नरमुंड का रहस्य-भाग 1 : पत्नी का खतरनाक अवैध संबंध

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मुरादाबाद आगरा राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक गांव है शिमलाठेर, जो थाना कुंदरकी के अंतर्गत आता है. 9 सितंबर, 2017 को इसी गांव के रहने वाले 2 भाई लक्ष्मण और ओमकार अपने भतीजे शिवम के साथ अपने खेत में पानी लगाने पहुंचे. उन्हें दिन में ही पानी लगाना था, लेकिन दिन में बिजली नहीं थी, इसलिए वे रात में गए थे. रात होने की वजह से वे टौर्च भी ले गए थे.

वे खेत पर पहुंचे तो उन्हें कुछ आहट सी सुनाई दी. टौर्च की रोशनी में उन्होंने देखा तो वहां 4 आदमी खड़े थे. उन के हाथों में हथियार थे. उन्होंने गांव के ही बबलू को बांध कर बैठा रखा था. बबलू संपन्न आदमी था. उन्हें समझते देर नहीं लगी कि ये बदमाश हैं. डर के मारे वे जाने लगे तो एक बदमाश ने उन पर टौर्च की रोशनी डालते हुए चेतावनी दी, ‘‘अगर भागे तो गोलियों से छलनी कर दिए जाओगे. जहां हो, वहीं रुक जाओ.’’

तीनों निहत्थे थे, इसलिए अपनीअपनी जगह खड़े हो गए. बदमाश उन को वहीं ले आए, जहां बबलू बंधा बैठा था. उन्होंने उन्हें भी बांध कर बबलू के साथ बैठा दिया. बदमाशों ने बबलू के साथ मंत्रणा कर के लक्ष्मण को खोल दिया. 3 बदमाश लक्ष्मण को ले कर चले गए और एक राइफलधारी बदमाश बंधे हुए लोगों के पास चौकसी से खड़ा रहा.

कुछ देर बाद वह लक्ष्मण को ले कर लौटा तो उन में से एक ने कहा, ‘‘लड़का तो अच्छा है.’’

इस के बाद बदमाशों ने आपस में कुछ बातें की और वही 3 बदमाश उसे फिर से ले कर जंगल में चले गए. करीब 20 मिनट बाद वे लौटे तो उन के साथ लक्ष्मण नहीं था. उन में से एक बदमाश ने कहा, ‘‘काम हो गया.’’

बदमाश के मुंह से यह बात सुन कर ओमकार और शिवम घबरा गए. लक्ष्मण को ले कर उन के दिमाग में तरहतरह के खयाल उठने लगे.

इस के बाद बदमाशों ने बबलू, ओमकार और शिवम की तलाशी ली. उन के पास जो मिला, उसे ले कर उन बदमाशों ने तीनों को औंधे मुंह लिटा कर उन के ऊपर चादर डाल कर धमकी दी कि वे अपनी खैर चाहते हैं तो इसी तरह पड़े रहें. डर की वजह से वे उसी तरह पड़े रहे.

जब उन्हें लगा कि बदमाश चले गए हैं तो बबलू ने चादर हटा कर इधरउधर देखा. वहां कोई नहीं दिखा तो उस ने ओमकार और शिवम से कहा, ‘‘लगता है, वे चले गए.’’

जब मिली लक्ष्मण की सिरकटी लाश

किसी तरह बबलू ने अपने हाथ खोल कर उन दोनों के हाथ भी खोले. इस के बाद सभी तेजी से गांव की ओर भागे. गांव जा कर उन्होंने बताया कि बदमाशों ने उन्हें बंधक बना कर लूट लिया और लक्ष्मण को अपने साथ ले गए हैं. उन के इतना कहते ही गांव में शोर मच गया. लाठीडंडा व अन्य हथियार ले कर गांव वाले खेतों की तरफ दौड़ पड़े.

सब लक्ष्मण और बदमाशों को खोजने लगे. थोड़ी देर में एक खेत के पुश्ते पर गड्ढे में लक्ष्मण की सिरकटी लाश मिल गई. इस की सूचना बबलू ने वहीं से फोन द्वारा थाना कुंदरकी को दे दी. उस समय थानाप्रभारी धीरज सिंह सोलंकी हाईवे पर गश्त पर थे. सूचना मिलते ही वह घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने इस वारदात की जानकारी एसएसपी प्रीतिंदर सिंह, एसपी (देहात) उदयशंकर सिंह, सीओ (बिलारी) अर्चना सिंह को दे दी.

लक्ष्मण की हत्या की बारे में पता चलने पर उस के घर में कोहराम मच गया था. उस की पत्नी अमरवती और दोनों बच्चे बिलख रहे थे. एसएसपी के निर्देश पर रात में ही घटनास्थल के आसपास सघन चैकिंग अभियान शुरू कर दिया गया, लेकिन न बदमाशों का सुराग मिला और न ही लक्ष्मण का सिर.

सवेरा होने पर पुलिस ने घटनास्थल की जरूरी काररवाई पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए मुरादाबाद भिजवा दिया. हालांकि बबलू लक्ष्मण के घर वालों के दुख में शरीक हो कर हर काम में बढ़चढ़ कर भाग ले रहा था, लेकिन उन्हें यही लग रहा था कि लक्ष्मण की हत्या में बबलू का हाथ है, क्योंकि वह उन से अदावत रखता था.

जैसेजैसे आसपास के गांवों में बदमाशों द्वारा शिमलाठेर गांव के लक्ष्मण का सिर काट कर ले जाने वाली बात पता चली, वे घटनास्थल की तरफ चल पड़े.

वहां पहुंच कर पता चला कि इस घटना के विरोध में लोग शिमलाठेर गांव में जमा हो रहे हैं तो वे भी वहीं चले गए. लक्ष्मण के घर के सामने इकट्ठा लोगों का पुलिस के प्रति गुस्सा बढ़ता जा रहा था. लक्ष्मण का सिर न मिलने से लोगों का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने मुरादाबादआगरा राजमार्ग पर जाम लगा दिया.

कुछ ही देर में राजमार्ग के दोनों तरफ कई किलोमीटर लंबा जमा लग गया. सूचना मिलने पर थाना पुलिस के अलावा सीओ अर्चना सिंह भी वहां पहुंच गईं. उन्होंने भीड़ को समझाने की कोशिश की, पर लोग वहां से नहीं हटे. तब एसएसपी प्रीतिंदर सिंह और एसपी (देहात) उदयशंकर सिंह भी वहां पहुंच गए. एसएसपी ने प्रदर्शनकारियों से कहा कि पुलिस को कुछ समय दो, लक्ष्मण का सिर व कातिल जल्द से जल्द पकड़े जाएंगे.

उन के समझाने के बाद उत्तेजित लोगों ने जाम खोल दिया. 10 सितंबर को पोस्टमार्टम के बाद लक्ष्मण का शव उस के घर वालों को सौंप दिया गया तो उसी दिन उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया. उस समय भारी संख्या में पुलिस भी मौजूद थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया था कि लक्ष्मण का सिर किसी तेज धारदार हथियार से एक ही झटके में काटा गया था. मरने से पहले उस ने बचाव के लिए संघर्ष किया था, क्योंकि उस की कलाइयों पर गहरे चोट के निशान थे.

मृतक के भाई ओमकार की तहरीर पर पुलिस ने गांव के ही बबलू और 4 अज्ञात लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. अगले दिन यह मामला अखबारों की सुर्खियों में आया तो इलाके में सनसनी फैल गई.

उधर एसपी देहात उदयशंकर सिंह व सीओ अर्चना सिंह जंगलों में सर्च औपरेशन चला कर लक्ष्मण का सिर ढूंढ रहे थे. जब सफलता नहीं मिली तो एसएसपी प्रीतिंदर सिंह ने सीओ अर्चना की अध्यक्षता में एक पुलिस टीम का गठन कर दिया.

टीम में थानाप्रभारी धीरज चौधरी, एसआई राजेश कुमार पुंडीर, ऋषि कपूर, कांस्टेबल अफसर अली, मोहम्मद नासिर, केशव त्यागी, कपिल कुमार, वेदप्रकाश दीक्षित के अलावा सर्विलांस टीम के एसआई नीरज शर्मा, कांस्टेबल अजय, राजीव कुमार, रवि कुमार, चंद्रशेखर आदि को शामिल किया गया था. एसओजी को भी टीम के साथ लगा दिया गया था. टीम का निर्देशन एसपी (देहात) उदयशंकर सिंह कर रहे थे.

चूंकि रिपोर्ट बबलू के नाम दर्ज थी, इसलिए पूछताछ के लिए उसे थाने ले आया गया. पूछताछ में वह खुद को बेकसूर बताने के अलावा यह भी कह रहा था कि वह दिशामैदान के लिए गया था, तभी बदमाशों ने उसे बंधक बना लिया था. उस ने बताया कि बदमाश उस की जेब से 3 हजार रुपए निकाल ले गए हैं. जब बबलू से कोई क्लू नहीं मिला तो पुलिस ने उसे घर भेज दिया.

हसबैंड बनाम बौयफ्रैंड : सबक सिखाने के लिए रची साजिश – भाग 3

लेकिन कोई खास बात हाथ नहीं लगी, सिवाय इस तसल्ली के कि उन का अपहरण नहीं हुआ है. क्योंकि जबलपुर जैसे बड़े शहर के व्यस्ततम इलाके के मौल से एक साथ 3 लोगों का अपहरण इतनी शांति से संपन्न हो जाना संभव नहीं था. सीसीटीवी फुटेज से पता चला कि संगीता दोपहर 3 बजे के लगभग मौल के दूसरे दरवाजे से बाहर गई थीं.

पर वह है कहां, इस सवाल का जवाब ढूंढने की चुनौती अब पुलिस वालों के सामने थी. इधर जैसे ही मीडिया वालों को एक धनाढ्य परिवार की बहू के मौल से बगैर कुछ बताए लापता हो जाने की खबर मिली, संगीता और उस के गुमशुदा बेटों को ले कर खासा बवाल मच गया. तरहतरह के सवाल न्यूज चैनल्स पर पूछे जा रहे थे और आशंकाएं भी जताई जा रही थीं. दूसरे दिन के समाचार पत्र भी संगीता ग्रोवर की रहस्यमय गुमशुदगी से रंगे पड़े थे.

संगीता के मायके व ससुराल वालों ने भी उसे खोजना शुरू कर दिया था. परिचितों के अलावा संगीता की सभी सहेलियों से पूछताछ की गई, पर कोई भी उस के बारे में खास जानकारी नहीं दे सका.

दूसरे दिन दोपहर 12 बजे जा कर इस राज से परदा हटा, जब यह अफवाह उड़ी कि संगीता ग्रोवर ने खुदकुशी कर ली है. दरअसल लगभग 12 बजे दोपहर को एसपी कटनी को कोरियर द्वारा संगीता का 12 पृष्ठों का सुसाइड नोट मिला, जिस में विस्तार से संगीता ने अपने ससुर को संबोधित करते हुए अपनी व्यथा लिखी थी और पति रंजन ग्रोवर पर तरहतरह के गंभीर अरोप लगाए थे.

आमतौर पर इतना लंबा सुसाइड नोट कोई नहीं लिखता कि वह उपन्यास जैसा हो, इसलिए पुलिस वाले इस बात को ले कर निश्चिंत हो चुके थे कि संगीता ने बेटों सहित खुदकुशी नहीं की है. पर वह है कहां, यह जानना जरूरी हो चला था, जिस से जबलपुर कटनी में बढ़ते बवाल और सवालों की रफ्तार को रोका जा सके.

अपनी खोजबीन में पुलिस टीम जबलपुर के डुमना एयरपोर्ट गई और वहां के सीसीटीवी फुटेज खंगाले तो संगीता दोनों बेटों सहित दिल्ली जाने वाली हवाई जहाज में सवार होती दिखी, साथ ही दिखा रंजन ग्रोवर का दोस्त या संगीता का प्रेमी सतीश कोटवानी. टिकिटों की खोजबीन की गई तो 2 अहम बातें ये पता चलीं कि टिकिट 15 दिसंबर को ही बुक करा लिए गए थे और संगीता नाम बदल कर सफर कर रही थी.

उस का टिकिट जसप्रीत कोटवानी के नाम से बुक था. बताने और छिपाने को अब कुछ खास नहीं रह गया था, सिवाय इस के कि संगीता पति के दोस्त या अपने प्रेमी सतीश कोटवानी के साथ अपनी मरजी से दिल्ली गई या भागी थी और इस की वजह भी उस ने विस्तार से अपने सुसाइड नोटनुमा पत्र में लिख दिया था.

संगीता का पकड़ा जाना जरूरी था, इसलिए एसपी एम.एस. सिकरवार की हिदायत पर टीआई अरविंद चौबे ने पुलिस की एक टीम तुरंत दिल्ली के लिए रवाना कर दी. संगीता के मोबाइल फोन की लोकेशन भी दिल्ली की ही मिल रही थी.

यह पुलिस टीम दिल्ली पहुंच भी नहीं पाई थी कि संगीता के मोबाइल फोन की लोकेशन गुजरात के भावनगर की मिलने लगी. पुलिस वाले कटनी के व्यापारियों के बढ़ते गुस्से के चलते परेशान थे, इसलिए खासतौर से उन्होंने संगीता और सतीश के मोबाइल ट्रेस किए हुए थे. दिल्ली के बजाए चारों भावनगर में हैं, यह जान कर पुलिस वालों को तुरंत समझ आ गया कि इतनी जल्दी ये लोग रेल या सड़क के रास्ते तो दिल्ली से भावनगर जा नहीं सकते, जाहिर है उन्होंने फिर हवाई यात्रा की है. नाकाम चालाकी दिखाते हुए संगीता और सतीश, दोनों ने अपने सिम बदल लिए थे. पर वे मोबाइल फोन पुराना ही इस्तेमाल कर रहे थे, इसलिए उन के ईएमआईई नंबरों के जरिए उन की लोकेशन आसानी से पकड़ में आ रही थी.

तीसरे दिन पुलिस टीम ने भावनगर जा कर एक फाइव स्टार होटल से इन लोगों को पकड़ लिया. यहां भी संगीता जसप्रीत कोटवानी के नाम से ही ठहरी थी. भावनगर से अलगअलग कारों से उन्हें जबलपुर लाया गया तो मामले की सनसनी खत्म हुई, जिस का सार यह था कि खोदा पहाड़ निकली चुहिया. क्योंकि ऐसा तो आजकल बेहद आम हो चला है कि लड़कियां या बहुएं कभीकभार अपने यार के साथ भाग जाती हैं. जबलपुर आ कर संगीता ने ससुराल और पति के पास जाने से सख्ती से इनकार कर दिया तो उसे अपनी मां के पास भेज दिया गया. सतीश को उस के घर जाने दिया गया. दोनों बालिग थे और अपनीअपनी मरजी से गए थे, इसलिए उस पर किसी तरह का कोई आपराधिक कृत्य नहीं बनता था.

जबलपुर में भी संगीता अपने सुसाइड नोट वाले कथनों पर अड़ी रही, जो अब बयानों की शकल में दर्ज हुए कि उस का पति रंजन क्रूर और अय्याश है. पति से वह किस हद तक नफरत करने लगी थी, यह उस के लिखने में भी झलकता था कि उस के हाथों अंतिम संस्कार होना भी उसे गवारा नहीं. रंजन ने 5 बार उस का अबौरशन करवाया और कुछ दिनों पहले कान्हा किसली नेशनल पार्क में उसे शराब पी कर दोस्तों के साथ नाचने को मजबूर किया. अपने ससुर को संबोधित करते हुए उस ने यह भी लिखा था कि जब आप झूठे गवाह खड़े कर के हत्या के मामले से अपने भांजे को रिहा करवा सकते हैं तो बेटे की करतूत ढंकने के लिए क्या कुछ नहीं कर सकते. संगीता को डर था कि अगर वह कटनी या जबलपुर में आत्महत्या करती तो सच दुनिया के सामने नहीं आ पाता और यह सच उतना वीभत्स नहीं होता, जितना कि वह बताना चाह रही थी. पीनापिलाना आजकल आम बातें हैं. रही बात पतिपत्नी के बीच कलह की तो सिवाय बारबार गर्भपात कराए जाने के दूसरे आरोप बहुत ज्यादा गंभीर नहीं हैं.

रंजन ज्यादती और गलती कर रहा था, इस में कोई शक नहीं, पर वे कितनी गंभीर थीं, इस का फैसला अब अदालत में होगा, जहां काम भावुकता से नहीं, बल्कि गवाहों और सबूतों की बिना पर होता है. जबलपुर वापस आ कर जितना जहर पति के खिलाफ संगीता ने उगला, उस से ज्यादा अपने दोस्त सतीश की वकालत की. वह यह कहती रही कि सतीश की वजह से ही वह और उस के बेटे जिंदा बच पाए, नहीं तो उस ने खुदकुशी का इरादा कर लिया था. जाहिर है, उस की मुमकिन कोशिश यह है कि कोई उस की और सतीश की दोस्ती को गलत नजरिए से न देखे. उलट इस के पति की लड़कियों से दोस्ती को ले कर वह दुखी रहती थी तो यह दोहरापन नहीं तो और क्या है.

ब्लैकमेलिंग का साइड इफेक्ट : हैरान कर देगी ये कहानी

‘‘रजनी, क्या बात है आजकल तुम कुछ बदलीबदली सी लग रही हो. पहले की तरह बात भी नहीं करती.

मिलने की बात करो तो बहाने बनाती हो. फोन करो तो ठीक से बात भी नहीं करतीं. कहीं हमारे बीच कोई और तो नहीं आ गया.’’ कमल ने अपनी प्रेमिका रजनी से शिकायती लहजे में कहा तो रजनी ने जवाब दिया, ‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है, मेरे जीवन में तुम्हारे अलावा कोई और आ भी नहीं सकता.’’

रजनी और कमल लखनऊ जिले के थाना निगोहां क्षेत्र के गांव अहिनवार के रहने वाले थे. दोनों का काफी दिनों से प्रेम संबंध चल रहा था.

‘‘रजनी, फिर भी मुझे लग रहा है कि तुम मुझ से कुछ छिपा रही हो. देखो, तुम्हें किसी से भी डरने की जरूरत नहीं है. कोई बात हो तो मुझे बताओ. हो सकता है, मैं तुम्हारी कोई मदद कर सकूं.’’ कमल ने रजनी को भरोसा देते हुए कहा.

‘‘कमल, मैं ने तुम्हें बताया नहीं, पर एक दिन हम दोनों को हमारे फूफा गंगासागर ने देख लिया था.’’ रजनी ने बताया.

‘‘अच्छा, उन्होंने घर वालों को तो नहीं बताया?’’ कमल ने चिंतित होते हुए कहा.

‘‘अभी तो उन्होंने नहीं बताया, पर बात छिपाने की कीमत मांग रहे हैं.’’ रजनी बोली.

‘‘कितने पैसे चाहिए उन्हें?’’ कमल ने पूछा.

‘‘नहीं, पैसे नहीं बल्कि एक बार मेरे साथ सोना चाहते हैं. वह धमकी दे रहे हैं कि अगर उन की बात नहीं मानी तो वह मेरे घर में पूरी बात बता कर मुझे घर से निकलवा देंगे.’’ रजनी के चेहरे पर चिंता के बादल छाए हुए थे.

‘‘तुम चिंता मत करो, बस एक बार तुम मुझ से मिलवा दो. हम उस की ऐसी हालत कर देंगे कि वह बताने लायक ही नहीं रहेगा. वह तुम्हारा सगा रिश्तेदार है तो यह बात कहते उसे शरम नहीं आई?’’ रजनी को चिंता में देख कमल गुस्से से भर गया.

‘‘अरे नहीं, मारना नहीं है. ऐसा करने पर तो हम ही फंस जाएंगे. जो बात हम छिपाना चाह रहे हैं, वही फैल जाएगी.’’ रजनी ने कमल को समझाते हुए कहा.

‘‘पर जो बात मैं तुम से नहीं कह पाया, वह उस ने तुम से कैसे कह दी. उसे कुछ तो शरम आनी चाहिए थी. आखिर वह तुम्हारे सगे फूफा हैं.’’ कमल ने कहा.

‘‘तुम्हारी बात सही है. मैं उन की बेटी की तरह हूं. वह शादीशुदा और बालबच्चेदार हैं. फिर भी वह मेरी मजबूरी का फायदा उठाना चाहते हैं.’’ रजनी बोली.

‘‘तुम चिंता मत करो, अगर वह फिर कोई बात करे तो बताना. हम उसे ठिकाने लगा देंगे.’’ कमल गुस्से में बोला.  इस के बाद रजनी अपने घर आ गई पर रजनी को इस बात की चिंता होने लगी थी.

ब्लैकमेलिंग में अवांछित मांग

38 साल के गंगासागर यादव का अपना भरापूरा परिवार था. वह लखनऊ जिले के ही सरोजनीनगर थाने के गांव रहीमाबाद में रहता था. वह ठेकेदारी करता था. रजनी उस की पत्नी रेखा के भाई की बेटी थी.

उस से उम्र में 15 साल छोटी रजनी को एक दिन गंगासागर ने कमल के साथ घूमते देख लिया था. कमल के साथ ही वह मोटरसाइकिल से अपने घर आई थी. यह देख कर गंगासागर को लगा कि अगर रजनी को ब्लैकमेल किया जाए तो वह चुपचाप उस की बात मान लेगी. चूंकि वह खुद ही ऐसी है, इसलिए यह बात किसी से बताएगी भी नहीं. गंगासागर ने जब यह बात रजनी से कही तो वह सन्न रह गई. वह कुछ नहीं बोली.

गंगासागर ने रजनी से एक दिन फिर कहा, ‘‘रजनी, तुम्हें मैं सोचने का मौका दे रहा हूं. अगर तुम ने मेरी बात नहीं मानी तो घर में तुम्हारा भंडाफोड़ कर दूंगा. तुम तो जानती ही हो कि तुम्हारे मांबाप कितने गुस्से वाले हैं. मैं उन से यह बात कहूंगा तो मेरी बात पर उन्हें पक्का यकीन हो जाएगा और बिना कुछ सोचेसमझे ही वे तुम्हें घर से निकाल देंगे.’’

रजनी को धमकी दे कर गंगासागर चला गया. समस्या गंभीर होती जा रही थी. रजनी सोच रही थी कि हो सकता है उस के फूफा के मन से यह भूत उतर गया हो और दोबारा वह उस से यह बात न कहें.

यह सोच कर वह चुप थी, पर गंगासागर यह बात भूला नहीं था. एक दिन रजनी के घर पहुंच गया. अकेला पा कर उस ने रजनी से पूछा, ‘‘रजनी, तुम ने मेरे प्रस्ताव पर क्या विचार किया?’’

‘‘अभी तो कुछ समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं. देखिए फूफाजी, आप मुझ से बहुत बड़े हैं. मैं आप के बच्चे की तरह हूं. मुझ पर दया कीजिए.’’ रजनी ने गंगासागर को समझाने की कोशिश की.

‘‘इस में बड़ेछोटे जैसी कोई बात नहीं है. मैं अपनी बात पर अडिग हूं. इतना समझ लो कि मेरी बात नहीं मानी तो भंडाफोड़ दूंगा. इसे कोरी धमकी मत समझना. आखिरी बार समझा रहा हूं.’’ गंगासागर की बात सुन कर रजनी कुछ नहीं बोली. उसे यकीन हो गया था कि वह मानने वाला नहीं है.

रजनी ने यह बात कमल को बताई. कमल ने कहा, ‘‘ठीक है, किसी दिन उसे बुला लो.’’

इस के बाद रजनी और कमल ने एक योजना बना ली कि अगर वह अब भी नहीं माना तो उसे सबक सिखा देंगे. दूसरी ओर गंगासागर पर तो किशोर रजनी से संबंध बनाने का भूत सवार था.

सुबह होते ही उस का फोन आ गया. फूफा का फोन देखते ही रजनी समझ गई कि अब वह मानेगा नहीं. कमल की योजना पर काम करने की सोच कर उस ने फोन रिसीव करते हुए कहा, ‘‘फूफाजी, आप कल रात आइए. आप जैसा कहेंगे, मैं करने को तैयार हूं.’’

रजनी इतनी जल्दी मान जाएगी, गंगासागर को यह उम्मीद नहीं थी. अगले दिन शाम को उस ने रजनी को फोन कर पूछा कि वह कहां मिलेगी. रजनी ने उसे मिलने की जगह बता दी.

अपने आप बुलाई मौत

18 जुलाई, 2018 को रात गंगासागर ने 8 बजे अपनी पत्नी को बताया कि पिपरसंड गांव में दोस्त के घर बर्थडे पार्टी है. अपने साथी ठेकेदार विपिन के साथ वह वहीं जा रहा है.

गंगासागर रात 11 बजे तक भी घर नहीं लौटा तो पत्नी रेखा ने उसे फोन किया. लेकिन उस का फोन बंद था. रेखा ने सोचा कि हो सकता है ज्यादा रात होने की वजह से वह वहीं रुक गए होंगे, सुबह आ जाएंगे.

अगली सुबह किसी ने फोन कर के रेखा को बताया कि गंगासागर का शव हरिहरपुर पटसा गांव के पास फार्महाउस के नजदीक पड़ा है. यह खबर मिलते ही वह मोहल्ले के लोगों के साथ वहां पहुंची तो वहां उस के पति की चाकू से गुदी लाश पड़ी थी. सूचना मिलने पर पुलिस भी वहां पहुंच गई. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी और गंगासागर के पिता श्रीकृष्ण यादव की तहरीर पर अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया.

कुछ देर बाद पुलिस को सूचना मिली कि गंगासागर की लाल रंग की बाइक घटनास्थल से 22 किलोमीटर दूर असोहा थाना क्षेत्र के भावलिया गांव के पास सड़क किनारे एक गड्ढे में पड़ी है. पुलिस ने वह बरामद कर ली.

जिस क्रूरता से गंगासागर की हत्या की गई थी, उसे देखते हुए सीओ (मोहनलाल गंज) बीना सिंह को लगा कि हत्यारे की मृतक से कोई गहरी खुंदक थी, इसीलिए उस ने चाकू से उस का शरीर गोद डाला था ताकि वह जीवित न बच सके.

पुलिस ने मृतक के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवा कर उस का अध्ययन किया. इस के अलावा पुलिस ने उस की सालियों, साले, पत्नी सहित कुछ साथी ठेकेदारों से भी बात की. एसएसआई रामफल मिश्रा ने काल डिटेल्स खंगालनी शुरू की तो उस में कुछ नंबर संदिग्ध लगे.

लखनऊ के एसएसपी कलानिधि नैथानी ने घटना के खुलासे के लिए एसपी (क्राइम) दिनेश कुमार सिंह के निर्देशन में एक टीम का गठन किया, जिस में थानाप्रभारी अजय कुमार राय के साथ अपराध शाखा के ओमवीर सिंह, सर्विलांस सेल के सुधीर कुमार त्यागी, एसएसआई रामफल मिश्रा, एसआई प्रमोद कुमार, सिपाही सरताज अहमद, वीर सिंह, अभिजीत कुमार, अनिल कुमार, राजीव कुमार, चंद्रपाल सिंह राठौर, विशाल सिंह, सूरज सिंह, राजेश पांडेय, जगसेन सोनकर और महिला सिपाही सुनीता को शामिल किया गया.

काल डिटेल्स से पता चला कि घटना की रात गंगासागर की रजनी, कमल और कमल के दोस्त बबलू से बातचीत हुई थी. पुलिस ने रजनी से पूछताछ शुरू की और उसे बताया, ‘‘हमें सब पता है कि गंगासागर की हत्या किस ने की थी. तुम हमें सिर्फ यह बता दो कि आखिर उस की हत्या करने की वजह क्या थी?’’

रजनी सीधीसादी थी. वह पुलिस की घुड़की में आ गई और उस ने स्वीकार कर लिया कि उस की हत्या उस ने अपने प्रेमी के साथ मिल कर की थी.

उस ने बताया कि उस के फूफा गंगासागर ने उस का जीना दूभर कर दिया था, जिस की वजह से उसे यह कदम उठाना पड़ा. रजनी ने पुलिस को हत्या की पूरी कहानी बता दी.

गंगासागर की ब्लैकमेलिंग से परेशान रजनी ने उसे फार्महाउस के पास मिलने को बुलाया था. वहां कमल और उस का साथी बबलू पहले से मौजूद थे. गंगासागर को लगा कि रजनी उस की बात मान कर समर्पण के लिए तैयार है और वह रात साढ़े 8 बजे फार्महाउस के पीछे पहुंच गया.

रजनी उस के साथ ही थी. गंगासागर के मन में लड्डू फूट रहे थे. जैसे ही उस ने रजनी से प्यारमोहब्बत भरी बात करनी शुरू की, वहां पहले से मौजूद कमल ने अंधेरे का लाभ उठा कर उस पर लोहे की रौड से हमला बोल दिया. गंगासागर वहीं गिर गया तो चाकू से उस की गरदन पर कई वार किए. जब वह मर गया तो कमल और बबलू ने खून से सने अपने कपड़े, चाकू और रौड वहां से कुछ दूरी पर झाड़ के किनारे जमीन में दबा दिया.

दोनों अपने कपड़े साथ ले कर आए थे. उन्हें पहन कर कमल गंगासागर की बाइक ले कर उन्नाव की ओर भाग गया. बबलू रजनी को अपनी बाइक पर बैठा कर गांव ले आया और उसे उस के घर छोड़ दिया. कमल ने गंगासागर की बाइक भावलिया गांव के पास सड़क किनारे गड्ढे में डाल दी, जिस से लोग गुमराह हो जाएं. पुलिस ने बड़ी तत्परता से केस की छानबीन की और हत्या का 4 दिन में ही खुलासा कर दिया. एसएसपी कलानिधि नैथानी और एसपी (क्राइम) दिनेश कुमार सिंह ने केस का खुलासा करने वाली पुलिस टीम की तारीफ की.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में रजनी परिवर्तित नाम है.

बेटी ने दी बाप के कत्ल की सुपारी : भाग 3

दरअसल, समीर के पिता जरीफ बीएएमएस डाक्टर थे और शामली में अपना क्लीनिक चलाते थे. उन की चाहत थी कि समीर बड़ा हो कर डाक्टर बने. इसीलिए उन्होंने डाक्टरी की कोचिंग के लिए उसे कोटा भेज दिया था. उन के रिश्तेदार का बेटा भी समीर के साथ ही एमबीबीएस की तैयारी कर रहा था.

काव्या से शुरू हुई समीर की दोस्ती गुजरते वक्त के साथ प्यार में बदल गई थी. काव्या के प्रति समीर की चाहत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि एक दिन उस ने अपने हाथ पर उस का नाम भी गुदवा लिया. काव्या को यह तो पता था कि समीर उस पर मरता है लेकिन उसे ये नहीं मालूम था कि उस की दीवानगी में वह उस का नाम अपने हाथ पर भी गुदवा लेगा.

इधर इंटरमीडिएट के बाद दोनों चोरीछिपे पढ़ाई के बहाने कभी घर में तो कभी घर के बाहर मिलतेजुलते थे. धीरेधीरे यह बात राकेश के कानों तक जा पहुंची. राकेश की पत्नी कृष्णा के संबध भी अपने पति से ठीक नहीं थे.

दरअसल, तेजतर्रार और चंचल स्वभाव वाली कृष्णा के चरित्र पर राकेश को पहले से ही शक था. राकेश को भनक थी कि कृष्णा उस के ड्यूटी जाने के बाद घर से बाहर अपने चाहने वालों से मिलती रहती है. राकेश को तो इस बात का भी शक था कि कृष्णा के चाहने वाले उस से मिलने के लिए घर में भी आते हैं.

यही कारण था कि अकसर राकेश और कृष्णा के बीच झगड़ा होता रहता था. अपनी इसी झल्लाहट में राकेश कृष्णा पर अकसर हाथ भी छोड़ देता था. जब राकेश शराब पी लेता तो वह कृष्णा को न सिर्फ गालियां देता, बल्कि मारपीट करने के दौरान यहां तक तंज कस देता कि उसे शक है कि उस की तीनों औलाद असल में उस की हैं या किसी और की.

पिता का विरोध करने के लिए जब उस की दोनों बेटियां वैशाली और वैष्णवी उर्फ काव्या कोशिश करतीं तो उन्हें भी राकेश की मार का शिकार होना पड़ता.

इस दौरान जब एक दिन राकेश को पता चला कि काव्या का चक्कर समीर नाम के एक मुसलिम युवक से चल रहा है तो उन का गुस्सा और बढ़ गया. उस ने पत्नी के साथ अब दोनों बेटियों पर भी लगाम कसनी शुरू कर दी. हालांकि समीर एमबीबीएस की तैयारी करने के लिए कोटा जरूर चला गया था, लेकिन वह हर हफ्ते चोरीछिपे अपने परिवार को बताए बिना शामली आता और काव्या से मिल कर चला जाता था.

काव्या और समीर की दोस्ती और परवान चढ़ रहे प्यार की कहानी की खबर काव्या की मां कृष्णा और उस की बड़ी बहन वैशाली को थी. इस की जानकारी राकेश को जब मोहल्ले के कुछ लोगों से मिली तो उस ने काव्या के साथ सख्ती से पेश आना शुरू कर दिया.

राकेश थक गया था लोगों के ताने सुन कर

शक की आग में जल रहे राकेश के गुस्से में एक दिन उस समय घी पड़ गया, जब वह अपनी ड्यूटी से घर लौट रहा था. मोहल्ले के ही एक व्यक्ति ने उसे रोक कर कहा, ‘‘राकेश भाई, आंखों पर ऐसी कौन से पट्टी बांध रखी है आप ने, जो दूसरे मजहब का एक लड़का सरेआम आप की बेटी को ले कर घूमता है. आप के घर आताजाता है. लेकिन न तो आप उसे रोक रहे हैं और न ही आप की धर्मपत्नी. अरे भाई अगर कोई डर या कोई दूसरी वजह है तो हमें बताओ, हम रोक देंगे उस लड़के को.’’

उस दिन कालोनी के व्यक्ति का ताना सुन कर राकेश के तनबदन में आग लग गई. ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. इस से पहले भी अलगअलग लोगों ने दबी जुबान में इस बात की शिकायत की थी, लेकिन अब काव्या की शिकायतें खुल कर होने लगीं. खुद राकेश ने भी एकदो बार समीर को अपने घर आते देखा था.

राकेश ने पहले समीर को समझा कर कह दिया कि वह उस के घर न आया करे, क्योंकि काव्या से उस का मिलनाजुलना उन्हें पसंद नहीं है. बाद में जब समझाने पर भी समीर नहीं माना तो उस ने समीर को एक बार 2-3 थप्पड़ भी जड़ दिए. साथ ही धमकी भी दी कि अगर फिर कभी काव्या से मिलने की कोशिश की तो वह उसे पुलिस को सौंप देंगे.

इस के बाद से समीर ने काव्या से मिलने में सावधानी बरतनी शुरू कर दी. अब या तो वह काव्या से सिर्फ उस के घर पर ही मिलता था या फिर दोनों शहर से बाहर कहीं दूर जा कर मिलते थे.

राकेश के ड्यूटी पर निकल जाने के बाद घर में क्याक्या होता, यह खबर रखने के लिए राकेश ने अपने घर में सीसीटीवी कैमरे लगवा लिए. इन सीसीटीवी कैमरों का मौनीटर उस ने अपने मोबाइल फोन में इंस्टाल करवा लिया. इसी सीसीटीवी के जरिए वह राज खुल गया, जिस का राकेश को शक था. उस ने मौनीटर पर खुद देखा कि किस तरह उस की गैरमौजूदगी में उस की पत्नी और बेटी से मिलने के लिए उन के आशिक उसी के घर में आते हैं.

पहले पत्नी उतरी विरोध पर

पत्नी और बेटी के चरित्र के इस खुलासे के बाद राकेश का मन बेटियों और पत्नी के प्रति खट्टा हो गया. राकेश के लिए पत्नी और बेटियों के साथ मारपीट करना अब आए दिए की बात हो गई.

रोजरोज की मारपीट और बंधनों से परेशान कृष्णा ने एक दिन अपनी दोनों बेटियों के सामने खीझते हुए बस यूं ही कह दिया कि जिंदा रहने से तो अच्छा है कि ये इंसान मर जाए, पता नहीं वो कौन सा दिन होगा जब हमें इस आदमी से छुटकारा मिलेगा.

बस उसी दिन काव्या के दिलोदिमाग में ये बात बैठ गई कि जब तक उस का पिता जिंदा है, वह और उस की मांबहनें आजादी की सांस नहीं ले सकतीं, न ही अपनी मरजी से जिंदगी जी सकती हैं.

काव्या के दिमाग में उसी दिन से उधेड़बुन चलने लगी कि आखिर ऐसा क्या किया जाए कि उस का पिता उन के रास्ते से हट जाए. अचानक उस की सोच समीर पर आ कर ठहर गई. उसे लगने लगा कि समीर उस से जिस कदर प्यार करता है, बस एक वही है, जो उस की खातिर ये काम कर सकता है.

लेकिन इस के लिए जरूरी था कि समीर को भावनात्मक रूप से और लालच दे कर इस काम के लिए तैयार किया जाए. इस बात का जिक्र काव्या ने अपनी मां से किया तो उस ने भी हामी भर दी. बस फिर क्या था काव्या मौके का इंतजार करने लगी.

एक दिन मौका मिल गया. समीर ने रोजरोज चोरीछिपे मिलने से परेशान हो कर काव्या से कहा कि वह इस तरह मिलनेजुलने से परेशान हो चुका है, क्यों न वे दोनों भाग जाएं और शादी कर लें.

पिता को बताया जल्लाद

काव्या ने कहा कि वह उस से भाग कर नहीं बल्कि पूरे जमाने के सामने ही शादी करेगी लेकिन इस के लिए एक समस्या है. काव्या ने समीर से कहा कि उस के पिता उन के प्रेम में बाधा बने हैं. उन के जीते जी कभी वे दोनों एक नहीं हो सकते. उन के मेलजोल के कारण ही पिता आए दिन पूरे परिवार के साथ मारपीट करते है.

दरोगा की कातिल पत्नी : मां-बेटी बने पिता के कातिल – भाग 3

अरशद ने मारा था सना को

जीनत ने यह बात अरशद को बताई तो अरशद ने सना की हत्या कराने का फैसला कर लिया. उस ने सोचा कि सना के न रहने पर उसे जीनत से मिलने में कोई बाधा नहीं आएगी. इस बारे में अरशद ने अपने गांव के बचपन के दोस्त सलमान से बात की. सलमान अरशद का साथ देने के लिए तैयार हो गया और एक दिन उस ने सना को गोली मार दी.

हत्याकांड की जानकारी मिलने के बाद सदर पुलिस ने अगले 24 घंटे में ही अरशद को गिरफ्तार कर के उस के कब्जे से हत्या में प्रयुक्त 315 बोर का देशी तमंचा, 2 कारतूस और मोटरसाइकिल बरामद कर ली थी.

अरशद से पूछताछ में पता चला था कि हत्या में मदद करने वाला उस का दूसरा साथी भी प्रतापगढ़ जिले के गांव कढ़ार का रहने वाला सलमान है, तो पुलिस ने सलमान की गिरफ्तारी के प्रयास करते हुए कई बार उस के ठिकानों पर दबिशें दीं, लेकिन सलमान हर बार पुलिस की पकड़ में आने से बचता रहा.

आखिरकार एसपी सुभाष चंद्र शाक्य ने उस की गिरफ्तारी पर 25 हजार रुपए का ईनाम घोषित कर दिया. जिस के एक हफ्ते बाद सलमान को सदर पुलिस ने रोडवेज बस स्टैंड से गिरफ्तार कर लिया. आरोपी को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

थानाप्रभारी डी.सी. शर्मा को अनायास सना की हत्या करने वाले कातिल अरशद का वह कबूल नामा भी याद आने लगा जब उस ने बताया था कि सना चाहती थी कि अगर वह उस के पिता मेहरबान अली को मार देने में उस की मदद करे तो अनुकंपा के आधार पर उन की नौकरी उसे मिल जाएगी.

सना ने अरशद से ये भी कहा था कि यदि वह ऐसा कर देगा तो वह उस से शादी कर लेगी. अरशद ने ये भी बताया था कि सना ने उस से कहा था कि उस के पिता उस की मां और सभी बहनों के साथ न सिर्फ मारपीट करते हैं बल्कि सभी बहनों पर पाबंदियां भी लगाते हैं. लेकिन अरशद ने सना का ये औफर इसलिए ठुकरा दिया था, क्योंकि वह सना से नहीं बल्कि उस की बहन जीनत से प्यार करता था.

घर वालों के बयानों में मिला विरोधाभास

उस वक्त तो थानाप्रभारी को लगा था कि अरशद शायद अपने बचाव में और सना को ही दोषी ठहराने के लिए झूठी कहानी गढ़ रहा है. लेकिन अब जबकि दरोगा मेहरबान अली की हत्या हुई तो उन्हें अरशद के उस बयान में सच्चाई नजर आने लगी. उन्हें लगने लगा कि संभव है, मेहरबान अली की हत्या का राज कहीं न कहीं उन के घर में ही छिपा हो.

अगली सुबह सब से पहले उन्होंने पुलिस टीम के साथ मेहरबान अली के घर का दौरा किया. उन्होंने एकएक कर के मेहरबान अली की पत्नी और उस की बेटियों से पूछताछ की. उन्होंने सभी से मेहरबान अली के शनिवार को घर से बाहर जाने का घटनाक्रम पूछा था. तो न जाने क्यों मांबेटियों के बयानों में एक के बाद एक कई विरोधाभास नजर आए.

किसी ने बताया कि वह दोपहर को खाना खा कर ड्यूटी चले गए थे. किसी ने बताया कि वह सुबह 10 बजे ही रात की ड्यूटी कर के घर लौटे थे और शाम को घर से गए थे. यह भी पता चला कि उन्होंने रात को घर न लौटने पर पुलिस लाइन में फोन कर के उन के घर न लौटने के बारे में पूछा था. लेकिन वहां से पता चला कि उस दिन मेहरबान अली ड्यूटी पर आए ही नहीं थे.

थानाप्रभारी शर्मा ने एसएसआई रामनरेश यादव को पुलिस लाइन में बने वायरलैस कंट्रोल रूम भेजा तो उन्हें पता चला कि मेहरबान अली के बारे में जानकारी लेने के लिए उन की पत्नी जाहिदा ने पुलिस लाइन में कोई फोन नहीं किया था. यह सुन कर थानाप्रभारी का शक यकीन में बदलने लगा कि हो न हो मेहरबान अली के कातिल उन के घर में ही छिपे हैं.

अपने शक को पुख्ता करने के लिए जब उन्होंने वायरलैस औफिस में मेहरबान अली की ड्यूटी का चार्ट निकलवाया तो जानकारी मिली कि मेहरबान अली इस सप्ताह रात की ड्यूटी पर तैनात थे. वह शुक्रवार की रात को ड्यूटी कर के शनिवार सुबह अपने घर आए थे.

डी.सी. शर्मा सोचने लगे कि अगर मेहरबान अली रात की ड्यूटी कर के घर लौटे थे तो दोपहर साढ़े 12 बजे वह भला दोबारा ड्यूटी पर क्यों जाएंगे. अब उन्हें लगने लगा कि मेहरबान अली को ले कर घर वाले झूठ बोल रहे हैं. इस झूठ का परदाफाश करना ही पड़ेगा.

थानाप्रभारी पुलिस टीम और फोरेंसिक टीम को ले कर एक बार फिर मेहरबान अली के घर पहुंचे. उन्होंने जब उन के घर व आसपास के घरों का निरीक्षण किया तो अनायास उन की नजर उन के घर के सामने वाले घर की छत पर लगे सीसीटीवी कैमरे पर पड़ी.

सीसीटीवी कैमरे से मिला क्लू

संयोग से सीसीटीवी कैमरे की दिशा ऐसी थी कि मेहरबान अली के घर आनेजाने वाला हर शख्स वीडियो में कैद हो सकता था. उन्होंने सीसीटीवी की फुटेज देखी तो अचानक मेहरबान अली हत्याकांड का पूरा सच सब के सामने आ गया.

सीसीटीवी वीडियो में 23 जून, 2018 को सुबह 9 बजे दरोगा मेहरबान अली घर के अंदर दाखिल होते दिखे थे. संभवत: वह उस वक्त अपनी ड्यूटी से लौटे थे. लगभग डेढ़ घंटे बाद घर के अंदर 2 अन्य लोग जाते दिखे लेकिन देर रात तक वह दोनों वापस लौटते नहीं दिखे. इस के बाद रात होने तक कोई असामान्य बात नहीं दिखी. लेकिन रात को 10 बजे के बाद अचानक मेहरबान अली की पत्नी व बेटियों की असामान्य गतिविधियां दिखाई पड़ीं.

करीब 10 बजे मेहरबान अली की पत्नी जाहिदा दरवाजे तक आई कुछ देर रोड पर इधरउधर देखा और लौट गई. उस के बाद कुछ देर बाद उस की बेटी आलिया और इरम बाहर आईं उन्होंने भी गली में इधरउधर देखा और वहां रुक कर मोबाइल देखती रहीं फिर वापस घर में भीतर चली गईं. इस के बाद मेहरबान अली की बड़ी बेटी शबा भी बाहर आई और कुछ देर रुक कर वह भी अंदर चली गई.

प्यार के लिए अपराध : अपने ही परिवार को बनाया निशाना

गांव की एक बहुत प्रचलित कहावत है, ‘भूख न देखे रूखा भात, प्यार न जाने जातपात और नींद न देखे टूटी खाट’. वास्तव में पे्रम जाति और धर्म का बंधन नहीं देखता है. कई बार वह ऊंचनीच और नातेरिश्तों को भी भूल जाता है.

ऐसे में प्यार की पगडंडी पर चल कर कभीकभी ऐसे कदम भी उठ जाते हैं, जो अपराध को भी बढ़ावा देने से पीछे नहीं हटते. लखनऊ शहर के रसूलपुर आशिक अली के रहने वाले मनोज कुमार की 19 साल की बेटी खुशबू कुमार की कहानी भी कुछ इसी तरह की है.

खुशबू की शहर के ही लालशाह का पुरवा मलौली के रहने वाले विनय यादव के साथ दोस्ती हो गई थी. 21 साल का विनय खुशबू को बेहद प्यार करता था.

लेकिन उन के बीच जातपात की गहरी खाई थी. दोनों ही परिवारों को इन की दोस्ती पसंद नहीं थी. इस के बाद भी विनय और खुशबू किसी भी तरह एकदूसरे को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे.

लेकिन परेशानी यह थी कि उन्हें साथ रहने का रास्ता नहीं दिख रहा था. अच्छी बात यह थी कि विनय और खुशबू के बीच एक सामंजस्य बना हुआ था. दोनों ही मिल कर अपने दिल की बात कर लेते थे.

इस बात की खबर जब खुशबू के घर वालों को होती तो वे विनय के घर वालों से शिकायत करते, जिस से दोनों परिवारों के बीच तनातनी हो जाती थी. जिसे प्रेमी युगल भी घबरा जाते. खुशबू पर भी मनोज इस बात का दबाव बनाता कि वह विनय से मिलना छोड़ दे.

एक दिन खुशबू ने विनय से कहा, ‘‘विनय, तुम अब यह देखो कि हम लोग कैसे एक साथ रह सकते हैं. क्योंकि अब घर में परेशानियां बढ़ने लगी हैं. हमारा तुम्हारा इस तरह मिलना संभव नहीं हो पाएगा. मैं कब तक घर वालों से झगड़ा करती रहूंगी.’’

‘‘खुशबू तुम्हें लगता है कि जैसे मैं कुछ सोचता नहीं. ऐसी बात नहीं है. पर मेरी समझ में कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा. पहले तो सिटी में नौकरी कर लेता था. लौकडाउन हुआ तो नौकरी चली गई. अब तो अपने खर्च उठाना और भी मुश्किल हो गया है. अपने पास घर और नौकरी दोनों नहीं होगी तो काम ही नहीं चलेगा.’’ विनय ने खुशबू को अपनी परेशानी से अवगत कराते हुए समझाया.

खुशबू को वह समय याद आ रहा था जब उस की पहली मुलाकात विनय से हुई थी. विनय उसे हर लड़के से अलग लगता था. हमेशा उस का खयाल रखता और बहुत सारी चीजें भी देता रहता था. खुशबू और विनय के बीच जब थोड़ी दोस्ती बढ़ गई तो खुशबू उस के साथ शादी और बाकी जीवन गुजरबसर करने के सपने देखने लगी.

खुशबू ने सोचा था कि जब उस के घर परिवार के लोग इस दोस्ती और प्यार को शादी के रिश्ते में बदलने नहीं देंगे तो वह गांव छोड़ कर विनय के साथ शहर चली जाएगी. वहां दोनों साथसाथ रहेंगे. विनय नौकरी करेगा और वह घर को संभालेगी. विनय के वापस आने का इंतजार करेगी.

ऐसे ही हसीन सपनों में दोनों का समय गुजर रहा था. अब दोनों ही अपनी दोस्ती को रिश्ते में बदलने का इंतजार कर रहे थे.

इसी बीच पिछले साल कोरोना महामारी बढ़ने पर लौकडाउन लग गया तो दुकानें, होटल, फैक्ट्री आदि पिछले साल बंद हो गईं, जिस से बहुत सारे लोग घर बैठ गए.

शुरुआत में लगा कि 10-20 दिनों में लौकडाउन खत्म जाएगा. उस के बाद बाजार और कामधंधे शुरू हो जाएंगे. लेकिन धीरेधीरे करीब 3 माह का समय बीत गया था. सारा कारोबार चौपट हो चुका था.

3 माह के बाद जब विनय अपने काम पर वापस गया तो उसे बताया गया कि अब औफिस में काम कम हो गया है. लिहाजा अब उस की वहां जरूरत नहीं रह गई.

उस के बाद जब विनय ने अपने 3 माह का बकाया वेतन मांगा तो कहा गया कि जब तुम ने काम हीं नहीं किया तो वेतन किस बात का. तुम ने मार्च महीने में 20 दिन काम किया था. उन 20 दिनों का पैसा ले लो और अब नौकरी पर नहीं आना है.

विनय का गांव तो लखनऊ से 20-22 किलोमीटर ही दूर था. ऐसे में वह रोज साइकिल और आटो से आताजाता था. खुशबू को साथ रखने की योजना की वजह से उस ने उस समय लखनऊ में एक कमरा किराए पर ले लिया था.

इस का भी 5 हजार रुपए देना पड़ता था. ऐसे में जब वह वहां अपना रखा सामान लेने गया तो मकान मालिक ने 15 हजार रुपए किराए के मांगे. विनय के पास उतना तो नहीं था. उसे 10 हजार औफिस से मिले थे, उसी में से 8 हजार मकान मालिक को दे कर अपना सामान साथ ले आया. कोरोना के बाद शहर से जैसे उस का नाता टूट गया.

कोरोना ने जिस तरह से काम धंधों पर रोक लगाई, उस से विनय और खुशबू जैसे युवाओं के सामने भी अपने भविष्य को ले कर प्रश्नचिह्न लगा दिए. बेरोजगारी ने आगे के सभी रास्ते बंद कर दिए.

यह उम्मीद थी कि 3 महीने के बाद जब लौकडाउन खुलेगा तो सब कुछ पटरी पर आ जाएगा. लेकिन इस के बाद भी कोई कामधंधा नहीं बढ़ा. मार्च, 2021 में जब कोरोना का संकट फिर से बढ़ा तो विनय को जो कामधंधा मिल जाता था, वह भी बंद हो गया.

विनय और खुशबू अपने जीवन को ले कर गंभीर थे. एक दिन विनय ने कहा, ‘‘खुशबू, अगर हमारे पास 15-20 लाख रुपए होते तो हम अपना काम भी शुरू कर लेते और एक रहने की जगह भी बना लेते, जिस से कम से कम हमें किराया तो नहीं देना पड़ता.’’

‘‘विनय, पैसे तो मिल सकते हैं. बस सावधानी बरतने की जरूरत है. और यदि हम पकड़े न जाएं तो मदद हो सकती है.’’ खुशबू ने कहा.

‘‘तुम रास्ता बताओ. बाकी हम कर लेंगे. किसी को कुछ पता नहीं चलेगा.’’ विनय ने उत्सुकता दिखाई और खुशबू को पूरा भरोसा दिलाते हुए कहा.

‘‘देखो विनय, मेरे घर में इतने रुपए और जेवर रखे हैं, जिन को मिला कर जितने पैसों की तुम बात कर रहे हो उतने हो जाएंगे. हम लोग एक दिन वह रुपए किसी तरह चोरी कर लें. चोरी होने से यह भी नहीं पता चलेगा कि किस ने यह काम किया है. फिर जब सब काम हो जाएगा, तब हम साथसाथ रहने लगेंगे.’’ खुशबू बोली.

खुशबू को उस के घर वाले भी मानसिक रूप से इतना परेशान करते थे कि वह किसी भी तरह से अपने घर में रहने को तैयार नहीं थी. अपने घर में चोरी की योजना बनाते समय उसे किसी भी तरह का डर या संकोच भी नहीं हुआ.

इधर विनय ने अपने साथी गांव के रहने वाले शुभम यादव को भी इस योजना में शामिल कर लिया.

खुशबू के साथ योजना बनाते समय विनय ने उसेनींद की 8 गोलियां ला कर दीं और कहा कि 4-4 गोलियां काढे़ में डाल कर रात में अपने मम्मी और पापा को पिला देना. जिस से वे रात भर गहरी नींद में सोते रहेंगे.

खुशबू ने 28 मई, 2021 की रात ऐसा ही किया. जब उस के मातापिता गहरी नींद में सो गए तो विनय और शुभम ने खुशबू के साथ मिल कर उस के घर से 13 लाख रुपए नकद और 3 लाख के जेवर चोरी कर लिए.

जेवर और रुपए ले कर विनय और शुभम चले गए. सुबह जब खुशबू के पिता मनोज कुमार सो कर उठे तो देखा कि उन की अलमारी टूटी हुई थी और उस में रखी नकदी व जेवर गायब थे.

वह थाना गोसाईंगंज गए. वहां पर उन्होंने यह जानकारी थानाप्रभारी अमरनाथ वर्मा को दी तो थानाप्रभारी ने अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 457 और 380 आईपीसी के तहत अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया.

लखनऊ के पुलिस कमिशनर धु्रवकांत ठाकुर के निर्देशन में डीसीपी ख्याति गर्ग, एडिशनल डीसीपी (साउथ) पुर्णेंदु सिंह, एसीपी स्वाति चौधरी, इंसपेक्टर गोसाईंगंज अमरनाथ वर्मा ने अपनी टीम के साथ चोरों को पकड़ने का काम शुरू किया.

पुलिस टीम में एसआई जय सिंह, दीपक कुमार पांडेय, विवेक कुमार, फिरोज आलम सिद्दीकी, अनिल कुमार, हैडकांस्टेबल अमीर हमजा, अकबर, सुशील चौहान, अंकित यादव, राजेश कुमार, पूनम शर्मा, मजीत सिंह, सुनील कुमार और रवींद्र कुमार शामिल थे.

मोबाइल की काल डिटेल्स में खुशबू और विनय के बीच बातचीत और रात में दोनों की लोकेशन एक होने से पुलिस का शक खुशबू पर गया. पुलिस ने खुशबू से पूछताछ की तो उस ने सच कबूल लिया. खुशबू की बताई बातों के आधार पर पुलिस ने पहले विनय और फिर शुभम को हिरासत में ले लिया. सभी ने अपना अपराध कबूल कर लिया.

पुलिस ने विनय, खुशबू और शुभम की निशानदेही पर चोरी गए रुपए और जेवर बरामद कर लिए. इस के बाद इन सभी को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

प्रेमी की जल समाधि : अपने ही प्रेमी को उतारा मौत के घाट

9  जून, 2021 की बात है. उत्तर प्रदेश के चंदौसी शहर का रहने वाला इस्तफर खान अपने मोहल्ले के कुछ लोगों को साथ ले कर शहर की कोतवाली पहुंचा. उस ने कोतवाल देवेंद्र कुमार शर्मा से मुलाकात कर बताया, ‘‘साहब, मेरा बेटा फहीम खान पिछले महीने की 19 तारीख से गायब है. उस का कहीं पता नहीं चल रहा है.’’

‘‘क्या..? वह 19 मई से गायब है और पुलिस के पास 20 दिन बाद आए हो? इतने दिनों तक कहां थे?’’ कोतवाल देवेंद्र कुमार शर्मा ने हैरानी से पूछा.

‘‘साहब, हम सब घर वाले अपने स्तर से उसे तलाश कर रहे थे. हम ने उसे सभी जगह पर ढूंढा मगर उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. उस का मोबाइल फोन भी बंद आ रहा है.’’ कहते हुए इस्तफर की आंखों में आंसू छलक आए.

‘‘कितनी उम्र है तुम्हारे बेटे की और वह क्या करता है? वह गायब कैसे हुआ? सब विस्तार से बताओ.’’ कोतवाल ने कहा.

‘‘साहब, मेरा बेटा फहीम खान शादीश्ुदा है, उस के 2 बच्चे भी हैं. वह मकानों और कोठियों में रंगाईपुताई का काम ठेके पर लेता है. दूसरे शहरों में भी उस का ठेका चलता रहता है. 19 मई, 2021 को वह काम के सिलसिले में अलीगढ़ गया था. वह जब कभी बाहर जाता था तो अपनी बीवी और घर वालों से फोन पर बात करता रहता था.

लेकिन उस के जाने के एकदो दिनों तक फोन नहीं आया तो हम ने उस का नंबर मिलाया. उस का फोन बंद आ रहा था. तब से आज तक उस का फोन बंद ही आ रहा है.

‘‘इस से हम लोगों की चिंता बढ़ गई. अलीगढ़ में उस का काम कहां चल रहा था, यह तो हमें पता नहीं. फिर भी हम ने अपने स्तर से उसे सभी जगह ढूंढा. जब कहीं नहीं मिला तो हुजूर हम आप के पास आए हैं. आप उस का पता लगा दीजिए.’’ रोआंसे हो कर हाथ जोड़ते हुए इस्तफर गिड़गिड़ाया.

‘‘देखिए, आप ने थाने आने में बहुत देर कर दी. फिर भी हम उस के बारे में पता लगाने की कोशिश करेंगे. आप बेटे का एक फोटो और तहरीर लिख कर दे दीजिए. चिंता मत करो, पुलिस जल्द ही उस की खोजबीन

कर लेगी.’’

इस के बाद इस्तफर ने लिख कर लाई हुई तहरीर और बेटे का फोटो कोतवाल साहब को दे दिया. इस के आधार पर फहीम खान की गुमशुदगी दर्ज कर ली. कोतवाल देवेंद्र कुमार शर्मा ने यह जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को भी दे दी.

गुमशुदगी दर्ज होने के बाद कोतवाल देवेंद्र कुमार शर्मा ने जांच चौकी इंचार्ज एसआई उमेंद्र मलिक को सौंप दी. वह अपनी टीम के साथ गुमशुदा फहीम की तलाश में जुट गए. पुलिस ने फहीम खान का मोबाइल सर्विलांस पर लगा दिया. उस के फोन की अंतिम लोकेशन अलीगढ़ की मिली. जिस इलाके की लोकेशन मिली थी, पुलिस टीम ने अलीगढ़ पहुंच कर उस इलाके के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला.

कोतवाल देवेंद्र कुमार शर्मा ने फहीम के बारे में जांच कराई तो पता चला कि वह आशिकमिजाज व्यक्ति था. तब उन्होंने इसी दिशा में जांच करने के निर्देश एसआई उमेंद्र मलिक को दिए.

शाहिदा से चल रहा था चक्कर

इंसपेक्टर की लाइन पर काम करते हुए चौकी इंचार्ज उमेंद्र मलिक ने जांच शुरू की. चौकी इंचार्ज को जानकारी मिली कि फहीम का रामपुर जिले के पटवाई गांव की शाहिदा के साथ चक्कर चल रहा था.

फहीम की शाहिदा से मुलाकात उस की एक परिचित अफसाना ने कराई थी. अफसाना अलीगढ़ के फिरदौस नगर की रहने वाली थी और उस का निकाह सलीम उर्फ शंभू से हुआ था. सलीम फिरदौस नगर में ही अफसाना के साथ किराए पर रहता था. वह फहीम के घर भी आतीजाती थी.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस टीम एक बार फिर अलीगढ़ पहुंची और सलीम व उस की पत्नी अफसाना को पूछताछ के लिए चंदौसी ले आई.

पुलिस ने उन दोनों से फहीम के बारे में पूछा तो वे अनभिज्ञता जताने लगे कि सलीम को जानते ही नहीं हैं, लेकिन जब उन से सख्ती की गई तो उन्होंने स्वीकार कर लिया कि फहीम इस वक्त दुनिया में नहीं है. हत्या करने के बाद उन्होंने उस की लाश हरदुआगंज की नहर में फेंक दी थी.

हत्या की खबर सुनते ही पुलिस भी चौंक गई. पुलिस को फहीम की लाश बरामद करनी थी इसलिए उन दोनों को साथ ले कर हरदुआगंज में नहर के ऊपर बने पुल पर पहुंची. वहीं से उन्होंने उस की लाश नहर में फेंकी थी.

पुलिस ने गोताखोरों की मदद से जाल डलवा कर वहां लाश की खोजबीन कराई, लेकिन सफलता नहीं मिली. तब पुलिस ने उस क्षेत्र के थानों में संपर्क कर किसी पुरुष की लावारिस लाश बरामद करने के बारे में पूछा.

तब वहां के थानाप्रभारी ने बताया कि 28 मई को नहर के किनारे से 2 लाशें बरामद हुई थीं, जिन का अंतिम संस्कार भी कर दिया था. दोनों के कपड़े पुलिस के पास सुरक्षित रखे थे.

पुलिस ने वे कपड़े फहीम खान के घर वालों को दिखाए. इतने दिनों में कपड़ों की हालत भी खराब हो चुकी थी, लेकिन फहीम खान की पत्नी ने पेंट पहचान ली. क्योंकि उस ने पति फहीम की टाइट पेंट उधेड़ कर ढीली की थी.

इस के बाद पुलिस ने अफसाना की निशानदेही पर हत्या में शामिल उस की सहेली शाहिदा और उस के भाई जीशान को भी गिरफ्तार कर लिया. इन चारों से पूछताछ करने के बाद फहीम की हत्या के पीछे की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के सुप्रसिद्ध जनपद पीतल नगरी मुरादाबाद से सटा जिला संभल है. चांदी के वर्क बनाने के आवा, मेंथा, तंबाकू और आलू की खेती भी बड़े पैमाने पर की जाती है. साथ ही सींग व हड्डी से कंघी, बटन व अन्य शोपीस के कारोबार से संभल की पहचान भी दूरदूर तक हो गई है.

संभल से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर एक शहर जैसा तहसील मुख्यालय चंदौसी है. चंदौसी के सीकरी गेट मोहल्ले में स्थित पुलिस चौकी के बगल में ही इस्तफर खान का परिवार रहता था.

उस के 4 बेटे थे. तसव्वुर खान, फहीम खान और वसीम खान का विवाह हो चुका था. जबकि चौथा बेटा सलीम खान अविवाहित था. बेटों के अलावा इस्तफर की 4 बेटियां भी थीं, जिस में से एक की मृत्यु हो चुकी थी. फहीम खान रंगाईपुताई का ठेकेदार था.

मजार पर हुई थी मुलाकात

फहीम का अलीगढ़ में भी ठेके का काम चल रहा था. वहीं पर उस की एक दिन क्वारसी क्षेत्र के फिरदौस नगर के रहने वाले सलीम उर्फ शंभू से मुलाकात हुई, जो बाद में दोस्ती में बदल गई.

इस के बाद सलीम और उस की पत्नी अफसाना का फहीम के घर आनाजाना शुरू हो गया. एक तरह से दोनों के पारिवारिक संबंध हो गए थे.

धार्मिक विचारों का फहीम बदायूं में स्थित नामी मजार पर जाता रहता था. इन्हें छोटे सरकार और बड़े सरकार के नाम से जाना जाता है. एक बार अफसाना भी उस के साथ थी. मजार पर अफसाना की सहेली शाहिदा भी मिल गई. शाहिदा अफसाना की सहेली थी, जो रामपुर जिले के गांव हाजीनगर में रहती थी.

यह साल 2013 की बात है. शाहिदा की मां भी बदायूं शरीफ में अकसर आती थीं और कईकई दिन वहां रुकती थीं.

इन के 3 बेटे और 3 ही बेटियां हैं. रजिया, नाजिया व शाहिदा तथा भाई जीशान भी मां के साथ बदायूं आताजाता रहता था. शाहिदा अफसाना की सहेली बन गई थी.

फहीम पहली मुलाकात में ही शाहिदा को अपने दिल में बसा चुका था. बाद में इन दोनों की  फोन पर बातें होने लगीं. इन के बीच हुई दोस्ती प्यार में बदल चुकी थी. फहीम शाहिदा के ऊपर खूब पैसे खर्च करता था. क्योंकि उस समय तक वह अविवाहित था.

मिलते रहे छिपछिप कर

दोनों ही जिंदगी साथ गुजारने और भविष्य के सुनहरे सपनों का तानाबाना बुनते रहते. एक दिन फहीम खान की बांहों में समाई शाहिदा ने कहा कि हम कब तक ऐसे छिपछिप कर मिलते रहेंगे, जल्दी शादी करो और मुझे अपने घर ले चलो.

इस पर फहीम ने कहा, ‘‘अभी थोड़ा और इंतजार करना पड़ेगा. मैं ने सऊदी अरब जाने की योजना बना ली है और वहां नौकरी मिल गई है. वहां से खूब सारा पैसा कमा कर लाऊंगा, फिर दोनों अपने अलग घर में आराम से जिंदगी गुजारेंगे.’’

उसी दौरान फहीम सऊदी अरब चला गया. वह कई साल बाद वहां से लौटा तो काफी उपहार अपनी प्रेमिका शाहिदा को भी ला कर दिए.

एक दिन प्रेमीप्रेमिका दोनों अपने भविष्य का तानाबाना बुन रहे थे तभी शाहिदा के मोबाइल की घंटी बजी. फोन फहीम खान ने रिसीव किया.

काल करने वाले की बात फहीम के कानों में जैसे जहर घोल गई. वह बोला, ‘‘कैसी हो मेरी जान? मैं ने कल भी काल की थी, लेकिन रिसीव नहीं की. कोई परेशानी हो तो बताओ, गुलाम तुरंत हाजिर होगा.’’

फहीम कुछ देर तक चुपचाप उस की बातें सुनता रहा. फिर फोन करने वाले को उस ने गालियां दीं तो उस ने काल डिसकनेक्ट कर दी.

इस के बाद तो फहीम को गुस्सा आ गया. वह सोचने लगा कि कौन है, जो उस की प्रेमिका से इस तरह बात कर रहा था. कहीं ऐसा तो नहीं कि शाहिदा का ही प्रेमी हो.

फहीम ने इस बारे में शाहिदा से पूछताछ की तो उलटे शाहिदा फहीम से लड़ने के लिए तैयार हो गई. दोनों ओर से बात बढ़ गई तभी शाहिदा अपना आपा खो बैठी और फहीम खान पर हाथ उठा दिया, जिस से नाराज हो कर फहीम ने भी शाहिदा की जम कर पिटाई कर डाली.

अब फहीम ने तय कर लिया कि वह यह पता लगा कर रहेगा कि शाहिदा का किसी से चक्कर चल रहा है या नहीं. कुछ दिनों में फहीम ने जानकारी निकाल ली कि शाहिदा का किसी से चक्कर चल रहा है.

प्रेमिका शाहिदा किसी और युवक से प्रेम करने लगी है. शाहिदा की इस बेवफाई से फहीम खान को गहरा आघात लगा. इसी बात से दोनों के बीच ऐसी दरार पड़ी कि संबंधविच्छेद हो गए.

फहीम खान खोयाखोया सा रहने लगा. उस के दिल टूटने का एहसास परिजनों को हुआ तो उन्होंने फहीम खान का विवाह बरेली शहर में कर दिया. यह बात करीब 4 साल पहले की है. अब उस के 2 बच्चे भी हैं.

उधर शाहिदा से उस के दूसरे प्रेमी ने कई साल रिलेशनशिप रखी. दोनों छिपछिप कर मिलते रहे, लेकिन अंत शाहिदा के अनुमान के विपरीत निकला. दूसरे प्रेमी ने उस से शादी से साफ इनकार कर दिया. इस से शाहिदा के दिल के अरमां आंसुओं में बहने लगे.

रोरो कर शाहिदा का जीवन गुजरने लगा. परिजनों से भी उस का हाल देखा नहीं जाता था. शाहिदा ने कई बार आत्महत्या करने की कोशिश की लेकिन परिजनों की कड़ी निगरानी के कारण सफल न हो सकी.

शाहिदा को अपने पहले प्रेमी फहीम खान की याद सताने लगी, लेकिन फहीम खान का मोबाइल नंबर उस के पास नहीं था. शाहिदा  ने अपनी सहेली अफसाना से फहीम खान का मोबाइल नंबर लिया.

शाहिदा से संबंध टूटने के बाद फहीम खान ने अपना नंबर बदल लिया था. उस का अफसाना  से फोन से बातचीत व मेलजोल बरकरार था. अफसाना से फहीम का फोन नंबर ले कर एक दिन शाहिदा ने फहीम खान को फोन किया और मिलने की गुजारिश की. फहीम ने सोचा कि पुरानी घटना के जख्म माफी तलाफी से धुल जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बल्कि बाद में उन दोनों के बीच तल्खी और बढ़ गई.

और ज्यादा खराब हो गए संबंध

फहीम खान उस के फोन करने से और भी ज्यादा आक्रामक हो गया. दोनों में फोन पर जम कर नोकझोंक होती रहती.

यह बात शाहिदा के भाई जीशान को बहुत नागवार गुजरी. उसे लगा कि फहीम की वजह से ही उस की बहन दुखी है. लिहाजा उस ने अफसाना से बात कर के फहीम खान को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली.

योजना के तहत अफसाना से फोन करा कर फहीम खान को 19 मई, 2021 को अलीगढ़ बुला लिया. उसी रात उसे खाने में नशीला पदार्थ खिलाया.

बेहोश हो जाने पर अफसाना व उस के पति सलीम उर्फ शंभू तथा जीशान और उस की बहन शाहिदा ने फहीम को ठिकाने लगाने की योजना बनाई. वे उसे हरदुआगंज क्षेत्र में स्थित नहर के बरेठा पुल पर ले गए और उस के शरीर से भारी पत्थर बांध कर नहर में जिंदा ही फेंक दिया. पानी में डूब जाने से फहीम की मौत हो गई.

चारों अभियुक्तों के गिरफ्तार हो जाने के बाद एसपी चक्रेश मिश्रा ने एक प्रैस कौन्फ्रैंस आयोजित कर इस मामले का खुलासा किया.

इस के बाद पुलिस ने हत्यारोपी शाहिदा, उस के भाई जीशान, सहेली अफसाना और उस के पति सलीम उर्फ शंभू को गिरफ्तार कर 23 जून, 2021 को न्यायालय के समक्ष पेश किया. वहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पति परदेस में तो डर काहे का : देवर के प्रेम ने बनाया हत्यारा – भाग 3

घटनास्थल से बरामद कान के टौप्स और चप्पलें मृतका दिव्या की ही थीं. जबकि लाल चूडि़यों के टुकड़े उस के नहीं थे. इस से यह बात साफ हो गई कि दिव्या की हत्या में कोई औरत भी शामिल थी. डौग टीम में आई स्निफर डौग गुड्डी लाश और हत्यास्थल को सूंघने के बाद सीधी दिव्या के घर तक जा पहुंची. इस से अंदेशा हुआ कि दिव्या की हत्या में घर का कोई व्यक्ति शामिल रहा होगा.

पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में पंचनामा भर कर दिव्या की लाश को पोस्टमार्टम के लिए अलीगढ़ भिजवा दिया गया. पूछताछ में दिव्या के परिवार से किसी की दुश्मनी की बात सामने नहीं आई. अब सवाल यह था कि दिव्या की हत्या किसने और

किस मकसद के तहत की थी.

हत्या का यह मुकदमा उसी दिन थाना गोंडा में अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के अंतर्गत दर्ज हो गया. पोस्टमार्टम के बाद उसी शाम दिव्या का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

दूसरे दिन थानाप्रभारी ने महिला सिपाहियों के साथ पींजरी गांव जा कर व्यापक तरीके से पूछताछ की. दिव्या की तीनों चाचियों से भी पूछताछ की गई. सुभाष यादव अपने स्तर पर पहले दिन ही दिव्या की हत्या की वजह के तथ्य जुटा चुके थे. बस मजबूत साक्ष्य हासिल कर के हत्यारों को पकड़ना बाकी था.

दिव्या की सब से छोटी चाची मोना से जब चूडि़यों के बारे में सवाल किया गया तो उस ने बताया कि वह चूड़ी नहीं पहनती, लेकिन जब तलाशी ली गई तो उस के बेड के पीछे से लाल चूडि़यां बरामद हो गईं, जो घटनास्थल पर मिले चूडि़यों के टुकड़ों से पूरी तरह मेल खा रही थीं. सुभाष यादव का इशारा पाते ही महिला पुलिस ने मोना को पकड़ कर जीप में बैठा लिया. पुलिस उसे थाने ले आई.

थाने में थानाप्रभारी सुभाष यादव को ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी. मोना ने हत्या का पूरा सच खुद ही बयां कर दिया. सच सामने आते ही बिना देर किए गांव जा कर मोना के प्रेमी सोनू को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

सोनू के अलावा नगला मोनी के रहने वाले मनीष को भी धर दबोचा गया. दोनों को थाने ला कर पूछताछ के बाद हवालात में डाल दिया गया. दिव्या हत्याकांड के खुलासे की सूचना एसपी ग्रामीण संकल्प शर्मा और सीओ इगलास पंकज श्रीवास्तव को दे दी गई.

दोनों अधिकारियों ने थाना गोंडा पहुंच कर थानाप्रभारी सुभाष यादव को शाबासी देने के साथ अभियुक्तों से खुद भी पूछताछ की.

पूछताछ में मोना के साथ उस के प्रेमी सोनू व उस के दोस्त ने जो कुछ बताया वह कुछ इस तरह था-

दिव्या ने सोनू को मोना के साथ शारीरिक संबंध बनाते देख लिया था. उस ने चाचा के घर लौटने पर उसे सब कुछ सचसच बता देने की बात भी कही थी. उस समय बात खत्म जरूर हो गई थी. फिर भी डर यही था कि बाल बुद्धि की दिव्या ने अगर यह बात जयकिंदर को बता दी तो उस का क्या हश्र होगा, इसी से चिंतित मोना व सोनू ने योजना बनाई कि जयकिंदर के आने से पहले दिव्या की हत्या कर दी जाए.

दिव्या हर रोज मोना के साथ ही सोती थी और अलसुबह चाची के साथ दौड़ लगाने जाती थी. कभीकभी वह दौड़ने के लिए वहीं रुक जाती थीं. जब कि मोना अकेली लौट आती थी. दिव्या को दौड़ का शौक था, ये बात घर के सभी लोग जानते थे. इसी लिए हत्या में मोना का हाथ होने की संभावना नहीं मानी जाएगी, यह सोच कर मोना ने सोनू के साथ योजना बना डाली, जिस में सोनू ने दूसरे गांव के रहने वाले अपने दोस्त मनीष को भी शामिल कर लिया.

26 दिसंबर को सोनू व मनीष पहले ही वहां पहुंच गए. मोना दिव्या को ले कर जब डालचंद के खेत के पास पहुंची तो घात में बैठे सोनू और मनीष ने दिव्या को दबोच कर चाकुओं से वार करने शुरू कर दिए. दिव्या ने बचने के लिए मोना का हाथ पकड़ा, जिस से उस के हाथ से 2 चूडि़यां टूट कर वहां गिर गईं. हत्यारे उसे खींच कर खेत में ले गए, जहां गर्दन काट कर उस की हत्या कर डाली. इसी छीनाझपटी में दिव्या के कान का एक टौप्स भी गिर गया था और चप्पलें भी पैरों से निकल गई थीं.

दिव्या की हत्या के बाद ये लोग लाश को खींचते हुए लगभग 300 मीटर दूर गजेंद्र के खेत में ले गए. इस के बाद सभी अपनेअपने घर चले गए.

हत्यारा कितना भी चतुर हो फिर भी कोई न कोई सुबूत छोड़ ही जाता है. जो पुलिस के लिए जांच की अहम कड़ी बन जाता है. ऐसा ही साक्ष्य मोना की चूडि़यां बनीं, जिस ने पूरे केस का परदाफाश कर दिया.

प्यार किसी का, लुटा आशियाना किसी का – भाग 2

अगले दिन निर्धारित समय पर शशि अकेली ही यज्ञस्थल की ओर चल दी. उस वक्त उस के दिमाग में कई सवाल उमड़घुमड़ रहे थे. वह सवालों की उधेड़बुन में यज्ञस्थल पर पहुंच गई. जब शशि वहां पहुंची तो उसे यह देख कर हैरानी हुई कि एहसान भी वहीं बैठा था. उसे लगा मानो वह उसी का इंतजार कर रहा हो.

प्यार के पंछियों की पहली उड़ान

एहसान की नजर शशि से टकराई तो दोनों के दिल खुशी से धड़क उठे. अनायास ही शशि मुसकरा दी तो एहसान के दिल के फूल खिल गए. जवाब में वह भी मुसकरा दिया. शशि वहां से निकली और एहसान को देखते हुए यज्ञस्थल से बाहर आ गई. मानो उस ने इशारा किया हो कि वह भी बाहर आए.

आगेआगे शशि और पीछेपीछे एहसान चलते हुए दोनों सुरक्षित जगह पर पहुंचे और एकदूसरे को देखने लगे. अनायास एहसान शशि के करीब आया और उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘मेरा नाम एहसान है और मैं पास के गांव कोहरावां का रहने वाला हूं.’’

थोड़ा शरमाते हुए शशि बोली, ‘‘मेरा नाम शशि है और मैं इसी गांव में रहती हूं. मुझे तुम्हारा चेहरा जानापहचाना सा लग रहा था. शायद मैं ने कभी तुम्हें देखा हो, लेकिन कल ही मेरा ध्यान तुम पर गया.’’

‘‘शशि…बड़ा ही प्यारा नाम है. तुम सचमुच अप्सराओं की तरह सुंदर हो. मुझे तुम्हारा नाम और तुम दोनों ही बहुत पसंद हो. क्या मैं तुम्हें पसंद हूं?’’ एहसान ने उत्सुकता में पूछा.

शशि ने ‘हां’ में सिर हिला दिया, साथ ही कहा भी, ‘‘एहसान, सिर्फ परिचय से कोई एकदूसरे का नहीं हो जाता, बल्कि उस के लिए एकदूसरे के बारे में सारी बात जानना भी जरूरी होता है. तभी दो दिल एकदूसरे के करीब हो सकते हैं.’’

‘‘बिलकुल ठीक कहा शशि, आओ हम उस पेड़ के नीचे बैठ कर बातें करते हैं.’’ कहते हुए एहसान शशि के साथ पेड़ की छांव में जा बैठा और बातें करने लगा. दोनों ने एकदूसरे को विस्तार से अपनेअपने परिवारों के बारे में बताया.

एहसान ने कहा, ‘‘जिंदगी हमारी है, इसलिए अपनी जिंदगी के बारे में सिर्फ हम ही निर्णय ले सकते हैं. तुम मुझ से मिलने के लिए रोज यहीं आना. यहां लोगों की नजर हम पर नहीं पड़ेगी. बोलो, आओगी न?’’

‘‘हां एहसान, मैं जरूर आऊंगी. तुम मेरा इंतजार करना.’’ शशि ने कहा और वहां से अपने घर की ओर चल दी.

शशि आज ऐसे खुश थी, मानो कोई बड़ा खजाना मिल गया हो. वह एहसान की यादों में इतनी खो गई थी कि कब सवेरा हुआ और कब वह उस के पास पहुंच गई, उसे पता ही नहीं चला. एहसान भी उसी पेड़ की छांव में उस का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. दोनों एकदूसरे से मिल कर काफी खुश हुए. एहसान शशि से रोमांटिक बातें करने लगा तो शशि शरमा गई, लेकिन बोली कुछ नहीं. तब एहसान ने पूछा, ‘‘शशि, तुम्हें पता है कि तुम कितनी सुंदर हो?’’

‘‘हां, मुझे पता है, पर इस में मेरा क्या कुसूर है?’’ शशि ने पूछा.

‘‘इस में तुम्हारा कोई कुसूर नहीं है. कुसूर है तो सिर्फ तुम्हारी सुंदरता का, जिस ने मेरा दिल चुरा लिया है. मेरे इस दिल को अपने पास संभाल कर रखना. इसे कभी तोड़ना नहीं.’’ एहसान ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘यह कैसी बातें कर रहे हो? मैं भला तुम्हारा दिल कैसे तोड़ सकती हूं? हमारा मिलन तो जन्मजन्मांतर का है. तुम्हें देख कर मुझे पहली ही नजर में ऐसा लगा जैसे तुम मेरे हो और मैं तुम्हारे पास खिंची चली आई.’’ शशि ने अपनी भावना व्यक्त करते हुए कहा.

‘‘मैं कितना खुशकिस्मत हूं कि तुम मुझे यज्ञ में अनायास ही मिल गई. शायद मेरे नसीब में लिखा था तुम्हें पाना.’’ कहते हुए एहसान ने शशि के हाथ को चूमा तो वह शरमा गई.

उन दोनों का प्यार दिनोंदिन परवान चढ़ने लगा. लेकिन गांव का माहौल कुछ ऐसा होता है कि अधिक दिनों तक कोई भी बात किसी से छिपी नहीं रह सकती. एहसान और शशि के प्रेमिल संबंध भी लोगों से छिपे नहीं रह सके.

लालजी को पता चला तो उस ने शशि की खूब पिटाई की और उसे सख्त हिदायत दी कि वह आज के बाद एहसान से मिलने की भूल कर भी कोशिश न करे, नहीं तो उस से बुरा कोई नहीं होगा. उस के घर से निकलने पर भी पाबंदी लगा दी गई. लालजी अब जल्द से जल्द शशि के हाथ पीले कर देना चाहता था. शशि के कारण पूरे गांव में उस की बदनामी हो रही थी. मिश्रिख थानाक्षेत्र के ही अमजदपुर गांव में रामप्रसाद अपने परिवार के साथ रहते थे और खेतीकिसानी करते थे. परिवार में पत्नी रामकली के अलावा 3 बेटियां श्रीकांती, महिमा व सरिता थीं और 2 बेटे बबलू और सोनू.

रामप्रसाद अपनी 2 बेटियों का विवाह कर चुके थे. उन्होंने बड़े बेटे बबलू का भी विवाह कर दिया था. बबलू लखनऊ में रह कर ड्राइवरी करता था. जबकि सोनू अभी अविवाहित था. सोनू पिता के साथ खेती में हाथ बंटाता था.

लालजी को एक रिश्तेदार के माध्यम से सोनू और उस के परिवार के बारे में पता चला तो वह सोनू के पिता रामप्रसाद से जा कर मिले. बात आगे बढ़ी और जल्द ही शशि का रिश्ता सोनू के साथ तय हो गया. शशि ने लाख विरोध किया लेकिन उस की एक नहीं चली.

प्यार में अड़ंगा, शशि हुई परेशान

इसी साल 9 मार्च को धूमधाम से शशि और सोनू का विवाह हो गया. शशि को न चाहते हुए भी विवाह कर के ससुराल जाना पड़ा. वह एहसान के साथ जिंदगी गुजारने का सपना देख रही थी, लेकिन उस के घर वालों ने उस के सपनों को तोड़ दिया था.

पगफेरे की रस्म के लिए जब शशि अपने मायके गई तो वह एहसान से मिली और उस के गले लग कर बिलखबिलख कर रोई. एहसान की भी आंखें गीली हो आईं. वह शशि की हालत देख कर बेचैन हो उठा. उस ने सांत्वना दे कर किसी तरह शशि को शांत किया. फिर उस से कहा कि हम कभी अलग नहीं होंगे, कोई भी हमें जुदा नहीं कर सकता.

शशि जब तक मायके में रही, एहसान से मिलती रही. वहां से वापस ससुराल आई तो मोबाइल पर चोरीछिपे एहसान से बातें करने लगी.