पाक प्यार में नापाक इरादे – भाग 2

पुलिस ने देखा कि सर्वेश इस तरह लाइन पर नहीं आ रही है तो पुलिस ने उस के साथ ऐसा खेल खेला कि बड़ी आसानी से वह उस में फंस गई. पुलिस ने उस से कहा था कि नेत्रपाल उन के कब्जे में है और उस ने बता दिया है कि तुम्हारी मदद से उसी ने पाकेश की हत्या की थी.

सर्वेश एकदम से बोली, ‘‘साहब, वह झूठ बोल रहा है. मैं ने उस से पाकेश की हत्या के लिए नहीं कहा था. उस ने अपने आप उस की हत्या की थी.’’

इस तरह सर्वेश ने सच्चाई उगल दी. इस के बाद लंबी पूछताछ में पुलिस ने सर्वेश से पाकेश की हत्या की पूरी कहानी उगलवा ली, जो इस प्रकार थी.

उत्तराखंड के जसपुर से लगभग 30 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर का एक गांव है मोहद्दीपुर हसनपुर. कृपाल सिंह का परिवार इसी गांव में रहता था. उस के पास जो खेतीबाड़ी थी, उसी में मेहनत कर के वह गुजरबसर कर रहा था. शादी के बाद बड़ा बेटा हरियाणा में जा कर रहने लगा था. उस से छोटा धर्मवीर मंदबुद्धि था.

भाईबहनों में पाकेश सब से छोटा था, जो खेतीबाड़ी में कृपाल सिंह की मदद करता था. धर्मवीर मंदबुद्धि था, इसलिए उस की शादी नहीं हो रही थी. तब कृपाल सिंह ने सोचा कि वह पाकेश की शादी कर दें, क्योंकि उस की शादी के लिए लोग आने लगे थे.

बिजनौर के थाना रेहड के पास एक गांव है देहलावाला. उसी गांव के रहने वाले देवेंद्र सिंह चौहान की बेटी सर्वेश कृपाल सिंह को पसंद आ गई तो उस ने पाकेश की शादी उसी से कर दी.

देवेंद्र सिंह भी कृपाल सिंह की ही तरह सीधासादा आदमी था. लेकिन उस की पत्नी मूर्ति देवी काफी तेजतर्रार थी और घर में उसी की चलती थी. सर्वेश ने जैसा अपने घर में देखा था, वैसा ही कुछ ससुराल में करने की कोशिश करने लगी. पाकेश सीधा और शांत स्वभाव का था, इसलिए चंचल स्वभाव वाली सर्वेश को ससुराल में अपनी चलाने में जरा भी परेशानी नहीं हुई.

देहलावाला गांव की गिनती इलाके में अच्छे गांवों में नहीं होती, क्योंकि यहां की कई औरतें देह के धंधे से जुड़ी थीं. वे खुद तो यह धंधा करती ही थीं, अपने साथ कई लड़कियों को भी जोड़ रखा था. इसी देह के धंधे की कमाई से उन के रहनसहन में और गांव के अन्य लोगों के रहनसहन में जमीनआसमान का अंतर था.

उन्हीं के रहनसहन को देख कर सर्वेश की मां मूर्ति देवी भी गांव छोड़ कर काशीपुर आ गई थी. काशीपुर आने के बाद उस ने भी वही रास्ता अपना लिया था और नोट कमाने लगी थी. हालांकि सर्वेश को मां के इस धंधे की जानकारी नहीं थी. लेकिन मां के रहनसहन को ही देख कर उस की भी काशीपुर में रहने की इच्छा होने लगी थी.

शादी के कुछ दिनों बाद ही कृपाल सिंह की मौत हो गई थी, इसलिए पाकेश अकेला पड़ गया था. वह सीधासादा तो था ही, इसलिए सर्वेश जैसा कहती थी, वह वैसा ही करती थी. सर्वेश उस पर काशीपुर चलने के लिए दबाव बनाने लगी. वह पत्नी को बहुत प्यार करता था, इसलिए उसे नाराज नहीं करना चाहता था. पत्नी के कहने पर ही उस ने अपनी एक एकड़ जमीन बेचने का मन बना लिया.

गांव की जमीन बिकते ही सर्वेश अपनी मां की मदद से काशीपुर में घर बनाने के लिए प्लौट ढूंढने लगी. मूर्ति देवी की काशीपुर के कई प्रौपर्टी डीलरों से अच्छी जानपहचान थी. उन्हीं प्रौपर्टी डीलरों की मदद से मूर्ति देवी ने सर्वेश को बाजपुर रेलवे लाइन के किनारे काशीपुर विकास कालोनी में एक प्लौट दिला दिया.

काशीपुर में प्लौट तो खरीद लिया गया, लेकिन जब उस की रजिस्ट्री करानी हुई तो पाकेश और सर्वेश में तकरार होने लगी. पाकेश उस प्लौट की रजिस्ट्री अपने नाम से कराना चाहता था, जबकि सर्वेश चाहती थी कि रजिस्ट्री उस के नाम हो. इस बात को ले कर विवाद ज्यादा बढ़ा तो पाकेश को ही झुकना पड़ा. क्योंकि वह पत्नी को नाराज नहीं करना चाहता था.

सर्वेश के नाम प्लौट की रजिस्ट्री करा कर पाकेश ने घर बनवा लिया. अब तक सर्वेश 2 बच्चों की मां बन चुकी थी, जिन में बेटा तुषार और बेटी गार्गी थी. सर्वेश ने अपने दोनों बच्चों का दाखिला भी काशीपुर में करा दिया था.

काशीपुर में गुजरबसर के लिए पाकेश महुआखेड़ा की फैक्ट्री में नौकरी करने लगा था. पाकेश का घर जिस मोहल्ले में था, वहां अभी इक्कादुक्का घर ही बने थे. दोनों बच्चे स्कूल चले जाते थे और पाकेश अपनी नौकरी पर. उस के बाद सर्वेश घर में अकेली रह जाती, ऐसे में उस के लिए समय काटना मुश्किल हो जाता था.

काशीपुर आने के बाद सर्वेश का अपनी मां के यहां आनाजाना बढ़ गया था. इसी आनेजाने में उसे मां की हकीकत का पता चल गया. वैसे तो वह महुआखेड़ा की किसी फैक्ट्री में नौकरी करती थी, लेकिन उस की कमाई का मुख्य स्रोत लड़कियों की दलाली थी. यह काम वह मोबाइल फोन से करती थी. उसे लड़कियों की दलाली से अच्छी कमाई हो रही थी.

मां की हकीकत जान कर सर्वेश ने भी उसी राह पर चलने का इरादा बना लिया. उस ने पाकेश से दिन में अकेली रहने वाली परेशानी बता कर एक जूता फैक्ट्री में नौकरी कर ली. उसी जूता फैक्ट्री में उस की मुलाकात नेत्रपाल से हुई. नेत्रपाल वहां सुपरवाइजर था. सर्वेश जितनी खूबसूरत थी, उस से कहीं ज्यादा चंचल और शोख थी.

नेत्रपाल उत्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद के गांव चतरपुर का रहने वाला था. उस का गांव महुआखेड़ा के नजदीक ही था, इसलिए वह घर से ही अपनी ड्यूटी पर आताजाता था. उस की अभी शादी नहीं हुई थी. इसलिए नेत्रपाल के नेत्र सर्वेश से लड़े तो वह उस के लिए पागल हो उठा. जबकि सर्वेश 2 बच्चों की मां थी. लेकिन उस की कदकाठी ऐसी थी कि देखने में वह कुंवारी लगती थी.

कुछ ही दिनों में नेत्रपाल सर्वेश के लिए ऐसा पागल हुआ कि दिनरात उसी के बारे में सोचने लगा. नेत्रपाल के पास सर्वेश का मोबाइल नंबर था ही, इसलिए वह छुट्टी के बाद भी फोन कर के उस से बातें करने लगा.

पाकेश पूरे दिन नौकरी पर रहता था. शाम को थकामांदा आता तो खाना खा कर सो जाता. उसे इस बात की भी चिंता नहीं रहती थी कि पत्नी क्या कर रही है. सर्वेश इसी बात का फायदा उठा कर नेत्रपाल से देर रात तक बातें करती रहती. मोबाइल पर बातें करतेकरते ही नेत्रपाल सर्वेश को अपने इतने नजदीक ले आया कि मौका मिलते ही उस ने उस से अवैध संबंध बना लिए.

नेत्रपाल से संबंध बनने के बाद सर्वेश को पाकेश की अपेक्षा नेत्रपाल की जरूरत ज्यादा महसूस होने लगी थी. सर्वेश को जब भी मौका मिलता, नेत्रपाल को फोन कर देती. नेत्रपाल को उस के फोन का इंतजार रहता ही था, संदेश मिलते ही वह सर्वेश के घर आ जाता.

मसीहा : शांति की लगन

दोपहर का खाना खा कर लेटे ही थे कि डाकिया आ गया. कई पत्रों के बीच राजपुरा से किसी शांति नाम की महिला का एक रजिस्टर्ड पत्र 20 हजार रुपए के ड्राफ्ट के साथ था. उत्सुकतावश मैं एक ही सांस में पूरा पत्र पढ़ गई, जिस में उस महिला ने अपने कठिनाई भरे दौर में हमारे द्वारा दिए गए इन रुपयों के लिए धन्यवाद लिखा था और आज 10 सालों के बाद वे रुपए हमें लौटाए थे. वह खुद आना चाहती थी पर यह सोच कर नहीं आई कि संभवत: उस के द्वारा लौटाए जाने पर हम वह रुपए वापस न लें.

पत्र पढ़ने के बाद मैं देर तक उस महिला के बारे में सोचती रही पर ठीक से कुछ याद नहीं आ रहा था.

‘‘अरे, सुमि, शांति कहीं वही लड़की तो नहीं जो बरसों पहले कुछ समय तक मुझ से पढ़ती रही थी,’’ मेरे पति अभिनव अतीत को कुरेदते हुए बोले तो एकाएक मुझे सब याद आ गया.

उन दिनों शांति अपनी मां बंती के साथ मेरे घर का काम करने आती थी. एक दिन वह अकेली ही आई. पूछने पर पता चला कि उस की मां की तबीयत ठीक नहीं है. 2-3 दिन बाद जब बंती फिर काम पर आई तो बहुत कमजोर दिख रही थी. जैसे ही मैं ने उस का हाल पूछा वह अपना काम छोड़ मेरे सामने बैठ कर रोने लगी. मैं हतप्रभ भी और परेशान भी कि अकारण ही उस की किस दुखती रग पर मैं ने हाथ रख दिया.

बंती ने बताया कि उस ने अब तक के अपने जीवन में दुख और अभाव ही देखे हैं. 5 बेटियां होने पर ससुराल में केवल प्रताड़ना ही मिलती रही. बड़ी 4 बेटियों की तो किसी न किसी तरह शादी कर दी है. बस, अब तो शांति को ब्याहने की ही चिंता है पर वह पढ़ना चाहती है.

बंती कुछ देर को रुकी फिर आगे बोली कि अपनी मेहनत से शांति 10वीं तक पहुंच गई है पर अब ट्यूशन की जरूरत पड़ेगी जिस के लिए उस के पास पैसा नहीं है. तब मैं ने अभिनव से इस बारे में बात की जो उसे निशुल्क पढ़ाने के लिए तैयार हो गए. अपनी लगन व परिश्रम से शांति 10वीं में अच्छे नंबरों में पास हो गई. उस के बाद उस ने सिलाईकढ़ाई भी सीखी. कुछ समय बाद थोड़ा दानदहेज जोड़ कर बंती ने उस के हाथ पीले कर दिए.

अभी शांति की शादी हुए साल भर बीता था कि वह एक बेटे की मां बन गई. एक दिन जब वह अपने बच्चे सहित मुझ से मिलने आई तो उस का चेहरा देख मैं हैरान हो गई. कहां एक साल पहले का सुंदरसजीला लाल जोड़े में सिमटा खिलाखिला शांति का चेहरा और कहां यह बीमार सा दिखने वाला बुझाबुझा चेहरा.

‘क्या बात है, बंती, शांति सुखी तो है न अपने घर में?’ मैं ने सशंकित हो पूछा.

व्यथित मन से बंती बोली, ‘लड़कियों का क्या सुख और क्या दुख बीबी, जिस खूंटे से बांध दो बंधी रहती हैं बेचारी चुपचाप.’

‘फिर भी कोई बात तो होगी जो सूख कर कांटा हो गई है,’ मेरे पुन: पूछने पर बंती तो खामोश रही पर शांति ने बताया, ‘विवाह के 3-4 महीने तक तो सब ठीक रहा पर धीरेधीरे पति का पाशविक रूप सामने आता गया. वह जुआरी और शराबी था. हर रात नशे में धुत हो घर लौटने पर अकारण ही गालीगलौज करता, मारपीट करता और कई बार तो मुझे आधी रात को बच्चे सहित घर से बाहर धकेल देता. सासससुर भी मुझ में ही दोष खोजते हुए बुराभला कहते. मैं कईकई दिन भूखीप्यासी पड़ी रहती पर किसी को मेरी जरा भी परवा नहीं थी. अब तो मेरा जीवन नरक समान हो गया है.’

उस रात मैं ठीक से सो नहीं पाई. मानव मन भी अबूझ होता है. कभीकभी तो खून के रिश्तों को भी भीड़ समझ उन से दूर भागने की कोशिश करता है तो कभी अनाम रिश्तों को अकारण ही गले लगा उन के दुखों को अपने ऊपर ओढ़ लेता है. कुछ ऐसा ही रिश्ता शांति से जुड़ गया था मेरा.

अगले दिन जब बंती काम पर आई तो मैं उसे देर तक समझाती रही कि शांति पढ़ीलिखी है, सिलाईकढ़ाई जानती है, इसलिए वह उसे दोबारा उस के ससुराल न भेज कर उस की योग्यता के आधार पर उस से कपड़े सीने का काम करवाए. पति व ससुराल वालों के अत्याचारों से छुटकारा मिल सके मेरे इस सुझाव पर बंती ने कोई उत्तर नहीं दिया और चुपचाप अपना काम समाप्त कर बोझिल कदमों से घर लौट गई.

एक सप्ताह बाद पता चला कि शांति को उस की ससुराल वाले वापस ले गए हैं. मैं कर भी क्या सकती थी, ठगी सी बैठी रह गई.

देखते ही देखते 2 साल बीत गए. इस बीच मैं ने बंती से शांति के बारे में कभी कोई बात नहीं की पर एक दिन शांति के दूसरे बेटे के जन्म के बारे में जान कर मैं बंती पर बहुत बिगड़ी कि आखिर उस ने शांति को ससुराल भेजा ही क्यों? बंती अपराधबोध से पीडि़त हो बिलखती रही पर निर्धनता, एकाकीपन और अपने असुरक्षित भविष्य को ले कर वह शांति के लिए करती भी तो क्या? वह तो केवल अपनी स्थिति और सामाजिक परिवेश को ही कोस सकती थी, जहां निम्नवर्गीय परिवार की अधिकांश स्त्रियों की स्थिति पशुओं से भी गईगुजरी होती है.

पहले तो जन्म लेते ही मातापिता के घर लड़की होने के कारण दुत्कारी जाती हैं और विवाह के बाद अर्थी उठने तक ससुराल वालों के अत्याचार सहती हैं. भोग की वस्तु बनी निरंतर बच्चे जनती हैं और कीड़ेमकोड़ों की तरह हर पल रौंदी जाती हैं, फिर भी अनवरत मौन धारण किए ऐसे यातना भरे नारकीय जीवन को ही अपनी तकदीर मान जीने का नाटक करते हुए एक दिन चुपचाप मर जाती हैं.

शांति के साथ भी तो यही सब हो रहा था. ऐसी स्थिति में ही वह तीसरी बार फिर मां बनने को हुई. उसे गर्भ धारण किए अभी 7 महीने ही हुए थे कि कमजोरी और कई दूसरे कारणों के चलते उस ने एक मृत बच्चे को जन्म दिया. इत्तेफाक से उन दिनों वह बंती के पास आई हुई थी. तब मैं ने शांति से परिवार नियोजन के बारे में बात की तो बुझे स्वर में उस ने कहा कि फैसला करने वाले तो उस की ससुराल वाले हैं और उन का विचार है कि संतान तो भगवान की देन है इसलिए इस पर रोक लगाना उचित नहीं है.

मेरे बारबार समझाने पर शांति ने अपने बिगड़ते स्वास्थ्य और बच्चों के भविष्य को देखते हुए मेरी बात मान ली और आपरेशन करवा लिया. यों तो अब मैं संतुष्ट थी फिर भी शांति की हालत और बंती की आर्थिक स्थिति को देखते हुए परेशान भी थी. मेरी परेशानी को भांपते हुए मेरे पति ने सहज भाव से 20 हजार रुपए शांति को देने की बात कही ताकि पूरी तरह स्वस्थ हो जाने के बाद वह इन रुपयों से कोई छोटामोटा काम शुरू कर के अपने पैरों पर खड़ी हो सके. पति की यह बात सुन मैं कुछ पल को समस्त चिंताओं से मुक्त हो गई.

अगले ही दिन शांति को साथ ले जा कर मैं ने बैंक में उस के नाम का खाता खुलवा दिया और वह रकम उस में जमा करवा दी ताकि जरूरत पड़ने पर वह उस का लाभ उठा सके.

अभी इस बात को 2-4 दिन ही बीते थे कि हमें अपनी भतीजी की शादी में हैदराबाद जाना पड़ा. 15-20 दिन बाद जब हम वापस लौटे तो मुझे शांति का ध्यान हो आया सो बंती के घर चली गई, जहां ताला पड़ा था. उस की पड़ोसिन ने शांति के बारे में जो कुछ बताया उसे सुन मैं अवाक् रह गई.

हमारे हैदराबाद जाने के अगले दिन ही शांति का पति आया और उसे बच्चों सहित यह कह कर अपने घर ले गया कि वहां उसे पूरा आराम और अच्छी खुराक मिल पाएगी जिस की उसे जरूरत है. किंतु 2 दिन बाद ही यह खबर आग की तरह फैल गई कि शांति ने अपने दोनों बच्चों सहित भाखड़ा नहर में कूद कर जान दे दी है. तब से बंती का भी कुछ पता नहीं, कौन जाने करमजली जीवित भी है या मर गई.

कैसी निढाल हो गई थी मैं उस क्षण यह सब जान कर और कई दिनों तक बिस्तर पर पड़ी रही थी. पर आज शांति का पत्र मिलने पर एक सुखद आश्चर्य का सैलाब मेरे हर ओर उमड़ पड़ा है. साथ ही कई प्रश्न मुझे बेचैन भी करने लगे हैं जिन का शांति से मिल कर समाधान चाहती हूं.

जब मैं ने अभिनव से अपने मन की बात कही तो मेरी बेचैनी को देखते हुए वह मेरे साथ राजपुरा चलने को तैयार हो गए. 1-2 दिन बाद जब हम पत्र में लिखे पते के अनुसार शांति के घर पहुंचे तो दरवाजा एक 12-13 साल के लड़के ने खोला और यह जान कर कि हम शांति से मिलने आए हैं, वह हमें बैठक में ले गया. अभी हम बैठे ही थे कि वह आ गई. वही सादासलोना रूप, हां, शरीर पहले की अपेक्षा कुछ भर गया था. आते ही वह मेरे गले से लिपट गई. मैं कुछ देर उस की पीठ सहलाती रही, फिर भावावेश में डूब बोली, ‘‘शांति, यह कैसी बचकानी हरकत की थी तुम ने नहर में कूद कर जान देने की. अपने बच्चों के बारे में भी कुछ नहीं सोचा, कोई ऐसा भी करता है क्या? बच्चे तो ठीक हैं न, उन्हें कुछ हुआ तो नहीं?’’

बच्चों के बारे में पूछने पर वह एकाएक रोने लगी. फिर भरे गले से बोली, ‘‘छुटका नहीं रहा आंटीजी, डूब कर मर गया. मुझे और सतीश को किनारे खड़े लोगों ने किसी तरह बचा लिया. आप के आने पर जिस ने दरवाजा खोला था, वह सतीश ही है.’’

इतना कह वह चुप हो गई और कुछ देर शून्य में ताकती रही. फिर उस ने अपने अतीत के सभी पृष्ठ एकएक कर के हमारे सामने खोल कर रख दिए.

उस ने बताया, ‘‘आंटीजी, एक ही शहर में रहने के कारण मेरी ससुराल वालों को जल्दी ही पता चल गया कि मैं ने परिवार नियोजन के उद्देश्य से अपना आपरेशन करवा लिया है. इस पर अंदर ही अंदर वे गुस्से से भर उठे थे पर ऊपरी सहानुभूति दिखाते हुए दुर्बल अवस्था में ही मुझे अपने साथ वापस ले गए.

‘‘घर पहुंच कर पति ने जम कर पिटाई की और सास ने चूल्हे में से जलती लकड़ी निकाल पीठ दाग दी. मेरे चिल्लाने पर पति मेरे बाल पकड़ कर खींचते हुए कमरे में ले गया और चीखते हुए बोला, ‘तुझे बहुत पर निकल आए हैं जो तू अपनी मनमानी पर उतर आई है. ले, अब पड़ी रह दिन भर भूखीप्यासी अपने इन पिल्लों के साथ.’ इतना कह उस ने आंगन में खेल रहे दोनों बच्चों को बेरहमी से ला कर मेरे पास पटक दिया और दरवाजा बाहर से बंद कर चला गया.

‘‘तड़पती रही थी मैं दिन भर जले के दर्द से. आपरेशन के टांके कच्चे होने के कारण टूट गए थे. बच्चे भूख से बेहाल थे, पर मां हो कर भी मैं कुछ नहीं कर पा रही थी उन के लिए. इसी तरह दोपहर से शाम और शाम से रात हो गई. भविष्य अंधकारमय दिखने लगा था और जीने की कोई लालसा शेष नहीं रह गई थी.

‘‘अपने उन्हीं दुर्बल क्षणों में मैं ने आत्महत्या कर लेने का निर्णय ले लिया. अभी पौ फटी ही थी कि दोनों सोते बच्चों सहित मैं कमरे की खिड़की से, जो बहुत ऊंची नहीं थी, कूद कर सड़क पर तेजी से चलने लगी. घर से नहर ज्यादा दूर नहीं थी, सो आत्महत्या को ही अंतिम विकल्प मान आंखें बंद कर बच्चों सहित उस में कूद गई. जब होश आया तो अपनेआप को अस्पताल में पाया. सतीश को आक्सीजन लगी हुई थी और छुटका जीवनमुक्त हो कहीं दूर बह गया था.

‘‘डाक्टर इस घटना को पुलिस केस मान बारबार मेरे घर वालों के बारे में पूछताछ कर रहे थे. मैं इस बात से बहुत डर गई थी क्योंकि मेरे पति को यदि मेरे बारे में कुछ भी पता चल जाता तो मैं पुन: उसी नरक में धकेल दी जाती, जो मैं चाहती नहीं थी. तब मैं ने एक सहृदय

डा. अमर को अपनी आपबीती सुनाते हुए उन से मदद मांगी तो मेरी हालत को देखते हुए उन्होंने इस घटना को अधिक तूल न दे कर जल्दी ही मामला रफादफा करवा दिया और मैं पुलिस के चक्करों  में पड़ने से बच गई.

‘‘अब तक डा. अमर मेरे बारे में सबकुछ जान चुके थे इसलिए वह मुझे बेटे सहित अपने घर ले गए, जहां उन की मां ने मुझे बहुत सहारा दिया. सप्ताह  भर मैं उन के घर रही. इस बीच डाक्टर साहब ने आप के द्वारा दिए उन 20 हजार रुपयों की मदद से यहां राजपुरा में हमें एक कमरा किराए पर ले कर दिया. साथ ही मेरे लिए सिलाई का सारा इंतजाम भी कर दिया. पर मुझे इस बात की चिंता थी कि मेरे सिले कपड़े बिकेंगे कैसे?

‘‘इस बारे में जब मैं ने डा. अमर से बात की तो उन्होंने मुझे एक गैरसरकारी संस्था के अध्यक्ष से मिलवाया जो निर्धन व निराश्रित स्त्रियों की सहायता करते थे. उन्होंने मुझे भी सहायता देने का आश्वासन दिया और मेरे द्वारा सिले कुछ वस्त्र यहां के वस्त्र विके्रताओं को दिखाए जिन्होंने मुझे फैशन के अनुसार कपड़े सिलने के कुछ सुझाव दिए.

‘‘मैं ने उन के सुझावों के मुताबिक कपड़े सिलने शुरू कर दिए जो धीरेधीरे लोकप्रिय होते गए. नतीजतन, मेरा काम दिनोंदिन बढ़ता चला गया. आज मेरे पास सिर ढकने को अपनी छत है और दो वक्त की इज्जत की रोटी भी नसीब हो जाती है.’’

इतना कह शांति हमें अपना घर दिखाने लगी. छोटा सा, सादा सा घर, किंतु मेहनत की गमक से महकता हुआ.  सिलाई वाला कमरा तो बुटीक ही लगता था, जहां उस के द्वारा सिले सुंदर डिजाइन के कपड़े टंगे थे.

हम दोनों पतिपत्नी, शांति की हिम्मत, लगन और प्रगति देख कर बेहद खुश हुए और उस के भविष्य के प्रति आश्वस्त भी. शांति से बातें करते बहुत समय बीत चला था और अब दोपहर ढलने को थी इसलिए हम पटियाला वापस जाने के लिए उठ खड़े हुए. चलने से पहले अभिनव ने एक लिफाफा शांति को थमाते हुए कहा, ‘‘बेटी, ये वही रुपए हैं जो तुम ने हमें लौटाए थे.

मैं अनुमान लगा सकता हूं कि किनकिन कठिनाइयों को झेलते हुए तुम ने ये रुपए जोड़े होंगे. भले ही आज तुम आत्मनिर्भर हो गई हो, फिर भी सतीश का जीवन संवारने का एक लंबा सफर तुम्हारे सामने है. उसे पढ़ालिखा कर स्वावलंबी बनाना है तुम्हें, और उस के लिए बहुत पैसा चाहिए. यह थोड़ा सा धन तुम अपने पास ही रखो, भविष्य में सतीश के काम आएगा. हां, एक बात और, इन पैसों को ले कर कभी भी अपने मन पर बोझ न रखना.’’

अभिनव की बात सुन कर शांति कुछ देर चुप बैठी रही, फिर धीरे से बोली, ‘‘अंकलजी, आप ने मेरे लिए जो किया वह आज के समय में दुर्लभ है. आज मुझे आभास हुआ है कि इस संसार में यदि मेरे पति जैसे राक्षसी प्रवृत्ति के लोग हैं तो

डा. अमर और आप जैसे महान लोग भी हैं जो मसीहा बन कर आते हैं और हम निर्बल और असहाय लोगों का संबल बन उन्हें जीने की सही राह दिखाते हैं.’’

इतना कह सजल नेत्रों से हमारा आभार प्रकट करते हुए वह अभिनव के चरणों में झुक गई.     द्य

 

चलन : जाति के बंधन तोड़ रहा है प्यार

गांवकसबे हों या शहर, आज नौजवान पीढ़ी अपने मनचाहे साथी के लिए जाति, धर्म और दूसरे सामाजिक बंधन तोड़ रही है. जरूरत पड़ने पर ऐसे प्रेमी जोड़े घरपरिवार छोड़ कर भाग भी रहे हैं. जाति हो या धर्म हो या फिर रुतबा, सभी पारंपरिक बेडि़यों को तोड़ते हुए आज नौजवानों का प्यार परवान चढ़ रहा है.

19 साल के विकास और 16 साल की स्नेहा की दोस्ती 2 साल पहले स्कूल में शुरू हुई थी. स्नेहा बताती है, ‘‘हमारी पहली मुलाकात स्कूल के रास्ते में हुई थी. यह पहली नजर का प्यार नहीं था. शुरुआत दोस्ती से हुई थी, फिर नंबर ऐक्सचेंज हुए और हमारी बातें होने लगीं.

‘‘मैं ने विकास से 3 वादे कराए थे. पहला, ये मुझे अपने परिवार से मिलाएंगे. दूसरा, मुझ से शादी करेंगे और तीसरा, अपना कैरियर बनाएंगे,’’ यह बताती हुई स्नेहा का चेहरा सुर्ख हो गया.

एक तरफ इन का इश्क परवान चढ़ रहा था, वहीं दूसरी तरफ स्नेहा के मातापिता का पारा. उस के पिता ने उसे फोन पर विकास से बात करते हुए सुन लिया था. अगले ही पल स्नेहा का फोन तोड़ कर फेंका जा चुका था और वह पिटाई के बाद रोते हुए एक कोने में दुबक गई थी.

विकास को जब इस सब का पता चला, तो उस ने स्नेहा को कुछ औरदिन बरदाश्त करने की बात कही. उन दोनों को यकीन था कि वे जल्द ही शादी कर लेंगे.दिसंबर की सर्दियों में दोपहर के तकरीबन 2 बजे होंगे. विकास एक कंपनी में नाइट ड्यूटी के बाद घर वापस आया था. उस की मां उस के लिए खाना गरम कर रही थीं कि तभी स्नेहा अचानक उन के घर चली आई. कड़कड़ाती सर्दी में उस के शरीर पर सिर्फ एक ढीला टौप और जींस थी.स्नेहा ने विकास की बांह पकड़ कर रोते हुए कहा, ‘‘यहां से चलो, अभी चलो. मेरे घर वाले तुम्हें मार डालेंगे…’’ और विकास उस के साथ निकल गया.

विकास के माबाप को लगा कि वे आसपास ही कहीं जा रहे होंगे, इसलिए उन्होंने दोनों को रोकने की कोशिश भी नहीं की.विकास ने उस दिन के बारे में बताया, ‘‘हम पैदल चल कर जयपुर पहुंचे और वहां हम ने रात बसअड्डे पर बिताई. हम पूरी रात जागते रहे. फिर हम ने जयपुर के पास ही एक गांव में किराए पर छोटा सा कमरा ले लिया और साथ रहने लगे.’’

स्नेहा बताती है कि वे दोनों वहां खुश थे, लेकिन विकास के परिवार को धमकियां मिल रही थीं. उस के मातापिता ने थाने में उन के लापता होने की शिकायत दर्ज कराई थी और स्नेहा के मातापिता जयपुर महिला आयोग जा चुके थे, इसलिए विकास ने अपने घर में फोन कर के अपना ठिकाना बताया.

इस बीच मैडिकल रिपोर्ट भी आगई थी, जिस में विकास और स्नेहा के बीच जिस्मानी संबंध होने की बात कही गई थी.पुलिस ने विकास को पोक्सो ऐक्ट यानी प्रोटैक्शन औफ चिल्ड्रेन फ्रोम सैक्सुअल औफैंस और रेप के आरोप में जेल में डाल दिया. उस ने जेल में 6 महीने बिताए. वहां रोज स्नेहा को याद कर के वह रोता था.क्या इस दौरान उन दोनों का भरोसा नहीं डगमगाया? एकदूसरे के पलटने का डर नहीं लगा? विकास के मन में थोड़ा डर जरूर था, लेकिन स्नेहा ने न में सिर हिलाया. उस ने कहा, ‘‘मैं ने सब समय पर छोड़ दिया था.’’

मामला अदालत में पहुंचा. स्नेहा ने जज के सामने अपने परिवार के साथ जाने से साफ इनकार कर दिया. उस ने बताया, ‘‘मैं ने कोर्ट में सचसच बता दिया कि मैं इन्हें ले कर घर से निकली थी, ये मुझे नहीं. हम दोनों अपनी मरजी से साथ हैं. इस पूरे मामले में इन की कोई गलती नहीं है.’’

जज ने फैसला सुनाया, ‘‘दोनों याचिकाकर्ता अपनी मरजी से साथ हैं. यह भी नहीं कहा जा सकता कि लड़की समझदार नहीं है. लेकिन चूंकि अभी दोनों नाबालिग हैं, इन्हें साथ रहने की इजाजत नहीं दी जा सकती.’’

जज ने विकास पर लगे पोक्सो ऐक्ट और रेप के आरोपों को भी खारिज कर दिया.राजस्थान के कोटा जिले के 28 साल के मनराज गुर्जर ने पिछले साल 30 दिसंबर को बांरा जिले की सीमा शर्मा से शादी कर ली. शादी में दोनों के परिवार खुशीखुशी शामिल हुए. राजस्थान यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान दोनों में प्यार हुआ.

मनराज राजस्थान पुलिस में सबइंस्पैक्टर हैं, तो सीमा स्कूल में टीचर. पर हर किसी की कहानी इन दोनों की तरह नहीं है. जयपुर की रहने वाली दलित समाज की पूनम बैरवा को ओबीसी समुदाय के सचिन से शादी के लिए न सिर्फ सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा, बल्कि उन के परिवार ने भी उन से नाता तोड़ लिया. ऐसा भी नहीं है कि यह हौसला बड़े शहरों की ओर रुख करने वाले ज्यादा पढ़ेलिखे नौजवानों में ही देखा जा रहा है, छोटे कसबों की कहानी तो और भी हैरानी भरी है.

अलवर जिले के तिजारा थाना इलाके के एक गांव की बलाई (वर्मा) जाति की खुशबू ने घर से भाग कर यादव जाति के किशन के साथ शादी रचा ली. जयपुर के महिला एवं बाल विकास संस्थान की सहायक निदेशक तारा बेनीवाल बताती हैं, ‘‘पिछले 2 साल में जयपुर में तकरीबन 30 लड़कियों ने अंतर्जातीय विवाह प्रोत्साहन राशि के लिए आवेदन किया है.’’ अजमेर के सरवाड़ इलाके के विजय कुमार ने जब सुनीता से अंतर्जातीय शादी की, तो उन्हें न केवल परिवार से अलग होना पड़ा, बल्कि पानी, बिजली और शौचालय जैसी सुविधाओं से भी वंचित कर दिया गया.

समाज ने उन का बहिष्कार कर दिया. इस दर्द को विजय कुमार कुछ यों बयान करते हैं, ‘‘लोग कहते हैं कि मैं आवारा निकल गया, बिरादरी की नाक कटा दी. आखिरी समय तक शादी तोड़ने की कोशिश की गई.’’ यहां तक कि बेटियों की आजादी पर भी बंदिश लगाई जाती है. 26 सितंबर, 2020 को अंतर्जातीय शादी करने वाली ज्योति बताती हैं, ‘‘मेरे परिवार वाले समाज के तानों से दुखी हैं. लोग कहते हैं कि बेटी को ज्यादा छूट देने की वजह से उस ने नीच जाति के लड़के से शादी कर ली. मांबाबूजी को तो यह भी फिक्र है कि दूसरे बेटेबेटियों की शादी कैसे होगी?’’

विजय कुमार अपने प्यार का राज खोलते हैं, ‘‘हम दोनों का संपर्क मोबाइल फोन के जरीए हुआ और उसी के जरीए परवान भी चढ़ा.’’जाहिर है कि मोबाइल और दूसरी तकनीकों और पढ़ाईलिखाई ने दूरियां मिटा दी हैं. जयपुर के महारानी कालेज में इतिहास की प्रोफैसर नेहा वर्मा इसी ओर इशारा करती हैं, ‘‘मर्दऔरत के बीच समाज ने जो अलगाव गढ़े थे, वे खत्म हो रहे हैं. दोनों के बीच आपसी मेल बढ़ा है, खासकर औरतें घर की दहलीज लांघ रही हैं.’’ अंतर्जातीय प्यार या शादी करने वालों को थोड़ीबहुत रियायत तो मिल भी जाती है, लेकिन अंतर्धार्मिक रिश्तों के लिए परिवार और समाज कतई तैयार नहीं होता.

अजमेर जिले के किशनगढ़ की 20 साला सकीना बानो ने जब घर से भाग कर 22 साल के अमित जाट से शादी की, तो उन्हें न केवल सामाजिक बुराई सहनी पड़ी, बल्कि उन के परिवार वालों ने अमित और उस की मां को जान से मारने और घर जलाने की धमकी तक दी.

मजबूरन उन्हें आत्मसमर्पण करना पड़ा और सकीना को पुनर्वास केंद्र भेज दिया गया. लेकिन अब अदालत के आदेश के बाद नवंबर, 2020 से दोनों पतिपत्नी की तरह रह रहे हैं. सकीना अब एक बेटे की मां बन गई है. उस के पिता अब बेहद बीमार हैं, पर बेटी से मिलना तक नहीं चाहते. अमित की मां भी सकीना को ले कर सहज नहीं हैं वहीं टोंक जिले की ही मनीषा की कहानी लव जिहाद की थ्योरी गढ़ने वाले संघी समूहों के मुंह पर करारा तमाचा है. 16 अप्रैल, 2022 को वह अपने प्रेमी मोहम्मद इकबाल के साथ घर से भाग गई.

भला समाज और परिवार को यह कैसे मंजूर होता. मनीषा के पिता जयनारायण ने इकबाल और उस के पिता हसन के खिलाफ अपहरण की प्राथमिकी दर्ज कराई. इस से बचने के लिए मनीषा और इकबाल ने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. समाज और परिवार का अडि़यल रुख ही है कि ऐसे ज्यादातर प्रेमी जोड़ों को प्यार या शादी के लिए घर से भागना पड़ रहा है. लेकिन वे उन से पीछा नहीं छुड़ा पाते, क्योंकि परिवार वाले उन के खिलाफ अपहरण और बहलाफुसला कर शादी करने का मामला दर्ज करा देते हैं. लेकिन इस से नौजवानों को कोई फर्क नहीं पड़ रहा.

इस सिलसिले में राजस्थान पुलिस के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. प्यार के मामलों में घर छोड़ कर भागने वाले नौजवानों की  तादाद में तकरीबन 6 गुना की बढ़ोतरी हुई है. पुलिस ने राज्य में अपहरण के दर्ज मामलों की जांच के बाद खुलासा किया है कि साल 2013 में जहां प्यार की खातिर घर से भागने वालों की तादाद सिर्फ 172 थी, वहीं साल 2021 में 763 हो गई और यह तादाद सिर्फ अपहरण के दर्ज मामलों की है.ब्राह्मण जाति की अंकिता और बहुत पिछड़ी जाति से आने वाले उन के पति के परिवारों में रिश्ते सामान्य होने में 3 साल लग गए. इस के लिए अंकिता के भाई ने ही पहल की. दोनों के 2 बच्चे भी हो गए हैं, तो वहीं कई लड़कियां पुनर्वास केंद्र में अपने प्रेमी से मिलने के इंतजार में दिन काट रही हैं. तमाम दुखों के बावजूद उन का हौसला नहीं टूटा है.

बेडि़यां तोड़ते इस प्यार को मनीषा के इस हौसले में देखा जा सकता है, ‘‘हमारे रिश्ते को जाति और धर्म के बंधन में नहीं बांधा जा सकता. कोई भी मुश्किल हमें डिगा नहीं सकती.’’प्रोफैसर नेहा वर्मा कहती हैं, ‘‘समाज में जहां एक तरफ धर्म और जाति का राजनीतिकरण बढ़ा है, वहीं दूसरी तरफ इन में दरारें भी पैदा हो रही हैं. नौजवान उन को चुनौती भी दे रहे हैं. लिहाजा, बांटने वाली ताकतों की प्रतिक्रिया भी बढ़ी है. लव जिहाद का झूठा मिथक इस की मिसाल है.’’

इश्क की बिसात पर बिजली का करंट

14नवंबर, 2022 की रात यही कोई 2 बजे की बात है. मध्य प्रदेश के भिंड जिले के गोरमी थाने के गांव सिकरौदा की रहने वाली एक महिला ने 100 नंबर पर फोन कर के कहा, ‘‘मैं कृष्णपाल केवट की पत्नी रामकली बोल रही हूं, मेरे पति की किसी बदमाश ने हत्या कर के उनकी लाश मेरे घर के पीछे डाल दी है.’’

चूंकि मामला गोरमी थाने का था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम ने गोरमी थाने को घटना की जानकारी दे दी.

सूचना मिलते ही गोरमी के एसएचओ सुधाकर सिंह तोमर, एसआई मनीराम, नादिर, एएसआई देवेंद्र भदौरिया, हैडकांस्टेबल कौशलेंद्र सिंह को साथ ले कर महिला द्वारा बताए पते की ओर रवाना हो गए. मौकाएवारदात पर पहुंचने के बाद एसएचओ ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को भी मामले की सूचना दे दी.

मृतक के शव और आसपास की जांचपड़ताल से पता चला कि कृष्णपाल केवट उर्फ टिंकू की हत्या करने के बाद हत्यारे उस की लाश को ठिकाने लगाने के लिए वहां तक घसीट कर लाए थे.

लाश को घसीटे जाने के निशान देख कर अनुमान लगाया गया कि हत्यारा किसी अन्य स्थान पर हत्या कर लाश को ठिकाने लगाने ले जा रहा होगा, लेकिन किसी ने लाश घसीटते हुए उसे देख लिया होगा. अत: वह पकड़े जाने के डर से लाश छोड़ कर भाग खड़ा हुआ. उस के पैर के दोनों अंगूठों पर बिली के करंट से जलाने के निशान थे.

कृष्णपाल सिंह को उस के दोनों हाथ साड़ी से बांधने के बाद उस के पैरों के अंगूठे में बिजली का करंट लगा कर मौत के घाट उतारा गया था, मृतक के दोनों हाथ अभी भी साड़ी से बंधे हुए थे. उस की आयु 37-38 साल के आसपास पास रही होगी.

लाश पड़ी होने का सब से पहले पता रात के अंधेरे में दिशामैदान के लिए गई एक महिला को चला था. उसी ने घर आ कर लाश के बारे में अपने पति को बताया था. फिर जानकारी मिलते ही और लोग भी वहां जुटने लगे थे. उसी भीड़ में शामिल मृतक की पत्नी ने पुलिस कंट्रोल रूम को इस हत्या की सूचना दी थी.

घटनास्थल की स्थिति और शुरुआती जांच में ही परिस्थितियां रामकली के खिलाफ थीं. एसएचओ को कृष्णपाल उर्फ टिंकू केवट की हत्या के मामले में उस की पत्नी रामकली की भूमिका स्पष्ट तौर पर दिखाई दे रही थी.

पुलिस ने रामकली के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि उस का सिकरौदा के ही 20 वर्षीय युवक राजू से पिछले 6 महीने से चक्कर चल रहा था.

कुछ महीने पहले वह उस के साथ घर से भाग गई थी, काफी प्रयास के बाद उस का पति उसे खोज लाया था. रामकली की इस करतूत के बाद पतिपत्नी में विवाद रहने लगा था, उन दोनों के रिश्तों में दरार आती चली गई. यह दरार इतनी बढ़ गई कि रामकली ने अपने पति को मौत के घाट उतारने की योजना बना डाली.

एसएचओ सुधाकर सिंह तोमर को लगा कि कहीं कृष्णपाल की हत्या प्रेम संबंध में बाधा बनने की वजह से तो नहीं हुई? अगर ऐसा हुआ तो रामकली भी शामिल रही होगी. उन्होंने बिना वक्त गंवाए शक के आधार पर रामकली को थाने बुलाया और उस से गहराई से पूछताछ की.

इस पूछताछ में उस ने प्रेम प्रसंग से ले कर राजू के साथ नाजायज ताल्लुकात की बात बेहिचक स्वीकार कर ली. लेकिन पति की हत्या में किसी तरह का हाथ होने से स्पष्ट तौर से मना करती रही.

उलटे वह एसएचओ से बोली, ‘‘साहब, मेरे ही पति की हत्या हुई है और आप मुझ से ही इस तरह पूछ रहे हैं, जैसे मैं ने ही उन्हें मारा हो. जिन लोगों ने मेरे पति को मार कर मेरे घर के पीछे उन की लाश फेंकी, उन्हें पकड़ने में आप कोई दिलचस्पी नहीं ले रहे. आप ही बताइए, भला मैं अपने पति को क्यों मारूंगी? यदि मैं ने अपने पति की हत्या की होती तो इतनी रात गए पुलिस को खबर क्यों देती? अगर आप मुझे ज्यादा तंग करेंगे तो मैं एसपी साहब से आप की शिकायत कर दूंगी.’’

पूछताछ के बाद उसी दिन एसएचओ ने रामकली और राजू के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स देख कर वह हैरान रह गए. काल डिटेल्स से पता चला कि दोनों एकदूसरे से अकसर घंटों तक बातें किया करते थे.

घटना वाली रात भी घटना से कुछ देर पहले और बाद में भी दोनों की काफी लंबी बातें हुई थीं. सबूत मिल जाने के बाद सुधाकर सिंह तोमर ने रामकली से कहा, ‘‘तुम जिस से चाहो मेरी शिकायत कर देना, मुझे तो इस अंधे कत्ल की पड़ताल कर जल्द से जल्द इस का खुलासा करना है.’’

सुधाकर सिंह तोमर ने रामकली से पूछा, ‘‘अब तुम यह बताओ कि तुम्हारे पति की हत्या से पहले और बाद में राजू से तुम्हारी क्या बातें हुई थीं? तुम्हारे मोबाइल फोन में मौजूद इस नंबर के बारे में भी बताओ कि यह किस का है?’’

रामकली ने तपाक से बताया कि यह नंबर  उस के प्रेमी राजू के मुंहबोले चाचा वीर सिंह का है.

इस बीच एसएचओ को अपने भरोसेमंद मुखबिर से पता चला कि घटना वाली रात सिकरौदा गांव के शातिर बदमाश वीर सिंह जिस पर अपनी पत्नी की हत्या सहित आधा दरजन आपराधिक मामले दर्ज हैं, को कृष्णपाल के घर में जाते हुए देखा गया था.

इस महत्त्वपूर्ण जानकारी से एसएचओ सुधाकर तोमर का माथा ठनका कि कहीं   रामकली के प्रेमी के साथसाथ वीर सिंह भी तो कृष्णपाल की हत्या में शामिल नहीं था.

एसएचओ ने राजू और उस के मुंहबोले चाचा वीर सिंह को भी पूछताछ के लिए थाने बुला लिया. उन दोनों से कृष्णपाल की हत्या के बारे में पूछताछ की गई. राजू ने बताया कि जिस वक्त कृष्णपाल की हत्या होने की बात कही जा रही है, उस समय वह सिकरौदा में नहीं था. वह तो किसी काम से उत्तर प्रदेश गया हुआ था.

राजू बारबार यही बात दोहराता रहा, उस के मोबाइल फोन की लोकेशन चैक करने से एक बात साफ हो गई कि कृष्णपाल की हत्या के समय राजू की मौजूदगी सिकरौदा में नहीं थी. यानी कृष्णपाल का हत्यारा कोई और था.

इस के बाद तोमर ने रामकली से पूछा, ‘‘तुम मुझे यह बताओ कि तुम्हारे पति की हत्या से पहले और बाद में राजू और उस के मुंहबोले चाचा से तुम्हारी क्या बातें हुई थीं?’’

इस सवाल पर रामकली के चेहरे का रंग उड़ गया. वह खुद को संभालते हुए बोली, ‘‘नहीं, मेरी उन दोनों से कोई बात नहीं हुई. साहब, किसी ने आप को गलत जानकारी दी है.’’

‘‘गलत नहीं बताया, यह देख लो. तुम ने घटना वाले दिन, कबकब और किस से बात की है. इस कागज में पूरी डिटेल है. एक नजर मार लो,’’ एसएचओ ने काल डिटेल्स वाला कागज उस के हाथ में थमाते हुए कहा.

रामकली अब झूठ नहीं बोल सकती थी, क्योंकि सुधाकर सिंह तोमर ने सारी हकीकत उस के सामने जो रख दी थी. उस की चुप्पी से तोमर समझ गए कि उन की जांच सही दिशा में चल रही है.

इस के बाद उन्होंने उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की तो रामकली ने कुबूल कर लिया कि पति की हत्या उस ने अपने प्रेमी के मुंहबोले चाचा वीर सिंह के साथ मिल कर की थी. उस ने पति के पैर के अंगूठे पर हीटर का तार बांधने के बाद एक घंटे तक करंट लगाया था. उस ने इस हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

तकरीबन 9 साल पहले घर वालों ने रामकली का विवाह सिकरौदा के कृष्णपाल केवट के साथ कर दिया था. रामकली इस विवाह से काफी खुश थी. उस ने बेहतर जिंदगी के सपने संजो लिए थे.

उस का लालनपालन भले ही एक गरीब परिवार में हुआ था, लेकिन उसे उम्मीद थी कि विवाह के बाद उस की सभी इच्छाएं पूरी हो जाएंगी और उस का पति उस के हर शौक को पूरा करेगा.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि कृष्णपाल सिंह अव्वल दरजे का शराबी था. वह जो कुछ कमाता था, शराब में उड़ा देता था. ऐसी स्थिति में उस के सारे अरमान चकनाचूर हो गए. समय अपनी गति से चलता रहा. रामकली 4 बच्चों की मां बन गई.

रामकली जितनी सुंदर थी, उस से कहीं ज्यादा चंचल भी थी. वह ज्यादा पढ़ीलिखी तो नहीं थी, मगर उस की खासियत यह थी कि वह गजब की चालाक थी. उसे जो भी करना होता था, बेहिचक हो कर करती थी. उस के इसी स्वभाव की वजह से जो भी उस से एक बार मुलाकात कर लेता था, वह उस का दीवाना हो जाता था.

राजू भी पहली ही मुलाकात में उस का दीवाना हो गया था. यही नहीं, वह मन ही मन उसे अपनी जीवनसंगिनी बनाने के सपने संजोने लगा था. वह जब भी अल्हड़ रामकली को देखता तो उस के दिल की धड़कनें बढ़ जातीं और वह रामकली का मादक जिस्म पाने के लिए छटपटा उठता.

हालांकि शुरू में तो राजू रामकली से ठीक तरह नजर भी नहीं मिला पाता था. लेकिन जब उसे पता चला कि रामकली अपने पति से खुश नहीं है तो उस की हिम्मत बढ़ गई. जैसा कि कहा जाता है कि जहां चाह होती है, वहां राह निकल ही आती है. राजू के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ.

रामकली के पति कृष्णपाल केवट को शराब पीने का शौक था. इसी के जरिए राजू को उस के करीब पहुंचने का मौका मिल गया. राजू भी अपने मुंहबोले चाचा वीर सिंह के साथ रोज कृष्णपाल के संग उस के घर पर शराब पीने जाता था.

इसी दौरान रामकली से उस की आंखें चार हो जाती थीं. फिर इसी बहाने वह रामकली के पति से ही नहीं, रामकली से भी घुलमिल गया. राजू उस की आर्थिक मदद भी करने लगा. हालांकि वीर सिंह भी रामकली से जिस्मानी संबंध बनाना चाहता था, मगर 40 वर्षीय वीर सिंह के आपराधिक चरित्र को देखते हुए रामकली इस के लिए तैयार नहीं हुई.

रामकली कोई दूधपीती बच्ची नहीं थी. वह राजू के दिल की बात अच्छी तरह से समझ रही थी. राजू को अपनी तरफ आकर्षित होते देख वह भी उस की ओर खिंची चली गई. राजू और रामकली के दिल में प्यार के अंकुर फूटे तो जल्द ही वह समय भी आ गया, जब दोनों का एकदूसरे के बिना रहना मुश्किल हो गया.

रामकली अकसर पति के नशे में मदहोश होते ही प्यार का अनैतिक खेल खेलने और अपने जिस्म की प्यास बुझाने के लिए राजू को अपने घर पर बुलाने लगी थी. जैसेजैसे यह खेल आगे बढ़ रहा था, उन दोनों के प्यार का बंधन मजबूत होता जा रहा था.

धीरेधीरे स्थिति यह हो गई कि रामकली को अपने पति कृष्णपाल की बाहों की अपेक्षा राजू की बाहें सख्त और ज्यादा अच्छी लगने लगी थीं. जो जिस्मानी सुख उसे राजू की बाहों में मिलता था, वह अपने पति की बाहों में नहीं मिल पाता था.

यही वजह थी कि उन दोनों को लगने लगा था कि अब वे एकदूसरे के बिना नहीं रह सकते. हालांकि राजू ने तो कुछ नहीं कहा लेकिन एक रोज रामकली ने उस से कहा, ‘‘राजू, अब मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती. मैं अब तुम से शादी करना चाहती हूं.’’

इस पर राजू ने उस से मजाक करते हुए कहा, ‘‘ऐसा कभी नहीं हो सकता, क्योंकि तुम सिर्फ शादीशुदा ही नहीं, बल्कि बालबच्चेदार भी हो.’’

‘‘मुझे इस से कोई मतलब नहीं. तुम अगर मुझ से सच में प्यार करते हो और मुझे हमेशाहमेशा के लिए अपना बनना चाहते हो तो इस के लिए तुम्हें मेरे पति की हत्या करनी पड़ेगी.’’ रामकली ने साफ कह दिया.

अपनी प्रेमिका के मुंह से यह सब सुन कर राजू की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. उस ने रामकली से दोटूक शब्दों में कहा, ‘‘मुझ से ऐसा निहायत ही घिनौना काम नहीं हो सकेगा. ऐसा करने पर हम दोनों को ही सारी उम्र जेल में गुजारनी पड़ेगी.’’

राजू ने रामकली से कहा, ‘‘हम दोनों को जो चाहिए वह हमें मिल रहा है तो फिर हम ऐसा काम क्यों करें?’’

राजू ने उसे समझाने का भरसक प्रयास किया, लेकिन इस का उस पर लेश मात्र भी असर नहीं हुआ. क्योंकि वह अपने शराबी पति से हमेशा के लिए पीछा छुड़ाना चाहती थी. राजू के प्यार में अंधी हो चुकी रामकली कभी राजू से कहती कि मेरे पति को शराब में जहर दे कर मार दो, तो कभी कहती गला घोट कर किस्सा हमेशा के लिए खत्म कर दो.

रामकली किसी भी तरह अपने पति को हटाना चाहती थी. लेकिन राजू इस के लिए तैयार नहीं हो रहा था. रामकली इस बात को अच्छी तरह जानती थी कि जब तक शराबी पति जिंदा रहेगा, वह तसल्ली से अपने प्रेमी को अपना जिस्म सौंप कर तनमन की प्यास नहीं बुझा सकेगी.

13 नबंबर, 2022 की रात रामकली ने राजू को फोन कर के कहा, ‘‘राजू, कृष्णपाल इस वक्त शराब के नशे में बेसुध हो कर बिस्तर पर पड़ा है. आज अच्छा मौका है उसे रास्ते से हटाने का. जल्दी से तुम यहां आ जाओ.’’

मगर राजू ने रामकली से कहा, ‘‘आज मैं सिकरौदा में नहीं हूं, अत: मैं नहीं आ सकूंगा. तुम मेरे मुंहबोले चाचा वीर सिंह को तो जानती ही हो, उन्हें फोन कर के अपने घर पर बुला लो. उन की मदद से अपने पति का खेल खत्म कर दो.’’

कहते हैं कि औरत जब चरित्रहीनता पर उतर आती है तो उसे किसी लोकलाज का भय नहीं रहता. रामकली भी ऐसी ही औरत थी. जिस वक्त रामकली ने अपने प्रेमी के मुंहबोले चाचा वीर सिंह को फोन किया, उस समय रात के 11 बज रहे थे.

रामकली ने पहले तो उस से इधरउधर की बातें कीं, इस के बाद उस ने बिना किसी हिचकिचाहट के वीर सिंह से कहा, ‘‘मुझे आज अपने पति को अपने और राजू के रास्ते से हटाना है. पति नहीं रहेगा तो मैं राजू के साथ हमेशा के लिए रह सकूंगी.’’

उस का इतना कहना था कि वीर सिंह ने कहा, ‘‘मैं तेरी इच्छा के मुताबिक रास्ते के कांटे को आज ही हटाए देता हूं. मगर इस के बदले में तुझे मेरे संग सोना होगा.’’

रामकली पति को ठिकाने लगाने के एवज में वीर सिंह के साथ शारीरिक संबंध बनाने को तैयार हो गई. वीर सिंह खुशी से चहका और मोबाइल फोन बंद कर के सीधे रामकली के घर जा पहुंचा.

उस ने रामकली के दरवाजे पर दस्तक दी और धीरे से दरवाजे को धकेला. दरवाजा खुल गया. वीर सिंह के दिल की धड़कनें बेकाबू होने लगीं. वह उन पलों की कल्पना कर के ही रोमांचित होने लगा, जब रामकली उस की बाहों में समाने वाली थी. अब वह क्षण बहुत करीब था.

रामकली के घर पहुंच कर वीर सिंह ने रामकली की मदद से शराब के नशे में मदहोश पड़े कृष्णपाल के दोनों हाथ साड़ी से बांध दिए. उस के बाद पैर के अंगूठों पर हीटर के तार से करंट देना शुरू कर दिया. जब कृष्णपाल की सांसें थम गईं, तब रामकली ने अपनी साड़ी से उस का गला घोंट दिया.

इस के बाद वादे के मुताबिक रामकली ने अपने पति की लाश के सामने ही वीर सिंह के साथ सहवास कर उस की कामोत्तेजना शांत की.

इस के बाद रामकली ने पति की नब्ज टटोलने के बाद नफरत से उस की लाश पर थूकते हुए कहा, ‘‘मर गया कमीना. मेरे और राजू के रास्ते का कांटा हमेशा के लिए निकल गया. चलो वीर सिंह, अब इसे कुंवारी नदी में फेंक कर देते हैं.’’

रामकली ने सोचा कि लाश नदी के पानी के साथ बह जाएगी, जिस से इस की पहचान नहीं हो पाएगी तो मामला रफादफा हो जाएगा’ लेकिन जब 14 नवंबर, 2022 की रात कृष्णपाल की लाश को रस्सी से बांध कर घसीटते हुए पास में बहने वाली नदी में प्रवाहित करने दोनों ले जा रहे थे, तभी उन्हें किसी के आने की आहट सुनाई दी. तब दोनों लाश को रास्ते में ही पड़ा छोड़ कर भाग खड़े हुए.

रामकली, राजू और वीर सिंह से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने मृतक की पत्नी की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त बिजली का तार, रस्सी और 3 मोबाइल फोन बरामद कर लिए.

इस के बाद उन्हें आईपीसी की धारा 302, 201 के तहत गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.     द्य

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित