हीरे की ललक में उमड़े लोग – भाग 3

साढ़े 3 सौ रुपए के इनवैस्टमेंट से  लखपति बनने का सपना देख रहे बाबूलाल ने बताया, ‘‘इस पहाड़ी के ऊपर एक गुफा है, वहां लोगों को ब्लैक डायमंड जैसे पत्थर अधिक मिल रहे हैं. मेरे पास ऐसे करीब 50 पत्थर जमा हो चुके हैं. इन की जांच कराऊंगा. ब्लैक डायमंड हुआ तो ठीक नहीं तो सुनार प्रति कंकड़ 100 रुपए के हिसाब से खरीद लेगा तो यहां आनेजाने का अपना खर्च तो निकल ही जाएगा.’’

हीरा पा कर मालामाल हो चुके लोगों की कहानी

हीरा पाने की ललक में नदी की रेत मिट्टी छान रहे लोग बेमतलब ही अपना वक्त नहीं बरबाद कर रहे, बल्कि लोग एक आस ले कर यहां पहुंचते हैं. मई 2022 में ऐसे ही एक मजदूर प्रताप सिंह की किस्मत चमकी थी, जब प्रताप सिंह यादव नाम के एक मजदूर को जैम क्वालिटी का हीरा मिला था.

प्रताप सिंह कुआं का रहने वाला है और उस की माली हालत ठीक नहीं थी. प्रताप यादव फरवरी में सरकारी हीरा कार्यालय गया और 4 गुणा 4 मीटर की एक जमीन हीरा खदान के लिए स्वीकृत करा ली. इस के बाद हीरा ढूंढने के लिए वह दिनरात मेहनत करने लगा.

3 महीने की कड़ी मेहनत ने उस की झोली में हीरा डाल दिया. इस तरह रातोरात गरीब मजदूर लखपति बन गया. हीरे का वजन 11.88 कैरट निकला. जिस की कीमत करीब 60 से 70 लाख रुपए आंकी गई. प्रताप ने इसे हीरा कार्यालय में जमा कर दिया है. प्रताप का कहना है कि हीरे की नीलामी से मिलने वाले पैसे से उस की आर्थिक स्थिति सुधारेगी और बच्चों की पढ़ाई और भरणपोषण का खर्च निकालेगा.

पन्ना में सब से बड़ा 44 कैरेट का हीरा वर्ष 1961 में रसूल मुहम्मद को मिला था. 67 साल बाद 2018 में 4 दोस्तों को 42 कैरेट से ज्यादा वजन का हीरा मिला था. यह हीरा उन्हें पटी की खदान में 9 अक्तूबर, 2018 को मिला था. इस खदान का पट्टा मोतीलाल प्रजापति के नाम पर था.

हीरा कार्यालय से मोतीलाल को इस हीरे के एवज में 2.25 करोड़ के लगभग कीमत मिली थी. पन्ना के बेनीसागर मोहल्ले में रहने वाले मोतीलाल अब भी हीरा खदानों में हीरा तलाशने का काम करते हैं. जब उन से पूछा गया कि करोड़ों का हीरा मिलने के बाद भी इस काम को नहीं छोड़ा तो उन का जबाब था, ‘‘मैं ने जो जिंदगी जी है, वो मेरे बच्चे न जिएं, उन को अच्छी शिक्षा देना और पढ़ाई कराना मेरा सपना है. इसी सपने को पूरा करने के लिए अब भी हीरा खदानों की खाक छान रहा हूं.’’

हीरा मिलने पर हो जाते हैं वारेन्यारे

47 साल के मोतीलाल 4 भाईबहनों में सब से बड़े हैं और केवल 10वीं तक की पढ़ाई उन्होंने की है. घर की माली हालत ठीक न होने से पढ़ाई बीच में छोड़ मजदूरी करनी पड़ी. अभी परिवार में मां, पत्नी के अलावा 2 बेटे व एक बेटी है.

मोतीलाल अपने 4 पार्टनरों के साथ 20 सालों से पटी की अलगअलग खदान में हीरे की खाक छानते रहे हैं. वे दोस्तों के साथ हीरापुर टपरियन की खदान में हीरे की तलाश में सुबह 5 बजे घर से निकल जाते हैं.

दोपहर बाद वहां से ईंट भट्ठे पर काम करने चले जाते हैं, वहां से शाम ढलने के बाद लौटते हैं.

मोतीलाल कहते हैं, ‘‘खदान में काम करते हुए 25 साल हो गए. पिछले साल उन्हें कम क्वालिटी का 5 कैरेट का हीरा मिला था. 1.62 लाख रुपए में नीलाम हुआ था. 11.50 प्रतिशत टैक्स कट गया था. शेष रकम 4 पार्टनरों में बंट गई.

इसी तरह 22 फरवरी, 2022 को पन्ना जिले की पटी की उथली हीरा खदान से किशोरगंज बड़ा बाजार में रहने वाले सुशील कुमार शुक्ला को 26.11 कैरेट का जैम क्वालिटी का हीरा मिला था.

सुशील कुमार शुक्ला हीरा मिलने की कहानी बताते हैं, ‘‘मैं 20 साल से बड़े भाई राजकिशोर शुक्ला के साथ हीरा पाने के लिए खुदाई कर रहा था, उस दिन हमारी किस्मत चमकी और हमें वो नायाब हीरा मिल गया.’’

नयापुवा पन्ना निवासी 45 साल के रामप्यारे विश्वकर्मा 16 साल की उम्र में छतरपुर से पन्ना आए थे. उन के बड़े भाई लोहा, पत्थर का काम करते थे. यहां आ कर उन्होंने साइकिल पंक्चर की दुकान खोल ली. बेटा भरत बाइक रिपेयरिंग करता है. 5 साल पहले पत्नी की बीमारी से मौत हो गई. 2 बेटियां हैं, बड़ी बेटी मोहिनी 12वीं में तो छोटी रोहिणी 6वीं में पढ़ रही है.

पिछले 30 सालों से वह भी हीरा तलाश रहे थे. उन की तलाश पूरी हुई 24 फरवरी, 2021 को जब उन्हें 14.9 कैरेट का हीरा मिला. उन की खदान में कुल 7 पार्टनर थे.

हीरे की नीलामी से 39 लाख रुपए मिले थे, जिसमें से हर एक के हिस्से में 5.57 लाख रुपए आए थे. रामप्यारे के हिस्से में मिले पैसे वे बेटियों की शादी के लिए जमा कर चुके हैं और अब भी हीरे की तलाश के लिए खदान जाते हैं.

मई 2022 में इटवां कला की रहने वाली चमेली बाई को 2.08 कैरेट का बेशकीमती हीरा कृष्ण कल्याणपुर पट्टी की उथली खदान से मिला था. चमेली बाई 10 साल से पन्ना में किराए के मकान में अपने परिवार के साथ रह रही हैं, लेकिन अभी तक मकान नहीं बनवा पाई.

इसी मकसद को ले कर उस ने फरवरी महीने में हीरा कार्यालय से हीरा खदान का पट्टा जारी कराया था. 200 रुपए के चालान में उसे 4×4 मीटर की खदान स्वीकृत हुई, जिस के बाद उस ने खदान में हीरा तलाशने का काम किया और मई के महीने में उसे 2.08 कैरेट का उज्ज्वल किस्म का हीरा मिला था.

ऐसे परखा जाता है असली हीरा

भारत करीब 3 हजार सालों से हीरे के उत्पादन में नंबर वन बना हुआ है. इंडियन ब्यूरो औफ माइंस की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हीरा मध्य प्रदेश के पन्ना जिले, आंध्र प्रदेश के गोलकुंडा और कोल्लूर खान के अलावा छत्तीसगढ़ के देवभोग में मिलता है.

कोहिनूर नाम का प्रसिद्ध हीरा गोलकुंडा में ही मिला था, जो वर्तमान में ब्रिटेन के राजशाही मुकुट की शोभा बढ़ा रहा है. हीरा रासायनिक तौर पर कार्बन का ही रूप है, जो निष्क्रिय होने के साथ पानी में घुलनशील नहीं है. गुजरात के सूरत शहर में ज्यादातर हीरे को काटने और पौलिश करने का काम होता है. हीरे को

700 डिग्री तापमान से अधिक गर्म करने पर वह जल कर कार्बन डाई आक्साइड के रूप में बदल कर राख जैसा कोई अवशेष नहीं छोड़ता है.

हीरे की परख रखने वाले जौहरी बताते हैं कि असली हीरे के अंदर की बनावट ऊबड़खाबड़ होती है, लेकिन कृत्रिम या बनावटी हीरा अंदर से सामान्य दिखता है.

असली हीरे में कुछ न कुछ खांचे होते है जो बारह सौ गुणा ताकतवर माइक्रोस्कोप की मदद से देखे जा सकते हैं.

हीरे को अखबार पर रखें और उस के पार से अक्षरों को पढ़ने की कोशिश करें, अगर  टेढ़ी लकीरें दिखें तो हीरा नकली है. हीरे को पराबैंगनी किरणों में देखें, नीली आभा के साथ चमकता है तो हीरा असली है. यदि पीली हरी या स्लेटी रंग की आभा निकले तो यह मोइसा नाइट नाम का पत्थर है.

हीरा प्रकाश को रिफ्लेक्ट करता है. असली हीरा बहुत कठोर होता है. हीरे को रगड़ने पर किसी भी प्रकार की खरोंच नहीं आती है. एक गिलास में पानी ले कर उस में हीरा डालने पर असली हीरा अपने घनत्व की अधिकता के कारण पानी में डूब जाता है लेकिन नकली हीरा पानी में तैरने लगता है.

हीरे के कोणों से आरपार देखने पर इंद्रधनुष की तरह सातों रंग दिखाई दें तो समझिए हीरा असली है. जिस तरह चश्मे के ग्लास पर भाप चढ़ जाती हैं, उसी तरह अगर मुंह की भाप हीरे पर जम जाए तो समझो हीरा नकली है. असली हीरे पर नमी नहीं जमती है.

सरकार की उदासीनता की वजह से पन्ना में हीरा उद्योग बंद होने के कगार पर है. अधिकांश हीरा खदानें बंद हो गई हैं. ऐसे में रुंझ नदी में हीरा मिलने की खबर से पन्ना का हीरा अचानक फिर चर्चा में आ गया है.

सरकार को चाहिए कि पन्ना के हीरा उद्योग को संरक्षित करे और वन भूमि विवाद के कारण जो हीरा खदानें बंद हो गई हैं, उन्हें भी चालू कराया जाना चाहिए, जिस से गरीबों की रोजीरोटी और अमीरों का शौक हमेशा के लिए सुरक्षित रह सके.    द्य

उजले लोगों का ये है काला धंधा – भाग 2

यह गिरोह खूबसूरत लड़कियों की मदद से रईस लोगों को ब्लैकमेल करता है. इस गिरोह के लोग पहले तो रईस लोगों की पहचान करते हैं, उस के बाद उन्हें फंसाने के लिए उन की दोस्ती गिरोह की खूबसूरत लड़कियों से करा देते हैं. दोस्ती के लिए वे फार्महाउसों पर सेलिबे्रट पार्टियां आयोजित करते हैं. इन पार्टियों में पीनेपिलाने का दौर चलता है.

उसी बीच लड़कियां शिकार को अपने मोबाइल नंबर दे देती हैं और उन के नंबर ले लेती हैं. इस के बाद पहले बातचीत और उस के बाद मुलाकातों का दौर शुरू हो जाता है. कुछ ही मुलाकातों में लड़कियां अपने शिकार को अपनी सुंदरता के मोहपाश में इस कदर बांध लेती हैं कि वे उन के साथ हमबिस्तर होने के लिए बेचैन हो उठते हैं.

शिकार को तड़पा कर लड़कियां हमबिस्तर होने का प्रोग्राम बनाती हैं. इस के लिए वे कई बार जयपुर से बाहर भी चली जाती हैं. रईसों के साथ उन के हमबिस्तर होने के समय गिरोह के सदस्य लड़की की मदद से गुप्त कैमरे से वीडियो क्लिपिंग बना लेते हैं. अगर इस में वे सफल नहीं हो पाते तो लड़कियां हमबिस्तर होने के बाद अपने अंतर्वस्त्र सुरक्षित रख लेती हैं.

इस के बाद उस रईस को धमकाने का काम शुरू होता है. लड़की अपने रईस शिकार को पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने की धमकी देती है. ज्यादातर मामलों में लड़कियां पुलिस में शिकायत कर भी देती हैं. इस के बाद फरजी पत्रकार और वकील का काम शुरू होता है. वे उस रईस को बदनामी का डर दिखा कर समझौता कराने की बात करते हैं. जरूरत पड़ने पर बीच में पुलिस वाले भी आ जाते हैं.

रईस अपनी इज्जत बचाने के लिए उन से सौदा करता है. रईस की हैसियत देख कर 10-12 लाख रुपए से ले कर एक करोड़ रुपए तक मांगे जाते हैं. गिरोह के लोग शिकार पर दबाव बनाए रखते हैं. आखिर रईस को सौदा करना पड़ता है. उस से पैसे लाने का काम अलग लोग करते हैं.

आनंद शांडिल्य ने पुलिस को बताया था कि यह गिरोह जयपुर सहित राजस्थान के बड़े शहरों के नामचीन प्रौपर्टी व्यवसायियों, बिल्डरों, मोटा पैसा कमाने वाले डाक्टरों, ज्वैलर्स, होटल रिसौर्ट संचालक और ठेकेदार आदि को अपना शिकार बनाता. इस काले धंधे में एक एनआरआई युवती भी शामिल है.

गिरोह के लोग लड़की को प्लौट या फ्लैट खरीदने के बहाने प्रौपर्टी व्यवसाई अथवा बिल्डर के पास भेज कर उसे फांस लेते हैं. इसी तरह होटल रिसौर्ट संचालक के पास नौकरी के बहाने भेजा जाता है तो डाक्टर के पास इलाज के बहाने. सौदा होने के बाद युवती और उस के गिरोह के सदस्य स्टांप पर लिख कर देते हैं कि दुष्कर्म नहीं हुआ है.

इस के पहले जयपुर में कभी इस तरह का कोई बड़ा मामला सामने नहीं आया था. इसलिए एसओजी के लिए हकीकत जानना अत्यंत महत्त्वपूर्ण था. अधिकारियों ने आपस में सलाहमशविरा कर के एसओजी के आईजी एम.एन. दिनेश के निर्देशन में हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग करने वाले गिरोह की खोजबीन शुरू कर दी.

उसी बीच इस गिरोह से पीडि़त जयपुर के वैशालीनगर निवासी डा. सुनीत सोनी ने एसओजी में शिकायत कराई कि उन का वैशालीनगर में हेयर ट्रांसप्लांट का क्लीनिक है. कुछ महीने पहले एक लड़की हेयर ट्रांसप्लांट कराने के लिए उन की क्लीनिक में आई. तभी उन का उस लड़की से संपर्क हुआ. लड़की ने जल्दी ही उन्हें प्रेमजाल में फांस लिया. इस के बाद दोनों पुष्कर गए और वहां एक रिसौर्ट में रुके. 2 दिनों बाद 2 लड़के मीडियाकर्मी बन कर आए और लड़की से दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कराने की धमकी दे कर उन से एक करोड़ रुपए मांगे.

डाक्टर ने रुपए देने से मना किया तो लड़की ने उन के खिलाफ पुष्कर में दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज करा दिया. जांच के बाद पुलिस ने डा. सुनीत सोनी को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. डाक्टर करीब ढाई महीने तक जेल में रहे. इस बीच डाक्टर से गिरोह के वकील सहित अलगअलग लोगों ने संपर्क किया.

गिरोह के सदस्यों ने अदालत में लड़की के बयान बदलवाने के लिए डाक्टर से डेढ़ करोड़ रुपए की मांग की. आखिर सौदा एक करोड़ रुपए में तय हो गया. पैसे लेने के बाद गिरोह के लोगों ने लड़की के बयान बदलवा दिए. उस समय डा. सुनीत सोनी ने जयपुर के थाना वैशालीनगर में इस मामले की रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी. लेकिन उस समय थाना पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की थी.

डा. सुनीत सोनी की शिकायत पर जांच करते हुए एसओजी ने 24 दिसंबर, 2016 को इस हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग करने वाले गिरोह का खुलासा किया. एसओजी ने गिरोह के 2 लोगों को गिरफ्तार कर लिया था. गिरफ्तार किए गए लोगों से पूछताछ की गई तो गिरोह में शामिल लड़कियों के बारे में पता चल गया. इन्हीं लोगों से गिरोह की एनआरआई लड़की रवनीत कौर उर्फ रूबी के बारे में पता चला था. इस के अलावा एक लड़की कल्पना उत्तराखंड की थी.

इस के बाद एसओजी इस पूरे गिरोह को गिरफ्तार करने में जुट गई. धीरेधीरे लोग पकड़े भी जाने लगे. एसओजी उत्तराखंड के ऊधमसिंहनगर से कल्पना को गिरफ्तार कर के जयपुर ले आई. पूछताछ में कल्पना ने बताया कि गिरोह ने उस की मदद से कई लोगों को अपने जाल में फांस कर मोटी रकम ऐंठी थी.

कल्पना से पूछताछ के बाद राजस्थान सशस्त्र पुलिस बल (आरएसी) के कांस्टेबल हरिकिशन को गिरफ्तार किया गया. उस ने गिरोह के लिए उत्तराखंड से अन्य कई लड़कियों को बुलाया था. कल्पना को भी वही लाया था.

गिरोह ने कल्पना को इस काम के लिए जो रकम देने का वादा किया था, वह रकम उसे नहीं मिली थी. इस के बाद उस ने गिरोह के सदस्य एक वकील को दुष्कर्म का केस दर्ज कराने की धमकी दी थी. इस से घबराए वकील ने कल्पना से सन 2015 में आमेर के एक मंदिर में शादी कर ली थी. वकील से शादी के बाद भी गिरोह कल्पना से हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग की वारदातों का काम लेता रहा.

कल्पना की गिरफ्तारी के बाद एसओजी का दल एनआरआई लड़की रवनीत कौर की तलाश में जुट गया. लेकिन समस्या यह थी कि अब तक रवनीत का गिरोह से पैसों के लेनदेन को ले कर विवाद हो गया था, जिस से वह गिरोह  से अलग हो गई थी. एसओजी को कहीं से जानकारी मिली कि रवनीत कोटा में है. जांच अधिकारियों को उस के फेसबुक एकाउंट का भी पता चल गया था.

इस के बाद एसओजी ने रवनीत के मोबाइल नंबर हासिल कर लिए. उस का नंबर मिल गया तो एसओजी की टीम कोटा पहुंच गई और एक पुलिस इंसपेक्टर ने रवनीत को जयपुर के मीडियाकर्मी करण के नाम से फोन किया. इस के बाद उसे किस तरह पकड़ा गया, आप शुरू में पढ़ चुके हैं. रवनीत कौर उर्फ रूबी से पूछताछ में उस की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

27 साल की रवनीत कौर उर्फ रूबी हांगकांग में पैदा हुई थी. उस के पिता पंजाब के फरीदकोट के रहने वाले थे. वह कारोबार के सिलसिले में हांगकांग गए थे. वहां उन का कामधाम जम गया तो वहीं उन्होंने भारतीय मूल की महिला से शादी कर ली.

रवनीत सन 2008 में ओवरसीज कार्ड पर अपनी दादी के पास जालंधर रहने आई. जालंधर से वह सन 2012 में जयपुर आ गई और एक यूनिवर्सिटी से उस ने 3 साल के बीबीए कोर्स में एडमिशन ले लिया. उसी यूनिवर्सिटी में एमबीए कर रहे कोटा निवासी रोहित से उस की दोस्ती हो गई. रवनीत कौर को बीबीए की पढ़ाई रास नहीं आई तो उस ने 2 साल बाद पढ़ाई छोड़ दी.

इस बीच रवनीत बीचबीच में अपने मातापिता के पास हांगकांग भी जाती रही. सन 2013 के अंत में उस के मातापिता ने कनाडा के एक एनआरआई बिजनैसमैन से उस की शादी तय कर दी. रवनीत भी उस से शादी करने को तैयार थी. इस का कारण यह था कि उस समय तक रवनीत की कोटा के रहने वाले रोहित से केवल दोस्ती थी.

दोस्ती इतनी आगे नहीं बढ़ी थी कि वह उस से शादी के बारे में सोचती. उस ने मातापिता से कहा कि शादी में वह जयपुर का लहंगा पहनेगी और वहीं से शादी के अन्य कपड़े और ज्वैलरी ले कर आएगी.

मातापिता ने उसे जयपुर से लहंगा और अन्य सामान लाने के लिए 8 लाख रुपए दे दिए. जयपुर आ कर रवनीत के 8 लाख रुपए खर्च हो गए मातापिता से शादी के सामान के लिए लाए पैसे खर्च हो गए तो रवनीत परेशान हो उठी. इस बीच उस की शादी भी टूट गई तो वह जयपुर में ही नौकरी की तलाश करने लगी. तभी वह इस गिरोह के संपर्क में आई. यह सन 2014 की बात है. गिरोह के इशारे पर रवनीत ने 6-7 लोगों को अपनी सुंदरता के जाल में फांस कर करोड़ों की वसूली की. सब से पहले उस ने एक बिल्डर को अपने हुस्न का जलवा दिखा कर उस से एक गोल्फ क्लब में मीटिंग तय की.

926 करोड़ की डकैती, जो हो नहीं पाई – भाग 2

926 करोड़ रुपए थे लुटेरों के निशाने पर

रात को ही एक्सिस बैंक के अफसरों को मौके पर बुलाया गया. राजधानी जयपुर में बैंक लूटने के प्रयास की सूचना मिलने पर जयपुर पुलिस कमिश्नरेट के आला अफसर रात को ही मौके पर पहुंच गए. बैंक के अफसरों ने बताया कि राजस्थान में एक्सिस बैंक की सभी शाखाओं में इसी चेस्ट ब्रांच से पैसा जाता है.

पूरे राज्य से जमा हो कर पैसा भी इसी चेस्ट ब्रांच में आता है. बैंक अफसरों से पुलिस अधिकारियों को पता चला कि इस चेस्ट ब्रांच में वारदात के समय 926 करोड़ रुपए रखे हुए थे. इतनी बड़ी रकम की बात सुन कर पुलिस अफसर हैरान रह गए.

अगर पुलिस कांस्टेबल सीताराम हिम्मत दिखा कर गोली नहीं चलाता तो शायद बदमाश बैंक लूटने में कामयाब हो जाते. अगर यह बैंक लुट जाती तो यह भारत की अब तक की सब से बड़ी बैंक डकैती होती. सीताराम के गोली चलाने से यह बैंक डकैती होने से बच गई थी.

कांस्टेबल सीताराम की ओर से बदमाशों को ललकारने के लिए चलाई गई गोली बैंक के सामने बाईं ओर एक मकान की खिड़की में जा कर लगी. गोली लगने से खिड़की का कांच टूटा तो मकान मालिक और उन के परिवार की नींद खुल गई. उन्होंने बाहर आ कर पता किया तो बैंक में डकैती के प्रयास का पता चला. तब तक पुलिस भी मौके पर पहुंच गई थी.

पुलिस ने रात को जयपुर से बाहर निकलने वाले सभी रास्तों पर कड़ी नाकेबंदी करवा दी. 6 फरवरी को कांस्टेबल सीताराम की रिपोर्ट के आधार पर जयपुर के अशोक नगर थाने में मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

6 फरवरी को सुबह से पुलिस और एक्सिस बैंक के आला अफसरों का मौके पर जमावड़ा लगा रहा. जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने भी मौके पर पहुंच कर बैंक के सुरक्षा इंतजामों के बारे में जानकारी ली. पुलिस को जांचपड़ताल के दौरान 4 बड़े खाली कट्टे (बोरी) मिले. ये कट्टे बदमाश अपने साथ लाए थे, लेकिन गोली की आवाज सुन कर भागते समय छोड़ गए.

बदमाशों का पता लगाने के लिए पुलिस ने बैंक के अंदरबाहर और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी तो पता चला कि बदमाश 7 सीटर इनोवा गाड़ी से आए थे. इस गाड़ी से 11 बदमाश बाहर निकले और 2 बदमाश अंदर ही बैठे रहे. बाहर निकले सभी बदमाशों के चेहरे ढंके हुए थे. इन में से 4-5 बदमाशों के हाथ में पिस्तौल और बाकी के हाथों में डंडे और सरिए थे. इस इनोवा का नंबर तो साफ दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन राजस्थान के नागौर जिले की नंबर सीरीज जरूर नजर आ रही थी.

पुलिस की जांच में पता चला कि बैंक की इस चेस्ट ब्रांच में लिमिट से करीब 3 सौ करोड़ रुपए ज्यादा रखे हुए थे. नियमानुसार बैंक को यह राशि रिजर्व बैंक में जमा करानी चाहिए थी. यह बात सामने आने पर करेंसी चेस्ट में सुरक्षा मापदंडों को ले कर चूक और लिमिट से ज्यादा कैश रखने के मामले में रिजर्व बैंक के महाप्रबंधक करेंसी पी.के. जैन ने एक्सिस बैंक से रिपोर्ट मांगी.

बहरहाल, एक्सिस बैंक में देश की सब से बड़ी डकैती टल गई थी. कांस्टेबल सीताराम की सूझबूझ से बदमाशों को भागना पड़ा. सीताराम जयपुर का हीरो बन गया था. सीताराम की सतर्कता और बहादुरी से 926 करोड़ रुपए की बैंक डकैती टल जाने पर जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने राजस्थान के पुलिस महानिदेशक ओ.पी. गल्होत्रा से बात की और कांस्टेबल सीताराम को पुरस्कृत करने की सिफारिश की.

पुलिस के लिए आसान नहीं था लुटेरों का सुराग ढूंढना

डकैती तो टल गई थी, लेकिन जयपुर पुलिस के लिए बैंक में घुसने वाले बदमाशों का पता लगाना सब से पहली चुनौती थी. इस के लिए पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने अपने मातहत अधिकारियों की मीटिंग कर के वारदात के लिए आए बदमाशों का पता लगाने को कहा.

विचारविमर्श में यह बात सामने आई कि 7 सीटर इनोवा में 13 लोगों का बैठना आसान नहीं है. इस का मतलब बदमाशों के पास कोई दूसरा वाहन भी रहा होगा, लेकिन सीसीटीवी फुटेज में दूसरा वाहन नजर नहीं आ रहा था. इनोवा गाड़ी भी चोरी की होने या उस पर फरजी नंबर प्लेट होने की आशंका थी. इस बात पर भी विचार किया गया कि बैंक में वारदात करने से पहले बदमाशों ने रैकी जरूर की होगी. अगर उन्होंने रैकी की थी तो उन्हें इस बात का पता रहा होगा कि बैंक की इस चेस्ट ब्रांच में 3-4 पुलिसकर्मी हमेशा मौजूद रहते हैं.

एक सवाल यह भी उठा कि बदमाशों की संख्या करीब 13 थी और उन में 4-5 के पास पिस्तौल भी थी तो वे केवल एक गोली चलने से घबरा क्यों गए? बैंक में डकैती डालने की हिम्मत करने वाले बदमाश डर कर भागने के बजाय मरनेमारने पर उतारू हो जाते हैं. इस से संदेह हुआ कि बदमाश कहीं नौसिखिया तो नहीं थे. इस के अलावा बदमाशों को इस बात का अंदाजा नहीं था कि बैंक में 926 करोड़ रुपए होंगे.

पुलिस ने वारदात की जानकारी मिलने के तुरंत बाद जयपुर से बाहर निकलने वाले रास्तों पर नाकेबंदी कर दी थी. फिर भी बदमाशों का कोई सुराग नहीं मिला था. इस से यह बात भी उठी कि बदमाश जयपुर शहर के ही रहने वाले तो नहीं हैं.

पचासों तरह के सवालों का हल खोजने के लिए पुलिस कमिश्नर ने 4 आईपीएस अधिकारियों के सुपरविजन में एक दर्जन टीमें गठित कीं. इन टीमों में सौ से ज्यादा पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया. अलगअलग टीमों को अलग जिम्मेदारियां सौंपी गईं.

पुलिस टीमों ने मुख्य रूप से बैंक कर्मचारियों और वहां तैनात गार्डों से पूछताछ, बैंक से रुपए लाने ले जाने वाली 3 निजी सिक्योरिटी एजेंसियों के मौजूदा और पुराने कर्मचारियों से पूछताछ, जयपुर से निकलने वाले रास्तों पर स्थित टोल नाकों पर सीसीटीवी फुटेज, जयपुर के आसपास हाइवे और कस्बों में स्थित होटल, ढाबों पर हुलिए के आधार पर बदमाशों की जानकारी हासिल करने, इस तरह की वारदात करने वाले गिरोहों की जानकारी जुटाने आदि बिंदुओं पर अपनी जांचपड़ताल शुरू की.

दूसरी ओर, पुलिस कमिश्नर ने रिजर्व बैंक में जयपुर के सभी पब्लिक सैक्टर और निजी सैक्टर के बैंक अधिकारियों, रिजर्व बैंक के अधिकारियों और गोल्ड लोन देने वाली कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की. इस मीटिंग में पुलिस कमिश्नर ने कहा कि सभी बैंक सुरक्षा व्यवस्था के बारे में रिजर्व बैंक की गाइडलाइन का पूरी तरह पालन करें.

इस के अलावा उन्होंने सुरक्षा के खास प्रबंधों के साथसाथ अलार्म और हौटलाइन की आवश्यक व्यवस्था करने को भी कहा. कैश लाने ले जाने से पहले मौकड्रिल करने की भी बात की. उन्होंने राय दी कि बैंक के सीसीटीवी कैमरे अपग्रेड किए जाएं, जिन में कम से कम 90 दिन का बैकअप होना चाहिए. अलार्म सिस्टम भी जरूर लगाए जाएं.

पैसों के लिए हनीट्रैप : लालच ने बनाया शिकार

23 नवंबर, 2020 की सुबह का वक्त था. मंदसौर जिले के मल्हारगढ़ थाने के टीआई कमलेश सिंगार को थाने पहुंचे कुछ ही समय हुआ था कि पास के गांव रतनगढ़ से आए 2 लोग मोहन और धीरज ने उन से मिलने की इच्छा जाहिर की.

टीआई ने उन दोनों को केबिन में बुला लिया. मोहन की उम्र कोई 40-45 साल थी, जबकि उस के साथ आए युवक धीरज की उम्र मुश्किल से 22 साल रही होगी.

मोहन गांव में पंचायत स्तर की राजनीति से जुड़ा होने के कारण तेज था, इसलिए उस ने बिना लागलपेट के टीआई कमलेश सिंगार को साथ आए युवक धीरज के साथ हुई लूट की रिपोर्ट दर्ज करने का अनुरोध किया. लेकिन धीरज इज्जत के डर से रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाना चाहता था.

पूरे घटनाक्रम में मोहन भी जुड़ा हुआ था. इसलिए उस ने टीआई कमलेश सिंगार को पूरी घटना से अवगत करा दिया. इस के बाद टीआई ने मोहन की तरफ से एक अज्ञात युवती,  2 महिलाओं और 3 पुरुषों के खिलाफ लूट की रिपोर्ट दर्ज  कर ली.

22 वर्षीय अविवाहित धीरज रतनगढ़ का रहने वाला था. संपन्न परिवार के धीरज का बड़ा करोबार था. एक दिन उस के मोबाइल फोन पर किसी अज्ञात नंबर से फोन आया.

‘‘हैलो, कौन?’’ धीरज ने फोन रिसीव करते हुए पूछा.

‘‘आप दिनेशजी बोल रहे हैं?’’ किसी लड़की की मीठी सी आवाज आई.

‘‘जी नहीं, शायद आप ने गलत नंबर मिलाया है,’’ धीरज ने कहा.

‘‘मेरी किस्मत में हमेशा गलत डायलिंग क्यों लिखी है.’’ उस युवती ने गहरी सांस लेते हुए कहा तो धीरज को अजीब लगा.

उस से कुछ बोलते नहीं बना. वह चुप रहा तो उधर से फिर आवाज आई, ‘‘हैलो आप सुन रहे हैं न?’’

‘‘हांहां सुन रहा हूं. लेकिन मैं दिनेश नहीं हूं.’’

‘‘मुझे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप का नाम दिनेश है या नहीं. मेरे लिए इतना ही काफी है कि आप ने कम से कम मेरा दर्द तो सुना, वरना इतनी बड़ी दुनिया में मेरा एक भी हमदर्द नहीं है.’’ वह बोली.

‘‘आप ऐसा क्यों सोचती हैं, समय के साथ सब ठीक हो जाएगा.’’ धीरज ने उसे तसल्ली देने वाले अंदाज में कहा.

‘‘पता नहीं कब होगा. मुझे तो लगता है कि सारी प्रौब्लम मेरे लिए ही हैं. मेरे पिता ने मुझे इतना पढ़ायालिखाया, लेकिन कुछ काम नहीं आया. खैर छोड़ो, आप क्यों मेरी कहानी सुन कर अपना समय खराब करेंगे.’’

‘‘अरे नहींनहीं, ऐसी कोई बात नहीं है.’’ धीरज ने जल्दी से कहा. उसे डर था कि कहीं वह फोन न काट दे.

‘‘आप सुनेंगे मेरे दर्द की दास्तान?’’

‘‘जी, बताइए. हो सकता है मैं आप के किसी काम आ सकूं.’’

‘‘तो ठीक है. मैं रात में आप को इसी नंबर पर फोन करूंगी. कहानी लंबी है, फिर रात की तनहाई में किसी अपने के सामने दिल खोल कर रख देने का सुख ही अलग होता है. अच्छा, यह बताओ कि आप की पत्नी तो गुस्सा नहीं करेंगी.’’

‘‘अभी मेरी शादी नहीं हुई है.’’ धीरज ने बताया.

‘‘अरे तो फिर किसी लड़की के दिल पर यूं प्यारभरा हाथ रखना आप ने कहां से सीखा. आप मेरी कहानी सुनने के लिए राजी हो गए तो मुझे लगा जैसे आप अभीअभी मेरे दिल को बहुत हौले से छू कर गुजरे हो.’’ वह बोली.

‘‘आप की शादी हो गई?’’ धीरज ने कुछ हिम्मत कर के पूछा.

‘‘इस तन की तो हो गई लेकिन दिल की नहीं हुई.’’

‘‘क्या मलतब?’’

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‘‘मतलब सीधा सा है यार. पति है, इसलिए मेरे शरीर को तो उस ने शादीशुदा बना दिया, लेकिन मेरे दिल को अब तक यह भरोसा नहीं दिला पाया कि वह मेरा पति है. अच्छा कोई आ जाएगा, बाकी बातें मैं रात में बताऊंगी, तुम अपनी तरफ से फोन मत करना मैं खुद कर लूंगी.’’

कहते हुए उस युवती ने काल डिसकनेक्ट कर दी तो धीरज ठगा सा खड़ा रह गया. उस का मन कर रहा था कि काश! अभी रात हो जाए और वह फिर उस युवती की मीठी आवाज सुने.

रात में उस युवती का फोन आ गया. वह बोली, ‘‘क्या कर रहे हो?’’

‘‘कुछ नहीं.’’ धीरज ने कहा.

‘‘धत मैं तो समझी थी कि तुम मुझे याद कर रहे होगे. सच कहूं तो आप से फोन पर बात करने के बाद से मैं लगातार आप को ही याद कर रही हूं.’’

‘‘ऐसा क्यों?’’

‘‘शायद इसी को पुराने जन्म का रिश्ता कहते हैं. हो सकता है, पिछले जन्म में आप मेरे रहे हो. इसलिए इस जन्म में भी मिल गए.’’

‘‘हां, हो सकता है.’’ धीरज ने थूक गटकते हुए कहा.

‘‘तो हमारे बीच इस जन्म में ये दूरी क्यों?’’

‘‘सब किस्मत की बात है.’’

‘‘सच कहा आप ने तभी तो नियति ने ऐसे पति के साथ बांध दिया जो दिन भर मेरे ऊपर अपने दिमाग की गरमी निकालता है और रात में अपने तन की. मेरी भावनाओं से तो जैसे उसे कोई मतलब ही नहीं है. सच कहूं तो मेरा पति रात में तो मुझे केवल मशीन समझता है. आप समझ रहे हैं न, मैं क्या कहना चाहती हूं.’’

‘‘जी, समझ रहा हूं.’’

‘‘कैसे? आप की तो अभी शादी भी नहीं हुई. कहीं ऐसा तो नहीं कि बिना शादी के ही गर्लफ्रैंड ने ये सब सिखा दिया हो.’’

‘‘मेरी कोई गर्लफ्रैंड भी नहीं है.’’

‘‘तो मुझे समझ लो.’’

‘‘आप बनोगी मेरी फ्रैंड?’’

‘‘समझो बन गई. सच कहूं, अब आप मिल गए हो तो लगता है कि सब ठीक हो जाएगा. चंद पलों की इस बात में ही आप से मिलने का मन करने लगा है. आप मिलना चाहेंगे मुझ से?’’

‘‘जरूर.’’

‘‘कहां सब के सामने या कहीं अकेले में? ज्यादा परेशान तो नहीं करोगे न मुझे?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘तो ठीक है, मैं 2-4 दिन में तुम से मिलने की कोशिश करती हूं.’’

उस के बाद काफी देर तक वह धीरज से मीठीमीठी बातें करती रही फिर दूसरे दिन फोन करने को कह कर फोन डिसकनेक्ट कर दिया.

दूसरे दिन धीरज इंतजार करता रहा लेकिन उस का फोन नहीं आया. अगले दिन उस ने बताया कि उसे मौका नहीं मिल पाया, इसलिए फोन नहीं कर सकी. इस बार उस ने अगले दिन धीरज को मल्हारगढ़ बस स्टैंड पर मिलने को कहा. धीरज न केवल राजी हो गया बल्कि उस के बताए समय पर वहां पहुंच भी गया.

थोड़ी देर में लगभग 22 साल की एक खूबसूरत युवती उस से आ कर मिली और उसे मस्ती करने के नाम पर गाडगिल सागर डैम ले गई. डैम पर एकांत में वह युवती धीरज को अपने साथ शारीरिक संबंध बनाने की दिशा में ले जाने लगी.

लेकिन इस से पहले कि बात ज्यादा आगे बढ़ती, मौके पर 2 महिलाएं और 2 युवक आ कर सीधे धीरज के साथ मारपीट करने लगे. महिलाएं उस पर आरोप लगा रहीं थी कि उस ने उन के परिवार की बहू को बिगाड़ दिया है. वह उस से अकेले में मिल कर शारीरिक संबंध बनाता है.

धीरज ने उन के सामने बहुत हाथपैर जोड़े, लेकिन वे उसे थाने ले जा कर बलात्कार का मामला दर्ज करवाने पर अड़े रहे. इसी बीच वहां से एक आदमी गुजरा, जिस ने पूरा मामला सुन कर दोनों पक्षों को समझाया कि थाने जाने से कोई फायदा नहीं है. यहीं आपस में मामला निपटा लो.

इस के लिए युवती के परिवार वालों ने धीरज से 5 लाख रुपए की मांग की. इतना ही नहीं, उन्होंने उसी समय धीरज की जेब में रखे 70 हजार रुपए छीन लिए. धीरज के पास 5 लाख रुपए नहीं थे, इसलिए मामला 3 लाख में सेट हो जाने पर धीरज ने तुरंत अपने दोस्त मोहन को फोन लगा कर 3 लाख रुपया ले कर बुलाया.

मोहन ने इस का कारण पूछा, लेकिन धीरज ने कुछ नहीं बताया. इसलिए अंधेरा होने तक मोहन धीरज के बताए स्थान पर पैसा ले कर तो आ गया मगर वह इस बात पर अड़ गया कि जब तक धीरज पैसों की जरूरत का कारण नहीं बताएगा, वह पैसे नहीं देगा.

लड़की और उस के साथियों ने धीरज की मोटरसाइकिल रख कर उसे अकेले ही मोहन के पास भेजा था. किसी तरह की बदमाशी दिखाने पर उन्होंने उसे बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करवाने का डर भी दिखाया था.

लेकिन जब मोहन बिना कारण जाने पैसे देने को राजी नहीं हुआ तो धीरज ने उसे पूरी बात बता दी. संयोग से इसी बीच धीरज के पास फिर बदमाशों का फोन आ गया. उन का कहना था कि जल्दी पैसे ले कर आओ वरना वे थाने जा कर मामला दर्ज करवा देंगे.

इस पर मोहन ने धीरज के हाथ से फोन छीन लिया और खुद को पुलिस इंसपेक्टर बताते हुए धमकी दी तो बदमाशों ने अपना फोन स्विच्ड औफ कर लिया. अगले दिन मोहन धीरज को किसी तरह थाने ले कर आया, लेकिन धीरज रिपोर्ट लिखवाने को राजी नहीं हुआ तो मोहन ने अपनी तरफ से रिपोर्ट दर्ज करवा दी.

धीरज के साथ घटी लूट की घटना सुन कर टीआई कमलेश सिंगार को एक पुरानी घटना याद आ गई, जिस में इसी तरह से एक औरत ने 70 वर्षीय गांव के मुखिया को अपने जाल में फंसा कर उस से एक लाख 80 हजार रुपए लूट लिए थे.

इस से टीआई समझ गए कि यह किसी गिरोह का काम है, जो नियोजित योजना के तहत लोगों को इज्जत का डर दिखा कर लूटने हैं. इसलिए उन्होंने इस गिरोह को खत्म करने के लिए कमर कस ली. अगले दिन टीआई कमलेश सिंगार ने उसी नंबर पर फोन लगाया, जिस से वह युवती धीरज को फोन किया करती थी. युवती ने टीआई से उन का परिचय पूछा तो इंसपेक्टर सिंगार ने एक दिलफेंक युवक की तरह उस से बातें करते हुए उस के मन में यह भ्रम पैदा कर दिया कि उस युवती ने ही कुछ दिन पहले उन्हें फोन किया था.

चूंकि युवती इस तरह से कई लोगों को फोन लगाती रहती थी, इसलिए वह टीआई कमलेश सिंगार के जाल में फंस गई. टीआई सिंगार को अपना नया शिकार जान कर युवती ने पहले तो उन के साथ काफी अश्लील बातें कीं, फिर अकेले में मिलने की जगह तय कर गिरोह के दूसरे सदस्यों को शिकार पर चलने के लिए बुला लिया. लेकिन उस गिरोह के लोगों को क्या मालूम था कि आज उन का पाला ऐसे पुलिस इंसपेक्टर से पड़ने वाला है जो खुद उन का शिकार करने शिकारी बन कर आया है.

थोड़ी देर में वही स्थिति बन गई जो धीरज के साथ बनी थी. फिर युवती के बाद साथ आए 2 पुरुष और एक महिला ने उन्हें घेरने की कोशिश की. फिर टीआई कमलेश सिंगार की टीम ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. सभी से पूछताछ की गई. पूछताछ के बाद 3 और महिलाओं व एक पुरुष को गिरफ्तार किया गया.

गिरोह में शामिल 22 साल की युवती पायल सब से ज्यादा तेजतर्रार थी. उस ने एक मुसलिम युवक से शादी की थी. गिरोह के लोग उस की बात मानते थे. उस ने अपने गिरोह से कह रखा था कि जब वह शिकार पर हो तो गिरोह के लोग उस के पास इशारे पर ही आएं.

क्योंकि शिकार पसंद आने पर पायल पहले उस युवक के साथ पूरी तरह संबंध बना कर अपना मन भरती थी, बाद में गिरोह की तिजोरी भरने के लिए बाकी सदस्यों को इशारा कर मौके पर बुला लेती थी.

गिरोह की बाकी महिला सदस्य हीराबाई, कुशालीबाई, नाथी उर्फ सुमन भी शिकार करने में माहिर थीं.

मल्हारगढ़ पुलिस ने इन महिलाओं के साथ कारूलाल उर्फ करण निवासी गोपालपुरा, गुलाम हैदर उर्फ भयू निवासी रामपुरा और श्यामलाल उर्फ समरथ निवासी सावन को भी गिरफ्तार कर इन के पास से धीरज और रामपुरा निवासी एक अन्य युवक से लूटे गए एक लाख रुपए बरामद किए.

गिरोह में जो 6 महिलाएं थीं, उन में से 3 की उम्र 20 से ले कर 24 साल और बाकी की 30-40 और 48 साल थी. ये ग्राहक की उम्र देख कर उस के सामने चारा बना कर डालने के लिए युवती चुनती थीं.

यदि शिकार जवान होता था तो तीनों युवतियों में से किसी एक को चारा बनाया जाता था और अगर शिकार अधेड़ होता तो फिर 30-40 साल वाली महिला सदस्य उस से प्रेमिका बन कर मिलती थीं.

पूछताछ करने के बाद पुलिस ने सभी आरोपियों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

भिखारी बनाने वाला खतरनाक गैंग – भाग 2

पूछताछ के दौरान सुरेश मांझी ने पुलिस को एक परची दी, जिस में एक मोबाइल नंबर लिखा था. उस ने बताया कि यह परची विजय ने उसे दिल्ली जाने के पहले दी थी और कहा था कि कोई परेशानी हो तो इस नंबर पर बात कर लेना. पुलिस ने उस परची को अपने पास सुरक्षित रख लिया.

डीसीपी (साउथ) प्रमोद कुमार ने पीडि़त सुरेश मांझी से पूछताछ के बाद एसएचओ संजय पांडेय को आदेश दिया कि वह तुरंत मुकदमा दर्ज करें.

आदेश पाते ही एसएचओ संजय पांडेय ने सुरेश मांझी के बड़े भाई रमेश को वादी बना कर धारा 325/326/328/342/370 आईपीसी के तहत विजय नागर उस के बहनोई राजेश, बहन तारा तथा रिश्तेदार राज नागर व उस की मां आशा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली.

डीसीपी (साउथ) प्रमोद कुमार ने इस मामले को बड़ी गंभीरता से लिया था. उन्होंने भीख मंगवाने वाले गिरोह का परदाफाश करने के लिए एसीपी विकास पांडेय की अगुवाई में पुलिस की 2 टीमें गठित की. इन टीमों में पुलिस के तेजतर्रार पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया.

इधर पीडि़त सुरेश मांझी को पुलिस ने पहले कांशीराम अस्पताल फिर लाला लाजपत राय अस्पताल में भरती कराया. अस्पताल में उस का डाक्टरी परीक्षण कराया गया, जिस में वह गंभीर बीमारी से पीडि़त पाया गया.

आंखों का परीक्षण नेत्र रोग विशेषज्ञ डा. एस.के. सिंह ने किया. उन्होंने बताया कि सुरेश मांझी की एक आंख की रोशनी पूरी तरह समाप्त हो गई है, जबकि दूसरी आंख की हलकी रोशनी है, यदि उस की पुतली बदली जाए तो उस की रोशनी वापस आ सकती है.

भीख मंगवाने वाले गिरोह की तलाश में पुलिस की 2 टीमें सक्रिय हुईं. एक टीम ने कानपुर शहर में गिरोह की तलाश शुरू की तथा दूसरी टीम दिल्ली रवाना हुई. लोकल पुलिस टीम ने विजय की तलाश में मछरिया स्थित गुलाबी बिल्डिंग के पास कच्ची बस्ती में छापा मारा.

यहां विजय नाम के 3 युवक रहते थे. इन में से विजय नाम के 2 युवकों का इस मामले से कोई लेनादेना नहीं था. तीसरा विजय नट जाति का था. वह फरार था. उस के घर पर ताला लटक रहा था.

इधर दिल्ली गई पुलिस टीम के पास परची में लिखा एक मोबाइल नंबर था. यह नंबर सुरेश मांझी ने पुलिस को दिया था. इस मोबाइल नंबर की जानकारी पुलिस टीम ने जुटाई तो पता चला कि वह नंबर राज नागर का है.

यह मोबाइल नंबर एक्टिव था और उस की लोकेशन दरियागंज, दिल्ली की मिल रही थी. पुलिस टीम दरियागंज पहुंची तो मोबाइल फोन की लोकेशन नांगलोई की आने लगी. पुलिस नांगलोई पहुंची तो फोन बंद हो गया, जिस से लोकेशन मिलनी बंद हो गई.

नांगलोई की कच्ची बस्ती में पुलिस टीम ने गहन पड़ताल की, लेकिन राज नागर का पता नहीं लगा सकी. भीख मंगवाने वाले गिरोह का पता लगाने की भी कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली. आखिर पुलिस टीम वापस कानपुर आ गई.

भीख मंगवाने वाले गिरोह के एक सदस्य को भी जब पुलिस गिरफ्तार नहीं कर पाई तो उन के माथे पर चिंता की लकीरें उभरने लगीं.

एक ओर मीडिया पुलिस की असफलता का डंका पीट रही थी तो दूसरी ओर पुलिस अधिकारी भी जवाबतलब कर रहे थे. आखिर पुलिस ने खास खबरियों का सहारा लिया और उन्हें नौबस्ता, किदवई नगर व यशोदा नगर क्षेत्र में सक्रिय कर दिया.

8 नवंबर, 2022 की सुबह 8 बजे एक खास खबरी थाना नौबस्ता पहुंचा और उस ने एसएचओ संजय पांडेय को बताया कि राज नागर और उस की मां आशा इस समय किदवई नगर चौराहे के पास मौजूद हैं. शायद वे कहीं भागने की फिराक में हैं.

चूंकि खबरिया की सूचना अतिमहत्त्वपूर्ण थी, अत: वह पुलिस टीम के साथ किदवई नगर चौराहा पहुंच गए. पुलिस वाहन के रुकते ही एक युवक व अधेड़ उम्र की महिला तेज कदमों से हनुमान मंदिर की ओर भागे लेकिन पुलिस ने कुछ दूरी पर उन्हें पकड़ लिया. दोनों को थाना नौबस्ता लाया गया.

जब उन से पूछताछ की गई तो युवक ने अपना नाम राज नागर तथा महिला ने अपना नाम आशा निवासी नटवन टोला किदवई नगर, थाना नौबस्ता, कानपुर नगर बताया. रिश्ते में दोनों मांबेटा थे.

राज नागर और आशा से जब पुलिस ने सुरेश मांझी के संबंध में पूछा तो उन दोनों ने बताया कि सुरेश मांझी को उन्होंने 25 हजार रूपए में विजय नट से खरीदा था, फिर उसे भीख मंगवाने के वास्ते नांगलोई (दिल्ली) ले गए थे.

विजय नट उन का रिश्तेदार है और उस के गिरोह का सक्रिय सदस्य है. विजय का सहयोग उस की बहन तारा व बहनोई राजेश भी करता है. विजय इस के पहले भी 2 युवकों को उसे बेच चुका है. जिस में एक युवक उमाशंकर जो विधनू के किसी गांव का रहने वाला था. उसे चकमा दे कर भाग गया था. इस के बाद उस का पता न चला.

भीख मंगवाने वाले 2 सदस्य गिरफ्त में आए तो पुलिस विजय, तारा व राजेश को गिरफ्तार करने को सक्रिय हुई. राज नागर की निशानदेही पर पुलिस टीम ने कानपुर शहर के आधा दरजन डेरों पर छापा मारा, लेकिन विजय व उस की बहन तारा व बहनोई राजेश हाथ नहीं आए. फिर भी पुलिस प्रयास में जुटी रही.

आरोपियों की शिनाख्त के लिए एसएचओ संजय पांडेय ने पीडि़त सुरेश मांझी के भाई रमेश को थाना नौबस्ता बुला लिया. रमेश का सामना जब राज नागर व उस की मां आशा से कराया गया तो रमेश ने दोनों को पहचानने से इंकार कर दिया. उस ने कहा वह पहली बार दोनों को देख रहा है. इस के पहले इन्हें कभी नहीं देखा. इन्हें तो उस का भाई सुरेश ही पहचान सकता है.

इस के बाद पुलिस राज नागर व आशा को लाला लाजपत राय अस्पताल लाई, जहां सुरेश मांझी का उपचार चल रहा था. सुरेश मांझी की आंखें खराब कर दी गई थीं. वह देख कर तो दोनों को पहचान नहीं सकता था, इसलिए पुलिस ने राज नागर व आशा की बातचीत सुरेश से कराई.

आवाज से सुरेश ने दोनों को पहचान लिया और पुलिस को बताया कि ये दोनों वही हैं, जो उसे दिल्ली ले गए थे और उस से भीख मंगवाते थे.

दोनों आरोपियों की शिनाख्त हो जाने के बाद एसएचओ संजय पांडेय ने भीख मंगवाने वाले गिरोह का परदाफाश करने तथा 2 सदस्यों को गिरफ्तार करने की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दे दी.

डीसीपी (साउथ) प्रमोद कुमार ने आननफानन प्रैसवार्ता की और मीडिया के समक्ष भीख मंगवाने वाले गिरोह का परदाफाश किया. उन्होंने 3 फरार आरोपियों विजय, तारा व राजेश की गिरफ्तारी के लिए 10-10 हजार रुपए के ईनाम की भी घोषणा कर दी.

चूंकि आरोपी राज नागर व उस की मां आशा ने सुरेश मांझी को खरीदने व उस से भीख मंगवाने का जुर्म कुबूल कर लिया था, अत: पुलिस ने उन दोनों को भादंवि की धारा 325/326/328/342/370 के तहत गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस पूछताछ में आरोपियों के बयानों तथा पीडि़त सुरेश मांझी द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर इस घटना के पीछे की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार है.

कुंवारे थे, कुंवारे ही रह गए – भाग 2

दूल्हों और उन के रिश्तेदारों ने पुलिस को सारी बात बताई. कुछ ने लिखित शिकायत कर दी. थाना खरखौदा पुलिस ने अनीता, सुशीला और मोनू के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. थानाप्रभारी वजीर सिंह ने इस मामले की जांच एसआई नरेश कुमार को सौंपी. पुलिस ने सुशीला और मोनू को हिरासत में ले कर पूछताछ की. बाद में दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया.

गेम की मास्टरमाइंड निकली अनीता

28 दिसंबर को पुलिस ने खरखौदा के वार्ड नंबर 2 निवासी सुशीला और गांव थाना कलां निवासी मोनू को मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर पूछताछ के लिए 2 दिनों के रिमांड पर लिया. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में सुशीला और मोनू ने बताया कि उन्हें पता नहीं  था कि शादी के नाम पर अनीता लोगों को ठग रही है.

अनीता ने उन्हें इस काम के लिए एक से 2 हजार रुपए ही दिए थे. बाकी रुपए उस ने खुद ही रख लिए थे. सुशीला के बताए अनुसार, अनीता दिल्ली के नरेला के लामपुर बौर्डर की रहने वाली थी. दिल्ली के अलावा झज्जर और अन्य जगहों पर भी उस के ठिकाने बताए.

थाना खरखौदा पुलिस ने अनीता की तलाश में दिल्ली और जहांजहां उस के मिलने की संभावना थी, छापे मारे, लेकिन वह नहीं मिली. इस के बाद पुलिस ने 3 टीमें बना कर उस की तलाश शुरू की.

सुशीला और मोनू से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने कई अन्य लोगों से पूछताछ की, लेकिन अनीता के बारे में कुछ पता नहीं चला. रिमांड अवधि समाप्त होने पर पुलिस ने सुशीला और मोनू को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

पुलिस की लगातार छापेमारी से घबरा कर अनीता ने 7 जनवरी, 2018 को सोनीपत की अदालत में आत्मसमर्पण किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. पुलिस ने पूछताछ के लिए अदालत से उस का रिमांड मांगा तो उसे 5 दिनों की रिमांड पर सौंप दिया गया. 5 दिनों के बाद एक बार फिर 3 दिनों के रिमांड पर लिया गया.

अनीता से पूछताछ में पता चला कि कुंवारों से शादी के नाम पर ठगे गए पैसों का उपयोग अनीता के बेटे रोहित ने भी किया था. पुलिस ने 9 जनवरी को दिल्ली से रोहित को भी गिरफ्तार कर लिया. रोहित को 3 दिनों के रिमांड पर लिया गया. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ और शादी के नाम पर ठगे गए लोगों से मिली जानकारी के आधार पर जो कहानी सामने आई है, वह इस प्रकार थी—

कुंवारों को ठगने की बनाई योजना

दिल्ली के नरेला के गांव लामपुर की रहने वाली अनीता के पति की मौत हो चुकी थी. उस के 2 बच्चे हैं, जिन की शादियां हो चुकी हैं. अनीता की हरियाणा में कई रिश्तेदारियां हैं. उसे पता था कि लड़कियों की कमी की वजह से हरियाणा के तमाम लड़कों की शादियां नहीं हो पाती हैं. शादी की उम्मीद में तमाम लड़के अधेड़ हो चुके हैं. इस तरह के लोग किसी भी तरह शादी करना चाहते हैं. इस के लिए वे पैसा दे कर दुलहन खरीदने को भी तैयार रहते हैं.

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अनीता ने इसी बात का फायदा उठाया. उस ने शादी कराने के नाम पर कुंवारों को ठगने की योजना बनाई. इस काम में उस ने अपनी जानकार खरखौदा की रहने वाली सुशीला की मदद ली. हालांकि उस ने सुशीला को अपनी पूरी योजना नहीं बताई थी. उसे केवल आसपास के गांवों में कुंवारों के बारे में पता करने और उन की शादी कराने की बात करने की जिम्मेदारी सौंपी थी.

इस के बाद अपने परिचित मोनू को मदद के लिए ले लिया. दोनों ने आसपास के गांवों और रिश्तेदारों में ऐसे लड़कों के बारे में पता किया, जिन की शादी नहीं हुई थी. सुशीला ने ऐसे लड़कों की शादी कराने की बात चलाई. हर गांव में एकदो परिवार ऐसे मिल गए, जिन के यहां लड़कों की शादी नहीं हुई थी. वे चाहते थे कि उन के लड़के की शादी हो जाए और घर में बहू आ जाए. इस के लिए वे पैसे भी खर्च करने को तैयार थे.

एक शादी के लिए 45 से 90 हजार रुपए

सुशीला के कहने पर तमाम लोग शादी के लिए तैयार हो गए. एकदूसरे के माध्यम से शादी करने वालों की संख्या बढ़ती गई. सुशीला ने यह बात अनीता को बताई. वह खरखौदा आ गई और सुशीला के साथ कुछ ऐसे लोगों के यहां गई भी, जो शादी के इच्छुक थे. उस ने कहा कि जिन लड़कियों से उन की शादी कराएंगी, वे लड़कियां अनाथ हैं और दिल्ली के अनाथालय में रहती हैं. इस के लिए उन्हें अनाथालय को चंदा देना होगा.

चंदे की राशि कम से कम 45 हजार होगी. उम्र के हिसाब से चंदे की यह रकम बढ़ती जाएगी. जब कई लोग शादी के लिए तैयार हो जाएंगे तो वह एकसाथ सब की शादियां करा देगी.

हीरे की ललक में उमड़े लोग – भाग 2

पन्ना जिले का वर्तमान स्वरूप पन्ना और अजयगढ़ रियासत, चरखारी, बिजावर, छतरपुर और यूनाइटेड प्रोविंस को मिला कर हुआ है. मूलरूप से 13वीं शताब्दी तक गोंड बस्ती रहे पन्ना को महाराजा छत्रसाल बुंदेला ने अपनी राजधानी बनाया था.

अप्रैल, 1949 के पहले यह विंध्य प्रदेश का हिस्सा था. जब पहली नवंबर, 1956 को मध्य प्रदेश का पुनर्गठन हुआ, तब यह मध्य प्रदेश में मिलाया गया था. पन्ना जिले का नाम यहां स्थित पद्मावती देवी मंदिर के नाम पर रखा गया है. यह जिला हीरे की खान के अलावा प्राचीन और सुंदर मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है.

हीरे से लबरेज बताई जाने वाली खदान में कई किसानों की निजी और कुछ जमीन सरकार की है. सरकारी जमीन पर खनन के लिए खनिज कार्यालय से परमिशन लेनी पड़ती है. निजी जमीन पर आमतौर पर 2 तरह के अनुबंध होते हैं. एक में कुछ रुपए ले कर खनन की अनुमति दी जाती है, जबकि दूसरे में जमीन मालिक हीरा मिलने पर 25 प्रतिशत का हिस्सेदार होता है. ज्यादातर अनुबंध 25 प्रतिशत हिस्सेदारी वाले ही होते हैं.

यदि किसी किसान के खेत में खुदाई (खनन) करना है तो उस किसान का सहमति पत्र खनन विभाग में जमा कराना होता है. आमतौर पर जमीन मालिक इस के एवज में 25 प्रतिशत का अनुबंध करते है. इस का मतलब है कि यदि हीरा मिला हो तो उस जमीन मालिक को हीरे की कुल कीमत का 25 प्रतिशत हिस्सा मिल जाता है.

अकसर दूसरी परत में मिलता है हीरा

चाल वाली मिट्टी में हीरा मिलने की संभावना ज्यादा होती है. इसे धो कर साफ किया जाता है और हीरा खोजा जाता है. हीरा मिट्टी की दूसरी लेयर में मिलता है. इसे चाल की लेयर कहा जाता है. चाल उस मिट्टी की परत को कहते हैं, जिस में पत्थर व हीरे मिक्स होते हैं. यही मिट्टी बेहद काम की होती है, जो हीरा उगलती है.

जब तक चाल की मिट्टी मिलती है, उस गहराई तक खुदाई होती है. इस मिट्टी को स्टोर किया जाता है. खुदाई में मिले बड़ेबड़े पत्थरों में हीरे मिलने की सब से अधिक संभावना होती है.

निकाली गई मिट्टी को 3 स्तर पर धोया जाता है, इस के बाद उसे सुखा कर हीरा तलाशा जाता है.

पन्ना जिले में 11 स्थानों पर हीरा मिलता है. पन्ना में जंगल सहित कुछ अन्य क्षेत्र भी चिह्नित हुए हैं, लेकिन अभी वहां हीरा खनन की अनुमति नहीं है. पन्ना जिले में इस वित्तीय वर्ष में 745 खदानों के पट्टे स्वीकृत हुए हैं. इस में सब से अधिक 317 खदान के पट्टे कृष्णा कल्याणपुर (पटी) में आवंटित किए गए हैं. पटी क्षेत्र में हाई क्वालिटी का हीरा मिलता है. इस साल अब तक 235.94 कैरेट के 90 हीरे कार्यालय में जमा कराए हैं,  इन की शुरुआती कीमत 3.79 करोड़ रुपए आंकी गई है.

ऐसे तय होती है हीरे की कीमत

हीरा औफिस में रोज खनन करने वाले लोग चमकीले पत्थर दे कर जाते हैं, जिन की जांच की जाती है. कुछ ही भाग्यशाली होते हैं जिन के जीवन में हीरा चमक लाता है.

पन्ना के हीरा अधिकारी रवि पटेल के बताते हैं, ‘कलर, क्लियरिटी, कट और वजन से हीरे की कीमत तय होती है. सब से अच्छा हीरा जैम क्वालिटी में ई और डी श्रेणी का माना जाता है. पन्ना में अमूमन ई श्रेणी का हीरा मिल जाता है. जैम क्वालिटी के हीरे की अंगूठी और दूसरी ज्वैलरी बनती है, जबकि दूसरा इंडस्ट्रियल ब्लैक हीरा होता है. इस का ग्लास कटिंग सहित दूसरी व्यावसायिक गतिविधियों में उपयोग होता है. इस की कीमत कम होती है. हीरा 50 हजार से ले कर 15 लाख रुपए कैरेट तक बिक सकता है.’

पन्ना में सन 1961 में हीरा कार्यालय बनाया गया था, तभी से हर 3 महीने में हीरे की नीलामी होती है. हीरे की नीलामी में गुजरात, मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद सहित कई राज्यों के व्यापारी आ कर बोली लगाते हैं. पट्टे पर खदान ले कर हीरा तलाश करने वाले मजदूर को तुआदार कहा जाता है.

खुदाई के दौरान मिलने वाले हीरे की जांच कराने के बाद तुआदार हीरा कार्यालय में उसे जमा कराता है. हीरा कार्यालय द्वारा वजन और हीरे की क्वालिटी के आधार पर उस की न्यूनतम कीमत तय की जाती है. इस के बाद नीलामी होती है.

अधिकतम कीमत में हीरा नीलाम किया जाता है. 11.50 प्रतिशत टैक्स काट कर बकाया राशि तुआदार मतलब हीरा खोजने वाले को दे दी जाती है.

हीरे के नाम पर होती है ठगी

हीरा अधिकारी रवि पटेल के औफिस में आए दिन ठगी की शिकायतें भी प्राप्त होती रहती हैं. ऐसी ही एक शिकायत सरकोहा निवासी घनश्याम यादव ने की थी.

घनश्याम का कहना है कि उसे अगस्त 2022 में अपने खेत की जुताई के दौरान 12 कैरेट के 3 हीरे मिले थे. खबर मिलते ही घनश्याम का एक परिचित मुंबई में रहने वाला नंदकिशोर उर्फ नंदू लाला उस के घर आया.

घनश्याम ने तीनों हीरे उसे चैक कराने को दे दिए. नंदकिशोर बोला, ‘‘भाई, यहां पर इन की परख सही नहीं होगी. तुम कहो तो इन्हें मैं मुंबई ले जा कर चैक कराऊंगा. वहां इन की सही कीमत मिलेगी.’’

घनश्याम ने यह सोच कर हीरे नंदकिशोर को दे दिए कि शायद बड़े शहर में उसे मिले हीरों के ज्यादा दाम मिल जाएं.

मुंबई जा कर नंदकिशोर ने उसे बताया कि उस के हीरे तो साधारण कंकड़पत्थर हैं. इसी बीच उसे पता चला कि नंदू लाला ने उस के हीरे 70 लाख में बेच दिए. वह न तो उस के हीरे लौटा रहा और न ही पैसे दे रहा.

पन्ना जिले में हीरा मिलने की सच्ची कहानियों के अलावा अफवाहों का बाजार भी गर्म रहता है और यहीं से ठगी का कारोबार भी चलता है. हीरे के नाम पर ठगी का धंधा भी यहां खूब फलफूल रहा है. वैसे तो पन्ना में हीरा खरीदने की एकमात्र जगह सरकारी हीरा औफिस है.

यहां के हीरा अधिकारी रवि पटेल बताते हैं कि पन्ना में जितने भी हीरे लोगों को मिलते हैं, उन का केवल एक प्रतिशत ही हीरा औफिस तक आ पाता है, क्योंकि यहां भी दलाल और ठगी का काम करने वाले मजदूरों से औनेपौने दाम में हीरा खरीद लेते हैं.

जब किसी को हीरा मिलता है तो वह उसे अपने स्तर पर चैक करता है. फिर व्यापारी या बिचौलिए को यकीन हो जाता है कि सही में हीरा है तो उसे लालच दे कर सस्ते दाम पर खरीद लेते हैं. असल में इस में लोगों का ही घाटा होता है.

अगर हीरे की नीलामी होगी तो 100 व्यापारी उसे खरीदने आएंगे तो बढ़चढ़ कर बोली लगाएंगे. ऐसे में उस के दाम बढ़ने की संभावना ज्यादा होती है. लेकिन लोग यह नहीं समझ पाते. वे सरकारी कायदेकानून के चक्कर में न पड़ कर तुरंत बिचौलियों से नकद दाम लेना सुविधाजनक मानते हैं.

यहां पहाड़ी के रास्ते पर छतरपुर जिले के बक्सबाहा के बाबूलाल कुशवाहा को खुदाई में ब्लैक डायमंड जैसे पत्थर मिले थे. वे बताते  हैं कि टीवी पर न्यूज देख कर पता चला था कि यहां हीरा मिल रहा है. तो हम भी किस्मत आजमाने यहां चले आए. यहां आ कर 100 रुपए का तसला और खुदाई करने के लिए  250 रुपए का एक सब्बल खरीदा.

2 लड़कियों की आशिकी

18 मार्च, 2017 को पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना मिली कि गांव अनोड़ा में कुछ लोगों ने 2 लड़कियों को घेर रखा है, उन की जान को खतरा है. कंट्रोल रूम ने यह सूचना थाना राया पुलिस को दे दी, क्योंकि गांव अनोड़ा उसी के अंतर्गत आता था. सूचना मिलते ही थाना राया के थानाप्रभारी इंसपेक्टर अनिल कुमार पुलिस बल के साथ गांव अनोड़ा पहुंच गए. गांव पहुंच कर उन्हें पता चला कि वह फोन रामखिलाड़ी के घर से किया गया था.

पूछताछ में अनिल कुमार के सामने जो घटना आई, वह हैरान करने वाली थी. फोन जिन 2 लड़कियों ने किया था, वे आपस में शादी करना चाहती थीं, जो लोगों को स्वीकार नहीं था. लोग दोनों को अलग करना चाहते थे, जबकि लड़कियां एकदूसरे से अलग नहीं होना चाहती थीं. जब लोग जबरदस्ती करने लगे तो उन्होंने कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर दिया था.

मामला कोई बहुत गंभीर नहीं था, फिर भी कुछ लोगों को उत्तेजित देख कर अनिल कुमार दोनों लड़कियों को साथ ले कर थाने आ गए. उन के पीछेपीछे दोनों लड़कियों के घर वाले ही नहीं, कुछ रिश्तेदार और गांव के भी तमाम लोग आ गए थे.

पुलिस जिन दोनों लड़कियों को थाने ले आई थी, उन में से एक का नाम सोनिया था. उस की उम्र 23 साल थी. वह मथुरा जिले के थाना राया के गांव अनोड़ा के रहने वाले रामखिलाड़ी की बेटी थी. उस के साथ आई लड़की का नाम रीना था, जो 21 साल की थी. वह गांव रूमगेला के रहने वाले लक्ष्मण की बेटी थी.

थाने में की गई पूछताछ में सोनिया और रीना के प्रेम से ले कर बात विवाह तक पहुंचने की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला मथुरा के थाना राया का एक गांव है अनोड़ा. रामखिलाड़ी इसी गांव के रहने वाले थे. उन के परिवार में पत्नी भारती के अलावा 4 बेटियां और एक बेटा था.

रामखिलाड़ी कपड़ों पर प्रैस कर के गुजरबसर करते थे. सोनिया उन की सब से छोटी बेटी थी. उन्होंने 3 बेटियों की शादी कर दी थी. अब वह सोनिया की शादी के बारे में सोचने लगे थे.

लेकिन सोनिया कुछ अलग तरह की लड़की थी, जिसे ले कर रामखिलाड़ी ही नहीं, उन की पत्नी भारती भी चिंतित रहती थी. इस की वजह यह थी कि सोनिया बचपन से ही लड़कियों की तरह नहीं, लड़कों की तरह रहती आई थी. वह कपड़े तो लड़कों जैसे पहनती ही थी, उस की सोच, बातचीत का लहजा भी लड़कों जैसा था. वह रहती भी लड़कों के साथ ही थी.

सोनिया की चालढाल, रहनसहन और उस की बातें सुन कर रामखिलाड़ी और भारती चिंतित रहते थे. जब तक वह बच्ची थी, बात बचपने में टाल दी जाती रही, लेकिन जब वह सयानी हुई तो मांबाप उसे समझाने ही नहीं लगे, बल्कि हिदायतें भी देने लगे. लेकिन सोनिया पर उन के समझाने या हिदायतों का कोई असर नहीं पड़ा.

सोनिया ने 12वीं तक पढ़ाई की और अपने पैरों पर खड़ी होने के लिए सिलाई सीख कर लोगों के कपड़े तो सीने ही लगी, साथ ही सिलाई सिखाने का इंस्टीट्यूट भी खोल लिया. उस के यहां सिलाई सीखने गांव की ही नहीं, अगलबगल के गांवों की भी लड़कियां आती थीं.

सोनिया जहां अपने में मस्त रहती थी, वहीं मांबाप को उस के ब्याह की चिंता थी. क्योंकि उन्हें शायद पता नहीं था कि वह जिस बेटी के ब्याह के लिए परेशान हैं, उस में लड़कियों वाले गुण हैं ही नहीं. उन्होंने सोनिया के मन में क्या है, इस बात की परवाह किए बगैर अलीगढ़ की तहसील अतरौली के गांव जमनपुर के रहने वाले रमेश से उस की शादी तय कर दी.

जब इस बात की जानकारी सोनिया को हुई तो वह विरोध पर उतर आई. लेकिन उस के विरोध के बावजूद रामखिलाड़ी ने उस की शादी धूमधाम से रमेश के साथ कर दी. यह सन 2009 की बात है. मांबाप के इस फैसले से नाराज सोनिया ससुराल चली तो गई, पर बागी बन गई. ससुराल वालों ने उसे हाथोंहाथ लिया, पर उस के मन में जो था, उस में जरा भी बदलाव नहीं आया.

सोनिया ने पति को छूने देने की कौन कहे, चारपाई के भी नजदीक नहीं आने दिया. सवेरा होते ही उस ने साड़ी उतार कर फेंक दी और जींसटौप पहन लिया. बहू की इस हरकत से ससुराल वाले हैरान रह गए. उन्हें यह जरा भी पसंद नहीं आया. उन्होंने उसे नादान समझ कर समझाना चाहा, पर वह कुछ भी समझने को तैयार नहीं थी. उन्होंने फोन कर के सारी बात रामखिलाड़ी को बताई तो वह परेशान हो उठे.

बड़ी मुश्किल से तो उस ने बेटी की शादी की थी. ससुराल जा कर वह इस तरह का नाटक कर रही थी. 5 दिनों बाद वह मायके आई तो उस ने साफ कह दिया कि अब वह ससुराल नहीं जाएगी. इस के बाद लाख प्रयास के बावजूद भी वह ससुराल नहीं गई. मजबूर हो कर मांबाप ने बेटी के तलाक का मुकदमा अदालत में दायर कर दिया, जो अभी भी विचाराधीन है.

सोनिया तनमन से अपने सिलाई सैंटर में लग गई. उसे लड़कियों को सिलाई सिखाना पसंद था. न जाने क्यों उसे लड़कियों को छूना अच्छा लगता था. इसलिए वह उन्हीं के बीच लगी रहती थी. एक दिन पड़ोस के रूमगेला गांव की रहने वाली रीना उस के सिलाई सैंटर पर सिलाई सीखने आई तो उस ने उस में न जाने क्या देखा कि उसे लगा, इसी लड़की की उसे तलाश थी. रीना अभी पढ़ रही थी. वह सिलाई सीख कर अपनी पढ़ाई का खर्च खुद निकालना चाहती थी. उस के पिता लक्ष्मण खेती करते थे. उन के परिवार में पत्नी शांति के अलावा 4 बेटियां थीं. 3 बेटियों की वह शादी कर चुके थे. सब से छोटी रीना अभी पढ़ रही थी.

रूमगेला गांव अनोड़ा से 6 किलोमीटर दूर था. इस के बावजूद रीना रोज साइकिल से सोनिया के यहां सिलाई सीखने आती थी. रीना में ऐसा न जाने कौन सा आकर्षण था कि सोनिया उस की ओर खिंचती जा रही थी. जब तक वह सिलाई सैंटर में रहती, सोनिया को अजीब सा सुख महसूस होता. वह उसी के इर्दगिर्द मंडराती रहती थी. उसे छू कर उस के मन को असीम शांति ही नहीं मिलती थी, बल्ति अद्भुत सुख का भी अहसास होता था.

सोनिया की नजरें हमेशा रीना पर ही जमी रहती थीं, क्योंकि वह उसे अन्य लड़कियों से अलग नजर आती थी. रीना को भी जब उस के मन की बात का अहसास हुआ तो वह भी उस के करीब आने लगी. जल्दी ही वह उस की खास छात्रा बन गई.

एक दिन सोनिया ने बहाने से उसे अपने घर क्या रोका, उस दिन के बाद से वह उसी की हो कर रह गई. इस के बाद सोनिया ने रीना के पिता लक्ष्मण को फोन कर के कहा कि रीना रोजरोज 6 किलोमीटर आनेजाने में थक जाती है. अच्छा होगा कि उसे उस के पास ही रहनें दें. इस से रीना सिलाई भी जल्दी सीख जाएगी और रोजरोज की थकान से भी बच जाएगी.

लक्ष्मण को क्या पता था कि सोनिया के मन में क्या है. उन्होंने सहज भाव से इजाजत दे दी. अब रीना सोनिया के साथ ही रहने लगी. सप्ताह में एकाध दिन वह घर भी चली जाती थी. एक साथ रहने से सोनिया और रीना एकदूसरे के इतने करीब आ गईं कि वे अलग होने के नाम से घबराने लग%8

उजले लोगों का ये है काला धंधा – भाग 1

“हैलो, कैन आई टौक टू रवनीत मैम?’’ मोबाइल फोन पर किसी पुरुष की रौबदार आवाज उभरी. ‘‘यस, आफकोर्स.’’ दूसरी ओर से किसी युवती ने खनकती आवाज में पूछा.

‘‘मैम, मैं जयपुर से आया हूं, मेरा नाम करण है… करण शर्मा…’’ उसी रौबदार आवाज में पुरुष ने कहा, ‘‘दरअसल, मैं जयपुर में एक मीडिया हाउस में काम करता हूं. मेरे दोस्त ने रवनीत मैम का नंबर दिया था, इसीलिए फोन किया है.’’

‘‘यस, आई एम रवनीत स्पीकिंग.’’ उसी खनकती आवाज में युवती ने कहा.

‘‘मैम, मैं आप के कोचिंग सैंटर में अपने बेटे का एडमिशन कराना चाहता हूं, इसलिए आप से मिलना चाहता हूं.’’ करण ने फोन करने का मकसद बताया.

‘‘यस, आप कोटा आएं तो सीधे कोचिंग सैंटर आ जाएं, मुलाकात हो जाएगी.’’ युवती ने कहा.

‘‘मैम, मैं आज जयपुर से इसी काम के लिए कोटा आया हूं, आप कहें तो मैं आ जाऊं?’’ करण ने गुजारिश करने वाले अंदाज में कहा.

‘‘ठीक है, अभी एक बजा है, आप ऐसा कीजिए, 2 बजे तक आ जाइए. इतनी देर में मैं लंच कर लेती हूं.’’ रवनीत ने कहा.

‘‘ओके मैम.’’ करण ने कहा.

यह 4 जनवरी, 2017 की बात है. रवनीत कोटा के एक नामी कोचिंग इंस्टीट्यूट में पब्लिक रिलेशन (पीआर) का काम करती थी. इस इंस्टीट्यूट में आईआईटी-जेईई आदि परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती थी.

इस कोचिंग इंस्टीट्यूट में काम करते उसे अभी कुछ ही महीने हुए थे, लेकिन अपनी खूबसूरती और अच्छी अंगरेजी में लच्छेदार बातें करने की वजह से वह इतने कम समय में ही कोचिंग संस्थान के कामकाज से अच्छी तरह वाकिफ ही नहीं हो गई थी, बल्कि पब्लिक रिलेशन की जिम्मेदारी संभालने की वजह से कोचिंग इंस्टीट्यूट में अपने बच्चों का एडमिशन दिलाने के लिए तमाम प्रभावशाली लोग उस की मदद ले रहे थे. क्योंकि कोचिंग इस्टीट्यूट की मोटी फीस में वह कुछ रियायत भी करवा देती थी.

करण जैसे मीडियापर्सन का फोन आना रवनीत के लिए रोजाना की तरह सामान्य बात थी. उस समय दोपहर का एक बज चुका था. उस के पेट में चूहे कूद रहे थे. वह घर से लंचबौक्स लाई थी.

लंचबौक्स खोल कर सुकून से लंच करने के साथ वह अपने मोबाइल फोन पर वाट्सएप पर आ रहे वीडियो, फोटो व मैसेज भी देख रही थी. इस बीच एकदो फोन आए तो रवनीत ने उन्हें इग्नोर क र दिया.

रवनीत लंच खत्म कर के बैठी ही थी कि उस के केबिन में एक हैंडसम आदमी दाखिल हुआ. उस के साथ एक युवती भी थी. अंदर आते ही उस आदमी ने कहा, ‘‘हैलो रवनीत मैम, माईसेल्फ करण.’’

‘‘ओ यस, करण फ्रौम जयपुर?’’ रवनीत ने सवाल किया. लेकिन जवाब मिलने से पहले ही बोली, ‘‘प्लीज सिट.’’

‘‘रवनीतजी, मैं आप के कोचिंग में अपने बेटे के एडमिशन के लिए आया हूं.’’ करण ने अपने आने का मकसद बताते हुए कहा, ‘‘वैसे मैं जयपुर के एक मीडिया हाउस में काम करता हूं. पीआर में आप जैसे स्मार्ट चेहरे कम ही होते हैं. आप का चेहरा देख कर मुझे याद आ रहा है कि मैं ने आप को जयपुर में कहीं देखा है.’’

करण की इस बात पर रवनीत एकदम से हड़बड़ा उठी. फिर खुद को संभाल कर बोली, ‘‘जयपुर में… हां, दरअसल मैं ने जयपुर में पढ़ाई की थी न. शायद तभी कभी देखा होगा.’’

रवनीत की हड़बड़ाहट देख कर करण समझ गया कि वह सही ठिकाने पर पहुंच गया है. जिस रवनीत की तलाश में वह 10 दिनों से भटक रहा था, वह यही रवनीत है. करण ने उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘मेरा नाम करण शर्मा नहीं, मैं एसओजी का पुलिस इंसपेक्टर हूं. मेरे साथ यह महिला भी पुलिस इंसपेक्टर हैं. रवनीत, अब तुम्हारा भांडा फूट चुका है. तुम ने बहुत लोगों को अपनी सुंदरता के जाल में फांसा और उन्हें ब्लैकमेल कर के उन से करोड़ों रुपए वसूले. हम तुम्हें गिरफ्तार करने आए हैं.’’

इसंपेक्टर की बात सुन कर रवनीत के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. वह चेहरा छिपा कर फूटफूट कर रोने लगी. थोड़ा रो लेने के बाद उस ने हिचकियां लेते हुए कहा, ‘‘सर, मैं ने अब वह सब छोड़ दिया है. उन बदमाशों ने मुझ से चीटिंग की थी. इसलिए मैं ने उन का साथ छोड़ दिया है. इन बातों को काफी समय हो गया है. अब मैं शांति की जिंदगी जी रही हूं. प्लीज, मुझे शांति से जीने दीजिए.’’

‘‘तुम्हें जो कुछ भी कहना है, पुलिस स्टेशन चल कर कहना.’’ कह कर दोनों पुलिस अधिकारी रवनीत को हिरासत में ले कर कोचिंग इस्टीट्यूट से बाहर ले आए और वहां खड़ी गाड़ी में बैठा कर अपनी टीम के साथ सीधे जयपुर के लिए चल पड़े.

कोटा से जयपुर तक के लंबे सफर में रवनीत गुमसुम बैठी रही. जयपुर पहुंचतेपहुंचते रात हो गई थी. इसलिए रवनीत से उस दिन पूछताछ नहीं की जा सकी. अगले दिन सुबह एसओजी के अधिकारियों ने रवनीत से पूछताछ शुरू की. अधिकारियों ने उस से कहा कि वह इस बात को ठीक से जान ले कि पुलिस को उस के पूरे गिरोह का पता चल चुका है. कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया जा चुका है. इसलिए वह खुद ही बता दे कि उस ने किनकिन लोगों को अपने हुस्न के जाल में फांस कर उन से कितनी रकम ऐंठी है? इस काम में उस के साथ कौनकौन लोग शामिल थे?

रवनीत की कहानी जानने से पहले आइए यह जान लेते हैं कि पुलिस को उस के बारे में कैसे पता चला?

12 मई, 2015 को जयपुर के विद्याधरनगर इलाके में सैंट्रल स्पाइन स्थित अलंकार प्लाजा के सामने दिनदहाड़े 34 साल के हिम्मत सिंह की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. हमलावर 2 थे और मोटरसाइकिल से आए थे. हिम्मत सिंह हरमाड़ा थाने का हिस्ट्रीशीटर था. वह प्रौपर्टी का कारोबार करता था और जयपुर के राजपुरा हरमाड़ा के लक्ष्मीनगर में परिवार के साथ रहता था. जबकि वह मूलरूप से सीकर के राजपुरा गांव का रहने वाला था. बैनाड़ रोड पर मां भगवती प्रौपर्टीज के नाम से उस ने अपना औफिस बना रखा था.

थाना पुलिस इस मामले में कुछ नहीं कर पाई तो इस मामले की जांच एसओजी को सौंप दी गई. हिम्मत सिंह की हत्या के आरोप में करीब डेढ़ साल बाद दिसंबर, 2016 के दूसरे सप्ताह में एसओजी ने 2 लोगों को गिरफ्तार किया. इन में एक जयपुर के तिलकनगर का रहने वाला आनंद शांडिल्य था और दूसरा उत्तर प्रदेश के बिजनौर का रहने वाला अनुराग चौधरी उर्फ रानू.

अनुराग चौधरी जयपुर के विद्युतनगर में रहता था. दोनों से पूछताछ में पता चला कि हिम्मत सिंह की हत्या राजस्थान के कुख्यात अपराधी आनंदपाल सिंह ने कराई थी. आनंदपाल अदालत से जेल जाते समय पुलिस पर गोलियां चला कर फरार हो गया था. वह अभी भी पुलिस गिरफ्त से बाहर है.

आनंद और अनुराग आनंदपाल के सहयोगी थे. हिम्मत सिंह की हत्या जयपुर में हरमाड़ा के पीछे माचड़ा में एक जमीन पर कब्जे को ले कर की गई थी. इस जमीन पर हिम्मत सिंह की नजर थी, जबकि आनंदपाल की नजर पहले से ही उस जमीन पर थी. आनंदपाल के इशारे पर ही उस के गिरोह के लोगों ने हिम्मत सिंह की गोली मार कर हत्या की थी.

पुलिस आनंद और अनुराग से आनंदपाल और उस के गिरोह के बारे में पूछताछ कर रही थी. इसी पूछताछ में पुलिस के सामने एक नया खुलासा हुआ. आनंद शांडिल्य ने पुलिस को बताया कि जयपुर में एक ऐसा भी गिरोह सक्रिय है, जो हाईप्रोफाइल लोगों के साथ ब्लैकमेलिंग करता है.

इस काले धंधे में सारे बड़े लोग शामिल हैं. बड़े लोगों से मतलब वे लोग हैं, जो समाज में प्रतिष्ठा की नजर से देखे जाते हैं. इस गिरोह में कुछ वकील, पुलिस वाले, प्रौपर्टी व्यवसाई और फरजी पत्रकार भी शामिल हैं.

भिखारी बनाने वाला खतरनाक गैंग – भाग 1

राम प्रकाश पाठक सुबह 10 बजे कानपुर के किदवई नगर चौराहा स्थित अपनी दुकान पर पहुंचे तो वहां एक युवक बैठा था. उस का शरीर कांप रहा था और शरीर से दुर्गंध भी आ रही थी. उसे देख कर लग रहा था कि उसे आंखों से पूरी तरह दिखाई न दे रहा हो.

उन्होंने दुकान का शटर खोलने के लिए उस युवक से थोड़ा आगे बढ़ कर बैठने के लिए कहा तो वह युवक बोला, ‘‘पंडितजी, आप ने पहचाना मुझे? मैं सुरेश मांझी, यहीं पर लेबर का काम करता था. रोज लेबर मंडी आता था. मैं ने आप की आवाज पहचान ली है.’’

‘पंडितजी’ संबोधन सुन कर राम प्रकाश पाठक चौंक पडे़. क्योंकि उन को जाननेपहचानने वाले लोग ही उन्हें पंडितजी कह कर बुलाते थे. फिर भी उन्होंने उस युवक से कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें नहीं पहचाना.’’

अभी पंडितजी और उस युवक में बातचीत हो ही रही थी, तभी पास में ही मौजूद अमित नाम का मजदूर वहां आ गया. उस ने उस युवक को गौर से देखा फिर बोला, ‘‘क्या तुम सुरेश हो?’’

‘‘हां भैया, मैं सुरेश मांझी हूं. और तुम?’’

‘‘मेरा नाम अमित है. हम दोनों ने कई बार साथसाथ काम किया है. इसलिए मैं ने तुम्हें पहचान लिया. लेकिन तुम्हारी यह दुर्दशा कैसे हुई?’’

‘‘अमित भैया, यह लंबी कहानी है. पहले तुम मेरे भाई रमेश को खबर दे दो. ताकि मेरी जान बच सके. वह यशोदा नगर के एस ब्लौक नाला रोड पर रहता है.’’ वह युवक बोला.

पंडित राम प्रकाश पाठक ने अमित को कुछ रुपए दे कर सुरेश मांझी के भाई के घर भेज दिया. अमित पूछतेपाछते किसी तरह रमेश के घर पहुंच गया और सुरेश मांझी के बारे में जानकारी दी. अमित की बात सुन कर रमेश मांझी चौंक पड़ा. क्योंकि उस का भाई सुरेश मांझी पिछले 6 महीने से लापता था और उस की खोज में वह जुटा हुआ था.

कुछ देर बाद ही रमेश अमित के साथ किदवई नगर चौराहे पर आ गया, जहां उस का भाई उस समय नाजुक हालत में पड़ा था. पहली नजर में छोटे भाई सुरेश को देख कर रमेश उसे पहचान ही नहीं पाया. क्योंकि वह तो शरीर से हृष्टपुष्ट 25 वर्षीय युवक था और जो सामने था, वह बेहद दयनीय स्थिति में था.

लेकिन जब उस ने उस से बातचीत की और घरपरिवार के बारे में जानकारी ली तो वह समझ गया कि यह युवक उस का भाई सुरेश मांझी ही है. उस के बाद रमेश अपने छोटे भाई सुरेश को अपने घर यशोदा नगर ले आया. यह बात 30 अक्तूबर, 2022 की है.

घर ला कर रमेश ने भाई सुरेश के शरीर से फटेपुराने बदबूदार कपड़ों को अलग किया और साफसुथरे कपड़े पहनाए. इस के बाद उसे अपने हाथ से खाना खिलाया. भाई की दशा देख कर रमेश का कलेजा मुंह को आ गया था.

वह न चल पा रहा था और न ठीक से बोल पा रहा था. आंखों से दिखाई भी नहीं दे रहा था. शरीर में संक्रमण फैला था, जिस से शरीर से बदबू भी आ रही थी.

सुरेश मांझी की यह दुर्दशा कैसे हुई या किस ने की? इस बाबत रमेश ने भाई सुरेश मांझी से पूछताछ की. सुरेश के दिलोदिमाग में दहशत भरी थी, इसलिए उस ने कुछ भी बताने से इंकार कर दिया. लेकिन जब रमेश ने उसे प्यार से समझाया तो उस ने बताया कि वह भीख मंगवाने वाले गिरोह के चंगुल में फंस गया था. उसी गिरोह के लोगों ने उस की यह दशा की है.

अपने भाई सुरेश मांझी के इलाज के लिए रमेश दरदर भटकने लगा. वह उसे भरती कराने के लिए नौबस्ता व यशोदा नगर क्षेत्र के 3 अस्पतालों में गया, लेकिन सुरेश की हालत देख कर किसी भी प्राइवेट अस्पताल ने उसे भरती नहीं किया. हताश हो कर वह उसे घर वापस ले आया. 2 दिन तक सुरेश घर पर ही तड़पता रहा.

3 नवंबर, 2022 की सुबह 10 बजे रमेश मदद के लिए यशोदा नगर (वार्ड 95) के सभासद प्रशांत शुक्ला के आवास पर पहुंचा.

रमेश ने तब बताया कि करीब 6 महीने पहले उस का भाई भीख मंगवाने वाले गिरोह के चंगुल में फंस गया. गिरोह के सदस्यों ने उसे अपाहिज बना दिया. आंखें भी फोड़ दीं. जब यह गंभीर बीमारी से पीडि़त हुआ और भीख मांगने के लायक नहीं रहा तो उसे छोड़ गए.

रमेश की व्यथा सुन कर सभासद प्रशांत शुक्ला ने रमेश को पूर्ण सहयोग का भरोसा दिया. प्रशांत शुक्ला कानपुर नगर निगम में सब से कम उम्र (23 वर्ष) के तेजतर्रार सभासद हैं.

प्रशांत शुक्ला को लगा कि मामला बेहद गंभीर है. अत: उन्होंने देर करना उचित नहीं समझा. वह रमेश व उस के पीडि़त भाई सुरेश को साथ ले कर थाना नौबस्ता पहुंचे. थाने पर उस समय एसएचओ संजय पांडेय मौजूद थे. प्रशांत शुक्ला ने उन्हें नौबस्ता क्षेत्र में भीख मंगवाने वाला गिरोह के बारे में जानकारी देते हुए उन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर गिरफ्तार करने की मांग की.

एसएचओ संजय पांडेय ने तब रमेश व उस के पीडि़त भाई सुरेश मांझी से पूछताछ की. लेकिन उन की समझ में यह बात नहीं आई कि जब भीख मंगवाने वाले गिरोह ने सुरेश मांझी के हाथपैर तोड़ दिए थे. आंखें खराब कर दी थीं तो फिर भीख मंगवाने के बजाय उसे किदवई नगर ला कर क्यों छोड़ दिया.

असमंजस की स्थिति में एसएचओ संजय पांडेय ने रिपोर्ट दर्ज नहीं की. इस पर पुलिस का ढुलमुल रवैया देख कर सभासद प्रशांत शुक्ला का गुस्सा फूट पड़ा. उन्होंने दरजनों कार्यकर्ताओं को थाने बुलवा लिया और थाने पर हंगामा शुरू कर दिया. यही नहीं, उन्होंने पीडि़त की रिपोर्ट दर्ज न किए जाने की जानकारी उसी समय क्षेत्रीय विधायक सतीश महाना को भी दे दी.

नौबस्ता थाने पर हंगामा शुरू हुआ तो पुलिस के हाथपांव फूलने लगे. एसएचओ संजय पांडेय ने हंगामे की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी तो पुलिस कमिश्नर बी.पी. जोगदंड, डीसीपी (साउथ) प्रमोद कुमार तथा एसीपी (गोविंद नगर) विकास पांडेय थाना नौबस्ता आ गए.

पुलिस अधिकारियों ने सभासद प्रशांत शुक्ला को आश्वासन दिया कि पीडि़त की रिपोर्ट भी दर्ज होगी और उचित काररवाई भी की जाएगी, लेकिन इस से पहले हंगामा शांत होना चाहिए.

पुलिस के आश्वासन पर हंगामा शांत हो गया. उस के बाद पुलिस अधिकारियों ने पीडि़त सुरेश मांझी व उस के बड़े भाई रमेश से विस्तृत पूछताछ की. सुरेश मांझी अपाहिज जरूर था, लेकिन उस का दिमाग काम कर रहा था. उस की एक आंख से थोड़ाथोड़ा दिखाई दे रहा था.

उस ने बताया कि लगभग 6 माह पहले लेबर मंडी किदवई नगर में उसे विजय नागर नाम का युवक मिला था. वह नट जाति का है और मछरिया स्थित गुलाबी बिल्डिंग के पास रहता है.

विजय ने उसे दिल्ली में अच्छी नौकरी लगवाने का लालच दिया और फिर अपने घर ले गया. फिर विजय उस की बहन तारा व बहनोई ने उसे यातनाएं दे कर अपंग बना दिया. इस के बाद वह भीख मंगवाने वाले गिरोह के पास दिल्ली छोड़ आया.

एक महीना पहले जब वह बीमार पड़ा तो राज नागर उसे किदवई नगर चौराहा (कानपुर) छोड़ कर भाग गया.