नैतिकता से परे : प्यार में लिया बदला – भाग 1

12 अक्तूबर, 2019 की बात है. शाम के करीब 10 बजे थे. लखनऊ के कनक विहार में रहने वाली रूबी गुप्ता अपने रोजमर्रा के कामों में व्यस्त थी, तभी उस के पास उस के भाई श्याम कुमार का फोन आया. उस ने उसे बताया कि कुछ लोग आलोक कुमार का अपहरण कर ले गए हैं. यह जानकारी उसे अशोक के मकान मालिक सिपाहीराम  ने दी है. आलोक कुमार रूबी और श्याम कुमार का छोटा भाई था जो लखनऊ के ही दुल्लूखेड़ा में रहने वाले सिपाहीराम के यहां किराए पर रह रहा था.

भाई आलोक के अपहरण की बात सुन कर रूबी परेशान हो गई. उस ने सिपाहीराम का घर देखा था, इसलिए वह अपने पति अनिल गुप्ता के साथ सिपाहीराम के पास पहुंच गई. सिपाहीराम की परचून की दुकान थी. उस समय वह अपनी दुकान पर ही बैठा मिला.

रूबी ने जब उस से अपने भाई आलोक कुमार के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वह मोनू कनौजिया, बबलू, अरुण यादव, रानू उर्फ छोटे मियां और संतोष के साथ बैठ कर शराब पी रहा था. उसी दौरान उन के बीच किसी बात को ले कर झगड़ा हो गया. फिर सब ने मिल कर आलोक की खूब पिटाई की और उसे उठा कर ले गए. सिपाहीराम ने रूबी को आलोक की चप्पलें दिखाईं जो वहीं छूट गई थीं. रूबी ने भाई की चप्पलें पहचान लीं.

रूबी गुप्ता उसी रात नजदीकी थाना पारा पहुंची. थानाप्रभारी त्रिलोकी सिंह को रूबी ने भाई आलोक कुमार के अपहरण की सूचना दे दी. थानाप्रभारी ने रूबी से आलोक का फोटो ले कर आश्वासन दिया कि इस संबंध में पुलिस तुरंत जरूरी काररवाई करेगी.

उस समय रात अधिक हो चुकी थी, इसलिए अगले दिन सुबह होते ही पुलिस ने इस मामले में तेज गति से काररवाई करनी शुरू कर दी. थानाप्रभारी अगले दिन दुल्लूखेड़ा में सिपाहीराम के घर पहुंच गए. उन्होंने उस से आलोक कुमार गुप्ता के अपहरण की बाबत पूछताछ की तो उस ने थानाप्रभारी को भी वही बात बता दी, जो रूबी को बताई थी.

थानाप्रभारी ने उस से पूछा कि वे सभी लोग तुम्हारी दुकान में बैठ कर शराब पीने के दौरान जब आलोक की पिटाई कर रहे थे तो तुम ने उसे बचाने की कोशिश क्यों नहीं की? इस के अलावा जब वे लोग आलोक को अपने साथ ले जा रहे थे तो तुम्हें शोर मचाना चाहिए था, पुलिस को सूचना देनी चाहिए थी, लेकिन तुम ने ऐसा नहीं किया. क्यों?

सिपाहीराम इस का कोई जवाब नहीं दे सका. इस से थानाप्रभारी त्रिलोकी सिंह को उस पर ही शक हुआ कि जरूर वह कोई बात छिपा रहा है. लिहाजा पुलिस उसे पूछताछ के लिए थाने ले गई.

13 अक्तूबर को ही लखनऊ के मलीहाबाद थाने के थानाप्रभारी सियाराम वर्मा को किसी ने सूचना दी कि भोलाखेड़ा और तिलसुआ गांव के बीच नाले के किनारे एक युवक की लाश पड़ी है. मृतक केवल अंडरवियर और बनियान पहने हुए है. लाश की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी सियाराम वर्मा पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए.

उन्होंने लाश और घटनास्थल का निरीक्षण किया तो मृतक की उम्र यही कोई 24-25 साल थी. उस के शरीर पर लगी चोटों के निशान बता रहे थे कि उस के साथ मारपीट की गई है. घटनास्थल पर संघर्ष का कोई निशान नहीं था. इस से अनुमान लगाया कि उस की हत्या कहीं और कर के लाश यहां डाली गई है.

लाश को देखने के लिए आसपास के गांवों के काफी लोग वहां इकट्ठे हो गए थे. थानाप्रभारी ने उन से लाश की शिनाख्त करानी चाही, लेकिन कोई भी उसे पहचान नहीं सका. तब पुलिस ने लाश के फोटो खींच कर उस की शिनाख्त के लिए वाट्सऐप पर वायरल कर दिए और घटनास्थल की काररवाई पूरी कर के शव 72 घंटों के लिए मोर्चरी में रखवा दिया.

हत्यारों तक पहुंचने से पहले मृतक की शिनाख्त होनी जरूरी थी, लिहाजा थानाप्रभारी सियाराम वर्मा ने लखनऊ शहर के सभी थानों को उस अज्ञात युवक की लाश के फोटो भेज दिए ताकि पता चल सके कि किसी थाने में उस की गुमशुदगी तो दर्ज नहीं है.

जब यह फोटो लखनऊ के थाना पारा के थानाप्रभारी त्रिलोकी सिंह ने देखा तो उन्हें ध्यान आया कि उस के अपरहण की सूचना देने के लिए कल उस की बहन थाने आई थी. उन्होंने वाट्सऐप पर आई लाश की फोटो हेड मोहर्रिर अभय प्रसाद को दिखाई तो उस ने कहा कि यह फोटो आलोक कुमार की ही है, जिस के अपहरण की तहरीर उस की बहन रूबी ने दी थी. तब थानाप्रभारी ने रूबी को फोन कर के थाने बुला लिया.

रूबी और उस के पति अनिल गुप्ता के थाने आने के बाद थानाप्रभारी त्रिलोकी सिंह उन्हें ले कर थाना मलीहाबाद पहुंचे. उन्होंने वहां के थानाप्रभारी सियाराम वर्मा को बताया, ‘‘कल हमारे थाना क्षेत्र से आलोक कुमार का कुछ लोगों ने अपहरण कर लिया था. आप ने जो लाश बरामद की है, वह आलोक कुमार की ही है.’’

पति की प्रेमिका का खूनी प्यार – भाग 1

महानगर मुंबई से करीब 120 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पुणे शहर में 21 नवंबर, 2018 को 2-2 जगहों पर हुई गोलीबारी ने शहर के लोगों के दिलों में डर पैदा कर दिया था. इस गोलीबारी में एक महिला की मौत हो गई थी और क्राइम ब्रांच का एक अधिकारी घायल हो गया था. उस अधिकारी की हालत गंभीर बनी हुई थी.

घटना चंदन नगर थाने के आनंद पार्क इंद्रायणी परिसर की सोसायटी स्थित धनदीप इमारत के अंदर घटी. सुबह के समय 3 गोलियां चलने की आवाज से वहां रहने वाले लोग चौंके. गोलियों की आवाज इमारत की पहली मंजिल और दूसरी मंजिल के बीच बनी सीढि़यों से आई थी.

आवाज सुनते ही पहली और दूसरी मंजिल पर रहने वाले लोग अपने फ्लैटों से बाहर निकल आए. वहां का दृश्य देख कर उन का कलेजा मुंह को आ गया. सीढि़यों पर एकता बृजेश भाटी नाम की युवती खून से लथपथ पड़ी थी. वह पहली और दूसरी मंजिल के 3 फ्लैटों में अपने परिवार के साथ किराए पर रहती थी. शोरशराबा सुन कर इमारत में रहने वाले अन्य लोग भी वहां आ गए.

लोग घायल महिला को अस्पताल ले गए, लेकिन डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. अस्पताल द्वारा थाना चंदन नगर पुलिस को सूचना दे दी गई.

सुबहसुबह इलाके में घटी इस सनसनीखेज घटना की खबर पा कर थाना चंदन नगर के थानाप्रभारी राजेंद्र मुलिक अपनी टीम के साथ अस्पताल की तरफ रवाना हो गए. अस्पताल में राजेंद्र मुलिक को पता चला कि एकता भाटी को उस के फ्लैट पर ही गोलियां मारी गई थीं. डाक्टरों ने बताया कि एकता को 2 गोलियां लगी थीं. एक गोली उस के पेट में लगी थी और दूसरी सिर को भेदते हुए आरपार निकल गई थी. थानाप्रभारी अस्पताल में 2 कांस्टेबलों को छोड़ कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

वहां जाने पर यह जानकारी मिली कि मृतका एकता भाटी सुबह अपने परिवार वालों के साथ चायनाश्ता के लिए अपनी पहली मंजिल वाले फ्लैट में दूसरी मंजिल से आ रही थी. उस का पति बृजेश भाटी 5 मिनट पहले ही नीचे आ चुका था. वह अपने पिता और बच्चों के साथ बैठा पत्नी के आने का इंतजार कर रहा था. उसी समय यह घटना घटी.

थानाप्रभारी ने मुआयना किया तो एक गोली का निशान सीढि़यों के पास दीवार पर मिला. इस का मतलब हमलावर की एक गोली दीवार पर लगी थी. बृजेश भाटी ने पुलिस को बताया कि उन्होंने 3 गोलियां चलने की आवाज सुनी थी.

मामला काफी संगीन था, अत: थानाप्रभारी राजेंद्र मुलिक ने मामले की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ पुलिस कंट्रोल रूम और फोरैंसिक टीम को भी दे दी. सूचना पाते ही शहर के डीसीपी घटनास्थल पर पहुंच गए. फोरैंसिक टीम ने मौके से सबूत जुटाए. पुलिस अधिकारियों ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया.

पुलिस समझ नहीं पाई हत्या का कारण

मौके की काररवाई निपटाने के बाद थानाप्रभारी फिर से अस्पताल पहुंचे और एकता भाटी के शव को पोस्टमार्टम के लिए पुणे के ससून डाक अस्पताल भेज दिया.

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस के उच्च अधिकारियों ने आपातकालीन बैठक बुलाई, जिस में शहर के कई थानों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथसाथ क्राइम ब्रांच के डीसीपी शिरीष सरदेशपांडे भी शामिल हुए. मामले पर विचारविमर्श करने के बाद पुलिस ने अपनी जांच शुरू कर दी.

महानगर मुंबई हो या फिर पुणे, इन शहरों में छोटीबड़ी कोई भी घटना घटती है तो स्थानीय पुलिस के साथ क्राइम ब्रांच अपनी समानांतर जांच शुरू कर देती है. डीसीपी शिरीष सरदेशपांडे ने भी एकता भाटी की हत्या की गुत्थी सुलझाने के लिए 2 टीमें गठित कीं, जिस की कमान उन्होंने इंसपेक्टर रघुनाथ जाधव और क्राइम ब्रांच यूनिट-2 के इंसपेक्टर गजानंद पवार को सौंपी.

सीनियर अफसरों के निर्देशन में स्थानीय पुलिस और क्राइम ब्रांच ने तेजी से जांच शुरू कर दी. उन्होंने सब से पहले पूरे शहर की नाकेबंदी करवा कर अपने मुखबिरों को सजग कर दिया.

मृतक एकता भाटी का परिवार दिल्ली का रहने वाला था, इसलिए मामले के तार दिल्ली से भी जुड़े होने का संदेह था. इस के साथसाथ उन्होंने घटना की तह तक पहुंचने के लिए आसपास लगे सारे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को खंगालना शुरू कर दिया.

पुलिस को इस से पता चला कि हत्यारे मोटरसाइकिल पर आए थे. वह मोटरसाइकिल पुणे वड़गांव शेरी के शिवाजी पार्क के सामने लावारिस हालत में खड़ी मिली. यह भी जानकारी मिली कि मोटरसाइकिल पुणे की मार्केट से चोरी की गई थी. मोटरसाइकिल वहां छोड़ कर वह सारस बाग की तरफ निकल गए थे. लिहाजा क्राइम ब्रांच की टीम हत्यारों की तलाश में जुट गई.

उसी दिन शाम करीब 4 बजे इंसपेक्टर गजानंद पवार की टीम को एक मुखबिर द्वारा खबर मिली कि चंदन नगर गोलीबारी के दोनों अभियुक्त पुणे रेलवे स्टेशन पर आने वाले हैं. वे प्लेटफार्म नंबर-3 से साढ़े 5 बजे छूटने वाली झेलम एक्सप्रैस से दिल्ली भागने वाले हैं.

प्रेमिका से छुटकारा पाने की शातिर चाल – भाग 1

माधुरी जिस उम्र में थी, वह नएनए सपनों, उमंगों, उम्मीदों और उत्साह से लबरेज होती है. उस ने भी भविष्य के लिए ढेरों ख्वाब बुन रखे थे. बीकौम की छात्रा माधुरी सुंदर और हंसमुख स्वभाव की थी. पढ़लिख कर वह एक मुकाम हासिल करना चाहती थी. लेकिन यह ऐसी उम्र है, जब कोई करिश्माई व्यक्ति आकर्षित कर जाता है. फिर तो उसी के लिए दिल धड़कने लगता है. माधुरी के साथ भी ऐसा हुआ था. वह आदमी कौन था, यह सिर्फ माधुरी ही जानती थी, जिसे वह जाहिर भी नहीं होने देना चाहती थी. वह परिवार में सभी की प्रिय थी. मातापिता को अपने बच्चों से ढेरों उम्मीदें होती हैं. माधुरी को भी मांबाप की ओर से पढ़नेलिखने और घूमनेफिरने की इसीलिए आजादी मिली थी कि वह अपना भविष्य संवार सके.

माधुरी दिल्ली से लगे गौतमबुद्ध नगर जिले के रबूपुरा थाना के गांव मोहम्मदपुर जादौन के रहने वाले मुनेश राजपूत की बेटी थी. वह एक समृद्ध किसान थे. वैसे तो यह परिवार हर तरह से खुश था, लेकिन नवंबर, 2016 में एक दिन माधुरी अचानक लापता हो गई तो पूरा परिवार परेशान हो उठा. वह घर नहीं पहुंची तो उसे ढूंढा जाने लगा. काफी प्रयास के बाद भी जब माधुरी का कुछ पता नहीं चल सका तो परिवार के सभी लोग परेशान हो उठे. चूंकि मामला जवान बेटी का था, इसलिए मुनेश ने थाने जा कर बेटी की गुमशुदगी दर्ज करा दी. पुलिस जांच में पता चला कि माधुरी अपने पिता के मोबाइल से किसी को फोन किया करती थी. पुलिस और घर वालों ने उस नंबर के बारे में पता किया तो वह नंबर नजदीक के ही गांव के रहने वाले राहुल जाट का निकला. 27 नवंबर, 2016 को राहुल को खोज निकाला गया.

राहुल के साथ माधुरी भी थी. दोनों ने जो कुछ बताया, उसे सुन कर घर वाले दंग रह गए. दोनों एकदूसरे से प्रेम करते थे. यही नहीं, उन्होंने आर्यसमाज मंदिर में विवाह भी कर लिया था. राहुल ने अपने 3 दोस्तों की मदद से माधुरी को भगाया था. मामला 2 अलगअलग जातियों का था. माधुरी के घर वाले इस रिश्ते के सख्त खिलाफ थे. वे बेटी द्वारा उठाए गए इस कदम से काफी आहत थे. बात मानमर्यादा और इज्जत की थी, इसलिए दोनों पक्षों के बीच आस्तीनें चढ़ गईं. इस मुद्दे पर पंचायत बैठी, जिस ने फैसला लिया कि दोनों ही अब एकदूसरे से कोई वास्ता नहीं रखेंगे. घर वालों ने माधुरी को डांटाफटकारा और जमाने की ऊंचनीच समझा कर इज्जत का वास्ता दिया. इस पर उस ने वादा किया कि अब वह कोई ऐसा कदम नहीं नहीं उठाएगी, जिस से उन की इज्जत पर आंच आए.

किस के दिमाग में कब क्या चल रहा है, यह कोई दूसरा नहीं जान सकता. माधुरी बिलकुल सामान्य जिंदगी जी रही थी. इस घटना को घटे अभी एक महीना भी नहीं बीता था कि 23 दिसंबर, 2016 की दोपहर माधुरी अचानक फिर लापता हो गई. उस के इस तरह अचानक घर से लापता होने से घर वाले परेशान हो उठे. उन्होंने अपने स्तर से उस की खोजबीन की. लेकिन जब वह शाम तक नहीं मिली तो उन का सीधा शक उस के प्रेमी राहुल पर गया.

माधुरी के घर वालों ने थाने जा कर राहुल और उस के दोस्तों के खिलाफ नामजद तहरीर दे दी. राहुल का चूंकि माधुरी से प्रेमप्रसंग चल रहा था और एक बार वह उसे ले कर भाग चुका था, इसलिए कोई भी होता, उसी पर शक करता. गुस्सा इस बात का था कि समझाने के बावजूद उस ने वादाखिलाफी की थी. इस बात से माधुरी के घर वाले ही नहीं, गांव वाले भी नाराज थे. शायद इसीलिए सभी माधुरी को जल्द से जल्द ढूंढ कर लाने को पुलिस से कहने लगे थे. पुलिस ने माधुरी के घर वालों से नंबर ले कर उस की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि अभी भी माधुरी की राहुल से बातचीत होती रहती थी. गायब होने वाले दिन भी उस की राहुल से बात हुई थी.

पुलिस ने राहुल और उस के दोस्तों को थाने ला कर पूछताछ की. लेकिन इन लोगों ने माधुरी के गायब होने में अपना हाथ होने से साफ मना कर दिया. इस पूछताछ में पुलिस को भी लगा कि इन लोगों का माधुरी के गायब होने में हाथ नहीं है तो उस ने उन्हें छोड़ दिया. कई दिन बीत गए, माधुरी का कुछ पता नहीं चला. घर वाले राहुल और उस के साथियों के छोड़े जाने से खिन्न थे. मुनेश के पड़ोस में ही रहता था हेमंत कौशिक उर्फ टिंकू, जो शादीशुदा ही नहीं, 2 बच्चों का बाप था. वह कंप्यूटर और मोबाइल रिपेयरिंग का काम करता था. पड़ोसी होने के नाते वह माधुरी के घर वालों की हर तरह से मदद कर रहा था.

हेमंत ने मुनेश को सलाह दी कि इस मामले में थाना पुलिस राहुल के खिलाफ काररवाई नहीं कर रही है तो चल कर पुलिस के बड़े अधिकारियों से मिला जाए. उस की बात घर वालों को ठीक लगी तो गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर मुनेश एसएसपी औफिस जा पहुंचे. अपनी बात मनवाने के लिए इन लोगों ने धरनाप्रदर्शन भी किया. इस का नतीजा यह निकला कि एसएसपी धर्मेंद्र सिंह ने इस मामले में एसपी (देहात) सुजाता सिंह को काररवाई करने के निर्देश दिए. मामला तूल पकड़ता जा रहा था, इसलिए सुजाता सिंह ने थानाप्रभारी शाबेज खान को माधुरी की गुमशुदगी वाले मामले की गुत्थी सुलझाने को तो कहा ही, खुद भी इस मामले पर नजर रख रही थीं.

पुलिस एक बार फिर राहुल को पकड़ कर थाने ले आई. एसपी सुजाता सिंह ने खुद उस से पूछताछ की. राहुल का कहना था कि पंचायत के बाद वह माधुरी से कभी नहीं मिला तो पुलिस ने उस के ही नहीं, उस के दोस्तों के भी मोबाइल फोनों की लोकेशन निकलवाई. इस से पता चला कि राहुल ही नहीं, उस के दोस्त भी माधुरी के लापता होने वाले दिन घर पर ही थे. कई लोग इस बात की तसदीक भी कर रहे थे. जांच में यह बात सच पाई गई, इसलिए पुलिस उलझ कर रह गई. जबकि माधुरी के घर वाले यह बात मानने को तैयार नहीं थे. लेकिन अब तक राहुल के पक्ष में भी कुछ लोग उतर आए थे, इसलिए पुलिस को विरोध और आरोपों का सामना करना पड़ रहा था. कभीकभी परेशान हो कर पुलिस फरजी खुलासा करते हुए निर्दोषों को जेल भेज देती है. लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ. एसपी सुजाता सिंह ने तय कर रखा था कि वह जो भी काररवाई करेंगी, सबूतों के आधार पर ही करेंगी. माधुरी के घर वाले चाहते थे कि राहुल और उस के साथियों को जेल भेजा जाए, लेकिन पुलिस के पास उन के खिलाफ एक भी सबूत नहीं था.

4 साल बाद : क्यों किया प्रेमिका से किनारा – भाग 3

सलमान की यह बात रचना की समझ में नहीं आई. वह अपनी मांग पर अड़ी रही. सलमान इस के लिए तैयार नहीं हुआ. साथ जीनेमरने की कसमें खाने वाले सलमान का नकली चेहरा सामने आ गया था. जिस वासना की चाहत में उस ने रचना को स्कूटी दी थी, उस रचना ने उस की आंखों में वासना की आग देख ठेंगा दिखा दिया.

इस बात को ले कर दोनों के बीच विवाद भी हुआ. सलमान ने रचना को भलाबुरा कहा तो रचना भी पीछे नहीं रही. उस ने सलमान को उस के दोस्तों के सामने ही जलील किया. रचना यहीं चुप नहीं बैठी, उस ने सलमान के खिलाफ दारागंज थाने में छेड़छाड़ का मुकदमा दर्ज करा दिया.

मुकदमा दर्ज होने के बाद रचना और सलमान के बीच दूरियां बढ़ गईं. दोनों ने एकदूसरे से मिलना बात करना बंद कर दिया. रचना ने अपने घर वालों को बता दिया कि सलमान नाम का लड़का उसे छेड़ता है. बहन की बात सुन कर भाई भोला का खून खौल उठा. उस ने सलमान को धमका कर बहन की तरफ न देखने और उस से दूर रहने की हिदायत दे दी.

इंतकाम की आग

रचना ने सलमान के साथ जो किया, वह उसे काफी नागवार लगा. वह अपमान की आग में झुलस रहा था. उस ने यह कभी नहीं सोचा था, रचना उस के साथ ऐसी घिनौनी हरकत भी कर सकती है. तभी उस ने दृढ़ निश्चय कर लिया कि जब तक वह रचना से अपने अपमान का बदला नहीं ले लेगा, तब तक उस के इंतकाम की आग ठंडी नहीं होगी. लेकिन सवाल यह था कि वह रचना से दोबारा कैसे मिले ताकि फिर से दोस्ती हो जाए और वह उसे विश्वास में ले कर अपना इंतकाम ले सके.

जैसेतैसे सलमान ने रचना तक अपना संदेश भिजवाया कि वह एक बार आ कर मिल ले. वह उस से मिल कर माफी मांगना चाहता है. रचना सलमान की बात मान गई और उसे माफ कर दिया. यही नहीं दोनों फिर से पहले की तरह मिलने लगे. सलमान यही चाहता भी था. उस ने रचना को अपने खतरनाक इरादों की भनक तक नहीं लगने दी.

इस बीच 3-4 महीने बीत गए. रचना पर फिर से सलमान के इश्क का जादू चल गया. सलमान को इसी का इंतजार था. सलमान ने अपने दोस्तों लकी पांडेय और ममेरे भाई अंजफ से बात कर के रचना को रास्ते से हटाने की बात की. लकी और अंजफ उस का साथ देने को तैयार हो गए.

तीनों ने मिल कर योजना बनाई कि रचना को किसी तरह सलमान के घर बुलाया जाए और उस का काम तमाम कर के लाश नदी में फेंक दी जाए. इस से किसी को पता भी नहीं चलेगा और वे लोग पुलिस से भी बचे रहेंगे.

योजना बन जाने के बाद सलमान ने 16 अप्रैल, 2016 की अलसुबह रचना को फोन कर के सुबह 10 बजे रेलवे स्टेशन पर मिलने के लिए कहा.

अपनी स्कूटी ले कर रचना ठीक 10 बजे सलमान से मिलने स्टेशन पहुंच गई. सलमान वहां मौजूद मिला. उस ने रचना की स्कूटी प्रयागराज स्टेशन के स्टैंड पर खड़ी कर दी और उसे अपनी बाइक पर बैठा कर बक्शी खुर्द स्थित अपने घर ले गया. उस के घर में बेसमेंट था.

सलमान रचना को बेसमेंट में ले गया. वहां लकी और अंजफ पहले से मौजूद थे. उन्हें देख रचना खतरे को भांप गई.

उस ने वहां से भागने की कोशिश की लेकिन उन तीनों ने उसे दौड़ कर पकड़ लिया और उस के हाथपांव रस्सी से बांध दिए. फिर सलमान ने चाकू से उस का गला रेत कर हत्या कर दी.

लाश ठिकाने लगाने के लिए सलमान ने अपने मामा शरीफ को फोन किया. शरीफ फौर्च्युनर ले आया. चारों ने मिल कर लाश जूट के बोरे में भर दी. इस के बाद कपड़े से कमरे में फैला खून साफ कर दिया.

रचना की लाश जूट की बोरी में भर कर फौर्च्युनर में लाद दी गई. सलमान और उस के मामा शरीफ सहित चारों लोग पहले नैनी की तरफ गए. इरादा था लाश को यमुना में फेंकने का, लेकिन 5 घंटे तक भटकने के बाद भी उन्हें मौका नहीं मिला.

इस के बाद ये लोग नवाबगंज की तरफ निकल गए. लेकिन वहां भी लाश को गंगा में फेंकने का मौका नहीं मिला. इन लोगों ने प्रयागराज की सीमा के पास प्रतापगढ़, वाराणसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर रचना की लाश हथिगहां के पास सड़क किनारे फेंक दी और सब लौट आए.

इस के बाद सलमान बाइक से फिर वहां गया. उस के पास एक बोतल पैट्रोल था. उस ने रचना की लाश पर पैट्रोल डाला और आग लगा दी, ताकि लाश पहचानी न जा सके, लौट कर उस ने रचना की स्कूटी सोरांव के एक परिचित के गैराज में खड़ी कर दी.

बाद में जो हुआ, जगजाहिर है. सलमान और उस के पिता ने पैसों के बल पर पुलिस को अपने पक्ष में कर लिया.

रचना के केस की पैरवी कर रहे उस के भाई भोला को साल 2018 में सामूहिक दुष्कर्म के आरोप में फंसा कर जेल भिजवा दिया

गया था. इस पर भी रचना के घर वालों ने हार नहीं मानी.

रचना की छोटी बहन निशा शुक्ला ने पैरवी करनी शुरू की. आखिरकार हाईकोर्ट की चाबुक से पुलिस की नींद टूटी और आरोपियों को जेल जाना पड़ा.

सलमान और लकी के गिरफ्तार होने के 3 दिनों बाद थाना दारागंज के थानेदार आशुतोष तिवारी ने अंजफ को और 20 दिनों बाद मामा शरीफ को दारागंज से गिरफ्तार कर लिया.

करीब 4 सालों से जिस रचना शुक्ला की हत्या रहस्य बनी थी, आरोपियों की गिरफ्तारी से सामने आ गई.

अगर पुलिस पीडि़ता उमा शुक्ला की बातों पर विश्वास कर लेती तो घटना के दूसरे दिन ही चारों आरोपी गिरफ्तार हो जाते और इस समय अपने गुनाह की सजा काट रहे होते. बहरहाल, देर से ही सही आरोपी जेल की सलाखों के पीछे चले गए.

साजन की सहेली : वंदना कैसे बनी शिकार – भाग 3

आष्टा से सटा जिला है शाजापुर, जिस का एक कस्बा है बेरछा, जो मावा उत्पादन के लिए प्रदेश भर में मशहूर है. बीती पहली फरवरी को सुबह बेरछा के गांव धुंसी के चौकीदार इंदर सिंह बागरी ने थाने में इत्तला दी कि जगदीश पाटीदार नाम के किसान के खेत में एक जली हुई लाश पड़ी है.

बेरछा थाने की तेजतर्रार प्रभारी दीप्ति शिंदे खबर मिलते ही पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचीं. एसपी शैलेंद्र सिंह के निर्देश पर एफएसएल अधिकारी आर.सी. भाटी भी वहां पहुंच चुके थे. लाश इतनी जल चुकी थी कि उसे किसी भी तरह पहचानना नामुमकिन था.

बारीकी से जांच करने पर लाश के नीचे से चाबियों का गुच्छा और अधजला थरमस मिला. लाश के दाहिने पांव में बिछिए और बाएं हाथ की कलाई में चूडि़यां मिलने से यह भर तय हो पाया कि लाश किसी महिला की है. आसपास उड़ कर गिरे. कई अधजले कागज भी बरामद हुए. इन कागजों की लिखावट को लेंस से पढ़ने पर जो शब्द पुलिस वालों को समझ आए वे मुगलई रोड, श्रमिक, जिला स्वास्थ्य अधिकारी, इनवास, इंजेक्शन की बौटल और चिकित्सक आदि थे.

इन शब्दों से अंदाजा लगाया गया कि मृतका का संबंध जरूर स्वास्थ्य विभाग से है. साफ दिख रहा था कि महिला की हत्या कर उस की लाश को पहचान छिपाने की गरज से जलाया गया है. अब तक गांव वालों की भीड़ घटनास्थल पर लग गई थी जिन से पूछताछ करने पर पता चला कि एक दिन पहले एक मारुति वैन इस इलाके में देखी गई थी.

इन साक्ष्यों से पुलिस वालों के हाथ कुछ खास नहीं लग रहा था. ऐसे में मुगलई रोड गांव को आधार बना कर पुलिस जांच आगे बढ़ी तो मालूम हुआ कि यह गांव सीहोर जिले की आष्टा तहसील का है.

आष्टा थाने में पूछताछ करने पर पुलिस का मकसद पूरा हो गया, जहां से पता चला कि मंडीदीप निवासी 2 महिलाएं नीलम और सुनंदा सोनी ने स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत अपनी बहन वंदना सोनी की गुमशुदगी दर्ज कराई है. इन दोनों बहनों ने बिछिए और चूडि़यां देख कर वंदना के होने की पुष्टि कर दी.

लाश पहचान में आ गई लेकिन हत्यारे गिरफ्त से बाहर थे, लिहाजा इंसपेक्टर दीप्ति शिंदे सीधे आष्टा अस्पताल पहुंचीं और सीसीटीवी फुटेज निकलवाए, जिन से पता चला कि 31 जनवरी की दोपहर 12 बजे तक वंदना अस्पताल में थी और आखिरी बार किसी एक महिला व बच्ची के साथ बाहर जाती हुई दिखी थी.

पुलिसिया पूछताछ में यह बात भी उजागर हुई कि वंदना कुछ दिन पहले ही बजरंग कालोनी सोनी लौज के पास एक मकान में रहने के लिए आई थी, इस के पहले वह मारूपुरा में अन्नू शाह के मकान में रह रही थी और इस परिवार से उस के बेहद अंतरंग और घनिष्ठ संबंध थे. लेकिन कुछ दिनों से वंदना और हनीफा में लड़ाई होने लगी थी.

सुनंदा और नीलम ने अपने बयानों में बता दिया कि वंदना और अंसार के बीच प्रेम प्रसंग था, जिस के चलते हनीफा उसे परेशान कर रही थी. यह बात वंदना ने फोन पर अपनी बहनों को बताई थी.

शक होने पर पुलिस जब अंसार के घर पहुंची तो पता चला कि हनीफा मायके गई हुई है. इस से पुलिस का शक यकीन में बदलता नजर आया. पुलिस काररवाई आगे बढ़ती, इस के पहले ही स्वर्णकार समाज ने आरोपियों की गिरफ्तारी को ले कर अधिकारियों व मुख्यमंत्री को ज्ञापन दिए और जुलूस भी निकाला.

इसी दौरान आष्टा पुलिस को उस वैन ड्राइवर का पता चल गया जो बेरछा में देखी गई थी. पूछताछ में ड्राइवर ने बताया कि हनीफा और उस का एक साथी वैन में कुछ सामान भर कर ले गए थे. हनीफा के साथी का नाम गुड्डू उर्फ रामचरण पता चला, जो पेशे से तांत्रिक भी था.

अब करने को कुछ नहीं रह गया था. पुलिस ने जल्द ही अंसार सहित हनीफा और रामचरण को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में हैरानी की बात अंसार द्वारा खुद को वंदना का कातिल बताना थी. जब पुलिस ने इस हादसे का रिक्रिएशन यानी नाट्य रूपांतरण कराया तो अंसार गड़बड़ाता दिखा.

अब हनीफा से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने सच उगल दिया कि घटना वाले दिन वह अस्पताल गई थी और वंदना को झांसा दे कर घर ले आई थी. उस का किराएदार गुड्डू पहले से ही तैयार था. वंदना और हनीफा के बीच की बातचीत जब तकरार और तूतूमैंमैं में बदली तो हनीफा ने वंदना के सिर पर रौड दे मारी. वंदना बेहोश हो गई तो गुड्डू और हनीफा ने गला रेत कर उस की हत्या कर दी.

वंदना की लाश दोनों ने प्लास्टिक के एक ड्रम में ठूंसी और उसे वैन में रख कर 85 किलोमीटर दूर बेरछा के लिए निकल गए. वैन ड्राइवर को हालांकि इन पर शक हो रहा था कि कुछ गड़बड़ है लेकिन अपनी ड्यूटी बजाते हुए उस ने ज्यादा पूछताछ नहीं की. ड्राइवर ने ड्रम गुड्डू की बताई जगह उतार दिया और आष्टा वापस आ गया.

लाश वाले ड्रम को हनीफा के पास छोड़ कर गुड्डू गांव के पैट्रोल पंप से 2 लीटर पैट्रोल लाया और दोनों ने मिल कर वंदना की लाश को जला दिया. जलाने के बाद गुड्डू भोपाल अपने एक दोस्त देवेंद्र ठाकुर के पास आ गया. उसे भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. हनीफा वापस आष्टा आ गई थी.

इन दोनों का अंदाजा था कि जली लाश पुलिस पहचान नहीं पाएगी और दोनों पकड़ से बाहर रहेंगे. हत्या के समय अंसार बस में ड्यूटी पर था जो हनीफा को बचाने के लिए कत्ल का इलजाम अपने ऊपर ले कर पुलिस को गुमराह कर रहा था.

आरोपी यानी हत्यारे अब सलाखों के पीछे हैं. वंदना ने जमाने की परवाह न करते हुए एक शादीशुदा मर्द से प्यार कर उस के साथ ही जीने की जिद करने की गलती की थी तो हनीफा पैसों के लालच में आ कर पति का सौदा करने की चूक कर बैठी थी.

बाद में जब अंसार वंदना से शादी करने पर उतारू हो गया तो उस ने सौतन को ठिकाने लगा दिया. अंसार ने खूब मौज की हालांकि वह भूल गया था कि बीवीबच्चों के होते हुए एक कुंवारी लड़की से इश्क लड़ाना जुर्म नहीं पर गलत बात जरूर है.

आनंद का आनंद लोक : किरण बनी शिकार – भाग 3

उस परिवार का लड़का दिल्ली में रह कर सोफे बनाने का काम करता था. उस लड़के व उस के परिवार को कविता पसंद आ गई. परिवार अच्छा होने की वजह से सरोज ने उस युवक से अपनी बेटी कविता की कोर्ट मैरिज करा दी. यह पिछले साल नवंबर की बात है.

इधर किरन अब जब भी आनंद से मिलती तो विवाह करने की जिद करती. अब आनंद के लिए  किरन को समझाना मुश्किल होने लगा. इसे ले कर वह तनाव में रहने लगा.

कोराना वायरस का प्रकोप पूरे विश्व में फैला हुआ था. उस से बचाने के लिए भारत सरकार ने देश में लौकडाउन कर रखा था. उत्तर प्रदेश की बात करें तो ताज नगरी आगरा में कोरोना संक्रमितों की संख्या सब से अधिक थी.

21 अप्रैल की रात 9 बजे आगरा के थाना लोहामंडी क्षेत्र के हसनपुरा में रहने वाले वरुण प्रजापति ने गजानन नगर में रहने वाली डाक्टर गरिमा बंसल के घर के पास एक कार्टन बौक्स पड़ा देखा. आश्चर्य की बात यह थी कि वह बौक्स सफेद चादर में बंधा हुआ था.

वरूण ने आसपास के लोगों को बुलाया. लोगों के आने पर तरहतरह की बातें होने लगीं. यह रहस्य जानने को सभी बेकरार थे कि बौक्स में है क्या. पता चला कि वह कार्टन बौक्स दोपहर में वहां नहीं था, शाम को अंधेरा घिरने पर किसी ने उसे वहां डाला होगा.

मामला संदिग्ध होने पर वरुण ने 112 नंबर पर काल कर के पुलिस को सूचना दे दी. सूचना मिलते ही एसपी सिटी रोत्रे बोहन प्रसाद व शाहगंज थाना पुलिस मौके पर पहुंच गई. जहां बाक्स मिला था, वहां से महज एक किलोमीटर की दूरी पर थाना शाहगंज था.

इंसपेक्टर सत्येंद्र राघव ने वहां पहुंचने के बाद एक पुलिसकर्मी को पीपीई किट पहना कर 2 फुट का वह कार्टन बौक्स खुलवाया. बौक्स खुलने पर उस में एक युवती की लाश मिली. मृतका की उम्र लगभग 25-26 वर्ष रही होगी. उस के गले पर दबाने के निशान थे. मृतका ने नीले रंग का सलवारसूट पहन रखा था. उस के पैर दुपट्टे से बंधे हुए थे. दाएं हाथ पर किरन लिखा था.

बौक्स पर जो चादर बंधी थी, और वह बौक्स किसी अस्पताल के लग रहे थे. बौक्स दवाइयों में इस्तेमाल होने वाला था. चादर भी अस्पतालों में बिछाई जाने वाली थी.

इस से लगा कि हत्यारे का कनेक्शन किसी हौस्पिटल से है. एक किलोमीटर तक के अस्पतालों की जानकारी एकत्र की गई तो ऐसा कोई हौस्पिटल नहीं मिला. मृतका की लाश के फोटो भी कोई नहीं पहचान पाया. मृतका की शिनाख्त नहीं हो पाई तो इंसपेक्टर सत्येंद्र राघव ने लाश को मार्चरी में रखवा दिया. फिर थाने आ कर उन्होंने वरुण प्रजापति से लिखित तहरीर ली और अज्ञात के विरूद्ध भादंवि की धारा 302/201 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.

वह अभागी किरन ही थी

अगले दिन एक महिला अपने बेटे के साथ शाहगंज थाने पहुंची और अपना नाम सरोज व बेटे का नाम सागर बताया. उन दोनों के अनुसार वे लाश मिलने की बात सुन कर थाने पहुंचे थे. सरोज की बेटी किरन घटना वाले दिन सुबह 10 बजे घर से निकली थी लेकिन वापस नहीं लौटी थी.

इंसपेक्टर सत्येंद्र राघव ने उन्हें लाश का फोटो दिखाया तो सरोज रो पड़ी, वह लाश उस की बेटी किरन की ही थी. शिनाख्त होने पर इंसपेक्टर राघव ने उन से किरन के बारे में पूछताछ की. लेकिन सरोज ने कुछ भी ऐसा नहीं बताया जो पुलिस के काम का होता. वह किरन के प्रेमसंबंधों को बदनामी के डर से छिपा गईं.

इंसपेक्टर राघव ने बौक्स मिलने के स्थान की सीसीटीवी फुटेज खंगालनी शुरू की. सीसीटीवी फुटेज में एक व्यक्ति बाइक पर पीछे बौक्स रखे आता दिखाई दिया. उस इलाके की पूरी सीसीटीवी फुटेज देखते हुए इंसपेक्टर राघव खुशी नेत्रालय तक पहुंच गए.

लौकडाउन की वजह से नेत्रालय बंद चल था, लेकिन उन्हें यह जानकारी मिल गई कि उस नेत्रालय में कोई रहता है. वह नेत्रालय पहुंचे तो आनंद ने गेट खोला. पुलिस को वहां आया देख कर वह चौंका और भागने की कोशिश की, लेकिन पुलिस से बच कर भाग नहीं पाया.

पुलिस को उस की हीरो सुपर स्पलैंडर बाइक भी वहीं खड़ी मिल गई. यह वही बाइक थी, जिस पर आनंद बौक्स रख कर फेेंकने ले गया था. उस के पास से किरन की पासबुक और आधार कार्ड भी बरामद हो गए.

थाने ला कर जब आनंद से सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गया और हत्या की वजह बता दी.

किरन ने शादी करने की बात को ले कर आनंद का जीना हराम कर दिया था. दिन रात बस एक ही रट कि शादी कर लो. जबकि आनंद पहले से ही शादीशुदा था, वह तो उस के साथ खेल रहा था. ऐसे में शादी करने का तो सवाल ही नहीं उठता था.

21 अप्रैल की सुबह 10 बजे किरन घर से अपनी मां से कह कर निकली कि वह आनंद से मिलने जा रही है. किरन सीधे वहां से खुशी नेत्रालय पहुंची. लौकडाउन की वजह से नेत्रालय बंद था. लेकिन आनंद अंदर अपने कमरे में मौजूद था.

आनंद और किरन बैठ कर बात करने लगे. बात बात में ही शादी को ले कर दोनों में विवाद होने लगा.

दोपहर साढ़े 12 बजे आनंद ने प्लास्टिक की रस्सी से किरन का गला घोंट दिया, जिस से किरन की मौत हो गई.

आनंद ने किरन के पैरों को उस के दुपट्टे से बांध दिया. फिर नेत्रालय में रखे एक 2 फुट के कार्टन बौक्स और सफेद चादर को उठा लाया. कार्टन बौक्स में आंखों के लेंस आते थे.

उस बौक्स में उस ने किसी तरह किरन की लाश को ठूंसा और कार्टन बंद कर के उसे उसी प्लास्टिक की रस्सी से बांध दिया, जिस से उस ने किरन का गला घोंटा था. इस के बाद कार्टन बौक्स को सफेद चादर से बांध कर रख दिया और रात होने का इंतजार करने लगा.

वह साढ़े 7 घंटे लाश को अपने कमरे में रखे रहा. रात 8 बजे उस ने बौक्स को अपनी हीरो सुपर स्पलैंडर बाइक पर रखा और गजानन नगर में डा. गरिमा बंसल के घर के पास डाल दिया. फिर वहां से चला आया.

लेकिन उस का गुनाह छिप न सका और पकड़ा गया. इंसपेक्टर सत्येंद्र राघव ने आवश्यक कानूनी लिखापढ़ी करने के बाद अतुल कुमार उर्फ आनंद को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया.

साजन की सहेली : वंदना कैसे बनी शिकार – भाग 2

अंसार ने पेशकश की कि अगर वंदना उस के मकान में बहैसियत किराएदार रहने लगे तो सारी मुरादें पूरी हो जाएंगी. दोनों चौबीसों घंटे एकदूसरे की नजरों के सामने रहेंगे और जब भी मौका मिलेगा तब एकांत में मिल भी लिया करेंगे.

जिंदगी के सुखद अनुभवों में से एक को तरस रही वंदना को भला इस पर क्या ऐतराज हो सकता था, लिहाजा वह झट तैयार हो गई. देखते ही देखते वह अब अपने आशिक के मकान में किराएदार के रूप में रहने लगी.

एकांत में मिलने के खतरों और खलल से वंदना तो ज्यादा वाकिफ नहीं थी, लेकिन अंसार को अंदाजा था कि आज नहीं तो कल पकड़े जाएंगे. क्योंकि पास घर होने पर पत्नी हनीफा और बच्चों की नजर उन पर पड़ सकती थी. लिहाजा उस ने बड़े ही शातिराना अंदाज से इस समस्या का भी तोड़ निकाल लिया.

अंसार ने हनीफा को सच बता दिया साथ ही यह इशारा भी कर दिया कि वंदना अपनी सारी पगार उस के घरपरिवार पर खर्च करेगी. उस का मकसद तो महज मौजमस्ती करना है.

हनीफा को सौदा बुरा नहीं लगा क्योंकि अंसार की आमदनी से उस की जरूरतें तो पूरी हो जाती थीं लेकिन सब कुछ खरीद लेने की ख्वाहिशें पूरी नहीं होती थीं. इस के अलावा वह इस बात से भी बेफिक्र थी कि वंदना चूंकि हिंदू है इसलिए अंसार उस से शादी करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा.

लिहाजा उस ने फिल्म ‘जुदाई’ की श्रीदेवी की तर्ज पर कुछ हजार रुपयों के लिए शौहर का बंटवारा मंजूर कर लिया क्योंकि श्रीदेवी की तरह करोड़ों में सोचने और पति को बेचने की उस की हैसियत नहीं थी.अब उर्मिला मातोंडकर बनी वंदना ठाठ से उस के घर के बगल में आ कर रहने लगी. खुद हनीफा ने उसे यह कहते अंसार से जिस्मानी ताल्लुकात बनाने की इजाजत दे दी थी कि अगर अंसार और वह एकदूसरे के साथ तनहाई का कुछ वक्त गुजारना चाहते हैं तो उसे कोई ऐतराज नहीं.

अब दोनों सहेलियों की तरह रहने लगीं. अकसर खुद हनीफा इस बात का खयाल रखने लगी थी कि जब अंसार वंदना के पास हो तो कोई अड़ंगा पेश न आए. नए अहसास और आनंद के सागर में गोते लगा रही वंदना अब अंसार को ही पति मानने लगी थी और उस के घर पर खुले हाथों से खर्च करती थी. अब वंदना और हनीफा ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ की नूतन और आशा पारेख की तरह रह रही थीं.

अंसार के तो दोनों हाथों में लड्डू थे. बासी हो चली हनीफा और ताजीताजी वंदना में जमीनआसमान का फर्क था. लेकिन बीवी से बेईमानी करने का उस का कोई इरादा नहीं था, जिस ने उस की चाहत में कोई रोड़ा नहीं अटकाया था, उलटे मददगार ही बनी थी. लिहाजा जिंदगी मजे से कट रही थी. दिन भर वह बस पर रहता था और वंदना अस्पताल में लेकिन रात होते ही दोनों एक कमरे में एक पलंग पर देह सुख ले रहे होते थे.

कुछ महीने तो मौजमस्ती में गुजरे लेकिन जाने क्यों वंदना को लगने लगा था कि अंसार उस का हो कर भी उस का नहीं है और हनीफा ने कोई दरियादिली नहीं दिखाई है बल्कि उस ने उस के पैसों के लिए पति का सौदा किया है.

यह बात जेहन में आते ही वंदना परेशान हो उठी कि आखिर कब तक वह अंसार की रखैल बन कर रहेगी या फिर उसे रखैल बना कर रखेगी. अंसार पर अपना सब कुछ लुटा चुकी वंदना को लगने लगा था कि अंसार बीवीबच्चों की चाहत में शायद ही उस से शादी करे, लिहाजा उस ने उस के परिवारपर पैसा खर्च करना बंद कर दिया.

इस का नतीजा वही हुआ जिस की वंदना को उम्मीद थी. जब पैसा मिलना बंद हो गया तो हनीफा उस से न केवल खिंचीखिंची रहने लगी बल्कि बेरुखी से भी पेश आने लगी. हनीफा के बदले तेवर देख वंदना ने अंसार पर शादी के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया. इस बाबत वह धर्म परिवर्तन करने को भी तैयार हो गई थी.

जल्द ही दोनों में लड़ाई होने लगी और दोनों एकदूसरे को कोसने लगीं. अब हनीफा के दिल में भी यह डर बैठ गया था कि कहीं ऐसा न हो कि दुनियाजहान को धता बताते हुए अंसार वंदना से शादी कर ही डाले. नए कानून के तहत वह इस बात को ले कर तो बेफिक्र थी कि अंसार उसे तलाक नहीं दे सकता, लेकिन दूसरी शादी तो कर ही सकता था.

इधर अंसार की हालत दो पाटों के बीच पिसने वाले अनाज की तरह होने लगी थी. वह न तो वंदना को छोड़ पा रहा था और न ही हनीफा को. ऐसे में उस ने वंदना से शादी करने को कहा तो वंदना इस जिद पर अड़ गई कि पहले हनीफा को तलाक दो फिर हमारी शादी होगी.

जब बात नहीं बनी तो रोजाना की कलह से बचने के लिए वंदना अलग मकान ले कर रहने लगी. लेकिन इस से अंसार का उस के यहां आनाजाना बंद या कम नहीं हुआ. अब दोनों का डर खत्म हो चला था इसलिए दोनों वंदना के नए घर में मिलने लगे.

वंदना में कशिश भी थी और वह सरकारी नौकरी भी करती थी, इसलिए अंसार को लगा कि क्यों न इस से शादी कर ली जाए. पर वंदना की हनीफा से तलाक की शर्त पूरी कर पाना उस के लिए मुश्किल लग रहा था. जब यह तय हो गया कि दोनों में से किसी एक हाथ का लड्डू तो उसे छोड़ना पड़ेगा, तब उस ने हनीफा से तलाक की बात की.

इस पर हनीफा कांप उठी. अब उसे ‘जुदाई’ की श्रीदेवी की तरह अपनी गलती समझ आ रही थी, लेकिन उस वक्त उस के हाथ में सिवाय पछताने के कुछ नहीं बचा था. अभी तो शौहर ने कहा ही है लेकिन कल को तलाक दे ही दे तो वह क्या कर लेगी, यह सोचते ही हनीफा के दिमाग में एक खतरनाक इरादा पनपने लगा.

4 साल बाद : क्यों किया प्रेमिका से किनारा – भाग 2

हाईकोर्ट पहुंची उमा शुक्ला

हाईकोर्ट ने इस मामले को संज्ञान में लिया और 6 जनवरी, 2020 को एसएसपी एसटीएफ राजीव नारायण मिश्र और वर्तमान थानाप्रभारी दारागंज आशुतोष तिवारी को फटकार लगाई. साथ ही 15 दिनों के अंदर रचना शुक्ला के बारे में कारगर रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया.

हाईकोर्ट के आदेश के बाद एसएसपी राजीव नारायण मिश्र ने एएसपी नीरज पांडेय को आड़े हाथों लिया और काररवाई कर के जल्द से जल्द रिपोर्ट देने का सख्त आदेश दिया. कप्तान के सख्त रवैए से पुलिस ने रचना शुक्ला कांड से संबंधित पत्रावलियों का एक बार फिर से अध्ययन किया.

जांचपड़ताल में उन्होंने सलमान और उस के दोस्त लकी पांडेय को संदिग्ध पाया. अंतत: पुलिस ने 19 जनवरी, 2020 की सुबह सलमान और लकी पांडेय को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. दोनों को गुप्त स्थान ले जा कर पूछताछ की गई.

शुरू में सलमान एएसपी नीरज पांडेय पर अपनी ऊंची पहुंच का रौब झाड़ने लगा, लेकिन उन के एक थप्पड़ में उसे दिन में तारे नजर आने लगे. सलमान उन के पैरों में गिर गया. उस ने अपना जुर्म कबूल करते हुए कहा, ‘‘सर, हमें माफ कर दीजिए. हम से बड़ी भूल हो गई. करीब 4 साल पहले मैं ने, लकी और अपने ममेरे भाई अंजफ के साथ मिल कर रचना की गला रेत कर हत्या कर दी थी. 4 साल पहले हथिगहां में मिली लाश रचना की ही थी.’’

इस के बाद सलमान परतदरपरत हत्या के राज से परदा उठाता चला गया. करीब 4 सालों से राज बनी रचना शुक्ला की हत्या हो चुकी थी. पता चला सलमान और रचना एकदूसरे को प्यार करते थे.

सलमान ने अपनी इस तथाकथित प्रेमिका को मौत के घाट उतार दिया था. रचना शुक्ला के अपहरण और हत्या से परदा उठते ही एसएसपी एसटीएफ राजीव नारायण मिश्र ने अगले दिन यानी 20 जनवरी को पुलिस लाइंस में पत्रकारवार्ता आयोजित की. प्रैस वार्ता में उन्होंने पत्रकारों के सामने रचना शुक्ला के अपहरण और हत्या के आरोपियों सलमान और उस के दोस्त लकी पांडे को पेश किया.

पत्रकारों के सामने सलमान और लकी पांडेय ने अपना जुर्म कबूल किया. साथ ही पूरी घटना भी बताई और वजह भी. रचना की हत्या क्यों और कैसे की गई थी, उस ने इस का भी खुलासा किया. रचना की हत्या की यह कहानी कुछ यूं सामने आई.

19 वर्षीय रचना शुक्ला भाईबहनों में सब से छोटी थी. रचना खूबसूरत युवती थी. जितनी देर तक वह घर में रहती, उस का ज्यादातर समय आइना देखने में बीतता था.

बक्शी खुर्द मोहल्ले के रहने वाले सलमान ने जब दूधिया रंगत वाली खूबसूरत रचना को जातेआते देखा तो वह उस पर मर मिटा. यह बात सन 2014 की है, तब रचना इंटरमीडिएट की छात्रा थी और उम्र थी 19 साल.

रचना उम्र के जिस पड़ाव को पार कर रही थी, वह ऐसी उम्र होती है, जब सहीगलत या अच्छेबुरे की जानकारी नहीं होती. रचना के लिए सलमान का प्यार शारीरिक आकर्षण से ज्यादा कुछ नहीं था.

सलमान एक अमीर बाप की बिगड़ी हुई औलाद था. उस के लिए पैसा कोई मायने नहीं रखता था. जब भी वह घर से बाहर निकलता, राह में कई चाटुकार दोस्त मिल जाते. उन की संगत में वह पैसे खर्च करता तो वे उसी का गुणगान करते.

रसिक सलमान की दिली डायरी में कई ऐसी लड़कियों के नाम थे, जिन के साथ वह मौजमस्ती करता था. इस के बावजूद वह मुकम्मल प्यार की तलाश में था, जहां उस की जिंदगी स्थिर हो जाए. एक ठहराव हो. रचना को देखने के बाद सलमान को अपना सपना पूरा होता लगा. उसे जिस प्यार की तलाश थी, वह रचना पर आ कर खत्म हो गई.

सलमान का प्यार एकतरफा था, क्योंकि इस के लिए रचना ने अपनी ओर से हरी झंडी नहीं दी थी. बाद में जब उस ने सलमान की आंखों में अपने लिए प्यार देखा तो उस का दिल पसीज गया. सलमान घंटों उस के घर के पास खड़ा उस के दीदार के लिए बेताब रहता. रचना चुपकेचुपके सब देखती थी, आखिरकार उस का दिल भी सलमान पर आ गया और उस ने सलमान से इस बात का इजहार भी कर लिया.

पंछी की तरह फंस गई जाल में

फलस्वरूप दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. दोनों ने प्यार में जीनेमरने की कसमें खाईं. सलमान तो निश्चिंत था, लेकिन रचना को यह चिंता सता रही थी कि घर वाले उन दोनों के प्यार को स्वीकार करेंगे या नहीं, क्योंकि दोनों की जाति ही नहीं धर्म भी अलगअलग थे. रचना की मां उमा शुक्ला कट्टर हिंदू थीं. वह बेटी के इस रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं करतीं.

रचना ने सलमान को अपने मन की आशंका बता दी थी. वैसे भी बहुत कम लोग ऐसे हैं जो बेटे या बेटी की शादी दूसरे मजहब के लड़के या लड़की से करना चाहें. खैर, सलमान ने रचना को समझाया और सब कुछ वक्त पर छोड़ देने को कहा. साथ ही कहा कि हम जिएंगे भी एक साथ और मरेंगे भी एक साथ. सलमान की भावनात्मक बातें सुन कर रचना मन ही मन खुश हुई. इतनी खुश कि उस ने सलमान का गाल चूम लिया. सलमान कैसे पीछे रहता, उस ने रचना को बांहों में भर लिया.

सलमान से रचना सच्चे दिल से प्यार करती थी, लेकिन सलमान के मन में तो कुछ और ही चल रहा था. जिस दिन से उस ने रचना को अपनी बांहों में भरा था, उसी दिन से उस के मन में प्यार नहीं बल्कि वासना की आग धधकने लगी थी.

रचना ने सलमान की आंखों में दहकती वासना को महसूस कर लिया था. उस ने उस से कह भी दिया था कि जो तुम मुझ से चाहते हो, वह शादी के पहले संभव नहीं है.

मुझे ऐसी लड़की मत समझना, जो दौलत के लिए सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार हो जाती हैं.

जब से यह बात हुई थी, तब से रचना सलमान से थोड़ा बच कर रहने लगी थी. उस ने मिलना भी कम कर दिया था. सलमान यह सब सह नहीं पा रहा था. इस पर सलमान ने एक दांव खेला. उस ने अपने नाम पर एक स्कूटी खरीदी और रचना को गिफ्ट कर दी. यह देख रचना बहुत खुश हुई.

रचना स्कूटी ले कर घर पहुंची तो घर वाले यह सोच कर हैरान हुए कि उस के पास स्कूटी कहां से आई. घर वालों ने रचना से स्कूटी के बारे में पूछा तो उस ने झूठ बोल दिया कि एक दोस्त की है. कुछ दिनों के लिए वह शहर से बाहर गई है. उस ने स्कूटी मुझे चलाने के लिए दी है. जब वापस लौट आएगी, मैं उसे लौटा दूंगी. बात वहीं की वहीं रह गई.

सलमान ने जो सोच कर रचना को स्कूटी दी थी, वह संभव नहीं हो पाया. स्कूटी हड्डी बन कर उस के गले में अटकी रह गई. महीनों बाद रचना ने प्यार का दम भरने वाले सलमान के सामने एक प्रस्ताव रखा.

उस ने स्कूटी को अपने नाम पर स्थानांतरित कराने के लिए कहा तो सलमान उसे घुमाते हुए बोला, ‘‘जब हम दोनों एक होने वाले हैं तो स्कूटी चाहे तुम्हारे नाम हो या मेरे, क्या फर्क पड़ता है. वक्त आने दो स्कूटी तुम्हारे नाम करा दूंगा. चिंता क्यों करती हो.’’

आनंद का आनंद लोक : किरण बनी शिकार – भाग 2

उस ने बड़े आराम से एक प्रेमपत्र  लिखा. जब वह किरन से मिला तो प्रेमपत्र चुपचाप उस के पर्स में रख दिया.

किरन ने जब घर जा कर पर्स खोला तो उसे पत्र रखा दिखा. उस ने पत्र पढ़ा. जैसेजैसे वह पत्र पढ़ती जा रही थी, वैसेवैसे उस के दिल में भी प्यार का जोश हिलोरे मार रहा था. वह तो इसी इंतजार में थी कि आनंद कब उस से प्यार का इजहार करे. आनंद ने प्रेम का इजहार कर दिया था लेकिन किरन यह सब उस के मुंह से सुनना चाहती थी. इसलिए उस ने पत्र का जबाव नहीं दिया.

जब पत्र का जबाव नहीं मिला तो आनंद बेचैन हो उठा. अगर किरन पत्र पढ़ कर नाराज होती तो उस से संबंध खत्म कर लेती लेकिन उस ने ऐसा भी नहीं किया.

एक दिन आनंद किरन की आंखों में आंखें डाल कर बोला, ‘‘किरन, मेरा दिल तुम्हारे पास है…’’

‘‘क्या…?’’ आश्चर्य में किरन के मुंह से यह शब्द निकला तो आनंद तुरंत बात बदलते हुए बोला,‘‘मेरा मतलब है कि मेरा दिल एक फिल्म देखने का है. फिल्म की मैटिनी शो की 2 टिकटें मेरे पास हैं. आज फिल्म देखने चलते हैं…चलोगी?’’

‘‘क्यों नहीं चलूंगी. वैसे भी पहली बार फिल्म दिखाने के लिए ले जा रहे हो.’’ किरन की बात सुन कर आनंद मुसकराया. फिर दोनों फिल्म देखने सिनेमाघर पहुंच गए. फिल्म शुरू हो गई लेकिन आनंद का दिल फिल्म देखने के बजाय किरन से प्यार करने को मचल रहा था.

कुछ नहीं सूझा तो उस ने अपना हाथ किरन के हाथ पर रख दिया और उस के हाथ को धीरेधीरे सहलाने लगा. किरन ने सोचा कि शायद वह अंधेरे का फायदा उठा कर उस से प्यार का इजहार करना चाहता है, इसीलिए वह फिल्म दिखाने लाया है.

जब काफी देर तक आनंद कुछ नहीं बोला तो किरन झुंझला उठी. इंटरवल होते ही वह आनंद से बोली,‘‘अन्नू, चलो अब मेरा मन फिल्म देखने का नहीं कर रहा है, कहीं और चलते हैं.’’

आनंद को पहली बार किसी ने प्यार का नाम दिया था, अन्नू. उसे किरन पर बहुत प्यार आ रहा था. इस पर आनंद उस के साथ तुरंत बाहर आ गया. थोड़ी देर बाद दोनों एक बाग में बैठे हुए थे. किरन का धैर्य जबाव दे गया था. वह आनंद से बोली,‘‘अन्नू, मुझे न जाने क्यों लगता है कि कई दिनों से तुम मुझ से कुछ कहना चाहते हो, लेकिन संकोचवश कह नहीं पा रहे हो.’’

किरन ने यह बात आनंद की आंखों में आंखें डाल कर कही थी. इस से आनंद का हौसला बढ़ा तो वह बोला,‘‘किरन, मैं ने कई बार तुम तक अपने दिल की बात पहुंचाई लेकिन तुम ने जबाव देना उचित न समझा.’’

‘‘यह भी तो हो सकता है कि मेरा मन उस बात को तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हो.’’ यह सुन कर आनंद चौंका.

उसे उम्मीद की एक किरण दिखी तो उस ने उत्साहित हो कर किरन का हाथ थाम लिया, ‘‘किरन, मैं तुम्हें प्यार करने लगा हूं. यही बात मैं तुम से कहने की कोशिश कर रहा था लेकिन तुम्हारी तरफ से कोई जबाव न मिलने की वजह से मैं बेचैन था. अब मेरी मोहब्बत का आइना तुम्हारे हाथों में है, चाहो तो उस में अपना अक्स देख कर मेरी जिंदगी संवार दो या उस को चकनाचूर कर के मेरी सांसों की डोर तोड़ दो. फैसला कर लो, तुम्हें क्या करना है.’’

आनंद के प्रेम की गहराई देख कर किरन के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई. वह अपना दूसरा हाथ आनंद के हाथ पर रखती हुई बोली, ‘‘अन्नू, मैं भी तुम्हें बहुत चाहती हूं. मैं यह बात जान चुकी थी कि तुम भी मुझ से प्यार करते हो लेकिन जुबां से प्यार का इजहार करने के बजाय तुम दूसरे तरीके अपना रहे थे. इस से मेरी झुंझलाहट बढ़ती जा रही थी.’’

‘‘यह कोई जरूरी नहीं कि प्यार का इजहार जुबां से किया जाए, वह किसी भी तरीके से किया जा सकता है. यह अलग बात है कि तुम्हारे दिल में जुबां से इजहार सुनने की चाहत छिपी थी. लेकिन तुम्हारे जबाव न देने से मेरी कई रातें जागते हुए बीतीं.’’ आनंद ने एक पल में अपने दिल की तड़प को बयान कर दिया.

‘‘खैर जो हुआ सो हुआ. अब आगे से कोई गलती नहीं होगी, प्लीज मुझे माफ कर दो.’’ किरन ने इतनी मासूमियत से कहा कि आनंद ने मुस्कराते हुए उसे सीने से लगा लिया. सीने से लगते ही किरन ने भी प्यार में डूब कर अपनी आंखों के परदे गिरा दिए. दोनों एक अजीब सा सुकून महसूस कर रहे थे. वहां कुछ देर और रूक कर दोनों वापस लौट आए.

प्यार का जादू

इस के बाद तो दोनों के प्यार को मानो पंख ही लग गए. मिलने के लिए आनंद के पास वैसे ही जगह नहीं थी. जिस नेत्रालय में वह रहता था, उस के अलावा  उस का कोई ठिकाना नहीं था. एक दिन उस ने नेत्रालय के उसी कमरे में, जिस में वह रहता था, उस ने किरन के जिस्म से आनंद लेने का मन बना लिया.

वह दिन भी आ गया, जब आनंद ने प्यार के पलों में किरन को बहका लिया और उस के जिस्म से अपने जिस्म का मेल करा दिया. दोनों के मन के साथसाथ तन भी मिल गए. किरन के तन को पा कर आनंद काफी खुश था. इस के बाद तो यह मिलन बारबार दोहराया जाने लगा.

2016 में आनंद ने खुशी नेत्रालय में किरन की भी नौकरी लगवा दी. अब हर समय किरन और आनंद एकदूसरे के साथ होते. उन की मोहब्बत परवान चढ़ती रही.

एक वर्ष बीततेबीतते दोनों के संबंध की जानकारी किरन की मां सरोज को हो गई. यह पता लगते ही उन्होंने किरन की नौकरी छुड़वा दी. लेकिन किरन फिर भी आनंद से मिलती रही.

किरन तो सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि आनंद उस से प्यार का नाटक कर रहा है. शादी का झांसा दे कर वह उस के जिस्म से खेल रहा है.

इस बीच किरन से विवाह के लिए कई रिश्ते आए. लेकिन उस ने मना कर दिया. उस के चक्कर में उस की छोटी बहन कविता का विवाह भी नहीं हो सकता था. किरन की मां सरोज व भाई सागर को मथुरा का एक अच्छा परिवार मिल गया.