पिता को रास ना आया बेटी का प्यार – भाग 3

बेटी के बारे में यह सब सुन कर सुमन सन्न रह गई. इस का मतलब साफ था कि उन की बेटी इतनी बड़ी हो गई थी कि उन की आंखों में धूल झोंक सके. उन्होंने तुरंत प्राची को बुला कर डांटते हुए पूछा, ‘‘तू उस आयुष्मान के साथ कहां घूमती फिर रही थी?’’

‘‘कौन आयुष्मान?’’ प्राची ने इस तरह पूछा जैसे वह किसी आयुष्मान को जानती ही न हो.

‘‘झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है. मैं विशाल के भांजे आयुष्मान की बात कर रही हूं. इस मोहल्ले में इस नाम का कोई दूसरा लड़का नहीं है. इस से तुझे पता होना चाहिए कि मैं उसी आयुष्मान की बात कर रही हूं.’’

‘‘मैं उस के साथ क्यों घूमूंगी?’’ प्राची तुनक कर बोली.

प्राची ने यह बात इतनी सफाई से कही थी कि सुमन को लगा कि उस की पड़ोसन को ही धोखा हुआ है. इसलिए उन्होंने बात बढ़ाना उचित नहीं समझा और हिदायत दे कर बेटी को छोड़ दिया. इस के बाद प्राची खुद तो सतर्क हो ही गई, अपने प्रेमी आयुष्मान को भी सतर्क कर दिया. उस ने आयुष्मान से साफसाफ कह दिया कि अब उन्हें काफी सोचसमझ कर और बच कर मिलना होगा.

सुमन तो बेटी की बात मान कर शांत हो गई थी, लेकिन जब कई लोगों ने अजीत शुक्ला को टोका कि वह अपनी बेटी पर नजर रखें, वरना एक दिन वह उन के मुंह पर कालिख पोत देगी, तब घर में बवंडर मच गया.

अजीत को जैसे ही पता चला कि प्राची आयुष्मान से मिलती है, उन्होंने यह बात सुमन से कही. तब पतिपत्नी ने सलाह की कि जवान हो रही बेटी को समझाया जाए. शायद वह रास्ते पर आ जाए. उन्होंने प्राची को पास बैठा कर कैरियर का हवाला दे कर काफी समझायाबुझाया. लेकिन प्राची पर मांबाप के इस समझानेबुझाने का कोई असर नहीं हुआ.

प्राची ने मांबाप के सामने तो कह दिया कि अब वह आयुष्मान से नहीं मिलेगी, लेकिन उस ने उस से मिलना बंद नहीं किया. हां, वह मिलने में सावधानी जरूर बरतने लगी थी. इस के बावजूद शहजहांपुर जैसे छोटे शहर में उन पर किसी न किसी की नजर पड़ ही जाती थी. तब उन की हरकतों का पता अजीत को चल जाता था.

अजीत की गिनती मोहल्ले के प्रतिष्ठित लोगों में होती थी. कोई चारा न देख अजीत शुक्ला ने सरायकाइयां का विशाल के पास वाला मकान छोड़ दिया और कुछ दूरी पर स्थित दलेलगंज में दूसरा मकान ले कर रहने लगे. इस के अलावा प्राची पर भी नजर रखी जाने लगी. प्राची को रोज सुबह वह स्वयं मोटरसाइकिल से कालेज छोड़ने जाते और शाम को ले भी आते.

रास्ते में भले ही प्राची और आयुष्मान की मुलाकात नहीं हो पाती थी, लेकिन दिन में तो उन पर कोई नजर  रखता नहीं था. प्राची क्लास छोड़ कर आयुष्मान के साथ निकल जाती. दिन भर दोनों घूमतेफिरते और छुट्टी होने के पहले आयुष्मान उसे कालेज में छोड़ देता. तब प्राची बाप के साथ घर आ जाती.

रोज की तरह 13 नवंबर को भी अजीत शुक्ला प्राची को कालेज छोड़ कर अपनी दुकान पर चले गए. इस के थोड़ी देर बाद आयुष्मान अपनी मोटरसाइकिल से प्राची के कालेज के गेट पर पहुंचा तो प्राची कालेज छोड़ कर उस के साथ निकल गई. दोनों थोड़ी दूर ही गए होंगे कि प्राची के ताऊ के बेटे राहुल शुक्ला की नजर उन पर पड़ गई. उस ने यह बात फोन कर के अपने चाचा अजीत शुक्ला को बताई तो उन्होंने राहुल से उन दोनों का पीछा करने को कहा.

राहुल अपनी मोटरसाइकिल से उन का पीछा करने लगा. प्राची ने राहुल को पीछा करते देख लिया तो उस ने यह बात आयुष्मान को बताई. इस के बाद आयुष्मान ने अपने मामा विशाल को फोन कर के ककराकलां आने को कहा.

दूसरी ओर बेटी की हरकत से नाराज अजीत शुक्ला ने लाइसेंसी राइफल उठाई और बेटे रजत को साथ ले कर प्राची के प्रेमी आयुष्मान को सबक सिखाने के लिए मोटरसाइकिल से निकल पड़े. ककराकलां में पानी की टंकी के पास अजीत शुक्ला ने राहुल और रजत की मदद से आयुष्मान और प्राची को घेर लिया. उन में बहस और हाथापाई होने लगी. तभी विशाल भी अपनी मारुति वैगनआर से ड्राइवर वरुण के साथ वहां पहुंच गया.

वादविवाद बढ़ता ही गया. अंतत: अजीत ने अपनी 315 बोर की राइफल से आयुष्मान पर फायर कर दिया. लेकिन आयुष्मान थोड़ा पीछे हट गया, जिस से निशाना चूक गया और वह गोली उस के दाएं हाथ में लगी.

अजीत दूसरी गोली न चला दे, इस के लिए सभी उस की राइफल छीनने लगे. इस छीनाझपटी में राइफल का ट्रिगर दब गया, जिस से चली गोली प्राची की बाईं तरफ कमर में जा कर लगी, जो उस के शरीर को भेदती हुई दाईं ओर से बाहर निकल गई. प्राची जमीन पर गिर कर तड़पने लगी.

बेटी को गोली लगते ही अजीत राइफल ले कर भाग खड़ा हुआ. प्राची के भाई रजत ने घायल प्राची को विशाल की कार में डाला और जिला अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने जांच कर के उसे मृत घोषित कर दिया. अस्पताल से ही इस घटना की सूचना स्थानीय थाना कोतवाली सदर बाजार को दी गई. परिणामस्वरूप कोतवाली प्रभारी इंस्पेक्टर आलोक सक्सेना सहयोगियों को साथ ले कर अस्पताल पहुंच गए.

पुलिस ने प्राची के भाई रजत शुक्ला को हिरासत में ले लिया. घटनास्थल से पुलिस ने राइफल की खाली मैगजीन और एक जिंदा कारतूस बरामद किया. आयुष्मान जिला अस्पताल में भर्ती था. पुलिस ने आयुष्मान से घटना के बारे में पूछताछ की और औपचारिक काररवाई निपटा कर प्राची के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.  पुलिस ने रजत को ला कर पूछताछ की. इस पूछताछ में उस ने पूरी कहानी बता दी, जिसे आाप ऊपर पढ़ ही चुके हैं.

इंस्पेक्टर आलोक सक्सेना ने आयुष्मान के नाना हरिकरननाथ मिश्र को वादी बना कर अजीत शुक्ला. रजत शुक्ला और राहुल शुक्ला के खिलाफ अपराध संख्या 842/2013 पर भादंवि की धारा 302, 307, 504, 506 के तहत मुकदमा दर्ज कर रजत को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक अजीत और राहुल शुक्ला को पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकी थी. पुलिस सरगर्मी से दोनों की तलाश कर रही थी. पोस्टमार्टम के बाद प्राची का अंतिम संस्कार किया जा चुका था. आयुष्मान की हालत खतरे से बाहर थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सुहाग की कातिल : देवर के प्यार में किया पति का क़त्ल – भाग 3

छिप न सका देवरभाभी का प्यार

रेनू को खानेपीने की कोई कमी न थी. बदन चमकता रहता. चलती तो ऐसा लगता जैसे अभी जवानी छलक पड़ेगी. गांव गली की कई औरतें उस का गदराया बदन देख कर जलती थीं और कुछ मनचले और शोहदे उसे पाने के लिए हमेशा ही लालायित रहते. उन्हीं में एक मोहित भी था. वह बृजेश के चाचा रामेश्वर का बेटा था और रिश्ते में उस का चचेरा भाई था.

मोहित के घरवालों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. बृजेश ने उसे अपने खेतों पर काम करने के लिए रख लिया था. बदले में मजदूरी के रूप में पैसे देता था. मोहित का कसरती बदन था. वह कदकाठी से भी आकर्षक लगता था. रेनू उसे बहुत मानती थी. वह जब भी घर आता था, रेनू उसे चायनाश्ता कराती और उस से खूब बतियाती थी.

लेकिन मोहित के मन में तो कुछ और ही चल रहा था. आजकल वह जब भी रेनू को देखता, उस का गदराया जिस्म देखते ही उस के मुंह में पानी आ जाता. उधर रेनू भी मोहित की कदकाठी देख कर मचल उठती. सोचती, काश! उस का भी मर्द इसी तरह का होता तो कितना अच्छा होता. क्या मर्दानगी है मोहित की, लेकिन नारी सुलभ लज्जा के कारण कभी वह दिल की बात जुबां पर न ला पाती.

लेकिन यह सच था कि रेनू के मन में मोहित को ले कर हलचल शुरू हो गई थी. इसलिए वह उस का अतिरिक्त खयाल रखती थी. सोचती थी कि आज नहीं तो कल जरूर वह उस की भावनाओं को समझेगा. हुआ भी यही, मोहित धीरेधीरे उस के नजदीक आता गया. उस के आगे रेनू को अब अपना पति बेकार लगता था. रातरात भर वह उसी के साथ हमबिस्तर होने की कल्पनाओं में डूबती उतराती थी.

रेनू की बेचैनी अब दिनरात बढ़ती जा रही थी. कभीकभी तो मोहित को देखते ही वह अपना आंचल इस तरह छाती से ढुलका देती, जैसे वह उसे खुला आमंत्रण दे रही हो. आखिर मोहित कब तक चाहत की आग में सुलगता रहता. एक दिन सारे नातेरिश्तों को भूल कर उस ने भाभी को अपने आगोश में भींच ही लिया और दोनों आंधीतूफान की तरह एकदूसरे में समा गए थे.

रेनू अपने मकसद में कामयाब हो गई. कुंवारे देवर से उसे जो परम आनंद मिला, उस के आगे पति बृजेश कहीं नहीं टिकता था. मोहित ने उसे पहली बार में ही पीस कर रख दिया था. उस की मर्दानगी पर रेनू निछावर थी. तन और धन सब कुछ उस ने उसे अर्पित कर दिया. दिल की लगी अपने उफान पर थी. रेनू को जैसे ही मौका मिलता, वह मोहित को इशारे से बुला लेती थी और फिर दोनों एकदूसरे में समा जाते थे. 7-8 महीने तक देवरभाभी का प्यार चोरीछिपे चलता रहा. किसी को कानोंकान खबर नहीं लगी.

उस के बाद अड़ोसपड़ोस की औरतों को उन पर शक होने लगा. बृजेश को भी भनक लगी, तब तो उस के कान खड़े हो गए. उस ने सपने में भी ऐसा नहीं सोचा था. बृजेश पाल अब पत्नी और मोहित पर पूरी तरह से नजर रखने लगा था. रेनू को पति की निगरानी का पता न था. वह मोहित के साथ पहले की ही तरह मिलती रही. आखिर एक दिन बृजेश ने उन दोनों को रंगेहाथ पकड़ लिया. उस का खून खौल उठा. रेनू का चेहरा पीला पड़ गया. मोहित तो ऐसे भागा था, जैसे गधे के सिर से सींग.

बृजेश ने कर दी मोहित की पिटाई

बृजेश पाल का सारा गुस्सा पत्नी पर ही फूटा था. उस ने खूब उसे मारापीटा था. बाद में जब रात में दोनों बिस्तर पर गए थे तो बृजेश ने रेनू को समझाया भी था, “लोग कहते हैं कि औरत को अगर नाक न हो तो वह मैला भी खा ले, लेकिन मैं नहीं मानता. सच तो यह है कि मर्द ही मनचले होते हैं. मुझे अच्छी तरह से पता है कि जरूर तुम्हारे साथ मोहित ने मनमानी की होगी, वरना तुम कभी न बहकती. तुम 2 बच्चों की मां हो, भला ऐसा कैसे कर सकती हो?”

बृजेश पाल की बातें सुन कर रेनू की जान में जान आई. वह हफ्ता-10 दिन ठीक रही, उस के बाद फिर दोनों तनमन की आग बुझाने लगे. साथ ही पूरी सावधानी भी बरतते थे. इस के बावजूद एक रोज फिर दोनों को रंगरेलियां मनाते हुए बृजेश ने पकड़ लिया. रेनू के पास अब कोई जवाब न था. उस ने उस की जम कर पिटाई की.

इस बार बृजेश ने रेनू के साथसाथ मोहित की भी जम कर पिटाई की और उसे हिदायत दी, “तू मेरा चचेरा भाई नहीं दुश्मन है. भाई हो कर तूने मेरी इज्जत पर डाका डाला. आस्तीन के सांप, तू कान खोल कर सुन ले. आज के बाद अगर तू मेरे घर में दिखाई दे गया तो तेरा काम तमाम कर दूंगा.”

उस समय तो मोहित और रेनू ने उस से माफी मांग ली थी, लेकिन बाद में वे फिर अपने पुराने ढर्रे पर चलने लगे. बृजेश की धमकी से मोहित और रेनू डर तो गए थे, लेकिन मन ही मन दोनों बृजेश से खुन्नस रखने लगे थे. बृजेश पत्नी की इस बेवफाई से इतना टूट गया था कि वह शराब में डूबा रहने लगा. वह गुस्से में अकसर रेनू की पिटाई करता रहता था.

शराबखोरी से बृजेश का शरीर तो खोखला हो ही गया, उस की आर्थिक स्थिति भी खराब हो गई. वह कर्जदार हो गया. कर्ज उतारने के लिए बृजेश नोएडा चला गया. वहां उस का एक रिश्तेदार रहता था. वह किसी फैक्ट्री में काम करता था. बृजेश ने उसे कर्ज वाली बात बताई तो उस ने उसे अपनी ही फैक्ट्री में नौकरी दिलवा दी. यह बात अगस्त, 2022 की है.

विचित्र संयोग : चक्रव्यूह का भयंकर परिणाम – भाग 7

धनंजय को अगले दिन कोर्ट में पेश करना था. उस रात प्रकाश राय देर तक औफिस में ठहरे थे. एक सिपाही से उन्होंने धनंजय को अपने पास बुलवाया और उसे कुर्सी पर बैठा कर बोले,”धनंजय, मेरा काम पूरा हो गया है. कल तुम्हें जेल भेजने के बाद हमारी मुलाकात कोर्ट में होगी. मुझे मालूम है कि तुम कुछ न कुछ छिपा रहे हो. मैं सत्य जानने के लिए उत्सुक हूं. अब तुम मुझे कुछ भी बतोओगे, उस का कोई लाभ नहीं होगा, क्योंकि तुम्हारे सारे कागजात तैयार हो गए हैं. उस में परिवर्तन नहीं हो सकता है. तुम जो कुछ भी बताओगे, वह मेरे तक ही सीमित रहेगा. अब मुझे बताओ कि तुम ने आनंद और आनंदी को रोहिणी की हत्या की खबर क्यों नहीं दी और आनंदी के फोन नंबर का ‘जी’ तुम ने क्यों फाड़ डाला?”

धनंजय गंभीर हो गया. उस की आंखों में आंसू भर आए. कुछ क्षणों बाद खुद को संभालते हुए बोला, “जो सच है, मैं सिर्फ आप को बता रहा हूं. एक सुखी परिवार को नष्ट करना या बचाना, आप के हाथ में है. पर मुझे विश्वास है कि आप यह बात किसी और को नहीं बताएंगे.

“आगरा में रोहिणी की मौसेरी बहन का विवाह था. उसी विवाह में हम आगरा गए थे. विवाह के बाद शताब्दी एक्सप्रेस से हम लौट रहे थे तो हमारी मुलाकात आनंद और आनंदी से हो गई. वे सामने की सीट पर बैठे थे. मैं 2-3 पैग पिए हुए था, फिर भी मुझे नींद नहीं आ रही थी. उस समय मेरी नींद उड़ गई थी.”

“ऐसा क्यों?”

“मेरे सामने बैठी आनंदी और कोई नहीं, मेरी प्रेमिका थी. हम दोनों एकदूसरे को जीजान से चाहते थे.”

“क्या?” प्रकाश राय की आंखें हैरानी से फैल गईं, “अच्छा, फिर क्या हुआ?”

“मेरी क्या हालत हुई होगी, आप अंदाजा लगा सकते हैं. पास में पत्नी बैठी थी और सामने प्रेमिका, वह भी अपने पति के साथ. मुझे देखते ही आनंदी भी परेशान हो गई थी. मैं असहज मानसिक अवस्था और बेचैनी के दौर से गुजर रहा था, वह भी उसी दौर से गुजर रही थी. सचसच कहूं तो हम दोनों ही अपने ऊपर काबू नहीं रख पा रहे थे.

“इस मुलाकात के असर से उबरने में मुझे 4 दिन लगे. तब मुझे नहीं मालूम था कि एक चक्रव्यूह से निकल कर मैं दूसरे चक्रव्यूह में फंस गया हूं. तब मैं यह भी नहीं जानता था कि इस दूसरे चक्रव्यूह से निकलने के लिए मुझे रोहिणी की हत्या करनी पड़ेगी. खैर…

“ट्रेन में आनंदी और रोहिणी की गप्पें जो शुरू हुईं तो थोड़ी देर बाद वे एकदूसरे की पक्की सहेली बन गईं. आनंदी 2-3 बार मेरे घर भी आई थी. खुदा का लाख शुक्र था कि हर बार मैं घर पर नहीं रहा. मैं आनंदी से मिलना भी नहीं चाहता था. मैं उस से संबंध बढ़ा कर रोहिणी को धोखा देना नहीं चाहता था. इसलिए रोहिणी और आनंदी की बढ़ती दोस्ती से मैं चिंतित था.”

धनंजय सांस लेने के लिए रुका. प्रकाश राय को लगा, कुछ कहने के लिए वह अपने आप को तैयार कर रहा है. उन का अंदाजा गलत नहीं था. धनंजय भारी स्वर में बोला, “एक दिन ऐसी घटना घटी कि मैं पागल सा हो गया. मुझे लगा, मेरे दिमाग की नसें फट जाएंगी. अपने सिर को दोनों हाथों से थाम कर मैं जहां का तहां बैठ गया. अपने आप पर काबू पाना मुश्किल हो गया.

मैं कंपनी के काम से सेक्टर-18 गया था. वहां एक होटल में मैं ने रोहिणी को एक युवक के साथ सटी हुई बैठी देखा, हकीकत जाहिर करने के लिए यह काफी था. मैं यह जानता था कि उस होटल में रूम किराए पर मिलते थे. मैं उस होटल से थोड़ी दूरी पर ही बैठ कर कल्पना से सब देखता रहा. खून कैसे खौलता है, मैं ने उसी वक्त महसूस किया. 12 बजे उस होटल में गई रोहिणी 4 बजे बाहर निकली थी.

“इसके बाद कुछ दिनों की छुट्टी  ले कर मैं ने रोहिणी का पीछा किया. अनेक बार रोहिणी मुझे उसी युवक के साथ दिखाई दी. वह युवक और कोई नहीं, आनंद था…आनंदी का पति.”

धनंजय ने आंखों में भर आए आंसुओं को पोंछा. प्रकाश राय स्तब्ध बैठे थे, पत्थर की मूर्ति बने. थोड़ी देर बाद शांत होने पर धनंजय बोला, “कैसा अजीब इत्तफाक था. विवाह से पहले मेरी प्रेमिका के साथ मेरे शारीरिक संबंध थे और विवाह के बाद मेरी प्रेमिका के पति के साथ मेरी पत्नी के शारीरिक संबंध. आनंदी को तो मैं पहले से जानता था, लेकिन रोहिणी और आनंद की पहचान तो शताब्दी एक्सप्रेस में हुई थी.

यात्रा के दौरान जिस चक्रव्यूह में मैं फंसा था, उस से निकलने के लिए मैं ने रोहिणी को हमेशा के लिए मिटा दिया और आनंदी मेरी नजरों के सामने न आए, इसीलिए मैं ने टेलीफोन डायरी से ‘जी’ पेज फाड़ दिया था. मुझे जो भी सजा होगी, इस का मुझे जरा भी रंज नहीं होगा. मैं खुशीखुशी सजा भोग लूंगा. बस यही है मेरी दास्तान.”

इस केस की बदौलत आनंद और आनंदी से प्रकाश राय की जानपहचान हो गई थी. कुछ दिनों बाद आनंद से उन्हें एक ऐसी बात पता चली कि उन का सिर चकरा कर रह गया था. जबजब आनंद और आनंदी उन के सामने आते थे, वह बेचैन हो जाते थे और सोचने पर मजबूर हो जाते थे कि काश, धनंजय और आनंदी एवं रोहिणी और आनंद का विवाह हो गया होता.

एक दिन बातचीत में आनंद ने कहा, “मुझे धनंजय की सजा का दुख नहीं है. अच्छा ही हुआ, उसे सजा होनी भी चाहिए. मुझे दुख है तो रोहिणी का. मैं ने आप से कहा था कि रोहिणी की और मेरी मुलाकात शताब्दी एक्सप्रेस में हुई थी. रोहिणी को देख कर मैं अभेद्य चक्रव्यूह में फंस गया था. आगरा से दिल्ली तक की यात्रा के घंटे मैं ने कैसे बिताए, मैं ही जानता हूं, क्योंकि मेरे सामने बैठी रोहिणी कोई और नहीं, मेरी पूर्व प्रेमिका थी.”

यह सुनते ही प्रकाश राय के होश फाख्ता होतेहोते बचे. विचित्र था संयोग और भयानक थी भाग्य की विडंबना. क्या सचमुच नियति के खेल में मनुष्य मात्र खिलौना होता है?

(कथा सत्य घटना पर आधारित है, किसी का जीवन बरबाद न हो, कथा में स्थानों एवं सभी पात्रों के नाम बदले हुए हैं)

अपनों के खून से रंगे हाथ : ताइक्वांडो कोच को मिली सजा

पिता को रास ना आया बेटी का प्यार – भाग 2

आग दोनों तरफ लग चुकी थी. दिन तो किसी तरह बीत जाता था, लेकिन रात काटनी मुश्किल हो जाती थी. रोज रात को दोनों सोचते कि कल अपने दिल की बात जरूर कह देंगे. लेकिन सुबह होने पर हिम्मत नहीं पड़ती. दोनों एकदूसरे के नजदीक आते तो उन के दिलों की धड़कन इतनी तेज हो जाती कि दिल की बात जुबां पर आ ही नहीं पाती. होंठों पर जीभ फेरते हुए दोनों अपनेअपने रास्ते चले जाते.

आखिर जब रहा और सहा नहीं गया तो आयुष्मान ने अपने दिल की बात कहने का वही पुराना तरीका अख्तियार करने का विचार किया, जिसे अकसर इस तरह के प्रेमी इस्तेमाल करते आ रहे हैं. उस ने अपने दिल की बेचैनी एक कागज पर लिख कर प्राची तक पहुंचाने का विचार किया. रोज की तरह उस दिन भी प्राची कालेज के लिए निकली तो आयुष्मान अपनी निश्चित जगह पर उस का इंतजार करता दिखाई दिया. जैसे ही प्राची उस के नजदीक पहुंची, उस ने रात में लिखा वह प्रेमपत्र प्राची के सामने धीरे से फेंक दिया और बिना नजरें मिलाए चला गया.

प्राची ने इधरउधर देखा और फिर डरतेडरते वह कागज चुपके से उठा कर अपने बैग में डाल लिया. कालेज पहुंचते ही सब से पहले एकांत में जा कर उस ने उस कागज को निकाला. उस की जिज्ञासा उस कागज में लिखे मजमून पर थी.

उस ने उस कागज को जल्दी से खोला. उस में लिखा था—

‘प्रिय प्राची,

मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं. मुझे मालूम है कि तुम भी मुझे उतना ही प्यार करती हो, फिर भी मैं तुम से यह बात कहने की हिम्मत नहीं कर सका. तुम्हारे करीब पहुंचते ही पता नहीं क्यों शब्द ही जुबान से नहीं निकलते. इसीलिए दिल की बात इस कागज पर लिख कर भेज रहा हूं. मुझे पूरा विश्वास है कि तुम्हारे मन में भी वही सब है, जो मेरे मन में है. फिर भी एक बार जानना चाहता हूं. तुम भी अपने दिल की बात इसी तरह कागज पर उतार कर मुझ तक पहुंचा सकती हो.

—तुम्हारे प्यार में पागल, आयुष्मान’

कागज के उस टुकड़े का एकएक शब्द प्राची के दिल में उतर गया. पत्र पढ़ कर उस का दिल बल्लियों उछलने लगा, क्योंकि उस के मन की मुराद पूरी हो गई थी. वह खुद को बहुत ही सौभाग्यशाली समझ रही थी. उस ने अपने दिल को आयुष्मान को समर्पित करने का निर्णय ले लिया. उस ने भी जवाब में आयुष्मान को पत्र लिख कर उसी तरह दे दिया, जिस तरह आयुष्मान ने उसे दिया था.

पत्र मिलने के बाद आयुष्मान के मन में जो भी आशंकाएं थीं, सब समाप्त हो गईं. अब वह हमेशा प्राची के बारे में ही सोचता रहता. उस ने प्राची को ले कर जो सपने देखे थे, वे पूरे होते दिखाई दे रहे थे. दोनों चोरीछिपे मिलने लगे तो उन का प्यार परवान चढ़ने लगा. पत्रों से शुरू हुआ प्यार वादों,कसमों, रूठनेमनाने से ले कर साथसाथ जीनेमरने की प्रतिज्ञाओं तक पहुंच गया. दोनों ने ही मुलाकातों के दौरान सौगंध ली कि वे अपने प्यार को मंजिल तक पहुंचा कर ही दम लेंगे, इस के लिए उन की जान ही क्यों न चली जाए.

आयुष्मान त्रिपाठी उर्फ मोनू सीतापुर जनपद के माहोली कस्बा के रहने वाले जयप्रकाश त्रिपाठी और विनीता त्रिपाठी का एकलौता बेटा था. एकलौता होने की वजह से वह मांबाप का काफी लाडला था. यह बात उन दिनों की है, जब वह बीए की पढ़ाई कर रहा था. उस का ननिहाल जिला शाहजहांपुर के थाना रामचंद्र मिशन के सरायकाइयां मोहल्ले में था.

उस के नाना हरिकरननाथ मिश्र की फलों की आढ़त थी. उन के इस काम में उन का बेटा विशाल उर्फ भोला मदद करता था. आयुष्मान ज्यादातर ननिहाल में ही रहता था. नाना के यहां रहने में ही उस की नजर नाना के घर के करीब रहने वाली प्राची पर पड़ी तो पहली ही नजर में वह उसे इस तरह भायी कि जब तक वह उसे एक नजर देख नहीं लेता, उसे चैन नहीं मिलता था.

प्राची के पिता अजीत शुक्ला का शाहजहांपुर के केरूगंज में मैडिकल स्टोर था. उन के परिवार में पत्नी सुमन के अलावा 2 बेटे रजत, रितिक और एक बेटी प्राची थी. रजत बरेली से बीटेक कर रहा था, जबकि प्राची आर्य कन्या महाविद्यालय से बीएससी कर रही थी. उस से छोटा रितिक 9वीं कक्षा में पढ़ रहा था. एकलौती बेटी होेने की वजह से प्राची भी मांबाप की लाडली थी.

किशोरावस्था में कदम रखते ही हसीन ख्यालों में खोने का जैसे ही समय आया, कालेज आनेजाने में आयुष्मान की नजर उस पर पड़ी तो वह उस के दिल में उतर गई. इस की वजह यह थी कि वह इतनी सुंदर थी कि आयुष्मान तो क्या, किसी के भी दिल में उतर सकती थी. संयोग से वह आयुष्मान को भायी तो आयुष्मान भी उसे भा गया. इसलिए आयुष्मान की चाहत जल्दी ही पूरी हो गई.

प्यार का इजहार हो गया तो प्राची और आयुष्मान घर वालों से चोरीछिपे पार्कों और रेस्तराओं में मिलने लगे. दोनों जब भी मिलते, उन्हें लगता कि दुनियाजहान की खुशी मिल गई है. बीए करने के बाद आयुष्मान शाहजहांपुर में नाना के यहां रह कर मामा की मदद करने लगा था. दोनों के पास एकदूसरे के मोबाइल नंबर थे, इसलिए समय मिलने पर वे लंबीलंबी बातें भी करते थे. इस से उन की करीबियां और बढ़ती गईं.

प्राची के घर में किसी को भी पता नहीं था कि उस के कदम बहक चुके हैं. वह एकलौती बेटी थी, इसलिए उस के पापा अजीत शुक्ला चाहते थे कि पढ़लिख कर वह उन का नाम रोशन करे. जबकि उन की बेटी पढ़ाई को भूल कर कुछ और ही गुल खिला रही थी. कोई भी मातापिता नहीं चाहता कि बेटी प्यारमोहब्बत में पड़े.

इस की वजह यह है कि हमारा समाज आज भी इसे अच्छा नहीं मानता. लेकिन प्यार करने वाले इस की परवाह नहीं करते. उन की अपनी अलग ही दुनिया होती है. वे स्वयं की रचीबुनी सपनीली दुनिया में खोए रहते हैं. ऐसी ही सपनीली दुनिया में आयुष्मान और प्राची भी खो गए थे.

धीरेधीरे 2 साल बीत गए. इस बीच किसी को उन के प्यार की भनक नहीं लगी. लेकिन यह ऐसी चीज है, जो कभी न कभी सामने आ ही जाती है. आखिर एक दिन प्राची और आयुष्मान के प्यार की सच्चाई प्राची के घर वालों के सामने आ गई. मोहल्ले की किसी औरत ने प्राची और आयुष्मान को एक साथ देख लिया तो उस ने यह बात प्राची की मां सुमन को बता दी.

                                                                                                                                          क्रमशः

सुहाग की कातिल : देवर के प्यार में किया पति का क़त्ल – भाग 2

निरीक्षण के बाद एसपी विनोद कुमार ने मौके की काररवाई पूरी करा कर शव पोस्टमार्टम हेतु मैनपुरी के जिला अस्पताल भिजवा दिया. उस के बाद उन्होंने बृजेश पाल मर्डर केस का खुलासा करने के लिए सीओ चंद्रकेश सिंह की अगुवाई में एक पुलिस टीम का गठन कर दिया. इस टीम में एसएचओ अमित सिंह, एसआई दिनेश कुमार, देवदत्त, कांस्टेबल दीपू पाल, विपिन यादव तथा महिला कांस्टेबल डिंपल रानी को सम्मिलित किया गया.

इस गठित पुलिस टीम ने सब से पहले घटनास्थल का निरीक्षण किया फिर मृतक बृजेश पाल की पत्नी रेनू से पूछताछ की. उस ने बताया कि 26 जनवरी, 2023 को परिवार में शादी समारोह था. उसी में शामिल होने रात 8 बजे वह गए थे. उस के बाद वह घर वापस नहीं आए. आज सुबह 9 बजे ससुर बेचेलाल ने खेत में लाश पड़ी होने की खबर दी तब मैं उन के साथ खेत पर गई और लाश की पहचान पति के रूप में की. उन की गांव में न तो किसी से दुश्मनी थी और न ही किसी से लेनदेन का झंझट था. पता नहीं किस ने और क्यों पति की हत्या कर दी.

रेनू घूंघट के भीतर से जिस बेबाकी से जवाब दे रही थी, उस से पुलिस टीम को कुछ शक हुआ. उस की आंखों में न तो आंसू थे और न ही बेचैनी. इसी बीच महिला कांस्टेबल डिंपल रानी ने बहाने से उस का मोबाइल फोन ले लिया. हालांकि मोबाइल फोन देने में उस ने तमाम बहाने बनाए, लेकिन जब डिंपल ने उसे डपटा तो उस ने चोली से निकाल कर फोन थमा दिया.

रेनू पर जताया शक

रेनू से पूछताछ के बाद पुलिस टीम ने मृतक बृजेश पाल के भाई राजेश पाल से जानकारी हासिल की. राजेश ने बताया कि उस का भाई सीधासादा था, जबकि उस की पत्नी रेनू चंचल स्वभाव की थी. दोनों में पटती नहीं थी. अकसर इन में झगड़ा होता रहता था. इस की वजह चचेरे भाई मोहित पाल का उस के घर आनाजाना था. यानी देवरभाभी के बीच प्रेम प्रसंग था. उसी को ले कर दोनों में झगड़ा होता रहता था. उस ने मोहित और रेनू पर ही भाई की हत्या का शक जाहिर किया.

इधर पुलिस ने रेनू का मोबाइल फोन खंगाला तो 26 जनवरी की रात 8 बजे से 12 बजे के बीच रेनू ने कई बार एक नंबर पर काल की थी. पुलिस ने इस नंबर की जानकारी जुटाई तो पता चला वह नंबर रेनू के चचेरे देवर मोहित पाल का है. पुलिस को अब यकीन हो गया था कि बृजेश की हत्या में उस की पत्नी रेनू पाल व चचेरे भाई मोहित पाल का हाथ है.

शक के आधार पर पुलिस टीम ने मोहित व रेनू के घर दबिश दी तो वे दोनों अपनेअपने घर से फरार मिले. इस के बाद पुलिस टीम ने तेजी दिखाई और कई स्थानों पर दविश दी. सुबह 4 बजे पुलिस टीम को एक खबरिया के जरिए पता चला कि मोहित व रेनू इस समय फर्दपुर तिराहे पर मौजूद है. सटीक सूचना के आधार पर पुलिस टीम ने मोहित व रेनू को फर्दपुर तिराहे से गिरफ्तार कर लिया. दोनो को थाना बिछुआ लाया गया.

देवरभाभी हुए गिरफ्ता

थाने में पुलिस टीम ने मोहित और रेनू से अलगअलग पूछताछ की. मोहित शुरू में तो पुलिस को गुमराह करता रहा, लेकिन पुलिस टीम ने जब सख्त रुख अपनाया तो वह टूट गया और चचेरे भाई बृजेश की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया.

मोहित के टूटते ही रेनू भी टूट गई और उस ने भी प्रेमी संग पति की हत्या करने का जुर्म कबूल कर लिया. मोहित की निशानदेही पर पुलिस ने आलाकत्ल खून से सनी ईंट भी बरामद कर ली, जो उस ने नाले किनारे झाडिय़ों में छिपा दी थी.

पुलिस टीम ने बृजेश पाल की हत्याकांड का भेद खोलने और हत्यारोपियों को गिरफ्तार करने की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी तो एसपी विनोद कुमार ने पुलिस लाइन सभागार में प्रैसवात्र्ता कर बृजेश मर्डर केस का खुलासा कर दिया.

चूंकि हत्यारोपियों ने जुर्म कुबूल कर लिया था और आलाकत्ल भी बरामद करा दिया था, अत: एसएचओ अमित सिंह ने मृतक के भाई राजेश पाल की तरफ से भादंवि की धारा 302/201 के तहत मोहित व रेनू के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और दोनों को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस पूछताछ में एक ऐसी अविवेकी औरत की कहानी सामने आई, जिस ने प्रेमी को पाने के लिए अपने पति को मौत की नींद सुला दिया.

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जनपद के बिछुआ थानांतर्गत एक गांव है नगला पृथ्वी. हरेभरे बागबगीचों के बीच बसा यह गांव अंबेडकर योजना के तहत उन्नति के शिखर पर है. यहां बिजली, पानी, सडक़ जैसी सभी सुखसुविधाएं है. बेचेलाल पाल इसी गांव का रहने वाला था. उस के परिवार में पत्नी रन्नो के अलावा 2 बेटे राजेश व बृजेश थे. बेचेलाल किसान था. कृषि उपज से ही परिवार का गुजरबसर होता था.

बड़े बेटे राजेश का विवाह हो चुका था. राजेश से छोटा बृजेश था. उस का विवाह रेनू के साथ हुआ था. बृजेश साधारण रंगरूप का सीधासादा युवक था. जबकि उस की पत्नी रेनू आकर्षक रूपरंग वाली थी. वह तेजतर्रार और चंचल स्वभाव की थी. उस का चालचलन जेठानी तारा को तनिक भी नहीं सुहाता था.

रेनू को ससुराल आए अभी एक साल भी नहीं बीता था कि उस का अपनी जेठानी से झगड़ा होने लगा था. राजेश और बृजेश उस समय एक साथ ही रहते थे. लेकिन जब दोनों की पत्नियों के बीच जराजरा सी बात को ले कर लड़ाईझगड़ा होने लगा तो 2 साल बाद दोनों भाई अलग हो गए. जमीनमकान का बंटवारा हो गया. बेचेलाल अपने छोटे बेटे के बजाय बड़े बेटे राजेश के साथ रहने लगा. उस की पत्नी की मौत हो चुकी थी.

रेनू अलग मकान में स्वच्छंद हो कर रहने लगी. दिन, महीने और साल गुजरते रहे. रेनू अब तक 2 बच्चों की मां बन चुकी थी. इस के बावजूद उस के रूपयौवन में कोई कमी नहीं आई थी. खूब खातीपीती थी और स्वच्छंद विचरण करती थी. उस की देह गदरा आई थी. चोली के भीतर उरोज हमेशा कसमसाते रहते.

जबकि बृजेश को घरगृहस्थी और बच्चों से फुरसत ही नहीं मिलती थी. वह दिनरात खेतीकिसानी में लगा रहता. शाम को घर आता तो इतना थका रहता कि खाना खा कर चारपाई पर पड़ता तो तुरंत ही नींद के आगोश में समा जाता. रेनू बगल में पड़ी सारी रात छटपटाती रह जाती. उस की देह सुलगती रहती.

विचित्र संयोग : चक्रव्यूह का भयंकर परिणाम – भाग 6

प्रकाश राय ने फिंगरप्रिंट्स रिपोर्ट अलग रख कर पोस्टमार्टम रिपोर्ट गौर से देखना शुरू किया था. रिपोर्ट के अनुसार, रोहिणी की मृत्यु लगभग 12 से 14 घंटे पहले हुई थी. रोहिणी का पोस्टमार्टम शाम 4 बजे हुआ था यानी राहिणी की मृत्यु आधी रात के बाद 2 बजे से सुबह 4 बजे के बीच हुई थी. फिर धनंजय सवा 6 बजे से 7 बजे के बीच हत्या होने की बात कैसे कह रहा था? पूरा माजरा प्रकाश राय की समझ में धीरेधीरे आता जा रहा था.  धनंजय को अपने ही घर में चोरी करने की क्या जरूरत थी? इस सवाल का जवाब भी प्रकाश राय की समझ में आ गया था.

उन्होंने राजेंद्र सिंह को समझाते हुए कहा, “राजेंद्र सिंह, धनंजय बहुत ही चालाक है. तुम एक काम करो,पिछले 2 दिनों से धनंजय बाहर नहीं गया है. आज भी वह घर पर ही होगा. कुछ दिनों बाद वह चोरी का सामान किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर जरूर रखेगा. उस का सारा घर हम लोगों ने छान मारा है. हो सकता है, उस ने बिल्डिंग में ही कहीं सामान छिपा कर रखा हो या फिर…

“धनंजय जिस वक्त गोश्त लाने निकला था, उस समय उस ने सामान कहीं बाहर रख दिया होगा. पर उस ने कहां रखा होगा. राजेंद्र सिंह, कहीं ऐसा तो नहीं कि वह थैली ले कर नीचे उतरा हो और स्कूटर की डिक्की में रख दी हो?  हो सकता है राजेंद्र सिंह,” प्रकाश राय चुटकी बजाते हुए बोले, “वह थैली अभी उसी डिक्की में ही हो? राजेंद्र सिंह तुम फौरन अपने स्टाफ सहित निकल पड़ो और धनंजय पर नजर रखो.”

इस के बाद राजेंद्र सिंह ने अलकनंदा के आसपास अपने सिपाहियों को धनंजय पर निगरानी रखने के लिए तैनात कर दिया था. धनंजय अपने स्कूटर पर ही निकलेगा, यह राजेंद्र सिंह जानते थे. इसलिए राजेंद्र सिंह ने स्कूटर वाले और टैक्सी वाले अपने 2 मित्रों को सहायता के लिए तैयार किया. सारी तैयारियां कर के राजेंद्र सिंह अलकनंदा के पास ही एक इमारत में रह रहे अपने एक गढ़वाली मित्र के घर में जम गए.

5 तारीख का दिन बेकार चला गया. धनंजय और उस के परिवार को सांत्वना देने के लिए लोगों का आनाजाना लगातार बना हुआ था. शायद इसीलिए धनंजय बाहर नहीं निकल पाया था. लेकिन 6 तारीख को दोपहर के समय धनंजय के नीचे उतरते ही राजेंद्र सिंह सावधान हो गए. धनंजय अपनी स्कूटर स्टार्ट कर के जैसे ही बाहर निकला, वैसे ही अपने सिपाहियों के साथ टैक्सी में बैठ कर राजेंद्र सिंह उस के पीछे हो लिये.

गोल चक्कर होते हुए धनंजय निरुला होटल के पास स्थित बैंक के सामने आ कर रुक गया. राजेंद्र सिंह ने थोड़ी दूरी पर ही टैक्सी रुकवा दी. स्कूटर खड़ी कर के धनंजय ने डिक्की खोली और कपड़े की एक थैली निकाली. धनंजय के हाथ में थैली देख कर ही राजेंद्र सिंह ने मन ही मन प्रकाश राय के अनुमान की प्रशंसा की.

थैली ले कर धनंजय के बैंक में घुसते ही राजेंद्र सिंह ने अपने मित्र को बैंक में भेजा, क्योंकि यह जानना जरूरी था कि धनंजय का बैंक में खाता है या किसी परिचित से मिलने गया था. थैली किसी को देने गया था या लौकर में रखने? उन के मित्र ने लौट कर उन्हें बताया कि धनंजय मैनेजर के साथ लौकर वाले कमरे में गया है. इस से पहले सीधे मैनेजर की केबिन में जा कर उस ने एक फार्म भरा था.

धनंजय को खाली हाथ बाहर आते देख कर अपने 2 सिपाहियों को उस का पीछा करने के लिए कह कर राजेंद्र सिंह वहीं ओट में खड़े हो गए. धनंजय के वहां से जाते ही राजेंद्र सिंह सीधे बैंक मैनेजर की केबिन में पहुंचे. अपना परिचय दे कर उन्होंने कहा, “अभी 5 मिनट पहले जिस व्यक्ति ने आप के यहां लौकर लिया है, वह वांटेड है. हमारे आदमी उस का पीछा कर रहे हैं. आप हमें सिर्फ यह बताइए कि आप से उस की क्या बातचीत हुई. “

“धनंजय को एक महीने के लिए लौकर चाहिए था. यहां उपलब्ध लौकर्स में से उस ने 106 नंबर लौकर पसंद किया. नियमानुसार फार्म भर कर एडवांस जमा किया और लौकर में एक थैली रख कर चला गया.”

लौकर खोलने के लिए 2 चाबियां लगती थीं. पहले बैंक की चाबी, फिर जिस व्यक्ति ने लौकर लिया हो, उस की चाबी से लौकर खुल सकता था. बैंक अधिकारी तहखाने में बने सेफ डिपौजिट वाल्ट में आ कर एक चाबी से लौकर खोल कर चले जाते थे. बाद में ग्राहक बैंक से प्राप्त चाबी से लौकर को खोल कर जो भी सामान रखना चाहे, रख सकता था. इसलिए ग्राहक ने लौकर में क्या रखा या निकाला, बैंक को इस की जानकारी नहीं रहती है.

राजेंद्र सिंह ने बैंक से ही प्रकाश राय को फोन किया. इस के बाद राजेंद्र सिंह ने बैंक मैनेजर से कहा, “यह व्यक्ति शायद कल फिर आए, तब इसे लौकर खोलने की इजाजत मत दीजिएगा. मैं कुछ सिपाही कल सवेरे बैंक खुलने से पहले ही यहां भेज दूंगा. वह यहां आया तो इसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा. अगर यह खुद नहीं आया तो हम इसे ले कर आएंगे.”

धनंजय को बैंक ले जाने के लिए जब प्रकाश राय अलकनंदा पहुंचे थे तो वहां शो केस की वस्तुओं को देखने के बहाने उन्होंने चाबी के गुच्छों में लौकर नंबर 106 की चाबी देख ली थी. टेलीफोन के पास रखी धनंजय की टेलीफोन डायरी को उन्होंने केवल आनंदी का नंबर जानने के लिए यों ही उल्टापलटा था. ‘ए’ पर आनंदी का नंबर न पा कर उन्होंने ‘जी’ पर नजर दौड़ाने के लिए पन्ने पलटे, क्योंकि आनंदी का पूरा नाम आनंदी गौड़ था. मगर ‘एफ’ और ‘एच’ के बीच का ‘जी’ पेज गायब था. वह पेज फाड़े जाने के निशान मौजूद थे.

पकड़े जाने के थोड़ी देर बाद ही धनंजय ने अपने आप पर काबू पा लिया था. गहरी सांस ले कर उस ने कहा, “इंसपेक्टर साहब, मैं ने ही अपनी बीवी की हत्या की है. उस के चरित्र पर मुझे लगातार शक रहता था. आगे चल कर मेरा शक विश्वास में बदल गया. लेकिन कुछ बातें अपनी आंखों से देखने पर मैं बेचैन हो उठा. मेरे मन की शांति समाप्त हो गई. मैं परेशान रहने लगा. मैं अपनी पत्नी को बेहद चाहता था, पर मुझे धोखा दे कर उस ने सब कुछ नष्ट कर दिया था. उस की चरित्रहीनता का कोई सबूत मैं नहीं दे सकता था. मेरे पास एक ही रास्ता था, उसे हमेशा के लिए मिटा देने का. वही मैं ने किया भी.”

प्रकाश राय धनंजय को कोतवाली ले आए. धनंजय ने बड़े योजनाबद्ध तरीके से रोहिणी का खून किया था. रोहिणी को यह दिखाने के लिए कि वह उस से बेहद प्रेम करता है, उस ने बाहर जाने का प्लान बनाया और 40 हजार रुपए भी निकलवाए थे, लेकिन वह कहीं जाने वाला नहीं था. रविवार पहली तारीख को उस ने जानबूझ कर आशीष तनेजा और देवेश तिवारी को अपने घर बुलाया.

रात 3 से 4 बजे के बीच रोहिणी की हत्या करने के बाद सवेरे उठ कर वह बड़े ही सहज ढंग से मटनमछली लाने गया था, सिर्फ इसलिए कि कोई उस पर शक न करे. इतना ही नहीं, पुलिस को चकमा देने के लिए उस ने खुद चोरी भी की थी. चोरी का सारा सामान उस ने मटन लेने जाते समय स्कूटर की डिक्की में रख दिया था.

इस के बाद वह कुछ बताने को तैयार नहीं था. जब प्रकाश राय ने टेलीफोन डायरी का ‘जी’ पेज कैसे फटा, इस बारे में पूछा तो जवाब में उस ने सिर्फ 2 शब्द कहे, “मालूम नहीं.”

पिता को रास ना आया बेटी का प्यार – भाग 1

कालेज पहुंचने के लिए अभी पर्याप्त समय था, इसलिए कंधे पर बैग लटकाए प्राची मस्ती से चली जा रही थी.  घर से निकल कर अभी वह थोड़ी दूर गई थी कि उस ने महसूस किया कि उसे 2 आंखें लगातार घूर रही हैं. लड़कियों के लिए यह कोई खास बात नहीं है, इसलिए ध्यान दिए बगैर वह अपनी राह चली गई. एक दिन की बात होती तो शायद वह इस बात को भूल जाती, लेकिन जब वे 2 आंखें उसे रोज घूरने लगीं तो उसे उन में उत्सुकता हुई.

एक दिन जब प्राची ने उन आंखों में झांका तो आंखें मिलते ही उस के शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई. उस ने झट अपनी आंखें फेर लीं. लेकिन उस ने उन आंखों में ऐसा न जाने कौन सा सम्मोहन देखा कि उस से रहा नहीं गया और उस ने एक बार फिर पलट कर उन आंखों में अपनी आंखें डाल दीं. वे आंखें अपलक उसे ही ताक रही थीं. इसलिए दोबारा आंखें मिलीं तो उस के दिल की धड़कन बढ़ गई.

उन आंखों में प्राची के लिए चाहत का समंदर लहरा रहा था. यह देख कर उस का दिल बेचैन हो उठा. न चाहते हुए भी उस की आंखों ने एक बार फिर उन आंखों में झांकना चाहा. इस बार आंखें मिलीं तो अपने आप ही उस के होंठ मुसकरा उठे. शरम से उस के गाल लाल हो गए और मन बेचैन हो उठा. वह तेजी से कालेज की ओर बढ़ गई.

कहते हैं, लड़कियों को लड़कों की आंखों की भाषा पढ़ने में जरा भी देर नहीं लगती. प्राची ने भी उस लड़के की आंखों की भाषा पढ़ ली थी. वह कालेज तो चली गई, लेकिन उस दिन पढ़ाई में उस का मन नहीं लगा. बारबार वही आंखें उस के सामने आ जातीं. नोटबुक और किताबों में भी उसे वही आंखें दिखाई देतीं. उस का मन बेचैन हो उठता. सिर झटक कर वह पढ़ाई में मन लगाना चाहती, लेकिन मन अपने वश में होता तब तो पढ़ाई में लगता. वह खोईखोई रही.

कालेज की छुट्टी हुई तो प्राची घर के लिए चल पड़ी. रोज की अपेक्षा उस दिन वह कुछ ज्यादा ही तेज चल रही थी. वह जल्दी ही उस जगह पर पहुंच गई, जहां उसे वे आंखें घूर रही थीं. लेकिन उस समय वहां कोई नहीं था. वह उदास हो गई. बेचैनी में वह घर की ओर चल पड़ी. प्राची को घूरने वाली उन आंखों के चेहरे की तलाश थी. घूरने वाली वे आंखें किसी और की नहीं, उस के घर से थोड़ी दूर रहने वाले आयुष्मान त्रिपाठी उर्फ मोनू की थीं.

प्राची इधर काफी दिनों से उसे अपने मोहल्ले में देख रही थी. वह उसे अच्छी तरह जानती भी थी, लेकिन कभी उस से उस की बात नहीं हुई थी. इधर उस ने महसूस किया था कि आयुष्मान अकसर उस से टकरा जाता था. लेकिन उस से आंखें मिलाने की हिम्मत नहीं कर पाता था. प्राची ने कालेज जाते समय उस की आंखों में झांका था तो उस ने आंखें झुका ली थीं. फिर जैसे ही उस ने मुंह फेरा था, वह फिर उसे ताकने लगा था.

प्राची ने उस दिन आयुष्मान में बहुत बड़ा और हैरान करने वाला बदलाव देखा था. सिर झुकाए रहने वाला आयुष्मान उसे प्यार से अपलक ताक रहा था. कई बार उन आंखों से प्राची की आंखें मिलीं तो उस के दिल में तूफान सा उमड़ पड़ा था.  उस के होंठों पर बरबस मुसकान उभर आई थी. दिल की धड़कन एकाएक बढ़ गई थी. विचलित मन से वह घर पहुंची थी. इस के बाद उस के ख्यालों में आयुष्मान ही आयुष्मान छा गया था.

घर पहुंच कर प्राची ने बैग रखा और बिना कपड़े बदले ही सीधे छत पर जा पहुंची. उस ने आयुष्मान के घर की ओर देखा. लेकिन आयुष्मान उसे दिखाई नहीं दिया. वह उदास हो गई. उस का मन एक बार फिर उन आंखों में झांकने को बेचैन था. लेकिन उस समय वे आंखें दिखाई नहीं दे रही थीं. वह उन्हीं के बारे में सोच रही थी कि नीचे से मां की आवाज आई, ‘‘प्राची, आज तुझे क्या हो गया कि आते ही छत पर चली गई? कपड़े भी नहीं बदले और खाना भी नहीं खाया. चल जल्दी नीचे आ जा. मुझे अभी बहुत काम करने हैं.’’

मां की बातें सुन कर ऊपर से ही प्राची बोली, ‘‘आई मां, थोड़ा टहलने का मन था, इसलिए छत पर आ गई थी.’’

प्राची ने एक बार फिर आयुष्मान की छत की ओर देखा. वह दिखाई नहीं दिया तो उदास हो कर प्राची नीचे आ गई. रात को खाना खाने की इच्छा नहीं थी, पर मां से क्या बहाना बनाती, इसलिए 2-4 कौर किसी तरह पानी से उतार कर प्राची बेड पर लेट गई. लेकिन आंखों में नींद नहीं थी. आंखें बंद करती तो उसे आयुष्मान की घूरती आंखें दिखाई देने लगतीं. करवट बदलते हुए जब किसी तरह नींद आई तो उस ने सपने में भी उन 2 आंखों को प्यार से निहारते देखा.

दूसरी ओर आयुष्मान भी कम बेचैन नहीं था. सुबह तो समय निकाल कर उस ने प्राची को देख लिया था, लेकिन शाम को देर हो जाने की वजह वह प्राची को नहीं देख पाया था, इसलिए अगले दिन की सुबह के इंतजार में समय कट ही नहीं रहा था. वैसे भी इंतजार की घडि़यां काफी लंबी होती हैं.

अगले दिन सुबह जल्दी उठ कर प्राची कालेज जाने की तैयारी करने लगी थी. लेकिन उस दिन ऐसा लग रहा था, जैसे समय बीत ही नहीं रहा है. आखिर इंतजार करतेकरते कालेज जाने का समय हुआ तो प्राची उस दिन कुछ ज्यादा ही सजधज कर घर से निकली. वह उस जगह जल्दी से जल्दी पहुंच जाना चाहती थी, जहां बैठ कर आयुष्मान उस के आने का इंतजार करता था.

पंख होते तो शायद वह उड़ कर पहुंच जाती, लेकिन उसे तो वहां पैरों से चल कर पहुंचना था. वह दौड़ कर भी नहीं जा सकत थी. कोई देख लेता तो क्या कहता. जैसेजैसे वह जगह नजदीक आती जा रही थी, उस के दिल की धड़कन बढ़ने के साथ मन बेचैन होता जा रहा था.

वह उस जगह पर पहुंची तो देखा कि आयुष्मान अपलक उसे ताक रहा था. उस ने उस की आंखों में अपनी आंखें डाल दीं. आंखें मिलीं तो होंठ अपने आप ही मुसकरा उठे. उस का आंखें हटाने का मन नहीं हो रहा था, लेकिन राह चलते यह सब ठीक नहीं था. ऐसी बातें लोग ताड़ते भी बहुत जल्दी हैं. वह उसे पलटपलट कर भी नहीं देख सकती थी. फिर भी शरमसंकोच के बीच उस से जितनी बार हो सका, उस ने उसे तब तक देखा, जब तक वह उसे दिखाई देता रहा.

साफ था, दोनों ही आंखों के रास्ते एकदूसरे के दिल में उतर चुके थे. उस रात दोनों को ही नींद नहीं आई. बेड पर लेटेलेटे बेचैनी बढ़ने लगी तो प्राची बेड से उठ कर छत पर आ गई. खुले वातावरण में गहरी सांस ले कर उस ने इधरउधर देखा. आसमान में तारे चमक रहे थे. उस ने उन तारों की ओर देखा तो उसे लगा कि हर तारे से आयुष्मान मुसकराता हुआ उसे ताक रहा है.

                                                                                                                                              क्रमशः

सुहाग की कातिल : देवर के प्यार में किया पति का क़त्ल – भाग 1

दोपहर का वक्त था. रेनू नहा कर बाथरूम से निकली तभी ‘भाभी…भाभी’ कहता हुआ मोहित उस के घर आ पहुंचा. उस समय रेनू के शरीर पर मात्र पेटीकोट और ब्लाउज था. उस की जुल्फों से पानी की बूंदें टपक रही थीं. मोहित की निगाहें रेनू के मखमली बदन पर जैसे पानी की बूंदों की तरह चिपक कर रह गई थीं.

मोहित की इस हरकत को रेनू समझ रही थी. वह न तो शरमाई और न ही वहां से भाग कर दूसरे कमरे में गई. बल्कि वह नजाकत से चलते हुए उस के और करीब आ गई. मोहित रिश्ते में उस का चचेरा देवर लगता था. उन के बीच अकसर मजाक भी होता रहता था. रेनू उस के एकदम करीब आ कर बोली, “मोहित, खड़े क्यों हो, बैठ जाओ न.”

रेनू के कहने के बावजूद मोहित चारपाई पर नहीं बैठा, बल्कि खड़ेखड़े उसे अपलक निहारता रहा. उस के मन में कोई तूफान मचल रहा था. रेनू मादक मुसकान बिखेरती हुई मुड़ी और अंदर वाले कमरे में चली गई. मोहित तब भी अपनी जगह जमा रहा.

रेनू कुछ देर बाद बाहर आई तो मोहित की आंखें फिर उस के चेहरे पर टिक गईं. आखिर रेनू से रहा नहीं गया तो उस ने पूछ ही लिया, “मोहित, तुम मुझे आज इस तरह से क्यों देख रहे हो?”

“बता दूं?” मोहित ने रेनू की आंखों में झांकते हुए कहा, “भाभी, तुम मुझे बहुत खूबसूरत लगती हो. तुम्हारी अदाएं मेरे अंदर बेचैनी पैदा कर रही हैं.”

शुरू हो गया देवरभाभी का प्यार

मोहित की बात सुन कर रेनू के मन में भी हलचल मच गई. वह आगे बढ़ी और मोहित का हाथ थाम कर बोली, “सच कहूं मोहित, तुम भी मुझे बहुत अच्छे लगते हो. मैं तो तुम्हारे लिए ही सजतीसंवरती हूं. तुम्हारे भैया को तो मेरी कद्र ही नहीं.”

रेनू के इतना कहने पर मोहित मन ही मन खुश हुआ. लेकिन वह वहां रुका नहीं और खेतों की ओर चला गया. रेनू दरवाजे पर खड़ी उसे एकटक देखती रही. मोहित खेतों पर चला तो गया था, लेकिन उस का मन काम में नहीं लग रहा था. वह थोड़ी देर बाद ही लौट आया. उसे देखते ही रेनू से रहा नहीं गया. उस ने आखिर पूछ ही लिया, “क्या बात है, काम में मन नहीं लगा क्या?”

“नहीं भाभी, शरीर तप रहा है.” मोहित ने कहा.

रेनू ने देखा, मोहित का शरीर वाकई पूरी तरह से तप रहा था. उस के हाथ का स्पर्श पाते ही मोहित रेनू से लिपट गया. तब तो रेनू से भी रहा न गया. उस का पूरा शरीर नीचे से ले कर ऊपर तक सनसना उठा. जैसे किसी ने रागिनी छेड़ दी हो और वीणा के सारे तार एक साथ झनझना उठे हों.

रेनू होश खोती जा रही थी. मोहित ने उसे मदहोश होते हुए देखा तो धीरे से उसे अपनी बांहों का सहारा दे कर अपने ऊपर गिरा लिया. अब दोनों का चेहरा आमनेसामने था. सांसें गर्म हो उठीं. मोहित की आंखों में वासना के लाल डोरे तैरने लगे. लग रहा था, जैसे बोतल भर का नशा हो आया हो. रेनू के अधर भी तप रहे थे. मोहित ने अचानक उन तपते होंठों को अपने दांतों के नीचे भींच लिया.

रेनू की सिसकारी फूट पड़ी. मोहित ने इस के बाद उसे और जोर से अपनी बांहों में समेट लिया. उस के हाथ रेनू के नाजुक अंगों पर रेंगने लगे. रेनू का हलक सूखने लगा. उस ने अपना चेहरा उस की चौड़ी छाती में छिपा लिया. तब तो मोहित से रहा नहीं गया. क्षण भर में ही सारे नातेरिश्ते ढह गए. मानमर्यादा टूट गई और दोनों एकदूसरे में समा गए. देवरभाभी के अवैध संबंध इसी तरह चलते रहे.

बृजेश पाल की मिली लाश

28 जनवरी, 2023 की सुबह उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के बिछुआ थाने के गांव नगला पृथ्वी का रहने वाला अनुज पाल अपने सरसों के खेत पर पहुंचा तो वहां खेत में उस ने एक लाश देखी. वह उलटे पैर गांव की ओर भागा और खेत में पड़ी लाश की सूचना गांव वालों को दी. फिर तो जंगल की आग की तरह यह खबर पूरे गांव में फैल गई. लोग खेत की ओर दौड़ पड़े.

सरसों के खेत में लाश पड़ी होने की खबर जब राजेश पाल के कानों में पड़ी तो उस का माथा ठनका. क्योंकि 2 दिन से उस का छोटा भाई बृजेश पाल गुम था. उस का कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था. वह बिछुआ थाने में उस की गुमशुदगी भी दर्ज करा चुका था . राजेश अपने मन में तमाम आशंकाओं का बवंडर लिए नंगे पांव ही खेत की ओर भागा. ख्ेात पर पहुंच कर जब उस ने लाश देखी तो वह फफक पड़ा. वह लाश उस के भाई बृजेश पाल की ही थी.

इसी बीच किसी ने लाश मिलने की सूचना थाना बिछुआ पुलिस को दे दी. सूचना पाते ही एसएचओ अमित सिंह पुलिस बल के साथ नगला पृथ्वी गांव की ओर रवाना हो लिए. रवाना होने से पहले उन्होंने पुलिस अधिकारियों को भी सूचना दे दी थी. थाना बिछुआ से नगला पृथ्वी गांव 5 किलोमीटर दूर था. पुलिस को वहां पहुंचने में लगभग आधा घंटे का समय लगा.

उस समय गांव के बाहर सरसों के खेत के पास ग्रामीणों की भीड़ जुटी थी. भीड़ को हटाते अमित सिंह उस स्थान पर पहुंचे, जहां लाश पड़ी थी. लाश युवक की थी. जिस की उम्र यही कोई 30-32 साल थी. उस के सिर पर गहरी चोट थी. इसलिए लग रहा था कि उस की हत्या किसी ठोस वस्तु से सिर पर प्रहार कर की गई थी. मृतक जींसकमीज व गुलाबी कलर का स्वेटर पहने था. लाश के पास मोबाइल फोन भी पड़ा था. पुलिस ने मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले लिया. मौके पर मौजूद राजेश नामक युवक ने पुलिस को बताया कि लाश उस के भाई बृजेश की है.

एसएचओ अमित सिंह अभी घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी विनोद कुमार, एएसपी राजेश कुमार तथा सीओ चंद्रकेश सिंह मौकाएवारदात आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया तथा मृतक के भाई राजेश तथा मौके पर मौजूद कुछ अन्य लोगों से पूछताछ की.

इसी समय एक महिला एक बूढ़े व्यक्ति के साथ लंबा घूंघट निकाल कर आई और लाश देख कर फूटफूट कर रोने लगी. पुलिस अधिकारियों ने उसे धैर्य बंधा कर पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस का नाम रेनू पाल है और लाश उस के पति बृजेश पाल की है. साथ आया बूढ़ा व्यक्ति उस का ससुर बेचेलाल है. बेचेलाल की आंखों से भी आंसू टपक रहे थे. वह लाश को टुकुरटुकुर देख रहा था.

विचित्र संयोग : चक्रव्यूह का भयंकर परिणाम – भाग 5

इतनी पूछताछ के बाद बेचैन हुए आनंद ने प्रकाश राय से पूछा, “आप रोहिणी के बारे में इतनी पूछताछ क्यों कर रहे है?”

गंभीर स्वर में प्रकाश राय ने कहा, “लोग हम से सत्य को छिपाते हैं, लेकिन हमारा काम ही है लोगों को सच बताना. परसों सवेरे 6 से 7 बजे के बीच किसी ने छुरा घोंप कर रोहिणी की हत्या कर दी है.”

“नहीं..,” आनंदी चीख पड़ी. लगभग 10 मिनट तक आनंदी हिचकियां लेले कर रोती रही. उस के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. आनंदी के शांत होने पर प्रकाश राय ने पूरी घटना सुनाई और अफसोस जाहिर करते हुए कहा, “अभी तक हमें कोई भी सूत्र नहीं मिला है. हमारी जांच जारी है, इसलिए रोहिणी के सभी परिचितों से मिल कर हम पूछताछ कर रहे हैं. कल उस का अंतिम संस्कार भी हो गया है.”

“लेकिन सर, किसी ने भी हमें इस घटना की सूचना क्यों नहीं दी?” आनंद ने पूछा.

“मैं भी यही सोच रहा हूं मिस्टर आनंद, तुम्हारी पत्नी और रोहिणी में बहुत अच्छी मित्रता थी. फिर भी धनंजय ने तुम्हें खबर क्यों नहीं दी, जबकि उस ने कर्नल सक्सेना को तमाम लोगों के फोन नंबर दे कर इस घटना की खबर देने को कहा था. है न आश्चर्य की बात?”

“मैं क्या कह सकता हूं?”

“मैं भी कुछ नहीं कह सकता मिस्टर आनंद. कारण मैं धनंजय से पूछ नहीं सकता. पूछने से लाभ भी नहीं, क्योंकि धनंजय कह देगा, मैं तो गम का मारा था, मुझे यह होश ही कहां था? अच्छा आनंदी, मैं तुम से एक सवाल का उत्तर चाहता हूं. रोहिणी ने कभी अपने पति के बारे में कोई ऐसीवैसी बात या शिकायत की थी तुम से?”

“नहीं, कभी नहीं. वह तो अपने वैवाहिक जीवन में बहुत खुश थी.”

प्रकाश राय का प्रश्न और आनंदी का उत्तर सुन कर आनंद ने जरा घबराते हुए पूछा, “आप धनंजय पर ही तो शक नहीं कर रहे हैं?”

“नहीं, उस पर मैं शक कैसे कर सकता हूं, अच्छा, अब हम चलते हैं. जरूरत पडऩे पर मैं फिर मिलूंगा.”

प्रकाश राय सोच रहे थे कि पूरे सफर के दौरान आनंद और धनंजय ने एकदूसरे से ज्यादा बात क्यों नहीं की? यहां भी वे एकदूसरे से क्यों नहीं मिलते थे?

मंगलवार, 5 मई. रोहिणी कांड की गुत्थी ज्यों की त्यों बरकरार थी. प्रकाश राय को कई लोगों पर शक था, पर प्रमाण नही थे. सिर्फ शक के आधार पर किसी को पकड़ कर बंद करना प्रकाश राय का तरीका नहीं था. दोपहर बाद प्रकाश राय के औफिस पहुंचने से पहले ही उन की मेज पर फिंगरप्रिंट्स ब्यूरो की रिपोर्ट रखी थी. रिपोर्ट देखतेदेखते उन के मुंह से निकला, “अरे यह…तो.” घंटी बजा कर इन्होंने राजेंद्र सिंह को बुलाया.

“राजेंद्र सिंह, रोहिणी मर्डर केस का अपराधी नजर आ गया है.” कह कर प्रकाश राय ने उन्हें एक नहीं, अनेक हिदायतें दीं.

राजेंद्र सिंह और उन के स्टाफ को महत्पूर्ण जिम्मेदारी सौंप कर योजनाबद्ध तरीके से समझा कर बोले, “जांच को अब नया मोड़ मिल गया है. भाग्य ने साथ दिया तो 2-3 दिनों में ही अपराधी पूरे सबूत सहित अपने शिकंजे में होगा. समझ लो, इस केस की गुत्थी सुलझ गई है. बाकी काम तुम देखो. मैं अब जरा अपने दूसरे केस देखता हूं.”

उत्साहित हो कर राजेंद्र सिंह निकल पड़े उन के आदेशों का पालन करने. 7 मई की सुबह 9 बजे दयाशंकर अपने स्टाफ के साथ औफिस पहुंचे. पिछली रात प्रकाश राय के निर्देश के अनुसार राजेंद्र सिंह पूरी तरह मुस्तैद थे. थोड़ी देर बाद प्रकाश राय के गाड़ी में बैठते ही गाड़ी सेक्टर-15 की ओर चल पड़ी.

करीब साढ़े 9 बजे प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह अलकनंदा स्थित धनंजय के घर पहुंचे. प्रकाश राय को देख कर धनंजय जरा अचरज में पड़ गया. उस के पिता भी हौल में ही बैठे थे. उस की मां और बहन अंदर कुछ काम में व्यस्त थीं. ज्यादा समय गंवाए बगैर प्रकाश राय ने धनंजय से कहा, “विश्वास, तुम जरा मेरे साथ बाहर चलो. रोहिणी के केस में हमें कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिली हैं. हम तुम्हें दूर से ही एक व्यक्ति को दिखाएंगे. तुम ने अगर उसे पहचान लिया तो समझो इस हत्या में उस का जरूर हाथ है. उस के पास से तुम्हारी संपत्ति भी मिल जाएगी. अब उसे पहचानने के लिए हमे तुम्हारी मदद की जरूरत है.”

“ठीक है, आप बैठिए. मैं 10 मिनट में तैयार हो कर आता हूं.” कह कर धनंजय अंदर चला गया और प्रकाश राय उस के पिता के साथ गप्पें मारने लगे. गप्पें मारतेमारते उन्होंने बड़े ही सहज ढंग से पास रखी टेलिफोन डायरी उठाई, उस के कुछ पन्ने पलटे और यथास्थान रख दिया. फिर वह टहलते हुए शो केस के पास गए. उस में रखा चाबी का गुच्छा उन्हें दिखाई दिया. शो केस में रखी कुछ चीजों को देख कर वह फिर सोफे पर आ बैठे.

15-20 मिनट में धनंजय तैयार हो गया. प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह के साथ निकलने से पहले उस ने शो केस में से सिगरेट का पैकेट, लाइटर, पर्स, चाबी और रूमाल लिया. अब प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह धनंजय को साथ ले कर निरुला होटल की ओर चल पड़े. लगभग 10 मिनट बाद उन की गाड़ी होटल के निकट स्थित बैंक के सामने जा कर रुकी.

गाड़ी रुकते ही प्रकाश राय ने धनंजय से कहा, “विश्वास, हम ने तुम्हारी सोसायटी के वाचमैन नारायण को गिरफ्तार कर लिया है. इस समय वह हमारे कब्जे में है. इस बैंक के सेफ डिपौजिट लौकर डिपार्टमेंट में 2 चौकीदार काम करते हैं. इन में से हमें एक पर शक है. मुझे विश्वास है कि उस ने नारायण के साथ मिल कर चोरी और हत्या की है. हम उसे दरवाजे पर ला कर तुम्हें दिखाएंगे. देखना है कि तुम उसे पहचानते हो या नहीं?”

धनंजय को ले कर प्रकाश राय बैंक में दखिल हुए और बैंक के लौकर डिपार्टमेंट में पहुंचे. वहां मौजूद 2-4 लोगों में से प्रकाश राय ने एक व्यक्ति से पूछा, “आप…?”

“मैं बैंक मैनेजर हूं.”

“आप इन्हें जानते हैं?”

“हां, यह धनंजय विश्वास हैं.”

“इन का खाता है आप के बैंक में?”

“खाता तो नहीं है, लेकिन कल दोपहर 3 बजे इन्होंने लौकर नंबर 106 किराए पर लिया है.”

“आप जरा वह लौकर खोलने का कष्ट करेंगे?”

बैंक मैनेजर सुरेशचंद्र वर्मा ने लौकर के छेद में चाबी डाल कर 2 बार घुमाई, पर लौकर एक चाबी से खुलने वाला नहीं था, क्योंकि दूसरी चाबी धनंजय के पास थी. प्रकाश राय धनंजय से बोले, “मिस्टर विश्वास, तुम्हारी जेब में चाबी का जो गुच्छा है, उस में लौकर नंबर 106 की दूसरी चाबी है. उस से इस लौकर को खोलो.”

धनंजय घबरा गया. उस ने चाबी निकाल कर कांपते हाथों से लौकर खोल दिया. प्रकाश राय ने लौकर में झांक कर देखा और फिर धनंजय से पूछा, “यह क्या है मिस्टर विश्वास?”

धनंजय ने गरदन झुका ली. प्रकाश राय ने लौकर से कपड़े की एक थैली बाहर निकाली. उस थैली में धनंजय के फ्लैट से चोरी हुए सारे जेवरात और 5 सौ रुपए के नोटों का एक बंडल भी था, जिस पर रोहिणी के पंजाब नेशनल बैंक की मोहर लगी थी. इस के अलावा एक और चीज थी उस में, एक रामपुरी छुरा.

“मिस्टर विश्वास, यह सब क्या है?” प्रकाश राय ने दांत भींच कर पूछा.

एक शब्द कहे बिना धनंजय ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक कर रोते हुए कहा, “साहब, मैं अपना गुनाह कबूल करता हूं. रोहिणी का खून मैं ने ही किया था.”

दरअसल, हुआ यह था कि मंगलवार को औफिस में आते ही प्रकाश राय को जो फिंगरप्रिंट्स रिपोर्ट मिली थी, उस के अनुसार फ्लैट में केवल रोहिणी और धनंजय के ही फिंगरप्रिंट्स मिले थे. किसी तीसरे व्यक्ति की अंगुलियों के निशान थे ही नहीं. इसलिए प्रकाश राय की नजरें धनंजय पर जम गई थीं.