जलन में जल गया पूरा परिवार

रांची में एक जगह है कोकर. वैसे तो यह इंडस्ट्रियल एरिया है, लेकिन इसी से लगा कुछ रिहाइशी इलाका भी है. रांचीझारखंड की राजधानी है, इसलिए इस शहर का विकास तेजी से हो रहा है. कोकर चौक से कांटा टोली की ओर जाने वाली सडक़ पर एक हाउसिंग सोसायटी है, जिसे लोग रिवर्सा अपार्टमेंट के नाम से जानते हैं. यह काफी ऊंची और शानदार बिल्डिंग है. जब इमारत बड़ी और सुंदर होगी तो उस में रहने वाले भी बड़े लोग ही होंगे.

इसी रिवर्सा अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 1002 में डा. सुकांत सरकार अपने परिवार के साथ रहते थे. डा. सुकांत सरकार डाक्टर तो थे ही, आर्मी से रिटायर भी थे, इसलिए लोग उन की काफी इज्जत करते थे. समाज में उन की अच्छी प्रतिष्ठा थी. इस की एक वजह यह भी थी कि वह सामाजिक आदमी थे और हर छोटेबड़े का सम्मान करते थे. मिलनसार स्वभाव वाले होने की वजह से हर किसी से मिलतेजुलते और बातचीत करते रहते थे. इसीलिए लोग उन्हें काफी मानसम्मान देते थे.

उन का बेटा था सुमित सरकार, जो नोएडा की एक बड़ी कंपनी में ऊंचे पर पर नौकरी करता था. सुमित ने नोएडा में अपना मकान ले रखा था. नोएडा में अपना मकान होने की वजह से डा. सुकांत सरकार पत्नी के साथ कभी रांची में रहते थे तो कभी बेटे के पास नोएडा जा कर रहते थे. इस तरह इस परिवार का नोएडा और रांची आनाजाना लगा रहता था. सब से बड़ी बात तो यह थी उन के यहां किसी चीज की कमी नहीं थी.

साल 2006 में डा. सुकांत सरकार ने खूब धूमधाम से बेटे सुमित का विवाह कोलकाता की मधुमिता के साथ किया. मधुमिता पढ़ीलिखी संस्कारी लडक़ी थी, इसलिए ससुराल आ कर उस ने घर को संभाल लिया. फिर परिवार ही कौन बड़ा था. कुल 4 लोगों का ही तो परिवार था. सब पढ़ेलिखे व्यवस्थित थे.

मधुमिता एक अच्छी, कुशल और संस्कारी बहू साबित हुई थी, इसलिए पति ही नहीं, सासससुर भी उसे प्यार तो करते ही थे, उस का सम्मान भी करते थे. उसे वे बेटी की तरह रखते थे. अब घर में वही सब होता था, जो वह चाहती थी. वह भी इस बात का खयाल रखती थी कि उस से ऐसा कोई काम न हो, जिस से घर के किसी सदस्य को किसी तरह की ठेस पहुंचे. वह कभी सासससुर के साथ रांची में रहती तो कभी पति के साथ नोएडा में. कुछ सालों बाद उसे एक बेटी पैदा हुई, जिस का नाम रखा गया शमिता.

इस परिवार में सब बढिय़ा चल रहा था. छोटा परिवार था, इसलिए सभी हंसीखुशी से रहते थे. ऐसे में ही 9 अक्तूबर, 2016 को इसी रिवर्सा अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 1002 से यानी सुकांत सरकार के फ्लैट से एक भयानक खबर निकल कर बाहर आई और वह खबर यह थी कि सुकांत सरकार के फ्लैट में एक साथ 5 लोगों की मौत हो गई है और सुकांत सरकार बुरी तरह घायल हैं.

रांची शहर में फैल गई थी सनसनी

जिन लोगों की मौत हुई थी, उन में सुकांत सरकार की 60 साल की पत्नी अंजना सरकार, उन का 35 साल का बेटा सुमित सरकार, सुकांत सरकार के भतीजे पार्थिव की पत्नी मोमिता सरकार और बेटे की बेटी शमिता तथा भतीजे की बेटी सुमिता शामिल थी.

इस तरह अचानक 5 लोगों की मौत और घर के मुखिया के बुरी तरह से घायल होने की खबर से अपार्टमेंट में ही नहीं, पूरे रांची शहर में सनसनी फैल गई थी. इस घटना के बारे में जिस ने भी सुना था, वह हक्काबक्का रह गया था. एक तरह से यह बहुत ही दुखद और दिल दहलाने वाली घटना थी.

इस की जानकारी लोगों को तब हुई, जब पुलिस अपार्टमेंट पर पहुंची थी और पुलिस को सूचना सुकांत सरकार के इसी शहर में रहने वाले भांजे ने दी थी. हुआ यह था कि भांजे ने पहले मामा सुकांत सरकार को फोन किया. जब उन का फोन नहीं उठा तो उस ने परिवार के अन्य लोगों को फोन किया. जब अन्य किसी का भी फोन नहीं उठा तो उसे चिंता हुई.

किसी एक का फोन न उठे तो सोचा जा सकता है कि वह कहीं व्यस्त होगा, इसलिए फोन नहीं उठा रहा है. लेकिन जब घर में कई लोग हों और किसी का भी फोन न उठे तो चिंता होगी ही. उस से रहा नहीं गया और वह मामा सुकांत सरकार के घर जा पहुंचा. घर का दरवाजा अंदर से बंद था. उस ने घंटी बजाई, दरवाजा नहीं खुला तो उस ने दरवाजा खटखटाया. जब दरवाजा खटखटाने पर भी नहीं खुला तो उस ने पुलिस को सूचना दी.

सूचना मिलते ही थाना सदर पुलिस रिवर्सा अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 1002 पर पहुंच गई. पुलिस ने किसी तरह दरवाजा खोला. दरवाजा खुलने पर जब सभी अंदर गए तो अंदर का दृश्य भयानक था. घर के अंदर एक कमरे में 5 लाशें पड़ी थीं, जिन में सुकांतो के बेटे, पत्नी, भतीजे की पत्नी और 2 बच्चियों की लाशें थीं. पर इन के शरीर पर किसी भी तरह की चोट वगैरह का कोई निशान नहीं था.

दूसरे कमरे में अकेले सुकांत सरकार ऐसे थे, जिन की सांसें अभी चल रही थीं. पर वह बुरी तरह घायल थे. उन का पूरा शरीर खून से लथपथ था. उन के पास एक बड़ा सा चाकू पड़ा था. चाकू पर भी खून लगा था. साफ लग रहा था उसी चाकू से उन पर वार हुए थे.

पुलिस ने तुरंत सुकांत सरकार को अस्पताल भिजवाया कि शायद समय पर इलाज मिलने से उन की जान बच जाए, पर अस्पताल पहुंचने के कुछ समय बाद जीवन और मौत के बीच संघर्ष करते हुए आखिर उन की भी सांसें थम गईं यानी उन की भी मौत हो गई थी. इस तरह एक ही परिवार के 6 लोगों की एकाएक मौत हो गई थी.

पुलिस को मिले बहू द्वारा प्रताडि़त करने के सबूत

पुलिस ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. फोरैंसिक टीम को बुला कर सारे साक्ष्य एकत्र कराए. इस के बाद बाकी की पांचों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया. अब पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार था. क्योंकि उसी से पता चलता कि इन लोगों की मौत कैसे हुई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने पर पता चला कि जिन 5 लोगों की पहले मौत हुई थी, उन्हें एनेस्थेसिया की ओवरडोज तो दी ही गई थी, साथ ही उन्हें इंजेक्शन से कोई जहर भी दिया गया था. अकेले सुकांत सरकार ऐसे थे, जिन के पेट पर चाकू के 14 घाव थे और इसी वजह से उन की मौत सब से बाद में अस्पताल जा कर हुई थी.

पुलिस ने परिवार वालों से पूछताछ शुरू की. इस पूछताछ में पता चला कि जिस समय यह घटना घटी थी, सुकांत सरकार की बड़ी बहू यानी सुमित सरकार की पत्नी मधुमिता सरकार नोएडा में थी. इसलिए वह बच गई थी. जबकि उस के पति की रांची में होने की वजह से मौत हो गई थी.

फ्लैट की तलाशी में पुलिस को कुछ ऐसे कागजात मिले थे, जिस से साफ पता चल रहा था कि यह पूरा परिवार बहू की प्रताडऩा से परेशान था. परिवार वालों से पूछताछ में भी यह बात सामने आई थी. आगे की जांच और पूछताछ में जो कहानी निकल कर सामने आई थी, वह बहुत ही अजीबोगरीब थी.

जैसा कि शुरू में बताया गया है कि जब मधुमिता इस घर में ब्याह कर आई थी तो इस घर में वह ढेरों खुशियां ले कर आई थी. क्योंकि मधुमिता एक बहुत अच्छी बहू साबित हुई थी. हर किसी का खयाल रखने वाली, हर किसी की हर बात सुनने वाली. जिस तरह वह हर किसी का खयाल रखती थी, उसी तरह घर का हर सदस्य उस का भी खयाल रखता था. उस के बातव्यवहार से सरकार परिवार उस पर अपनी जान छिडक़ता था.

छोटी बहन के देवरानी बनने पर हुई कलह शुरू

मधुमिता की एक छोटी बहन थी मोमिता, जो कोलकाता के एक आश्रम में रहती थी. क्योंकि घर में उन की मां नहीं थी. मधुमिता ने जब यह बात अपनी ससुराल वालों को बता कर उसे अपने साथ अपने घर लाने को कहा तो चूंकि मधुमिता ने खुद को अच्छी बहू साबित कर दिखाया था, इसलिए उस की ससुराल वाले उसे बहन को अपने घर लाने से मना नहीं कर सके. उन्होंने कहा था कि वह अपनी बहन को बिलकुल ले आए. वह भी उन के घर एक बेटी की तरह रहेगी.

ससुराल वालों से परमिशन मिलने के बाद मधुमिता अपनी छोटी बहन मोमिता को अपने घर ले आई थी. मोमिता भी कभी रांची तो कभी नोएडा में बहनबहनोई के साथ रहने लगी थी. धीरेधीरे मोमिता ने भी अपनी बड़ी बहन की ही तरह अपने बातव्यवहार और कामों से सरकार परिवार का दिल जीत लिया.

उस ने सरकार परिवार का ऐसा दिल जीता कि सरकार परिवार ने उसे भी अपनी बहू बनाने का फैसला कर लिया. इस के बाद सुकांत सरकार ने मोमिता का विवाह अपने भतीजे पार्थिव सरकार के साथ करा दिया. इस तरह मधुमिता की छोटी बहन मोमिता सुकांत सरकार के घर की दूसरी बहू बन गई. मोमिता का विवाह भले ही सुकांत सरकार के भतीजे पार्थिव के साथ हुआ था, पर वह रहती थी सुकांत सरकार के परिवार के साथ ही.

पार्थिव अलग रहता था, इसलिए कभी वह अपने चाचा के घर आ जाता था तो कभी मोमिता अपने पति के साथ उस के घर रहने चली जाती थी. उस का आनाजाना लगा रहता था, लेकिन वह ज्यादातर सुकांत सरकार के परिवार के साथ ही रहती थी  इस तरह सुकांत सरकार के परिवार में अब 7 लोग हो गए थे. वह खुद, उन की पत्नी अंजना, बेटा सुमित, दोनों बहुएं और दोनों बहुओं की एकएक बेटियां.

धीरेधीरे एक समय ऐसा आ गया, जब सरकार परिवार छोटी बहू यानी मधुमिता की छोटी बहन मोमिता पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान रहने लगा. यानी लोग उस से ज्यादा प्यार करने लगे, उस का ज्यादा खयाल रखने लगे. अब घर में चलती भी उसी की ज्यादा थी. घर में मधुमिता से उस की तुलना होने लगी.

घर में जब उस का मानसम्मान ज्यादा होने लगा तो मधुमिता को इस से जलन होने लगी. इस की वजह यह थी कि मोमिता ने अपने कामों और बातव्यवहार से सब का दिल जीत लिया था. सभी के लिए वह हर वक्त एक पैर पर खड़ी रहती थी. कहा भी जाता है कि काम प्यारा होता है शरीर नहीं. यह बात सच साबित हुई थी.

मधुमिता छोटी बहन को समझने लगी दुश्मन

बस, यहीं से दोनों बहनों, जो अब जेठानी और देवरानी बन चुकी थीं, के बीच नफरत ने जन्म ले लिया. जिस की लपेट में धीरेधीरे पूरा परिवार आ गया. मधुमिता यानी सुमित की पत्नी इस जलन की लपटों में कुछ इस तरह झुलसी कि उस ने अपने पति और अपनी ही सगी बहन पर यह इलजाम लगा दिया कि उस के पति के अपने छोटे भाई की पत्नी मोमिता के बीच अवैध संबंध हैं.

इस नाजायज संबंधों की बात यहीं तक सीमित नहीं रही, आगे चल कर मधुमिता यह भी कहने लगी कि मोमिता के नाजायज संबंध अपने ससुर यानी उस के ससुर सुकांत सरकार से भी हैं. जब इस तरह के झूठे इलजाम एक प्रतिष्ठित परिवार के लोगों पर लगाया जाएगा तो सोचिए उस परिवार पर क्या बीतेगी, परिवार वालों का क्या हाल होगा? बहू द्वारा लगाए गए इस इल्जाम से पूरा सरकार परिवार हिल गया था.

इतना ही नहीं, मधुमिता बारबार दहेज उत्पीडऩ का केस दर्ज कराने की भी धमकी देने लगी थी. वह खुद तो धमकी देती ही थी, कई एनजीओ यानी स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से भी सरकार परिवार को चेतावनियां या यह कहिए कि धमकियां दी जाने लगी थीं कि वे लोग मधुमिता को परेशान न करें.

इस तरह की बातें कर के एक तरह से सरकार परिवार को डराया जाने लगा था. अकसर उन के घर पुलिस भी आने लगी थी, जो कभी समझाती तो कभी कहती कि आप लोग पढ़ेलिखे प्रतिष्ठित लोग हैं, फिर भी बहू को परेशान करने जैसी ओछी हरकत करते हैं.

कभीकभी उन लोगों को थाने भी जाना पड़ता था, जहां उन्हें जलील किया जाता, बेइज्जती की जाती. मधुमिता ने पति, सासससुर पर कई मुकदमे दर्ज करवा दिए थे, जिन में दहेज उत्पीडऩ और प्रताडि़त करने वाले थे.

बहू की प्रताडऩा से परेशान हुआ परिवार

सुकांत सरकार ही नहीं, उन का पूरा परिवार इस तरह की बातों से शर्मिंदगी महसूस करता. क्योंकि वह जो सफाई देते, उन की बातों पर कोई विश्वास नहीं करता. इस से पूरा परिवार दिमागी रूप से इतना परेशान रहने लगा था. उन की कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि वे क्या करें.

कभी वे सभी मधुमिता से पूछते भी कि वह ऐसा क्यों कर रही है तो वह कोई जवाब भी नहीं देती थी. इस तरह कभी घर की अच्छी कही जाने वाली बहू ने ही पूरे परिवार की जिंदगी में उथलपुथल मचा दी थी. एक तरह से सभी का जीना हराम कर दिया था.

और इसी सब का परिणाम आया था 9 अक्तूबर, 2016 को, जब घर के 6 लोगों ने एक साथ मौत को गले लगा लिया था. एक दिन पहले सुकांतो सरकार ने संकेत भी दिया था कि अगर घर के हालात ऐसे ही रहे तो वह कुछ ऐसा कर गुजरेंगे कि कोई सोच भी नहीं सकता.

लेकिन किसी को न तो पता था और न ही विश्वास था कि इस घर से एक साथ 6 लाशें उठेंगी यानी और 6 लोगों की जान चली जाएगी. लेकिन 9 अक्तूबर को कुछ ऐसा ही हुआ. इस तरह 6 लोगों का मौत को गले लगाना दिल दहलाने वाली घटना थी.

पुलिस जांच में घर में जो कागजात मिले थे, उन से मौतों की वजह का पता चल गया था. इन मौतों का सारा इलजाम घर की बड़ी बहू मधुमिता पर लगाया गया था. उसी की ओर इशारा किया गया था कि यह जो कुछ भी हुआ है, उसी की वजह से हुआ है.

जांच में पता चला था कि सभी की रजामंदी के बाद डा. सुकांत सरकार ने ही सभी को पहले एनेस्थेसिया की ओवरडोज का इंजेक्शन लगाया था. बच्चियां किस के सहारे रहेंगी, इसलिए उन्हें भी एनेस्थेसिया का इंजेक्शन लगा दिया गया था. एनेस्थेसिया का इंजेक्शन लगाने के बाद जहर का भी इंजेक्शन लगाया गया था, जिस से कोई न बचे. इस के बाद डा. सुकांत सरकार ने खुद पर चाकू से 14 वार किए थे.

7 साल बाद पुलिस के हत्थे चढ़ी बड़ी बहू

इस मामले की जांच में लगी पुलिस ने कागजों में जो लिखा था, रिश्तेदारों तथा परिचितों से इस बारे में पूछताछ की तो पता चला कि इन मौतों के लिए मधुमिता ही जिम्मेदार है. पुलिस के हाथ जो सबूत लगे थे, उस से साफ हो गया था कि मधुमिता की ही वजह से पूरे परिवार की मौत हुई थी. उसी की प्रताडऩा से तंग आ कर परिवार ने मौत को गले लगाने का निर्णय लिया था.

इस के बाद पुलिस ने मधुमिता पर आत्महत्या के लिए मजबूर करने का मुकदमा दर्ज किया और उसे गिरफ्तार करने नोएडा जा पहुंची. क्योंकि पुलिस के पास नोएडा का ही पता था. पर वह वहां से फरार हो चुकी थी. पुलिस मामले की जांच करते हुए सबूत भी जुटाती रही, साथ ही मधुमिता को गिरफ्तार करने की कोशिश भी करती रही.

कभी इस मामले की फाइल धूल खाती रहती तो कभी कोई अधिकारी मधुमिता को गिरफ्तार करने की कोशिश में नोएडा में छापा मार देता, क्योंकि पुलिस के पास उस का केवल वहीं का पता था. लेकिन इधर पुलिस को पता चला कि मधुमिता कोलकाता में रह रही है. पुलिस ने जब उस की तलाश कोलकाता में शुरू की तो उस का सही पता ही नहीं मिल रहा था. कभी पता मिल भी जाता तो पुलिस के पहुंचने से पहले वह ठिकाना बदल चुकी होती.

लेकिन जून, 2023 में पुलिस को उस का कोलकाता का सही पता मिल गया तो रांची पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. पहले उसे कोलकाता की अदालत में पेश किया गया, जहां से ट्रांजिट रिमांड पर उसे रांची लाया गया है. रांची में उसे सिविल कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया है.

पुलिस अब एक एनजीओ की संचालिका गिताली चंद्रा के बारे में जांच कर रही है कि इस मामले में उन की तो कोई भूमिका नहीं थी.

कलयुगी बेटा : मां के बुढ़ापे का सहारा बना हत्यारा

मेनगेट का ताला खुला देख कर राधा समझ गई कि मनीष आ गया है, क्योंकि घर की चाबियां मनीष के पास भी होती थीं. उतने बड़े घर में मांबेटा ही रहते थे, इसलिए दोनों अलगअलग चाबियां रखते थे कि किस को कब जरूरत पड़ जाए.

राधा ने अंदर आ कर बाजार से लाया सामान किचन में रखा और हाथमुंह धोने के लिए बाथरूम की ओर बढ़ी. वह मनीष के कमरे के सामने से गुजरी तो अंदर से मनीष के साथ लड़की के हंसने की आवाज उसे सुनाई दी. उस के कदम वहीं रुक गए और माथे पर बल पड़ गए.

वह होंठों ही होंठों में बड़बड़ाई, ‘‘मनीष आज फिर नेहा को ले आया है. इस का मतलब यह हुआ कि वह मानने वाला नहीं है.’’

बेटे की इस मनमानी से नाराज राधा उस के कमरे में घुस गई. अंदर उस ने जो देखा, उस से एक बार उसे पलट कर बाहर आना पड़ा. अंदर पड़े बैड पर नेहा अपनी दोनों बांहें मनीष के गले में डाले गोद में बैठी थी.

राधा को देख कर दोनों भले ही अलग हो गए थे, लेकिन उन के चेहरों पर शरम की परछाई तक नहीं थी. वे कमरे से बाहर आए तो राधा ने कहा, ‘‘तू आज फिर इस लड़की को घर ले आया. मैं ने कहा था न कि मुझे यह लड़की बिलकुल पसंद नहीं है, इसलिए इसे घर मत ले आना.’’

‘‘मम्मी, नेहा आप को भले नहीं पसंद, पर मुझे तो पसंद है. आप तो जानती हैं कि मैं इसे बहुत प्यार करता हूं, इसलिए शादी भी इसी से करूंगा.’’ मनीष ने राधा के नजदीक जा कर कहा.

‘‘अगर तुम्हें अपने मन की करना है तो करो. लेकिन जिस दिन तुम ने इस लड़की से शादी की, उसी दिन तुम से मेरा संबंध खत्म.’’ राधा ने गुस्से में कहा.

मांबेटे के इस झगड़े से नेहा खुद को काफी असहज महसूस कर रही थी. इसलिए वह मनीष के पास जा कर बोली, ‘‘मनीष, अभी मैं जा रही हूं. कल कहीं बाहर मिलना, वहीं बाकी बातें करेंगे.’’

नेहा की इस बात से राधा को तो गुस्सा आया ही, मां ने प्रेमिका का अपमान किया था, इसलिए मनीष को भी गुस्सा आ गया था. उस ने चीखते हुए कहा, ‘‘मम्मी, नेहा से शादी करने में तुम्हें परेशानी क्या है, क्या तुम मेरी खुशी के लिए इतना भी नहीं कर सकती?’’

‘‘मैं ने तो तुम्हारी खुशी के लिए न जाने क्याक्या किया है, क्या तुम मेरी खुशी के लिए उस लड़की को नहीं छोड़ सकते?’’ राधा ने व्यंग्य से कहा.

‘‘नेहा को छोड़ना मेरे लिए आसान नहीं है. अगर आसान होता तो मैं कब का छोड़ देता.’’

‘‘इस का मतलब तुम मुझे छोड़ सकते हो, उसे नहीं. सोच लो, तुम्हें दोनों में से एक का ही साथ मिलेगा. चाहे मां के साथ रह लो या उस लड़की के साथ. अगर तुम ने उस लड़की से शादी की तो मेरा तुम से कोई संबंध नहीं रहेगा. मैं तुम्हें अपने इस घर में भी नहीं रहने दूंगी. यही नहीं, मेरे पास जो कुछ भी है, उस में से भी तुम्हें एक कौड़ी नहीं दूंगी.’’ इस तरह राधा ने अपना निर्णय सुना दिया.

मां की इन बातों से मनीष परेशान हो उठा. क्योंकि पिता की मौत के बाद सारी संपत्ति की मालकिन उस की मां ही थी. उस के लिए इस से भी बड़ी चिंता की बात यह थी कि वह पूरी तरह मां पर ही निर्भर था. अगर मां हाथ खींच लेती तो वह पाईपाई के लिए मोहताज हो जाता. जबकि बिना शराब के उसे नींद नहीं आती थी. सिगरेट तो वह पलपल में पीता था.

मनीष ही नहीं, राधा भी कम परेशान नहीं थी. वह उस का एकलौता बेटा था. 5 बेटियों के बाद वह न जाने कितनी मन्नतें मांगने के बाद पैदा हुआ था. बेटा पैदा होने पर राधा और उन के पति लालाराम की खुशी का ठिकाना नहीं रहा था.   लेकिन बेटे से उन्होंने जो उम्मीदें पाल रखी थीं, अधिक लाडप्यार ने उन उम्मीदों पर पानी फेर दिया था. बेटे की ही चिंता में राधा को नींद नहीं आ रही थी. देर रात तक करवट बदलते हुए किसी तरह वह सोई तो फिर सुबह उठ नहीं पाई.

सुबह मनीष उठा तो मां नहीं उठी थी. जबकि हमेशा वह उस से पहले उठ जाती थी. उस ने मां के कमरे में जा कर देखा, वहां की स्थिति देख कर वह सन्न रह गया. राधा की खून में डूबी लाश पड़ी थी. मां को उस हालत में देख कर वह घबरा गया.

उस ने तुरंत थाना जगदीशपुरा पुलिस को मां की हत्या की सूचना दी. इस के बाद उस ने पड़ोस में रहने वाले डा. प्रदीप श्रीवास्तव को मां की हत्या के बारे में बताया. इस के बाद तो यह खबर पूरी कालोनी में फैल गई.

मनीष की एक बहन स्नेहलता उसी कालोनी में रहती थी. मनीष ने उसे भी मां के कत्ल की सूचना दे दी थी. आते ही वह मनीष से लिपट कर रोने लगी. वह उसे झिंझोड़ कर पूछने लगी, ‘‘भैया, किस ने किया मम्मी का कत्ल, उस ने किसी का क्या बिगाड़ा था?’’

‘‘दीदी, मैं तो खाना खा कर सो गया था. सुबह उठा तो मम्मी को इस हालत में पाया?’’ रोते हुए मनीष ने कहा.

लोग बहनभाई को सांत्वना दे रहे थे. राधा के अन्य रिश्तेदारों को भी उस के कत्ल की सूचना दे दी गई थी. नजदीक रहने वाले रिश्तेदार आ भी गए थे.

थाना जगदीशपुरा के थानाप्रभारी आदित्य कुमार भी पुलिसबल के साथ आ गए थे. उन की सूचना पर एएसपी शैलेश कुमार पांडेय भी आ गए थे. राधा की लाश जमीन पर पड़ी थी. उस के सिर, गरदन और चेहरे पर किसी धारदार हथियार से वार किए गए थे. गले पर अंगुलियों के भी निशान थे.

राधा की उम्र 65 साल के आसपास थी. शरीर पर सारे गहने मौजूद थे. कमरे का भी सारा सामान अपनी जगह था. यह देख कर सभी एक ही बात कह रहे थे कि आखिर इस बुढि़या ने किसी का क्या बिगाड़ा था, जो इस की हत्या कर दी गई. जबकि उस का जवान बेटा घर में ही दूसरे कमरे में सो रहा था. पूछने पर मनीष ने पुलिस को बताया था कि मम्मी शायद चीख भी नहीं पाई थी, क्योंकि अगर वह चीखी होतीं तो उस की आंख जरूर खुल जाती.

हत्या लूट के इरादे से नहीं हुई थी, यह अब तक की जांच में साफ हो चुका था. मेनगेट पर ताला राधा ही बंद करती थी. पूछताछ में मनीष ने कहा था कि हो सकता है रात में वह ताला लगाना भूल गई हों.

घटनास्थल के निरीक्षण के दौरान थानाप्रभारी आदित्य कुमार ने देखा था कि वाशबेसिन में खून लगा है. इस का मतलब हत्यारे ने हत्या करने के बाद अपने हाथ वाशबेसिन में धोए थे. इस के अलावा पुलिस को वहां से ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला था, जिस से हत्यारे तक पहुंचा जा सकता.

मां की हत्या पर मनीष जिस तरह रो रहा था, वह लोगों को एक तरह का नाटक लग रहा था. ऐसा लग रहा था, जैसे वह यह साबित करना चाहता है कि मां की हत्या का उसे बहुत दुख है. पुलिस को भी कुछ ऐसा ही अहसास हुआ था. क्योंकि परिस्थितियां मनीष को ही शक के दायरे में ला रही थीं. पूछताछ में पुलिस को कुछ ऐसी बातें पता चलीं थीं, जिस से वही शक के दायरे में आ रहा था.

बहरहाल, पुलिस ने काररवाई को आगे बढ़ाते हुए लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद थाने लौट कर थानाप्रभारी आदित्य कुमार ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.

आदित्य कुमार को पूरी संभावना थी कि हत्या के इस मामले में कहीं न कहीं से मृतका का बेटा जरूर जुड़ा है, फिर भी उन्होंने उसे हिरासत में नहीं लिया था. वह सुबूत जुटा कर ही उसे गिरफ्तार करना चाहते थे. आगे क्या हुआ, यह जानने से पहले आइए थोड़ा मनीष के बारे में जान लें.

आगरा के थाना जगदीशपुरा की विजय विहार कालोनी की कोठी नंबर 27 में रहने वाले लालाराम का बेटा था मनीष. लालाराम ने यह कोठी आगरा में तहसीलदार रहते हुए बनवाई थी. उन के परिवार में पत्नी राधा, 5 बेटियां स्नेहलता, अनीता, प्रेमलता, हेमलता और सुनीता थी.

बेटे के चक्कर में ही उन्हें ये 5 बेटियां हो गई थीं. इसीलिए लालाराम इतने पर भी नहीं रुके थे. आखिरकार छठवीं संतान के रूप में उन के यहां बेटा मनीष पैदा हुआ था. मनीष के पैदा होतेहोते लालाराम और राधा काफी उम्रदराज हो गए थे. उम्र के तीसरे पन में बेटा पा कर पतिपत्नी फूले नहीं समाए थे. एक तो मनीष बुढ़ापे में पैदा हुआ था, दूसरे 5 बेटियों के बाद, इसलिए वह मांबाप का बहुत लाडला था. इसी लाडप्यार में वह बिगड़ता चला गया.

जैसेजैसे बेटियां सयानी होती गईं, लालाराम उन की शादियां करते गए. अच्छी नौकरी में थे, इसलिए उन्होंने सारी बटियों की शादी ठीकठाक घरों में की थीं. उन के 3 दामाद रेलवे में थे, एक बैंक में तो एक प्राइवेट नौकरी में था. बेटे को भी वह पढ़ालिखा कर किसी काबिल बनाना चाहते थे, लेकिन बेटे का मन पढ़ने में कम, आवारागर्दी में ज्यादा लगता था. खर्च के लिए पैसे मिल ही रहे थे, इसलिए उस के दोस्त भी तमाम हो गए थे.

मनीष पढ़ ही रहा था, तभी लालाराम नौकरी से रिटायर हो गए थे. दुर्भाग्य से रिटायर होने के कुछ ही दिनों बाद वह एक ऐसी दुर्घटना का शिकार हुए, जिस की वजह से कोमा में चले गए. यह सन 2005 की बात है. राधा ने पति का बहुत इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

पिता के कोमा में चले जाने के बाद मनीष और ज्यादा आजाद हो गया. राधा के लिए परेशानी यह थी कि वह बेटे को संभाले या पति की देखभाल करे. पति की देखभाल के चक्कर में मनीष उस के हाथ से पूरी तरह निकल गया. आखिर कोमा में रहते हुए सन 2010 में लालाराम की मौत हो गई. पति की मौत के बाद राधा को लगा कि बेटा तो है ही, उसी के सहारे बाकी का जीवन काट लेगी.

लेकिन मनीष मां का सहारा नहीं बन सका. क्योंकि पति की मौत के बाद जब राधा का ध्यान बेटे पर गया तो उसे उस की असलियत का पता चला. उसे पता चला कि बेटा सिगरेट का ही नहीं, शराब का भी आदी हो चुका है. यही नहीं, नेहा नाम की लड़की से उस का प्रेमसंबंध हो गया है, जिस से वह शादी करना चाहता है.

जबकि राधा इस शादी के लिए कतई तैयार नहीं थी. इस की वजह यह थी कि वह लड़की उस की जाति की नहीं थी. बेटे की हरकतों से से राधा बहुत परेशान रहती थी. ऐसे में बेटियां ही उसे थोड़ा सुकून पहुंचा रही थीं. जबकि मनीष को बहनों का आनाजाना भी अच्छा नहीं लगता था. क्योंकि बहनें उसे रोकती टोकती तो थीं ही, मां को भी उसे पैसे देने से रोकती थीं.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार राधा पर धारदार हथियार से तो हमला किया ही गया था, उस का गला भी दबाया गया था. स्थितियों से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि कातिल कोई नजदीकी ही था. शायद वह गला दबा कर पूरी तरह निश्चित हो जाना चाहता था कि उस में जान नहीं रह गई है.

मनीष ने पुलिस को बताया था कि वह रात में शराब पी कर सोया था, इसलिए न तो उसे चीख सुनाई दी थी, न खटरपटर की आवाज. उस ने सफाई तो बहुत दी थी, लेकिन पुलिस को उसी पर संदेह था. इसलिए पुलिस ने अपने मुखबिरों से उस के बारे में पता लगाने को कह दिया था.

मुखबिरों ने थानाप्रभारी आदित्य कुमार को बताया था कि मां-बेटे में अकसर झगड़ा होता रहता था. इस की वजह मनीष की आवारागर्दी थी. लालाराम अपनी सारी संपत्ति राधा के नाम कर गए थे. शायद उन्हें बेटे पर पहले से ही संदेह था.

पुलिस ने अब तक जो सुबूत जुटाए थे, वे मनीष को ही दोषी ठहरा रहे थे. थानाप्रभारी आदित्य कुमार पुलिस बल के साथ उस के घर जा पहुंचे. पुलिस को देख कर मनीष का चेहरा उतर गया. जब सिपाहियों ने उस का हाथ पकड़ कर साथ चलने को कहा तो वह बोला, ‘‘मुझे कहां चलना है?’’

‘‘थाने और कहां, साहब तुम से कुछ पूछताछ करना चाहते हैं.’’ सिपाहियों ने कहा.

‘‘लेकिन मैं ने तो सब कुछ पहले ही बता दिया है,’’ मनीष ने कहा, ‘‘अब क्या पूछना है?’’

‘‘अभी तो तुम से और भी बहुत कुछ पूछना है.’’ कह कर सिपाहियों ने उसे गाड़ी में बैठा दिया.

मनीष को थाने ला कर पूछताछ शुरू हुई. पहले तो वह वही बातें बताता रहा, जो शुरू में बता चुका था. जबकि आदित्य कुमार उस से वह पूछना चाहते थे, जो उस ने सचमुच में किया था. लेकिन यह इतना आसान नही था. उन्होंने जब उसे जुटाए सुबूतों के आधार पर घेरना शुरू किया तो वह फंसने लगा.

जब वह आदित्य कुमार के सवालों में पूरी तरह से फंस गया तो फूटफूट कर रोने लगा. फिर उस ने अपनी मां की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने पुलिस को मां की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

मनीष बिगड़ तो चुका ही था, उस के दोस्त भी वैसे ही थे. राधा का सोचना था कि वह उस की शादी कर दे तो शायद उस में सुधार आ जाए. उस के पास किसी चीज की कमी तो थी नहीं, इसलिए उसे अच्छा रिश्ता मिल सकता था. लेकिन तभी राधा को पता चला कि मनीष का शाहगंज की रहने वाली किसी लड़की से चक्कर चल रहा है. वह लड़की दूसरी जाति की थी, इसलिए राधा किसी भी स्थिति में उस से मनीष की शादी नहीं करना चाहती थी.

इस की एक वजह यह भी थी कि उस लड़की यानी नेहा के घर वालों को मनीष और उस के संबंधों का पता नहीं था. ऐसे में अगर शादी हो जाती तो हंगामा भी हो सकता था. इसलिए राधा इस झंझट में नहीं पड़ना चाहती थी. जबकि मनीष अपनी जिद पर अड़ा था. यही वजह थी कि एक दिन वह नेहा को ले कर घर आ गया.

तब राधा ने दोनों को डांटा ही नहीं था, बल्कि नेहा को चेतावनी भी दी थी कि अगर वह नहीं मानी तो वह उस की शिकायत उस के पिता से कर देगी. इस के बाद उस ने यह बात अपनी बड़ी बेटी और दामाद को बताई तो उन्होंने कहा कि वे मनीष को समझा देंगे.

26 फरवरी को राधा की अनुपस्थिति में मनीष फिर नेहा को घर ले आया. संयोग से राधा घर आ गई और नेहा को मनीष की बांहों में देख लिया तो वह भड़क उठी. उस ने दोनों को डांटाफटकारा ही नहीं, नेहा को अपमानित कर के भगा दिया और मनीष को अपनी संपत्ति से बेदखल करने की धमकी दे दी.

मनीष न तो नेहा को छोड़ना चाहता था और न ही मां की संपत्ति को. उसे यह भी पता था कि मां वसीयत बनवाने के लिए वकील से सलाह ले रही है. इसलिए उसे लगा कि अगर मां ने सचमुच उसे संपत्ति से बेदखल कर दिया तो वह कहीं का नहीं रहेगा. वह यह भी जानता था कि मां जो ठान लेती है, कर के मानती है.

अगर राधा सारी संपत्ति बेटियों के नाम कर देती तो मनीष का भविष्य अंधेरे में फंस जाता. अपने भविष्य को बचाने के लिए उस ने गहराई से विचार किया तो उसे लगा कि अगर मां न रहे तो उस की संपत्ति भी उसे मिल जाएगी और वह नेहा से शादी भी कर सकेगा.

इस के बाद उस ने तय कर लिया कि वह मां की हत्या कर के अपना रास्ता साफ कर लेगा. रात का खाना खा कर मनीष लेट गया. उसे मां की हत्या करनी थी, इसलिए उसे नींद नहीं आ रही थी. दूसरी ओर बेटे की चिंता की वजह से राधा को भी नींद नहीं आ रही थी.

करवट बदलते बदलते राधा को नींद आ गई तो मनीष को मौका मिल गया. राधा के सोते ही मनीष ने पहले से छिपा कर रखा हंसिया उठाया और राधा के कमरे में जा पहुंचा. सो रही राधा के चेहरे पर उस ने वार किया तो राधा चीखी. मनीष ने झट उस का मुंह दबा दिया तो वह बेहोश हो गई. इस के बाद उस ने 2-3 वार और किए.

मनीष ने देखा कि मां अभी मरी नहीं है तो उस ने गला दबा दिया. राधा का खेल खत्म हो गया. उस ने रास्ते का कांटा तो निकाल फेंका, लेकिन अब उसे पुलिस का डर सताने लगा. वह पुलिस से बचने का उपाय सोचने लगा.

काफी सोचविचार कर मनीष ने खून लगे कपड़े उतार कर छिपा दिए. इस के बाद मोटरसाइकिल निकाली और देर तक आगरा की सड़कों पर बेमतलब घूमता रहा. सड़क पर घूमते हुए ही उस ने खुद को बचाने के लिए एक कहानी गढ़ डाली.

सुबह सब से पहले उस ने मां की हत्या की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दी. इस के बाद अपना पक्ष मजबूत करने के लिए उस ने पड़ोसी डा. प्रदीप श्रीवास्तव को घटना के बारे में बताया. इस के बाद कालोनी में ही रहने वाली बहन स्नेहलता को सूचना दी.

पुलिस ने मनीष की निशानदेही पर उस के घर से वह हंसिया बरामद कर लिया, जिस से उस ने मां की हत्या की थी. उस के वे कपड़े भी मिल गए थे, जिन्हें वह हत्या के समय पहने था. पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे आगरा की अदालत में उसे पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक मनीष जेल में था. अब दुविधा उस की बहनों के सामने है कि वे एकलौते भाई को बचाएं या मां के हत्यारे को सजा दिलाएं.

एक परिवार ऐसा भी

गांव के किनारे हरेभरे खेतों के बीच सुनसान इलाके में बना एक आलीशान और लंबाचौड़ा  मकान. मकान के इर्दगिर्द पसरा हुआ सन्नाटा, गहरी रात का अंधेरा. दोमंजिला मकान की दूसरी मंजिल के चारों तरफ गैलरी बनी हुई थी. कंधों पर दोनाली बंदूक लटकाए उस गैलरी में मुस्तैदी से 2 पहरेदार घूम रहे थे.

रफता रफता रात ढली, जैसे ही भोर होने को आई और घड़ी की सूइयों ने ठीक 5 बजाए तभी एक बंदूकधारी ने छत पर लोहे की जंजीर के सहारे लटक रहे पीतल के घंटे को बजाना शुरू कर दिया.

घंटे की आवाज सुन कर परिवार का हर सदस्य नींद से जाग कर अपने दैनिक कार्यों में लग गया. नित्यकर्म से निपटने के बाद घर की स्त्रियां नाश्ता तैयार करने में जुट गईं और पुरुष नहाधो कर नाश्ते के लिये कतारबद्ध हो कर बैठ गए. नाश्ता कर के पुरुष अपनेअपने कामों में लग गए, जबकि स्त्रियां बच्चों को स्कूल जाने के लिए तैयार करने लगीं.

इसी तरह दोपहर 1 बजे घंटे की आवाज सुन कर खेतों में काम कर रहे पुरुष खाना खाने के लिए घर आते हैं और थोड़ा आराम करने के बाद अपने काम पर चले जाते हैं. इतने बड़े परिवार में यह सब बड़े ही अनुशासन में चलता है. नियम संयम से अपना जीवनयापन करने वाला यह संयुक्त और अनोखा परिवार अपने बनाए नियमों पर जी रहा है. मौसम और हालात चाहे जो हो, इस परिवार की दिनचर्या नहीं बदलती.

इस अनोखे परिवार की बुनियाद रखने वाले शख्स का नाम था निधान सिंह. भले ही अब वह इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन यह बड़ा परिवार आज भी उन के बनाए नियमों, आदर्शों और परंपराओं पर चल रहा है.

निधान सिंह का परिवार उत्तर प्रदेश के जनपद मेरठ के दौराला थानांतर्गत ग्राम अझौता में रहता था.  उन का विवाह 1951 में श्रीमती किरन से हुआ था. उस समय उन की माली हालत अच्छी नहीं थी. परिवार की आजीविका का एकमात्र जरिया खेती थी. निधान सिंह 5 भाइयों में सब से बड़े थे. गंभीर प्रवृत्ति के होने की वजह से उन्हें परिवार की जिम्मेदारियों का अहसास था. वह अपना अधिक से अधिक वक्त खेती में ही बिताते थे.

सब कुछ ठीकठाक चल रहा था, लेकिन बाद में भाइयों के बीच मतभेद रहने लगे. मामूली बातें भी गंभीर बनने लगीं. हालात यह हो गए कि उन के भाई अलग रहने लगे. निधान सिंह नहीं चाहते थे ऐसा हो, भाइयों के अलग होने से वह बहुत आहत हुए और परेशान रहने लगे.

एक दिन उन्होंने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ पत्नी से कहा, ‘‘किरन अब तक जो हुआ सो हुआ, लेकिन भविष्य में मैं अपने परिवार को एक सूत्र में बांध कर नई मिसाल कायम कर दूंगा. तुम देखना लोग हमारे परिवार की मिसाल दिया करेंगे.’’ निधान सिंह ने जैसे खुद को ही तसल्ली दी.

समय के साथ निधान सिंह 5 बेटों के पिता बन गए. जो जमीन बची थी, उस का सही उपयोग करने के साधन भी घर में नहीं थे. लेकिन निधान सिंह ने हिम्मत नहीं हारी और मन ही मन मेहनत के बल पर इसी जमीन को बढ़ाने का फैसला कर लिया. घर की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी, जबकि निधान सिंह के 2 छोटे भाई अभी पढ़ाई कर रहे थे. पैसे के अभाव में उन की पढ़ाई की दिक्कत आने लगी.

ऐसे दौरे में देवरों के लिए किरन ने अपने जेवर बेच दिए. मानसिक और शारीरिक श्रम की प्रक्रिया चलती रही. वक्त के साथ दोनों छोटे भाइयों में से एक ने एमए और दूसरे ने बीए कर लिया. बाद में उन का विवाह भी कर दिया गया. एक दिन निधान सिंह पत्नी से बोले, ‘‘दोनों बहुओं के और अपने जेवर एक साथ रखना.’’

‘‘और हां एक बात और.’’ वह कुछ रुक कर बोले, ‘‘जिस संदूक में जेवरों को रखो, उस में ताला मत लगाना. जिस का जो मन चाहे वह पहने. जब अपने पराए की भावना नहीं रहेगी, तो मनमुटाव भी नहीं होगा.’’

किरन ने ऐसा ही किया, उन्होंने बहुओं को समझाया कि सब के जेवर और कपड़े एक साथ रखे जाएंगे और किसी बक्से में ताला भी नहीं लगेगा. निधान सिंह के इस निर्णय और नए नियम पर न तो भाइयों को आपत्ति हुई और न ही उन की पत्नियों को. ऐसा ही किया गया. इस के बाद परिवार की यह परंपरा बन गई.

समय अपनी गति से चलता रहा. मेहनत के दम पर निधान सिंह ने कुछ और जमीन भी खरीद ली. इस बीच देखते ही देखते वह 5 बेटों— मंजीत सिंह, अजीत सिंह, जगदीप सिंह, जगजीत सिंह और कुलदीप सिंह के पिता बन गए. वंशबेल बढ़ी तो परिवार में खुशहाली आ गई.

यह सच है कि दुनिया में दूसरों की खुशहाली पर जलने वालों की कमी नहीं होती. कुछ लोग अपने दुख से ज्यादा दूसरों की खुशी पर दुखी होते हैं. गांव के कुछ लोग भी निधान सिंह के परिवार से जलन की भावना रखने लगे थे. सब का मिल कर रहना उन्हें पसंद नहीं आ रहा था.

कुछ खुराफाती लोगों ने रात के वक्त उन के घर के बाहर शराब पीकर हुड़दंग और गालीगलौज करनी शुरू कर दी. परिवार के पुरुष कई बार रात को  खेतों पर रहते थे और घर में महिलाएं अकेली. निस्संदेह यह चिंता का विषय था. एक रात निधान सिंह घर पर ही थे कि तभी 3-4 शराबियों ने घर के बाहर हुड़दंग शुरू कर दिया. उन से नहीं रहा गया, तो उन्होंने बाहर आ कर कहा, ‘‘यहां क्यों तमाशा कर रहे हो?’’

‘‘चाचा, शराब पी कर आदमी तमाशा नहीं करेगा तो क्या पूजा करेगा?’’

‘‘यह बहुत बुरी बात है.’’

‘‘हम भी जानते हैं, शराब पीना भला अच्छी बात कैसी हो सकती है? लेकिन मजा आता है, इस लिए पीते हैं.’’

शराबियों की बातों से निधान सिंह को अहसास होने लगा कि वह उन के साथ बदतमीजी पर उतारू हो रहे हैं. फिर भी उन्होंने सामान्य लहजे में पूछा, ‘‘तुम हमारे घर के सामने ही हुड़दंग क्यों करते हो?’’

‘‘ये तो हमारी मरजी है.’’ नशे की पिनक में शराबी उन से लड़ने को तैयार हो गए.

एक शराबी अकड़ कर बोला, ‘‘हमारी बात सुनो निधान सिंह, तुम मुखिया होगे अपने घर के. ये सड़क किसी के बाप की नहीं है जो हम तुम्हारे कहने से रुक जाएंगे. इतनी ही शांति चाहिए तो कहीं ऐसी जगह जा कर रहो, जहां तुम्हारा हुक्म चल सके.’’

उस वक्त निधान सिंह की जगह कोई और होता, तो ईंट का जवाब पत्थर से देता, लेकिन वह चूंकि शांत प्रवृत्ति वाले इंसान थे, इसलिए उन्होंने अपने गुस्से को जब्त कर लिया. कुछ देर हंगामा करने के बाद शराबी बड़बड़ाते हुए वहां से चले गए.

कभीकभी छोटी सी बात के लिए इंसान बहुत कुछ कर बैठता है. निधान सिंह को शराबियों की बात कांटे की तरह चुभ गई. वह मेहनत के बल पर आगे बढ़ने वाले धुन के पक्के इंसान थे. उस रात निधान सिंह को ठीक से नींद नहीं आई. शराबियों की बातें उन के कानों में गूंजती रहीं. सुबह होतेहोते उन्होंने उस घर को ही छोड़ने का फैसला कर लिया.

कई दिनों के विचार मंथन के बाद एक दिन वह परिवार के सभी सदस्यों को जमा कर के उन से बोले, ‘‘हम इस घर को छोड़ देंगे. अब हम ऐसी जगह रहेंगे जहां शांति हो, सभ्यता हो और हमारा हुक्म भी चले.’’

परिवार के मुखिया की बात सुन कर सभी चौंके, लेकिन किसी को कुछ कहने या पूछने की हिम्मत नहीं थी. सब को चुप देख निधान सिंह आगे बोले, ‘‘अब हम गांव के कोने वाले खेत में अपना घर बना कर रहेंगे. वहां खेती की देखभाल भी अच्छी तरह होती रहेगी. और शांति भी रहेगी. वहां हमारे अपने नियम होंगे, कायदेकानून होंगे.’’

उन का निर्णय अजीब जरूर था, लेकिन परिवार के किसी भी सदस्य को उन के निर्णय पर कोई आपत्ति नहीं हुई. इस के बाद निधान सिंह ने खेत में अपना घर बनवाना शुरू कर दिया. गांव के लोगों को उन के निर्णय पर हैरानी भी हुई और चर्चाएं भी हुईं.

मकान तैयार हो गया तो पुराना मकान बेच कर पूरा परिवार नए घर में आ गया. वहां नितांत खामोशी और एकांत था. लोगों  को उन का खेत में रहना भले ही अजीब लग रहा था, लेकिन निधान सिंह खुश थे. हालांकि उन के लिए जंगल में मंगल करने जैसी बड़ी चुनौती थी. इस जगह का नाम उन्होंने रखा ‘अजय बाग.’ यह बात सन 1970 की है.

निधान सिंह गांव छोड़ कर चले तो आए थे, लेकिन वहां रहना खतरे से खाली नहीं था. एकांत होने के चलते कोई वारदात भी हो सकती थी. इस का उपाय भी उन्होंने खोज निकाला.

उन्होंने घर की महिलाओं की इच्छा से उन के जेवर बेच कर बंदूक का लाइसेंस बनवा लिया. सब्जी आदि खरीदने के लिए घर से बाहर न जाना पड़े इसका रास्ता भी उन्होंने निकाला. सब्जियों के लिए उन्होंने 10 बीघा खेत में बागवानी शुरू कर दी. जहां आज कई किस्म के आम, अमरूद, आडू, नींबू, कटहल आदि के पेड़ लगे हैं.   इस के साथ उन्होंने बड़े पैमाने पर गाएं पाल कर दूध की डेयरी शुरू कर दी. आज उन के यहां सैकड़ों गाएं हैं, जिन का दूध टैंकरों से बडे़ डेयरी उपक्रमों पर ले जाया जाता है.

अपने परिवार के लिए निधान सिंह ने कुछ नियम निर्धारित कर दिए थे. अपने बच्चों को उन्होंने उच्च संस्कार और शिक्षा दिलाई. उन के पांचों बेटों ने उच्च शिक्षा प्राप्त की. शिक्षा भी ऐसी जो समाज और परिवार के काम आ सके.

हुआ भी यही, जगदीप सिंह ने इंजीनियरिंग कर के घर का काम सभांल लिया. उन्होंने आधुनिक तरीके से खेती का विकास किया, कृषि की नईनई तकनीकों का इस्तेमाल कर के बेहतर फसलें उगाईं. दूसरी तरफ अजीत सिंह ने पशु चिकित्सक की डिग्री हासिल कर ली थी.

इतने बड़े परिवार के लिए यहां खाना आदि पकाने के लिए गोबर गैस का उपयोग किया जाता है. शुरू मे यहां 210 क्यूबेक का टैंक लगाया गया. आज 900 क्यूबेक का टैंक है. इस गैस से खाने के अलावा आधी गैस और आधे डीजल की मदद से 10 होर्सपावर का इंजन चलाया जाता है, 5 किलोवाट का जनरेटर चला कर बिजली प्राप्त की जाती है.

जगदीप सिंह ने इंजीनियरिंग में कुछ सीखने की ललक में जापान की यात्रा की. इस यात्रा का लाभ यह हुआ कि वह एक ऐसी अनोखी तकनीक सीखकर अपने घर लौटे, जिस का कभी भारत में प्रयोग नहीं किया गया था. उन्होंने 6 महीने के कठिन परिश्रम से एक आटोमैटिक गेयर प्रणाली वाली बाइंडिंग मशीन विकसित की. इस मशीन से एक साथ 6 मोटर बाइंडिंग की जाती हैं. अझौता और आसपास के गांवों के लोग शहर जाने के बजाए अब यहीं अपनी मोटर बाइंडिंग कराना पसंद करते हैं.

जिन दिनों ‘रामायण’  धारावाहिक आता था, उन दिनों बिजली बहुत जाती थी. ग्रामीण इस से परेशान रहते थे क्योंकि वे रामायण सीरियल देखना चाहते थे. उन दिनों ऐसी तकनीक नहीं थी कि टेलीविजन सेट को बैटरी से चलाया जा सके. जगदीप सिंह ने कठिन परिश्रम से एक पी.एस. यूनिट बनाई. यह उपकरण बैटरी से एसी करंट बना कर उतनी ही बोल्टेज टीवी को देता था, जितनी कि उसे आवश्यकता होती थी.

प्रयोग सफल होते ही उन्होंने इस की बिक्री शुरू कर दी. जब यह तकनीक विकास में आई, तो बाद में इसे टीवी सेटों में भी लगाया जाने लगा. लोकल टीवी कंपनियां उन से  संपर्क कर के उन की बनाई यूनिट लेने लगीं.

फिलहाल इस परिवार में छोटेबड़े मिलाकर करीब 40 सदस्य हैं. गांव की आबादी से कुछ हट कर रहने वाला यह अद्भुत परिवार है. परिवार में अपना पशु चिकित्सक है, कृषि विशेषज्ञ और इलैक्ट्रौनिक इंजीनियर है. घर की महिलाओं के कपड़े और आभूषण आज भी एक जगह रखे जाते हैं. जिसका जो कपड़ा, गहना पहनने का मन करता है, वह पहन लेती है.

इसी तरह पुरुषों व बच्चों के कपड़े भी एक जगह रखे जाते हैं. बड़ों में स्नेह है, तो बच्चे आज्ञाकारी हैं. न तो बड़ों में अपनेपराए की भावनाएं हैं और न ही छोटों में. घर के हर सदस्य को समान अधिकार प्राप्त हैं. सब के जीवन के कुछ निश्चित लक्ष्य हैं, जिन की प्राप्ति के लिए वे पूरी मेहनत करते हैं.

परिवार के सभी सदस्य उस धर्म का पालन करते हैं, जो इंसानियत सिखाता है. पेड़पौधों और पशुपक्षियों से प्रेम करना सिखाता है. यह परिवार रोजाना पक्षियों के लिए मकान की छत पर कई किलोग्राम अनाज डालता है. पूरा परिवार अपनी आमदनी का ढाई प्रतिशत दान के रूप में खर्च करता है. यह दान नकद रुपयों और अनाज के रूप में होता है.

इस परिवार का कोई भी सदस्य मांस, पान, बीड़ी या शराब का सेवन नहीं करता. सात्विकता की हद यह है कि ये लोग चमड़े से बना जूता तक नहीं पहनते. परिवार के हर सदस्य के लिए शिक्षा प्राप्त करना जरूरी है. दहेज प्रथा का विरोध किया जाता है.

परिवार में गरीब घरों की लड़कियां भी बहू बन कर आई हैं और अमीर घरों की भी. सभी समान रूप से रहती हैं. सुबह उठकर वह बड़ों के पांव छूना नहीं भूलतीं. वे खाना पकाती हैं, बच्चों को पढ़ाती हैं और कामों से पुरुषों का हाथ बंटाती हैं.

परिवार के पुरुष सदस्य खेती के साथ बागवानी करते हैं, डेयरी चलाते हैं और इलैक्ट्रौनिक्स के उपकरण बनाते हैं. घर में बच्चों के लिए झूले आदि, परिवार की जरूरत के लिए गोबर गैस प्लांट, इनवर्टर, डिश टीवी जैसी वे सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं, जो शहरों में होती हैं.

यह इंतजाम इसलिए किए गए हैं ताकि कोई अपनी धरती से विमुख न हो. परिवार के किसी सदस्य का कभी किसी से झगड़ा नहीं होता. खुद को आदर्श व्यक्ति के रूप में पेश करना और परिवार को जोड़े रखने की जिम्मेदारी यहां हरेक सदस्य की है. फिर भी गलतियां करने पर सजा दी जाती है. सजा के तौर पर घर के बड़े कुछ दिनों तक छोटों को अपने पैर नहीं छूने देते. यह परिवार संस्कारों के सूत्र में बंध कर टूटतेबिखरते परिवारों के लिए मिसाल बना हुआ है.

जाना अनजाना सच : जुर्म का भागीदार – भाग 3

जिस कमरे में अनवर मुझे ले गया, उस में हलका अंधेरा था. मैं ने देखा, एक कोने में एक लड़का फैल्ट हैट पहने म्यूजिक सुन रहा था. मैं अनवर की अम्मी के सीने से लग कर उन के मुंह से अपने लिए दुलहन शब्द सुनने को बेताब थी.

‘‘अम्मी को जल्दी बुलाइए न,’’ कह कर मैं अनवर को हैरानी से देखने लगी. दिल में तूफान सा छाया हुआ था जो अनवर की अम्मी के दीदार से ही शांत हो सकता था. बाहर अंधेरा स्याह होता जा रहा था.

‘‘अम्मी गुसलखाने में हैं.’’ अनवर ने मुझे कुरसी पर बैठा कर गिलास थमाते हुए कहा, ‘‘तब तक कोक पियो.’’ अनवर की आंखों का बदलता रंग देख कर मैं ने जल्दी से कोक पी लिया. लेकिन यह क्या, मुझे सब कुछ धुआंधुआं सा लगने लगा. मैं होश खोती जा रही थी.

तभी अनवर ने मेरे गाल पर एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया. उस वक्त उस की आंखें बारूद उगल रही थीं. यह इंतकाम की आग थी. वह गुस्से में बोला, ‘‘मैं मवाली हूं, गुंडा हूं, बदचलन हूं. यही कहा था ना तेरी मां ने.’’

धीरेधीरे मैं पूरी तरह बेहोश हो गई, विरोध की कतई क्षमता नहीं थी. अनवर की दुलहन बनने का मेरा ख्वाब टूट चुका था. जब मुझे थोड़ाथोड़ा होश आना शुरू हुआ तो मुझे अनवर और उस के साथी की हंसी सुनाई दी. अनवर का दोस्त थोड़ी दूर गलियारे में उस से कह रहा था, ‘‘अनवर, आज जैसा मजा पहले कभी नहीं आया.’’

अनवर और उस के दोस्त की जहरीली हंसी मेरे दिल में नश्तर की तरह चुभ रही थी. मैं लड़खड़ाते हुए उठी, पूरा बदन दर्द से बेहाल था. मेरे कपड़े, मेरा लहूलुहान जिस्म, मेरी तबाही की कहानी कह रहे थे. मैं चुपचाप बाहर आ गई. बाहर से स्कूटर ले कर मैं घर लौट आई. तब तक पूरा शहर अंधेरे के आगोश में डूब चुका था. गनीमत यह थी कि अब्बू टुअर पर थे. इस काली रात की कहानी जानने वाला मेरे अलावा कोई नहीं था.

मैं ने जब अम्मी को बताया तो वह चीख पड़ीं, मुझे बुरी तरह डांटा, पीटा. मैं सारी रात सिसकती रही. उस के बाद हर रात मेरी सिसकियां अंधेरों में घुटती रहीं. मम्मी भी किटी पार्टियां अटैंड करना, सैरसपाटा, शौपिंग सब भूल गई थीं. मेरी जैसी मांओं के लिए, जिन के पास अपने बच्चों की देखभाल का वक्त न हो, इस से बड़ी सजा और हो भी क्या सकती थी?

अम्मी ने मुझे सख्त हिदायत दी थी कि इस राज को परदे में ही रखूं. फिर जल्दीबाजी में मेरी शादी मेराज से कर दी गई थी. मेरी पसंदनापसंद या मरजी के बारे में पूछना भी मुनासिब नहीं समझा गया था. मैं होमली लड़की थी. शादी की बात आई तो नए अरमान फिर से जेहन में करवट लेने लगे. शौहर के कदमों के नीचे औरत का स्वर्ग होता है. मैं उसी स्वर्ग की कल्पना करने लगी.

मेरा निकाह हो गया. मैं सुहागसेज पर बैठी अपने शौहर के आने का बेताबी से इंतजार कर रही थी, मेरी आंखों में भावी जीवन के गुलाबी सपने तैर रहे थे. तभी किसी के कदमों की आहट पास आती सुनाई दी तो मैं खुद में सिमट गई. मैं ने घूंघट की ओट से देखा तो मेराज की सुनहरी शेरवानी से सजा फूलों सा महकता व्यक्तित्व नजर आया. उन्होंने धीरे से करीब आ कर मेरा घूंघट पलटा तो ऐसे चौंके जैसे किसी नागिन को देख लिया हो.

मुझे पर टेढ़ी नजर डाल कर मेराज बाहर चले गए. बस, उस दिन के बाद हम दोनों के बीच एक अदृश्य सी दीवार बन गई. हम ने सालों साथ गुजारे तो सिर्फ इसलिए क्योंकि दो बड़े परिवारों की इज्जत का मामला था. हम साथ रह कर भी नदी के दो किनारे बने रहे. मैं देवर और ननदों को पालने, बड़ा करने में लगी रही और मेराज बिजनैस में. मैं चाह कर भी नहीं जान पाई कि मेराज को मुझ से क्या शिकायत थी, वह मुझ से क्यों दूर रहना चाहते थे. अब तक यही स्थिति थी.

रात गहरा रही थी. नैनी झील के किनारे लगी लाइटों की रोशनी पानी की लहरों पर लहराती हुई बड़ी अच्छी लग रही थी, लेकिन अब उसे देखने का मन नहीं था. मैं मेराज के सीने से लिपटी उन में अपने हिस्से का प्यार खोज रही थी. मन चाह रहा था, सालों की चाह आज ही पूरी कर लूं.

तभी मेराज गंभीर स्वर में बोले, ‘‘क्या तुम किसी अनवर को जानती हो?’’

अनवर का नाम सुन कर मैं एक ही झटके में खयालों से बाहर आ गई. मैं ने डर कर कांपती आवाज में पूछा, ‘‘क्यों, आप उसे कैसे जानते हैं?’’

‘‘क्योंकि वह मेरा जिगरी दोस्त था. जिस रोज तुम उस के पास आई थीं, मैं ही कैप लगाए म्यूजिक सुन रहा था. अंधेरे की वजह से तुम मुझे पहचान नहीं सकी थीं. आगे क्या हुआ, तुम जानती ही हो. जब हमारा निकाह हुआ, मुझे भी मालूम नहीं था कि जिसे मेरा जीवनसाथी बनाया जा रहा है, वह तुम हो. यही वजह थी कि सुहागरात में घूंघट उठाते वक्त मैं चौंक गया था. गलती अनवर की थी और मैं उस में भागीदार था. इस के बावजूद मेरे मन में तुम्हें ले कर दुर्भावना बनी रही कि तुम्हें मेरी बीवी नहीं होना चाहिए था. लेकिन अब मेरी सोच बदल गई है. गलत मैं था, तुम नहीं.’’

लंबी खामोशी जब टूटती है तो उस की गूंज भी देर तक सुनाई देती है. डाल से बिछड़े पत्ते की तरह मैं बद्हवास थी, तभी इन का कोमल स्वर सुनाई दिया, ‘‘तुम ने वहां आ कर जो भूल की थी, उस में मैं भी तो बराबर का गुनहगार हूं.’’ इन के सीने से लगी मैं कांप रही थी. हम दोनों ही शर्मसार थे और एकदूसरे की चाहत में बेताब भी.

सपना का अधूरा सपना – भाग 3

अभिनय ने आर्यसमाज मंदिर में विधिविधान से सपना से शादी कर के सभी को मिठाई खिलाई. इस के बाद प्रार्थना को उस के घर भेज दिया और सपना को साथ ले कर लोहियानगर स्थित अपने घर आ गया. अभिनय के घर वालों ने सपना को बहू के रूप में स्वीकार कर के उस का भव्य स्वागत किया.

प्रार्थना घर पर पहुंची तो उसे अकेली देख कर घर वालों ने सपना के बारे में पूछा. जब उस ने कहा कि बाजार में सपना उसे चकमा दे कर भाग गई है तो घर वाले बौखला उठे. उन्होंने तुरंत सपना को फोन किया. जब सपना ने बताया कि उस ने अभिनय से शादी कर ली है और अब वह उसी के यहां रहेगी तो कुंवरपाल सपना को समझाने लगा कि उस के इस कदम से उस की कालोनी और समाज में बड़ी बदनामी होगी, इसलिए वह वापस आ जाए.

लेकिन जब सपना ने साफसाफ कह दिया कि अब वह किसी भी सूरत में अभिनय को छोड़ कर नहीं आ सकती तो खीझ कर कुंवरपाल ने फोन काट दिया. इस के बाद पतिपत्नी ने प्रार्थना की जम कर पिटाई की. इस तरह सपना की करनी की सजा प्रार्थना को भोगनी पड़ी.

अगले ही दिन कुंवरपाल ने अपने दोनों सालों नंदकिशोर तथा राधाकिशन को बुलाया और उन से पूछा कि अब क्या किया जाए? एक बार उन के मन में आया कि क्यों न वे अभिनय को मार दें. लेकिन जब इस बात पर उन्होंने गहराई से विचार किया तो उन्हें लगा कि इस मामले में अभिनय की क्या गलती है, भाग कर शादी तो सपना ने की है, इसलिए जो सजा दी जाए, उसे दी जाए. इस तरह सपना घर वालों की आंखों का कांटा बन गई.

कुंवरपाल अकसर फोन कर के सपना को समझाता और धमकी देता रहता था कि उस ने जो किया है, वह ठीक नहीं किया है, वह वापस आ जाए, इसी में उस की भलाई है. अगर उस ने उस का कहना नहीं माना तो वह उसे छोड़ेगा नहीं, भले ही उसे पूरी उम्र जेल में बितानी पड़े. इस तरह सिर नीचा कर के जीने से तो अच्छा है, वह पूरी जिंदगी जेल में ही काट दे.

अभिनय के घर वालों ने सपना को बहू के रूप में स्वीकार तो कर लिया था, लेकिन अभिनय के पिता शिशुपाल सिंह जादौन के मन में एक कसक थी कि वह अपने बेटे की शादी धूमधाम से नहीं कर सके. इसलिए वह चाहते थे कि सपना के घर वाले उस की शादी धूमधाम से कर दें. सपना जानती थी कि उस का बाप ऐसा कतई नहीं करेगा, इसलिए उस ने ससुर से कह दिया कि ऐसा होना नामुमकिन है.

शिशुपाल सिंह को लगा कि बेटे की शादी धूमधाम से नहीं हो सकती तो वह अपने घर इस शादी की दावत कर के अपने परिचितों और रिश्तेदारों को बता दें कि उन के बेटे ने प्रेम विवाह कर लिया है. वह दावत की तैयारी कर रहे थे कि एक दिन कुंवरपाल पत्नी उर्मिला और साली के साथ उन के घर आ पहुंचा.

कुंवरपाल और उस की पत्नी ने सपना और उस की ससुराल वालों से कहा कि जो हो गया, सो हो गया. अब वे अपनी बेटी की शादी सामाजिक रीतिरिवाज के अनुसार धूमधाम से करना चाहते हैं. इसलिए शादी की तारीख तय कर के वे सपना को अपने साथ ले जाना चाहते हैं.

सपना मांबाप के साथ घर जाना तो नहीं चाहती थी. लेकिन अभिनय और उस के ससुर शिशुपाल सिंह ने समझाबुझा कर उसे कुंवरपाल के साथ भेज दिया.

आखिर वही हुआ, जिस बात का सपना को डर था. घर आने के बाद कुंवरपाल सपना को इस बात के लिए राजी करने लगा कि उस ने एटा के जिस लड़के के साथ उस की शादी तय की है, वह उस के साथ शादी कर ले. सपना इस के लिए तैयार नहीं थी. उस का कहना था कि एक बार उस ने अभिनय से शादी कर ली है तो वह अब किसी दूसरे से शादी क्यों करे.

25 जुलाई की शाम को भी कुंवरपाल ने सपना से एटा वाले लड़के से शादी करने की बात कही. लेकिन सपना ने साफ मना कर दिया. इस के बाद रात का खाना खा कर जब घर के सभी लोग सो गए तो कुंवरपाल दबे पांव सपना के कमरे में पहुंचा. अंदर से सिटकनी बंद कर के उस ने एक बार फिर सपना को शादी के लिए मनाना चाहा. लेकिन सपना नहीं मानी तो वह उसे मनाने के लिए करंट लगाने लगा. इसी करंट लगाने में सपना बेहोश हो गई.

सपना का इस तरह बेहोश हो जाना कुंवरपाल को खतरे की घंटी लगा. उस ने सोचा कि अब इस का जिंदा रहना ठीक नहीं है, इसलिए उस ने उस की गर्दन और हाथ पर तार लपेट कर प्लग में लगा दिया, जिस से सपना तड़पतड़प कर मर गई.

सपना को मौत के घाट उतार कर कुंवरपाल ने यह बात पत्नी उर्मिला को बताई तो वह सन्न रह गई. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उस का पति इतना घिनौना काम भी कर सकता है. कुंवरपाल ने गुस्से में सपना को मार तो डाला, लेकिन अब उसे अपने किए पर पछतावा हो रहा था. अब उसे जेल जाने का भी डर सताने लगा था. उस समय रात के 2 बज रहे थे.

पुलिस से बचने के लिए उस ने अन्य बच्चों को जगाया और उन्हें घर से बाहर कर के सपना के मोबाइल फोन का स्विच औफ कर दिया. उन्होंने बच्चों को इस बात की जानकारी नहीं होने दी कि सपना के साथ क्या हुआ है. घर में बाहर से ताला लगा कर कुंवरपाल पत्नी और अन्य बच्चों के साथ फरार हो गया.

पूछताछ के बाद उत्तर कोतवाली पुलिस ने अपनी ही बेटी की हत्या के आरोप में कुंवरपाल सिंह यादव को जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक बाकी कोई गिरफ्तार नहीं हुआ था. पुलिस उन की तलाश कर रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

फरेब के जाल में फंसी नीतू – भाग 3

एक समझदार ससुर की तरह बाबूलाल मऊ नीतू के मायके पहुंचा और दुनिया की ऊंच नीच और इज्जत दुहाई देते उसे मना कर वापस ले आया. यह पिछले साल नवरात्रि की बात है. नीतू दोबारा ससुराल आ गई. पत्नी क्यों मायके चली गई थी और फिर वापस क्यों आ गई और सेक्स से अंजान रामजी को इन बातों से कोई सरोकार नहीं था.

हालात देख बाबूलाल के मन में पाप पनपा और उस ने नीतू से नजदीकियां बढ़ानी शुरू कर दीं. किसी नएनवेले आशिक की तरह बाबूलाल नीतू की हर पसंदनापसंद का खयाल रखने लगा तो नीतू भी उस की तरफ झुकने लगी. आखिर उसे भी पुरुष सुख की जरूरत थी, जिसे वह कहीं बाहर से हासिल करती तो बदनामी भी होती और गलत भी वही ठहराई जाती.

देहसुख का अघोषित अनुबंध तो बाबूलाल और नीतू के बीच हो गया लेकिन पहल कौन और कैसे करे, यह दोनों को समझ नहीं आ रहा था. मियांबीवी राजी तो क्या करेगा काजी वाली बात इन दोनों पर इसलिए लागू नहीं हो रही थी कि दोनों के बीच कोई काजी था ही नहीं. दोनों भीतर ही भीतर सुलगने लगे थे पर शायद लोकलाज का झीना सा परदा अभी बाकी था.

यह परदा भी एक दिन टूट गया जब आंगन में नहाती नीतू को बाबूलाल ने देखा. उस के दुधिया और भरे मांसल बदन को देखते ही बाबूलाल के जिस्म में चीटियां सी रेंगी तो सब्र ने जवाब दे दिया. एकाएक उस ने नीतू को जकड़ लिया.

नीतू ने कोई एतराज नहीं जताया. वह तो खुद पुरुष संसर्ग के लिए बेचैन थी. उस दिन जो हुआ नीतू के लिए किसी मनोकामना के पूरी होने से कम नहीं था. बाबूलाल को भी सालों बाद स्त्री सुख मिला था, सो वह भी निहाल हो गया.

अब यह रोजरोज का काम हो गया था. दोनों को रोकनेटोकने वाला कोई नहीं था. रामजी जैसे ही बिस्तर पर आ कर सोता था, नीतू सीधे बाबूलाल के कमरे में जा पहुंचती थी.

उम्र और रिश्तों का लिहाज नाजायज संबंधों में नहीं होता और आमतौर पर उन का अंत में किसी तीसरे का रोल जरूर रहता है. पर इन दोनों पर यह बात लागू नहीं थी. ससुर की मर्दानगी पर निहाल हो चली नीतू ने एक दिन बाबूलाल से साफ कह दिया कि अब मुझ से शादी करो नहीं तो…

इस ‘नहीं तो’ में छिपी धमकी बाबूलाल को समझ आ रही थी और मजबूरी भी, लेकिन जो जिद नीतू कर रही थी उसे वह पूरी नहीं कर सकता था. अब जा कर बाबूलाल को समाज और रिश्तों के मायने समझ आए. समझाने और मना करने पर नीतू झल्लाने लगी थी, जिस से बाबूलाल घबराया हुआ रहने लगा था. नीतू की लत तो उसे भी लग गई थी पर उस पर लदी शर्त उस से पूरी करते नहीं बन रही थी.

साफ है बाबूलाल बहू के जिस्म को तो भोगना चाहता था लेकिन समाज को ठेंगा बता कर उसे पत्नी बनाने की बात सोचते ही उस के पैरों तले से जमीन खिसकने लगती थी. जितना वह समझाता था नीतू उसी तादाद में एक बेतुकी जिद पर अड़ती जा रही थी.

अब बाबूलाल नीतू से बचने के बहाने ढूंढने लगा था, जिन में से एक उसे मिल भी गया था कि फसल पक रही है, इसलिए उसे चौकीदारी के लिए खेत पर सोना पड़ेगा. इस के लिए उस ने खेत में झोपड़ी भी डाल ली थी.

नीतू जब शहर से मजदूरी कर लौटती थी तब तक बाबूलाल खेत पर जा चुका होता था. कुछ दिन ऐसे ही बिना मिले गुजरे तो नीतू का सब्र जवाब देने लगा. वैसे भी वह महसूस रह रही थी कि बाबूलाल अब उस में पहले जैसी दिलचस्पी नहीं लेता. 25 मार्च को नीतू जब सहेलियों के साथ लौटी तो उसे याद आया कि अगले दिन उसे मायके जाना है.

मायके जाने से पहले वह अपनी प्यास बुझा लेना चाहती थी. इसलिए सीधे खेत पर पहुंच गई और बाबूलाल को इशारा किया कि आज रात वह यहीं रुकेगी तो बाबूलाल के हाथ के तोते उड़ गए, क्योंकि रात में दूसरे किसान तंबाकू और बीड़ी के लिए उस के पास आते रहते थे.

समझाने की कोशिश बेकार थी फिर भी बाबूलाल ने दूसरे किसानों के आनेजाने की बात बताई तो नीतू ने खुद अपने हाथों से अपने कपड़े उतार लिए और धमकी देते हुए बोली, ‘‘खुले तौर पर मुझ से बीवी की तरह पेश आओ नहीं तो पुलिस में रिपोर्ट लिखा दूंगी.’’ उस दिन सुबह वह बाबूलाल से कह भी रही थी कि रात में घर पर ही मिलना.

रोजरोज की धमकियों और परेशानियों से तंग आ गए बाबूलाल को कुछ नहीं सूझा तो उस ने बेरहमी से नीतू की हत्या कर दी और स्तनों को खरोंचा, जिस से मामला सामूहिक बलात्कार का लगे. नीतू का गुप्तांग भी उस ने इसी वजह के चलते जलाया था.

नीतू की हत्या पर वह उस की लाश को कंधे पर उठा कर ले गया और आम के बाग में फेंक आया. पुलिस को दिए शुरुआती बयान में वह रामजी को फंसा देना चाहता था जिस से खुद साफ बच निकले. पर ऐसा नहीं हो पाया.

ससुर बहू के अवैध संबंधों का यह मामला अजीब इस लिहाज से है कि इसे और ज्यादा ढोने की हिम्मत नीतू में नहीं बची थी और वह अधेड़ ससुर को ही पति बनाने पर उतारू हो आई थी यानी राजकुमार, हेमामालिनी, कमल हासन और पद्मिनी कोल्हापुरे अभिनीत फिल्म ‘एक नई पहेली’ की तर्ज पर वह अपने ही पति की मां बनने तैयार थी.

बड़ी गलती बाबूलाल की है जिस की सजा भी वह भुगत रहा है. उस ने पहले पागल बेटे की शादी करा दी और जब बेटा बहू की शारीरिक जरूरतें पूरी नहीं कर पाया तो खुद पाप की दलदल में उतर गया.

नीतू रखैल की तरह नहीं रहना चाह रही थी. साथ ही वह दुनियादारी की परवाह भी नहीं कर रही थी, इसलिए उस से छुटकारा पाने के लिए बाबूलाल को उस की हत्या ही आसान रास्ता लगा पर कानून के हाथों से वह भी नहीं बच पाया.

जाना अनजाना सच : जुर्म का भागीदार – भाग 2

मेरी और मेराज की शादी भी इत्तफाक ही थी. सच कहूं तो 2 बड़े परिवारों के बीच अचानक बना एक खोखला संबंध भर. यह संबंध भी इसलिए बना था क्योंकि मेरे अब्बू अम्मी को मेरी शादी की जल्दी थी. उन की चाहत पूरी हुई और सब कुछ जल्दीजल्दी में हो गया. इस के पीछे भी एक रहस्य था जिस के लिए जिम्मेदार मैं ही थी.

बात उन दिनों की है जब मैं लखनऊ यूनिवर्सिटी में पढ़ा करती थी. एक दिन जब मैं अपनी फाइल उठा कर यूनिवर्सिटी जाने के लिए निकली तो अब्बू बोले, ‘‘सलमा, इन से मिलो, यह हैं मेरे जिगरी दोस्त जुबैर. इन के साहबजादे अनवर मियां भी लखनऊ यूनिवर्सिटी से फिजिक्स में एमएससी करने आए हैं. उन्हें हौस्टल में जगह नहीं मिल पा रही है इसलिए कुछ दिन हमारे यहां ही रहेंगे. तुम शाम तक कोठी की ऊपरी मंजिल के दोनों कमरे साफ करवा देना. अनवर शाम को आ जाएगा.’’

‘‘आदाब चचाजान’’ कह कर मैं अब्बू की तरफ मुखातिब हो कर बोली, ‘‘अब्बू, मैं शाम तक कमरे तैयार करवा दूंगी. अभी जा रही हूं, देर हुई तो मेरी क्लास छूट जाएगी.’’

खुदा हाफिज कह कर मैं सीढि़यां उतर कर चली गई. चचाजान और अब्बू हाथ हिलाते रहे. वापस आते ही मैं ने सब से पहले कमरे साफ करवाए. फूलों वाली नई चादर बिछाई, गुलदानों में नए फूल सजाए. टेबल पर अपने हाथ का कढ़ा हुआ मेजपोश बिछाया, उस पर पानी से भरा जग और नक्काशीदार ग्लास रखा.

नीचे आई तो लगा कोई दरवाजे पर दस्तक दे रहा है. मेरे कपड़े और मलिन सा चेहरा धूल से भरे हुए थे. पर मैं करती भी तो क्या, दस्तक तेज होती जा रही थी. मैं ने फाटक खोल दिया.

बाहर एक युवक खड़ा था. वह अपना परिचय देते हुए बोला, ‘‘मैं अनवर.’’

कसरती जिस्म, स्याह घुंघराले बाल, उसे देख मैं तो पलक झपकना ही भूल गई. लगा जैसे किसी ने सम्मोहन सा कर दिया हो. ‘‘आइए तशरीफ लाइए.’’ कह कर मैं ने चुन्नी सर पर डाल ली. फिर उसे कमरे में ले गई.

कमरे की सजावट देख कर वह मुसकराते हुए बोला, ‘‘ओह, तो आप कमरे की सफाई कर रही थीं, बहुत सुंदर सजाया है.’’

‘‘सुबह चचाजान से मुलाकात हुई, पता चला आप को हौस्टल में जगह नहीं मिली.’’ मैं ने कहा, ‘‘इसी बहाने हमें आप की खिदमत का मौका मिल जाएगा.’’

‘‘नाहक ही आप को परेशान किया, माफ कीजिएगा. जैसे ही वहां कमरा मिलेगा, मैं चला जाऊंगा.’’ अनवर ने कहा तो मैं बोली, ‘‘यह क्या कह रहे हैं आप? यह तो हमारी खुशकिस्मती है कि आप हमारे गरीबखाने पर तशरीफ लाए.’’

‘‘आप को एक तकलीफ और दूंगा, अगर एक कप चाय मिल जाए तो बड़ी मेहरबानी होगी.’’

‘‘ओह श्योर.’’ कह कर मैं तेजी से जीना उतरने लगी, उस वक्त मेरा दिल मेरे ही बस में नहीं था.

मैं ने उसे चाय ला कर दे दी. उस दिन बात वहीं खत्म हो गई. फिर भी न जाने क्यों मैं उसे ले कर खुश थी.

अनवर को हमारे यहां रहते लंबा वक्त गुजर गया. मैं उस का और उस की हर चीज का ध्यान रखती. उस की गैरहाजरी में उस का कमरा सजाती. अपनी ड्रैसेज पर भी खूब ध्यान देती. उस के सामने बनसंवर कर जाना, मुझे अच्छा लगता था. वह भी ऐसी ही कोशिश करता था.

मुझ में आए बदलाव पर अम्मी ने कभी भी ध्यान नहीं दिया. इस की वजह थी अब्बू का देर से घर आना. भाईभाभी अमेरिका में थे, जबकि अम्मी का ज्यादातर वक्त किटी पार्टियों में गुजरता था. घूमनेफिरने की शौकीन अम्मी को मुझ पर नजर रखने का वक्त ही नहीं मिलता था.

मैं और अनवर यूनिवर्सिटी में आतेजाते अकसर आमनेसामने पड़ जाते थे. कभी टैगोर लायब्रेरी में, कभी बौटेनिकल गार्डन में. वह जब भी मुझे देखता, उस की प्यासी नजरें कुछ पैगाम सा देती नजर आतीं. एक दिन सुबहसुबह जब मैं उस के कमरे में चाय देने गई, तो उस ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोला, ‘‘सलमा, क्या हम दोस्ती के लायक भी नहीं हैं?’’

यह मेरे लिए अप्रत्याशित जरूर था, लेकिन मेरे मन के किसी कोने में दबी तमन्नाओं को जैसे पंख मिल गए और मैं आसमान में उड़ने लगी. कब से दबा कर रखी चाहत ने जोर मारा तो एक झटके में मन के सभी बंधन टूट गए.

उस दिन आसमान पर कालेकाले बादल छाए थे. इतवार का दिन था, मैं ने हलका मेकअप कर के फिरोजी रंग का गरारा, कुरता और फिरोजी चूडि़यां पहनी. दरअसल उस दिन मेरी खास फ्रैंड नसीमा आने वाली थी.

अम्मी तैयार हो कर निकलते हुए बोलीं, ‘‘सलमा, मैं आज पिक्चर जा रही हूं, सभी किटी मैंबर हैं. बुआ से लंच बनवा दिया है, जल्दी ही आऊंगी. ऊपर भी लंच बुआ दे आएंगीं. वह 2 बजे दोबारा आएंगी.’’

अम्मी के जाते ही मैं यह सोच कर खुशी से उछल पड़ी कि आज नसीमा से खूब दिल की बातें करूंगी.

मैं चाय ले कर ऊपर गई तो अनवर कुछ रोमांटिक मूड में लगा. मैं ने चाय रखी तो वह मेरी तरफ देख कर बोला, ‘‘आज तो आप कयामत लग रही हैं. क्या करूं, मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूं.’’

मैं कुछ सोच पाती, इस से पहले ही अनवर ने मुझे बाहों में भर लिया. उस की बाहों में मुझे जन्नत नजर आ रही थी. लेकिन तभी जैसे जलजला सा आ गया. मेरे पांवों के नीचे से जमीन निकल गई.

सामने अम्मी रौद्र रूप में खड़ी थीं. वह जोर से चीख कर बोलीं, ‘‘भला हुआ जो मैं अपना पर्स भूल गई थी, वरना इस नौटंकी का पता ही नहीं चलता. इसे कहते हैं आस्तीन का सांप. जिसे फ्री में खिलापिला रहे हैं, वही हमें डंस रहा है. हम ने तुम्हें पनाह दी थी और तुम ने ही हमारा गिरेबां चाक कर दिया. जाओ, चले जाओ यहां से. यहां गुंडे मवालियों का कोई काम नहीं है.’’

मैं और अनवर दोनों ही अपराधियों की तरह मुंह लटकाए खड़े थे. अम्मी बहुत गुस्से में थीं. वह अनवर का सामान उठाउठा कर नीचे फेंकने लगीं. जरा सी देर में सारा मोहल्ला इकट्ठा हो गया. अनवर गुनहगार बना खामोश खड़ा था, उस की आंखों से अंगारे बरस रहे थे. अब जाना ही उस के लिए बेहतर था. उस ने खामोशी से अपना सामान समेटा और टैक्सी स्टैंड की ओर निकल गया.

वह तो चला गया पर मेरी जिंदगी में तूफान बरपा गया. उस के जाने के बाद अम्मी ने मोहल्ले वालों से कह दिया कि किराया नहीं देता था, कब तक रखती.

अम्मी ने मुझे खूब मारा, लेकिन उन की मार मेरे प्यार की आग को बुझा नहीं सकी. एक दिन अनवर मेरे सोशियोलौजी सोशल वर्क डिपार्टमेंट के आगे खड़ा था. रूखे बाल, उदास चेहरा. मैं दौड़ कर उस के पास जा पहुंची और उसे ऊपर से नीचे तक देखते हुए बोली, ‘‘यह क्या हाल बना रखा है अनवर, मैं तुम्हारे बगैर नहीं जी सकती.’’

अनवर मेरी तरफ देख कर बोला, ‘‘यूनिवर्सिटी के पास ही एक कमरा लिया है, अम्मी भी आई हुई हैं. मैं ने उन्हें तुम्हारे बारे में सब कुछ बता रखा है. अम्मी मेरी दुलहन को देखना चाहती हैं. 2 मिनट के लिए चल सकोगी? अम्मी हमारी शादी का कोई रास्ता निकालना चाहती हैं.’’

अनवर की आवाज में जो दर्द था, उसे देख मैं रो पड़ी और उस के पीछेपीछे चल दी.

सपना का अधूरा सपना – भाग 2

सपना के परिवार में पिता कुंवरपाल सिंह यादव, मां उर्मिला यादव, 3 बहनें प्रार्थना, मधु और भावना के अलावा 1 छोटा भाई आशीष था. कुंवरपाल का दूध का अच्छाखासा व्यवसाय था. फिरोजाबाद के ही थाना सिरसागंज के गांव सिकरामऊ में उस की खेती की काफी जमीन भी थी. फिरोजाबाद के सुदामानगर की जिस नवनिर्मित कालोनी में कुंवरपाल रहता था, उस में उस की गिनती संपन्न लोगों में होती थी. उस का काफी बड़ा मकान भी था.

कुंवरपाल को राजनीति से लगाव था, इसलिए उस ने तमाम नेताओं से संबंध बना रखे थे. संबंध की ही वजह से उस के यहां तमाम नेताओं का आनाजाना लगा रहता था. सिरसागंज के विधायक से तो कुंवरपाल की दांत काटी दोस्ती थी. कुंवरपाल के 2 साले थे. दोनों ही एक राजनीतिक दल में पदाधिकारी थे. उन का अपने क्षेत्र में खासा रुतबा था. इस का असर उन की बहन यानी कुंवरपाल की पत्नी उर्मिला पर भी था. रौबरुतबे की ही वजह से पतिपत्नी कालोनी में किसी को कुछ नहीं समझते थे. वे जल्दी से किसी से बात भी नहीं करते थे.

सपना ने घर के नजदीक ही स्थित लिटिल ऐंजल्स कान्वेंट स्कूल से इंटर करने के बाद एम.जी. कालेज से ग्रैजुएशन किया. इस के बाद वह कोई प्रोफेशनल कोर्स करना चाहती थी. थोड़ी कोशिश के बाद उस का बीएड में हो गया, जिस के लिए उस ने दाऊदयाल महिला महाविद्यालय में दाखिला ले लिया.

सपना जिन दिनों हाईस्कूल में पढ़ रही थी, उन्हीं दिनों उस की मुलाकात अभिनय राणा से हुई थी. अभिनय सुदामानगर से 2 किलोमीटर दूर स्थित लोहियानगर में रहता था. उस के परिवार में पिता शिशुपाल सिंह जादौन, मां प्रेमा देवी जादौन और एक बड़ा भाई अभिषेक जादौन था. पिता उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही थे. जादौन परिवार के पास काफी पुश्तैनी प्रौपर्टी थी, इसलिए इस परिवार का रहनसहन रईसों जैसा  था. उन दिनों वह बारहवीं में पढ़ रहा था.

एक दिन सपना स्कूटी से कोचिंग से घर जा रही थी, तभी एक बाइक सवार की टक्कर से गिर पड़ी. बाइक सवार तो भाग गया, लेकिन डिवाइडर से टकराने की वजह से सपना के पैर से खून बहने लगा. पीछे से आ रहे अभिनय ने उसे उठाया और मरहमपट्टी करा कर उसे उस के घर पहुंचाया. अभिनय का यह सेवाभाव सपना के दिल को छू गया. उस की छवि उस के दिल में एक अच्छे युवक की बन गई.

सपना जिस कोचिंग में पढ़ती थी, उसी में अभिनय भी पढ़ता था. अभिनय की गिनती कोचिंग इंस्टीट्यूट में अच्छे लड़कों में होती थी. ऐसी ही बातों से वह सपना के दिल की धड़कन बन गया. आमनेसामने पड़ने पर दोनों एकदूसरे को देख कर मुसकरा देते थे. कभीकभार बातचीत भी हो जाती थी. किसी दिन दोनों ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए तो दोनों के बीच लंबीलंबी बातें होतेहोते प्यार का भी सिलसिला शुरू हो गया.

दोनों में प्यार गहराया तो वे एकदूसरे की पसंद का खयाल रखने लगे. इस तरह प्यार की नाव पर सवार हुए उन्हें एकएक कर के 5 साल बीत गए. इस बीच सपना ने ग्रैजुएशन कर लिया तो अभिनय बीएसपी कर के ठेकेदारी करने लगा. इस समय वह फिरोजाबाद का एक बड़ा शराब व्यवसाई माना जाता है. शहर और कस्बों में उस की अंग्रेजी शराब और देशी शराब की तमाम दुकानें हैं. उस के कई बार भी हैं. अभिनय भले ही शराब का बड़ा कारोबारी बन चुका था, लेकिन सपना के प्रति उस का प्यार वैसा ही था.

सपना ने ग्रैजुएशन कर के बीएड में दाखिला ले लिया था. 5 सालों से उस का जो प्यार चोरीछिपे चल रहा था, अब तक कई लोगों की नजरों में आ चुका था. वे कुंवरपाल के परिचित थे, इसलिए यह बात उस तक पहुंच गई. जानकारी होने पर कुंवरपाल ने सपना को बुला कर अभिनय और उस से प्यार के बारे में पूछा तो उस ने इस बात को इसलिए नहीं छिपाया, क्योंकि अभिनय हर तरह से कुंवरपाल का दामाद बनने लायक था.

लेकिन जब कुंवरपाल को पता चला कि सपना का प्रेमी ठाकुर है तो वह बौखला उठा. उस ने चीखते हुए कहा, ‘‘यादवों ने चूड़ी पहन रखी है क्या, जो ठाकुर का लौंडा उन की लड़कियों के साथ गुलछर्रे उड़ाएगा.’’

बाप के गुस्से को देख कर सपना की समझ में आ गया कि उस का बाप ऊंची जाति से भी उतनी ही नफरत करता है, जितनी नीची जाति वालों से. कुंवरपाल ने उस से साफसाफ कह दिया कि आज से ही वह उस लड़के से सारे संबंध खत्म कर ले. अगर उस के साथ कहीं दिखाई दे गई तो वह उसे काट कर रख देगा.

कुंवरपाल ने भले ही अपना आदेश सुना दिया था, लेकिन सपना को अभिनय के बिना अपनी दुनिया अंधकारमय नजर आ रही थी. इसलिए उस ने भी तय कर लिया कि कुछ भी हो जाए, वह अभिनय का साथ किसी भी हालत में नहीं छोड़ेगी. इसलिए उस ने तुरंत फोन कर के सारी बातें अभिनय को बता दीं. अभिनय ने उस का हौसला बढ़ाते हुए कहा, ‘‘चिंता करने की कोई बात नहीं है. हम दोनों ही बालिग हैं, इसलिए अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने में सक्षम हैं.’’

प्रेमी की इस बात से सपना को काफी सुकून मिला. लेकिन अब उस के घर से अकेली निकलने पर पाबंदी लगा दी गई. इसी के साथ कुंवरपाल ने उस की शादी के लिए लड़के की तलाश भी जोरशोर से शुरू कर दी. वह बीएड की पढ़ाई पूरी होते ही सपना की शादी कर देना चाहता था.

इधर कुंवरपाल सपना की शादी के लिए लड़का ढूंढ रहा था, उधर उस ने अभिनय से शादी करने का फैसला कर लिया था. यह अप्रैल, 2014 की बात है.

दरअसल, सपना मौका निकाल कर अभिनय से बातें तो कर ही लेती थी, कभीकभार घर वालों की चोरी से मिल भी लेती थी. कुंवरपाल को संदेह था कि बेटी कोई भी उल्टासीधा कदम उठा सकती है, इसलिए उस ने रजिस्ट्रार औफिस के कर्मचारियों से सांठगांठ कर ली थी कि अगर सपना वहां विवाह के लिए आवेदन करती है तो तुरंत उसे इस बात की जानकारी दे दी जाए.

सपना के घर से निकलने पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई, जिस से उस का बीएड भी पूरा नहीं हो सका. उस का फोन भी छीन लिया गया था. ऐसे में सपना का साथ उस की छोटी बहन प्रार्थना ने दिया. बहन की भावनाओं का खयाल रखते हुए वह कभीकभार अपने फोन से उस की बात अभिनय से करा देती थी.

29 मई, 2014 को प्रार्थना की मदद से सपना घर से बाहर निकली और वहां पहुंच गई, जहां अभिनय 2-3 महिलाओं और 4-5 पुरुषों के साथ उस का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. उस ने फिरोजाबाद के ही उलाऊखेड़ा प्रांगण में बने आर्यसमाज मंदिर में विधिविधान से विवाह करने की व्यवस्था पहले से ही कर रखी थी, इसलिए सपना को साथ ले कर वह सीधे वहीं पहुंच गया.

फरेब के जाल में फंसी नीतू – भाग 2

यह एक अजीब सी बात इस लिहाज से थी कि हत्या के मामले में किसी भी पिता की कोशिश बेटे को बचाने की रहती है. लेकिन बाबूलाल इस का अपवाद था. हालांकि संभावना इस बात की भी थी कि वह वाकई सच बोल रहा हो क्योंकि रामजी घोषित तौर पर मंदबुद्धि वाला था और गुस्सा आ जाने पर ऐसा कर भी सकता था. लेकिन इस थ्यौरी में आड़े यही बात आ रही थी कि कोई मंदबुद्धि इतनी प्लानिंग से हत्या नहीं कर सकता.

अभयराज सिंह ने नीतू के बारे में जानकारियां इकट्ठी करने के लिए एक लेडी कांस्टेबल को काम पर लगा दिया था. अलबत्ता अभी तक की जांच में ऐसी कोई बात सामने नहीं आई थी जिस से यह लगे कि नीतू के चालचलन में कोई खोट थी. ये सब बातें अभयराज ने जब आला अफसरों से साझा कीं तो उन्होंने बाबूलाल को टारगेट करने की सलाह दी.

महिला कांस्टेबल की दी जानकारियों ने मामला सुलझाने में बड़ी मदद की. पता यह चला कि नीतू दूसरी महिलाओं के साथ मजदूरी करने ब्यौहारी जाती थी और शाम तक लौट आती थी. 25 मार्च को यानी हादसे के दिन भी वह मजदूरी करने गई थी. लेकिन लौटते वक्त वह गांव के बाहर से ही अपने ससुर बाबूलाल से मिलने खेत की तरफ चली गई थी.

बाबूलाल शक के दायरे में तो पहले से ही था पर इस खुलासे से उस पर शक और गहरा गया था. चूंकि उसे धर दबोचने के लिए कोई पुख्ता सबूत या गवाह नहीं था. इसलिए पुलिस ने बारबार पूछताछ करने का अपना परंपरागत तरीका आजमाया.

इस पूछताछ में उस के साथ कोई जोर जबरदस्ती नहीं की गई और न ही कोई यातना दी गई. पुलिस ने तरहतरह से उसे धर्मग्रंथों का हवाला दिया कि जो जैसे कर्म करता है उसे वैसा ही फल भुगतना पड़ता है. फिर चाहे वह नीचे धरती पर मिले या ऊपर कहीं मिले.

धर्मगुरुओं  की तरह प्रवचन दे कर जुर्म कबूलवाने का शायद यह पहला मामला था. कर्म फल और पाप पुण्य की पौराणिक कहानियों का बाबूलाल पर वाजिब असर पड़ा और उस ने अपना गुनाह कबूल कर लिया.

यह डर था या ग्लानि थी यह तो शायद बाबूलाल भी न बता पाए, लेकिन नीतू की हत्या की जो वजह उस ने बताई वह वाकई अनूठी थी. कहानी सुनने से पहले पुलिस ने उस की निशानदेही पर खेत में छिपाई गई चप्पलें व साड़ी बरामद करने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई.

बहू नीतू की हत्या की वजह बताते हुए बाबूलाल का चेहरा सपाट था. बाबूलाल तब किशोरावस्था में था जब उस के पिता संतोषी राठौर की मौत हो गई थी. शादी के बाद पत्नी भी ज्यादा साथ नहीं निभा पाई, लेकिन इन तकलीफों से बड़ी उस की तकलीफ मंदबुद्धि बेटा रामजी था.

जवान होते रामजी को देख बाबूलाल का कलेजा मुंह को आता था कि उस के बाद यह लड़का किस के भरोसे रहेगा. कम अक्ल रामजी को पालतेपोसते बाबूलाल ने कई जगह उस की शादी की बात चलाई लेकिन जिस ने भी रामजी की मंदबुद्धि के चर्चे सुने उस ने बाबूलाल के सामने हाथ जोड़ लिए. खेतीकिसानी बहुत ज्यादा भी नहीं थी, इसलिए बाबूलाल ज्यादा पैसों के लिए खेतों में हाड़तोड़ मेहनत करता था, जिस के चलते 54 साल की उम्र भी उस पर हावी नहीं हो पाई थी.

फिर एक दिन पागल कहे जाने वाले रामजी की तब मानो लाटरी लग गई, जब बात चलाने पर नीतू के घर वाले रामजी से उस की शादी करने तैयार हो गए. नीतू गठीले बदन की चंचल लड़की थी, जिसे पत्नी बनाने का सपना आसपास के गांवों के कई युवक देख रहे थे.

गोरीचिट्टी नीतू की खूबसूरती के चर्चे हर कहीं थे पर लोग यह जानकर हैरान रह गए कि उस की शादी रामजी से हो रही है, जिसे गांव की भाषा में पागल, सभ्य लोगों की भाषा में मंदबुद्धि और आजकल सरकारी जुबां में मानसिक रूप से दिव्यांग कहा जाता है.

जब नीतू के घर वालों ने रिश्ते के बाबत हां भर दी तो बाबूलाल की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. घर में बहू के पांव पड़ेंगे, अरसे बाद छमछम पायल बजेगी और जल्द ही पोता उस की गोद में होगा जैसी बातें सोच कर वह अपनी गुजरी और मौजूदा जिंदगी के दुख भूलता जा रहा था.

उधर रामजी पर इस का कोई असर नहीं पड़ा था, वह तो अपनी दुनिया में मस्त था, जैसे कुछ हो ही नहीं रहा हो. शादी के नए कपड़े, धूमधड़ाका, बैंडबाजा बारात वगैरह उस के लिए बच्चों के खेल जैसी बातें थीं. पर बाबूलाल का मन कह रह था कि बहू के आते ही वह सुधर भी सकता है.

खुशी से फूले नहीं समा रहे बाबूलाल को आने वाली परेशानियों और दुश्वारियों का अहसास तक नहीं था. नीतू बहू बन कर आई तो वाकई घर में रौनक आ गई. पर यह रौनक चार दिन की चांदनी सरीखी साबित हुई.

सुहागरात के वक्त नीतू शर्माती लजाती कमरे में बैठी पति का इंतजार कर रही थी कि वह आएगा, रोमांटिक और प्यार भरी बातें करेगा, फिर मन की बातों के बाद धीरे से तन की बात करेगा और फिर… फिल्मों और टीवी सीरियलों में देखे सुहागरात के दृश्य नीतू की जवानी और सपनों को पर लगा रहे थे जिन्हें सोच कर ही वह रोमांचित हुई जा रही थी.

रामजी कमरे में आया और बगैर कुछ कहे सुने बिस्तर पर गया तो नीतू एकदम से कुछ समझ नहीं पाई. उस रात रामजी ने कुछ नहीं किया तो यह सोच कर नीतू ने खुद के मन को तसल्ली दी कि होगी कोई वजह और आजकल के मर्द भी शर्माने में औरतों से कम नहीं हैं.

यह सिलसिला लगातार चला तो शर्म छोड़ते खुद नीतू ने पहल की लेकिन यह जानसमझ कर वह सन्न रह गई कि रामजी मानसिक ही नहीं बल्कि शारीरिक तौर पर भी अक्षम है. एक झटके में आसमान से जमीन पर गिरी नीतू की हालत काटो तो खून नहीं जैसी हो गई थी.

घर के कामकाज करती नीतू को लगने लगा था कि उस की हैसियत एक नौकरानी से ज्यादा कुछ नहीं है और बाबूलाल व रामजी ने उसे धोखा दिया है. यह सोच कर वह चोट खाई नागिन की तरह फुंफकारने लगी. इस पर रामजी ने उसे मारना पीटना शुरू कर दिया तो वह मायके चली गई और दहेज की रिपोर्ट भी लिखा दी. बेटेबहू के बीच अनबन की असल वजह जब बाबूलाल को पता चली तो वह अवाक रह गया.

अब उसे समझ आया कि क्यों बातबात पर नीतू गुस्सा होती रहती है. इधर दहेज की रिपोर्ट तलवार बन कर उस के सिर पर लटक रही थी. रामजी को तो कोई फर्क नहीं पड़ता था लेकिन पुलिस काररवाई से उस का नप जाना तय था.

जाना अनजाना सच : जुर्म का भागीदार – भाग 1

ठंडी बर्फीली हवा के झोंके तन को भिगो रहे थे, मन की उड़ान सातवें आसमान को छू रही थी. पहाड़ों की शीतलता का अहसास, बादलों से आंखमिचौली करती गुनगुनी धूप, सब कुछ बहुत दिलकश था. चीड़ और देवदार के वृक्षों के इर्दगिर्द चक्कर काटते धुंधभरे बादलों को देख कर हम दिल्ली की तपती गर्मी को भूल गए थे. होटल की लौबी से जब मैं नैनी झील पर तैरती रंगबिरंगी कश्तियां देखती तो सोचती उन पर बैठे हर शख्स की जिंदगी कितनी हसीन है.

क्यारियों में खिले रंगबिरंगे फूल और उन पर मंडराती तितलियां मन को कल्पनालोक की सैर करा रही थीं. लौबी से अंदर आ कर मैं कमरे का जायजा लेने लगी. तभी वेटर चाय और गरमगरम पकौडे़ ले आया. जब हम चाय पी रहे थे तभी मेरी नजर मेराज पर पड़ी. उन की आंखों में मुझे प्यार का सागर लहराता नजर आया. जिस चाहत भरी नजर के लिए मैं सालों से तरसती रही थी, आज वही नजर मुझ पर मेहरबान सी लगी.

सचमुच हम दोनों जिंदगी की भीड़ में गुम हो गए थे. देवर और ननदों को संभालने और बड़ा करने की जिम्मेदारी में शायद हम यह भी भूल गए थे कि हम पतिपत्नी भी हैं. अचानक मेराज उठे और शौल ला कर मेरे कंधों पर डाल दी. मैं ताज्जुब से सिहर सी गई. यह स्वाभाविक भी था क्योंकि जिस ने सालों से मेरी परवाह नहीं की, वह आज मुझे सपनों के शहर में ले आया था. अचानक मेराज मुझ से बोले, ‘‘फ्रेश हो जाओ, नीचे लेक पर चलते हैं, फिर कहीं बाहर डिनर करेंगे.’’

यह एक तरह से मेरे लिए सरप्राइज था. मैं जल्दी से तैयार हो गई. होटल से लेक तक काफी लंबी ढलान थी, मेरे कदम उखड़ रहे थे. तभी मेराज ने मेरा बर्फ सा ठंडा हाथ थाम लिया. उन की गरम गुदगुदी हथेली में अपना हाथ दे कर मुझे ऐसा लगा जैसे भूल से किसी ने मुझे कतरा भर इज्जत बख्श दी हो.

उस दिन जो हो रहा था, वैसा कभी नहीं हुआ था. मैं और मेराज कश्ती में बैठ कर देर शाम तक नैनी झील में हवा से उठतीबैठती लहरों का आनंद लेते रहे. हां, हमारे बीच बातचीत कोई नहीं हुई. दोनों ही एकदूसरे की जगह दूसरे जोड़ों को देखते रहे. इस बीच मेराज ने 2-3 बार मुझे कनखियों से जरूर देखा था. हमारा यह नौका विहार रूमानी भले ही नहीं था, फिर भी बहुत अच्छा लगा. जब अंधेरा घिरने लगा तो हम डिनर के लिए एक अच्छे होटल में चले गए.

होटल रंगीन रोशनियों से दमक रहा था, इत्र की खुशबू से सराबोर. आसमानी लिबास और पुराने डिजाइन के गहनों में मैं बहुत दिलकश लग रही थी. डिनर के दौरान मेराज एकटक मुझे देखे जा रहे थे. उन की आंखों की गहराइयों में न जाने ऐसा क्या था कि मैं अंदर तक पिघलती जा रही थी. मेरे जीवन से जो खुशी विदा ले चुकी थी, वह दोबारा दस्तक देती सी लग रही थी.

‘‘तुम बहुत प्यारी हो सलमा’’ मेराज के थरथराते होंठों से निकले शब्दों को सुन कर मुझे लगा जैसे मैं किसी और ही लोक में हूं. जिन अल्फाजों को सुनने के लिए मैं सालों से तरस रही थी, वह मेरे कानों में शहद घोल रहे थे.

जीने के लिए खुशी के दो पल भी काफी होते हैं. मुझे लग रहा था जैसे मेराज के शब्द पहाडि़यों से टकरा बारबार मेरे कानों तक आ रहे हों. जिस तरह तितलियां मौन रह कर भी संगीत पैदा करती हैं, वैसे ही मेराज के हावभाव मेरे इर्दगिर्द संगीतमय माहौल पैदा कर रहे थे.

जब से हमारा निकाह हुआ, मैं ने मेराज को गुस्से में ही पाया था. बातबात पर मुझे बेइज्जत करना, मेरे घर वालों को उलटासीधा कहना, मेरी तरफ घूर कर देखना, मुझ पर मालिक की तरह हुक्म चलाना, उन की आदत में शामिल था. मैं ने उन्हें कभी हंसते हुए नहीं देखा था. उन के साथ मैं ने कई साल बड़ी खामोशी के साथ गुजारे थे.

मेराज सभी से ठीक से पेश आते थे लेकिन जैसे ही मुझ से निगाह मिलती, एक संजीदगी भरी उदासी उन के चेहरे पर उतर आती थी.  फिर हमारे बीच एक सर्द धुआं सा फैल जाता था और यह आपे से बाहर हो जाते थे. अपने लिए उन की आंखों में छाई नफरत मुझ से बरदाश्त नहीं होती थी. कई बार तो मैं रोने बैठ जाती थी.

वक्त गुजरते देर नहीं लगती. वह आ कर कब चला जाता है, पता नहीं चलता. हां, वक्त अपने पीछे ढेरों कहानियां जरूर छोड़ जाता है. मेरे देवर मोहम्मद रजा सैफ ने शायद मेरे दर्द को समझ लिया था. जब वह किशोर थे तभी से मेरी उदासी और नम आंखों के दर्द को पढ़ने लगे थे. जब वह जवान हो गए और बिजनैस संभालने लगे तो उन्होंने अपनी प्यारी भाभी यानी मुझे कुछ सुकून पहुंचाना चाहा. इसीलिए उन्होंने जबरन टैक्सी करवा कर हमें यहां भेज दिया था. होटल की बुकिंग भी रजा ने कराई थी.

डिनर के बाद मेराज के मन में न जाने क्या आया कि मेरा हाथ थाम कर बोले, ‘‘अभी और घूमने का मन है, चलो फिर से झील में चलते हैं. रोशनी और अंधेरे के समीकरण में कश्तियों में घूमने का अलग ही मजा है.’’

मैं भला क्यों मना करती. मेरा मन तो चाह रहा था कि वह रात भर मेरे साथ घूमते रहें.  हम लेक किनारे खड़ी बोट पर बैठ गए. कुछ ही देर पहले बारिश हुई थी. हवा अब भी चल रही थी, जिस के वेग से बोट हिल रही थी. लहरें इतनी ऊपर तक आ रही थीं कि उन का आक्रामक रूप देख कर डर लग रहा था. एक जगह रोशनी देख मैं ने झील में झांका तो अपना ही अक्स डरावना सा लगा.

मेरी कहानी एक औरत के अपमान की कहानी थी. ऐसी औरत की कहानी जो सालों से अपने ही हमसफर के हाथों अपमान की शिकार होती रही थी. पुरुष कभी पिता बन कर, कभी पति बन कर, कभी भाई बन कर तो कभी बेटा बन कर औरत को अपमान की भट्ठी में जलाता रहा है. मेराज ने मुझे मेरा ही हमनवा बन कर अपमान की आग में जलाया था.

झील के हिलते हुए पानी में अपना बदसूरत सा अक्स देख कर मेरी आंखें भर आईं. मेरी आंसुओं भरी आंखों से मेराज कभी नहीं पसीजे थे. लेकिन उस तनहाई में अचानक बोले, ‘‘सलमा, मैं ने तुम्हारे साथ जो सुलूक किया, उस के लिए मैं ताउम्र शर्मिंदा रहूंगा.’’

फिर अचानक उन्होंने मेरी कमर में हाथ डाल कर मुझे अपने सीने में छिपा लिया. मेराज का गला भर आया था, आंखें नम थीं. कुछ ठहर कर उन्होंने फिर कहा, ‘‘सालों से मेरे दिल पर एक बोझ है, जिसे मैं आज सुकून भरे इन लम्हों में मन से उतार देना चाहता हूं. मैं जानता हूं तुम बेहद खूबसूरत हो, जहीन हो. फिर भी शादी के बाद से आज तक मैं तुम्हें वैसा प्यार नहीं कर सका, जैसा मुझे करना चाहिए था. तुम्हें देखते ही मेरे मन में नफरत की एक सर्द लहर सी दौड़ जाती थी. इसी वजह से मैं तुम्हारे दामन में चाहत का कोई फूल नहीं डाल सका.’’

‘‘आप को खुश रखूं, आप के लिए दुआएं मांगू, मेरे जीने का तो बस यही एक मकसद है. फिर भी मैं उस वजह को जानने के लिए बेताब हूं, जिस की मुझे इतनी लंबी सजा मिली.’’ कह कर मैं हैरानी से मेराज को देखने लगी. मेरे सवाल के जवाब में मेराज ने जो कुछ बताया, उसे सुन कर मैं सन्न रह गई. सर्दी के बावजूद मेरा बदन पसीनेपसीने हो गया.