बीता वक़्त वापिस नहीं आता – भाग 2

इस के बाद उन की मुलाकातें होने लगीं. वे जब भी मिलते, घंटों एकदूसरे के साथ रहते. रोक्सेन को वाकर की नजदीकी बेहद सुकून देती थी. उस के मिलने से मन तो तृप्त हो जाता था, लेकिन तन की प्यास वैसी ही बनी रहती थी. वाकर एकांत में रोक्सेन के किसी अंग को छू लेता या होंठों को चूम लेता, तो उस की देह में आग सी लग जाती. मन करता कि वाकर की बांहों में समा जाए और उस से कहे कि वह उस के प्यासे तन को तृप्त कर दे. लेकिन वह ऐसा इसलिए नहीं कह पाती थी, क्योंकि वह जगह इस के लिए सुरक्षित नहीं होती थी.

पति की बेरुखी से विचलित वाकर की नजदीकी पा कर रोक्सेन ज्यादा दिनों तक अपनी इच्छा दबाए नहीं रह सकती थी. उस ने वाकर से सीधे तो नहीं कहा, लेकिन एक दिन घुमाफिरा कर अपने मन की बात कह ही दी, ‘‘वाकर, कहीं ऐसी जगह चलते हैं, जहां हम दोनों के अलावा कोई और न हो.’’

‘‘ठीक है, हम कल सुबह किंगस्टन झील पर पिकनिक मनाने चलते हैं.’’ वाकर ने रोक्सेन के दिल की मंशा भांप कर कहा.

अगले दिन पति काम पर चला गया और बच्चे स्कूल चले गए, तो रोक्सेन वाकर के साथ पिकनिक पर निकल गई. शहर से किंगस्टन झील लगभग 30 किलोमीटर दूर थी. वाकर अपनी लौरी से रोक्सेन को वहां ले गया. किंगस्टन एक छोटी सी झील थी. उस के दोनों ओर छोटेबड़े पहाड़ थे. वहां इक्कादुक्का लोग ही नजर आ रहे थे. वे भी प्रेमी युगल थे, जो इन्हीं की तरह एकांत की तलाश में यहां आए थे. रोक्सेन और वाकर भी एक छोटी सी पहाड़ी के पीछे जा पहुंचे. वहां से झील के आसपास का नजारा तो देखा जा सकता था, लेकिन उन तक किसी और की नजर नहीं पहुंच सकती थी. इसी का फायदा उठा कर वे एकदूसरे की बांहों में समा गए.

एकांत का पहला दिन रोक्सेन और वाकर के लिए यादगार बन गया. इस के बाद तो उन का मिलना आम हो गया. वाकर बेखौफ रोक्सेन के घर भी आनेजाने लगा. लेकिन वह इस बात का ध्यान जरूर रखता था कि उस का पति कोरोनट घर पर न हो. वह रोक्सेन की बेटियों की भी वह परवाह नहीं करता था. बेटा रौबर्ट अभी छोटा ही था. रोक्सेन को भी अब कोई खौफ नहीं था. उस ने बच्चों से वाकर का परिचय कराते हुए कहा था कि ये तुम्हारे अंकल हैं. वाकर जब भी आता था, बच्चों के लिए कुछ न कुछ ले कर आता था, इसलिए बड़ी बेटी को छोड़ कर बाकी के दोनों बच्चे उस से खुश रहते थे. वे उस के आने का इंतजार भी करते थे.

धीरेधीरे रोक्सेन वाकर के इतने नजदीक आ गई कि उसे पति कोरोनट फालतू की चीज लगने लगा. अब वह वाकर को ही अपना पति मानने लगी थी. वाकर भी उस से सिर्फ शारीरिक सुख ही नहीं हासिल करता था, बल्कि उस की और उस के बच्चों की हर जरूरत का भी पूरा खयाल रखता था. यही वजह थी कि रोक्सेन को अब पति कोरोनट की जरा भी परवाह नहीं रह गई थी. वह वाकर को उस के सामने ही घर बुलाने लगी थी.

कोरोनट और उस की बड़ी बेटी को वाकर का आना बिलकुल पसंद नहीं था. क्योंकि रोक्सेन और उस के बातव्यवहार से उसे अंदाजा हो गया था कि इन के बीच गलत संबंध है. फिर एक दिन उस ने उन्हें आपत्तिजनक स्थिति में देख भी लिया. कोरोनट ने इस पर ऐतराज जताया, तो रोक्सेन ने उसे खरीखोटी सुनाते हुए कहा, ‘‘तुम न तो पेट की आग ठीक से बुझा पाते हो और न तन की. अब ऐसे पति से तो बिना पति के ही ठीक हूं. मैं ने अपना रास्ता खोज लिया है. अच्छा यही होगा कि तुम भी अपना रास्ता खोज लो. अब हम एक राह पर एक साथ नहीं चल सकते.’’

‘‘बच्चों का तो खयाल करो?’’ कोरोनट ने रोक्सेन को समझाना चाहा.

‘‘तुम्हें उन की चिंता करने की जरूरत नहीं है. मैं जल्दी ही उन्हें वाकर को डैडी कहना सिखा दूंगी.’’ रोक्सेन ने तल्खी से कहा.

कोरोनट को लगा कि अब रोक्सेन से उम्मीद करना बेकार है. वह अपनी राह पर इतनी आगे बढ़ चुकी है कि उस का लौटना मुमकिन नहीं है. इसलिए अब उसे अपना रास्ता अलग कर लेना चाहिए. कोरोनट ने रोक्सेन को तलाक दे कर उसे अपनी जिंदगी से अलग कर दिया. मां की हरकतों से नाखुश बड़ी बेटी एमा हेमंड भी बाप के साथ चली गई थी. रोक्सेन को इस का जरा भी अफसोस नहीं हुआ, क्योंकि वह तो यही चाहती थी. उस की मुराद पूरी हो गई थी. अब उसे रोकनेटोकने वाला कोई नहीं रहा, तो वाकर का अधिकतर समय उसी के घर गुजरने लगा.

जल्दी ही रोक्सेन की बेटी स्टेसी लारैंस और बेटे रौबर्ट ने वाकर को पिता के रूप में स्वीकार कर लिया था. रौबर्ट 4 साल का था, तो स्टेसी 9 साल की. संयोग से समय से पहले ही स्टेसी के शरीर में बदलाव आने लगा था. इसी बदलाव की वजह से उसे बनियान की जगह ब्रा पहननी पड़ रही थी. हारमोंस की गड़बड़ी की वजह से इसी उम्र में उसे मासिक भी शुरू हो गया था. रोक्सेन जो अब तक उसे बच्ची समझती थी, ऊंचनीच समझाने लगी. कुछ भी रहा हो, स्टेसी बेहद समझदार थी. अच्छेबुरे का उसे पूरा खयाल था.

स्कूल की छुट्टी के दिन अकसर स्टेसी वाकर की लौरी में बैठ कर घूमने चली जाती थी. लेकिन रोक्सेन को यह अच्छा नहीं लगता था, इसलिए वह बेटी को रोकती थी. क्योंकि वह औरत थी और मर्दों की निगाहों को भलीभांति पहचानती थी. उसे वाकर की निगाहों में खोट नजर आने लगा था.

यही वजह थी कि वह वाकर पर नजर रखने लगी थी. ऐसे में ही एक दिन उस ने वाकर को स्टेसी के शरीर से ऐसी छेड़छाड़ करते देख लिया, जो एक पिता नहीं, मर्द कर सकता है. उस ने तुरंत वाकर को टोका, ‘‘वाकर, तुम्हें मैं ने अपना मन ही नहीं, तन भी सौंपा है. तुम्हें वे अधिकार दिए हैं, जो सिर्फ पति को दिए जाते हैं. तुम ने भी वादा किया है कि मेरे बच्चों को अपने बच्चे समझ कर वह सब दोगे, जो एक पिता का कर्तव्य होता है. लेकिन अब तुम्हारी नीयत ठीक नहीं दिख रही है.’’

‘‘ऐसा नहीं है रोक्सेन. मैं न वादे को भूला हूं और न कभी अपने फर्ज भूलूंगा. मैं कोई ऐसा काम नहीं करूंगा, जिस से तुम्हें आहत होना पड़े. अगर गलती से मुझ से कुछ गलत हो गया है तो मैं तुम्हें अपना मुंह नहीं दिखाऊंगा.’’ वाकर ने एक बार फिर रोक्सेन से वादा किया.

गलतफहमी दूर हुई, तो रोक्सेन ने वाकर को बांहों में भर लिया, ‘‘मैं ने तुम पर पूरा भरोसा किया है और करती रहूंगी.’’

इस के बाद रोक्सेन ने स्टेसी को छूट दे दी. वह वाकर के साथ घूमने जाने लगी. उस का नईनई जगहों पर घूमना तो होता ही, वाकर उसे तरहतरह की चीजें भी खिलाता. एक तरह से स्टेसी की पिकनिक हो जाती.

3 अप्रैल, 2013 को भी स्टेसी वाकर के साथ लौरी पर घूमने गई थी. वाकर को कई जगह माल सप्लाई करना था. फिर भी उसे शाम तक लौट आना था. लेकिन वह नहीं लौटा, तो रोक्सेन को चिंता हुई. वह फोन करने ही जा रही थी कि वाकर का फोन आ गया. उस ने कहा कि काम की वजह से वह आज लौट नहीं पाएगा, कल आएगा. लेकिन वह अगले दिन भी नहीं लौटा, तो रोक्सेन को वाकर और बेटी स्टेसी की चिंता हुई. उस ने सैकड़ों बार फोन किया, लेकिन एक भी बार फोन नहीं उठा. मजबूर हो कर उस ने पुलिस को फोन किया.

पुलिस फौरन हरकत में आ गई. वाकर जिस कंपनी का माल सप्लाई करता था, वहां पता किया गया. जानकारी मिली कि उस की लौरी में सभी तरह की सुविधाएं हैं. उस में वायरलेस फोन भी लगा है, जो कंपनी से चलता था. वायरलेस औपरेटर से पुलिस ने लौरी की लोकेशन पता की. ट्रैकिंग डिवाइस से पता चला कि लौरी की लोकेशन वेस्ट मिडलैंड्स के जंगल की है. पुलिस वहां पहुंची. काफी ढूंढने पर जंगल के बीच खड़ी लौरी मिल गई. लौरी के अंदर का दृश्य चौंकाने वाला था. उस के अंदर स्टेसी की लाश पड़ी थी.

कमर के नीचे से वह निर्वस्त्र थी. वहां खून भी पड़ा था. देख कर ही लग रहा था कि स्टेसी के साथ जबरदस्ती की गई थी. कमर के नीचे के हिस्से पर वहशीपन के निशान स्पष्ट दिखाई दे रहे थे. गरदन पर भी अंगुलियों के नीले निशान थे. दुष्कर्म के बाद उस की हत्या कर दी गई थी.

वाकर वहां नहीं था. अनुमान लगाया गया कि यह अमानवीय कृत्य वाकर ने ही किया होगा. वाकर की तलाश में पुलिस जंगल में फैल गई. लौरी से कुछ दूरी पर वाकर एक पेड़ से लटका मिल गया. शायद उस ने भी आत्महत्या कर ली थी.

सुहाग की कातिल : देवर के प्यार में किया पति का क़त्ल

दूसरी बीवी का खूनी खेल – भाग 1

‘‘बाबूजी, आप की पूरी जिंदगी इसी खेती किसानी में निकल गई.

बदले में क्या मिला? न तो अच्छा जीवन जी सके और न ही कोई ऐसा काम किया जिस से दुनिया में आप का नाम हो. आप की जिंदगी इस गांव में ही सिमट कर रह गई है. कभी शहर में रह कर देखो तब महसूस होगा कि यहां के जीवन और वहां के जीवन में कितना फर्क है?’’ संतोष ने अपने पिता महाराज बख्श सिंह से कहा. वह पिता को बाबूजी कहता था.

महाराज बख्श सिंह लखनऊ जिले से 26 किलोमीटर दूर गोसाईंगंज इलाके के नूरपूर बेहटा गांव में रहते थे. उन के पास खेती की अच्छीखासी जमीन थी, इसलिए उन की गिनती गांव के प्रतिष्ठित किसानों में होती थी. गांव में रहने के नाते उन का जीवन सरल और सीधा था.

उन्होंने संतोष को पढ़ाना चाहा, लेकिन जब उस का पढ़ाईलिखाई में मन नहीं लगा तो उन्होंने कम उम्र में ही उस की शादी मोहनलालगंज की रहने वाली राजकुमारी के साथ कर दी थी. शादी हो जाने के बाद संतोष अपनी घरगृहस्थी में रम गया. बाद में राजकुमारी 2 बेटों की मां भी बनी. इस के बाद तो उन के घर में खुशियां और बढ़ गईं. बच्चे बड़े हुए तो उन का दाखिला गांव के ही स्कूल में करा दिया.

संतोष गांव में रह कर पिता के साथ खेती करता था, लेकिन खेती के काम में उस का मन नहीं लगता था. इस के अलावा उसे एक गलत लत यह लग गई थी कि उस ने अपने यारदोस्तों के साथ शराब पीनी शुरू कर दी थी. शुरू में महाराज बख्श सिंह ने उसे काफी समझाया था, लेकिन उस ने पिता की बात को अनसुना कर दिया था.

संतोष रोज शराब पी कर वह घर लौटता और पत्नी के साथ झगड़ता था. इस से पत्नी भी परेशान हो गई थी. संतोष का गांव में मन नहीं लगता था. वह चाहता था कि अपने परिवार के साथ शहर में रहे. इस की वजह यह थी कि उस के गांव की जमीन के भाव काफी बढ़ चुके थे. जिस की वजह से गांव के कुछ लोग अपनी खेती की जमीन बेच कर शहर चले गए थे. शहर जा कर उन्होंने अपने निजी कामधंधे शुरू कर दिए और वहां मजे की जिंदगी गुजार रहे थे. बच्चों के दाखिले भी उन्होंने अच्छे स्कूलों में करा रखे थे. उन की देखादेखी संतोष भी शहर जाना चाहता था. इसीलिए वह बारबार पिता पर जमीन बेचने का दबाव डाल रहा था.

महाराज बख्श सिंह जानते थे कि बेटे को दुनियादारी की अभी इतनी समझ नहीं है. वह शहरी जिंदगी के रहनसहन और चकाचौंध की ओर खिंचा जा रहा है इसलिए उन्होंने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘बेटा अपना गांव और अपना खेत ही अपनी पहचान होती है. शहर में कामधंधा करना तो ठीक है पर अपने खेत बेच कर वहां रहना मेरे लिए संभव नहीं है. इसलिए मैं तुझ से भी यही कहना चाहता हूं कि ऐसी बातें मन से निकाल कर यहीं काम में मन लगा.’’

‘‘बाबूजी, हम ने नहर के किनारे वाली 4 बीघा जमीन का सौदा कर लिया है. 60 लाख रुपए मिल जाएंगे. इस पैसे से मैं आप को नया काम कर के दिखा दूंगा. तब आप को लगेगा कि मेरी बात में कितना दम है.’’

‘‘बेटा, तुम्हारी बात में कोई दम नहीं है. तुम शराब के नशे में गलत कदम उठा रहे हो. जमीन बेच कर तुम सारा घरपरिवार बरबाद कर दोगे.’’ महाराज बख्श सिंह बेटे को समझा रहे थे. आवाज सुन कर संतोष की पत्नी राजकुमारी भी वहां आ गई. ससुर की बात पूरी होने से पहले ही वह बोली, ‘‘बाबूजी, आप इन की बातों में मत आना. इन के शराबी यारदोस्तों ने ही इन्हें यह सलाह दी होगी.’’

पत्नी के बीच में बोलने पर संतोष उस के ऊपर बिफर पड़ा, ‘‘मेरी तरक्की से तुझे क्या परेशानी हो रही है. तू नहीं चाहती कि मैं यहां से शहर जाऊं और अच्छी जिंदगी गुजरबसर करूं. तू ने मेरे पैरों में परिवार की बेडि़यां डाल रखी हैं. लेकिन तू अच्छी तरह जान ले कि मैं ने गांव की जमीन बेच कर शहर में काम करने की ठान ली है. अब मुझे इस काम से कोई नहीं रोक सकता.’’ इस के बाद संतोष और राजकुमारी के बीच कहासुनी शुरू हो गई. बेटेबहू की लड़ाई देख कर 70 साल के महाराज सिंह बरामदे में पड़ी चारपाई पर बैठ गए.

बेटे की ऐसी जिद देख कर उन्हें घरपरिवार का भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा था. वह समझ रहे थे कि बेटा जिद्दी है. वह मानेगा नहीं. इसलिए वह राजकुमारी को ही समझाते हुए बोले, ‘‘बहू इस के मुंह मत लग, जो करता है करने दे. ठोकर खाएगा तो इसे समझ आ जाएगी. शहर में रह कर कामधंधा चलाना कोई आसान काम नहीं. हम ने बहुतों को बरबाद होते देखा है.’’

‘‘बाबूजी शहर जा कर बहुत लोग बन भी गए हैं, उन की जानकारी आप को नहीं है. कुछ अच्छा भी सोचा करें.’’ इतना कह कर संतोष गुस्से में बाहर चला गया. जिस जमीन को बेचने की बात संतोष कर रहा था वह असल में उस के ही नाम थी. पहले वह जमीन ऊसर थी लेकिन अब वहां से सड़क निकल गई तो उस की कीमत बढ़ गई है.

महाराज बख्श सिंह सोचने लगे कैसी विडंबना है कि शहर के लोग महंगी कीमत में जमीन खरीद कर गांवों से जुड़ना चाहते हैं और गांव के लोग जमीन बेच कर शहरों की चकाचौंध में फंसना चाहते हैं. चूंकि संतोष को शहर जाने की सनक सवार थी, इसलिए उस ने अपनी जमीन बेच दी. महाराज सिंह ने उसी समय समझदारी दिखाते हुए जमीन की कीमत का बड़ा हिस्सा संतोष के बेटों के नाम पर बैंक में जमा कर दिया. उन्होंने संतोष को केवल 4 लाख रुपए ही दिए.

संतोष के पास पैसा आ चुका था. इसलिए वह काम की तलाश में लखनऊ चला गया. उसे किसी कामधंधे की जानकारी तो थी नहीं इसलिए लखनऊ जाने के बाद भी वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या काम शुरू करे? ज्यादा से ज्यादा उस ने ढाबा और होटल ही देखे थे और उन के बारे में थोड़ीबहुत जानकारी थी.

शहर में उसे ऐसी कोई जगह नहीं मिली जहां वह अपना काम शुरू कर सके. एकदो जगह उस ने देखी भी लेकिन उन का किराया बहुत ज्यादा था. शहर में ढाबा खोलना उस के बूते के बाहर था. उसे शहर के बाहर बसी कालोनियों में ढाबा खोलना और चलाना आसान लग रहा था.

संतोष पहले जब कामधंधे की तलाश में लखनऊ आता तो वहां वह एक ढाबे पर खाना खाता था. उस की जानपहचान उस ढाबे पर खाना बनाने वाले श्याम कुमार से थी. संतोष ने उसी के साथ काम शुरू करने की योजना बनाई.

वह श्याम के पास पहुंच कर बोला, ‘‘श्याम भाई, तुम बहुत अच्छा खाना बनाते हो. मुझे उम्मीद है कि यहां तुम जितनी मेहनत करते हो, उस के अनुसार तुम्हें पैसे भी नहीं मिलते होंगे. मैं भी एक ढाबा खोलना चाहता हूं और चाहता हूं कि उस ढाबे को हम दोनों मिल कर चलाएं.’’

यह सुन कर श्याम खुश हो गया. उसे फ्री में बिजनेस करने का मौका मिल रहा था. इसलिए उस ने संतोष के साथ काम करने की हामी भर ली. उस ने कहा, ‘‘संतोष भाई, यहां तो कोई ऐसी जगह नहीं है जहां ढाबा खोला जा सके लेकिन जानकीपुरम इलाके में सेक्टर-2 के पास एक ढाबा है. वो ढाबा इस समय चल नहीं रहा है. तुम कहो तो मैं बात करूं?’’

‘‘ठीक है, तुम बात करो हम मिल कर उस ढाबे को चलाएंगे.’’ संतोष ने कहा तो श्याम ने उस ढाबे के मालिक से बात कर ली. वह उन्हें अपना ढाबा किराए पर देने के लिए राजी हो गया. इस के बाद दोनों ही उस ढाबे को चलाने लगे. दोनों की मेहनत से काम चल निकला.

कपूत की करतूत : अपने पिता की दी सुपारी – भाग 1

62 वर्षीय मामन जमींदार परिवार से थे, इसलिए इलाके के लोग उन का काफी सम्मान करते थे. इस उम्र में भी वह पूरी तरह स्वस्थ थे. इस की वजह यह थी कि वह बहुत ही अनुशासित जीवन जीते थे. वह हर रोज सुबह घर से काफी दूर स्थित पार्क में टहलने जाते थे और अपने हर मिलने वाले का कुशलक्षेम पूछते हुए 7, साढ़े 7 बजे तक घर लौटते थे.

2 नवंबर, 2014 की सुबह जब वह पार्क में टहल कर सवा 7 बजे घर लौट रहे थे तो गली में एक पल्सर मोटरसाइकिल उन के सामने आ कर इस तरह रुकी कि वह उस से टकरातेटकराते बचे. मोटरसाइकिल पर 2 युवक सवार थे. उन के चेहरों पर रूमाल बंधे थे. युवकों की यह हरकत मामन को नागवार गुजरी तो उन्होंने युवकों को डांटने वाले अंदाज में कहा, “यह कैसी बदतमीजी है, तुम्हारे मांबाप ने तुम्हें यह नहीं सिखाया कि बुजुर्गों से किस तरह पेश आना चाहिए?”

“सिखाया तो था, लेकिन हम ने सीखा ही नहीं,” मोटरसाइकिल चला रहे युवक ने हंसते हुए कहा, “ताऊ, हम ने तो एक ही बात सीखी है, पैसा लो और खेल खत्म कर दो.”

“क्या मतलब?” मामन ने हकबका कर पूछा.

मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे युवक ने उतरते हुए कहा, “ताऊ मतलब बताने से अच्छा है, कर के ही दिखा दूं.”

इसी के साथ उस ने हाथ में थामी गुप्ती निकाल कर मामन के पेट में घुसेड़ दी. चीख कर मामन जमीन पर बैठ गए. उस वक्त वह इस तरह घिरे थे कि भाग भी नहीं सकते थे. उन की चीख सुन कर कुछ लोग घरों से निकल आए. तभी मोटरसाइकिल पर सवार युवक ने पिस्तौल लहराते हुए धमकी दी, “अगर कोई भी नजदीक आया तो गोली मार दूंगा.”

उस की इस धमकी से किसी की आगे आने की हिम्मत नहीं पड़ी. इस बीच वह युवक मामन पर गुप्ती से लगातार वार करता रहा. वह चीखते रहे, छटपटाते रहे. लेकिन वह उन्हें गुप्ती से तब तक गोदता रहा, जब तक उन की मौत नहीं हो गई. जब उसे लगा कि मामन मर चुके हैं तो वह कूद कर मोटरसाइकिल पर बैठ गया. उस के बाद मोटरसाइकिल पर सवार युवक तेजी से मोटरसाइकिल चलाता हुआ चला गया.

मामन इलाके के जानेमाने और सम्मानित व्यक्ति थे. उन की हत्या की खबर पलभर में पूरे इलाके में फैल गई. जहां हत्या हुई थी, थोड़ी ही देर में वहां भारी भीड़ जमा हो गई. किसी ने इस घटना की सूचना फोन से थाना नरेला को दे दी.

इलाके के एक सम्मानित व्यक्ति की हत्या होने की सूचना से थाना नरेला की पुलिस तुरंत हरकत में आ गई. थाने से एएसआई राजेंद्र सिंह, महिला सिपाही मधुबाला, अभिमन्यु एवं बीट के सिपाहियों को तुरंत घटनास्थल पर भेजा गया. राजेंद्र सिंह ने घटनास्थल एवं शव का निरीक्षण कर के वहां एकत्र लोगों से पूछताछ की. इस के बाद औपचारिक काररवाई निपटा कर उन्होंने लाश को पोस्टमार्टम के लिए राजा हरिश्चंद्र अस्पताल भिजवा दिया.

थाना नरेला पुलिस की जांच का सिलसिला काफी लंबा चला. इस के बावजूद पुलिस न हत्या की वजह जान सकी और न हत्यारों का सुराग लगा सकी. मामन की हत्या जिन 2 युवकों ने की थी, उन्होंने चेहरों पर रूमाल बांध रखे थे, इसलिए हत्या के समय घटनास्थल पर मौजूद प्रत्यक्षदर्शी पुलिस को उन के बारे में कुछ भी नहीं बता सके थे. हां, किसी ने उस पल्सर मोटरसाइकिल का नंबर जरूर बता दिया था, जिस से दोनों हत्यारे भागे थे.

पुलिस ने उस नंबर की मोटरसाइकिल के बारे में पता किया तो पता चला कि वह उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर की थी. उस के मालिक ने स्थानीय थाने में 1 नवंबर, 2014 को मोटरसाइकिल की चोरी की रिपोर्ट दर्ज करा रखी थी. बाद में 13 नवंबर, 2014 को वह नरेला के जंगल से बरामद हो गई थी.

दिल्ली के नरेला स्थित गांव बांकनेर के ममनीरपुर रोड पर मामन का आलीशान मकान था. उस इलाके में मामन के 5 अन्य मकान थे, जिन में तमाम किराएदार रहते थे. हर महीने किराए के रूप में उन्हें करीब 3 लाख रुपए मिलते थे. इस के अलावा उन के पास सैकड़ों एकड़ खेती की जमीन थी. साथ ही वह ब्याज पर पैसा देने का काम भी करते थे. ब्याज के भी उन्हें लाखों रुपए मिलते थे.

मामन के परिवार में एक बेटा अशोक उर्फ चौटाला और एक बेटी सोनम थी. उन की पत्नी की मौत तब हो गई थी, जब बेटी 11 साल की और बेटा 14 साल का था. सयानी होने पर सोनम की शादी उन्होंने हरियाणा के सोनीपत निवासी सत्येंद्र से कर दी थी. अशोक का विवाह उन्होंने दिल्ली के बसंतकुंज के रहने वाले हरिप्रसाद की बेटी रोशनी से किया था. लेकिन अशोक से रोशनी की पटरी नहीं बैठी. वह तलाक ले कर मायके में रहने लगी.

अदालत के आदेश पर उसे हर महीने 20 हजार रुपए गुजाराभत्ता मिलता था, जिसे अशोक हर माह अदालत में जमा करता था. अशोक राजा हरिशचंद्र अस्पताल में सिक्युरिटी गार्ड की नौकरी करता था. मतभेदों के चलते मामन ने उसे घर से निकाल दिया था. वह मामन के बनवाए दूसरे मकान में अकेला रहता था.

मामन काफी मिलनसार थे. उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. दुश्मनी होती भी कैसे, वह हर किसी के सुखदुख में खड़े रहते थे. किसी बीमार को इलाज के लिए पैसों की जरूरत होती अथवा किसी की बेटी की शादी होती तो वह बिना ब्याज के पैसा देते थे. जितनी हो सकती थी, मदद भी करते थे. इसी वजह से इलाके के लोग उन की इज्जत करते थे. ऐसे आदमी की किसी से ऐसी क्या दुश्मनी हो सकती थी, यह बात पुलिस समझ नहीं पा रही थी.

थाना नरेला पुलिस ने अपने स्तर से काफी छानबीन की, लेकिन वह हत्यारों का सुराग नहीं लगा सकी. जब थाना पुलिस इस मामले में कुछ नहीं कर सकी तो 13 फरवरी, 2015 को यह मामला दिल्ली की अपराध शाखा को सौंप दिया गया. अपराध शाखा के जौइंट कमिश्नर रविंद्र कुमार ने थाना नरेला पुलिस द्वारा की गई जांच का अध्ययन करने के बाद यह केस क्राइम ब्रांच के एडिशनल कमिश्नर अजय कुमार को सौंप दिया. अजय कुमार ने इस मामले की जांच के लिए क्राइम ब्रांच के डीसीपी राजीव कुमार के नेतृत्व में एक टीम बनाई, जिस में क्राइम ब्रांच के एसीपी जितेंद्र ङ्क्षसह, इंसपेक्टर अशोक कुमार आदि को शामिल किया गया.

थाना नरेला पुलिस ने अपनी जांच की जो फाइल तैयार की थी, इंसपेक्टर अशोक कुमार ने उसे ध्यान से पढ़ा. उन्हें इस बात पर हैरानी हुई कि थाना पुलिस ने मामन , उन के बेटे अशोक, बेटी सोनम व सोनम के पति के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच करने की जहमत नहीं उठाई थी, जबकि आजकल तमाम केसों का खुलासा मोबाइल फोन से ही हो जाता है.

अशोक कुमार ने तुरंत मृतक मामन, उन के बेटे अशोक उर्फ चौटाला, बेटी सोनम और उस के पति सत्येंद्र के मोबाइल नंबरों को सॢवलांस पर लगवाने के साथ उन के नंबरों की 1 नवंबर से 15 नवंबर, 2014 तक की काल डिटेल्स निकलवाई. उन्होंने तीनों की काल डिटेल्स को ध्यान से देखी तो मामन के बेटे अशोक उर्फ चौटाला की काल डिटेल्स में एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर उन्हें संदेह हुआ.

बीता वक़्त वापिस नहीं आता – भाग 1

रोक्सेन के चेहरे पर परेशानी के बादल एक बार फिर घिर आए थे. ऐसे ही बादल पिछले दिन शाम को भी घिरे थे. लेकिन डेरेन  वाकर का फोन आ गया था, तो वे छंट गए थे. वाकर ने फोन कर के बता दिया था कि वह रात को घर नहीं आ पाएगा. स्टेसी भी उसी के साथ लौरी में रहेगी. वाकर ने स्टेसी से उस की बात भी करा दी थी. उस समय वह लौरी में लगा टीवी देख रही थी. वह काफी खुश नजर आ रही थी, इसलिए रोक्सेन निश्ंिचत हो गई थी.

अगला पूरा दिन गुजर गया और वाकर तथा स्टेसी नहीं आए, तो रोक्सेन एक बार फिर परेशान हो उठी. उस का धैर्य जवाब देने लगा था, क्योंकि वाकर फोन भी नहीं उठा रहा था. ऐसा किसी हादसे की सूरत में ही हो सकता था. वह हादसा कैसा हो सकता है, यह रोक्सेन की समझ में नहीं आ रहा था. रात हो गई और धैर्य ने भी जवाब दे दिया, तो हार कर उस ने पुलिस को फोन कर के अपने प्रेमी डेरेन वाकर और बेटी स्टेसी लारैंस के गायब होने की सूचना दे दी.

38 वर्षीय रोक्सेन तलाकशुदा 3 बच्चों की मां थी. बेटी एमा हेमंड 17 साल की, उस से छोटी स्टेसी लारैंस 9 साल की, तो बेटा रौबर्ट 4 साल का. लगभग 19 साल पहले उस की शादी कोरोनट पेंबर से हुई थी. शादी के शुरुआती दिन बहुत अच्छे बीते. रोक्सेन पति के साथ बहुत खुश थी. लेकिन बेटी स्टेसी के पैदा होने के 3 साल बाद अचानक उन के रिश्तों में कड़वाहट आ गई. इस की वजह थी उम्र के साथ रोक्सेन के मन में बढ़ती शारीरिक संबंध की इच्छा. जबकि शराब अधिक पीने और दिन भर मेहनत करने की वजह से कोरोनट की मर्दाना ताकत कम होती जा रही थी.

शुरूशुरू में तो रोक्सेन ऐसी नहीं थी, लेकिन बेटी के पैदा होने के बाद उस में न जाने क्या बदलाव आया कि उस की शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा एकाएक बढ़ने लगी. जबकि दिन भर का थकामादा कोरोनट शाम को शराब पी कर बिस्तर पर पड़ते ही सो जाता था. कभीकभी तो उसे खाने का भी होश नहीं रहता था.कोरोनट को तो अच्छी नींद आती थी, लेकिन उस की बगल में लेटी रोक्सेन सारी रात शारीरिक सुख के लिए तड़पती रहती थी.

सुबह उठने पर रोक्सेन कोरोनट से शिकायत करती, ‘‘तुम्हें काम और शराब के अलावा भी कुछ दिखाई देता है या नहीं? पहले तो तुम ऐसे नहीं थे, कितना प्यार करते थे? एक भी रात मुझे चैन नहीं लेने देते थे. पूरीपूरी रात जगाए रखते थे. अब ऐसा क्या हो गया कि तुम मेरी ओर देखते तक नहीं. मैं खूबसूरत नहीं रही या तुम ने किसी और से दिल लगा लिया है?’’

‘‘कैसी बातें करती हो. अब तो तुम पहले से भी ज्यादा खूबसूरत लगती हो. प्यार भी मैं तुम से पहले की ही तरह करता हूं. लेकिन क्या करूं, परिवार बढ़ने से जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं. इसलिए ज्यादा कमाई के लिए मेहनत ज्यादा करनी पड़ती है. यह सब मैं तुम लोगों को सुखी रखने के लिए ही तो कर रहा हूं.’’ कोरोनट ने रोक्सेन को समझाया.

‘‘भाड़ में जाए यह सुख. औरत को सिर्फ रोटीकपड़े से ही सुख नहीं मिलता, इस के अलावा भी उसे कुछ चाहिए. मैं सारी रात तड़पती रहती हूं और तुम मस्ती में सोए रहते हो. रोज नहीं, तो कभीकभार ही मेरी ओर देख लिया करो.’’ रोक्सेन ने कहा.

‘‘ठीक है, अब ध्यान रखूंगा.’’ कह कर कोरोनट ने किसी तरह पीछा छुड़ाया. लेकिन अपनी इस बात पर वह कभी खरा नहीं उतरा. उस का वही ढर्रा रहा. वह करता ही क्या. पूरे दिन की हाड़तोड़ मेहनत के बाद रात को उसे पत्नी को सुख देने का होश ही नहीं रहता. उस की मजबूरी भी थी. थका होने की वजह से मानसिक रूप से वह इस के लिए तैयार ही नहीं हो पाता था.

कभी कोशिश भी करता, तो उस के दिमाग में यह घूमता रहता कि वह किस तरह पत्नी और बेटी को सुख मुहैया करवाए, जिस की उन्हें जरूरत है. यही सोचने में वह भूल जाता कि उस की पत्नी रोक्सेन को इन चीजों के अलावा भी किसी चीज की जरूरत है. उस का सोचना था कि बेटी हो गई है, तो अब रोक्सेन को उस की नजदीकी की क्या जरूरत है. वह बेटी में ही व्यस्त रहती होगी, उसे उस का होश ही नहीं रहता होगा.

जबकि रोक्सेन की यही सब से अहम जरूरत बन गई थी. वह एक समय भूखी रह सकती थी, लेकिन पति के सान्निध्य के बिना नहीं रह सकती थी. इस की वजह यह थी कि इस इच्छा को दबाना शायद उस के वश में नहीं रह गया था, वरना वह जरूर दबा लेती.

खैर, किसी तरह वक्त गुजरता रहा. बेटी के पैदा होने के करीब 5 सालों बाद रोक्सेन एक बार फिर मां बनी. इस बार बेटा रौबर्ट पैदा हुआ. इस के बाद तो उस की इच्छा और ज्यादा होने लगी. हमेशा उस की देह में आग लगी रहती, जबकि कोरोनट में उस आग को बुझाने की ताकत नहीं रह गई थी.

पति की उपेक्षा से रोक्सेन की नजरें भटकने लगीं, जिस से उस के मन में खोट आ गया. अब वह जब भी घर से बाहर निकलती, उस की नजरें पराए पुरुषों पर ठहर जातीं. उन्हें वह हसरत भरी नजरों से तब तक ताकती रहती, जब तक वे आंखों से ओझल नहीं हो जाते. वह मर्दों को ताकती जरूर, लेकिन चाहत का इजहार करने की हिम्मत नहीं कर पाती. संकोचवश वह किसी को इशारा भी नहीं कर पाती थी.

वे लोग बदनसीब होते हैं, जिन्हें इंतजार का वाजिब फल नहीं मिलता. रोक्सेन उन में से नहीं थी. उस दिन शाम को वह मौल में शौपिंग करने गई, तो उस की हसरत पूरी हो गई. शौपिंग करने के बाद वह कैश काउंटर पर पेमेंट कर के गेट की ओर बढ़ रही थी, तभी गेट के पास खड़े एक युवक पर उस की नजरें जम गईं. इस की वजह यह थी कि वह युवक उसी को ताक रहा था.

रोक्सेन का दिल धड़का और पलकें अपने आप झपक उठीं. वह युवक भी उस से जरा भी कम स्मार्ट नहीं था. हां, उम्र में उस से कम जरूर था. इस के बावजूद रोक्सेन उस की नजरों में छा गई, तो वह भला क्यों पीछे रहती. उस ने उसे दिल की धड़कन बना लिया. अब कदमों के रुकने का सवाल ही नहीं था. रोक्सेन ने उस की ओर कदम बढ़ाए, तो युवक भी उस की ओर बढ़ने लगा.

दोनों आमनेसामने थे. मुसकराहट दोनों के होंठों पर थी. वे एकदूसरे की आंखों में अपनीअपनी तसवीरें देखते हुए चाहत तलाशने की कोशिश कर रहे थे. कुछ कहना भी चाह रहे थे, लेकिन होंठों से शब्द नहीं निकल रहे थे. बस कांप कर रह जा रहे थे. इसी कशमकश में आखिर युवक ने हिम्मत दिखाई, ‘‘मुझे डेरेन वाकर कहते हैं और आप.’’

‘‘रोक्सेन नाम है मेरा, लेकिन आप मुझे आप न कह कर तुम कहोगे, तो ज्यादा अच्छा लगेगा.’’ रोक्सेन ने कहा.

‘‘अगर तुम भी मुझे आप न कह कर वाकर कहोगी, तो मुझे भी अच्छा लगेगा.’’ डेरेन ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘यहां आतेजाते लोग घूर रहे हैं. अगर हम कहीं एकांत में चलें, तो..?’’ रोक्सेन ने हिम्मत कर के कहा.

वाकर रोक्सेन को साथ ले कर मौल स्थित रेस्टोरेंट में आ गया. रेस्टोरेंट में कोने की टेबल पर बैठने के बाद बातों का सिलसिला शुरू हुआ. इस बातचीत में दोनों ने अपनेअपने बारे में सब कुछ बता दिया.

32 साल का हो जाने के बाद भी डेरेन वाकर कुंवारा था. उस के पास अपनी एक कैब (लौरी) थी, जिस से वह शहर व शहर के बाहर डिपार्टमेंटल स्टोरों पर माल सप्लाई का काम करता था. काम भी अच्छा था और कमाई भी अच्छी थी. वह ए.एफ. ब्लेकमोरे एंड संस नामक कंपनी के लिए काम करता था. उसी का माल वह स्टोरों पर पहुंचाता था.

अपने जैसा स्मार्ट और अपनी उम्र से कमउम्र प्रेमी पा कर रोक्सेन खुश थी. वाकर को भी ऐतराज नहीं था कि रोक्सेन उस से उम्र में 6 साल बड़ी थी और 2 बच्चों की मां थी. रोक्सेन और वाकर ने किसी भी तरह की औपचारिकता निभाए बगैर पहली ही मुलाकात में अपनेअपने प्यार का इजहार कर दिया था.

बेरुखी : बनी उम्र भर की सजा

सालगिरह पर पति को मौत का तोहफा

जगजीवन राम रात्रे की आंखें गुस्से से लाल थीं, उस ने पत्नी की गरदन दबोचते हुए गुस्से में लाल आंखों से कहा, “देखो धन्नू, मैं तुम्हें अंतिम चेतावनी देता हूं, तुम नहीं सुधरी तो अनर्थ हो जाएगा. इतने साल हो गए तुम्हें, इतना भी नहीं पता कि मुझे क्या पसंद है और क्या नहीं.”

गला दबाए जाने से धनेश्वरी की आंखें निकली जा रही थीं और मुंह से शब्द नहीं फूट रहे थे. अचानक जगजीवन ने उसे छोड़ कर के पास रखी एक थाली उठा ली और उस से उस की पीठ पर दनादन पिटाई करने लगा. फिर उस ने थाली फेंक दी. इस के बाद वहीं बैठ कर लंबीलंबी सांसें लेने लगा.

तीखे नाकनक्श की धनेश्वरीबाई का 10 साल पहले 24 मई, 2013 को कोयला खान में फिटर पद पर कार्यरत जगजीवन राम रात्रे के साथ सामाजिक रीतिरिवाजों के साथ विवाह हुआ था. समय पर उस के 2 बच्चे हुए. पति के हाथों पिटने के बाद वह आंसू बहाते हुए अपने रोजाना के कामकाज में लग गई. यह धनेश्वरी की नियति बन गई थी. वह अकसर पति के गुस्से का शिकार हो जाती. घरेलू ङ्क्षहसा से धनेश्वरीबाई परेशान हो चुकी थी.

छोटी सी भी गलती पति को बरदाश्त नहीं थी, वह लाख चाहती कि यह नौबत न आए, मगर कुछ न कुछ नुक्स निकाल कर जगजीवन राम पत्नी हाथ उठा दिया करता. धनेश्वरी भीतर ही भीतर कुढ़ती रहती और सोचती कि वह इस रोजरोज की पति की पिटाई से किस तरह बच जाए.

उसे अपनी बहन भुवनेश्वरी की याद आती, उस का पति सरकारी नौकरी में नहीं है मगर कम पैसों में भी किस तरह दोनों सुखी जीवन जी रहे हैं. और एक वह है जो पति की अच्छीखासी कमाई के बावजूद जीवन से निराश होती चली जा रही है. आखिर क्या करे, जिस से पति की पिटाई से छुटकारा मिल जाए, यह बात वह अकसर सोचती थी.

पत्नी को रुई की तरह धुन देता था जगजीवन राम

आखिरकार एक दिन उस के मन में विचार आया कि रोजरोज की इस मार खाने से अच्छा तो यह है कि उस का पति ही इस दुनिया से चला जाए तो कितना अच्छा हो. यह विचार उस के मन में आते ही वह भीतर तक दुखी भी हो गई और सोचने लगी कि वह ये बात कैसे सोच सकती है. जैसा भी है, जगजीवन उस का सुहाग है उस के बच्चों का बाप है.

जगजीवन राम रात्रे ऊर्जा नगर कालोनी के क्वार्टर में पत्नी धनेश्वरी और 2 बच्चों के साथ रहता था. वह अकसर शराब पीता और तनख्वाह में मिले पैसों को दोस्तों के साथ पार्टी कर के उड़ा दिया करता. इसी वजह से उस के कई दोस्त बन गए थे, जो अकसर घर पर आया करते थे. घर पर ही पार्टी हुआ करती थी.

मार्च 2023 के एक दिन जगजीवन राम रात्रे को किसी बात पर गुस्सा आ गया और वह दोस्तों के सामने ही धनेश्वरी पर बरसते हुए उस की पिटाई करने लगी. पहले तो किसी ने कुछ नहीं कहा, मगर जब जगजीवन रात्रे हद पार करने लगा तो उस के साथ काम करने वाला रमेश सूर्यवंशी उठ खड़ा हुआ और कंधे से पकड़ जगजीवन राम को धनेश्वरी बाई रात्रे से दूर हटा कर नाराजगी जताते हुए बोला,

“यह क्या नौटंकी कर रहे हो जगजीवन, पत्नी पर हाथ उठाना, यह तो बहुत ही गलत है. देखो तुम्हारे बच्चे भी कैसे डरेसहमे खड़े हैं.”

यह देख कर जगजीवन रात्रे मानो गुस्से से उबल पड़ा और चीख कर बोला, “देखो , तुम हमारे दोस्त हो और हमारे बीच में मत आओ.”

बदमाश तुषार सोनी ने लिया धनेश्वरी का पक्ष

इसी दौरान वहां से गुजर रहा तुषार सोनी उर्फ गोपी भी आ कर कुछ लोगों के साथ तमाशा देखने लगा था. जगजीवन राम की बातें सुन कर के रमेश सूर्यवंशी ने विरोध करते हुए कहा, “अगर तुम अपनी पत्नी के साथ हमारे सामने जानवरों की तरह व्यवहार करोगे तो यह हम, कम से कम मैं तो बरदाश्त नहीं कर सकता. पतिपत्नी का मामला है मगर यह आपस में घर का मामला होना चाहिए. जब हम घर आए हुए हैं तो ऐसा व्यवहार करना, यह हमारा भी अपमान है.”

इस पर तुषार सोनी ने भी सामने आ कर रमेश का समर्थन किया और जगजीवन राम की बात का जोरदार विरोध करते हुए कहा, “पत्नी से मारपीट करना अच्छी बात नहीं है, इस से घर का माहौल खराब होता है.”

तुषार सोनी उर्फ गोपी पास के ही कृष्णानगर में रहता था और उस के आपराधिक चरित्र के कारण सभी उसे अच्छी तरह जानते थे. उस के वहां रहने से जगजीवन राम सहम सा गया था. अब जगजीवन राम रात्रे की बोलती बंद हो गई थी. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहे.

जगजीवन राम को निरुत्तर देख कर के तुषार सोनी का हौसला बढ़ गया. उस ने सधे हुए शब्दों में कहा, “आप हम से बड़े हो, आप को हम क्या कहेंगे. मगर मैं आज की स्थिति देख कर कह सकता हूं कि ऐसा करना आप को शोभा नहीं देता है.”

इस घटना को बीते हुए कई दिन हो गए, एक दिन तुषार सोनी के मोबाइल पर घंटी बजी तो उस ने काल रिसीव किया तो दूसरी तरफ से महिला की आवाज आई. वह बोली, “भैया, मैं धनेश्वरी बोल रही हूं जगजीवन राम की पत्नी. मैं आप से मिलना चाहती हूं.”

“हां भाभी, आप अगर मिलना चाहती हैं तो शाम को कृष्णानगर चौक के पान ठेले पर मैं रहूंगा आ जाइएगा.” तुषार सोनी ने सम्मानपूर्वक कहा. शाम को धनेश्वरी कृष्णानगर चौक के पान ठेले पर पहुंच गई.

वहां उसे तुषार सोनी मिल गया तो वह बोली, “भैया क्या बोलूं, आप के भैया उस दिन जब आप ने उन्हें रोका था तो वह डर गए थे, लेकिन अब वह मुझ से बुरी तरह मारपीट करने लगे हैं. भैया, मैं तो किसी दिन मर जाऊंगी, इन की मार खातेखाते मैं तो अब तंग आ चुकी हूं मुझे बचा लो.” कह कर धनेश्वरी रोने लगी.

“देखो भाभी, आप चिंता मत करो. मैं हूं न, मैं जगजीवन को समझा लूंगा.”

यह सुन कर धनेश्वरी की आंखें भर आईं. वह बोली, “मैं कितना चाहती हूं कि उन्हें गुस्सा न आए, मगर छोटीछोटी बातों पर चिल्लाने लगते हैं और मारपीट शुरू कर देते हैं. यह बात मैं ने कभी अपने मायके तक में नहीं बताई है. भैया, मैं क्या करूं, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है?”

तुषार सोनी ने अधिकार जताते हुए कहा, “आप चिंता मत करो, मैं देख लूंगा.”

इस पर धनेश्वरी दुखी होते हुए बोली, “जगजीवन कभी भी नहीं समझेगा, वह ऐसा ही है. वह एक पत्थर बन चुका है, इसलिए वह कभी नहीं सुधर सकता. मैं ने कितने प्यार से उसे समझाने की कोशिश की, बच्चों की भी कसम दी मगर…”

“फिर इस का एक ही रास्ता है…” कह कर के तुषार सोनी मौन हो गया.

धनेश्वरी ने उस की और देखते हुए कहा, “और क्या रास्ता है भैया, बताओ मैं आप की हर बात मानूंगी.”

तुषार सोनी ने धीरे से कहा, “ऐसा है तो जगजीवन को तुम्हारे रास्ते से हमेशा के लिए मैं हटा दूंगा. इस के बाद तुम्हें उस की जगह कोयला खदान (एसईसीएल) की सरकारी नौकरी भी मिल जाएगी, फिर तुम मजे से अपना जीवन बिताना.”

पति को मरवाने का बना लिया प्लान

कुछ सोचविचार कर के धनेश्वरी इस के लिए तैयार हो गई. तब तुषार सोनी ने उस की ओर देखते हुए कहा, “इस के बदले में मुझे क्या मिलेगा, यह भी बता दो.”

“क्या चाहिए तुम्हें, बताओ कितने पैसे चाहिए, मैं दूंगी.”

यह सुन कर के तुषार ने कहा, “देखो भाभी, मुझे 5 लाख देने होंगे. अभी मुझे 50 हजार रुपए तुम दे दो, काम करने के बाद बाकी रुपए और दे देना. तुम्हें दुखी देख कर के मैं तुम्हारी मदद करना चाहता हूं, मुझे रुपएपैसों का लालच नहीं है.”

इस पर धनेश्वरी कुछ सोच कर तैयार हो गई. और दूसरे दिन अपने कुछ गहने बेच कर 50 हजार रुपए तुषार सोनी के हाथ में रख दिए. मगर तुषार सोनी दूसरे ही दिन एक पुराने वारंट में पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, लेकिन जल्द ही वह जमानत पर जेल से बाहर आ गया.

बुधवार 23-24 मई, 2023 की रात लगभग साढ़े 12 बजे जगजीवन राम रात्रे पत्नी धनेश्वरी और बच्चों के साथ बिस्तर पर लेटा हुआ था कि दरवाजे पर दस्तक हुई. जगजीवन राम उठा और दरवाजा खोला. सामने तुषार सोनी खड़ा था. जगजीवन राम को देखते ही तुषार सोनी ने कहा, “भैया, एक बहुत जरूरी बात तुम्हें तुम्हारी पत्नी के बारे में बताना चाहता हूं.”

देर रात को इस तरह तुषार सोनी का आना और आश्चर्यचकित कर देने वाले अंदाज में पत्नी की बात छेडऩा जगजीवन राम रात्रे को चकित कर गई और वह उस की और देखता रह गया. तुषार सोनी ने कहा, “मुझे पहले पानी पिलाओ.”

कुछ विचार करता हुआ जगजीवन राम घर के भीतर चला गया. तुषार सोनी की आहट सुन कर धनेश्वरी मन ही मन खुश होते हुए पति से बोली, “इतनी रात कौन आया है?”

पत्नी की बातें सुनीअनसुनी कर के जगजीवन राम ने फ्रिज से ठंडे पानी की बोतल निकाली, फिर दरवाजा बंद कर बाहर चला गया. जैसे ही बोतल ले कर के जगजीवन राम आया, तुषार सोनी ने मौका देख कर उस पर कुल्हाड़ी से लगातार वार करने लगा और वह तब तक उसे मारता रहा, जब तक कि उस की मौत न हो गई.

इधर कमरे के भीतर धनेश्वरी बाई रात्रे पति के चीखने की आवाज सुन कर मुसकरा रही थी. दोनों ही बच्चे गहरी नींद में सोए हुए थे. पति का मर्डर हो जाने के बाद धनेश्वरी बहुत खुश हुई.

रात लगभग 3 बजे थाना दीपका के एसएचओ अविनाश सिंह के मोबाइल की ङ्क्षरगटोन बजने लगी. नींद उचाट हुई तो घड़ी की ओर देखते हुए फोन को रिसीव किया. दूसरी तरफ थाने के स्टाफ ने बताया कि ऊर्जा नगर में एक शख्स की हत्या हो गई है, लोगों की भीड़ वहां उमड़ी पड़ी है.

पुलिस जुटी जांच में

थाने में शिवकांत कुर्रे ने आ कर के घटना की जानकारी दी थी. मर्डर की खबर मिलते ही एसएचओ अविनाश सिंह तत्काल तैयार हुए और घटनास्थल पर पहुंच गए. ऊर्जा नगर में स्थित जगजीवन राम के क्वार्टर के बाहर कुछ लोगों की भीड़ लगी हुई थी, उन्होंने मुआयना किया तो देखा कि जगजीवन राम रात्रे खून से लथपथ मृत अवस्था में पड़ा हुआ था.

पास में ही बच्चों के साथ बैठी उस की हत्यारी पत्नी धनेश्वरी बाई रात्रे पति की सालगिरह पर मौत दे कर घडिय़ाली आंसू बहा रही थी. घटना के संबंध में उस ने बताया कि कुछ लोग आए थे और पति को मार कर चले गए. वह डर की वजह से कमरे के भीतर ही थी और पति के चिल्लाने की आवाज सुनी थी.

एसएचओ ने घटना की जानकारी एसपी उदय किरण को दी और तत्काल फोरैंसिक टीम, डौग स्क्वायड को बुलवा लिया गया. पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई पूरी कर जगजीवन राम रात्रे के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

दीपका कोयला अंचल अपनी शांति व्यवस्था के लिए जाना जाता है. रोजाना लाखों टन कोयला यहां से देश के विभिन्न राज्यों में भेजा जाता है. कोयला भरे सैकड़ों ट्रक यहां से विभिन्न राज्यों के लिए जाते हैं. मगर हत्या की वारदात एसएचओ के लिए एक चुनौती बन कर के सामने थी. हत्या के कारणों के विभिन्न कोणों पर उन्होंने नजर डाली और यह पता लगाने की कोशिश की कि क्या जगजीवन राम की किसी से दुश्मनी थी.

धनेश्वरी ने बताया कि इस की उसे कोई भी जानकारी नहीं है. एसएचओ ने धनेश्वरी के मोबाइल को ट्रेस किया, मगर उस में कहीं कोई साक्ष्य नहीं मिला. जगजीवन राम रात्रे के दोस्तों से बात की गई. उन्होंने भी कोई ऐसा सूत्र नहीं दिया, जिस से जांच आगे बढ़ती.

पुलिस को जगजीवन राम के मोबाइल से भी कोई सूत्र नहीं मिल पा रहा था. अविनाश सिंह ने धनेश्वरी और बच्चों से पूछताछ की. बच्चे भी कुछ नहीं बता पा रहे थे. ऐसे में उन्होंने मनोवैज्ञानिक तरीके से धनेश्वरी से पूछताछ करनी शुरू की. बातचीत करने से धीरेधीरे जो बातें सामने आने लगीं, उस से उन्हें लगा कि हत्या पर से परदा उठ सकता है.

दोपहर को एक मुखबिर ने उन्हें बताया कि उस ने घटना से पहले शाम के समय तुषार सोनी को धनेश्वरी के साथ बातचीत करते देखा गया था. तुषार सोनी पुलिस के रडार पर पहले से ही था. उस का नाम हत्या के इस घटनाक्रम में सामने आते ही एसएचओ को यह एहसास होने लगा कि कहीं न कहीं हत्या में उसी का हाथ हो सकता है.

पुलिस पूछताछ में धनेश्वरी कई प्रकार के सचझूठ बताती रही. अंतत: सख्ती से पूछताछ के बाद उस ने सारा राज उगल दिया. उस ने बताया कि उस ने ही तुषार सोनी के द्वारा पति की हत्या कराई थी. पूछताछ में उस ने बताया कि करीब 10 साल पहले आज ही के दिन 24 मई, 2013 को उस का जगजीवन राम से विवाह हुआ था. मगर उस का पति उस के साथ अकसर मारपीट करता था. इस के बाद धनेश्वरी ने फूटफूट कर रोते हुए सारी कहानी बयां कर दी. उस ने बताया कि आज शादी की सालगिरह के दिन ही मैं ने पति को मौत का तोहफा दे दिया.

हत्या के बाद 6 हजार रुपए नगद रात को ही तुषार सोनी को देने की बात भी उस ने स्वीकार की. पुलिस हत्या के आरोपी तुषार सोनी को पहले ही हिरासत में ले चुकी थी. तुषार की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में उपयोग की गई कुल्हाड़ी, खून से रंगे हुए कपड़े और एक बाइक भी बरामद कर ली.

पुलिस ने शुक्रवार 26 मई, 2023 को 32 वर्षीय धनेश्वरी बाई रात्रे 21 वर्षीय तुषार सोनी उर्फ गोपी निवासी कृष्णा नगर, थाना दीपका को भादंवि धारा 302, 120 (बी), 34 के तहत गिरफ्तार कर लिया. दोनों आरोपियों को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, कटघोरा के समक्ष पेश किया गया, जहां से दोनों को ही जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों से बातचीत पर आधारित

संगीता के प्यार की झंकार

मायके में मोहब्बत : भाई बना दुश्मन – भाग 3

लाखन भी गांव में ही रहता था, इसलिए उस का अंकुर और उस के चाचा का अकसर आमनासामना हो जाया करता था. यही नहीं, वह उन्हें देख कर अपनी मूंछों पर ताव भी दिया करता था. गांव में वैसे भी पहले से उन की बहुत बदनामी हो चुकी थी. लाखन की यह हरकत उन के गुस्से में आग में घी डालने का काम करती थी. जब यह उन के बरदाश्त से बाहर हो गया, तब अंकुर ने अपने चाचा और चचेरे भाई के साथ मिल कर लाखन को जिंदा नहीं रहने देने की सौगंध खा ली.

तीनों ने लखन को रास्ते से हटाने के लिए उस की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू कर दी. उस की दिनचर्या मालूम करने के बाद वारदात के दिन 5 अप्रैल, 2023 की शाम को उन्होंने देखा कि लाखन बस स्टैंड के पास राधेश्याम राठौर के मकान के सामने ट्रैक्टर ट्रौली से गेहूं खाली कर रहा है. उस के आसपास कोई और नहीं था. तीनों ने मौका देख कर उस पर हमला कर दिया. पुलिस को इस हत्याकांड का कोई भी चश्मदीद नहीं मिला था, जबकि हत्या की साजिश पहले ही बना ली गई होगी.

लाखन की हत्या जिस जगह पर हुई थी, उस के पास में ही आरोपी प्रेम सिंह की दूध डेयरी भी थी. पुलिस को पता चला कि शायद इसी दुकान पर बैठ कर हत्या की योजना बनाई गई होगी, क्योंकि दुकान में पहले से ही पिस्टल और सब्बल रखा हुआ था. लाखन को घेर कर यहीं से हथियार निकाले गए थे.

मिटा दिया बहन का सिंदूर

उस दिन लाखन गांव के राधेश्याम राठौर के खेत पर गेहूं निकाल रहा था. वह ट्रैक्टर ट्रौली में गेहूं ले कर धानोदा गांव के बस स्टैंड के पास स्थित राधेश्याम के घर के सामने पहुंचा ही था, तब शाम के लगभग साढ़े 7 बजे थे. लाखन ने ट्रौली से गेहूं खाली करना शुरू ही किए थे कि आरोपी अचानक से आ गए थे.

अंकुर दौड़ कर डेयरी से पिस्टल ले आया था. उस ने लाखन की ओर फायर किया था. गोली उस की कमर में लगी थी और लाखन ट्रौली के पास ही सटे खंभे के पास गिर गया था. इस के बाद एक आरोपी दौड़ा और डेयरी से सब्बल निकाल ले आया. फिर तीनों उस पर टूट पड़े थे. उन्होंने सब्बल और पत्थर से उस पर जानलेवा हमला कर दिया था. इस के बाद अंकुर ने फिर से उस पर गोली दाग दी.

लाखन पूरी तरह से निढाल जमीन पर गिर गया था. सब्बल चाचा के लडक़े के हाथ में था, जिसे छुड़ा कर अंकुर ने उस पर इतनी जोर से वार किया कि सब्बल गले के आरपार हो गया. उस दिन गांव में अनेक शादियां थीं. हत्याकांड के बाद काफी दहशत फैल गई. बैंडबाजे सब कुछ बजने बंद हो गए. पूरे गांव में सन्नाटा पसर गया. न कोई शादी में शामिल हुआ, न कोई दावत खाने गया. परिवार वालों ने ही जैसेतैसे रस्में निभाईं.

इस घटना से पहले लाखन के पिता बहादुर सिंह नीतू के परिवार से मिल रही धमकियों से बेहद डरे हुए थे. जिस के चलते वह घर के पास ही मंदिर में जा कर रहने लगे थे. लाखन उन का इकलौता बेटा था. उस की मौत से उन का बुरा हाल हो गया था. मां का भी रोरो कर बुरा हाल हो गया था.

हत्याकांड के बारे में लाखन की मां श्याम कुंवर ने बताया कि बेटे ने नीतू से लव मैरिज की थी, जो दोनों की पसंद की थी. फिर भी बहू नीतू के घर वाले बेटे को जान से मारने की धमकी दे रहे थे. नीतू प्रेग्नेंट थी. लाखन के जिम्मे ही मातापिता, पत्नी नीतू और बहन की जिम्मेदारी थी. लाखन की मौत के बाद 4 लोगों की जिंदगी पूरी तरह से बिखर गई. नीतू के नाराज भाइयों ने ही उस के पति की हत्या की थी. वह उस का पहला और आखिरी प्यार था.

नीतू ने बताया कि घर वालों ने उस की मरजी के खिलाफ उस की शादी राजेंद्र से कर दी थी. पति की शराब की लत से रिश्ता बिगड़ गया था. इस बीच इन 5 सालों में एक बेटा और एक बेटी का जन्म भी हुआ. कोरोना काल में पिता भगवान सिंह की मौत के बाद ससुराल वालों के तेवर बदल गए. वे आए दिन किसी न किसी बात पर विवाद करते थे. पति नशे में धुत हो कर छोटीछोटी बातों पर पीटता. जब बात बरदाश्त से बाहर हो गई तो दोनों बच्चों को रावतपुरा गांव छोड़ कर मायके धानोदा आ गई थी.

लाखन की बहन ने भी नीतू के भाइयों पर हत्या का आरोप लगाया. उस ने भी बताया कि भाभी के घरवालों को यह शादी अपनी इज्जत पर दाग जैसी लग रही थी. उन्होंने इसी का बदला लिया.

माचलपुर एसएचओ जितेंद्र अजनारे के सामने मृतक लाखन की बहन सपना की तरफ से नामजद रिपोर्ट दर्ज कर ली. हत्या के तीनों आरोपियों से पूछताछ करने के बाद उन्हें कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में अंकुर परिवर्तित नाम है.

मायके में मोहब्बत : भाई बना दुश्मन – भाग 2

नीतू ने एक नजर से सहेली को देखा, वह जैसे ही जाने लगी उस ने उस से नजर चुरा कर लाखन का गिफ्ट पैकेट ले लिया. लाखन तुरंत साइकिल का पैडल मार कर आगे बढ़ गया.

नीतू ने सहेली को पुकारा, “अरे मुझे अकेला छोड़ कर जाएगी क्या? ठहर, मैं आ रही हूं.”

इसी के साथ नीतू दौड़ती हुई सहेली के पास आ गई. वह बोली, “देख, लाखन के बारे में घर में किसी को नहीं बतइयो, वरना मेरी पढ़ाई छुड़वा देंगे!”

“मैं क्यों बताने लगी भला उस के बारे में! तू उस से संभल कर रहियो. वह आवारा है.”

दोनों चुपचाप घर की ओर चल दिए. रास्ते में उन के बीच कोई और बात नहीं हुई. नीतू ने घर आ कर रात में लाखन का दिया हुआ गिफ्ट खोला. उस में घड़ी थी. वह खुश हो गई, लेकिन सोच में पड़ गई कि किसी को क्या बोल कर उसे पहनेगी? उस बारे में पिता और दूसरे लोग पूछेंगे, तब वह उस बारे उन से क्या बोलेगी? इसी उधेड़बुन में उस की आंख लग गई.

अगले रोज सुबह उस की नींद देर से खुली. फटाफट स्कूल जाने की तैयारी करने लगी. इसी अफरातफरी में लाखन के गिफ्ट का पैकेट बिछावन के नीचे गिर गया था. वह स्कूल चली गई. शाम को सहेली संग घर लौटी, तब वह घड़ी उस के पिता भगवान सिंह हाथ में थी. उन्होंने उस घड़ी के बारे में उस से पूछ लिया. वे नाराज दिखे. उन की नाराजगी को सहेली ने ही दूर किया. वह बोली कि उस ने राखी पर मिले पैसों से यह खरीदी है.

इस पर भगवान सिंह सिर्फ इतना ही बोले कि वह मन लगा कर पढ़ाई करे. इधरउधर की बातों में न पड़े, वरना परीक्षा में फेल होने पर नाम कटवा देंगे. पिता की बात सुन कर नीतू का मन थोड़ा हलका हुआ. ‘जी पापा!’ बोल कर वह घर के भीतर चली गई.

एक तरफ लाखन से उस की नजदीकियां बढ़ रही थीं. जबकि इस की खबर गांव में फैल गई. दोनों की शिकायतें भगवान सिंह के पास आने लगीं. भगवान सिंह पहले ही उस के रंगढंग देख कर बहुत कुछ समझ चुके थे. उन्होंने समझदारी से काम लिया और तुरंत उस के योग्य लडक़ा देखा और 2017 में शादी कर दी.

बिना मरजी के हो गई शादी

नीतू की शादी राजगढ़ जिले में ही राजेंद्र नामक युवक से हुई थी. शादी हो जाने के बाद लाखन उस की जिंदगी से जा चुका था. शादी के कुछ साल बाद नीतू 2 बच्चों की मां बन गई. वह एक बेटा और बेटी पा कर बेहद खुश थी, लेकिन पति के साथ उस की अच्छी नहीं बनती थी. इस कारण वह अपने बच्चों के साथ अकसर मायके आ जाती थी और फिर कुछ दिन रह कर अपने ससुराल चली जाती थी.

यह सिलसिला चल रहा था. मायके वालों को भी बिना वजह यहां आना अच्छा नहीं लगता था. इस पर पड़ोसी भी तरहतरह की बातें करते थे. इस दौरान नीतू की पूर्व प्रेमी लाखन से भी मुलाकातें हो जाती थीं. लाखन अब एक सुलझा हुआ जिम्मेदार व्यक्ति बन गया था.

एक बार तो हद ही हो गई. नीतू ने बच्चों को ले कर मायके आते ही सब को अपना फैसला सुना दिया कि वह अब अपनी ससुराल कभी नहीं जाएगी. मायके में बच्चों का अपने दम पर पालनपोषण करेगी. पिता की खेतीबाड़ी में हाथ बंटाएगी.

उस ने बताया कि पति उसे प्रताडि़त करता है. उसे मारतापीटता रहता है. नीतू को मायके में पनाह मिल गई. लेकिन वे नीतू के पति के साथ बिगड़े संबंध सुधारने की कोशिश करने लगे. इसी बीच नीतू का लाखन से मिलनाजुलना ज्यादा बढ़ गया. उसे गांव में एकमात्र लाखन ही अपना हमदर्द लगा. उस से अपने दिल का हाल सुनातेसुनाते आगे की जिंदगी उस के जिम्मे सौंपने का फैसला ले लिया.

लाखन ने भी इस पर बहुत जल्द निर्णय ले लिया. दोनों की नजदीकियां बढऩे और साथ रहने की खबर एकदूसरे के कानों से होते हुए पूरे गांव में फैल गई. जिस ने भी सुना, वही दांतों तले अंगुली दबा कर रह गया और थूथू करने लगा. सभी ने इसे समाज परिवार के लिए गलत बताया.

गांव वाले इस के लिए नीतू के परिवार वालों को ही दोषी ठहरा रहे थे. उसी दौरान नीतू के पिता भगवान सिंह की मृत्यु हो चुकी थी, लेकिन घर में मर्द के रूप में भाई का निर्णय ही चलता था. चाचा का भरापूरा परिवार भी था. सभी को नीतू की हरकतें बुरी लगीं.

नीतू और लाखन ने भी अपनेअपने घर वालों से दूर खेत में ही अपनी दुनिया बसा ली. वे गांव से 3 किलोमीटर दूर खेत में छोटा सा टपरीनुमा घर बना कर रहने लगे. जबकि लाखन के पिता बहादुर सिंह और मां श्याम कुंवर परिवार के सदस्यों के साथ गांव में ही रह रहे थे. गांववालों ने लखन को नीतू से दूरी बना कर रहने के बारे में भी समझाया था. नीतू के भाई अंकुर ने तो उन्हें धमकी तक दे डाली थी कि लाखन ने नीतू से दूरी नहीं बनाई तो बापबेटे को मौत के घाट उतार देंगे.

नीतू की वजह से हुई घर वालों की बदनामी

जुलाई, 2022 में नीतू अचानक घर से लापता हो गई थी. परिवार के लोगों ने उस की खोजखबर लेने के लिए लाखन से भी संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन वह भी अपने घर से गायब मिला. इस बाबत माचलपुर थाने में शिकायत दर्ज करवाई गई.

कुछ समय बाद माचलपुर पुलिस दोनों को राजस्थान के झालावाड़ से खोज कर गांव ले आई. उस के बाद ही नीतू और लाखन के परिजनों समेत ग्रामीणों को मालूम हुआ कि उन्होंने 8 जुलाई, 2022 को शादी कर ली थी और नीतू लाखन के साथ रहने चली गई थी.

इसे ग्रामीणों और परिजनों ने बिरादरी में चली आ रही परंपरा के खिलाफ समझा. बिरादरी की यह बात अंकुर के दिल में चुभ गई कि उस की बहन ने उसे समाज में कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा था. रातदिन उस की यह हरकत दिमाग में घूमने लगी. वह इस बदनामी को भुला नहीं पा रहा था. चाचा और चचेरे भाई को भी यह सब चैन से जीने नहीं दे रहा था.