सुहाग की कातिल : देवर के प्यार में किया पति का क़त्ल – भाग 2

निरीक्षण के बाद एसपी विनोद कुमार ने मौके की काररवाई पूरी करा कर शव पोस्टमार्टम हेतु मैनपुरी के जिला अस्पताल भिजवा दिया. उस के बाद उन्होंने बृजेश पाल मर्डर केस का खुलासा करने के लिए सीओ चंद्रकेश सिंह की अगुवाई में एक पुलिस टीम का गठन कर दिया. इस टीम में एसएचओ अमित सिंह, एसआई दिनेश कुमार, देवदत्त, कांस्टेबल दीपू पाल, विपिन यादव तथा महिला कांस्टेबल डिंपल रानी को सम्मिलित किया गया.

इस गठित पुलिस टीम ने सब से पहले घटनास्थल का निरीक्षण किया फिर मृतक बृजेश पाल की पत्नी रेनू से पूछताछ की. उस ने बताया कि 26 जनवरी, 2023 को परिवार में शादी समारोह था. उसी में शामिल होने रात 8 बजे वह गए थे. उस के बाद वह घर वापस नहीं आए. आज सुबह 9 बजे ससुर बेचेलाल ने खेत में लाश पड़ी होने की खबर दी तब मैं उन के साथ खेत पर गई और लाश की पहचान पति के रूप में की. उन की गांव में न तो किसी से दुश्मनी थी और न ही किसी से लेनदेन का झंझट था. पता नहीं किस ने और क्यों पति की हत्या कर दी.

रेनू घूंघट के भीतर से जिस बेबाकी से जवाब दे रही थी, उस से पुलिस टीम को कुछ शक हुआ. उस की आंखों में न तो आंसू थे और न ही बेचैनी. इसी बीच महिला कांस्टेबल डिंपल रानी ने बहाने से उस का मोबाइल फोन ले लिया. हालांकि मोबाइल फोन देने में उस ने तमाम बहाने बनाए, लेकिन जब डिंपल ने उसे डपटा तो उस ने चोली से निकाल कर फोन थमा दिया.

रेनू पर जताया शक

रेनू से पूछताछ के बाद पुलिस टीम ने मृतक बृजेश पाल के भाई राजेश पाल से जानकारी हासिल की. राजेश ने बताया कि उस का भाई सीधासादा था, जबकि उस की पत्नी रेनू चंचल स्वभाव की थी. दोनों में पटती नहीं थी. अकसर इन में झगड़ा होता रहता था. इस की वजह चचेरे भाई मोहित पाल का उस के घर आनाजाना था. यानी देवरभाभी के बीच प्रेम प्रसंग था. उसी को ले कर दोनों में झगड़ा होता रहता था. उस ने मोहित और रेनू पर ही भाई की हत्या का शक जाहिर किया.

इधर पुलिस ने रेनू का मोबाइल फोन खंगाला तो 26 जनवरी की रात 8 बजे से 12 बजे के बीच रेनू ने कई बार एक नंबर पर काल की थी. पुलिस ने इस नंबर की जानकारी जुटाई तो पता चला वह नंबर रेनू के चचेरे देवर मोहित पाल का है. पुलिस को अब यकीन हो गया था कि बृजेश की हत्या में उस की पत्नी रेनू पाल व चचेरे भाई मोहित पाल का हाथ है.

शक के आधार पर पुलिस टीम ने मोहित व रेनू के घर दबिश दी तो वे दोनों अपनेअपने घर से फरार मिले. इस के बाद पुलिस टीम ने तेजी दिखाई और कई स्थानों पर दविश दी. सुबह 4 बजे पुलिस टीम को एक खबरिया के जरिए पता चला कि मोहित व रेनू इस समय फर्दपुर तिराहे पर मौजूद है. सटीक सूचना के आधार पर पुलिस टीम ने मोहित व रेनू को फर्दपुर तिराहे से गिरफ्तार कर लिया. दोनो को थाना बिछुआ लाया गया.

देवरभाभी हुए गिरफ्ता

थाने में पुलिस टीम ने मोहित और रेनू से अलगअलग पूछताछ की. मोहित शुरू में तो पुलिस को गुमराह करता रहा, लेकिन पुलिस टीम ने जब सख्त रुख अपनाया तो वह टूट गया और चचेरे भाई बृजेश की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया.

मोहित के टूटते ही रेनू भी टूट गई और उस ने भी प्रेमी संग पति की हत्या करने का जुर्म कबूल कर लिया. मोहित की निशानदेही पर पुलिस ने आलाकत्ल खून से सनी ईंट भी बरामद कर ली, जो उस ने नाले किनारे झाडिय़ों में छिपा दी थी.

पुलिस टीम ने बृजेश पाल की हत्याकांड का भेद खोलने और हत्यारोपियों को गिरफ्तार करने की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी तो एसपी विनोद कुमार ने पुलिस लाइन सभागार में प्रैसवात्र्ता कर बृजेश मर्डर केस का खुलासा कर दिया.

चूंकि हत्यारोपियों ने जुर्म कुबूल कर लिया था और आलाकत्ल भी बरामद करा दिया था, अत: एसएचओ अमित सिंह ने मृतक के भाई राजेश पाल की तरफ से भादंवि की धारा 302/201 के तहत मोहित व रेनू के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और दोनों को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस पूछताछ में एक ऐसी अविवेकी औरत की कहानी सामने आई, जिस ने प्रेमी को पाने के लिए अपने पति को मौत की नींद सुला दिया.

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जनपद के बिछुआ थानांतर्गत एक गांव है नगला पृथ्वी. हरेभरे बागबगीचों के बीच बसा यह गांव अंबेडकर योजना के तहत उन्नति के शिखर पर है. यहां बिजली, पानी, सडक़ जैसी सभी सुखसुविधाएं है. बेचेलाल पाल इसी गांव का रहने वाला था. उस के परिवार में पत्नी रन्नो के अलावा 2 बेटे राजेश व बृजेश थे. बेचेलाल किसान था. कृषि उपज से ही परिवार का गुजरबसर होता था.

बड़े बेटे राजेश का विवाह हो चुका था. राजेश से छोटा बृजेश था. उस का विवाह रेनू के साथ हुआ था. बृजेश साधारण रंगरूप का सीधासादा युवक था. जबकि उस की पत्नी रेनू आकर्षक रूपरंग वाली थी. वह तेजतर्रार और चंचल स्वभाव की थी. उस का चालचलन जेठानी तारा को तनिक भी नहीं सुहाता था.

रेनू को ससुराल आए अभी एक साल भी नहीं बीता था कि उस का अपनी जेठानी से झगड़ा होने लगा था. राजेश और बृजेश उस समय एक साथ ही रहते थे. लेकिन जब दोनों की पत्नियों के बीच जराजरा सी बात को ले कर लड़ाईझगड़ा होने लगा तो 2 साल बाद दोनों भाई अलग हो गए. जमीनमकान का बंटवारा हो गया. बेचेलाल अपने छोटे बेटे के बजाय बड़े बेटे राजेश के साथ रहने लगा. उस की पत्नी की मौत हो चुकी थी.

रेनू अलग मकान में स्वच्छंद हो कर रहने लगी. दिन, महीने और साल गुजरते रहे. रेनू अब तक 2 बच्चों की मां बन चुकी थी. इस के बावजूद उस के रूपयौवन में कोई कमी नहीं आई थी. खूब खातीपीती थी और स्वच्छंद विचरण करती थी. उस की देह गदरा आई थी. चोली के भीतर उरोज हमेशा कसमसाते रहते.

जबकि बृजेश को घरगृहस्थी और बच्चों से फुरसत ही नहीं मिलती थी. वह दिनरात खेतीकिसानी में लगा रहता. शाम को घर आता तो इतना थका रहता कि खाना खा कर चारपाई पर पड़ता तो तुरंत ही नींद के आगोश में समा जाता. रेनू बगल में पड़ी सारी रात छटपटाती रह जाती. उस की देह सुलगती रहती.

विचित्र संयोग : चक्रव्यूह का भयंकर परिणाम – भाग 6

प्रकाश राय ने फिंगरप्रिंट्स रिपोर्ट अलग रख कर पोस्टमार्टम रिपोर्ट गौर से देखना शुरू किया था. रिपोर्ट के अनुसार, रोहिणी की मृत्यु लगभग 12 से 14 घंटे पहले हुई थी. रोहिणी का पोस्टमार्टम शाम 4 बजे हुआ था यानी राहिणी की मृत्यु आधी रात के बाद 2 बजे से सुबह 4 बजे के बीच हुई थी. फिर धनंजय सवा 6 बजे से 7 बजे के बीच हत्या होने की बात कैसे कह रहा था? पूरा माजरा प्रकाश राय की समझ में धीरेधीरे आता जा रहा था.  धनंजय को अपने ही घर में चोरी करने की क्या जरूरत थी? इस सवाल का जवाब भी प्रकाश राय की समझ में आ गया था.

उन्होंने राजेंद्र सिंह को समझाते हुए कहा, “राजेंद्र सिंह, धनंजय बहुत ही चालाक है. तुम एक काम करो,पिछले 2 दिनों से धनंजय बाहर नहीं गया है. आज भी वह घर पर ही होगा. कुछ दिनों बाद वह चोरी का सामान किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर जरूर रखेगा. उस का सारा घर हम लोगों ने छान मारा है. हो सकता है, उस ने बिल्डिंग में ही कहीं सामान छिपा कर रखा हो या फिर…

“धनंजय जिस वक्त गोश्त लाने निकला था, उस समय उस ने सामान कहीं बाहर रख दिया होगा. पर उस ने कहां रखा होगा. राजेंद्र सिंह, कहीं ऐसा तो नहीं कि वह थैली ले कर नीचे उतरा हो और स्कूटर की डिक्की में रख दी हो?  हो सकता है राजेंद्र सिंह,” प्रकाश राय चुटकी बजाते हुए बोले, “वह थैली अभी उसी डिक्की में ही हो? राजेंद्र सिंह तुम फौरन अपने स्टाफ सहित निकल पड़ो और धनंजय पर नजर रखो.”

इस के बाद राजेंद्र सिंह ने अलकनंदा के आसपास अपने सिपाहियों को धनंजय पर निगरानी रखने के लिए तैनात कर दिया था. धनंजय अपने स्कूटर पर ही निकलेगा, यह राजेंद्र सिंह जानते थे. इसलिए राजेंद्र सिंह ने स्कूटर वाले और टैक्सी वाले अपने 2 मित्रों को सहायता के लिए तैयार किया. सारी तैयारियां कर के राजेंद्र सिंह अलकनंदा के पास ही एक इमारत में रह रहे अपने एक गढ़वाली मित्र के घर में जम गए.

5 तारीख का दिन बेकार चला गया. धनंजय और उस के परिवार को सांत्वना देने के लिए लोगों का आनाजाना लगातार बना हुआ था. शायद इसीलिए धनंजय बाहर नहीं निकल पाया था. लेकिन 6 तारीख को दोपहर के समय धनंजय के नीचे उतरते ही राजेंद्र सिंह सावधान हो गए. धनंजय अपनी स्कूटर स्टार्ट कर के जैसे ही बाहर निकला, वैसे ही अपने सिपाहियों के साथ टैक्सी में बैठ कर राजेंद्र सिंह उस के पीछे हो लिये.

गोल चक्कर होते हुए धनंजय निरुला होटल के पास स्थित बैंक के सामने आ कर रुक गया. राजेंद्र सिंह ने थोड़ी दूरी पर ही टैक्सी रुकवा दी. स्कूटर खड़ी कर के धनंजय ने डिक्की खोली और कपड़े की एक थैली निकाली. धनंजय के हाथ में थैली देख कर ही राजेंद्र सिंह ने मन ही मन प्रकाश राय के अनुमान की प्रशंसा की.

थैली ले कर धनंजय के बैंक में घुसते ही राजेंद्र सिंह ने अपने मित्र को बैंक में भेजा, क्योंकि यह जानना जरूरी था कि धनंजय का बैंक में खाता है या किसी परिचित से मिलने गया था. थैली किसी को देने गया था या लौकर में रखने? उन के मित्र ने लौट कर उन्हें बताया कि धनंजय मैनेजर के साथ लौकर वाले कमरे में गया है. इस से पहले सीधे मैनेजर की केबिन में जा कर उस ने एक फार्म भरा था.

धनंजय को खाली हाथ बाहर आते देख कर अपने 2 सिपाहियों को उस का पीछा करने के लिए कह कर राजेंद्र सिंह वहीं ओट में खड़े हो गए. धनंजय के वहां से जाते ही राजेंद्र सिंह सीधे बैंक मैनेजर की केबिन में पहुंचे. अपना परिचय दे कर उन्होंने कहा, “अभी 5 मिनट पहले जिस व्यक्ति ने आप के यहां लौकर लिया है, वह वांटेड है. हमारे आदमी उस का पीछा कर रहे हैं. आप हमें सिर्फ यह बताइए कि आप से उस की क्या बातचीत हुई. “

“धनंजय को एक महीने के लिए लौकर चाहिए था. यहां उपलब्ध लौकर्स में से उस ने 106 नंबर लौकर पसंद किया. नियमानुसार फार्म भर कर एडवांस जमा किया और लौकर में एक थैली रख कर चला गया.”

लौकर खोलने के लिए 2 चाबियां लगती थीं. पहले बैंक की चाबी, फिर जिस व्यक्ति ने लौकर लिया हो, उस की चाबी से लौकर खुल सकता था. बैंक अधिकारी तहखाने में बने सेफ डिपौजिट वाल्ट में आ कर एक चाबी से लौकर खोल कर चले जाते थे. बाद में ग्राहक बैंक से प्राप्त चाबी से लौकर को खोल कर जो भी सामान रखना चाहे, रख सकता था. इसलिए ग्राहक ने लौकर में क्या रखा या निकाला, बैंक को इस की जानकारी नहीं रहती है.

राजेंद्र सिंह ने बैंक से ही प्रकाश राय को फोन किया. इस के बाद राजेंद्र सिंह ने बैंक मैनेजर से कहा, “यह व्यक्ति शायद कल फिर आए, तब इसे लौकर खोलने की इजाजत मत दीजिएगा. मैं कुछ सिपाही कल सवेरे बैंक खुलने से पहले ही यहां भेज दूंगा. वह यहां आया तो इसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा. अगर यह खुद नहीं आया तो हम इसे ले कर आएंगे.”

धनंजय को बैंक ले जाने के लिए जब प्रकाश राय अलकनंदा पहुंचे थे तो वहां शो केस की वस्तुओं को देखने के बहाने उन्होंने चाबी के गुच्छों में लौकर नंबर 106 की चाबी देख ली थी. टेलीफोन के पास रखी धनंजय की टेलीफोन डायरी को उन्होंने केवल आनंदी का नंबर जानने के लिए यों ही उल्टापलटा था. ‘ए’ पर आनंदी का नंबर न पा कर उन्होंने ‘जी’ पर नजर दौड़ाने के लिए पन्ने पलटे, क्योंकि आनंदी का पूरा नाम आनंदी गौड़ था. मगर ‘एफ’ और ‘एच’ के बीच का ‘जी’ पेज गायब था. वह पेज फाड़े जाने के निशान मौजूद थे.

पकड़े जाने के थोड़ी देर बाद ही धनंजय ने अपने आप पर काबू पा लिया था. गहरी सांस ले कर उस ने कहा, “इंसपेक्टर साहब, मैं ने ही अपनी बीवी की हत्या की है. उस के चरित्र पर मुझे लगातार शक रहता था. आगे चल कर मेरा शक विश्वास में बदल गया. लेकिन कुछ बातें अपनी आंखों से देखने पर मैं बेचैन हो उठा. मेरे मन की शांति समाप्त हो गई. मैं परेशान रहने लगा. मैं अपनी पत्नी को बेहद चाहता था, पर मुझे धोखा दे कर उस ने सब कुछ नष्ट कर दिया था. उस की चरित्रहीनता का कोई सबूत मैं नहीं दे सकता था. मेरे पास एक ही रास्ता था, उसे हमेशा के लिए मिटा देने का. वही मैं ने किया भी.”

प्रकाश राय धनंजय को कोतवाली ले आए. धनंजय ने बड़े योजनाबद्ध तरीके से रोहिणी का खून किया था. रोहिणी को यह दिखाने के लिए कि वह उस से बेहद प्रेम करता है, उस ने बाहर जाने का प्लान बनाया और 40 हजार रुपए भी निकलवाए थे, लेकिन वह कहीं जाने वाला नहीं था. रविवार पहली तारीख को उस ने जानबूझ कर आशीष तनेजा और देवेश तिवारी को अपने घर बुलाया.

रात 3 से 4 बजे के बीच रोहिणी की हत्या करने के बाद सवेरे उठ कर वह बड़े ही सहज ढंग से मटनमछली लाने गया था, सिर्फ इसलिए कि कोई उस पर शक न करे. इतना ही नहीं, पुलिस को चकमा देने के लिए उस ने खुद चोरी भी की थी. चोरी का सारा सामान उस ने मटन लेने जाते समय स्कूटर की डिक्की में रख दिया था.

इस के बाद वह कुछ बताने को तैयार नहीं था. जब प्रकाश राय ने टेलीफोन डायरी का ‘जी’ पेज कैसे फटा, इस बारे में पूछा तो जवाब में उस ने सिर्फ 2 शब्द कहे, “मालूम नहीं.”

पिता को रास ना आया बेटी का प्यार – भाग 1

कालेज पहुंचने के लिए अभी पर्याप्त समय था, इसलिए कंधे पर बैग लटकाए प्राची मस्ती से चली जा रही थी.  घर से निकल कर अभी वह थोड़ी दूर गई थी कि उस ने महसूस किया कि उसे 2 आंखें लगातार घूर रही हैं. लड़कियों के लिए यह कोई खास बात नहीं है, इसलिए ध्यान दिए बगैर वह अपनी राह चली गई. एक दिन की बात होती तो शायद वह इस बात को भूल जाती, लेकिन जब वे 2 आंखें उसे रोज घूरने लगीं तो उसे उन में उत्सुकता हुई.

एक दिन जब प्राची ने उन आंखों में झांका तो आंखें मिलते ही उस के शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई. उस ने झट अपनी आंखें फेर लीं. लेकिन उस ने उन आंखों में ऐसा न जाने कौन सा सम्मोहन देखा कि उस से रहा नहीं गया और उस ने एक बार फिर पलट कर उन आंखों में अपनी आंखें डाल दीं. वे आंखें अपलक उसे ही ताक रही थीं. इसलिए दोबारा आंखें मिलीं तो उस के दिल की धड़कन बढ़ गई.

उन आंखों में प्राची के लिए चाहत का समंदर लहरा रहा था. यह देख कर उस का दिल बेचैन हो उठा. न चाहते हुए भी उस की आंखों ने एक बार फिर उन आंखों में झांकना चाहा. इस बार आंखें मिलीं तो अपने आप ही उस के होंठ मुसकरा उठे. शरम से उस के गाल लाल हो गए और मन बेचैन हो उठा. वह तेजी से कालेज की ओर बढ़ गई.

कहते हैं, लड़कियों को लड़कों की आंखों की भाषा पढ़ने में जरा भी देर नहीं लगती. प्राची ने भी उस लड़के की आंखों की भाषा पढ़ ली थी. वह कालेज तो चली गई, लेकिन उस दिन पढ़ाई में उस का मन नहीं लगा. बारबार वही आंखें उस के सामने आ जातीं. नोटबुक और किताबों में भी उसे वही आंखें दिखाई देतीं. उस का मन बेचैन हो उठता. सिर झटक कर वह पढ़ाई में मन लगाना चाहती, लेकिन मन अपने वश में होता तब तो पढ़ाई में लगता. वह खोईखोई रही.

कालेज की छुट्टी हुई तो प्राची घर के लिए चल पड़ी. रोज की अपेक्षा उस दिन वह कुछ ज्यादा ही तेज चल रही थी. वह जल्दी ही उस जगह पर पहुंच गई, जहां उसे वे आंखें घूर रही थीं. लेकिन उस समय वहां कोई नहीं था. वह उदास हो गई. बेचैनी में वह घर की ओर चल पड़ी. प्राची को घूरने वाली उन आंखों के चेहरे की तलाश थी. घूरने वाली वे आंखें किसी और की नहीं, उस के घर से थोड़ी दूर रहने वाले आयुष्मान त्रिपाठी उर्फ मोनू की थीं.

प्राची इधर काफी दिनों से उसे अपने मोहल्ले में देख रही थी. वह उसे अच्छी तरह जानती भी थी, लेकिन कभी उस से उस की बात नहीं हुई थी. इधर उस ने महसूस किया था कि आयुष्मान अकसर उस से टकरा जाता था. लेकिन उस से आंखें मिलाने की हिम्मत नहीं कर पाता था. प्राची ने कालेज जाते समय उस की आंखों में झांका था तो उस ने आंखें झुका ली थीं. फिर जैसे ही उस ने मुंह फेरा था, वह फिर उसे ताकने लगा था.

प्राची ने उस दिन आयुष्मान में बहुत बड़ा और हैरान करने वाला बदलाव देखा था. सिर झुकाए रहने वाला आयुष्मान उसे प्यार से अपलक ताक रहा था. कई बार उन आंखों से प्राची की आंखें मिलीं तो उस के दिल में तूफान सा उमड़ पड़ा था.  उस के होंठों पर बरबस मुसकान उभर आई थी. दिल की धड़कन एकाएक बढ़ गई थी. विचलित मन से वह घर पहुंची थी. इस के बाद उस के ख्यालों में आयुष्मान ही आयुष्मान छा गया था.

घर पहुंच कर प्राची ने बैग रखा और बिना कपड़े बदले ही सीधे छत पर जा पहुंची. उस ने आयुष्मान के घर की ओर देखा. लेकिन आयुष्मान उसे दिखाई नहीं दिया. वह उदास हो गई. उस का मन एक बार फिर उन आंखों में झांकने को बेचैन था. लेकिन उस समय वे आंखें दिखाई नहीं दे रही थीं. वह उन्हीं के बारे में सोच रही थी कि नीचे से मां की आवाज आई, ‘‘प्राची, आज तुझे क्या हो गया कि आते ही छत पर चली गई? कपड़े भी नहीं बदले और खाना भी नहीं खाया. चल जल्दी नीचे आ जा. मुझे अभी बहुत काम करने हैं.’’

मां की बातें सुन कर ऊपर से ही प्राची बोली, ‘‘आई मां, थोड़ा टहलने का मन था, इसलिए छत पर आ गई थी.’’

प्राची ने एक बार फिर आयुष्मान की छत की ओर देखा. वह दिखाई नहीं दिया तो उदास हो कर प्राची नीचे आ गई. रात को खाना खाने की इच्छा नहीं थी, पर मां से क्या बहाना बनाती, इसलिए 2-4 कौर किसी तरह पानी से उतार कर प्राची बेड पर लेट गई. लेकिन आंखों में नींद नहीं थी. आंखें बंद करती तो उसे आयुष्मान की घूरती आंखें दिखाई देने लगतीं. करवट बदलते हुए जब किसी तरह नींद आई तो उस ने सपने में भी उन 2 आंखों को प्यार से निहारते देखा.

दूसरी ओर आयुष्मान भी कम बेचैन नहीं था. सुबह तो समय निकाल कर उस ने प्राची को देख लिया था, लेकिन शाम को देर हो जाने की वजह वह प्राची को नहीं देख पाया था, इसलिए अगले दिन की सुबह के इंतजार में समय कट ही नहीं रहा था. वैसे भी इंतजार की घडि़यां काफी लंबी होती हैं.

अगले दिन सुबह जल्दी उठ कर प्राची कालेज जाने की तैयारी करने लगी थी. लेकिन उस दिन ऐसा लग रहा था, जैसे समय बीत ही नहीं रहा है. आखिर इंतजार करतेकरते कालेज जाने का समय हुआ तो प्राची उस दिन कुछ ज्यादा ही सजधज कर घर से निकली. वह उस जगह जल्दी से जल्दी पहुंच जाना चाहती थी, जहां बैठ कर आयुष्मान उस के आने का इंतजार करता था.

पंख होते तो शायद वह उड़ कर पहुंच जाती, लेकिन उसे तो वहां पैरों से चल कर पहुंचना था. वह दौड़ कर भी नहीं जा सकत थी. कोई देख लेता तो क्या कहता. जैसेजैसे वह जगह नजदीक आती जा रही थी, उस के दिल की धड़कन बढ़ने के साथ मन बेचैन होता जा रहा था.

वह उस जगह पर पहुंची तो देखा कि आयुष्मान अपलक उसे ताक रहा था. उस ने उस की आंखों में अपनी आंखें डाल दीं. आंखें मिलीं तो होंठ अपने आप ही मुसकरा उठे. उस का आंखें हटाने का मन नहीं हो रहा था, लेकिन राह चलते यह सब ठीक नहीं था. ऐसी बातें लोग ताड़ते भी बहुत जल्दी हैं. वह उसे पलटपलट कर भी नहीं देख सकती थी. फिर भी शरमसंकोच के बीच उस से जितनी बार हो सका, उस ने उसे तब तक देखा, जब तक वह उसे दिखाई देता रहा.

साफ था, दोनों ही आंखों के रास्ते एकदूसरे के दिल में उतर चुके थे. उस रात दोनों को ही नींद नहीं आई. बेड पर लेटेलेटे बेचैनी बढ़ने लगी तो प्राची बेड से उठ कर छत पर आ गई. खुले वातावरण में गहरी सांस ले कर उस ने इधरउधर देखा. आसमान में तारे चमक रहे थे. उस ने उन तारों की ओर देखा तो उसे लगा कि हर तारे से आयुष्मान मुसकराता हुआ उसे ताक रहा है.

                                                                                                                                              क्रमशः

बेरुखी : बनी उम्र भर की सजा – भाग 5

अभी सड़क पर मैं ने कदम रखा ही था कि दाईं तरफ से एक तेज रोशनी मेरे करीब आ कर रुक गईं. फिर मैं ने आंसुओं से धुंधलाई हुई आंखों से एक शख्स को गाड़ी से उतर कर अपनी तरफ बढ़ते देखा. वह कोई मर्द था.

‘‘अंधी हैं आप? अभी मेरी गाड़ी के नीचे आ जातीं.’’ उस शख्स ने मेरे सामने आ कर गुस्से से कहा.

‘‘प्लीज, मुझे बचा लीजिए. मैं कुछ दरिंदों के चंगुल से निकल कर भागी हूं.’’ मैं ने रोते हुए कहा. वह गौर से मेरा जायजा ले रहा था.

‘‘रात को तनहा भटकने वाली लड़कियों के पीछे दरिंदे लग ही जाते हैं.’’ उस ने रुखाई से कहा. मैं फूटफूट कर रोने लगी.

वह शख्स बौखला गया, ‘‘मोहतरमा! खुदा के लिए चुप हो जाएं. अगर इस वक्त कोई यहां आ गया तो आप को यों रोती हुई और आप का हुलिया देख कर न जाने मेरे बारे में किस गलतफहमी में पड़ जाए.’’

तब मैं ने एक नजर खुद पर डाली. मेरे कपड़े कई जगह से फट गए थे. रेतमिट्टी से अटी हुई हालत बेहद खराब थी. मैं ने जल्दी से दुपट्टे को ठीक किया.

‘‘आप को कहां जाना है?’’ उस ने पूछा.

मैं ने बिना उस की ओर देखे उसे अपने इलाके का नाम बताया.

‘‘बैठिए.’’ उस ने एक गहरी सांस ले कर कहा.

‘‘मगर…’’ मैं ने कहना चाहा.

‘‘अगरमगर कुछ नहीं. आप को मुझ पर भरोसा करना होगा, वरना मैं चलता हूं. आप किसी भरोसे वाले का इंतजार करें.’’ वह कुछ गुस्से से बोला, ‘‘मुमकिन है कि पीछे से वही बदमाश आ जाएं, जिन से बच कर आप भागी हैं.’’

वह सही कह रहा था. मैं डर कर जल्दी से गाड़ी में बैठ गई. उस ने गाड़ी आगे बढ़ा दी. वह मेरे जानेपहचाने रास्ते पर सफर करती हुई मेरे इलाके में दाखिल हुई. मैं इशारे से उसे रास्ता बताती गई. मैं ने अपनी गली से कुछ पहले उतरना मुनासिब समझा. मेरे उतरते ही उस ने गाड़ी आगे बढ़ा दी. तब मुझे खयाल आया कि अपने मोहसिन का नाम तक नहीं पूछा, यहां तक कि उस का चेहरा तक ठीक से न देख सकी थी.

खुदा ने मेरी इज्जत महफूज रखी थी, मगर मैं घर वालों की पूछताछ से किसी तरह नहीं बच सकती थी. उस समय रात के साढ़े 8 बज रहे थे और मैं कभी इतनी देर तक घर से गायब नहीं रही थी. बहरहाल, हिम्मत कर के घर की तरफ चल पड़ी. खुशकिस्मती से हमारी गली के सभी खंभों के बल्ब शरारती लड़कों ने तोड़ दिए थे. उस लमहे मुझे अंधेरा बहुत गनीमत लगा कि उस ने मेरे शिकस्ता वजूद को दूसरों की नजरों से आने से बचा लिया था.

अम्मी जैसे दरवाजे से लगी मेरे इंतजार में थीं. हल्की सी दस्तक के जवाब में फौरन दरवाजा खोल दिया. उन के चेहरे पर परेशानी जैसे जम कर रह गई थी. मुझे देखते ही उन की आंखों में खून उतर आया. इत्तेफाक से बाकी सब घर वाले टीवी लाउंज में बैठे प्रोग्राम देख रहे थे. मैं फौरी तौर पर अब्बू और भाइयों की नजरों में गिरने से बच गई थी. अम्मी एक शब्द बोले बगैर मुझे अंदर कमरे में ले गईं और दरवाजा बंद कर के दांत पीसती हुई धीरे से बोलीं, ‘‘कहां से आ रही है कमीनी?’’

जवाब में मैं ने हिचकियों के बीच पूरी कहानी सुनाई.

‘‘चुप कर जा जलील!’’ उन्होंने मुझे थप्पड़ मारते हुए कहा, ‘‘मैं ने तेरे बापभाइयों से यह बात छिपाई है. और तू टेसुवे बहा कर उन्हें बताने जा रही है. जा, दफा हो जा. अपना हुलिया ठीक कर.’’

मैं ने गुसलखाने में जा कर नहाया और साफसुथरा जोड़ा पहन लिया. रात सब के सोने के बाद अम्मी मरहम ले कर मुझे लगाने लगीं. तब मैं उन से लिपट कर रोने लगी. मैं ने माफी मांगी तो वह दबी आवाज में बोलीं, ‘‘बेटी, मां तो औलाद की बड़ी से बड़ी गलती माफ कर देती है. मगर तूने मेरा ऐतबार खो दिया है.’’

उन की बात तल्ख सही, लेकिन सच थी. मैं ने जान निसार करने वाले मांबाप की मोहब्बत को नजरअंदाज कर के और एक बेहद गंदे शख्स पर ऐतबार कर के उन्हें धोखा दिया था. मुझे पता था कि अम्मी अब मुझ पर ऐतबार नहीं करेंगी. इसलिए कालेज जाने का खयाल तो मैं दिल से निकाल ही चुकी थी. इस के अलावा भी मैं ने घर से निकलना बंद कर दिया था.

राहेल के साथ संबंध उस दिन से खत्म हो गया था. मैं ने खुदा का शुक्र अदा किया कि राहेल के पास मेरा कोई खत या तसवीर नहीं थी, वरना उस जैसे कमीने का कोई भरोसा नहीं था कि वह मुझे ब्लैकमेल न करता. अब सारा दिन बोरियत से बचने के लिए मैं घर के कामों में खुद को व्यस्त रखने लगी. इस के अलावा कोर्स की किताबें मंगवा कर सेकेंड ईयर के इम्तिहान की तैयारी शुरू कर दी.

अम्मी मेरे इस बदलाव से बहुत खुश थीं. वह मुझे सारे घरेलू मामलों में माहिर करना चाहती थीं. हमेशा मुझे कुछ न कुछ सिखाने की केशिश करती रहतीं. मैं भी मेहनत कर रही थी.  मैं ने इंटर का इम्तिहान आसानी से पास कर लिया. अम्मी मुझे इम्तिहान दिलाने ले जाया करती थीं.

एक साल गुजरने के बावजूद अम्मी की बेऐतबारी पहले दिन की ही तरह कायम रही. उन की आंखों में लहराते शक के नाग जैसे हर लमहे मुझे डसते रहते थे. अब वह बड़ी सरगर्मी से मेरे लिए आए हुए रिश्तों की छानबीन में लगी थीं. मुझे मर्द के नाम से वहशत होती थी, मगर मैं अम्मी के आगे मजबूर थी. उन्हीं रिश्तों में सुलतान अहमद का रिश्ता भी था. वह हुकूमत में एक अच्छे ओहदे पर लगे हुए थे. खानदानी थे और हमारी बिरादरी से ताल्लुक रखते थे. मतलब यह कि वह हर दृष्टि से मेरे लिए मुनासिब थे.

अम्मी ने अब्बू और बहनों की रजामंदी पा कर सुलतान अहमद के घर वालों को हां कर दी. मेरी ससुराल वालों को शादी की जल्दी थी. अम्मी को भी कोई ऐतराज नहीं था. उन्होंने अच्छीखासी तैयारी पहले ही कर रखी थी. तारीख तय होते ही घर में चहलपहल शुरू हो गई.

एक दिन बड़ी आपा ने मुझे एक लिफाफा देते हुए कहा, ‘‘दूल्हे मियां की तसवीर देख ले. बाद में हम से कुछ न कहना.’’

मैं ने लिफाफा ले कर बेजारी से एक तरफ डाल दिया कि देख लूंगी. अब जब शादी में चंद रोज बाकी रह गए तो मुझे दूल्हे की तसवीर दिखाने का खयाल आ रहा था. अपनी इस बेकद्री पर मैं खून के आंसू बहा कर रह गई. कहां वह कि मेरी छोटी सी छोटी चीज भी मेरी मरजी के बगैर नहीं पसंद की जाती थी, कहां यह सितम कि जिंदगी भर का साथी बगैर मुझ से पूछे, मेरी मरजी जाने चुन लिया गया था. अपनी इस हद तक बेकद्री की सारी जिम्मेदारी भी मुझ पर आयद होती थी.

                                                                                                                                               क्रमशः

सुहाग की कातिल : देवर के प्यार में किया पति का क़त्ल – भाग 1

दोपहर का वक्त था. रेनू नहा कर बाथरूम से निकली तभी ‘भाभी…भाभी’ कहता हुआ मोहित उस के घर आ पहुंचा. उस समय रेनू के शरीर पर मात्र पेटीकोट और ब्लाउज था. उस की जुल्फों से पानी की बूंदें टपक रही थीं. मोहित की निगाहें रेनू के मखमली बदन पर जैसे पानी की बूंदों की तरह चिपक कर रह गई थीं.

मोहित की इस हरकत को रेनू समझ रही थी. वह न तो शरमाई और न ही वहां से भाग कर दूसरे कमरे में गई. बल्कि वह नजाकत से चलते हुए उस के और करीब आ गई. मोहित रिश्ते में उस का चचेरा देवर लगता था. उन के बीच अकसर मजाक भी होता रहता था. रेनू उस के एकदम करीब आ कर बोली, “मोहित, खड़े क्यों हो, बैठ जाओ न.”

रेनू के कहने के बावजूद मोहित चारपाई पर नहीं बैठा, बल्कि खड़ेखड़े उसे अपलक निहारता रहा. उस के मन में कोई तूफान मचल रहा था. रेनू मादक मुसकान बिखेरती हुई मुड़ी और अंदर वाले कमरे में चली गई. मोहित तब भी अपनी जगह जमा रहा.

रेनू कुछ देर बाद बाहर आई तो मोहित की आंखें फिर उस के चेहरे पर टिक गईं. आखिर रेनू से रहा नहीं गया तो उस ने पूछ ही लिया, “मोहित, तुम मुझे आज इस तरह से क्यों देख रहे हो?”

“बता दूं?” मोहित ने रेनू की आंखों में झांकते हुए कहा, “भाभी, तुम मुझे बहुत खूबसूरत लगती हो. तुम्हारी अदाएं मेरे अंदर बेचैनी पैदा कर रही हैं.”

शुरू हो गया देवरभाभी का प्यार

मोहित की बात सुन कर रेनू के मन में भी हलचल मच गई. वह आगे बढ़ी और मोहित का हाथ थाम कर बोली, “सच कहूं मोहित, तुम भी मुझे बहुत अच्छे लगते हो. मैं तो तुम्हारे लिए ही सजतीसंवरती हूं. तुम्हारे भैया को तो मेरी कद्र ही नहीं.”

रेनू के इतना कहने पर मोहित मन ही मन खुश हुआ. लेकिन वह वहां रुका नहीं और खेतों की ओर चला गया. रेनू दरवाजे पर खड़ी उसे एकटक देखती रही. मोहित खेतों पर चला तो गया था, लेकिन उस का मन काम में नहीं लग रहा था. वह थोड़ी देर बाद ही लौट आया. उसे देखते ही रेनू से रहा नहीं गया. उस ने आखिर पूछ ही लिया, “क्या बात है, काम में मन नहीं लगा क्या?”

“नहीं भाभी, शरीर तप रहा है.” मोहित ने कहा.

रेनू ने देखा, मोहित का शरीर वाकई पूरी तरह से तप रहा था. उस के हाथ का स्पर्श पाते ही मोहित रेनू से लिपट गया. तब तो रेनू से भी रहा न गया. उस का पूरा शरीर नीचे से ले कर ऊपर तक सनसना उठा. जैसे किसी ने रागिनी छेड़ दी हो और वीणा के सारे तार एक साथ झनझना उठे हों.

रेनू होश खोती जा रही थी. मोहित ने उसे मदहोश होते हुए देखा तो धीरे से उसे अपनी बांहों का सहारा दे कर अपने ऊपर गिरा लिया. अब दोनों का चेहरा आमनेसामने था. सांसें गर्म हो उठीं. मोहित की आंखों में वासना के लाल डोरे तैरने लगे. लग रहा था, जैसे बोतल भर का नशा हो आया हो. रेनू के अधर भी तप रहे थे. मोहित ने अचानक उन तपते होंठों को अपने दांतों के नीचे भींच लिया.

रेनू की सिसकारी फूट पड़ी. मोहित ने इस के बाद उसे और जोर से अपनी बांहों में समेट लिया. उस के हाथ रेनू के नाजुक अंगों पर रेंगने लगे. रेनू का हलक सूखने लगा. उस ने अपना चेहरा उस की चौड़ी छाती में छिपा लिया. तब तो मोहित से रहा नहीं गया. क्षण भर में ही सारे नातेरिश्ते ढह गए. मानमर्यादा टूट गई और दोनों एकदूसरे में समा गए. देवरभाभी के अवैध संबंध इसी तरह चलते रहे.

बृजेश पाल की मिली लाश

28 जनवरी, 2023 की सुबह उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के बिछुआ थाने के गांव नगला पृथ्वी का रहने वाला अनुज पाल अपने सरसों के खेत पर पहुंचा तो वहां खेत में उस ने एक लाश देखी. वह उलटे पैर गांव की ओर भागा और खेत में पड़ी लाश की सूचना गांव वालों को दी. फिर तो जंगल की आग की तरह यह खबर पूरे गांव में फैल गई. लोग खेत की ओर दौड़ पड़े.

सरसों के खेत में लाश पड़ी होने की खबर जब राजेश पाल के कानों में पड़ी तो उस का माथा ठनका. क्योंकि 2 दिन से उस का छोटा भाई बृजेश पाल गुम था. उस का कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था. वह बिछुआ थाने में उस की गुमशुदगी भी दर्ज करा चुका था . राजेश अपने मन में तमाम आशंकाओं का बवंडर लिए नंगे पांव ही खेत की ओर भागा. ख्ेात पर पहुंच कर जब उस ने लाश देखी तो वह फफक पड़ा. वह लाश उस के भाई बृजेश पाल की ही थी.

इसी बीच किसी ने लाश मिलने की सूचना थाना बिछुआ पुलिस को दे दी. सूचना पाते ही एसएचओ अमित सिंह पुलिस बल के साथ नगला पृथ्वी गांव की ओर रवाना हो लिए. रवाना होने से पहले उन्होंने पुलिस अधिकारियों को भी सूचना दे दी थी. थाना बिछुआ से नगला पृथ्वी गांव 5 किलोमीटर दूर था. पुलिस को वहां पहुंचने में लगभग आधा घंटे का समय लगा.

उस समय गांव के बाहर सरसों के खेत के पास ग्रामीणों की भीड़ जुटी थी. भीड़ को हटाते अमित सिंह उस स्थान पर पहुंचे, जहां लाश पड़ी थी. लाश युवक की थी. जिस की उम्र यही कोई 30-32 साल थी. उस के सिर पर गहरी चोट थी. इसलिए लग रहा था कि उस की हत्या किसी ठोस वस्तु से सिर पर प्रहार कर की गई थी. मृतक जींसकमीज व गुलाबी कलर का स्वेटर पहने था. लाश के पास मोबाइल फोन भी पड़ा था. पुलिस ने मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले लिया. मौके पर मौजूद राजेश नामक युवक ने पुलिस को बताया कि लाश उस के भाई बृजेश की है.

एसएचओ अमित सिंह अभी घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी विनोद कुमार, एएसपी राजेश कुमार तथा सीओ चंद्रकेश सिंह मौकाएवारदात आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया तथा मृतक के भाई राजेश तथा मौके पर मौजूद कुछ अन्य लोगों से पूछताछ की.

इसी समय एक महिला एक बूढ़े व्यक्ति के साथ लंबा घूंघट निकाल कर आई और लाश देख कर फूटफूट कर रोने लगी. पुलिस अधिकारियों ने उसे धैर्य बंधा कर पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस का नाम रेनू पाल है और लाश उस के पति बृजेश पाल की है. साथ आया बूढ़ा व्यक्ति उस का ससुर बेचेलाल है. बेचेलाल की आंखों से भी आंसू टपक रहे थे. वह लाश को टुकुरटुकुर देख रहा था.

विचित्र संयोग : चक्रव्यूह का भयंकर परिणाम – भाग 5

इतनी पूछताछ के बाद बेचैन हुए आनंद ने प्रकाश राय से पूछा, “आप रोहिणी के बारे में इतनी पूछताछ क्यों कर रहे है?”

गंभीर स्वर में प्रकाश राय ने कहा, “लोग हम से सत्य को छिपाते हैं, लेकिन हमारा काम ही है लोगों को सच बताना. परसों सवेरे 6 से 7 बजे के बीच किसी ने छुरा घोंप कर रोहिणी की हत्या कर दी है.”

“नहीं..,” आनंदी चीख पड़ी. लगभग 10 मिनट तक आनंदी हिचकियां लेले कर रोती रही. उस के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. आनंदी के शांत होने पर प्रकाश राय ने पूरी घटना सुनाई और अफसोस जाहिर करते हुए कहा, “अभी तक हमें कोई भी सूत्र नहीं मिला है. हमारी जांच जारी है, इसलिए रोहिणी के सभी परिचितों से मिल कर हम पूछताछ कर रहे हैं. कल उस का अंतिम संस्कार भी हो गया है.”

“लेकिन सर, किसी ने भी हमें इस घटना की सूचना क्यों नहीं दी?” आनंद ने पूछा.

“मैं भी यही सोच रहा हूं मिस्टर आनंद, तुम्हारी पत्नी और रोहिणी में बहुत अच्छी मित्रता थी. फिर भी धनंजय ने तुम्हें खबर क्यों नहीं दी, जबकि उस ने कर्नल सक्सेना को तमाम लोगों के फोन नंबर दे कर इस घटना की खबर देने को कहा था. है न आश्चर्य की बात?”

“मैं क्या कह सकता हूं?”

“मैं भी कुछ नहीं कह सकता मिस्टर आनंद. कारण मैं धनंजय से पूछ नहीं सकता. पूछने से लाभ भी नहीं, क्योंकि धनंजय कह देगा, मैं तो गम का मारा था, मुझे यह होश ही कहां था? अच्छा आनंदी, मैं तुम से एक सवाल का उत्तर चाहता हूं. रोहिणी ने कभी अपने पति के बारे में कोई ऐसीवैसी बात या शिकायत की थी तुम से?”

“नहीं, कभी नहीं. वह तो अपने वैवाहिक जीवन में बहुत खुश थी.”

प्रकाश राय का प्रश्न और आनंदी का उत्तर सुन कर आनंद ने जरा घबराते हुए पूछा, “आप धनंजय पर ही तो शक नहीं कर रहे हैं?”

“नहीं, उस पर मैं शक कैसे कर सकता हूं, अच्छा, अब हम चलते हैं. जरूरत पडऩे पर मैं फिर मिलूंगा.”

प्रकाश राय सोच रहे थे कि पूरे सफर के दौरान आनंद और धनंजय ने एकदूसरे से ज्यादा बात क्यों नहीं की? यहां भी वे एकदूसरे से क्यों नहीं मिलते थे?

मंगलवार, 5 मई. रोहिणी कांड की गुत्थी ज्यों की त्यों बरकरार थी. प्रकाश राय को कई लोगों पर शक था, पर प्रमाण नही थे. सिर्फ शक के आधार पर किसी को पकड़ कर बंद करना प्रकाश राय का तरीका नहीं था. दोपहर बाद प्रकाश राय के औफिस पहुंचने से पहले ही उन की मेज पर फिंगरप्रिंट्स ब्यूरो की रिपोर्ट रखी थी. रिपोर्ट देखतेदेखते उन के मुंह से निकला, “अरे यह…तो.” घंटी बजा कर इन्होंने राजेंद्र सिंह को बुलाया.

“राजेंद्र सिंह, रोहिणी मर्डर केस का अपराधी नजर आ गया है.” कह कर प्रकाश राय ने उन्हें एक नहीं, अनेक हिदायतें दीं.

राजेंद्र सिंह और उन के स्टाफ को महत्पूर्ण जिम्मेदारी सौंप कर योजनाबद्ध तरीके से समझा कर बोले, “जांच को अब नया मोड़ मिल गया है. भाग्य ने साथ दिया तो 2-3 दिनों में ही अपराधी पूरे सबूत सहित अपने शिकंजे में होगा. समझ लो, इस केस की गुत्थी सुलझ गई है. बाकी काम तुम देखो. मैं अब जरा अपने दूसरे केस देखता हूं.”

उत्साहित हो कर राजेंद्र सिंह निकल पड़े उन के आदेशों का पालन करने. 7 मई की सुबह 9 बजे दयाशंकर अपने स्टाफ के साथ औफिस पहुंचे. पिछली रात प्रकाश राय के निर्देश के अनुसार राजेंद्र सिंह पूरी तरह मुस्तैद थे. थोड़ी देर बाद प्रकाश राय के गाड़ी में बैठते ही गाड़ी सेक्टर-15 की ओर चल पड़ी.

करीब साढ़े 9 बजे प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह अलकनंदा स्थित धनंजय के घर पहुंचे. प्रकाश राय को देख कर धनंजय जरा अचरज में पड़ गया. उस के पिता भी हौल में ही बैठे थे. उस की मां और बहन अंदर कुछ काम में व्यस्त थीं. ज्यादा समय गंवाए बगैर प्रकाश राय ने धनंजय से कहा, “विश्वास, तुम जरा मेरे साथ बाहर चलो. रोहिणी के केस में हमें कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिली हैं. हम तुम्हें दूर से ही एक व्यक्ति को दिखाएंगे. तुम ने अगर उसे पहचान लिया तो समझो इस हत्या में उस का जरूर हाथ है. उस के पास से तुम्हारी संपत्ति भी मिल जाएगी. अब उसे पहचानने के लिए हमे तुम्हारी मदद की जरूरत है.”

“ठीक है, आप बैठिए. मैं 10 मिनट में तैयार हो कर आता हूं.” कह कर धनंजय अंदर चला गया और प्रकाश राय उस के पिता के साथ गप्पें मारने लगे. गप्पें मारतेमारते उन्होंने बड़े ही सहज ढंग से पास रखी टेलिफोन डायरी उठाई, उस के कुछ पन्ने पलटे और यथास्थान रख दिया. फिर वह टहलते हुए शो केस के पास गए. उस में रखा चाबी का गुच्छा उन्हें दिखाई दिया. शो केस में रखी कुछ चीजों को देख कर वह फिर सोफे पर आ बैठे.

15-20 मिनट में धनंजय तैयार हो गया. प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह के साथ निकलने से पहले उस ने शो केस में से सिगरेट का पैकेट, लाइटर, पर्स, चाबी और रूमाल लिया. अब प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह धनंजय को साथ ले कर निरुला होटल की ओर चल पड़े. लगभग 10 मिनट बाद उन की गाड़ी होटल के निकट स्थित बैंक के सामने जा कर रुकी.

गाड़ी रुकते ही प्रकाश राय ने धनंजय से कहा, “विश्वास, हम ने तुम्हारी सोसायटी के वाचमैन नारायण को गिरफ्तार कर लिया है. इस समय वह हमारे कब्जे में है. इस बैंक के सेफ डिपौजिट लौकर डिपार्टमेंट में 2 चौकीदार काम करते हैं. इन में से हमें एक पर शक है. मुझे विश्वास है कि उस ने नारायण के साथ मिल कर चोरी और हत्या की है. हम उसे दरवाजे पर ला कर तुम्हें दिखाएंगे. देखना है कि तुम उसे पहचानते हो या नहीं?”

धनंजय को ले कर प्रकाश राय बैंक में दखिल हुए और बैंक के लौकर डिपार्टमेंट में पहुंचे. वहां मौजूद 2-4 लोगों में से प्रकाश राय ने एक व्यक्ति से पूछा, “आप…?”

“मैं बैंक मैनेजर हूं.”

“आप इन्हें जानते हैं?”

“हां, यह धनंजय विश्वास हैं.”

“इन का खाता है आप के बैंक में?”

“खाता तो नहीं है, लेकिन कल दोपहर 3 बजे इन्होंने लौकर नंबर 106 किराए पर लिया है.”

“आप जरा वह लौकर खोलने का कष्ट करेंगे?”

बैंक मैनेजर सुरेशचंद्र वर्मा ने लौकर के छेद में चाबी डाल कर 2 बार घुमाई, पर लौकर एक चाबी से खुलने वाला नहीं था, क्योंकि दूसरी चाबी धनंजय के पास थी. प्रकाश राय धनंजय से बोले, “मिस्टर विश्वास, तुम्हारी जेब में चाबी का जो गुच्छा है, उस में लौकर नंबर 106 की दूसरी चाबी है. उस से इस लौकर को खोलो.”

धनंजय घबरा गया. उस ने चाबी निकाल कर कांपते हाथों से लौकर खोल दिया. प्रकाश राय ने लौकर में झांक कर देखा और फिर धनंजय से पूछा, “यह क्या है मिस्टर विश्वास?”

धनंजय ने गरदन झुका ली. प्रकाश राय ने लौकर से कपड़े की एक थैली बाहर निकाली. उस थैली में धनंजय के फ्लैट से चोरी हुए सारे जेवरात और 5 सौ रुपए के नोटों का एक बंडल भी था, जिस पर रोहिणी के पंजाब नेशनल बैंक की मोहर लगी थी. इस के अलावा एक और चीज थी उस में, एक रामपुरी छुरा.

“मिस्टर विश्वास, यह सब क्या है?” प्रकाश राय ने दांत भींच कर पूछा.

एक शब्द कहे बिना धनंजय ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक कर रोते हुए कहा, “साहब, मैं अपना गुनाह कबूल करता हूं. रोहिणी का खून मैं ने ही किया था.”

दरअसल, हुआ यह था कि मंगलवार को औफिस में आते ही प्रकाश राय को जो फिंगरप्रिंट्स रिपोर्ट मिली थी, उस के अनुसार फ्लैट में केवल रोहिणी और धनंजय के ही फिंगरप्रिंट्स मिले थे. किसी तीसरे व्यक्ति की अंगुलियों के निशान थे ही नहीं. इसलिए प्रकाश राय की नजरें धनंजय पर जम गई थीं.

विचित्र संयोग : चक्रव्यूह का भयंकर परिणाम – भाग 4

प्रकाश राय स्वयं राजेंद्र सिंह को ले कर चल पड़े. रास्ते में प्रकाश राय ने राजेंद्र सिंह को आनंदी के बारे में जो कुछ सुना था, बता दिया. रोहिणी के बैंक के मैनेजर रोहित बिष्ट से मिल कर प्रकाश राय ने अपना परिचय दिया और वहां आने का कारण बताते हुए कहा, “जो कुछ हुआ, बहुत बुरा हुआ. हमें तो दुख इस बात का है कि हत्यारे का हमें कोई सुराग तक नहीं मिल रहा है.”

“हम तो आसमान से गिर पड़े. सवेरे 10 बजे आते ही फोन पर रोहिणी की हत्या की खबर मिली.”

“तुम्हें फोन किस ने किया था?”

“सक्सेना नाम के किसी व्यक्ति ने. पर एकाएक हमें विश्वास ही नहीं हुआ. हम ने मिसेज विश्वास के घर फोन किया. तब पता चला कि रोहिणी वाकई अब इस दुनिया में नहीं रही. हम कुछ लोग अलकनंदा गए थे. मैं दाह संस्कार में जा नहीं पाया. हां, मेरे कुछ साथी जरूर गए थे.”

“आप जरा बुलाएंगे उन्हें?”

कुछ क्षणों बाद ही 5-6 बैंक कर्मचारी मैनेजर के कमरे में आ गए. उन्होंने प्रकाश राय से उन का परिचय कराया. बातचीत के दौरान प्रकाश राय ने वहां उपस्थित हेड कैशियर सोलंकी से पूछा, “शनिवार को मिसेज विश्वास ने कुछ रुपए निकाले थे क्या?”

“हां, 40 हजार…”

“खाता किस के नाम था?”

“मिस्टर और मिमेज विश्वास का जौइंट एकाउंट है.”

“आप ने मिसेज विश्वास को जो रकम दी थी, वह किस रूप में थी?”

“5 सौ के नए कोरे नोटों के रूप में दिया था. उन नोटों के नंबर भी हैं मेरे पास.”

प्रकाश राय ने राजेंद्र सिंह से नोटों के नंबर लेने और उस चेक को कब्जे में लेने को कहा.

कुछ क्षण रुक कर उन्होंने अपना अंदाज बदलते हुए कहा, “अरे क्या खूब याद आया बिष्ïट साहब, विश्वास के यहां हमें बारबार ‘बैंक, आनंदी, कल फोन किया था’- ऐसा सुनाई पड़ रहा था. आप के यहां कोई आनंदी काम..?”

“नहीं,” वहां मौजूद एक अधिकारी ने कहा, “वह आनंदी गौड़ है. रोहिणी की फास्टफ्रैंड. वह यहां काम नहीं करती.”

“अच्छा, यह बात है. बारबार आनंदी का नाम सुनने पर मुझे लगा कि वह यहीं काम करती होगी. आप को मालूम है, यह आनंदी कहां रहती है?”

“निश्चित रूप से तो मालूम नहीं, पर वह दिल्ली में कहीं रहती है. 2-3 बार वह बैंक में भी आई थी. शनिवार को उस का फोन भी आया था. शायद एक, डेढ़ महीना पहले ही उन की जानपहचान हुई थी. मिसेज विश्वास ने ही मुझे बताया था.”

“एक विवाह में शामिल होने के लिए अप्रैल महीने के अंत में गई थीं और 3 मई को ड्यूटी पर आ गई थीं.”

“यहां किसी ने मिसेज आनंदी को रोहिणी की हत्या के बारे में बताया तो नहीं है. अगर नहीं तो अब कोई नहीं बताएगा. क्या किसी के पास उस का नंबर है. अगर नहीं है तो रोहिणी के काल डिटेल्स से तलाशना पड़ेगा.”

मैनेजर ने बैंक की औपरेटर से इंटरकौम पर बात की तो प्रकाश राय को आनंदी का फोन नंबर मिल गया. इस के बाद उन्होंने उस नंबर से आनंदी के घर का पता मालूम कर लिया.

“पता कहां का है?” मैनेजर से पूछे बिना नहीं रहा गया.

“साउथ एक्स का. अच्छा मिसेज गौड़ ने किसलिए फोन किया था?”

“औपरेटर ने बताया है कि किसी वजह से मोबाइल पर फोन नहीं मिला तो मिसेज गौड़ ने लैंडलाइन पर फोन किया था. वह रविवार को मिसेज विश्वास को शौपिंग के लिए साथ ले जाना चाहती थीं. पर रोहिणी ने कहा था कि उस के यहां कुछ मेहमान खाना खाने आ रहे हैं, इसलिए वह नहीं आ सकेगी.”

इतने में ही राजेंद्र सिंह और मिश्रा वहां आ पहुंचे. राजेंद्र सिंह अपना काम पूरा कर चुके थे. प्रकाश राय ने रोहिणी का बियरर चेक ले कर उसे देखा और बड़े ही सहज ढंग से पूछा, “मिस्टर बिष्ट, आप के बैंक में सेफ डिपौजिट वाल्ट की सुविधा है?”

“हां, है. आप को कुछ…?”

“नहीं, नहीं, मैं ने यों ही पूछा. अब हम चलते हैं.”

प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह बैंक से निकल कर साउथ एक्स में जहां आनंदी रहती थी, वहां पहुंचे. प्रकाश राय ने ऊपर पहुंच कर एक फ्लैट के दरवाजे की घंटी बजाई. फ्लैट के दरवाजे पर लिखा ‘आनंद गौड़’ नाम वह पहले ही पढ़ चुके थे. कुछ क्षणों बाद दरवाजा खुला. प्रकाश राय को समझते देर नहीं लगी कि उन के सामने आनंदी और उस के पति आनंद गौड़ खड़े हैं और दोनों बाहर जाने की तैयारी में हैं.

मिस्टर गौड़ ने आश्चर्य से प्रकाश राय को देखा. प्रकाश राय ने शांत भाव से कहा, “मुझे आनंद गौड़ से मिलना है.”

आनंद ने आनंदी को और आनंदी ने आनंद को देखा. 2 अपरिचितों को देख कर वे हड़बड़ा गए थे.

“मैं ही आनंद गौड़ हूं, आप…?”

“हम दोनों नोएडा पुलिस से हैं. एक जरूरी काम से आप के पास आए हैं. घबराने की कोई बात नहीं है. मुझे आप से थोड़ी जानकारी चाहिए.”

“आइए, अंदर आइए.”

प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह ने घर में प्रवेश किया. ड्राइंगरूम में बैठते हुए प्रकाश राय बोले, “मिस्टर आनंद, जिन लोगों का पुलिस से कभी सामना नहीं होता, उन का आप की तरह घबरा जाना स्वाभाविक है. मैं आप से एक बार फिर कहता हूं, आप घबराइए मत. बस, आप मेरी मदद कीजिए.”

बातचीत के दौरान आनंद से प्रकाश राय को मालूम हुआ कि आनंद के परिवार में मातापिता, भाईबहन और पत्नी, सभी थे. 2 साल पहले आनंद और आनंदी का विवाह हुआ था. करोलबाग में आनंद के पिता की करोलबाग शौङ्क्षपग सेंटर नामक एक शानदार दुकान थी . टीवी, डीवीडी प्लेयर, फ्रिज, पंखा आदि कीमती सामानों की यह दुकान काफी प्रसिद्ध थी. मंगलवार को दुकान बंद रहती थी. इसलिए मिस्टर आनंद घर पर मिल गए थे. पतिपत्नी अपने किसी रिश्तेदार के यहां पूजा में जा रहे थे कि वे वहां पहुंच गए थे.

आनंद ने अपने निजी जीवन के बारे में सब कुछ बता दिया तो आनंदी ने प्रकाश राय से कहा, “अब तो बताइए कि आप हमारे घर कौन सी जानकारी हासिल करने आए हैं?”

“मिसेज आनंदी, आप यह बताइए कि आप मिसेज रोहिणी विश्वास को जानती हैं?” प्रकाश राय के मुंह से रोहिणी का नाम सुन कर आनंद और आनंदी भौचक्के रह गए.

“हां, वह मेरी सहेली है. क्यों, क्या हुआ उसे?”

“आप की और रोहिणी की मुलाकात कब और कहां हुई थी?”

“हमारी जानपहचान हुए लगभग एक महीना हुआ होगा. अप्रैल के अंतिम सप्ताह में हम दोनों घूमने आगरा गए थे. 3 मई को आगरा से दिल्ली आते समय शताब्दी एक्सप्रेस में हमारी मुलाकात हुई थी.”

“लेकिन जानपहचान कैसे हुई?”

“हम आगरा स्टेशन से गाड़ी में बैठे थे. रोहिणी और उस के पति भी वहीं से गाड़ी में बैठे थे. उन की सीट हमारे सामने थी. बांतचीत के दौरान हमारी जानपहचान हुई. हम दोनों के पति गाड़ी चलते ही सो गए थे. हम एकदूसरे से बातें करने लगी थीं. फिर हम बचपन की सहेलियों की तरह घुलमिल गईं.”

“सारे रास्ते तुम दोनों के पति सोते ही रहे?”

“अरे नहीं, दोनों जाग गए थे. फिर हम ने एकदूसरे का परिचय कराया. रोहिणी को हजरत निजामुद्ïदीन उतरना था, हमें नई दिल्ली. उतरने से पहले हम दोनों ने एकदूसरे को अपनेअपने घर का पता और फोन तथा मोबाइल नंबर दे दिया था.”

“तुम अपने पति के साथ रोहिणी के घर जाती थी?”

“नहीं.”

“रोहिणी के पति तुम्हारे घर आया करते थे?”

“नहीं.”

“इस का कारण?” प्रकाश राय ने आनंद की ओर देखते हुए पूछा.

“कारण…?” आनंद गड़बड़ा गया, “एक तो दुकान के कारण मुझे समय नहीं मिलता था, दूसरे न जाने क्यों मुझे मिस्टर विश्वास से मिलने की इच्छा नहीं होती थी.”

“रोहिणी से आखिरी बार तुम कब मिली थीं?” प्रकाश राय ने आनंदी से पूछा.

“पिछले हफ्ते मैं रोहिणी के बैंक गई थी.”

“अच्छा रोहिणी को तुम ने आखिरी बार फोन कब किया था और क्यों?”

“पिछले शनिवार को. लाजपतनगर में शौपिंग के लिए मैं ने उसे बुलाया था. पर उस ने मुझे बताया कि रविवार को उस के यहां कुछ लोग खाने पर आने वाले थे.”

अब तक आनंद दंपति ने जो कुछ बताया था, वह सब सही था. प्रकाश राय थोड़ा सा घबराए हुए थे. एक प्रश्न का उत्तर उन्हें नहीं मिल रहा था.

ट्रंक की चोरी : ईमानदार चोर ने किया साजिश का पर्दाफाश – भाग 4

निक ने फोन रखा और वहां से निकलने के लिए मुड़ा तभी अचानक किचन की लाइट जल गई. दरवाजे पर विक्टर हाथ में रिवौल्वर लिए खड़ा था.

वह गुस्से में बोला, ‘‘तुम ने बेवकूफी की मिस्टर निक, मैं ने कहा था 5 हजार डालर ले कर सब कुछ भूल जाओ, पर तुम्हारी समझ में नहीं आया. तुम अपने आप को मुसीबत में डालना चाहते हो.’’

‘‘पहली बात तो यह है कि मैं कभी कातिलों से समझौता नहीं करता, तुम ने 3 बेगुनाह लोगों को चोरी और कत्ल के इलजाम में गिरफ्तार करवा दिया, ये बात मुझे बिलकुल पसंद नहीं.’’ निक ने कहा.

‘‘कई बातें लोगों को पसंद नहीं आतीं पर बरदाश्त करनी पड़ती हैं. यह बताओ कि तुम फोन पर किस से बातें कर रहे थे?’’

यह सुन निक को तसल्ली हुई कि उस ने उसे पुलिस से बातें करते नहीं सुना है. निक ने उसे बातों में उलझाते हुए कहा, ‘‘मैं न्यूयार्क में अपनी दोस्त ग्लोरिया से बात कर रहा था,’’ वह फौरन टापिक बदल कर बोला, ‘‘तुम्हें यह जान कर खुशी होगी कि आज सुबह मैं तुम्हारी सौतेली बहन ऐना से मिला था. उस का कहना है कि उस ने तुम्हारी डायरी नहीं पढ़ी थी. बल्कि तुम्हारे पिता ने उसे जेवरात के बारे में बताया था और वसीयत के अनुसार वह तीसरे हिस्से की हकदार है. इस के अलावा मैं न्यूपालिट की पुलिस के चीफ से भी मिला था.

‘‘मैं जब उस से मिला, तो उस ने बताया कि आलविन नाम के एक नामी बदमाश से तुम्हारे गहरे संबंध हैं. जिस रोज मैं यहां ट्रंक चोरी करने आया था तुम ने उसे और उस के साथियों को यहां बुलाया था और खुद न्यूयार्क चले गए थे. ऐना को यहां बुलाना तुम्हारी ही साजिश का एक प्लान था. उस दिन ऊपरी मंजिल पर मुझे भी कदमों की आहट सुनाई दी थी. मैं ने उसे अपना भ्रम समझा था. लेकिन मुझे अब पता चला है कि वह भ्रम नहीं था. उस ने ही चौकीदार की हत्या की होगी. जरूर ही आलविन ऊपरी मंजिल पर था.’’

निक के मुंह से यह सचाई सुन कर विक्टर गुस्से से बोला, ‘‘बके जाओ जो तुम्हारे दिल में है. आखिरी मौका तुम्हें भी मिलना चाहिए. निक, तुम इन सब बातों को साबित नहीं कर सकते.’’

‘‘हां, यह तो तुम ठीक कहते हो. सुबूत नहीं है?’’ निक ने चालाकी से हां में हां मिलाई. उस के कान पुलिस के सायरन पर लगे हुए थे.

‘‘अब मैं चाहता हूं कि तुम्हारा मुंह हमेशा के लिए ही बंद कर दिया जाए. तुम्हें किसी मुनासिब जगह पर गोली मारना चाहता हूं. इसलिए अपने हाथ ऊपर कर के यहां से बाहर चलो. तुम्हारे मरने के बाद जब पुलिस यहां आएगी तो कह दूंगा कि तुम चोरी के मकसद से यहां घुसे थे और अपनी हिफाजत में गोली चला दी.’’

निक ने हाथ ऊपर उठाए और उस के आगे चल पड़ा. उसी वक्त पुलिस साइरन की आवाज गूंजी. विक्टर चौंक उठा. फिर भारी कदमों की गूंज अपार्टमेंट में होने लगी. 2 पुलिस अफसर तेज कदमों से किचन की तरफ आ गए. इस से पहले कि पुलिस वाले कुछ कहते विक्टर बोल पड़ा, ‘‘यह आदमी चोरी करने की नीयत से मेरे घर में घुसा था. इसे जल्दी पकड़ लीजिए.’’

‘‘रिचर्ड निक्सन किस का नाम है?’’ एक पुलिस अफसर ने पूछा.

‘‘सर, ये मेरा नाम है. आप को फोन मैं ने ही किया था.’’ निक जल्दी से बोला.

‘‘फोन किया था?’’ सुन कर विक्टर एलियानोफ के चेहरे पर घबराहट आ गई.

‘‘रिवौल्वर नीचे करो,’’ पुलिस अफसर ने डपट कर विक्टर से कहा. फिर निक से बोला, ‘‘तुम ने फोन पर जिन जेवरातों का जिक्र किया था वह कहां हैं?’’

निक ने पीछे मुड़ कर फ्रिज की तरफ इशारा किया, ‘‘इस पुराने फ्रिज में हैं.’’

उसी दौरान फुरती से विक्टर ने पुलिस वालों पर रिवौल्वर तानते हुए कहा, ‘‘खबरदार, कोई भी किचन में कदम न रखे.’’

‘‘रिवौल्वर फेंक दो.’’ एक अफसर ने हुक्म दिया.

‘‘मैं कहता हूं कि मेरे घर से बाहर निकल जाओ तुम लोग बिना सर्च वारंट के किसी चीज को हाथ नहीं लगा सकते.’’ थोड़ा पीछे हट कर उस ने तीनों को रिवौल्वर से कवर कर लिया.

‘‘रिवौल्वर नीचे फेंक दो.’’ दूसरा अफसर गरजा. उस के साथ ही एक फायर हुआ और विक्टर का रिवौल्वर हाथ से छूट कर नीचे गिर गया.

पुलिस अफसर ने उस के हाथ पर गोली चलाई थी. पहले अफसर ने फुरती से रिवौल्वर उठा लिया और रूमाल निकाल कर विक्टर एलियानोफ के हाथ पर बांध दिया. विक्टर को हिरासत में लेने के बाद पुलिस ने जब फ्रिज खोल कर देखा तो उस में रखे जेवरात देख कर वह हैरान रह गए. जेवरात बरामद कर के विक्टर को कत्ल और धोखा देने के इलजाम में गिरफ्तार कर लिया. निक ने अपना बयान नोट कराया और न्यूयार्क के लिए निकल गया.

पुलिस ने विक्टर से जब पूछताछ की तो उस ने अपनी सारी साजिश पुलिस के सामने उगल दी.

इस के बाद पुलिस को पुष्टि हो गई कि ऐना और उस के साथी बेकुसूर हैं. उन के बेकुसूर होने की रिपोर्ट कोर्ट में पेश कर दी. जिस के बाद उन्हें रिहा कर दिया. ऐना ने निक को धन्यवाद दिया और वायदा किया कि जायदाद मिलते ही सब से पहले उस के 15 हजार डालर देगी.

उधार का चिराग – भाग 4

अगले दिन मैं औफिस जाने के बजाय कोर्ट की ओर चल पड़ा. औफिस तो वैसे भी नहीं जा सकता था. मैं रिक्शे के इंतजार में खड़ा था कि अचानक 2 आदमी आ कर मेरे दाएंबाएं खड़े हो गए. एक ने तीखे लहजे में कहा, ‘‘मिस्टर सामने जो गाड़ी खड़ी है, चुपचाप चल कर उस में बैठ जाओ.’’

‘‘क्यों?’’ मैं ने पूछा.

‘‘सवाल करने की जरूरत नहीं है. जो कह रहा हूं, वही करो, वरना गोली मार दूंगा. चलो मेरे साथ, 2-4 बातें कर के छोड़ देंगे.’’ उस ने कहा.

मैं समझ गया कि कहानी क्या है? वे अजहर के भेजे गुंडे थे. वह एक दौलतमंद आदमी था. उस के पास पैसा भी था और ताकत भी. मैं बेचारा गरीब अकेला उस का कैसे सामना कर सकता था. लेकिन मुझे यह उम्मीद नहीं थी. वे लोग किराए के कातिल थे, मुझे मारने के लिए कहीं ले जा रहे थे. इन्हें न मुझ में कोई दिलचस्पी थी, न अजहर में. इन्हें इन के पैसे चाहिए थे.

रास्ते में मै ने उन से बात करनी चाही तो उन्होंने मेरी बातों का कोई जवाब नहीं दिया. गाड़ी काफी तेज चल रही थी. मैं काफी डरा हुआ था. इस के बावजूद दिमाग में एक बात थी कि कुछ न कुछ कर गुजरना है. एक सुनसान जगह पर गाड़ी रोक कर उन्होंने मुझ से उतरने को कहा. वे कुल 3 आदमी थे. एक गाड़ी चला रहा था. 2 मेरे अगलबगल बैठे थे. दोनों के पास हथियार थे. मैं गाड़ी से उतरा. मैं पूरी तरह सजग था. मुझे कुछ तो करना ही था.

वे कुछ समझ पाते, मैं ने दोनों में से एक को जोर से धक्का दिया. वह एकदम से गाड़ी पर गिर पड़ा. बस मैं बेतहाशा भागा. वे ‘रुको… रुको…’ चिल्लाते रहे, पर मैं क्यों रुकता. पागलों की तरह भागता रहा. तभी गोली चली, जो मेरे सिर के ऊपर से गुजर गई.

अचानक एक करिश्मा सा हुआ. उस सुनसान जगह पर न जाने कहां से पुलिस की गाड़ी आ गई. मैं गाड़ी के पास जा कर निढाल सा गिर पड़ा. गाड़ी से 2 पुलिस वाले उतरे और मुझे सहारा दे कर खड़ा किया. मेरी टांगें कांप रही थीं, सांस फूल रही थी. उन्होंने मुझे गाड़ी में बैठाया और पानी पिलाया. पानी पी कर मेरी हालत कुछ ठीक हुई तो उन्होंने पूछा, ‘‘अब बताओ, तुम्हारे साथ क्या हुआ?’’

‘‘जनाब, मैं अपने औफिस जा रहा था तो अचानक एक गाड़ी मेरे पास आ कर रुकी. मुझे जबरदस्ती गाड़ी में बिठा कर यहां ले आया गया. उन के पास हथियार थे. वे मुझे मारना चाहते थे, लेकिन मैं उन्हें धोखा दे कर भाग निकला. आप की गाड़ी देख कर वे भाग गए.’’

‘‘हां, एक गाड़ी तो तेजी से गई थी, लेकिन हमारा ध्यान तुम्हारे ऊपर था. कौन थे वे लोग?’’ सिपाहियों ने पूछा.

‘‘मैं नहीं जानता वे लोग कौन थे?’’

‘‘बिना किसी दुश्मनी के उठा लाए?’’

मेरा मन हुआ कि उन्हें अजहर अली की पूरी कहानी सुना दूं, लेकिन यह सोच कर चुप रह गया कि मेरे पास इस का कोई सुबूत नहीं था. वह एक अमीर और ताकत वाला आदमी था. मैं उस का कुछ नहीं बिगाड़ सकता था.

‘‘जी जनाब, बिना किसी वजह के उठा लाए थे.’’

‘‘तुम बहुत अमीर आदमी हो क्या?’’

‘‘नहीं जी, मैं एक मामूली आदमी हूं. एक औफिस में नौकरी करता हूं.’’ मैं ने धीरे से कहा.

‘‘तब वे तुम्हें क्यों उठा लाए?’’

‘‘छोडि़ए इस बात को.’’ दूसरे पुलिस वाले ने कहा, ‘‘आजकल इस तरह की न जाने कितनी घटनाएं घटती रहती हैं. गलतफहमी भी हो सकती है. यह तो अब रोज का चक्कर हो गया है.’’

‘‘क्या तुम उन लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराना चाहते हो?’’ पुलिस वाले ने पूछा.

‘‘जनाब किस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराऊं? मैं तो किसी को पहचानता भी नहीं. रिपोर्ट किस के नाम लिखवाऊं?’’ मैं ने कहा.

‘‘तुम ठीक ही कहते हो. चलो तुम्हें तुम्हारे औफिस छोड़ दूं.’’ उस ने कहा.

मैं अपनी मौत के पास कैसे जा सकता था. इस हमले की नाकामी से अजहर अली गुस्से में होगा. वह दोबारा कोशिश करेगा. उस के पास पैसे हैं. उसे किराए के लोगों की क्या कमी है. संबंध भी ऊंचे लोगों से हैं. मैं एक गरीब, बेहैसियत आदमी उस के सामने कहां टिक सकता था. मैं अपने फ्लैट के करीब उतर गया. अब सवाल जिंदगी बचाने का था. मेरी समझ में यही आया कि मैं यह घर खाली कर के कहीं भीड़ में गुम हो जाऊं.

मैं ने वही किया. मैं एक बुजदिल, कमजोर इंसान था, इसलिए इस के अलावा और कुछ नहीं कर सका. इस के बाद अजहर भी शांत हो गया. किसी ने मुझ से मिलने की कोशिश नहीं की. कोई फोन भी नहीं आया.

बरसों गुजर गए. इस बीच मैं नहीं जान पाया कि अजहर और नाजनीन के क्या हाल थे. पिछले दिनों बस इतना पता चला कि अजहर बहुत बीमार है. अब उस की कंपनी उस का बेटा संभाल रहा है. वह बेटा कौन हो सकता है, शायद यह बताने की जरूरत नहीं है.

बेरुखी : बनी उम्र भर की सजा – भाग 4

फिर उस के कदमों की और मोटरसाइकिल स्टार्ट होने की आवाज आई. मैं खुद को शिकारियों के घेरे में घिरी हुई हिरनी महसूस कर रही थी. यह बात अच्छी तरह मेरी समझ में आ गई थी कि वह अब तक मुझे बेवकूफ बना रहा था. वह मुनासिब मौके की तलाश में था, जो बेवकूफी में मैं ने उसे बख्श दिया था.

जिंदगी में पहली बार मुझे अपनी किसी तमन्ना पर पछतावा महसूस हुआ था. मेरा दिल चाह रहा था कि जमीन फटे और मैं उस में समा जाऊं या मौत का फरिश्ता मुझे आ दबोचे, ताकि आने वाले हालात का सामना न करना पड़े. मगर दोनों बातें मुमकिन नहीं थीं.

अपनी इज्जत खतरे में देख कर मेरे अंदर की औरत जाग उठी. मैं ने फैसला कर लिया कि अपनी इज्जत पर आंच नहीं आने दूंगी, चाहे मुझे अपनी जान ही क्यों न देनी पड़े. उस समय मुझे खुदा की याद आई. मैं जानती थी कि उस के सिवा अब मुझे कोई नहीं बचा सकता था. मैं ने दिल की गहराइयों से गिड़गिड़ा कर अपनी हिफाजत की दुआ मांगी और उस कैद से रिहाई की सोचने लगी.

बाथरूम खासा बड़ा था. उस में बाथटब भी था. एक तरफ वाशबेसिन था, जिस में आगे शीशा लगा हुआ था. उस के बराबर में एक रैक था, जिस पर शैम्पू और साबुन आदि रखे थे, मगर शेविंग का सामान नहीं था, वरना मैं ब्लेड से शायद अपना गला काट कर खुदकुशी कर लेती. इस बात का मुझे कैद करने वालों को भी अंदाजा था. इसलिए उन्होंने बाथरूम से हर वह चीज हटा दी थी, जिसे मैं रिहाई या खुदकुशी के लिए इस्तेमाल कर सकूं. रैक स्टील का बना हुआ था, मगर दीवार में इस तरह जुड़ा हुआ था कि उसे वहां से निकालना मेरे लिए मुमकिन नहीं था.

बाथरूम का दरवाजा ठोस लकड़ी का था और मेरे लिए उसे तोड़ना नामुमकिन था. तब मेरी निगाह रोशनदान पर गई. फर्श से लगभग 8 फुट ऊंचा वह रोशनदान इतना चौड़ा था कि उस में से आसानी से बाहर निकल सकती थी. उस में शीशे के 2 पट थे, जो सिटकिनी के सहारे बंद थे, मगर असल मसला उस तक पहुंचना था.

यह मुमकिन नहीं था कि मैं उछल कर वहां तक पहुंच सकूं. कोई ऐसी चीज मुहैया नहीं थी, जिस के सहारे मैं ऊपर चढ़ सकती. वाशबेसिन और बाथटब, सब अपनी जगह पर फिट थे. फिर भी मैं ने उछल कर रोशनदान की मुंडेर पकड़ने की कोशिश की, मगर कुछ नाकाम कोशिशों के बाद मेरा हौसला जवाब दे गया और मैं फूटफूट कर रोने लगी. मुझे महसूस हुआ कि मैं खुद कुछ भी करूं, उस कैदखाने से नहीं निकल सकूंगी.

कुछ देर रोने के बाद मुझे अक्ल आ गई कि इस तरह आने वाली मुसीबत टल नहीं सकेगी. फिर मुझ पर जैसे जुनून छा गया. मैं ने रैक से साबुन और शैम्पू की बोतल आदि उठा कर फर्श पर दे मारी. रैक को कुछ जोरदार झटके दिए, मगर वह अपनी जगह जमा रहा. फिर बेसिन को झिंझोड़ा, मगर वह भी टस से मस नहीं हुआ.

आखिर मैं ने टब को जोरदार ठोकर मारी और यह देख कर चौंक गई कि वह अपनी जगह से हिल कर रह गया. मैं ने उसे पकड़ कर झटके दिए. तब पता चला कि वह फर्श के साथ महज पाइप की मदद से जुड़ा हुआ था. पाइप शायद ढीला पड़ गया था. उस समय जाने कहां से मुझ में इतनी ताकत आ गई थी कि मैं ने उसे झटके दे कर आखिर फर्श से अलग कर दिया.

सेरामिक्स का बना हुआ वह टब 3 फुट चौड़ा और 5 फुट लंबा था. बनावट में गोलाकार था. मैं उसे उस की जगह से सरकाने लगी. अब मैं टब को लंबाई के रुख से दीवार के साथ लगाती तो खुद टब पर चढ़ना मेरे लिए मुमकिन न रहता और चौड़ाई के रुख से खड़ा करने की हालत में उस के स्लिप हो जाने का खतरा था. बहरहाल मैं ने टब दीवार से लगा कर खड़ा किया. सैंडिल उतारी और ऊपर चढ़ने लगी, मगर पहली ही कोशिश में टब स्लिप हो गया और मेरा घुटना दीवार से जा टकराया.

वक्त रोने का नहीं था. अगर मौके के चंद लमहे मेरे हाथ से निकल जाते, तो दरिंदों से छुटकारा पाना नामुमकिन था. इस बार टब को कम तिरछा कर के दीवार से टिकाया और बड़ी सावधानी से धीरेधीरे कदम जमा कर ऊपर चढने लगी. बड़ी मुश्किल से अपने जख्मी घुटने के कंपन पर काबू पाया. खुदाखुदा कर के मेरा हाथ रोशनदान तक जा पहुंचा और उस की मुंडेर पर हाथ जमा कर मैं ने उस के पट खोले.

मेरी खुशकिस्मती थी कि रोशनदान की दूसरी तरफ खासा चौड़ा छज्जा था. मैं ने बाहर की मुंडेर पर अभी हाथ जमाया ही था कि ऐन उसी लमहे टब फिर स्लिप हो कर एक धमाके से गिरा. मुझे शदीद झटका लगा. एक लम्हे के लिए ऐसा महसूस हुआ, जैसे मेरी बांहें कंधों से उखड़ जाएंगी. मेरी पूरी कोशिश थी कि मुंडेर मेरे हाथ से न छूटने पाए. मुझे नहीं पता कि मैं कैसे रोशनदान से गुजर कर छज्जे तक पहुंची.

छज्जे का हिस्सा कौटेज के अंदर ही था. इसलिए मैं उस पर से होती हुई पिछले हिस्से में आ गई. यह कौटेज से बाहर था. जमीन वहां से 10-11 फुट नीचे थी, मगर मैं ने हिम्मत की. पहले पांव नीचे लटकाए, फिर बाहों के बल पर छज्जे से लटक गई. मैं ने आंख बंद कर के छलांग लगा दी. खुशकिस्मती से और किसी चोट से महफूज रही.

अंधेरा पूरी तरह फैल चुका था और दूर कहींकहीं मकानों की रोशनियां झिलमिला रही थीं. मैं ने उठ कर कपड़े झाड़े. सैंडिल तो अंदर ही रह गई थी, मगर दुपट्टा मेरे पास था, जिसे मैं ने अच्छी तरह अपने गिर्द लपेटा और अंधाधुंध साहिल से कुछ दूर स्थित सड़क की तरफ भागी. मैं जल्दी से जल्दी उस कैदखाने से दूर निकल जाना चाहती थी. सड़क तक आतेआते कितने ही नुकीले कंकड़ों ने मेरे पांव छलनी कर दिए. कितनी ही बार मैं ठोकर खा कर गिरी. मुझे कुछ पता नहीं चला.

                                                                                                                                       क्रमशः