ट्रंक की चोरी : ईमानदार चोर ने किया साजिश का पर्दाफाश – भाग 2

उस ने फटाफट कार की डिक्की बंद की और कार ले कर वहां से निकल गया. कार चलाते समय वह बारबार साइड मिरर में देख रहा था कि कहीं कोई उस का पीछा तो नहीं कर रहा. उस के दिमाग में बारबार यही बात घूम रही थी कि अपार्टमेंट में रहने वाले सभी लोग बाहर गए हुए थे तो वहां फायर किस ने किए?

वह रात उस ने होटल माउंटेन हाऊस में गुजारी और सुबह जल्दी न्यूयार्क के लिए रवाना हो गया. ट्रंक में क्या चीज रखी है, यह जानने के लिए उस की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी. न्यूयार्क पहुंचते ही उस ने डिक्की में रखे ट्रंक को खोला. अंदर एक सोने की अंगूठी मिली. उस पुरानी अंगूठी में एक बड़ा हीरा और उस के आसपास कई छोटे हीरे जड़े थे.

वह अंगूठी बहुत कीमती लग रही थी. निक ने अंगूठी जेब में रखी और ट्रंक डिक्की में ही बंद कर दिया. अंगूठी देख कर ग्लोरिया के मन में लालच आ गया. वह उस अंगूठी को अपने पास रखना चाहती थी, लेकिन निक ने यह कह कर उस से अंगूठी ले ली कि यह क्लाइंट या मालिक की अमानत है, वह उन्हें लौटा देगा.

रात साढ़े 9 बजे वह दिए गए पते पर ट्रंक पहुंचाने निकल गया. वह एक 4 मंजिला इमारत थी. अपार्टमेंट के मुख्य दरवाजे पर ताला लगा हुआ था. उसे विक्टर ने एक चाबी दे रखी थी. निक ने वह चाबी ताले में लगाई तो वह खुल गया. फिर दरवाजा खोल कर उस ने वह ट्रंक कमरे में रख दिया. जिस कमरे में ट्रंक रखा था वह हौलनुमा था और बेहद खूबसूरती से सजाया हुआ था.

ट्रंक रखने के बाद वह अपनी कार के पास पहुंचा तो वहां उसे विक्टर एलियानोफ मिला, जो कार से टेक लगा कर सिगरेट पी रहा था. निक को देखते ही बोला, ‘‘निक तुम अपने हुनर में माहिर हो. जी चाहता है कि तुम्हारे हाथ चूम लूं.’’

‘‘हाथ चूमने की जरूरत नहीं है. मुझे जो काम सौंपा गया था, पूरा कर दिया.’’

निक ने उस अंगूठी के बारे में विक्टर को कुछ नहीं बताया. उस ने सोचा कि विक्टर को अंगूठी के बारे में कुछ मालूम नहीं होगा. विक्टर ने एक मोटा लिफाफा निकाल कर उस की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘ये हैं तुम्हारे बाकी के 15 हजार डालर.’’

लिफाफा लेते हुए निक बोला, ‘‘मुझे ट्रंक में एक कीमती चीज मिली है.’’

विक्टर ने चौंक कर उसे देखते हुए कहा, ‘‘मेरी जानकारी के अनुसार ट्रंक खाली था तो तुम्हें उस में क्या चीज मिली?’’

‘‘हीरे जड़ाऊ एक अंगूठी थी उस में.’’

‘‘कहां है वो अंगूठी?’’

‘‘वह मेरे पास है मैं उसे उस के मालिक को वापस दूंगा. क्योंकि मैं केवल फालतू चीजें ही चोरी करता हूं, कोई कीमती चीज नहीं. यदि मैं अंगूठी रख लूंगा तो मुझ में और दूसरे चोरों में क्या फर्क रह जाएगा?’’

‘‘अगर तुम इतने ही शरीफ बनते हो तो लाओ अंगूठी मुझे दो, मैं उसे मालिक तक पहुंचा दूंगा.’’

‘‘नहीं, जब इसे चुरा कर मैं लाया हूं तो मैं ही पहुंचाऊंगा.’’

अगले दिन निक अखबार में छपी एक खबर पढ़ कर चौंक उठा. खबर में लिखा था कि न्यूपालिट में डकैती की वारदात कर लाखों रुपए के बहुत पुराने हीरेजवाहरात के जेवर लूट लिए. वारदात के समय डकैतों ने अपार्टमेंट के चौकीदार की गोली मार कर हत्या कर दी. इस मामले में पुलिस ने 3 लोगों को गिरफ्तार किया है जिन में एक लड़की भी शामिल है. पुलिस ने उन के पास से ट्रंक और कुछ लूटे हुए जेवरात बरामद कर लिए.

खबर पढ़ कर निक समझ गया कि यह सब विक्टर का ही कराधरा होगा. यानी विक्टर ने इस अपराध में उसे भी शामिल कर लिया. उस ने सोचा कि जिन 3 जनों को उसने फंसाया है वह उस के करीबी रिश्तेदार होंगे. निक ने विक्टर को फोन लगाया और मिलने के लिए कहा. विक्टर ने उसे बर्कशायर होटल के कमरा नंबर 787 में मिलने के लिए बुला लिया.

निक फटाफट तैयार हो कर होटल बर्कशायर पहुंच गया. विक्टर कमरे में बैठा टीवी देख रहा था. निक ने बैठते ही कहा, ‘‘मिस्टर विक्टर मैं यह जानना चाहता हूं कि जिन 3 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है, उन से आप का क्या रिश्ता है? चौकीदार को किस ने मारा?’’

यह सुनते ही विक्टर ने चेकबुक निकाली और 5 हजार डालर का एक चेक काट कर उसे देते हुए कहा, ‘‘मिस्टर निक, ये 5 हजार रखो और भूल जाओ कि तुम ने कोई ट्रंक चोरी किया था और कोई घटना घटी थी. हां, वह कीमती अंगूठी भी तुम रख लो.’’

उस की बात सुन कर निक चौंक गया. वह बोला, ‘‘अच्छा, तो वह मकान आप का ही है. मुझे पहले ही शक था.’’

‘‘हां, मकान मेरा ही है मगर मैं कह रहा हूं कि उन सब बातों को भूलने के लिए ही ये 5 हजार हैं.’’

निक ने सोचा कि विक्टर रकम के बूते उसे चुप कराना चाहता है. वह लालच में नहीं आया. उस ने वह चेक फाड़ दिया और कहा, ‘‘मामला 3 बेगुनाह लोगों का है जिन्हें आप ने कत्ल और डकैती के जुर्म में जेल भिजवाया है.’’

‘‘मिस्टर निक, अक्ल से काम लो अगर वो तीनों छूट जाएंगे तो फांसी का फंदा तुम्हारी गरदन में ही पड़ेगा. मैडिकल रिपोर्ट के मुताबिक चौकीदार की मौत का जो वक्त है उसी वक्त तुम मेरे घर में मौजूद थे. इसलिए कत्ल और डकैती के इल्जाम से तुम निकल नहीं पाओगे.’’

विक्टर की बात में दम था. निक सोचने पर मजबूर हो गया. तभी विक्टर बोला, ‘‘तुम्हें बहुत उत्सुकता है जानने की तो सुन लीजिए, जिस मकान में तुम ने चोरी की, वह हमारा पुश्तैनी मकान है. ऐना एलियानोफ मेरी सौतेली बहन है. मेरे पुरखे रूसी थे. मेरे दादा ऐलेक्स एलियानोफ फौज में जनरल थे. लेनिन के साथ कुछ गलतफहमी होने पर उन्हें रूस छोड़ना पड़ा था. 1921 में वह रूस से इस्तांबुल आ गए. वह खानदानी रईस थे. उन के पास काफी कीमती हीरेजवाहरात थे.

‘‘वह 1932 में न्यूपालिट आ गए. यहां मकान बना कर रहने लगे. सारा कीमती खजाना एक मजबूत संदूक में बंद कर के तहखाने में रख दिया. उस के बारे में किसी को कुछ पता नहीं था. लेकिन अपनी मौत से पहले दादा ने मेरे पापा को खजाने का राज बता दिया था. इस के बाद मेरे पिता ने एक अमेरिकन महिला से दूसरी शादी कर ली थी. ऐना एलियानोफ उस अमेरिकन महिला से पैदा हुई हमारी सौतेली बहन है.’’

निक ने टोका, ‘‘ऐना की मां कहां है?’’

‘‘ऐना की मां ने मेरे पिता से करीब 20 साल पहले तलाक ले लिया था. तलाक के बाद वह ऐना को ले कर न्यूयार्क चली गई थी. बाद में उसने किसी शख्स से दूसरी शादी कर ली.’’

‘‘फिर ये कीमती जेवर की चोरी का क्या मामला है?’’ निक ने पूछा.

‘‘मेरे पिता की मौत करीब एक हफ्ता पहले हुई थी. मरने से पहले उन्होंने खानदानी खजाने के बारे में मुझे बता दिया था. मुझ से गलती यह हुई कि सारी बातें मैं ने एक डायरी में नोट कर ली थीं. पिता की मौत की खबर सुन कर सौतेली बहन ऐना भी आ गई थी.

‘‘मैं यह देख कर हैरान रह गया कि पिता के अंतिम संस्कार के बाद ऐना घर में रखी अलमारियां और दराजें खंगालने लगी. वह शायद कोई दस्तावेज तलाश रही थी. इसी बीच उसे मेरी डायरी हाथ लग गई. डायरी पढ़ कर उस ने ट्रंक के खजाने का रहस्य जान लिया था. 2 रोज बाद उस ने अपने 2 साथियों के साथ मिल कर ट्रंक का ताला तोड़ कर सारे जेवर चुरा लिए.’’

‘‘आप के पास इस चोरी का क्या सुबूत है?’’ निक ने पूछा.

‘‘यही तो सारी मुसीबत है. मेरे पास कोई सुबूत नहीं है, पर मुझे पक्का यकीन है कि चोरी उसी ने की, मैं ने उसे अपनी डायरी पढ़ते देख लिया था.’’ उस ने बेबसी से कहा.

‘‘और आप ने ट्रंक मुझ से चोरी करवा कर ऐना के अपार्टमेंट में रखवा दिया. बाद में आप ने पुलिस को खबर कर दी. लेकिन एक बात समझ में नहीं आई कि चौकीदार का कत्ल किस ने किया?’’ निक बोला.

‘‘जाहिर है यह काम ऐना के साथियों ने किया होगा.’’ विक्टर एलियानोफ बोला.

‘‘यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही कि जब ऐना और उस के साथी चंद रोज पहले चोरी कर चुके थे, तो फिर दोबारा वहां जा कर कत्ल करने की क्या जरूरत थी?’’

‘‘उन्हें शक हुआ होगा कि चौकीदार ने चोरी करते देख लिया है या शायद वो कुछ और चुराने आए हों.’’ निक चुप रह गया. उस ने जेब से हीरे की अंगूठी निकाल कर विक्टर के हाथ पर रख दी और बाहर निकल गया.

                                                                                                                                             क्रमशः

उधार का चिराग – भाग 2

नाजनीन मुझे ले कर एक अलग टेबल पर बैठ गई. उस ने ढेर सारी चीजें और्डर कर दीं. वह मुझे वहां के तौरतरीके समझाती रही. मेरे बारबार मैडम कहने पर उस ने कहा, ‘‘यह मैडम कहना छोड़ो और मुझे नाम ले कर बुलाओ. मैं अब तुम्हारी बौस नहीं, दोस्त हूं.’’

हम क्लब से बाहर निकले तो उसने पूछा, ‘‘घर पर तुम्हारा कोई इंतजार तो नहीं कर रहा?’’

‘‘नहीं, मैं बिलकुल अकेला हूं.’’

‘‘तब तुम मेरे साथ मेरे घर चलो.’’

11 बजे के आसपास हम दोनों घर पहुंचे. मेरी हालत अजीब सी हो रही थी. घर पहुंचने पर पता चला कि अजहर अली कहीं बाहर गए हुए हैं. वह रात में आएंगे नहीं. कुछ देर रुक कर मैं जाने के लिए खड़ा हुआ, ‘‘नाजनीन, अब मुझे चलना चाहिए.’’

‘‘अब इतनी रात को तुम कहां जाओगे. तुम मेरे साथ आओ.’’ कह कर उस ने मेरा हाथ पकड़ा और खींच कर बेडरूम में ले आई. इतना शानदार बेडरूम मैं ने पहली बार देखा था. मुझे अजीब सी उलझन हो रही थी. मैं इतना भी बेवकूफ नहीं था कि एक खूबसूरत औरत के इशारे न समझ पाता.

वह मेरे एकदम करीब बैठी थी. मैं सोच रहा था कि क्या करूं? खुद को इस तूफान में बह जाने दूं या अपने बौस की इज्जत का  खयाल करते हुए यहां से भाग निकलूं या इस औरत को अहसास दिलाऊं कि वह गलत कर रही है.

नाजनीन ने मेरे गले में बांहें डाल दीं. मैं एकदम से खड़ा हो गया. उस की बांहें हटाते हुए बेरुखी से कहा, ‘‘मैडम, आप जो कर रही हैं, यह ठीक नहीं है. मुझे जाने दीजिए. आप के शौहर ने मेरे लिए इतना कुछ किया है, इतना बड़ा ओहदा दिया है और मुझे जमीन से उठा कर आसमान पर बिठा दिया है, मैं उन की इज्जत से खिलवाड़ करूं, इतना भी अहसान फरामोश नहीं हूं.’’

‘‘बेवकूफ हो तुम.’’ नाजनीन गुस्से से चीखी, ‘‘यह सब मैं अजहर की रजामंदी से कर रही हूं. उन्हें सब पता है.’’

मैं चौंका, ‘‘क्या… उन्हें यह सब पता है?’’

नाजनीन तुनक कर बोली, ‘‘अब तुम जा सकते हो. चाहो तो कल अपने बौस से मेरी शिकायत कर देना. उस के बाद देखना, वह क्या कहते हैं?’’

मैं ने कहा, ‘‘यह सब मेरे उसूलों के खिलाफ है, इसलिए मैं जरूर कहूंगा.’’ कह कर मैं उसी वक्त अपने घर आ गया. मुझे नाजनीन पर गुस्सा आ रहा था कि कैसी बेशर्म औरत है, जो अपने शौहर की इज्जत नीलाम कर रही है. पूरी रात मैं उस बेबाक बेधड़क औरत के बारे में ही सोचता रहा.

अगले दिन मैं गुस्से में बौस के चैंबर में पहुंचा तो उन्होंने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘कहो, शहबाज, क्लब में कैसा लगा? मुबारक हो तुम्हें क्लब की मेंबरशिप मिल गई.’’

‘‘शुक्रिया सर, लेकिन मुझे आप से एक जरूरी बात करनी है.’’

‘‘कहो, क्या कहना चाहते हो?’’

‘‘सर, कल रात मैडम मुझे क्लब से सीधे अपने घर ले गईं.’’

‘‘मुझे मालूम है, उन्होंने मुझे सब बता दिया है.’’

‘‘सर, कल रात उन्होंने मेरे साथ कुछ ऐसा किया, जो उन्हें नहीं करना चाहिए था. वह सब बताते हुए मुझे शरम आती है.’’ मैं ने कहा.

‘‘मैं समझ गया, तुम क्या कहना चाहते हो. बैठ जाओ, मुझे तुम से कुछ खास बातें करनी हैं. शहबाज, मैं जो कहने जा रहा हूं, वह एक बहुत बड़ी ट्रेजिडी है. वादा करो, इस बात की चर्चा तुम किसी से नहीं करोगे.’’

‘‘जी सर, आप यकीन रखें, मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगा.’’

‘‘बात यह है कि मेरा खानदान बहुत बड़ा है और सब की नजरें हमारे ऊपर ही टिकी हैं. हमारी शादी को 7-8 साल हो गए हैं और अब तक हमारी कोई औलाद नहीं हुई है. यह बात हर किसी को बताई भी नहीं जा सकती. दरअसल मेरी मजबूरी यह है कि मैं औलाद पैदा करने के काबिल नहीं हूं.’’

इतना कह कर अजहर अली ने एक लंबी सांस ली और सिर झुका लिया.

मेरे बौस ने एक बहुत बड़ी बात मेरे सामने कह दी थी. उस समय बौस काफी मजबूर और बेबस लग रहे थे. मेरे लिए भी यह बात किसी आघात से कम नहीं थी.

मुझे खामोश देख कर उन्होंने कहा, ‘‘तुम मेरी बात समझ रहे हो न? हमें एक बच्चे की सख्त जरूरत है, जो नाजनीन की कोख से पैदा हुआ हो. हम बच्चा अडौप्ट भी नहीं करना चाहते.’’

‘‘सर, आप बच्चे के लिए दूसरी शादी तो कर सकते हैं.’’ मैं ने कहा.

‘‘बेवकूफी वाली बात मत करो. कमजोरी मुझ में है. दूसरी या तीसरी शादी से क्या होगा?’’

‘‘हां, यह बात भी सही है.’’ मैं ने झेंप कर कहा.

‘‘अब तुम समझ गए होगे कि हम क्या चाहते हैं. मैं ने महीनों तुम्हारे बारे में सोचा, उस के बाद नाजनीन से बात की. तब फैसला लिया गया कि औलाद तुम्हारे जरिए प्राप्त कर ली जाए.’’ अजहर अली ने कहा.

मुझे झटका सा लगा, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’

‘‘बिलकुल हो सकता है. तुम मेरे बच्चे के बाप हो, यह राज केवल हम तीनों को पता होगा. और हां, इस बात की जानकारी किसी अन्य को नहीं होनी चाहिए. बच्चा पैदा होने के बाद तुम्हारा नाजनीन से कोई संबंध नहीं रहेगा.’’ अजहर अली ने सख्त लहजे में कहा.

‘‘सर, कम से कम आप को मुझ से एक बार पूछ तो लेना चाहिए था कि क्या मैं इस सौदे के लिए तैयार हूं?’’ मैं ने कहा.

‘‘अगर तुम अक्लमंद हो तो मना नहीं करोगे. फिर इस में तुम्हारा नुकसान ही क्या है? तुम मैनेजर हो गए हो. तुम्हारा वेतन 3 गुना हो गया है, गाड़ीबंगला के साथ तुम्हें एक खूबसूरत औरत मिल रही है.’’ यह कहते हुए अजहर अली की जुबान लड़खड़ा गई थी.

‘‘लेकिन सर, मुझे अफसोस है कि इतना सब मिलने पर भी मैं यह सब नहीं कर सकता.’’

‘‘प्लीज, मेरी बात मान लो शहबाज. इसी में हम सब की भलाई है. अगर तुम ने मना कर दिया तो मैं किसे पकड़ूंगा? मैं ने तुम पर भरोसा किया था, इसीलिए इतनी बड़ी बात तुम से कह दी. अब मेरे घर और खानदान को तुम्हीं बरबादी से बचा सकते हो. अगर इतनी मेहरबानी तुम मुझ पर कर दो तो अच्छा रहेगा.’’

इस के बाद मुझे उन पर रहम आने लगा था. वह मुझे बहुत बेबस लग रहे थे. उन्होंने मेरे सामने ऐसी बात कह दी थी कि मैं मना नहीं कर सकता था. मैं ने कहा, ‘‘सर, एक काम हो सकता है.’’

‘‘कहो, क्या हो सकता है?’’ उन्होंने बेताबी से पूछा.

‘‘सर, आप मैडम को तलाक दे दीजिए.’’ मैं ने कहा.

‘‘क्या बेकार की बात करते हो, इस से क्या होगा?’’

‘‘सर, आप मेरी पूरी बात तो सुन लीजिए. आप को तलाक इस तरह देना है कि किसी को पता न चले. मैडम आप के साथ ही रहेंगी. इद्दत (तलाक के बाद जितने दिनों तक शादी नहीं हो सकती) के बाद मैं उन से निकाह कर लूंगा. यह उचित और इसलामी तरीका है. इस में कुछ गलत भी नहीं है.’’

‘‘हां, यह तरीका भी ठीक है.’’ अजहर अली ने राहत की सांस ली.

‘‘सर, इस में मुझे भी इत्मीनान रहेगा कि मैं ने कोई गलत काम नहीं किया है. आप का काम हो जाने के बाद मैं मैडम को तलाक दे दूंगा. इस तरह आप की बात भी रह जाएगी और आप का मकसद भी पूरा हो जाएगा.’’

‘‘लेकिन यह सब होगा कैसे?’’

‘‘बहुत ही खामोशी से हो जाएगा, किसी को कानोकान खबर नहीं होगी.’’ मैं ने कहा.

अजहर अली ने चुपचाप नाजनीन को तलाक दे दिया. इद्दत के दौरान वह अपने घर पर ही रहीं, इसलिए किसी को कुछ पता नहीं चला. इद्दत के बाद नाजनीन से उसी तरह चुपचाप मेरा निकाह हो गया, जिस तरह तलाक हुआ था. नाजनीन की जिंदगी में यह रात पहले भी आ चुकी थी, लेकिन मेरी तो पहली शादी थी, इसलिए मेरे लिए पहली रात खास थी.                                                                        

यादगार केस : दुआ को मिला इन्साफ – भाग 2

खलील मंगी गहरे सांवले रंग का ऊंचापूरा सेहतमंद कसरती बदन का मालिक था. कहने को तो वह बिल्डर था, लेकिन असल में वह जमीन माफिया था. रोजाना शाम को वह एक आधुनिक ‘हेल्थ एंड फिटनेस’ क्लब में वर्जिश करने जाता था. उसी क्लब के एक हिस्से में महिलाएं भी वर्जिश करती थीं. दुआ अली भी इसी क्लब में वर्जिश के लिए आती थी, लंबीछरहरी, खूबसूरत, जवानी में कदम रख चुकी 15 साल की मासूम सी लड़की दुआ मंगी को पसंद आ गई.

मंगी ने उस से दोस्ती की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहा. एक दिन पार्किंग में मंगी ने दुआ के कंधे पर हाथ रख दिया तो गुस्से में दुआ ने उसे एक थप्पड़ जड़ दिया. इस के बाद तो उस ने जबरदस्ती दुआ को बांहों में उठाया और अपनी गाड़ी में डाल कर भाग निकला. दुआ चीखतीचिल्लाती रही, लेकिन उस की मदद के लिए कोई नहीं आया. अगले दिन दुआ का रौंदा बेजार शरीर शहर के मशहूर पार्क में पड़ा मिला. जिंदगी की डोर काटने से पहले उसे बड़ी ही बेरहमी से कई बार बेआबरू किया गया था.

दुआ को उठा कर कार में डालते हुए खलील मंगी को कई लोगों ने देखा था, इसलिए शकशुबहा की कोई गुंजाइश नहीं थी. दुआ का भाई शाद अली फौज में अफसर था इसलिए तुरंत काररवाई कर के मंगी को गिरफ्तार कर लिया गया. बाद में मंगी ने रसूख व पैसे का जोर दिखाया, कुछ गवाह जान के खौफ से पीछे हट गए तो कुछ ने पैसे ले कर बयान बदल दिए यानी उन्हें खरीद लिया गया. पैसे के ही जोर पर मैडिकल रिपोर्ट भी बदलवा दी गई और अब वह जालिम कातिल किसी और दुआ के लिए बददुआ बनने के लिए रिहा हो कर आ रहा था.

जज आफाक अहमद आ कर अपनी सीट पर बैठ चुके थे. पेशकार ने पहले से ही टाइप की हुई फैसले की फाइल सामने रख दी थी. अदालत में दोनों ओर के वकीलों के अलावा बार काउंसिल के सदर कामरान पीरजादा, मीडिया के कुछ प्रतिनिधि, दुआ अली के कुछ रिश्तेदार, खलील मंगी का बड़ा भाई और सुरक्षा से जुड़े चंद लोगों के अलावा किसी अन्य को दाखिल होने की इजाजत नहीं थी.

अंदर आने वाले हर शख्स की बड़ी बारीकी से तलाशी ली गई थी. मीडिया वालों का हर सामान चेक किया गया था. बम डिस्पोजल स्क्वायड ने भी अदालत के कमरे को खूब अच्छी तरह से चैक किया गया था. डीएसपी रंधावा और इंसपेक्टर गुलाम भट्टी खुद भी काफी चौकन्ने थे.

दीवार पर लगी घड़ी ने 11 बजने की घोषणा की. जज आफाक अहमद ने मेज के सामने खड़े सफाई वकील को बैठने के लिए कह कर चश्मा ठीक किया. उस के बाद उन्होंने फैसला सुनाना शुरू किया, ‘‘हालात, वाकयात और गवाहों के बयानों से अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि खलील मंगी वल्द जलील मंगी बेगुनाह है.’’

यह फैसला नहीं, एक खंजर था, जिस ने दुआ के प्यारों की जान निकाल दी थी. उन की उम्मीदों का कत्ल कर दिया था. उन के चेहरों पर दुख और आंखों से आंसू उमड़ पड़े थे. जबकि मंगी के भाई का चेहरा खुशी से चमक उठा था.

दोनों भाइयों ने विजयी भाव से एक दूसरे को देखा. रंधावा और भट्टी की नजर वहां उपस्थित हर शख्स की हर हरकत पर थी. वह लम्हा आने ही वाला था, जिस का दावा किया गया था. वैसे तो हर तरफ सुकून था. उन्हें यकीन था कि कैप्टन शाद अली ने भटकाने के लिए वह दावा किया था. यकीनन वह वापसी पर मंगी पर हमला करेगा.

जज आफाक अहमद ने एक बार फिर चश्मे को ठीक किया. उस के बाद एक नजर मंगी पर डाल कर बोले, ‘‘इसी बुनियाद पर अदालत खलील मंगी वल्द जलील मंगी को बाइज्जत बरी करने का हुक्म देती है.’’

खलील मंगी ने खुशी से बेकाबू हो कर अपने दोनों हाथ ऊपर किए. उसी पल मीडिया वालों के कैमरे उस पर चमकने लगे. तभी वह अचानक लड़खड़ाया. बगल में खड़े सिपाही ने उस के मुंह से निकली सिसकारी सुनी. मंगी का एक हाथ सीने पर गया और उसी के साथ वह कटघरे की रेलिंग से टकराया. रेलिंग टूट गई और वह जज की मेज के सामने जा गिरा. पलभर के लिए जैसे सन्नाटा पसर गया. रंधावा ने हैरानी से पलकें झपकाईं. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह जो देख रहा है, वह हकीकत है या भ्रम हो रहा है.

एक साथ कई तरह की आवाजें गूंजी. लेकिन सब से अलग और तेज आवाज मंगी के भाई की थी. वह चीख कर अपने भाई की ओर दौड़ा. लेकिन इंसपेक्टर गुलाम भट्टी ने उसे बीच में ही पकड़ लिया, ‘‘खुद पर काबू रखो.’’

जज आफाक अहमद उठे और अदालत से लगे अपने चैंबर में चले गए. सुरक्षा में लगे लोग हरकत में आ गए. ऐंबुलैंस के लिए फोन किया जा चुका था. मंगी का भाई बेकाबू हो रहा था. उसे जबरदस्ती बाहर ले जाया गया. बाकी लोगों को उन की जगहों पर बैठा कर तलाशी ली जाने लगी.

दुआ के बूढ़े चाचा और बहनोई के चेहरे पर एक अजीब सी खुशी और सुकून था. उन के हाथ दुआ के लिए उठे हुए थे. वे दिल से खुद के शुक्रगुजार थे. मंगी का जिस्म कुछ झटके खा कर शांत पड़ गया था. होंठों पर नीला झाग उभर आया था. दुआ अली का मुजरिम खत्म हो गया था.

कैप्टन शाद अली अपने दावे में कामयाब हो गया था. मंगी के सीने पर दाईं ओर एक सुई जैसा बड़ा सा तीर घुसा था, जो बहुत घातक जहर में बुझा हुआ था. ताज्जुब की बात यह थी कि उस तीर को वहां कैसे और किस ने उस पर चलाया था? ये दिमाग को चकराने वाले सवाल थे. ऐंबुलैंस आ चुकी थी. पुलिस हेडक्वार्टर से इन्वैस्टीगेशन टीम आने वाली थी, इसलिए अदालत के कमरे को बंद कर दिया गया था.

सभी लोगों की अच्छी तरह से तलाशी ले ली गई थी. इन्वैस्टीगेशन टीम की काररवाई के बाद मंगी की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. कुछ देर बाद आफाक अहमद अपना ब्रीफकेस ले कर निकलने लगे तो रंधावा के पास आ कर धीरे से बोले, ‘‘वह अपने मकसद में कामयाब हो गया. मैं ने कहा था न कि यह तुम्हारे लिए एक यादगार केस होगा.’’

रंधावा खामोश रहे. उन का दिमाग तेजी से चल रहा था. गाड़ी आई और आफाक अहमद बैठ कर चले गए. इंसपेक्टर भट्टी और डीएसपी रंधावा सिर जोड़े बैठे थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब कैसे हुआ?

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई. स्पेशल इन्वैस्टीगेशन टीम की भी शुरुआती रिपोर्ट आ गई थी. उस के अनुसार मंगी के सीने में वह जहरीला तीर, बिलकुल सामने से 6 फुट की ऊंचाई से चलाया गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मंगी की मौत बेहद घातक जहर से हुई थी. मंगी का कद 6 फुट 1 इंच था. इस के अलावा मुल्जिमों का कटघरा जमीन से करीब 8 इंच ऊंचा था.

उस के सामने गवाहों वाला कटघरा था. उस के सामने दीवार थी, जिस पर एक घड़ी टंगी थी. कटघरे, दीवार घड़ी आदि सभी चीजों को अच्छे से चैक किया गया था. बाद में भी उन में किसी तरह की कोई गड़बड़ी नहीं मिली थी. अब सवाल यह था कि क्या कैप्टन शाद अली जादू की टोपी पहन कर अदालत के कमरे में आया और मंगी को मार कर आराम से चला गया. इन सवालों ने पुलिस को परेशान कर दिया था.

रंधावा ने पता कर लिया था कि शाद अली उस जहर और हथेली की साइज की अल्ट्रामाडर्न एरोगन चलाने वाले दस्ते से जुड़ा था. जहरीले तीर के चलने के स्थान और ऊंचाई को देख कर अदालत में मौजूद सभी लोग शक के दायरे से बाहर हो गए थे.

                                                                                                                                              क्रमशः

बेरुखी : बनी उम्र भर की सजा – भाग 2

मतलब यह कि चाहतों के हिंडोले में झूलती उम्र की मंजिलें तय करती रही. जब मैं छठी क्लास में थी, तब बड़ी आपा का रिश्ता तय हो गया. उन्हें मैट्रिक के बाद स्कूल से उठा लिया गया, क्योंकि हमारी बिरादरी में लड़कियों को इस से ज्यादा पढ़ाने का रिवाज नहीं था. हमारे खानदान में बिरादरी से बाहर शादी का भी रिवाज नहीं था. बड़ी आपा की शादी के बाद अम्मी ने फौरन ही छोटी आपा की रुखसती की तैयारी शुरू कर दी. वह बचपन से ही ताया अब्बा के बेटे से जोड़ दी गई थी. मेरे 8वीं पास करतेकरते दोनों बहनें विदा हो कर अपनेअपने घर की हो चुकी थीं.

मैट्रिक में आतेआते मुझ पर बहार आ गई. मैं ने ऐसा रूपरंग और कद निकाला कि मैट्रिक करते ही दरवाजे पर रिश्तों की लाइन लग गई. अम्मी का इरादा तो यही था कि मैट्रिक के बाद मुझे भी घर से रुखसत कर दिया जाए, लेकिन मैं अभी और आगे पढ़ना चाहती थी. इसलिए मैं ने अम्मी से छिप कर अब्बू से कालेज में दाखिले की जिद शुरू कर दी. पहले उन्होंने इनकार कर दिया, मगर फिर राजी हो गए.

लेकिन यह बात खुलते ही अम्मी ने हंगामा खड़ा कर दिया. वह मेरे आगे पढ़ने के हक में नहीं थीं. अब्बू ने उन्हें किसी न किसी तरह राजी कर लिया. मैट्रिक में मेरी बहुत अच्छी पोजीशन आई थी, इसलिए बेहतरीन कालेज में दाखिले में कोई मुश्किल पेश नहीं आई. उस कालेज में ज्यादातर बड़े घरानों की लड़कियां पढ़ती थीं. मुझे उस माहौल में आ कर ऐसा महसूस हुआ, जैसे मैं किसी तालाब से निकल कर विशाल समुद्र में आ गई थी.

कालेज में अगरचे एक से बढ़ कर एक हसीन लड़कियां मौजूदी थीं, मगर उन की सुंदरता मेरे हुस्न के आगे फीकी पड़ गई. अलबत्ता उन की बेबाकियां और बातें मुझे दांतों तले अंगुली दबा लेने पर मजबूर कर देतीं. फिर मैं धीरेधीरे उन से घुलमिल गई. लड़कियां जब अपने चाहने वालों की दीवानगी के अंदाज बयान करतीं तो मैं उन के मुंह देखती रह जाती. यह हकीकत थी कि मेरी खूबसूरती के बावजूद किसी लड़के ने मुझे चाहत का पैगाम नहीं दिया था.

कालेज में मेरा दूसरा साल था. मेरी क्लासफेलो नाजिया की सालगिरह थी और मैं उस जलसे में खासतौर पर तैयार हो कर गई थी. यही वजह थी कि वहां मौजूद हर निगाह कुछ क्षणों के लिए मुझ पर जम कर रह गई. नाजिया करोड़पति बाप की औलाद थी और उस दावत में आई हुई लड़कियां कीमती कपड़ों और बेशकीमती जेवरातों से जगमगा रही थीं.

फिर भी एक नौजवान की निगाहें बारबार मुझ पर ही टिक जाती थीं. लंबा कद, बर्जिशी जिस्म, हल्के घुंघराने बाल, सुर्खी मिली रंगत और चमकती आंखें. वह हाथ में कैमरा लिए तसवीरें खींच रहा था. मैं ने महसूस किया कि बारबार कैमरे की फ्लैश मुझ पर पड़ रही थी. उस की निगाहों की गर्मी मैं फासले से भी महसूस कर रही थी. मेरे होंठों पर एक गुरूरभरी मुसकराहट फैल गई. जल्दी ही परिचय का मौका भी आ गया. वह केक की प्लेट उठाए चला आया.

‘‘आप तो कुछ खा ही नहीं रही हैं मिस!’’ उस ने गहरी नजर से मेरा जायजा लिया.

‘‘गुल.’’ मैं ने कनफ्यूज हो कर अधूरा नाम बताया.

‘‘बहुत खूब. आप बिलकुल गुल (फूल) जैसी ही हैं. मुझे राहेल कहते हैं.’’ उस ने मेरी आंखों में झांकते हुए कहा.

उसी वक्त नाजिया वहां आ गई.

‘‘राहेल! तुम इस से मिले? मेरी बेस्टफ्रेंड गुलनार है.’’

‘‘मिल ही तो रहा हूं.’’ वह बोला और मैं ने अपने चेहरे पर रंग बिखरता हुआ महसूस किया.

फिर मुझे पता ही नहीं चला कि कब हम बेतकल्लुफी की सीमा में दाखिल हो गए. जाते समय उस ने चुपके से कागज की एक चिट मेरे हाथ में पकड़ा दी, जो मैं ने हथेली में दबा ली. घर पहुंचते ही धड़कते दिल के साथ वह चिट देखी. उस पर एक फोन नंबर लिखा था. उस रात नींद मेरी आंखों से गायब हो गई थी. नतीजे में सुबह कालेज न जा सकी. सारा दिन व्याकुल सी रही. रात हुई तो सब के सोने के बाद टेलीफोन उठा कर अपने कमरे में ले आई. कांपती अंगुलियों से चिट पर लिखा हुआ नंबर डायल किया. पहली ही घंटी पर रिसीवर उठा लिया गया.

‘‘हैलो!’’ मैं ने धीरे से कहा.

‘‘मुझे यकीन था कि आप फोन जरूर करेंगी.’’ दूसरी तरफ से आवाज आई. मेरे स्वाभिमान को धक्का सा लगा और मैं ने बात किए बिना फोन काट दिया. मगर अगली रात को फिर फोन करने से खुद को रोक न सकी, हालांकि कोई अंदर से मुझे खबरदार कर रहा था कि गुल यह खेल मत शुरू कर.

मैं ने गोलमोल शब्दों में उसे अपने दिल की हालत कह सुनाई और उस ने अपनी बेताबियों का खुल कर इजहार किया. यह कच्ची उम्र की जुनूनी मोहब्बत थी, जो नफानुकसान के खयाल से बेपरवाह होती है. इसलिए जब उस ने मुझे कहीं बाहर मिलने को कहा तो मैं सोचेसमझे बिना तैयार हो गई.

उस ने तजवीज पेश की कि मैं कालेज से किसी बहाने छुट्टी ले कर बाहर आ जाऊं. फिर हम दोनों किसी रेस्त्रां में चलेंगे. मुझे एहसास ही नहीं था कि मैं एक अजनबी की मोहब्बत के नशे में डूब कर मांबाप की इज्जत को दांव पर लगा रही हूं. बस मुझे एक ही अहसास था कि शहजादों जैसी खूबसूरती रखने वाला शख्स मेरी मोहब्बत में गिरफ्तार है.

साथ जीनेमरने की कसमों ने मुझे उस के जादू में जकड़ लिया था. पहली मुलाकात में, जो एक रेस्त्रां के फैमिली केबिन में हुई. उस ने वादा किया कि अपनी तालीम पूरी होते ही वह अपने वालिदैन को हमारे घर भेजेगा. उस के बाद मैं हर तीसरेचौथे रोज उस से इसी तरह बाहर मिलती रही.

अगरचे मैं बड़ी कामयाबी से इस सारे सिलसिले को घर वालों की नजरों से छिपाए हुए थी, मगर कुदरत ने माताओं को एक खूबी दे रखी है, जो उन्हें अपनी बेटियों की बदलती अवस्था से आगाह रखती है. शायद मेरी खुशी, गालों के दमकते हुए गुलाबों और आंखों में उतरे सपनों ने उन्हें सचेत कर  दिया. वह अकसर टटोलती निगाहों से मुझे देखतीं. उन के शक की वजह से मैं राहेल से मिलनेजुलने में सावधानी बरतने लगी. मगर उस समय धमाका हो गया, जब मेरा फस्ट ईयर का नतीजा आया और मैं 4 परचों में फेल हो गई.

                                                                                                                                          क्रमशः

खुल गया रानी का राज

27 सितंबर, 2016 को उत्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद शहर से करीब 10 किलोमीटर दूर गांव फरीदपुर के नजदीक स्ड्डिथत अंडरपास से जरा सी दूरी पर एक युवक की लाश पड़ी मिली. सुबह सुबह लोग जब अपने खेतों पर जा रहे थे, तभी उन की नजर हाईवे के नीचे कच्ची रोड पर चली गई थी. लाश वहीं पड़ी थी. किसी ने फोन कर के इस की सूचना थाना मैनाठेर को दे दी. थानाप्रभारी राजेश सोलंकी उसी समय थाने पहुंचे थे. मामला मर्डर का था, इसलिए सूचना मिलते ही वह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

उन्होंने देखा, मृतक 25-26 साल का था और उस की लाश लहूलुहान थी.थानाप्रभारी ने लाश का बारीकी से निरीक्षण किया. मृतक के गले व सिर पर किसी तेजधार हथियार के गहरे घाव थे. उस की लाश के पास ही शराब की खाली बोतल और 2 गिलास पड़े मिले. इस से अनुमान लगाया गया कि हत्या से पहले हत्यारे ने मृतक के साथ शराब पी होगी. घटनास्थल पर काफी भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी.

थानाप्रभारी ने भीड़ से मृतक की शिनाख्त कराई तो किसी ने उस का नाम हरि सिंह बताते हुए कहा कि यह मुरादाबाद-संभल रोड पर स्थित गांव लालपुर हमीर का रहने वाला है. थानाप्रभारी ने एक सिपाही को हरि सिंह के घर भेज कर उस की हत्या की खबर भिजवा दी. उस की पत्नी रानी उस समय अपने मायके वारीपुर भमरौआ में थी. जैसे ही उसे पति की हत्या की खबर मिली, उस का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था.

मृतक के परिजन घटनास्थल पर पहुंच चुके थे. पुलिस ने उन से संक्षिप्त पूछताछ कर के घटनास्थल की काररवाई पूरी की और लाश को पोस्टमार्टम के लिए मुरादाबाद भेज दिया.

मृतक हरि सिंह के चाचा ओमप्रकाश की तरफ से पुलिस ने अज्ञात हत्यारों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. एसएसपी नितिन तिवारी ने थानाप्रभारी राजेश सोलंकी को घटना के शीघ्र खुलासे के निर्देश दिए. थानाप्रभारी ने सब से पहले हरि सिंह के गांव लालपुर हमीर जा कर उस के घर वालों से पूछताछ की. घर वालों ने बताया कि उन की किसी से कोई रंजिश नहीं है. वैसे भी हरि सिंह बहुत सीधासादा था.

26 सितंबर, 2016 की शाम को उस के मोबाइल पर किसी का फोन आया था. फोन पर बात करने के बाद वह यह कह कर घर से गया था कि जरूरी काम है, थोड़ी देर में लौट आएगा. लेकिन वह वापस नहीं आया. सुबह उस की हत्या की जानकारी मिली.

राजेश सोलंकी ने हरि सिंह की पत्नी रानी से भी बात की. उस ने बताया कि हमारी किसी से कोई रंजिश नहीं है. पता नहीं यह सब कैसे हो गया. रानी से बातचीत करते समय राजेश सोलंकी की नजर उस की बौडी लैंग्वेज पर टिकी हुई थी.

पति के मरने का जो गम होना चाहिए, वह उस के चेहरे पर दिखाई नहीं दे रहा था. वह बात करने में डर रही थी और उन से निगाहें चुरा रही थी. थानाप्रभारी ने अपने अनुभव से अनुमान लगाया कि कहीं न कहीं दाल में काला जरूर है. लेकिन बिना ठोस सबूत के उस पर हाथ डालना ठीक नहीं था. लिहाजा वह उस से यह कह कर लौट आए कि अगर किसी पर शक हो तो फोन कर के बता देगी.

इस के बाद पुलिस ने हरि सिंह के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से पता चला कि हरि सिंह के मोबाइल पर जो आखिरी काल आई थी, वह संभल जिले के थाना नरवासा के गांव बारीपुर भमरौआ के ओंकार सिंह की थी. पुलिस ने दबिश दे कर उसे पकड़ा और पूछताछ के लिए उसे थाना मैनाठेर ले आई.

थाने में उस से हरि सिंह की हत्या के बारे में गहनता से पूछताछ की गई तो पहले तो वह खुद को निर्दोष बताता रहा, लेकिन जब उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गया. उस ने अपना अपराध कबूल करते हुए बताया कि हरि सिंह की हत्या उस ने ही की थी. उस ने उस की हत्या की जो कहानी बताई, वह अवैध संबंधों पर आधारित थी.

हरि सिंह मुरादाबाद के थाना मैनाठेर के गांव लालपुर हमीर के रहने वाले रामकिशोर की पहली पत्नी का बेटा था. दरअसल, रामकिशोर ने अपनी पत्नी शांति देवी की मृत्यु के बाद मुरादाबाद के मोहल्ला बंगला गांव की चंद्रकला से शादी कर ली थी. हरि सिंह शांति देवी से पैदा हुआ था. रामकिशोर दूसरी पत्नी चंद्रकला के साथ मुरादाबाद में ही रहने लगा था. करीब 5 साल बाद रामकिशोर की भी मृत्यु हो गई तो हरि सिंह की परवरिश उस की दादी हरदेई ने की थी.

हरि सिंह जवान हो गया तो राजमिस्त्री का काम करने लगा. बाद में उस की शादी संभल जिले के थाना नरवासा के अंतर्गत आने वाले गांव बारीपुर भमरौआ की रानी से हो गई. यह 7 साल पहले की बात है. शादी के 4 साल बाद उन के यहां एक बेटा हुआ, जिस का नाम जितिन रखा गया. यह शादी हरि सिंह के दूर के रिश्ते के बहनोई रोहताश ने करवाई थी. शादी के बाद रोहताश सिंह और उन के बच्चों का हरि सिंह के यहां आनाजाना बढ़ गया.

रोहताश का एक बेटा था ओमकार सिंह. वह इंटरमीडिएट तक पढ़ा था और बनठन कर रहता था. वह भी हरि सिंह के घर खूब आता जाता था. उस की रानी से बहुत पटती थी. रानी रिश्ते में उस की मामी लगती थी, इस नाते वह उस से हंसीमजाक कर लेता था.

हरि सिंह राजमिस्त्री था. दिन भर काम करने के कारण शाम को थकामांदा घर आता तो वह पत्नी को ज्यादा समय नहीं दे पाता. खाना खाने के बाद वह जल्द ही सो जाता. यह बात रानी को अखरती थी. पति की इस उदासीनता की वजह से रानी का झुकाव ओमकार की तरफ हो गया.

मामी के इस आमंत्रण को ओमकार समझ गया. हरि सिंह के घर से निकलते ही वह उस के घर पहुंच जाता और अपनी लच्छेदार बातों से उस ने मामी का दिल जीत लिया. लिहाजा एक दिन ऐसा आया, जब दोनों ने अपनी सीमाएं लांघ कर अपनी हसरतें पूरी कर लीं. यानी दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए.

घर में हरि सिंह की दादी हरदेई और पत्नी रानी ही रहती थीं. दादी मोहल्ले में औरतों से बतियाने चली जाती तो रानी घर में अकेली रह जाती. ओमकार इसी का फायदा उठा कर उस के घर पहुंच जाता. इस तरह काफी दिनों तक दोनों मौजमस्ती करते रहे.

जाहिर है, अवैध संबंध छिपाए नहीं छिपते. मोहल्ले की औरतों को इस बात का शक हो गया कि ओमकार हरि सिंह की गैरमौजूदगी में ही उस के घर क्यों आता है, किसी तरह यह बात हरि सिंह के कानों तक पहुंच गई. इस से हरि सिंह का भी माथा ठनका. उस ने पत्नी से साफ कह दिया कि वह ओमकार से कह दे कि उस की गैरमौजूदगी में यहां कतई ना आए.

इस के बाद भी ओमकार ने हरि सिंह के घर आना बंद नहीं किया. यह जानकर हरि सिंह ने ओमकार से साफ कह दिया कि वह उस के घर न आया करे. इस के अलावा उस ने पत्नी को भी खूब खरीखोटी सुनाई. आखिर ओमकार ने हरि सिंह के यहां आनाजाना बंद कर दिया. हरि सिंह की सख्ती के बाद रानी और ओमकार की मुलाकातें नहीं हो पा रही थीं. दोनों ही बहुत परेशान थे. ऐसे में दोनों को हरि सिंह अपनी राह का कांटा दिखाई देने लगा.

एक दिन किसी तरह मौका मिलने पर रानी ने ओमकार से मुलाकात की. उस ने ओमकार से कहा, ‘‘हरि को हमारे संबंधों की जानकारी हो चुकी है. उस ने मेरे ऊपर जो सख्ती की है, उस हालत में मैं नहीं रह सकती. मुझे तुम इस तनावभरी जिंदगी से निकालो. किसी तरह हरि को ठिकाने लगा दो. इस के बाद ही हम लोग चैन से रह सकते हैं.’’

उस की बातों में आ कर ओमकार हरि सिंह की हत्या करने के लिए तैयार हो गया.

26 सितंबर, 2016 को हरि सिंह की दादी हरदेई ने शाम का खाना बनाने के बाद उस से खाने को कहा. हरि सिंह की पत्नी रानी 2 दिन पहले अपने मायके चली गई थी, इसलिए खाना दादी ने बनाया था. हरि सिंह खाना खाने के लिए बैठा ही था कि उस के मोबाइल पर ओमकार का फोन आया. वह ओमकार की काल रिसीव करना नहीं चाह रहा था, लेकिन उस ने सोचा कि हो सकता है, कोई खास बात हो जो वह फोन कर रहा हो.

यही सोच कर उस ने फोन उठाया तो ओमकार बोला, ‘‘मामा, तुम्हारे लिए एक अच्छी खबर है. मेरे एक मिलने वाले का मकान बनना है. बड़ी पार्टी है. ऐसा करते हैं, दोनों मिल कर मकान का ठेका ले लेते हैं. पैसे मैं लगाऊंगा. पार्टी से आज ही बात करनी है. अगर आज बात नहीं हुई तो वह पार्टी किसी दूसरे ठेकेदार के पास चली जाएगी. तुम जल्दी चले आओ, मैं बाहर सड़क पर इंतजार कर रहा हूं. अगर बात बन गई तो पार्टी से आज ही थोड़ाबहुत एडवांस ले लेंगे.’’

हरि सिंह लालच में आ गया. वह दादी से यह कह कर घर से निकल गया कि थोड़ी देर में लौट कर खाना खाएगा. जब वह सड़क पर आया तो वहां मोटरसाइकिल लिए ओमकार खड़ा था. हरि सिंह को देखते ही वह बोला, ‘‘मामा, जल्दी से कस्बा सिरसी चलो.’’

हरि सिंह इस के लिए राजी हो गया. वह ओमकार सिंह की मोटरसाइकिल पर बैठ गया. रास्ते में ओमकार सिंह ने बताया कि जिस पार्टी से बात करनी है, वह सिरसी कस्बे की पुलिस चौकी के सामने खड़ी है. थोड़ी देर में दोनों सिरसी पहुंच गए. वहां जा कर देखा तो पार्टी नहीं मिली. ओमकार सिंह ने किसी को फोन किया, फिर बताया कि पार्टी किसी जरूरी काम से संभल चली गई है. उस ने यहीं इंतजार करने को कहा है.

सिरसी से संभल की दूरी करीब 10 किलोमीटर है. कुछ देर दोनों वहीं खड़े इंतजार करते रहे. तभी ओमकार ने हरि सिंह से कहा कि तुम अपने घर फोन कर लो कि देर से लौटोगे. इस पर हरि सिंह ने बताया कि घर पर फोन नहीं है. फोन तो उसी के पास है. जब वहां खड़ेखड़े काफी देर हो गई और संभल से पार्टी भी नहीं आई तो हरि सिंह बोला, ‘‘चलो, कल बात कर लेंगे.’’

ओमकार ने कहा कि चलो जब यहां तक आए हैं तो एकदो पैग लगा लें. हो सकता है जब तक हम यह काम करें, तब तक पार्टी आ जाए. इतना कहने के बाद ओमकार शराब की दुकान से एक बोतल खरीद लाया. पास ही अंडे के ठेले से गिलास ले कर दोनों ने शराब पी. जो थोड़ी शराब बोतल में बची थी, वह ओमकार ने अपनी बाइक की डिक्की में रख ली और गिलास भी रख लिए.

शराब पीने के बाद ओमकार ने कहा, ‘‘देखो मामाजी, तुम्हारे घर वाले इंतजार कर रहे होंगे और मेरे भी. हो सकता है पार्टी को कोई जरूरी काम आ गया हो, इसलिए अब सुबह उस से बात कर लेंगे. मैं ऐसा करता हूं कि पहले तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ देता हूं, उस के बाद अपने घर चला जाऊंगा.’’

इस के बाद हरि सिंह उस की बाइक के पीछे बैठ गया. कुछ दूर चल कर ओमकार ने सड़क किनारे बसे राजस्थानी खानाबदोशों की झुग्गी के पास अपनी बाइक रोक दी.  खानाबदोश लोहे के सामान बना कर बेचते थे. उन से उस ने 80 रुपए में एक गंडासा खरीदा. हरि सिंह ने उस से पूछा कि वह इस का क्या करेगा तो उस ने बताया कि घर के आसपास काफी जंगली पौधे उग आए हैं, उन्हें काटेगा. वह गंडासा उस ने बाइक की डिक्की में रख लिया.

हरि सिंह उस की योजना से अनभिज्ञ था. उसे क्या पता था कि वह गंडासा जंगली पौधे काटने के लिए नहीं, बल्कि उस की हत्या के लिए खरीदा है. बाइक जब हरि सिंह के गांव के नजदीक पहुंची तो ओमकार ने कहा, ‘‘मामा, अभी थोड़ी शराब बची है. अगर मैं इसे घर ले जाऊंगा तो घर वाले फेंक देंगे. क्योंकि वे लोग शराब से बहुत नफरत करते हैं और जब यह फेंकी जाएगी तो मुझे बहुत दुख होगा. ऐसा करते हैं कि एकएक पैग और ले लेते हैं.’’

हरि सिंह ओमकार की बात को टाल नहीं सका. दोनों जिस जगह खड़े हो कर बातें कर रहे थे, उन्होंने वहां बैठ कर शराब पीना ठीक नहीं समझा. लिहाजा वे वहां से कुछ दूर चले गए. फिर सड़क की साइड में बैठ कर उन्होंने शराब पी.

हरि सिंह एक तो पहले से ही ज्यादा पिए हुए था. 2 पैग और लगाने के बाद उसे ज्यादा नशा हो गया, जिस से वह लड़खड़ाने लगा. तभी ओमकार ने बाइक संभालते हुए कहा कि यह स्टार्ट नहीं हो रही है, थोड़ा धक्का लगा दे. बाइक गियर में थी, इसलिए आगे नहीं बढ़ सकी. इस पर ओमकार ने गाड़ी स्टैंड पर खड़ी कर के हरि सिंह से कहा कि वह ब्रेक दबाए. नशे में झूमते हुए हरि सिंह ने झुक कर दोनों हाथों से ब्रेक दबाए, ठीक उसी समय ओमकार ने बाइक की डिक्की से गंडासा निकाल कर उस की गरदन पर ताबड़तोड़ प्रहार करने शुरू कर दिए.

नशे की हालत में हरि सिंह को संभलने तक का मौका नहीं मिला. वह निढाल हो कर नीचे गिर पड़ा. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई. ओमकार सिंह ने उसे हिलाडुला कर देखा तो वह मर चुका था. वह वहां से अपने घर चला गया. उस ने गांव बारी भमरौआ पहुंच कर रानी को हरि सिंह की हत्या की खबर दे दी. उस ने उस से कह दिया कि जब उसे हरि सिंह की हत्या की खबर मिले तो वह रोने का नाटक करे, जिस से किसी को शक न हो.

पुलिस ने ओमकार से पूछताछ के बाद रानी को भी गिरफ्तार कर लिया. उस ने भी स्वीकार कर लिया कि पति की हत्या की साजिश में वह भी शामिल थी. ओमकार की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त गंडासा भी बरामद कर लिया. इस के बाद दोनों को 28 सितंबर, 2016 को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया. इस मामले की तफ्तीश थानाप्रभारी राजेश सोलंकी कर रहे हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

डांसर के इश्क में : लुट गए दरोगा जी

मैक्स बीयर बार में सैक्स रैकेट चलने की सूचना मिलते ही नौदर्न टाउन थाने के सबइंस्पैक्टर भीमा सिंह ने अपने दलबल के साथ वहां छापा मारा. वहां किसी शख्स के जन्मदिन का सैलिब्रेशन हो रहा था. खचाखच भरे हाल में सिगरेट, शराब और तेज परफ्यूम की मिलीजुली गंध फैली हुई थी. घूमते रंगीन बल्बों की रोशनी में अधनंगी बार डांसरों के साथ भौंड़े डांस करते मर्द गदर सा मचाए हुए थे. सब इंस्पैक्टर भीमा सिंह हाल में घुसा और चारों ओर एक नजर फेरते हुए तेजी से दहाड़ा, ‘‘खबरदार… कोई अपनी जगह से नहीं हिलेगा. बंद करो यह तमाशा और बत्तियां जलाओ.’’

तुरंत बार में चारों ओर रोशनी बिखर गई. सबकुछ साफसाफ नजर आने लगा. सब इंस्पैक्टर भीमा सिंह एक बार डांसर के पास पहुंचा और उसे ऊपर से नीचे तक देखते हुए एक जोरदार तमाचा उस के गाल पर मारा. वह बार डांसर गिर ही पड़ती कि भीमा सिंह ने उसे बांहों का सहारा दे कर थाम लिया और बार मालिक को थाने में मिलने का आदेश देते हुए वह उस बार डांसर को अपने साथ ले कर बाहर निकल गया. भीमा सिंह ने सोचा कि उस लड़की को थाने में ले जा कर बंद कर दे, फिर कुछ सोच कर वह उसे अपने घर ले आया. उस रात वह बार डांसर नशे में चूर भीमा सिंह के बिस्तर पर ऐसी सोई, जैसे कई दिनों से न सोई हो.

दूसरे दिन भीमा सिंह ने उसे नींद से जगाया और गरमागरम चाय पीने को दी. उस ने चालाक हिरनी की तरह बिस्तर पर पड़ेपड़े अपने चारों ओर नजर फेरी. अपनेआप को महफूज जान उसे तसल्ली हुई. उस ने कनखियों से सामने खड़े उस आदमी को देखा, जो उसे यहां उठा लाया था. भीमा सिंह उस बार डांसर से पुलिसिया अंदाज में पेश हुआ, तो वह सहम गई. मगर जब वह थोड़ा मुसकराया, तो उस का डर जाता रहा और खुल कर अपने बारे में सबकुछ सचसच बताने लगी कि वह जामपुर की रहने वाली है.

वह पढ़ीलिखी और अच्छे घर की लड़की है. उस के पिता ने उस की बहनों की शादी अच्छे घरों में की है. वह थोड़ी सांवली थी, इसलिए उस की अनदेखी कर दी. इस से दुखी हो कर वह एक लड़के के साथ घर से भाग गई. रास्ते में उस लड़के ने भी धोखा देते हुए उसे किसी और के हाथ बेचने की कोशिश की. वह किसी तरह से उस के चंगुल से भाग कर यहां आ गई और पेट पालने के लिए बार में डांस करने लगी.

भीमा सिंह बोला, ‘‘तुम्हारे जैसी लड़कियां जब रंगे हाथ पकड़ी जाती हैं, तो यही बोलती हैं कि वे बेकुसूर हैं.

‘‘ठीक है, तुम्हारा केस थाने तक नहीं जाएगा. बस, तुम्हें मेरा एक काम करना होगा. मैं तुम्हारा खयाल रखूंगा.’’

‘‘मुझे क्या करना होगा ’’ उस बार डांसर के मासूम चेहरे पर चालाकी के भाव तैरने लगे थे.

भीमा सिंह ने उसे घूरते हुए कहा, ‘‘तुम मेरे लिए मुखबिरी करोगी.’’ उस बार डांसर को अपने बचाव का कोई उपाय नहीं दिखा. वह बेचारगी का भाव लिए एकटक भीमा सिंह की ओर देखने लगी. भीमा सिंह एक दबंग व कांइयां पुलिस अफसर था. रिश्वत लिए बिना वह कोई काम नहीं करता था. जल्दी से वह किसी पर यकीन नहीं करता था. भ्रष्टाचार की बहती गंगा में वह पूरा डूबा हुआ था.

लड़कियां उस की कमजोरी थीं. शराब के नशे में डूब कर औरतों के जिस्म के साथ खिलवाड़ करना उस की आदतों में शुमार था. भीमा सिंह पकड़ी गई लड़कियों से मुखबिरी का काम कराता था. लड़कियां भेज कर वह मुरगा फंसाता था. पकड़े गए अपराधियों से केस रफादफा करने के एवज में उन से हजारों रुपए वसूलता था. शराब के नशे में कभीकभी तो वह बाजारू औरतों को घर पर भी लाने लगा था, जिस के चलते उस की पत्नी उसे छोड़ कर मायके में रहने लगी थी.

इस बार डांसर को भी भीमा सिंह यही सोच कर लाया था कि उसे इस्तेमाल कर के छोड़ देगा, पर इस लड़की ने न जाने कौन सा जादू किया, जो वह अंदर से पिघला जा रहा था.

भीमा सिंह ने पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है ’’

‘‘रेशमा.’’

‘‘जानती हो, मैं तुम्हें यहां क्यों लाया हूं ’’

‘‘जी, नहीं.’’

‘‘क्योंकि थाने में औरतों की इज्जत नहीं होती. तुम्हारी मोनालिसा सी सूरत देख कर मुझे तुम पर तरस आ गया है. मैं ने जितनी लड़कियों को अब तक देखा, उन में एक सैक्स अपील दिखी और मैं ने उन से भरपूर मजा उठाया. मगर तुम्हें देख कर…’’

भीमा सिंह की बातों से अब तक चालाक रेशमा भांप चुकी थी कि यह आदमी अच्छी नौकरी करता है, मगर स्वभाव से लंपट है, मालदार भी है, अगर इसे साध लिया जाए… रेशमा ने भोली बनने का नाटक करते हुए एक चाल चली.

‘‘मैं क्या सचमुच मोनालिसा सी दिखती हूं ’’ रेशमा ने पूछा.

‘‘तभी तो मैं तुम्हे थाने न ले जा कर यहां ले आया हूं.’’

रेशमा को ऐसे ही मर्दों की तलाश थी. उस ने मन ही मन एक योजना तैयार कर ली. एक तिरछी नजर भीमा सिंह की ओर फेंकी और मचल कर खड़ी होते हुए बोली, ‘‘ठीक है, तो अब मैं चलती हूं सर.’’ ‘‘तुम जैसी खूबसूरत लड़की को गिरफ्त में लेने के बाद कौन बेवकूफ छोड़ना चाहेगा. तुम जब तक चाहो, यहां रह सकती हो. वैसे भी मेरा दिल तुम पर आ गया है,’’ भीमा सिंह बोला.

‘‘नहींनहीं, मैं चाहती हूं कि आप अच्छी तरह से सोच लें. मैं बार डांसर हूं और क्या आप को मुझ पर भरोसा है ’’

‘‘मैं ने काफी औरतों को देखा है, लेकिन न जाने तुम में क्या ऐसी कशिश है, जो मुझे बारबार तुम्हारी तरफ खींच रही है. तुम्हें विश्वास न हो, तो फिर जा सकती हो.’’ रेशमा एक शातिर खिलाड़ी थी. वह तो यही चाहती थी, लेकिन वह हांड़ी को थोड़ा और ठोंकबजा लेना चाहती थी, ताकि हांड़ी में माल भर जाने के बाद ले जाते समय कहीं टूट न जाए.

वह एकाएक पूछ बैठी, ‘‘क्या आप मुझे अपनी बीवी बना सकते हैं ’’

‘‘हां, हां, क्यों नहीं. मैं नहीं चाहता कि मैं जिसे चाहूं, वह कहीं और जा कर नौकरी करे. आज से यह घर तुम्हारा हुआ,’’ कह कर भीमा सिंह ने घर की चाबी एक झटके में रेशमा की ओर उछाल दी. रेशमा को खजाने की चाबी के साथ सैयां भी कोतवाल मिल गया था. उस के दोनों हाथ में लड्डू था. वह रानी बन कर पुलिस वाले के घर में रहने लगी. भीमा सिंह एक फरेबी के जाल में फंस चुका था.

अगले दिन रेशमा ने भीमा सिंह को फिर परखना चाहा कि कहीं वह उस के साथ केवल ऐशमौज ही करना चाहता है या फिर वाकई इस मसले पर गंभीर है. कहीं वह उसे मसल कर छोड़ न दे. फिर तो उस की बनीबनाई योजना मिट्टी में मिल जाएगी. रेशमा घडि़याली आंसू बहाते हुए कहने लगी, ‘‘मैं भटक कर गलत रास्ते पर चल पड़ी थी. मैं जानती थी कि जो मैं कर रही हूं, वह गलत है, मगर कर भी क्या सकती थी. घर से भागी हुई हूं न. और तो और मेरे पापा ने ही मेरी अनदेखी कर दी, तो मैं क्या कर सकती थी. मैं घर नहीं जाना चाहती. मैं अपनी जिंदगी से हारी हुई हूं.’’

‘‘रेशमा, तुम अपने रास्ते से भटक कर जिस दलदल की ओर जा रही थी, वहां से निकलना नामुमकिन है. तुम ने अपने मन की नहीं सुनी और गलत जगह फंस गई. खैर, मैं तुम्हें बचा लूंगा, पर तुम्हें मेरे दिल की रानी बनना होगा,’’ भीमा सिंह उसे समझाते हुए बोला. ‘‘तुम मुझे भले ही कितना चाहते हो, लेकिन मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती. मैं बार डांसर बन कर ही अपनी बाकी की जिंदगी काट लूंगी. तुम मेरे लिए अपनी जिंदगी बरबाद मत करो. तुम एक बड़े अफसर हो और मैं बार डांसर. मुझे भूल जाओ,’’ रेशमा ने अंगड़ाई लेते हुए अपने नैनों के बाण ऐसे चलाए कि भीमा सिंह घायल हुए बिना नहीं रह सका.

‘‘यह तुम क्या कह रही हो रेशमा  अगर भूलना ही होता, तो मैं तुम्हें उस बार से उठा कर नहीं लाता. तुम ने तो मेरे दिल में प्यार की लौ जलाई है.’’ रेशमा के मन में तो कुछ और ही खिचड़ी पक रही थी. उस ने भीमा सिंह को अपने रूपजाल में इस कदर फांस लिया था कि वह आंख मूंद कर उस पर भरोसा करने लगा था. भीमा सिंह के बाहर जाने के बाद रेशमा ने पूरे घर को छान मारा कि कहां क्या रखा है. वह उस के पैसे से अपने लिए कीमती सामान खरीदती थी.

भीमा सिंह को कोई शक न हो, इस के लिए वह पूरे घर को साफसुथरा रखने की कोशिश करती थी. भीमा सिंह को भरोसे में ले कर रेशमा अपना काम कर चुकी थी. अब भागने की तरकीब लगाते हुए एक शाम उस ने भीमा सिंह की बांहों में झूलते हुए कहा, ‘‘एक अच्छे पति के रूप में तुम मिले, इस से अच्छा और क्या हो सकता है. मैं तो जिंदगीभर तुम्हारी बन कर रहना चाहती हूं, लेकिन कुछ दिनों से मुझे अपने घर की बहुत याद आ रही है.

‘‘मैं तुम्हें भी अपने साथ ले जाना चाहती थी, मगर मेरे परिवार वाले बहुत ही अडि़यल हैं. वे इतनी जल्दी तुम्हें अपनाएंगे नहीं.

‘‘मैं चाहती हूं कि पहले मैं वहां अकेली जाऊं. जब वे मान जाएंगे, तब उन लोगों को सरप्राइज देने के लिए मैं तुम्हें खबर करूंगी. तुम गाड़ी पकड़ कर आ जाना.

‘‘ड्रैसिंग टेबल पर एक डायरी रखी हुई है. उस में मेरे घर का पता व फोन नंबर लिखा हुआ है. बोलो, जब मैं तुम्हें फोन करूंगी, तब तुम आओगे न ’’

‘‘क्यों नहीं जानेमन, अब तुम ही मेरी रानी हो. तुम जैसा ठीक समझो करो. जब तुम कहोगी, मैं छुट्टी ले कर चला आऊंगा,’’ भीमा सिंह बोला. रेश्मा चली गई. हफ्ते, महीने बीत गए, मगर न उस का कोई फोन आया और न ही संदेश. भीमा सिंह ने जब उस के दिए नंबर पर फोन मिलाया, तो गलत नंबर बताने लगा.

भीमा सिंह ने जब अलमारी खोली, तो रुपएपैसे, सोनेचांदी के गहने वगैरह सब गायब थे. घबराहट में वह रेशमा के दिए पते पर उसे खोजते हुए पहुंचा, तो इस नाम की कोई लड़की व उस का परिवार वहां नहीं मिला. भीमा सिंह वापस घर आया, फिर से अलमारी खोली. देखा तो वहां एक छोटा सा परचा रखा मिला, जिस में लिखा था, ‘मुझे खोजने की कोशिश मत करना. तुम्हारे सारे पैसे और गहने मैं ने पहले ही गायब कर दिए हैं.

‘मैं जानती हूं कि तुम पुलिस में नौकरी करते हो. रिपोर्ट दर्ज कराओगे, तो खुद ही फंसोगे कि तुम्हारे पास इतने पैसे कहां से आए  तुम ने पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी कब की ’ भीमा सिंह हाथ मलता रह गया.

बीवी की आशनाई लायी बर्बादी – भाग 1

उत्तर प्रदेश के हरदोई-कानपुर मार्ग पर हरदोई जिला मुख्यालय से 27 किलोमीटर की दूरी पर एक  कस्बा है बिलग्राम. यहां हरदोई का थाना कोतवाली भी है. इसी कोतवाली क्षेत्र में एक गांव है हैबतपुर. यह गांव बिलग्राम से 4 किलोमीटर पहले ही मुख्य मार्ग पर स्थित है. इसी गांव में रामभजन सक्सेना का परिवार रहता था. मेहनतमजदूरी कर के गुजरबसर करने वाले रामभजन के परिवार में पत्नी सुमित्रा देवी के अलावा 4 बेटे और 4 बेटियां थीं.

रामभजन ने अपने दूसरे नंबर के बेटे रामचंद्र का विवाह लगभग 12 साल पहले हरदोई के ही थानाकोतवाली शहर के अंतर्गत आने वाले गांव पोखरी की रहने वाली रमाकांती से कर दिया था. उस के पिता गंगाराम की मौत हो चुकी थी. उस के 6 भाई और 2 बहनें थीं. भाईबहनों में वह सब से छोटी थी. उस के भाइयों ने मिलजुल कर उस की शादी रामचंद्र से कर दी थी.

रमाकांती ससुराल आई तो उसे ससुराल में रामचंद्र के साथ गृहस्थी बसाने में कोई परेशानी नहीं हुई, क्योंकि ससुराल में सभी अलगअलग अपनेअपने घरों में रहते थे. रामचंद्र भी अन्य भाइयों की तरह मेहनतमजदूरी कर के गुजरबसर कर रहा था. इसलिए रमाकांती के लिए जैसे हालात मायके में थे, वैसे ही ससुराल में भी मिले. रमाकांती एक के बाद एक कर के तीन बेटियों और 2 बेटों यानी 5 बच्चों की मां बनी. इस समय उस की बड़ी बेटी 10 साल की है तो छोटा बेटा 1 साल का.

रामचंद्र का जिस हिसाब से परिवार बढ़ा, उस हिसाब से आमदनी नहीं बढ़ पाई, इसलिए उसे गुजरबसर में परेशानी होने लगी. गांव में मेहनतमजदूरी से इतना पैसा नहीं मिल पाता था कि वह परिवार का खर्चा उठा सकता. जब वह हर तरह से कोशिश कर के हार गया तो उस ने परिवार सहित कहीं बाहर जा कर काम करने का विचार किया.

उस ने जानपहचान वालों से बात की कि वह ऐसे कौन से शहर जाए, जहां उसे आसानी से काम मिल जाए. उस के गांव के कुछ लोग अंबाला में रहते थे. उन्होंने उसे अंबाला चलने की सलाह दी तो वह उन्हीं के साथ पत्नी और बच्चों को ले कर अंबाला चला गया.

वहां उसे लालू मंडी स्थित सिलाई का धागा बनाने वाली एक फैक्ट्री में नौकरी मिल गई, जहां उसे 3 सौ रुपए रोज मिलते थे. पास की ही एक अन्य सिलाई धागा फैक्ट्री में उस ने रमाकांती को भी नौकरी दिला दी. फैक्ट्री के पास ही उस ने एक मकान में किराए का एक कमरा ले लिया और उसी में पत्नीबच्चों के साथ रहने लगा. वह मकान चंडीगढ़ के रहने वाले किसी सरदार का था. मकान काफी बड़ा था, जिस में तमाम किराएदार रहते थे. अंबाला में पतिपत्नी इतना कमा लेते थे कि उन की आसानी से गुजरबसर होने लगी.

रमाकांती सुबह से दोपहर तक की शिफ्ट में काम करती थी. इस के बाद वह कमरे पर आ जाती और बच्चों के साथ रहती. जबकि रामचंद्र 12 घंटे की ड्यूटी करता था. वह सुबह जल्दी निकलता तो घर आने में रात के 9 बज जाते थे.

कोई भी आदमी सुबह से ले कर देर रात तक मेहनत करेगा तो जाहिर है, वह थक कर चूर हो जाएगा. रामचंद्र भी जब घर लौट कर आता तो उस का भी वही हाल होता था. घर पहुंच कर वह खाना खाता और चारपाई पर लेट कर खर्राटे भरने लगता. जबकि 5 बच्चों की मां बनने के बाद भी रमाकांती की हसरतें जवान थीं. उस का मन हर रात पति से मिलने को होता, जबकि रामचंद्र की थकान उस की इच्छाओं का गला घोंट देती थी. वह हर रात पति की बांहों में गुजारना चाहती, जबकि पति के सो जाने की वजह से यह संभव नहीं हो पाता था.

जिस मकान में रामचंद्र परिवार के साथ किराए पर रहता था, उसी मकान में सूरज भी एक कमरा किराए पर ले कर रह रहा था.  बिहार के रहने वाले 25 वर्षीय सूरज की अभी शादी नहीं हुई थी. वह भी धागा बनाने वाली उसी फैक्ट्री में नौकरी करता था, जिस में रामचंद्र करता था. एक ही मकान में रहने की वजह से सूरज और रमाकांती में परिचय हो गया था. जब भी दोनों का आमनासामना होता, एकदूसरे को देख कर मुसकरा देते. धीरेधीरे दोनों में बातचीत भी होने लगी.

सूरज कुंवारा था, इसलिए उस का महिलाओं की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक ही था. इसी आकर्षण की वजह से 5 बच्चों की मां रमाकांती के शारीरिक कसाव और आंखों की कशिश में वह ऐसा डूबा कि उस के आगे उसे बाकी की सारी औरतें बेकार लगने लगीं. वह जब भी उसे देखता उस की कामनाएं अंगड़ाइयां लेने लगतीं. रमाकांती पर उस का मन डोला तो वह उसे अपनी कल्पनाओं की दुल्हन मान कर उस के बारे में न जाने क्याक्या सोचने लगा.

रमाकांती पर दिल आते ही सूरज उस पर डोरे डालने लगा. जल्दी ही रमाकांती को भी उस के मन की बात पता चल गई. उसे एक ऐसे मर्द की चाहत थी भी, जो रामचंद्र की जगह ले सके. इसलिए उस का भी झुकाव सूरज की ओर हो गया. जब सूरज ने रमाकांती की आंखों में प्यास देखी तो वह उस के आगेपीछे चक्कर लगाने लगा.

सूरज रामचंद्र के घर भी आनेजाने लगा. वह रमाकांती को भाभी कहता था. इसी रिश्ते की आड़ में वह हंसीमजाक भी करने लगा. इसी हंसीमजाक में कभीकभी वह मन की बात भी कह जाता.

यादगार केस : दुआ को मिला इन्साफ – भाग 1

अतिरिक्त जिला जज आफाक अहमद ने सामने बैठे डीएसपी खावर रंधावा पर गहरी नजर  डाल कर कहा, ‘‘मैं चाहता हूं कि तुम्हारा आखिरी केस यादगार बन जाए, इसलिए खलील मंगी को कल जेल से अदालत लाने और फैसले के बाद हिफाजत से उस के घर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी मैं तुम्हें सौंपना चाहता हूं.’’

सामने बैठे डीएसपी खावर रंधावा ने पहलू बदलते हुए कहा, ‘‘इस में यादगार बनने वाली क्या बात है? यह तो मेरा फर्ज है, जिसे मैं और मेरे साथी बखूबी निभाएंगे.’’

जज आफाक अहमद और डीएसपी खावर रंधावा पुराने दोस्त तो थे ही, समधी बन जाने के बाद उन की यह दोस्ती रिश्तेदारी में भी बदल गई थी.

‘‘मैं ने मंगी को रिहा करने का फैसला कर लिया है.’’ आफाक अहमद ने यह बात कही तो डीएसपी रंधावा को झटका सा लगा. हैरानी से वह अपने बचपन के दोस्त का चेहरा देखते रह गए. जबकि वह एकदम निश्चिंत नजर आ रहे थे. जिस आदमी के बारे में मीडिया और कानून के जानकार ही नहीं, पूरे देश में मशहूर था कि उन्होंने आज तक किसी भी गुनहगार को नहीं छोड़ा, शायद उन्होंने जिंदगी का मकसद ही गुनाहगार को सजा देना बना लिया था, आज वही शख्स एक घिनौने और बेरहम अपराधी को छोड़ने की बात कर रहा था.

उन्होंने कहा, ‘‘तुम उस घिनौने कातिल को छोड़ दोगे, जिस ने 15 साल की एक मासूम बच्ची को अपनी हवस का शिकार बना कर बेरहमी से मार डाला था. भई, मुझे तो यकीन नहीं हो रहा है कि तुम ऐसा काम करोगे. जिस आदमी की ईमानदारी और फर्ज अदायगी पर लोग आंख मूंद कर यकीन करते हों, वह भला ऐसा काम कैसे कर सकता है?’’

रंधावा की बातों में शिकायत थी. आफाक अहमद निराशा भरे अंदाज में अपना सिर कुरसी की पुश्त से टिकाते हुए धीरे से बोले, ‘‘जिस तरह मेरे आदेश पर तुम उस की हिफाजत करने के लिए मजबूर हो, उसी तरह कानूनी मजबूरियों की वजह से मैं भी उसे रिहा करने को मजबूर हूं.’’

रंधावा होंठ भींचे उन्हें देखते रहे तो आफाक अहमद ने आगे कहा, ‘‘तुम अदालती काररवाई के बारे में तो जानते ही हो. चश्मदीद गवाहों ने अपने बयान बदल दिए हैं, मैडिकल रिपोर्ट भी पैसे के बल पर बदलवा दी गई है, केवल घटना के आधार पर तो सजा नहीं दी जा सकती. फिर कोई मजबूत पक्ष भी नहीं है, इसलिए मुझे मजबूरन कल उसे रिहा करना होगा.’’

रंधावा के चेहरे पर निराशा के भाव साफ झलकने लगे. दोस्त वाकई बेबस था. मजबूत एफआईआर के साथ अगर गवाह अपने बयानों पर टिके रहते तो दुनिया की कोई भी ताकत खलील मंगी को फांसी पर चढ़ने से नहीं रोक सकती थी.

आफाक अहमद के कमरे में खामोशी छा गई. उस समय दीवार पर लगी आधा दरजन घडि़यों की टिकटिक की आवाज ही आ रही थी जो उन के कमरे की दीवारों पर चारों ओर लगी थीं. तरहतरह की नईपुरानी घडि़यों को जमा करना और उन्हें दीवारों पर लगाना आफाक अहमद का शौक था. रंधावा ने अचानक कहा, ‘‘फिर तो खलील के हाथों मारी गई दुआ के लिए दुआ ही की जा सकती है. उस का भाई शाद अली, जो कैप्टन था, अच्छा होगा वह अपने दावे में कामयाब हो जाए.’’

आफाक अहमद ने भी दुखी लहजे में कहा, ‘‘खुदा करे, वह अपने मकसद में कामयाब हो.’’

फौज में कैप्टन शाद अली ने 2 बार हिरासत के दौरान खलील मंगी पर कातिलाना हमला किया था. लेकिन वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सका था. उस के बाद वह एकदम से गायब हो गया था.

इलेक्ट्रौनिक मीडिया के जरिए उस ने दावा किया था कि अगर खलील मंगी को अदालत से रिहा किया तो वह अदालत में जज के सामने ही उसे जान से मार देगा. इस तरह की बातों को उछालने में मीडिया को वैसे भी बड़ा मजा आता है. इसलिए न्यूज चैनलों ने इसे बारबार दिखा कर लोगों में एक अजीब तरह का एक्साइटमेंट पैदा कर दिया था. इसीलिए यह फैसला मीडिया, अवाम और कानून के लिए एक चुनौती बन गया था.

कमरे की सभी घडि़यों ने 9 बजने की घोषणा की तो तरहतरह के म्यूजिक ने कमरे के सन्नाटे को भंग कर दिया. चंद पलों के लिए आफाक अहमद ने अपनी आंखें बंद कर लीं. ये आवाजें उन्हें बड़ा सुकून देती थीं. आवाजों के बंद होने पर उन्होंने कहा, ‘‘दोस्त हमें अपना फर्ज अदा करना है और उस सिरफिरे कैप्टन से मंगी को बचाना है. अब देखना है कि आखिर कौन कामयाब होता है?’’

रंधावा ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘मेरी सारी दुआएं उस सिरफिरे कैप्टन के साथ हैं. खुदा करे वह अपने मकसद में कामयाब हो जाए. दिल तो चाहता है कि मैं ही उस की कोई मदद कर दूं. लेकिन अगले हफ्ते मैं खुद ही रिटायर हो रहा हूं. इसलिए अपने बेदाग कैरियर पर मैं कोई धब्बा नहीं लगने देना चाहता. इस इमेज को बनाने में मैं ने पूरी उम्र लगा दी है, अब उसे दांव पर नहीं लगा सकता. फिर भी दुआ तो कर ही सकता हूं कि शाद अली उस जालिम कातिल को बरी होने के बाद खत्म कर दे.’’

रंधावा के लहजे में नफरत साफ झलक रही थी.

आफाक अहमद ने चिंतित स्वर में कहा, ‘‘डीएसपी रंधावा, इसीलिए मैं ने तुम्हें इस काम के लिए चुना है, क्योंकि मुझे यकीन है कि यह मामला तुम्हारे लिए यादगार होगा.’’

डीएसपी रंधावा ने रात को ही अपने तेजतर्रार साथी इंसपेक्टर गुलाम भट्टी के साथ मिल कर अगले दिन की सुरक्षा व्यवस्था की पूरी योजना बना डाली थी. अतिरिक्त पुलिस बल की भी व्यवस्था कर ली गई थी. खलील मंगी को बख्तरबंद गाड़ी से अदालत ले आने और ले जाने की व्यवस्था पहले से ही थी. सुरक्षा की पूरी योजना बना कर गुलाम भट्टी ने कहा, ‘‘सर, हम लोगों को अपना पूरा ध्यान अदालत के कमरे पर रखना होगा.’’

रंधावा ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘मुझे तो लगता है कि अदालत के कमरे में खलील मंगी को मौत के घाट उतारने वाली बात उस ने केवल हमें भटकाने के लिए कही है. कैप्टन अदालत के बाहर कहीं पर भी उस पर हमला कर सकता है.’’

‘‘फिर तो बख्तरबंद गाड़ी को हमें अदालत के अहाते के बजाय अदालत के कमरे तक ले जाना चाहिए.’’ गुलाम भ्टटी ने कहा.

अगले दिन खलील मंगी को बख्तरबंद गाड़ी से अदालत के कमरे तक लाया गया. और जज आफाक अहमद की मेज के दाईं तरफ बने मुल्जिमों के कटघरे में खड़ा किया गया. उस की आंखों में जीत की चमक साफ झलक रही थी. उसे पूरा यकीन था कि थोड़ी देर में उसे रिहा कर दिया जाएगा. उस ने ताजा शेव किया हुआ या और कौटन का सफेद सलवार कुरता पहने था.

                                                                                                                                           क्रमशः

विचित्र संयोग : चक्रव्यूह का भयंकर परिणाम – भाग 1

रविवार के सुबह सात बजे के लगभग धनवानों का इलाका सेक्टर-15ए अभी सोया पड़ा था. चारों ओर शांति फैली थी. वीआईपी इलाका होने के कारण यहां सवेरा यों भी जरा देर से उतरता है, क्योंकि यहां रात का आलम ही कुछ और होता है. चहलपहल थी तो सिर्फ सेक्टर-2 के पीछे के इलाके में. सवेरे 4 बजे से ही यहां मछलियों का बाजार लग जाता है. ट्रौली रिक्शे और टैंपो रुक रहे थे और उन के साथ ही मछलियों के ढेर लग रहे थे. मछलियां लाने के लिए यहां टैंपो और ट्रौली रिक्शों की लाइन लगी थी.

इसी बाजार के पास फाइन चिकन एंड मीट शौप है, जहां सवेरे 4 बजे से ही बकरों को काटने और उन्हें टांगने का काम शुरू हो जाता है. इस इलाके के लोग इसी दुकान से गोश्त खरीदना पसंद करते थे. सामने स्थित डीटीसी बस डिपो से बसें बाहर निकलने लगी थीं. डिपो के एक ओर नया बास गांव है, जिस में स्थानीय लोगों के मकान हैं. डिपो के सामने पुलिस चौकी है, जिस के बाहर 2-3 सिपाही बेंच पर बैठ कर गप्पें मार रहे थे और चौकी के अंदर बैठे सबइंसपेक्टर आशीष शर्मा झपकियां ले रहे थे.

गांव के पीछे के मयूरकुंज की अलकनंदा इमारत की पांचवी मंजिल के एक फ्लैट में एक सुखी जोड़ा रहता था. यह फ्लैट सेक्टर-62 की एक सौफ्टवेयर कंपनी में काम करने वाले धनंजय विश्वास का था. फ्लैट में धनंजय अपनी पत्नी रोहिणी के साथ रहते थे.

रोहिणी दिल्ली में पंजाब नेशनल बैंक में प्रोबेशनरी औफिसर थी. वह आगरा की रहने वाली थी. 2 वर्ष पूर्व धनंजय से उस का विवाह हुआ था. इस से पहले धनंजय दिल्ली में अपने मातापिता के साथ रहता था. विवाह के बाद उस के सासससुर ने यह फ्लैट खरीदवा दिया था. रोहिणी वाकई रोहिणी नक्षत्र के समान सुंदर थी. धनंजय और उस की जोड़ी खूब फबती थी.

धनंजय के औफिस का समय सवेरे 9 बजे से शाम 6 बजे तक था. वह औफिस अपनी कार से जाता था. लेकिन लौटने का उस का कोई समय निश्चित नहीं था. रोहिणी शाम साढ़े छह बजे तक घर लौट आती थी. इन हालात में पतिपत्नी शाम का खाना साथ ही खाया करते थे. हां, छुट्ïटी के दिनों दोनों मिल कर हसंतेखेलते खाना बनाते थे. धनंजय हर रविवार को सेक्टर-2 में लगने वाली मछली बाजार से मछलियां और फाइन चिकन एंड मीट शौप की दुकान से मीट लाता था.

पहली जून की सुबह 6 बजे फ्लैट की घंटी बजने पर दूध देने वाले गनपत से दूध ले कर धनंजय फटाफट तैयार हो कर मीट लेने के लिए निकल गया. रोहिणी को वह सोती छोड़ गया था. वह कार ले कर निकलने लगा तो चौकीदार ने हंसते हुए पूछा, “साहब, आज रविवार है न, मीट लेने जा रहे हो?”

धनंजय ने हंस कर कार आगे बढ़ा दी थी. फाइन चिकन एंड मीट शौप पर आ कर उस ने 2 किलोग्राम मीट और एक किलोग्राम कीमा लिया. इस के बाद उस ने रास्ते में मछली और नाश्ते के लिए अंडे, ब्रेड, मक्खन और 4 पैकेट सिगरेट लिए. लगभग साढ़े 7 बजे वह फ्लैट पर लौट आया. वाचमैन नीचे ही था, साफसफाई करने वाले अपने काम में लगे थे. ऊपर पहुंच कर उस ने ‘लैच की’ से दरवाजा खोला. दरवाजे के अंदर अखबार पड़ा था, जिसे नरेश पेपर वाला दरवाजे के नीचे से अंदर सरका गया था. अखबार उठाते हुए उस ने रोहिणी को आवाज लगाई, “उठो भई, मैं तो बाजार से लौट भी आया.”

धनंजय के फ्लैट में सुखसुविधा के सभी आधुनिक सामान मौजूद थे. उस ने डाइनिंग टेबल पर सारा सामान रख कर 2 बड़ी प्लेटें उठाईं. एक में उस ने गोश्त और दूसरे में मछली निकाली. फ्लैट के हौल में शानदार दरी बिछी थी और कीमती सोफे सजे थे. एक कोने में टीवी और डीवीडी प्लेयर रखा था. दूसरे कोने में शो केस के नीचे टेलीफोन रखा था, वहीं मेज पर लैपटौप था. पीछे की ओर गैलरी थी, जहां से दिल्ली की ओर जाने वाली सडक़ के साथसाथ दूर तक फैली हरियाली और नोएडा गेट दिखाई देता था.

इस हौल के बाईं ओर बैडरूम का दरवाजा था. बैडरूम में डबल बैड, गोदरेज की 2 अलमारियां और एक ड्रेसिंग टेबल था. बैडरूम से लग कर ही एक छोटा गलियारा था. गलियारे में ही टौयलेट और बाथरूम था. सारा सामान डाइनिंग टेबल पर रखने के बाद बैडरूम में घुसते ही धनंजय की चीख निकल गई, “रोहिणी?”

उस की सुंदर पत्नी, उसे जीजान से चाहने वाली जीवनसंगिनी, जो अभी रात में उस के सीने पर सिर रख कर सोई थी, जिसे वह सुबह की मीठी नींद में छोड़ कर गया था, रक्त से सराबोर बैड पर मरी पड़ी थी. रोहिणी के गले, सीने और पेट से उस वक्त भी खून रिस रहा था, जिस से सफेद बैडशीट लाल हो गई थी.

कुछ क्षणों बाद धनंजय रोहिणी का नाम ले कर चीखता हुआ बाहर की ओर भागा. उस के अड़ोसपड़ोस में 3 फ्लैट थे. दाईं ओर के 2 फ्लैटों में सक्सेना और मिश्रा तथा बाईं ओर के फ्लैट में रावत रहते थे. पागलों की सी अवस्था में धनंजय ने सक्सेना के फ्लैट की घंटी पर हाथ रखा तो हटाया ही नहीं. वह पड़ोसियों के नाम लेले कर चिल्ला रहा था.

कुछ क्षणों बाद तीनों पड़ोसी बाहर निकले. वे धनंजय की हालत देख कर दंग रह गए. धनंजय कांप रहा था. वह कुछ कहना चाहता था, पर उस के मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे. उस के कंधे पर हाथ रख कर सक्सेना ने पूछा, “क्या हुआ विश्वास?”

सक्सेना रिटायर्ड कर्नल थे. उन्होंने ही नहीं, मिश्रा और रावत ने भी किसी अनहोनी का अंदाजा लगा लिया था. धनंजय ने हकलाते हुए कहा, “रो…हि…णी.”

सक्सेना, उन का बेटा एवं बहू, मिश्रा और रावत उस के फ्लैट के अंदर पहुंचे. बैडरूम का हृदयविदारक दृश्य देख कर सक्सेना की बहू डर के मारे चीख पड़ी और उलटे पांव भागी. अपने आप को संभालते हुए सक्सेना ने कोतवाली पुलिस को फोन लगा कर घटना की सूचना दी. कोतवाली में उस समय ड्ïयूटी पर सबइंसपेक्टर दयाशंकर थे.

दयाशंकर ने मामला दर्ज कर के मामले की सूचना अधिकारियों को दी और खुद 2 सिपाही ले कर अलकनंदा के लिए निकल पड़े. उन के पहुंचते ही वहां के चौकीदार ने उन्हें सलाम किया. लोगों के बीच से जगह बनाते हुए दयाशंकर सीधे पांचवीं मंजिल पर पहुंचे. लोग सक्सेना के घर में जमा थे. धनंजय सोफे पर अपना सिर थामे बैठा था.

दयाशंकर के पहुंचते ही धनंजय उठ कर खड़ा हो गया. आगे बढ़ कर सक्सेना ने अपना परिचय दिया और धनंजय के फ्लैट की ओर इशारा किया. थोड़ी ही देर में फोरैंसिक टीम के सदस्य भी आ पहुंचे. इंसपेक्टर प्रकाश राय भी आ पहुंचे थे.

उन के वहां पहुंचते ही एक व्यक्ति सामने आया, “गुडमौर्निंग सर? आप ने मुझे पहचाना? मैं रिटायर्ड इंसपेक्टर खन्ना. इन फ्लैटों की सुरक्षा व्यवस्था मेरे जिम्मे है. सोसाइटी के सेक्रैटरी ने फोन पर मुझे सूचना दी. दयाशंकर साहब से मुझे पता चला कि आप आ रहे हैं.”

प्रकाश राय को खन्ना का चेहरा जानापहचाना लगा. मगर उन्हें याद नहीं आया कि वह उस से कहां मिले थे. सीधे ऊपर न जा कर उन्होंने इमारत को गौर से देखना शुरू किया. इमारत में ‘ए’ और ‘बी’ 2 विंग थे. दोनों विंग के लिए अलगअलग सीढिय़ां थीं. धनंजय ‘ए’ विंग में रहता था. इमारत के गेट पर ही वाचमैन के लिए एक छोटी सी केबिन थी, जिस में से आनेजाने वाला हर व्यक्ति उसे दिखाई देता था.

कंजूस पिता की ज़िद का नतीजा – भाग 1

पारसराम पुंज सेना के कैप्टन पद से रिटायर जरूर हो गए थे लेकिन लोगों पर हुकुम और डिक्टेटरशिप चलाने की उन की  आदत नहीं गई थी. सेवानिवृत्त के बाद यह बात उन की समझ में नहीं आई थी कि सेना और समाज के नियमों में जमीनआसमान का अंतर होता है. अपने घर वालों के साथ मोहल्ले वालों पर भी वह अपनी हिटलरशाही दिखाते थे. घर वालों की बात दूसरी थी, लेकिन मोहल्ले वाले या और दूसरे लोग उन के गुलाम तो थे नहीं जो उन की डिक्टेटरशिप सहते. लिहाजा इसी सब को ले कर मोहल्ले वालों से उन की अकसर कहासुनी होती रहती थी. उन की पत्नी अनीता उन्हें समझाने की कोशिश करती तो वह उलटे ही उसे डांट देते थे. उन के घर में पत्नी के अलावा एक बेटी निष्ठा थी.

22 अक्तूबर, 2013 को करवाचौथ का त्यौहार था. इस त्यौहार के मौके पर महिलाओं के साथसाथ आजकल तमाम लड़कियां भी हाथों पर मेंहदी लगवाने लगी है. करवाचौथ से एक दिन पहले 21 अक्तूबर को निष्ठा भी अपने हाथों पर मेंहदी लगवा कर रात 8 बजे घर लौटी थी. उस समय घर पर पारसराम कुंज ही मौजूद थे. निष्ठा की मां अनीता पंजाबी बाग स्थित एक संत के आश्रम में गई हुई थीं. तभी निष्ठा ने कहा, ‘‘पापा, मम्मी ने बाहर से सरगी (करवाचौथ का सामान) लाने को कहा था, आप ले आइए.’’

मार्केट पारसराम पुंज के घर से कुछ ही दूर था. वह पैदल ही सरगी का सामान लेने बाजार चले गए. जब वह सामान खरीद कर घर लौटे उन के दोनों हाथों में सामान भरी पौलिथिन की थैलियां थीं. अभी वह अपने दरवाजे पर पहुंचे ही थे कि किसी ने उन के ऊपर चाकू से हमला कर दिया. दर्द से छटपटा कर उन्होंने जोर से बेटी को आवाज लगाई. उस समय तकरीबन साढ़े 8 बज रहे थे.

निष्ठा ने जब पिता के चीखने की आवाज सुनी. तब वह पहली मंजिल पर थी. चीख की आवाज सुन कर निष्ठा ने सोचा कि शायद आज फिर पापा का किसी से झगड़ा हो गया है. वह जल्दीजल्दी सीढि़यों से उतर कर नीचे आई. घर का मुख्य दरवाजा भिड़ा हुआ था उस ने जैसे ही दरवाजा खोला उस के पिता सामने गिरे पड़े थे और हाथ में चाकू लिए एक युवक वहां से भाग रहा था. कुछ आगे एक युवक लाल रंग की मोटरसाइकिल पर बैठा था. जिस ने सिर पर हेलमेट लगा रखा था. कुछ लोग गली में मौजूद थे लेकिन उन्हें पकड़ने की किसी की भी हिम्मत नहीं हुई. युवक मोटरसाइकिल पर बैठ कर भाग गए.

पिता को लहूलुहान देख कर निष्ठा जोरजोर से रोने लगी. उस के रोने की आवाज सुन कर आसपास के लोग वहां आ गए. पीछे वाली गली में निष्ठा का ममेरा भाई नरेंद्र रहता था वह दौड़ीदौड़ी उस के पास गई और यह बात उसे बता दी. जब तक वह आया तब तक वहां काफी लोग जमा हो गए थे. मामा को लहूलुहान देख कर वह भी घबरा गया. लोगों को सहयोग से वह पारसराम को नजदीक के आचार्य श्री भिक्षु अस्पताल ले गया लेकिन डाक्टरों ने पारसराम पुंज को मृत घोषित कर दिया. इसी दौरान किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर के सूचना दे दी कि मोतीनगर के सुदर्शन पार्क में स्थित मकान नंबर बी-462 के सामने एक आदमी का मर्डर हो गया है.

पीसीआर ने यह सूचना थाना मोतीनगर को दे दी. हत्या की खबर मिलते ही थानाप्रभारी शैलेंद्र तोमर, इंसपेक्टर (तफ्तीश) रमेश कलसन, हेडकांस्टेबल सत्यप्रकाश और कांस्टेबल कृष्णराठी आदि के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने देखा कि सुदर्शन पार्क के मकान नंबर बी-462 के सामने काफी मात्रा में खून पड़ा था. पता चला कि किसी ने रिटायर्ड कप्तान पारसराम पुंज को कई चाकू मारे हैं और उन्हें आचार्य श्री भिक्षु अस्पताल ले जाया गया है. थानाप्रभारी अस्पताल पहुंचे तो डाक्टरों से पता चला कि पारसरामकी अस्पताल लाने से पहले ही मौत हो गई थी.

पुलिस ने लाश कब्जे में ले कर उसे पोस्टमार्टम के लिए दीनदयाल अस्पताल भेज दिया. थानाप्रभारी ने सेना के पूर्व कैप्टन पारसराम पुंज की हत्या की खबर आला अधिकारियों को भी दे दी. थोड़ी देर में पुलिस उपायुक्त डीसीपी रणजीत सिंह और सहायक पुलिस आयुक्त ईश सिंघल भी मौकाएवारदात पर पहुंच गए. मौका मुआयना करने के बाद पुलिस अधिकारियों ने आसपास के लोगों से बात की. मृतक की बेटी निष्ठा और कुछ लोगों ने पुलिस को बताया कि उन्होंने हमलावर को हाथ में चाकू लिए वहां से भागते देखा था.

डीसीपी रणजीत सिंह ने इस केस को सुलझाने के लिए एसीपी ईश सिंघल के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में थानाप्रभारी शैलेंद्र तोमर, इंसपेक्टर रमेश कलसन, एसआई गुलशन नागपाल, हेड कांस्टेबल सत्यप्रकाश, कांस्टेबल कृष्ण राठी, अमित कुमार आदि को शामिल किया गया.

पुलिस को घटनास्थल से ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला जिस के सहारे हत्यारों तक पहुंचा जा सकता. यह एक तरह से ब्लाइंड मर्डर केस था. इसलिए पुलिस ने सब से पहले पूर्व कैप्टन पारसराम और उस के परिवार के बारे में छानबीन करनी शुरू की.

छानबीन में पता चला कि मृतक पारसराम पुंज तेजतर्रार व्यक्ति थे. उन के मिजाज की वजह से मोहल्ले के लोगों से उन की अकसर कहासुनी होती रहती थी. लेकिन वह मामूली कहासुनी की वजह से कोई उन की हत्या कर सकता है. पुलिस को ऐसा नहीं लग रहा था. फिर भी पुलिस ने मोहल्ले के उन लोगों से भी पूछताछ की जिन से कप्तान साहब की नोंकझोंक होती रहती थी.

इस के बाद पुलिस ने पारसराम पुंज और बेटी निष्ठा पुंज के मोबाइल फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. इस से पता चला कि निष्ठा की कुछ नंबरों पर ज्यादा बातें होती थीं. 16 साल की निष्ठा जवान होने के साथ साथ खूबसूरत भी थी. इसी मद्देनजर पुलिस ने यह सोचना शुरू कर दिया कि कहीं निष्ठा का किसी लड़के के साथ कोई चक्कर तो नहीं चल रहा है. हो सकता है कप्तान साहब उस के प्यार में रोड़ा बन रहे हों और इसलिए उस ने अपने प्रेमी की मार्फत अपने पिता को ठिकाने लगवा दिया हो.

जिन नंबरों पर निष्ठा की ज्यादा बात होती थी, पुलिस ने उन का पता लगाया तो वह एक झुग्गी बस्ती में रहने वाले युवकों के नंबर निकले. पूछताछ के लिए पुलिस ने उन युवकों को थाने बुलवा कर पूछताछ करनी शुरू की. उन्होंने बताया कि उन की निष्ठा से केवल दोस्ती थी. उस के पिता के मर्डर से उन का कोई लेनादेना नहीं है. उन लड़कों से सख्ती से की गई पूछताछ के बाद भी कोई नतीजा सामने नहीं आया.

इसी बीच पुलिस टीम को मुखबिर से खास जानकारी यह मिली कि हमलावर लाल रंग की जिस पैशन मोटरसाइकिल से आए थे, उस पर हरियाणा का नंबर था. वह नंबर क्या था यह पता नहीं लग सका. जबकि बिना नंबर के मोटरसाइकिल ढूंढना आसान नहीं था.

जांच टीम ने एक बार फिर घटनास्थल से मेन रोड तक आने वाले रास्तों का मुआयना किया. उन्होंने देखा कि जहां पारसराम पुंज का मर्डर हुआ था, उस के सामने वाले मकान के बाहर सीसीटीवी कैमरा लगा हुआ था. संभावना थी कि कातिलों की और उन की मोटरसाइकिल की फोटो उस कैमरे में जरूर कैद हुई होगी. यही सोच कर पुलिस ने उस मकान के मालिक से बात की. उस ने बताया कि उस के कैमरे की डीवीआर नहीं हो रही. इस से पुलिस की उम्मीद पर पानी फिर गया.

जिस गली में पारसराम का मकान था उस के बाहर मोड़ पर सुरेश का चावल का गोदाम था. गोदाम के बाहर भी सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे. पूछताछ के बाद पता चला कि वहां लगे सीसीटीवी कैमरे भी काम नहीं कर रहे थे. पुलिस टीम जांच का जो कदम आगे बढ़ा रही थी, वह आगे नहीं बढ़ पाता था. इस तरह जांच करते हुए पुलिस को 2 सप्ताह बीत गए.

टीम ने निष्ठा के फोन की काल डिटेल्स का एक बार फिर अध्ययन किया. उस से पता चला कि घटना वाले दिन एक फोन नंबर पर निष्ठा की 4 बार बात हुई थी. उस नंबर के बारे में निष्ठा से पूछा गया तो उस ने बताया कि यह नंबर उस के भाई यानी कप्तान साहब की पहली पत्नी ऊषा से पैदा हुए बेटे लाल कमल पुंज का है. इस के बाद ही पुलिस को पता लगा कि कप्तान साहब ने 2 शादियां की थीं. निष्ठा उन की दूसरी पत्नी अनीता की बेटी थी.

पुलिस ने निष्ठा से पूछा कि उस की लाल कमल से क्या बात हुई थी? तो उस ने जवाब दिया कि उस ने घर का हालचाल जानने के लिए फोन किया था. उस ने यह भी बताया की लाल कमल कभीकभी घर भी आता रहता था. पूछताछ में जानकारी मिली कि लाल कमल अपनी पत्नी के साथ पानीपत में रहता है.