ट्रंक की चोरी : ईमानदार चोर ने किया साजिश का पर्दाफाश – भाग 1

निक वेल्वेर एक अलग तरह का चोर था. वह एक दिन सुबह साढ़े 10 बजे पब्लिक लाइब्रेरी में बैठा हुआ पिछले 2 घंटे से मैगजीन पढ़ रहा  था. इसी दौरान उस के दिमाग में एक आइडिया आया कि क्यों न वह चोरी के टौपिक पर एक किताब लिखे, जिस का शीर्षक हो ‘चोरी एक आर्ट’.

इस विषय पर क्याक्या लिखा जाए, इस बारे में वह सोच ही रहा था, तभी एक मोटा सा आदमी आ कर उस के पास वाली कुरसी पर बैठ गया. उस के बैठते ही निक उठने लगा. तभी वह मोटा आदमी बोला, ‘‘हैलो मिस्टर निक, शायद तुम मुझे नहीं जानते होगे लेकिन मैं तुम्हें जानता हूं. किसी के रेफरेंस से ही तुम्हारे पास तक पहुंचा हूं. मेरा नाम विक्टर एलियानोफ है.’’

निक विक्टर को गौर से देखने लगा तभी विक्टर ने कहा, ‘‘मैं तुम से मिलने यहां इसलिए आया हूं कि मैं तुम से एक ट्रंक चोरी करवाना चाहता हूं.’’

इतना सुनते ही वेल्वेर ने कहा, ‘‘जब आप को किसी ने मेरे पास भेजा है तो यह भी बताया होगा कि मैं सिर्फ फालतू और मामूली चीजों की ही चोरी करता हूं. ऐसी चीजों के चुराने में किसी को दुख भी नहीं होता.’’

‘‘हां, मैं जानता हूं. जिस संदूक के बारे में मैं बात कर रहा हूं वह पुराना और जंग लगा है. वह कोई 70-80 साल पुराना है.’’

‘‘जब इतना पुराना है, तब तो यह ऐतिहासिक महत्त्व की चीज होगी?’’

‘‘नहीं ऐसा कुछ नहीं है. यह एक फालतू पुराना ट्रंक है. उसे कोई कबाड़ी भी लेना पसंद नहीं करेगा, डेढ़ फीट ऊंचा 2 फीट चौड़ा और 4 फीट लंबा है.’’

‘‘जब किसी महत्त्व का नहीं है, तो आप इसे चोरी करवाना क्यों चाहते हैं?’’

‘‘मैं समझता हूं कि इस बात से तुम्हें कोई मतलब नहीं होना चाहिए. तुम अपना काम करो और काम के जो पैसे बनते हैं लो.’’

‘‘मेरी फीस पता है, मैं 25 हजार डालर लेता हूं.’’

विक्टर ने एक लिफाफा निकाल कर उस के सामने रखते हुए कहा, ‘‘ये रहे 10 हजार डालर बाकी काम होने के बाद.’’

निक ने लिफाफा देखे बगैर पूछा, ‘‘अब यह बताओ कि ये ट्रंक किस जगह पर है?’’

विक्टर एलियानोफ ने एक कागज उस के सामने रखते हुए कहा, ‘‘ये है उस जगह का पता. उस इमारत के तहखाने में तुम्हें यह संदूक मिल जाएगा.’’

निक ने कागज को देखते हुए कहा, ‘‘ये जगह कस्बा ‘न्यूपालिट’ में है, जो यहां से करीब 100 मील दूर है.’’

‘‘तुम्हें ट्रंक चोरी करने में ज्यादा दिक्कत पेश नहीं आएगी. जिस घर में यह रखा है, उस घर के लोग न्यूयार्क गए हुए हैं. बस एक बूढ़ा चौकीदार वहां होता है. मुझे यकीन है कि तुम उस चौकीदार की आंखों से बच कर आसानी से अपना काम कर लोगे.’’ विक्टर ने कहा.

‘‘मुझे अपना काम करना आता है. तुम यह बताओ कि ट्रंक पहुंचाना कहां है?’’

विक्टर ने एक पता लिखी परची उसे देते हुए कहा, ‘‘ट्रंक इस अपार्टमेंट में पहुंचाना होगा. ये रही अपार्टमेंट की चाबी. काम खत्म होने के बाद तुम मुझे फोन कर देना, मैं मिल लूंगा.’’ विक्टर ने निक को अपना फोन नंबर देते हुए कहा.

उस समय मौसम सुहाना था. निक ने अपनी दोस्त ग्लोरिया को फोन किया, ‘‘ग्लोरिया, हम न्यूपालिट घूमने चलेंगे. वहां मछली का शिकार और बोटिंग करेंगे.’’

न्यूपालिट एक बहुत खूबसूरत जगह थी इसलिए वहां जाने की बात सुनते ही ग्लोरिया बहुत खुश हुई, उस ने निक के साथ घूमने के लिए हामी भर ली. थोड़ी देर बाद निक अपनी कार से एक निर्धारित जगह पर पहुंच गया. वहां उसे ग्लोरिया उस का इंतजार करती मिली.

ग्लोरिया को कार में बैठा कर वह न्यूपालिट की ओर चल दिया. ग्लोरिया निक के बारे में सब जानती थी. निक ने उसे नए केस के बारे में बता दिया. ग्लोरिया तो वहां जाने से खुश थी. न्यूयार्क की भीड़भाड़, उमस से दूर वे चले जा रहे थे.

दोपहर साढ़े 12 बजे वे लोग न्यूपालिट पहुंच गए. झील के किनारे मशहूर होटल माउंटेन हाऊस में उन्होंने कमरा बुक कराया. खाना खा कर दोनों घूमने निकल गए. उसी दौरान निक उस मकान को एक नजर देख लेना चाहता था, जहां से उसे ट्रंक चुराना था.

कुछ देर बाद वह उस अपार्टमेंट के पास पहुंच गया. वह अपार्टमेंट लाल पत्थरों से बना था. अपार्टमेंट के चारों तरफ पेड़ और हरियाली थी. बाहर लोहे का बड़ा सा गेट लगा था. सीढि़यों के पास बैठा एक बूढ़ा चौकीदार सिगरेट पीता नजर आया. उस के कंधे पर स्टेनगन टंगी थी. अपार्टमेंट की चारदीवारी ज्यादा ऊंची नहीं थी. पीछे की चारदीवारी एक पहाड़ी ढलान से मिली हुई थी.

अपार्टमेंट का मुआयना करने के बाद पूरे दिन प्रेमिका के साथ घूमता रहा. दोनों ने बोटिंग की, शिकार किया. अपना काम करने के लिए निक रात 10 बजे अकेला उस अपार्टमेंट की तरफ रवाना हो गया. रात सुनसान और अंधेरी थी. निक ने अपनी कार एक पेड़ के नीचे खड़ी कर दी. फिर वह बड़ी आसानी से दीवार कूद कर अपार्टमेंट की तरफ बढ़ ही रहा था कि सन्नाटे में किसी कार की आवाज आई. निक पौधों की आड़ में हो गया.

एक कार फाटक पर आ कर रुकी. 3 बार हार्न बजाने पर गेट पर लगी बड़ी लाइट जला कर स्टेनगनधारी चौकीदार गेट के पास पहुंच गया. तभी कार में से एक लड़की उतरी उस ने चौकीदार से कुछ कहा. वह लाइट में खड़ी थी. चौड़े भारी बदन की वह लड़की तंग जींस और स्कीवी पहने हुई थी. वह चौकीदार से हाथ हिलाहिला कर कुछ कह रही थी. इस के बाद वह वापस मुड़ कर चली गई. गेट पर खड़ा चौकीदार बड़े गौर से उसे देखता रहा.

निक को फ्लैट में घुसने का यह सही मौका लगा, वह फुरती से चुपचाप खुले दरवाजे से अंदर दाखिल हो गया. अंदर गहरा अंधेरा था. निक ने जेब से पेंसिल टौर्च निकाली पर जलाई नहीं. दाईं तरफ कोने के कमरे में हलकी रोशनी हो रही थी.

वह ऊपरी मंजिल की सीढि़यों पर झुक कर खड़ा हो गया. तभी उसे ऊपरी मंजिल से कुछ आहट महसूस हुई. 2-3 मिनट वह चुपचाप खड़ा रहा. फिर उसे दरवाजा बंद करने की आवाज आई. एक साया, जो शायद चौकीदार, हलकी लाइट वाले कमरे में चला गया. उस के बाद वहां की लाइट भी बंद हो गई.

निक दबेपांव वहां से निकला और तहखाने की सीढि़यां ढूंढ कर धीरेधीरे नीचे उतरने लगा. तहखाने में उस ने टौर्च जला कर देखा. वहां पुराना सामान, टूटा फरनीचर, रद्दी अखबार वगैरह पड़े थे. सब चीजों पर धूल चढ़ी हुई थी और वहां मकडि़यों के जाले थे. यह सब देख कर ऐसा लग रहा था जैसे वहां कोई काफी दिनों से नहीं आया हो. एक कोने में पुराना, जंग लगा एक ट्रंक पड़ा था. निक समझ गया कि यही वह ट्रंक है.

अजीब बात यह थी कि ट्रंक पर धूल नहीं थी. जबकि वहां रखे हर सामान पर धूल चढ़ी हुई थी. निक ने उसे उठा कर सिर पर रखा. सीढि़यों के ऊपर पहुंच कर जरा रुक वह यह देखने लगा कि बाहर निकलने में उसे कोई खतरा तो नहीं है.

पूरी तरह सन्नाटा होने पर वह धीरे से दरवाजा खोल कर फ्लैट से बाहर निकल गया. आराम से चारदीवारी फांद कर वह बाहर पहुंचा. कार की डिक्की खोल कर ट्रंक उस में रखने लगा तभी उसे ट्रंक के अंदर से किसी चीज के खड़खड़ाने की आवाज आई. वैसी ही आवाज उसे ट्रंक उठाते समय भी आई थी. उस ने सोचा ट्रंक खोल कर देखा जाए कि उस में क्या है.

वह ट्रंक खोलने को हुआ उसी वक्त अपार्टमेंट के अंदर से कुछ उठापटक की आवाजें आने लगीं. ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने जोर से दरवाजा बंद किया हो. फिर किसी के दौड़ने की आवाज, कुछ शोर, कुछ भारी चीज गिरने की आवाज के साथ फायर होने की 2 आवाजें सुनाई दीं. निक ने ट्रंक खोलने का इरादा छोड़ दिया. उस ने वहां से जल्द खिसकने में भलाई समझी.

                                                                                                                                           क्रमशः

उधार का चिराग – भाग 1

मुझे उन्होंने मारने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन संयोग अच्छा था कि मैं बच गया था. उन की चलाई गोली मेरे सिर को छूती हुई निकल गई थी. उस के बाद जान बचाने के  लिए मैं ने सरपट दौड़ लगा दी थी. जिन लोगों ने मुझे मारने की कोशिश की थी, उन से मेरी कोई दुश्मनी नहीं थी और जिस ने उन्हें इस काम के लिए भेजा था, उस से भी मेरी कोई दुश्मनी नहीं थी. इस के बावजूद मारने वाले मुझे मारना चाहते थे तो मरवाने वाला मुझे मरवाना चाहता था.

इस कहानी की शुरुआत उस दिन हुई थी, जिस दिन मेरे बौस अजहर अली ने मुझे अपने चैंबर में पहली बार बुलाया था. वह अपनी सख्ती और खड़ूसपने के लिए मशहूर थे. उन का एक्सपोर्टइंपोर्ट का बहुत बड़ा कारोबार था.  कंपनी के सारे कर्मचारी उन से बहुत डरते थे. चैंबर में घुसते ही उन्होंने बैठने का इशारा करते हुए पूछा, ‘‘शहबाज तुम्हारा ही नाम है?’’

‘‘जी सर.’’ मैं ने बैठते हुए अदब से कहा था.

‘‘तुम यहां अकेले ही रहते हो या परिवार के साथ?’’

‘‘सर, मैं बिल्कुल ही अकेला हूं, मेरा कोई नहीं है.’’

उन्होंने मुझे गौर से देखा. इस के बाद कुछ सोचते हुए पूछा, ‘‘अभी शादी भी नहीं की?’’

‘‘जी नहीं.’’

मुझे उन की बातों पर हैरानी हो रही थी. उन्होंने मेरे चेहरे पर नजरें जमा कर कहा, ‘‘मैं तुम्हारे काम से बहुत खुश हूं. तुम काफी मेहनती और ईमानदार हो. मैं ने तुम्हारी रिपोर्ट देखी है. मैं तुम्हें प्रमोशन देना चाहता हूं. शाम को मेरे घर आ जाना, वहीं इत्मीनान से बातें करेंगे.’’

यह मेरी खुशनसीबी ही थी कि मुझे इस तरह का मौका मिल रहा था. शाम को मैं बौस अजहर अली के घर पहुंच गया. उन का घर बहुत शानदार था. ड्राइंगरूम बेशकीमती चीजों से सजा हुआ था. बाहर कई गाडि़यां खड़ी थीं. कई नौकर इधरउधर घूम रहे थे.

अजहर अली एक छरहरी खूबसूरत औरत के साथ ड्राइंगरूम में दाखिल हुए. उन्होंने औरत की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘यह मेरी वाइफ नाजनीन है.’’

मैं ने सलाम किया. सभी लोग बैठ गए. अजहर अली ने औफिस और काम की बातें शुरू कीं. उन्होंने कुछ खास जिम्मेदारियां सौंपते हुए ओहदा और वेतन बढ़ाने की बात कही. तभी उन के मोबाइल पर किसी का फोन आ गया तो वह उठ कर बाहर चले गए.

उन के जाते ही नाजनीन अपनी जगह से उठी और मेरे पास आ कर बैठ गई. उस के परफ्यूम की खुशबू ने मुझे मदहोश सा कर दिया. मेरी धड़कन एकदम से बढ़ गई. उस ने बड़े प्यार से पूछा, ‘‘आप के शौक क्या क्या हैं, आप जिम जाते हैं?’’

‘‘मैडम, मैं इतने महंगे शौक कैसे पाल सकता हूं?’’ मैं ने कहा.

‘‘अब तुम गरीब नहीं रहोगे.’’ उस ने प्यार से कहा.

उस के इस अंदाज से मैं हैरान था. मैं ने कहा, ‘‘मैं समझा नहीं मैडम?’’

‘‘अजहर तुम पर मेहरबान हैं. वह तुम्हें अपनी फर्म का जनरल मैनेजर बनाने जा रहे हैं. इस के बाद पैसे की कमी कहां रहेगी. मैनेजर बनते ही तुम्हें क्लब की मैंबरशिप मिल जाएगी. बड़े आदमी बन जाओगे तो तुम्हें बड़े लोगों के साथ उठनाबैठना होगा न?’’

मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि पहली मुलाकात में यह कैसी बातें कह रही हैं. अजहर अली लौट कर आए. आते ही उन्होंने कहा, ‘‘नाजनीन ने तुम्हें सब बता ही दिया होगा. मुझे एक जरूरी मीटिंग में जाना है, इसलिए मैं चलता हूं.’’

‘‘लेकिन सर मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि यह कैसे हो सकता है?’’ मैं ने घबरा कर कहा.

‘‘इस में समझना क्या है. बस यह समझो कि तुम्हारी किस्मत जाग उठी है. कल तुम औफिस जाओगे तो तुम्हें अपौइंटमेंट लेटर मिल जाएगा.’’

मैं परेशान था कि आखिर मुझ पर यह मेहरबानी क्यों हो रही है? मैनेजर की पोस्ट, तगड़ा वेतन, गाड़ी के साथसाथ अन्य तमाम सुविधाएं. आखिर यह सब क्यों किया जा रहा है?

अजहर अली अपनी बीवी को बाय कह कर चले गए. उन के जाने के बाद नाजनीन ने कहा, ‘‘अब तो तुम्हें यकीन हो गया होगा कि आप अमीर आदमी बन गए हैं. मैं भी यही चाहती हूं.’’

‘‘मुझे तो यह सब एक सपना सा लग रहा है.’’ मैं ने कहा.

‘‘लेकिन तुम्हारा सपना हकीकत बन गया है. अब तुम जा सकते हो.’’

अपने किराए के फ्लैट पर पहुंच कर भी मुझे यह सब एक सपना ही लग रहा था. मैं ने अपने उस किराए के छोटे से पुराने फ्लैट को देखा, अब मुझे एक शानदार घर मिलने वाला था. किस्मत मुझ पर मेहरबान जो थी. अगले दिन बौस ने मुझे अपने चैंबर में बुलाया तो मैं धड़कते दिल के साथ पहुंचा.

उन्होंने मुसकराते हुए कहा, ‘‘तुम्हारा लेटर तैयार हो गया है. अभी जो मैनेजर था, उस का ट्रांसफर कर दिया गया है. 3 दिन वह तुम्हारे साथ रह कर तुम्हें सारे काम समझा देगा.’’

मन यही कर रहा था कि मैं उठ कर नाचने लगूं. साथ काम करने वालों के लिए यह एक हैरानी की बात थी. सभी ने मुझे मुबारकबाद दी. मैनेजर का चैंबर काफी बड़ा और शानदार था. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं बौस का शुक्रिया कैसे अदा करूं?

एकाउंटेंट ने मेरे चैंबर में आ कर मुझे मुबारकबाद दे कर कहा, ‘‘शहबाज साहब, आप इस फर्म के जनरल मैनेजर हो गए हैं. लेकिन एक बात याद रखना कि अब आप को दोधारी तलवार पर चलना होगा. जितना बड़ा ओहदा होता है, जिम्मेदारियां उतनी ही बढ़ जाती हैं.’’

इस के बाद वह मुझे औफिस के काम और जिम्मेदारियां समझाने लगा. काफी बड़ी फर्म थी. कुछ मैं पहले से जानता था, बाकी पहले के मैनेजर और एकाउंटेंट ने समझाना और सिखाना शुरू कर दिया.

3-4 दिनों बाद अजहर अली ने मुझे बुला कर पूछा, ‘‘शहबाज, कोई मुश्किल तो नहीं आ रही है? काम समझ में आ रहा है न?’’

मैं ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा, ‘‘जी सर, सब ठीक चल रहा है.’’

उन्होंने मुझे गौर से देखते हुए कहा, ‘‘आज शाम को तुम मेरे घर आ जाना. नाजनीन तुम्हें साथ ले जा कर क्लब का मेंबर बनवा देगी.’’

‘‘जी सर.’’

किस्मत मुझ पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान थी. नाजनीन मेरी राह देख रही थी. उस ने आगे बढ़ कर बड़ी गर्मजोशी से मुझ से हाथ मिलाया. मैं थोड़ा नर्वस जरूर हुआ.

वह बहुत अच्छी तरह से तैयार हुई थी, जिस से बहुत ज्यादा खूबसूरत लग रही थी. उस का परफ्यूम मुझे मदहोश कर रहा था. उस ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर पूछा, ‘‘मैं कैसी लग रही हूं?’’

‘‘बहुत अच्छी लग रही हैं.’’ मैं ने कहा.

मेरे बाजू को थपथपाते हुए उस ने कहा, ‘‘अब तुम्हें हाई सोसायटी के तौरतरीके सीखने पड़ेंगे.’’

गाड़ी वह खुद चला रही थी. मैं उस की बगल वाली सीट पर बैठा था. क्लब में उस ने अपने सभी जानने वालों से मेरा परिचय कराया. आधे घंटे में मैं क्लब का मेंबर बन गया. यह वह क्लब था, जिस के सामने से गुजरते हुए मैं सोचा करता था कि इस में क्या होता होगा, कैसे कैसे लोग आते होंगे? आज मैं खुद उस के अंदर था.                                                                                                                            

बेरुखी : बनी उम्र भर की सजा – भाग 1

यह सच है कि अगर मेरे शौहर सुलतान अहमद मुझ से मेरी जान भी मांगते तो मैं देने में एक लमहे की भी देर न करती. उन का छोटे से छोटा काम  भी मैं खुद किया करती थी, हालांकि घर में नौकरनौकरानियां भी थीं. इस में ताज्जुब की कोई बात नहीं थी. अकसर औरतें अपने पतियों की ताबेदारी में खुशी महसूस करती हैं. फिर भी उन्होंने कभी मेरे साथ मुसकरा कर बात नहीं की थी.

दूसरों के सामने तो वह मेरे साथ नरम पड़ जाते थे, मगर तनहाई में या बच्चों के सामने बिलकुल अजनबी से बन जाते थे. ऐसा भी नहीं था कि वह स्वभाव से ऐसे थे. दूसरों के लिए वह बहुत हंसमुख थे. खासतौर पर बच्चों पर तो जान छिड़कते थे. उन के बीच वह बेतकल्लुफ दोस्त बन जाते थे.

उन की हर फरमाइश मुंह से निकलते ही पूरी किया करते, मगर मेरे लिए उन के पास सिवाय बेगानगी के और कुछ नहीं था. मुझे देखते ही सुलतान अहमद के चेहरे पर अजीब सी संजीदगी भरी सख्ती छा जाती. अगर वह बोल रहे होते तो मेरे आते ही खामोश हो जाते. हमारा बेडरूम साझा था, मगर वह वहां देर रात को आते थे. घर में उन का अधिक समय अपने स्टडी रूम में गुजरता था. वह कभी मेरे साथ शौपिंग के लिए नहीं गए.

सुलतान अहमद आला ओहदे पर लगे हुए थे. दफ्तर की तरफ से उन्हें मकान और गाड़ी मिली हुई थी. वह अपनी सारी तनख्वाह अपना खर्च निकाल कर मेरे हवाले कर देते थे और फिर पलट कर यह नहीं पूछते थे कि मैं ने क्या खर्च किया, कहां खर्च किया, क्यों खर्च किया और क्या बचाया.

उन का यह रवैया मैं कोई 1-2 साल से नहीं, बल्कि पिछले 25 सालों से बरदाश्त कर रही थी. एक चौथाई सदी के इस अरसे में उन की तरफ से चाहत का एक भी फूल मेरे आंचल में नहीं डाला गया था. इस सितम के बावजूद वह मेरे सिर का ताज थे. उन की सेवा करना, उन के काम करना मेरी जिंदगी का अहमतरीन मकसद था. सुलतान अहमद भी इतनी बेरुखी के बावजूद अपना हर काम मुझ से ही करवाना पसंद करते थे.

सुबह 8 बजे तक वह और बच्चे घर से निकल जाते थे. उन के जाने के बाद मैं नौकरानी से सफाई करवाती. फिर बर्तन और कपड़े धोने वाली आ जाती. मगर मैं सिर्फ अपने और बच्चों के कपड़े धुलवाती. सुलतान अहमद के कपड़े मैं अपने हाथों से ही धोया करती थी. फिर मैं दोपहर के खाने की तैयारी में लग जाती. बच्चे 1 बजे तक स्कूलकालेज से आ जाते थे और सुलतान अहमद भी दोपहर का खाना घर में ही आ कर खाते थे.

दफ्तर से आमतौर पर वह शाम 6 बजे तक आ जाते थे. फ्रेश हो कर लाउंज में बच्चों के पास बैठ जाते थे. इस दौरान वह उन के मनोविनोद और तालीमी सरगर्मियों के बारे में पूछते. चाय पीते और फिर अपने स्टडी रूम में चले जाते, जहां से वह रात के खाने के वक्त ही निकलते थे. खाने के बाद वह फिर स्टडीरूम में वापस चले जाते और लगभग 11, साढ़े 11 बजे बेडरूम में आते थे.

सुलतान अहमद आर्थिक मामलों में माहिर थे. वह आडिट और एकाउंट के विषय में खास अधिकार रखते थे. इस विषय पर उन की लिखी हुई किताबें बहुत मकबूल थीं. अपने स्टडी रूम में वह लिखनेपढ़ने का काम करते थे. इन सारी बातों से आप ने अंदाजा लगा लिया होगा कि उन के पास मेरे लिए एक लमहा भी नहीं था. यह मैं बता चुकी हूं कि सुलतान अहमद स्वभाव से ऐसे नहीं थे.

तब मुझे इतनी लंबी और कड़ी सजा देने की वजह क्या हो सकती थी, यह बताने के लिए मुझे अपनी जिंदगी की किताब के उन पन्नों को खोलना पड़ेगा, जिन की बातें आज तक किसी पर जाहिर नहीं की थीं. हमारे समाज में जब कोई औलाद लगातार तीसरी लड़की होने के नाते इस दुनिया में आंख खोलती है तो आमतौर पर उसे इस जुर्म की सजा तकरीबन उस सारे अरसे भुगतनी पड़ती है, जब तक वह बाप के घर रहती है.

मगर मेरी खुशकिस्मती थी कि जब बेटे की जगह मैं इस दुनिया में आई तो सब ने बड़ी मोहब्बत से मेरा स्वागत किया. यह मेरी खूबसूरती का करिश्मा था. दादी अम्मा, जो मेरी पैदाइश से पहले उठतेबैठते अम्मी को बेटा पैदा करने की याद दिलाना भूलती नहीं थी, मुझे देख कर खुश हो गईं. उन का कहना था कि हमारी 7 पीढि़यों में कोई इतनी हसीन बच्ची पैदा नहीं हुई.

मेरी पैदाइश के बाद भाइयों का जन्म शुरू हो गया. अब्बू तरक्की पर तरक्की करते गए. खुशहाली के सारे दरवाजे खुल गए. इस तरह मुझे पैदाइशी भाग्यशाली का दर्जा हासिल हो गया. होश संभालते ही मुझे जो पहला अहसास हुआ या फिर मेरे घर वालों ने अहसास दिलाया, वह यह था कि मैं बेहद खूबसूरत हूं.

स्कूल में दाखिले के समय मैं ने उस स्कूल में पढ़ने से साफ इनकार कर दिया, जहां मेरी दोनों बड़ी बहनें तालीम हासिल कर रही थीं. उस की बेरौनक इमारत, मामूली फर्नीचर और सादा लिबास लड़कियां मेरी पसंद से  कतई मेल नहीं खाती थीं. मैं ने अम्मीअब्बू से साफ कह दिया कि मैं उस गंदेसंदे स्कूल में उन गंदीसंदी लड़कियों के साथ हरगिज नहीं पढूंगी. यह सुनते ही दोनों बहनों ने हंगामा खड़ा कर दिया कि क्या हम गंदीसंदी हैं? अम्मी ने भी मेरी बात का बुरा तो माना, लेकिन दरगुजर कर गईं. उन्होंने दोनों बहनों को भी समझा लिया.

‘‘तो क्या तुझे किसी अंगरेजी स्कूल में पढ़ाऊं?’’ उन्होंने दबेदबे लहजे में कहा.

‘‘मैं ने कह दिया कि मैं उस स्कूल में नहीं पढूंगी, बस.’’ मैं ने ठुनक कर कहा.

अब्बू ने मेरी हिमायत की. उन्होंने अम्मी से कहा, ‘‘ठीक तो कह रही है मेरी बेटी. वह स्कूल भला इस के लायक है?’’

‘‘तो फिर दाखिल करा दें किसी बढि़या स्कूल में और दें भारी भरकम फीस.’’ अम्मी भन्ना कर बोलीं.

अब्बू ने भागदौड़ कर के मेरा दाखिला शहर के एक आला इंगलिश मीडियम स्कूल में करा दिया. घर से दूर होने की वजह से मुझे गाड़ी लेने और छोड़ने आया करती थी. स्कूल में मैं ने चुनचुन कर खूबसूरत और नफासतपसंद लड़कियों को सहेली बनाया. टीचरें भी मुझे पसंद करती थीं, जिस का सब से बड़ा फायदा मुझे तालीम हासिल करने में हुआ. मैं अपनी क्लास की बेहतरीन स्टूडेंट्स में गिनी जाती थी.

                                                                                                                                          क्रमशः

मृतक की वीडियो से खुला हत्या का राज़

तांत्रिक शक्ति के लिए अपने बच्चों की बलि

फेसबुकिया प्यार में डबल मर्डर

ज्योति ने बुझाई पति की जीवन ज्योति

सनकी ‘मोबाइल चिपकू’ का कारनामा

उस समय रात के 8 बज रहे थे. विनोद तुरंत अपने जीजा ओमप्रकाश के घर पहुंचा. घर का दरवाजा अंदर से बंद था. काफी देर तक दरवाजा खटखटाने के बाद अंदर से कोई आवाज नहीं आई. विनोद जोरजोर से दरवाजा पीटने लगा, तो भीतर से ओमप्रकाश की आवाज आई. विनोद ने जब अपनी बहन नीतू के बारे में पूछा, तो उस ने दरवाजा खोले बगैर ही कह दिया कि वह काफी देर पहले घर से निकल चुकी है.

विनोद उस की बात मानने को तैयार नहीं था. उस ने जब दरवाजे पर धक्का मारना शुरू किया, तो ओमप्रकाश ने अंदर से कहा, ‘‘कुछ देर ठहरो, मैं कपड़े पहन कर बाहर निकलता हूं.’’

5 मिनट बाद घर के पिछले हिस्से में किसी के कूदने की आवाज सुनाई पड़ी, तो विनोद के कान खड़े हो गए. उस ने दोबारा दरवाजा खटखटाया, तो कोई आवाज नहीं आई. उस के बाद विनोद घर के पिछले हिस्से में गया और दीवार फांद कर घर के अंदर कूद गया. अंदर जाने पर देखा कि दोनों कमरों के दरवाजे पर भी ताले लटके हुए थे.

उस ने फिर दरवाजा खटखटाया, पर अंदर से कोई आवाज नहीं आई. उस ने एक कमरे के दरवाजे का ताला तोड़ा, तो देखा कि उस के दोनों मासूम भांजे जमीन पर ही पड़े हुए थे. उन्हें जगाने की कोशिश की गई, तो उन के जिस्म में कोई हलचल नहीं हुई.

दूसरे कमरे का ताला तोड़ा गया, तो वहां सुमन और नीतू बेसुध पड़ी हुई थीं. नीतू के मुंह से काफी झाग निकला हुआ था. अपनी दोनों बहनों और भांजों की ऐसी हालत देख विनोद रोने लगा और उस ने गांव के मुखिया को सूचना दी.

मुखिया के पति महेंद्र चौहान और पंचायत समिति के सदस्य बलिराम चौहान मौके पर पहुंचे और तुरंत पुलिस को खबर की. विनोद ने पुलिस को बताया कि जब उस की छोटी बहन नीतू शाम तक घर नहीं पहुंची, तो उस ने अपने जीजा ओमप्रकाश को फोन पर ही सारा माजरा बताया.

ओमप्रकाश के बात करने के लहजे से लग रहा था कि वह काफी घबराया हुआ है. कुछ देर बाद उस का मोबाइल स्विच औफ बताने लगा. इस से विनोद के मन में तरहतरह की शंकाएं उठने लगीं और वह तुरंत ओमप्रकाश के घर पहुंच गया.

झारखंड के धनबाद जिले के बरोरा थाने की प्योर बरोरा बस्ती में 19 फरवरी को बीसीसीएल में काम करने वाले मुलाजिम ओमप्रकाश चौहान ने अपनी बीवी, साली और 2 मासूम बच्चे को जहर दे कर मार डाला. चारों की लाशें घर में पड़ी मिलीं. 4 जानें लेने के बाद 35 साला ओमप्रकाश फरार हो गया.

पुलिस ओमप्रकाश की खोज में इधरउधर हाथपैर मारती रही और 20 फरवरी को धनबाद के पास ही गोमो रेलवे स्टेशन के डाउन यार्ड की 5 नंबर लाइन पर ट्रेन के सामने आ कर उस ने अपनी जान दे दी.

ओमप्रकाश झारखंड के धनबाद जिले की बरोरा ब्लौक-2 कोलियरी में काम करता था. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के मुताबिक, ओमप्रकाश की बीवी की मौत 17-18 फरवरी को ही हो चुकी थी. उसे जहर दे कर मारा गया था. सुमन, नीतू, पीयूष और हर्षित के पेट में जहर पाया गया. सभी के जिस्म में कोई भीतरी और बाहरी चोट नहीं पाई गई.

ओमप्रकाश की बीवी का नाम सुमन उर्फ तेतरी (30 साल), साली का नाम नीतू (23 साल), बड़े बेटे का नाम पीयूष(12 साल) और छोटे बेटे का नाम हर्षित  (8 साल) था. ओमप्रकाश की ससुराल फुसरो के ढोरी इलाके में है. उस की साली नीतू ढोरी में ही रह कर ब्यूटीशियन का कोर्स कर रही थी.

नीतू के भाई विनोद नोनिया और गुड्डन चौहान ने बताया कि नीतू रोज की तरह 19 फरवरी को ब्यूटीशियन की क्लास करने के लिए घर से निकली थी. शाम को जब वह घर नहीं लौटी, तो घर वालों को चिंता सताने लगी. उन्होंने नीतू की सहेली से उस के बारे में पूछा, तो सहेली ने बताया कि आज नीतू क्लास में नहीं गई थी. उस के बाद नीतू की खोज शुरू हुई.

विनोद ने अपने जीजा ओमप्रकाश को फोन कर के बताया कि नीतू घर से गायब है. ओमप्रकाश ने बताया कि नीतू उस के घर आई थी और शाम को कुछ सामान लेने के लिए बाजार की ओर गई है. उस के बाद वह घर पहुंच जाएगी.

ओमप्रकाश ने अपने सुसाइड नोट में अपनी साली को बहन की तरह बताया है, लेकिन उस के दोस्तों ने पुलिस को बताया है कि ओमप्रकाश और उस की साली के बीच नाजायज रिश्ता था और दोनों मोबाइल फोन पर घंटों बातें किया करते थे.

ओमप्रकाश के साथ काम करने वाले मजदूरों ने पुलिस को बताया है कि डंपर औपरेटर ओमप्रकाश अकसर उन के साथ बातचीत के दौरान साली से प्रेम संबंध होने की बात किया करता था. काम के दौरान भी वह घंटों अपनी साली के साथ फोन पर बातें करता रहता था. इस वजह से सभी साथी उसे मजाक में ‘मोबाइल चिपकू’ के नाम से पुकारने लगे थे.

ओमप्रकाश को उस की मां सोनवा कामिन की जगह बीसीसीएल में नौकरी मिली थी. साल 2000 में सोनवा की मौत हो गई थी. उस ने सब से पहले फुलेरीटांड कोलियरी में ड्यूटी जौइन की थी और फिलहाल वह ब्लौक-2 में डंपर औपरेटर था. उस के दफ्तर के हाजिरी बाबू अभय पांडे ने पुलिस को दिए बयान में कहा है कि ओमप्रकाश पिछले 2-3 महीने से गैरहाजिर था. वह काफी सनकी आदमी था और बातबात पर तैश में आ जाता था. उस ने कभी भी अपनी ड्यूटी सही तरीके से नहीं की.

अकसर वह पहाड़ी पर बैठ कर अपने स्मार्टफोन में मसरूफ रहा करता था. अफसरों ने उसे कई बार काम से निकालने की धमकी भी दी, लेकिन उस पर कोई असर नहीं होता था. ओमप्रकाश और सुमन की शादी साल 2003 में हुई थी. ओमप्रकाश का पैतृक घर बिहार के औरंगाबाद जिले के रफीगंज के कसमा थाने के तहत पड़ने वाले भटुकीकलां गांव में है.

ओमप्रकाश के भाई जयराम कुमार ने बताया कि 11 फरवरी को ओमप्रकाश गांव गया था. उस ने बताया कि उस का भाई अपनी साली से अकसर बातें किया करता था. 19 फरवरी की सुबह को भी ओमप्रकाश ने जयराम से बातें की थीं, लेकिन साली के साथ उस का कोई गलत रिश्ता था, इस की भनक किसी को नहीं लगी थी. नीतू के भाई विनोद ने बरोरा थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई है, जिस में कहा है कि ओमप्रकाश के साथ नीतू के किसी तरह के गलत संबंध होने की जानकारी किसी को नहीं थी.

बरोरा थाने के थानेदार प्रवीण कुमार ने बताया कि शुरुआती जांच में पता चला है कि ओमप्रकाश पिछले कुछ महीनों से काफी तनाव में था. वह लोगों से मिलता भी नहीं था. काम से लौट कर वह अपने घर में ही कैद हो जाता था.

जिद ने उजाड़ा आशियाना

अपनी ही गलती से बना हत्यारा