दो जासूस और अनोखा रहस्य – भाग 7

अजय के कातिल को ढूंढ़ते हुए उन्होंने यूसुफ से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह और अजयजी साथ काम करते थे औैर वह अजयजी के कातिल को ढूंढ़ने हेतु यहां पहुंचा. दरअसल, वे दोनों सीक्रेट एजेंट थे इसलिए यूसुफ ने सीजर कोड जल्दी हल कर लिया. टैनिस बौल के बारे में पूछने पर उस ने बताया कि उस में एक मैमोरीकार्ड निकला जिसे फोन में लगाने पर एक वीडियो क्लिपिंग दिखी.

उस में एक तहखाने में बंदूकों, राइफलों, बमों के ढेर दिख रहे थे. यूसुफ ने बताया कि हमारा डिपार्टमैंट इसी यूनिट की तलाश में था. शायद अजय ने इसे ढूंढ़ कर इस की रिकौर्डिंग कर ली थी. अब इंस्पैक्टर ने वीडियो को दोचार बार देख जगह की पहचान की और गुपचुप तरीके से वहां छापा मार कर सभी अपराधी पकड़ लिए. लेकिन कुछ सवाल अभी बाकी थे और असली कातिल उन से दूर था.

पुलिस वालों ने अनवर के घर के इर्दगिर्द मोरचाबंदी कर ली. शोरगुल सुन कर घर के  सब लोग उठ कर वहां आ गए और सारी बात पता चलने पर सब के मुंह खुले के खुले रह गए.

‘‘इस से यह बात तो बिलकुल साफ हो जाती है कि उन का कोई न कोई आदमी खुलेआम बाहर घूम रहा है और अब इस केस से जुड़े सभी लोगों को मार कर वह अपने साथियों का बदला लेगा. यूसुफ अंकल आज सुबह घर वापस जाने वाले थे, इसलिए पहले उन्हें निशाने पर लिया गया. अगला नंबर हमारा होगा या फिर इंस्पैक्टर अंकल का,’’ साहिल बोला.

‘‘लेकिन यूसुफ अंकल ने कहा था कि उन लोगों को कल की घटना से पहले उन के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और कल जब हम उन्हें पकड़ कर पुलिस स्टेशन लाए, तब से एक औल्टो कार हमारा पीछा कर रही थी. शाम तक वे लोग वहीं बाहर ही छिपे थे जहां से पुलिस ने उन्हें पकड़ा था यानी उन के अलावा गैंग के किसी मैंबर को यूसुफ अंकल के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. इस का मतलब यह हुआ कि औल्टो वालों ने पकड़े जाने से पहले किसी को इस बारे में बताया और वह जो भी था, वह उन के अड्डे पर नहीं बल्कि कहीं और था.’’

उस की बातों को ध्यान से सुन रहा फैजल बोला, ‘‘और अगर इस तरह की सिचुएशन में कोई आदमी फोन करेगा तो जरूर गैंग के किसी महत्त्वपूर्ण आदमी को ही करेगा. जो रिकौर्डिंग हम ने देखी थी उस के हिसाब से वे कुल 17 आदमी थे. 15 वहां से अरैस्ट हुए और 2 औल्टो वाले, तो पूरे 17 तो हो गए. फिर यह 18वां आदमी कहां से पैदा हो गया?’’ फैजल का दिमाग बड़ी तेजी से काम कर रहा था, ‘‘17 आदमी वहां काम करते थे, मतलब वर्कर्स थे, तो इन वर्कर्स का कोई मालिक यानी बौस भी होना चाहिए. वही बौस जिसे उन्होंने फोन कर के खबर दी और जिस ने यूसुफ अंकल को मारा. कौन हो सकता है यह आदमी?’’

इतने में इंस्पैक्टर रमेश आ पहुंचे, उन्होंने बताया कि रामगढ़ लौंज नाम के होटल के जिस कमरे में यूसुफ ठहरा हुआ था, वहीं उस की लाश पड़ी मिली है. उस की हत्या भी गोली मार कर की गई है और अस्तबल जैसे ही बड़े जूतों के निशान वहां से भी मिले हैं यानी अजय और यूसुफ दोनों का कातिल एक ही है.

‘‘कोई और खास बात जो आप ने वहां देखी हो?’’ फैजल ने पूछा.

‘‘और तो कुछ खास नहीं, पर यूसुफ के चेहरे पर जो भाव थे, वे कुछ अजीब से थे. जैसे हैरान और कुछ समझ न पा रहा हो.’’

फैजल कुछ सोचने लगा. अचानक उस ने अपना फोन निकाला और जल्दीजल्दी दोचार बटन दबा कर स्क्रीन देखने लगा.

करीब 5 मिनट बाद उस के चेहरे के भाव एकदम बदल गए और वह ऐसे खुश नजर आने लगा, मानो उसे कोई खजाना मिल गया हो. फिर वह इंस्पैक्टर रमेश के पास पहुंचा और बोला, ‘‘अंकल, आप के पास अजय के घर का नंबर है न, वहां फोन लगाइए और आंटी को कहिए कि हम अभी आधे घंटे में उन के घर आ रहे हैं. मुझे ऐसा लगता है कि अंकल की अलमारी में एक फाइल थी, जिस से हमें कोई काम की बात पता चल सकती है.’’

‘‘फैजल, इस समय कातिल बौराया हुआ घूम रहा है. तुम लोगों का बाहर जाना ठीक नहीं होगा,’’ इंस्पैक्टर ने कहा.

‘‘अरे, आप फोन लगाइए तो सही. मुझे समझ आ गया है कि कातिल कौन है और मेरे पास उसे पकड़ने का पूरा प्लान भी है.’’

इंस्पैक्टर रमेश ने फोन उठाया और अजय की पत्नी यास्मिन को वैसा ही कह दिया जैसा फैजल ने बताया था.

‘‘अब सब लोग ध्यान से मेरी बात सुनिए…’’ फैजल धीमी आवाज में उन्हें कुछ समझाने लगा.

जब वह चुप हुआ तो सब के चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे.

इंस्पैक्टर रमेश ने जल्दीजल्दी 3-4 फोन मिलाए, कुछ हिदायतें दीं और कुछ सामान लाने का और्डर दिया. फिर बैठ कर किसी का इंतजार करने लगा. साहिल, फैजल और अनवर मामू तैयार होने चले गए. कुछ ही देर में एक सिपाही सारा सामान ले कर आ गया और सब लोग बाहर जा कर जीप में बैठ गए.

अजय के घर पहुंच कर वे चारों जब ड्राइंगरूम में पहुंचे तो यास्मिन उन का इंतजार कर रही थी.

‘‘आइएआइए, मैं ने सुना है कल गांव में बहुत सारे आतंकवादी पकड़े गए. क्या यह सच है? और उस पहेली का कोई हल सूझा तुम्हें फैजल?क्या उसी के लिए तुम्हें वह फाइल चैक करनी है? आओ, तुम खुद ही देख कर निकाल लो, जो फाइल तुम्हें चाहिए.’’

अजय के कमरे से नीले रंग की एक फाइल ले कर वे फिर से ड्राइंगरूम में आ गए.

‘‘तुम इसे चैक करो, मैं चाय ले कर आती हूं,’’ कह कर यास्मिन किचन में चली गई?

कुछ ही पल बीते थे कि अचानक पिछले दरवाजे से दबेपांव एक बड़ेबड़े जूतों वाला नकाबपोश कमरे में दाखिल हुआ. उस के दोनों हाथों में रिवाल्वर थे, जिन में साइलैंसर लगे हुए थे. फाइल पर झुके चारों लोगों ने चौंक कर उस की ओर देखा ही था कि पिट…पिट…पिट…पिट… किसी को पलक झपकाने का मौका दिए बगैर उस ने चारों के सीने में गोलियां उतार दीं. दर्द भरी चीखों के साथ वे नीचे गिर पड़े. जितनी फुरती से नकाबपोश अंदर आया था, उतनी ही फुरती के साथ बाहर की तरफ लपका, लेकिन दरवाजे तक पहुंचने से पहले ही 8-10 आदमियों ने उसे घेर कर बुरी तरह जकड़ लिया और उस से दोनों रिवाल्वर छीन लिए. इस से पहले कि वह कुछ समझ पाता, उसे रस्सियों से बांध दिया गया. तभी चारों लाशें अपनेअपने कपड़े झाड़ती हुई उठ खड़ी हुईं. उन सब के चेहरे पर शरारती मुसकराहट थी.

‘‘क्यों, कैसी रही यास्मिन आंटी?’’ साहिल ने एक आंख दबाते हुए पूछा और फैजल ने उन का नकाब खींच कर दूर फेंक दिया.

‘‘आप ने क्या समझा था कि हम सब गोलगप्पे हैं जो आप एक मिनट में गटक जाएंगी?’’ कहते हुए फैजल शर्ट का एक बटन खोल कर अंदर पहनी बुलेटप्रूफ जैकेट की तरफ इशारा करते हुए बोला, ‘‘हमें हजम करना इतना आसान नहीं है.’’

यास्मिन गुस्से से बड़बड़ाती हुई बोली, ‘‘मैं तुम्हें छोडं़ूगी नहीं. तुम ने मेरी बरसों की मेहनत पर पानी फेर दिया. मैं ने ये सब करने में अपनी सारी जिंदगी गुजार दी और तुम लोगों की वजह से एक पल में सब तहसनहस हो गया,’’ और फूटफूट कर रोने लगी.

‘‘मतलब आप बहुत छोटी उम्र से ही इन सब कामों में लगी हुई थीं?’’ इंस्पैक्टर रमेश हैरानी से बोले.

‘‘हां, अनाथाश्रम में रहते हुए मेरी पहचान इन लोगों से हुई थी और तभी से मैं इन के साथ काम कर रही हूं.’’

‘‘क्या आप को पता था कि अजय सीक्रेट एजेंट हैं?’’

‘‘अगर पता होता तो क्या मैं उन से शादी करती? यहां रामगढ़ में आ कर बसने की जिद भी मैं ने ही उन से की थी ताकि मुझे अपना काम करने में आसानी रहे. अगर मुझे जरा भी भनक होती तो मैं कभी यहां नहीं आती.’’

‘‘अजय के लापता होने में भी आप का हाथ था?’’

‘‘बिलकुल नहीं, मैं और मेरे आदमी तो खुद उन्हें ढूंढ़ रहे थे. उन्हें न जाने कब यहां चल रही गतिविधियों पर शक हो गया और एक दिन मेरे आदमी का पीछा करतेकरते वे मेरे अड्डे तक पहुंच गए. जब वे वहां से वापस भाग रहे थे, तो मेरे एक आदमी ने उन्हें देख लिया और मुझे खबर दी. उसे यह नहीं पता था कि अजय ने वहां कुछ रिकौर्ड भी किया है.

‘‘मैं ने तभी फैसला कर लिया कि उन के घर आते ही मैं उन्हें खत्म कर दूंगी, लेकिन वे घर आए ही नहीं. उन्हें रास्ते में ही पता चल गया कि कुछ आदमी उन का पीछा कर रहे हैं. उन्होंने एक पब्लिक बूथ में घुस कर किसी को फोन किया, लेकिन जिस से वे बात करना चाहते थे वह आदमी कुछ दिन के लिए बाहर गया हुआ था. बूथ के बाहर खड़ा मेरा आदमी सारी बातें सुन रहा था. फोन पर बात करने के बाद वे कुछ निराश हो गए और वहां से निकलने के कुछ ही देर बाद उन आदमियों को चकमा दे कर भागने में सफल हो गए.’’

‘‘ओह, अब समझा,’’ बीच में ही फैजल बोला, ‘‘जरूर अजय ने अपने पुराने चीफ को फोन किया होगा और जब वे नहीं मिले तो उन्होंने 15-20 दिन तक मैमोरीकार्ड को इन लोगों से बचाने के लिए अलगअलग भेष बदल कर यह सारा सैटअप किया.’’

‘‘तभी तो हम उन्हें पकड़ नहीं पाए. उसी दिन मैं ने उन के लापता होने की रिपोर्ट लिखवाई. अब मेरे आदमियों के साथसाथ पुलिस भी उन के पीछे थी. 8वें दिन मुझे उन के अस्तबल में होने की खबर मिली और मैं वहां पहुंच गई. मैं ने जानबूझ कर बड़े साइज के मर्दाना जूते पहने थे ताकि मुझ पर किसी को शक न हो.

‘‘मुझे इस रूप में देख कर पहले तो वे दुखी और हैरान हुए लेकिन जल्दी ही संभल गए. जिस तरह से उन्होंने मुझ से मुकाबला किया, उसे देख कर मैं हैरान थी. बड़ा संघर्ष करना पड़ा मुझे उन्हें मारने में. गिरतेगिरते जब उन्होंने मूंछें और भवें उतार कर फेंकीं, तब मैं उन की यह चाल समझ नहीं पाई. वह तो बाद में पता चला कि उन्होंने जानबूझ कर ऐसा किया ताकि उन के पहले के जानने वाले लोग उन्हें आसानी से पहचान सकें.

‘‘मरतेमरते उन्होंने मुझे एक और धोखा दिया. दूसरी गोली लगने के बाद उन्होंने सांस रोक कर ऐसा नाटक किया जैसे मर गए हों. अच्छी तरह चैक करने के बाद मैं वहां से निकल गई और उस के  बाद उन्होंने वह संदेश लिख दिया. सुबह जब मैं रोतीपीटती वहां पहुंची तो उन्हें देख कर चौंकी. लेकिन समझ कुछ नहीं आया. इसीलिए मैं ने तुम लोगों के पीछे 24 घंटे आदमी लगा दिए ताकि तुम्हारी सारी रिपोर्ट मुझ तक पहुंचती रहे, लेकिन एक बात समझ नहीं आई. तुम्हें मेरे बारे में पता कैसे चला?’’

‘‘फैजल मुसकराया, मुझे जब से यह पता चला कि अजय सीक्रेट एजेंट थे, तब से मुझे एक बात बारबार खटक रही थी कि अजय इतना बड़ा राज इस तरीके से बता कर गए, पर अपने खूनी का नाम क्यों नहीं बता गए? मुझे लग रहा था कि वह नाम हमारे बिलकुल सामने ही कहीं है, बस नजर नहीं आ रहा है. मैं इसी दुविधा में था जब इंस्पैक्टर रमेश ने बताया कि मरते वक्त यूसुफ के चेहरे पर हैरानी और कन्फ्यूजन के भाव थे. इस का मतलब है कि वे कातिल को पहचाते थे.

‘‘इस गांव में वे किसी और को तो जानते नहीं थे. इसलिए मेरा शक सीधा अजय की पत्नी यास्मिन यानी आप पर ही गया. उसी समय मेरे दिमाग में एक और बात आई. अगर अजय ने कहीं कातिल के बारे में कोई हिंट छोड़ा होगा तो वह सिर्फ उन के आखिरी मैसेज में ही हो सकता है. इसलिए मैं ने उसे निकाल कर दोबारा चैक किया और मेरी आंखें आश्चर्य से फटी रह गईं. उन्होंने बिलकुल साफसाफ कातिल का नाम लिख रखा था,’’ कहते हुए फैजल ने कागज की एक स्लिप निकाल कर यास्मिन के आगे रख दी, जिस पर लिखा था,

‘‘जब पूरा मैसेज स्माल लैटर्स में लिखा है तो बीच में ये कैपिटल लैटर्स क्यों? रूहृढ्ढङ्घस््न. इन्हें आगेपीछे कर के देखा जाए तो बनता है यास्मिन (ङ्घ्नस्रूढ्ढहृ) अगर यह बात पहले ही मुझे सूझ गई होती तो बेचारे यूसुफ अंकल को जान से हाथ न धोना पड़ता. खैर, जो हुआ सो हुआ. ले चलो इन्हें,’’ फैजल फिर बोला.

इंस्पैक्टर रमेश ने फैजल और साहिल की पीठ थपथपाई और यास्मिन को गिरफ्तार कर लिया.

अंधविश्वास की राजनीति आखिर कबतक

देसी चुनावों में जीत पा जाना कोई कमाल की बात नहीं है खासतौर पर जब यह पैसा देने को भी तैयार हो और भक्तों का चलाया जा रहा मीडिया लोगों को पाखंडी और अंधविश्वासी के साथ राज्य की भक्ति भी सिखा रहा. नेता की ताकत तो तब दिखती है जब दूसरे देश उस की सुनते हों, उसे नाराज करने की हिम्मत न करते हों.

नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री होने की वजह से बारीबारी से मिलने वाली जी-20, बड़े 20 देशों की संस्था के अध्यक्ष बने हैं पर उन के अध्यक्ष की कुर्सी लेने के कुछ दिन बाद ही चीन ने अरुणाचल प्रदेश में घुसपैठ शुरू कर दी यही नहीं, मुसलिम देशों के संगठन औगैंनाइजेशन औफ इस्लामिक कंट्रीज के महासचिव ने भारत के कश्मीर के उस हिस्से का दौरा कर लिया जो पाकिस्तान ने 1947 से जबरन दबोच रखा है.

अच्छा नेता वह होता है जिस का खौफ न हो तो कम से कम इज्जत हो कि उसे अपने देश में नीचा देखने की जरूरत न पड़े. पाकिस्तान के कब्जे वाली कश्मीर घूमने जाने से या अरुणाचल प्रदेश में घुस जाने से भारत टूटने नहीं वाला, न उसे…..है पर यह सवाल जरूर कर सकता है कि जब केंद्र में दिल्ली में बैठी सरकार इतनी मजबूत है तो ऐसा हो ही क्यों रहा है.

अपने देश में अपने बलबूते पर चुनाव जीतना किसी देश के नेता के लिए काफी नहीं है. हर देश का नेता चुनाव जीत कर या लड़ कर जीत कर ही नेता बनता है. बड़ा नेता वह होता है जिस की सब की इज्जत करें. जवाहरलाल नेहरू ने 1962 में धोखा खाया था. उन्हें लगा कि महात्मा गांधी के शिष्य होने की वजह से उन्हें दुनिया भर में इज्जत मिलेगी और चाहे चुनाव उन्होंने जीते हो, बेहद लोकप्रिय रहे हो. कानून मानने वाले रहे हों, माओ त्से तुंग के चीन ने. 1862 में हमला कर के मोहभंग कर दिया.

आज भारत ऐसे मोड़ पर बैठा है जहां अपनी गिनती की वजह से, सस्ती मजदूरी की वजह से, बड़ा देश होने की वजह से, सडक़ों, हवाई अड्डों, रेलों के जाल की वजह से वह दुनिया के किसी भी देश से बढ़ कर बन सकता है. पर हो क्या हो रहा है. एक चीन और इस्लामिक देश अपने तेवर दिखा रहे है और दूसरी तरफ भारतीय मजदूर कोठियों में नौकरियां करने के लिए खुद को गुलाम बना कर दुनिया भर में घटिया काम करने के लिए जा रहे हैं.

हमारा हाल तो यह है कि हमारे पढ़ेलिखे ही पढऩे के लिए बाहर जा रहे हैं. देश में अमनचैन की बात की जाती है पर हर साल 2 लाख ङ्क्षहदुस्तानी अपनी नागरिकता छोड़ कर दूसरे देश की नागरिकता अपना लेते हैं.

देश को चलाने के बैलेट या बुलेट की नहीं, सही बैल्ट वाली नीतियों की जरूरत है जो हमारी खिसकती फटी पैंट को रोक सके. देश बाहरी खतरों से ज्यादा तो अदरुनी खतरों से परेशान है और इसीलिए बाहर वाले शेर हो रहे हैं.

आरक्षण का हल है दूसरी जाति में शादी

पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में यह साफ किया था कि अगर कोई आरक्षित कोटे यानी दलित या आदिवासी मांबाप किसी सामान्य जाति के बच्चे को गोद लेते हैं, तो उस बच्चे से आरक्षण प्रमाणपत्र का फायदा छीना नहीं जा सकता.

हाईकोर्ट की जज जयश्री ठाकुर ने साफ किया कि इस बात का कोई सुबूत नहीं है कि फरियादी ने अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र गलत तरीके से हासिल किया था. दरअसल, एक मामले में फरियादी रतेज भारती ने अदालत को बताया था कि उस का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में साल 1967 में हुआ था. उस के पैदा होने के तुरंत बाद उस की मां की मौत हो गई थी. रतेज भारती जब 10 साल का था, तब उसे रामदासिया जाति के पतिपत्नी ने गोद ले लिया था. इस बाबत बाकायदा कानूनी गोदनामा तैयार कराया गया था.

साल 1992 में आरक्षित समुदाय के मांबाप की औलाद होने की बिना पर रतेज भारती ने आरक्षण का प्रमाणपत्र बनवाया था. 2 साल बाद ही उस ने इस प्रमाणपत्र की बिना पर सरकारी नौकरी भी हासिल कर ली थी.

लेकिन जनवरी, 2014 में सरकार ने यह कहते हुए रतेज भारती को नौकरी से निकाल दिया था कि चूंकि उस का गोद लिया जाना जायज नहीं है, इसलिए वह आरक्षित जाति के प्रमाणपत्र पर नौकरी करने का हकदार नहीं है.

रतेज भारती ने हिम्मत नहीं हारी और अदालत का दरवाजा खटखटाया. 2 दफा उस के जाति प्रमाणपत्र की जांच हुई और दोनों ही बार वह सही पाया गया. लिहाजा, हाईकोर्ट ने उस की नौकरी बहाली का हुक्म जारी कर दिया.

1. कोई गड़बड़झाला नहीं

 इस फैसले से एकसाथ कई अहम बातें उजागर हुईं कि आरक्षण गोद लिए गए बच्चे का हक है यानी दलित समुदाय के मांबाप ऊंची जाति वाले बच्चे को गोद लें, तो बच्चा ठीक वैसे ही आरक्षण का हकदार होता है, जैसे गोद लेने वाले मांबाप की जायदाद में वह हकदार हो जाता है और उसे दूसरे कई हक व जिम्मेदारियां भी मिल जाती हैं.

यह तो रतेज भारती के दलित मांबाप की दरियादिली थी कि जब उस अनाथ को कोई सहारा नहीं दे रहा था, तब उन्होंने उसे गोद ले कर उस की परवरिश की और पढ़ाईलिखाई की जिम्मेदारी उठाई यानी गोद लेते ही रतेज भारती ब्राह्मण से दलित हो गया.

संविधान बनाने वालों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आारक्षण से ताल्लुक रखते ऐसे मामले भी सामने आएंगे, इसलिए उन का ध्यान इस तरफ नहीं गया कि गोद लिए बच्चे की हालत पर भी गौर किया जाए, चाहे फिर वह सवर्ण मांबाप द्वारा गोद लिया गया दलित बच्चा हो या फिर दलित मांबाप द्वारा गोद लिया गया सवर्ण बच्चा.

इसी तरह संविधान में यह भी साफसाफ नहीं लिखा है कि अगर एक दलित नौजवान सवर्ण लड़की से शादी करता है, तो उन की औलाद को आरक्षण का फायदा मिलेगा या नहीं. इसी तरह कोई सवर्ण नौजवान दलित लड़की से शादी करता है, तो उस की औलाद को आरक्षण का फायदा मिलेगा या नहीं.

इस तरह के सैकड़ों मुकदमे देशभर की अदालतों में चल चुके हैं, जिन में से ज्यादातर में फैसला यह आया है कि अगर दलित और सवर्ण लड़का या लड़की शादी करते हैं, तो उन की औलाद को आरक्षण का फायदा मिलेगा. ऐसे मामलों में हालांकि अदालतों को भी फैसला लेना आसान काम नहीं होता, खासतौर से उस हालत में जब पिता सवर्ण और मां दलित हो. चूंकि बच्चे का नाम और जाति पिता से चलते हैं, इसलिए कुछ मामलों में अदालतों ने सवर्ण पिता की दलित पत्नी से हुई औलाद को आरक्षण देने में हिचकिचाहट भी दिखाई है.

यह तय है कि कानून मानता है कि बच्चे की परवरिश किस माहौल में हुई है. यह बात ज्यादा अहम है, बजाय इस के कि वह किस जाति में पैदा हुआ है.

अगर कोई ब्राह्मण या दूसरे सवर्ण मांबाप दलित बच्चे को गोद लेते हैं, तो उन की परवरिश का माहौल बदल जाता है और उसे जातिगत जोरजुल्म व उन परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ता, जिन से दलित बच्चे रूबरू होते हैं.

ऐसे मामले बहुत कम तादाद में अदालतों में जाते हैं, इसलिए थोड़ाबहुत बवाल उन पर सुनवाई और फैसले के वक्त मचता है, फिर सब भूल जाते हैं कि खामी क्या है और इस का हल क्या है.

2. शादी है जरूरी

दलितों और सवर्णों के बीच आरक्षण को ले कर हमेशा से ही बैर रहा है, पर बीते 4 सालों में यह उम्मीद से ज्यादा बढ़ा है, तो इस की एक वजह सियासी भी है, जिस के तहत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अकसर आरक्षण पर दोबारा सोचविचार की बात कहता रहता है. इस से दलितों व आदिवासियों को लगता है कि ऊंची जाति वालों की पार्टी भारतीय जनता पार्टी की सरकार उन से आरक्षण छीनना चाहती है.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में दलितों ने भाजपा को भी वोट दिए, तो ऐसा लगा कि बारबार की घुड़की के चलते दलित तबका डर गया है और भाजपा को चुनने की उस की एक वजह यह भी है कि वह उन के वोट ले ले, पर आरक्षण न छीने.

कांग्रेस भी यही बात कहती रही थी कि आरक्षण व्यवस्था को बनाए रखना है, तो उसे वोट दो. हालांकि इस बाबत उस का तरीका दूसरा था.

इन सियासी दांवपेंचों से परे एक अहम सामाजिक सच यह भी है कि अगर ऊंची और नीची जाति वाले आपस में शादी करने लगें, तो क्या हर्ज है. इस से या तो आरक्षण खत्म हो जाएगा या फिर हमेशा के लिए बना रहेगा, जिस का फायदा दोनों तबकों की नई नस्ल को मिलेगा. बजाय फिर से कोई आयोग बनाने के लिए सरकार यह फैसला ले ले कि ऊंची और नीची जाति वाले अगर आपस में शादी करें, तो उन की औलाद का आरक्षण सलामत रहेगा, तो देश की तसवीर बदल भी सकती है.

दूसरा फायदा इस से जातिवाद को खत्म करने का मिलेगा. जिस सामाजिक समरसता की बात भाजपा और संघ कर रहे हैं, वह असल में दलितों के साथ नहाने या उन के साथ बैठ कर खाना खाने से पूरी नहीं हो जाती. दूसरी जाति में बड़े पैमाने पर शादियां आपसी बैर खत्म कर सकती हैं यानी रोटी के साथसाथ बेटी के संबंध भी इन दोनों तबकों के बीच बनने चाहिए.

रोजमर्रा की जिंदगी के अलावा सोशल मीडिया पर ऊंची और नीची जाति वाले आरक्षण को ले कर एकदूसरे पर इलजाम लगाते रहते हैं और आरक्षण की समस्या के तरहतरह के हल भी सुझाते रहते हैं.

ऊंची जाति वालों का हमेशा से कहना रहा है कि नाकाबिल लोग सरकारी नौकरियों में घुस कर उन का हक मार रहे हैं, जबकि दलित समुदाय के लोग कहते हैं कि सदियों से उन पर जाति की बिना पर जुल्म ढाए जाते रहे हैं, क्योंकि वे धार्मिक और सामाजिक लिहाज से दलित और निचले हैं. अब अगर उन की तरक्की हो रही है, वे भी पढ़लिख कर सरकारी नौकरियों में आ कर अपनी दशा सुधार रहे हैं, तो हल्ला क्यों? यह तो उन का संवैधानिक हक है.

रतेज भारती दलित मांबाप के साथ खुश हैं. जातपांत का बंधन एक गोदनामे से टूटा, तो शादियों के जरीए वह बड़े पैमाने पर भी टूट सकता है. इस बाबत सोशल मीडिया पर बड़े दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण ढंग से ऐसे सुझाव दिए जा रहे हैं:

* अगर आरक्षण खत्म करना है या फिर उसे आर्थिक आधार पर लागू करना है, तो यह बहुत मामूली काम है.

* आरक्षण का फायदा ले कर जितने दलित बेहतर सामाजिक हालात में आ चुके हैं, उन का यज्ञोपवीत यानी जनेऊ संस्कार करा कर उन्हें ब्राह्मण जाति में शामिल कर लिया जाए. इस से वे आरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगे.

* फिर उतनी ही तादाद में गरीब ब्राह्मणबनिए, जो आरक्षण का फायदा लेना चाहते हैं, दलितों में अपने बेटेबेटियों की शादी करें, उन के साथ खाना खाएं, उन के साथ रोटीबेटी का रिश्ता बना कर दलित हो जाएं और आरक्षण का फायदा लें. ऐसा लगातार हर साल होते रहना चाहिए.

* हर कोई आरक्षण चाहता है, तो आजादी के इतने सालों बाद भी चल रही जाति प्रथा का जहर भी तो ले.

* जिस माली आधार पर आरक्षण छीने जाने की वकालत हो रही है, उसे सामान्य जाति का ब्राह्मणबनिया होने का हक भी तो दीजिए, क्योंकि आरक्षण से बाहर होने के बाद तो वे सामान्य जाति में होने का हक तो रखते हैं.

* गरीब ब्राह्मण आरक्षण तो ले, पर जैसा कि धार्मिक किताबों में कहा गया है कि ब्रह्मा के मुंह से पैदा हुए थे, तो इंसाफ नहीं हुआ. दलित कलक्टर और आरक्षण छोड़ देने के बाद भी दलित हो, यह कौन सा इंसाफ हुआ?

* हर दलित ब्राह्मण हो कर आरक्षण के दायरे से बाहर आना चाहेगा. यह बात और है कि कोई भी सवर्ण जाति वाला नीची जाति वालों में महज आरक्षण के लिए बेटी की शादी नहीं करने वाला.

इन बातों पर गौर किया जाना चाहिए, जो देश और समाज से जातिवाद को खत्म करने में कारगर हो सकती हैं. ये सुझाव एक चुनौती भी हैं कि क्या ऊंची जाति वाले वाकई ऐसा चाहते हैं या आरक्षण खत्म कर फिर से नीची जाति वालों को दबाए रखने के लिए उन पर पहले की तरह जुल्म ढाते रहेंगे?

नक्सली ने खोली नक्सलवाद की पोलपट्टी

झारखंड के हार्डकोर नक्सली कुंदन पाहन ने आत्मसमर्पण करने के बाद माओवादियों और नक्सलियों की पोलपट्टी खोल कर रख दी है. कुंदन पाहन ने पुलिस को बताया कि माओवादी संगठन के ज्यादातर नक्सली नेता खुद ही नए जमींदार बन बैठे हैं. वे सूद पर पैसा लगाने से ले कर ठेकेदारी का काम करने लगे हैं.

करोड़पति नक्सली कुंदन पर 128 मामले दर्ज हैं. उस के सिर पर 15 लाख रुपए का इनाम था. गौरतलब है कि कुछ समय पहले खुफिया विभाग ने सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी कि सरकारी योजनाओं में कई नक्सली पेटी कौंट्रैक्टर के तौर पर काम कर रहे हैं. वे सरकारी योजनाओं के ठेके हासिल करने वाली बड़ीबड़ी कंपनियों को धमका कर छोटेछोटे कामों के ठेके अपने हाथ में ले लेते हैं. बड़ी कंपनियां इस डर से नक्सलियों को ठेके दे देती हैं कि काम आसानी से हो सकेगा और दूसरे अपराधियों की ओर से कोई परेशानी खड़ी नहीं की जाएगी.

खुफिया विभाग ने कुछ साल पहले ही राज्य सरकार को बताया था कि पेटी कौंट्रैक्टर के काम में लग कर कई नक्सली करोड़पति बन बैठे हैं. पुलिस महकमे से मिली जानकारी के मुताबिक, कुछ समय पहले पटना, बिहार में पकड़े गए नक्सलियों के पास से 68 लाख रुपए बरामद हुए थे. जहानाबाद में गिरफ्तार नक्सलियों के पास से 27 लाख, 50 हजार रुपए और 5 मोबाइल फोन जब्त किए गए थे.

औरंगाबाद में नक्सलियों के पास से 3 लाख, 34 हजार रुपए और एक बोलैरो गाड़ी, गया में 15 लाख रुपए, मुंगेर में एक कार, 50 हजार रुपए, पिस्तौल वगैरह सामान बरामद किए गए थे.

कुंदन पाहन ने बताया कि माओवादी संगठन के ऊंचे पदों पर बैठे नक्सलियों के बच्चे बड़ेबड़े अंगरेजी स्कूलों में पढ़ते हैं और छोटे नक्सलियों से गांवों के स्कूलों को बम से उड़ाने को कहा जाता है. जहां एक ओर बड़े नक्सली शानोशौकत की जिंदगी गुजारते हैं, वहीं दूसरी ओर जंगल में दिनरात बंदूक ढोने वाले नक्सलियों के परिवार दानेदाने को मुहताज रहते हैं.

पुलिस हैडर्क्वाटर के सूत्रों पर भरोसा करें, तो बिहार के कई नक्सलियों की करोड़ों की दौलत पता लगाने का काम शुरू किया गया है. उस के बाद उन की गैरकानूनी तरीके से बनाई गई जायदाद को जब्त करने का काम शुरू किया जा सकता है.

हार्डकोर नक्सली कुंदन पाहन का पुलिस ने 14 मई को आत्मसमर्पण कराया था. 77 हत्याएं करने की बात कबूलने वाले कुंदन ने पुलिस को कोई हथियार नहीं सौंपा था.

कुंदन करोड़पति है और उस ने झारखंड के बुंडू, तमाड़, अड़की, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम जिलों के कारोबारियों समेत ओडिशा के दर्जनों कारोबारियों को सूद पर रकम दे रखी है.

कुंदन किसी राजनीतिक दल से चुनाव लड़ने का मन बना रहा है. वह इस की पूरी तैयारी भी कर चुका है. उस ने साफतौर पर कहा है कि वह जेल से ही चुनाव लड़ेगा और चुनाव जीतने के बाद अपने इलाके की तरक्की करेगा.

भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (माओवादी), झारखंड की क्षेत्रीय समिति के सचिव कुंदन ने साल 2008 में स्पैशल ब्रांच के इंस्पैक्टर फ्रांसिस इंडवर की हत्या की थी. उसी साल सरांडा के जंगल में डीएसपी प्रमोद कुमार की हत्या की थी. आईसीआईसीआई बैंक के 5 करोड़ रुपए और सवा किलो सोना लूटने के बाद संगठन में उस की तूती बोलने लगी थी. उस के बाद उस ने सांसद सुनील महतो और विधायक रमेश मुंडा को मार डाला था.

कुंदन के खिलाफ रांची में 42, खूंटी में 50, चाईबासा में 27, सरायकेला में 7 और गुमला जिले में एक मामला अलगअलग थानों में दर्ज है. उस से पूछताछ के बाद मिली जानकारी के बाद झारखंड पुलिस रांची, खूंटी, लोहरदगा, गुमला, सरांडा, पूर्वी सिंहभूम और पश्चिम बंगाल से सटे इलाकों में जम कर छापामारी कर रही है.

बैंक से करोड़ों की लूट के बाद रुपए के बंटवारे को ले कर कुंदन और उस के करीबी दोस्त राजेश टोप्पो के बीच तीखी झड़प हो गई थी. कुंदन लूट की रकम में ज्यादा हिस्सा लेना चाहता था और राजेश बराबरबराबर बांटने की जिद पर अड़ा हुआ था. दोनों के बीच का झगड़ा इतना बढ़ा कि उन्होंने अपने रास्ते अलगअलग कर लिए.

राजेश ने अपना अलग दस्ता बना लिया. उस के बाद वह संगठन में कुंदन को नीचा दिखाने की ताक में रहने लगा. कुछ दिनों के बाद ही उसे बड़ा मौका मिल भी गया. राहे इलाके में राजेश की अगुआई वाले दस्ते ने 5 पुलिस वालों की हत्या कर दी और उन से हथियारों को लूट लिया.

इस के बाद संगठन में राजेश की हैसियत रातोंरात काफी बढ़ गई. उसे संगठन में काफी तवज्जुह मिलने लगी. संगठन के बड़े नक्सली नेताओं द्वारा राजेश को ज्यादा तरजीह देने से कुंदन नाराज रहने लगा. उस ने राजेश को अपने रास्ते से हटाने की साजिश रचनी शुरू कर दी. उस ने झांसा दे कर राजेश को अड़की के जंगल में बुलवाया और वहीं उस की हत्या कर दी.

पहले तो नक्सली नेता यह समझ बैठे कि पुलिस की मुठभेड़ में राजेश की जान गई है, पर बाद में उन्हें पता चला कि कुंदन ने उसे धोखे से मार डाला है, तो संगठन के सभी नक्सली नेता उस से नाराज हो गए. संगठन ने कुंदन के पर कतर डाले और उसे अलगथलग कर दिया. इस के बाद से ही उस ने आत्मसमर्पण करने की प्लानिंग शुरू कर दी थी.

रांचीटाटा हाईवे पर कुंदन की दहशत पिछले कई सालों से कायम थी. शाम ढलते ही हाईवे पर सन्नाटा पसरने लगता था. बुंडू और तमाड़ इलाकों के बाजार शाम होते ही बंद हो जाते थे. नेताओं और सरकारी अफसरों के बीच उस का खौफ इतना ज्यादा था कि अगर उन्हें शाम के बाद हाईवे से गुजरना होता था, तो पूरे रास्ते पर सीआरपीएफ के जवानों की तैनाती कर दी जाती थी.

खूंटी जिले का रहने वाला कुंदन साल 1998-99 में अपने 2 बड़े भाइयों डिंबा पाहन और श्याम पाहन के साथ नक्सली दस्ते में शामिल हुआ था. उस समय कुंदन की उम्र महज 17 साल थी. कुंदन और उस के परिवार वालों के पास अड़की ब्लौक के बाड़गाड़ा गांव में 27 सौ एकड़ जमीन है. उस में से तकरीबन 1350 एकड़ जमीन पर उस के एक चाचा ने कब्जा जमा रखा है.

तमाड़ में आल झारखंड स्टूडैंट यूनियन के विधायक विकास मुंडा कुंदन के आत्मसमर्पण करने के तरीके को गलत बताते हुए सरकार से नाराज हैं. कुंदन ने ही लैंडमाइंस ब्लास्ट कर के उन के पिता रमेश मुंडा की हत्या कर दी थी.

गणेश की शातिर सोच ने उसे बनाया अपराधी

उत्तर प्रदेश के जिला वाराणसी के थाना भेलूपुर में प्रमोद कुमार पत्नी और 3 बच्चों के साथ हंसीखुशी से रहता था. शुभम उस का सब से छोटा बेटा था, जो सभी का लाडला था. गुरुवार 27 अक्तूबर, 2016 को अचानक वह गायब हो गया तो पूरा परिवार परेशान हो उठा.13 महीने का शुभम जब कहीं दिखाई नहीं दिया तो उस की तलाश शुरू हुई. उस के बारे में आसपास के घरों में पूछा गया तो जल्दी ही उस के गायब होने की खबर पूरे मोहल्ले में फैल गई. इस के बाद मोहल्ले के भी कुछ लोग मदद के लिए आ गए. जब शुभम का कहीं कुछ पता नहीं चला तो बिना देर किए सलाह कर के सब उस के गुम होने की सूचना थाना भेलूपुर पुलिस को देने पहुंच गए.

थानाप्रभारी इंसपेक्टर राजीव कुमार सिंह को जब 13 महीने के शुभम के गायब होने की तहरीर दी गई तो उन्होंने गुमशुदगी दर्ज करा कर शुभम की फोटो ले कर प्रमोद कुमार तथा उन के साथ आए लोगों को धैर्य बंधाते हुए कहा, ‘‘आप लोग बिलकुल मत घबराइए, शुभम को कुछ नहीं होगा. हम उसे जल्द ही ढूंढ निकालेंगे.’’

इस के बाद राजीव कुमार सिंह ने आवश्यक जानकारी ले कर सभी को घर भेज दिया. एक मासूम की गुमशुदगी की बात थी, इसलिए उन्होंने इस की जानकारी अधिकारियों को दे कर थाने में मौजूद सिपाहियों को बच्चे की तलाश में लगा दिया. इस के अलावा इलाके के सभी मुखबिरों को भी सतर्क कर दिया.

प्रमोद की किसी से न कोई अदावत थी और न किसी से कोई विवाद था. ऐसे में यही लगता था कि बच्चे का फिरौती के लिए अपहरण किया गया होगा. लेकिन प्रमोद कुमार की इतनी हैसियत भी नहीं थी कि वह फिरौती के रूप में मोटी रकम दे सकता. फिर भी पुलिस फिरौती के लिए किए गए अपहरण को ही ध्यान में रख कर चल रही थी.

और हुआ भी वही. प्रमोद द्वारा थाने में तहरीर दे कर लौटने के थोड़ी देर बाद ही उसे एक पत्र मिला, जिस में शुभम के अपहरण की बात लिख कर उस की सकुशल वापसी के लिए 5 लाख रुपए की फिरौती मांगी गई थी.

अपहर्त्ता ने पत्र में लिखा था, ‘तुम्हारे जीजा ने मुझे बहुत परेशान किया है. अब तुम्हें अपना बेटा चाहिए तो 5 लाख रुपए दो, वरना बाद में चिडि़या खेत चुग जाएगी.’

ताज्जुब की बात यह थी कि पत्र भेजने वाला कोई और नहीं, प्रमोद कुमार के पड़ोस में ही रहने वाला गणेश राजभर था, जो औटो चलाता था. प्रमोद कुमार ने तुरंत इस बात की जानकारी थाना भेलूपुर पुलिस को तो दी ही, खुद भी गणेश की तलाश में लग गया. गणेश के घर में कोई नहीं था. पुलिस भी सूचना मिलते ही गणेश की तलाश में तेजी से जुट गई थी.

एसपी (सिटी) राजेश यादव ने सीओ राजेश श्रीवास्तव को निर्देश दिया कि किसी भी तरह गणेश को गिरफ्तार कर के शुभम को सकुशल बरामद किया जाए. इस के बाद थाना भेलूपुर पुलिस के अलावा क्राइम ब्रांच को भी गणेश की तलाश में लगा दिया गया.

आखिर पुलिस की मेहनत रंग लाई और अपहरण के 2 दिनों बाद यानी 29 अक्तूबर, 2016 को मुखबिर की सूचना पर गणेश को बच्चे के साथ मंडुआडीह रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तार करने के साथ ही उस के कब्जे से मासूम शुभम को सकुशल बरामद कर लिया गया. वह काफी डरासहमा हुआ था.

गणेश की गिरफ्तारी और मासूम शुभम की सकुशल बरामदगी के बाद एसपी (सिटी) राजेश यादव ने अपने औफिस में प्रैसवार्ता बुला कर अभियुक्त गणेश को पत्रकारों के सामने किया तो उस ने मासूम शुभम के अपहरण की जो कहानी सुनाई, वह प्रतिशोध की भावना से भरी हुई इस प्रकार थी—

वाराणसी के थाना सारनाथ के सोना तालाब का रहने वाला गणेश राजभर घर वालों से न पटने की वजह से परिवार के साथ थाना भेलूपुर के कमच्छा सट्टी स्थित अपनी ससुराल में किराए का मकान ले कर रहता था. गुजरबसर के लिए वह औटो चलाता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे थे. किराए पर रहने की वजह से उसे आर्थिक रूप से तो परेशानी होती ही थी, साथ ही बारबार कमरा बदलने से भी उसे दिक्क्त होती थी.

यही सोच कर उस ने कुछ पैसा इकट्ठा किया और जमीन लेने की योजना बनाई, जिस से वह अपना मकान बना कर उस में आराम से रह सके. इस से उस के किराए के पैसे तो बचते ही, बारबार कमरा बदलने की जहमत से भी छुटकारा मिल जाता. इस के अलावा उस में वह थोड़ीबहुत सागसब्जी की खेती भी कर लेगा, जिस से चार पैसे भी बचते.

पैसे इकट्ठा हो गए तो गणेश जमीन की तलाश में लग गया. किसी के माध्यम से उस ने प्रकाश मास्टर से साढ़े 3 लाख रुपए में एक जमीन खरीदी. लेकिन जमीन खरीदने के बाद उसे पता चला कि वह जमीन बंजर है. यह जान कर वह परेशान हो उठा. क्योंकि वहां कुछ भी नहीं हो सकता था. प्रकाश से उस ने अपने रुपए वापस मांगे तो उस ने पैसे देने से मना कर दिया. इस के बाद दोनों में अकसर तकरार होने लगी.

गणेश को जब पता चला कि प्रकाश मास्टर उस के पड़ोस में रहने वाले प्रमोद कुमार का बहनोई है तो उस के मन में शातिर और घृणित सोच ने जन्म लेना शुरू कर दिया. वह थी प्रमोद कुमार के मासूम बेटे शुभम के अपहरण की. उसे लगता था कि साले के बेटे की चाहत में प्रकाश उस के रुपए तो लौटा ही देगा, फिरौती के रूप में भी कुछ रुपए देगा.

बस फिर क्या था, अपनी इसी सोच को अंजाम देने के लिए वह मौके की तलाश में रहने लगा. आखिर 27 अक्तूबर, 2016 को उसे मौका मिल ही गया. उस समय शुभम  घर के बाहर खेल रहा था. गणेश ने अपने 14 साल के बेटे सूरज को भेज कर औटो में घुमाने के बहाने शुभम को मंगा लिया और उसे ले कर चला गया. बाद में उस ने अपने बेटे सूरज के हाथों फिरौती के लिए प्रमोद के पास चिट्ठी भिजवा दी थी.

फिरौती की चिट्ठी मिलते ही प्रमोद के घर में कोहराम मच गया था, जबकि गणेश फिरौती के 5 लाख पाने के सपने देखने लगा था. उस के ये सपने पूरे होते, उस के पहले ही पुलिस ने उसे पकड़ लिया.

दरअसल, गणेश को इस बात की जरा भी उम्मीद नहीं थी कि लोग इतनी जल्दी पुलिस को शुभम के अपहरण की सूचना दे देंगे. गणेश द्वारा शुभम के अपहरण का अपराध स्वीकार करने के बाद थाना भेलूपुर पुलिस ने उस के खिलाफ अपहरण का मुकदमा दर्ज किया और उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

दो जासूस और अनोखा रहस्य – भाग 6

अजय के कातिल की तफ्तीश करते हुए कवितारूपी पंक्तियों वाले कोड के अनुसार अनवर, इंस्पैक्टर रमेश, साहिल और फैजल शंकर गली पहुंचे और आगे की पंक्तियों के अनुसार रिमझिम ब्यूटी पार्लर ढूंढ़ा, वहां उन्हें धर्मपुत्री यानी ईशा नामक एक लड़की मिली. उन्होंने उस लड़की को बुलाया और धीरे से पासवर्ड बताया. लेकिन उस ने बताया कि यह पासवर्ड बता कर अभीअभी कोई उस से सामान ले गया है.

वे यह जान कर हैरान हुए. पूछने पर पता चला कि अजयजी उसे अपनी पुत्री की तरह मानते थे व उसे एक टैनिस बौल दे कर उन्होंने कहा था कि जो पासवर्ड बताए उसे दे देना अत: उस ने उस बाइक वाले के पासवर्ड बताने पर बौल उसे दे दी. इंस्पैक्टर ने उस से बाइक वाले का हुलिया जाना और दोनों जीपें दौड़ा दीं. कुछ दूर जा कर उन्होंने बाइक वाले को पकड़ लिया लेकिन उस ने कहा कि हम यहां सुरक्षित नहीं हैं, मुझे पुलिस स्टेशन ले चलिए, मैं वहां सब बताऊंगा मेरी जान को यहां खतरा है. अत: वे उसे पुलिस स्टेशन ले आए.

अब बोलो, क्या कहना है तुम्हें?’’

‘‘अंकल सब से पहले इस से पूछिए कि बौल कहां है?’’

उस ने किसी के बोलने से पहले ही जेब से बौल निकाल कर मेज पर रख दी और बोला, ‘‘मेरा नाम यूसुफ है. अजय और मैं साथ काम करते थे. मैं ने टीवी पर न्यूज में अजय का फोटो और उस के कत्ल की खबर देखी तो मुझ से रहा नहीं गया और मैं उस के कातिल का पता लगाने यहां आ गया. तभी से मैं आप लोगों के पीछे घूम रहा हूं.’’

‘‘तो हम से पहले इस बौल तक कैसे पहुंच गए तुम?’’

‘‘क्योंकि मैं ने अजय की आखिरी पहेली आप से पहले हल कर ली थी.’’

‘‘ओह…तो आप जेम्स बांड की औलाद हैं?’’ व्यंग्य से इंस्पैक्टर रमेश बोले.

यूसुफ ने एक ठंडी सांस भरी और आगे झुकते हुए धीमी आवाज में बोला, ‘‘मैं यह बात आप को कभी न बताता, लेकिन हालात कुछ ऐसे हो गए हैं कि मुझे सबकुछ बताना पड़ेगा. दरअसल, अजय और मैं सीक्रेट एजैंट्स थे. हम दोनों ने कई केसों पर एकसाथ काम किया. शादी कर के जल्दी रिटायरमैंट लेने के बाद अजय यहां आ कर बस गए और मैं अभी एक साल पहले ही रिटायर हुआ हूं. अजय के कत्ल के बारे में सुन कर मैं चुप कैसे बैठ सकता था?

न्यूज में दिखाए गए उन के फोटो में उन का लिखा सीजर कोड पढ़ते ही मैं समझ गया था कि जरूर वे गुपचुप तरीके से किसी गैरकानूनी गतिविधि के खिलाफ काम कर रहे होंगे और उन्हीं लोगों ने उन का कत्ल कर दिया है. सारी बात का पता लगाने मैं यहां आया. सब जगह घूमघूम कर और आप लोगों का पीछा करतेकरते आप की बातें सुनसुन कर मैं सारे कोड हल करता गया और आप से पहले ईशा से बौल लेने में सफल हो गया.

‘‘अजय और मैं ने तो अपनी सारी जिंदगी कोड बनाने और तोड़ने में ही बिताई, तो हमें तो इन का ऐक्सपर्ट होना ही था, लेकिन इन दोनों किशोरों ने जिस अक्लमंदी और होशियारी से उन्हें हल किया, वह वाकई काबिलेतारीफ है,’’ कहते हुए युसूफ ने साहिल और फैजल की पीठ थपथपाई.

‘‘और हां इंस्पैक्टर साहब, जिस फुरती से आप ने मेरा पीछा कर के मुझे ढूंढ़ा और रुकने पर मजबूर किया, उस के लिए आप की भी तारीफ करनी होगी.’’

‘‘धन्यवाद,’’ मुसकराते हुए इंस्पैक्टर बोले.

‘‘लेकिन हमारा पीछा करते हुए कातिल ने आप को भी देखा होगा, तो उस ने आप को पकड़ने या मारने की कोशिश क्यों नहीं की?’’ साहिल ने पूछा.

‘‘मैं उन्हें पता लगने देता तब न हां, लेकिन आज आप के मेरा पीछा करने और मुझे यहां पकड़ कर लाने से जरूर मैं उन की नजरों में आ गया हूं.’’

‘‘क्या आप को पता है कि इस बौल में क्या है?’’

‘‘नहीं, आप ने पता लगाने का मौका ही कहां दिया? कातिल के आदमी बराबर आप लोगों के पीछे लगे हैं, इसलिए जल्दी से जल्दी इस का राज जान कर कातिल को पकड़वा कर किस्सा खत्म कीजिए. इस के अंदर कोई चीज है. बौल को काट कर उसे बाहर निकालना होगा.’’

बौल को काटने पर उस के अंदर से एक मैमोरी कार्ड बरामद हुआ.

‘‘मैं अपने फोन में इसे लगा कर देखता हूं,’’ फैजल बोला. फोन में कार्ड लगाने पर उस ने पाया कि उस में एक वीडियो क्लिपिंग की रिकौर्डिंग है. उस रिकौर्डिंग को देखते ही उन के पैरों तले जमीन खिसक गई. उस में कुछ लोग एक तहखाने में बैठे बम बनाते हुए नजर आ रहे थे. एक कोने में बंदूकों, राइफलों और तैयार छोटेबड़े बमों के ढेर लगे हुए थे. उन की अस्पष्ट आवाज को ध्यान से सुनने पर पता चला कि वह कुल 17 लोगों की यूनिट है, जो कई साल से यह काम करते आ रहे हैं.

‘‘ये सब क्या है? देखने में तो यह जगह हमारे गांव की ही लग रही है, लेकिन यहां ये सबकुछ हो रहा है?’’ इंस्पैक्टर रमेश की आवाज में अविश्वास और घबराहट के भाव साफ झलक रहे थे. ‘‘ओह नो,’’ कुरसी पर बेचैनी से पहलू बदलते हुए यूसुफ बोला, ‘‘मेरे रिटायर होने से कुछ महीने पहले हमें खबर मिली थी कि आसपास के एरिया में कहीं आतंकवादियों का एक बड़ा अड्डा है, जहां बड़े पैमाने पर बम बना कर देश के अन्य भागों में ब्लास्ट करने के लिए सप्लाई किए जा रहे हैं. हमारा डिपार्टमैंट तभी से पड़ोसी देश की मदद से बनी इस यूनिट को ढूंढ़ने में लगा हुआ था, लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिल पाई थी.

‘‘अजय चूंकि काफी पहले रिटायर हो चुके थे, अत: उन्हें इस औपरेशन के बारे में कुछ पता नहीं था. 3 साल से इस छोटी सी जगह में रहते हुए अजय को यहां चलती इन खतरनाक ऐक्टिविटीज के बारे में पता न चलता, ऐसा तो संभव ही नहीं था. उन्होंने साबित कर दिया कि वे भारत के एक सच्चे सिपाही हैं. न जाने कितने दिन से वे इन के पीछे लगे थे. मौका मिलते ही उन्होंने यह रिकौर्डिंग कर ली होगी लेकिन उन लोगों को पता चल गया और उन्होंने उस का कत्ल कर दिया. मरतेमरते भी वे इतना पक्का इंतजाम कर गए कि यह सुबूत बिलकुल सुरक्षित है.’’

‘‘लेकिन जब अजय के पास पक्के सुबूत थे तो उन्होंने इन्हें पकड़वाया क्यों नहीं? कार्ड को ऐसे छिपा कर क्यों रखा और एक हफ्ता गांव में छिपतेछिपाते क्यों घूमते रहे?’’

‘‘यह बात मुझे भी थोड़ी अजीब लग रही है, लेकिन इतना तो पक्का है कि उस की जरूर कोई मजबूरी रही होगी. मैं तो यहां नया हूं, अत: आप लोग ही इस जगह की पहचान कीजिए. तभी हम इन लोगों को पकड़वा पाएंगे.’’

2-3 बार और रिकौर्डिंग देखने के बाद इंस्पैक्टर पहचान गए कि वह नदी के उस पार का एक छोटा सा पथरीला इलाका है, जो चारों तरफ से कंटीली झाडि़यों से घिरा हुआ है.

‘‘ऐसी जगह और इतने खतरनाक लोगों से निबटने के लिए हमारे पास न तो पुलिस फोर्स है और न ही इतने हथियार. मुझे अपने सीनियर औफिसर्स से बात करनी पड़ेगी.’’

‘‘एक बात का ध्यान रखिएगा. सारा काम बिलकुल गुपचुप तरीके से जल्दी से जल्दी होना चाहिए. उन्हें यदि यह भनक लग गई कि हम उन के बारे में जान चुके हैं तो सब गड़बड़ हो जाएगा,’’ यूसुफ ने आगाह किया.

कुछ फोन इंस्पैक्टर रमेश ने किए और कुछ यूसुफ ने. खबर इतनी बड़ी थी कि एक घंटे में ही पूरी सरकारी मशीनरी हरकत में आ गई. शाम का धुंधलका होते ही सेना के जवानों को पैराशूट से उस इलाके में उतार कर छापा मारने का प्लान बना लिया गया. गांव के लोगों की सुरक्षा के लिए भी पक्के इंतजाम किए गए. गलती से ब्लास्ट हो जाने की स्थिति में फायरब्रिगेड की गाडि़यों और बचावकर्मियों को बैकअप के रूप में तैयार कर के साथ वाले गांव में रखा गया. सारा काम इतनी शांति और सफाई से हुआ कि गांव में किसी को कानोंकान खबर नहीं हुई.

उधर आर्मी के जवानों ने अपने मकसद को अंजाम देना शुरू किया और इधर पुलिस स्टेशन के बाहर छिपे, किसी हलचल का इंतजार करते हरी औल्टो के काले चश्मे वाले और उस के दूसरे साथी को पुलिस ने धरदबोचा.

पुलिस स्टेशन में बैठ कर इंतजार करते हुए सब लोगों के चेहरे उस वक्त खुशी से खिल गए जब उन्हें कामयाब होने की सूचना मिली. नदी पार के अड्डे पर जितने लोग और हथियार थे, बिना किसी खास संघर्ष और खूनखराबे के सेना ने अपने कब्जे में ले लिए.

पकड़े गए 15 आदमी और हथियार हैलीकौप्टर्स द्वारा सीधे दिल्ली भेज दिए गए थे. औपरेशन पूरा होने के 10 मिनट बाद ही इंस्पैक्टर रमेश के प्रमोशन की खबर आ गई. साहिल और फैजल को उन की बुद्धिमत्ता के लिए राज्य सरकार की तरफ से 10-10 हजार रुपए के नकद पुरस्कार की भी घोषणा की गई. इंस्पैक्टर रमेश के चेहरे पर खुशी झलक रही थी और यूसुफ के चेहरे पर संतोष.

‘‘मुझे भी इजाजत दीजिए. जिस काम के लिए मैं यहां आया था, वह तो पूरा हो गया. कल सुबह मैं भी घर वापस चला जाऊंगा,’’ कहते हुए यूसुफ खड़ा हो गया.

सब खुश थे कि केस सौल्व हो गया लेकिन फैजल कुछ दुविधा में था, ‘‘बाकी सब तो ठीकठाक हो गया पर अजय मर्डर से पहले लापता क्यों हुए और उन्होंने यह लौकर, चाकू वगैरा का सारा सैटअप कब और कैसे किया. ये बातें तो राज ही रह गईं.’’

‘‘हां, ये राज तो उन के साथ ही चले गए, लेकिन अब क्या फर्क पड़ता है, केस तो हल हो ही गया न. अब कल हम नदी में मछलियां पकड़ने चलेंगे. जब से यहां आए हैं इस केस में ही उलझे हुए हैं.’’

सुबह 6 बजे फोन की घंटी बजी. अनवर मामू ने फोन उठाया. उधर से इंस्पैक्टर रमेश की घबराई आवाज सुनाई दी, ‘‘साहिल और फैजल कहां हैं डाक्टर साहब?’’

‘‘सो रहे हैं, क्यों क्या हुआ?’’

‘‘उन्हें घर से कहीं बाहर मत निकलने दीजिएगा. मैं ने अभी कुछ सिपाही आप के घर भेजे हैं, जो वहां पहरे पर रहेंगे.’’

‘‘अरे, आखिर हुआ क्या है?’’ अनवर मामू की आवाज में दहशत के साथ हैरानी भरी थी.

‘‘कल रात किसी ने बड़ी बेदर्दी से यूसुफ का कत्ल कर दिया है. मुझे लगता है साहिल और फैजल की जान भी खतरे में है.’’

‘‘क्या? क्या यह वही कल वाले लोग हैं? लेकिन वे सब तो पकड़े जा चुके हैं न?’’

‘‘मेरे खयाल से हम से कहीं कोई चूक हुई है. मैं कुछ देर में आप के पास पहुंच कर सारी बात बताऊंगा. तब तक कोई बाहर न निकले,’’ कह कर इंस्पैक्टर रमेश ने फोन रख दिया.

दो जासूस और अनोखा रहस्य – भाग 5

अनवर मामू के घर आए फैजल और साहिल ने अजयजी के कत्ल की गुत्थी सुलझाने हेतु मिले हर कोड को हल किया. इस बार की पहेली हल करने पर उन्हें जो कटारें मिलीं उन में टेप से लिपटी एक चाबी व परची थी. उन्हें लगा यह चाबी किसी लौकर की होगी. उन्होंने यास्मिन से पूछा पर उन्हें कुछ पता न था सो वे स्टैप बाई स्टैप लौक ढूंढ़ने लगे. अब उन्हें लगा कि परची पर लिखे अक्षर भी कोड हैं. उन्होंने उसे हल किया तो पता चला कि एक बैंक अकाउंट नंबर है. दूसरा लौकर का नंबर.

टिक मार्क (क्क) से उन्हें पता चला कि यह यस बैंक का लोगो है. अत: वे यस बैंक पहुंचे. वहां उन्हें पता चला कि यह अकाउंट 8 दिन पहले ही खोला गया है. लौकर खोलने पर उन्हें वहां मोबाइल मिला. जिसे खोलने पर एक स्लिप मिली, जिस पर कविता रूपी कुछ पंक्तियां लिखी थीं.

अब वे इन पंक्तियों का मतलब समझ महादेव गली ढूंढ़ने लगे. लेकिन सिपाही रामदीन ने बताया कि यहां पास में शंकर गली है शायद उसे ही महादेव गली लिखा हो. अब उन्होंने डिसाइड किया कि वे शंकर गली जाएंगे, शायद वहीं उन्हें आगे का सुराग मिले. दो आंखें यहां भी उन का पीछा कर रही थीं.

जीप में कुल 7 लोग थे. साहिल, फैजल, अनवर, इंस्पैक्टर रमेश, रामदीन और 2 अन्य सिपाही.

‘‘क्या किसी को कविता की दूसरी लाइन का कुछ मतलब समझ आ रहा है?’’ इंस्पैक्टर रमेश ने सवाल किया, ‘‘तीसरी और चौथी लाइन तो साफ है कि वहां कोई लड़की है, जिस ने किसी को अपना धर्मपिता बनाया हुआ है. उसे हमें कोई पासवर्ड देना है.’’

‘‘धर्मपिता क्या मतलब?’’ साहिल ने पूछा.

‘‘अगर किसी लड़की का अपना पिता न हो और कोई आदमी उसे अपनी बेटी मान ले तथा पिता के सारे फर्ज निभाए तो वह उस का धर्मपिता कहलाएगा और वह लड़की उस की धर्मपुत्री,’’ अनवर मामा ने समझाया.

‘‘ओह समझा, लेकिन इस धर्मपुत्री के लिए पासवर्ड कहां से लाएंगे और पासवर्ड तो छोड़ो, यह धर्मपुत्री कहां मिलेगी? मान लो गली के हर घर में जाजा कर हम ने उसे ढूंढ़ भी लिया तो सावन की रिमझिम और खिलती कलियां कहां से लाएंगे,’’ फैजल ने आंखें मटकाईं, ‘‘मुझे तो यह नहीं समझ आ रहा कि अगर सावन के आने से कलियां खिलेंगी तो पूरे गांव की खिलेंगी. सिर्फ इस गली की ही थोड़ी न खिलेंगी. इस गली में कोई स्पैशल सावन आता है क्या?’’

यही सारे सवाल बाकी लोगों के दिमाग में भी घूम रहे थे, लेकिन जवाब किसी के पास न था. सब को यही उम्मीद थी कि वहां जा कर ही कुछ पता लग सकता है.

‘‘अच्छा अंकल, जैसा कि हम ने आप को बताया था कि कोई 2 लोग हमारा पीछा कर रहे हैं, तो अब जब हम केस खत्म करने के इतने करीब हैं, तो वे लोग जरूर कोई न कोई ऐक्शन लेंगे. अभी भी वे हमारे पीछे ही लगे होंगे. इसलिए हमें आगे का काम बड़ी सावधानी से करना होगा,’’ फैजल बोला.

‘‘तुम चिंता न करो. मैं पहले ही सब इंतजाम कर के आया हूं. ‘6 सिपाही दूसरी जीप में हमारे साथसाथ वहां पहुंच रहे हैं. वे सारे इलाके को घेर लेंगे, तब हम अंदर गली में जा कर तहकीकात करेंगे और हां, हम में से कोई भी इस कविता के एक भी शब्द को वहां मुंह से नहीं निकालेगा. हम सारा काम गुपचुप तरीके से इशारोंइशारों में करेंगे ताकि कोई आसपास छिप कर सुन भी रहा हो तो उसे कुछ पता न चल सके.’’

‘‘ग्रेट प्लानिंग सर,’’ कह कर साहिल ने अंगूठा दिखा कर अप्रूवल का इशारा किया.

शंकर गली के मुहाने पर पहुंच कर थोड़ी देर वे लोग जीप में ही बैठे रहे. जब दूसरी जीप के सिपाहियों ने अपना मोरचा संभाल लिया तो वे जीप से उतर कर गली में दाखिल हुए और इधरउधर देखते हुए आगे बढ़ने लगे.

मंजिल नामक बिल्डिंग के ठीक सामने वाली यह गली ज्यादा बड़ी नहीं थी. गली में घर भी बहुत कम थे. ज्यादातर छोटेमोटे सामान की दुकानें ही थीं. सरसरी तौर पर पूरी गली का 2 बार चक्कर लगा कर भी कहीं कोई छोटामोटा बाग या फूलोंकलियों जैसी कोई चीज उन्हें नजर नहीं आई.

अब उन्होंने हर घर, हर दुकान को ध्यान से देखते हुए फिर से गली का चक्कर लगाना शुरू किया. करीब आधी गली पार करने के बाद एक बड़ी सी दुकान के साइनबोर्ड पर जैसे ही अनवर मामा की नजर पड़ी, वे ठिठक कर वहीं रुक गए. बोर्ड पर बड़ेबड़े शब्दों में लिखा था, ‘रिमझिम ब्यूटी पार्लर.’ और जैसा कि गांव में रिवाज होता है नीचे एक कोने में लिखा था, ‘प्रौपराइटर सावन कुमार.’

बड़ी मुश्किल से उस ने अपने मुंह से निकलने वाली आवाज को रोका और धीरे से पीछे खड़े साहिल को पास आने का इशारा किया.

‘‘ओह,’’ बोर्ड को पढ़ने के बाद उस के मुंह से निकला, ‘‘सावन की रिमझिम में खिलती हर कली. पहले ‘सामने है मंजिल’ और अब ‘सावन की रिमझिम…’ अजय ने हर शब्द बहुत ही सोचसमझ कर बड़े ही नायाब तरीके से प्रयोग किया है. कोई भी शब्द बेमतलब नहीं है. कितना फिट है सबकुछ…

कमाल है.’’

तब तक फैजल और इंस्पैक्टर रमेश भी वहां आ गए थे और उन के चेहरे भी खुशी से चमकने लगे थे.

‘‘और इस का मतलब है कि हमारी उस धर्मपुत्री को ढूंढ़ने के लिए अब हमें दरदर नहीं भटकना पड़ेगा. वह पक्का इस पार्लर में ही काम करती होगी,’’ इंस्पैक्टर रमेश ने कहा, ‘‘तुम लोग यहीं रुको, मैं अंदर जा कर यहां के सारे फीमेल स्टाफ के नामपते ले कर आता हूं. उन में से इस लड़की को ढूंढ़ना बहुत ही आसान होगा.’’

15-20 मिनट बाद वे बाहर आए और सब को चल कर जीप में बैठने का इशारा किया. दोनों जीपें जब वहां से रवाना हो गईं तो उन्होंने बताया, ‘‘यहां कुल 8 लड़कियां काम करती हैं. उन सब के घर भी आसपास ही हैं. पुलिस स्टेशन पहुंच कर 2-3 सिपाहियों को मैं इन का पता लगाने भेज देता हूं. तब तक वहीं बैठ कर हम पासवर्ड सोचने की कोशिश करते हैं.’’

लगभग 2 ढाई घंटे बाद लड़की का पता लगाने गए सिपाही लौट कर आए और बताया कि उन सब लड़कियों के अपने परिवार और अपने मातापिता हैं. कोई किसी की धर्मपुत्री नहीं है. यह सुन कर सब सन्न रह गए.

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है. अब तक अजय की लिखी हर पहेली, हर कोड बिलकुल एक्यूरेट और टू द पौइंट है. उस के हर छोटे से छोटे शब्द का बिलकुल सटीक मतलब निकला है और खासकर इस कविता में तो हर सिंगल शब्द पूरे सीन में बिलकुल परफैक्ट तरीके से फिट हो रहा है. फिर इतना बड़ा झोल कैसे हो सकता है,’’ इंस्पैक्टर रमेश बोले.

‘‘नहीं, झोल उन के लिखने में नहीं, बल्कि हमारे सोचने में है. हम कहीं कुछ गलती कर रहे हैं. धर्मपुत्री का कोई और भी मतलब होता है क्या मामू?’’ कुछ सोचता हुआ साहिल बोला.

‘‘नहीं, और कोई मतलब तो नहीं होता.’’

साहिल ने पहेली वाला कागज हाथ में उठाया और बीसियों बार पढ़ी जा चुकी उन लाइनों को फिर ध्यान से पढ़ते हुए कुछ समझने की कोशिश करने लगा. एकएक अक्षर को बारीकी से घूरतेघूरते एक अजीब बात पर सब का ध्यान आकर्षित करता हुआ बोला, ‘‘जरा देखिए, इस में धर्मपुत्री की स्पैलिंग गलत लिखी हैं. अजय ने इसे धरम पुत्री लिखा है जबकि असली शब्द धर्म होता है. क्या इस का कोई खास मतलब हो सकता है या यह सिर्फ एक गलती है?’’

‘‘इस का भला क्या खास मतलब होगा? गलती ही होगी…’’ बोलतेबोलते अचानक फैजल की टोन बदल गई.

‘‘गलती ही तो नहीं होगी…बिलकुल नहीं हो सकती…यह तो बिलकुल सही है. अंकल, जरा वह सारी लड़कियों के नाम वाली लिस्ट तो निकालिए.’’

पास खड़े सिपाही ने जेब से लिस्ट निकाल कर साहिल को थमा दी. उस ने जल्दीजल्दी सारे नाम पढ़े और जोर से टेबल पर मुक्का मारते हुए बोला, ‘‘यस. मिल गई. यह छठे नंबर वाली ईशा वह लड़की है जिसे हम ढूंढ़ रहे हैं.’’

‘‘क्या मतलब? कैसे? हमें भी बताओ.’’

‘‘धरम कौन है बताइए तो जरा?’’ सभी एकसाथ बोले.

‘‘देखिए, अजय ने धर्म की जगह धरम का प्रयोग किया है. ‘धरम’ यानी फिल्मों के मशहूर कलाकर धर्मेंद्रजी का प्यार का नाम है. तो धरम पुत्री हुई धर्मेंद्रजी की बेटी यानी ईशा. मतलब हमें जिस लड़की की तलाश है, उस का नाम ईशा है और इसी तर्ज पर चलते हुए जब हम अगली लाइन पर पहुंचते हैं तो उस का भी डबल मतलब है. पासवर्ड के बिना बनेगा काम न यानी पासवर्ड ही वह पासवर्ड है जिसे हम ढूंढ़ रहे हैं. उसी से हमारा काम बनेगा.’’

‘‘तुम्हें पूरा यकीन है?’’

‘‘जी हां. जिस तरह अजय अब तक अपनी बात कहते आ रहे हैं, उस के हिसाब से मैं दावे से कह सकता हूं कि यही हमारा कोडवर्ड है. अब हमें और देर किए बिना तुंरत ईशा से मिलने जाना चाहिए.’’

दो मिनट बाद ही वे जीपों पर सवार हो पार्लर पहुंचे और ईशा को बाहर बुलवाया. फिर धीरे से उसे पासवर्ड बताया.

‘‘आप लोग कौन हैं? पासवर्ड बता कर सामान तो एक आदमी पहले ही ले जा चुका है,’’ ईशा ने कहा तो सब हैरान हुए.

‘‘पासवर्ड बता कर सामान ले गया? क्या सामान था? किस ने दिया था?’’ इंस्पैक्टर रमेश ने पूछा. डरीसहमी ईशा ने पहले तो बताने से इनकार किया, फिर इंस्पैक्टर के डर से सब उगल दिया, ‘‘अजय अंकल ने मुझे कुछ दिन पहले एक टैनिस की बौल दी थी और कहा था कि कुछ दिन बाद वे उसे लेने आएंगे. अगर वे न आएं या उन्हें कुछ हो जाए, तो जो आदमी आ कर मुझे पासवर्ड बताए, मैं उसे वह बौल दे दूं.’’

‘‘क्या था उस बौल में?’’

‘‘मुझे कुछ नहीं पता.’’

‘‘उन्होंने इस काम के लिए तुम्हें ही क्यों चुना?’’

‘‘मेरा घर उन के घर से कुछ ही दूर है. हमारी गरीबी से वे अच्छी तरह वाकिफ थे और अकसर मेरी मदद करते रहते थे. मुझे बिलकुल अपनी बेटी की तरह मानते थे. जब उन्होंने वह बौल मुझे दी तब वे चोरों की तरह छिपतेछिपाते मेरे पास आए थे और उन्होंने बड़ा अजीब सा हुलिया बना रखा था. अगर उन की आवाज न सुनती, तो मैं तो उन्हें पहचान ही नहीं पाती. किसी को कुछ भी न बताने की उन्होंने सख्त हिदायत दी थी और यह भी कहा था कि अगर 6 महीने तक कोई इसे लेने न आए तो मैं इसे नष्ट कर दूं.’’

‘‘जो आदमी बौल ले कर गया वह देखने में कैसा था?’’ इंस्पैक्टर रमेश ने पूछा.

‘‘लंबा, मूंछों वाला, काले रंग की बाइक पर…’’

‘‘काली बाइक पर…हो न हो यह वही आदमी है जो हमारा पीछा कर रहा था,’’ फैजल की बेचैनी अपने चरम पर थी.

‘‘कितनी देर हुई उसे यहां से गए? किस ओर गया है?’’

‘‘अभी मुश्किल से 5 मिनट हुए होंगे. गली से निकल कर वह दाएं मुड़ा था. उस के बाद मुझे पता नहीं.’’ इतना सुनते ही वे लोग तेजी से जीपों की ओर दौड़े और स्पीड से जीपें दौड़ा दीं.

थोड़ा आगे जा कर सड़क 2 भागों में बंट रही थी. दूसरी जीप को उस सड़क पर भेज इंस्पैक्टर रमेश ने अपनी जीप पहले वाले रास्ते पर दौड़ा दी. काफी दूर पहुंचने के बाद एक मोड़ पर घूमते ही उन्हें काली बाइक नजर आई. जब तक बाइक वाले को पता चला कि जीप उस का पीछा कर रही है, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. इंस्पैक्टर ने बड़ी ही कुशलता से बाइक को साइड से हलकी सी टक्कर मार कर उसे नीचे गिरा दिया और फुरती से नीचे कूद कर धरदबोचा और पूछा, ‘‘कौन है तू? अजय का खून तूने ही किया है न और अब सुबूत मिटाना चाहता है, बोल, वरना बहुत मारूंगा.’’

‘‘पागल हो क्या तुम? कातिल मैं नहीं, वह आल्टो वाला है. मैं तो अजय का दोस्त हूं.’’

‘‘कौन दोस्त?’’

इस से पहले कि वह कुछ बोलता, उस आदमी ने उसे चुप रहने का इशारा किया और फुसफुसाते हुए बोला, ‘‘यहां खतरा है. जल्दी यहां से निकलो और पुलिस स्टेशन चलो. मैं वहीं सारी बात बताऊंगा.’’

‘‘हूं…मुझे बेवकूफ बनाने चले हो? भागने का मौका ढूंढ़ रहे हो?’’

‘‘तुम्हें मुझ पर यकीन नहीं है तो मुझे हथकड़ी लगा कर जीप में बैठा लो और मेरी बाइक पर किसी और को भेज दो, लेकिन जल्दी निकलो यहां से.’’

ऐसा करने में इंस्पैक्टर को कोई बुराई नजर नहीं आई वे उसे ले कर पुलिस स्टेशन आ गए.

फर्जी MBBS दाखिले : करोड़ों लूटे – भाग 3

राजवीर और चंद्रेश की आंखों में अनोखी चमक थी. बहुत कम रुपयों में उन्हें एमबीबीएम करने का सुनहरा मौका जो मिल रहा था. इस मौके को वे किसी भी कीमत पर हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे.

सभी पीडि़त पहुंचे पुलिस के पास

नोएडा (गौतमबुद्ध नगर) के थाना सेक्टर-63 में 30-35 युवक एक साथ पंहुचे तो एसएचओ अमित मान अपनी कुरसी से उठ कर खड़े होते हुए बोले, ‘‘क्या बात है, आप इतने लोग एक साथ?’’

‘‘सर, हम लुट गए हैं, हमारे साथ धोखाधड़ी हुई है.’’ उन युवकों में चंद्रेश भी था. वह आगे आ कर रुआंसे स्वर में बोला.

‘‘किस ने की है यह धोखाधड़ी?’’ एसएचओ चौंकते हुए बोले, ‘‘मुझे तुम विस्तार से पूरा मामला बताओ.’’

‘‘सर, मेरा नाम चंद्रेश है. यहां सैक्टर-63 में एक औफिस खोला गया है, जिस के द्वारा 20 से 30 लाख रुपए ले कर सरकारी कालेज में एमबीबीएस का एडमिशन दिलवाने का झांसा दिया गया.

‘‘यह साथ आए तमाम छात्र और मैं इस फरजीवाड़े का शिकार बन गए हैं. किसी ने 30 लाख रुपया दिया है, किसी ने 20 लाख. मेरे दोस्त राजवीर ने मुझे बताया कि कम रुपयों में फलां कंपनी हमें एमबीबीएस का एडमिशन दिलवा देगी.’’

‘‘राजवीर साथ आया है?’’ एसएचओ अमित मान ने पूछा.

‘‘जी सर.’’ राजवीर युवकों की भीड़ से आगे आ कर बोला, ‘‘मैं भी इस फरजी कंपनी द्वारा ठग लिया गया हूं. मैं ने 25 लाख रुपया इस कंपनी को दे दिया है.’’

‘‘ओह!’’ एसएचओ अमित मान एकदम गंभीर हो गए, ‘‘राजवीर तुम्हें इस औफिस के विषय में किस ने बताया था?’’

‘‘मेरा दोस्त शिवम है, वह भी साथ आया है सर. शिवम ने ही मुझे बताया था कि 15 लाख रुपया दे कर वह सरकारी कालेज के लिए सेलेक्ट हो गया है. मैं ने यह बात चंद्रेश को बताई तो वह और मैं दूसरे दिन इस औफिस में पहुंच गए. मुझ से 25 लाख रुपया एडमिशन दिलवाने के नाम पर मांगा गया तो मैं ने तीसरे दिन ही यह रुपया औफिस में जा कर जमा करवा दिया.’’

‘‘हां चंद्रेश, तुम ने 20 लाख रुपया कैसे जुटाया?’’ एसएचओ ने पूछा.

‘‘सर, मैं ने पिताजी और भैया के पांव पकड़ लिए. उन से गिड़गिड़ा कर कहा कि अगर मुझे 20 लाख रुपया दे देंगे तो डाक्टरी करने के बाद सरकारी नौकरी मिल जाएगी. मैं उन का रुपया लौटा दूंगा और घर की तमाम जिम्मेदारी भी संभाल लूंगा. मेरे भाई और पिताजी ने सलाहमशविरा कर के फैजाबाद वाला खेत 20 लाख में तुरंत बेच कर 3 दिन में मेरे हाथ पर 20 लाख रुपया रख दिया. जिसे ला कर मैं ने उस औफिस में जमा करवा दिया.’’

‘‘तुम्हें कैसे पता चला कि तुम लुट गए हो, तुम्हारे साथ धोखा हुआ है?’’ एसएचओ ने पूछा.

‘‘सर, इस कंपनी ने रुपया ले लेने के बाद मुझे भी अन्य छात्रों की तरह काउंसलिंग के बहाने 18 दिसंबर, 22 तक रोक कर रखा. हमें एक महीने रोक कर रोज मीटिंग ली जाती, समझाया जाता कि एमबीबीएस कैसे पूरा करना है, कैसे आत्मविश्वास बना कर रखना है, कैसे संयम रख कर अपनी पढाई करनी है, आदिआदि.

‘‘एक महीना पूरा होने के बाद 18 दिसंबर को सरकारी कालेज (जहां से एमबीबीएस करना था) एक अथारिटी लेटर ले कर भेजा गया. वहां जाने पर हमें मालूम हुआ कि सरकारी कालेज के डीन ऐसे किसी औफिस या व्यक्ति को नहीं जानते, हमें ठगा गया है. यह मालूम होते ही हम सब सेक्टर-63 के उस औफिस में पहुंचे तो वहां गार्ड और कर्ताधर्ता गायब थे. हमें अपने को ठगे जाने का पता चला तो हम सब एकत्र हो कर यहां अपनी शिकायत ले कर आ गए हैं.’’

मामला बहुत गंभीर था. एसएचओ अमित मान ने गौतमबुद्ध नगर की पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह, डीसीपी  व एसीपी को फोन द्वारा इस ठगी की जानकारी दी तो उन्होंने एसएचओ अमित मान को जांच अधिकारी बना कर उन के नेतृत्व में एसआई नीरज शर्मा, आरती शर्मा, हैडकांस्टेबल सुबोध, वरुण चौधरी, कांस्टेबल अंकित व अंशुल की टीम का गठन कर दिया गया.

एसएचओ ने थाने में आए छात्रों को आश्वासन दिया कि उन ठगों को पकड़ने की पूरी कोशिश की जाएगी. वे सब अपनीअपनी शिकायत स्वागत कक्ष में जा कर लिखित रूप में जमा करवा दें और अपने घर लौट जाएं.

चंद्रेश और राजवीर के बताए अनुसार, आर्टिस्ट ने उन ठगों के हुलिए के रेखाचित्र बना दिए. उन में एक उस मुसलिम युवक और 2 युवतियों के चित्र थे.

एसएचओ अमित मान ने उन रेखाचित्रों को हर थाने में वाट्सऐप द्वारा भेज कर उन्हें देखते ही हिरासत में लेने और सूचना देने का अनुरोध कर दिया.

एसएचओ अमित मान अपने साथ एसआई नीरज शर्मा और पुलिस टीम के साथ चंद्रेश और राजवीर को साथ ले कर उन ठगों के कथित औफिस के लिए निकल गए.

लेकिन औफिस पर ताला बंद था. वहां आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की पड़ताल की गई तो उन युवक और युवतियों की पहचान चंद्रेश और राजवीर ने कर दी.

तीनों की फोटो अपने मोबाइल में अपलोड करने के बाद एसएचओ अमित मान ने अपने तमाम मुखबिरों को वह फोटो उन के मोबाइल में भेज कर उन की तलाश में लगा दिया.

पुलिस टीम भी उन वांछित ठगों की तलाश में पूरे शहर में फैल गई. पुलिस और मुखबिरों की मेहनत रंग लाई. उन ठगों को 30 दिसंबर को सेक्टर 62 के गोलचक्कर से गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तारी की सूचना पा कर वरिष्ठ अधिकारी भी थाने पहुंच गए.

उन की उपस्थिति में ठगों से पूछताछ शुरू हुई. उन के नाम तस्कीर अहमद खान, रितिक सिंह उर्फ लवलीन व वैशाली पाल थे. तीनों पढ़ेलिखे थे. अपने शौक व तुरंत अमीर बनने की महत्त्वाकांक्षा के लिए उन्होंने ठगी का यह धंधा अख्तियार किया था. तीनों दोस्त थे.

तस्कीर अहमद को मालूम था, एमबीबीएस में छात्रों को 80-90 लाख में भी दाखिला बहुत मुश्किल से मिलता है. ऐसे छात्रों को एमबीबीएस में कालेज में दाखिला दिलवाने के लिए 15 से 30 लाख रुपया ले कर ठगा जा सकता है.

इस के लिए उन तीनों ने गौतमबुद्ध नगर में डी-247/4ए में एक औफिस खोल कर सिक्योरिटी गार्ड को रखा. इस के बाद उन्होंने कालेजों से साइंस सब्जेक्ट से ग्रैजुएशन करने वाले छात्रों के एड्रैस, नाम और मोबाइल नंबर हासिल कर के उन के मोबाइल्स पर सस्ते में एमबीबीएस करवाने का मैसेज भेजा.

2-4 छात्र उन के पास आए तो उन्हें 20-30 लाख में एडमिशन दिलवाने के नाम पर ठग कर उन्हें ही अन्य दोस्तों को, जो यह कोर्स करना चाहते हैं, उकसाने और यहां लाने के लिए प्रेरित किया. इस प्रकार सैकड़ों छात्र उन के संपर्क में आ गए.

उन्होंने इस तरह छात्रों से करोड़ों रुपए ठग लिए, फिर फरजीवाड़े की पोल खुलने के डर से 18 दिसंबर, 2022 को उन्होंने छात्रों को अपाइंटमेंट लेटर दे कर सरकारी कालेज जाने को कहा और अपना बोरियाबिस्तर समेट कर भाग निकले, किंतु वे मुखबिर की सूचना पर सेक्टर-62 से पकडे़ गए. वह यह शहर छोड़ कर मुंबई भाग जाने वाले थे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका.

पुलिस ने उन को कोर्ट में पेश कर के रिमांड पर ले लिया. उन से कड़ी पूछताछ शुरू हुई तो उन्होंने अपने 3 और साथियों के नाम बताए, जो परदे के पीछे रह कर काम कर रहे थे. ये नाम थे- 1. नीरज कुमार सिंह उर्फ अजय, निवासी-गांव महादेवा, थाना-माली, जिला-औरंगाबाद (बिहार) 2. अभिषेक आनंद उर्फ सुनील, निवासी- 193, मानसा मार्ग, कृष्णापुरी, पटना (बिहार) 3. मोहम्मद जुबेर उर्फ रिजोल हक निवासी-149, हौजरानी, मैक्स हौस्पिटल के पास, मालवीय नगर, दिल्ली.

इन्हें पकड़ने के लिए पुलिस टीम भेजी गई, लेकिन ये तीनों फरार हो गए थे. शायद इन्हें अपने साथियों के पकड़े जाने की भनक लग गई थी. पकड़े गए तस्कीर अहमद खान पुत्र अहमद अली खान, निवासी मुरादी रोड, बाटला हाउस, थाना जामिया, दिल्ली 2. रितिक उर्फ लवलीन कौर पुत्री गुरुदेव कौर, चाम्स केशल, राजनगर एक्सटेंशन, गाजियाबाद. 3. वैशाली पाल पुत्री मूलचंद सिंह, निवासी-साईं एन्क्लेव, डी ब्लौक, नंदग्राम, गाजियाबाद.

रिमांड अवधि में इन से छात्रों से ठगे गए रुपयों के संबंध में पूछताछ की गई तो इन की निशानदेही पर 19 लाख रुपया, 3 अंगूठी सफेद धातु, एक ब्रेसलेट सफेद धातु, 6 चेन पीली धातु, एक बाली पीली धातु, 6 अंगूठियां पीली धातु, 6 मोबाइल, 14 की पैड फोन, 3 डायरी, एक पैन कार्ड, 4 एटीएम कार्ड, एक आधार कार्ड बरामद हुआ.

पुलिस ने इन के विरुद्ध भादंवि की धारा 420/406/120बी/34 के तहत मुकदमा दर्ज कर इन्हें दोबारा अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया.

तीनों भगोड़े ठगों नीरज कुमार सिंह उर्फ अजय, अभिषेक आनंद उर्फ सुनील व मोहम्मद जुबेर उर्फ रिजोल पर पुलिस ने 25-25 हजार का ईनाम घोषित कर दिया था. इन्होंने पुलिस को बहुत छकाया, लेकिन अंत में 28 जनवरी, 2023 को 11 बजे ये तीनों पुलिस के हत्थे चढ़ गए. इन से भी पूछताछ करने के बाद पुलिस ने इन्हें कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया.     द्य