डॉक्टर और इंजीनियर बनाने लगे कैंसर की नकली दवाएं – भाग 1

दिल्ली के प्रगति मैदान के सामने भैरों मंदिर के पास सफेद रंग की स्कौर्पियो गाड़ी में बैठे दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर सतेंद्र मोहन सिंह को करीब एक घंटा हो चुका था, लेकिन जिस शख्स का वह बेसब्री से इंतजार कर रहे थे वो अभी तक नहीं आया था.

अपने स्टाफ के साथ सादा लिबास में सतेंद्र मोहन ही नहीं 2-3 अलगअलग प्राइवेट गाडि़यों में उन की टीम के दूसरे लोग भी इसी तरह की बेचैनी से पहलू बदल रहे थे.

‘‘गुलाब, तुम्हें यकीन तो है कि तुम्हारा शिकार इसी रास्ते से निकलेगा और आज ही आएगा.’’ इंसपेक्टर सतेंद्र जब इंतजार करतेकरते ऊब गए तो उन्होंने एएसआई गुलाब से पूछ ही लिया. क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि गुलाब के पास शायद पूरी जानकारी नहीं है.

‘‘जनाब सूचना एकदम सटीक है. बस ये नहीं पता कि उस को आने में इतनी देर कैसे हो गई. मैं अपने सोर्स से एक बार फिर कनफर्म कर लेता हूं.’’ कहते हुए एएसआई गुलाब ने जेब से फोन निकाला और किसी से बात करने लगा.

बात करने के बाद जब उस ने फोन बंद किया तो उस के चेहरे की चमक देखने लायक थी. वह बोला, ‘‘जनाब शिकार अगले 5 से 10 मिनट में आने वाला है, रास्ते में है.’’

इस के बाद भैरों मंदिर के बाहर खड़ी चारों प्राइवेट गाडि़यों में बैठे पुलिस वाले गाडि़यों से उतर कर इधरउधर फैल गए. जबकि कुछ गाडि़यों में ही बैठे रहे.

करीब 10 मिनट बाद स्कूटी पर सवार एक व्यक्ति वहां से गुजरा तो अचानक सतेंद्र मोहन की गाड़ी ने ओवरटेक कर के स्कूटी सवार को रुकने पर मजबूर कर दिया. इस से पहले कि स्कूटी सवार कोई सवालजवाब करता, आसपास फैली टीम के लोगों ने उसे घेर लिया.

‘‘भाई, कौन हो आप लोग और मुझे इस तरह क्यों घेरा है?’’ स्कूटी सवार ने सवाल पूछा तो उस से पहले ही सतेंद्र मोहन ने उस की स्कूटी की चाबी निकाल ली और चालक को स्कूटी से हटा कर उस की सीट वाली डिक्की खोली.

डिक्की में एक बैग रखा था, जिसे देख कर इंसपेक्टर सतेंद्र की आंखें चमक उठीं. बैग खोल कर देखा तो उस में कुछ मैडिसिन थीं. सतेंद्र मोहन सिंह की आंखों की चमक से ही लग रहा था कि उन्हें मानो उन दवाइयों की ही तलाश थी.

‘‘अरे…रे भाईसाहब, आप हैं कौन और इस तरह किसी का बैग आप कैसे चैक कर सकते हैं. देख नहीं रहे इस में दवाइयां हैं.’’ स्कूटी सवार को अब तक गुस्सा आ गया था. उस ने आंखें तरेरते हुए कहा तो अचानक सतेंद्र सिंह ने जोरदार थप्पड़ उस के गाल पर जड़ दिया. जिस के बाद स्कूटी सवार एकदम सन्न रह गया.

‘‘हमें पता है ये दवाइयां हैं और हमें ये भी पता है कि ये दवाइयां एकदम नकली हैं. लेकिन तुझे ये नहीं पता कि हम कौन हैं. हम दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच से हैं. अब तू वहीं चल कर बताएगा कि इन दवाइयों का खेल क्या है.’’ कहते हुए इंसपेक्टर सतेंद्र मोहन ने अपनी टीम को इशारा किया.

जिस के बाद स्कूटी सवार को गाड़ी में बैठा लिया. फिर टीम का एक सदस्य उस की स्कूटी ले कर गाड़ी के पीछेपीछे चलने लगा. कुछ ही देर में टीम उसे ले कर चाणक्यपुरी में क्राइम ब्रांच के इंटरस्टेट सेल में ले आई.

विदेशी कंपनियों की नकली दवाइयां

वहां एसीपी रमेशचंद्र लांबा पहले ही बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. स्कूटी सवार 27 साल का पंकज सिंह बोहरा था, जो मूलरूप से गांव नौखुना, पिथौरागढ़, उत्तराखंड का रहने वाला था. थोड़ी सी सख्ती बरतने के बाद ही पंकज तोते की तरह बताता चला गया.

उस के पास से पुलिस टीम ने टैग्रीसो 80 मिलीग्राम एस्ट्राजेनेका की 190 टैबलेट, वेंटोक्सेन 100 मिलीग्राम इंसेप्टा फार्मास्युटिकल्स की 600 टैबलेट्स और ओसिंट 80 मिलीग्राम इंसेप्टा फार्मास्युटिकल्स की 1,500 टैबलेट्स बरामद हुई थीं, जो कैंसर के इलाज में काम आती हैं.

ये सभी दवाइयां अमेरिका की दवा कंपनियों की थीं और भारत में इन्हें बेचने का अधिकार केवल एस्ट्राजेनेका कंपनी के पास था. पंकज बोहरा ने बताया कि उन दवाओं की पैंकिग भले ही असली दवाओं जैसी थी, लेकिन उन कैप्सूलों में दवा के नाम पर प्रोटीन पाउडर भरा था. यानी दवाइयां एकदम नकली थीं.

एसीपी लांबा और उनकी टीम के लोग पंकज की जुबानी कैंसर की नकली दवाइयों की कहानी सुनकर सन्न रह गए.

कहानी की शुरुआत दरअसल 2 महीना पहले हुई थी. क्राइम ब्रांच की इंटरस्टेट ब्रांच में तैनात एएसआई गुलाब सिंह के एक परिचित के नजदीकी रिश्तेदार की कैंसर के कारण मौत हो गई.

गुलाब सिंह जब उसे सांत्वना देने पहुंचे तो परिचित ने बताया कि उन का रिश्तेदार पिछले 6 महीने से कैंसर की जो दवा खा रहा था, उसे पता ही नहीं था कि वे नकली हैं. नकली दवा खाने के कारण उस की हालत बिगड़ती चली गई. जब डाक्टरों ने दवा की पड़ताल की तो खुलासा हुआ कि दवाएं नकली हैं.

लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. मरीज की मौत हो गई. तभी गुलाब सिंह को ये भी पता चला कि कैंसर की ये दवाएं बहुत महंगी हैं लेकिन उन्हें किसी दवा एजेंट के जरिए ये दवाएं 50 फीसदी छूट पर मिलती थीं. इसीलिए इस का कोई बिल नहीं दिया जाता था.

बताया जाता था कि ये सीधे दवा कंपनी के स्टाकिस्ट के गोदाम से चोरीछिपे निकाल कर नीचे के कर्मचारी डिस्कांउट में बेचते थे. अब गंभीर बीमारी के शिकार व्यक्ति को जिसे हर महीने हजारों रुपए की महंगी दवाइयां खानी होती हैं. उसे यहीं दवाएं अगर आधे दाम पर मिल जाएं तो उसे इस बात से क्या मतलब कि दवा किसी बड़ी दुकान से खरीदी गई है या दवा गोदाम से उस का कोई कर्मचारी चुरा कर बेच रहा है.

भारीभरकम छूट में दवाइयां मिलती रहीं और मरीज खाता रहा. पता उस वक्त लगा जब मरीज अच्छा होने की जगह और ज्यादा बीमार होने लगा. तबीयत इतनी बिगड़ गई कि अस्पताल में दाखिल होना पड़ा.

एएसआई गुलाब सिंह जुट गए जांच में

डाक्टरों को जब यह पता चला कि उन के ही द्वारा लिखी गई दवा देने के बावजूद तबीयत खराब हो रही है तो उन्होंने दवा खरीदने वाली दुकान के बारे में पूछा. तब जा कर भेद खुला कि दवाओं के रैपर असली दवा से मिलतेजुलते जरूर हैं लेकिन वे नकली दवाएं हैं. लेकिन तब तक मरीज के लिए बहुत देर हो चुकी थी और उस की मौत हो गई.

गैंगस्टर बनने के लिए किए 4 मर्डर – भाग 1

27अगस्त, 2022 की रात को मध्य प्रदेश के सागर जिले के कैंट थाना टीआई अजय कुमार सनकत को सूचना मिली कि भैंसा गांव में ट्रक बौडी रिपेयरिंग कारखाने में चौकीदार की हत्या हुई है. सूचना मिलते ही पुलिस टीम ने मौके पर पहुंच कर जांच शुरू कर दी.

जांच के दौरान पता चला कि भैंसा गांव का 50 साल का कल्याण लोधी कारखाने में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करता था. सुबह जब वह घर नहीं पहुंचा तो उस का बड़ा बेटा संजय उस की तलाश में कारखाने पहुंच गया.

कारखाने के बाहर लोगों की भीड़ और पुलिस देख कर उस के होश उड़ गए. पास जा कर देखा तो उस के पिता कल्याण का शव पड़ा हुआ था. पिता की लाश को देख कर वह चीखचीख कर रोने लगा.

पुलिस ने उसे ढांढस बंधाते हुए बताया कि किसी हमलावर ने सिर पर हथौड़ा मार कर उस की हत्या कर दी है. मृतक कल्याण का मोबाइल भी उस के पास नहीं मिला था.

घटनास्थल की सभी काररवाई पूरी कर के पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. मृतक के बेटे संजय लोधी की तरफ से हत्या का मुकदमा दर्ज करने के बाद पुलिस इस केस की जांच में जुट गई.

सागर पुलिस कल्याण लोधी के अंधे कत्ल की जांच कर ही रही थी कि 2 दिन बाद 29 अगस्त को सिविल लाइंस थाना क्षेत्र में गवर्नमेंट आर्ट ऐंड कामर्स कालेज के चौकीदार 60 साल के शंभुदयाल दुबे की हत्या हो गई. उस की हत्या सिर पर पत्थर मार कर की गई थी.

घटनास्थल पर जांच के दौरान पुलिस को शव के पास से एक मोबाइल मिला. पहले वह मोबाइल मृतक चौकीदार दुबे का माना जा रहा था, लेकिन बाद में पता चला कि वह मोबाइल कैंट थाना क्षेत्र के भैंसा के कारखाने में मारे गए चौकीदार कल्याण लोधी का है.

इस आधार पर पुलिस अधिकारियों को इस बात का पूरा भरोसा हो गया था कि दोनों वारदातों के पीछे एक ही हत्यारे का हाथ होगा.

दोनों अंधे कत्ल के खून की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि मोतीनगर थाना क्षेत्र के गांव रतौना में एक निर्माणाधीन मकान में चौकीदारी कर रहे 40 साल के मंगल अहिरवार पर जानलेवा हमला हो गया. मंगल की लाश के पास खून से सना फावड़ा मिला था, जिस के आधार पर माना जा रहा था कि मंगल की हत्या सिर पर फावड़ा मार कर की गई थी.

एक के बाद एक 3 वारदातों ने अमूमन शांत रहने वाले सागर शहर में दहशत का माहौल पैदा कर दिया था. हत्या करने वाले आरोपी का न कोई नाम था, न कोई सुराग. हत्याओं के पीछे का मकसद भी समझ नहीं आ रहा था. सुराग के नाम पर हाथ खाली थे, आरोपी को तलाशना भूसे के ढेर में सुई ढूंढने जैसी चुनौती थी.

मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल का शहर सागर वैसे तो झीलों और डा. हरिसिंह गौर सेंट्रल यूनिवर्सिटी जैसे शैक्षणिक संस्थान के लिए जाना जाता है, लेकिन अगस्त महीने के आखिरी 4 दिनों में हुई 3 सिक्योरिटी गार्डों की हत्याओं से सुर्खियों में आ चुका था. सागर में हुईं ये हत्याएं रात के एक निश्चित समय और एक ही पैटर्न से की गई थीं.

हत्या में किसी तरह की लूटपाट और किसी खास किस्म के हथियार का इस्तेमाल भी नहीं किया था. हत्या की कोई वजह सामने नहीं आ रही थी और न ही मरने वाले सिक्योरिटी गार्डों का आपस में कोई संबंध था. लिहाजा पुलिस का अनुमान था कि इन हत्याओं के पीछे किसी सीरियल किलर का हाथ हो सकता है.

पुलिस अधिकारियों की बढ़ गई चिंता

सागर जिले के एसपी तरुण नायक और एडिशनल एसपी विक्रम सिंह इन घटनाओं को ले कर खुद मोर्चे पर आ चुके थे. उन्होंने जिले की पुलिस फोर्स को मुस्तैद कर दिया था.

एसपी तरुण नायक ने चौकीदारों की सिलसिलेवार हत्या की वारदातों को अंजाम देने वाले आरोपी की गिरफ्तारी के लिए एएसपी विक्रम सिंह कुशवाहा, एएसपी ज्योति ठाकुर और सीएसपी (सिटी) के निर्देशन में पुलिस अधिकारियों की टीम बनाई. इस टीम में सिविल लाइंस टीआई नेहा सिंह गुर्जर, मोतीनगर टीआई सतीश सिंह, कैंट टीआई अजय कुमार सनकत, गोपालगंज टीआई कमलसिंह ठाकुर को शामिल किया.

एक के बाद एक हो रही चौकीदारों की हत्या को ले कर शहर में भी डर और दहशत का माहौल बन गया था. पुलिस रातरात भर गश्त कर पूरे शहर में तैनात सिक्योरिटी गार्डों को सचेत कर रही थी.

तीनों घटनाओं से जुड़े लोगों से पूछताछ और सीसीटीवी कैमरों की फुटेज के आधार पर पुलिस ने हत्यारे का स्कैच जारी कर शहर के लोगों को सावधान कर दिया था.

पुलिस के सामने सब से बड़ी चुनौती यह थी कि यदि एक व्यक्ति ही यह वारदात कर रहा है तो उस का अगला टारगेट अब कहां होगा. जैसेजैसे समय निकल रहा था, वैसेवैसे वारदात होने की आशंका बढ़ती जा रही थी.

पुलिस को किलर के अगली वारदात को अंजाम देने की चिंता ज्यादा थी. पुलिस टीमों ने शहर कवर कर लिया था, लेकिन टेंशन ग्रामीण इलाकों की थी. जांच के दौरान मिले साक्ष्यों और लोगों के अनुसार किलर का स्कैच जारी किया गया. इस के बावजूद आरोपी की न तो पहचान हुई और न ही उस के बारे में कोई सुराग मिल सका.

चौकीदार शंभुदयाल दुबे की हत्या की वारदात के बाद आक्रोशित ब्राह्मण समाज ने मकरोनिया चौराहे पर परिजनों की मौजूदगी में शव रख कर प्रदर्शन किया. शव को सड़क से हटाने की कोशिश के दौरान युवा ब्राह्मण समाज प्रदेश अध्यक्ष दिनकर तिवारी व प्रदर्शनकारियों की अधिकारियों व पुलिस से तीखी बहस भी हुई.

आक्रोश बढ़ता देख डीएम दीपक आर्य एवं नरयावली विधायक प्रदीप लारिया मौके पर पहुंचे और दुबे के परिवार को 4 लाख रुपए की आर्थिक मदद स्वीकृत करने के आश्वासन के साथ ही तात्कालिक सहायता के रूप में 50 हजार रुपए की राशि भी उपलब्ध कराई.

वहीं आउटसोर्स एजेंसी के माध्यम से परिवार के एक सदस्य को नौकरी दिलाने का भी वायदा किया. तब जा कर मृतक के घर वाले लाश को सड़क से हटाने को तैयार हुए.

काफी मानमनौवल के बाद चौकीदार शंभुदयाल दुबे का अंतिम संस्कार पुलिस बल की मौजूदगी में मकरोनिया के श्मशान घाट में किया गया.

भोपाल में मिली मोबाइल लोकेशन

तीसरे गार्ड की हत्या के बाद सागर से भोपाल तक हड़कंप मच गया. गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने सागर एसपी तरुण नायक से बात कर सीरियल किलर को जल्द पकड़ने के निर्देश दिए. लिहाजा पुलिस चारों तरह फैल गई.

श्रद्धा मर्डर केस : 35 टुकड़ों में बिखर गया प्यार – भाग 1

श्रद्धा की आंखों पर सूरज की रोशनी पड़ रही थी. वह सो रही थी. रोशनी से उस की नींद में खलल पड़ गई थी. तभी मां सुमन की आवाज सुनाई दी, ‘‘बेटी श्रद्धा, उठ भी जाओ. दिन काफी निकल आया है.’’

‘‘ममा! मैं ने कितनी बार कहा है कि खिड़की मत खोला करो, अभी थोड़ा और सो लेने दो,’’ श्रद्धा नाराज होती हुई अलसाई आवाज में बोली.

‘‘अब कितना सोएगी. दिन के 11 बजने वाले हैं.’’ सुमन बोलीं.

‘‘…तो क्या हुआ?’’ कच्ची नींद में ही करवट बदलती हुई श्रद्धा बोली.

‘‘तुम्हारे मोबाइल में मैसेज पर मैसेज आ रहे हैं. देखो, पता नहीं किस के हैं,’’ मां बोलीं.

‘‘लाओ, इधर दो मोबाइल. मैसेज पढ़ा तो नहीं?’’ श्रद्धा ने मैसेज के बारे में सुनते ही हड़बड़ा कर बैड पर बैठती हुई मां की ओर हाथ फैला दिया.

‘‘यह ले देख ले तू ही, पता नहीं तू कौन कौन सा ऐप चलाती है…बंबल लिखा आ रहा है,’’ मां बोलीं.

‘‘अरे ममा तुम क्या समझोगी बंबल क्या है? यही तो मेरा यार है, मेरा प्यार है.’’ श्रद्धा चहकती हुई बोली.

‘‘यार है, प्यार है, मतलब?’’ मां आश्चर्य से बोली.

‘‘मतलब यह ममा कि ये न्यू जनेरशन का डेटिंग ऐप है. तुम ने भी तो प्यार के लिए पापा संग डेटिंग की होगी. तब सिक्का डालने वाले फोन से होता था, अब मोबाइल ऐप से. जमाना बदल गया है न.’’

‘‘तू बेशरम होती जा रही है आजकल.’’

‘‘अच्छाअच्छा, एक कप कौफी तो पिला दो,’’ कहती हुई श्रद्धा मोबाइल के मैसेज पढ़ने लगी.

‘‘…पता नहीं आजकल की लड़कियों को सोशल साइट और ऐप की कैसी बीमारी लग गई है. जब देखो तब इसी में लगी रहती हैं.’’ बुदबुदाती हुई मां वहां से रसोई में चली गईं.

इधर मैसेज पढ़ रही श्रद्धा का चेहरा चमक उठा. उस ने तुरंत जवाबी मैसेज लिख डाला, ‘‘एस, मे बी सम लेट…बाहर ही इंतजार करना.’’

डेटिंग ऐप बंबल पर आया मैसेज उस के प्रेमी आफताब का था. वह हाल में ही उस के संपर्क में आई थी. श्रद्धा ने उस के फूड ब्लौग से प्रभावित हो कर इसी ऐप के जरिए उस से दोस्ती कर ली थी.

कुछ मैसेजिंग और फिजिकल डेटिंग में ही श्रद्धा को आफताब ने प्रभावित कर दिया था. उस के फेसबुक और इंस्टाग्राम पर भी अकाउंट थे, लेकिन डेटिंग के लिए बंबल का ही इस्तेमाल करता था. वह इस के जरिए मुंबई के मीटिंग पौइंट पर मिलने का समय तय करता था.

उस का पूरा नाम था आसिफ आफताब अमीन पूनावाला. वह एक शेफ और चर्चित फूड ब्लौगर था. हमेशा अपने ब्लौग ‘हंग्री छोकरो’ पर नईनई रेसिपी डालता रहता था. उस के चिकन करी रेसिपी की श्रद्धा दीवानी हो गई थी. उसे अपने घर में बनाना चाहती थी, लेकिन शाकाहारी मां की वजह से ऐसा नहीं कर पाती थी.

डेटिंग ऐप पर हुई थी दोस्ती

श्रद्धा मुंबई के मलाड के एक कालसेंटर में काम करने वाली 24 साल की युवती थी. एकदम से बिंदास अंदाज वाली लड़की. बेधड़क और मुंहफट. मांबाप के सामने भी कुछ भी बोलने से जरा भी नहीं हिचकती थी. अपने अधिकार के लिए उन से भी लड़ पड़ती थी. बातबात पर उन्हें एहसास दिलाती रहती थी कि वह अब बालिग हो गई है. अपनी जिंदगी का फैसला खुद लेने से कोई नहीं रोक सकता.

दुनिया भर की रेसिपी का मास्टरमाइंड आफताब उस के दिल में उतर चुका था. यह बात साल 2018 के मध्य की है. श्रद्धा प्यार की भूखी थी. उस के मातापिता के बीच मतभेद हो चुका था, जिस के चलते वह 2016 से ही मुंबई में इलैक्ट्रौनिक्स कारोबारी पिता विकास मदन वाकर से अलग हुई मां के साथ मलाड में रह रही थी.

श्रद्धा के घर से मात्र 3 किलोमीटर की दूरी ही आफताब पालघर के वसई स्थित हाउसिंग सोसाइटी में रहता था. उस की बिल्डिंग का नाम यूनिक था, जिस के 301 नंबर फ्लैट में आफताब का परिवार रहता था. श्रद्धा उस से कई बार मिलने भी जा चुकी थी.

उस की बात पिता से बहुत कम हो पाती थी. मांबाप की परवरिश में उसे प्यार के रूखेपन की अनुभूति भी होती थी. जब उस की मुलाकात आफताब से हुई, तब उस की बातों और व्यवहार में उसे ताजे प्यार की खुशबू का एहसास हुआ था. …और वह उस ओर खिंचती चली गई थी.

जल्द ही इस की जानकारी उस की मां को हो गई. उन्होंने सिरे से आपत्ति जताई कि वह उस की जाति तो दूर समान धर्म का भी नहीं है. इसलिए उस के साथ दोस्ती भी ठीक नहीं, प्यारमोहब्बत तो काफी दूर की बात है.

इस बारे में सुमन ने श्रद्धा को काफी समझाया, किंतु श्रद्धा पर इस का कोई असर नहीं हुआ. उस की आफताब के साथ डिजिटल डेटिंग भी चलती रही और मुंबई में मिलनाजुलना भी होता रहा.

मां ने जब काफी विरोध किया और बात पिता तक जा पहुंची, तब श्रद्धा ने मां से खुलेआम विरोध जता दिया. वह आफताब के प्यार में अंधी हो चुकी थी. उसे अपना भविष्य और करिअर सिर्फ और सिर्फ प्रेमी आफताब में दिख रहा था. श्रद्धा से आफताब ने भावनात्मक दोस्ती कर ली थी. फिर दोनों ने तय किया कि लिवइन में रहेंगे. साल 2019 से दोनों लिवइन में रहने लगे. इस के लिए मलाड में ही किराए का एक कमरा ले लिया. मकान मालिक को उन्होंने पतिपत्नी बताया था.

यह श्रद्धा की मां सुमन को पता चली तो उन्होंने विरोध जताया तब श्रद्धा ने दोटूक जवाब दे दिया, ‘‘मैं 24 साल की हो गई हूं और मुझे अपने फैसले लेने का पूरा अधिकार है. मुझे आफताब  के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहना है. मैं आज से आप की बेटी नहीं, समझो.’’

यह बात कह कर श्रद्धा जब अपने घर से सामान ले कर जाने लगी थी, उस वक्त उस के पिता भी आए हुए थे. उसे मातापिता ने काफी समझाया था, लेकिन वह नहीं मानी. दोनों एक साथ लिवइन में रहने लगे. इधर, मांबाप परेशान. उन्हें बेटी के बारे में वाट्सऐप स्टेटस, फेसबुक और इंस्टाग्राम के जरिए ही पता चल पाता था.

बेटी के गम में मां भी चल बसी

इस तरह एक साल का समय निकल गया. श्रद्धा की मां सुमन परेशान रहने लगीं. श्रद्धा ने मां को दोटूक सुना दिया था. सुमन अपनी बेटी के फैसले के आगे विरोध जताने की स्थिति में नहीं थीं. वह उस के स्वभाव से अच्छी तरह से वाकिफ थीं. आखिरकार श्रद्धा ने प्यार की खातिर अपने मांबाप की परवरिश को छोड़ दिया.

सुमन अब अपने फ्लैट में अकेली रह गई थीं. उन की जिंदगी नौकरानी के भरोसे चल रही थी. बीमार भी रहती थीं. वैसे बीचबीच में श्रद्धा मां से फोन पर बात कर हालचाल ले लिया करती थी.

तांत्रिक का इंद्रजाल : समाज में फैल रहा अंधविश्वास – भाग 1

35साल का योगेश उर्फ पप्पू नामदेव अपनी 32 वर्षीय पत्नी सुनीता व 12 साल के बेटे दिव्यांश के साथ मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के बानापुरा के वार्ड नंबर 3 दुर्गा कालोनी में रहता था. योगेश पान की दुकान चलाता था, जबकि पत्नी सुनीता घर पर ही आटा चक्की और किराना दुकान चलाती थी.

4 नवंबर की सुबह को कालोनी के लोग अपनी जरूरत का सामान लेने किराना दुकान पर आ रहे थे, लेकिन अभी तक योगेश की दुकान का दरवाजा नहीं खुला था. पड़ोसी और कालोनी के लोग इस बात को ले कर आश्चर्य भी व्यक्त कर रहे थे कि आज योगेश की दुकान क्यों नहीं खुली. क्योंकि अकसर योगेश सुबह जल्दी उठ कर किराना दुकान खोल लेता था.

आसपास रहने वाले लोग अपने घरों में दीवाली की तैयारियों में जुटे थे. योगेश के घर के सामने किसी तरह की हलचल न देख कर लोगों ने यह अनुमान लगाया कि आज अमावस्या है और योगेश शायद अपने परिवार के साथ नर्मदा नदी में स्नान करने आंवली घाट गया होगा.

कालोनी के लोगों को पता था कि योगेश के मातापिता आंवली घाट में पूजन सामग्री की दुकान चलाते हैं. अकसर ही पूर्णिमा और अमावस्या पर योगेश अपने परिवार के साथ वहां जाता रहता था. पिछले पखवाड़े ही वह अपने 8 साल के बेटे को भी वहां छोड़ आया था.

दीवाली की शाम करीब 4 बजे थे. तभी योगेश के घर के सामने एक बाइक आ कर रुकी. उन्होंने दरवाजे पर दस्तक दी. दरअसल, योगेश के घर के सामने उस की दुकान की शटर लगा हुआ था. वहीं से हो कर उस के घर के अंदर जाने का रास्ता था.

काफी देर तक योगेश के घर का दरवाजा (शटर) खटखटाया, मगर किसी ने शटर नहीं खोला. आवाज सुन कर पड़ोसी भी आ गए.

बाइक पर सवार लोगों ने उन्हें बताया कि वे बनापुरा के ही रहने वाले हैं, आज आंवली घाट नर्मदा स्नान करने गए थे. वहां पर नारियल प्रसाद खरीदते समय योगेश के पिता से परिचय हुआ तो उन्होंने कहा, ‘‘आज दीपावली का दिन है योगेश और बच्चों के लिए देवी मां का प्रसाद ले जाना.’’

योगेश के पिता के भेजे प्रसाद को देने के लिए वे काफी देर से शटर खटखटा रहे हैं, मगर कोई अंदर से उन की बात सुन ही नहीं रहा.

उन दोनों युवकों की बात सुन कर आसपास रहने वाले लोग आ गए और उन्होंने शटर को जोरजोर से पीटना शुरू कर दिया. अंदर से कोई जवाब न मिलने पर एक युवक ने खिड़की से झांक कर देखा तो उस की आंखें फटी रह गईं.

अंदर का मंजर खौफनाक था. कमरे के अंदर योगेश, उस की पत्नी और बेटे के रक्तरंजित हालत में पलंग पर पड़े हुए थे.

जैसे ही कालोनी में यह खबर फैली तो योगेश के घर के सामने कालोनी के लोग जमा होने लगे. इसी बीच किसी ने सिवनी मालवा पुलिस थाने में फोन कर के मामले की जानकारी दे दी.

सिवनी मालवा पुलिस थाने के टीआई जितेंद्र सिंह यादव को जैसे ही इस घटना की सूचना मिली, उन्होंने जिले के आला अधिकारियों को सूचना दी और पुलिस बल के साथ बनापुरा की दुर्गा कालोनी पहुंच गए.

योगेश के मकान में सामने की तरफ 2 शटर लगे हुए थे. एक शटर में किराना दुकान, जबकि दूसरी में आटा चक्की लगी हुई थी. आटा चक्की वाले तरफ से ही योगेश के मकान में अंदर जाने का रास्ता था.

पुलिस के वहां पहुंचते ही जब आटा चक्की दुकान का शटर खोल कर देखा तो वह अंदर से बंद नहीं था. जैसे ही पुलिस टीम ने शटर को उठाया, वह आसानी से खुल गया. उसी रास्ते से पुलिस टीम ने योगेश के घर के अंदर प्रवेश किया.

अंदर बैडरूम में एक पलंग पर योगेश नामदेव उर्फ पप्पू, पत्नी सुनीता नामदेव और दूसरे पलंग पर उस के 12 साल के बेटे दिव्यांश के शव पड़े हुए थे. तीनों के सिर पर चोट के साथ गले पर किसी धारदार हथियार के निशान साफ दिख रहे थे.

पलंग समेत आसपास दीवार पर खून के छींटे साफ दिखाई दे रहे थे. घर के कमरे में सामान बिखरा हुआ था. एक कमरे में जलता हुआ दीपक और पूजा की सामग्री रखी हुई थी.

इस दिल दहला देने वाली घटना की खबर सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो चुकी थी. खबर मिलते ही होशंगाबाद जिले के एसपी डा. गुरुकरन सिंह, एएसपी अवधेश प्रताप सिंह, एसडीपीओ सौम्या अग्रवाल, फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड मौके पर आ चुकी थी.

घटना की खबर आंवली घाट में रहने वाले योगेश के पिता को दी गई. योगेश का एक बेटा अपने दादादादी के पास रहता था. खबर मिलते ही आंवली घाट से योगेश के मातापिता उस के बेटे को ले कर आ चुके थे. अपने बेटे, बहू और पोते की मौत के सदमे से उन का रोरो कर बुरा हाल था.

पुलिस ने तीनों शवों को बरामद कर दूसरे दिन सुबह सिवनी मालवा के सरकारी अस्पताल में पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया, जिस के बाद तीनों शवों को योगेश के 70 साल के बूढ़े पिता विनोद कुमार नामदेव को सौंप दिया गया.

घर से तीनों की अर्थियां एक साथ निकलीं तो दुर्गा कालोनी के रहवासियों की आंखें नम हो गईं. दीवाली पर रोशनी की जगह कालोनी में चारों तरफ सन्नाटा पसरा रहा.

एसपी गुरुकरण सिंह, एएसपी अवधेश प्रताप सिंह ने मौके पर जा कर जांचपड़ताल कर घटनास्थल के कमरे को पूरी तरह सील करने का आदेश दिया. और हत्यारों की तलाश के लिए एसडीपीओ सौम्या अग्रवाल, टीआई जितेंद्र सिंह यादव, जिला पुलिस लाइन से इंसपेक्टर उमाशंकर यादव, गौरव सिंह बुंदेला के नेतृत्व में 4 अलगअलग टीमें गठित कीं.

खोजी कुत्ते के द्वारा घटनास्थल का निरीक्षण कराया गया. खोजी कुत्ते के बानापुरा रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म-1 तक जा कर रुकने से यह अनुमान लगाया गया कि शायद हत्या के आरोपी वारदात को अंजाम देने के बाद किसी ट्रेन से या प्लेटफार्म से गुजरे होंगे.

 

दुर्गा कालोनी में दीपावली का त्यौहार मातम में बदल चुका था. एक साथ हुए 3 मर्डर की वजह से कालोनी के लोग दहशत में थे. पुलिस ने दुर्गा कालोनी के लगभग दरजन भर महिला पुरुषों के बयान दर्ज कर हत्या के कारणों को जानने की कोशिश की.

नामदेव परिवार के 3 सदस्यों की हत्या की वजह जानने के लिए पुलिस ने मृतक योगेश के पिता विनोद नामदेव, माता रुकमणी एवं 8 साल के बेटे से आंवली घाट में जा कर गहन पूछताछ की.

‘‘आप के बेटे की किसी से कोई रंजिश थी क्या?’’ टीआई जितेंद्र सिंह ने विनोद नामदेव से पूछा.

‘‘नहीं साहब, पप्पू की किसी से कोई रंजिश नहीं थी, वह तो दिन भर अपनी दुकान पर ही रहता था.’’ विनोद ने कहा.

‘‘तो फिर किसी पर शक है तुम्हें?’’

‘‘नहीं साहब, कुछ समझ नहीं आ रहा. हां, इतना जरूर है कि पिछले 2 महीने से पप्पू के घर पर अजीब तरीके से चोरी हो रही थी.’’

‘‘तो फिर चोरी की रिपोर्ट दर्ज क्यों नहीं कराई.’’

राष्ट्रप्रेम थोपा नहीं जा सकता

12 दिसंबर, 2016 को तिरुअनंतपुरम में इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल औफ केरल के आयोजन के दौरान 6 लोग राष्ट्रगान बजने पर खड़े नहीं हुए तो उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. इस घटना के एक दिन पहले चेन्नई के अशोक नगर इलाके के काशी थिएटर में भी 9 लोग राष्ट्रगान के दौरान खड़े नहीं हुए तो उन्हें भी राष्ट्रगान के अपमान के आरोप में गिरफ्तार कर मामला दर्ज कर लिया गया था.

इस के पहले राष्ट्रगान के अपमान के मामले न के बराबर हो रहे थे क्योंकि थिएटर में राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य नहीं था. अब अनिवार्य हो गया है तो ऐसे मामलों की तादाद और बढ़ना तय दिख रही है. थिएटरों में राष्ट्रगान बजाने की अनिवार्यता को ले कर बहस बडे़ पैमाने पर शुरू हो गई है. कई लोग सुप्रीम कोर्ट के 30 नवंबर, 2016 के फैसले से सहमति न रखते हुए यह दलील देने लगे हैं कि राष्ट्रगान की आड़ में लोगों के दिलों में देशप्रेम का जज्बा जबरन पैदा नहीं किया जा सकता तो इन लोगों को पूरी तरह गलत नहीं ठहराया जा सकता.

अपने एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अब देश के सभी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने के पहले राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य होगा और इस दौरान थिएटर में मौजूद सभी दर्शकों को राष्ट्रगान के सम्मान में खड़ा होना जरूरी होगा. 52 सैकंड के राष्ट्रगान के दौरान हौल में कोई आएगाजाएगा नहीं और स्क्रीन पर राष्ट्रध्वज दिखाना जरूरी होगा. विकलांगों को खड़े न होने की छूट होगी. फैसले को कड़ा या प्रभावी बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने यह हिदायत भी दी है कि राष्ट्रगान हमारी राष्ट्रीय पहचान, राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक देशभक्ति से जुड़ा हुआ है. देश में रह रहे हर भारतीय नागरिक को राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े होना होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने संभावित आपत्तियोें को ध्यान में रखते यह भी स्पष्ट कर दिया कि आप लोग (भारतीय) विदेशों में सभी बंदिशों का पालन करते हैं पर भारत में कहते हैं कि कोई बंदिश न लगाई जाए. अगर आप भारतीय हैं तो आप को राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े होने में कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए. लेकिन एक अजीब बात इस फैसले में यह कही गई जो विवाद की वजह बन सकती है. वह यह है कि शास्त्रों में भी राष्ट्रगान को स्वीकार किया गया है, इसलिए देश के सम्मान के प्रतीक राष्ट्रगान का सम्मान करना आप का भी दायित्व बनता है. कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस बाबत अधिसूचना जारी कर जागरूकता के लिए अखबारों व न्यूज चैनल्स पर विज्ञापन दे.

ठोस वजह नहीं है

थिएटरों में राष्ट्रगान की अनिवार्यता लागू करने के पीछे कोई गंभीर या भारीभरकम वजह नहीं है, बल्कि यह एक दायर याचिका के एवज में आया फैसला है. भोपाल के शाहपुरा इलाके में रहने वाले 77 वर्षीय श्यामसुंदर चौकसे भोपाल के एक सिनेमाघर में ‘कभी खुशी कभी गम’ फिल्म देखने गए थे. जब राष्ट्रगान शुरू हुआ तो वे खड़े हो गए. इस पर मौजूद दूसरे बैठे दर्शकों ने उन की हूटिंग की तो वे दुखी हो उठे और जगहजगह इस वाकए की शिकायत की.

इस पर कोई सुनवाई नही हुई तो उन्होंने जबलपुर हाइकोर्ट में याचिका दायर कर दी. 24 जुलाई, 2004 को फैसला उन के हक में आया पर फिल्म निर्देशक करण जौहर इस पर स्थगन आदेश ले आए. इस पर श्यामसुंदर ने सितंबर 2016 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई और उस में कहा कि सिनेमाहौल में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान जरूरी हो. अपनी याचिका में उन्होंने राष्ट्रगान की गरिमा सुनिश्चित करने के लिए अदालत को कई बिंदु बताए.

30 नवंबर, 2016 को पहली सुनवाई में ही जस्टिस दीपक मिश्रा और अमिताव राय की पीठ ने उन से इत्तफाक रखते यह फैसला दे दिया.

यह है सजा

फैसला आते ही आम लोग अचंभित रह गए और इस का उल्लंघन करने पर सजा के प्रावधान से दहशत में भी हैं. प्रिवैंशन औफ इन्सल्ट टू नैशनल ओनर ऐक्ट 1971 की धारा 3 के मुताबिक, राष्ट्रगान में खलल डालने या राष्ट्रगान को रोकने की कोशिश करने पर 3 साल तक की कैद हो सकती है. यह ऐक्ट और धारा दोनों विरोधाभासी इस लिहाज से हैं कि इन में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि लोगों को राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर किया जाए.

थिएटरों में राष्ट्रगान की शुरुआत 60 के दशक में हुई थी लेकिन 20 साल बाद इसे बंद कर दिया गया था क्योंकि सभी लोग थिएटरों में इस के बजने के दौरान खड़े नहीं होते थे. दूसरी व्यावहारिक दिक्कतें ये थीं कि लोग सिनेमाघर मनोरंजन के लिए जाते हैं, ऐसे में वहां राष्ट्रगान के दौरान बंद हौल में खड़े होने की बाध्यता उन्हें असहज बना रही थी. किसी पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि वह देशप्रेमी नहीं है या राष्ट्रगान के दौरान खड़े न हो कर देशद्रोही हो गया है. इस की अपनी वजहें और तर्क हैं लेकिन कड़ी सजा के प्रावधान से लग ऐसा रहा है कि अब बात अंधभक्ति की हो रही है.

अंधभक्ति न हो

यह वाकई जरूरी है कि लोग राष्ट्रगान, ध्वज और दूसरे राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करें. लेकिन वह धर्म की तरह अंधभ्क्ति जैसा हो जाए, इस बात में कोई तर्क नहीं होता. उलटे, लोगों का जी उचटाने वाली बात साबित हो जाती है. देश के कई मंदिरों में प्रवेश और पूजापाठ का अपना एक अलग संविधान और विधिविधान है और यहां तक है कि बनारस, पुरी, हरिद्वार व इलाहाबाद सहित कई शहरों के मंदिरों में साफसाफ लिखा है कि यहां गैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है. शनि शिगणापुर के मंदिर में लोग जाते हैं तो उन्हें धोती पहनने के लिए पंडों द्वारा मजबूर किया जाता है. इस पर वहां आएदिन विवादफसाद होते रहते हैं.

मध्य प्रदेश के दतिया स्थित देवी पीतांबरा पीठ में 2 महीने पहले कई दिग्गज भाजपाई नेता पहुंचे थे तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह मंदिर के गर्भगृह में नहीं जा पाए थे क्योंकि वे धोती नहीं पहने थे. किसी भी गुरुद्वारे में दाखिल होने से पहले सिर पर रूमाल रखना एक अनिवार्यता है. ऐसे कई कायदेकानूननियम अधिकांश धर्मस्थलों में जाने के बाबत हैं. इसी तरह राष्ट्रगान के दौरान वह भी थिएटरों में, खड़े होने की बाध्यता इस के अपमान को जन्म देने और बढ़ावा देने वाली साबित हो रही है.

केरल और चेन्नई के मामले इस की बानगी भर हैं. अब जगहजगह इस बात को ले कर फसाद होंगे ठीक वैसे ही जैसे 80 के दशक में होते थे. तब अकेले महाराष्ट्र्र को छोड़ कर देशभर के सिनेमाघरों में राष्ट्रगान की बाध्यता खत्म करनी पड़ी थी. देश का माहौल राष्ट्र और धर्म को ले कर कतई ठीक नहीं है. हिंदूवादी राष्ट्रभक्ति को धर्म से जोड़ कर लोगों को न केवल उपदेश दे रहे हैं बल्कि धर्म की नई दुकानें भी खोल रहे हैं. भारत माता की जय बोलना और वंदे मातरम कहना जैसे विवाद जबतब होते रहते हैं.

अब तो कई धार्मिक आयोजनों में बाकायदा आरती के साथसाथ राष्ट्रगान भी गाया जाने लगा है. भक्तगणों के हाथ में तिरंगा थमा दिया जाता है यानी राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रप्रेम को धर्म के दुकानदारों ने भुनाना शुरू कर दिया है.

पिछले दिसंबर माह के तीसरे हफ्ते में भोपाल के एक धार्मिक समारोह में यह नजारा देख लोग हैरत में थे कि ऐसा क्यों किया जा रहा है. ऐसे में जरूरी है कि देश और धर्म को अलग किया जाए, न कि इन्हें एकदूसरे का पर्याय बना दिया जाए. रही बात कानून की, तो साफ दिख रहा है कि राष्ट्रप्रेम उस के जरिए न पैदा किया जा सकता है, न ही थोपा जा सकता है. लोगों में यह भावना जगाने के दूसरे तरीके भी हैं. स्कूलकालेजों में राष्ट्रगान अनिवार्य है और छात्र उस का पालन भी करते हैं. सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के दौरान कोई खड़ा न हो तो साथ के लोग एतराज जताते हैं और लड़ाईझगड़ा करते हैं. यह कानून इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा देने वाला साबित होगा.

राष्ट्रगान का अपमान करने वालों को सजा देना हर्ज की बात नहीं, लेकिन उस का थोपा जाना ‘सम्मान न करना, अपमान के दायरे में लाना जरूर चिंता की बात है. अब तक देशभक्ति और धर्मभक्ति में एक फर्क हुआ करता था, उस का खत्म हो जाना भी चिंता और हर्ज की बात है. हिंदू धर्म के नाम पर योग, सूर्य नमस्कार एक तरह से थोपे ही जा रहे हैं. इसी तरह हर धर्म अपने उसूलों और बंदिशों से बंधा हुआ है जिन का पालन करना अनुयायियों की मजबूरी होती है. ऐसा न करने पर वे नास्तिक और पापी करार दे कर तिरस्कृत किए जाने लगते हैं. अब देशभक्ति के मामले में भी यही कानूनीतौर पर होगा तो धर्मभक्ति और देशभक्ति में क्या फर्क रह जाएगा.

प्लान बनाकर किया डिजाइनर का मर्डर

फैशन डिजाइनर माला लखानी (53) उनके नौकर बहादुर (50) की हत्या के आरोपियों से पूछताछ के बाद पुलिस ने दावा किया है कि योजना बनाकर मर्डर को अंजाम दिया गया. बाद में आरोपी डर गए और खुद ही थाने पहुंचकर सरेंडर कर दिया.

पूछताछ में पता चला है कि राहुल ने वारदात की योजना पहले से बनाई थी. इन लोगों को पैसों की जरूरत थी. राहुल को लगता था कि माला के घर से उसे काफी रुपये और जूलरी या दूसरा कीमती सामान हाथ लग सकता है. वह दोस्तों के साथ मिलकर हथियारों के बल पर लूट को अंजाम देना चाहता था. उसने बीते रविवार को ही वसंत कुंज इलाके में लगनेवाली संडे मार्केट से मीट काटने वाले 2 बड़े चाकू भी खरीद लिए थे.

फोन कर कहा- ड्रेस रेडी है : पुलिस के मुताबिक, बुधवार रात 10:30 या 10:45 बजे के करीब राहुल ने माला को कॉल करके बताया कि ड्रेस रेडी है. वह वर्कशाप में आकर चेक कर लें. माला टीवी देख रहीं थीं. राहुल की कॉल के बाद जब वह वर्कशॉप पहुंचीं, तो आरोपियों ने पीछे से उनका मुंह दबाकर जमीन पर गिराने की कोशिश की. माला ने विरोध कर खुद को छुड़ाना चाहा, उसी दौरान उनके गले और पेट पर चाकू से ताबड़तोड़ 5-6 वार कर दिए गए. गले की नस कटने से माला ने मौके पर ही दम तोड़ दिया.

बहादुर न आता तो शायद बच जाता : आरोपी वर्कशाप से निकले भी नहीं थे कि 10 मिनट बाद ही माला का नौकर बहादुर वहां पहुंच गया. उसने खून से लथपथ माला को देखा, तो हक्का-बक्का रह गया. इससे पहले कि बहादुर कुछ समझ पाता, आरोपियों ने उसे भी वर्कशाप के गेट से अंदर की तरफ धक्का देकर नीचे गिरा दिया. फिर दरवाजा लगाकर उस पर भी हमले कर दिए. आरोपियों को डर था कि अगर बहादुर बच गया, तो उनकी पहचान हो जाएगी. बहादुर ने काफी देर तक आरोपियों का मुकाबला किया, लेकिन पेट में चाकू के 5-6 वार के बाद उसने भी वहीं दम तोड़ दिया. उसके बाद आरोपियों ने कपड़े बदले. करीब एक घंटे घर के कोने-कोने को खंगाला. उन्हें थोड़ी बहुत जूलरी ही मिल पाई.

बोतल ले गए थे, लेकिन पी नहीं पाए : पुलिस का दावा है कि रात 12:15 बजे आरोपी माला की कार लेकर घर से निकले. रंगपुरी पहाड़ी पर पहुंचे. उन्होंने वहां चाकू और खून से सने कपड़ों को ठिकाने लगाया. देर रात तक वहीं रुके रहे. आरोपी माला के घर से शराब की एक बोतल भी ले गए थे, लेकिन इतने घबराए हुए थे कि शराब पी नहीं पाए.

पड़ोसियों के लिए यकीन करना मुश्किल

वसंत कुंज एनक्लेव के ए ब्लौक में जिस जगह माला का घर बना हुआ है, वहां आज भले ही महेंद्र सिंह धोनी और चेतन शर्मा जैसे नामी क्रिकेटर भी रह रहें हो, लेकिन पड़ोसी शकील अहमद और उनके भाई वसीम अहमद ने बताया कि माला तब से इस इलाके में अकेली रह रहीं थीं, जब यह इलाका ठीक से बसा भी नहीं था. वह काफी हिम्मत वाली महिला थीं और उन्हें बच्चों से बहुत प्यार था. उनकी हिम्मत की आस-पास के लोग भी दाद देते थे. गाड़ी भी वो खुद ही ड्राइव करती थीं.

वसीम ने बताया कि माला के घर में अक्सर जब कोई पार्टी होती थी या मेहमान आते थे, तो वह उन्हीं के घर से बड़े बर्तन मंगवाती थीं. साथ ही त्योहारों पर भी वे एक-दूसरे को विश करते थे. वसीम और शकील के बच्चों से भी माला बहुत प्यार और स्नेह से मिलती थीं. वसीम ने बताया कि गुरुवार तड़के 4 बजे के करीब जब उन्होंने शोरशराबा सुना और वो बाहर आए, तो उन्होंने भारी तादाद में पुलिस देखी. पुलिसवाले माला के घर के अंदर छानबीन कर रहे थे.

पहले उन्हें लगा कि शायद कोई चोरी हुई है, क्योंकि माला की कार नहीं दिख रही थी. पूछने पर पुलिसवालों ने कुछ नहीं बताया और अंदर चले जाने के लिए कहा. फिर 6 बजे के करीब जब पुलिसवालों ने दो लाशें घर से बाहर निकालीं, तो उसे देखकर हर कोई हैरान रह गया.

भरोसे का उठाया फायदा

मुख्य आरोपी राहुल अनवर माला के यहां साढ़े तीन साल से काम कर रहा था. वही उनका मेन टेलर था. माला ने वर्कशाप का पूरा जिम्मा उसी को दिया था. वर्कशॉप की चाबी भी राहुल के पास रहती थी. माला उसे जिस तरह के कपड़े बनाने के लिए कहतीं, राहुल जरूरत के हिसाब से दूसरे टेलरों और हेल्परों को हायर कर लेता था. माला ने राहुल को इसकी खुली छूट दे रखी थी. इसी का फायदा उठाकर राहुल ने बुधवार की शाम को 6:30 बजे के करीब अपने 2 साथियों वसीम और रहमत को वर्कशॉप पर बुला लिया था. एक-दो बार पहले भी राहुल उन्हें माला के घर बुला चुका था.

आखिर में तीनों आरोपियों ने रजामंदी से लिया सरेंडर का फैसला

करीब दो ढाई घंटे तक बातचीत के बाद आरोपियों को लगा कि पुलिस कभी न कभी उन्हें पकड़ लेगी. उनकी पहचान ज्यादा दिन छुपी नहीं रह पाएगी. तीनों घबरा गए. आखिरकार उन्होंने मिलकर सरेंडर का फैसला किया. रात 2:45 बजे सभी माला की गाड़ी लेकर वसंत कुंज (साउथ) थाने पहुंचे. ड्यूटी अफसर को बताया कि डबल मर्डर करके आए हैं. तब एसएचओ संजीव कुमार थाने में ही थे. तड़के 3 बजे पुलिस तीनों आरोपियों को लेकर मौके पर पहुंची. वहां माला और बहादुर की लाश थी.

चार राज्यों तक फैले खून के छींटे – भाग 3

हेमंत को अपने पकड़े जाने का डर इसलिए भी था, क्योंकि उस ने जयपुर आने के लिए जिस कैब को बुक किया था, उस के लिए उस ने दीप्ति के फोन का इस्तेमाल किया था. उसी फोन नंबर और गाड़ी के ड्राइवर की मदद से पुलिस उस तक पहुंच सकती थी.

हेमंत ने उसी वक्त फैसला कर लिया कि अगर उसे पुलिस से बचना है तो उसे इनोवा कैब के चालक की भी हत्या करनी पड़ेगी वरना वह खुद फंस जाएगा. उस ने सोचा कि देवेंद्र की हत्या कर के कुछ वक्त इधरउधर छिप कर बिता लेगा. देवेंद्र सिंह की हत्या के बाद उस की गाड़ी को भी बेच देगा.

यह ख्याल आते ही हेमंतके दिमाग में एक और खतरनाक साजिश ने जन्म ले लिया. उसे लग रहा था कि वह देवेंद्र के मामले में पुलिस के हाथ कभी नहीं लगेगा, क्योंकि उस की कार उस ने दीप्ति के फोन से बुक की थी. देवेंद्र की हत्या के बाद पुलिस के लिए उस तक पहुंचने की कड़ी टूट जाएगी.

इसी साजिश को अमली जामा पहनाने के लिए उस ने एक दिन जयपुर में ही रुकने का मन बनाया. उस ने यह बात ड्राइवर देवेंद्र को बता दी. देवेंद्र को पता ही नहीं था कि हेमंत के दिमाग में क्या खतरनाक साजिश चल रही है.

उसी रात हेमंत किसी से मिलने के बहाने ड्राइवर देवेंद्र को अपने साथ अजमेर बाइपास एक्सप्रैस-वे पर चंदबाजी के इलाके में ले गया. वहां उस ने रास्ते में एक सुनसान जगह पर देवेंद्र को गोली मार क र उस की भी हत्या कर दी. इस के बाद लाश फेंक कर वह उस की इनोवा ले कर पहले अपने होटल पहुंचा, फिर वहां से कमरा खाली कर के गुजरात के लिए रवाना हो गया.

हेमंत ने सोचा था कि वह पहले देवेंद्र की इनोवा कार को सूरत में बेचेगा, फिर वहां से मुंबई चला जाएगा. अगले दिन वह इनोवा ले कर सूरत पहुंच गया. वहां पहुंच कर उस ने एक होटल में कमरा ले लिया.

इस के बाद उस ने दिल्ली में अपने एक दोस्त को फोन कर के दिल्ली में कुछ कार डीलरों के नंबर हासिल किए. दरअसल, वह उन से संपर्क कर के सेकेंड हैंड इनोवा की कीमत जानना चाहता था. उसे पता चला कि इनोवा 8-9 लाख में बिक सकती है. सूरत में उस ने गाड़ी बेचने के लिए एक डीलर से संपर्क किया तो सौदा 8 लाख रुपए में तय हो गया.

इनोवा की ड्राइविंग साइड का एक शीशा टूटा हुआ था. उस पर खून के कुछ निशान भी थे. यह देख डीलर को शक हुआ तो हेमंत गाड़ी ले कर भाग निकला, लेकिन इस से पहले डीलर ने तुरंत पीछे लिखे नंबर पर फोन कर दिया. यह नंबर देवेंद्र के भाई अजीत का था, जो कार का मालिक था.

कुछ गड़बड़ देख देवेंद्र के भाई अजीत ने अपने भाई देवेंद्र के मोबाइल पर फोन किया तो उस का नंबर स्विच्ड औफ मिला. जिस के बाद देवेंद्र के भाई ने पलट कर उसी डीलर के नंबर पर फोन किया, जिस ने उसे फोन किया था.

जिस वक्त सूरत में ये सब चल रहा था, उसी वक्त पुलिस को जयपुर के चंदबाजी में सड़क किनारे एक युवक का शव पड़े होने की सूचना मिली. युवक को गोली मारी गई थी और किसी कार का शीशा भी टूटा पड़ा था.

पुलिस ने टोल नाकों की सीसीटीवी फुटेज खंगाली तो एक इनोवा एसयूवी कार संदिग्ध नजर आई. उस के नंबरों के आधार पर कार मालिक दिल्ली निवासी अजीत सिंह से संपर्क किया गया.

अजीत ने बताया कि उस का भाई देवेंद्र बुकिंग पर कार ले कर गया था. वह 7 दिसंबर से लापता है, जिस की गुमशुदगी डाबड़ी थाने में दर्ज करवाई गई थी. बुकिंग करवाने वाले के मोबाइल नंबर की डिटेल्स खंगाली गई तो वह दिल्ली की दीप्ति गोयल का निकला.

पता चला कि दीप्ति की 6 दिसंबर को धारूहेड़ा में गोली मार कर हत्या कर दी गई थी और उस का शव सड़क किनारे एक खाली प्लौट में फेंक दिया गया था. बाद में पुलिस को देवेंद्र की कार की लोकेशन सूरत में मिली. आरोपी हेमंत कार को बेचने के लिए सूरत ले गया था.

सूरत के जिस कार डीलर ने अजीत सिंह को फोन किया था, उसी ने थाना सरथाना के एसएचओ टी.आर. चौधरी को भी फोन कर के इस की इत्तला दे दी थी. चौधरी ने इस सूचना के बाद तत्काल अपने स्टाफ को सक्रिय कर दिया. फलस्वरूप कुछ ही देर में वह इनोवा गाड़ी सरथाना पुलिस के कब्जे में आ गई, जिसे हेमंत लांबा ड्राइव कर रहा था.

जब हेमंत को थाने लाया गया और पुलिस ने उस की खातिरदारी कर के कार के मालिक और उस पर लगे खून के छींटों और टूटे हुए साइड मिरर के बारे में पूछा तो सारी कहानी खुलती चली गई.

इंसपेक्टर चौधरी के सामने एक नहीं दो कत्ल करने वाले आरोपी ने इकबाले जुर्म किया था. लेकिन दोनों में से कोई भी वारदात उन के इलाके में नहीं हुई थी, इसलिए उन्होंने अपने उच्चाधिकारियों को इस बाबत पूरी जानकारी दे कर हेमंत के खिलाफ सीआरपीसी की धारा में मुकदमा दर्ज कर लिया.

तब तक उच्चाधिकारियों की तरफ से जयपुर पुलिस व रेवाड़ी पुलिस को उन के इलाके में हुए दीप्ति हत्याकांड व देवेंद्र सिंह हत्याकांड की जानकारी दे दी गई थी.

सब से पहले रेवाड़ी पुलिस सूरत पहुंची और उस ने आरोपी हेमंत से पूछताछ करने के बाद उसे स्थानीय कोर्ट में पेश कर प्रोडक्शन वारंट पर अपनी हिरासत में ले लिया.

रेवाड़ी पुलिस हेमंत को सूरत से ले कर वापस आ गई और उसे अदालत में पेश कर जब 7 दिन के रिमांड पर लिया गया तो यह राज भी उजागर हो गया कि हेमंत ने दीप्ति की हत्या क्यों की थी.

फेसबुक पर हेमंत लांबा से हुई जानपहचान और फिर उस के प्यार में पड़ना दीप्ति को भारी पड़ गया था, जो उस की मौत का कारण बन गया.

दरअसल, जब दोनों की मुलाकात हुई तो हेमंत को दीप्ति पंसद तो आई लेकिन उसे दीप्ति में ऐसा कुछ नहीं दिखा कि वह उस के साथ लंबा वक्त गुजारता. कुछ समय तक वह उस से प्यार करने का नाटक करता रहा, लेकिन दीप्ति के साथ मौजमस्ती करतेकरते  दीप्ति उस के प्यार में कुछ इस कदर डूब गई कि वह उस से शादी के सपने देखने लगी.

हेमंत ऐसा भंवरा था जो एक डाल पर ज्यादा दिन तक नहीं बैठता था. फूल का रस चूसने के बाद वह अगली कली की तरफ बढ़ जाता था. लेकिन दीप्ति के मामले में उसे लगने लगा कि वह उस के गले में हड्डी की तरह फंस गई है. वक्त बीतने के साथ दीप्ति उस पर शादी का दबाव बनाने लगी थी. इसलिए उस से छुटकारा पाने के लिए हेमंत ने उस की हत्या की साजिश रची.

रिमांड के दौरान हुई पूछताछ में धारूहेड़ा पुलिस ने हेमंत से वारदात में इस्तेमाल की गई पिस्तौल, 4 जिंदा कारतूस और इनोवा बरामद कर ली. रेवाड़ी पुलिस ने रिमांड खत्म होने के बाद हेमंत लांबा के खिलाफ दर्ज मामले में हत्या के अलावा सबूत छिपाने की धारा जोड़ कर उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

इस के बाद जयपुर पुलिस ने हेमंत को देवेंद्र हत्याकांड में रिमांड पर ले लिया और उस से गहन पूछताछ की.

हेमंत लांबा अपनी फेसबुक वाल पर नेताओं व खुद को स्मार्ट दिखाने वाली फोटो डालता रहता था. उस पर दिल्ली में 1 दुष्कर्म, 2 छेड़छाड़ व एनआईए के 42 मामले दर्ज थे.

इस में लोगों के साथ ठगी करना, जबरन कब्जा करना, झगड़ा आदि करने के मामले भी शामिल हैं.

हरियाणा साउथ रेंज के एडीजीपी डा. आर.सी. मिश्रा के मुताबिक हेमंत सोशल मीडिया, फेसबुक व अन्य वेबसाइट पर खुद को हाईप्रोफाइल सोसायटी का दर्शाता था. उस के इसी प्रोफाइल को देख कर लड़कियां उस के जाल में फंस जाती थीं.

लेकिन वह उन लड़कियों के साथ कुछ दिन अय्याशी करता था और उन से नाता तोड़ लेता था.

उसे पता नहीं था कि जिस दीप्ति को उस ने अय्याशी  के लिए अपने जाल में फंसाया है, वह एक दिन उस के गले की फांस बन जाएगी.  द्य

—कथा पुलिस की जांच व आरोपी से हुई पूछताछ पर आधारित