Uttar Pradesh Crime : दरोगा ने 2 लाख देकर बेटे की प्रेमिका की हत्या कराई

Uttar Pradesh Crime : उत्तर प्रदेश पुलिस में दरोगा बच्चू सिंह के बेटे तरुण की दोस्ती प्रियंका से हो गई थी. दोनों शादी करना चाहते थे, लेकिन जब पिता के कहने पर तरुण ने शादी से इनकार कर दिया तो प्रियंका ने अपने हक की लड़ाई लड़ने की सोची. उसे क्या पता था कि इस लड़ाई में…   

प्रियंका को जल्दीजल्दी तैयार होता देख उस की मां चित्रा ने पूछा, ‘‘क्या बात है, आज कहीं जल्दी जाना है क्या, जो इतनी जल्दी उठ कर तैयार हो गई?’’

‘‘हां मम्मी, परसों जो मैडम आई थीं, जिन्हें मैं ने अपने फोटो, आई कार्ड और सीवी दिया था, उन्होंने बुलाया है. कह रही थीं कि उन्होंने अपने अखबार में मेरी नौकरी की बात कर रखी है. इसलिए मुझे टाइम से पहुंचना है.’’ 

प्रियंका ने कहा तो चित्रा ने टिफिन में खाना पैक कर के उसे दे दिया. प्रियंका ने टिफिन अपने बैग में रखा और शाम को जल्दी लौट आने की बात कह कर बाहर निकल गई. कुछ देर बाद प्रियंका के पापा जगवीर भी अपने क्लीनिक पर चले गए तो चित्रा घर के कामों में व्यस्त हो गई. उस दिन शाम को करीब साढ़े 5 बजे जगवीर सिंह के मोबाइल पर उन के साले ओमदत्त का फोन आयाओमदत्त ने उन्हें बताया, ‘‘जीजाजी, मेरे फोन पर कुछ देर पहले प्रियंका का फोन आया था. वह कह रही थी कि बच्चू सिंह ने अपने बेटे राहुल और कुछ बदमाशों की मदद से उस का अपहरण करवा लिया है और वह अलीगढ़ के पास खैर इलाके के वरौला गांव में है.’’

ओमदत्त की बात सुन कर जगवीर सिंह की आंखों के आगे अंधेरा छा गया. उन्होंने जैसेतैसे अपने आप को संभाला और क्लीनिक बंद कर के घर गए. तब तक उन का साला ओमदत्त भी उन के घर पहुंच गया था. मामला गंभीर था. विचारविमर्श के बाद दोनों गाजियाबाद के थाना कविनगर पहुंचे और लिखित तहरीर दे कर 25 वर्षीया प्रियंका के अपहरण की नामजद रिपोर्ट दर्ज करा दी. जगवीर सिंह सपरिवार गोविंदपुरम गाजियाबाद में किराए के मकान में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी चित्रा के अलावा 3 बच्चे थेबेटी प्रियंका और 2 बेटे पंकज तितेंद्र. उन का बड़ा बेटा पंकज एक टूर ऐंड ट्रैवल कंपनी की गाड़ी चलाता था, जबकि छोटा तितेंद्र सरकारी स्कूल में 10वीं कक्षा में पढ़ाई कर रहा था

जगवीर सिंह ने 7 साल पहले प्रियंका की शादी गुलावठी के धर्मेंद्र चौधरी के साथ कर दी थी. धर्मेंद्र एक ट्रैवल एजेंसी में काम करता था. शादी के 1 साल बाद प्रियंका एक बेटे की मां बन गई थी, जो अब 6 साल का है. आर्थिक स्थिति कमजोर होने की वजह से जगवीर अपने बच्चों को अधिक पढ़ालिखा नहीं सके. उन का छोटा सा क्लीनिक था, जहां वह बतौर आरएमपी प्रैक्टिस करते थे. यही क्लीनिक उन की आय का एकमात्र साधन थाप्रियंका शहर में पलीबढ़ी महत्त्वाकांक्षी लड़की थी. शादी के बाद गांव उसे कभी भी अच्छा नहीं लगा.

इसी को ले कर जब पतिपत्नी में अनबन रहने लगी तो प्रियंका ने पति से अलग रहने का निर्णय ले लिया और बेटे सहित धर्मेंद्र का घर छोड़ कर मातापिता के पास गाजियाबाद गई. जगवीर सिंह की आर्थिक स्थिति पहले से ही खराब थी. बेटे सहित प्रियंका के मायके जाने से उन के पारिवारिक खर्चे और भी बढ़ गएकिसी भी मांबाप के लिए यह किसी विडंबना से कम नहीं होता कि उन की बेटी शादी के बाद भी उन के साथ रहे. इस बात को प्रियंका अच्छी तरह समझती थी. इसलिए वह अपने स्तर पर नौकरी की तलाश में लग गई. काफी खोजबीन के बाद भी जब उसे कोई अच्छी नौकरी नहीं मिली तो उस ने एक मोबाइल शौप पर सेल्सगर्ल की नौकरी कर ली.

मोबाइल शौप पर काम करते हुए प्रियंका की मुलाकात तरुण से हुई. तरुण चढ़ती उम्र का अच्छे परिवार का लड़का था. पहली ही मुलाकात में तरुण आंखों के रास्ते प्रियंका के दिल में उतर गया. बातचीत हुई तो दोनों ने अपनाअपना मोबाइल नंबर एकदूसरे को दे दिया. इस के बाद दोनों प्राय: रोज ही एकदूसरे से फोन पर बातें करने लगेजल्दी ही मिलनेमिलाने का सिलसिला भी शुरू हो गया. दोनों एकदूसरे को दिन में कई बार फोन और एसएमएस करने लगे. जब समय मिलता तो दोनों साथसाथ घूमते और रेस्टोरेंट वगैरह में जाते. धीरेधीरे दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ती गईं

तरुण के पिता बच्चू सिंह उत्तर प्रदेश पुलिस में सबइंसपेक्टर थे और गाजियाबाद के थाना मसूरी में तैनात थे. जब तरुण और प्रियंका के संबंध गहराए तो उन दोनों की प्रेम कहानी का पता बच्चू सिंह को भी लग गया. उन्होंने जब इस बारे में तरुण से पूछा तो उस ने बेहिचक सारी बातें पिता को बता दीं. प्रियंका के बारे में भी सब कुछ और यह भी कि वह उस से शादी की इच्छा रखता है. उधर प्रियंका भी तरुण से शादी का सपना देखने लगी थी. बेटे की प्रेमकहानी सुन कर बच्चू सिंह बहुत नाराज हुए. उन्होंने तरुण से साफसाफ कह दिया कि वह प्रियंका से दूर रहे, क्योंकि एक तलाकशुदा और एक बच्चे की मां कभी भी उन के परिवार की बहू नहीं बन सकती. इतना ही नहीं, उन्होंने प्रियंका को भी आगे बढ़ने की सख्त चेतावनी दी. प्रियंका और अपने बेटे की प्रेम कहानी को ले कर वह तनाव में रहने लगे.

बच्चू सिंह ने प्रियंका और तरुण को चेतावनी भले ही दे दी थी, पर वे जानते थे कि ऐसी स्थिति में लड़का समझेगा लड़की. इसी वजह से उन्हें इस समस्या का कोई आसान हल नहीं सूझ रहा था. आखिर काफी सोचविचार कर उन्होंने प्रियंका को समझाने का फैसला किया. बच्चू सिंह ने प्रियंका को समझाया भी, लेकिन वह शादी की जिद पर अड़ी रही. इतना ही नहीं, ऐसा होने पर उस ने बच्चू सिंह को परिवार सहित अंजाम भुगतने की धमकी तक दे डाली. अपनी इस धमकी को उस ने सच भी कर दिखाया

1 मार्च, 2013 को उस ने थाना कविनगर में बच्चू सिंह, उन की पत्नी, बेटे राहुल, नरेंद्र, प्रशांत और रोबिन के खिलाफ धारा 376, 452, 323, 506 406 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया, जिस में उस ने घर में घुस कर मारपीट, बलात्कार और 70 हजार रुपए लूटने का आरोप लगायाबलात्कार का आरोप लगने से बच्चू सिंह के परिवार की बड़ी बदनामी हुई. इस मामले में बच्चू सिंह का नाम आने पर उन का तबादला मेरठ के जिला बागपत कर दिया गया. मामला चूंकि एक पुलिसकर्मी से संबंधित था, सो इस सिलसिले में गंभीर जांच करने के बजाय विभागीय जांच के नाम पर इसे लंबे समय तक लटकाए रखा गया

जबकि दूसरे आरोपियों के खिलाफ कानूनी काररवाई की गई. उधर बच्चू सिंह के खिलाफ कोई विशेष काररवाई होते देख प्रियंका ने उन के बड़े बेटे राहुल और उस के दोस्त के खिलाफ 17 जून, 2013 को छेड़खानी मारपीट का एक और मुकदमा दर्ज करा दिया. इस से बच्चू सिंह का परिवार काफी दबाव में गया. 2-2 मुकदमों में फंसने से बच्चू सिंह और उन के परिवार को रोजरोज कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ रहे थे. इसी सब के चलते 31 नवंबर, 2013 को प्रियंका घर से गायब हो गई.

प्रियंका के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज होने पर थानाप्रभारी कविनगर ने इस मामले की जांच की जिम्मेदारी सबइंसपेक्टर शिवराज सिंह को सौंप दी. शिवराज सिंह प्रियंका द्वारा दर्ज कराए गए पिछले 2 केसों की भी जांच कर रहे थे. उन्होंने पिछले दोनों केसों की तरह इस मामले में भी कोई विशेष दिलचस्पी नहीं ली. दूसरी ओर प्रियंका के मातापिता लगातार थाने के चक्कर लगाते रहे. उन्होंने डीआईजी, आईजी और गाजियाबाद के एसपी, एसएसपी तक सभी अधिकारियों को अपनी परेशानी बताई . लेकिन किसी भी स्तर पर उन की कोई सुनवाई नहीं हुई. इसी बीच अचानक थानाप्रभारी कविनगर का तबादला हो गया. उन की जगह नए थानाप्रभारी आए अरुण कुमार सिंह.

अरुण कुमार सिंह ने प्रियंका के अपहरण के मामले में विशेष दिलचस्पी लेते हुए इस की जांच का जिम्मा बरेली से तबादला हो कर आए तेजतर्रार एसएसआई पवन चौधरी को सौंप कर कड़ी जांच के आदेश दिए. पवन चौधरी ने जांच में तेजी लाते हुए इस मामले में उस अज्ञात नामजद महिला पत्रकार के बारे में पता किया, जिस ने लापता होने वाले दिन प्रियंका को नौकरी दिलाने के लिए बुलाया था. छानबीन में यह भी पता चला कि उस महिला का नाम रश्मि है और वह अपने पति के साथ केशवपुरम में किराए के मकान में रहती है. यह भी पता चला कि वह खुद को किसी अखबार की पत्रकार बताती है.

पवन चौधरी ने रश्मि का मोबाइल नंबर हासिल कर के उस की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से यह बात साफ हो गई कि 31 नवंबर को उसी ने प्रियंका को फोन किया था. यह जानकारी मिलते ही पुलिस ने 18 फरवरी, 2014 को रात साढ़े 12 बजे रश्मि और उस के पति अमरपाल को उन के घर से गिरफ्तार कर लिया. थाने पर जब दोनों से पूछताछ की गई तो पहले तो पतिपत्नी ने पुलिस को बरगलाने की कोशिश की, लेकिन जब उन के साथ थोड़ी सख्ती की गई तो वे टूट गए. मजबूर हो कर उन दोनों ने सारा राज खोल दिया. पता चला कि प्रियंका की हत्या हो चुकी है.

रश्मि और उस के पति अमरपाल के बयानों के आधार पर 19 फरवरी को सब से पहले सिपाही विनेश कुमार को गाजियाबाद पुलिस लाइन से गिरफ्तार किया गया. इस के बाद उसी दिन इस हत्याकांड के मास्टरमाइंड बच्चू सिंह को टटीरी पुलिस चौकी, बागपत से गिरफ्तार कर गाजियाबाद लाया गया. थाने पर जब सब से पूछताछ की गई तो पता चला कि बच्चू सिंह प्रियंका द्वारा दर्ज कराए गए मुकदमों से बहुत परेशान रहने लगे थे. इसी चक्कर में उन का तबादला भी बागपत कर दिया गया था. यहीं पर बच्चू सिंह की मुलाकात उन के साथ काम करने वाले सिपाही राहुल से हुई

राहुल अलीगढ़ का रहने वाला था. बच्चू सिंह ने अपनी समस्या के बारे में उसे बताया. राहुल पर भी अलीगढ़ में एक मुकदमा चल रहा था, जिस के सिलसिले में वह पेशी पर अलीगढ़ आताजाता रहता था. राहुल का एक दोस्त विनेश कुमार भी पुलिस में था और गाजियाबाद में तैनात था. विनेश जब एक मामले में अलीगढ़ जेल में था तो उस की मुलाकात एक बदमाश अमरपाल से हुई थी. विनेश ने अमरपाल की जमानत में मदद की थी. इस के लिए वह विनेश का एहसान मानता था. बच्चू सिंह ने राहुल और विनेश कुमार के माध्यम से अमरपाल से प्रियंका की हत्या का सौदा 2 लाख रुपए में तय कर लिया. योजना के अनुसार अमरपाल ने इस काम के लिए अपनी पत्नी रश्मि की मदद ली. उस ने रश्मि को प्रियंका से दोस्ती करने को कहाउस ने प्रियंका से दोस्ती गांठ कर उसे विश्वास में ले लिया

रश्मि को जब यह पता चला कि प्रियंका को नौकरी की जरूरत है तो उस ने खुद को एक अखबार की पत्रकार बता कर प्रियंका को 30 नवंबर, 2013 की सुबह फोन कर के घर से बाहर बुलाया और बसअड्डे ले जा कर उसे अमरपाल को यह कह कर सौंप दिया कि वह अखबार का सीनियर रिपोर्टर है और अब आगे उस की मदद वही करेगा. अमरपाल प्रियंका को बस से लालकुआं तक लाया, जहां पर रितेश नाम का एक और व्यक्ति मोटरसाइकिल लिए उस का इंतजार कर रहा था. तीनों उसी बाइक से ले कर देर शाम अलीगढ़ पहुंचेवहां से वे लोग खैर के पास गांव बरौला गए. तब तक प्रियंका को शक हो गया था कि वह गलत हाथों में पहुंच गई है. जब एक जगह बाइक रुकी तो प्रियंका ने बाथरूम जाने के बहाने अलग जा कर अपने मामा को फोन कर के अपनी स्थिति बता दी.

बाद में जब इन लोगों ने एक नहर के पास बाइक रोकी तो प्रियंका ने भागने की कोशिश भी की. लेकिन वह गिर पड़ी. यह देख अमरपाल और रितेश ने उसे पकड़ लिया और उस की गला घोंट कर हत्या कर दी. हत्या के बाद इन लोगों ने प्रियंका की लाश नहर में फेंक दी और अलीगढ़ स्थित अपने घर चले गए. इस हत्याकांड में बच्चू सिंह के बेटे राहुल की भी संलिप्तता पाए जाने पर पुलिस ने अगले दिन उसे भी गिरफ्तार कर लियाइस हत्याकांड में नाम आने पर सिपाही राहुल फरार हो गया था, जिसे पुलिस गिरफ्तार करने की कोशिश कर रही थी. पूछताछ के बाद सभी गिरफ्तार अभियुक्तों को अगले दिन गाजियाबाद अदालत में पेश किया गया, जहां से रश्मि, बच्चू सिंह, विनेश कुमार और तरुण को जेल भेज दिया गया. जबकि अमरपाल को रिमांड पर ले कर प्रियंका की लाश की तलाश में खैर इलाके का चक्कर लगाया गया

लेकिन वहां पर लाश का कोई अवशेष नहीं मिला. पुलिस ने उस इलाके की पूरी नहर छान मारी, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. रिमांड अवधि पूरी होने पर अमरपाल को भी डासना जेल भेज दिया गया. फिलहाल सभी अभियुक्त डासना जेल में बंद हैं.

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

                                               

Madhya Pradesh : इश्क की राह में बाधा बना पति तो उतार डाला मौत के घाट

Madhya Pradesh : ममता का अच्छाभला परिवार था. पति और 2 बच्चे थे. लेकिन जब वह अपने फुफेरे देवर गजेंद्र के प्यार में पड़ी तो उसे पति उमेश बेकार लगने लगा. आखिरकार गजेंद्र और ममता ने मिल कर ऐसी साजिश रची कि…      

4 अप्रैल, 2018 की बात है. मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले के मुरार थाना क्षेत्र में कर्फ्यू लगा होने की वजह से चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था. कर्फ्यू की वजह यह थी किअप्रैल को एससी/एसटी एक्ट के संशोधन के विरोध में दलित आंदोलन के दौरान 2 लोगों की मौत हो गई थी. हालात बिगड़ने पर प्रशासन ने इलाके में कर्फ्यू लगा रखा था. इसी दौरान घटी एक अन्य घटना ने माहौल में अचानक ही गरमाहट पैदा कर दी. घटना भी ऐसी कि पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया. खबर यह फैली कि बुधवार की सुबह भारत बंद के दौरान उपद्रव करने वाले लोगों ने तिकोनिया इलाके में एक युवक की हत्या और कर दी है. मरने वाला युवक तिकोनिया पार्क का उमेश कुशवाह है.

यह खबर जंगल की आग की तरह इतनी तेजी से फैली कि थोड़ी ही देर में मृतक उमेश कुशवाह के घर के बाहर भीड़ लग गई. भीड़ में राजनैतिक दलों के पदाधिकारी और कार्यकर्ताओं से ले कर सामाजिक संगठनों के लोग भी शामिल थे. सभी में इस घटना को ले कर काफी आक्रोश था. लोग हत्यारों के तत्काल पकड़े जाने की मांग कर होहल्ला मचा रहे थे. सूचना मिलने पर घटनास्थल पर पहुंचे सीएसपी रत्नेश तोमर ने मामले की गंभीरता को समझते हुए विभाग के आला अधिकारियों को अवगत करा दिया. संवेदनशील इलाके में हत्या की एक और घटना घटने की सूचना पर आईजी अंशुमान यादव, डीआईजी मनोहर वर्मा, एसपी डा. आशीष भी मौका वारदात पर जल्द पहुंच गए.

भीड़ ने उन सभी पुलिस अधिकारियों को घेर लिया. इस से तिकोनिया इलाके का माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया. ऐसी हालत में किसी भी अनहोनी से बचने के लिए रैपिड एक्शन फोर्स को भी बुला लिया. पुलिस अधिकारियों ने वहां मौजूद प्रदर्शनकारियों को भरोसा दिया कि इस केस का जल्द परदाफाश कर के हत्यारों को गिरफ्तार कर लेंगे. उन के आश्वासन के बाद भीड़ किसी तरह शांत हुई. इस के बाद पुलिस अधिकारियों ने मौका वारदात का अवलोकन किया. पुलिस जानती थी कि अफवाहें चिंगारी बन कर आग लगाने का काम करती हैं और उन्हें रोकना कठिन होता है. वे इतनी तेजी से फैलती हैं कि माहौल बहुत जल्द बिगड़ जाता है, इसलिए पुलिस ने सुरक्षा के मद्देनजर सख्त कदम उठाते हुए इंटरनेट प्रसारण पर रोक लगा दी.

पुलिस अफसरों के रवाना होते ही डौग स्क्वायड और फोरैंसिक एक्सपर्ट्स की टीमें भी घटनास्थल पर पहुंच गईं. सीएसपी रत्नेश तोमर और थानाप्रभारी अजय पवार ने घटनास्थल का मुआयना किया तो देखा कि खून से लथपथ उमेश कुशवाह की लाश मकान के बाहरी हिस्से में बने कमरे में फर्श पर पड़ी थी. देख कर लग रहा था, जैसे किसी धारदार चीज से उस के सिर पर प्रहार किया गया था. उस का सिर फटा हुआ था. मौके पर इधरउधर खून फैला हुआ था. लाश बिस्तर पर नहीं थी, इस से लगता था कि मरने से पहले उमेश ने शायद हत्यारे से संघर्ष किया होगा. जिस कमरे में उमेश कुशवाह की लाश पड़ी थी, वहीं पर उस का मोबाइल फोन भी पड़ा हुआ था.

घटनास्थल से सारे सबूत इकट्ठे करने के बाद पुलिस ने अलगअलग कोणों से लाश की फोटोग्राफी कराई. घटनास्थल से कुछ दूरी पर पुलिस टीम को एक हंसिया पड़ा मिला. उस हंसिए पर खून लगा हुआ था. इस से पुलिस को आशंका हुई कि हो हो इस हंसिया से ही हत्यारों ने इस वारदात को अंजाम दिया हो. फोरैंसिक टीम ने हंसिए से फिंगरप्रिंट उठा लिए. फिर जरूरी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. पुलिस ने वहां मौजूद उमेश की पत्नी ममता से प्रारंभिक पूछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘मेरे पति सूरत में नौकरी करते हैं. वह 30 मार्च को ही सूरत से लौट कर घर आए थे. शहर में 2 अप्रैल को भारत बंद के दौरान उपद्रव हो जाने के बाद समूचे मुरार क्षेत्र में कर्फ्यू और धारा 144 लग जाने की वजह से वह सूरत नहीं लौट सके

‘‘रोजाना की तरह वह खाना खा कर अपने कमरे में सो रहे थे. आज तड़के 4 बजे के करीब मैं बाथरूम गई. जब वहां से लौट कर आई तो पति को खून से लथपथ फर्श पर पड़ा देख कर भौचक्की रह गई. मैं रोती हुई अपने फुफेरे देवर गजेंद्र के पास गई और उसे जगा कर यह बात बताई. मेरी बात सुन कर गजेंद्र तुरंत मेरे घर आया. लाश देख कर वह समझ नहीं सका कि यह सब कैसे हो गया. इस के बाद मैं ने साहस बटोर कर मोबाइल से अपने रिश्तेदारों और पड़ोसियों को जानकारी दे दी. पड़ोसी महेश ने इस की सूचना पुलिस को दी.’’

पुलिस ने ममता से कमरे में उमेश के अकेले सोने की वजह मालूम की तो उस ने बताया कि हमारे दोनों बेटे 2 दिन पहले सिकंदर कंपू स्थित अपने मामा के घर एक कार्यक्रम में गए थे. वे रात को लौटने वाले थे, इसलिए वह दरवाजा खुला छोड़ कर सो रहे थे. उमेश के चीखने की आवाज तो ममता ने सुनी थी और ही गजेंद्र ने. पुलिस अधिकारियों ने क्राइम सीन को पुन: समझा. जांच में 3 बातें स्पष्ट हुईं, एक तो यह कि सिर पर किसी धारदार चीज से प्रहार किया गया था. दूसरा यह कि मामला साफतौर पर हत्या का था कि लूटपाट में हुई हत्या का. तीसरी बात यह थी कि वारदात में किसी ऐसे नजदीकी व्यक्ति का हाथ होने की संभावना लग रही थी, जो घर की स्थिति को भलीभांति जानता था. वह व्यक्ति यह भी जानता था कि उमेश के दोनों बेटे आज घर पर नहीं हैं. घर पर सिर्फ पत्नी ममता ही है.

बहरहाल, कातिल जो भी था उस ने गुनाह को छिपाने की हरसंभव कोशिश की थी. पुलिस ने पड़ताल के दौरान जो हंसिया बरामद किया था, ममता ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया. घटनास्थल की जांच के बाद एसपी डा. आशीष ने इस मामले के खुलासे के लिए सीएसपी रत्नेश तोमर के नेतृत्व में एक टीम का गठन कर दिया. टीम का निर्देशन एसपी साहब स्वयं कर रहे थेअगले दिन पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह सिर पर धारदार चीज का प्रहार बताया गया था. जबकि मौत का समय रात 1 बजे से 3 बजे के बीच बताया गया, इसलिए पुलिस ने तिकोनिया इलाके में लगे सीसीटीवी कैमरों की रात 12 बजे से ले कर 3 बजे तक की फुटेज देखी. लेकिन इस से इस घटना का कोई सुराग नहीं मिला.

इलाके में कर्फ्यू लगा होने की वजह से फुटेज में पुलिस के अलावा कोई भी शख्स आताजाता दिखाई नहीं दिया. पुलिस ने ममता से उमेश की हत्या के बारे में पूछताछ की तो वह पुलिस पर हावी होते हुए बोली, ‘‘साहब, मेरे ही पति की हत्या हुई और आप मुझ से ही इस तरह पूछ रहे हैं जैसे मैं ने ही उन्हें मारा हो. जिस ने उन्हें मारा उसे तो आप पकड़ नहीं पा रहे. आप ही बताइए, भला मैं अपने पति को क्यों मारूंगी. आप मुझे ज्यादा परेशान करेंगे तो मैं एसपी साहब से आप की शिकायत कर दूंगी.’’

‘‘देखो ममता, तुम जिस से चाहो मेरी शिकायत कर देना. मुझे तो इस केस की जांच करनी है.’’ सीएसपी रत्नेश तोमर ने कहा, ‘‘अब तुम यह बताओ कि तुम्हारी गजेंद्र से मोबाइल पर इतनी बातें क्यों होती हैं, इस से तुम्हारा क्या नाता है?’’

‘‘साहब, गजेंद्र मेरा फुफेरा देवर है. मैं जिस किराए के मकान में रहती हूं, उसी मकान में वह भी रहता है. अगर मैं गजेंद्र से बात कर लेती हूं तो कोई गुनाह करती हूं क्या?’’ ममता बोली.

‘‘तुम्हारा गजेंद्र से बात करना कोई गुनाह नहीं है. लेकिन तुम्हें यह तो बताना ही पड़ेगा कि पति की हत्या से पहले और बाद में उस से क्या बातें हुई थीं?’’

हत्या का सच जानने के लिए पुलिस को काफी प्रयास करने पड़े. ऐसा होता भी क्यों , चालाक ममता और गजेंद्र सीएसपी रत्नेश तोमर को गुमराह करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे. सीएसपी ने ममता से कहा, ‘‘ममता, तुम झूठ मत बोलो. तुम ने ही अपने प्रेमी के साथ मिल कर प्रेम प्रसंग में रोड़ा बन रहे पति को रास्ते से हटाने का षडयंत्र रचा था.’’

इतना सुनते ही ममता के चेहरे का रंग उड़ गया, वह खुद को संभालते हुए बोली, ‘‘नहीं, मेरी गजेंद्र से कोई बात नहीं हुई थी. किसी ने आप को गलत जानकारी दी है.’’

‘‘ममता, हमें गलत जानकारी नहीं दी. यह देखो तुम ने कबकब और कितनी देर तक गजेंद्र से बातें की थीं. इस कागज में पूरी डिटेल्स है.’’ सीएसपी ने काल डिटेल्स उस के हाथ में थमाते हुए कहा.

ममता अब झूठ नहीं बोल सकती थी, क्योंकि काल डिटेल्स का कड़वा सच उस के हाथ में था. ममता की चुप्पी से सीएसपी तोमर समझ गए कि उन की पड़ताल सही दिशा में जा रही है. इस के बाद उन्होंने उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और पति की हत्या की पूरी कहानी सुना दी. उमेश कुशवाह मूलरूप से बिजौली के रशीदपुर गांव का रहने वाला था. 15 साल पहले रोजीरोटी की तलाश में वह गांव छोड़ कर सूरत चला गया था. उमेश जवान हुआ तो उस के बड़े भाई मान सिंह ने सिकंदर कंपू इलाके की रहने वाली ममता से शादी कर दी.

शादी के कुछ साल बाद ही ममता 2 बच्चों की मां बन गई. बच्चे पढ़ने लायक हुए तो उमेश ने दोनों बच्चों को ग्वालियर शिफ्ट कर दिया. यहां वह मुरार के तिकोनिया इलाके में किराए का मकान ले कर रहने लगे. इसी मकान के दूसरे कमरे में उमेश का फुफेरा भाई गजेंद्र भी रहता था. कहते हैं कि जहां चाह होती है, वहां राह निकल ही आती है. ममता के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ. बच्चों का हालचाल पूछने के बहाने गजेंद्र ममता के पास आने लगा. ममता बच्ची नहीं थी, वह गजेंद्र के मन की बात को अच्छी तरह से समझ रही थी. गजेंद्र को अपनी ओर आकर्षित होते देख वह भी उस की ओर खिंचती चली गई.

दोनों के दिलों में प्यार का अंकुर फूटा तो जल्द ही वह समय गया, जब दोनों का एकदूसरे के बिना रहना मुश्किल हो गया. धीरेधीरे स्थिति यह हो गई कि ममता को उमेश की बांहों की अपेक्षा गजेंद्र की बांहें ज्यादा अच्छी लगने लगीं. जो सुख उसे गजेंद्र की बांहों में मिलता था, वह उमेश की बांहों में नहीं था. यही वजह थी कि उन दोनों को लगने लगा था कि अब वे एकदूसरे के बिना नहीं रह सकते.

ममता ने तो कुछ नहीं कहा, लेकिन एक दिन गजेंद्र ने कहा, ‘‘ममता, अब मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं रह सकता. मैं तुम से शादी करना चाहता हूं.’’

इस पर ममता ने कहा, ‘‘ऐसा नहीं हो सकता गजेंद्र, मैं शादीशुदा ही नहीं 2 बच्चों की मां हूं.’’

‘‘मुझे इस से कोई मतलब नहीं है. मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं.’’

गजेंद्र बोला, ‘‘तुम्हारे लिए मुझे यदि उमेश की हत्या भी करनी पड़े तो मैं कर दूंगा.’’

‘‘तुम ऐसा कुछ भी नहीं करोगे.’’ ममता ने कहा, ‘‘उमेश, मुझ से और बच्चों से बहुत प्यार करता है. हम दोनों को जो चाहिए, वह मिल ही रहा है फिर हम कोई गलत काम क्यों करें.’’ ममता ने गजेंद्र को समझाया

लेकिन ममता के समझाने का उस पर कोई असर नहीं हुआ, क्योंकि वह ममता को हमेशा के लिए पाना चाहता था. गजेंद्र ने ममता पर ज्यादा दबाव डाला तो वह परेशान हो कर बोली, ‘‘तुम्हें जो करना है करो. इस मामले में मैं कुछ नहीं जानती.’’

ममता के प्यार में पागल गजेंद्र ने ममता की इस बात को सहमति मान कर उमेश की हत्या करने की योजना बना डाली और हत्या करने के लिए मौके की ताक में रहने लगा. फिर योजना में ममता को भी शामिल कर लिया. 4 अप्रैल, 2018 को उसे वह मौका तब मिल गया, जब उसे पता चला कि उमेश के दोनों बेटे मामा के घर से नहीं लौट पाए हैं. घर पर सिर्फ ममता और उमेश ही हैं. ममता ने बातोंबातों में फोन पर गजेंद्र को बता दिया कि उमेश खाना खाने के बाद गहरी नींद में सो गया है. इस पर गजेंद्र उमेश को ठिकाने लगाने के इरादे से उमेश के कमरे पर पहुंच गया. उस ने ममता के साथ बैठ कर योजना बनाई कि तुम सब से पहले मौका देख कर उमेश के सिर पर हंसिए का वार करना. ममता ने ऐसा ही किया. इस के बाद गजेंद्र ने ममता के हाथ से हंसिया ले कर उमेश के सिर को बड़ी बेरहमी से वार कर के फाड़ दिया. थोड़ी देर छटपटाने के बाद उमेश शांत हो गया.

इश्क की राह में बने रोड़े को मौत के घाट उतारने के बाद घर कर गजेंद्र ने इत्मीनान के साथ हाथपैर धोए और फिर कपड़े बदल कर सो गया. ममता और गजेंद्र को उम्मीद थी कि उमेश की हत्या पहेली बन कर रह जाएगी और वे कभी नहीं पकड़े जाएंगे. उधर सुबह घटनास्थल पर पुलिस के आने के बाद ममता और गजेंद्र पूरी तरह से अंजान बने रहने का नाटक करते रहे. पुलिस के सवालों का भी उन दोनों ने बड़ी चालाकी के साथ सामना किया. इन दोनों ने अपने जुर्म को छिपाने का भरसक प्रयास किया, लेकिन पुलिस ने आखिरकार सच उगलवा ही लिया

ममता और गजेंद्र ने जब अपना गुनाह स्वीकार कर लिया तो पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर के अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Family dispute : पत्नी की आंखों में मिर्ची झोंक कर किया कत्ल

Family dispute : कौशल किशोर जैसे लोगों की समाज में कमी नहीं है, जो खुद की जिंदगी को तो नरक बनाए ही रहते हैं, पत्नी और बच्चों को भी नहीं छोड़ते. कौशल किशोर अगर चाहता तो लेक्चरर राजकंवर के साथ चैन की जिंदगी गुजार सकता था, लेकिन..

गभग 40-45 साल की थुलथुल जिस्म की सुमित्रा पिछले 15-20 मिनट से राजकंवर के फ्लैट की कालबेल बजा रही थी. जब दरवाजा नहीं खुला तो वह परेशान हो गई. फिर थकहार कर वहीं बैठ गई. वह झल्लाते हुए आश्चर्य से दरवाजे की तरफ देख रही थी. उसे समझ नहीं रहा था कि एक बार कालबेल बजाने पर दरवाजा खोल देने वाली राजकंवर मेमसाहब दरवाजा क्यों नहीं खोल रहीं. जबकि फ्लैट के अंदर गूंजती कालबेल की आवाज उसे बाहर भी सुनाई दे रही थी. बमुश्किल कमर पर हाथ रख कर खड़ी हुई सुमित्रा ने एक बार फिर दरवाजा खुलवाने की कोशिश में दरवाजे को हाथ से जोर से पीटा. इतना ही नहीं, उस ने मेमसाहब का नाम ले कर भी दरवाजा खोलने को कहा. लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. सुमित्रा राजकंवर नागर के यहां खाना बनाने, कपड़े धोने से ले कर सभी घरेलू कामकाज करती थी.

जिस फ्लैट की हम बात कर रहे हैं, वह कोटा से लगभग 100 किलोमीटर दूर शहरनुमा कस्बे इटावा की सरोवर कालोनी में स्थित स्थानीय राजकीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल की व्याख्याता राजकंवर नागर का था, जहां वह अपने पति कौशल किशोर और 6 वर्षीय बेटे उदित के साथ किराए पर रह रही थीं. उस दिन मंगलवार था और तारीख थी 4 सितंबर. सुबह के करीब 8 बज चुके थे. जब सुमित्रा रोजाना की तरह राजकंवर के फ्लैट पर पहुंची थी. उस तिमंजिला इमारत में राजकंवर दूसरी मंजिल के आखिरी ब्लौक में रहती थीं. सुमित्रा राजकंवर की रोजमर्रा की दिनचर्या से भलीभांति वाकिफ थी.

सुबह जिस समय सुमित्रा काम करने के लिए फ्लैट पर पहुंचती थी, राजकंवर ब्रेकफास्ट कर चुकी होती थीं और स्कूल जाने के लिए तैयार मिलती थीं. बेटे उदित को भी स्कूल जाना होता था, इसलिए वह भी उन के साथ जाने को तैयार हो चुका होता था. आमतौर पर दरवाजा राजकंवर ही खोलती थीं. कभीकभार ही ऐसा हुआ होगा कि उबासियां और अंगड़ाइयां लेते हुए उन के पति ने दरवाजा खोला हो. जब फ्लैट का दरवाजा नहीं खुला तो सुमित्रा को किसी अनहोनी का अंदेशा सताने लगा था. इतनी देर तक राजकंवर मेमसाहब के सोते रहने का तो कोई सवाल ही नहीं था.

राजकंवर के बगल वाले फ्लैट में रहने वाले कुंदनलाल रहेजा (परिवर्तित नाम) को सिर्फ घंटी की आवाज सुनाई दे रही थी, बल्कि वह कामवाली बाई सुमित्रा की आवाजें भी सुन रहे थे. सब कुछ इतना संदेहास्पद था कि उन से रहा नहीं गया. रहेजा कारोबारी थे. लिहाजा उस समय वह दुकान पर जाने की तैयारी में थे. उन्हें भी समझ नहीं रहा था कि राजकंवर या उन के पति दरवाजा क्यों नहीं खोल रहे. आखिरकार जब रहेजा से रहा नहीं गया तो वह अपने फ्लैट का दरवाजा खोल कर बाहर आए, जहां उन की नजरें सामने खड़ी सुमित्रा पर पड़ीं.

रहेजा ने सुमित्रा से पूछा, ‘‘क्या बात है सुमित्रा?’’

खून से लथपथ मिलीं राजकंवर अब तक अनहोनी के अंदेशे से सांस ऊपरनीचे करती सुमित्रा को जैसे राहत मिल गई. उस ने शिकायती लहजे में कहा, ‘‘देखिए सेठजी, कितनी देर से मैं घंटी बजा रही हूं, दरवाजा भी खटखटा चुकी हूं, लेकिन कोई दरवाजा खोल ही नहीं रहा.’’

अनहोनी की आशंका में डूबतेउतराते रहेजा ने भी कालबेल बजाई, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. उन्होंने सुमित्रा से पूछा, ‘‘मैडम का बेटा उदित भी तो होगा अंदर, उसे दरवाजा खोल देना चाहिए था.’’

‘‘साहबजी, वो तो 3-4 दिन से अपने नाना के घर गया है. वह 6 साल का ही तो है, यहां होता भी तो दरवाजा खोलना उस के वश की बात नहीं थी.’’ सुमित्रा ने बताया.

आखिर थकहार कर रहेजा ने मोबाइल पर राजकंवर का मोबाइल नंबर डायल किया. लेकिन कुछ देर रिंग जाने के बाद एक घिसीपिटी रिकौर्डिंग सुनाने के साथ ही मोबाइल बंद हो गया. रहेजा के कानों में जैसे खतरे की घंटियां बजने लगीं. कुछ सोच कर उन्होंने सुमित्रा को वहीं रुकने को कहा और फिर अपने फ्लैट के पिछवाड़े की बालकनी की तरफ बढ़े. तब तक आवाज सुन कर इमारत के कुछ और लोग भी वहां गए थे. रहेजा ने अपने नेपाली नौकर को बालकनी की परछत्ती पर चढ़ कर राजकंवर के कमरे में झांकने को कहा. बहादुर सब कुछ सुन चुका था, इसलिए वह भी घबराया हुआ था. लेकिन लोगों के हौसला दिलाने पर ऊपर चढ़ कर उस ने जो कुछ देखा, बुरी तरह सहम कर रह गया. वह घबरा कर नीचे कूदा और हांफते हुए बोला, ‘‘शाबशाबमेमशाब नीचे फर्श पर पड़ा है. आसपास खून फैला है.’’

बहादुर ने जो कुछ बताया, उस से वहां के माहौल में सन्नाटा खिंच गया. आगे की काररवाई की पहल भी रहेजा ने ही की. उन्होंने तुरंत पुलिस को फोन कर दिया. आधे घंटे के अंदर थानाप्रभारी संजय राय की अगुवाई में पुलिस टीम वहां पहुंच गई. पुलिस ने वहां मौजूद रहेजा और अन्य लोगों से पूछताछ की. चूंकि फ्लैट का दरवाजा बंद था, इसलिए लोगों की मौजूदगी में दरवाजा तोड़ कर थानाप्रभारी फ्लैट में घुसे तो सामने का दृश्य देख कर भौंचक रह गए. राजकंवर जमीन पर बेसुध पड़ी हुई थीं और उन के कपड़े खून से सने हुए थे

एक बार जान बचाई पुलिस ने थानाप्रभारी ने चैक किया तो राजकंवर की सांस फंसफंस कर रही थीं. यानी कि वह जीवित थीं, लेकिन जिस तरह उन की कनपटी और कलाइयों से खून रिस रहा था और साड़ीब्लाउज खून से सने थे, लगता था उन के साथ बड़ी निर्दयता से मारपीट की गई थी. संजय राय ने राजकंवर को अस्पताल भेजने का बंदोबस्त कियाइस के बाद उन्होंने पूरे कमरे का निरीक्षण किया. सब कुछ उलटापुलटा पड़ा था. लगता था, हमलावर ने कमरे में रखे सामान पर भी अपना गुस्सा उतारा था. थानाप्रभारी ने पूछा, ‘‘क्या राजकंवर यहां अकेली रहती थीं?’’

‘‘नहीं सर,’’ रहेजा ने बताया, ‘‘इन का पति कौशल किशोर और करीब 6 साल का बेटा उदित भी रहता है.’’

‘‘…तो वे दोनों कहां हैं?’’ राय ने रहेजा से ही पूछा.

‘‘सर, बेटा तो 3-4 दिन पहले ही ननिहाल गया है. लेकिन पति कौशल किशोर को तो यहीं होना चाहिए था.’’ इस के साथ ही रहेजा ने इधरउधर नजरें दौड़ाने के बाद कहा, ‘‘वह तो कहीं नजर नहीं रहे. पता नहीं कहां हैं?’’

थानाप्रभारी ने रहेजा से ही पूछा, ‘‘आप के पड़ोस के फ्लैट में इतना घमासान मचा और आप को भनक तक नहीं लगी.’’

पति नहीं, कसाई था वो त्रहेजा ने कुछ पल चुप्पी साधे रहने के बाद कहना शुरू किया, ‘‘साहब, पतिपत्नी के बीच झगड़ाफसाद होना रोज की बात थी. मैडम के पति का तो स्वभाव ही बेसुरा था. किसी से बोलचाल तक नहीं थी. कोई बात करता भी और समझाता भी तो कैसे, वह तो बातबात पर खाने को दौड़ता था

‘‘पता नहीं कोई काम करता भी था या नहीं. हम ने तो उसे कभी काम पर जाते नहीं देखा. अगर वह गायब है तो सीधा मतलब है कि मैडम की ऐसी दुर्गति उसी ने की होगी.’’

थानाप्रभारी घटनास्थल की जरूरी काररवाई कर के थाने लौट आए. फिर वह अस्पताल में राजकंवर को देखने पहुंचे. उन की हालत में सुधार हो रहा था. घटना के 2 दिन बाद यानी 6 सितंबर को राजकंवर बयान देने लायक हो गईं. उन्होंने बताया कि उन पर जानलेवा हमला किसी और ने नहीं, उन के पति ने ही किया था. राजकंवर ने पति के खिलाफ शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न की रिपोर्ट दर्ज कराई. उन्होंने अपनी जो कहानी थानाप्रभारी संजय राय को सुनाई, उस का एकएक शब्द चौंकाने वाला था.

राजस्थान के जिला कोटा के कस्बा दीगोद के रमेशचंद नागर संपन्न व्यक्ति हैं. उन के पास अच्छीखासी खेतीबाड़ी है. करीब 8 साल पहले सन 2010 में उन्होंने अपनी इकलौती बेटी राजकंवर का विवाह करीबी कस्बे अयाना के कौशल किशोर नागर से कर दिया था. कौशल किशोर के पिता भी किसान थे. राजकंवर पढ़ाईलिखाई में काफी होशियार थी, उस ने शादी के बाद भी अपनी पढ़ाई जारी रखी और एमएड की डिग्री हासिल कर ली. नतीजतन उन्हें लेक्चरर की प्रतिष्ठित नौकरी मिल गई. राजकंवर की पोस्टिंग नजदीक के कस्बा इटावा के राजकीय सीनियर सैकेंडरी स्कूल में हुई थी. वह पिछले डेढ़ साल से इटावा में तैनात थीं, इसलिए घर से स्कूल आनेजाने में कोई दिक्कत नहीं थी.

शादी के 2 साल बाद ही राजकंवर को बेटा हुआ, जिस का नाम उन्होंने उदित रखा. उदित अब 6 साल का हो गया था. उन्होंने अपने बेटे का दाखिला इटावा के एक निजी स्कूल में करा दिया था. राजकंवर के जीवन की सब से दुर्भाग्यपूर्ण त्रासदी यह थी कि विवाह के कुछ ही सालों में पति कौशल किशोर और उन के दांपत्य संबंधों में तनाव गया था. यह तनाव दिनोंदिन बढ़ता जा रहा था. पूरा परिवार खेती पर आश्रित था, इसलिए नियमित आमदनी के लिए कौशल किशोर क्या करता है, उस ने कभी पत्नी को नहीं बताया. उस के स्वभाव को देखते हुए राजकंवर ने उस से पूछताछ नहीं की.

बेटे के जन्म पर तो लोग खुशी से दोहरे हो जाते हैं, लेकिन उदित के पैदा होने पर कौशल के चेहरे पर खुशी नहीं दिखी. इतना ही नहीं, पत्नी के प्रति कौशल की नफरत में इजाफा होता रहा. राजकंवर तीन पाटों में फंसी हुई थी. एक तरफ पति की रोजरोज की मार और दुत्कार थी तो दूसरी तरफ पारिवारिक मर्यादा और अपने पिता से सब कुछ छिपाए रखने की मजबूरी थी. और तीसरी थी पति के तौरतरीके देख कर अपने भविष्य की चिंता. पति के जुल्म पर ससुर की खामोशी भी उसे हैरान करती थी. रोजरोज की कलह तब और ज्यादा बढ़ गई, जब कौशल ने राजकंवर के चरित्र पर लांछन लगाना शुरू कर दिया. पढ़ाई के दौरान वह किसी व्यक्ति या टीचर से बात कर लेतीं तो राजकंवर पर कौशल के लातघूंसों का कहर टूट पड़ता था.

राजकंवर जब कभी मायके में अपने मातापिता से मिलने जातीं तो चुपचाप ही रहती थीं. उन के चेहरे पर हमेशा उदासी छाई रहती थी. पिता रमेशचंद  को उड़तेउड़ते कुछ भनक लगी थी, इसलिए उन्होंने ससुरालियों के व्यवहार को ले कर बेटी से पूछताछ भी की, लेकिन राजकंवर ने उन्हें अपने दिल का दर्द कभी नहीं बताया. पत्नी पर लगाता था निराधार आरोप शराब के नशे में धुत पत्नी से मारपीट पर उतारू होते कौशल का यह रटारटाया इलजाम होता था कि पढ़ाई के बहाने जाने किसकिस से पेंच लड़ाती है. राजकंवर के दिल पर ये गंदे आरोप तीर की तरह चुभते थे. नतीजतन कलह की कड़वाहट का परनाला पूरे गलीमोहल्ले में फूट पड़ता था. यह राजकंवर का दुर्भाग्य था कि उसे जुल्म से बचाने के लिए ससुर खड़े हुए और ही पासपड़ोस के लोग.

राजकंवर चुप्पी साधे रहीं, लेकिन जब सहनशक्ति जवाब दे गई तो रहने के लिए वह इटावा गईं. पति को वह साथ नहीं रखना चाहती थीं, लेकिन यह सोच कर साथ रखा कि लोगों के तानों से भी बची रहेंगी और यहां रह कर पति भी शायद सुधर जाए. लेकिन सुधरना तो दूर, पति और दरिंदा हो गया. वह यहां भी उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताडि़त करता. थानाप्रभारी ने राजकंवर के पति कौशल किशोर नागर को उसी दिन गिरफ्तार कर लिया. उसे सबडिवीजनल मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया गया तो उस ने अपनी गलती की क्षमा मांगी

मामला पारिवारिक था, इसलिए अदालत ने उसे पत्नी से अलग रहने की ताकीद करते हुए कहा कि अगर भविष्य में वह पत्नी राजकंवर के पास गया, उसे धमकाया, मारपीट या अभद्रता की तो उस के खिलाफ सख्त कानूनी काररवाई की जाएगी. कौशल किशोर के लिए यह फैसला अंगारों पर लोटने जैसा था. कानूनी ताकीद के बावजूद अपमान से तिलमिलाता कौशल घर छोड़ कर जाती राजकंवर को धमकाने से बाज नहीं आया. उस ने कहा, ‘‘देखता हूं, तुझे मेरे पंजों से कौन सा कानून बचाता है.’’

इस घटना के बाद राजकंवर पति कौशल किशोर से अपना रिश्ता खत्म कर के अपने बेटे उदित को ले कर कोटा गईं और किराए का मकान ले कर रहना शुरू कर दिया. वह कोटा से ही रोजाना ड्यूटी के लिए अपडाउन करती थीं. लेकिन राजकंवर के सिर से दुर्भाग्य की छाया अभी छंटी नहीं थीसंजय राय अनुभवी पुलिस अधिकारी थे. राजकंवर के पति कौशल किशोर को जिस समय मजिस्ट्रैट के सामने पाबंद किया जा रहा था, संजय राय ने उस की अंगार सी सुलगती आंखों में छिपा लावा देख लिया था. वह अपने सहयोगी से अपने मन की बात कहे बिना नहीं रहे, ‘इस की आंखों में भेडि़ए की सी मक्कारी है. मैं दावे से कह सकता हूं कि इस में इंसानी जज्बा कतई नहीं है. यह शख्स कब क्या कर जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता.’

राय का सहयोगी पता नहीं उन की बात की गहराई समझा या नहीं, यह तो पता नहीं लेकिन राय ने जो अंदेशा जताया था, घटना के ठीक 10 दिन बाद 17 सितंबर को हो गया. सोमवार की दोपहर जिस समय थानाप्रभारी संजय राय अपने औफिस में बैठे थे, तभी फोन की घंटी बजी. उन्होंने अनमने मन से फोन उठाया, ‘‘यस, इटावा पुलिस स्टेशन.’’

दूसरी तरफ से हड़बड़ाती सी आवाज सुनाई दी, ‘‘साहब, पीपल्दा रोड पर स्थित एक निजी स्कूल के गेट पर अभीअभी एक टीचर की गला रेत कर हत्या कर दी गई है.’’

‘‘कौन? किस की?’’ पूछते हुए थानाप्रभारी चिल्लाते ही रह गए. लेकिन दूसरी से फोट कट चुका था. काल बन गया कौशल किशोर थानाप्रभारी तुरंत बताए गए पते की ओर रवाना हो गए. साथ ही उन्होंने एसपी (ग्रामीण) राजीव पचार को भी घटना की जानकारी दे दी. घटनास्थल पर खासी भीड़ जुटी हुई थी. स्कूल का पूरा स्टाफ वहां मौजूद था. उन्हें जब बताया गया कि मरने वाली सीनियर सैकेंडरी स्कूल की व्याख्याता राजकंवर थीं तो संजय राय सन्न रह गए. राय ने पूछा, ‘‘लेकिन राजकंवर का इस स्कूल में क्या काम?’’

स्कूल स्टाफ ने पूरा वाकया बयान करते हुए कहा, ‘‘राजकंवर का बेटा उदित यहीं पढ़ता था. अब वह कोटा रहने लगी थीं तो बेटे का दाखिला कोटा के किसी स्कूल में कराने के लिए बेटे की टीसी लेने आई थीं.’’

‘‘…फिर?’’ राय ने बेसब्री से पूछा.

‘‘दोपहर करीब 12 बजे राजकंवर अपने स्कूल के छात्र गोलू बैरवा की मोटरसाइकिल पर यहां पहुंची थीं.’’ स्टाफ के एक व्यक्ति ने बताया.

गोलू बैरवा वहीं मौजूद था. उस ने बात पूरी करते हुए कहा, ‘‘मैडम, टीसी लेने स्कूल के भीतर चली गई थीं. लेकिन मैं ने बाहर ही इंतजार करना ठीक समझा. जैसे ही बाहर कर वह मेरे पास पहुंची, अचानक कोई पीछे से आया और मेरी और मैडम की आंखों में मिर्ची झोंक दी. मैं ने आंखें मलते हुए मैडम की तरफ देखा तो वह खून से लथपथ नीचे पड़ी थीं. लगता था उन का गला काट दिया गया था. गले और सीने से खून बह रहा था. मैं जोर से चिल्लाया तो लोग इकट्ठा हो गए.’’

‘‘तुम ने देखा, कौन था वो?’’ राय ने पूछा.

‘‘नहीं साहब, मिर्ची की जलन और दर्द के मारे चेहरा तो दूर आदमी को ही नहीं देख पाया.’’ गोलू ने बताया.

थानाप्रभारी राय ने तुरंत घायल राजकंवर को अस्पताल पहुंचाया. तब तक एसपी राजीव पचार भी मौके पर गए थे. छात्र गोलू बैरवा से की गई पूछताछ की बाबत राय ने एसपी साहब को जानकारी दी तो उन्होंने भी गोलू से पूछताछ की. एसपी पचार ने गोलू को भी तुरंत अस्पताल भिजवा दिया. उसी समय उन की नजर धूप से चमकते चाकू पर पड़ी. उन्होंने राय की तरफ देख कर कहा, ‘‘यह मर्डर वेपन लगता है. जल्दी में हमलावर इसे यहीं छोड़ कर भाग गया होगा. कोटा के एसपी भार्गव को घटना की जानकारी दे कर एफएसएल टीम भिजवाने का आग्रह किया. साथ ही उन्होंने सीओ भोपाल सिंह और थानाप्रभारी राय को निर्देश दिया कि अभी हमलावर ज्यादा दूर नहीं जा पाया होगा, शहर की नाकेबंदी का बंदोबस्त करो.’’

राजकंवर ने अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ दिया था. चिकित्सा प्रभारी डा. के.सी. शर्मा ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि मृतका के शरीर पर एक दरजन से ज्यादा घाव थे, जो किसी नुकीले हथियार से किए गए थे. लगता था ताबड़तोड़ वार किए गए थेपिता ने बताई हकीकत बेटी की नृशंस हत्या की खबर पा कर इटावा पहुंचे पिता रमेशचंद नागर ने इस मामले में राजकंवर के पति कौशल किशोर के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाई. थानाप्रभारी राय उस समय हैरान रह गए, जब रमेशचंद नागर ने बिलखते हुए बताया कि अदालत के पाबंद करने के बावजूद कौशल किशोर राजकंवर के पीछे पड़ा हुआ था. वह मोबाइल पर उसे जान से मारने की धमकियां देता था.

केस दर्ज होने के बाद पुलिस आरोपी की तलाश में जुट गई. मुखबिर से मिली सूचना पर कौशल किशोर को तीसरे दिन इटावा के गणेशगंज चौराहे से गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस पूछताछ में वह जल्दी ही टूट गया. एसपी (देहात) राजीव पचार, सीओ भोपाल सिंह की मौजूदगी में थानाप्रभारी राय द्वारा की गई पूछताछ में उस ने बताया कि उस ने पत्नी की आवाजाही पर नजर रखने के लिए 2 दिन तक रेकी की थी. बेटे उदित को स्कूल ले जाने वाले वैन ड्राइवर से भी जानकारी जुटाई थी. घटना वाले दिन उस ने नकाब पहन कर उस का पीछा किया था. फिर मौका पा कर उस की आंखों में मिर्ची झोंक कर उस पर चाकू से हमला कर दिया. उस ने बताया कि पत्नी ने पुलिस से पाबंद करा कर उस का अपमान किया था, इसलिए उस ने उस के साथ ऐसा किया

पुलिस ने कौशल किशोर नागर से पूछताछ के बाद उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.                 

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित