मासूम किशोरी के साथ वहशीपन का नंगा नाच

घरों में अकेले रहना अब मासूमों के लिए ज्यादा मुफीद नहीं रहा है. चोरी के मकसद से आए चोरों ने मासूम किशोरी के साथ दर्दनाक और दिल दहला देने वाली घटना को अंजाम दिया और फरार हो गए.

यह घटना दिल्ली के पीरागढ़ी इलाके में 4 अगस्त, 2020 को घटी. मांबाप तो हर रोज की तरह सुबह ही काम पर चले गए थे, वहीं बड़ी बहन भी दोपहर में काम पर चली गई थी. अनुमान है कि शाम के तकरीबन 4 बजे 12-13 साल की किशोरी कमरे में अकेली थी, तभी चोर चोरी के मकसद से घर में घुसे.

अजनबी शख्स को कमरे में देख किशोरी ने शोर मचाया, पर उस की चीख कमरे में ही दब गई. चुप कराने की कोशिश में चोरों ने उस के साथ दरिंदगी की. विरोध करने पर कैंची से उस के सिर और शरीर को बुरी तरह गोद डाला.

घायल होने के बाद भी किशोरी बड़ी बहादुरी से इन चोरों से काफी देर तक जूझती रही. खून से नहाई मासूम को आखिर मरा समझ कर आरोपी फरार हो गए.

काफी देर तक वह बच्ची कमरे में बेसुध रही, उस के बाद जैसेतैसे कमरे से घिसटते हुए वह बाहर आई और पड़ोसी के दरवाजे को खटखटा कर इशारे से खुद की हालत बयां करते हुए फिर बेहोश हो गई. उस के निजी अंगों से लगातार खून बह रहा था.

किशोरी की ऐसी बुरी हालत देख पड़ोसी भी सहम गए. तुरंत ही इस की सूचना पुलिस को दी गई. साथ ही, उस के मातापिता को भी इस हादसे के बारे में बताया गया.

सूचना मिलने पर पश्चिम विहार वेस्ट थाने की पुलिस आई और बच्ची को संजय गांधी अस्पताल में भरती कराया. उस के सिर और हिप्स में किसी धारदार हथियार से कई वार किए गए थे. डाक्टरों ने फौरन ही बच्ची के सिर व कटे हुए हिस्सों में टांके लगाए और हाथोंहाथ एम्स रेफर कर दिया.

किशोरी ने जो बयान दिया, उस के आधार पर इस वारदात में 2 लड़के शामिल हैं. पुलिस के मुताबिक, 13 साल की किशोरी अपने परिवार के साथ पीरागढ़ी में किराए के मकान में रहती है. परिवार मूल रूप से बिहार का रहने वाला है. जिस कमरे में परिवार रहता है, वह बिल्डिंग तीनमंजिला है. इस बिल्डिंग में छोटेछोटे तकरीबन 2 दर्जन कमरे बने हुए हैं. ज्यादातर आसपास की फैक्टरियों में लेबर का काम करते हैं. बच्ची के परिवार में मातापिता और एक बड़ी बहन है. वे सभी एक फैक्टरी में लेबर का काम करते हैं.

तकरीबन साढ़े 5 बजे फोन के जरीए पुलिस को सूचना मिली थी. आशंका है कि बच्ची के साथ 4 बजे के आसपास वारदात हुई.

शुरुआती जांच में उस मासूम किशोरी के साथ सैक्सुअल एसौल्ट की पुष्टि हुई.

पुलिस ने हत्या की कोशिश और पोक्सो एक्ट समेत कई धाराओं में केस दर्ज कर आरोपियों की तलाश में संभावित ठिकानों पर छापेमारी की. तकरीबन 36 घंटे बाद यानी 3 दिन बाद एक आरोपी को पकड़ने का पुलिस ने दावा किया.

पुलिस के मुताबिक, आरोपी ड्रग एडिक्ट है. उस पर पहले से ही चोरी के अलावा दूसरे आपराधिक मामले दर्ज हैं. इस के कारण वह जेल भी जा चुका है.

हाल ही में आरोपी जेल से बाहर आया था. जेल से छूटने के बाद पास के पार्क में ही आरोपी ठहरता था. पुलिस को आरोपी के बारे में सीसीटीवी कैमरे से सुराग हाथ लगा.

घटना को अंजाम दे कर आरोपी फरार होने के बाद आसपास की जगहों पर छिप रहा था. केस की पड़ताल में पुलिस ने क्रिमिनल अपराधियों की हिस्ट्रीशीट खंगाली. इस के अलावा जमानत पर छूट कर आए चोरउचक्कों की लोकेशन का पता किया. सीसीटीवी, पड़ोसियों और 100 से अधिक संदिग्धों से पूछताछ के बाद जांच की सूई इस आरोपी पर आ कर टिकी.

पुलिस के मुताबिक, वारदात के समय आरोपी नशे में था और चोरी के इरादे से कमरे में घुसा था. कमरे में अकेली बच्ची ने जब उसे टोका और शोर मचाने की कोशिश की तो  उस ने दबोच लिया.

आरोपी ने नशे में बेरहमी से लड़की पर कैंची से ताबड़तोड़ वार किए और उसे मरा हुआ समझ कर फरार हो गया.

पुलिस ने जब आरोपी को पकड़ा, तब उस के शरीर पर खरोंच के निशान पाए गए थे. इस से खुलासा यह हुआ कि बहादुर किशोरी ने जम कर मुकाबला किया.

वहीं दूसरी ओर जांच में जुटी टीम का मानना है कि मासूम बेसुध होने तक आरोपियों से मुकाबला करती रही. कमरे में बिखरा खून और पास ही पड़ी कैंची इस ओर इशारा कर रहे थे.

कैंची खून से सनी फर्श पर पड़ी थी. पास ही में सिलाई की मशीन रखी हुई थी. उसी सिलाई मशीन पर कैंची रखी थी. माता, पिता और बड़ी बहन हर रोज की तरह काम पर चले जाते थे. घर में किशोरी के पास मोबाइल फोन रहता था, पर वह बंद था.

मासूम किशोरी का एम्स में इलाज चल रहा है और वह जिंदगी और मौत से जूझ रही है. पर, उस ने अपने ऊपर हो रहे जुल्म का डट कर विरोध किया और उन से जम कर जूझी भी. वहीं जेल से छूट कर आए अपराधियों पर पुलिस का नकेल न कस पाना ऐसे अपराधों को बढ़ाने में मददगार साबित हो रहा है.

लगता है, समाज में ओछी यानी गिरती हुई सोच और बदली मानसिकता पर लगाम लगा पाना बेहद मुश्किल साबित हो रहा है, तभी तो इनसानियत यों शर्मसार हो रही है. यही वजह है कि आएदिन मासूम बच्चियों व किशोरियों पर हमले की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं.

कुंवारे थे, कुंवारे ही रह गए – भाग 3

शादी कब और कहां होगी, यह वह बाद में बता देगी. उस ने यह भी कहा कि शादी से कुछ दिनों पहले दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट के पास स्थित आश्रम में पहले लड़कियां दिखाई जाएंगी, उन में वे जिस लड़की को पसंद करेंगे, उसी से उन की शादी कराई जाएगी. जिन के लड़कों की शादी नहीं हुई थी, उन्हें यह सौदा बुरा नहीं लगा.

वे चंदा देने के लिए तैयार हो गए. इस के बाद अनीता तो चली गई, सुशीला और मोनू शादी कराने वाले लड़कों के घर वालों से चंदा वसूल करने लगे.

कुछ जगह चंदा लेने के लिए सुशीला और मोनू के साथ अनीता भी गई थी. इन में कुछ लोग ऐसे भी थे, जो किसी तरह गुजरबसर कर रहे थे. ऐसे लोगों ने बेटे की शादी के लिए कर्जा ले कर सुशीला को पैसे दिए.

रोहतक के राजबीर और मोहन के गांव बोहर में सुशीला की रिश्तेदारी थी. सुशीला ने उन के गांव जा कर ऐसे लोगों के बारे में पता किया, जो शादी करना चाहते थे. गांव में रिश्तेदारी होने की वजह से सुशीला पर विश्वास कर के मोहन ने 45 हजार तो राजबीर ने 50 हजार रुपए उसे दे दिए. इसी तरह खरखौदा के संदीप ने शादी के लिए सुशीला को 45 हजार रुपए दिए थे. उस के पास पैसे नहीं थे तो घर वालों ने उधार ले कर उसे 45 हजार रुपए दिए थे.

खरखौदा के ही सुरेश, अंशरूप, पवन, राजेंद्र, मुनेश, जौनी, राकेश और साबू, सोनीपत के अमित, रोहतक के गांव हुमायूंपुर के संतोष और लक्ष्मी, निलौठी के असीक और रामवीर, मोहाना के राजू, बोहर के सत्यनारायण, कृष्ण, मोहन, राजवीर और कुलदीप, रोहतक के गांव निडाना के रमेश, अनिल, धनाना के शिवकुमार, जींद के अमरजीत, संजीव, झज्जर के बहराना गांव के जगवीर सहित कई लोगों ने शादी के लिए सुशीला को पैसे दिए.

ठगी के शिकार सब से ज्यादा खरखौदा के ही हुए हैं. इन की संख्या 25 से भी ज्यादा है. खरखौदा का रहने वाला सुरेश कुमार खेती करता था. उस का दूध का भी धंधा था. घर में बुजुर्ग विधवा मां थी.

आखिर बूढी मां पर वह कब तक बोझ बना रहता. सुशीला ने उस की मां से कहा कि वह सुरेश की शादी अनाथाश्रम की लड़की से करा देगी. इस के लिए 45 हजार रुपए दान देने पड़ेंगे. घर में 10 हजार रुपए ही थे. बाकी के 35 हजार रुपए उस ने ब्याज पर ले कर दिए.

खरखौदा का संदीप सब्जीमंडी में सब्जी बेचता था. बूढ़ी मां की इच्छा थी कि संदीप की शादी हो जाए. कई लोगों ने सुशीला को अनाथाश्रम की लड़की से शादी कराने के लिए पैसे दिए थे, इसलिए संदीप की मां भी उस के झांसे में आ गई. कुछ पैसे घर में थे और कुछ पैसे उधार ले कर सुशीला को दे दिए थे.

इसी तरह खरखौदा के वार्ड नंबर 3 निवासी स्कूटर रिपेयरिंग का काम करने वाले जौनी की दादी ने उस की दुलहन के लिए दान के रूप में पैसे दिए थे. दादी ने सोचा था कि पोते की बहू आ जाएगी तो दो जून की रोटी मिलने लगेगी.

सुशीला और अनीता ने सभी से 27 दिसंबर को शादी कराने के लिए कहा था. कुछ लोगों से यह भी कहा था कि शादी से 10-11 दिन पहले उन्हें दिल्ली में लड़कियां दिखा दी जाएंगी. उन में से शादी के लिए लड़की पसंद कर लेना.

कुंवारों को टालती रही अनीता

लड़की दिखाने के लिए मोहाना गांव के रोहताश ने 16 दिसंबर को अनीता को फोन किया तो उस ने कहा कि अनाथाश्रम की लड़कियों की शादी में मदद करने के लिए कुछ विदेशी आने वाले थे, लेकिन बर्फबारी होने की वजह से वे नहीं आए. इसलिए अब लड़की दिखाने का प्रोग्राम कैंसिल हो गया है. अब 27 दिसंबर को सीधे सामूहिक विवाह ही होगा.

जिन लोगों ने अनीता और सुशीला को लड़की दिखाने के लिए फोन किया था, सभी से यही कह दिया गया. लड़कों ने सोचा कि लड़की नहीं दिखाई जा रही, कोई बात नहीं शादी तो हो जाएगी.

इस के बाद सभी को फोन कर के बता दिया गया कि 27 दिसंबर को दिल्ली में शादी होगी. इस के लिए दिल्ली से खरखौदा बस आएगी. उस बस से सभी लोग दिल्ली पहुंच जाना, जहां तीसहजारी कोर्ट के पास स्थित एक अनाथाश्रम में सभी की शादी होगी. 27 दिसंबर को जो हुआ, वह बताया ही जा चुका है.

यह सारी योजना अनीता की थी. सुशीला और मोनू एजेंट के रूप में काम कर रहे थे. शादी के नाम पर चंदे के रूप में वसूली गई रकम अनीता लेती थी. उस में से कुछ पैसे सुशीला और मोनू को मिलते थे.

पुलिस ने हिसाब लगाया तो इन लोगों ने शादी के नाम पर 40 से ज्यादा लड़कों से 25 से 30 लाख रुपए वसूले थे. पुलिस यह भी पता कर रही है कि इन लोगों के साथ और लोग तो नहीं थे. थानाप्रभारी वजीर सिंह ने ठगे गए युवकों को आश्वासन दिया है कि उन लोगों से पैसे वसूल कर उन के पैसे वापस कराने की कोशिश की जाएगी.

society

दरअसल, सोनीपत के खरखौदा में लड़कों के हिसाब से लड़कियां बहुत कम हैं. इसी वजह से यहां सभी लड़कों की शादियां नहीं हो रही हैं.

मजे की बात यह है कि चुनाव के दौरान जींद जिले में कुंवारा संगठन बना था. उन्होंने शादी की उम्र पार करने वाले लड़कों की शादियां कराने की मांग उठाई थी. तब एक नेता ने बिहार से लड़कियां ला कर उन की शादी करवाने का आश्वासन दिया था.

दुलहन के नाम पर अनोखी ठगी

उत्तराखंड के बनबसा में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (एएचटीयू) की प्रभारी एसआई मंजू पांडेय को एक दिन एक व्यक्ति ने खास सूचना दी. उस ने बताया कि ऊधमसिंह नगर के खटीमा इलाके में कुछ लोग विवाह की चाह रखने वाले युवकों की शादी कराने के लिए लड़कियां उपलब्ध कराते हैं.

इस के एवज में वह उन से मोटी रकम वसूलते हैं. बाद में लड़कियां मौका मिलने के बाद वहां से लौट जाती हैं या फिर ठग गिरोह द्वारा अन्यत्र भेज दी जाती हैं.

एसआई मंजू पांडे ने यह जानकारी सीओ (टनकपुर) आर.एस. रौतेला को दी. सीओ आर.एस. रौतेला ने मंजू पांडेय के नेतृत्व में एक टीम बनाई, जिस में हैडकांस्टेबल लक्ष्मणचंद, रवि जोशी, कांस्टेबल गणेश सिंह के अलावा स्थानीय लोग और एनजीओ के लोग शामिल थे.

साथ ही उन्होंने योजना बना कर उन्हें अपने हस्ताक्षरयुक्त कुछ नोट व चैक दे दिए. इस के बाद एसआई मंजू पांडेय ने ठग गिरोह से किसी लड़के की शादी कराने के बारे में बात की.

निश्चित तारीख को चकरपुर मंदिर परिसर में शादी कराने की तैयारियों का नाटक करते हुए सीओ के हस्ताक्षर वाले चैक और नोट ठग गैंग के सदस्य को दे दिए. कुछ देर बाद खटीमा की ओर से 2 महिलाएं एक बाइक से वहां पहुंचीं. फिर एक महिला बस में सवार हो कर आई.

वह टनकपुर से आई थी. उन के पहुंचते ही विवाह की तैयारियां शुरू हो गईं. उसी दौरान एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट की दूसरी टीम वहां पहुंच गई. टीम ने पुरुष और तीनों महिलाओं को हिरासत में ले कर उन के पास से हस्ताक्षरयुक्त चैक और नोट अपने कब्जे में ले लिए.

पूछताछ में पता चला कि गिरोह में कलक्टर फार्म खटीमा की रहने वाली रजवंत कौर अपने बेटे सतनाम के साथ ठगी का यह धंधा कर रही थी. अन्य 2 महिलाओं में थाना नानकमता के गांव दहला निवासी गुरमीत कौर और टनकपुर की विष्णुपुरी कालोनी निवासी आरती कपूर थी. इन सभी के खिलाफ भादंवि की धारा 420, 120बी, 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर कोर्ट में पेश किया, जहां से इन चारों को जेल भेज दिया गया.

भिखारी बनाने वाला खतरनाक गैंग – भाग 3

बिहार राज्य के सीवान जिला अंतर्गत एक गांव है-गोरिया कोठी पिपरा. इसी गांव में मुसाफिर मांझी अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे परवेश कुमार, रमेश कुमार तथा सुरेश कुमार थे.

मुसाफिर किसान था. उस के पास मात्र 3 बीघा उपजाऊ जमीन थी. जमीन की उपज से ही वह परिवार का भरणपोषण करता था. उस का बड़ा बेटा परवेश कृषि कार्य में उस का हाथ बंटाता था.

परवेश से छोटा रमेश था. वह तेज दिमाग का था. उस का मन किसानी में नहीं लगता था. मामूली पढ़ाई के बाद वह रोजीरोटी की तलाश में कानपुर आ गया था. यहां वह कई महीने तक भटकता रहा, उस के बाद उसे यशोदा नगर की एक प्लास्टिक फैक्ट्री में नौकरी मिल गई.

नौकरी लग गई तो उस की शादी भी जल्दी हो गई. कुछ समय बाद वह अपनी पत्नी छठी देवी को भी कानपुर शहर ले आया और नौबस्ता थाना क्षेत्र के एस ब्लौक नाला रोड पर रहने लगा.

छोटे बेटे सुरेश का मन जब पढ़ाई से उचट गया तो मुसाफिर ने उसे किसानी के काम में लगा लिया. कुछ समय बाद सुरेश सीवान चला गया. वहां वह एक दुकान पर काम करने लगा और अच्छा पैसा कमाने लगा.

सुरेश जब कमाने लगा तो मुसाफिर ने उस का विवाह सीवान निवासी गोपी की बेटी गुलाबो के साथ कर दिया. शादी का सारा खर्चा मुसाफिर व उस के बेटे रमेश ने उठाया था.

शादी के एक साल बाद गुलाबो ने एक बेटी को जन्म दिया, लेकिन महीने भर बाद ही उस की मौत हो गई. बेटी की मौत का सदमा सुरेश को इस कदर लगा कि वह गम भुलाने के लिए शराब पीने लगा. धीरेधीरे वह शराब का लती बन गया.

पति का शराब पीना गुलाबो को बेहद खलता था, क्योंकि वह सारा पैसा शराब पीने में ही खर्च कर देता था. अपनी कमाई का एक भी पैसा न घर वालों को देता था और न ही पत्नी गुलाबो को.

शराब पीने को ले कर अब पतिपत्नी के बीच तल्खियां बढ़ने लगी थीं. दोनों के बीच झगड़ा और मारपीट भी होने लगी थी. पिता व भाइयों के समझाने के बावजूद वह मनमानी करता था.

पति की शराबखोरी और प्रताड़ना से जब गुलाबो आजिज आ गई तो वह उसे छोड़ कर मायके सीवान आ गई. कुछ माह बाद सुरेश पत्नी को लेने आया. लेकिन गुलाबो ने उस के साथ जाने से साफ इंकार कर दिया.

कालांतर में गुलाबो के प्रेम संबंध एक रिश्तेदार युवक से हो गए, बाद में उस ने उसी युवक से शादी कर ली और सुखमय जीवन व्यतीत करने लगी.

पत्नी ने साथ छोड़ा, तो सुरेश का मन गांव में नहीं लगा. वह गांव छोड़ कर अपने भाई रमेश के पास कानपुर शहर आ गया.

अपनी कमाई का आधा पैसा वह भाई के हाथ पर रखने लगा. शराब की लत अब भी उस की नहीं छूटी थी. इस को ले कर उसे भाई की फटकार भी सुननी पड़ती थी.

सुरेश मांझी मजदूर था. काम की तलाश में वह हर रोज सुबह 8 बजे किदवई नगर लेबर मंडी आ जाता था. काम मिल जाता तो ठीक वरना घर वापस लौट आता था.

अप्रैल, 2022 की बात है. एक रोज सुरेश मांझी काम की तलाश में लेबर मंडी में बैठा था. तभी एक आदमी उस के पास आ कर बैठ गया और बातचीत करने लगा. बातों में उलझा कर उस ने सुरेश को दिल्ली में नौकरी दिलवाने और अच्छा पैसा कमाने का लालच दिया. सुरेश उस के लालच में फंस गया.

दरअसल, सुरेश को अपने जाल में फंसाने वाला कोई और नहीं, भीख मंगवाने वाले गिरोह का सक्रिय सदस्य विजय नट था. वह मछरिया के गुलाबी बिल्डिंग के पास रहता था.

विजय नट कानपुर की लेबर मंडियों में सक्रिय रहता था. वहां वह 18 से 25 साल के युवकों को फंसाता था. फिर हाथपैर से अपंग बना कर भीख मंगवाने वाले गिरोह को बेच देता था. उस के गिरोह में उस की बहन तारा तथा बहनोई राजेश भी था.

विजय का एक रिश्तेदार राज नागर था. वह अपनी मां आशा के साथ किदवई नगर नटवन टोला में रहता था. लेकिन पिछले 3 साल से वह नांगलोई (दिल्ली) की कच्ची बस्ती में रहने लगा था. उस का कानपुर भी आनाजाना लगा रहता था.

राज नागर भी भीख मंगवाने वाले गिरोह का सदस्य था. वह विजय नट से युवकों को खरीदता था, फिर ऊंचे दाम पर दिल्ली के भीख मंगवाने वाले गिरोह को बेच देता था. कानपुर तथा उस के आसपास के क्षेत्र के कई युवकों को वह इस गिरोह को बेच चुका था.

सुरेश मांझी को अपने जाल में फंसाने के बाद विजय नट उसे अपने घर ले आया. यहां उस ने सुरेश को 2 दिन रखा और मीट मुरगे के साथ शराब पिलाई.

उस के बाद विजय सुरेश को अपने बहनबहनोई के डेरे पर झकरकटी ले आया. यहां आने के कुछ दिन बाद ही उस का उत्पीड़न शुरू हो गया. विजय की बहन तारा व बहनोई राजेश ने जुल्म की सारी हदें पार कर दीं.

सुरेश को भिखारी बनाने के लिए उन दोनों ने उस के हाथपैर के पंजे तोड़ दिए तथा उस की आंखों में कैमिकल डाल कर उसे अंधा बना दिया. यही नहीं, उन्होंने उस के शरीर को लोहे की गरम रौड से जगहजगह दागा तथा चेहरे पर उस की दाढ़ के पास कट लगा कर उस का चेहरा बिगाड़ दिया. इस के बाद वे दोनों सुरेश से भीख मंगवाने लगे.

लगभग 2 माह बाद विजय नट ने राज नागर व उस की मां आशा के हाथ सुरेश को 25 हजार रुपए में बेच दिया. राज नागर व आशा, सुरेश को गोरखधाम एक्सप्रेस से दिल्ली लाए और नांगलोई की कच्ची बस्ती में रखा.

इस के बाद वह सुरेश से भीख मंगवाने लगा. वह सुरेश को व्यस्ततम चौराहे पर छोड़ देता और उस पर निगरानी रखता. शाम तक जो पैसे मिलते, वह सब अपने पास रख लेता था.

राज नागर का संबंध भीख मंगवाने वाले दूसरे गिरोह से भी था. कुछ समय बाद उस ने सुरेश को दूसरे गिरोह को 70 हजार रुपए में बेच दिया.

अब दूसरा गिरोह सुरेश से भीख मंगवाने लगा. इस गिरोह ने फुटपाथ पर डेरे पर रहने की उस की व्यवस्था कर दी थी. इस डेरे में कई और लोग थे, जो भीख मांगते थे. गिरोह के सदस्य डेरे पर हर समय नजर रखते थे. सुरेश को ये लोग नांगलोई के व्यस्त चौराहे पर छोड़ देते.

रेड लाइट होने पर वह भीख मांगता था. उस की दशा देख कर लोग उसे 5-10 रुपए के नोट भीख में देते. इस तरह शाम तक वह हजार-2 हजार रुपया भीख में पा जाता. इस रकम को गिरोह के सदस्य अपने कब्जे में कर लेते थे.

डेरे पर सुरेश का उत्पीड़न भी किया जाता. उसे कम खाना दिया जाता तथा नशे का इंजेक्शन लगाया जाता. इस वजह से सुरेश कमजोर हो गया और वह बीमार पड़ गया. उस के शरीर के घावों में संक्रमण फैल गया और शरीर से बदबू भी आने लगी.

सुरेश भीख मांगने से लाचार हुआ तो गिरोह के सरगना की चिंता बढ़ गई. उस ने सुरेश को डाक्टर को दिखाया तो उस ने 40-45 हजार रुपए इलाज का खर्च बताया.

इस के बाद सरगना ने राज नागर को सारी बात बताई और सुरेश का इलाज किसी सरकारी अस्पताल में कराने की सलाह दी. साथ ही सुरेश के बदले किसी दूसरे युवक को देने का दबाव बनाया.

राज नागर ने तब विजय से बात की और जल्द ही किसी अन्य युवक को सौंपने की बात कही. विजय ने उसे आश्वासन दिया कि जल्दी ही उस का काम हो जाएगा.

इधर सुरेश की हालत बिगड़ी तो राज नागर और आशा उसे दिल्ली से कानपुर लाए और 30 अक्तूबर, 2022 की सुबह 4 बजे किदवई नगर चौराहा स्थित एक दुकान के बाहर छोड़ कर भाग गए.

पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 9 नवंबर, 2022 को आरोपी राज नागर व आशा को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

विजय नट ने अदालत में 5 दिसंबर, 2022 को आत्मसमर्पण कर दिया था जबकि तारा व राजेश फरार थे. पुलिस उन की तलाश में जुटी थी.

रमेश अपने भाई के इलाज से संतुष्ट नहीं था. उस का आरोप था कि उसे हैलट, उर्सला और कांशीराम अस्पताल के चक्कर लगवाए जा रहे थे. उस ने अपनी पीड़ा पार्षद प्रशांत शुक्ला को बताई तो वह मदद को आगे आए.

उन्होंने दिल्ली निवासी एक पत्रकार मित्र से बात की तो उन्होंने सुरेश मांझी के इलाज की व्यवस्था आई केयर चैरिटेबल अस्पताल, दरियागंज में करा दी. कथा लिखने तक सुरेश का इलाज इसी अस्पताल में हो रहा था. डाक्टरों ने बताया कि उस की एक आंख की रोशनी वापस आ सकती है.       द्य

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

हीरे की ललक में उमड़े लोग – भाग 3

साढ़े 3 सौ रुपए के इनवैस्टमेंट से  लखपति बनने का सपना देख रहे बाबूलाल ने बताया, ‘‘इस पहाड़ी के ऊपर एक गुफा है, वहां लोगों को ब्लैक डायमंड जैसे पत्थर अधिक मिल रहे हैं. मेरे पास ऐसे करीब 50 पत्थर जमा हो चुके हैं. इन की जांच कराऊंगा. ब्लैक डायमंड हुआ तो ठीक नहीं तो सुनार प्रति कंकड़ 100 रुपए के हिसाब से खरीद लेगा तो यहां आनेजाने का अपना खर्च तो निकल ही जाएगा.’’

हीरा पा कर मालामाल हो चुके लोगों की कहानी

हीरा पाने की ललक में नदी की रेत मिट्टी छान रहे लोग बेमतलब ही अपना वक्त नहीं बरबाद कर रहे, बल्कि लोग एक आस ले कर यहां पहुंचते हैं. मई 2022 में ऐसे ही एक मजदूर प्रताप सिंह की किस्मत चमकी थी, जब प्रताप सिंह यादव नाम के एक मजदूर को जैम क्वालिटी का हीरा मिला था.

प्रताप सिंह कुआं का रहने वाला है और उस की माली हालत ठीक नहीं थी. प्रताप यादव फरवरी में सरकारी हीरा कार्यालय गया और 4 गुणा 4 मीटर की एक जमीन हीरा खदान के लिए स्वीकृत करा ली. इस के बाद हीरा ढूंढने के लिए वह दिनरात मेहनत करने लगा.

3 महीने की कड़ी मेहनत ने उस की झोली में हीरा डाल दिया. इस तरह रातोरात गरीब मजदूर लखपति बन गया. हीरे का वजन 11.88 कैरट निकला. जिस की कीमत करीब 60 से 70 लाख रुपए आंकी गई. प्रताप ने इसे हीरा कार्यालय में जमा कर दिया है. प्रताप का कहना है कि हीरे की नीलामी से मिलने वाले पैसे से उस की आर्थिक स्थिति सुधारेगी और बच्चों की पढ़ाई और भरणपोषण का खर्च निकालेगा.

पन्ना में सब से बड़ा 44 कैरेट का हीरा वर्ष 1961 में रसूल मुहम्मद को मिला था. 67 साल बाद 2018 में 4 दोस्तों को 42 कैरेट से ज्यादा वजन का हीरा मिला था. यह हीरा उन्हें पटी की खदान में 9 अक्तूबर, 2018 को मिला था. इस खदान का पट्टा मोतीलाल प्रजापति के नाम पर था.

हीरा कार्यालय से मोतीलाल को इस हीरे के एवज में 2.25 करोड़ के लगभग कीमत मिली थी. पन्ना के बेनीसागर मोहल्ले में रहने वाले मोतीलाल अब भी हीरा खदानों में हीरा तलाशने का काम करते हैं. जब उन से पूछा गया कि करोड़ों का हीरा मिलने के बाद भी इस काम को नहीं छोड़ा तो उन का जबाब था, ‘‘मैं ने जो जिंदगी जी है, वो मेरे बच्चे न जिएं, उन को अच्छी शिक्षा देना और पढ़ाई कराना मेरा सपना है. इसी सपने को पूरा करने के लिए अब भी हीरा खदानों की खाक छान रहा हूं.’’

हीरा मिलने पर हो जाते हैं वारेन्यारे

47 साल के मोतीलाल 4 भाईबहनों में सब से बड़े हैं और केवल 10वीं तक की पढ़ाई उन्होंने की है. घर की माली हालत ठीक न होने से पढ़ाई बीच में छोड़ मजदूरी करनी पड़ी. अभी परिवार में मां, पत्नी के अलावा 2 बेटे व एक बेटी है.

मोतीलाल अपने 4 पार्टनरों के साथ 20 सालों से पटी की अलगअलग खदान में हीरे की खाक छानते रहे हैं. वे दोस्तों के साथ हीरापुर टपरियन की खदान में हीरे की तलाश में सुबह 5 बजे घर से निकल जाते हैं.

दोपहर बाद वहां से ईंट भट्ठे पर काम करने चले जाते हैं, वहां से शाम ढलने के बाद लौटते हैं.

मोतीलाल कहते हैं, ‘‘खदान में काम करते हुए 25 साल हो गए. पिछले साल उन्हें कम क्वालिटी का 5 कैरेट का हीरा मिला था. 1.62 लाख रुपए में नीलाम हुआ था. 11.50 प्रतिशत टैक्स कट गया था. शेष रकम 4 पार्टनरों में बंट गई.

इसी तरह 22 फरवरी, 2022 को पन्ना जिले की पटी की उथली हीरा खदान से किशोरगंज बड़ा बाजार में रहने वाले सुशील कुमार शुक्ला को 26.11 कैरेट का जैम क्वालिटी का हीरा मिला था.

सुशील कुमार शुक्ला हीरा मिलने की कहानी बताते हैं, ‘‘मैं 20 साल से बड़े भाई राजकिशोर शुक्ला के साथ हीरा पाने के लिए खुदाई कर रहा था, उस दिन हमारी किस्मत चमकी और हमें वो नायाब हीरा मिल गया.’’

नयापुवा पन्ना निवासी 45 साल के रामप्यारे विश्वकर्मा 16 साल की उम्र में छतरपुर से पन्ना आए थे. उन के बड़े भाई लोहा, पत्थर का काम करते थे. यहां आ कर उन्होंने साइकिल पंक्चर की दुकान खोल ली. बेटा भरत बाइक रिपेयरिंग करता है. 5 साल पहले पत्नी की बीमारी से मौत हो गई. 2 बेटियां हैं, बड़ी बेटी मोहिनी 12वीं में तो छोटी रोहिणी 6वीं में पढ़ रही है.

पिछले 30 सालों से वह भी हीरा तलाश रहे थे. उन की तलाश पूरी हुई 24 फरवरी, 2021 को जब उन्हें 14.9 कैरेट का हीरा मिला. उन की खदान में कुल 7 पार्टनर थे.

हीरे की नीलामी से 39 लाख रुपए मिले थे, जिसमें से हर एक के हिस्से में 5.57 लाख रुपए आए थे. रामप्यारे के हिस्से में मिले पैसे वे बेटियों की शादी के लिए जमा कर चुके हैं और अब भी हीरे की तलाश के लिए खदान जाते हैं.

मई 2022 में इटवां कला की रहने वाली चमेली बाई को 2.08 कैरेट का बेशकीमती हीरा कृष्ण कल्याणपुर पट्टी की उथली खदान से मिला था. चमेली बाई 10 साल से पन्ना में किराए के मकान में अपने परिवार के साथ रह रही हैं, लेकिन अभी तक मकान नहीं बनवा पाई.

इसी मकसद को ले कर उस ने फरवरी महीने में हीरा कार्यालय से हीरा खदान का पट्टा जारी कराया था. 200 रुपए के चालान में उसे 4×4 मीटर की खदान स्वीकृत हुई, जिस के बाद उस ने खदान में हीरा तलाशने का काम किया और मई के महीने में उसे 2.08 कैरेट का उज्ज्वल किस्म का हीरा मिला था.

ऐसे परखा जाता है असली हीरा

भारत करीब 3 हजार सालों से हीरे के उत्पादन में नंबर वन बना हुआ है. इंडियन ब्यूरो औफ माइंस की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हीरा मध्य प्रदेश के पन्ना जिले, आंध्र प्रदेश के गोलकुंडा और कोल्लूर खान के अलावा छत्तीसगढ़ के देवभोग में मिलता है.

कोहिनूर नाम का प्रसिद्ध हीरा गोलकुंडा में ही मिला था, जो वर्तमान में ब्रिटेन के राजशाही मुकुट की शोभा बढ़ा रहा है. हीरा रासायनिक तौर पर कार्बन का ही रूप है, जो निष्क्रिय होने के साथ पानी में घुलनशील नहीं है. गुजरात के सूरत शहर में ज्यादातर हीरे को काटने और पौलिश करने का काम होता है. हीरे को

700 डिग्री तापमान से अधिक गर्म करने पर वह जल कर कार्बन डाई आक्साइड के रूप में बदल कर राख जैसा कोई अवशेष नहीं छोड़ता है.

हीरे की परख रखने वाले जौहरी बताते हैं कि असली हीरे के अंदर की बनावट ऊबड़खाबड़ होती है, लेकिन कृत्रिम या बनावटी हीरा अंदर से सामान्य दिखता है.

असली हीरे में कुछ न कुछ खांचे होते है जो बारह सौ गुणा ताकतवर माइक्रोस्कोप की मदद से देखे जा सकते हैं.

हीरे को अखबार पर रखें और उस के पार से अक्षरों को पढ़ने की कोशिश करें, अगर  टेढ़ी लकीरें दिखें तो हीरा नकली है. हीरे को पराबैंगनी किरणों में देखें, नीली आभा के साथ चमकता है तो हीरा असली है. यदि पीली हरी या स्लेटी रंग की आभा निकले तो यह मोइसा नाइट नाम का पत्थर है.

हीरा प्रकाश को रिफ्लेक्ट करता है. असली हीरा बहुत कठोर होता है. हीरे को रगड़ने पर किसी भी प्रकार की खरोंच नहीं आती है. एक गिलास में पानी ले कर उस में हीरा डालने पर असली हीरा अपने घनत्व की अधिकता के कारण पानी में डूब जाता है लेकिन नकली हीरा पानी में तैरने लगता है.

हीरे के कोणों से आरपार देखने पर इंद्रधनुष की तरह सातों रंग दिखाई दें तो समझिए हीरा असली है. जिस तरह चश्मे के ग्लास पर भाप चढ़ जाती हैं, उसी तरह अगर मुंह की भाप हीरे पर जम जाए तो समझो हीरा नकली है. असली हीरे पर नमी नहीं जमती है.

सरकार की उदासीनता की वजह से पन्ना में हीरा उद्योग बंद होने के कगार पर है. अधिकांश हीरा खदानें बंद हो गई हैं. ऐसे में रुंझ नदी में हीरा मिलने की खबर से पन्ना का हीरा अचानक फिर चर्चा में आ गया है.

सरकार को चाहिए कि पन्ना के हीरा उद्योग को संरक्षित करे और वन भूमि विवाद के कारण जो हीरा खदानें बंद हो गई हैं, उन्हें भी चालू कराया जाना चाहिए, जिस से गरीबों की रोजीरोटी और अमीरों का शौक हमेशा के लिए सुरक्षित रह सके.    द्य

उजले लोगों का ये है काला धंधा – भाग 2

यह गिरोह खूबसूरत लड़कियों की मदद से रईस लोगों को ब्लैकमेल करता है. इस गिरोह के लोग पहले तो रईस लोगों की पहचान करते हैं, उस के बाद उन्हें फंसाने के लिए उन की दोस्ती गिरोह की खूबसूरत लड़कियों से करा देते हैं. दोस्ती के लिए वे फार्महाउसों पर सेलिबे्रट पार्टियां आयोजित करते हैं. इन पार्टियों में पीनेपिलाने का दौर चलता है.

उसी बीच लड़कियां शिकार को अपने मोबाइल नंबर दे देती हैं और उन के नंबर ले लेती हैं. इस के बाद पहले बातचीत और उस के बाद मुलाकातों का दौर शुरू हो जाता है. कुछ ही मुलाकातों में लड़कियां अपने शिकार को अपनी सुंदरता के मोहपाश में इस कदर बांध लेती हैं कि वे उन के साथ हमबिस्तर होने के लिए बेचैन हो उठते हैं.

शिकार को तड़पा कर लड़कियां हमबिस्तर होने का प्रोग्राम बनाती हैं. इस के लिए वे कई बार जयपुर से बाहर भी चली जाती हैं. रईसों के साथ उन के हमबिस्तर होने के समय गिरोह के सदस्य लड़की की मदद से गुप्त कैमरे से वीडियो क्लिपिंग बना लेते हैं. अगर इस में वे सफल नहीं हो पाते तो लड़कियां हमबिस्तर होने के बाद अपने अंतर्वस्त्र सुरक्षित रख लेती हैं.

इस के बाद उस रईस को धमकाने का काम शुरू होता है. लड़की अपने रईस शिकार को पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने की धमकी देती है. ज्यादातर मामलों में लड़कियां पुलिस में शिकायत कर भी देती हैं. इस के बाद फरजी पत्रकार और वकील का काम शुरू होता है. वे उस रईस को बदनामी का डर दिखा कर समझौता कराने की बात करते हैं. जरूरत पड़ने पर बीच में पुलिस वाले भी आ जाते हैं.

रईस अपनी इज्जत बचाने के लिए उन से सौदा करता है. रईस की हैसियत देख कर 10-12 लाख रुपए से ले कर एक करोड़ रुपए तक मांगे जाते हैं. गिरोह के लोग शिकार पर दबाव बनाए रखते हैं. आखिर रईस को सौदा करना पड़ता है. उस से पैसे लाने का काम अलग लोग करते हैं.

आनंद शांडिल्य ने पुलिस को बताया था कि यह गिरोह जयपुर सहित राजस्थान के बड़े शहरों के नामचीन प्रौपर्टी व्यवसायियों, बिल्डरों, मोटा पैसा कमाने वाले डाक्टरों, ज्वैलर्स, होटल रिसौर्ट संचालक और ठेकेदार आदि को अपना शिकार बनाता. इस काले धंधे में एक एनआरआई युवती भी शामिल है.

गिरोह के लोग लड़की को प्लौट या फ्लैट खरीदने के बहाने प्रौपर्टी व्यवसाई अथवा बिल्डर के पास भेज कर उसे फांस लेते हैं. इसी तरह होटल रिसौर्ट संचालक के पास नौकरी के बहाने भेजा जाता है तो डाक्टर के पास इलाज के बहाने. सौदा होने के बाद युवती और उस के गिरोह के सदस्य स्टांप पर लिख कर देते हैं कि दुष्कर्म नहीं हुआ है.

इस के पहले जयपुर में कभी इस तरह का कोई बड़ा मामला सामने नहीं आया था. इसलिए एसओजी के लिए हकीकत जानना अत्यंत महत्त्वपूर्ण था. अधिकारियों ने आपस में सलाहमशविरा कर के एसओजी के आईजी एम.एन. दिनेश के निर्देशन में हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग करने वाले गिरोह की खोजबीन शुरू कर दी.

उसी बीच इस गिरोह से पीडि़त जयपुर के वैशालीनगर निवासी डा. सुनीत सोनी ने एसओजी में शिकायत कराई कि उन का वैशालीनगर में हेयर ट्रांसप्लांट का क्लीनिक है. कुछ महीने पहले एक लड़की हेयर ट्रांसप्लांट कराने के लिए उन की क्लीनिक में आई. तभी उन का उस लड़की से संपर्क हुआ. लड़की ने जल्दी ही उन्हें प्रेमजाल में फांस लिया. इस के बाद दोनों पुष्कर गए और वहां एक रिसौर्ट में रुके. 2 दिनों बाद 2 लड़के मीडियाकर्मी बन कर आए और लड़की से दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कराने की धमकी दे कर उन से एक करोड़ रुपए मांगे.

डाक्टर ने रुपए देने से मना किया तो लड़की ने उन के खिलाफ पुष्कर में दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज करा दिया. जांच के बाद पुलिस ने डा. सुनीत सोनी को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. डाक्टर करीब ढाई महीने तक जेल में रहे. इस बीच डाक्टर से गिरोह के वकील सहित अलगअलग लोगों ने संपर्क किया.

गिरोह के सदस्यों ने अदालत में लड़की के बयान बदलवाने के लिए डाक्टर से डेढ़ करोड़ रुपए की मांग की. आखिर सौदा एक करोड़ रुपए में तय हो गया. पैसे लेने के बाद गिरोह के लोगों ने लड़की के बयान बदलवा दिए. उस समय डा. सुनीत सोनी ने जयपुर के थाना वैशालीनगर में इस मामले की रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी. लेकिन उस समय थाना पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की थी.

डा. सुनीत सोनी की शिकायत पर जांच करते हुए एसओजी ने 24 दिसंबर, 2016 को इस हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग करने वाले गिरोह का खुलासा किया. एसओजी ने गिरोह के 2 लोगों को गिरफ्तार कर लिया था. गिरफ्तार किए गए लोगों से पूछताछ की गई तो गिरोह में शामिल लड़कियों के बारे में पता चल गया. इन्हीं लोगों से गिरोह की एनआरआई लड़की रवनीत कौर उर्फ रूबी के बारे में पता चला था. इस के अलावा एक लड़की कल्पना उत्तराखंड की थी.

इस के बाद एसओजी इस पूरे गिरोह को गिरफ्तार करने में जुट गई. धीरेधीरे लोग पकड़े भी जाने लगे. एसओजी उत्तराखंड के ऊधमसिंहनगर से कल्पना को गिरफ्तार कर के जयपुर ले आई. पूछताछ में कल्पना ने बताया कि गिरोह ने उस की मदद से कई लोगों को अपने जाल में फांस कर मोटी रकम ऐंठी थी.

कल्पना से पूछताछ के बाद राजस्थान सशस्त्र पुलिस बल (आरएसी) के कांस्टेबल हरिकिशन को गिरफ्तार किया गया. उस ने गिरोह के लिए उत्तराखंड से अन्य कई लड़कियों को बुलाया था. कल्पना को भी वही लाया था.

गिरोह ने कल्पना को इस काम के लिए जो रकम देने का वादा किया था, वह रकम उसे नहीं मिली थी. इस के बाद उस ने गिरोह के सदस्य एक वकील को दुष्कर्म का केस दर्ज कराने की धमकी दी थी. इस से घबराए वकील ने कल्पना से सन 2015 में आमेर के एक मंदिर में शादी कर ली थी. वकील से शादी के बाद भी गिरोह कल्पना से हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग की वारदातों का काम लेता रहा.

कल्पना की गिरफ्तारी के बाद एसओजी का दल एनआरआई लड़की रवनीत कौर की तलाश में जुट गया. लेकिन समस्या यह थी कि अब तक रवनीत का गिरोह से पैसों के लेनदेन को ले कर विवाद हो गया था, जिस से वह गिरोह  से अलग हो गई थी. एसओजी को कहीं से जानकारी मिली कि रवनीत कोटा में है. जांच अधिकारियों को उस के फेसबुक एकाउंट का भी पता चल गया था.

इस के बाद एसओजी ने रवनीत के मोबाइल नंबर हासिल कर लिए. उस का नंबर मिल गया तो एसओजी की टीम कोटा पहुंच गई और एक पुलिस इंसपेक्टर ने रवनीत को जयपुर के मीडियाकर्मी करण के नाम से फोन किया. इस के बाद उसे किस तरह पकड़ा गया, आप शुरू में पढ़ चुके हैं. रवनीत कौर उर्फ रूबी से पूछताछ में उस की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

27 साल की रवनीत कौर उर्फ रूबी हांगकांग में पैदा हुई थी. उस के पिता पंजाब के फरीदकोट के रहने वाले थे. वह कारोबार के सिलसिले में हांगकांग गए थे. वहां उन का कामधाम जम गया तो वहीं उन्होंने भारतीय मूल की महिला से शादी कर ली.

रवनीत सन 2008 में ओवरसीज कार्ड पर अपनी दादी के पास जालंधर रहने आई. जालंधर से वह सन 2012 में जयपुर आ गई और एक यूनिवर्सिटी से उस ने 3 साल के बीबीए कोर्स में एडमिशन ले लिया. उसी यूनिवर्सिटी में एमबीए कर रहे कोटा निवासी रोहित से उस की दोस्ती हो गई. रवनीत कौर को बीबीए की पढ़ाई रास नहीं आई तो उस ने 2 साल बाद पढ़ाई छोड़ दी.

इस बीच रवनीत बीचबीच में अपने मातापिता के पास हांगकांग भी जाती रही. सन 2013 के अंत में उस के मातापिता ने कनाडा के एक एनआरआई बिजनैसमैन से उस की शादी तय कर दी. रवनीत भी उस से शादी करने को तैयार थी. इस का कारण यह था कि उस समय तक रवनीत की कोटा के रहने वाले रोहित से केवल दोस्ती थी.

दोस्ती इतनी आगे नहीं बढ़ी थी कि वह उस से शादी के बारे में सोचती. उस ने मातापिता से कहा कि शादी में वह जयपुर का लहंगा पहनेगी और वहीं से शादी के अन्य कपड़े और ज्वैलरी ले कर आएगी.

मातापिता ने उसे जयपुर से लहंगा और अन्य सामान लाने के लिए 8 लाख रुपए दे दिए. जयपुर आ कर रवनीत के 8 लाख रुपए खर्च हो गए मातापिता से शादी के सामान के लिए लाए पैसे खर्च हो गए तो रवनीत परेशान हो उठी. इस बीच उस की शादी भी टूट गई तो वह जयपुर में ही नौकरी की तलाश करने लगी. तभी वह इस गिरोह के संपर्क में आई. यह सन 2014 की बात है. गिरोह के इशारे पर रवनीत ने 6-7 लोगों को अपनी सुंदरता के जाल में फांस कर करोड़ों की वसूली की. सब से पहले उस ने एक बिल्डर को अपने हुस्न का जलवा दिखा कर उस से एक गोल्फ क्लब में मीटिंग तय की.

926 करोड़ की डकैती, जो हो नहीं पाई – भाग 2

926 करोड़ रुपए थे लुटेरों के निशाने पर

रात को ही एक्सिस बैंक के अफसरों को मौके पर बुलाया गया. राजधानी जयपुर में बैंक लूटने के प्रयास की सूचना मिलने पर जयपुर पुलिस कमिश्नरेट के आला अफसर रात को ही मौके पर पहुंच गए. बैंक के अफसरों ने बताया कि राजस्थान में एक्सिस बैंक की सभी शाखाओं में इसी चेस्ट ब्रांच से पैसा जाता है.

पूरे राज्य से जमा हो कर पैसा भी इसी चेस्ट ब्रांच में आता है. बैंक अफसरों से पुलिस अधिकारियों को पता चला कि इस चेस्ट ब्रांच में वारदात के समय 926 करोड़ रुपए रखे हुए थे. इतनी बड़ी रकम की बात सुन कर पुलिस अफसर हैरान रह गए.

अगर पुलिस कांस्टेबल सीताराम हिम्मत दिखा कर गोली नहीं चलाता तो शायद बदमाश बैंक लूटने में कामयाब हो जाते. अगर यह बैंक लुट जाती तो यह भारत की अब तक की सब से बड़ी बैंक डकैती होती. सीताराम के गोली चलाने से यह बैंक डकैती होने से बच गई थी.

कांस्टेबल सीताराम की ओर से बदमाशों को ललकारने के लिए चलाई गई गोली बैंक के सामने बाईं ओर एक मकान की खिड़की में जा कर लगी. गोली लगने से खिड़की का कांच टूटा तो मकान मालिक और उन के परिवार की नींद खुल गई. उन्होंने बाहर आ कर पता किया तो बैंक में डकैती के प्रयास का पता चला. तब तक पुलिस भी मौके पर पहुंच गई थी.

पुलिस ने रात को जयपुर से बाहर निकलने वाले सभी रास्तों पर कड़ी नाकेबंदी करवा दी. 6 फरवरी को कांस्टेबल सीताराम की रिपोर्ट के आधार पर जयपुर के अशोक नगर थाने में मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

6 फरवरी को सुबह से पुलिस और एक्सिस बैंक के आला अफसरों का मौके पर जमावड़ा लगा रहा. जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने भी मौके पर पहुंच कर बैंक के सुरक्षा इंतजामों के बारे में जानकारी ली. पुलिस को जांचपड़ताल के दौरान 4 बड़े खाली कट्टे (बोरी) मिले. ये कट्टे बदमाश अपने साथ लाए थे, लेकिन गोली की आवाज सुन कर भागते समय छोड़ गए.

बदमाशों का पता लगाने के लिए पुलिस ने बैंक के अंदरबाहर और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी तो पता चला कि बदमाश 7 सीटर इनोवा गाड़ी से आए थे. इस गाड़ी से 11 बदमाश बाहर निकले और 2 बदमाश अंदर ही बैठे रहे. बाहर निकले सभी बदमाशों के चेहरे ढंके हुए थे. इन में से 4-5 बदमाशों के हाथ में पिस्तौल और बाकी के हाथों में डंडे और सरिए थे. इस इनोवा का नंबर तो साफ दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन राजस्थान के नागौर जिले की नंबर सीरीज जरूर नजर आ रही थी.

पुलिस की जांच में पता चला कि बैंक की इस चेस्ट ब्रांच में लिमिट से करीब 3 सौ करोड़ रुपए ज्यादा रखे हुए थे. नियमानुसार बैंक को यह राशि रिजर्व बैंक में जमा करानी चाहिए थी. यह बात सामने आने पर करेंसी चेस्ट में सुरक्षा मापदंडों को ले कर चूक और लिमिट से ज्यादा कैश रखने के मामले में रिजर्व बैंक के महाप्रबंधक करेंसी पी.के. जैन ने एक्सिस बैंक से रिपोर्ट मांगी.

बहरहाल, एक्सिस बैंक में देश की सब से बड़ी डकैती टल गई थी. कांस्टेबल सीताराम की सूझबूझ से बदमाशों को भागना पड़ा. सीताराम जयपुर का हीरो बन गया था. सीताराम की सतर्कता और बहादुरी से 926 करोड़ रुपए की बैंक डकैती टल जाने पर जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने राजस्थान के पुलिस महानिदेशक ओ.पी. गल्होत्रा से बात की और कांस्टेबल सीताराम को पुरस्कृत करने की सिफारिश की.

पुलिस के लिए आसान नहीं था लुटेरों का सुराग ढूंढना

डकैती तो टल गई थी, लेकिन जयपुर पुलिस के लिए बैंक में घुसने वाले बदमाशों का पता लगाना सब से पहली चुनौती थी. इस के लिए पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने अपने मातहत अधिकारियों की मीटिंग कर के वारदात के लिए आए बदमाशों का पता लगाने को कहा.

विचारविमर्श में यह बात सामने आई कि 7 सीटर इनोवा में 13 लोगों का बैठना आसान नहीं है. इस का मतलब बदमाशों के पास कोई दूसरा वाहन भी रहा होगा, लेकिन सीसीटीवी फुटेज में दूसरा वाहन नजर नहीं आ रहा था. इनोवा गाड़ी भी चोरी की होने या उस पर फरजी नंबर प्लेट होने की आशंका थी. इस बात पर भी विचार किया गया कि बैंक में वारदात करने से पहले बदमाशों ने रैकी जरूर की होगी. अगर उन्होंने रैकी की थी तो उन्हें इस बात का पता रहा होगा कि बैंक की इस चेस्ट ब्रांच में 3-4 पुलिसकर्मी हमेशा मौजूद रहते हैं.

एक सवाल यह भी उठा कि बदमाशों की संख्या करीब 13 थी और उन में 4-5 के पास पिस्तौल भी थी तो वे केवल एक गोली चलने से घबरा क्यों गए? बैंक में डकैती डालने की हिम्मत करने वाले बदमाश डर कर भागने के बजाय मरनेमारने पर उतारू हो जाते हैं. इस से संदेह हुआ कि बदमाश कहीं नौसिखिया तो नहीं थे. इस के अलावा बदमाशों को इस बात का अंदाजा नहीं था कि बैंक में 926 करोड़ रुपए होंगे.

पुलिस ने वारदात की जानकारी मिलने के तुरंत बाद जयपुर से बाहर निकलने वाले रास्तों पर नाकेबंदी कर दी थी. फिर भी बदमाशों का कोई सुराग नहीं मिला था. इस से यह बात भी उठी कि बदमाश जयपुर शहर के ही रहने वाले तो नहीं हैं.

पचासों तरह के सवालों का हल खोजने के लिए पुलिस कमिश्नर ने 4 आईपीएस अधिकारियों के सुपरविजन में एक दर्जन टीमें गठित कीं. इन टीमों में सौ से ज्यादा पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया. अलगअलग टीमों को अलग जिम्मेदारियां सौंपी गईं.

पुलिस टीमों ने मुख्य रूप से बैंक कर्मचारियों और वहां तैनात गार्डों से पूछताछ, बैंक से रुपए लाने ले जाने वाली 3 निजी सिक्योरिटी एजेंसियों के मौजूदा और पुराने कर्मचारियों से पूछताछ, जयपुर से निकलने वाले रास्तों पर स्थित टोल नाकों पर सीसीटीवी फुटेज, जयपुर के आसपास हाइवे और कस्बों में स्थित होटल, ढाबों पर हुलिए के आधार पर बदमाशों की जानकारी हासिल करने, इस तरह की वारदात करने वाले गिरोहों की जानकारी जुटाने आदि बिंदुओं पर अपनी जांचपड़ताल शुरू की.

दूसरी ओर, पुलिस कमिश्नर ने रिजर्व बैंक में जयपुर के सभी पब्लिक सैक्टर और निजी सैक्टर के बैंक अधिकारियों, रिजर्व बैंक के अधिकारियों और गोल्ड लोन देने वाली कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की. इस मीटिंग में पुलिस कमिश्नर ने कहा कि सभी बैंक सुरक्षा व्यवस्था के बारे में रिजर्व बैंक की गाइडलाइन का पूरी तरह पालन करें.

इस के अलावा उन्होंने सुरक्षा के खास प्रबंधों के साथसाथ अलार्म और हौटलाइन की आवश्यक व्यवस्था करने को भी कहा. कैश लाने ले जाने से पहले मौकड्रिल करने की भी बात की. उन्होंने राय दी कि बैंक के सीसीटीवी कैमरे अपग्रेड किए जाएं, जिन में कम से कम 90 दिन का बैकअप होना चाहिए. अलार्म सिस्टम भी जरूर लगाए जाएं.

भिखारी बनाने वाला खतरनाक गैंग – भाग 2

पूछताछ के दौरान सुरेश मांझी ने पुलिस को एक परची दी, जिस में एक मोबाइल नंबर लिखा था. उस ने बताया कि यह परची विजय ने उसे दिल्ली जाने के पहले दी थी और कहा था कि कोई परेशानी हो तो इस नंबर पर बात कर लेना. पुलिस ने उस परची को अपने पास सुरक्षित रख लिया.

डीसीपी (साउथ) प्रमोद कुमार ने पीडि़त सुरेश मांझी से पूछताछ के बाद एसएचओ संजय पांडेय को आदेश दिया कि वह तुरंत मुकदमा दर्ज करें.

आदेश पाते ही एसएचओ संजय पांडेय ने सुरेश मांझी के बड़े भाई रमेश को वादी बना कर धारा 325/326/328/342/370 आईपीसी के तहत विजय नागर उस के बहनोई राजेश, बहन तारा तथा रिश्तेदार राज नागर व उस की मां आशा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली.

डीसीपी (साउथ) प्रमोद कुमार ने इस मामले को बड़ी गंभीरता से लिया था. उन्होंने भीख मंगवाने वाले गिरोह का परदाफाश करने के लिए एसीपी विकास पांडेय की अगुवाई में पुलिस की 2 टीमें गठित की. इन टीमों में पुलिस के तेजतर्रार पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया.

इधर पीडि़त सुरेश मांझी को पुलिस ने पहले कांशीराम अस्पताल फिर लाला लाजपत राय अस्पताल में भरती कराया. अस्पताल में उस का डाक्टरी परीक्षण कराया गया, जिस में वह गंभीर बीमारी से पीडि़त पाया गया.

आंखों का परीक्षण नेत्र रोग विशेषज्ञ डा. एस.के. सिंह ने किया. उन्होंने बताया कि सुरेश मांझी की एक आंख की रोशनी पूरी तरह समाप्त हो गई है, जबकि दूसरी आंख की हलकी रोशनी है, यदि उस की पुतली बदली जाए तो उस की रोशनी वापस आ सकती है.

भीख मंगवाने वाले गिरोह की तलाश में पुलिस की 2 टीमें सक्रिय हुईं. एक टीम ने कानपुर शहर में गिरोह की तलाश शुरू की तथा दूसरी टीम दिल्ली रवाना हुई. लोकल पुलिस टीम ने विजय की तलाश में मछरिया स्थित गुलाबी बिल्डिंग के पास कच्ची बस्ती में छापा मारा.

यहां विजय नाम के 3 युवक रहते थे. इन में से विजय नाम के 2 युवकों का इस मामले से कोई लेनादेना नहीं था. तीसरा विजय नट जाति का था. वह फरार था. उस के घर पर ताला लटक रहा था.

इधर दिल्ली गई पुलिस टीम के पास परची में लिखा एक मोबाइल नंबर था. यह नंबर सुरेश मांझी ने पुलिस को दिया था. इस मोबाइल नंबर की जानकारी पुलिस टीम ने जुटाई तो पता चला कि वह नंबर राज नागर का है.

यह मोबाइल नंबर एक्टिव था और उस की लोकेशन दरियागंज, दिल्ली की मिल रही थी. पुलिस टीम दरियागंज पहुंची तो मोबाइल फोन की लोकेशन नांगलोई की आने लगी. पुलिस नांगलोई पहुंची तो फोन बंद हो गया, जिस से लोकेशन मिलनी बंद हो गई.

नांगलोई की कच्ची बस्ती में पुलिस टीम ने गहन पड़ताल की, लेकिन राज नागर का पता नहीं लगा सकी. भीख मंगवाने वाले गिरोह का पता लगाने की भी कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली. आखिर पुलिस टीम वापस कानपुर आ गई.

भीख मंगवाने वाले गिरोह के एक सदस्य को भी जब पुलिस गिरफ्तार नहीं कर पाई तो उन के माथे पर चिंता की लकीरें उभरने लगीं.

एक ओर मीडिया पुलिस की असफलता का डंका पीट रही थी तो दूसरी ओर पुलिस अधिकारी भी जवाबतलब कर रहे थे. आखिर पुलिस ने खास खबरियों का सहारा लिया और उन्हें नौबस्ता, किदवई नगर व यशोदा नगर क्षेत्र में सक्रिय कर दिया.

8 नवंबर, 2022 की सुबह 8 बजे एक खास खबरी थाना नौबस्ता पहुंचा और उस ने एसएचओ संजय पांडेय को बताया कि राज नागर और उस की मां आशा इस समय किदवई नगर चौराहे के पास मौजूद हैं. शायद वे कहीं भागने की फिराक में हैं.

चूंकि खबरिया की सूचना अतिमहत्त्वपूर्ण थी, अत: वह पुलिस टीम के साथ किदवई नगर चौराहा पहुंच गए. पुलिस वाहन के रुकते ही एक युवक व अधेड़ उम्र की महिला तेज कदमों से हनुमान मंदिर की ओर भागे लेकिन पुलिस ने कुछ दूरी पर उन्हें पकड़ लिया. दोनों को थाना नौबस्ता लाया गया.

जब उन से पूछताछ की गई तो युवक ने अपना नाम राज नागर तथा महिला ने अपना नाम आशा निवासी नटवन टोला किदवई नगर, थाना नौबस्ता, कानपुर नगर बताया. रिश्ते में दोनों मांबेटा थे.

राज नागर और आशा से जब पुलिस ने सुरेश मांझी के संबंध में पूछा तो उन दोनों ने बताया कि सुरेश मांझी को उन्होंने 25 हजार रूपए में विजय नट से खरीदा था, फिर उसे भीख मंगवाने के वास्ते नांगलोई (दिल्ली) ले गए थे.

विजय नट उन का रिश्तेदार है और उस के गिरोह का सक्रिय सदस्य है. विजय का सहयोग उस की बहन तारा व बहनोई राजेश भी करता है. विजय इस के पहले भी 2 युवकों को उसे बेच चुका है. जिस में एक युवक उमाशंकर जो विधनू के किसी गांव का रहने वाला था. उसे चकमा दे कर भाग गया था. इस के बाद उस का पता न चला.

भीख मंगवाने वाले 2 सदस्य गिरफ्त में आए तो पुलिस विजय, तारा व राजेश को गिरफ्तार करने को सक्रिय हुई. राज नागर की निशानदेही पर पुलिस टीम ने कानपुर शहर के आधा दरजन डेरों पर छापा मारा, लेकिन विजय व उस की बहन तारा व बहनोई राजेश हाथ नहीं आए. फिर भी पुलिस प्रयास में जुटी रही.

आरोपियों की शिनाख्त के लिए एसएचओ संजय पांडेय ने पीडि़त सुरेश मांझी के भाई रमेश को थाना नौबस्ता बुला लिया. रमेश का सामना जब राज नागर व उस की मां आशा से कराया गया तो रमेश ने दोनों को पहचानने से इंकार कर दिया. उस ने कहा वह पहली बार दोनों को देख रहा है. इस के पहले इन्हें कभी नहीं देखा. इन्हें तो उस का भाई सुरेश ही पहचान सकता है.

इस के बाद पुलिस राज नागर व आशा को लाला लाजपत राय अस्पताल लाई, जहां सुरेश मांझी का उपचार चल रहा था. सुरेश मांझी की आंखें खराब कर दी गई थीं. वह देख कर तो दोनों को पहचान नहीं सकता था, इसलिए पुलिस ने राज नागर व आशा की बातचीत सुरेश से कराई.

आवाज से सुरेश ने दोनों को पहचान लिया और पुलिस को बताया कि ये दोनों वही हैं, जो उसे दिल्ली ले गए थे और उस से भीख मंगवाते थे.

दोनों आरोपियों की शिनाख्त हो जाने के बाद एसएचओ संजय पांडेय ने भीख मंगवाने वाले गिरोह का परदाफाश करने तथा 2 सदस्यों को गिरफ्तार करने की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दे दी.

डीसीपी (साउथ) प्रमोद कुमार ने आननफानन प्रैसवार्ता की और मीडिया के समक्ष भीख मंगवाने वाले गिरोह का परदाफाश किया. उन्होंने 3 फरार आरोपियों विजय, तारा व राजेश की गिरफ्तारी के लिए 10-10 हजार रुपए के ईनाम की भी घोषणा कर दी.

चूंकि आरोपी राज नागर व उस की मां आशा ने सुरेश मांझी को खरीदने व उस से भीख मंगवाने का जुर्म कुबूल कर लिया था, अत: पुलिस ने उन दोनों को भादंवि की धारा 325/326/328/342/370 के तहत गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस पूछताछ में आरोपियों के बयानों तथा पीडि़त सुरेश मांझी द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर इस घटना के पीछे की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार है.

कुंवारे थे, कुंवारे ही रह गए – भाग 2

दूल्हों और उन के रिश्तेदारों ने पुलिस को सारी बात बताई. कुछ ने लिखित शिकायत कर दी. थाना खरखौदा पुलिस ने अनीता, सुशीला और मोनू के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. थानाप्रभारी वजीर सिंह ने इस मामले की जांच एसआई नरेश कुमार को सौंपी. पुलिस ने सुशीला और मोनू को हिरासत में ले कर पूछताछ की. बाद में दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया.

गेम की मास्टरमाइंड निकली अनीता

28 दिसंबर को पुलिस ने खरखौदा के वार्ड नंबर 2 निवासी सुशीला और गांव थाना कलां निवासी मोनू को मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर पूछताछ के लिए 2 दिनों के रिमांड पर लिया. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में सुशीला और मोनू ने बताया कि उन्हें पता नहीं  था कि शादी के नाम पर अनीता लोगों को ठग रही है.

अनीता ने उन्हें इस काम के लिए एक से 2 हजार रुपए ही दिए थे. बाकी रुपए उस ने खुद ही रख लिए थे. सुशीला के बताए अनुसार, अनीता दिल्ली के नरेला के लामपुर बौर्डर की रहने वाली थी. दिल्ली के अलावा झज्जर और अन्य जगहों पर भी उस के ठिकाने बताए.

थाना खरखौदा पुलिस ने अनीता की तलाश में दिल्ली और जहांजहां उस के मिलने की संभावना थी, छापे मारे, लेकिन वह नहीं मिली. इस के बाद पुलिस ने 3 टीमें बना कर उस की तलाश शुरू की.

सुशीला और मोनू से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने कई अन्य लोगों से पूछताछ की, लेकिन अनीता के बारे में कुछ पता नहीं चला. रिमांड अवधि समाप्त होने पर पुलिस ने सुशीला और मोनू को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

पुलिस की लगातार छापेमारी से घबरा कर अनीता ने 7 जनवरी, 2018 को सोनीपत की अदालत में आत्मसमर्पण किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. पुलिस ने पूछताछ के लिए अदालत से उस का रिमांड मांगा तो उसे 5 दिनों की रिमांड पर सौंप दिया गया. 5 दिनों के बाद एक बार फिर 3 दिनों के रिमांड पर लिया गया.

अनीता से पूछताछ में पता चला कि कुंवारों से शादी के नाम पर ठगे गए पैसों का उपयोग अनीता के बेटे रोहित ने भी किया था. पुलिस ने 9 जनवरी को दिल्ली से रोहित को भी गिरफ्तार कर लिया. रोहित को 3 दिनों के रिमांड पर लिया गया. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ और शादी के नाम पर ठगे गए लोगों से मिली जानकारी के आधार पर जो कहानी सामने आई है, वह इस प्रकार थी—

कुंवारों को ठगने की बनाई योजना

दिल्ली के नरेला के गांव लामपुर की रहने वाली अनीता के पति की मौत हो चुकी थी. उस के 2 बच्चे हैं, जिन की शादियां हो चुकी हैं. अनीता की हरियाणा में कई रिश्तेदारियां हैं. उसे पता था कि लड़कियों की कमी की वजह से हरियाणा के तमाम लड़कों की शादियां नहीं हो पाती हैं. शादी की उम्मीद में तमाम लड़के अधेड़ हो चुके हैं. इस तरह के लोग किसी भी तरह शादी करना चाहते हैं. इस के लिए वे पैसा दे कर दुलहन खरीदने को भी तैयार रहते हैं.

society

अनीता ने इसी बात का फायदा उठाया. उस ने शादी कराने के नाम पर कुंवारों को ठगने की योजना बनाई. इस काम में उस ने अपनी जानकार खरखौदा की रहने वाली सुशीला की मदद ली. हालांकि उस ने सुशीला को अपनी पूरी योजना नहीं बताई थी. उसे केवल आसपास के गांवों में कुंवारों के बारे में पता करने और उन की शादी कराने की बात करने की जिम्मेदारी सौंपी थी.

इस के बाद अपने परिचित मोनू को मदद के लिए ले लिया. दोनों ने आसपास के गांवों और रिश्तेदारों में ऐसे लड़कों के बारे में पता किया, जिन की शादी नहीं हुई थी. सुशीला ने ऐसे लड़कों की शादी कराने की बात चलाई. हर गांव में एकदो परिवार ऐसे मिल गए, जिन के यहां लड़कों की शादी नहीं हुई थी. वे चाहते थे कि उन के लड़के की शादी हो जाए और घर में बहू आ जाए. इस के लिए वे पैसे भी खर्च करने को तैयार थे.

एक शादी के लिए 45 से 90 हजार रुपए

सुशीला के कहने पर तमाम लोग शादी के लिए तैयार हो गए. एकदूसरे के माध्यम से शादी करने वालों की संख्या बढ़ती गई. सुशीला ने यह बात अनीता को बताई. वह खरखौदा आ गई और सुशीला के साथ कुछ ऐसे लोगों के यहां गई भी, जो शादी के इच्छुक थे. उस ने कहा कि जिन लड़कियों से उन की शादी कराएंगी, वे लड़कियां अनाथ हैं और दिल्ली के अनाथालय में रहती हैं. इस के लिए उन्हें अनाथालय को चंदा देना होगा.

चंदे की राशि कम से कम 45 हजार होगी. उम्र के हिसाब से चंदे की यह रकम बढ़ती जाएगी. जब कई लोग शादी के लिए तैयार हो जाएंगे तो वह एकसाथ सब की शादियां करा देगी.

हीरे की ललक में उमड़े लोग – भाग 2

पन्ना जिले का वर्तमान स्वरूप पन्ना और अजयगढ़ रियासत, चरखारी, बिजावर, छतरपुर और यूनाइटेड प्रोविंस को मिला कर हुआ है. मूलरूप से 13वीं शताब्दी तक गोंड बस्ती रहे पन्ना को महाराजा छत्रसाल बुंदेला ने अपनी राजधानी बनाया था.

अप्रैल, 1949 के पहले यह विंध्य प्रदेश का हिस्सा था. जब पहली नवंबर, 1956 को मध्य प्रदेश का पुनर्गठन हुआ, तब यह मध्य प्रदेश में मिलाया गया था. पन्ना जिले का नाम यहां स्थित पद्मावती देवी मंदिर के नाम पर रखा गया है. यह जिला हीरे की खान के अलावा प्राचीन और सुंदर मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है.

हीरे से लबरेज बताई जाने वाली खदान में कई किसानों की निजी और कुछ जमीन सरकार की है. सरकारी जमीन पर खनन के लिए खनिज कार्यालय से परमिशन लेनी पड़ती है. निजी जमीन पर आमतौर पर 2 तरह के अनुबंध होते हैं. एक में कुछ रुपए ले कर खनन की अनुमति दी जाती है, जबकि दूसरे में जमीन मालिक हीरा मिलने पर 25 प्रतिशत का हिस्सेदार होता है. ज्यादातर अनुबंध 25 प्रतिशत हिस्सेदारी वाले ही होते हैं.

यदि किसी किसान के खेत में खुदाई (खनन) करना है तो उस किसान का सहमति पत्र खनन विभाग में जमा कराना होता है. आमतौर पर जमीन मालिक इस के एवज में 25 प्रतिशत का अनुबंध करते है. इस का मतलब है कि यदि हीरा मिला हो तो उस जमीन मालिक को हीरे की कुल कीमत का 25 प्रतिशत हिस्सा मिल जाता है.

अकसर दूसरी परत में मिलता है हीरा

चाल वाली मिट्टी में हीरा मिलने की संभावना ज्यादा होती है. इसे धो कर साफ किया जाता है और हीरा खोजा जाता है. हीरा मिट्टी की दूसरी लेयर में मिलता है. इसे चाल की लेयर कहा जाता है. चाल उस मिट्टी की परत को कहते हैं, जिस में पत्थर व हीरे मिक्स होते हैं. यही मिट्टी बेहद काम की होती है, जो हीरा उगलती है.

जब तक चाल की मिट्टी मिलती है, उस गहराई तक खुदाई होती है. इस मिट्टी को स्टोर किया जाता है. खुदाई में मिले बड़ेबड़े पत्थरों में हीरे मिलने की सब से अधिक संभावना होती है.

निकाली गई मिट्टी को 3 स्तर पर धोया जाता है, इस के बाद उसे सुखा कर हीरा तलाशा जाता है.

पन्ना जिले में 11 स्थानों पर हीरा मिलता है. पन्ना में जंगल सहित कुछ अन्य क्षेत्र भी चिह्नित हुए हैं, लेकिन अभी वहां हीरा खनन की अनुमति नहीं है. पन्ना जिले में इस वित्तीय वर्ष में 745 खदानों के पट्टे स्वीकृत हुए हैं. इस में सब से अधिक 317 खदान के पट्टे कृष्णा कल्याणपुर (पटी) में आवंटित किए गए हैं. पटी क्षेत्र में हाई क्वालिटी का हीरा मिलता है. इस साल अब तक 235.94 कैरेट के 90 हीरे कार्यालय में जमा कराए हैं,  इन की शुरुआती कीमत 3.79 करोड़ रुपए आंकी गई है.

ऐसे तय होती है हीरे की कीमत

हीरा औफिस में रोज खनन करने वाले लोग चमकीले पत्थर दे कर जाते हैं, जिन की जांच की जाती है. कुछ ही भाग्यशाली होते हैं जिन के जीवन में हीरा चमक लाता है.

पन्ना के हीरा अधिकारी रवि पटेल के बताते हैं, ‘कलर, क्लियरिटी, कट और वजन से हीरे की कीमत तय होती है. सब से अच्छा हीरा जैम क्वालिटी में ई और डी श्रेणी का माना जाता है. पन्ना में अमूमन ई श्रेणी का हीरा मिल जाता है. जैम क्वालिटी के हीरे की अंगूठी और दूसरी ज्वैलरी बनती है, जबकि दूसरा इंडस्ट्रियल ब्लैक हीरा होता है. इस का ग्लास कटिंग सहित दूसरी व्यावसायिक गतिविधियों में उपयोग होता है. इस की कीमत कम होती है. हीरा 50 हजार से ले कर 15 लाख रुपए कैरेट तक बिक सकता है.’

पन्ना में सन 1961 में हीरा कार्यालय बनाया गया था, तभी से हर 3 महीने में हीरे की नीलामी होती है. हीरे की नीलामी में गुजरात, मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद सहित कई राज्यों के व्यापारी आ कर बोली लगाते हैं. पट्टे पर खदान ले कर हीरा तलाश करने वाले मजदूर को तुआदार कहा जाता है.

खुदाई के दौरान मिलने वाले हीरे की जांच कराने के बाद तुआदार हीरा कार्यालय में उसे जमा कराता है. हीरा कार्यालय द्वारा वजन और हीरे की क्वालिटी के आधार पर उस की न्यूनतम कीमत तय की जाती है. इस के बाद नीलामी होती है.

अधिकतम कीमत में हीरा नीलाम किया जाता है. 11.50 प्रतिशत टैक्स काट कर बकाया राशि तुआदार मतलब हीरा खोजने वाले को दे दी जाती है.

हीरे के नाम पर होती है ठगी

हीरा अधिकारी रवि पटेल के औफिस में आए दिन ठगी की शिकायतें भी प्राप्त होती रहती हैं. ऐसी ही एक शिकायत सरकोहा निवासी घनश्याम यादव ने की थी.

घनश्याम का कहना है कि उसे अगस्त 2022 में अपने खेत की जुताई के दौरान 12 कैरेट के 3 हीरे मिले थे. खबर मिलते ही घनश्याम का एक परिचित मुंबई में रहने वाला नंदकिशोर उर्फ नंदू लाला उस के घर आया.

घनश्याम ने तीनों हीरे उसे चैक कराने को दे दिए. नंदकिशोर बोला, ‘‘भाई, यहां पर इन की परख सही नहीं होगी. तुम कहो तो इन्हें मैं मुंबई ले जा कर चैक कराऊंगा. वहां इन की सही कीमत मिलेगी.’’

घनश्याम ने यह सोच कर हीरे नंदकिशोर को दे दिए कि शायद बड़े शहर में उसे मिले हीरों के ज्यादा दाम मिल जाएं.

मुंबई जा कर नंदकिशोर ने उसे बताया कि उस के हीरे तो साधारण कंकड़पत्थर हैं. इसी बीच उसे पता चला कि नंदू लाला ने उस के हीरे 70 लाख में बेच दिए. वह न तो उस के हीरे लौटा रहा और न ही पैसे दे रहा.

पन्ना जिले में हीरा मिलने की सच्ची कहानियों के अलावा अफवाहों का बाजार भी गर्म रहता है और यहीं से ठगी का कारोबार भी चलता है. हीरे के नाम पर ठगी का धंधा भी यहां खूब फलफूल रहा है. वैसे तो पन्ना में हीरा खरीदने की एकमात्र जगह सरकारी हीरा औफिस है.

यहां के हीरा अधिकारी रवि पटेल बताते हैं कि पन्ना में जितने भी हीरे लोगों को मिलते हैं, उन का केवल एक प्रतिशत ही हीरा औफिस तक आ पाता है, क्योंकि यहां भी दलाल और ठगी का काम करने वाले मजदूरों से औनेपौने दाम में हीरा खरीद लेते हैं.

जब किसी को हीरा मिलता है तो वह उसे अपने स्तर पर चैक करता है. फिर व्यापारी या बिचौलिए को यकीन हो जाता है कि सही में हीरा है तो उसे लालच दे कर सस्ते दाम पर खरीद लेते हैं. असल में इस में लोगों का ही घाटा होता है.

अगर हीरे की नीलामी होगी तो 100 व्यापारी उसे खरीदने आएंगे तो बढ़चढ़ कर बोली लगाएंगे. ऐसे में उस के दाम बढ़ने की संभावना ज्यादा होती है. लेकिन लोग यह नहीं समझ पाते. वे सरकारी कायदेकानून के चक्कर में न पड़ कर तुरंत बिचौलियों से नकद दाम लेना सुविधाजनक मानते हैं.

यहां पहाड़ी के रास्ते पर छतरपुर जिले के बक्सबाहा के बाबूलाल कुशवाहा को खुदाई में ब्लैक डायमंड जैसे पत्थर मिले थे. वे बताते  हैं कि टीवी पर न्यूज देख कर पता चला था कि यहां हीरा मिल रहा है. तो हम भी किस्मत आजमाने यहां चले आए. यहां आ कर 100 रुपए का तसला और खुदाई करने के लिए  250 रुपए का एक सब्बल खरीदा.

2 लड़कियों की आशिकी

18 मार्च, 2017 को पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना मिली कि गांव अनोड़ा में कुछ लोगों ने 2 लड़कियों को घेर रखा है, उन की जान को खतरा है. कंट्रोल रूम ने यह सूचना थाना राया पुलिस को दे दी, क्योंकि गांव अनोड़ा उसी के अंतर्गत आता था. सूचना मिलते ही थाना राया के थानाप्रभारी इंसपेक्टर अनिल कुमार पुलिस बल के साथ गांव अनोड़ा पहुंच गए. गांव पहुंच कर उन्हें पता चला कि वह फोन रामखिलाड़ी के घर से किया गया था.

पूछताछ में अनिल कुमार के सामने जो घटना आई, वह हैरान करने वाली थी. फोन जिन 2 लड़कियों ने किया था, वे आपस में शादी करना चाहती थीं, जो लोगों को स्वीकार नहीं था. लोग दोनों को अलग करना चाहते थे, जबकि लड़कियां एकदूसरे से अलग नहीं होना चाहती थीं. जब लोग जबरदस्ती करने लगे तो उन्होंने कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर दिया था.

मामला कोई बहुत गंभीर नहीं था, फिर भी कुछ लोगों को उत्तेजित देख कर अनिल कुमार दोनों लड़कियों को साथ ले कर थाने आ गए. उन के पीछेपीछे दोनों लड़कियों के घर वाले ही नहीं, कुछ रिश्तेदार और गांव के भी तमाम लोग आ गए थे.

पुलिस जिन दोनों लड़कियों को थाने ले आई थी, उन में से एक का नाम सोनिया था. उस की उम्र 23 साल थी. वह मथुरा जिले के थाना राया के गांव अनोड़ा के रहने वाले रामखिलाड़ी की बेटी थी. उस के साथ आई लड़की का नाम रीना था, जो 21 साल की थी. वह गांव रूमगेला के रहने वाले लक्ष्मण की बेटी थी.

थाने में की गई पूछताछ में सोनिया और रीना के प्रेम से ले कर बात विवाह तक पहुंचने की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला मथुरा के थाना राया का एक गांव है अनोड़ा. रामखिलाड़ी इसी गांव के रहने वाले थे. उन के परिवार में पत्नी भारती के अलावा 4 बेटियां और एक बेटा था.

रामखिलाड़ी कपड़ों पर प्रैस कर के गुजरबसर करते थे. सोनिया उन की सब से छोटी बेटी थी. उन्होंने 3 बेटियों की शादी कर दी थी. अब वह सोनिया की शादी के बारे में सोचने लगे थे.

लेकिन सोनिया कुछ अलग तरह की लड़की थी, जिसे ले कर रामखिलाड़ी ही नहीं, उन की पत्नी भारती भी चिंतित रहती थी. इस की वजह यह थी कि सोनिया बचपन से ही लड़कियों की तरह नहीं, लड़कों की तरह रहती आई थी. वह कपड़े तो लड़कों जैसे पहनती ही थी, उस की सोच, बातचीत का लहजा भी लड़कों जैसा था. वह रहती भी लड़कों के साथ ही थी.

सोनिया की चालढाल, रहनसहन और उस की बातें सुन कर रामखिलाड़ी और भारती चिंतित रहते थे. जब तक वह बच्ची थी, बात बचपने में टाल दी जाती रही, लेकिन जब वह सयानी हुई तो मांबाप उसे समझाने ही नहीं लगे, बल्कि हिदायतें भी देने लगे. लेकिन सोनिया पर उन के समझाने या हिदायतों का कोई असर नहीं पड़ा.

सोनिया ने 12वीं तक पढ़ाई की और अपने पैरों पर खड़ी होने के लिए सिलाई सीख कर लोगों के कपड़े तो सीने ही लगी, साथ ही सिलाई सिखाने का इंस्टीट्यूट भी खोल लिया. उस के यहां सिलाई सीखने गांव की ही नहीं, अगलबगल के गांवों की भी लड़कियां आती थीं.

सोनिया जहां अपने में मस्त रहती थी, वहीं मांबाप को उस के ब्याह की चिंता थी. क्योंकि उन्हें शायद पता नहीं था कि वह जिस बेटी के ब्याह के लिए परेशान हैं, उस में लड़कियों वाले गुण हैं ही नहीं. उन्होंने सोनिया के मन में क्या है, इस बात की परवाह किए बगैर अलीगढ़ की तहसील अतरौली के गांव जमनपुर के रहने वाले रमेश से उस की शादी तय कर दी.

जब इस बात की जानकारी सोनिया को हुई तो वह विरोध पर उतर आई. लेकिन उस के विरोध के बावजूद रामखिलाड़ी ने उस की शादी धूमधाम से रमेश के साथ कर दी. यह सन 2009 की बात है. मांबाप के इस फैसले से नाराज सोनिया ससुराल चली तो गई, पर बागी बन गई. ससुराल वालों ने उसे हाथोंहाथ लिया, पर उस के मन में जो था, उस में जरा भी बदलाव नहीं आया.

सोनिया ने पति को छूने देने की कौन कहे, चारपाई के भी नजदीक नहीं आने दिया. सवेरा होते ही उस ने साड़ी उतार कर फेंक दी और जींसटौप पहन लिया. बहू की इस हरकत से ससुराल वाले हैरान रह गए. उन्हें यह जरा भी पसंद नहीं आया. उन्होंने उसे नादान समझ कर समझाना चाहा, पर वह कुछ भी समझने को तैयार नहीं थी. उन्होंने फोन कर के सारी बात रामखिलाड़ी को बताई तो वह परेशान हो उठे.

बड़ी मुश्किल से तो उस ने बेटी की शादी की थी. ससुराल जा कर वह इस तरह का नाटक कर रही थी. 5 दिनों बाद वह मायके आई तो उस ने साफ कह दिया कि अब वह ससुराल नहीं जाएगी. इस के बाद लाख प्रयास के बावजूद भी वह ससुराल नहीं गई. मजबूर हो कर मांबाप ने बेटी के तलाक का मुकदमा अदालत में दायर कर दिया, जो अभी भी विचाराधीन है.

सोनिया तनमन से अपने सिलाई सैंटर में लग गई. उसे लड़कियों को सिलाई सिखाना पसंद था. न जाने क्यों उसे लड़कियों को छूना अच्छा लगता था. इसलिए वह उन्हीं के बीच लगी रहती थी. एक दिन पड़ोस के रूमगेला गांव की रहने वाली रीना उस के सिलाई सैंटर पर सिलाई सीखने आई तो उस ने उस में न जाने क्या देखा कि उसे लगा, इसी लड़की की उसे तलाश थी. रीना अभी पढ़ रही थी. वह सिलाई सीख कर अपनी पढ़ाई का खर्च खुद निकालना चाहती थी. उस के पिता लक्ष्मण खेती करते थे. उन के परिवार में पत्नी शांति के अलावा 4 बेटियां थीं. 3 बेटियों की वह शादी कर चुके थे. सब से छोटी रीना अभी पढ़ रही थी.

रूमगेला गांव अनोड़ा से 6 किलोमीटर दूर था. इस के बावजूद रीना रोज साइकिल से सोनिया के यहां सिलाई सीखने आती थी. रीना में ऐसा न जाने कौन सा आकर्षण था कि सोनिया उस की ओर खिंचती जा रही थी. जब तक वह सिलाई सैंटर में रहती, सोनिया को अजीब सा सुख महसूस होता. वह उसी के इर्दगिर्द मंडराती रहती थी. उसे छू कर उस के मन को असीम शांति ही नहीं मिलती थी, बल्ति अद्भुत सुख का भी अहसास होता था.

सोनिया की नजरें हमेशा रीना पर ही जमी रहती थीं, क्योंकि वह उसे अन्य लड़कियों से अलग नजर आती थी. रीना को भी जब उस के मन की बात का अहसास हुआ तो वह भी उस के करीब आने लगी. जल्दी ही वह उस की खास छात्रा बन गई.

एक दिन सोनिया ने बहाने से उसे अपने घर क्या रोका, उस दिन के बाद से वह उसी की हो कर रह गई. इस के बाद सोनिया ने रीना के पिता लक्ष्मण को फोन कर के कहा कि रीना रोजरोज 6 किलोमीटर आनेजाने में थक जाती है. अच्छा होगा कि उसे उस के पास ही रहनें दें. इस से रीना सिलाई भी जल्दी सीख जाएगी और रोजरोज की थकान से भी बच जाएगी.

लक्ष्मण को क्या पता था कि सोनिया के मन में क्या है. उन्होंने सहज भाव से इजाजत दे दी. अब रीना सोनिया के साथ ही रहने लगी. सप्ताह में एकाध दिन वह घर भी चली जाती थी. एक साथ रहने से सोनिया और रीना एकदूसरे के इतने करीब आ गईं कि वे अलग होने के नाम से घबराने लग%8