डॉक्टर और इंजीनियर बनाने लगे कैंसर की नकली दवाएं – भाग 3

डा. पवित्रा जल्दी से जल्दी अमीर बनने के चक्कर में ऐसा फंसा कि मौत का सौदागर बनने के लिए तैयार हो गया. उस ने अपने काम के लिए चीन से ही एमबीबीएस की पढ़ाई कर डाक्टर बने अनिल कुमार को साथ में ले कर यह गोरखधंधा शुरू कर दिया.

चीन से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद डा. पवित्रा 5 साल पहले दिल्ली आया और उस के बाद 3 बड़े अस्पतालों जीटीबी अस्पताल, सुपर स्पैशियालिटी कैंसर इंस्टीट्यूट और दीपचंद बंधु अस्पताल में नौकरी की. जीटीबी अस्पताल में ही पवित्रा की दोस्ती डा. अनिल से हुई थी, जो बिहार का रहने वाला है. अनिल बेहद महत्त्वाकांक्षी था. उस से मुलाकात के बाद तो डा. पवित्रा के इरादों को पंख लग गए.

अमीर बनने के लिए नकली दवाइयों के धंधे में उतरने की तैयारी उस ने तेज कर दी. सब से पहले पवित्रा ने अपने ममेरे भाई शुभम मन्ना और दूसरे साथियों को इस में जोड़ना शुरू किया. मसलन, दवा कहां बनेगी, उस की पैकिंग कहां होगी, बाजार और ग्राहकों तक दवाइयां किस तरह पहुचेंगी. इस के लिए पूरी टीम बन गई.

किस का क्या काम रहेगा, सब कुछ तय हो गया. बेंगलुरु से बीटेक करने के बाद पवित्रा के ममेरे भाई शुभम ने कई मल्टीनैशनल कंपनियों में काम किया था. जब पवित्रा ने उसे कैंसर की नकली दवाइयों के धंधे के बारे में बता कर उस से होने वाले मुनाफे के बारे में बताया तो शुभम भी अपने भाई पवित्रा के साथ नकली दवाइयों के धंधे में जुड़ गया.

पवित्रा ने दवाओं के धंधे की देखरेख करने के लिए आईटीआई डिप्लोमा पास पंकज और अंकित को अपने पास नौकरी पर रख लिया. वह दवाओं को पैक करने के अलावा मार्केट में सप्लाई और कुरियर भी करते थे.

गन्नौर की फैक्ट्री में बनती थीं दवाएं

रामकुमार उर्फ हरबीर की गन्नौर, सोनीपत में आरडीएम बायोटेक के नाम से दवा बनाने की फैक्ट्री है. खुद को एम्स का डाक्टर बता कर डा. पवित्रा ने रामकुमार से कैंसर की नकली दवाएं बनवानी शुरू कीं. लेकिन बाद में रामकुमार के ऊपर यह भेद खुल गया कि ये दवाइयां नकली हैं. इसलिए फिर से इस काम के लिए ज्यादा पैसे लेने शुरू कर दिए.

चंडीगढ़ का रहने वाला एकांश फार्मा कंपनी चलाता है. एकांश की चंडीगढ़ में मैडियार्क फार्मा नाम से फर्म है. वह रामकुमार की कंपनी को खाली कैप्सूल के अलावा अन्य सामान उपलब्ध करवाता था. एकांश इंडिया मार्ट के जरिए भी दवाएं बेचता था. वहीं, प्रभात कुमार की दिल्ली के चांदनी चौक स्थित भागीरथ प्लेस में आदित्य फार्मा के नाम से दवा विक्रेता फर्म है.

प्रभात की मुलाकात पहले डा. अनिल से हुई थी. वह उस की दुकान पर आताजाता था. अनिल ने ही प्रभात को कैंसर की नकली दवाइयां बेचने का औफर दिया था. मोटा मुनाफा कमाने के चक्कर में प्रभात कैंसर की नकली दवाइयां बेचने के लिए राजी हो गया.

दरअसल, प्रभात गंभीर रोगों जैसे कैंसर की ही दवा बेचने की ट्रेडिंग करता था. प्रभात अपने ग्राहकों को पूरे भारत के अलावा चीन व दूसरे देशों में दवाएं भेजता था. पुलिस को पूछताछ में पता चला कि वे शौपिंग साइट से ही हर साल 25 करोड़ रुपए की कैंसर की नकली दवा बेच देता था.

रामकुमार की जिस फैक्ट्री में दवाइयां बनाई जाती थीं, वह पिछले करीब साढ़े 5 साल से बादशाही रोड स्थित आरडीएम बायोटेक कंपनी के नाम से चल रही थी. पहले इस में फूड सप्लीमेंट बनाने का काम होता था. इस के लिए केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन से लाइसेंस लिया गया था.

इतना ही नहीं, साल 2020 में रामकुमार ने जिला आयुर्वेदिक अधिकारी कार्यालय से भी देसी दवा बनाने का लाइसेंस लिया था. फैक्ट्री में फूड सप्लीमेंट ‘जिनोव्हे’ के नाम से बनाया जाता था. दिलचस्प बात थी कि फैक्ट्री में कभी निरीक्षण ही नहीं हुआ.

हालांकि अब जबकि फैक्ट्री में कैंसर की नकली दवाएं बनाने का दिल्ली पुलिस ने खुलासा किया है तो जिला आयुर्वेदिक विभाग ने इस का लाइसेंस निरस्त कर इसे सील कर दिया है.

बहरहाल, गन्नौर की फैक्ट्री में प्रोटीन पाउडर तैयार किया जाता था. उसे बाद में  गाजियाबाद ले जाने के बाद खाली कैप्सूलों में भर कर इस को कैंसर की दवा के रूप में पैक कर दिया जाता था. बाद में शुभम मन्ना उस पर एक्सपायरी डेट और दूसरी तरह की जरूरी हिदायतें प्रिंट कर देता था.

कैप्सूलों में भरते थे प्रोटीन पाउडर

ये काम गाजियाबाद के लोनी स्थित ट्रोनिका सिटी में होता था, जहां मास्टरमाइंड डा. पवित्रा नारायण और इस के ममेरे भाई शुभम मन्ना ने गोदाम बनाया हुआ था. इस गोदाम की देखरेख और दवाओं की सप्लाई के लिए इन लोगों ने अंकित शर्मा उर्फ अंकू उर्फ भज्जी और पंकज सिंह बोहरा को रखा हुआ था.

आरोपियों से पूछताछ में खुलासा हुआ कि कैंसर के कैप्सूल में कैमिकल की जगह प्रोटीन पाउडर भरा जाता था, जो मक्के के आटे का स्टार्च होता था. बाद में जब दवाओं की लेबलिंग हो जाती थी तो नकली दवाओं को भागीरथ प्लेस समेत अन्य बड़े मैडिकल स्टोरों को सस्ती कीमत पर बेच दिया जाता था.

साथ ही भारत में ये लोग शौपिंग साइट इंडिया मार्ट पर औनलाइन दवा मंगवाने के इच्छुक लोगों को औनलाइन भी दवा बेचते थे. यह गैंग भारत, अमरीका, इंग्लैंड, बांग्लादेश और श्रीलंका की 7 बड़ी कंपनियों के 20 से अधिक ब्रांड की कैंसर की नकली दवाएं बना कर बेचता था.

पुलिस ने अब तक इन के कब्जे से करीब 9 करोड़ रुपए मूल्य की नकली दवाएं, 16 लाख रुपए और पैकिंग का सामान, खाली डिब्बे, बिना नाम की दवाइयां, तारीख और बैच नंबर डालने की मशीनें व अन्य सामान बरामद किया है.

मास्टरमाइंड पवित्रा नारायण के फ्लैट से भी भारी मात्रा में दवाएं बरामद हुईं. इन के कब्जे से दवा बनाने का कच्चा माल, 12 मोबाइल फोन और लैपटाप तथा वारदात में इस्तेमाल एक स्कूटी भी बरामद की गई.

क्राइम ब्रांच की टीम को डा. पवित्रा के 2 सहयोगी डा. रसैल (बांग्लादेश निवासी) और डा. अनिल (बिहार निवासी) की तलाश है. पुलिस छानबीन के दौरान पता चला है कि दोनों आरोपी चीन फरार हो गए हैं.

जांच में यह भी पता चला है कि मौत के काले कारोबार से डा. पवित्रा ने गुरुग्राम में करीब 9 करोड़ के 2 प्लौट खरीदे हुए हैं. इस के अलावा दुर्गापुर, पश्चिम बंगाल में एक नर्सिंग होम के लिए करोड़ों की जमीन खरीदी है. इन लोगों ने डा. अनिल के साथ मिल कर नेपाल में भी करोड़ों की जमीन में पैसा निवेश किया हुआ है.

सभी सातों आरोपियों के पास से करीब 8 करोड़ रुपए की जो दवाएं बरामद हुई हैं, वह करीब 4 महीने का स्टाक था. पुलिस के सामने डा. पवित्रा ने कुबूल किया कि पिछले 4 सालों के दौरान वह 100 करोड़ से ज्यादा की दवाई बेच चुका है.

कैंसर के लिए इस्तेमाल होने वाली दवाइयों की कीमत 5 हजार रुपए से ले कर 2 लाख के बीच में है. गैंग के सदस्य आधे दामों पर ही दवाएं उपलब्ध करा देते थे. इसलिए उन की दवाइयों की खूब डिमांड थी. देशभर में दवाओं की डिलीवरी के लिए ‘वी फास्ट’ कुरियर बुक करते थे.

अपराध शाखा की जिन टीमों ने कैंसर की नकली दवा के इन सौदागरों को गिरफ्तार किया है. क्राइम ब्रांच के विशेष आयुक्त रविंद्र यादव ने उस टीम को पुरस्कृत करने की घोषणा की है. पुलिस टीम अब यह भी पता लगाने में जुटी है कि मौत का ये सामान दिल्ली एनसीआर में किन दुकानों तक पहुंचता था.द्य

—कथा पुलिस की जांच व आरोपियों के कुबूलनामे पर आधारित

श्रद्धा मर्डर केस : 35 टुकड़ों में बिखर गया प्यार – भाग 3

श्रद्धा को एक ही गम खाए जा रहा था कि आखिर वह कब तक बिनब्याही लिवइन पार्टनर के साथ बनी रहेगी. उसे विवाहिता का अस्तित्व कैसे मिलेगा? मुश्किल यह थी कि आफताब कोर्टमैरिज के लिए भी राजी नहीं था.

दिन बीतते रहे और नोकझोंक के साथ श्रद्धा और आफताब की जिंदगी भी आगे बढ़ती रही. एक दिन आफताब के डेटिंग ऐप पर आफताब की तरफ किसी लड़की की रिक्वेस्ट देखी तो वह चौंक गई. उस बारे में श्रद्धा ने पूछा.

आफताब ने इस का उस ने रूखेपन से जवाब दिया, ‘‘क्यों, कोई और मुझ से डेटिंग नहीं कर सकती क्या? तुम से अधिक मेरे इंस्टाग्राम पर फालोअर हैं. ब्लौग के व्यूअर्स लाख तक पहुंचने वाले हैं.’’

‘‘मेरे पूछने का तुम गलत अर्थ निकाल रहे हो, यह तो चोर की दाढ़ी में तिनका वाली बात हुई न,’’ श्रद्धा ने भी करारा जवाब दिया.

‘‘तुम को तो पता है न, बंबल पर फीमेल की रिक्वेस्ट ही मान्य होती है, मेल की नहीं. इस का मतलब तो साफ है न कि मैं ने उसे अप्रोच नहीं किया है, बल्कि उस ने मुझ से डेटिंग की रिक्वेस्ट की है. अब उसे रेसिपी सीखनी है तो इस में मैं क्या कर सकता हूं?’’ वह बोला.

बन गई नए ठिकाने की योजना

इस तकरार का अंत श्रद्धा के सौरी से हो गया, लेकिन मन अस्थिर बना रहा. दिमाग में संदेह के कुलबुलाते कीड़े को शांत नहीं कर पाई थी. साल 2022 आ गया. सब कुछ  पहले की तरह सामान्य होने लगा. घूमनेफिरने, बाजार, मौल, मल्टीप्लेक्स और टूरिज्म की मौजमस्ती के अड्डे  पर चहलपहल शुरू हो गई. आवागमन सामान्य हो गया.

इन सब के बावजूद मुंबई में श्रद्धा और आफताब के लिए नया कुछ नजर नहीं आ रहा था. आफताब ने ही पहल की और श्रद्धा को खुश करने के लिए घूमने की योजना बनाई.

‘‘सुना है, दिल्ली में आईटी का अच्छा हब बन चुका है. एनसीआर गुड़गांव और नोएडा में आईटी प्रोफैशनल्स की मांग है. वहां रहने का खर्च भी कम है,’’ आफताब बोले जा रहा था और श्रद्धा उस के बोलने के अंदाज को प्यार से निहार रही थी.

बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘…और वहां रेस्टोरेंट और फाइव स्टार होटलों में भी तुम जैसे शेफ की मांग है,’’ कहती हुई वह हंस पड़ी.

‘‘सही कहा तुम ने. आखिर वह कैपिटल है. वहां से हमें विदेश जाने के मौके मिल सकते हैं. कुछ नहीं तो स्टार्टअप तो शुरू कर ही सकते हैं. मल्टीनैशनल कंपनियां हैं, विदेशी पूंजी है..’’ आफताब बोला.

‘‘तो दिल्ली में रहने का इरादा है. वह मेरे लिए एकदम अनजाना मैट्रोपौलिटन है,’’ श्रद्धा ने चिंता जताई.

‘‘अनजाना है, लेकिन वहां के लोग बड़े दिलवाले हैं,’’ कहते हुए आफताब ने श्रद्धा को गले लगा लिया.

इस तरह दोनों ने जनवरी, 2022 में ही दिल्ली में जमने की नई योजना बना ली, लेकिन दिल्ली की सर्दी के बारे में सुन कर उन्होंने गरमी शुरू होने पर दिल्ली जाने का मन बनाया.

आखिरकार योजना के मुताबिक दोनों 5 मई, 2022 को मुंबई से दिल्ली आ गए. उन्होंने पहाड़गंज के होटल में खुद को पतिपत्नी बता कर कमरा लिया. यहां एक दिन रहने के बाद वे हिमाचल प्रदेश चले गए और विभिन्न होटलों में छुट्टियां बिताते हुए दोबारा 8 मई को वापस दिल्ली आ गए. फिर उन्होंने पहाड़गंज के होटल में कमरा ले लिया और 11 मई तक वहीं ठहरे.

इस बीच दिल्ली में रहने के लिए कमरे की तलाश भी करते रहे. उन्हें महरौली के छतरपुर इलाके में  प्रौपर्टी डीलर के माध्यम से किराए का एक फ्लैट मिल गया. वहां वे 12 मई से रहने लगे.

इस दौरान मिली खुशियों को श्रद्धा फेसबुक और इंस्टाग्राम आदि में अपडेट करती जा रही थी. उस की आखिरी पोस्ट 11 मई को हुई थी. उस के बाद घर की व्यवस्था करने में समय ही नहीं मिल पाया था.

जिंदगी की नई शुरुआत अच्छी हुई. अपनीअपनी उम्मीदें लिए हुए वे जोश से भरे हुए थे. श्रद्धा को उम्मीद थी कि निश्चित तौर पर वह यहां आफताब के साथ शादी रचा कर सेटल हो जाएगी, जबकि आफताब अभी भी लक्ष्य को ले कर दुविधा में था.

खासकर श्रद्धा के साथ निकाह के लिए घर वालों को मनाने में असफल रहा था और उस के पिता ने भी उस से संबंध तोड़ने का अपना फैसला सुना दिया था. यानी कुछ अच्छा और नया किया जाना था, किंतु उन की पुरानी जिंदगी भी पीछा नहीं छोड़ रही थी.

हंसीखुशी में 6 दिन कैसे निकल गए, उन्हें पता ही नहीं चला. आफताब के मन में क्या चल रहा था, इस का श्रद्धा जरा भी अंदाजा नहीं लगा पर रही थी. करिअर और भविष्य को ले कर कभी कुछ तो कभी कुछ बातें करता था. शादी की बात जैसे ही होती, सिरे से गुस्से में आ जाता था.

चिंतित पिता ने की पहल

श्रद्धा नए शहर में अपनी नई जिंदगी की नई राह पर दौड़ लगाने को तैयार थी. जबकि मुंबई में उस के पिता विकास वाकर उसे ले कर चिंतित थे. उन की पिछले कई महीने से श्रद्धा से बात नहीं हुई थी. मई के बाद उन्होंने श्रद्धा का कोई नई पोस्ट भी नहीं देखी था.

उन्होंने लक्ष्मण नाडर से बेटी के बारे में पूछा. इस पर लक्ष्मण ने बताया कि उस की भी श्रद्धा से 14 मई के बाद कोई बात नहीं हुई है और 4 माह बीत चुके हैं, इस बीच उस ने भी कोई फोन नहीं किया है. आज 14 सितंबर है. श्रद्धा दिल्ली जा कर इतनी लापरवाह कैसे हो गई?

विकास वाकर ने लक्ष्मण से उस के बारे में पता करने को कहा, लेकिन उस का कोई पता नहीं चल पाया. आफताब से बात हुई, तब उस ने बताया कि वह दिल्ली में उस के साथ नहीं है. कहां गई उसे नहीं मालूम.

यह जान कर पिता और भी चिंतित हो गए कि पिछले कई महीनों से श्रद्धा की कोई अपडेट उस के दोस्त के पास नहीं थी और वह आफताब के साथ भी नहीं है. महीनों से उस का फोटो भी अपडेट नहीं हो रहा था. न वाट्सऐप पर और न ही फेसबुक पर. इसी अपडेट से उस के पिता अपनी बेटी की खोजखबर लेते थे.

तब वह अनहोनी की आशंकाओं से घिर गए कि कहीं न कहीं और कुछ न कुछ उन की बेटी के साथ गलत तो हुआ है.

गैंगस्टर बनने के लिए किए 4 मर्डर – भाग 2

सीरियल किलर ने सागर में आर्ट ऐंड कामर्स कालेज में गार्ड शंभुदयाल को मार कर उन का मोबाइल अपने पास रख लिया था. मोबाइल उस ने स्विच औफ कर रखा था.  उधर, सागर पुलिस ने भी शंभुदयाल के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगा रखा था. सागर शहर में नाकाबंदी कर पुलिस टीमें संदिग्ध की तलाश कर रही थीं.  पुलिस नाइट गश्त में लगी थी.

किलर ने पहली सितंबर, 2022 की रात 11 बजे चंद सेकेंड के लिए जैसे ही मोबाइल औन किया, पुलिस टीम के अधिकारियों के चेहरों पर चमक आ गई. मोबाइल की लोकेशन ट्रेस होते ही 10 सदस्यीय टीम बनाई और 2 कारों से उसे भोपाल रवाना किया गया.

पुलिस टीम भोपाल तो पहुंच गई, मगर मोबाइल बंद होने की वजह से किलर को खोजना आसान काम नहीं था. भोपाल में साइबर सेल की टीम लोकेशन ट्रेस कर खजूरी थाना क्षेत्र में कई घंटों तक आरोपी की तलाश में इधरउधर भटकती रही.

रात करीब डेढ़ बजे से पुलिस उसे बैरागढ़, कोहेफिजा, लालघाटी इलाके में खोजती रही, लेकिन वह नहीं मिला. रात करीब साढ़े 3 बजे किलर ने एक बार फिर मोबाइल को औन किया. पुलिस को उस की लोकशन लालघाटी इलाके में पता चली.

सीरियल किलर चढ़ गया हत्थे

पुलिस टीम उस की तलाश में करीब सुबह 5 बजे जैसे ही लालघाटी पहुंची तो लाल कलर की शर्ट पहने करीब 19-20 साल का एक नौजवान संदिग्ध हालत में घूमता नजर आया. पुलिस ने उसे रोक कर पूछताछ की तो उस ने अपना नाम शिवप्रसाद धुर्वे बताया.

उस की तलाशी के दौरान पुलिस को शंभुदयाल का वही मोबाइल फोन मिल गया, जिस की लोकेशन के आधार पर पुलिस उस तक पहुंची थी. पुलिस ने उसे दबोच लिया.

भोपाल से सागर ले जाने के लिए पुलिस उसे ले कर करीब 40 किलोमीटर दूर पहुंची ही थी कि उस ने पुलिस को बताया कि थोड़ी देर पहले ही उस ने भोपाल में मार्बल दुकान में एक गार्ड की हत्या कर दी है.

पुलिस को शिवप्रसाद के पास से भोपाल वाले गार्ड का भी मोबाइल फोन मिला. सागर पुलिस ने तुरंत ही भोपाल पुलिस के अधिकारियों को सूचना दी. खजूरी रोड पुलिस घटनास्थल पर पहुंची तो गार्ड सोनू वर्मा खून से लथपथ मिला. मरने वाला सिक्योरिटी गार्ड सोनू वर्मा था.

शिवप्रसाद ने पुलिस को बताया कि 1-2 सितंबर की दरमियानी रात करीब डेढ़ बजे खजूरी रोड स्थित गोराजी मार्बल की दुकान पर काम करने वाले गार्ड सोनू वर्मा की मार्बल के टुकड़ों से हमला कर हत्या की है.

सोनू का परिवार मूलरूप से भिंड जिले का रहने वाला है. 2005 में उन का परिवार रोजगार के लिए भोपाल आ कर बस गया.

भोपाल आ कर उस के पिता सुरेश वर्मा ने गोराजी मार्बल की दुकान पर चौकीदार की नौकरी शुरू कर दी. उन के 4 बेटे और एक बेटी है. सोनू चौथे नंबर का था. कुछ महीने पहले ही सोनू के पिता की हार्ट अटैक से मौत हो गई थी, जिस के बाद सोनू गोराजी मार्बल की दुकान पर चौकीदारी करने लगा था.

25 साल का सोनू पांचवीं तक ही पढ़ा था. सोनू रात में चौकीदारी करता था. वह शाम 7 बजे ड्यूटी पर आता और सुबह 7 बजे घर जाता था. 12 घंटे की ड्यूटी के बाद उसे महीने के 5 हजार रुपए मिलते थे.

घर चलाने के लिए सोनू दिन के समय पानी सप्लाई करने वाले टैंकर पर पार्टटाइम काम करता था. वहां काम करने के बाद उसे मुश्किल से 3-4 हजार रुपए मिलते थे. महीने में इस तरह दिनरात काम करने के बाद भी वह मुश्किल से 8-9 हजार रुपए ही कमा पाता था.

सागर आ कर पुलिस अधिकारियों ने जब साइकोकिलर शिवप्रसाद से विस्तार से पूछताछ की तो उस ने चारों गार्डों की हत्या करने का जुर्म कुबूल कर लिया.

किलर शिवप्रसाद की गिरफ्तारी पर मध्य प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा सहित पुलिस के आला अधिकारियों ने सागर पुलिस को बधाई दी. साथ ही सागर शहर के लागों ने भी राहत की सांस ली.

6 दिनों में हुई 4 सिलसिलेवार हत्याओं की वजह से चर्चा में आए सीरियल किलर की कहानी भी बेहद दिलचस्प है.

सागर जिले के केसला ब्लौक के केकरा गांव का रहने वाला 19 साल का शिवप्रसाद धुर्वे अपने पिता नन्हेलाल का छोटा बेटा है. उस का बड़ा भाई पुणे में मजदूरी करता है, जबकि 2 बेटियों की शादी हो चुकी है.

नन्हेलाल के पास करीब 2 एकड़ जमीन है, जिस पर खेतीबाड़ी कर वह अपने परिवार की गुजरबसर करता है. शिवप्रसाद कुल 8वीं जमात तक ही पढ़ा है. वह बचपन से ही लड़ाकू प्रवृत्ति का था.

स्कूल में पढ़ते समय गांव के लड़कों को छोटीछोटी बात पर पीट देता था. सभी से झगड़ते रहने के कारण गांव में किसी से भी उसकी दोस्ती नहीं  थी. मातापिता भी उस की हरकतों से परेशान रहने लगे थे.

2016 में 13 साल की उम्र में किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रखते ही उस ने एक लड़की के साथ छेड़छाड़ कर दी, जिस की वजह से गांव के लोगों ने उस की पिटाई कर दी. उसी दौरान वह घर से भाग कर सागर आया और ट्रेन में बैठ कर पुणे चला गया. फिर वहां एक होटल में नौकरी करने लगा.

शिवप्रसाद बीचबीच में होली, दीवाली पर एकदो दिन के लिए गांव आता था, लेकिन किसी से मिलताजुलता नहीं था. पुणे में एक दिन होटल मालिक के साथ किसी बात को ले कर विवाद हो गया तो शिवप्रसाद ने उसे इतना पीटा कि उसे अस्पताल में भरती कराना पड़ा.

उस के खिलाफ पुलिस ने काररवाई कर  उसे बाल सुधार गृह भेज दिया था. बाद में उस के पिता नन्हेलाल आदिवासी उसे छुड़ा कर गांव ले आए. गांव में कुछ समय रहने के बाद वह गोवा चला गया था.

गोवा में काम करतेकरते वह अच्छीखासी इंग्लिश बोलनेसमझने लगा. अभी हाल ही में रक्षाबंधन पर वह 7-8 दिनों के लिए गांव आया था, इस के बाद बिना किसी को कुछ बताए वह घर से चला गया. पिता नन्हेलाल को कभी भी उस ने यह नहीं बताया कि वह क्या काम करता है. मां सीताबाई भी उस से पूछती,  ‘‘बेटा, यह तो बता तू शहर में कामधंघा क्या करता है?’’

तो शिवप्रसाद कहता, ‘‘मां, तू काहे को चिंता करती है मैं ऐसा काम करता हूं कि जल्द ही मुझे लोग जानने लगेंगे.’’

मां यही समझ कर चुप हो जाती कि उस का बेटा अमीर आदमी बन कर नाम कमाने वाला है.

फिल्मों से प्रभावित हो कर बना किलर

सागर में 3 और भोपाल में एक सिक्योरिटी गार्ड्स की हत्या करने के आरोपी सीरियल किलर शिवप्रसाद धुर्वे फिल्में देखने का शौकीन था. फिल्में देख कर उस ने गैंगस्टर बनने की ठानी थी. वह बिना मेहनत किए पैसा कमा कर फेमस होना चाहता था.

वारदात को अंजाम देने से पहले मोबाइल पर उस ने कई फिल्में और वीडियोज देखे.  सागर पुलिस को पूछताछ में उस ने बताया कि मध्य प्रदेश के उज्जैन के गैंगस्टर दुर्लभ कश्यप को वह रोल मौडल मानता है और उस के जैसा बनने की चाहत उस के दिल में थी.

उस ने जल्द फेमस होने का सपना देखा और जुर्म की दुनिया में कदम बढ़ा दिए.   शिवप्रसाद दिन भर सोता रहता था और रात होते ही अपने शिकार की तलाश में निकल पड़ता था.

डॉक्टर और इंजीनियर बनाने लगे कैंसर की नकली दवाएं- भाग 2

एएसआई गुलाब को कैंसर जैसी भयानक बीमारी की नकली दवाएं बना कर पैसा कमाने वालों पर उस दिन बेहद गुस्सा आया. लोगों को नकली दवाएं उपलब्ध करा कर झूठी उम्मीदें बेचने वाले जरूर ये काम बड़़े पैमाने पर करते होंगे. उन्होंने सोचा कि क्यों न इस गंभीर अपराध को अंजाम देने वालों को उन के अंजाम तक पहुंचाया जाए.

बस यही सोच कर एएसआई गुलाब सिंह ने अपने परिचित से जानकारी लेने के बाद इस पूरे मामले की जानकारी अपने स्तर से एकत्र करनी शुरू कर दी. मसलन परिचित का रिश्तेदार भारी छूट की दवाएं कहां से मंगवाता था. उस बंदे को दवाएं कहां से मिलती थीं. कभीकभी एक खास कुरियर कंपनी से भी दवा आती थी.

करीब डेढ़ महीने तक गुलाब पूरी जानकारी एकत्र करता रहा. उस के पास जब इतनी जानकारी एकत्र हो गई कि इस गिरोह को पकड़ा जा सके तो उस की समझ में आ गया कि यह एक बड़ा गैंग है, जिसे पकड़ने के लिए एक बड़ी टीम की जरूरत पड़ेगी.

लिहाजा एएसआई गुलाब ने अपने इंसपेक्टर सतेंद्र मोहन और एसीपी रमेशचंद्र लांबा को इस पूरे मामले की जानकारी दी. मामला वाकई गंभीर था, इसलिए उन्होंने क्राइम ब्रांच के डीसीपी अमित गोयल को सारी बात बता कर आवश्यक दिशानिर्देश मांगे.

डीसीपी अमित गोयल ने क्राइम ब्रांच के स्पैशल कमिश्नर रविंद्र सिंह यादव से सलाहमशविरा करने के बाद एसीपी लांबा को मामले का खुलासा करने के लिए एक बड़ी टीम गठित करने का निर्देश दिया. साथ ही ये हिदायत भी दी कि काररवाई एक साथ इतनी तेजी से हो कि किसी भी अपराधी को भागने का मौका न मिले.

एसीपी लांबा ने संभाली कमान

एसीपी रमेशचंद्र लांबा के नेतृत्व में 4 टीमें बनाई गईं. एक टीम की अगुवाई कर थे इंसपेक्टर कमल कुमार, दूसरी टीम को इंसपेक्टर पवन कुमार, तीसरी को  इंसपेक्टर महिपाल और चौथी का नेतृत्व इंसपेक्टर सतेंद्र मोहन सिंह कर रहे थे.

चारों टीमों में एसआई सुरेंद्र राणा, एएसआई रमेश, राकेश, जफरुद्दीन, सुकेंदर, गुलाब के अलावा हैडकांस्टेबल रामकेश, वरुण, शक्ति, सुरेंद्र, सुनील, दलबीर, ललित, तरुण व नवीन को शमिल किया गया था.

सभी टीमों को एसीपी लांबा ने अलगअलग काम सौंप दिए. इंसपेक्टर सतेंद्र मोहन की टीम में शामिल एएसआई गुलाब इस पूरे मामले में अहम जानकारियां जुटा चुके थे. लिहाजा इस पूरे मामले की अहम कड़ी तक पहुंचने की जिम्मेदारी भी उन्हीं को सौंपी गई.

गुलाब ने 2 महीनों की मेहनत से जो जानकारियां एकत्र की थीं और जिन लोगों को अपने भरोसे में ले कर पूरे मामले की जड़ तक पहुंचे थे, उन्हीं के माध्यम से पता चला कि 13 नवंबर की दोपहर 3 बजे इस गिरोह का एक आदमी स्कूटी ले कर प्रगति मैदान के सामने से हो कर भागीरथ प्लेस में किसी को नकली दवाओं की डिलीवरी देने जाएगा.

सूचना एकदम सटीक थी. इसलिए एसीपी लांबा के निर्देश पर इंसपेक्टर सतेंद्र मोहन ने जाल बिछा दिया. इंतजार लंबा रहा, लेकिन आखिरकार जब पंकज बोहरा नकली दवाइयां ले कर वहां से गुजरा तो पुलिस टीम ने उसे दबोच लिया. उस के बाद क्राइम ब्रांच के औफिस में पहुंच कर उस ने अपने गैंग की पूरी कलई खोल दी.

सब कुछ साफ था. बस, अब आगे का काम बाकी के आरोपियों को पकड़ कर माल की बरामदगी करनी थी. एसीपी लांबा ने एक साथ चारों टीमों को एक छापेमारी के लिए रवाना किया.

पहली टीम पंकज बोहरा को ले कर लोनी पहुंची, जहां दवाओं पर लेबल लगा कर उन की पैंकिंग होती थी. वहां से लेबलिंग और पैंकेजिंग की पूरी यूनिट और उपकरण बरामद कर 2 लोगों को पकड़ा गया.

दूसरी टीम ने नोएडा में छापा मारा, जहां से इस गिरोह के मास्टरमाइंड सरगना डा. पवित्रा नारायण प्रधान और उस के ममेरे भाई शुभम मन्ना को एक करोड़ से अधिक की तैयार नकली दवाओं के साथ पकड़ा गया.

पुलिस की एक टीम ने सोनीपत के गन्नौर में उस फैक्ट्री पर छापा मारा, जहां ये दवाएं तैयार की जाती थीं. पुलिस ने फैक्ट्री के मालिक को गिरफ्तार कर वहां से तैयार दवाएं और उपकरण भी बरामद कर लिए. इस के बाद पुलिस ने 2 अन्य लोगों को दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया.

एक साथ की गई काररवाई से मिली बड़ी सफलता

सभी आरोपियों की पहचान इस प्रकार हुई. फ्लैट नंबर 207, दूसरी मंजिल, चौहान रेजीडेंसी, सेक्टर-45, नोएडा का रहने वाला 34 साल का डा. पवित्रा नारायण प्रधान इस गिरोह का सरगना था. उस के साथ पुलिस ने उस के 39 वर्षीय ममेरे भाई शुभम मन्ना को गिरफ्तार किया, जो उसी के साथ रहता था.

सब से पहले पकड़ा गया आरोपी 27 वर्षीय पंकज सिंह बोहरा से पूछताछ के बाद पुलिस टीम ने लोनी की फैक्ट्री से अंकित शर्मा उर्फ अंकू उर्फ भज्जी निवासी मकान नंबर 355, नेब सराय, नई दिल्ली को गिरफ्तार किया.

पुलिस टीम ने मकान नंबर 257, बादशाही रोड, बीएसएनएल एक्सचेंज के पास, गन्नौर, जिला सोनीपत में नकली दवा बनाने वाली फैक्ट्री के मालिक 43 साल के रामकुमार उर्फ हरबीर को भी गिरफ्तार किया.

इन के अलावा दवाओं की आपूर्ति से ले कर उन की मार्केटिंग करने वाले एकांश वर्मा निवासी 1127, एस्कान एरिना, नगला रोड, चंडीगढ़ तथा फ्लैट नंबर 904, एमराल्ड-2, गार्डेनिया ग्लैमर सोसाइटी, सेक्टर-3, वसुंधरा, गाजियाबाद में रहने वाले प्रभात कुमार को गिरफ्तार किया.

सभी आरोपियों से पूछताछ हुई तो पता चला कि उन के कब्जे से जो भी दवाएं बरामद हुईं, वे सभी कैंसर में इस्तेमाल होने वाली दवाएं थीं. लेकिन वे मोटा मुनाफा कमाने के लिए ये नकली दवाइयां बना कर बेचते थे.

पुलिस ने कैंसर की दवा बेचने की अधिकृत कंपनी एस्ट्राजेनेका के मैनेजर रेग्युलेटरी अफेयर्स अमित कुमार को बुला कर जब वे दवाइयां दिखाईं तो उन्होंने भी इन के नकली होने की पुष्टि कर दी. जिस के बाद क्राइम ब्रांच ने सातों आरोपियों के खिलाफ  आईपीसी की धारा 274/275/276/420/468/471/120बी/34  के तहत मामला दर्ज कर सभी आरोपियों से विस्तृत पूछताछ शुरू कर दी.

डा. पवित्रा नारायण निकला मास्टरमाइंड

पता चला कि पिछले 4 सालों से आरोपी डा. पवित्रा नारायण प्रधान कैंसर की नकली दवा का धंधा कर रहा था. उस ने चीन की एक सरकारी यूनिवर्सिटी से वर्ष 2012 में एमबीबीएस किया था. चीन में ही उस की मुलाकात बांग्लादेशी नागरिक व उस के क्लासमेट डा. रसैल से हुई थी. रसैल ने ही उसे कैंसर की नकली दवाइयां बनाने का आइडिया दिया था.

रसैल ने बताया था कि वह उसे कैंसर की दवाई बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला एपीआई (एक्चुअल फार्मास्युटिकल इनग्रेडिएंट्स) उपलब्ध करा देगा. उस ने बताया कि कैंसर की दवाओं की भारत और चीन में खासी मांग है. दवाएं महंगी हैं, इसलिए उन को अगर आधे दामों पर भी  बेचा जाए तो भी बहुत फायदा होगा.

श्रद्धा मर्डर केस : 35 टुकड़ों में बिखर गया प्यार – भाग 2

आखिरकार 23 जनवरी, 2020 को सुमन की मौत हो गई. इस की सूचना उसे पिता की मार्फत मिली. सुमन की मौत पर 4 साल पहले से अलग रहने वाले उन के पति और एक साल से लिवइन में रहने वाली बेटी श्रद्धा आखिरी बार मिले. बापबेटी के बीच तनाव का माहौल बना रहा.

मोहब्बत में आई खटास

मां के गुजर जाने के बाद श्रद्धा अपने भविष्य को ले कर चिंतित रहने लगी थी. एक रोज सुबहसुबह चाय पीते हुए वह आफताब से अचानक पूछ बैठी, ‘‘फैमिली से हमारी शादी के बारे में कोई बात हुई?’’

कप में अपनी चाय निकालता हुआ आफताब अचानक यह सवाल सुन कर तिलमिला गया, ‘‘तुम्हें कितनी बार कहा है, उस बारे में कोई बात नहीं हुई है.’’

‘‘बात कब करोगे?’’श्रद्धा थोड़ी नाराजगी दिखाते हुई बोली.

‘‘वे लोग हमारे रिश्ते को ले कर ऐसे ही चिढ़े हुए हैं…और कोरोना भी है. लौकडाउन खत्म होते ही घर जा कर बात करूंगा.’’ आफताब टालने के अंदाज में बोला.

इस पर श्रद्धा चिढ़ती हुई बोली, ‘‘तुम मेरी कोई बात नहीं सुनते हो. हर बात को टाल देते हो. तुम्हारे चलते मैं ने अपना घरबार छोड़ा है …और तुम्हें जरा भी परवाह नहीं है.’’

उस के बाद श्रद्धा सांस लिए बगैर आफताब की खामियां गिनवाने लगी. चीखते हुए आफताब पर दनादन आरोप लगा दिए, जिस से वह भन्ना गया. गुस्से में उस ने चाय की प्याली श्रद्धा की ओर उछाल दी. गर्म चाय टेबल पर कुछ श्रद्धा के हाथों पर गिरी. वह गुस्से में आ कर और चीखने लगी, ‘‘जला दोगे क्या मुझे?’’

आफताब श्रद्धा के गर्म चाय से जले हाथ को देखने के बजाए कमरे में चला गया. गुस्से से भरी श्रद्धा तौलिए से हाथ पोंछती हुई उस के पीछेपीछे कमरे तक आ गई. आफताब ने उसे धक्का दे दिया. वह वहीं जमीन पर गिर पड़ी. आफताब का गुस्से से तमतमाया हुआ खौफनाक चेहरा देख श्रद्धा सहम गई. दोनों हाथों से चेहरा छिपा लिया और सिसकने लगी.

थोड़ी देर बाद आफताब तैयार हो कर घर से बाहर चला गया. उदास श्रद्धा ने अपने क्लासमेट लक्ष्मण नाडर को फोन मिलाया. वह उस के बचपन का दोस्त था. उस से अपनी बातें बेहिचक शेयर कर लेती थी.

वह जब कभी किसी उलझन में होती थी, तब उस से सलाह लेती थी या फिर उस के जरिए अपनी कोई जरूरी बात मम्मीपापा तक पहुंचा दिया करती थी.

उस रोज की घटना को ले कर श्रद्धा ने दोस्त को विस्तार से तो नहीं बताया, लेकिन इतना जरूर कहा कि आफताब उस से शादी करने में टालमटोल कर रहा है. इस बारे में बात करते ही गुस्से में आ जाता है. उस ने लक्ष्मण से यह भी बताया कि आफताब की क्या मजबूरी है, उसे नहीं मालूम, लेकिन उसे लगता है कि उस की मोहब्बत में खटास आ गई है.

इतना कहने के साथ ही वह फोन पर रोने लगी. तभी कालबेल बजी. उस ने फोन कट किया. आंसू पोंछे और आईव्यू से देखा.

बाहर गार्ड खड़ा था. दरवाजा खोल कर उस के आने का कारण पूछने ही वाली थी कि उस ने पीले रंग की दवाई की ट्यूब उस ओर बढ़ा दी, ‘‘मैडम, सर ने आप को देने के लिए कहा है.’’

गार्ड ट्यूब दे कर चला गया. श्रद्धा ने उसे भरी नजर से देखा. वह जले में लगाने वाली दवा का ट्यूब था. वह समझ नहीं पाई कि जिसे वह कोस रही थी, आखिर वह उस से कैसी हमदर्दी भी रखता है.

फिर भी श्रद्धा लिवइन पार्टनर के बारे में अपने पिता से बात करना चाहती थी. उसे भरोसा था कि उस के पिता आफताब के परिवार वालों को शादी के लिए राजी कर लेंगे. वह अकेली हिंदू लड़की नहीं है, जो मुसलिम युवक से प्रेम करती है और भी तो लिवइन में रह रही हैं.

करीना कपूर भी तो काफी समय तक शादीशुदा सैफ अली खान के साथ लिवइन पार्टनर बन कर रही. कई सालों बाद शादी की. उन्हें तो तब किसी ने कुछ नहीं कहा. इसलिए न, क्योंकि वे अमीर घराने की सेलिब्रेटी थे. हम साधारण लोगों पर ही पाबंदियां क्यों लगाते हैं लोग?

पिता से मांगा शादी कराने में सहयोग

इसी उधेड़बुन में खोई श्रद्धा के मन में कई तरह के खयाल आ रहे थे. आखिरकार उस ने अपने पिता से ही इस बारे में सलाह लेने और कोई रास्ता निकालने की सोची. वह अगले रोज ही सीधा पिता के पास जा पहुंची.

उस ने पिता से सब कुछ सचसच बता दिया. उन से मदद मांगी कि चाहे जैसे भी हो, वह उस की आफताब से शादी करवाने की कोई तरकीब निकालें. उस के परिजनों को इस के लिए तैयार कर लें.

पिता ने आफताब को भी अपने घर बुलवाया. श्रद्धा खुश थी कि शायद कोई बात बन जाए. किंतु वह जैसा सोच रही थी, वैसा पिता ने नहीं किया. उन की शादी के लिए पहल करने के बजाय उन्होंने आफताब को ही बेटी से संबंध तोड़ लेने के लिए कहा.

आफताब को अंतरधार्मिक भावना की बातें समझाने की कोशिश करने लगे. उन्होंने यहां तक कहा कि उस की शादी को लोग सिर्फ हिंदू और मुसलिम कीनजर से देखेंगे. वह नहीं चाहते कि उन की वजह से समाज परिवार में उन के उठनेबैठने पर असर पड़ जाए और उन का बिजनैस चौपट हो जाए.

पिता की इस पहल से श्रद्धा और भी आहत हो गई. वह असहाय और अकेला महसूस करने लगी. पिता ने तो दोनों पर अपनी राय के साथसाथ फैसला भी थोप दिया. और आगे का निर्णय उन पर छोड़ कर चले गए.

दुखी मन से श्रद्धा ने आफताब को देखा. आफताब ने उसे गले लगा लिया. बीते दिनों की अपनी गलतियों के लिए माफी मांगी और भरोसा दिया कि अब उन्हें कोई सही राह निकालनी होगी.

इसी बीच कोरोना लहर का दूसरा दौर भी आ चुका था, जिस से काफी अफरातफरी मची हुई थी. लगातार मौतें हो रही थीं. मुंबई में भी मौतें हो रही थीं. लोग निगम से ले कर राज्य और केंद्र सरकार तक की पाबंदियां झेलने को मजबूर थे. श्रद्धा और आफताब को इस दौर में वर्क फ्रौम होम काम मिलता रहा. वे लौकडाउन की छूट का इंतजार करने लगे.

श्रद्धा धीरेधीरे मां की मौत के गम से उबर रही थी, लेकिन पिता द्वारा लाख मनाने के बाद भी वह आफताब के साथ रहती रही. हालांकि उन के रिश्ते की मधुरता में पहले जैसी ताजगी नहीं बची थी. दोनों एकदूसरे से खीझे रहते थे.

तांत्रिक का इंद्रजाल : समाज में फैल रहा अंधविश्वास – भाग 2

‘‘साहब, पप्पू बताता था कि घर की अलमारी से बहू सुनीता के गहने और रुपए चोरी हो रहे थे, जिस का पता लगाने के लिए योगेश ने घर पर एक तांत्रिक से तांत्रिक क्रियाएं जरूर कराई थीं.’’

विनोद नामदेव के मुंह से तांत्रिक क्रियाएं कराने की बात सुन कर पुलिस टीम के कान खड़े हो गए. पुलिस ने घटनास्थल पर जलते हुए दीपक और पूजन सामग्री को देखा था, इस से पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि दीपावली के एक दिन पहले तंत्रमंत्र का खेल हुआ था.

‘‘तांत्रिक क्रियाएं करने वाला तांत्रिक कौन था?’’ पुलिस ने विनोद से पूछा.

‘‘साहब, हरदा जिले का गणेश काशिव अकसर योगेश के घर पर आ कर तंत्रमंत्र करता रहता था. वह चोरी गई वस्तुओं को वापस दिलाने के लिए तंत्रमंत्र का सहारा लेता था. घटना वाले दिन भी गणेश मुझ से बाइक में पैट्रोल भरवाने के लिए पैसे ले कर आया था.’’ विनोद नामदेव ने साफसाफ बता दिया.

पुलिस ने योगेश के घर सहित दुर्गा कालोनी में सुरक्षा बढ़ा कर आरोपियों की तलाश शुरू की तो कालोनी के लोगों से पता चला कि योगेश के घर तांत्रिक क्रियाओं को हरदा जिले के आदमपुर गांव का तांत्रिक गणेश काशिव अंजाम देता था.

तांत्रिक पिछले कुछ दिनों से मृतक के घर बारबार आ रहा था. दीपावली के एक दिन पहले भी लोगों ने उसे योगेश के घर पर देखा था.

पुलिस को तीनों मृतकों योगेश नामदेव, पत्नी सुनीता बाई व बच्चे दिव्यांश के शवों पर चोटों के निशान मिले थे. मृतकों के पास पूजा का स्थान एवं उस के पास पड़े खून के छींटे, जलता हुआ दीपक ये सभी साक्ष्य पुलिस के लिए तांत्रिक क्रियाओं की तरफ इशारा कर रहे थे.

योगेश के मौसेरे भाई से भी तांत्रिक गणेश के पूजा करने की बात पुलिस को पता चली. पुलिस की एक टीम हरदा जिले के हंडिया थाना क्षेत्र के गांव आदमपुर पहुंची और शक के आधार पर तांत्रिक गणेश काशिव को ले कर सिवनी मालवा आ गई.

गणेश ने तांत्रिक क्रियाएं करने की बात तो स्वीकार कर ली, मगर हत्या की बात से अंजान बनने की कोशिश करता रहा. पुलिस ने जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो वह जल्दी ही टूट गया.

पुलिस पूछताछ में तांत्रिक गणेश काशिव ने अपने साथी मोनू उर्फ मोहन बामने के साथ मिल कर 3-4 नवंबर, 2021 की रात 12 बजे अमावस्या को मृतक के घर पूजा करने और उन की हत्या करने का जुर्म कुबूल कर लिया.

आरोपी गणेश ने बताया कि उस ने इंद्रजाल नामक पुस्तक से तंत्र विद्या सीखी थी. उस ने पुलिस के सामने दावा किया कि वह गायब पैसा और गायब सामग्री को वापस दिलाने की तंत्र विद्या अच्छी तरह जानता है.

वैज्ञानिक अविष्कारों के बावजूद भी पढ़ेलिखे परिवार द्वारा रुपए और गहने वापस पाने के लिए अंधविश्वास के चक्कर में पड़ कर तांत्रिक से तंत्रमंत्र कराने की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

70 साल के विनोद नामदेव मूलत: होशंगाबाद जिले के आंवली घाट के निवासी हैं. नर्मदा नदी के तट पर पूजन सामग्री की दुकान से उन के परिवार की रोजीरोटी चलती है. विनोद का एकलौता बेटा योगेश पढ़लिख कर जवान हुआ तो वह काम की तलाश में गांव से 30 किलोमीटर दूर बनापुरा आ गया. बनापुरा में योगेश ने पान की दुकान खोल ली.

योगेश के बनाए पान के लोग दीवाने हो गए. योगेश की पान की दुकान चल पड़ी तो रोजाना हजारों रुपए की कमाई होने लगी. सन 2008 में योगेश की शादी सुनीता से हो गई. शादी के कुछ समय बाद ही बनापुरा की दुर्गा कालोनी में योगेश और सुनीता ने प्लौट ले कर मकान बना लिया.

2 बेटे दिव्यांश और अक्षांश के जन्म के बाद सुनीता के कहने पर योगेश ने घर पर आटा चक्की और छोटी सी किराना दुकान खोल ली. योगेश घर के बाहर पान की दुकान चलाता और सुनीता घर पर रह कर आटा चक्की और किराना दुकान चलाने लगी. सुबह बच्चों को स्कूल भेज कर वह दिन भर दुकान चलाने में व्यस्त रहती.

2021 के सितंबर महीने की बात है. सुनीता अपनी अलमारी में रखे गहने देख रही थी, मगर उसे उस की सोने की बालियां और अंगूठी नहीं मिल रही थी. परेशान हो कर उस ने अपने पति योगेश को यह बात बताई तो योगेश ने कहा, ‘‘अच्छे से देख लो सुनीता, तुम ने ये चीजें कहीं दूसरी जगह रख दी होंगी.’’

सुनीता ने अलमारी का कोनाकोना छान कर देख लिया, मगर उसे अंगूठी और कान की बालियां नहीं मिलीं. इस के हफ्ते भर बाद जब सुनीता ने अपना पर्स खोल कर देखा तो उस के करीब 5 हजार रुपए पर्स से गायब थे.

सुनीता इस बात को ले कर परेशान रहने लगी. उस ने योगेश से कहा, ‘‘देखो, घर से रुपए और अंगूठी, कान की बालियां गायब हो गई हैं, जरूर कोई हमारे ऊपर जादूटोना कर रहा है.’’

‘‘तुम कैसी दकियानूसी बातें कर रही हो, घर से कैसे कोई चीज गायब हो सकती है, तुम्हें कुछ याद रहता नहीं. कहीं रख दी होगी.’’ योगेश ने उसे झिड़कते हुए कहा.

सुनीता के दिमाग में शक का कीड़ा घुस गया था, उसे लग रहा था कि किसी ने उस के रुपए और गहने गायब कर दिए हैं.

इसी दौरान जब योगेश की मौसी का लड़का मनीष उस के घर आया तो सुनीता ने उसे रुपए और गहने गायब होने की बात बताई तो मनीष बोला, ‘‘भाभी, मैं एक तांत्रिक बंजारा बाबा को जानता हूं, वह लोगों के गुम हो गए सामान को वापस दिला देता है.’’

‘‘भैया, तुम बंजारा बाबा से बात कर लो न, मुझे भी मेरे रुपए और गहने वापस चाहिए.’’ सुनीता के तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गई, उस ने चहकते हुए मनीष से कहा.

मनीष 2-3 दिन बाद बंजारा बाबा को ले कर योगेश के घर आ गया. बंजारा बाबा का असली नाम गणेश काशिव था. 25 साल का गणेश काशिव हरदा जिले के हंडिया थाना क्षेत्र के गांव आदमपुर का रहने वाला था.

गणेश को जिस उम्र में स्कूल की किताबें पढ़नी चाहिए थीं, उस उम्र में वह तंत्रमंत्र की किताबें पढ़ने लगा था. तंत्रमंत्र और झाड़फूंक में उस का नाम आसपास के इलाकों में प्रसिद्ध हो गया था.

गणेश झाड़फूंक और तांत्रिक साधना के लिए बनापुरा आता रहता था. वह लोगों को बताता था कि उस के पास इंद्रजाल नाम की पुस्तक है, जिस में जमीन में गड़े धन का पता लगाने और चोरी किया धन वापस करने के लिए तंत्रमंत्र करने के उपाय बताए गए हैं.

बंजारा बाबा अकसर अमावस्या की रात को सुनसान जगह पर तंत्र साधना करता था. उस के इस काम में मोहन बामने उर्फ मोनू उस की मदद करता था. 30 साल का मोनू भी उस के गांव के पास रीझगांव का रहने वाला था.

हमारे समाज में अंधविश्वास की जड़ें भी अमरबेल की तरह इस तरह फैली हुई हैं कि पढ़ेलिखे लोग भी इसे छोड़ने को तैयार नहीं हैं. सुनीता और योगेश भी तांत्रिक के बिछाए इंद्रजाल में फंस ही गए.

गणेश अकसर योगेश के घर आ कर कहता कि उस के घर में किसी प्रेत का साया है, इसी वजह से घर का सामान गायब हो रहा है. गणेश ने योगेश को 6 ताबीज बना कर देते हुए कहा था कि इन्हें घर के सभी लोग अपने गले में हमेशा पहन कर रखें तो प्रेत का साया उन का कुछ नहीं बिगाड़ सकता.

दीपावली के सप्ताह भर पहले गणेश ने सुनीता को बताया कि दीपावली के एक दिन पहले की रात में वह उस के घर आ कर तांत्रिक साधना करेगा, इस से उस के घर से गायब सभी सामान घर में आ जाएगा.

उस ने तांत्रिक साधना के लिए कुछ सामान की लिस्ट बना कर उसे दी थी. योगेश काफी मशक्कत के बाद तांत्रिक क्रिया में उपयोग होने वाले सामान जुटा पाया था. तांत्रिक गणेश के बनाए प्लान के मुताबिक वह अपने सहयोगी मोनू को ले कर योगेश के घर रूप चौदस की शाम ही पहुंच गया.

गणेश ने इंद्रजाल नाम की तंत्रमंत्र से संबंधित पुस्तक में पढ़ा था कि अमावस्या की मध्यरात्रि में किसी की बलि चढ़ाने से उसे तांत्रिक शक्तियां प्राप्त हो जाती हैं. इन शक्तियों के द्वारा वह जमीन में गड़े धन का पता लगाने के साथ खोए हुए रुपए, जेवरात वापस ला सकते हैं.

गणेश तंत्रमंत्र के जरिए उन शक्तियों को हासिल करना चाहता था. इसलिए उस ने अपने साथी मोनू की मदद से दीपावली के एक दिन पहले की मध्यरात्रि में तांत्रिक अनुष्ठान कर के बलि चढ़ाने का प्लान बनाया था.

योजना के मुताबिक, वे रात 9 बजे ही पूजापाठ की तैयारियों में लग गए थे. योगेश के घर में बने एक कमरे में दीपक जला कर पूजा में उपयोग होने वाले सामान को सजा कर रख लिया गया था.

सुनीता पूजा की तैयारियों के साथ खाना बनाने की तैयारी भी कर रही थी, क्योंकि गणेश ने सुनीता से बोल दिया था कि खाना तैयार कर परिवार के लोग खा लें, तांत्रिक अनुष्ठान के बाद वह खाना खा कर ही घर जाएगा.

डॉक्टर और इंजीनियर बनाने लगे कैंसर की नकली दवाएं – भाग 1

दिल्ली के प्रगति मैदान के सामने भैरों मंदिर के पास सफेद रंग की स्कौर्पियो गाड़ी में बैठे दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर सतेंद्र मोहन सिंह को करीब एक घंटा हो चुका था, लेकिन जिस शख्स का वह बेसब्री से इंतजार कर रहे थे वो अभी तक नहीं आया था.

अपने स्टाफ के साथ सादा लिबास में सतेंद्र मोहन ही नहीं 2-3 अलगअलग प्राइवेट गाडि़यों में उन की टीम के दूसरे लोग भी इसी तरह की बेचैनी से पहलू बदल रहे थे.

‘‘गुलाब, तुम्हें यकीन तो है कि तुम्हारा शिकार इसी रास्ते से निकलेगा और आज ही आएगा.’’ इंसपेक्टर सतेंद्र जब इंतजार करतेकरते ऊब गए तो उन्होंने एएसआई गुलाब से पूछ ही लिया. क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि गुलाब के पास शायद पूरी जानकारी नहीं है.

‘‘जनाब सूचना एकदम सटीक है. बस ये नहीं पता कि उस को आने में इतनी देर कैसे हो गई. मैं अपने सोर्स से एक बार फिर कनफर्म कर लेता हूं.’’ कहते हुए एएसआई गुलाब ने जेब से फोन निकाला और किसी से बात करने लगा.

बात करने के बाद जब उस ने फोन बंद किया तो उस के चेहरे की चमक देखने लायक थी. वह बोला, ‘‘जनाब शिकार अगले 5 से 10 मिनट में आने वाला है, रास्ते में है.’’

इस के बाद भैरों मंदिर के बाहर खड़ी चारों प्राइवेट गाडि़यों में बैठे पुलिस वाले गाडि़यों से उतर कर इधरउधर फैल गए. जबकि कुछ गाडि़यों में ही बैठे रहे.

करीब 10 मिनट बाद स्कूटी पर सवार एक व्यक्ति वहां से गुजरा तो अचानक सतेंद्र मोहन की गाड़ी ने ओवरटेक कर के स्कूटी सवार को रुकने पर मजबूर कर दिया. इस से पहले कि स्कूटी सवार कोई सवालजवाब करता, आसपास फैली टीम के लोगों ने उसे घेर लिया.

‘‘भाई, कौन हो आप लोग और मुझे इस तरह क्यों घेरा है?’’ स्कूटी सवार ने सवाल पूछा तो उस से पहले ही सतेंद्र मोहन ने उस की स्कूटी की चाबी निकाल ली और चालक को स्कूटी से हटा कर उस की सीट वाली डिक्की खोली.

डिक्की में एक बैग रखा था, जिसे देख कर इंसपेक्टर सतेंद्र की आंखें चमक उठीं. बैग खोल कर देखा तो उस में कुछ मैडिसिन थीं. सतेंद्र मोहन सिंह की आंखों की चमक से ही लग रहा था कि उन्हें मानो उन दवाइयों की ही तलाश थी.

‘‘अरे…रे भाईसाहब, आप हैं कौन और इस तरह किसी का बैग आप कैसे चैक कर सकते हैं. देख नहीं रहे इस में दवाइयां हैं.’’ स्कूटी सवार को अब तक गुस्सा आ गया था. उस ने आंखें तरेरते हुए कहा तो अचानक सतेंद्र सिंह ने जोरदार थप्पड़ उस के गाल पर जड़ दिया. जिस के बाद स्कूटी सवार एकदम सन्न रह गया.

‘‘हमें पता है ये दवाइयां हैं और हमें ये भी पता है कि ये दवाइयां एकदम नकली हैं. लेकिन तुझे ये नहीं पता कि हम कौन हैं. हम दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच से हैं. अब तू वहीं चल कर बताएगा कि इन दवाइयों का खेल क्या है.’’ कहते हुए इंसपेक्टर सतेंद्र मोहन ने अपनी टीम को इशारा किया.

जिस के बाद स्कूटी सवार को गाड़ी में बैठा लिया. फिर टीम का एक सदस्य उस की स्कूटी ले कर गाड़ी के पीछेपीछे चलने लगा. कुछ ही देर में टीम उसे ले कर चाणक्यपुरी में क्राइम ब्रांच के इंटरस्टेट सेल में ले आई.

विदेशी कंपनियों की नकली दवाइयां

वहां एसीपी रमेशचंद्र लांबा पहले ही बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. स्कूटी सवार 27 साल का पंकज सिंह बोहरा था, जो मूलरूप से गांव नौखुना, पिथौरागढ़, उत्तराखंड का रहने वाला था. थोड़ी सी सख्ती बरतने के बाद ही पंकज तोते की तरह बताता चला गया.

उस के पास से पुलिस टीम ने टैग्रीसो 80 मिलीग्राम एस्ट्राजेनेका की 190 टैबलेट, वेंटोक्सेन 100 मिलीग्राम इंसेप्टा फार्मास्युटिकल्स की 600 टैबलेट्स और ओसिंट 80 मिलीग्राम इंसेप्टा फार्मास्युटिकल्स की 1,500 टैबलेट्स बरामद हुई थीं, जो कैंसर के इलाज में काम आती हैं.

ये सभी दवाइयां अमेरिका की दवा कंपनियों की थीं और भारत में इन्हें बेचने का अधिकार केवल एस्ट्राजेनेका कंपनी के पास था. पंकज बोहरा ने बताया कि उन दवाओं की पैंकिग भले ही असली दवाओं जैसी थी, लेकिन उन कैप्सूलों में दवा के नाम पर प्रोटीन पाउडर भरा था. यानी दवाइयां एकदम नकली थीं.

एसीपी लांबा और उनकी टीम के लोग पंकज की जुबानी कैंसर की नकली दवाइयों की कहानी सुनकर सन्न रह गए.

कहानी की शुरुआत दरअसल 2 महीना पहले हुई थी. क्राइम ब्रांच की इंटरस्टेट ब्रांच में तैनात एएसआई गुलाब सिंह के एक परिचित के नजदीकी रिश्तेदार की कैंसर के कारण मौत हो गई.

गुलाब सिंह जब उसे सांत्वना देने पहुंचे तो परिचित ने बताया कि उन का रिश्तेदार पिछले 6 महीने से कैंसर की जो दवा खा रहा था, उसे पता ही नहीं था कि वे नकली हैं. नकली दवा खाने के कारण उस की हालत बिगड़ती चली गई. जब डाक्टरों ने दवा की पड़ताल की तो खुलासा हुआ कि दवाएं नकली हैं.

लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. मरीज की मौत हो गई. तभी गुलाब सिंह को ये भी पता चला कि कैंसर की ये दवाएं बहुत महंगी हैं लेकिन उन्हें किसी दवा एजेंट के जरिए ये दवाएं 50 फीसदी छूट पर मिलती थीं. इसीलिए इस का कोई बिल नहीं दिया जाता था.

बताया जाता था कि ये सीधे दवा कंपनी के स्टाकिस्ट के गोदाम से चोरीछिपे निकाल कर नीचे के कर्मचारी डिस्कांउट में बेचते थे. अब गंभीर बीमारी के शिकार व्यक्ति को जिसे हर महीने हजारों रुपए की महंगी दवाइयां खानी होती हैं. उसे यहीं दवाएं अगर आधे दाम पर मिल जाएं तो उसे इस बात से क्या मतलब कि दवा किसी बड़ी दुकान से खरीदी गई है या दवा गोदाम से उस का कोई कर्मचारी चुरा कर बेच रहा है.

भारीभरकम छूट में दवाइयां मिलती रहीं और मरीज खाता रहा. पता उस वक्त लगा जब मरीज अच्छा होने की जगह और ज्यादा बीमार होने लगा. तबीयत इतनी बिगड़ गई कि अस्पताल में दाखिल होना पड़ा.

एएसआई गुलाब सिंह जुट गए जांच में

डाक्टरों को जब यह पता चला कि उन के ही द्वारा लिखी गई दवा देने के बावजूद तबीयत खराब हो रही है तो उन्होंने दवा खरीदने वाली दुकान के बारे में पूछा. तब जा कर भेद खुला कि दवाओं के रैपर असली दवा से मिलतेजुलते जरूर हैं लेकिन वे नकली दवाएं हैं. लेकिन तब तक मरीज के लिए बहुत देर हो चुकी थी और उस की मौत हो गई.

गैंगस्टर बनने के लिए किए 4 मर्डर – भाग 1

27अगस्त, 2022 की रात को मध्य प्रदेश के सागर जिले के कैंट थाना टीआई अजय कुमार सनकत को सूचना मिली कि भैंसा गांव में ट्रक बौडी रिपेयरिंग कारखाने में चौकीदार की हत्या हुई है. सूचना मिलते ही पुलिस टीम ने मौके पर पहुंच कर जांच शुरू कर दी.

जांच के दौरान पता चला कि भैंसा गांव का 50 साल का कल्याण लोधी कारखाने में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करता था. सुबह जब वह घर नहीं पहुंचा तो उस का बड़ा बेटा संजय उस की तलाश में कारखाने पहुंच गया.

कारखाने के बाहर लोगों की भीड़ और पुलिस देख कर उस के होश उड़ गए. पास जा कर देखा तो उस के पिता कल्याण का शव पड़ा हुआ था. पिता की लाश को देख कर वह चीखचीख कर रोने लगा.

पुलिस ने उसे ढांढस बंधाते हुए बताया कि किसी हमलावर ने सिर पर हथौड़ा मार कर उस की हत्या कर दी है. मृतक कल्याण का मोबाइल भी उस के पास नहीं मिला था.

घटनास्थल की सभी काररवाई पूरी कर के पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. मृतक के बेटे संजय लोधी की तरफ से हत्या का मुकदमा दर्ज करने के बाद पुलिस इस केस की जांच में जुट गई.

सागर पुलिस कल्याण लोधी के अंधे कत्ल की जांच कर ही रही थी कि 2 दिन बाद 29 अगस्त को सिविल लाइंस थाना क्षेत्र में गवर्नमेंट आर्ट ऐंड कामर्स कालेज के चौकीदार 60 साल के शंभुदयाल दुबे की हत्या हो गई. उस की हत्या सिर पर पत्थर मार कर की गई थी.

घटनास्थल पर जांच के दौरान पुलिस को शव के पास से एक मोबाइल मिला. पहले वह मोबाइल मृतक चौकीदार दुबे का माना जा रहा था, लेकिन बाद में पता चला कि वह मोबाइल कैंट थाना क्षेत्र के भैंसा के कारखाने में मारे गए चौकीदार कल्याण लोधी का है.

इस आधार पर पुलिस अधिकारियों को इस बात का पूरा भरोसा हो गया था कि दोनों वारदातों के पीछे एक ही हत्यारे का हाथ होगा.

दोनों अंधे कत्ल के खून की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि मोतीनगर थाना क्षेत्र के गांव रतौना में एक निर्माणाधीन मकान में चौकीदारी कर रहे 40 साल के मंगल अहिरवार पर जानलेवा हमला हो गया. मंगल की लाश के पास खून से सना फावड़ा मिला था, जिस के आधार पर माना जा रहा था कि मंगल की हत्या सिर पर फावड़ा मार कर की गई थी.

एक के बाद एक 3 वारदातों ने अमूमन शांत रहने वाले सागर शहर में दहशत का माहौल पैदा कर दिया था. हत्या करने वाले आरोपी का न कोई नाम था, न कोई सुराग. हत्याओं के पीछे का मकसद भी समझ नहीं आ रहा था. सुराग के नाम पर हाथ खाली थे, आरोपी को तलाशना भूसे के ढेर में सुई ढूंढने जैसी चुनौती थी.

मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल का शहर सागर वैसे तो झीलों और डा. हरिसिंह गौर सेंट्रल यूनिवर्सिटी जैसे शैक्षणिक संस्थान के लिए जाना जाता है, लेकिन अगस्त महीने के आखिरी 4 दिनों में हुई 3 सिक्योरिटी गार्डों की हत्याओं से सुर्खियों में आ चुका था. सागर में हुईं ये हत्याएं रात के एक निश्चित समय और एक ही पैटर्न से की गई थीं.

हत्या में किसी तरह की लूटपाट और किसी खास किस्म के हथियार का इस्तेमाल भी नहीं किया था. हत्या की कोई वजह सामने नहीं आ रही थी और न ही मरने वाले सिक्योरिटी गार्डों का आपस में कोई संबंध था. लिहाजा पुलिस का अनुमान था कि इन हत्याओं के पीछे किसी सीरियल किलर का हाथ हो सकता है.

पुलिस अधिकारियों की बढ़ गई चिंता

सागर जिले के एसपी तरुण नायक और एडिशनल एसपी विक्रम सिंह इन घटनाओं को ले कर खुद मोर्चे पर आ चुके थे. उन्होंने जिले की पुलिस फोर्स को मुस्तैद कर दिया था.

एसपी तरुण नायक ने चौकीदारों की सिलसिलेवार हत्या की वारदातों को अंजाम देने वाले आरोपी की गिरफ्तारी के लिए एएसपी विक्रम सिंह कुशवाहा, एएसपी ज्योति ठाकुर और सीएसपी (सिटी) के निर्देशन में पुलिस अधिकारियों की टीम बनाई. इस टीम में सिविल लाइंस टीआई नेहा सिंह गुर्जर, मोतीनगर टीआई सतीश सिंह, कैंट टीआई अजय कुमार सनकत, गोपालगंज टीआई कमलसिंह ठाकुर को शामिल किया.

एक के बाद एक हो रही चौकीदारों की हत्या को ले कर शहर में भी डर और दहशत का माहौल बन गया था. पुलिस रातरात भर गश्त कर पूरे शहर में तैनात सिक्योरिटी गार्डों को सचेत कर रही थी.

तीनों घटनाओं से जुड़े लोगों से पूछताछ और सीसीटीवी कैमरों की फुटेज के आधार पर पुलिस ने हत्यारे का स्कैच जारी कर शहर के लोगों को सावधान कर दिया था.

पुलिस के सामने सब से बड़ी चुनौती यह थी कि यदि एक व्यक्ति ही यह वारदात कर रहा है तो उस का अगला टारगेट अब कहां होगा. जैसेजैसे समय निकल रहा था, वैसेवैसे वारदात होने की आशंका बढ़ती जा रही थी.

पुलिस को किलर के अगली वारदात को अंजाम देने की चिंता ज्यादा थी. पुलिस टीमों ने शहर कवर कर लिया था, लेकिन टेंशन ग्रामीण इलाकों की थी. जांच के दौरान मिले साक्ष्यों और लोगों के अनुसार किलर का स्कैच जारी किया गया. इस के बावजूद आरोपी की न तो पहचान हुई और न ही उस के बारे में कोई सुराग मिल सका.

चौकीदार शंभुदयाल दुबे की हत्या की वारदात के बाद आक्रोशित ब्राह्मण समाज ने मकरोनिया चौराहे पर परिजनों की मौजूदगी में शव रख कर प्रदर्शन किया. शव को सड़क से हटाने की कोशिश के दौरान युवा ब्राह्मण समाज प्रदेश अध्यक्ष दिनकर तिवारी व प्रदर्शनकारियों की अधिकारियों व पुलिस से तीखी बहस भी हुई.

आक्रोश बढ़ता देख डीएम दीपक आर्य एवं नरयावली विधायक प्रदीप लारिया मौके पर पहुंचे और दुबे के परिवार को 4 लाख रुपए की आर्थिक मदद स्वीकृत करने के आश्वासन के साथ ही तात्कालिक सहायता के रूप में 50 हजार रुपए की राशि भी उपलब्ध कराई.

वहीं आउटसोर्स एजेंसी के माध्यम से परिवार के एक सदस्य को नौकरी दिलाने का भी वायदा किया. तब जा कर मृतक के घर वाले लाश को सड़क से हटाने को तैयार हुए.

काफी मानमनौवल के बाद चौकीदार शंभुदयाल दुबे का अंतिम संस्कार पुलिस बल की मौजूदगी में मकरोनिया के श्मशान घाट में किया गया.

भोपाल में मिली मोबाइल लोकेशन

तीसरे गार्ड की हत्या के बाद सागर से भोपाल तक हड़कंप मच गया. गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने सागर एसपी तरुण नायक से बात कर सीरियल किलर को जल्द पकड़ने के निर्देश दिए. लिहाजा पुलिस चारों तरह फैल गई.

श्रद्धा मर्डर केस : 35 टुकड़ों में बिखर गया प्यार – भाग 1

श्रद्धा की आंखों पर सूरज की रोशनी पड़ रही थी. वह सो रही थी. रोशनी से उस की नींद में खलल पड़ गई थी. तभी मां सुमन की आवाज सुनाई दी, ‘‘बेटी श्रद्धा, उठ भी जाओ. दिन काफी निकल आया है.’’

‘‘ममा! मैं ने कितनी बार कहा है कि खिड़की मत खोला करो, अभी थोड़ा और सो लेने दो,’’ श्रद्धा नाराज होती हुई अलसाई आवाज में बोली.

‘‘अब कितना सोएगी. दिन के 11 बजने वाले हैं.’’ सुमन बोलीं.

‘‘…तो क्या हुआ?’’ कच्ची नींद में ही करवट बदलती हुई श्रद्धा बोली.

‘‘तुम्हारे मोबाइल में मैसेज पर मैसेज आ रहे हैं. देखो, पता नहीं किस के हैं,’’ मां बोलीं.

‘‘लाओ, इधर दो मोबाइल. मैसेज पढ़ा तो नहीं?’’ श्रद्धा ने मैसेज के बारे में सुनते ही हड़बड़ा कर बैड पर बैठती हुई मां की ओर हाथ फैला दिया.

‘‘यह ले देख ले तू ही, पता नहीं तू कौन कौन सा ऐप चलाती है…बंबल लिखा आ रहा है,’’ मां बोलीं.

‘‘अरे ममा तुम क्या समझोगी बंबल क्या है? यही तो मेरा यार है, मेरा प्यार है.’’ श्रद्धा चहकती हुई बोली.

‘‘यार है, प्यार है, मतलब?’’ मां आश्चर्य से बोली.

‘‘मतलब यह ममा कि ये न्यू जनेरशन का डेटिंग ऐप है. तुम ने भी तो प्यार के लिए पापा संग डेटिंग की होगी. तब सिक्का डालने वाले फोन से होता था, अब मोबाइल ऐप से. जमाना बदल गया है न.’’

‘‘तू बेशरम होती जा रही है आजकल.’’

‘‘अच्छाअच्छा, एक कप कौफी तो पिला दो,’’ कहती हुई श्रद्धा मोबाइल के मैसेज पढ़ने लगी.

‘‘…पता नहीं आजकल की लड़कियों को सोशल साइट और ऐप की कैसी बीमारी लग गई है. जब देखो तब इसी में लगी रहती हैं.’’ बुदबुदाती हुई मां वहां से रसोई में चली गईं.

इधर मैसेज पढ़ रही श्रद्धा का चेहरा चमक उठा. उस ने तुरंत जवाबी मैसेज लिख डाला, ‘‘एस, मे बी सम लेट…बाहर ही इंतजार करना.’’

डेटिंग ऐप बंबल पर आया मैसेज उस के प्रेमी आफताब का था. वह हाल में ही उस के संपर्क में आई थी. श्रद्धा ने उस के फूड ब्लौग से प्रभावित हो कर इसी ऐप के जरिए उस से दोस्ती कर ली थी.

कुछ मैसेजिंग और फिजिकल डेटिंग में ही श्रद्धा को आफताब ने प्रभावित कर दिया था. उस के फेसबुक और इंस्टाग्राम पर भी अकाउंट थे, लेकिन डेटिंग के लिए बंबल का ही इस्तेमाल करता था. वह इस के जरिए मुंबई के मीटिंग पौइंट पर मिलने का समय तय करता था.

उस का पूरा नाम था आसिफ आफताब अमीन पूनावाला. वह एक शेफ और चर्चित फूड ब्लौगर था. हमेशा अपने ब्लौग ‘हंग्री छोकरो’ पर नईनई रेसिपी डालता रहता था. उस के चिकन करी रेसिपी की श्रद्धा दीवानी हो गई थी. उसे अपने घर में बनाना चाहती थी, लेकिन शाकाहारी मां की वजह से ऐसा नहीं कर पाती थी.

डेटिंग ऐप पर हुई थी दोस्ती

श्रद्धा मुंबई के मलाड के एक कालसेंटर में काम करने वाली 24 साल की युवती थी. एकदम से बिंदास अंदाज वाली लड़की. बेधड़क और मुंहफट. मांबाप के सामने भी कुछ भी बोलने से जरा भी नहीं हिचकती थी. अपने अधिकार के लिए उन से भी लड़ पड़ती थी. बातबात पर उन्हें एहसास दिलाती रहती थी कि वह अब बालिग हो गई है. अपनी जिंदगी का फैसला खुद लेने से कोई नहीं रोक सकता.

दुनिया भर की रेसिपी का मास्टरमाइंड आफताब उस के दिल में उतर चुका था. यह बात साल 2018 के मध्य की है. श्रद्धा प्यार की भूखी थी. उस के मातापिता के बीच मतभेद हो चुका था, जिस के चलते वह 2016 से ही मुंबई में इलैक्ट्रौनिक्स कारोबारी पिता विकास मदन वाकर से अलग हुई मां के साथ मलाड में रह रही थी.

श्रद्धा के घर से मात्र 3 किलोमीटर की दूरी ही आफताब पालघर के वसई स्थित हाउसिंग सोसाइटी में रहता था. उस की बिल्डिंग का नाम यूनिक था, जिस के 301 नंबर फ्लैट में आफताब का परिवार रहता था. श्रद्धा उस से कई बार मिलने भी जा चुकी थी.

उस की बात पिता से बहुत कम हो पाती थी. मांबाप की परवरिश में उसे प्यार के रूखेपन की अनुभूति भी होती थी. जब उस की मुलाकात आफताब से हुई, तब उस की बातों और व्यवहार में उसे ताजे प्यार की खुशबू का एहसास हुआ था. …और वह उस ओर खिंचती चली गई थी.

जल्द ही इस की जानकारी उस की मां को हो गई. उन्होंने सिरे से आपत्ति जताई कि वह उस की जाति तो दूर समान धर्म का भी नहीं है. इसलिए उस के साथ दोस्ती भी ठीक नहीं, प्यारमोहब्बत तो काफी दूर की बात है.

इस बारे में सुमन ने श्रद्धा को काफी समझाया, किंतु श्रद्धा पर इस का कोई असर नहीं हुआ. उस की आफताब के साथ डिजिटल डेटिंग भी चलती रही और मुंबई में मिलनाजुलना भी होता रहा.

मां ने जब काफी विरोध किया और बात पिता तक जा पहुंची, तब श्रद्धा ने मां से खुलेआम विरोध जता दिया. वह आफताब के प्यार में अंधी हो चुकी थी. उसे अपना भविष्य और करिअर सिर्फ और सिर्फ प्रेमी आफताब में दिख रहा था. श्रद्धा से आफताब ने भावनात्मक दोस्ती कर ली थी. फिर दोनों ने तय किया कि लिवइन में रहेंगे. साल 2019 से दोनों लिवइन में रहने लगे. इस के लिए मलाड में ही किराए का एक कमरा ले लिया. मकान मालिक को उन्होंने पतिपत्नी बताया था.

यह श्रद्धा की मां सुमन को पता चली तो उन्होंने विरोध जताया तब श्रद्धा ने दोटूक जवाब दे दिया, ‘‘मैं 24 साल की हो गई हूं और मुझे अपने फैसले लेने का पूरा अधिकार है. मुझे आफताब  के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहना है. मैं आज से आप की बेटी नहीं, समझो.’’

यह बात कह कर श्रद्धा जब अपने घर से सामान ले कर जाने लगी थी, उस वक्त उस के पिता भी आए हुए थे. उसे मातापिता ने काफी समझाया था, लेकिन वह नहीं मानी. दोनों एक साथ लिवइन में रहने लगे. इधर, मांबाप परेशान. उन्हें बेटी के बारे में वाट्सऐप स्टेटस, फेसबुक और इंस्टाग्राम के जरिए ही पता चल पाता था.

बेटी के गम में मां भी चल बसी

इस तरह एक साल का समय निकल गया. श्रद्धा की मां सुमन परेशान रहने लगीं. श्रद्धा ने मां को दोटूक सुना दिया था. सुमन अपनी बेटी के फैसले के आगे विरोध जताने की स्थिति में नहीं थीं. वह उस के स्वभाव से अच्छी तरह से वाकिफ थीं. आखिरकार श्रद्धा ने प्यार की खातिर अपने मांबाप की परवरिश को छोड़ दिया.

सुमन अब अपने फ्लैट में अकेली रह गई थीं. उन की जिंदगी नौकरानी के भरोसे चल रही थी. बीमार भी रहती थीं. वैसे बीचबीच में श्रद्धा मां से फोन पर बात कर हालचाल ले लिया करती थी.