True Crime Story: दगाबाज महबूबा

True Crime Story: औरत अगर चरित्रहीन हो तो   बसेबसाए घर उजड़ जाते हैं. एक नहीं, कई जिंदगियां बरबाद हो जाती हैं. ऐसे में औरत तो परेशान होती ही है, ससुराल के ही नहीं,  मायके वाले भी दुखी होते हैं. मुराद अली से मेरी अच्छी दोस्ती थी. उस दिन वह अपने साथ अपने दोस्त नादिर अली को ले कर मेरे पास आया था. वह बड़ा परेशान था. मेरे पूछने

पर मुराद अली ने बताया, ‘‘वाकया नादिर अली के बड़े भाई कादिर अली के साथ हुआ है. इन दोनों भाइयों की खालिद रोड पर साझे में टायरों की काफी बड़ी दुकान है. कल कादिर अली को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है.’’

‘‘किस जुर्म में गिरफ्तार किया है?’’ मैं ने पूछा तो वह बोले, ‘‘उन्हें उन की एक्स वाइफ के कत्ल के इलजाम में गिरफ्तार किया गया है. फिलहाल वह रिमांड पर पुलिस कस्टडी में हैं.’’

‘‘कादिर अली की एक्स वाइफ के बारे में कुछ बताइए?’’ मैं ने नादिर अली से पूछा.

‘‘उस का नाम लुबना था. उस औरत ने भाईसाहब को जिंदगी भर दुख दिए और मरने के बाद भी उन्हें मुसीबत में डाल गई. तलाक भी एक तरह से उस ने जबरदस्ती लिया. उस ने एक ऐसा नाटक खेला था कि भाई को मजबूरन उसे तलाक देना पड़ा. बाद में तलाक को कानूनी हैसियत भी मिल गई. यह सब एक सोचीसमझी साजिश के तहत हुआ था. बेहद मक्कार और शातिर औरत थी वह.’’ नादिर अली ने नफरत से कहा.

‘‘तलाक वाली बात कितना अरसा पहले की है?’’

‘‘यह मई चल रहा है, तलाक जनवरी में हुआ था. भाई अच्छेखासे अपनी बेटी आरिफा के साथ रह रहे थे कि यह आफत गले पड़ गई.’’

‘‘आरिफा अपनी मरजी से बाप के साथ रह रही थी?’’

‘‘हां, उन की बेटी आरिफा 15 साल की है, वह बेटी की वजह से मजबूर थे. इसलिए अपनी बीवी लुबना की आवारगी और ज्यादती को जहर की तरह गले उतारते रहे. लेकिन जब लुबना ने सारी हदें पार कर दीं, वह भी सिर्फ भाई से जान छुड़ाने के लिए तो उन्होंने भी देर नहीं की और उस शातिर औरत को अपनी जिंदगी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. उन की बेटी आरिफा काफी समझदार है, वह मां की चालों और चरित्रहीनता को समझ गई थी. इसलिए उस ने खुद बाप के साथ रहने का फैसला किया था.’’

मुराद अली ने थोड़ा रुक कर कहा, ‘‘वकील साहब, तलाक वाली रात उन के घर में जिस तरह का तमाशा हुआ था, उस ने आरिफा को पूरी तरह मां के खिलाफ कर दिया था. उस ने बड़े सही वक्त पर सही फैसला लिया था.’’

‘‘तलाक का मंसूबा और तलाक वाली रात हुए ड्रामे की बात मैं कुछ समझ नहीं पाया. यह एक नहीं, दो बातें हैं?’’ मैं ने पूछा तो नादिर अली ने हिचकिचाते हुए कहा, ‘‘बताने में शरम आ रही है, पर आप भाई का केस लड़ रहे हैं, इसलिए बताना जरूरी है. ज्यादा डिटेल तो मैं नहीं जानता, पर मुझे जो पता है, बताए देता हूं.’’

उस ने बताया, ‘‘लुबना काफी दिनों से इस कोशिश में थी कि भाई उसे छोड़ दें, ताकि वह मनमाने ढंग से अय्याशी कर सके, पर भाईजी उस की हर ज्यादती सहते रहे. यह देख कर वह नीचता पर उतर आई और उस ने भाई के लिए एक जाल बुना. वह अपनी इंसानी कमजोरी के चलते उस में फंस गए और फिर उन के पास तलाक के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा.’’

‘‘जब कोई औरत छुटकारा पाने के लिए साजिश रचती है तो उस के पीछे कोई न कोई मकसद तो होना चाहिए. उस का क्या मकसद था?’’ मैं ने पूछा तो वह उत्तेजित हो कर बोले, ‘‘मकसद था जनाब, बड़ा बेशरमी भरा मकसद था. वह मेरे भाई की बीवी होने के बावजूद एक गैर इंसान से ताल्लुक बनाए हुए थी. उस से शादी करना चाहती थी. उस मरदूर का नाम जमाल बेरी है.

‘‘भाई को जब इस बात का पता चला तो उन्हें बहुत गुस्सा आया. उन्होंने उसे रोकने की कोशिश की तो वह नएनए हथकंडे अपनाने लगी, ताकि भाई तंग आ कर उसे छोड़ दें. जब पानी सिर से गुजर गया तो मजबूरन उन्हें लुबना को तलाक देना पड़ा. तलाक पाने के लिए उस ने घर की मुलजिमा रशना का इस्तेमाल किया था.’’

‘‘यानी लुबना ने भाई से तलाक ले कर जमाल से शादी कर ली. इस तरह उस का मकसद पूरा हो गया?’’

‘‘नहीं, पिछले दिनों उन की मंगनी की खबर सुनी थी, अगर वह जिंदा रहती तो शादी भी हो जाती.’’ नादिर अली ने कहा.

कुछ और बातें पता कर के मै ंने फीस ली और उन्हें तसल्ली दे कर विदा कर दिया. पुलिस ने मुलजिम कादिर अली को अदालत में पेश कर के 7 दिनों का रिमांड लिया था. शाम को मैं थाने पहुंच गया. कादिर अली को देख कर मैं चौंका, क्योंकि उस का चेहरामोहरा नािदर अली से काफी मिलता था, उम्र में वह जरूर 2-4 साल बड़ा रहा होगा. वह उदास और परेशान था. यह जान कर कि मैं उन का वकील हूं, उन्होंने कहा, ‘‘बेग साहब, मैं बैठेबिठाए इस मुसीबत में फंस गया हूं, मेरा कहीं कोई कसूर नहीं है.’’

‘‘आप को पूरा यकीन है कि आप पूरी तरह निर्दोष हैं?’’

‘‘जी हां, वकील साहब, मुझे जानबूझ कर फंसाया गया है, मैं बेकसूर हूं.’’

‘‘अगर आप बेकसूर है तो आप जरूर इस केस से बाइज्जत बरी हो जाएंगे, यकीन रखिए. अगले 20 मिनट तक मैं उन से केस से संबंधित सवालजवाब करता रहा. उन्होंने मुझे कई सनसनीखेज बातें बताईं. वकालतनामे पर साइन ले कर मैं ने उन्हें सारी बातें समझा दीं कि वह पुलिस वालों की कोई पेशकश कबूल न करें और न ही उन की कोई मांग मानें. बस मजबूती से अपने बयान पर टिके रहें.’’

रिमांड खत्म होने के बाद पुलिस ने अदालत में चालान पेश कर दिया. इसी पेशी पर मैं ने अपने वकालतनामे के साथ मुलजिम की जमानत की अरजी पेश कर दी, ‘‘जनाबेआला, मेरा मुवक्किल एक बाइज्जत शहरी है. उस का रिकौर्ड बिलकुल साफ है. उसे इस केस में जबरन फंसाया गया है. उस की जमानत की अरजी मंजूर की जाए.’’

इस्तेगासा के वकील ने कहा, ‘‘वारदात के वक्त मुलजिम को मकतूल के फ्लैट में जाते और आते देखा गया था. इस का एक गवाह भी मौजूद है. साथ ही मौकाएवारदात पर मुलजिम की मौजूदगी के निशान भी पाए गए हैं. जबकि कुछ अरसा पहले मुलजिम के मकतूल के ताल्लुकात खतम हो चुके थे?’’

इसी तरह बहस चलती रही. कत्ल के मुलजिम को जमानत वैसे भी मुश्किल से मिलती है, इसलिए बहुत जोर देने पर भी कादिर अली की जमानत नहीं हो सकी. अदालत ने 15 दिनों बाद की तारीख दे कर मुलजिम को जेल भेज दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, लुबना की मौत 9 मई की रात 8 से 9 बजे के बीच हुई थी. एक तेजधार वाला खंजर उस के सीने में उतार दिया गया था. मौत की वजह वही खंजर था. जब उस पर हमला किया गया था, वह नशे में थी. मारने से पहले उसे कोई ऐसी नशीली दवा दी गई थी, जिस से नींद आती है. मेरे पास 15 दिनों का समय था. मैं ने दौड़भाग कर के सार सबूत जुटा लिए, जो आप को अदालती काररवाही के दौरान पता चलेंगे.

अगली पेशी पर अदालत की काररवाही शुरू हुई तो जज ने जुर्म पढ़ कर सुनाया. मेरे मुवक्किल ने कत्ल के जुर्म से साफ इनकार कर दिया. इस के बाद मुलजिम का बयान दर्ज किया गया. वकील ने जिरह शुरू की, ‘‘मकतूल, जो पहले तुम्हारी बीवी थी और तुम्हारे व्यवहार से बहुत परेशान थी?’’

वह कुछ और पूछता मेरे मुवक्किल ने कहा, ‘‘वह मेरी बीवी जरूर थी, लेकिन मेरे व्यवहार से बिलकुल परेशान नहीं थी.’’

‘‘उस ने तुम से परेशान हो कर ही सहारा ढूंढ़ कर तलाक लिया था?’’

‘‘उस ने मुझ से तलाक जरूर लिया था, पर व्यवहार मेरा नहीं, उस का खराब था. वह मुझ से ठीक से बात तक नहीं करती थी, मेरे जज्बातों और मेरी जरूरतों की उसे जरा भी परवाह नहीं थी. जवान बेटी के सामने मैं उसे कुछ कह भी नहीं सकता था, इसलिए उस की हर ज्यादती चुपचाप बरदाश्त करता रहा. लेकिन जब पानी सिर के ऊपर से गुजर गया तो मुझे अपना रास्ता अलग करना पड़ा. जब तक वह मेरी बीवी थी, मैं ने उस पर अंधा यकीन किया. मैं जमाल को उस का बौस समझता रहा. मुझे तो बाद में पता चला कि उस का जमाल से अफेयर चल रहा था और वह उस से शादी करना चाहती थी.’’

वकील इस्तेगासा ने जख्मों पर नमक छिड़कते हुए कहा, ‘‘इस का मतलब यह सच है कि तुम्हारी बीवी का जमाल से इश्क चल रहा था और वह जल्दी ही उस से शादी करना चाहती थी. उन की मंगनी भी हो गई थी. उस की मौत से तो तुम्हें खुशी हुई होगी?’’

‘‘इस में खुश होने की क्या बात है? जो औरतें अपना घर उजाड़ कर गलत राह पर चलती हैं, उन का यही अंजाम होता है. मुझे बिलकुल नहीं पता कि उस का किस ने, क्यों और कैसे कत्ल किया?’’

‘‘क्या तुम 9 मई यानी कत्ल वाली रात मकतूल के फ्लैट पर उस से मिलने नहीं गए थे?’’

‘‘रात को नहीं, शाम 7 बजे 5 मिनट के लिए मैं उस के फ्लैट पर उस की अमानत लौटाने गया था. वह अमानत क्या थी, यह मैं बताना नहीं चाहता.’’

इस्तेगासा वकील ने 2-4 सवाल और पूछ कर अपनी जिरह खत्म कर दी.

अब मेरी बारी थी. मुझे इस तरह से सवाल करने थे कि कादिर अली की बेगुनाही साबित हो जाए. मैं ने पूछा, ‘‘आप की शादी को कितना अरसा हुआ होगा, क्या आप दोनों में शुरू से ही अनबन थी?’’

‘‘मेरी शादी को 16 साल हो गए हैं. शुरू में तो सब ठीक रहा. इधर 2, ढाई साल से लुबना के व्यवहार में बदलाव आना शुरू हुआ था. वह मुझ से दूर रहने लगी थी और ज्यादा से ज्यादा समय घर से बाहर गुजारने लगी थी. उस ने मेकअप आर्टिस्ट की हैसियत से एक आर्ट एकेडमी जौइन कर ली.’’

‘‘कैसी आर्ट एकेडमी, क्या इस में आप की मरजी शामिल थी?’’

‘‘वह आर्ट एकेडमी ऐक्टिंग, मौडलिंग, संगीत आदि की ट्रेनिंग दे कर शौकीन लोगों को अदाकार बनाती है. उस का नाम है परफौरमैंस. लुबना ‘परफौरमैंस’ में मेकअप आर्टिस्ट के रूप में काम करने लगी थी. जबकि यह मुझे बिलकुल पसंद नहीं था. पर उस की लगातार जिद के आगे मैं मजबूर था.

इस की वजह यह थी कि मै ंने सुन रखा था कि ऐसी जगहों पर बहुत ज्यादा आजादी और बेशरमी होती है, वहां सारे गलत काम होते हैं. काश मैं ने इजाजत न दी होती.’’

‘‘क्या यह वही एकेडमी है, जिस का मालिक जमाल बेरी है?’’

‘‘जी हां, परफौरमैंस का मालिक जमाल ही है.’’

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि लुबना का अफेयर अपने बौस से चल रहा था और आप से तलाक के बाद उस ने उस से मंगनी कर ली थी.’’

‘‘जी हां, परफौरमैंस की नौकरी के बाद ही लुबना बदल गई और मेरी जिंदगी में यह तबाही आई.’’

‘‘दोनों शादी करते, उस के पहले ही लुबना का कत्ल हो गया. अब मैं कुछ निजी सवाल पूछना चाहता हूं, जो बहुत जरूरी हैं, आप उन पर माइंड मत कीजिएगा. मकतूल और जमाल के अफेयर के बारे में आप को पता था?’’

‘‘नहीं, यह मुझे बहुत बाद में तब पता चला कि जब वह तलाक के लिए ड्रामा करने लगी यह सारी चाल जमाल के लिए चली गई थी.’’

‘‘क्या लुबना रात को देर से घर आती थी?’’

‘‘वह अकसर एकेडमी से रात को घर आती थी. मैं ने बहुत समझाया, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ. मैं ने उसे एकेडमी छोड़ने को कहा तो उस ने साफ मना कर दिया. इधर वह मेरी कोई बात नहीं मानती थी.’’

‘‘इस का मतलब मकतूल आप को शौहर नहीं मानती थी? आप ने उसे सख्ती से नहीं रोका?’’

‘‘कैसे रोकता? उस ने मुझे धमकी दी कि अगर ज्यादा रोकटोक की तो वह आर्ट एकेडमी में ही रहने लगेगी. उस समय मेरी बेटी भी मां की हमदर्द थी.’’

‘‘क्या आप अपनी बीवी की धमकी से डर गए थे?’’

‘‘जी, मैं शरीफ आदमी हूं. ऐसे हथकंडों से डर गया था. वैसे भी हम अजनबियों की तरह एक छत के नीचे रह रहे थे.’’

‘‘क्या आप दोनों के बीच मियांबीवी वाला रिश्ता नहीं रह गया था? जहां तक मुझे जानकारी है कि आप दोनों के बैडरूम अलगअलग थे?’’

‘‘आप ठीक कह रहे हैं. हमारे बीच मियांबीवी वाला रिश्ता खत्म हो चुका था. 2, ढाई साल से हमारे बैडरूम भी अलगअलग थे. लुबना मुझे शौहर नहीं मानती थी. मैं ने कभी उस के करीब जाना चाहा तो उस ने बेरुखी से झिड़क दिया. अब उसे मेरी निकटता की कोई जरूरत नहीं रह गई थी. हमारे बीच प्यारमोहब्बत का कोई रिश्ता नहीं बचा था. उस ने साफ कह दिया था कि वह मुझ से नफरत करती है. गुस्सा तो मुझे बहुत आता था, लेकिन बेटी की वजह से मैं खामोश रहता था. मैं उसे तलाक दे कर आजाद नहीं छोड़ना चाहता था.’’

‘‘फिर ऐसा क्य हुआ कि आप ने उसे तलाक दे दिया?’’

‘‘लुबना ने परफौरमैंस एकेडमी में स्टार बनने आई एक लड़की रशना को हमारे घर में केयरटेकर के रूप में रखवा दिया. रशना काफी खूबसूरत और जवान थी. पर वह उन लोगों में से थी, जो अपनी मंजिल पाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं.

‘‘लुबना ने शायद उस से कहा था कि अगर वह कुछ दिनों तक उस के घर पर काम करेगी तो वह उसे स्टार बना देगी. यह मुझे बाद में पता चला कि लुबना उसे अपना ‘खास मकसद’ पूरा करने के लिए योजना बना कर हमारे घर लाई थी.

‘‘यह सब मुझे पता नहीं था. मैं तो उसे केयरटेकर ही समझता रहा. खैर मैं उसे रखने के सख्त खिलाफ था, लेकिन लुबना का कहना था कि वह एकेडमी में बहुत मसरूफ रहती है, इसलिए घर की देखभाल के लिए किसी का होना जरूरी है. उस ने जिद कर के रशना को रखवाया था.’’

मैं ने देखा, जज बड़ी दिलचस्पी से कादिर अली की बरबादी की दास्तान सुन रहे थे. इस्तेगासा वकील भी औब्जेक्शन कहना भूल सा गया था. अदालत में भी खामेशी और उत्सुकता थी.

कादिर अली ने बात आगे बढ़ाई, ‘‘रशना 25 साल की खूबसूरत व स्मार्ट लड़की थी, वह कपड़े भी स्टाइल वाले पहनती थी. लुबना ने उसे मेकअप करने में भी एक्सपर्ट कर दिया था. वह लुबना द्वारा तैयार की गई स्क्रिप्ट के अनुसार कदमदरकदम बढ़ रही थी. उसे आए महीना भी नहीं गुजरा था कि एक दिन वह अपने मकसद में कामयाब हो गई.

‘‘लुबना ने जानबूझ कर आरिफा को अपनी बहन के घर भेज दिया था. उस रात मैं और रशना घर में अकेले थे. लुबना एकेडमी से लौटी नहीं थी. रशना ने आकर्षित करने वाला खुला लिबास पहना था और जानबूझ कर वह बारबार मेरे करीब आने की कोशिश कर रही थी. मैं भी इंसान हूं, कोई फरिश्ता नहीं. बीवी के साथ को तरसा हुआ था. जब एक भूखे इंसान के सामने सजीसजाई थाली रख दी जाए तो वह कहां तक खुद को रोकेगा? उसे लालच आ ही जाएगा.’’

‘‘आप सही कह रहे हैं, एक तो आप अपनी बीवी की बेरुखी के सताए थे, दूसरी तरफ प्यार भरे इसरार पर आप का फिसलना कुदरती था.’’ मैं ने उसे स्पोर्ट किया.

‘‘लुबना ने मुझे बदनाम व रुसवा करने का पूरा मंसूबा बना लिया था. वह हम दोनों को रंगेहाथों पकड़ना चाहती थी. संयोग था कि मैं उस दलदल में फंसने से बच गया. वह मेरे एकदम करीब आ गई थी, लेकिन अचानक मेरा जमीर जाग उठा, मैं ने जैसे ही झटके से उस से अलग हुआ, उसी समय लुबना चुपके से आ कर चीखनेचिल्लाने लगी.

‘‘हम दोनों बुरी तरह से बौखला उठे. बाद में पता चला कि रशना का बौखलाना भी ऐक्टिंग था. वह लुबना के पास जा कर कहने लगी, ‘‘साहब मुझ से जबरदस्ती कर रहे थे. सही वक्त पर आ कर आप ने मुझे बचा लिया?’’

लुबना ने फटाफट फोन कर के 6-7 लोगों को बुला लिया. आने वालों में उस की बहनें, आरिफा, एकेडमी का उस का असिस्टैंट उबेद जामी और रशना का बूढ़ा शराबी बाप भी शामिल था. लुबना चीखचीख कर कह रही थी, ‘‘मैं ऐसे चरित्रहीन आदमी के साथ कतई नहीं रह सकती. मुझे अभी तलाक चाहिए.’’

‘‘उस के साथ अन्य लोग भी मुझे ही बुराभला कहने लगे. मैं लुबना के खेल को समझ गया था, इसलिए मैं ने उसे उसी समय तलाक दे दिया. मेरी बेटी आरिफा भी मां की चाल समझ गई थी, क्योंकि रशना को उस ने जिद कर के घर में रखवाया था, इसलिए आरिफा ने भी मेरे साथ रहने का फैसला किया.’’

‘‘तो यह है आप की दुखभरी कहानी, जिस ने आप की जिंदगी बरबाद कर दी. लुबना को आप ने तलाक दे दिया, आरिफा आप के साथ रहने लगी, लेकिन रशना का क्या हुआ?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं ने उसे उसी समय घर से निकाल दिया. अब वह कहां है, मुझे मालूम नहीं.’’

मेरे सवालों से सारा मामला अदालत के सामने आ गया था. रशना के उस शर्मनाक ड्रामे में जमाल और लुबना की मिलीभगत थी, जिस की स्क्रिप्ट जमाल ने लिखी थी और डायरेक्शन लुबना का था.

मैं ने जिरह आगे बढ़ाई, ‘‘कादिर अली साहब, आप ने जनवरी में लुबना को तलाक दिया, उस के एक, डेढ़ महीने बाद ही उस ने मंगनी कर ली. मई में उस का कत्ल हो गया. इस से एक बात यह सामने आती है कि कोई ऐसा था, जो लुबना और जमाल की शादी से खुश नहीं था या वह खुद लुबना में रुचि ले रहा था. मंगनी के बाद उस ने नाराज हो कर उस का कत्ल कर दिया. यह सब तलाश करना पुलिस और अदालत का काम है.

‘‘आप ने इस्तेगासा की जिरह में बताया था कि आप कत्ल की शाम लुबना को उस की अमानत लौटाने गए थे. क्या आप उस के फ्लैट पर गए थे, जहां वह आप से अलग होने के बाद रह रही थी? वह फ्लैट जमाल बेरी का है, जहां वह अकसर लुबना से मिलने आया करता था. आप मुझे यह बताइए कि आप उस की कौन सी अमानत लौटाने गए थे?’’

‘‘वकील साहब, आप पूछ रहे हैं तो मुझे बताना ही पड़ेगा. एक दिन मैं सफाई कर रहा था तो मुझे मेज की दराज से एक ब्राउन रंग का लिफाफा मिला, जिस में लुबना के कुछ कागजात थे. साथ ही 20 हजार रुपए का एक क्रौस किया चेक था, जो मैं ने ही लुबना को एक बार दिया था. मै ंने यह बात आरिफा को बताई तो उस ने कहा कि वह ब्राउन लिफाफा चेक समेत लुबना तक पहुंचा देना चाहिए. इसलिए मैं उस शाम आरिफा और उस की दोस्त सबा के साथ लुबना के फ्लैट पर गया और उसे लिफाफा दे कर 5 मिनट में लौट आया.’’

‘‘क्या आरिफा और उस की दोस्त भी तुम्हारे साथ लुबना के फ्लैट पर गई थीं?’’

‘‘नहीं, आरिफा और उस की दोस्त नीचे गाड़ी में बैठी थीं. मैं नहीं चाहता था कि मांबेटी का सामना हो, इसलिए मैं उसे साथ नहीं ले गया था.’’

‘‘क्या आप वहां से सीधे घर आ गए थे?’’

‘‘नहीं, दरअसल उस दिन रौयल होटल में पैंटिंग्स की नुमाइश लगी थी. मेरी बेटी आरिफा और उस की दोस्त सबा फाइन आर्ट की उस एग्जीविशन को देखना चाहती थीं, जिस का टाइम 7 से 10 बजे तक था.

चूंकि समय हो चुका था, इसलिए मैं फटाफट लुबना को लिफाफा दे कर नीचे आ गया और आरिफा तथा सबा को ले कर रौयल होटल चला गया. 7 बज कर 20 मिनट पर मैं होटल पहुंच गया था.’’

‘‘नुमाइश का समय 7 बजे से 10 बजे तक था. आप उन दोनों को छोड़ कर वापस आ गए होंगे?’’

‘‘नहीं साहब, उन की जिद पर मुझे भी उन के साथ पैंटिंग्स की एग्जीविशन देखनी पड़ी थी?’’

‘‘इस का मतलब आप वारदात के दिन शाम सवा सात बजे से 10 बजे तक रौयल होटल में नुमाइश देख रहे थे?’’

‘‘जी जनाब, उस दिन 7 बज कर 20 मिनट से रात 10 बजे तक मैं नुमाइश देखता रहा.’’

इस का मतलब उस दिन आप लुबना के फ्लैट से काफी दूर होटल रौयल में नुमाइश में थे?

‘‘जी जनाब.’’

इस के बाद मैं ने जिरह खत्म कर दी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, लुबना का कत्ल 9 मई को रात 8 से 9 बजे के बीच हुआ था. जबकि उस वक्त मेरा क्लाइंट घटनास्थल से काफी दूर होटल रौयल में था. इसलिए वह कत्ल नहीं कर सकता था. एक हिसाब से केस यहीं खत्म हो जाना चाहिए था, पर अभी कई सवाल बाकी थे. इस्तेगासा का पहला गवाह अमजद था. उस की फ्लैट के सामने दरजी की दुकान थी. उस ने अपने बयान में कहा कि उस ने मुलजिम को मकतूल के फ्लैट में जाते और निकलते देखा था. 1-2 सवाल पूछ कर इस्तेगासा वकील ने अपनी जिरह खत्म कर दी.

अपनी बारी पर मैं ने उस से पूछा, ‘‘आप की दुकान मकतूल के फ्लैट के काफी करीब है, जैसा आप ने कहा है. क्या आप मकतूल और उस के मुलाकातियों को जानते थे?’’

‘‘मकतूल 3-4 महीने पहले ही वहां रहने आई थी. 1-2 बार वह मेरी दुकान पर भी आई थी. उन के मुलाकातियों में जमाल साहब को ही मैं ने देखा था.’’

‘‘क्या आप जमाल को जानते हैं?’’

‘‘जी, क्योंकि उस फ्लैट के मालिक वही हैं.’’

‘‘वारदात के दिन छुट्टी थी. सभी दुकानें बंद थी, फिर आप की दुकान कैसे खुली थी?’’

‘‘मुझे इमरजेंसी में शादी के कपड़े देने थे.’’

‘‘आप ने मुलजिम को बिल्डिंग में जाते देखा था, पर यह कैसे कह सकते हैं कि वह मकतूल के फ्लैट में ही गया था? क्या आप ने उस का पीछा किया था?’’

‘‘नहीं, मैं ने पीछा नहीं किया था. सभी कह रहे हैं कि वह मकतूल के फ्लैट में गया था, इसलिए मैं भी कह रहा हूं.’’

‘‘मैं सब की बात नहीं, आप की बात कर रहा हूं. आप को कैसे पता चला कि वह मकतूल के फ्लैट गया था?’’

‘‘मुझे यह बात जमाल बेरी साहब ने बताई थी कि मुलजिम का नाम कादिर अली है और वह मकतूल से मिलने उस के फ्लैट पर आया था.’’

‘‘यह बात जमाल ने आप को कब बताई थी?’’

‘‘वारदात वाले दिन रात साढ़े 10 बजे. वह आए और फ्लैट में गए. घबरा कर वापस आए और मुझे बताया कि लुबना को किसी ने खंजर घोंप कर मार दिया है. इस के बाद कादिर अली का हुलिया और गाड़ी की पहचान बता कर पूछा कि इस तरह का कोई आदमी तो नहीं आया था? मैं ने ‘हां’ कहा तो उन्होंने कहा कि उसी कादिर अली ने लुबना का कत्ल कर दिया है.’’

उस ने इस बात को माना कि जमाल ने उसे तफ्सील से बताया तो उस ने ‘हां’ कहा था. अगली पेशी पर मामले की जांच करने वाला अफसर फजल शाह था. मैं ने पूछा, ‘‘आप को वारदात की खबर कब और किस ने दी थी?’’

‘‘मुझे जमाल बेरी ने रात 11 बजे वारदात की खबर दी थी. इस के बाद मैं करीब पौने 12 बजे मकतूल के फ्लैट पर पहुंचा था.’’

‘‘उस समय जमाल वेरी फ्लैट पर मौजूद था?’’

‘‘जी हां, जमाल वहां मौजूद था और उस ने टेलर अमजद को भी रोक रखा था.’’

‘‘क्या यह सच है कि जमाल ने ही आप से कहा था कि कादिर अली ने ही यह हत्या की है?’’

‘‘जी हां, जमाल ने ही कादिर अली की तरफ इशारा किया था. फिर मैं ने अमजद का बयान लिया. उस ने भी कहा कि कादिर अली को मकतूल के फ्लैट में जाते उस ने देखा था. टाइम का सही अंदाजा उसे नहीं था.’’

‘‘क्या आप यह बताना चाहेंगे कि जमाल बेरी ने यह कैसे तय कर लिया कि कत्ल कादिर अली ने ही किया था, क्या उस के पास कोई ठोस सबूत था?’’

‘‘जी हां, मकतूल के पास एक ब्राउन लिफाफा रखा मिला था, जिस में कादिर अली का दिया 20 हजार का चेक था.’’

‘‘यह वही लिफाफा तो नहीं, जिस की जिक्र मेरी जिरह में आ गया है?’’

‘‘जी हां, वह वही लिफाफा था.’’

‘‘जब आप वहां पहुंचे तो आप ने क्या देखा?’’

‘‘मकतूल बिस्तर पर मरी पड़ी थी. उस के सीने में खंजर घोंपा हुआ था. लगता था, उस ने बचने के लिए कोई संघर्ष नहीं किया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उस ने नशे की कोई दवा ली थी. सब चीजें अपनी जगह पर सुरक्षित थीं.’’

‘‘खंजर पर फिंगरप्रिंट मिले थे?’’

‘‘नहीं, मुलजिम ने चालाकी से प्रिंट साफ कर दिए थे.’’

‘‘कमरे के किसी हिस्से में भी मुलजिम के फिंगरप्रिंट नहीं मिले?’’

‘‘जी नहीं, कमरे में कहीं अंगुलियों के निशान नहीं मिले.’’

‘‘क्या कमाल की बात है. मुलजिम के पास इतना समय था कि अंगुलियों के निशान साफ कर वह समय पर रौयल होटल भी पहुंच गया.’’

‘‘हो सकता है, आप का क्लाइंट झूठ बोल रहा हो? वह वहां ज्यादा देर रुका हो.’’

‘‘एक बात सोच कर बताइए, आप के सामने मुलजिम ने दुखभरी कहानी सुना दी, सारे हालात बता दिए कि किस वजह से किस परिस्थिति में तलाक हुआ. क्या इस सब के बाद भी आप यह उम्मीद करते हैं कि मकतूल फ्लैट का दरवाजा खोल कर मुलजिम को अपने बैडरूम में ले जाएगी. जिस से वह सख्त नफरत करती थी, कभी नहीं ले जाएगी न? इस का मतलब साफ है कि जिस ने मकतूल का कत्ल किया है, वह उस का भरोसे का आदमी था. वह उसे तनहाई में अपने बैडरूम में ले गई. मेरा मुवक्किल वह आदमी नहीं हो सकता. आप क्या कहते हैं?’’

‘‘तो फिर ऐसा शख्स कौन हो सकता है?’’

‘‘यह पता लगाना आप का काम है, मेरा काम खत्म हुआ.’’

अगली पेशी पर विटनेस बौक्स में मकतूल का मंगेतर आर्ट एकेडमी का मालिक जमाल बेरी था.

इस्तगासा वकील की जिरह में कोई खास बात निकल कर सामने नहीं आई. जमाल बेरी ने जो बातें अपने बयान में कही थीं, वही रिपीट हुईं. उस के बाद मैं ने जिरह शुरू की. पहले मैं ने उस की मंगेतर की मौत पर दुख का इजहार किया. उस के बाद पूछा, ‘‘आप ने परफौरमैंस एकेडमी खोलने से पहले इस का कोई कोर्स किया था?’’

‘‘मैं ने कोई कोर्स तो नहीं किया, पर मैं स्टेज करता था और इस का तजुर्बा रखता हूं.’’

‘‘यानी आप के पास अच्छी तालीम है, क्या आप दीन, खुदा और रसूल पर भी यकीन रखते हैं?’’

‘‘हां खुदा रसूल पर पूरा यकीन रखता हूं.’’

‘‘इस के बावजूद आप ने मुलजिम की अच्छीभली शादीशुदा जिंदगी में दरार पैदा कर दी और उस की बीवी से ऐसी मोहब्बत बढ़ाई कि उन के बीच लड़ाईझगड़े करवा कर रशना वाली साजिश रच कर लुबना का तलाक करवा दिया. यही नहीं, एक बेगुनाह इंसान पर झूठे इलजाम लगवा दिए. ये बातें खुदा को सख्त नापसंद है. आप ने किसी का घर उजाड़ कर गुनाह नहीं किया?’’

‘‘मैं क्या कर सकता था. लुबना मुझ से बहुत ज्यादा मोहब्बत करती थी. मैं भी उसे चाहने लगा था. मोहब्बत में अंधे हो कर यह सब होता गया. वह मुझ से जल्द शादी करना चाहती थी और मकतूल की मुजरिम से जान छुड़ाने के लिए यह सब करना जरूरी था.’’

परेशानी और शर्मिंदगी उस के चेहरे पर साफ झलक रही थी. वह काफी स्मार्ट और शानदार पर्सनाल्टी का मालिक था. मैं ने जिरह आगे बढ़ाई, ‘‘जमाल साहब, वारदात के दिन आप मकतूल के पास कब पहुंचे थे?’’

‘‘रात के करीब साढ़े 10 बजे मैं वहां पहुंचा था.’’

‘‘जब आप मकतूल के फ्लैट पर पहुंचे तो क्या हुआ था, क्या आप ने डोरबैल बजाई थी?’’

‘‘मैं ने डोरबैल बजाई, पर कोई नतीजा नहीं निकला. उस के बाद मैं ने हैंडल घुमाया तो दरवाजा खुल गया.’’

‘‘आप ने अंदर दाखिल हो कर आवाज दी होगी, जवाब न मिलने पर आप परेशान हो कर बैडरूम में गए होंगे, जहां वह अपने बैड पर मरी पड़ी थी, ऐसा ही हुआ था न?’’

‘‘जी हां, ऐसा ही हुआ था.’’

‘‘जब आप वहां पहुंचे थे तो आप की मंगेतर को मरे डेढ़, 2 घंटे हो चुके थे. इस का मतलब साफ है कि आप कातिल नहीं हैं? अब मैं मुलजिम की बेगुनाही की तरफ आता हूं. वारदात वाले दिन शाम 7 बजे मुलजिम मकतूल के फ्लैट पर ब्राउन लिफाफा देने गया था, जिस में एक चैक भी था. यह ब्राउन लिफाफा वही है, जिस की वजह से मुलाजिम पर कातिल होने का शक किया जा रहा है? आप ने टेलर अमजद से पूछताछ की और पुलिस के आने पर आप ने कादिर अली को कातिल की तरह पेश कर दिया. मैं गलत तो नहीं कह रहा?’’

‘‘नहीं, आप ठीक कह रहे हैं, हालात ऐसे ही पेश आए थे. मुझे यही लगा था.’’

‘‘आप एक आर्ट एकेडमी चला रहे हैं तो आप को रौयल होटल में होने वाली आर्ट एग्जीबिशन के बारे में पता ही रहा होगा?’’

‘‘जी हां, मुझे इन्वीटेशन भी मिला था, पर मेरा डिनर मकतूल के साथ तय था, इसलिए मैं वहां नहीं जा सका.’’

‘‘मुलजिम अपनी बेटी आरिफा और उस की दोस्त सबा के साथ शाम साढ़े 7 बजे से साढ़े 10 बजे तक एग्जीबिशन में था. एक मशहूर आर्टिस्ट शाहिद निजामी पूरे वक्त उस के साथ थे. वह उस की वहां मौजूदगी के गवाह हैं. जरूरत पड़ने पर उन्हें गवाही के लिए बुलाया जा सकता है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक मकतूल का कत्ल 8 बजे और 9 बजे के बीच हुआ था. इस अरसे मेरा मुवक्किल नुमाइश में था, इसलिए यह कहना बेवकूफी है कि उस ने मकतूल का कत्ल किया है.’’

‘‘अगर उस ने कत्ल नहीं किया तो कातिल कौन हो सकता है?’’ जमाल ने उलझ कर पूछा.

‘‘आप का जवाब देने से पहले मैं इस केस के इंक्वायरी अफसर से सवाल करना चाहूंगा.’’

जज ने फौरन इजाजत दे दी. मैं ने आईओ से पूछा, ‘‘आप ने वारदात की जगह से जो फिंगरप्रिंट्स उठाए हैं, उस का रिकौर्ड आप के पास होगा? आप यह बताएं कि वहां किनकिन लोगों के निशान आप को मिले हैं?’’

‘‘हम ने 3 लोगों के फिंगरप्रिंट्स उठाए हैं. एक मकतूल लुबना, दूसरे उस के मंगेतर जमाल और तीसरे के बारे में कुछ पता नहीं चल सका है.’’ उस ने शर्मिंदगी से कहा.

‘‘मैं दावे से कह सकता हूं कि तीसरे नंबर के फिंगरप्रिंट्स जिन का पता नहीं चल सका, वह कातिल के हैं और कातिल तक मि. जमाल पहुंचाएंगे.’’

‘‘मैं… मैं कैसे?’’ वह हकलाया.

मैं ने जमाल से पूछा, ‘‘मि. जमाल, क्या आप किसी ऐसी लड़की या औरत के बारे में जानते हैं, जो आप से शादी करना चाहती है?’’

‘‘मेरी नजर में ऐसी कोई लड़की नहीं है.’’

‘‘कोई ऐसा शख्स है, जो मकतूल को बहुत पसंद करता था और उस से शादी करना चाहता था? एकेडमी में कोई ऐसा है, जिस की मकतूल से दोस्ती थी?’’

‘‘मेरी जानकारी में बस उबेद ऐसा शख्स है, जिस की लुबना से अच्छी बनती थी. उस वक्त लुबना से मेरी मंगनी नहीं हुई थी. मैं कैसे ऐतराज कर सकता था?’’

‘‘आप की मंगनी पर उस का क्या रिएक्शन था?’’

‘‘मेरी मंगनी के बाद वह एकदम बुझ सा गया था.’’

‘‘इस का मतलब मंगनी से उसे दुख पहुंचा था?’’

‘‘हो सकता है.’’

‘‘क्या यह वही उबेद है, जिसे लुबना ने रशना वाले ड्रामे के दिन फोन कर के घर बुलाया था?’’

‘‘जी हां, वही है. लौट कर उस ने मुझे बताया था कि काम हो गया.’’

‘‘यानी मुलजिम ने मकतूल को तलाक दे दिया?’’

‘‘जी हां, उस का यही मतलब था.’’

मैं ने अपना रुख जज की तरफ कर के कहा, ‘‘जनाब, अब तक की अदालती काररवाही मेरे मुवक्किल को बेगुनाह साबित करने को काफी है. फिर भी अदालत को निर्णय लेने में आसानी हो, मैं अगली पेशी पर मुलजिम की बेटी आरिफा उस की दोस्त सबा और आर्टिस्ट शाहिद निजामी को गवाही में पेश करूगा. आईओ साहब से रिक्वेस्ट है कि वह उबेद जामी के फिंगरप्रिंट्स जल्द हासिल कर के तीसरे नामालूम फिंगरप्रिंट्स से मिलाएं तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा?’’

जज ने आईओ और पुलिस को हिदायत दी कि उबेद को शामिल तफतीश किया जाए और अगली पेशी पर उसे हाजिर किया जाए. पुलिस ने बड़ी मुस्तैदी से उसी दिन उबेद को शामिल तफतीश कर के उस के फिंगरप्रिंट्स तीसरे नंबर के नामालूम फिंगरप्रिंट्स से मिलाए तो सारा मामला साफ हो गया. फिंगरप्रिंट्स के नमूने से उबेद के फिंगरप्रिंट्स मैच हो गए. पहले तो उबेद पुलिस को इधरउधर घुमाता रहा, जुर्म से इनकार करता रहा, पर जब पुलिस ने हाथ कड़े किए तो उस ने सच उगल दिया.

उबेद ने इकरारे जुर्म कर लिया कि लुबना को उसी ने सीने में खंजर घोंप कर मौत की नींद सुलाया था. यह कत्ल उस ने दास्ताने पहन कर किया था, इसलिए खंजर पर फिंगरप्रिंट नहीं आए थे. दूसरी जगहों पर फिंगर प्रिंट्स पाए गए थे. उबेद के बयान के मुताबिक, लुबना डबल गेम खेल रही थी. पहले तो वह उबेद से हंसतीबोलती रही, उस से दोस्ती बढ़ाती रही. जब उबेद उस की मोहब्बत में डूब गया तो जमाल को अपनी ओर आकर्षित देख कर वह उस की तरफ मुड़ गई. वह एकेडमी का मालिक था और उबेद से ज्यादा स्मार्ट था. मगर वह उबेद का सब्जबाग दिखाती रही. दोनों अपनीअपनी जगह पर लुबना को माशूका पा कर खुश थे. वह बारीबारी दोनों को खुश करती रही. दोनों यही समझते रहे कि वह बस उस के साथ सीरियस है.

अपने शौहर यानी कादिर अली से तलाक हासिल करने के बाद उस ने खुल्लमखुल्ला अपना फैसला जमाल के हक में दे दिया और उस के दिए हुए फ्लैट में रहने लगी. बाद में उस से मंगनी भी कर ली. उबेद को दुख भी हुआ और गुस्सा भी आया कि वह उसे इतने दिनों तक उल्लू बनाती रही. उस ने पुलिस को बयान देते हुए कहा, ‘‘मैं मोहब्बत में अपनी यह हार बिलकुल बरदाश्त नहीं कर पाया. वह मुझ से बड़ा प्यार जताती थी. मैं ने उल्लू बन कर उसे महंगेमहंगे तोहफे दिए थे. उस का धोखा मेरे दिल को लग गया. मैं ने तय कर लिया कि मैं बदला जरूर लूंगा.

‘‘मैं ने उसे बुझे दिल से मंगनी की मुबारकबाद दी. फिर कुछ दिन गुजरने के बाद मैं ने लुबना से रिक्वैस्ट की कि अपनी मोहब्बत मैं भूल जाऊंगा, बस वह एक घंटा तनहाई में मेरे साथ गुजारे. इस के बाद मैं उन की जिंदगी से दूर हो जाऊंगा. उसे पुरानी मोहब्बत का वास्ता दिया तो वह मान गई. हम ने जिंदगी के बहुत सारे रंगीन लम्हे साथ बिताए थे. उन्हीं की यादों को ताजा करते हुए उस ने मेरी बात मान ली.’’

आईओ ने पूछा, ‘‘तो तुम ने एक खास मकसद के लिए उस से मुलाकात की और चुपचाप वापस चले आए. यह नशे का क्या मामला था?’’

‘‘वारदात वाले दिन लुबना ने 8 बजे बुलाया था. और यह जता दिया था कि 9 बजे के पहले चले जाना होगा. मैं पूरी तैयारी के साथ उस के फ्लैट पर ठीक 8 बजे पहुंच गया. उस ने मेरे लिए चाय बनाई. मैं ने नजर बचा कर उस की चाय में नींद की गोलियां डाल दीं. चाय पी कर वह सिरदर्द की शिकायत करने लगी. मैं ने उसे सहारा दे कर उस के बैडरूम में ले जा कर बैड पर लिटा दिया. मेरी दी हुई दवा ने असर दिखाना शुरू कर दिया था. वह अपने होश में नहीं रही तो मैं ने अपने लिबास में छिपाया खंजर निकाला और दास्ताने पहन कर खंजर का घातक वार उस दगाबाज औरत के सीने पर कर दिया.’’

उबेद अपने जुर्म, अपने बदले की दास्तान सुना रहा था. उस के एकएक लफ्ज में नफरत की चिनगारियां निकल रही थीं, ‘‘वह बेवफा औरत इसी लायक थी. ऐसी दगाबाज औरतें ऐसे ही अंजाम की हकदार होती हैं. मुझे अपने किए पर कोई दुख, कोई पछतावा नहीं है. बस दुख इस बात का है कि मैं पकड़ा गया. हालांकि चाय के खाली कप मैं अपने साथ ले गया था, ताकि पुलिस को मुझ तक पहुंचने का कोई सुराग न मिले. लेकिन मेरी बदनसीबी की मैं पकड़ा गया.’’

उबेद के इकबाले जुर्म के बाद मेरे मुवक्किल की बेगुनाही पक्की हो गई और अगली पेशी पर आरिफा, सबा व शाहिद निजामी की गवाही के बाद कादिर अली बाइज्जत बरी हो गया. True Crime Story

 

Hindi Crime Story: जो सिर्फ दिमाग चलाते हैं

Hindi Crime Story: एक एनजीओ संचालक ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीम बना कर बौलीवुड फिल्म ‘स्पैशल 26’ की तरह एक बिल्डर के यहां छापा मार कर 21 लाख रुपए और गहने जिस तरह ठगे, हैरान करने वाली बात है. लेकिन क्या वे पुलिस से बच पाए?

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की सड़कों पर रोज की तरह उस दिन भी वाहनों की आवाजाही लगी थी. रात के लगभग 9 बजे दिल्ली नंबर की एक चमचमाती सफेद रंग की एलैंट्रा कार नंबर- डीएल 3सी एक्यू 0504 सहारनपुर चौक से राजपुर की ओर चली जा रही थी. कार में 4 आदमी और 2 औरतें सवार थीं. सभी ने सफेद रंग की पैंट और कमीज पहन रखी थी.

कार कारगी चौक पहुंच एक किनारे खड़ी हो गई. कार के रुकते ही वहां पहले से खड़े 2 लोग उस के नजदीक आए तो कार की ड्राइविंग सीट पर बैठा युवक उन से मुखातिब हुआ, ‘‘सब ठीक है न?’’

‘‘यस, लाइन क्लियर है. बस आप लोगों का ही इंतजार था.’’ कह कर वे दोनों भी कार में सवार हो गए. इस के बाद कार फिर चल पड़ी तो कुछ देर में वह पौश इलाके सरकुलर रोड पर कोठी नंबर 92 के सामने जा कर रुकी.

यह कोठी बिल्डर यशपाल टंडन की थी. यशपाल प्रौपर्टी का काम करते थे. इस के अलावा बड़ीबड़ी कमेटियां भी डालते थे, जिस में लाखों रुपए का लेनदेन होता था.

यशपाल का अपना औफिस भी था, जिस में वह सुबह से शाम तक बैठते थे. कोई नहीं जानता था कि उस दिन यशपाल का वास्ता एक बड़ी मुसीबत से पड़ने वाला था. कार में बाद में सवार हुए दोनों लोगों को छोड़ कर बाकी सभी कार से नीचे उतरे. उन में से एक के हाथ में ब्रीफकेस था. कार से उतरे लोग कोठी के गेट पर जा कर खड़े हो गए. उन्होंने डोरबैल बजाई तो कुछ सेकैंड बाद दरवाजे पर यशपाल टंडन खुद आए. उन के दरवाजा खोलते सब से आगे खड़े एक आदमी ने पूछा, ‘‘आप यशपाल टंडन?’’

‘‘जी हां, लेकिन आप कौन?’’ उन्होंने पूछा तो उसी आदमी ने रौब जमाते हुए सख्त लहजे में कहा, ‘‘हम लोग प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से हैं. आइए अंदर बैठ कर बातें करते हैं.’’

टंडन सकपका गए. एकाएक उन की कुछ समझ में नहीं आया. आने वालों के तेवर उन्हें ठीक नहीं लग रहे थे. उन्होंने हकलाते हुए कहा, ‘‘ल…ल…लेकिन इस तरह.’’

‘‘कहा न, चलो अंदर चल कर बात करते हैं.’’ कहने के साथ ही टीम का नेतृत्व कर रहे उस आदमी ने साथियों से कहा, ‘‘दरवाजा बंद कर के इन्हें अंदर ले आइए और बाहर खड़े लोगोें से कहिए कि बिना इजाजत कोई अंदर न आने पाए.’’

हालात अचानक बदल गए थे. टंडन चुपचाप उन के साथ अंदर आ गए. ड्राइंगरूम में आते ही उन्होंने टंडन को सोफे पर बैठा कर कहा, ‘‘मि. टंडन, हमें तुम्हारे घर की तलाशी लेनी है. हमें शिकायत मिली है कि तुम्हारे पास बहुत ब्लैकमनी है.’’

‘‘ऐसा तो कुछ भी नहीं है सर, जरूर आप को किसी ने गलत सूचना दी है.’’ टंडन ने सफाई देनी चाही तो टीम का नेतृत्व कर रहा आदमी बड़े ही आत्मविश्वास से बोला, ‘‘हमारी इन्फौरमेशन गलत नहीं है. हम तुम पर तभी से नजर रख रहे हैं, जब तुम्हारे दोस्त विजय मनचंदा के यहां आयकर का छापा पड़ा था, उस समय तुम खुद भी तो वहां मौजूद थे.’’

उस की इस बात पर यशपाल चौंके, क्योंकि उस अधिकारी ने जो कहा था, वह एकदम सही था. दरअसल 4 महीने पहले उन के दोस्त विजय मनचंदा के यहां जब आयकर विभाग ने छापा मारा था, तब वह भी वहां मौजूद थे. इतना ही नहीं, आयकर विभाग ने उन का पहचान पत्र ले कर उन्हें गवाह भी बना लिया था. वह घबरा गए. यह सब उन की पत्नी भी देखसुन रही थीं. वह भी घबरा गईं. टंडन और उन की पत्नी को सोफे पर एक तरह से बंधक बना कर बैठा दिया गया.

‘‘मि. टंडन, हमें कोऔपरेट कीजिए.’’ सामने बैठे आदमी ने कहा तो टीम में शामिल युवा लड़कियां टंडन दंपति के इर्दगिर्द खड़ी हो गईं, जबकि बाकी लोग कोठी की तलाशी लेने लगे. करीब आधा घंटे तक जब कुछ हाथ नहीं लगा तो उन्होंने सेफ की चाबी ले कर सारा सामान उलटपलट दिया. इस जांचपड़ताल में उन के हाथ संपत्ति के कुछ कागजात, नकदी और गहने लगे.

उन्हें जो भी मिला, वह सब एक स्थान पर रखते गए. उन के बारे में तरहतरह के सवाल भी करते रहे. टीम का नेतृत्व कर रहे अधिकारी ने यशपाल को गहरी नजरों से घूरते हुए कहा, ‘‘इन सब का हिसाब देने तुम्हें कल औफिस आना होगा. तुम्हारे खिलाफ एफआईआर तो होगी ही, जरूरत पड़ी तो गिरफ्तारी भी हो सकती है.’’

यशपाल के तो होश उड़ गए. उन्हें परेशान देख कर अधिकारी ने कहा, ‘‘हमारे पास एक बीच का रास्ता है.’’

‘‘क्या?’’ डरेसहमे यशपाल टंडन ने पूछा तो राजदाराना अंदाज में वह बोला, ‘‘अगर हमें 50 लाख रुपए मिल जाएं तो तुम आगे की काररवाई से बच सकते हो.’’

इस काररवाई से दहशत में आए यशपाल सोच में पड़ गए. गिड़गिड़ाने वाले अंदाज में उन्होंने कहा, ‘‘सर, मेरे पास इतनी बड़ी रकम नहीं है. कुछ कम हो जाए तो मैं कोशिश कर सकता हूं.’’

‘‘ठीक है, रकम कम करेंगे तो हम इन्हें अपने साथ ले जाएंगे.’’ उस ने गहनों की ओर इशारा कर के कहा.

यशपाल इजाजत ले कर सोफे से उठे और घर में रखे 6 लाख रुपए निकाल कर उन्हें दे दिए.

लेकिन छापा मारने वाली टीम ने उन्हें लेने से मना कर दिया. उन्होंने कहा कि इतने में बात नहीं बनेगी. इस के बाद टंडन ने फोन कर के अपने किसी परिचित व्यापारी से 10 लाख रुपए मंगा कर लिए. यह रकम लेने टंडन खुद दरवाजे तक गए थे. इतने पर भी बात नहीं बनी तो उन्होंने अपने किसी अन्य परिचित से 5 लाख रुपए और मंगा कर दिए.

टीम का मुखिया इतने पर भी संतुष्ट नजर नहीं आया. उस ने सारी नकदी और आभूषण एक बैग में रख लिए. इस के बाद चलने लगा तो कहा, ‘‘थोड़ी देर के लिए अपनी स्कूटी देना.’’

टंडन ने मना किया तो उस ने कहा, ‘‘आप चिंता न करें, हमारा कर्मचारी आ कर उसे दे जाएगा.’’

करीब सवा 2 घंटे की काररवाई के बाद पूरी टीम चली गई.

यशपाल टंडन के यहां ईडी का यह छापा 2 नवंबर, 2015 की रात पड़ा था. इस छापे से वह काफी परेशान थे. उन्होंने अपने परिचितों को फोन कर के इस छापे की जानकारी दी तो बिना पुलिस के रात में छापा मारना और स्कूटी मांग कर ले जाने वाली बात से उन लोगों को यह सब संदिग्ध लगा. जब यह साफ हो गया कि आयकर विभाग या प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) रात में छापा नहीं मारता तो लगा कि उन के साथ कोई बड़ी गड़बड़ हुई है. परिचितों से सलाहमशविरा कर के यशपाल टंडन ने इस की सूचना पुलिस कंट्रौल रूम को दे दी.

फरजी ईडी टीम द्वारा छापे के बहाने लाखों रुपए ले जाने की घटना की सूचना पा कर थाना कोतवाली के प्रभारी एस.एस. बिष्ट और लक्खीबाग चौकीप्रभारी राकेश शाह पुलिस बल के साथ टंडन की कोठी पर पहुंच गए. अधिकारियों को भी सूचित कर दिया गया था. इस घटना से जिला पुलिस में हड़कंप मच गया था. एसपी (सिटी) अजय सिंह और सीओ मनोज कत्याल भी मौके पर पहुंच गए थे. सभी ने यशपाल से पूछताछ की तो उन्होंने पूरी घटना सिलसिलेवार बता दी. पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि यशपाल टंडन को छापे के बहाने शातिराना अंदाज में ठगा गया है. प्रवर्तन निदेशालय के क्षेत्रीय प्रमुख पी.के. चौधरी ने भी स्पष्ट कर दिया कि उन की किसी टीम ने छापा नहीं डाला है.

यशपाल बुरी तरह हताश हो गए. ठग पूरी तैयारी के साथ आए थे और बड़ी चालाकी से उन्हें ठग कर चले गए थे. मामला बेहद गंभीर था. थाना कोतवाली में यशपाल द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर अज्ञात लोगों के खिलाफ अपराध संख्या- 304/2015 पर भादंवि की धारा 595, 419, 420, 120 बी, 406 व 506 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. एसएसपी डा. सदानंद दाते को भी इस घटना की सूचना मिल गई थी. वह काफी हैरान थे. इस की वजह यह थी कि यह फिल्मी स्टाइल में किया गया अपनी तरह का एक अलग अपराध था. उन्होंने एसपी (सिटी) अजय सिंह से सलाह कर के इस मामले के खुलासे के लिए एक टीम का गठन करने का आदेश दिया.

इस स्पैशल औपरेशन ग्रुप की संयुक्त टीम में थानाप्रभारी एस.एस. बिष्ट, लक्खीबाग चौकीप्रभारी राकेश शाह, एसआई दिलबर सिंह, एएसआई सर्वेश कुमार, कांस्टेबल अरविंद भट्ट, मनमोहन सिंह, कुलवीर, सत्येंद्र नेगी, प्रमोद, गंभीर सिंह और महिला कांस्टेबल रजनी कोहली तथा सुमन को शामिल किया गया. इस का नेतृत्व खुद एसपी (सिटी) अजय सिंह कर रहे थे. पुलिस टीम तुरंत अपने काम में लग गई. यशपाल टंडन से हुई पूछताछ के आधार पर पुलिस ने एक्सपर्ट से एक आरोपी का स्कैच भी बनवा कर जारी कर दिया.

यशपाल ने कार का जो नंबर बताया था, पुलिस ने अगले दिन उस की जांच की तो वह पंजाब प्रांत की किसी मोटरसाइकिल का निकला. 2 बातें स्पष्ट होती थीं, एक तो यह कि यशपाल को ठीक से नंबर याद नहीं था या फिर कार में फरजी नंबर प्लेट का इस्तेमाल किया गया था. यशपाल की स्कूटी पुलिस ने उसी दिन कारगी चौक से लावारिस अवस्था में खड़ी बरामद कर ली थी. उन की कोठी के बाहर बाईं ओर एसजीआरआर स्कूल था. उस के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे थे. पुलिस ने उस की रिकौर्डिंग चैक की, लेकिन उस से कार का नंबर पकड़ में नहीं आ सका.

राजधानी के मुख्य चौराहों पर भी सुरक्षा की दृष्टि से हाई डैफिनेशन कैमरे लगे हैं. पुलिस ने रात 9 से साढ़े 11 बजे तक की उन की फुटेज बारीकी से चैक की तो आशारोड़ी क्षेत्र के कैमरे में वह कार दिख गई, जिस में सवार हो कर कथित ईडी टीम के सदस्य आए थे. इस में कार का नंबर स्पष्ट नजर आ रहा था. इस तरह पुलिस को नंबर मिल गया. अब तक कई दिन बीत चुके थे. चूंकि नंबर दिल्ली का था, इसलिए एसआई राकेश शाह के नेतृत्व में एक टीम दिल्ली भेज दी गई.

दिल्ली पहुंची पुलिस टीम ने आरटीओ औफिस से कार के मालिक के बारे पता किया. पुलिस आरटीओ औफिस से मिले पते पर पहुंची तो वहां जो मिला, पता चला उस ने कार बेच दी थी. जिस व्यक्ति को उस ने कार बेची थी, पुलिस उस के पास पहुंची तो वहां भी निराश होना पड़ा, क्योंकि उस ने भी किसी अन्य को कार बेच दी थी. पुलिस टीम दिल्ली में ही डेरा डाले थी. कार आदर्शनगर निवासी पुष्पा को बेची गई थी. पुलिस खोजबीन करते हुए पुष्पा के यहां पहुंची तो उस ने बताया कि उस की कार को एक एनजीओ संचालक प्रदीप सिंह मांग कर ले गया था.

प्रदीप के बारे में पूछताछ की गई तो पता चला कि वह अपने भाई बबलू और कुछ अन्य साथियों के साथ जहांगीरपुरी में एक औफिस खोल कर एनजीओ चलाता है. उस के यहां स्टाफ भी था. पुलिस ने पूछताछ कर के उस के बारे में जानकारी इकट्ठा कर ली. पुलिस को कार पुष्पा के यहां मिल गई थी. पुलिस को जो सुराग मिले थे, वे काम के थे. 25 नवंबर को पुलिस टीम जहांगीरपुरी स्थित फ्लैट नंबर डी 268 पर पहुंची. फ्लैट में औफिस चल रहा था. पुलिस को वहां प्रदीप तो नहीं मिला, उस के यहां काम करने वाली 2 लड़कियां मिल गईं.

ईडी के छापे में चूंकि 2 लड़कियां भी शामिल थीं, इसलिए पुलिस ने उन्हें शक के दायरे में रख कर पूछताछ शुरू कर दी. उन लड़कियों में एक श्रद्धानंद कालोनी निवासी बेबी पुत्री वीरेंद्र और दूसरी राखी पुत्री कल्लू थीं. दोनों बेहद साधारण परिवारों से थीं. वे दोनों कई महीने से इस एनजीओ में काम कर रही थीं. पुलिस ने उन से घुमाफिरा कर सवाल किए तो वे जवाब देने में उलझ गईं. उन्होंने जो सच बताया, उसे सुन कर पुलिस भी हैरान रह गई. इस फरजी छापे की योजना किस ने तैयार की थी, यह तो वे नहीं जानती थीं, लेकिन प्रदीप के साथ छापे में वे भी गई थीं. पुलिस दोनों को हिरासत में ले कर देहरादून आ गई. पुलिस प्रदीप के जहांगीरपुरी स्थित एमसीडी में फ्लैट नंबर 306 पर भी गई थी, लेकिन वहां ताला लगा था.

पुलिस ने दोनों लड़कियों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि 2 नवंबर को प्रदीप छापा मारने की बात कह कर उन्हें अपने साथ ले गया था. उस के साथ उस का भाई बबलू और 2 दोस्त भी थे, जबकि 2 लोग उन्हें देहरादून में मिले थे. बेबी और राखी प्रदीप एवं बबलू के अलावा किसी और को नहीं पहचानती थीं. पुलिस ने यशपाल टंडन से लड़कियों का आमनासामना कराया तो उन्होंने उन्हें पहचान लिया. लड़कियों ने हैरान करने वाली बात यह बताई कि प्रदीप ने यह छापा फिल्म ‘स्पैशल-26’ की स्टाइल में मारा था. इस के लिए उस ने खुद तो रिहर्सल किया ही था, उन्हें भी रिहर्सल कराया था. उन्हें कई बार फिल्म भी दिखाई थी.

टीम असली लगे, इस के लिए उन्होंने सफेद रंग के कपड़े सिलवाए थे. अपनी बनाई योजना के अनुसार वे छापा मार कर चले गए थे. प्रदीप के पास ही पूरी रकम थी. छापा मारने के पहले जो 2 लोग देहरादून में मिले थे, वे देहरादून में ही रह गए थे. लड़कियों ने बताया था कि यशपाल टंडन ने टीम को पूरा सहयोग दिया था. उन्होंने खुद ही बताया था कि अमुकअमुक स्थान पर तलाशी लें. इस से यशपाल की भूमिका भी संदिग्ध हो गई थी.

यशपाल कमेटी डलवाते थे. हो सकता था कि घाटा दिखाने के लिए उन्होंने ही यह योजना बनाई हो. इस मुद्दे पर उन से भी पूछताछ की गई, लेकिन इस में उन का कोई हाथ नहीं निकला. अलबत्ता लड़कियों और उन के बयानों में थोड़ा विरोधाभास जरूर बना रहा. अभी मामले का खुलासा पूरी तरह नहीं हो सका था. एसएसपी डा. सदानंद दाते ने 26 नवंबर को अपने औफिस में प्रेसवार्ता कर के इस फरजी छापे का खुलासा किया. इस के बाद पुलिस ने दोनों लड़कियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

लड़कियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को विश्वास हो गया कि वारदात में स्थानीय लोगों का भी हाथ जरूर था. पुलिस टीम प्रदीप की तलाश में जुटी थी, लेकिन अगले कई दिनों तक वह हाथ नहीं आया. पुलिस प्रदीप और उस के भाई के मोबाइल नंबरों की जांच कर रही थी. लेकिन वे बंद हो चुके थे. पुलिस हर सूरत में पूरे मामले का परदाफाश करना चाहती थी. एसपी (सिटी) अजय सिंह समयसमय पर टीम के काम की समीक्षा करते रहते थे. देखते ही देखते घटना को घटे डेढ़ महीने से ज्यादा का समय बीत गया, लेकिन आरोपियों का कोई सुराग नहीं मिला. कोई महत्त्वपूर्ण सुराग हाथ लग जाए, इस के लिए पुलिस ने जेल में बंद राखी और बेबी से दोबारा पूछताछ की.

पुलिस आरोपियों के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स पर भी काम कर रही थी. इस से कडि़यां जुड़ती चली गईं. इस कड़ी में एक नाम धर्मपाल भाटिया का सामने आया. धर्मपाल हरियाणा के जिला करनाल के हांसी रोड पर रहता था. पुलिस उसे गिरफ्तार कर के देहरादून ले आई और उस से पूछताछ के आधार पर देहरादून के थाना क्लेमन टाउन के गोकुल एन्कलैव में रहने वाले दीपक मनचंदा को भी 4 जनवरी, 2016 को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने दोनों से पूछताछ की. इन से पूछताछ में पुलिस को पता चला कि यह पूरी योजना एक महिला द्वारा तैयार की गई थी तो हैरानी बढ़ गई. सभी लोगों ने योजना बना कर जिस तरह फिल्मी अंदाज में छापा मारा था, पुलिस उलझ कर रह गई थी. ठगी का शिकार हुए यशपाल टंडन का उन का अपना कलैक्शन एजेंट ही उन्हें दगा दे गया था. दरअसल, दीपक मनचंदा यशपाल के दोस्त विजय मनचंदा का भतीजा था. इसी नाते उन्होंने भरोसा कर के उसे अपने यहां कमेटी का पैसा जुटाने और अन्य कामों के लिए रख लिया था. दीपक ने खूब मेहनत कर के काम किया, जिस से यशपाल टंडन को उस पर पूरा भरोसा हो गया. वह उस के साथ परिवार के सदस्य की तरह व्यवहार करने लगे.

जरूरी नहीं कि इंसान जैसा दिखता है, ठीक वैसा हो ही. दीपक के साथ भी ऐसा ही था. वह बुरी आदतों का शिकार था. उन में एक आदत अनापशनाप खर्च करना भी थी. यशपाल के लिए वह मोटी रकम इकट्ठा करता था. धीरेधीरे उस ने उन से 5 लाख रुपए उधार ले लिए. जब रुपए लौटाने की बात आई तो वह परेशान रहने लगा. दीपक मूलरूप से करनाल का ही रहने वाला था और कुछ सालों पहले ही देहरादून आया था. उस की जानपहचान धर्मपाल भाटिया और उस की पत्नी निशा उर्फ रेखा से थी. निशा तेजतर्रार महिला थी. एक दिन बातोंबातों में उस ने अपनी परेशानी दोनों को बताने के साथ यह भी बताया कि उस का मालिक काफी दौलतमंद आदमी है.

‘‘तुम उसी से पैसा क्यों नहीं कमाते?’’ निशा ने रहस्यमय अंदाज में कहा.

‘‘वह कैसे?’’ दीपक ने हैरानी से पूछा.

‘‘इस की तरकीब मैं तुम्हें बताऊंगी.’’ निशा ने कहा.

आश्वासन मिलने पर दीपक को थोड़ी राहत मिल गई. जहांगीरपुरी में रहने वाले प्रदीप और बबलू निशा के भाई थे. दोनों काफी शातिर थे. वे एनजीओ की आड़ में ब्लैकमेलिंग का धंधा करते थे. निशा और धर्मपाल ने इस मुद्दे पर उन से बात की तो काफी सोचविचार कर उन्होंने फिल्म ‘स्पैशल 26’ की स्टाइल में यशपाल टंडन को लूटने की सोची.

इस के बाद उन्होंने दीपक से बात की तो उस ने यशपाल के बारे में सब कुछ बता दिया. उस ने यह भी बताया कि यशपाल चूंकि कमेटी के साथ ब्याज पर भी रुपए देने का काम करते हैं, इसलिए उन के पास बिना हिसाबकिताब की मोटी रकम होती है. प्रदीप और निशा को वह सौफ्ट टारगेट लगे. प्रदीप स्मार्ट युवक था और अधिकारियों वाले अंदाज में रहता था.

सभी ने मिल कर यशपाल को प्रवर्तन निदेशालय के फरजी छापे के जरिए अपना शिकार बनाने का फैसला किया. प्रदीप ने इस योजना  में अपने एक दोस्त पंकज तिवारी, भांजे रमन और एनजीओ में काम करने वाली बेबी और राखी को भी लालच दे कर शामिल कर लिया. प्रदीप, उस का भाई, दोस्त, भांजा और दोनों लड़कियों ने कई बार ‘स्पैशल 26’ फिल्म देखी. प्रदीप को अधिकारी की भूमिका में रहना था, जबकि बाकी को टीम के सदस्य के रूप में. योजना बन गई तो तय दिन 2 नवंबर के एक दिन पहले ही धर्मपाल दीपक के पास देहरादून पहुंच गया.

अगले दिन प्रदीप ने बहाने से पुष्पा की कार मांगी और बबलू, पंकज, रमन, बेबी और राखी के साथ शाम को दिल्ली से चल कर करीब 8 बजे देहरादून पहुंच गया. यशपाल और दीपक तय योजना के तहत उन्हें रास्ते में मिल गए. सभी लोग यशपाल की कोठी पर पहुंचे. चूंकि यशपाल दीपक को पहचानते थे, इसलिए वह धर्मपाल के साथ बाहर कार ही में रुक गया. यशपाल को उन के फरजी ईडी होने का शक न हो, इस के लिए प्रदीप ने उन्हें उन के दोस्त के यहां पूर्व में पड़े आयकर विभाग के छापे का जिक्र किया. यह बात दीपक उसे पहले ही बता चुका था. उन्होंने बेहद शातिराना अंदाज में 21 लाख कैश और गहने ठग लिए. जातेजाते वे स्कूटी भी ले गए, जिसे उन्होंने कारगी चौक पर छोड़ दिया.

इस के बाद दीपक अपने घर चला गया. धर्मपाल करनाल और बाकी लोग दिल्ली. प्रदीप ने कहा कि वह माल का बंटवारा बाद में करेगा. लेकिन वह सभी से शातिर निकला और अपने भाई के साथ पूरी रकम ले कर फरार हो गया. उस ने सिर्फ बेबी और राखी को 6 हजार रुपए खर्च के लिए दिए थे. पूछताछ के बाद पुलिस ने आरोपियों का सामना यशपाल टंडन से कराया. वह अपने दोस्त के भतीजे द्वारा दी गई दगा से आहत थे. एसएसपी डा. सदानंद दाते ने 5 जनवरी, 2016 को आरोपियों को मीडिया के सामने पेश कर के केस का खुलासा किया और पुलिस टीम को ढाई हजार रुपए इनाम देने की घोषणा की.

पुलिस ने बाद में गिरफ्तार किए गए दोनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक जेल गए आरोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी. बाकी अन्य आरोपी निशा उर्फ रेखा, प्रदीप, बबलू, पंकज और रमन की तलाश जारी थी. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Story Hindi: शिल्पा शेट्टी के – परिवार को ठगने वाला बाबा

Crime Story Hindi: योगगुरु बाबा रामदेव के तथाकथित शिष्य देवेंद्र ने मशहूर अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के परिवार के अलावा भी कई लोगों को ठगा था. लेकिन जब उस के कारनामों की पोल खुली तो हर कोई दंग रह गया. चेहरे पर दाढ़ी और सिर पर लंबे बाल रखने वाला वह लंबातगड़ा शख्स खुद को पहुंचा हुआ बाबा बताता था. मैडिकल साइंस को चुनौती देने वाले रोगों को भी वह ठीक करने का दावा करता था. सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि वह खुद को करोड़ों का कारोबार करने वाले ट्रस्ट पतंजलि के योगगुरु बाबा रामदेव का शिष्य भी बताता था, साथ ही वह बौलीवुड की मशहूर अदाकारा शिल्पा शेट्टी के साथसाथ कई और विख्यात हीरोइनों से अपने खास ताल्लुकात बताया करता था.

उस के कई नाम थे और उस का सब से बड़ा हथियार था धर्म. यही वजह थी कि तमाम लोग उस के मुरीद थे, लेकिन जब उस की करतूतों का खुलासा हुआ तो उस की हकीकत जान कर हर कोई दंग रह गया. वास्तव में वह महाठग था. उस ने न सिर्फ शिल्पा शेट्टी के परिवार से एक करोड़ रुपए से ज्यादा ठग लिए थे, बल्कि अन्य कई लोगों को भी चूना लगाया था. इस शख्स का नाम था देवेंद्र कुमार योगी उर्फ देवेंद्र कुमार आचार्य उर्फ योगी महाराज उर्फ स्वामी कृष्णदेव योगी. इस तथाकथित योगी का उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद स्थित हस्तिनापुर इलाके में आश्रम था. गेरुआ व सफेद वस्त्र धारण करने वाला यह बाबा धर्म के नाम पर लोगों को अपना मुरीद बनाता था.

लोगों को धर्म के नाम पर किस तरह बहलाफुसला कर काबू में लाया जाता है, यह हुनर वह बखूबी जानता था. इस के लिए वह सोशल नेटवर्किंग साइट का भी सहारा लेता था. वैसे भी समाज में ऐसे अंधविश्वासियों की कोई कमी नहीं है, जो अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं. देवेंद्र के कई चेलेचपाटे गांवगांव जा कर उस का प्रचार किया करते थे. वह लोगों को योग सिखाने के साथसाथ खुद को कैंसर स्पैशलिस्ट भी बताता था. वैसे तो उस के पास कोई डिग्री नहीं थी, लेकिन वह दावा करता था कि जिस मर्ज का इलाज डाक्टर नहीं कर सकते, उस का इलाज वह कर देगा.

वह जिन मर्जों को दूर करने की बात करता था, उन में गुप्तरोग, दमा, अस्थमा, हृदय रोग, थायराइड, एनीमिया, साइनस, किडनी स्टोन, शुगर, प्रोस्टेट, पाइल्स, कोरोनरी आर्टरीज, मोटापा, कब्ज, आर्थराइटिस, ब्लड प्रेशर व जोड़ों का दर्द आदि रोग शामिल थे.

धनी भक्तों के घर जा कर वह योगा क्लास चलाता था. वह अपनी फीस भक्तों की हैसियत के हिसाब से निर्धारित करता था. आश्रम में आने वाले भक्तों को वह अपनी कामयाबियों के मनगढ़ंत किस्से सुना कर प्रभावित करता था. उस ने खुद को कारोबारी बाबा के रूप में पहचान बना चुके बाबा रामदेव का खास शिष्य घोषित किया हुआ था. उस के अनुसार, वह पिछले 10 सालों से बाबा से जुड़ा हुआ था. अपने इस दावे को सच साबित करने के लिए उस ने बाबा रामदेव के साथ वाली अपनी कई तसवीरें आश्रम की दीवारों पर टांग रखी थीं.

रौबरुतबे के लिए इतना ही काफी नहीं था. वह फिल्म हीरोइन शिल्पा शेट्टी समेत उन के पूरे परिवार को अपना भक्त बताता था. शिल्पा शेट्टी और उन के परिवार के साथ भी उस ने कई तसवीरों को दीवार पर सजा रखा था. वह अपने भक्तों को बताता था कि जब वह मुंबई जाता है तो प्रियंका चोपड़ा, दीपिका पादुकोण, करिश्मा कपूर, बिपाशा बसु, सोनाक्षी सिन्हा, अनिल कपूर, रितिक रोशन जैसे कई हीरोहीरोइन उस से मिलने आते हैं. वे लोग अपने कई काम उस के कहे अनुसार करते हैं और टेलीफोन पर बराबर संपर्क में रहते हैं.

साधारण लोग सोचते थे कि जब इतने बड़ेबड़े स्टार बाबा के भक्त हैं तो फिर वे क्यों पीछे रहें. भक्तों की बढ़ती कतार के साथ उस के चेहरे की रौनक बढ़ जाती थी. उस के भक्त बाबा को खुशीखुशी रुपयापैसा भी देते थे. देवेंद्र की दुकान ठीक जमी हुई थी कि 20 नवंबर, 2015 को मुंबई के वरसोवा थाने के सबइंसपेक्टर भारत शिवाजी के नेतृत्व में पुलिस टीम की छापेमारी से खलबली मच गई. दरअसल मुंबई में बाबा के खिलाफ धोखाधड़ी व गबन का मामला दर्ज था. पुलिस ने बाबा देवेंद्र को गिरफ्तार कर लिया.

इस के साथ ही उस की कलई खुली तो उस के भक्त भी सिर थाम कर बैठ गए, क्योंकि हकीकत हैरान करने वाली थी. बाबा कोई छुटभैया नहीं, बल्कि महाठग निकला. उस ने हीरोइन शिल्पा शेट्टी के मातापिता से 1 करोड़ 20 लाख रुपए की रकम ठगी थी. कानून का फंदा कसते ही देवेंद्र हक्काबक्का रह गया. वजह यह कि शायद उसे इस की कतई उम्मीद नहीं थी.

दरअसल, देवेंद्र ने जनवरी, 2014 में एक कारोबारी के माध्यम से शिल्पा के पिता सुरेंद्र शेट्टी व मां सुनंदा शेट्टी से जानपहचान बढ़ाई. बाबा के लिबास और धर्म की बड़ीबड़ी बातों से वह उस के झांसे में आ गए. इस के बाद वह अकसर उन के घर आनेजाने लगा. उस ने उन से खुद को रामदेव का खास शिष्य व आयुर्वेदिक औषधियों का बड़ा जानकार बताया था. उस ने उन्हें सपना दिखाया कि औषधियों का बड़ा कारोबार किया जा सकता है. उस के झांसे में आए सुरेंद्र शेट्टी ने उसे मोटी रकम दे दी. दिखावे के लिए देवेंद्र ने मुंबई में औफिस भी खोल लिया था.

देवेंद्र जब शिल्पा के घर जाता था तो प्रभाव जमाने के लिए श्वेत वस्त्रों के साथ ही लकड़ी की खड़ाऊ पहन कर जाता था. जबकि हकीकत में वह फैशनपरस्त था. वह जींस टीशर्ट पहन कर डांस बारों से ले कर सिनेमाघरों तक में मौजमस्ती करता था. शिल्पा का परिवार उस की इस हकीकत से अनजान था. दवा सप्लाई के नाम पर जब उस ने धीरेधीरे एक करोड़ से ज्यादा की रकम झटक ली तो एक दिन वह चुपके से बोरियाबिस्तर समेट कर अपने मूल ठिकाने पर आ गया. शिल्पा शेट्टी के परिवार की एक लग्जरी कार भी वह अपने साथ ले आया था. ठगी का अहसास होने पर शिल्पा के पिता ने वरसोवा थाने में बाबा के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया था.

आश्रम आ कर देवेंद्र ने अपना काम ठीक से जमा लिया था. उस ने योग के नाम से एक फेसबुक पेज भी बनाया, जिस पर विदेशी मौडल्स की कई उत्तेजक तसवीरें लगाईं. फेसबुक पेज पर उस ने खुद को योग अध्यापक घोषित कर रखा था. देवेंद्र की गिरफ्तारी के साथ ही उस की ठगी के कारनामे खुलने लगे. उस ने कई लोगों को चूना लगाया था. अजय ठाकुर नामक एक युवक से उस ने पीसीएस परीक्षा में चयन करवाने के नाम पर 10 लाख रुपए मांगे थे. उन्होंने उसे पेशगी के तौर पर 4 लाख रुपए दे भी दिए थे. लेकिन चयन के नाम पर बाबा टरकाने का काम करता रहा. इस के अलावा कई बड़े व्यापारियों को भी उस ने यह कह कर चूना लगाया था कि वह उन के किसी प्रोग्राम में शिल्पा शेट्टी को बुलवा देगा.

चूंकि शिल्पा और उन के परिवार के साथ उस के फोटोग्राफ थे, इसलिए लोग भरोसा कर लेते थे. पुलिस का कहना है कि देवेंद्र ने कई और लोगों को ठगने की प्लानिंग कर रखी थी. पुलिस इस बाबा को जेल भेज चुकी है. पुलिस कस्टडी में उस ने दावा किया कि वह रामदेव के ट्रस्ट पतंजलि से जुड़ा है. देवेंद्र कोई अकेला ठग नहीं है. समाज में ऐसे लोगों की भरमार है, जो धर्म के नाम पर लोगों को बहका कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं. जरूरत है ऐसे ठगों को पहचान कर उन से सावधान रहने की. Crime Story Hindi

 

UP Crime: रिश्तों पर लगा खून का दाग – बुआ ने भतीजी को टैंक में डुबोया

UP Crime: एक दिल दहला देने वाली वारदात ने रिश्तों की मर्यादा को चकनाचूर कर दिया. प्रेम संबंध के चलते एक महिला ने अपनी ही भतीजी की हत्या कर दी और भाभी पर जानलेवा हमला कर डाला. सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि बुआ का रिश्ता इतनी बेरहमी में बदल गया? आइए इस हत्याकांड की पूरी कहानी विस्तार से जानते हैं, जो आप को झकझोर कर रख देगी.

यह सनसनीखेज मामला उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के बसीकलां गांव से सामने आया है. यहां एक माना नाम की एक युवती ने पहले अपनी 4 साल की भतीजी को पानी के टैंक में डाल कर मौत के घाट उतार दिया. इस के बाद सो रही भाभी फिरदौस पर चाकू से कई वार किए. इस हमले में भाभी के बच्चे भी घायल हो गए.

बताया जा रहा है कि घटना से 2 दिन पहले आरोपी युवती माना ने अपनी भाभी को रास्ते से हटाने की योजना बनाई. उस ने रात के खाने में परिवार को नींद की गोलियां दे दीं, ताकि सभी गहरी नींद में सो जाएं. जब सब बेखबर थे, तब उस ने अपनी मासूम भतीजी इशारा को पानी के टैंक में डाल दिया, जहां दम घुटने से उस की मौत हो गई. इस के बाद उस ने गहरी नींद में सो रही भाभी फिरदौस पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया.

हमले के दौरान घर में मौजूद फिरदौस के 3 छोटे बच्चे भी चाकू लगने से जख्मी हो गए. चीखपुकार सुनकर ग्रामीण मौके पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि फिरदौस खून से लथपथ पड़ी है और उस की बेटी लापता है. तुरंत पुलिस को सूचना दी गई. पुलिस टीम, डाग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम घटनास्थल पर पहुंची और घायलों को अस्पताल भेजा गया. हालत गंभीर होने पर महिला को मेरठ रेफर किया गया.

जब पुलिस ने घर की तलाशी ली तो पानी के टैंक से बच्ची का शव बरामद हुआ. इस के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. इस के बाद पुलिस ने शक के आधार पर बुआ माना को हिरासत में लिया और सख्ती से पूछताछ की, जिस में उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

पूछताछ में माना ने बताया कि गांव के एक युवक से उस का लंबे समय से प्रेम संबंध था. परिवार को जानकारी मिलने पर उस का रिश्ता कहीं और तय कर दिया गया. इसी बीच उस का प्रेमी नौकरी के सिलसिले में चेन्नई चला गया. जब भी वह चोरीछिपे उस से फोन पर बात करती, तो भाभी उसे टोकती थी. इसी रंजिश में उस ने यह खौफनाक साजिश रची. फिलहाल पुलिस ने आरोपी माना को गिरफ्तार कर लिया है और मामले की गहन जांच जारी है. UP Crime

Crime Story: कपूत की करतूत

Crime Story: करोड़पति बाप का बेटा अशोक अगर सीधी राह चलता तो ऐशोआराम की जिंदगी गुजार सकता था. लेकिन अपनी गलत आदतों के चलते पैसे की चाहत में उस ने अपने पिता की ही हत्या की सुपारी दे दी.

बासठ वर्षीय मामन जमींदार परिवार से थे, इसलिए इलाके के लोग उन का काफी सम्मान करते थे. इस उम्र में भी वह पूरी तरह स्वस्थ थे. इस की वजह यह थी कि वह बहुत ही अनुशासित जीवन जीते थे. वह हर रोज सुबह घर से काफी दूर स्थित पार्क में टहलने जाते थे और अपने हर मिलने वाले का कुशलक्षेम पूछते हुए 7, साढ़े 7 बजे तक घर लौटते थे.

2 नवंबर, 2014 की सुबह जब वह पार्क में टहल कर सवा 7 बजे घर लौट रहे थे तो गली में एक पल्सर मोटरसाइकिल उन के सामने आ कर इस तरह रुकी कि वह उस से टकरातेटकराते बचे. मोटरसाइकिल पर 2 युवक सवार थे. उन के चेहरों पर रूमाल बंधे थे. युवकों की यह हरकत मामन को नागवार गुजरी तो उन्होंने युवकों को डांटने वाले अंदाज में कहा, ‘‘यह कैसी बदतमीजी है, तुम्हारे मांबाप ने तुम्हें यह नहीं सिखाया कि बुजुर्गों से किस तरह पेश आना चाहिए?’’

‘‘सिखाया तो था, लेकिन हम ने सीखा ही नहीं,’’ मोटरसाइकिल चला रहे युवक ने हंसते हुए कहा, ‘‘ताऊ, हम ने तो एक ही बात सीखी है, पैसा लो और खेल खत्म कर दो.’’

‘‘क्या मतलब?’’ मामन ने हकबका कर पूछा.

मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे युवक ने उतरते हुए कहा, ‘‘ताऊ मतलब बताने से अच्छा है, कर के ही दिखा दूं.’’

इसी के साथ उस ने हाथ में थामी गुप्ती निकाल कर मामन के पेट में घुसेड़ दी. चीख कर मामन जमीन पर बैठ गए. उस वक्त वह इस तरह घिरे थे कि भाग भी नहीं सकते थे. उन की चीख सुन कर कुछ लोग घरों से निकल आए. तभी मोटरसाइकिल पर सवार युवक ने पिस्तौल लहराते हुए धमकी दी, ‘‘अगर कोई भी नजदीक आया तो गोली मार दूंगा.’’

उस की इस धमकी से किसी की आगे आने की हिम्मत नहीं पड़ी. इस बीच वह युवक मामन पर गुप्ती से लगातार वार करता रहा. वह चीखते रहे, छटपटाते रहे. लेकिन वह उन्हें गुप्ती से तब तक गोदता रहा, जब तक उन की मौत नहीं हो गई. जब उसे लगा कि मामन मर चुके हैं तो वह कूद कर मोटरसाइकिल पर बैठ गया. उस के बाद मोटरसाइकिल पर सवार युवक तेजी से मोटरसाइकिल चलाता हुआ चला गया. मामन इलाके के जानेमाने और सम्मानित व्यक्ति थे. उन की हत्या की खबर पलभर में पूरे इलाके में फैल गई. जहां हत्या हुई थी, थोड़ी ही देर में वहां भारी भीड़ जमा हो गई. किसी ने इस घटना की सूचना फोन से थाना नरेला को दे दी.

इलाके के एक सम्मानित व्यक्ति की हत्या होने की सूचना से थाना नरेला की पुलिस तुरंत हरकत में आ गई. थाने से एएसआई राजेंद्र सिंह, महिला सिपाही मधुबाला, अभिमन्यु एवं बीट के सिपाहियों को तुरंत घटनास्थल पर भेजा गया. राजेंद्र सिंह ने घटनास्थल एवं शव का निरीक्षण कर के वहां एकत्र लोगों से पूछताछ की. इस के बाद औपचारिक काररवाई निपटा कर उन्होंने लाश को पोस्टमार्टम के लिए राजा हरिश्चंद्र अस्पताल भिजवा दिया.

थाना नरेला पुलिस की जांच का सिलसिला काफी लंबा चला. इस के बावजूद पुलिस न हत्या की वजह जान सकी और न हत्यारों का सुराग लगा सकी. मामन की हत्या जिन 2 युवकों ने की थी, उन्होंने चेहरों पर रूमाल बांध रखे थे, इसलिए हत्या के समय घटनास्थल पर मौजूद प्रत्यक्षदर्शी पुलिस को उन के बारे में कुछ भी नहीं बता सके थे. हां, किसी ने उस पल्सर मोटरसाइकिल का नंबर जरूर बता दिया था, जिस से दोनों हत्यारे भागे थे. पुलिस ने उस नंबर की मोटरसाइकिल के बारे में पता किया तो पता चला कि वह उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर की थी. उस के मालिक ने स्थानीय थाने में 1 नवंबर, 2014 को मोटरसाइकिल की चोरी की रिपोर्ट दर्ज करा रखी थी. बाद में 13 नवंबर, 2014 को वह नरेला के जंगल से बरामद हो गई थी.

दिल्ली के नरेला स्थित गांव बांकनेर के ममनीरपुर रोड पर मामन का आलीशान मकान था. उस इलाके में मामन के 5 अन्य मकान थे, जिन में तमाम किराएदार रहते थे. हर महीने किराए के रूप में उन्हें करीब 3 लाख रुपए मिलते थे. इस के अलावा उन के पास सैकड़ों एकड़ खेती की जमीन थी. साथ ही वह ब्याज पर पैसा देने का काम भी करते थे. ब्याज के भी उन्हें लाखों रुपए मिलते थे. मामन के परिवार में एक बेटा अशोक उर्फ चौटाला और एक बेटी सोनम थी. उन की पत्नी की मौत तब हो गई थी, जब बेटी 11 साल की और बेटा 14 साल का था. सयानी होने पर सोनम की शादी उन्होंने हरियाणा के सोनीपत निवासी सत्येंद्र से कर दी थी.

अशोक का विवाह उन्होंने दिल्ली के बसंतकुंज के रहने वाले हरिप्रसाद की बेटी रोशनी से किया था. लेकिन अशोक से रोशनी की पटरी नहीं बैठी. वह तलाक ले कर मायके में रहने लगी. अदालत के आदेश पर उसे हर महीने 20 हजार रुपए गुजाराभत्ता मिलता था, जिसे अशोक हर माह अदालत में जमा करता था. अशोक राजा हरिशचंद्र अस्पताल में सिक्युरिटी गार्ड की नौकरी करता था. मतभेदों के चलते मामन ने उसे घर से निकाल दिया था. वह मामन के बनवाए दूसरे मकान में अकेला रहता था.

मामन काफी मिलनसार थे. उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. दुश्मनी होती भी कैसे, वह हर किसी के सुखदुख में खड़े रहते थे. किसी बीमार को इलाज के लिए पैसों की जरूरत होती अथवा किसी की बेटी की शादी होती तो वह बिना ब्याज के पैसा देते थे. जितनी हो सकती थी, मदद भी करते थे. इसी वजह से इलाके के लोग उन की इज्जत करते थे. ऐसे आदमी की किसी से ऐसी क्या दुश्मनी हो सकती थी, यह बात पुलिस समझ नहीं पा रही थी. थाना नरेला पुलिस ने अपने स्तर से काफी छानबीन की, लेकिन वह हत्यारों का सुराग नहीं लगा सकी. जब थाना पुलिस इस मामले में कुछ नहीं कर सकी तो 13 फरवरी, 2015 को यह मामला दिल्ली की अपराध शाखा को सौंप दिया गया.

अपराध शाखा के जौइंट कमिश्नर रविंद्र कुमार ने थाना नरेला पुलिस द्वारा की गई जांच का अध्ययन करने के बाद यह केस क्राइम ब्रांच के एडिशनल कमिश्नर अजय कुमार को सौंप दिया. अजय कुमार ने इस मामले की जांच के लिए क्राइम ब्रांच के डीसीपी राजीव कुमार के नेतृत्व में एक टीम बनाई, जिस में क्राइम ब्रांच के एसीपी जितेंद्र सिंह, इंसपेक्टर अशोक कुमार आदि को शामिल किया गया.

थाना नरेला पुलिस ने अपनी जांच की जो फाइल तैयार की थी, इंसपेक्टर अशोक कुमार ने उसे ध्यान से पढ़ा. उन्हें इस बात पर हैरानी हुई कि थाना पुलिस ने मामन , उन के बेटे अशोक, बेटी सोनम व सोनम के पति के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच करने की जहमत नहीं उठाई थी, जबकि आजकल तमाम केसों का खुलासा मोबाइल फोन से ही हो जाता है. अशोक कुमार ने तुरंत मृतक मामन, उन के बेटे अशोक उर्फ चौटाला, बेटी सोनम और उस के पति सत्येंद्र के मोबाइल नंबरों को सर्विलांस पर लगवाने के साथ उन के नंबरों की 1 नवंबर से 15 नवंबर, 2014 तक की काल डिटेल्स निकलवाई. उन्होंने तीनों की काल डिटेल्स को ध्यान से देखी तो मामन के बेटे अशोक उर्फ चौटाला की काल डिटेल्स में एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर उन्हें संदेह हुआ.

अशोक उर्फ चौटाला ने उस नंबर पर 1 नवंबर, 2014 की सुबह, दोपहर, शाम और रात में फोन कर के काफी देर तक बातें की थीं. इस के अलावा इसी नंबर पर उस ने 2 नवंबर की सुबह 5 बजे, 11 बजे और शाम 6 बजे बातें की थीं. उसी दिन सुबह सवा 7 बजे मामन की हत्या हुई थी. इस के बाद अशोक उर्फ चौटाला की उसी नंबर पर 25 दिसंबर से ले कर 28 दिसंबर, 2014 तक कुल 13 बार बातें हुईं थीं. इस के बाद 13 जनवरी से ले कर 17 जनवरी, 2015 तक 8 बार बातें हुई थीं.

जिस नंबर पर बातें हुई थीं, वह नंबर रिलायंस का था. अशोक कुमार ने रिलायंस से इस नंबर के बारे में पता किया तो बताया गया कि वह नंबर उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के रहने वाले नीतू उर्फ काला का है. हत्या में जिस मोटरसाइकिल का उपयोग हुआ था, वह भी बिजनौर की थी, इसलिए अशोक कुमार को लगा कि हत्या नीतू उर्फ काला ने ही की है. उन्होंने बिजनौर पुलिस से संपर्क कर के नीतू उर्फ काला के बारे में जानकारी मांगी तो पता चला कि 26 वर्षीय नीतू उर्फ काला पेशेवर अपराधी है. उस के खिलाफ उत्तर प्रदेश और हरियाणा के अनेक थानों में लूट, हत्या, हत्या की कोशिश और रंगदारी के कई मुकदमे दर्ज थे. काला कई बार जेल भी जा चुका था. उस समय वह जमानत पर छूटा हुआ था. बिजनौर पुलिस ने उसे जिला बदर कर रखा था.

जब अशोक उर्फ चौटाला पूरी तरह संदेह के घेरे में आ गया तो अशोक कुमार ने अपने कुछ मुखबिर मामन के बेटे अशोक के पीछे लगा दिए. आखिर एक दिन उन्हें किसी मुखबिर से पता चला कि अशोक की शराब के ठेके पर 2 लोगों से झड़प हो रही थी. वे लोग उस से अपने पैसे मांग रहे थे, जो अशोक ने हत्या के एवज में देने का वादा किया था. इस के बाद अशोक कुमार ने उन दोनों लोगों के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि वे दोनों नीतू उर्फ काला और हरियाणा के सोनीपत का रहने वाला सुपारी किलर जितेंद्र उर्फ टिंकू थे. यह भी जानकारी मिली कि जितेंद्र काला का जिगरी दोस्त है. उस पर भी हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश में कई संगीन अपराधों के मुकदमे दर्ज हैं. ये दोनों मिल कर अपराध करते हैं.

इस के बाद अशोक कुमार ने अपनी टीम के साथ हर उस जगह छापा मारा, जहां काला और टिंकू मिल सकते थे. लेकिन वे कहीं नहीं मिले. अलबत्ता इस काररवाई में यह जरूर पता चला कि टिंकू दिल्ली के छावला स्थित गांव ख्याला खुर्द में किराए का मकान ले कर रहता है, जबकि काला दिल्ली के नरेला के सैक्टर ए-6 के पौकेट 1 में मकान नंबर 167 में किराए पर रहता है. लेकिन दोनों वहां भी नहीं मिले. इसी बीच पुलिस को पता चला कि मृतक मामन के बेटे अशोक ने 90 लाख में 2 एकड़ जमीन बेची है.

मामन का बेटा शक के दायरे में आया था तो अशोक कुमार ने उन की बेटी सोनम के सोनीपत स्थित घर जा कर पूछताछ की थी. इस पूछताछ में उन्होंने जरा भी यह जाहिर नहीं होने दिया था कि उन्हें उस के भाई पर शक है. उन का पहला सवाल था, ‘‘तुम्हारे पिता की किसी से ऐसी कोई दुश्मनी तो नहीं थी, जिस की वजह से उन की हत्या की गई हो?’’

‘‘पापा बहुत अच्छे इंसान थे,’’ सोनम ने कहा, ‘‘वह हर किसी के दुखसुख में खड़े रहते थे. भला ऐसे आदमी की किसी से क्या दुश्मनी हो सकती थी?’’

‘‘फिर भी उन की हत्या हो गई. हत्या की कोई तो वजह होगी? तुम्हारे ख्याल से क्या वजह हो सकती है?’’ अशोक कुमार ने पूछा.

सोनम कुछ क्षण सिर नीचा किए बैठी रही. उस के बाद गहरी सांस ले कर बोली, ‘‘क्या कहूं सर, मेरे ख्याल से पापा की हत्या संपत्ति की वजह से हुई है. मेरा भाई बहुत ज्यादा लाड़प्यार की वजह से बिगड़ गया था. वह अय्याश और नशेबाज है. जुआ भी खेलता है. उस की इन गलत आदतों की वजह से पापा ने उसे और उस की पत्नी को अलग मकान दे कर घर से निकाल दिया था. कोई कारोबार करने के लिए उसे 6-7 लाख रुपए भी दिए थे. भाई ने कारोबार करने के बजाय वे रुपए अपने गलत शौकों में उड़ा दिए. उस के बाद वह लोगों से कर्ज ले कर खर्च करता रहा. पता चला है कि इस समय एक करोड़ के करीब कर्ज है. कर्ज देने वाले उसे परेशान कर रहे थे.’’

‘‘तुम्हारे कहने का मतलब है कि तुम्हारे भाई ने पिता की हत्या कराई है?’’

‘‘मुझे तो ऐसा ही लगता है.’’

‘‘तुम्हारे पिता के पास कितनी संपत्ति होगी?’’

‘‘कई मकान, सैकड़ों एकड़ जमीन, करोड़ों का बैंक बैलेंस. कुल मिला कर सौ करोड़ से ज्यादा की संपत्ति होगी.’’

‘‘इतनी संपत्ति के लिए तो तुम भी पिता की हत्या करवा सकती हो?’’

‘‘मैं पापा की हत्या क्यों कराऊंगी. सारी संपत्ति तो वैसे ही वह मेरे नाम करने जा रहे थे.’’

‘‘यह बात तुम्हारे भाई को पता थी?’’

‘‘जी पता थी. इस बात को ले कर वह अकसर पापा और मुझ से झगड़ा भी करता रहता था. पापा ने उस से कह भी दिया था कि वह उसे एक पैसा नहीं देंगे.’’

इस के बाद उन्होंने अशोक उर्फ चौटाला की तलाकशुदा पत्नी रोशनी के घर जा कर पूछताछ की थी. रोशनी ने बताया था कि अशोक शराबी, जुआरी, बाजारू औरतों के पास जा कर मुंह काला करने वाला बदतमीज इंसान है. ऐसे आदमी के साथ कौन औरत गुजारा कर सकती है. परेशान हो कर उस ने भी तलाक ले लिया. उस के ससुर बहुत अच्छे आदमी थे. अपने गलत शौक पूरे करने के लिए अशोक उन से पैसे मांगता था. पैसे न मिलने पर वह उन के साथ गालीगलौज करता था. कई बार उस ने उन्हें जान से मरवाने की धमकी भी दी थी. जरूर उसी ने उन की हत्या कराई होगी.

अशोक कुमार ने ये सारी बातें एसीपी जितेंद्र सिंह को बताईं तो उन्होंने तुरंत अशोक उर्फ चौटाला को हिरासत में लेने का आदेश दे दिया. इस के बाद 22 सितंबर, 2015 को अशोक कुमार की टीम अशोक उर्फ चौटाला को हिरासत में ले कर नेहरू प्लेस स्थित थाना क्राइम ब्रांच ले आई, जहां उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की जाने लगी. पुलिस के पास उस के खिलाफ सारे सबूत थे ही, मजबूरन उसे अपना अपराध स्वीकार कर के सच बताना पड़ा.

इस के बाद पुलिस टीम ने अशोक उर्फ चौटाला की निशानदेही पर जितेंद्र उर्फ टिंकू और नीतू उर्फ काला को भी दिल्ली के छावला इलाके से गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने 23 सितंबर, 2015 को तीनों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर के अदालत में पेश किया, जहां से पूछताछ के लिए तीनों को एक दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड के दौरान पुलिस ने नीतू और टिंकू की निशानदेही पर गांव ख्याला खुर्द के एक बाग से हत्या में प्रयुक्त गुप्ती बरामद कर ली. रिमांड खत्म होने पर तीनों को 24 सितंबर, 2015 को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया.

हत्याभियुक्तों के बयान के आधार पर मामन की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस तरह थी: मामन पुश्तैनी रईस थे, लेकिन वह उन रईसों में नहीं थे, जो विरासत में मिली धनसंपत्ति से ऐश करते हैं. उन्होंने पुरखों से मिली धनसंपत्ति का सदुपयोग करते हुए उस में इजाफा ही किया था. उन की पत्नी की मौत तभी हो गई थी जब बेटा अशोक 14 साल का और बेटी सोनम 11 साल की थी. लोगों के कहने पर भी उन्होंने दूसरी शादी नहीं की थी और बच्चों को खुद ही पालने लगे थे. अधिक लाड़प्यार की वजह से बेटा अशोक बिगड़ गया था.

गलत संगत की वजह से वह किशोरावस्था से ही गंदी आदतों का शिकार हो गया. पिता से उसे मनचाहा जेब खर्च मिलता ही था, इसलिए उस के तमाम दोस्त भी थे. उन के साथ वह नशा करता, जुआ खेलता और बाजारू लड़कियों के साथ अय्याशी करता. इन बातों की जानकारी जब मामन को हुई तो उन्होंने अशोक को जेब खर्च देना बंद कर दिया. लेकिन अब तक अशोक पूरी तरह बिगड़ चुका था. पैसे न मिलने पर वह घर में चोरी करने लगा. अब तक वह 24 साल का हो चुका था. मामन ने सोचा कि अगर उस का विवाह कर दें तो जिम्मेदारी पड़ने पर शायद वह सुधर ही जाए.

उन्होंने अशोक का विवाह रोशनी से कर दिया. लेकिन वह नहीं सुधरा. वह पहले की ही तरह शराब पीता और बाजारू औरतों के पास जाता. पत्नी उसे रोकती तो वह उस के साथ मारपीट करता. तंग आ कर मामन ने अशोक को घर से निकाल दिया. उसे और उस की पत्नी के रहने के लिए दूसरा मकान दे दिया. वह कोई कामधंधा कर सके, इस के लिए उसे 7 लाख रुपए भी दिए. अशोक चाहता तो इतने से अपनी गृहस्थी चला सकता था. लेकिन उस ने कामधंधा करने के बजाय सारे रुपए अपनी गंदी आदतों में उड़ा दिए.

पति की गलत आदतों और रोजरोज की मारपीट से तंग आ कर रोशनी पति का साथ छोड़ कर मायके में रहने लगी थी. साथ ही उस ने तलाक का मुकदमा भी दायर कर दिया. उन दिनों अशोक राजा हरिश्चंद्र अस्पताल में गार्ड की नौकरी करता था. अदालत में तलाक का मुकदमा चला और सन् 2010 में अदालत ने निर्णय दिया कि अशोक रोशनी को हर महीने 20 हजार रुपए गुजाराभत्ता देगा. अशोक को जो वेतन मिलता था, उस से उस का ही खर्च पूरा नहीं होता था. इसलिए वह लोगों से रुपए उधार ले कर अपने शौक पूरा करता था. धीरेधीरे उस पर 70 लाख रुपए का कर्ज हो गया था.

जब काफी दिन हो गए तो कर्ज देने वाले उस से अपना रुपया मांगने लगे. इसी बीच अशोक को अस्पताल की एक नर्स से प्यार हो गया. पैसे न होने की वजह से वह उस की फरमाइशें पूरी नहीं कर पा रहा था. वह उस नर्स से शादी करना चाहता था. कर्ज चुकाने और शादी के लिए उसे पैसे चाहिए थे. इस के लिए वह पिता से मिला और उन से 2 करोड़ रुपए मांगे. मामन ने उसे लताड़ते हुए कहा, ‘‘2 करोड़ तो क्या, मैं तुम्हें 2 पैसे भी नहीं दूंगा. मैं ने सोच लिया है कि मेरा बेटा मर चुका है. तुम से अब मेरा कोई संबंध नहीं है. आइंदा तुम मुझ से मिलने भी मत आना.’’

अक्टूबर, 2014 में अशोक को एक वकील के जरिए पता चला कि मामन उसे अपनी संपत्ति से बेदखल कर के सारी संपत्ति सोनम के नाम करवा रहे हैं. यह जान कर अशोक क्रोध में पागल हो उठा और शराब पी कर मामन के पास पहुंच गया. जब वह उन से गालीगलौज करने लगा तो मामन ने उसे दुत्कारते हुए कहा, ‘‘मैं ने तो पहले ही कहा था कि मेरा कोई बेटा नहीं है. था भी तो मैं ने उसे मरा मान लिया है. मेरी संपत्ति में अब तुम्हारा कोई हक नहीं है.’’

‘‘मैं तुम्हें सारी प्रौपर्टी सोनम के नाम नहीं करने दूंगा.’’

‘‘क्या करेगा तू…?’’ मामन चीखे.

‘‘तुम्हें जिंदा नहीं रहने दूंगा.’’

‘‘धमकी देता है मुझे.’’

‘‘धमकी नहीं, सच कह रहा हूं. अगर तुम ने आधी संपत्ति मेरे नाम नहीं की तो मैं तुम्हें मरवा दूंगा. मेरी समझ में यह नहीं आता कि तुम वक्त से पहले क्यों मरना चाहते हो?’’

‘‘निकल जा यहां से.’’

‘‘इस का मतलब तुम नहीं मानोगे. तो ठीक है, मरने की तैयारी कर लो. लेकिन एक बार और सोच लेना. मरने के बाद क्या ले जा सकोगे यहां से. तुम्हारी मौत के बाद सबकुछ मेरा और सोनम का ही होगा.’’

‘‘जीतेजी मैं तुझे एक पैसा नहीं दूंगा.’’

‘‘यानी तुम ने मरने का फैसला कर लिया है. चलता हूं, अब हम जीते जी कभी नहीं मिलेंगे.’’ हंसता हुआ अशोक चला गया.

अशोक नरेला सैक्टर ए-6 में रहने वाले नीतू उर्फ काला को जानता था. उसे पता था कि काला सुपारी किलर है. वह काला से मिला और उसे 20 लाख रुपए में पिता के कत्ल की सुपारी दे दी. उस ने कर्ज ले कर एडवांस के रूप में उसे 14 लाख रुपए दे भी दे दिए. बाकी रकम उस ने काम होने के 2-3 महीने बाद जमीन बेच कर देने को कहा. नीतू उर्फ काला ने अपने आपराधिक सहयोगी जितेंद्र उर्फ टिंकू के साथ मिल कर मामन के कत्ल की योजना बनाई. दोनों ने कई दिनों तक मामन की गतिविधियों पर नजर रखी. मामन को ठिकाने लगाने के लिए उसे सुबह का समय ठीक लगा. दोनों ने बिजनौर से एक मोटरसाइकिल चोरी की और हत्या के लिए एक गुप्ती भी वहीं से खरीदी.

योजना के अनुसार, 2 नवंबर, 2014 की सुबह दोनों ने चोरी की मोटरसाइकिल से मामन का पीछा किया और गुप्ती से गोद कर उन की हत्या कर दी. उन्होंने मोटरसाइकिल वहीं जंगल में छोड़ दी और हरियाणा चले गए. इस के बाद वे जबतब अशोक से फोन पर बात करते रहे. जब दोनों को पता चला कि अशोक ने 2 एकड़ जमीन 90 लाख रुपए में बेची है तो उन्होंने फोन कर के अपनी बकाया रकम मांगी. लेकिन अशोक ने 70 लाख रुपए का कर्ज अदा करने के बाद जो पैसे बचे थे, उन्हें अय्याशी में खर्च कर दिए थे.

बकाया रकम के लिए दोनों की अशोक से अकसर झड़प होती रहती थी. नीतू और टिंकू को जब पता चला कि अशोक के नाम पिता की आधी संपत्ति होने वाली है और वह करोड़ों की है तो वे उस से 4 करोड़ रुपए मांगने लगे. रकम न देने पर वे उसे पुलिस से सच्चाई बताने की धमकी दे रहे थे. एक दिन जब नरेला स्थित शराब के ठेके पर नीतू और टिंकू की अशोक से झड़प हो रही थी, तभी वहां मौजूद मुखबिर ने उन की बातें सुन ली थीं. उस के बाद उस ने सारी बातें अशोक कुमार को बता दी थीं. इस तरह मामन की हत्या का राज खुल गया और हत्यारे पकड़े गए. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है.

Cyber Crime: एमबीए ठगों का जाल

Cyber Crime: रेहान के पास एमबीए की डिग्री थी. वह कोई अच्छी नौकरी या काम कर सकता था, लेकिन उस के फितरती दिमाग में इंटरनेट के जरिए लोगों को ठगने का ऐसा आइडिया आया, जिस ने उसे साथियों के साथ जेल पहुंचा दिया. समाज में ऐसे युवाओं की कमी नहीं है, जो आधुनिकता की चकाचौंध से प्रभावित हो कर बहुत कम समय में सफलताओं की इमारत खड़ी करने के सपने देखते हैं. वे सोचते हैं कि उन के पास सभी भौतिक सुविधाएं और ढेर सारी दौलत हो. महत्त्वाकांक्षाओं की हवाएं जब उन के दिलोदिमाग में सनसनाती हैं तो सोच खुदबखुद इस की गुलाम हो जाती है. सोच की यह गुलामी उन्हें इसलिए बुरी भी नहीं लगती, क्योंकि इस से उन्हें ख्वाबों में कल्पनाओं के खूबसूरत महल नजर आने लगते हैं. रिहान भी कुछ ऐसी ही सोच का शिकार था.

एमबीए पास कंप्यूटर एक्सपर्ट रिहान का ख्वाब था कि किसी भी तरह उस के पास इतनी दौलत आ जाए कि जिंदगी ऐशोआराम से बीते. यह कैसे हो, इस के लिए वक्त के दरिया में तैराकी करते हुए वह दिनरात अपने दिमाग को दौड़ाता रहता था. कुछ विचार उसे सही नजर आए, मगर उन विचारों को क्रियान्वित करने के लिए पैसों की जरूरत थी, जो उस के पास नहीं थे. क्योंकि वह बेरोजगारी की गर्दिश झेल रहा था. लिहाजा उन विचारों का उस के लिए कोई महत्त्व नहीं रहा.

फिलहाल उस के सामने सब से बड़ी समस्या पैसों की थी, इसलिए वह अपने लिए सही नौकरी तलाशने लगा. इस के लिए उस ने कई जगह हाथपैर मारे, लेकिन जब उसे मन मुताबिक नौकरी नहीं मिली तो उस ने सन 2014 में एक फाइनैंस कंपनी में नौकरी कर ली. यह कंपनी लोगों को विभिन्न बैंकों से लोन दिलाने का काम करती थी. इस के बदले वह लोन लेने वालों से तयशुदा कमीशन लेती थी.

रिहान उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर स्थित कोतवाली क्षेत्र की पुरानी तहसील मोहल्ले का रहने वाला था. उस के पिता अख्तर नवाज का कई सालों पहले इंतकाल हो गया था. पति की मौत के सदमे में मां का साया भी उस के सिर से उठ गया. रिहान उन का एकलौता बेटा था. बाद में उस के चाचा मजहर ने न सिर्फ उस की परवरिश की, बल्कि उन्होंने उसे बेहतर तालीम भी दिलाई. रिहान लंबातगड़ा, आकर्षक कदकाठी का युवक था. उस का लाइफस्टाइल भी आधुनिक था. वह जितना कमाता था, उस से उस के महंगे शौक भी मुश्किल से पूरे होते थे. महत्त्वाकांक्षी होने के साथसाथ वह तेजतर्रार भी था.

जिस फाइनैंस कंपनी में वह नौकरी कर रहा था, वहां काम करतेकरते उसे यह बात समझ में आ गई थी कि यह कंपनी पाकसाफ काम नहीं करती, बल्कि लोगों को सपनों में उलझा कर उन के साथ ठगी करती है. एक दिन औफिस में उस के सामने जो वाकया पेश आया, उस से इस बात की पुष्टि तो हो ही गई, साथ ही उसे भी कुछ ऐसा ही काम करने की प्रेरणा मिल गई.

दरअसल, एक दिन औफिस में एक ग्राहक आ कर झगड़ने लगा. लोन पास कराने के लिए उस ने कंपनी को 25 हजार रुपए फाइल खर्च व अन्य खर्चों के नाम पर जमा कर दिए थे. इस के बावजूद भी कंपनी वाले उसे लोन नहीं दिला रहे थे. इस के लिए वह पहले भी कई बार औफिस के चक्कर लगा चुका था, लेकिन उस दिन वह गुस्से में दिखाई पड़ रहा था. औफिस में आते ही वह रिसैप्शनिस्ट के सामने पड़ी कुरसी पर बैठ गया. फिर उस से मुखातिब होते हुए बोला, ‘‘आज तो मैं कुछ फैसला कर के ही जाऊंगा. पैसे लेने के बावजूद भी मुझे लोन नहीं दिलाया जा रहा, मेरा काम नहीं हो रहा है तो मेरे पैसे वापस करो.’’

उस के तीखे तेवर देख कर रिसैप्शनिस्ट ने उसे समझाने की नाकाम कोशिश की, ‘‘सर, हम कोशिश कर रहे हैं.’’

इस पर वह और भी भड़क गया, ‘‘कोशिश तो आप कई महीनों से कर रहे हैं. बताओ उस का क्या नतीजा निकला? आप को पता है मैं पंजाब से यहां आताजाता हूं. कितने पैसे तो मैं किराए में ही खर्च कर चुका हूं, लेकिन आप लोग मेरी बात को समझ ही नहीं रहे.’’

शोर सुन कर रिहान भी वहीं आ कर खड़ा हो गया था. ग्राहक को समझाते हुए रिसैप्शनिस्ट बोली, ‘‘सौरी सर, आज तो बौस यहां नहीं हैं.’’

यह सुन रिहान को झटका लगा, क्योंकि कंपनी का बौस तो उस समय औफिस में बने अपनी केबिन में ही था.

रिसैप्शनिस्ट की बात से नाराज ग्राहक सख्ती से बोला, ‘‘मैं आज यहां से जाने वाला नहीं हूं. आप उन्हें अभी फोन मिलाइए और पूछिए कि मेरे पैसे कब मिलेंगे?’’

‘‘ओके सर,’’ उस के अडि़यल रुख को देखते हुए रिसैप्शनिस्ट ने तुरंत ही टेबल पर रखे टेलीफोन का स्पीकर औन कर के एक नंबर डायल कर दिया. तभी दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘उपभोक्ता का मोबाइल अभी स्विच औफ है. कृपया थोड़ी देर बाद डायल करें.’ इस के बाद रिसैप्शनिस्ट उस ग्राहक से शांत लहजे में बोली, ‘‘सर, आप फिर कभी आइए, अभी तो सर से बात नहीं हो पा रही है. मैं आप के सामने ही नंबर मिला रही हूं. उन का मोबाइल अभी बंद है.’’

‘‘ओजी ठीक है. मैं फिर आऊंगा और अब की बार अपने पैसे ले कर ही जाऊंगा.’’ खड़े होते हुए वह पंजाबी लहजे में बोला और गुस्से से पैर पटकता हुआ औफिस से निकल गया.

यह सब देख कर रिहान सोच में पड़ गया. इस की वजह भी थी क्योंकि कंपनी के बौस उस समय औफिस में ही थे और दूसरे उन का मोबाइल कभी बंद ही नहीं रहता था. इस बात को भी वह अच्छी तरह से जानता था. जिज्ञासावश उस ने रिसैप्शनिस्ट से पूछा, ‘‘मैडम, बौस का मोबाइल तो कभी बंद नहीं रहता, फिर यह सब…’’

उस की बात पर पहले वह खिलखिला कर हंसी, फिर रहस्यमय अंदाज में बोली, ‘‘रिहान अभी तुम नहीं समझोगे ये सब बातें.’’

‘‘मतलब… अब तो मैडम आप को बताना ही होगा.’’ रिहान ने जिद की.

उस की जिद पर रिसैप्शनिस्ट ने टेबल पर रखे फोन की तरफ इशारा करते हुए बताया, ‘‘रिहान, जब हम इस से बौस का नंबर डायल करते हैं तो हमेशा यही संदेश सुनने को मिलेगा. दरअसल बौस ने अपने मोबाइल में औटोमैटिक सौफ्टवेयर डाला हुआ है. ऐसे ग्राहकों से पीछा छुड़ाने के लिए यही तरीका अपनाना पड़ता है.’’

इन सब बातों से रिहान का दिमाग घूम गया. वह तुरंत एक फाइल के बहाने बौस के केबिन में दाखिल हुआ. उस समय बौस फोन से किसी से बातें कर रहे थे. अब उसे पक्का विश्वास हो गया कि रिसैप्शनिस्ट जो कह रही थी, बिलकुल सच था. उस दिन के बाद रिहान ने कंपनी के काम को और भी जिज्ञासा से समझना शुरू कर दिया. कुछ ही दिनों में पूरी तरह उस की समझ में आ गया कि कंपनी वास्तव में लोगों को लोन दिलाने का ख्वाब दिखा कर ठगी का धंधा करती है. उस के दिमाग में विचार आया कि जिस तरह से यह कंपनी लोगों को बेवकूफ बना कर पैसे ठग रही है, इसी तरह से वह भी लाखों रुपए कमा सकता है.

कंपनी जिस तरह से लोगों को झांसे में लेती थी, उस तरीके को वह यहां काम करते हुए अच्छी तरह से जान गया था. वह इस काम की बारीकियों को भी समझ चुका था. इस कंपनी में सैयद बिलाल उर्फ समी मलिक व अब्दुल बारी भी नौकरी करते थे. ये दोनों युवक भी मेरठ के ही रहने वाले थे. सैयद बिलाल तो उसी की तरह एमबीए पास था. रिहान के पास भी ऊंची तालीम थी. वह चाहता तो कोई अच्छी नौकरी या व्यवसाय कर सकता था, लेकिन उस का दिमाग गलत दिशा में दौड़ने लगा. उस ने मन ही मन सोच लिया कि वह भी अपनी खुद की ऐसी कंपनी खड़ी कर के करोड़ों रुपए कमाएगा.

इस मुद्दे पर रिहान अपने साथियों सैयद बिलाल और अब्दुल बारी से बात की तो वे भी उस का साथ देने के लिए तैयार हो गए. जल्दी ही ज्यादा पैसे कमाने के लालच में तीनों ने एक साथ उस फाइनैंस कंपनी से नौकरी छोड़ दी. लोगों को कंपनी के जाल में उलझाया जा सके, इस के लिए इंटरनेट वेबसाइट का रजिस्ट्रेशन जरूरी था. कंपनी को चूंकि धंधा ही ठगी का करना था, इसलिए वे रजिस्ट्रेशन अपने असली नाम से नहीं कराना चाहते थे.

रिहान ने आकाश शिंदे के नाम से फरजी प्रमाणपत्र बनवाए और उन के माध्यम से एडिशन कारपोरेशन फाइनैंस डौट काम नाम की वेबसाइट बनवाई. इस के बाद उन्होंने शहर के वैस्टर्न कचहरी मार्ग पर कंपनी का एक औफिस भी खोल लिया. औफिस में उन्होंने जरूरी स्टाफ भी रख लिया. यह जनवरी, 2015 की बात थी. उन्होंने वेबसाइट पर दावा किया कि कंपनी विभिन्न बैंकों से हर तरह के लोन दिलाती है. कंपनी का सब से आकर्षक औफर न्यूनतम 4 प्रतिशत ब्याज दर पर लोन दिलाने का था. समाज में ऐसे जरूरतमंद लोगों की कमी नहीं, जिन्हें लोन की जरूरत रहती है. कंपनी की वेबसाइट पर फरजी नामों से लिए गए मोबाइल नंबर भी दिए गए थे.

उन्होंने वेबसाइट पर योजनाबद्ध तरीके से प्रचार किया था. इस का नतीजा यह हुआ कि कुछ ही दिनों में उन के पास लोगों के फोन आने शुरू हो गए. फोनकर्त्ताओं से बेहद लुभावनी बातें की जातीं. उन से कहा जाता कि उन की कंपनी खुद भी लोन देती है और बैंकों से भी दिलाती है. चूंकि बैंकों के साथ उन का करार है, इसलिए उन के माध्यम से बैंक सस्ती ब्याज दरों पर लोन पास कर देती हैं. इन्हीं चिकनीचुपड़ी बातों में लोग फंसते गए. वे लोगों से फाइल चार्ज के नाम पर 5 से 25 हजार रुपए वसूलने लगे. लोगों को चूंकि बिना सख्त नियमों और आधेअधूरे कागजों के साथ मनचाहा लोन मिल जाने की उम्मीद होती थी, लिहाजा वह खुशीखुशी पैसे दे देते थे.

सपनों को बेचने का रिहान का यह धंधा ऐसा चमका कि उस की दुनिया ही बदल गई. फाइल चार्ज के नाम पर ही उन्होंने लाखों रुपए कमा लिए. इस के बाद उन्होंने धीरेधीरे कंपनी का नेटवर्क दूसरे राज्यों में फैलाना शुरू कर दिया. रिहान ने फरजी पहचानपत्रों के आधार पर बैंकों में भी खाते खुलवा लिए थे. उन्हीं खातों में वे लोगों से रकम जमा करवाते थे. उन्होंने जो वेबसाइट बनवाई थी, उस पर कंपनी का पता नहीं दिया था. वे फोन पर ही लोगों से बातें करते थे. उन की पूरी कोशिश यही होती थी कि पूरी काररवाई इंटरनेट के जरिए ही हो.

वे नजदीकी राज्यों के लोगों के बजाय उड़ीसा, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, पंजाब, छत्तीसगढ़, आसाम, पश्चिमी बंगाल, आंध्र प्रदेश, बिहार आदि प्रदेशों के लोगों को ही अपने झांसे में लेने की कोशिश करते थे, ताकि ठगे जाने के बाद वे उन के औफिस के ज्यादा चक्कर न लगा सकें. जिस शख्स के ये पैसे ठगते, वह शख्स बारबार इन के पास फोन करता तो वे अपने फोन नंबर बदल देते थे. ठगी का अहसास होने के बावजूद कोई चाहते हुए भी इन के औफिस नहीं आ पाता था, क्योंकि औफिस उन के यहां से काफी दूर था और जो कोई इन के औफिस में कभी आ भी जाता तो उसे कोई न कोई बहाना बना कर चलता कर दिया जाता था. जो लोग इन के ऊपर ज्यादा दबाव बनाते थे, उन में से जिन लोगों के बैंक में दिए जाने वाले कागजात पूरे होते थे, उन का लोन पास करा देते थे.

धंधे में चमक आई तो उन्होंने समाचार पत्रों में भी विज्ञापन देने शुरू कर दिए. इस का भी उन्हें फायदा मिला. कंपनी का धंधा बढ़ने पर उन्होंने कई बैंकों में फरजी नामपतों पर एक दरजन से ज्यादा खाते खुलवा लिए. वे अलगअलग राज्यों के लोगों को पैसा जमा करने के लिए अलगअलग खाता नंबर देते थे. पैसे जमा होते ही वे तुरंत एटीएम कार्ड से निकाल लेते थे. ग्राहकों को उन के काम पर भरोसा रहे, इसलिए दिखावे के लिए वे अलगअलग राज्यों के स्टांप पेपर और बैंकों के फरजी चैक टेबल रखते थे. जिन्हें दिखा कर वे ग्राहकों को आश्वस्त करते थे कि कई ग्राहकों के चेक उन के यहां तैयार रखे हैं.

औफिस को उन्होंने इस ढंग से सुसज्जित किया था, जिस से लगे कि यह कोई बड़ी लोन कंपनी का औफिस है.

इस बीच उन्होंने एक टेलीफोन कंपनी से सिम कार्ड बिक्री के लिए भी अनुबंध कर लिया. स्टाफ रखने में वे अधिकांश लड़कियों को प्राथमिकता देते थे, ताकि कोई ग्राहक उन से ज्यादा लड़ेझगड़े नहीं.

एक दिन 3 लोग कंपनी के औफिस पहुंचे. देखने और पहनावे से वे गुजराती लग रहे थे. रिसैप्शनिस्ट के पास पहुंचते ही एक ने कहा, ‘‘हमें प्रौपर्टी के लिए लोन चाहिए. हम लोग बहुत दूर से आए हैं.’’

‘‘आप लोग कहां से आए हैं?’’ रिसैप्शनिस्ट बोली.

‘‘जी गुजरात से.’’ उन में से एक आदमी बोला.

‘‘कितना लोन चाहिए आप को?’’ रिसैप्शनिस्ट ने पूछा.

‘‘5 करोड़.’’ उस शख्स ने कहा तो रिसैप्शनिस्ट थोड़ा चकरा गई.

‘‘इतना बड़ा लोन. इस का फाइल चार्ज भी काफी लगेगा.’’ वह बोली.

‘‘कोई बात नहीं मैडम, जो भी चार्ज होगा हम देने को तैयार हैं.’’ कहने के साथ ही उस शख्स ने जेब में हाथ डाल कर 50 हजार रुपए की गड्डी निकाल कर रिसैप्शनिस्ट के सामने रख दी.

तभी रिसैप्शनिस्ट बोली, ‘‘नहींनहीं, अभी रहने दीजिए, यह तो बाद में जमा करना होगा. आप रुकिए, मैं आप को बौस से मिलवाती हूं.’’ कह कर वह केबिन में चली गई. इस के बाद उन तीनों गुजरातियों को भी बौस के औफिस में ले गई. उस केबिन में रिहान और बिलाल बैठे थे. उन दोनों को जब पता चला कि मोटे लोन के लिए वे लोग गुजरात से उन के पास आए हैं तो वे बहुत खुश हुए. लोन लेने के लिए जो लोग आए थे, उन्होंने यह भी बता दिया था कि उन के कुछ पेपर कम पड़ सकते हैं.

बिलाल को जब विश्वास हो गया कि पार्टी पक्की है तो वह बोला, ‘‘पेपरों की आप फिक्र न करें, उन्हें हम पूरे करा देंगे. लेकिन पेपर तैयार करने से पहले आप को फाइल चार्ज वगैरह के पैसे पहले जमा कराने होंगे.’’

‘‘ठीक है, आप जितना बोलेंगे हम कर जमा कर देंगे.’’ उन में से एक ने कहा.

बिलाल ने उन्हें एक सप्ताह के बाद अपने पेपरों के साथ आने को कहा. इस के बाद वे चले गए.

इसी बीच 2 नवंबर, 2015 को उन की कंपनी की वेबसाइट अचानक बंद हो गई. रिहान ने पहले इसे इंटरनेट व कंप्यूटर का कोई टैक्निकल फौल्ट समझा. कई घंटे बाद भी जब वह नहीं चली तो वे समझ गए कि यह वेब निर्माता कंपनी के स्तर से बंद हुई है. तब रिहान ने वेब निर्माता कंपनी के औफिस फोन किया. उन्होंने भी इसे टैक्निकल दिक्कत बताया.

वेबसाइट चल पाती, उस से पहले ही 3 नवंबर को पुलिस वहां दनदनाती हुई पहुंच गई. पुलिस को देख कर औफिस में बैठे सभी लोगों के होश फाख्ता हो गए. पुलिस टीम में वे लोग भी शरीक थे, जो गुजराती क्लाइंट बन कर उन के पास आए थे. रिहान समझ गया कि उस का खेल खत्म हो चुका है. पुलिस ने मौके से रिहान, बिलाल व अब्दुल बारी को गिरफ्तार कर लिया. औफिस की तलाशी ली गई तो वहां से 3 लैपटौप, 6 मोबाइल फोन, 2 लैंडलाइन फोन, 18 एटीएम कार्ड, 2 शौपिंग कार्ड, 6 पैन कार्ड, आधार कार्ड, 15 चैकबुक, विभिन्न राज्यों के लोगों के भरे हुए करीब साढ़े तीन सौ फार्म, 21 छोटीबड़ी मोहरें, कई राज्यों के स्टांप पेपर व अन्य कागजी सामग्री मिली.

पुलिस आरोपियों को बरामद सामान के साथ थाना सिविल लाइंस ले आई और उन से पूछताछ की. पूछताछ के दौरान उन्होंने इंटरनेट के जरिए ठगी का अपना सारा खेल पुलिस को बता दिया. पुलिस ने बेहद चतुराई से उन पर शिकंजा कसा था. दरअसल, भारतीय रिजर्व बैंक के एक पत्र के आधार पर उत्तर प्रदेश पुलिस मुख्यालय में तैनात पुलिस महानिरीक्षक (अपराध) मनोज कुमार झा ने मेरठ पुलिस को सितंबर महीने में इस संबंध में काररवाई करने के निर्देश दिए थे. एसएसपी डी.सी. दुबे ने मामले की जांच थाना सिविल लाइंस पुलिस को करने के निर्देश दिए, साथ ही उन्होंने साइबर यूनिट के प्रभारी कर्मवीर सिंह को भी इस काम में लगा दिया.

जांच में पता चला कि यह कंपनी वास्तव में लोगों के साथ ठगी का धंधा कर रही है. जो मोबाइल नंबर वेबसाइट पर दिए गए थे, जांच में वह भी फरजी आईडी प्रूफ पर लिए हुए पाए गए. जांचपड़ताल में वेबसाइट निर्माता कंपनी का पता भी लग गया. वह कंपनी मेरठ की ही थी. वेबसाइट रजिस्ट्रेशन के समय जो कागजात जमा किए थे, उन की जांच की तो वह भी फरजी पाए गए. वह कागजात आकाश शिंदे के नाम पर थे.

पुलिस को पता चल गया कि कंपनी का संचालन वैस्टर्न कचहरी रोड के एक कार्यालय से किया जा रहा है. जब साइबर युनिट प्रभारी कर्मवीर सिंह को विश्वास हो गया कि कंपनी की बुनियाद फरजीवाड़े पर टिकी है तो उन्होंने अपनी जांच से पुलिस अधीक्षक (अपराध) टी.एस. सिंह, पुलिस उपाधीक्षक एस. वीर कुमार को अवगत करा दिया. पुख्ता जानकारी मिलने के बाद एसएसपी डी.सी. दुबे ने ठगों की गिरफ्तारी के लिए एक पुलिस टीम का गठन किया. इस टीम में थाना सिविल लाइंस प्रभारी इकबाल अहमद कलीम, सबइंसपेक्टर महेश कुमार शर्मा, कर्मवीर सिंह, कांस्टेबल अरविंद कुमार, विजय कुमार, आनंद कुमार व उमेश वर्मा को शामिल किया गया.

एक दिन पुलिस टीम के 3 सदस्य छद्म गुजराती क्लाइंट बन कर उन के औफिस पहुंचे. सदस्यों ने औफिस में जो बात की, उस से पूरा विश्वास हो गया कि ये लोग लोन दिलाने के नाम पर बहुत बड़ी ठगी कर रहे हैं. इस के बाद पुलिस ने उन ठगों की वेबसाइट ब्लौक करा दी और अगले दिन उन के औफिस में छापा मार दिया. विस्तार से की गई पूछताछ में पता चला कि रिहान और उस के साथी लाखों रुपए की ठगी कर चुके हैं. अगले दिन पुलिस ने तीनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

अच्छी डिग्री होने के बावजूद रिहान और उस के साथियों ने लोगों को ठगने की फितरती सोच बनाई थी, उसी सोच ने उन के भविष्य को चौपट कर दिया. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. Cyber Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Pune Crime News: रासिला ने ऐसा सोचा भी न था

Pune Crime News: आईटी क्षेत्र में बंगलुरु की इंफोसिस सौफ्टवेयर कंपनी का एक बड़ा नाम है. केरल की रहने वाली रासिला ओ.पी. इसी कंपनी के पुणे फेज-2 स्थित कंपनी में नौकरी करती थी. वह सौफ्टवेयर इंजीनियर थी. इस कंपनी के प्रोजेक्ट इतने महत्त्वपूर्ण होते हैं कि उन्हें पूरा करने के लिए कर्मचारियों और अधिकारियों को कभीकभी 24-24 घंटे तक काम करना पड़ता है. 29 जनवरी को रविवार था.

शहर के अधिकांश औफिस और प्रतिष्ठान बंद थे. लेकिन इंफोसिस कंपनी का एक प्रोजेक्ट इतना अर्जेंट था कि उसे पूरा करने के लिए कर्मचारियों को रविवार को भी औफिस आना पड़ा था. इस प्रोजेक्ट को पूरा करने की जिम्मेदारी पुणे और बंगलुरु टीम को सौंपी गई थी. रासिला भी उस दिन इसी प्रोजेक्ट की वजह से औफिस आई थी. बंगलुरु में कुछ कर्मचारी अपनेअपने घरों में बैठ कर उस की मदद कर रहे थे.

कंपनी का प्रोजेक्ट लगभग पूरा हो गया था. केवल कुछ ही औपचारिकताएं बाकी रह गई थीं कि शाम 7 बजे अचानक रासिला और बंगलुरु टीम के बीच फोन और ईमेल से होने वाली बातचीत बंद हो गई. बंगलुरु के कर्मचारी समझ नहीं पाए कि अचानक यह क्या हो गया.

तमाम कोशिशों के बाद भी रासिला और बंगलुरु के कर्मचारियों के बीच जब संपर्क नहीं हो पाया तो उन के मन में तरहतरह की आशंकाएं जन्म लेने लगीं. उन्होंने पुणे के बड़गांव में रहने वाले इंफोसिस सौफ्टवेयर के सीनियर एसोसिएट कंसलटेंट और रासिला के प्रोजेक्ट रिपोर्टिंग मैनेजर अभिजीत कोठारी को फोन किया.

उन्हें सारी बातें बता कर रासिला के विषय में पता लगाने के लिए कहा. अभिजीत ने उसी वक्त रासिला को फोन लगाया. उस के फोन की घंटी तो बज रही थी, पर वह फोन नहीं उठा रही थी. इस के बाद उन्होंने पुणे फेज-2 स्थित कंपनी के औफिस के लैंडलाइन पर फोन किया.

फोन एक सिक्योरिटी गार्ड ने उठाया. उस ने अभिजीत को बताया कि वह ड्यूटी पर अभीअभी आया है. उस के पहले ड्यूटी पर सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया था. वह अपनी ड्यूटी पूरी कर के अपना चार्ज उसे दे कर चला गया है. अभिजीत कोठारी ने जब ड्यूटी पर मौजूद गार्ड से रासिला के बारे में पूछा तो गार्ड रासिला की केबिन में गया. इस के बाद उस गार्ड ने जो जानकारी दी, उसे सुन कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

फिर क्या था, कुछ ही देर में अभिजीत कोठारी इंफोसिस के औफिस पहुंच गए. उन्होंने देखा कि औफिस के अंदर रासिला की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. शव के आसपास काफी खून फैला था. चेहरा पूरी तरह किसी भारी और ठोस वस्तु से कुचला गया था. अभिजीत कोठारी ने मामले की जानकारी कंपनी के प्रमुख अधिकारियों और रासिला के परिवार वालों को देने के बाद थाना हिंजवाली पुलिस को दे दी थी.

थाना हिंजवाली के थानाप्रभारी अरुण वायकर अपने सहायकों के साथ तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गए. हत्या की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दे कर वह मामले की जांच में जुट गए. वह घटनास्थल का निरीक्षण कर रहे थे कि पुणे शहर के डीसीपी गणेश शिंदे, एसीपी वैशाली जाधव भी घटनास्थल पर आ गईं.

उन के साथ डौग स्क्वायड और फिंगरप्रिंट ब्यूरो के अधिकारी भी आए थे. सभी ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया तो पाया कि रासिला की हत्या की बड़ी बेरहमी से की गई थी. उस के गले में एक पीले रंग का तार लपेटा हुआ था. वह कंप्यूटर का तार था. पुलिस यह जानने की कोशिश करने लगी कि ऐसा कौन व्यक्ति हो सकता है, जिस ने इस की हत्या के बाद चेहरा तक कुचल दिया.

घटनास्थल की काररवाई पूरी कर के पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए पुणे के मसन अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर अभिजीत कोठारी की ओर से रासिला की हत्या का मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी. शुरुआती जांच में पुलिस को पता चला कि रासिला जिस केबिन में बैठती थी, वह बेहद सुरक्षित थी.

उस का दरवाजा एक विशेष कार्ड के टच होने पर ही खुलता था. इस से पुलिस को यही लगा कि उस की हत्या में किसी ऐसे आदमी का हाथ है, जिस का उस केबिन में आनाजाना था. इस संबंध में पुलिस ने कंपनी के कर्मचारियों से पूछताछ की तो कंपनी का सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया पुलिस के शक के दायरे में आ गया. इस के बाद कंपनी के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी गई तो स्पष्ट हो गया कि सिक्योरिटी गार्ड भावेन ने ही रासिला की हत्या की थी.

एसीपी वैशाली जाधव के निर्देशन में जब पुलिस टीम सिक्योरिटी गार्ड भावेन के घर पर पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला. उस के घर के दरवाजे पर ताला लगा था. पड़ोसियों ने बताया कि भावेन की मां की तबीयत अचानक खराब हो गई थी, इसलिए वह अपने गांव चला गया है. जिस सिक्योरिटी एजेंसी में उस की नियुक्ति थी, उस से संपर्क कर पुलिस ने भावेन के बारे में सारी जानकारी ले ली.

जहांजहां से भावेन के गांव जाने के साधन मिलते थे, उन सभी रास्तों पर नाकेबंदी करवा दी गई. इस के अलावा जांच टीम को 7 भागों में विभाजित कर उन्हें महानगर मुंबई और पुणे के विभिन्न इलाकों के लिए रवाना कर दिया गया. रासिला की हत्या पुणे पुलिस के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुकी थी. क्योंकि पिछले साल आईटी प्रोफेशनल महिला ज्योति कुमारी, नयना पुजारी, दर्शना टोगारी और अंतरा दास की कंपनी के सिक्योरिटी गार्डों द्वारा जिस तरह हत्याएं की गई थीं, उसे देख कर आईटी कंपनियों में काम करने वाली महिलाओं के भीतर डर का माहौल बन गया था.

इसलिए इस मामले का खुलासा करने के लिए वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पर दबाव बढ़ गया था. यही वजह थी कि एसीपी वैशाली जाधव ने इस मामले की जांच अपने हाथों में ले ली थी. आखिरकार एसीपी वैशाली जाधव और उन की टीम की मेहनत रंग लाई और 8 घंटे की कोशिश के बाद सौफ्टवेयर इंजीनियर रासिला के हत्यारे भावेन सैकिया को महानगर मुंबई के छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया गया.

पुलिस टीम जिस समय छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन पहुंची थी, उस समय रात के लगभग 3 बज रहे थे. भावेन सैकिया अपना पूरा चेहरा कंबल के नीचे ढक कर टिकट खिड़की के पास बैठा खिड़की के खुलने का इंतजार कर रहा था. मुखबिर के इशारे पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था.

सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया को ले कर पुलिस पुणे आ गई. उस से थोड़ी पूछताछ कर के उसे पुणे के प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी ए.एस. वारूलकर के सामने पेश कर 4 फरवरी, 2017 तक की रिमांड पर ले लिया. पूछताछ में उस ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. उस ने इस हत्याकांड की जो कहानी बताई, इस प्रकार निकली.

27 वर्षीय भावेन सैकिया मूलरूप से असम के गांव ताती विहार का रहने वाला था. उस के पिता ने 3 शादियां की थीं. भावेन सैकिया उन की तीसरी पत्नी का बेटा था. भावेन महत्त्वाकांक्षी के साथ पढ़ाईलिखाई में भी होशियार था.

उस का स्वभाव उग्र था. इस वजह से उस की अपने सौतेले भाइयों से नहीं पटती थी. 12वीं कक्षा में अच्छे अंक पाने के बाद उस ने स्नातक की पढ़ाई करनी चाही पर उस के सौतेले भाई नहीं चाहते थे कि वह पढ़े. किसी न किसी बात को ले कर वह उस से झगड़ने लगते थे. फिर एक दिन झगड़ा इतना बढ़ गया कि सन 2013 में उस ने अपने सौतेले भाई की हत्या कर दी. हत्या के बाद वह घर से फरार हुआ तो वापस गांव नहीं लौटा.

सन 2014 में वह पुणे पहुंच गया और वहां की एक सिक्योरिटी एजेंसी में सिक्योरिटी गार्ड के पद पर उस की नौकरी लग गई. कंपनी की तरफ से भावेन की तैनाती इंफोसिस सौफ्टवेयर कंपनी के औफिस में हो गई. उस ने औफिस के पास ही हिजवाड़ी जयरामनगर के फेज-3 में एक कमरा किराए पर ले लिया.

नौकरी के दौरान उस में काफी परिवर्तन आ गया था. औफिस में काम करने वाली लड़कियों को वह चाहत की निगाहों से देखता. खूबसूरत लड़कियां उस की कमजोरी बन गई थीं. किसी न किसी बहाने वह उन से बातें करता और उन्हें छूने की कोशिश करता था. इसी प्रकार की कोशिश जब उस ने रासिला ओ.पी. के साथ की तो उस ने भावेन की बात अनदेखी नहीं की, बल्कि उस से अपनी नाराजगी भी जता दी.

घटना के 2 दिन पहले रासिला ने भावेन सैकिया को अपने केबिन में बुला कर काफी डांटाफटकारा और उस की हरकतों की शिकायत ईमेल द्वारा उस की सिक्योरिटी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों से करने की भी धमकी दी. इस धमकी से भावेन काफी डर गया था. उसे लग रहा था कि रासिला उस की शिकायत जरूर कर देगी. उस की शिकायत पर उसे अपनी नौकरी जाने का डर था.

24 वर्षीय रासिला ओझम पोईल पुराईत उर्फ रासिला ओ.पी. मूलरूप से केरल राज्य के कालीकट जिले के गांव कुदमंगलम की रहने वाली थी. उस के पिता ओझम पोईल पुराईत उर्फ राजू ओ.पी. होमगार्ड में एक तृतीय श्रेणी कर्मचारी थे. परिवार में उस के और पिता के अलावा एक बड़ा भाई तेजस कुमार ओ.पी. था. मां पुष्पलता का देहांत उस समय हो गया, जब छोटी थी. दोनों भाईबहन का बचपन बहुत ही गरीबी में बीता था. पिता से ही दोनों को मां का प्यार मिला था. घर की परिस्थतियों को देखते हुए दोनों बच्चों ने मन लगा कर पढ़ाई की.

रासिला और तेजस कुमार दोनों ने 98 प्रतिशत अंकों से 12वीं की परीक्षा पास की. इंजीनियरिंग की परीक्षाएं भी दोनों ने प्रथम श्रेणी से पास की थीं. इंजीनियरिंग के बाद तेजस कुमार को आबूधाबी की एयरलाइंस कंपनी में और रासिला की बंगलुरु की इंफोसिस सौफ्टवेयर कंपनी में असिस्टैंट इंजीनियर के पद पर नौकरी लग गई. अपने बच्चों को अच्छी जगह और अच्छे पद पर देख कर राजू ओ.पी. की सारी चिंताएं दूर हो गईं. रासिला की अच्छी पोस्ट देख कर तो उस की शादी के रिश्ते भी आने शुरू हो गए थे.

रासिला खूबसूरत तो थी ही, साथ ही वह कंपनी की जिस पोस्ट पर काम करती थी, उस की जिम्मेदारी भी अच्छी तरह निभा रही थी. अपने काम और व्यवहार से उस ने कंपनी के कई वरिष्ठ अधिकारियों के दिल में एक खास जगह बना ली थी. इस श्रेणी में एक बड़ा अधिकारी ऐसा था जो रासिला को अपने दिल में एक खास जगह देना चाहता था, पर रासिला को वह पसंद नहीं था. जिस के कारण वह अधिकारी रासिला से चिढ़ गया और उसे किसी न किसी बहाने परेशान करने लगा.

उस अधिकारी से परेशान हो कर रासिला ने कुछ वरिष्ठ अधिकारियों से उस की शिकायत कर दी. साथ ही अपना इस्तीफा भी दे दिया. लेकिन कंपनी ने उस का इस्तीफा स्वीकार नहीं किया. बल्कि कंपनी ने रासिला का ट्रांसफर इंफोसिस कंपनी की पुणे ब्रांच में कर दिया और पुणे के हिजवाड़ी के जयरामनगर फेज-1 में उस के रहने की व्यवस्था भी कर दी. पुणे ब्रांच में रासिला को आए अभी 5 महीने ही हुए थे कि उसे औफिस के सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया से दोचार होना पड़ा.

घटना के दिन सारा औफिस बंद होने के बावजूद भी कंपनी द्वारा सौंपे गए प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए रासिला को अपने औफिस आना पड़ा था. दिन के 2 बजे जब वह अपने औफिस में पहुंची तो काफी खुश थी. उस समय सिक्योरिटी गार्ड भावेन अपनी ड्यूटी पर तैनात था. रासिला ने अपने एक्सेस कार्ड से केबिन का लौक खोला और केबिन के अंदर जा कर अपने बंगलुरु ब्रांच के कुछ साथियों के साथ औनलाइन जुड़ कर अपने प्रोजेक्ट की तैयारी में जुट गई थी.

इधर रासिला की धमकी और अपनी नौकरी को ले कर भावेन काफी परेशान था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे क्या न करे. शिकायत को अपने वरिष्ठ अधिकारियों तक जाने से कैसे रोके इसी बारे में वह सोचने लगा. सोचविचार करने के बाद उस ने खतरनाक फैसला ले लिया.

उस समय रासिला औफिस में अकेली थी. बातचीत करने के लिए मौका अच्छा था. अपनी हरकतों की माफी मांगने के बहाने वह रासिला के केबिन में जाने में कामयाब हो गया. केबिन के अंदर पहुंचते ही उस ने रासिला से कहा, ‘‘मैडम, आप मेरी शिकायत मेरे अधिकारियों से नहीं करना वरना मेरी नौकरी चली जाएगी और मैं बेकार हो जाऊंगा.’’ वह गिड़गिड़ाया.

रासिला ने एक बार गार्ड के चेहरे को देखा. जिस पर मिलेजुले खौफ का असर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था. हालांकि रासिला ने उस की हरकतों को नजरअंदाज कर दिया था. लेकिन वह उसे थोड़ा और सबक सिखाना चाहती थी, जिस से वह सुधर जाए. इसलिए वह गंभीर होते हुए बोली, ‘‘नौकरी चली जाएगी, बेकार हो जाओगे तो मैं क्या करूं. तुम्हें  लड़कियों को परेशान करने का बड़ा शौक है न, अब भुगतो, मैं ने तो तुम्हारी शिकायत तुम्हारी कंपनी के सीनियर अधिकारियों को ईमेल से कर दी है. अब जाओ गांव में ही बैठना.’’

यह सुन कर भावेन का चेहरा क्रोध से तमतमा उठा. अपने आपे से बाहर होते हुए उस ने इंटरनेट का वायर खींच कर रासिला के गले में डालते हुए कहा, ‘‘मैडम, यह तुम ने अच्छा नहीं किया. अब तुम्हें इस की सजा तो भुगतनी ही पड़ेगी.’’

रासिला उस का इरादा जान कर अपने बचाव के लिए काफी चीखीचिल्लाई. पर उस वक्त उस की मदद के लिए वहां कोई नहीं था. उस ने उस इंटरनेट वायर से रासिला का गला घोंट दिया. उस की हत्या करने के बाद उस ने अपने बूटों से ठोकरें मारमार कर उस का चेहरा लहूलुहान कर दिया.

रासिला की हत्या करने के बाद जब भावेन का गुस्सा शांत हुआ तो वह बाहर आ कर आराम से अपनी जगह बैठ गया. उसे पुलिस और कानून का डर लगने लगा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अब कहां जाए. गांव जा नहीं सकता था, क्योंकि उस पर सौतेले भाई की  हत्या का आरोप था. पुणे और गांव की पुलिस से बचने के लिए उस के पास कोई रास्ता नहीं था. ऐसे में उसे बस आत्महत्या के अलावा और कोई चारा नहीं दिखा.

उस की ड्यूटी का टाइम भी पूरा हो चुका था. जैसे ही दूसरा सिक्योरिटी गार्ड शिफ्ट बदलने आया तो उसे जिम्मेदारी सौंप कर भावेन औफिस से निकल गया. आत्महत्या करने के लिए वह पुणे रेलवे स्टेशन पर पहुंचा ताकि किसी टे्रेन के सामने कूद कर जीवनलीला खत्म कर ले लेकिन ऐसा करने की उस की हिम्मत नहीं हुई.

फिर उस ने आत्महत्या करने के बजाय किसी दूसरे शहर में जाने का इरादा बनाया. अपने कमरे से उसे कुछ जरूरी सामान भी साथ लेना था. इसलिए कमरे पर पहुंच कर उस ने पड़ोसियों से झूठ कह दिया कि उस की मां की तबीयत खराब है. बैग में कपड़े आदि भर कर वह महानगर मुंबई के छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन पहुंचा. वहां से टिकिट ले कर उसे अपनी किसी मंजिल की ओर रवाना होना था. पर इस के पहले ही वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया. भावेन मराली सैकिया से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने न्यायालय में पेश कर उसे जेल भेज दिया.

पुलिस ने रासिला ओ.पी. के शव को पोस्टमार्टम के बाद उस के पिता राजू ओ.पी. और परिजनों को सौंप दिया. पिता और परिवार वालों का कहना था कि रासिला की हत्या एक साजिश के तहत इंफोसिस कंपनी के ही एक बड़े अधिकारी ने कराई है, जिस की शिकायत उन्होंने हिजवाड़ी पुलिस थाने में दर्ज करवा दी.

पुलिस ने उन्हें भरोसा दिया कि रासिला की हत्या के मामले में जो भी दोषी होगा, उस के खिलाफ सख्त काररवाई की जाएगी. मामले की जांच थानाप्रभारी अरुण वायकर कर रहे थे. कथा लिखे जाने तक भावेन सैकिया की जमानत नहीं हो सकी थी. Pune Crime News

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Haryana Crime News: दोस्त बना जीजा, खतरनाक नतीजा

सुबह का उजाला अभी फैलना शुरू हुआ था कि ‘बचाओ बचाओ’ की मर्मभेदी चीख ने वहां मौजूद लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था. चीखने वाले पर तेजधार हथियार से एक युवक ने हमला किया था, जिस से गंभीर रूप से घायल हो कर वह चीखा था. चीखने के साथ ही वह सड़क पर गिर पड़ा था और गिरते ही बेहोश हो गया था.

उस युवक के गिरते ही उस पर हमला करने वाला युवक लंबे फल का खून सना चाकू हाथ में लिए भागा था. सुबह का समय होने की वजह से वहां बहुत कम लोग थे, लेकिन जो भी थे, वे उस का पीछा करने या पकड़ने की हिम्मत नहीं कर सके थे.

पर उन लोगों ने इतना जरूर किया कि हमलावर के भागने के बाद सड़क पर घायल पड़े युवक को पंचकूला के सैक्टर-6 स्थित जनरल अस्पताल पहुंचा दिया था. उसे देखते ही डाक्टरों ने मृत घोषित करने के साथ इस की सूचना पुलिस को दे दी थी.

सूचना मिलते ही थाना मौलीजागरां के एएसआई गुरमीत सिंह सुबह 7 बजे के करीब अस्पताल पहुंच गए थे. घटना की जानकारी ले कर उन्होंने थानाप्रभारी इंसपेक्टर बलदेव कुमार को सूचित किया तो सिपाही अमित कुमार के साथ वह भी अस्पताल पहुंच गए थे.

जरूरी काररवाई कर के बलदेव कुमार ने उन लोगों से बात की, जो मृतक को अस्पताल ले कर आए थे. वे 2 लोग थे, जिन में एक 19 साल का मोहम्मद चांद था और दूसरा था ड्राइवर अशोक कुमार. पूछताछ में चांद ने बताया था कि वह पंचकूला के सैक्टर-16 की इंदिरा कालोनी के मकान नंबर 1821 में रहता था और सैक्टर-17 की राजीव कालोनी स्थित शरीफ हलाल मीट शौप पर नौकरी करता था.

सुबह जल्दी जा कर चांद ही दुकान खोलता था. मृतक को ही नहीं, उस पर हमला करने वाले को भी वह अच्छी तरह से पहचानता था. वह सुबह 5 बजे दुकान पर पहुंचा तो मुर्गा सप्लाई करने वाली गाड़ी आ गई. गाड़ी के ड्राइवर अशोक कुमार ने मोहम्मद चांद को आवाज दे कर गाड़ी से मुर्गे उतारने को कहा.

मोहम्मद चांद गाड़ी के पीछे पहुंचा तो गाड़ी में बैठा ड्राइवर का सहायक इरफान उतर कर उस के पास आ गया. जैसे ही वह जाली वाला दरवाजा खोल कर मुर्गे निकालने के लिए आगे बढ़ा, शाहबाज हाथ में चाकू लिए वहां आया और इरफान के सिर पर उसी चाकू से वार कर दिया.

वार होते ही इरफान पीछे की ओर घूमा तो शाहबाज ने कहा, ‘तुम ने मेरी भोलीभाली बहन को अपनी मीठीमीठी बातों में फंसा कर मेरी मरजी के खिलाफ उस से शादी की है न? तो आज मैं तुझे उसी का सबक सिखा रहा हूं. आज मैं तुझे जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’

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इस के बाद शाहबाज ने इरफान की छाती, आंख के नीचे और कमर तथा पेट पर लगातार कई वार किए. इरफान ‘बचाओ…बचाओ’ की गुहार लगाते हुए नीचे गिर गया. शाहबाज का गुस्सा और उस के हाथ में चाकू देख कर कोई भी उस के पास जाने की हिम्मत नहीं कर सका.

लेकिन जैसे ही शाहबाज चला गया, मोहम्मद चांद और अशोक कुमार ने किसी तरह इरफान को अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे देखते ही मरा हुआ बताया. ऐसा ही कुछ अशोक कुमार ने भी बताया था, लेकिन उस का कहना था कि वह आगे था. शोर सुन कर पीछे आया. तब तक शाहबाज अपना काम कर के जा चुका था.

इंसपेक्टर बलदेव कुमार ने हत्याकांड के चश्मदीद मोहम्मद चांद के बयान के आधार पर शाहबाज के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने की अनुशंसा कर के तहरीर थाना भेज दी, जहां एफआईआर नंबर 101 पर भादंवि की धारा 302 के तहत यह केस दर्ज कर लिया गया. यह घटना 4 जून, 2016 की है.

उसी दिन पुलिस की एक टीम शाहबाज की तलाश में जुट गई. उस के बारे में पता करने के लिए विश्वस्त मुखबिर भी सक्रिय कर दिए गए थे. मुखबिर की ही सूचना पर शाहबाज को उसी दिन रात में गांव मक्खनमाजरा से गिरफ्तार कर लिया गया.

अदालत से कस्टडी रिमांड ले कर सब से पहले शाहबाज से उस चाकू के बारे में पूछा गया, जिस से उस ने इरफान का कत्ल किया था. 6 जून को उस की निशानदेही पर वह चाकू मौलीजागरां की एक कब्रगाह से बरामद कर लिया गया. उस ने वहां चाकू को पत्थरों के नीचे दबा कर रखा था. लेकिन उस पर लगा खून उस ने साफ कर दिया था.

इस के बाद शाहबाज से इरफान की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के रहने वाले शाहबाज और इरफान एक ही गांव के रहने वाले थे, इसलिए वे एक साथ खेलकूद कर बड़े हुए थे. कुछ दिनों पहले कामधंधे की तलाश में दोनों चंडीगढ़ आ गए. इरफान जहां अपने बड़े भाई के साथ आया था, वहीं शाहबाज अपने पूरे परिवार के साथ आया था. उस के परिवार में अब्बूअम्मी के अलावा एक छोटी बहन साहिबा थी.

चंडीगढ़ में दोनों पंचकूला की सीमा पर बसे गांव मौलीजागरां में थोड़ी दूरी पर अलगअलग किराए के मकान ले कर रहने लगे थे. मौलीजागरां जहां चंडीगढ़ में पड़ता है, वहीं मुख्य सड़क के उस पार की दुकानें हरियाणा के जिला पंचकूला के सैक्टर-17 की राजीव कालोनी के अंतर्गत आती हैं. उन्हीं में से एक दुकान पर शाहबाज जहां मुर्गे काटने का काम करने लगा था, वहीं इरफान को मुर्गे सप्लाई करने वाली गाड़ी पर सहायक की नौकरी मिल गई थी.

अपने हिसाब से दोनों का काम ठीकठाक चल रहा था. शाहबाज के अब्बू को भी नौकरी मिल गई थी. इरफान और शाहबाज हमउम्र थे. दोनों इतने गहरे दोस्त थे कि उन में सगे भाइयों जैसा प्यार था. एक दिन भी दोनों एकदूसरे से मिले बिना नहीं रह पाते थे. एकदूसरे के यहां आनाजाना, खाना खा लेना या फिर कभीकभार सो जाना आम बात थी.

साहिबा भी दोनों के साथ बचपन से खेलतीकूदती आई थी. मगर अब वह जवान हो चुकी थी. घर वाले उस के निकाह के बारे में सोचने लगे थे. देखनेदिखाने की बात चली तो साहिबा ने हिम्मत कर के शरमाते हुए घर वालों से कहा कि वह इरफान से प्यार करती है और उसी से निकाह करना चाहती है.

साहिबा की इस बात से शाहबाज के घर में तूफान सा आ गया. घर का कोई भी आदमी इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं था. शाहबाज ने साफ कहा, ‘‘इस से बड़ी जिल्लत मेरे लिए और क्या होगी कि लोग यह कह कर मेरा मजाक उड़ाएंगे कि अपनी बहन का निकाह करने के लिए ही मैं ने इरफान से दोस्ती की थी. क्या निकाह के लिए सिर्फ वही रह गया है? दुनिया में और कोई लड़का नहीं है? मैं यह निकाह किसी भी कीमत पर नहीं होने दूंगा.’’

शाहबाज ने साहिबा को तो लताड़ा ही, इरफान से भी झगड़ा किया. इरफान ने उसे समझाने की कोशिश करते हुए कहा कि जो भी होगा, घर वालों की रजामंदी से होगा. लेकिन शाहबाज ने साफ कह दिया कि वह साहिबा को भूल जाए और किसी अन्य लड़की से निकाह कर ले, वरना उस के लिए ठीक नहीं होगा.

शाहबाज की इस धमकी का नतीजा यह हुआ कि कुछ दिनों बाद इरफान साहिबा को भगा ले गया और एक धार्मिक स्थल पर दोनों ने निकाह कर लिया. वह वापस आया तो साहिबा को शरीकेहयात बना कर आया. शाहबाज को इस मामले में सारी गलती इरफान की नजर आ रही थी. उस ने अपने दिलोदिमाग में बैठा लिया कि इरफान ने साहिबा के भोलेपन का फायदा उठा कर उसे अपनी बातों में फंसा लिया है.

शाहबाज इरफान से पहले से ही नाराज था, जलती पर घी का काम किया उस ने साहिबा को भगा कर. उस के अब्बू ने इस से बहुत ज्यादा शर्मिंदगी महसूस की. इसी की वजह उन्होंने 2 दिनों बाद ही मौलीजागरां का अपना निवास छोड़ दिया था और वहां से 20 किलोमीटर दूर जा कर कस्बा डेराबस्सी में किराए का मकान ले कर रहने लगे थे. उन्होंने उधर जाना ही छोड़ दिया था. शाहबाज को नौकरी की वजह से उधर जाना पड़ता था.

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जिस मीट की दुकान पर शाहबाज काम करता था, इरफान रोजाना उधर मुर्गे की सप्लाई करने आता था. लेकिन निकाह के बाद वह उधर दिखाई नहीं दिया था. पता चला कि निकाह के दिन से ही उस ने छुट्टी ले रखी है.

4 जून, 2016 की बात है. साहिबा से इरफान को निकाह किए 5 दिन हो गए थे. सुबह के 5 बजे शाहबाज दुकान पर पहुंच कर मुर्गा काटने वाला चाकू तेज कर रहा था. तभी मुर्गेवाली गाड़ी आ कर उस की दुकान से थोड़ी दूरी पर सड़क के किनारे रुकी. इरफान उतर कर गाड़ी के पीछे की ओर आया.

शाहबाज ने उसे आते देखा तो उसे देख कर उस की आंखों में खून उतर आया. उस के पास सोचनेविचारने का वक्त नहीं था. वह मीट काटने वाला चाकू ले कर तेजी से भागता हुआ इरफान के पास पहुंचा और जरा सी देर में उसे मौत के घाट उतार कर भाग गया.

पहले तो उस ने कब्रिस्तान के पास एक जगह चाकू को साफ कर के पत्थरों के नीचे छिपा दिया. उस के बाद बचने के लिए इधरउधर छिपता रहा. लेकिन पुलिस ने उसे पकड़ लिया. उस ने कहा कि इरफान ने काम ही ऐसा किया था, जिस से उसे मारने का कोई अफसोस नहीं है. इरफान ने जो किया था, उस की उसे यही सजा मिलनी चाहिए थी.

पूछताछ के बाद पुलिस ने शाहबाज को फिर से अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में बुड़ैल जेल भेज दिया गया.

बलदेव कुमार ने उस के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर समय से निचली अदालत में दाखिल कर दिया, जहां से सैशन कमिट हो कर 13 सितंबर, 2016 से मामले की सुनवाई चंडीगढ़ के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अतुल कसाना की अदालत में शुरू हुई.

6 अक्तूबर को अदालत ने शाहबाज के खिलाफ धारा 302 का चार्ज फ्रेम कर दिया. उस ने अदालत में खुद को बेकसूर बताते हुए दरख्वास्त की थी कि पुलिस ने एक झूठी कहानी गढ़ कर इस केस में उसे बिना मतलब फंसा दिया है. वह अपने उन बयानों से भी मुकर गया, जो उस ने कस्टडी रिमांड के दौरान पुलिस को दिए थे.

मामले की विधिवत सुनवाई शुरू होते ही अभियोजन पक्ष ने डा. अमनदीप सिंह, डा. गौरव, मोहम्मद चांद, इंतजाम अली, अशोक कुमार, इंसपेक्टर बलदेव कुमार, फोटोग्राफर फूला सिंह, हवलदार सतनाम सिंह, रमेशचंद, धर्मपाल एवं यशपाल के अलावा सीनियर कांस्टेबल कृष्णकुमार, एसआई गुरमीत सिंह, एसआई गुरनाम सिंह और डा. मनदीप सिंह के रूप में 15 गवाह अदालत में पेश किए.

इस के बाद अतिरिक्त पब्लिक प्रौसीक्यूटर ने अभियोजन पक्ष की गवाहियों के पूरी होने के बाद सीआरपीसी की धारा 293 के तहत फोरैंसिक साइंस लैबोरेटरी की रिपोर्ट के अलावा विसरा रिपोर्ट भी पेश की.

अभियोजन पक्ष की काररवाई पूरी होने के बाद 20 जनवरी, 2017 को कोड औफ क्रिमिनल प्रोसीजर की धारा 313 के तहत अभियुक्त शाहबाज का स्टेटमैंट रिकौर्ड किया गया. अभियुक्त ने उक्त सभी गवाहों को झूठ करार देते हुए यही कहा कि वह बेकसूर है. उसे झूठा फंसाया गया है.

बचाव पक्ष की ओर से साहिबा को पेश किया गया. कोड औफ क्रिमिनल प्रोसीजर की धारा 315 के अधीन दर्ज अपने बयान में साहिबा ने अदालत को बताया कि उस ने इरफान से प्रेम विवाह किया था, जिस का परिवार वालों ने पहले तो विरोध किया, लेकिन बाद में मान गए थे.

इरफान ने उसे बताया था कि उस की कुछ गलत लोगों से ऐसी दुश्मनी हो गई है कि वे मौका मिलने पर उस की जान ले सकते हैं. ऐसे में हो सकता है, इरफान को उन्हीं लोगों ने मारा हो, न कि शाहबाज ने.

बचाव पक्ष की ओर से अशोक कुमार को अविश्वसनीय करार देते हुए अदालत ने उसे मुकरा गवाह घोषित करने की गुहार लगाई गई, जो अदालत ने मान भी ली. यह भी दलील दी गई कि पुलिस द्वारा बरामद चाकू पर डाक्टर की रिपोर्ट के मुताबिक मानवीय खून नहीं लगा था.

31 जनवरी, 2017 को विद्वान जज अतुल कसाना ने इस मामले का फैसला सुनाते हुए खुली अदालत में कहा कि उन्होंने दोनों पक्षों को ध्यानपूर्वक सुनने के अलावा सभी साक्ष्यों को गौर से जांचापरखा है, जिन से यह केस शीशे की तरह साफ है. अशोक कुमार को भले मुकरा गवाह करार दिया गया है, लेकिन उस की गवाही को नकारा नहीं जा सकता.

वह भी एक तरह से इस केस का चश्मदीद गवाह था. भले ही उस की गवाही में बाद में कुछ विपरीत बातें सामने आईं, जिस वजह से उसे मुकरा गवाह घोषित किया गया. लेकिन उस की शुरू की गवाही अभियोजन पक्ष को पूरी तरह मजबूती देने में सहायक सिद्ध हुई है.

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चाकू पर मानवीय खून का अंश होने की बात रिपोर्ट में पहले ही आ चुकी है. हालांकि अभियुक्त ने उसे फेंकने से पहले साफ कर दिया था. साहिबा को बचाव पक्ष ने गवाह के रूप में पेश कर के केस की दिशा बदलने का प्रयास किया. लेकिन उस की प्रेम विवाह वाली बात मान लेने से ही प्रौसीक्यूशन की कहानी को बल मिल जाता है.

लिहाजा यह अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में कामयाब रहा है और अभियुक्त शाहबाज खान मृतक मोहम्मद इरफान का कत्ल करने का दोषी पाया गया है. अभी वह जेल में है. सजा की बाबत सुनने के लिए उसे अगले दिन अदालत में पेश किया जाए.

अगले दिन शाहबाज को ला कर अदालत में पेश किया गया तो माननीय एडीजे अतुल कसाना ने उसे उम्रकैद के अलावा 10 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई. Haryana Crime News

– कथा अदालत के फैसले पर आधारित 

Hindi Stories: हुश्न की कीमत

Hindi Stories: लड़कियों के प्रति खासकर हसीन लड़कियों के प्रति सभी का रवैया एक जैसा होता है बेरहम और कांटेदार, जो उस हसीना के शरीर पर खराशें डाल देते हैं. ऐसा ही कुछ जरीना के साथ हुआ, जिस की वजह से वह डौली बन गई.

पहले मेरा नाम जरीना था. उन दिनों मेरे बदन पर ढंग के कपडे़ तक नहीं होते थे. हमारे घर में अच्छा खाना नहीं पकता था. लोग मेरे सिर पर सलीके से जमे हुए दुपट्टे और झुकी हुई निगाहों को देख कर मेरे बारे में दकियानूसी होने का फतवा लगा देते थे. कहने का मतलब कि हम बेहद गरीब थे. मैं अपने वालिदैन के साथ मलेर में रहती थी. यह शहर से कुछ फासले पर गरीबों की बस्ती थी. यहां हुकूमत की तरफ से क्वार्टर बना कर अलाट कर दिए गए थे. अब्बा को भी एक 80 गज का क्वार्टर अलाट हो गया था.

घर में हम 6 लोग थे—अब्बा, अम्मी, हम 2 बहनें और 2 भाई. मैं बहनभाइयों में सब से बड़ी थी. मैं समझती हूं कि लड़कियों को सब से बड़ी नहीं होना चाहिए, वरना उन की आधी उम्र दूसरों को समेटते हुए गुजर जाती है. कम से कम गरीब घराने में अव्वल तो लड़कियों की जरूरत ही नहीं होती. अगर हो भी तो तीसरे या चौथे नंबर पर हो. बहरहाल, अब्बा ने हम सब को एक पास के स्कूल में दाखिला दिला दिया था. जिंदगी बुरीभली गुजर रही थी. अब्बा एक औफिस में काम करते थे. मलेर से शहर का फासला लंबा था, इसलिए अब्बा 5 बजतेबजते घर से औफिस के लिए निकल जाते थे.

मैं ने अपनी कहानी शुरू तो कर दी है, लेकिन यह एक तल्ख कहानी है. अगर आप में हौसला है तो इसे पढ़ें. इस के बाद आप की मरजी है, चाहे गालियां दें या खामोश हो जाएं. लेकिन इतना जरूर जानती हूं कि आप इस बात से इनकार नहीं करेंगे कि इस कहानी के बेशुमार किरदारों में एक आप भी हैं. हां, आप जो एक ट्यूटर हैं, एक दुकानदार हैं, व्यापारी हैं, औफिस में काम करने वाले क्लर्क हैं, मालिक हैं. यह कहानी आप की है, क्योंकि इस समाज को आप ही ने बनाया है. आप चाहे कुछ भी हों, कोई भी हों, इस आईने में अपना चेहरा आप को घिनौना ही नजर आएगा.

हां तो, मैं उस से मुखातिब हो रही हूं, जो रोज स्कूल जाते समय हमारे रास्ते में खड़ा रहता था. उस वक्त हम दोनों बहनें ज्यादा बड़ी नहीं थीं. मेरी उम्र 15 बरस रही होगी और हसीना की 13 बरस. वह खड़ा रहने वाला नौजवान तकरीबन 20 का रहा होगा. वह एक अजीब मिजाज का नौजवान था. उस का गरेबान हमेशा खुला रहता था. बड़ेबड़े बालों को वह तेल लगा कर चिपकाए रखता था. तंग मोरी की पतलून और चारखाने की कमीज में उस का हुलिया बहुत फूहड़ लगता. उस के होंठों के दरम्यान हमेशा एक सिगरेट दबी रहती. वह हम दोनों को देख कर अजीब अंदाज से खंखारता और सीटियां बजाता हुआ पीछेपीछे चलने लगता. हम स्कूल के गेट तक पहुंच जातीं तो वह रफूचक्कर हो जाता. यह उस का रोजाना का काम था. हम दोनों बहनें इस सूरतेहाल से परेशान हो गई थीं.

उन दिनों मुझे जिंदगी के इन पहलुओं के बारे में ज्यादा मालूम नहीं था. घर में रेडियो हुआ करता था. कभीकभी हम नजदीकी सिनेमाघर में जा कर फिल्म देख लिया करती थीं. लेकिन उस जमाने की फिल्में भी बस यूं ही हुआ करती थीं. हम दोनों बहनें अकसर उसी के बारे में बातें करती थीं. हमारी समझ में नहीं आता था कि वह चाहता क्या है? एक दिन रोशी ने अचानक मुझे अहसास दिला दिया. उस ने यह अहसास इस तरह दिलाया था, जैसे अंधेरे में किसी के हाथों में मशाल दे दी जाए और उस मशाल की रोशनी में उसे सब कुछ दिखाई देने लगे. हुआ यों कि रोशी उस दिन स्कूल में कहीं से एक किताब ले आई थी.

रोशी उम्र में मुझ से 2 बरस बड़ी रही होगी, लेकिन पढ़ती मेरी क्लास में थी. उस ने पीरियड खत्म होते ही किताब मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘जरीना, यह देखो, इस में अच्छीअच्छी तसवीरें हैं.’’

मैं किताब देखने लगी. उस में वाकई खूबसूरत लड़कियों की तसवीरें थीं. एक से बढ़ कर एक लिबास पहने हुए. खूबसूरत लिबास पहने हुए खूबसूरत लड़कियां, जिन को देखने से खुशी महसूस होती थी.

‘‘अरे, ये तो वाकई बहुत प्यारीप्यारी लड़कियां हैं.’’ मैं ने कहा.

‘‘हां, हैं तो बहुत प्यारी, लेकिन इन में से कोई भी तुम्हारी तरह नहीं है.’’

‘‘क्या मतलब?’’ मैं ने चौंक कर किताब बंद कर दी.

‘‘तुम जरा अपने आप को आईने में देखो,’’ उस ने कहा, ‘‘तुम्हें खुद अहसास हो जाएगा कि तुम कितनी खूबसूरत हो.’’

मेरा दिल जोरजोर से धड़क उठा. क्या मैं वाकई उतनी खूबसूरत हूं? यह अपने को देखने का जज्बा तो हर एक में हुआ करता है. आप किसी बच्चे की भी जरा सी तारीफ कर दें तो वह इठलाइठला कर चलना शुरू कर देता है.

‘‘यह तुम क्या कह रही हो रोशी? पहले तो किसी ने ऐसी बात नहीं कही.’’

‘‘तो क्या हुआ? मैं सच कहती हूं. तुम्हारी वजह से हंगामा होगा, गोलियां चलेंगी. न जाने कितने नौजवान तुम पर मर मिटेंगे.’’

और उस वक्त मुझे अचानक अहसास हो गया कि वह नौजवान रास्ते में क्यों खड़ा रहता है. रोशी ने अनजाने में एक राज से परदा उठाया था, वरना मैं तो अभी तक उलझी हुई थी. मतलब यह था कि मैं बहुत खूबसूरत थी, इसीलिए वह नौजवान मेरे रास्ते में आया करता था. इस राज से परदा हटते ही अजीब किस्म की घबराहट होने लगी. अगर मैं खूबसूरत थी तो फिर उस को क्या? वह कौन होता था, मेरे रास्ते में खड़ा होने वाला? वह दिन स्कूल में बस इसी किस्म की बातें सोचते हुए गुजर गया.

अगले दिन वह नौजवान फिर दिखाई दिया. इस दफा पहली बार मेरे कदम लड़खड़ाए थे, वरना इस से पहले मैं उसे नजरअंदाज कर दिया करती थी. लेकिन आज एक कदम भी उठाना दूभर हो रहा था. मेरी बहन हसीना ने भी मेरी यह हालत महसूस कर ली थी.

‘‘अरे, क्या हो गया बाजी? चलो न. इतना आहिस्ताआहिस्ता क्यों चल रही हो?’’

मैं ने चौंक कर अपनी रफ्तार तेज कर दी. रोज की तरह वह नौजवान स्कूल के गेट से वापस हो गया था.

उस रात मैं ने अम्मी से उस नौजवान की शिकायत कर दी. अम्मी मेरी बात सुन कर बोलीं, ‘‘तुम्हारा वहम होगा जरीना. हो सकता है, उस का भी रास्ता वही हो.’’

‘‘नहीं अम्मी,’’ हसीना मेरी तरफ से बोली, ‘‘वह वाकई हम दोनों के लिए खड़ा रहता है और बाजी को यों घूरघूर कर देखता है कि क्या बताऊं.’’

अम्मी सोच में पड़ गईं. ऐसी बातें सुन कर गरीब मांएं आमतौर पर सोच में मुब्तिला हो जाती हैं, जबकि अमीर मांएं या तो मुसकरा कर बात टाल देती हैं या ऐसे आवारागर्द का फौरी तौर पर बंदोबस्त कर दिया जाता है. लेकिन मेरी अम्मी गरीब थीं, इसलिए सोचने लगीं और उन्होंने पहली बार मुझे ऐसी निगाहों से देखा, जिन की तपिश मुझे अपने चेहरे पर महसूस होने लगी थी. उन निगाहों में हैरानी भी थी और खौफ भी. बेटी के हुस्न की तारीफ भी और अंदेशे भी. उन निगाहों ने मुझे बेचैन कर दिया. वहां से उठ कर मैं कमरे में आ गई और कमरे में दाखिल होते ही आईना मेरे सामने था.

वह लकड़ी की अलमारी में लगा हुआ धुंधला सा आईना था. लेकिन उस वक्त वह मेरे वजूद से जगमगा रहा था. मैं ने पहली बार आईने को और आईने ने मुझे इस अंदाज से देखा था. मैं अपने आप पर फिदा होने लगी थी. एक खास किस्म का गुरूर, एक अजीब तरह की खुशी. क्या मैं वाकई इतनी खूबसूरत हूं? दूसरी सुबह वह नौजवान फिर दिखाई दिया. मुझे मालूम नहीं था कि अम्मी ने अब्बा से भी इस का जिक्र कर दिया होगा और न हमें यह मालूम था कि उस सुबह वह उस नौजवान की घात में थे. वह रोज की तरह हमारे पीछेपीछे चला और अब्बा न जाने किस तरफ से हाजिर हो कर उस की राह में आ गए.

उस दिन मुझे मालूम हुआ कि जब बेटी की इज्जत दांव पर हो तो एक दुबलेपतले इंसान में भी कितनी ताकत पैदा हो जाती है. अब्बा ने उस नौजवान को धुन कर रख दिया. यह मामला ऐसा था कि हर शख्स उन का साथ देने पर तैयार हो जाता. इसलिए राह चलते लोगों ने भी अब्बा का साथ दिया और वह नौजवान पिटपिटा कर वहां से चला गया. उस के बाद दोबारा वह दिखाई नहीं दिया.

वह तो फिर कभी मेरे रास्ते में नहीं आया, लेकिन आज मैं उसी से मुखातिब हूं. यह तुम ही थे, जिस ने मेरी जिंदगी के तालाब में पहला कंकड़ फेंका था. पहली बार दायरे बनाए थे, हालांकि तुम उस के बाद कभी दिखाई नहीं दिए. वक्त तुम्हें अपने बाजुओं में समेट कर किस तरफ ले गया, मुझे नहीं मालूम. लेकिन तुम ने जो कुछ भी किया, वह मुझे अभी तक याद है. और तुम…अब मैं तुम से मुखातिब हूं, तुम जो मेरे ट्यूटर बने थे. दुबलेपतले, चश्मा लगाए एक सभ्य नौजवान.

मैं ने नौवीं में पहुंच कर साइंस ले ली थी. खयाल था कि बड़ी हो कर डाक्टर बन जाऊंगी. आमतौर पर हर गरीब वालिदैन अपने बच्चों को डाक्टर बनाने के बारे में सोचते हैं या फिर उन्हें इंजीनियर बनाना चाहते हैं. वैसे उन्हें यह भी मालूम होता है कि इस दुनिया में हजार दूसरे काम भी हैं. बहरहाल मैं साइंस पढ़ रही थी.

मैं जहीन इतनी नहीं कि साइंस को बगैर किसी की मदद से पढ़ सकती और हमारी इतनी हैसियत भी नहीं थी कि हम कोई ट्यूटर रख सकते. एक दिन अब्बा के एक दोस्त ने उन्हें एक ट्यूटर की औफर कर दी. यह ट्यूटर उन के दोस्त का बेटा था.

‘‘भाई, अगर तुम चाहो तो मैं कामरान को तुम्हारे घर भेज दिया करूं.’’

‘‘वह तो ठीक है, लेकिन मैं…’’

‘‘ओहो, तुम से फीस कोई नहीं मांग रहा है. क्या मुझे तुम्हारी हालत मालूम नहीं है? तुम फीस की परवाह मत करो. बस बच्ची की तालीम पर ध्यान दो.’’

इस तरह कामरान ट्यूटर बन कर हमारे घर आने लगा. मैं ने महसूस किया कि मेरी खूबसूरती ने उसे बौखला कर रख दिया था. वह पहली मुलाकात में बस देखता ही रह गया और उस वक्त तक देखता रहा, जब तक अम्मी ने चाय की प्याली ला कर उस के सामने नहीं रख दी. वह खुद भी किसी बहाने से सामने वाली चौकी पर बैठ गईं.  उस 80 गज के क्वार्टर में पहले सिर्फ एक कमरा था, कमरे के साथ एक लाइन में किचन, बाथरूम और टायलेट बने हुए थे. लेकिन अब्बा ने दरवाजे के साथ एक छोटा सा कमरा और बनवा लिया था. उन दोनों कमरों के अलावा बाकी सेहन था. मैं उस सेहन में बैठ कर कामरान से पढ़ रही थी. एक चौकी भी उसी सेहन में रखी थी और अम्मी छालियां काटने के बहाने पानदान ले कर उस चौकी पर बैठ गई थीं.

गरीब घरानों की मांएं आमतौर पर इसी अंदाज से ट्यूटर और बेटी के सामने बैठ जाया करती हैं या फिर बहानेबहाने किसी को भी भेजती रहती हैं, जिस से यह मालूम हो सके कि वाकई पढ़ाई हो रही है या मोहब्बत का सबक याद कराया जा रहा है. कामरान ने उस दिन मुझे सिर्फ एक बार गहरी नजरों से देखा था. उस के बाद वह सिर झुकाए पढ़ाता रहा. कुछ देर बाद अम्मी को भी शायद उस की शराफत का अंदाजा हो गया था, इसलिए वह पानदान ले कर वहां से चली गईं. कई दिन बीत गए, अम्मी ने बैठना छोड़ दिया. कामरान अब किसी हद तक मुझ से इधरउधर की बातें कर लेता था. मैं ने महसूस किया कि वह बहुत देर तक मेरे पास बैठा रहता था. हुस्न में बहुत ताकत हुआ करती है.

यह वह जमाना था, जब मुझे अपनी उस ताकत का पूरी तरह ज्ञान हो गया था. आदमी के पास जब कोई दौलत आ जाए तो वह उसे बहुत सावधानी से बचाबचा कर रखता है. वक्त उसे दौलत के इस्तेमाल के तरीके सिखा देता है. मुझे भी यह आ गया था कि मैं किस तरह अपनी इस दौलत से फायदा उठा सकती हूं.

फिर एक दिन कामरान ने एक कदम आगे बढ़ा दिया. बातें वह करता ही था. उस दिन पहली बार मुझ से इजहारे मोहब्बत किया. क्या आप को इस पहली बार के जादू का अंदाजा है? यह ऐसा जादू होता है, जो आंखों के सामने खूबसूरत दृश्यों की चादर तान देता है. कानों में सुरीली घंटियां सी बजने लगती हैं. चेहरे पर चांद प्रकट हो जाता है. कान की लवें तपिश देने लगती हैं.

कामरान ने इजहारे मोहब्बत क्या किया, मेरे अंदर की दुनिया बदल गई. वह मेरी जिंदगी में पहला आदमी था, जिस ने सिर्फ देखते रहने पर संतोष न करते हुए एक कदम आगे बढ़ा दिया था. मैं लहक उठी थी. उस ने बड़े दिलकश अंदाज में कहा था, ‘‘मुझे नहीं मालूम कि मुझे इस किस्म की मोहब्बत करनी चाहिए कि नहीं, क्योंकि मैं तुम्हें पढ़ाने आता हूं. लेकिन जज्बा ऐसा होता है कि किसी बात की परवाह नहीं करता. इश्क अंधा होता है. मैं भी अंधा हो गया हूं. अगर तुम चाहो तो इस अंधे का हाथ थाम सकती हो, वरना हाथ को झटकने का भी अख्तियार है. तुम्हें याद होगा कि मैं ने जब तुम्हें पहली बार देखा तो मेरी क्या हालत हुई थी. जरीना! मैं तुम से मोहब्बत करने लगा हूं…बेपनाह मोहब्बत.’’

उस ने पहली बार मुझे अहसास दिलाया था कि हुस्न सिर्फ देखते रहने के लिए नहीं, बल्कि मोहब्बत करने के लिए हुआ करता है. हम लड़कियां पहली बार की मोहब्बत को नजरअंदाज नहीं करतीं. हर लड़की की जिंदगी में यह ‘पहली बार’ जरूर आता है. लिहाजा मैं भी उस की मोहब्बत का जवाब मोहब्बत से देने की पाबंद हो गई थी.

अब पढ़ाई के साथसाथ प्यार की बातें भी होने लगीं. इस किस्म की बातों का अपना अलग लुत्फ हुआ करता है. उसे पूरी तरह बयान भी नहीं किया जा सकता. बातें करते हुए डरेडरे अंदाज में इधरउधर देखना, एकदूसरे की खैरियत पूछना, एकदूसरे को अपनी मोहब्बत का बारबार यकीन दिलाते रहना, मौका देख कर एकदूसरे का हाथ थाम लेना, यह सब कुछ होता रहा. लेकिन बात इस से आगे नहीं बढ़ सकी.

इस किस्म की मोहब्बत का कोई साफ मकसद भी नहीं हुआ करता. उस वक्त यह खयाल नहीं होता कि इस सिलसिले को आगे किस तरह बढ़ाया जाए. तनहाई में मुलाकातें किस तरह की जाएं. कुछ लोग थोड़ी हिम्मत कर के अपने वालिदैन से अपना राज कह दिया करते हैं और ज्यादातर लोग खामोश रह कर अपने महबूब या महबूबा की शादी का नजारा करते हैं और बाद में कुछ दिनों तक उस की याद में आंसू बहाते रहते हैं. फिर वे खुद भी जमाने की भीड़ में कहीं गुम हो जाया करते हैं.

हमारी यह कहानी ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकी. एक बार अम्मी ने मुझे उस से इस किस्म की बातें करते हुए देखसुन लिया और उस दिन बेचारे की छुट्टी कर दी गई. अम्मी का खयाल था कि यह सिलसिला एकतरफा है, यानी वह यह समझ रही थीं कि जो कुछ भी हुआ है, वह उसी मास्टर की तरफ से हुआ है. हर मां अपनी औलाद के लिए इसी किस्म की खुशफहमी में रहती है. उस के बाद कामरान से मेरी मुलाकात नहीं हो सकी. 1-2 बार मैं ने उस को देखा, लेकिन वह भी दूर से. बहुत उदास नजर आ रहा था. तो कामरान, आज मैं तुम से इसलिए मुखातिब हूं कि तुम ने पूरी तरह मेरे दिल में मोहब्बत के जज्बात जगाए थे.

कामरान के बाद जिंदगी कुछ उदास और बेजार सी हो गई. यह और बात है कि मुझ को अपनी अहमियत का पूरी तरह अंदाजा हो गया था. यह भी अजीब बात थी कि हसीना मेरी तरह हरगिज नहीं थी. देखने वाले मेरे बारे में यह कहा करते थे कि हसीना मेरा नाम होना चाहिए था. हसीना एक आम सी लड़की थी.

फिर वाकयात की रफ्तार में तेजी आ गई. कभीकभी ऐसा होता है कि वाकयात बहुत सुस्त रफ्तार हो जाते हैं. एकएक लम्हा बोझिल होने लगता है और कभीकभी पंख लगा कर उड़ने लगता है. एक दिन अचानक अब्बा का इंतकाल हो गया. घर का एक कोना हमेशा के लिए खाली हो गया. वह कोना मोहब्बत का था, हिफाजत के अहसास का था. उन की मौत के बाद पता चला कि जिंदगी कितनी बेरहम, कितनी दुश्वार है. यह तो रगों से लहू निचोड़ कर रगों को खुश्क कर देती है. हमारे तालीमी खर्चे थे और भूख थी, जो मौत की ही तरह बेरहम हुआ करती है.

मैं उस जमाने में मैट्रिक कर चुकी थी. लेकिन अब्बा के जाते ही तालीम का सिलसिला तोड़ देना पड़ा. इंसान पहले दिन से भूख को तरजीह देता आया है तो भूख की मांग यह थी कि तालीम छोड़ दो. अच्छे लिबास न इस्तेमाल करो और अच्छी जिंदगी से बाज आओ. हम ने यही किया, लेकिन यह भी कब तक चल सकता था?

अब सवाल यह था कि किया क्या जाए? दोनों भाइयों ने नौकरी की तलाश शुरू कर दी, लेकिन नौकरी इतनी आसानी से कहां मिल सकती थी और वह भी उन को, जिन का बाप एक मामूली हैसियत का इंसान रहा हो और वह मर गया हो.

हम सब सिसकती हुई जिंदगी गुजार रहे थे कि एक दिन एक लंबी सी स्याह कार हमारे दरवाजे पर आ कर रुकी. वह पहला मौका था कि हमारे दरवाजे पर कोई गाड़ी आई थी. दरवाजों की ओट से चेहरे झांकने लगे. बच्चों ने कार के गिर्द घेरा डाल दिया. पूरे मोहल्ले में एक शोर सा बरपा हो गया. हम जल्दी से दरवाजे पर आ गए. गाड़ी से उतरने वाली एक मोटी सी औरत थी, जिस ने कीमती साड़ी पहन रखी थी. उस के हाथों में सोने की चूडि़यां थीं. वह सीधे हमारे दरवाजे आ गई. उस की गाड़ी में एक बावर्दी ड्राइवर बैठा था.

‘‘तुम नसीमा हो न?’’ उस मोटी औरत ने अम्मी की तरफ इशारा किया.

‘‘हां,’’ अम्मी ने जल्दी से अपनी गरदन हिला दी, ‘‘लेकिन आप…’’

‘‘मैं साजिदा हूं,’’ उस ने कहा, ‘‘तुम मुझे नहीं जानती, लेकिन मैं तुम से अच्छी तरह वाकिफ हूं.’’

अम्मी असमंजस में पड़ गईं, फिर भी उन्होंने एक तरफ हट कर उसे रास्ता दे दिया. वह मोटी औरत नाकभौं चढ़ाई हुई अंदर आ गई. उसे शायद घर से उठने वाली बू पसंद नहीं आई थी या इतने छोटे घर में उस का दम घुट रहा था. अम्मी ने उसे सेहन में रखी हुई चौकी पर बैठा दिया.

‘‘मैं अभी तक आप को पहचान नहीं सकी.’’ अम्मी ने कहा.

अम्मी की बात का जवाब देने के बजाय उस की निगाहें पूरे घर का जायजा ले रही थीं. मैं और मेरे सारे बहनभाई वहीं खड़े थे. मैं उस की निगाहों के अंदाज से शर्मिंदगी महसूस कर रही थी. वह छोटा सा घर उस की शान के काबिल नहीं था. जिस औरत के पास इतनी शानदार गाड़ी हो, उस का घर भी यकीनन बहुत शानदार होगा. चारों तरफ का जायजा लेने के बाद उस ने अपनी निगाहें मुझ पर गड़ा दीं. मुझे उस की निगाहों से कुछ बेचैनी सी होने लगी थी.

‘‘आप के शौहर के औफिस में शेरवानी साहब काम करते थे. आप ने उन का नाम जरूर सुना होगा?’’

अम्मी को याद आ गया, ‘‘हां हां, याद आया.’’

‘‘मैं उन की बीवी हूं,’’ उस औरत ने बताया, ‘‘मैं तो बहुत दिनों से यहां आने की सोच रही थी, लेकिन फुरसत ही नहीं मिलती थी. आज फुरसत मिली है तो आप लोगों से मिलने चली आई हूं.’’

‘‘आप की बहुत मेहरबानी.’’ अम्मी ने कहा और मेरे एक भाई को कोल्डड्रिंक लाने के लिए दौड़ा दिया.

वह औरत कुछ देर तक बातें करने के बाद चली गई. जातेजाते उस ने हम सब के हाथों पर 100-100 के नोट भी रखती गई. उस की कृपा दृष्टि मुझ पर ज्यादा ही महसूस हो रही थी. मुझे तो यों महसूस हो रहा था, जैसे वह सिर्फ मुझ से ही मिलने आई थी. वह चली तो गई, लेकिन अम्मी को परेशान कर गई. मैं ने महसूस किया कि उस के जाने के बाद वह बहुत देर तक उलझी रही थीं. मैं अम्मी के बाद घर में सब से बड़ी थी, इसलिए मुझे उन की परेशानी पूछने का हक हासिल था.

‘‘मुझे इस औरत का यहां आना अच्छा नहीं लगा.’’ अम्मी बोलीं.

‘‘क्यों? वह तो बहुत अच्छी औरत लग रही थी.’’ मैं ने न जाने क्यों उस की हिमायत की, ‘‘जरा सोचें, हमारे घर में आता ही कौन है और वह भी इतने पैसे वाली औरत…कितनी शानदार गाड़ी थी उस की और उस के हाथों में सोने की चूडि़यां कितनी थीं.’’

‘‘यही तो परेशानी की बात है कि यह सब कुछ जायज नहीं है.’’ अम्मी ने कहा.

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘ओहो, अब तू मुझ से बहस करेगी?’’

‘‘नहीं अम्मी, मैं बहस नहीं कर रही हूं. आप मुझे बताएं न. मैं अब बड़ी हो गई हूं. जब आप ही मुझे अच्छाबुरा नहीं बताएंगी तो कौन बताएगा?’’

‘‘तेरे अब्बा बताया करते थे कि शेरवानी साहब अच्छे आदमी नहीं हैं,’’ अम्मी ने कहा, ‘‘उन के पास बेपनाह दौलत है, जबकि जाहिर है नौकरी से इतनी दौलत कभी नहीं आ सकती.’’

‘‘बस अम्मी, इतनी सी बात? हो सकता है शेरवानी का नौकरी के अलावा और कोई कारोबार हो या जायदाद हो.’’

‘‘अच्छा, अच्छा… अब तू खामोश रह.’’

उस रात मैं और हसीना सोने से पहले उसी की बातें करती रही थीं.

वह खातून एक बार फिर मेरे घर आई. इस बार भी उस के आने से मोहल्ले में हंगामा बरपा हो गया. अम्मी कुछ उखड़ीउखड़ी थीं, लेकिन वह ऐसी औरत थी कि उस ने अम्मी के रवैए का बुरा नहीं माना. उस का ध्यान इस बार भी मुझ पर ही था और जहां तक मेरा सवाल था, मैं उस की दौलत की चमकदमक से प्रभावित हो चुकी थी. उस दिन उस ने एक अजीब हरकत की. उस ने उस वक्त मेरे हाथ में कागज का एक पुरजा थमा दिया, जब अम्मी उस के लिए चाय बनाने गई थीं. वह मुझे कागज देते हुए बोली, ‘‘इस को जल्दी से अपने पास रख लो. इस में मेरा पता है. किसी दिन आ जाना. तुम से जरूरी बात करनी है, लेकिन किसी को पता न चले.’’

मैं ने न जाने क्या सोच कर खामोशी अख्तियार कर ली. मैं ने अम्मी को भी नहीं बताया. अलबत्ता तनहाई में सोचती रही थी कि उस ने मुझे अपने घर क्यों बुलाया है? मैं उस के किस काम आ सकती हूं? मैं तो एक गरीब लड़की हूं और उस के लिए किसी भी तरह फायदेमंद नहीं हो सकती हूं. होना तो यह चाहिए था कि मैं उस की पेशकश को कबूल न करती. मैं ने अम्मी के विश्वास को कभी ठेस नहीं पहुंचाई थी, लेकिन उस की चमकदमक ने मुझे प्रभावित कर रखा था. इस के अलावा मेरे दिल में उत्सुकता भी जाग उठी थी. आखिर मैं ने बहुत सोचविचार के बाद उस के घर जाने का फैसला कर लिया.

अब सवाल यह था कि घर से किस तरह निकलूं. तालीम का सिलसिला खत्म हो चुका था. इसलिए मुझे अम्मी से झूठ बोलना पड़ा. मैं ने अम्मी से किसी सहेली के घर जाने का झूठ बोला था. और यह मेरी जिंदगी का पहला झूठ था. झूठ बोलते हुए शुरूशुरू में थोड़ी सी झिझक होती है, निगाहें झुकी रहती हैं, जुमले टूटटूट जाते हैं. फिर 2-4 बार के बाद यह झिझक खत्म हो जाती है. लहजे में आत्मविश्वास पैदा हो जाता है.

मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ. मैं झिझक रही थी, मेरे जुमले टूट रहे थे, लेकिन अम्मी को कोई शक नहीं हुआ, क्योंकि उन्हें मुझ पर विश्वास था. मैं घर से निकल पड़ी. उस औरत का पता मेरी मुट्ठी में दबा हुआ था. वह मेरा पहला सफर था. अब तो यह पता ही नहीं चलता कि मैं कहीं ठहरी हूं या सफर में हूं. बहरहाल, मैं उस के आलीशान मकान में पहुंच गई. उस मकान को देख कर आंखें फटी रह गई थीं. यकीन नहीं आता था कि मकान इतना बड़ा भी होता है. मैं जब मकान में दाखिल हुई तो मेरे जिस्म पर कंपकंपी छाई हुई थी.  मैं ने

अब तक अपने हुस्न से दूसरों को सम्मोहित होते देखा था, लेकिन उस वक्त दौलत की ताकत ने मुझे सम्मोहित कर दिया था. उस मकान में ऐसीऐसी चीजें थीं, जिन को मैं ने ख्वाब में भी नहीं देखा होगा, क्योंकि ख्वाब भी तजुर्बात से पैदा होते हैं. और मुझे कीमती कालीनों, खूबसूरत फानूसों, आरामदेह सोफे वगैरह का कहां तजुर्बा था? वह औरत मेरे साथसाथ चल रही थी. उस ने मुझे पूरे मकान की सैर करवाई. उस के होंठों पर एक ऐसी गहरी मुसकराहट थी, जिस का मतलब उस समय समझ में नहीं आया था. मकान देखने के बाद मैं उस के साथ लंबेचौड़े ड्राइंगरूम में आ गई.

‘‘चलो, बैठ जाओ,’’ उस ने सोफे की तरह इशारा किया, ‘‘तुम थक गई होगी.’’

मैं चुपचाप बैठ गई. नरमनरम सोफा ऐसा लग रहा था, जैसे ढेर से झाग ने मुझे समेट लिया हो. मेरे जिस्म की कंपकंपी अभी तक कम नहीं हुई थी.

‘‘घर कैसा लगा तुम्हें?’’ उस ने पूछा.

‘‘बहुत अच्छा,’’ मैं ने अटकते हुए जवाब दिया, ‘‘मैं ने ऐसा घर पहले कभी नहीं देखा था.’’

‘‘अगर तुम चाहो तो यह सब कुछ तुम्हारा हो सकता है.’’ उस ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘क्या?’’ मैं ने आंखें फाड़ कर उस की तरफ देखा, ‘‘मेरा…यह आप क्या कह रही हैं?’’

‘‘हां तुम्हारा…देखो जरीना, मैं ने एक खास मकसद से तुम्हें यहां बुलाया है, क्योंकि मैं समझती हूं, तुम एक समझदार लड़की हो. यहां जो कुछ देखोगी और सुनोगी, उस का जिक्र किसी से नहीं करोगी. देखो, आज हालात बहुत बदल गए हैं. आज की सब से बड़ी सच्चाई दौलत है. दौलत, जो पेट भर खाने को देती है. दौलत, जो लिबास मुहैया कराती है. दौलत, जो समाज में इज्जत बढ़ाती है. बाकी जो है, सब बकवास है. तुम्हारे हुस्न की मिसाल मिलनी मुश्किल है. लेकिन गरीबी ने तुम्हारा क्या हाल कर दिया है. तुम्हारे खूबसूरत गालों पर भूख ने जर्दी की तह जमा दी है. तुम्हारी खूबसूरत आंखें वीरान होने लगी हैं. तुम्हारा शानदार जिस्म अच्छे लिबास को तरस रहा है. क्या यह सब तुम्हें अच्छा लगता है?’’

‘‘नहीं..,’’ मैं ने अनजाने तौर पर अपनी गरदन हिला दी.

‘‘मैं जानती थी कि तुम्हारा यही जवाब होगा,’’ उस ने कहा, ‘‘आहिस्ताआहिस्ता आने वाली मौत किस को अच्छी लगती है और गरीबी ऐसी ही मौत है. तुम को शायद यह अंदाजा न हो कि मैं ने तुम्हारे यहां सिर्फ तुम्हारी वजह से आनाजाना शुरू किया है. मेरे शौहर शेरवानी ने तुम्हारा जिक्र किया था. मेरे शौहर और तुम्हारे अब्बू एक ही औफिस में काम करते थे. यह नौकरी तो सिर्फ एक आड़ है, वरना मेरे शौहर को नौकरी की कोई जरूरत नहीं है. तो एक दिन शेरवानी तुम्हारे अब्बू के साथ तुम्हारे घर गए थे. वहां उन्होंने तुम्हें देख लिया था. फिर कुछ दिनों बाद तुम्हारे अब्बू का इंतकाल हो गया और मुझे तुम्हारे घर जाने का मौका मिला. मैं यह चाहती थी कि मैं तनहाई में कुछ देर तुम से बातें कर लूं. सो आज मौका मिल गया है.’’

‘‘लेकिन क्यों?’’ मैं ने हैरान हो कर पूछा. उस वक्त मेरी घबराहट कुछ कम हो गई थी.

‘‘इस सवाल का जवाब तुम्हें आईना देगा. तुम आईने में अपने आप को देख कर सवाल करो. आईने से यह पूछो कि क्या इतनी खूबसूरत आंखें वीरान होने के लिए हैं? क्या यह नायाब जिस्म इसलिए बनाया गया है कि अच्छे लिबास को तरसता रहे? क्या यह तरोताजा चेहरा भूख का सदमा बरदाश्त करने के लिए है? क्या तुम इसलिए हो कि 80 गज के एक घुटन भरे क्वार्टर में अपनी जिंदगी बिता दो? क्या तुम्हारा बेमिसाल हुस्न इसलिए है कि एक मामूली दर्जे का गंदा, कंगाल सा आदमी तुम्हें ब्याह कर ले जाए और तुम उस के गंदे घर में सिसकते हुए सारी जिंदगी गुजार दो? बताओ, क्या तुम्हें अच्छी जिंदगी पसंद नहीं है? क्या तुम यह सब हासिल करना नहीं चाहती, जो इस वक्त तुम्हारे इर्दगिर्द फैला हुआ है?’’

मैं उस की बातों के सम्मोहन में फंस गई थी. उस ने मुझे एक दूसरी किस्म के अहसास में मुब्तिला कर दिया था. इस से पहले लोगों ने यह तो अहसास दिला दिया था कि मैं बेहद हसीन हूं, लेकिन किसी ने यह नहीं बताया था कि ऐसा हुस्न 80 गज के क्वार्टर में नहीं रहता है. ऐसे हुस्न के लिए एक खूबसूरत मकान और उम्दा फर्नीचर चाहिए. इसलिए मुझे उस की बातें अच्छी लग रही थीं.

‘‘बताओ, क्या तुम यह सब नहीं चाहतीं?’’ उस ने फिर सवाल किया.

‘‘क्यों नहीं चाहती, मैं भी इंसान हूं. मेरी भी ख्वाहिशें हैं.’’ मैं ने कहा.

‘‘शाबाश! असल चीज इरादा है, ख्वाहिश है. अगर इरादा पुख्ता और ख्वाहिश में शिद्दत हो तो सब कुछ हासिल किया जा सकता है.’’

‘‘किस तरह?’’

‘‘हां, इस सवाल का जवाब जरा मुश्किल है, क्योंकि हो सकता है कि तुम्हारा जमीर जाग उठे. इज्जत वगैरह का खयाल आ जाए और तुम नाराज हो कर चल दो. मुझे मालूम है कि मैं ने अगर बता दिया तो वही होगा, जो मैं कह रही हूं यानी तुम नाराज हो जाओगी, मुझे बुराभला कहोगी, गालियां दोगी, लेकिन मुझे तुम्हारी नाराजगी की परवाह नहीं होगी. मैं बुरा नहीं मानूंगी, क्योंकि शुरूशुरू में ऐसा ही होता है. लेकिन इस घर के दरवाजे एक शानदार भविष्य ले कर तुम्हारे लिए खुले रहेंगे. तुम जब आना चाहो, यहां आ सकती हो.’’

‘‘आप बताएं तो सही, मुझे करना क्या होगा?’’

उस ने जो कुछ बताया, उस ने मेरे पूरे बदन में आग भर दी थी. मैं नहीं कह सकती थी कि वह आग लज्जत दे रही थी या उस की तपिश में तकलीफ हो रही थी. एक अजीब सी हालत थी. अहसास हो रहा था कि शायद मैं ने यहां आ कर गलती की है या शायद कोई गलती नहीं की. आदमी के पास जब एक कीमती शै है तो उसे ज्यादा से ज्यादा कीमत पर बेचने का हक हासिल है.

‘‘तो यह है दौलत हासिल करने का तरीका.’’ मैं ने अपनी हैरानी पर काबू पाते हुए पूछा.

‘‘हां, मुझे मालूम है कि इस वक्त तुम्हारी क्या हालत हो रही होगी. हमारे पास जबरदस्ती नाम की कोई चीज नहीं है. यहां सब कुछ अपनी मरजी से हुआ करता है. मैं यह बता दूं कि इस समाज में अच्छाईबुराई नाम की कोई चीज नहीं है. सब बकवास करते हैं. तुम इस मकान में आने वालों को देख लो तो तुम्हारे होश उड़ जाएं. ये वे लोग हैं, जिन के चर्चे अखबारों और रिसालों में होते हैं, जिन की पाकीजगी की कसमें खाई जाती हैं. जिन पर कौम विश्वास करती है. सब यहां आते हैं. रात के अंधेरों में आते हैं और सुबह होने से पहले चले जाते हैं, ताकि उन की पारसाई का भरम कायम रहे.

‘‘तुम इस शहर में इतने खूबसूरत मकान और गाडि़यां देखती हो तो यह सब कहां से आता है? किसी ने हलाल की कमाई से कोई महल नहीं बनवाया है. तुम मुझे किसी एक का नाम बता दो. अब जायज और नाजायज एकदूसरे में गड्डमड्ड हो कर रह गए हैं तो इस मौके का फायदा क्यों न उठा लिया जाए. मैं फिर यह कह रही हूं कि तुम पर जबरदस्ती नहीं कर रही, क्योंकि यह सौदा अपनी खुशी से होता है. तुम घर जाओ और जब तुम्हें जमीर और इज्जत वगैरह बेकार की बातें लगने लगें तो यहां चली आना. यह घर एक शानदार भविष्य के साथ तुम्हारा इंतजार करेगा.’’

मैं वहां से घर आ गई. उस औरत की बातों ने मुझे एक दोराहे पर खड़ा कर दिया था. बरसों की पढ़ाईलिखाई और घर के माहौल ने मुझे यह याद करा दिया था कि मैं ऐसी दौलत, ऐसी जिंदगी पर लात मार दूं. जमीर बहुत आला चीज है. औरत का सब कुछ उस की इज्जत हुआ करती है. लेकिन दूसरी तरफ उस की बातें मुझे अहसास दिला रही थीं कि शायद वह ठीक ही कह रही थी. हो सकता है कि आप को भी यह सब नागवार गुजर रहा हो. आप सोच रहे हों कि मुझे उस औरत को गाली दे कर वापस आ जाना चाहिए था. लेकिन क्यों?

मेरे घर में फाके होते हैं. हम लोग रूखी रोटी चाय के साथ भिगोभिगो कर खाते हैं तो क्या उस वक्त आप हमारे जमीर की दाद देने के लिए आते हैं? नहीं, आप ऐसा नहीं करते. आप को तो अहसास भी नहीं होता और जब हम अपनी मंजिल तय कर के अपना सफर शुरू कर देते हैं, उस वक्त आप समाज के ठेकेदार बन कर हमारे सामने आ जाते हैं. लेकिन ऐसे ठेकेदार कि हमारे खिलाफ तकरीर करते हुए आप की निगाहें हमारे जिस्मों को तौलती रहती हैं. खैर, तो मैं ने किसी से जिक्र नहीं किया, क्योंकि मुझे उस रास्ते पर सफर नहीं करना था. इस दौरान घर की हालत और भी बिगड़ चुकी थी. भाइयों ने मायूसी के बाद आवारागर्दी शुरू कर दी थी.

एक दिन अम्मी ने अपने दिल पर काबू करते हुए मुझे एक बात बताई, ‘‘बेटी, मेरा दिल तो नहीं चाहता, लेकिन क्या करूं? पेट की आग कम ही नहीं होती. दोनों बेटे तो किसी काम के नहीं रहे. सौ दफा समझा चुकी हूं कि जब अच्छी नौकरी नहीं मिल रही है तो कोई और काम कर लो. अब भूख और कंगाली बरदाश्त नहीं होती. मोहल्ले में जो अजीम साहब रहते हैं न, वह कल आए थे मेरे पास. बता रहे थे कि उन्होंने तुम्हारे लिए किसी फर्म में नौकरी की बात कर ली है. अभी 7 सौ रुपए मिलेंगे. बाद में तनख्वाह बढ़ा दी जाएगी.’’

मैं ने तो नौकरी करने का कभी तसव्वुर भी नहीं किया होगा. अम्मी यह क्या कह रही थीं. मैं इनकार भी नहीं कर सकती थी. घर की मजबूरियां मेरे सामने खुली हुई किताब की तरह थीं, लिहाजा मैं ने नौकरी के लिए हामी भर दी. 7 सौ ही सही, उस में रूखीसूखी रोटी तो आ सकती थी. मेरे दोनों भाइयों को जब मेरी नौकरी के बारे में मालूम हुआ तो वे चुप रह गए. और ऐसा होना भी चाहिए. अगर वे ऐतराज करते तो घर का गुजारा कैसे होता?

तीसरे दिन मैं उस फर्म की फैक्ट्री में पहुंच गई. वहां मेरे अलावा और लड़कियां भी थीं. लेकिन वहां मेरा पहुंचना ऐसा था, जैसे आसमान से चांद उतर आया हो या फैक्ट्री में बहार आ गई हो. मैं उन के दरम्यान किसी शहजादी की तरह थी. पैकिंग के कागजात मेरे खूबसूरत हाथों में आ कर जगमगाने लगते थे. मेरे पास हुस्न की जो ताकत थी, उस ताकत ने फैक्ट्री में अपना हुनर दिखाना शुरू कर दिया था और उस फैक्ट्री के 2 आदमी मेरी जिंदगी में दाखिल हो गए. यह मेरे सफर का एक और पड़ाव था. अंदाजा हो गया कि रिश्ते किस झूठ के नाम हैं. असल चीज है हविस और दौलत. जिंदगी में इस के अलावा और कुछ नहीं है. हविस, जो हमेशा मुझ जैसी लड़की के पीछे लगी रहती है और दौलत जिस से रोटी, कपड़ा और मकान खरीदा जा सकता है.

और आज मैं तुम दोनों से भी मुखातिब हूं. तुम राशिद अली, जो इस फैक्ट्री के मालिक के बेटे थे और इफ्तखार अली, जो इस फैक्ट्री के मालिक थे. मैं तुम दोनों के दरम्यान एक ऐसी नेमत की तरह थी, जिस को तुम दोनों हासिल करना चाहते थे. खुद बताओ, कहां गया तुम्हारा रिश्ता? बापबेटे का रिश्ता तो बहुत अजीम हुआ करता है. फिर तुम दोनों को क्या हो गया था? तुम दोनों ने मेरी खातिर एकदूसरे से रकाबत तक मोल ले ली थी. पूरी फैक्ट्री तुम दोनों का मजाक उड़ाती थी और मैं बदनाम हुई जा रही थी. तुम दोनों ने बारीबारी से मुझे इतनी सुविधाएं दीं कि मैं खुद को हवाओं में महसूस करने लगी थी.

आज मैं पूछती हूं कि तुम दोनों ने ऐसा क्यों किया? मेरी खातिर तुम्हारे दरम्यान बापबेटे की शिनाख्त क्यों खत्म हो गई थी? क्या हुस्न ऐसा जादू है, जो आंखों पर पट्टियां बांध देता है? वैसे मैं तुम दोनों की शुक्रगुजार हूं. अगर तुम ऐसा न करते तो अब तक मैं और मेरे घर वाले भूख से हलाक हो चुके होते. उस फैक्ट्री में काम करते हुए तीसरा दिन था कि एक औरत ने आ कर बताया कि राशिद अली मुझ से मिलना चाहता है. मैं उस वक्त तक राशिद अली को नहीं जानती थी. मेरे पूछने पर उस ने बताया कि राशिद अली उस फैक्ट्री के मालिक का बेटा है और फैक्ट्री की देखभाल उसी के जिम्मे है.

मेरी समझ में नहीं आया कि उस ने मुझे क्यों बुलाया है. शायद मेरे काम में कोई कोताही थी या वह मुझे किसी और काम में लगाना चाहता था. बहरहाल मैं उस के साथ हो ली. वह औरत मुझे एक शानदार कमरे में पहुंचा कर वापस चली गई. उस वक्त उस कमरे में सिवाय दौलत के इजहार के और कुछ नहीं था. यह दौलत कैसी चीज थी, जो मुझे प्रभावित करने पर तुली हुई थी. वह मेरे सामने रूप बदलबदल आ रही थी.

मैं उस औफिस को आंखें फाड़फाड़ कर देखती रही. सब कुछ इतना कीमती था कि सिर्फ उसी औफिस में मेरी जिंदगी भर की कमाई से कई गुना ज्यादा रकम लगी हुई थी. मैं अभी उन सब चीजों को देख रही थी कि राशिद कमरे में दाखिल हुआ. वह एक खूबसूरत नौजवान था. अच्छी सूरतशक्ल के बावजूद उस के चेहरे पर एक खास किस्म की अय्यारी का अक्स था. वह मेरे सामने आ कर खड़ा हो गया. मैं उसे देख कर सिटपिटा गई.

‘‘मैं राशिद अली हूं,’’ उस ने कहा, ‘‘यह फैक्ट्री मेरी है और मैं ने तुम्हें इसलिए बुलाया है कि तुम मुझे वहां काम करती हुई अच्छी नहीं लग रही थीं.’’

‘‘जी, क्या कहा आप ने?’’

‘‘हां, देखो, मैं बहुत साफ कहने वाला आदमी हूं. अपने दिल में कुछ छिपा कर नहीं रखता. मैं यह कह रहा हूं कि कुदरत ने तुम जैसी हसीना को इसलिए नहीं बनाया कि तुम मामूली से काम करती रहो. तुम्हें तो हुकूमत करने के लिए बनाया गया है.’’

‘‘पता नहीं, आप क्या कह रहे हैं?’’ मैं जल्दी से बोली.

वैसे मैं अच्छी तरह समझ गई थी कि वह क्या कह रहा था. वह मेरे हुस्न की तारीफ कर रहा था और मेरे पास इस ताकत के अलावा और था ही क्या, गोया उस ने भी मुझे मेरी ताकत का अहसास दिला दिया था. अपने हुस्न की तारीफ सुनते हुए मुझे अच्छा लग रहा था. इस से पहले जो लोग मेरी जिंदगी में आए और जिन्होंने मेरे हुस्न को सराहा था, वे मेरे ही तबके से ताल्लुक रखते थे. लेकिन राशिद अली एक दौलतमंद इंसान था. उस ने न जाने कितने मुल्कों की सैर की होगी. कितनी लड़कियों से उस का वास्ता पड़ा होगा और जब वह मेरे हुस्न की तारीफ कर रहा था तो इस का मतलब यह था कि मैं वाकई बेहद हसीन थी. राशिद के पास अगर दौलत थी तो मेरे पास हुस्न था. उस कमरे में हम दोनों बराबर के थे.

मैं उस के सामने तन कर खड़ी हो सकती थी. उसे अपनी अहमियत का अहसास दिला सकती थी.

‘‘आप ने मुझे क्यों बुलाया है?’’

‘‘सिर्फ यह कहने के लिए कि तुम आज से पैकिंग नहीं करोगी, बल्कि तुम्हें उस डिपार्टमेंट का इंचार्ज बना दिया गया है,’’ उस ने कहा, ‘‘और वक्त गुजरने के साथसाथ तुम्हारी और भी तरक्की होती रहेगी. मैं जानता हूं कि तुम में कितनी खूबियां हो सकती हैं.’’

मैं ने सोचा, उस से कह दूं कि खूबियां मुझ में नहीं, मेरे हुस्न में हैं. लेकिन गरदन झुका कर खामोश खड़ी रही. उस दिन के बाद से फैक्ट्री में काम करने वाली लड़कियां मुझ से ईर्ष्या करने लगी थीं. यह पहला मौका था कि किसी लड़की को इतनी जल्दी तरक्की मिल गई थी. लेकिन शायद उस फैक्ट्री में मुझ जैसी खूबसूरत लड़की भी पहली बार आई थी. मेरी तनख्वाह फौरी तौर पर 7 सौ से 12 सौ कर दी गई थी.

कुछ दिनों बाद मुझे फिर बुलाया गया. इस बार बेटे ने नहीं, बल्कि बाप ने बुलाया था. बापबेटे में ज्यादा फर्क दिखाई नहीं देता था. उस ने भी गुफ्तगू की शुरुआत मेरे हुस्न की तारीफ से की थी, लेकिन उस का अंदाज अलग था. उस की उम्र ने उसे होशबंदी सिखा दी थी. इसलिए वह जानता था कि किसी लड़की के लिए किस अंदाज का जाल बिछाना चाहिए.

‘‘मैं तुम्हें देखते ही समझ गया था कि तुम ऐसी लड़की नहीं हो, जो फैक्ट्री में रह कर अपनी जिंदगी तबाह कर दे,’’ उस ने कहा, ‘‘इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम औफिस में आ जाओ. वहां तुम्हारी तरक्की की भी रोशन उम्मीदें हैं.’’

‘‘लेकिन सर, मुझे तो औफिस का कोई काम नहीं आता.’’ मैं ने कहा.

‘‘इस से कोई फर्क नहीं पड़ता,’’ इफ्तखार मुसकरा दिए, ‘‘शुरूशुरू में तो किसी को भी कुछ नहीं आता. आहिस्ताआहिस्ता सब कुछ आ जाता है.’’

फैक्ट्री की लड़कियों ने जब यह खबर सुनी तो मेरे खिलाफ उन के गुस्से की आग और तेज हो गई, लेकिन मुझे उन की परवाह नहीं थी. मैं ने तो अपना सफर शुरू कर दिया था और सफर में कामयाबी की शर्त यह होती है कि न तो पीछे मुड़ कर देखा जाए और न ही झिझक कर पांव रोक दिए जाएं. औफिस में मेरी तनख्वाह 15 सौ रुपए माहवार कर दी गई. हमारे सभी मसले हल हो सकते थे, लेकिन यह सिलसिला ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सका. औफिस में एक दिन कयामत आ गई. उन दोनों की बीवियां औफिस चली आईं. क्या तमाशा था कि सासबहू दोनों एक ही लड़की से परेशान हो कर औफिस चली आई थीं. मैं सास की भी सौतन हुई जा रही थी और बहू की भी. औफिस में अच्छाखासा हंगामा बरपा हो गया था और उसी दिन मुझे नौकरी से निकाल दिया गया. मैं आसमान में उड़तेउड़ते अचानक जमीन पर आ गिरी.

घर पहुंची तो मुझ से पहले मेरी बदनामी वहां पहुंच चुकी थी. किसी ने मेरे घर वालों को सूरतेहाल से आगाह कर दिया था. पूरा घर मेरे खिलाफ खड़ा था. खासतौर पर दोनों भाई बहुत नाराज हो रहे थे.

‘‘इस में मेरा क्या कुसूर है?’’ मैं ने उन लोगों से कहा, ‘‘अगर मैं खूबसूरत हूं तो यह खूबसूरती मैं ने अपनी मरजी से तो हासिल नहीं की. मेरा तो सिर्फ इतना कुसूर है कि मैं ने हालात से फायदा उठाते हुए तरक्की करनी चाही थी. इस के अलावा मैं ने कुछ नहीं किया.’’

‘‘लेकिन जो कुछ भी हुआ, वह हमारी इज्जत और शान के खिलाफ है.’’ एक भाई गुस्से से बोला.

‘‘आप लोग किस इज्जत और शान की बात कर रहे हैं?’’ मैं ने तल्ख हो कर कहा, ‘‘फर्ज करें, अगर मैं फैक्ट्री में काम करती और हर महीने अपनी तनख्वाह ला कर दिया करती और पूरा घर उस तनख्वाह से परवरिश पाता रहता तो क्या इज्जत और शान कायम रहती कि लड़की घर चला रही है, जबकि यह काम मर्दों का है?’’

‘‘लेकिन अब क्या होगा?’’ अम्मी ने परेशान हो कर अपने आप से सवाल किया.

मैं उन की परेशानी के मतलब से वाकिफ हो चुकी थी. उन की परेशानी इसलिए नहीं थी कि मैं बदनाम हो चुकी थी, बल्कि इस परेशानी की वजह यह थी कि नौकरी खत्म होने के बाद गुजारा किस तरह होगा. उस वक्त मुझे अहसास हो रहा था कि गरीबी जब हद से गुजर जाए तो हर वह शख्स काबिलेकबूल हो जाता है, जिस के हाथ में नोट हों, दूसरे हाथ में चाहे हविस की तलवार ही क्यों न हो. यह एक बेरहम हकीकत है और हमें उसे स्वीकार भी कर लेना चाहिए. मैं ने महसूस किया कि उस दिन के बाद से अम्मी कुछ उखड़ीउखड़ी रहने लगी थीं. दोनों भाई भी जराजरा सी बात पर नाराज हो रहे थे. हसीना ने मुंह फुला रखा था.

अम्मी ने अच्छे वक्त के कुछ जेवर बचा रखे थे. उन्हें भी बेच दिया गया. मैं कभीकभी खुद को आईने में देखती तो अपने आप पर तरस आने लगता था. खूबसूरत आंखें जो मुरझाने के लिए नहीं थीं, मुरझाई जा रही थीं. दिलकश रंग फीका पड़ता जा रहा था. कुदरत ने मुझे एक नेमत तो दी, लेकिन अफसोस, मैं उस की हिफाजत नहीं कर पा रही थी. फिर मेरी मुलाकात फिरोज से हो गई. यह मेरी आखिरी मुलाकात थी. उस के बाद मैं ने किसी से मुलाकात नहीं की. सिर्फ समझौता किया, सौदा किया. वह मेरे अब्बा के किसी दोस्त का लड़का था, जो किसी औफिस में मामूली सा नौकर था. इसलिए उस के जिस्म पर लिबास भी मामूली हुआ करता था. इस के बावजूद वह मुझे पसंद आ गया, क्योंकि पसंदीदगी का अमल हिमाकत से शुरू हो कर शर्मिंदगी पर खत्म हो जाता है.

वह सिर्फ एक बार हमारे घर आया था, लेकिन मुझ से मिलने के बाद उस का आनाजाना शुरू हो गया था. जब उस ने मेरी तरफ मोहब्बत का हाथ बढ़ाया तो मैं न जाने क्यों, उस के बढ़े हुए हाथ को झटक न सकी. कैसेकैसे लोगों ने मुझे हासिल करने की कोशिश की थी, लेकिन मैं ने उस का हाथ कबूल कर लिया था, जो एक मामूली सा क्लर्क था और जिस के जिस्म पर ढंग का लिबास भी नहीं होता था. हम दोनों छिपछिप कर मिलते रहे. मेरा खयाल था कि फिरोज हमारे घर के हालात से आगाह था और वह हम लोगों के लिए सहारा बन जाएगा. हम घंटों एकदूसरे के साथ बैठे पूरी दुनिया को फतह करने की बातें करते रहे. हम ने कैसेकैसे ख्वाब देखे थे. दुनिया की हर लड़की का ख्वाब एक जैसा होता है. एक मोहब्बत करने वाला शौहर, एक छोटा सा घर, उस में शरारतें करते हुए मासूम बच्चे.

फिरोज ने मुझ से कहा था, ‘‘मैं शायद दुनिया का खुशकिस्मततरीन इंसान हूं, क्योंकि मुझे दुनिया की खूबसूरततरीन लड़की से मोहब्बत हो गई है. तुम ने मुझे जिंदा रहने के अंदाज सिखा दिए हैं. देख लेना, मैं तुम्हारी मोहब्बत हासिल करने के बाद कितनी तरक्की करूंगा. औफिस के मालिक ने मुझ से कहा है कि मैं शार्टहैंड सीख लूं तो मेरी तनख्वाह बढ़ा दी जाएगी.’’

पहली बार मुझे झटका सा लगा. मेरा हुस्न इसलिए नहीं था कि किसी के तनख्वाह के इजाफे पर खुश होता रहे. फिरोज की सोच इस से बुलंद उड़ान नहीं भर सकती थी. मैं ने फिर भी उस से कुछ नहीं कहा, क्योंकि मैं पहली बार मोहब्बत के  तजुर्बे से गुजर रही थी. एक दिन फिरोज मुझे अपने एक दोस्त के घर ले गया. उस दोस्त के घर में कोई भी नहीं था. सिर्फ मैं थी और फिरोज. उस दिन पहली बार मेरे गालों पर सुर्खी उमड़ आई. मैं पहली बार एक ऐसी बात से वाकिफ हो गई, जिस से वाकिफ कराने के लिए राशिद अली, इफ्तखार अली और न जाने कितने लोग कोशिश करते रहे थे.

मैं जब फिरोज के साथ उस घर से वापस आई तो अपने आप को हार चुकी थी, लेकिन न जाने क्यों मुझे इत्मीनान सा था. यह इत्मीनान खुद फिरोज ने दिलाया था. उस ने कहा था कि वह बहुत जल्दी मुझे अपना लेगा और मैं खयालों में डूबी अपने घर आ गई. उस वक्त मेरे चलने का अंदाज बदल चुका था. मेरे लहजे में ठहराव पैदा हो गया था. मेरे अंदाजे में एक खास किस्म की खुशी थी. 4-5 दिनों के बाद घर में एक हादसा हो गया. अम्मी गुसलखाने में गिर पड़ी थीं. उन के कूल्हे की हड्डी टूट गई थी.

कंगाली में अगर जुकाम भी हो जाए तो उस का बोझ कंधों पर महसूस होने लगता है और यह तो कूल्हे की हड्डी थी, जिस के इलाज के खर्च इतने थे कि पूरे घर की चीजें फरोख्त हो जातीं.  उस वक्त दोनों भाई किसी काम नहीं आ सकते थे, क्योंकि उन के पास सिवाय बेकारी के और कोई काम न था. गरीबों के रिश्तेदार भी कम ही होते हैं या होते ही नहीं हैं. लिहाजा हम कहीं से भी कोई मदद हासिल नहीं कर सकते थे.

उस वक्त मुझे फिरोज का खयाल आया. वही हमारी मदद कर सकता था. वह मेरी मोहब्बत और जिस्म का रखवाला था. उस से कोई तकल्लुफ नहीं था. मोहब्बत के रिश्ते में यही तो एक लुत्फ है कि एकदूसरे से खुल कर बातें कर ली जाती हैं.

मैं फिरोज से मिलने पहुंच गई. वह मुझे घर पर ही मिल गया था और यह इत्तफाक था कि वह घर पर अकेला ही था. मुझे देख कर उस के चेहरे पर खुशी के रंग दौड़ गए.

‘‘फिरोज, मैं तुम्हारे पास एक बहुत जरूरी काम से आई हूं.’’ मैं ने कहा.

‘‘बताओ, तुम्हारे लिए तो जान भी हाजिर है.’’

‘‘मेरी अम्मी गिर गई हैं. कूल्हे की हड्डी फ्रैक्चर हो गई है. तुम किसी भी तरह 5 हजार रुपए का बंदोबस्त कर दो.’’

एक लम्हे के लिए उस के चेहरे पर फीका सा रंग आ कर गुजर गया. वह कुछ सोचने लगा.

‘‘अब क्या सोचने लगे? क्या इतनी रकम नहीं है तुम्हारे पास?’’

‘‘नहीं, बात पैसों की नहीं है.’’

‘‘तो फिर क्या है?’’

‘‘मैं सोच रहा हूं कि तुम ने कुछ देर लगा दी,’’ वह मुसकराते हुए बोला, ‘‘तुम्हें तो अपने हुस्न की कीमत वसूल करने के लिए बहुत पहले आ जाना चाहिए था.’’

बस, यह वह आखिरी जुमला था, जो जरीना ने सुना था, क्योंकि उस के बाद जरीना ‘डौली’ हो गई थी. जरीना के नकाब को उस ने अपने सिर से उतार फेंका था. जरीना ने जब यह जुमला सुना तो जमीनआसमान एक हो गए थे. हवाएं रुक गई थीं. सूरज बहुत जल्दी डूब गया था और वह सब कुछ हो गया था, जो नहीं होना चाहिए था. क्या मैं अपने हुस्न की कीमत वसूल करने गई थी? क्या मैं इतनी सस्ती थी? क्या लड़कियों के मुकद्दर में सिर्फ धोखे ही लिख दिए जाते हैं? क्या इस जमीन पर उगने वाले सारे रिश्ते झूठे हैं?

अब तो आप को यकीन हो गया होगा कि मैं इतनी तल्ख हकीकत क्यों हूं. बताइए, मैं उस वक्त क्या करती? हर तरफ तो आप जैसे लोगों की सल्तनत है और सल्तनत इतनी बड़ी कि कोई आप की हविस के दायरे से निकल ही नहीं सकता. आप चाहे कोई भी हों, लड़कियों के लिए और खासतौर पर हसीन लड़कियों के लिए आप का रवैया एक जैसा ही होता है, बेरहम और कांटेदार. आप के रवैए के नाखून हसीन जिस्मों पर खराशें डाल देते हैं. आप को मालूम है कि बाद में मैं ने क्या किया होगा? हां, मैं ने वही किया जो मुझे करना चाहिए था. मैं उस औरत के घर पहुंच गई, जिस ने कहा था कि मेरे लिए उस के दरवाजे खुले रहेंगे.

…और उस के दरवाजे खुले हुए थे. सब से पहले तो उस ने मुझे पुराने नाम से निजात दिलाई. जरीना से डौली हो गई. उस घर में और भी लड़कियां थीं, लेकिन मेरी तरह कोई नहीं थी. इसलिए मेरे हालात बहुत तेजी से बदलने लगे. मैं ने कहा था कि मुझे इस समाज में पारसा कोई नहीं दिखाई दिया. सब एक जैसे हैं.

उस मकान में जाने के बाद यह बात बिलकुल सच साबित हो रही है. वहां आने वाले व्यापारी, नेता, अफसर, लेखक, अदाकार, गर्ज यह कि हर पेशे के लोग वही लोग हैं, जो दूसरों के सामने कुछ और होते हैं, लेकिन मेरे बदन के आईने में उन के चेहरों की बनावट कुछ और हो जाती है. एक दफा खुद फिरोज भी आ चुका है, लेकिन मुझे देख कर भाग गया था. शुरूशुरू में मेरे घर वालों ने मुझ से ताल्लुक खत्म कर लिया था, लेकिन जब मैं ने उन के आगे पैसों के ढेर लगा दिए, एक खूबसूरत सा मकान उन के हवाले कर दिया तो उन्होंने भी समझौता कर लिया. यह एक तल्ख बात है, लेकिन है हकीकत. अब हम सब साथ रहते हैं. एक ही घर में, एक ही छत के नीचे.

मेरे दोनों भाई अब भी कोई काम नहीं करते. अब उन्हें जरूरत भी नहीं है. उन की जेबें हमेशा नोटों से भरी रहती हैं. मेरी अम्मी को आज अगर जुकाम भी होता है तो शहर भर के डाक्टर ‘बेगम साहिबा, बेगम साहिबा’ कहते हुए दौड़ लगा देते हैं. मेरी बहन हसीना को जब लिबास की जरूरत होती है तो मैं उस के लिए इतने लिबास खरीद देती हूं कि उस के लिए पसंद करना मुश्किल हो जाता है.

आप मेरी कहानी पढ़ कर मुझ पर अफसोस न करें, क्योंकि डौली बहुत खुश है. हो सकता है कि जरीना खुश न रहती, लेकिन मैं जरीना नहीं, डौली हूं. अगर आप को कभी मेरी जरूरत महसूस हो तो मेरा पता जानने की जद्दोजहद न करें. अपने इर्दगिर्द नजर डालें, आलीशान मकानों में कोई न कोई डौली आप को जरूर मिल जाएगी. Hindi Stories

लेखक – जरीना  

  

MP Crime: काली करतूतों से बुने रंगीन सपने

MP Crime: मीनाक्षी ने खुशहाल परिवार के व्यवसाई मनीष से प्रेम विवाह किया था. फिर ऐसा क्या हुआ कि यार के साथ मिल कर उसे पति की हत्या करानी पड़ी.

भोर की लालिमा फैलनी शुरू हुई ही थी कि उज्जैन के महाकाल मंदिर से उठते आरती के स्वर फिजा में गूंजने लगे. रोजाना की तरह घंटेघडि़यालों की गूंज के बीच इस दिन यानी 18 अगस्त, 2015 को भी उज्जैन अंगड़ाई लेने लगा. शहर की विवेकानंद कालोनी के विष्णुनगर की रहने वाली मीनाक्षी भी मंदिर से आने वाली आवाज सुन कर जाग गई. अब लेटे रहना उस के वश में नहीं था. उस ने जल्दी से बिस्तर छोड़ दिया.

आमतौर पर सुबहसुबह के इस शोर से जागने के बाद मीनाक्षी चिड़चिड़ा उठती थी लेकिन वह दिन उस के लिए कुछ खास था, तभी तो उसे पहली बार मंदिर के घंटों की आवाज मधुर लग रही थी. फ्रैश होने के लिए वह बाथरूम में घुस गई और करीब आधे घंटे बाद जब बाहर निकली तो उस का पति मनीष पहले की तरह गहरी नींद में सो रहा था. अपने गीले बालों का जूड़ा बांधते हुए उस ने पति को झकझोरते हुए उठाया. मनीष अलसाया सा उठ गया. उसे भी अपने औफिस जाना था इसलिए वह भी जाने की तैयारी में जुट गया. मीनाक्षी घर के रोजाना के काम करने लगी. काम निपटातेनिपटाते करीब साढ़े 9 बज गए.

सुबह के 10 बजने को थे. मनीष और मीनाक्षी दोनों के काम पर जाने का वक्त हो चुका था. इसलिए दोनों एक ही कमरे में तैयार हो रहे थे. इसी दौरान कंघी करते मनीष ने आईने में अपने पीछे खड़ी मीनाक्षी को कुरता पहनते देखा तो उसे शरारत सूझी. उसे छेड़ने के लिए वह पीछे मुड़ा ही था कि इस बीच मीनाक्षी का मोबाइल बज उठा. रिंगटोन सुन कर मीनाक्षी ने हवा में उठी अपनी बांहें नीचे झुका लीं. इस से मनीष अपनी सोची शरारत अधूरी रह जाने से मन मसोस कर रह गया.

‘‘हैलो, हां बस 5 मिनट में निकलने वाली हूं.’’ कहते हुए मीनाक्षी ने मोबाइल पर बात खत्म की और जल्दी से कपड़े ठीक करने के बाद पैरों में सैंडिल डालते हुए बोली, ‘‘तुम तैयार हो मनीष?’’

‘‘हां.’’ मनीष ने भी कह दिया.

‘‘तो चलो.’’ कहते हुए मीनाक्षी कमरे से बाहर आ गई. मनीष भी कमरे से निकल आया तो मीनाक्षी ने दरवाजे पर ताला लगाया और पास बैठे सासससुर को उपेक्षा की नजर से देखती हुई मनीष के साथ घर से बाहर निकल गई.

मनीष मीणा उज्जैन की विवेकानंद कालोनी में रहने वाले आर.के. मीणा का एकलौता बेटा था. उज्जैन के टावर चौराहे के पास वसावड़ा पैट्रोल पंप के पीछे की गली में वह श्रीजी नाम से एक फाइनैंस कंपनी चलाता था. जबकि मीनाक्षी बेगमगंज इलाके में स्थित अरुणोदय सर्वेश्वरी कल्याण समिति नाम के एनजीओ में काम करती थी. पतिपत्नी दोनों सुबह एक साथ स्कूटी पर घर से निकलते थे.

मनीष को टावर चौराहे पर उस के औफिस छोड़ कर मीनाक्षी अपने औफिस चली जाती थी. उस रोज भी वह हमेशा की तरह स्कूटी चला रही थी और मनीष पीछे बैठा था. हवा के झोंकों में उड़ते मीनाक्षी के खुले बाल मनीष के चेहरे से टकरा कर उस के मन में अजीब सी हलचल पैदा कर रहे थे. इस से रोमांचित हो कर मनीष ने अपनी बाहें पत्नी की कमर में डाल दीं. तभी मीनाक्षी ने उसे रूखे स्वर में टोका, ‘‘हम अपने कमरे में नहीं, सड़क पर हैं.’’

‘‘जानता हूं, मैं तुम्हें भगा कर नहीं लाया, बैंडबाजे के साथ तमाम लोगों के सामने ब्याह कर लाया हूं.’’ मनीष ने शरारत से कहा.

‘‘मुझे भी पता है. लेकिन शादीशुदा होने का मतलब यह तो नहीं कि सड़क पर ही कपड़े उतार दूं.’’ मीनाक्षी ने चिढ़ कर कहा.

मीनाक्षी के इस व्यवहार पर मनीष को गुस्सा आ गया. उस ने अपने हाथ वापस खींच लिए. इस के बाद वह टावर चौराहे तक न केवल चुप रहा, बल्कि मीनाक्षी ने जब स्कूटी रोकी तो बिना उस की ओर देखे अपने औफिस की तरफ चल पड़ा तो मीनाक्षी बोली, ‘‘सुनो, नाराज हो गए क्या?’’

मनीष कुछ नहीं बोला तो मीनाक्षी ने फिर पूछा, ‘‘नाराज हो गए?’’ मनीष फिर भी चुप रहा. इस पर मीनाक्षी ने हंसते हुए कहा, ‘‘अच्छा बाबा, आज शाम को जल्दी घर आ जाऊंगी. फिर अपनी सारी नाराजगी दूर कर लेना, ओके.’’

मनीष हलके से मुसकरा दिया और वापस मुड़ कर औफिस की तरफ चल पड़ा. उस के जाते ही स्कूटी मोड़ कर मीनाक्षी भी आगे बढ़ गई. कुछ दूरी पर जा कर उस ने सड़क के किनारे स्कूटी खड़ी कर के पीछे मुड़ कर मनीष की तरफ देखा. इस के बाद मोबाइल पर कोई नंबर डायल कर के 2-3 सेकेंड बात की और फिर तेजी से स्कूटी चला कर वहां से चली गई.

इधर मनीष ने रोज की तरह अपने औफिस से पहले पड़ने वाली चाय की एक दुकान पर चाय पी. इस के बाद वह पैट्रोल पंप के पास की गली में घुस गया. उस का औफिस उसी गली में था. उस समय सुबह के करीब साढ़े 10 बजे थे. वह औफिस पहुंच पाता, उस से पहले ही किसी ने उसे गोली मार दी. गली के दुकानदार मनीष को जानते थे. जैसे ही लोगों को इस घटना का पता चला, लोग वहां जमा हो गए और किसी ने फोन द्वारा इस की सूचना थाना माधोनगर को दे दी.

किसी को गोली मारने की खबर पा कर थानाप्रभारी एम.एस. परमार कुछ ही देर में घटनास्थल पर पहुंच गए. वहां पता चला कि मनीष मीणा के सिर पर नजदीक से गोली मारी गई है. थानाप्रभारी ने गंभीर रूप से घायल मनीष को सिविल अस्पताल भेज दिया और घटना की जानकारी एसपी एम.एस. वर्मा, एएसपी अमरेंद्र सिंह और एसपी (सिटी) विजय डाबर को दे दी. थानाप्रभारी को किसी तरह मनीष की पत्नी और उस के घर वालों के फोन नंबर हासिल हो गए तो उन्होंने उन्हें भी फोन कर के अस्पताल बुला लिया. थानाप्रभारी को लोगों ने बताया कि गोली चलने की आवाज सुन कर जब वे दुकानों से बाहर आए तो उन्होंने एक मोटरसाइकिल पर सवार 2 युवकों को जाते देखा था.

घटनास्थल पर 7.65 एमएम कारतूस का एक खाली खोखा मिला. पुलिस को लगा कि यह हमलावरों द्वारा चलाई गई गोली का ही होगा. कुछ ही देर में एसपी, एएसपी और सीएसपी भी मौके पर पहुंच गए. उन्होंने भी घटना के बारे में लोगों से बात की. पुलिस द्वारा सूचना देने के कुछ देर में ही मनीष की पत्नी मीनाक्षी अस्पताल पहुंच गई. गंभीर अवस्था में घायल पति को अस्पताल में देख कर मीनाक्षी जोरजोर से रोने लगी. रोतेरोते ही वह बेहोश हो गई. उसी समय मनीष के मातापिता भी अस्पताल पहुंच गए.

मनीष की हालत इतनी गंभीर थी कि पुलिस उस का बयान तक नहीं ले सकती थी. डाक्टरों की टीम आईसीयू में उस का उपचार करने में लगी थी. बहरहाल पुलिस ने हत्या की कोशिश करने का मामला दर्ज कर घटना की जांच शुरू कर दी. उस गली में कुछ सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे. पुलिस ने उन कैमरों की फुटेज देखी तो उस में 2 लड़के मोटरसाइकिल पर दिखाई तो दे रहे थे, लेकिन तसवीर इतनी धुंधली थी कि न तो उन के चेहरे पहचाने जा सके और न ही मोटरसाइकिल का नंबर.

इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि हमलावर काफी शातिर रहे होंगे. उधर मनीष की न तो बेहोशी टूट रही थी और न ही पुलिस को जांच की कोई दिशा मिल रही थी. चूंकि मनीष फाइनैंस एजेंसी के अलावा विवादित प्रौपर्टी की खरीदफरोख्त भी करता था. इसलिए पुलिस को लग रहा था कि उस की हत्या के पीछे कोई प्रौपर्टी विवाद हो सकता है. इस बिंदु को ध्यान में रखते हुए पुलिस इस बात की जांच की कि वह किनकिन लोगों से ज्यादा मिलताजुलता था और उस ने कौनकौन से विवादित प्रौपर्टी का सौदा किया था.

एसपी एम.एस. वर्मा ने साइबर सेल प्रभारी इंसपेक्टर दीपिका शिंदे को मृतक और उस से जुड़े लोगों के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स की जांच करने की जिम्मेदारी सौंप दी. दीपिका शिंदे सेल के आरक्षक राहुल कुशवाहा के साथ इस काम में जुट गईं. दीपिका शिंदे ने सब से पहले मृतक मनीष के अलावा उस की पत्नी मीनाक्षी के मोबाइल नंबरों की भी काल डिटेल्स निकाल कर उस की स्कैनिंग की.

जांच में पता चला कि मनीष को टावर चौराहे पर छोड़ने के बाद मीनाक्षी ने जिस नंबर पर बात की थी, घटना के कुछ समय बाद उसी नंबर से मीनाक्षी के पास भी फोन आया था. इंसपेक्टर शिंदे ने दोनों फोन के समय के साथ मीनाक्षी के अस्पताल पहुंचने के समय का मिलान किया तो यह बात सामने आई कि पति को गोली मारे जाने की सूचना मिलने पर मीनाक्षी आश्चर्यजनक रूप से बहुत कम समय में ही अस्पताल पहुंच गई थी.

मीनाक्षी जिस एनजीओ में नौकरी करती थी, इंसपेक्टर शिंदे ने उस एनजीओ के संचालक से पूछताछ की तो पता चला कि मीनाक्षी उस रोज सुबह 10 बज कर 35 मिनट पर औफिस पहुंची थी और केवल 5 मिनट रुक कर वापस चली गई थी. इधर पुलिस जांच में कड़ी से कड़ी जोड़ने की कोशिश कर रही थी. घटना को हुए 3 दिन बीत चुके थे. मीनाक्षी पुलिस पर दबाव बनाने के लिए कुछ लोगों के साथ आईजी औफिस गई.

पति के हमलावरों की गिरफ्तारी की मांग को ले कर उस ने आईजी औफिस का घेराव करने की कोशिश की. पुलिस अधिकारियों ने किसी तरह उसे समझाया. उस के हंगामे को देखते हुए वह खुद पुलिस के शक के दायरे में आ गई. इसी के मद्देनजर आरक्षक राहुल कुशवाहा मीनाक्षी के फोन को सर्विलांस पर लगा कर उस की निगरानी करने लगे. इस से यह पता लग रहा था कि वह फोन पर किसकिस से बातें कर रही थी.

कुशवाहा मीनाक्षी के हर मूवमेंट की जानकारी इंसपेक्टर दीपिका शिंदे को दे रहे थे. इस से यह बात निकल कर सामने आ रही थी कि मनीष भले ही अस्पताल में जिंदगी और मौत से संघर्ष कर रहा था, लेकिन मीनाक्षी ने घटना के पहले और बाद में जिस मोबाइल नंबर पर बात की थी, उसी नंबर पर उस की अब भी लगातार लंबीलंबी बातें हो रही थीं. वह मोबाइल नंबर हनीफ का था.

जबकि घटना के बाद से 2 दिन तक मीनाक्षी अस्पताल नहीं आई थी. मनीष के मातापिता ही उस की देखभाल कर रहे थे. पुलिस ने जब उन से मीनाक्षी के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि मीनाक्षी मनीष की जान बचाने के लिए घर पर रह कर 48 घंटे की अखंड पूजा कर रही है. उस का कहना था कि पूजा के बाद वह महाकाल से अपने पति को मौत के मुंह से वापस ले आएगी. लेकिन घटना के पांचवे रोज ही मनीष जिंदगी की जंग हार गया. उस की मौत के बाद पुलिस ने इस मामले में हत्या की धारा जोड़ कर जांच आगे बढ़ाई.

पुलिस को यह बात हजम नहीं हुई थी कि एक ओर तो वह अस्पताल में पति को उस के हाल पर छोड़ कर घर में थी, वहीं दूसरी ओर मोबाइल पर उस की किसी से लंबीलंबी बातें चल रहीं थी. इंसपेक्टर शिंदे ने एसपी एम.एस. वर्मा के सामने मीनाक्षी पर अपनी शंका व्यक्त की तो एसपी ने मीनाक्षी से पूछताछ करने के निर्देश दिए. एसपी के निर्देश पर पुलिस टीम मीनाक्षी के घर पहुंची तो मनीष के पिता ने मीनाक्षी को थाने ले जाने पर कड़ा विरोध जताया. लेकिन पुलिस ने उन की एक न सुनी. पुलिस मीनाक्षी को साइबर सेल ले आई. जैसे ही मीनाक्षी साइबर सेल पहुंची, आरक्षक राहुल ने उसे देखते ही पहचान लिया. क्योंकि उन्होंने उसे इसी साल अप्रैल महीने में अंबरनगर कालोनी के एक सूने मकान में अपने प्रेमी हनीफ के संग रंगरलियां मनाते पकड़ा था. तब मीनाक्षी के पति को भी साइबर सेल बुलाया गया था.

जिस युवक के साथ उसे पकड़ा गया था, वह मीनाक्षी के साथ एनजीओ में काम करता था. काल डिटेल्स से पता चला कि इसी हनीफ के साथ मीनाक्षी की फोन पर लंबीलंबी बातें हो रही थीं. इस बात की जानकारी मिलते ही पुलिस की एक टीम हनीफ की तलाश में उस के एनजीओ के औफिस पहुंची. पुलिस को देख कर हनीफ डर गया. उस ने झट से अपने मोबाइल का सिम और मेमोरी कार्ड निकाल कर अपने मुंह में छिपा लिया. लेकिन पुलिस ने उसे ऐसा करते हुए देख लिया था. पुलिस ने हनीफ को हिरासत में ले कर उस के मुंह से सिमकार्ड और डाटा कार्ड निकलवा कर बरामद कर लिया.

जांच में यह भी पता चला कि घटना वाले दिन एनजीओ के हाजिरी रजिस्टर में हनीफ के औफिस आने का समय साढ़े 11 बजे का लिखा था, जिसे ओवर राइट कर के साढ़े 10 बनाया गया था. मनीष को गोली साढ़े 10 बजे के करीब मारी गई थी. इस से पुलिस समझ गई कि वह साढ़े 10 बजे औफिस में नहीं था. लेकिन उस ने अपनी मौजूदगी औफिस में दिखाने के लिए रिकौर्ड में छेड़खानी की कोशिश की थी. पुलिस हनीफ को हिरासत में ले कर साइबर सेल आ गई. उन दोनों से पुलिस ने पूछताछ की तो उन्होंने यह बात तो स्वीकार कर ली कि उन के आपस में प्रेमसंबंध हैं, लेकिन मनीष की हत्या की बात से दोनों मुकर गए.

काल डिटेल्स के आधार पर पुलिस को पता लग गया था कि जिस वक्त मनीष को गोली मारी गई थी, उस वक्त हनीफ के फोन की लोकेशन टावर चौराहे के पास थी. जबकि मनीष उस समय अपनी उपस्थिति अपने औफिस की बता रहा था. इस के बाद पुलिस ने उन दोनों से सख्ती से पूछताछ की. फलस्वरूप दोनों ने मनीष की हत्या की बात स्वीकार करते हुए पूरी कहानी सिलसिलेवार सुना दी, जो इस प्रकार निकली. विवेकानंद कालोनी निवासी आर.के. मीणा के एकलौते बेटे मनीष की करीब 5 साल पहले मीनाक्षी से मुलाकात हुई थी. दरअसल मनीष पहले एक एनजीओ चलाता था. मीनाक्षी उसी के एनजीओ में काम करती थी. मीनाक्षी तराना की रहने वाली थी. रोजरोज तराना से औफिस आनेजाने में उसे बड़ी परेशानी होती थी. इसलिए वह उज्जैन में किराए का मकान ले कर अकेली रहने लगी. यह बात मनीष भी जानता था.

मनीष उस का बौस था, सो वह मीनाक्षी के अकेलेपन का फायदा उठा कर उस के नजदीक आने की कोशिश करने लगा. इस में वह सफल भी हो गया. दरअसल मीनाक्षी को पता था कि मनीष एक रईस मातापिता की एकलौती संतान है. उसे लगा कि मनीष से मोहब्बत कर के उसे बड़ा फायदा हो सकता है, इसलिए उस ने मनीष के लिए अपने तनमन की लगाम ढीली छोड़ दी. इस के बाद उन दोनों के बीच की दूरियां कुछ ही मुलाकातों में खत्म हो गईं. मीनाक्षी मनीष के दिल और दिमाग पर छा गई.

मनीष के घर वाले बेटे के लिए किसी शरीफ परिवार की बहू चाहते थे. लेकिन जब उन्हें बेटे के द्वारा पता चला कि वह अपने ही औफिस में काम करने वाली मीनाक्षी को चाहता है तो उस की खुशी देख कर उन्होंने अपनी रजामंदी दे दी. इस तरह 2 साल पहले मीनाक्षी अपने बौस की पत्नी बन कर उस के घर आ गई.

चूंकि दोनों का प्रेमविवाह था, इसलिए शादी के बाद का शुरुआती वक्त तो पंख लगा कर बीत गया. शादी के कुछ समय बाद मनीष ने एनजीओ बंद कर के टावर चौराहे के पास श्रीजी फाइनैंस कंपनी खोल ली. कंपनी के माध्यम से मनीष केवल लोगों को विभिन्न बैंकों से लोन ही नहीं दिलवाता था, बल्कि उस ने विवादित प्रौपर्टी की खरीद- फरोख्त का काम भी शुरू कर दिया था.

मीनाक्षी चाहती तो अपने पति की कंपनी में सहयोग कर सकती थी, लेकिन उस ने ऐसा न कर के बेगमगंज इलाके में स्थित अरुणोदय सर्वेश्वरी कल्याण समिति नामक एनजीओ में नौकरी कर ली. मनीष ने मीनाक्षी के इस फैसले का विरोध इसलिए नहीं किया क्योंकि वह अपनी फाइनैंस कंपनी के माध्यम से न केवल ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी कर रहा था, बल्कि विवादित प्रौपर्टियों में भी रुचि ले रहा था. इसलिए वह मीनाक्षी को कंपनी से दूर ही रखना चाहता था.

उस की योजना मीनाक्षी के लिए नया एनजीओ खुलवा कर लाखों कमाने की थी. लेकिन पति से अलग रह कर नौकरी करते हुए मीनाक्षी की मुलाकात खंदार मोहल्ले में रहने वाले हनीफ से हुई. हनीफ एकदूसरे एनजीओ में काम करता था. मुलाकात के बाद वे वाट्सएप के माध्यम से अपने विचारों का आदानप्रदान करते रहे. उन के बीच गहरी दोस्ती हो गई. दोनों दिनभर एकदूसरे के संपर्क में रहने लगे. फिर रोज ही उन की मुलाकातें होने लगीं.

मीनाक्षी बचपन से ही महत्त्वाकांक्षी थी. अपने बारे में बढ़ाचढ़ा कर बातें करना उस की आदत में शुमार था. उस ने हनीफ को भी यही बताया था कि मनीष करोड़पति है और उस की ज्यादातर प्रौपर्टी मेरे ही नाम पर है. हनीफ मीनाक्षी जैसी कितनी लड़कियों को रंगीन सपने दिखा कर उन का शारीरिक शोषण कर चुका था. इसलिए उसे लगा कि मीनाक्षी के हाथ आने पर वह आसानी से करोड़पति बन सकता है. उस ने मीनाक्षी के नजदीक आने की कोशिश करनी शुरू कर दी.

2 साल पहले मनीष के साथ मोहब्बत की कमसें खाने और उस से प्रेमविवाह करने वाली मीनाक्षी ने भी अपनी तरफ बढ़ते हनीफ के कदमों को रोकने की कोशिश नहीं की. इस बीच मीनाक्षी और हनीफ के बीच शारीरिक रिश्ते भी कायम हो गए. इस के बाद तो मीनाक्षी को मनीष में 50 कमियां और हनीफ में हजार अच्छाइयां नजर आने लगीं.

हनीफ दूसरे एनजीओ में काम करता था, इसलिए दोनों का आसानी से मिलना संभव नहीं हो पाता था. इसलिए मीनाक्षी ने उस की नौकरी अपने ही एनजीओ में लगवा दी. इस से दोनों का मिलना काफी आसान हो गया. काम के नाम पर हनीफ और मीनाक्षी औफिस से बाहर निकल जाते. इस के बाद हनीफ मीनाक्षी को ले कर अपने एक दोस्त के कमरे पर चला जाता. वहीं पर दोनों अपनी हसरतें पूरी करते. हसरतें पूरी कर के वह औफिस आ जाते थे.

इस तरह धीरेधीरे मीनाक्षी मनीष से दूर हो कर हनीफ के पास होती गई. लेकिन इन का खेल ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रह सका. हुआ यह कि हनीफ अकसर मीनाक्षी को ले कर अंबरनगर स्थित अपने एक दोस्त के कमरे पर जाता था. लेकिन रोजरोज का यह खेल मोहल्ले वालों की नजरों में आ गया. अप्रैल, 2015 में जब एक दिन मीनाक्षी और हनीफ उस दोस्त के यहां गए तो मोहल्ले वालों ने दोनों को पकड़ कर पुलिस को खबर कर दी. पुलिस आने पर विवाद की स्थिति बन गई. खबर मिलने पर मीनाक्षी का पति भी वहां आ गया. तब मीनाक्षी का कहना था कि वह अपने दोस्त के घर खाना खाने आई थी. बहरहाल पुलिस ने उन्हें हिदायत दे कर छोड़ दिया.

मीनाक्षी ने मनीष को लाख सफाई देने की कोशिश की, लेकिन मनीष समझ गया था कि मीनाक्षी जैसी लड़की केवल खाना खाने के लिए तो ऐसे गंदे माहौल में नहीं जा सकती. वह कभी अंडे को हाथ तक नहीं लगाती थी. वह हनीफ का मन रखने के लिए मांसाहार कैसे कर सकती है. घर पहुंच कर मनीष ने गुस्से में मीनाक्षी की पिटाई कर दी. इतना ही नहीं, उस ने मीनाक्षी को चेतावनी भी दे दी कि उस के 1-2 दोस्त जेल में बंद हैं, जिन के बाहर आते ही वह हनीफ को ठिकाने लगवा देगा. मीनाक्षी पति की आदत और पहुंच को जानती थी. इसलिए उसे विश्वास था कि वह हनीफ को जरूर मरवा देगा. इसलिए वह फिर हनीफ से मिली और उस ने उसे बता दिया कि मनीष उस की हत्या करवा सकता है.

हनीफ डर गया. उस के सोचा कि इस से पहले मनीष उस के खिलाफ कोई कदम उठाए, क्यों न मनीष को ही ठिकाने लगा दिया जाए. उस ने मीनाक्षी को अपनी योजना बताई तो वह राजी हो गई. क्योंकि वह जानती थी कि एक बार मनीष की नजरों में गिरने के बाद अब वह उस घर में कभी अपनी पुरानी हैसियत नहीं पा सकती. तब हनीफ ने मीनाक्षी को सलाह दी कि वह मनीष के साथ गहरे प्यार का नाटक कर उस का मकान और जायजाद सब अपने नाम करवा ले, ताकि मनीष की हत्या के बाद उस के मातापिता को घर से निकाल कर दोनों आपस में निकाह कर आराम से रह सकें.

मीनाक्षी को भी प्रेमी की बात पसंद आ गई. इसलिए घटना से कुछ दिनों पहले जब मनीष ने 35 लाख की एक जमीन खरीदी तो मीनाक्षी ने जिद कर के उस की रजिस्ट्री अपने नाम करवा ली. इस के बाद हनीफ और मीनाक्षी ने मिल कर मनीष की हत्या की फूलप्रूफ योजना बनाई. इस के लिए हनीफ ने 2 महीने तक मनीष के औफिस के चारों तरफ रैकी कर गली में गोली मारने का फैसला किया. मीनाक्षी और मनीष जानते थे कि हत्या के बाद मीनाक्षी की काल डिटेल्स भी निकाली जाएगी, जिस के चलते हनीफ और मीनाक्षी से पुलिस पूछताछ कर सकती है. इसलिए पुलिस के सभी संभावित प्रश्नों के जवाब भी उन्होंने पहले से ही तैयार कर लिए थे.

यह सब करने के बाद हनीफ ने अपनी मौसी के लड़के रिजवान को साथ देने के लिए तैयार किया. दोनों ने कई बार मनीष की गली से मोटरसाइकिल ले कर तेजी से निकलने की प्रैक्टिस की. अंतत: परफेक्ट हो जाने के बाद 18 अगस्त, 2015 को हनीफ ने मनीष की हत्या कर दी. इतनी फूलप्रूफ योजना के तहत हत्या करने के बावजूद भी आखिर वे पुलिस के चंगुल में फंस ही गए. काली करतूतों की बुनियाद पर रंगीन सपने सजाने वाले हनीफ और मीनाक्षी से पूछताछ के बाद उन्हें कोर्ट में पेश कर के सलाखों के पीछे पहुंचा दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित