Love Crime Story: बीवी का तोहफा

Love Crime Story: शाहिद से प्यार करने वाली तरन्नुम की शादी भले ही अलाउद्दीन से हो गई थी, लेकिन उस ने उसे मन से शौहर नहीं माना था. तभी तो जब प्रेमी ने उस से पूछा कि वह वैलेंटाइन डे पर क्या तोहफा लेगी तो उस ने शौहर का सिर मांग लिया…

17 जनवरी, 2016 को रविवार था. हनीफ खां के लिए यह दिन बहुत ही महत्त्वपूर्ण था. क्योंकि उस दिन उन की जिंदगी की ख्वाहिश पूरी होने जा रही थी. उन का एक ही सपना था कि उन के जीवित रहते उन के बेटे अलाउद्दीन की शादी हो जाए. अलाउद्दीन से बड़े उन के तीनों बेटों शफरुद्दीन, जाकिर व भूरे खां की शादियां हो चुकी थीं और वे बालबच्चेदार भी थे. जिला अलीगढ़, थाना कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला भुजपुरा के नए बसे इब्राहिमनगर में हनीफ खां का पूरा परिवार संयुक्त रूप से एक ही मकान में रहता था.

अलाउद्दीन 20 साल का हो चुका था. हनीफ खां ने उस का रिश्ता अलीगढ़ के ही थाना सिविललाइंस के मोहल्ला हमदर्दनगर, जमालपुर निवासी अलाउद्दीन उर्फ पप्पू की बेटी तरन्नुम से तय कर दिया था. शादी की तारीख भी निश्चित हो गई थी 17 जनवरी 2016. अंतत: हनीफ खां का सपना पूरा हो गया था. 17 जनवरी, 2016 को उन का बेटा तरन्नुम से निकाह कर के उसे घर ले आया था. अलाउद्दीन खूबसूरत पत्नी पा कर खुश था.

तरन्नुम 3 दिनों तक ससुराल में रही. चौथे दिन उसे मायके वाले विदा करा कर ले गए. 10 दिनों बाद अलाउद्दीन ससुराल जा कर अपनी पत्नी को ले आया. लेलिन इस के चौथे दिन ही तरन्नुम की जिद पर अलाउद्दीन को उसे उस के मायके छोड़ कर आना पड़ा. अलाउद्दीन कोई बच्चा तो था नहीं, पति के पास रहने के बजाय तरन्नुम के इस तरह मांबाप के घर जाने की जिद ने उस के मन में शक का बीज बो दिया था. जब शक की सुई घूमी तो उस की आंखों के सामने पहली रात से ले कर अब तक का सारा घटनाक्रम घूम गया.

तरन्नुम ने उसे अपने बदन को छूने तक नहीं दिया था. कभी सिर दर्द का बहना तो कभी कुछ और. उसे अपनी भाभी की बात भी याद आई. भाभी ने उसे बताया था कि तरन्नुम उस की गैरमौजूदगी में मोबाइल पर किसी से लंबीलंबी बातें करती है. जब दिमाग में इधरउधर की बातें आईं तो अलाउद्दीन मोटरसाइकिल से ससुराल जा पहुंचा और अम्मी की तबीयत खराब होने का बहाना बना कर बीवी को घर ले आया. ससुराल आने के दूसरे दिन जब तरन्नुम नहाने के लिए बाथरूम जाने लगी तो अलाउद्दीन ने उस से कहा कि वह एक जरूरी काम से बाहर जा रहा है. तरन्नुम जब बाथरूम में घुसी तो अलाउद्दीन धीरे से पलंग के नीचे घुस गया.

तरन्नुम नहा कर बाहर आई तो कमरा खाली था. मौका अच्छा था, वह बालों को तौलिए में लपेट कर बैठ गई और मोबाइल पर बातें करने लगी. अलाउद्दीन सारी बातें सुन रहा था. जब बात बरदाश्त के बाहर हो गई तो वह पलंग के नीचे से बाहर निकला और मोबाइल छीन कर बोला, ‘‘किस से बातें कर रही थी? क्या नाम है तेरे आशिक का?’’

‘‘जब सब कुछ सुन ही लिया है तो फिर पूछ क्यों रहे हो? यह पूछो कि मेरा उस से संबंध क्या है?’’ तरन्नुम ने बेशर्मी से कहा.

‘‘अगर तुम्हारे किसी और से संबंध थे तो उसी से शादी कर लेती. मेरी जिंदगी को नरक बनाने की क्या जरूरत थी?’’ अलाउद्दीन ने गुस्से में कहा.

तरन्नुम ने पलटवार करते हुए कहा, ‘‘चलो अच्छा ही हुआ, आप ने हमारी बातें सुन लीं. अगर थोड़ी देर और नीचे लेटे रहते तो आप को यह भी पता चल जाता कि मैं ने उसे यह कहने के लिए फोन किया था कि अब वह मुझे भूल जाए, क्योंकि मैं किसी और की बीवी बन चुकी हूं.’’

‘‘बीवी बनने की बात तो कहने वाली थीं, लेकिन आज तक तुम ने बीवी का कौन सा संबंध निभाया है?’’ अलाउद्दीन ने तीखे स्वर में पूछा.

‘‘जब तबीयत ही ठीक नहीं थी तो कैसे संबंध निभाती.’’ कहते हुए तरन्नुम ने अलाउद्दीन को पकड़ कर पलंग पर लिटा दिया और उस के सीने पर सिर रख कर बोली, ‘‘मुझ से अनजाने में जो भी गलती हुई, वह मेरी भूल थी. लेकिन अब मैं नादान नहीं हूं. मैं जानती हूं कि मैं आप की बीवी हूं. आप के खानदान की इज्जत हूं, माफ कर दो मुझे.’’

एक तो नईनई शादी थी, दूसरे पत्नी का पहला सान्निध्य. फलस्वरूप अलाउद्दीन तरन्नुम के त्रियाचरित्र को समझ नहीं पाया. इसे पत्नी की नादानी समझ कर उसे माफ कर दिया और सीने से लगा लिया. 2 दिनों तक तरन्नुम रातदिन अलाउद्दीन से बेल की तरह लिपटीचिपटी रही. उस ने अलाउद्दीन को वह सब भूलने को मजबूर कर दिया, जो वह उस के बारे में सोचता था. तरन्नुम उसे पूरी तरह समर्पित हो गई. तीसरे दिन तरन्नुम की मां का फोन आया तो अलाउद्दीन ने ही बातें कीं. बात करने के बाद उस ने तरन्नुम से कहा, ‘‘तैयार हो जाओ, तुम्हारी अम्मी ने हमें दावत पर बुलाया है.’’

‘‘मेरा मन नहीं है, अब वहां जाने का. तुम साथ हो तो मेरे लिए दावत कोई अहमियत नहीं रखती.’’ तरन्नुम उस के गले में बाहें डाल कर बोली.

‘‘मैं ने अम्मी से कह दिया है, जाओ जल्दी तैयार हो जाओ.’’

तरन्नुम ने दिखाने के लिए भले ही कुछ भी कहा हो, पर वह मन ही मन खुश थी. अलाउद्दीन के कहने पर वह तैयार हो गई. थोड़ी देर बाद दोनों बाइक से जमालपुर के लिए रवाना हो गए. मायके जा कर तरन्नुम ने अपनी मां से कह दिया कि उसे 2-4 दिन के लिए रोक ले. उस की तबीयत ठीक नहीं है. दावत खाने के बाद जब अलाउद्दीन चलने को हुआ तो सास ने उस से मनुहार कर के कहा कि तरन्नुम को 4-5 दिनों के लिए वहीं छोड़ दे. फलस्वरूप अलाउद्दीन को बात माननी पड़ी. वह अकेला ही घर लौट आया.

दूसरे दिन सुबह जब तरन्नुम चाय बना रही थी तो उस के मोबाइल की घंटी बजी. मां ने किचन में आ कर बताया तो तरन्नुम किचन से बाहर जाते हुए बोली, ‘‘मां चाय देखना, पता नहीं कौन बद्तमीज है, चाय भी नहीं पीने देता.’’

‘‘कौन क्या, तेरा शौहर होगा. शौहर को क्या ऐसे बोलते हैं. कुछ सलीका सीख ले.’’

मां को किचन में छोड़ कर तरन्नुम मोबाइल ले कर छत पर चली गई. ऊपर जा कर वह बनावटी गुस्से में बोली, ‘‘क्या बात है शाहिद, हम ने तो रात में ही फोन पर कह दिया था कि हम तुम्हारी खातिर घर रुक गई है. फिर सुबहसुबह क्या जरूरत आन पड़ी, जो घंटी बजा दी?’’

‘‘तुम्हें याद दिलाने के लिए फोन किया है. 3 बजे फूफी के घर आ जाना.’’ दूसरी ओर से यह कहने वाला उस का आशिक शाहिद था.

‘‘आ जाएंगे, हम वादा खिलाफी नहीं करते.’’ कह कर तरन्नुम नीचे आ गई. तब तक चाय बन गई थी. मां ने उसे चाय का प्याला देते हुए पूछा, ‘‘क्या कह रहे थे अलाउद्दीन?’’

‘‘3 बजे अमींनिशा बाजार बुलाया है.’’

‘‘तो चली जाना. शौहर ही तो है, कोई गैर तो नहीं.’’ मां ने कह दिया. उसे क्या पता था कि फोन पर दूसरी ओर अलाउद्दीन नहीं शाहिद था.

शाहिद 3 बजे से पहले ही फूफी के घर पहुंच कर तरन्नुम का इंतजार करने लगा. यह वह घर था, जहां दोनों की मोहब्बत जवान हुई थी. इसी घर की एकांत जगहों पर दोनों के बीच की दूरियां मिटी थीं. फूफी उन दोनों के संबंधों की राजदार थी. शाहिद बैठक में अकेला बैठा था. फूफी ने चाय का प्याला मेज पर रखते हुए उसे सलाह दी, ‘‘अब तुझे भी कोई लड़की ढूंढ़ कर निकाह कर लेना चाहिए. तरन्नुम अब किसी और की बीवी बन चुकी है. अगर भूल से भी कभी उस के शौहर को तुम दोनों की कहानी पता चल गई तो तरन्नुम की जिंदगी में तूफान आ जाएगा.’’

जब फूफी और शाहिद बात कर रहे थे, तभी तरन्नुम आ गई. बड़े अदब से फूफी को सलाम कर के वह सोफे पर बैठ गई. फूफी चुपचाप बाहर निकल गई.

‘‘क्या बात है शाहिद, तुम्हें इतनी बेसब्री क्यों हो जाती है?’’ तरन्नुम ने सोफे से उठ कर शाहिद की गोद में बैठते हुए पूछा.

‘‘मैं ने तो तुम्हें याद दिलाने के लिए फोन किया था.’’ शाहिद ने तरन्नुम के बालों से खेलते हुए कहा.

‘‘मैं ने तो यहां आते ही बता दिया था कि मैं तुम्हारे लिए आ गई हूं, फिर टाइम को कैसे भूल जाती? पर तुम्हें चैन कहां, जब मन आता है, मिला दिया फोन.’’

‘‘मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं जी सकता. वैसे भी परसों ‘वैलेंटाइन डे’ है, बोलो इस बार क्या तोहफा लोगी?’’ शाहिद ने पूछा.

‘‘मैं जो मागूंगी, तुम दे नहीं पाओगे शाहिद.’’ तरन्नुम ने शाहिद की बांहों में मचलते हुए कहा.

‘‘तुम मांगो तो. हम न दें तो लानत है हम पर.’’

‘‘और अगर मुकर गए तो…?’’ तरन्नुम ने शाहिद की बांहों से फिसल कर सामने खड़े होते हुए पूछा.

‘‘मैं भी पहलवान की औलाद नहीं, जो मुंह मांगा तोहफा न दूं. बताओ क्या चाहिए?’’ शाहिद ने उत्तेजना में कहा.

तरन्नुम यही चाहती थी. उस ने तुरंत कह दिया, ‘‘अलाउद्दीन का सिर.’’

‘‘शौहर का सिर?’’ ठगे से रह गए शाहिद ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘जी हां, शौहर का सिर.’’ कहते हुए तरन्नुम ने शाहिद को सारी बातें बता कर कहा कि उसे सब कुछ पता लग चुका है.

तरन्नुम पूरी चालाकी से ख्ेल ख्ेल रही थी. शाहिद कुछ सोचता, इस से पहले ही वह बोली, ‘‘मैं तुम्हारी अमानत को पहली रात से ही बचाती आ रही थी, लेकिन मजबूरी में उसे भी लुटाना पड़ा.’’

14 फरवरी, 2016 को वैलेंटाइन डे के दिन दोपहर को तरन्नुम को मोबाइल पर उस के शौहर अलाउद्दीन का फोन आया कि ‘आज हमारा पहला ‘वैलेंटाइन डे’ है, मैं शाम को तुम्हें लेने आ रहा हूं, तैयार रहना.’ तरन्नुम ने फोन कर के यह बात शाहिद को बता दी. अलाउद्दीन ससुराल आया और खापी कर तरन्नुम के साथ बाइक से घर के लिए निकला. उस वक्त पौने 8 बजे थे. शाहिद अपने एक दोस्त के साथ बाइक से उस का पीछा कर रहा था. रात साढ़े 8 बजे अलाउद्दीन की बाइक टावर वाले रास्ते से भुजपुरा में घुसी तो पीछे आ रहे शाहिद ने सुनसान जगह टक्कर मार कर अलाउद्दीन को गिरा दिया.

तरन्नुम भी गिर पड़ी. जब तक अलाउद्दीन संभल पाता, तब तक शाहिद ने बाइक से उतर कर उस के सिर में गोली मार दी. एक चीख के साथ ही अलाउद्दीन जमीन पर पड़ा रह गया. शाहिद तरन्नुम को उठाते हुए बोला, ‘‘जो तोहफा मांगा था, वही दिए जा रहा हूं.’’

‘‘भाग जाओ शाहिद, कोई पहचान लेगा. जल्दी भागो यहां से.’’ तरन्नुम ने कहा और सड़क पर पड़े तड़पते शौहर को देख कर रोनेचीखने लगी.

इत्तफाक से यह सारा नजारा वहां से गुजर रहे एक आदमी ने देख लिया था. हमलावरों के भागते ही वहां लोगों की भीड़ एकत्र हो गई. किसी ने खबर दी तो अलाउद्दीन के घर वाले भी दौड़े चले आए. तब तक घटना की सूचना पुलिस को भी मिल चुकी थी. पुलिस के पहुंचने से पहले ही चश्मदीद ने पूरी हकीकत अलाउद्दीन के घर वालों को बता दी थी. दूसरी ओर सूचना मिलते ही थाना कोतवाली के इंसपेक्टर हैदर रजा जैदी बिना देर किए पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए थे.

खून से लथपथ अलाउद्दीन को तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां से उसे जे.एन मेडिकल भेजा गया. उसे बचाने के लिए डाक्टरों की टीम जुट गई. उसी रात अलाउद्दीन के भाई भूरे खां की तहरीर पर तरन्नुम, शाहिद उर्फ लड्डन व एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ भादंवि की धारा 307 व 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. हकीकत सुननेसमझने के बाद इंसपेक्टर जैदी ने अलाउद्दीन के घर वालों को सचेत करते हुए कहा कि अलाउद्दीन के होश में आने तक तरन्नुम को घर से बाहर न जाने दें, साथ ही उस की हर गतिविधि पर नजर रखने के अलावा यह भी ध्यान रखें कि वह कुछ खा न ले.

2 दिनों तक अलाउद्दीन जिंदगी और मौत के बीच झूलता रहा. उस की स्थिति कोमा जैसी थी. 16 फरवरी की रात उस ने दम तोड़ दिया. अलाउद्दीन की मौत की सूचना मिलते ही हैदर रजा जैदी ने तरन्नुम को उस की ससुराल पहुंच कर गिरफ्तार कर लिया और उसे कोतवाली ले आए. उस से पूछताछ की गई तो उस ने सब कुछ सचसच बता दिया. इसी के साथ इस मामले में दर्ज मुकदमा धारा 302 में तरमीम कर दिया गया. शाहिद की गिरफ्तारी के लिए कई जगह दबिश दी गई. पुलिस की काररवाई से परेशान हो कर शाहिद ने 19 फरवरी को अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

कोतवाली इंसपेक्टर हैदर रजा जैदी ने अदालत में प्रार्थनापत्र दे कर शाहिद को 3 मार्च, 2016 को पूछताछ के लिए रिमांड पर ले लिया. कोतवाली ला कर उस से पूछताछ की गई तो उस ने अपने साथी का नाम मुस्तकीम निवासी हमदर्दनगर, जमालपुर बताया. साथ ही उस ने वह तमंचा भी बरामद करा दिया, जिस से अलाउद्दीन की हत्या की गई थी. शाहिद को जेल भेजने के बाद पुलिस ने मुस्तकीम की गिरफ्तारी के प्रयास शुरू कर दिए. 8 मार्च, 2016 को इंसपेक्टर जैदी को सूचना मिली कि मुस्तकीम जमालपुर गंदा नाले के पास खड़ा है. पुलिस ने वहां जा कर उसे भी गिरफ्तार कर लिया. वह कहीं बाहर जाने के लिए अपने घर से आया था.

कोतवाली में मुस्तकीम ने बताया कि वह सिर्फ दोस्ती के नाते यह काम करने के लिए तैयार हो गया था. घटना के वक्त वह बाइक चला रहा था, जबकि शाहिद पीछे बैठा था. पूछताछ के बाद मुस्तकीम को भी अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीनों जेल में थे. तरन्नुम को वैलेंटाइन का तोहफा तो मिल गया, लेकिन बाकी की उस की जिंदगी जेल में जो बीतेगी, वह भी उस के लिए तोहफे जैसी ही होगी. Love Crime Story

Uttar Pradesh Crime: ज्योति जो बुझ गई

Uttar Pradesh Crime: ज्योति का कमाने वाला पति था, 3 बच्चे थे, घर में किसी चीज की कमी नहीं थी लेकिन स्वार्थी राजेश के कहने में आ कर उस ने जो किया, उस से उस की खुद की जान तो गई ही, अपना और राजेश का घर भी बरबाद कर दिया.

आदमी में महत्त्वाकांक्षाएं कभीकभी ऐसा जुनून पैदा करती हैं कि कुछ पाने की चाह में उस के पास जो होता है, वह भी गंवा बैठता है. ज्योति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. वह उत्तर प्रदेश के इटावा शहर के पंचवटी रोड स्थित यशोदानगर के रहने वाले कालका सिंह चौहान के बड़े बेटे जितेंद्र की पत्नी थी. उन का दूध का कारोबार था, जिसे अब उन का बड़ा बेटा जितेंद्र संभालता था.

ज्योति तहसील करहल के गांव तिलियानी के रहने वाले रिटायर्ड फौजी महेंद्र सिंह की बेटी थी. ससुराल में किसी चीज की कमी नहीं थी. वह बीए पास थी. शादी से पहले वह नौकरी करके अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी. अच्छी ससुराल मिल जाने की वजह से उस ने नौकरी वाली बात भुला भले दी थी, लेकिन मन से निकाल नहीं पाई थी, जिस की वजह से कभीकभी उसे लगता था कि वह जो करना चाहती थी, कर नहीं पाई.

ज्योति जितेंद्र के 2 बेटों और 1 बेटी की मां बन चुकी थी. घर के कामों को करते हुए कभीकभी उसे लगता कि जिंदगी इसी तरह खाना बनाते, बरतन धोते और घर वालों की चाकरी करते बीत जाएगी. कभी वह मन की बात पति से कहना चाहती तो उस के पास समय ही नहीं होता था कि वह पत्नी के मन की बात को सुनता. लेकिन समय को किस ने देखा है. कभी भी कुछ भी हो सकता है. वह कभी भी करवट ले सकता है और आदमी को कुछ भी करने का मौका दे सकता है.

करीब 4 साल पहले जितेंद्र ने अपने मकान का एक हिस्सा अपने दोस्त राजेश को किराए पर दे दिया. वह आगरा के फतेहाबाद के श्रीकृष्णपुरा के रहने वाले बीरी सिंह का बेटा था. दोस्त होने के नाते जितेंद्र ने उसे दूध के अपने कारोबार में पार्टनर बना लिया था. राजेश ने कारोबार में काफी मेहनत की, जिस से जल्दी ही उस की हैसियत जितेंद्र के घर में सदस्य जैसी हो गई. उस का खानापीना, उठनाबैठना, सब जितेंद्र के घर होने लगा. इस का नतीजा यह निकला कि उसे जितेंद्र के घर के अंदर की बातें पता चल गईं.

कुछ ही दिनों में राजेश को लगा कि जितेंद्र और उस की पत्नी ज्योति के बीच कुछ ऐसा है, जो पतिपत्नी के बीच नहीं होना चाहिए. वह शादीशुदा था और जब भी मौका मिलता था, पत्नी से मिलने घर जाता रहता था. लेकिन घर से दूर रह कर उसे पत्नी की कमी तो खलती ही थी. उस ने महसूस किया कि ज्योति उदास रहती है. उस ने उस से उदासी का कारण पूछा तो वह टाल गई. राजेश को पता था कि ज्योति पढ़ीलिखी और स्मार्ट महिला है. उस के घर वालों की कुछ मजबूरियां रही होंगी, तभी उस की शादी एक कम पढ़ेलिखे लड़के से कर दी थी है.

दरअसल, ज्योति अब तक घर के कामों से ऊब गई थी. वह कुछ करना चाहती थी, लेकिन जितेंद्र का कहना था कि उसे किस चीज की कमी है, जो वह नौकरी करना चाहती है. इस से ज्योति को लगता था कि पति उस की भावनाओं की कद्र नहीं करता. राजेश का घर के अंदर तक आनाजाना था. पत्नी से दूर रहने की वजह से वह ज्योति के प्रति सहानुभूति दिखा कर उस से कुछ हासिल करना चाहता था. इसलिए एक दिन उस ने ज्योति से कहा, ‘‘भाभी, मैं देखता हूं, जितेंद्र भाई को तुम्हारी जो कद्र करनी चाहिए, वह नहीं करते. जबकि तुम सुंदर और स्मार्ट तो हो ही, उन से ज्यादा पढ़ीलिखी भी हो. आखिर तुम कुछ करना चाहती हो तो इस में बुरा क्या है? वैसे मुझे यह सब कहना तो नहीं चाहिए था, लेकिन तुम्हें परेशान देख कर कह दिया.’’

ज्योति को लगा, राजेश ठीक ही कह रहा है. वह सुंदर और स्मार्ट है, पढ़ीलिखी भी है. अगर वह चाहे तो कुछ कर सकती है. लेकिन जितेंद्र करने नहीं देता. शायद वह उसे इसी तरह नौकरानी बना कर रखना चाहता है. उस दिन दोपहर का खाना ले कर वह राजेश के कमरे में पहुंची तो राजेश ने कहा, ‘‘अरे भाभी, तुम ने क्यों तकलीफ की? मैं खाना लेने आ ही रहा था.’’

‘‘मैं ही ले कर आ गई तो क्या हो गया?’’ राजेश के कमरे में पड़ी कुरसी पर बैठते हुए ज्योति ने कहा, ‘‘अच्छा यह बताओ कि क्या मैं कुछ कर सकती हूं? घर का काम खत्म होने के बाद समय काटे नहीं कटता है.’’

‘‘भाभीजी, तुम पढ़ीलिखी हो, टीचर बन सकती हो, ब्यूटीपार्लर खोल सकती हो, जो भी चाहो, कर सकती हो.’’

‘‘तुम्हें मेरे ऊपर इतना विश्वास है?’’ ज्योति ने पूछा.

‘‘क्यों नहीं, मैंने कहा न कि तुम सुंदर और पढ़ीलिखी हो, कुछ भी कर सकती हो. जितेंद्र तुम्हें परख नहीं पाया.’’

‘‘लेकिन तुम ने परख लिया?’’ ज्योति ने हंसते हुए कहा.

ज्योति का मन राजेश के इर्दगिर्द भटकने लगा तो पति से नफरत सी होने लगी. जल्दी ही वह राजेश के प्रति आकर्षित हो उठी. इस के बाद उस की नजरें बदल गईं तो राजेश को भांपते देर नहीं लगी. आखिर एक दिन उस ने ज्योति से मन की बात कह ही दी, ‘‘भाभी, मैं तुम से प्यार करने लगा हूं.’’

‘‘प्यार, वह भी मुझ से? अरे मैं तुम्हारे दोस्त की पत्नी हूं और उन के 3 बच्चों की मां भी.’’

‘‘अब भाभी, तुम पर दिल आ गया तो मैं क्या करूं. मैं उस के हाथों मजबूर हूं. मैं तुम्हें ले कर परेशान रहता हूं. काम में भी मन नहीं लगता. अगर तुम ने ना कर दिया तो शायद मैं यहां न रह पाऊं.’’ राजेश ने कहा.

राजेश ने जाने की बात की तो ज्योति का दिल धड़क उठा. उस ने कहा, ‘‘मुझे कुछ सोचने का समय दो.’’

‘‘सोचना क्या है? मेरा दिलोदिमाग सब बेचैन है. मेरी रातों की नींद और दिन का चैन लुटा हुआ है. अगर यही हाल रहा तो मैं पागल हो जाऊंगा.’’

ज्योति ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘ठीक है, आज रात जितेंद्र बाहर जा रहे हैं.’’

‘‘जितेंद्र बाहर जाए या घर में रहे, इस से मुझे क्या मिलेगा?’’ राजेश ने उत्सुकता से पूछा.

ज्योति ने उस के पास आ कर कहा, ‘‘लगता है, तुम बुद्धू ही हो. इसीलिए मेरी बात तुम्हारी समझ में नहीं आई. आज रात में मिलूंगी.’’

राजेश की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. इतनी आसानी से काम बन जाएगा, उस ने सोचा भी नहीं था. फिर उस रात राजेश ने दोस्त के दांपत्य में सेंध लगा दी. जितेंद्र को पता ही नहीं चला कि दोस्त आस्तीन का सांप बन गया है. पत्नी और दोस्त दोनों ही बेवफा हो गए थे. वह 2 दिनों के लिए बाहर गया था. लौट कर आया तो सब बदल गया था. रात को पलंग पर ज्योति रहती तो उस के पास थी, लेकिन साथ नहीं रहती थी.

कुछ ही दिनों में जितेंद्र को लगने लगा कि उस के घर में कुछ गड़बड़ है. क्योंकि ज्योति उस की उपेक्षा करने लगी थी. लेकिन वह यह नहीं समझ पा रहा था कि इस की वजह क्या है. पर ऐसी बातें ज्यादा दिनों तक छिपी कहां रहती हैं. पत्नी और दोस्त के हावभाव से उसे शक होने लगा. पिछले कुछ दिनों से वह देख रहा था कि राजेश को वह काम से बाहर भेजना चाहता तो वह कोई न कोई बहाना कर के घर में ही रहना चाहता था. लेकिन बिना सबूत के कुछ कहना ठीक नहीं था.

अब तक ज्योति को लगने लगा था कि आखिर उस के और राजेश के इस संबंध का भविष्य क्या है? इस की वजह यह थी कि अब वह राजेश को दिल से चाहने लगी थी और आगे की जिंदगी उसी के साथ बिताना चाहती थी. इसलिए एक दिन उस ने राजेश से पूछ लिया, ‘‘राजेश, हम इस तरह कब तक चोरीछिपे मिलते रहेंगे.’’

‘‘जैसा चल रहा है, वैसा ही चलने दो, इस में बुरा क्या है.’’ राजेश ने कहा.

‘‘अब मैं तुम्हारी पत्नी बन कर तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं. यह लुकाछिपी मुझे अच्छी नहीं लगती.’’

‘‘लेकिन ज्योति मैं पत्नीबच्चों वाला हूं, उन का क्या होगा?’’

‘‘मैं उन के बारे में क्यों सोचूं? मैं ने पति को दिल से निकाल दिया है, इसलिए अब तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं. इस के लिए तुम्हें कुछ तो करना ही होगा.’’

‘‘ठीक है, मैं कुछ सोचता हूं.’’ राजेश ने कह तो दिया, लेकिन वह जानता था कि पत्नी के रहते वह ज्योति के लिए कुछ नहीं कर सकता. वैसे भी वह ज्योति को ले कर जरा भी गंभीर नहीं था. उस ने तो मौजमस्ती के लिए उस से संबंध बनाए थे.

इस मामले में बात आगे बढ़ती, संयोग से एक दिन जितेंद्र ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया. राजेश को तो उस ने खरीखोटी सुना कर भगा दिया, जबकि ज्योति की जम कर पिटाई कर दी. राजेश के जाने के बाद से ज्योति परेशान रहने लगी थी. आखिर एक दिन राजेश का फोन आया तो उस ने अपने दिल की बात उस से कही. तब राजेश ने कहा, ‘‘ज्योति, मुझे भले ही तुम्हारे घर से निकाल दिया गया है, लेकिन मैं तुम्हें दिल से नहीं निकाल पाया हूं.’’

राजेश के लिए परेशानी तब खड़ी हो गई, जब उस की पत्नी विमला को उस के  और ज्योति के संबंधों का पता चल गया. उसे शक तो पहले से ही था, लेकिन जब पति के मोबाइल में उस ने ज्योति का फोटो देखा तो विश्वास हो गया. वह समझ गई कि पति धोखा दे रहा है. उस ने राजेश से साफ कह दिया, ‘‘अगर तुम ने ज्योति से संबंध खत्म नहीं किए तो मैं जान दे दूंगी. उस के बाद तुम जेल की हवा खाते रहना.’’

एक ओर पत्नी थी, दूसरी ओर प्रेमिका. दोनों के बीच फंसा राजेश बेचैन हो उठा. उधर राजेश के जाने के बाद से जितेंद्र को लगता था कि सब ठीक हो चुका है, लेकिन ज्योति तो पहले से ज्यादा उग्र हो उठी थी. राजेश से मिलने के लिए ही उस ने घर में कहा कि वह बीएड करना चाहती है. जितेंद्र ने सोचा कि अगर ज्योति का मन पढ़ाई में लग जाता है तो वह राजेश को भूल जाएगी. इसलिए उस ने बीएड करने के लिए ज्योति का दाखिला शमसाबाद स्थित एनडी कालेज में करा दिया.

बीएड तो एक बहाना था, ज्योति ने राजेश से मिलने और उस पर शादी का दबाव डालने के लिए यह सब किया था. जबकि राजेश ने सिर्फ मजा लेने के लिए उस से संबंध बनाए थे. ज्योति अब उस के पीछे हाथ धो कर पड़ गई. एक दिन उस ने फोन कर के कहा, ‘‘राजेश अगर तुम्हें लगता है कि मैं मजाक कर रही हूं तो यह तुम्हारी भूल है. मैं सचमुच तुम से शादी करना चाहती हूं. अगर तुम ने धोखा दिया तो मैं तुम्हें जेल भी भिजवा सकती हूं.’’

ज्योति के तेवर देख कर राजेश डर गया. अब वह सोचने लगा कि ज्योति से कैसे छुटकारा पाए, क्योंकि अब उस की वजह से उस की गृहस्थी बरबाद होने वाली थी. दूसरी ओर उस की वजह से जितेंद्र भी उस की जान का दुश्मन बन सकता था. इसलिए उस ने सोचा कि अगर ज्योति को ठिकाने लगा दिया जाए तो सारा झंझट खत्म हो जाएगा. इस के बाद उस ने ज्योति को फोन कर के कहा, ‘‘ज्योति, तुम ऐसा करो, फतेहाबाद आ जाओ, यहीं बैठ कर आपस में बात करते हैं कि कैसे क्या किया जाए.’’

20 अक्तूबर, 2016 को कालेज जाने के बहाने ज्योति घर से निकली. दोपहर बाद उस ने जितेंद्र को फोन किया कि बैंक बंद होने की वजह से वह पैसा नहीं निकाल पाई, इसलिए रात में किसी सहेली के पास हौस्टल में रुक जाएगी. कल सुबह घर आ जाएगी. इस के बाद ज्योति का मोबाइल बंद हो गया. अगले दिन वह न घर आई और न फोन पर बात हो सकी तो घर वालों को चिंता हुई. जितेंद्र ने कालेज और हौस्टल जा कर पता किया, लेकिन कुछ पता नहीं चला.

इस के बाद ज्योति की तलाश शुरू हुई. राजेश से भी पूछा गया, लेकिन उस ने जानने से साफ मना कर दिया. काफी तलाश के बाद भी जब ज्योति का कुछ पता नहीं चला तो इटावा कोतवाली में जितेंद्र ने उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. जितेंद्र की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर ज्योति कहां चली गई. अब पुलिस वाले भी उस की तलाश में लग गए थे. लेकिन उस का कुछ पता नहीं चल रहा था. कभीकभी गुनाह सिर चढ़ कर बोलता है. ऐसा ही इस मामले में भी हुआ. 6 नवंबर, 2016 को राजेश जितेंद्र के घर पहुंचा और मुंह लटका कर बोला, ‘‘जितेंद्र भाई, भाभी का कुछ पता चला?’’

‘‘नहीं, लेकिन कभी न कभी तो पता चल ही जाएगा.’’

‘‘वह कुछ तो कह कर गई होंगी?’’ राजेश ने पूछा.

‘‘अब इस का क्या फायदा? जब लौट कर आएंगी, तभी पता चलेगा कि वह कहां गई थीं.’’ जितेंद्र ने कहा.

‘‘देखो जितेंद्र, तुम मेरे दोस्त हो, मुझे तुम से पूरी सहानुभूति है. कुछ गलतियां जरूर मुझ से हुई हैं, पर मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूं. मैं यहां तुम को कुछ बताने आया हूं. फोन पर बताता तो तुम पता नहीं क्या सोचते. ज्योति भाभी को फतेहाबाद में देखा गया है, पर यकीन मानो वह मेरे पास नहीं आई थीं. तुम्हें तो पता ही है कि आजकल मैं चौकीदारी की नौकरी कर रहा हूं. छुट्टी मुश्किल से मिलती है, वरना मैं तुम्हारी मदद जरूर करता.’’

राजेश की बातों से जितेंद्र को उस पर शक हुआ. उस ने तुरंत कोतवाली पुलिस को फोन कर के बुला लिया. पुलिस राजेश को हिरासत में ले कर कोतवाली ले आई और जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने ज्योति की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद कोतवाली पुलिस राजेश को ले कर फतेहाबाद पहुंची और सीओ ए.के. सिंह से मिली. उन की उपस्थिति में राजेश की निशानदेही पर वह जहां चौकीदारी करता था, वहां खुदाई कराई गई तो ज्योति की सड़ीगली लाश बरामद हो गई. पत्नी की लाश देख कर जितेंद्र फूटफूट कर रोने लगा.

थाना फतेहाबाद में अपराध संख्या 334/15 पर राजेश के खिलाफ ज्योति की हत्या का मुकदमा दर्ज कर के उसे गिरफ्तार कर लिया गया. इस के बाद उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. इस तरह ज्योति की महत्वाकांक्षा उसे तो ले डूबी ही, 2 घर भी बरबाद हो गए. Uttar Pradesh Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Family Crime: बदचलन बहू

Family Crime: न जाने कितनों को हवालात की हवा खिलाने वाले मोहन सक्सेना बहू की बदचलनी से इस कद्र आजिज आ गए कि यह जानते हुए भी कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, उन्होंने कानून हाथ में ले ही लिया. नतीजतन अब वह बेटे के साथ जेल में है.

मध्य प्रदेश पुलिस में असिस्टैंट सबइंसपेक्टर मोहन सक्सेना के दिन का चैन और रातों की नींद गायब थी. सोतेजागते, उठतेबैठते उन्हें एक ही शख्स नजर आता था, वह था उन का पुराना ड्राइवर अंकित चौरसिया. अंकित बिना किसी डर और लिहाज के उन के घर की इज्जत से खिलवाड़ कर रहा था. गुस्से, खीझ और बेबसी में मोहन सक्सेना दांत पीस कर रह जाते थे. उन्हें कभीकभी इस बात का डर सताने लगता कि कहीं उन्हें इस तनाव में फिर से लकवा न मार जाए या  हार्टअटैक न आ जाए.

59 वर्षीय मोहन सक्सेना की तैनाती शाजापुर की पुलिस लाइन में थी. वह अगले ही साल रिटायर होने वाले थे. एक उम्र पुलिस की नौकरी करने वाले मोहन सक्सेना की जिंदगी में कई तरह के उतारचढ़ाव आए. लेकिन जिंदगी की ढलती शाम में वह जो कुछ देख रहे थे, वह उन की आंखों में कांटे की तरह चुभ रहा था. इस की वजह थी उन की बहू नेहा. शाजापुर में उन का अपना अलग रुतबा था, जिस की वजह वरदी या पुलिस की नौकरी ही नहीं, बल्कि एक इज्जतदार कायस्थ परिवार का मुखिया होना भी था. बहू द्वारा किए जा रहे कृत्य से उन्हें अपनी इज्जत मिट्टी में मिलती नजर आ रही थी. लेकिन वह करें क्या उन की समझ में नहीं आ रहा था.

क्योंकि लाख समझानेबुझाने और चेतावनी देने पर भी न नेहा मान रही थी और न ही अंकित रास्ते पर आ रहा था. उन के सुनने में तो यहां तक आया कि अंकित ने अपने मोबाइल फोन में नेहा के साथ बिताए अंतरंग दृश्यों की कुछ फोटो तक खींच रखी हैं जिन्हें वह अपने दोस्तों को दिखाता रहता है. ऐसी बेबसी में अकसर वह उस घड़ी को कोसते थे, जब उन्होंने अंकित को शरीफ मानते हुए अपने यहां ड्राईवरी की नौकरी पर रखा था. दरअसल मोहन सक्सेना का बेटा नितिन दिमागी तौर पर कुछ कमजोर है. यह बात सारा शाजापुर जानता था.

अपने रिटायर होने से पहले उन्होंने उस की शादी अपने बराबर वाले घर में कर दी थी. बेटा कुछ करता है, यह दिखाने के लिए उन्होंने एक कार खरीद ली थी, जो बतौर टैक्सी चलती थी. अंकित को यही गाड़ी चलाने के लिए रखा गया था. शुरूशुरू में तो सबकुछ ठीकठाक चला. सवारियां मिल जातीं तो अंकित गाड़ी ले कर चला जाता और न मिलती तो शहर में इधरउधर घूम कर वक्त काटता. उधर नितिन को अपने लिए जमाए जा रहे इस ट्रैवलिंग के कारोबार से कोई खास लेनादेना नहीं था. इतना ही नहीं, उस की दिलचस्पी तो अपनी पत्नी में भी नहीं थी, जो खासी खूबसूरत, आकर्षक और चंचल थी. उस की पति से बिलकुल पटरी नहीं बैठती थी.

अंकित ने इसी बात का फायदा उठाया. वह नेहा को चाहने लगा और उस से करीबी संबंध बनाने की जुगत में लग गया. अपने बातूनी स्वभाव से उस ने उसे प्रभावित करना शुरू कर दिया. बातों का दायरा बढ़तेबढ़ते प्यार के मुकाम तक पहुंच गया और फिर एक दिन ऐसा भी आ गया, जब दोनों के संबंध बन गए. इस के बाद सिलसिला बन गया. दोनों ने ही बूढ़े मोहन सक्सेना का किसी भी स्तर पर कोई लिहाज नहीं किया.

पिछले साल एकाएक मोहन सक्सेना को लकवा मार गया तो अंकित को उन के घर आनेजाने के ज्यादा मौके मिल गए. सक्सेना परिवार के सारे काम वह वक्त पर ईमानदारी से कर देता था. लेकिन नेहा के आकर्षण से खुद को नहीं बचा सका. नेहा भी खूबसूरत और मजाकिया स्वभाव के अंकित के प्रेमजाल में फंसने से खुद को नहीं रोक पाई थी. उस के संस्कार इस कथित प्यार या व्यभिचार के आगे ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाए.

लकवाग्रस्त मोहन सक्सेना का लंबा इलाज चला तो उस बुरे वक्त में कई मामलों में नितिन की भूमिका अंकित निभा रहा था, इसलिए मोहन उस के एहसान तले दबते जा रहे थे. इलाज के अलावा वह झाड़फूंक और तंत्रमंत्र का भी सहारा ले रहे थे. यानी वह हर हालत में ठीक हो जाना चाहते थे. और इस सब से जल्द ही वह ठीक भी हो गए.

शाजापुर एक छोटा सा कस्बा है, इसलिए मोहन सक्सेना की बहू के प्रेमसंबंधों की चर्चा लोग चटकारे लेले कर करने लगे. यह बात जब मोहन सक्सेना के कानों में पड़ी तो वह बौखला उठे. एक बार तो उन्हें कान सुनी बातों पर विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने सोचा कि ऐसा नहीं हो सकता. क्योंकि नेहा शरीफ घर की थी. उस के मांबाप ने उसे बेहतर संस्कार दिए थे. रही बात अंकित की तो कल के इस छोकरे की क्या मजाल जो उन की बहू की तरफ आंख उठा कर भी देखे. लेकिन पुलिस की नौकरी के दौरान उन्होंने कई संस्कारवान बहूबेटियों का त्रियाचरित्र देखा था और अंकित जैसे रंगीले मजनूं भी देखे थे.

लिहाजा दिमाग में आया शक दूर करने के लिए उन्होंने खुद चोरीछिपे दोनों की निगरानी शुरू कर दी. नितिन से तो उन्हें कोई उम्मीद करना बेकार लग रहा था. दिमागी कमजोरी के चलते वह गुस्से और जल्दबाजी में बगैर सोचेसमझे कोई ऐसा कदम उठा सकता था, जो काफी महंगा पड़ता. इसलिए उन्होंने इस बारे में नितिन को कुछ नहीं बताया. आखिर एक दिन उन्होंने खुद अपनी आंखों से अंकित और बहू नेहा को अपने ही घर में आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया तो मारे गुस्से के उन का शरीर जल उठा. उन्हें विश्वास हो गया कि बाहर उन के बहू और अंकित के बारे में जो बातें की जा रही हैं, निराधार नहीं थीं. उन का मन कर रहा था कि वह अंकित को ऐसी सजा दें कि कोई भी उन के घर की तरफ नजर उठाने की हिम्मत न करे.

लेकिन वह कानून को अपने हाथ में लेना नहीं चाहते थे और अदालत या बाहर की दुनिया तक खुद बात ले जाएं तो जगहंसाई के साथ उन की जिंदगी भर की कमाई इज्जत मिट्टी में मिला देने वाली बात होती. किसी तरह जहरीला घूंट पी कर वह चुप रहे. लेकिन अगले दिन उन्होंने दोनों को खूब लताड़ा. अंकित को उन्होंने नौकरी से हटा दिया, साथ ही नेहा को भी सख्त लहजे में समझा दिया कि आइंदा वह उस लड़के से मिलेगी तो अच्छा नहीं होगा.

ससुर के गुस्से को देख कर नेहा उस समय सहम जरूर गई थी, लेकिन अंकित की यादों को वह दिल से निकाल नहीं पाई. वह ससुर से नजरें बचा कर उस से घर से बाहर मिलने लगी. यानी आशिक का लगाव ससुर की वरदी पर भारी पड़ा. आशिक से बाहर मिलने की बात भी मोहन सक्सेना से ज्यादा दिनों तक छिप नहीं सकी. वह परेशान थे कि बहू का क्या करें, जो यह उस लड़के का पीछा छोड़ दे. उसी समय अचानक मोहन सक्सेना के दिमाग में तांत्रिक बाबा उर्फ संजय व्यास का खयाल आया. उन्हें उम्मीद की एक किरण दिखाई पड़ी. वह खुद भी मानते थे कि उन का लकवा तांत्रिक बाबा ने ही ठीक किया था.

कुछ साल पहले तक संजय व्यास शाजापुर के ही एक सरकारी बैंक में चपरासी था. बाद में वह नौकरी छोड़ कर कस्बे में छोटे किले के पास स्थित बरगद के पेड़ के नीचे बैठ कर तंत्रक्रियाओं द्वारा लोगों का इलाज करने लगा था. इस तरह तथाकथित तांत्रिक बन कर वह लोगों की जेबें ढीली करने लगा था. इस से उसे अच्छी कमाई होने लगी थी. देखते ही देखते वह शहर में इतना मशहूर हो गया कि हर गुरुवार को उस के पास हैरानपरेशान लोगों की भीड़ लगने लगी थी. संजय का यह कारोबार चल निकला तो उस ने हुलिया भी बदल लिया. वह हरे रंग के कपड़े पहनने लगा. उस के गले में तरहतरह की मालाएं और अंगुलियों में हरे, काले, लाल आदि रंगों वाले  नगों की अंगूठियां चमकने लगीं.

अपनी परेशानी से छुटकारा पाने के लिए मोहन उस तथाकथित तांत्रिक उस की शरण में आने लगे. उन्होंने बहू के देहरी लांघने वाली बात तांत्रिक को बता कर कहा कि किसी भी तरह वह कुछ ऐसा कर दें कि बहू का प्रेमी अंकित की तरफ से मन उचट जाए. तांत्रिक संजय ने उन्हें भरोसा दिया कि वह अपनी सिद्धियों के बल पर ऐसा कर देगा कि नेहा उस लड़के का नाम तक नहीं लेगी. इस काम के लिए उस ने मोहन सक्सेना से मोटी रकम भी ली.

इसी तांत्रिक के पास अंकित भी पहुंच गया. अंकित ने उस से कहा कि उस की प्रेमिका नेहा अब उस से दूरियां बना रही है. वह ऐसा कुछ कर दे कि वह पति को छोड़ कर उस के पास आ जाए. बातचीत से तांत्रिक को पता लग गया कि इस का चक्कर मोहन सक्सेना की बहू से चल रहा है. वह उस के पास इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए आए थे. तांत्रिक के लिए मोहन सक्सेना या अंकित में से कोई भी उस का सगा नहीं था. उस का मकसद तो दोनों से पैसे कमाना था. इसलिए उस ने अंकित से भी मोटे पैसे ले लिए. इस तरह तांत्रिक संजय दोनों से ही पैसे ऐंठता रहा.

बाद में मोहन को पता चला कि अंकित भी संजय बाबा के पास आता है तो उन का माथा ठनका. वह भागेभागे संजय बाबा के पास पहुंचे. उन्होंने पैसों का लालच दे कर बाबा से अंकित के बारे में पूछा तो उस ने मनुहार के बाद बता दिया कि अंकित नेहा को अपने वश में करवाने के लिए आता है. मोहन सक्सेना अब अंकित से तुरंत छुटकारा पाना चाहते थे. इस बारे में उन्होंने तांत्रिक संजय से बात की. बातचीत के बाद उन्होंने फैसला किया कि अब तंत्रमंत्र से तो बात संभलने वाली नहीं, लिहाजा अंकित की हत्या कर दी जाए.

वैसे कई बार यह बात मोहन सक्सेना के मन में आई थी, लेकिन अपने पुलिसिया तजुर्बे से वह जानते थे कि किसी का कत्ल कर कानून से बच पाना आसान काम नहीं होता. इसलिए वह यह अपराध नहीं करना चाहते थे. पर अब उन्हें तांत्रिक संजय का साथ मिल रहा था, इसलिए वह तैयार हो गए. तांत्रिक संजय व्यास अंकित की हत्या के लिए तैयार हो गया. इस के लिए उस ने मोहन सक्सेना से 15 हजार रुपए की मांग की तो उन्होंने झट से पैसे दे दिए. क्योंकि जिस काम के लिए वह अपनी अब तक की सारी कमाई खर्च करने को तैयार थे, वह काम काफी सस्ते में हो रहा था.

दूसरी ओर अंकित को इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि संजय और मोहन के बीच क्या खिचड़ी पक चुकी है. वह तो यह सोच कर खुश हो रहा था कि तांत्रिक की वशीकरण क्रिया के बाद नेहा हमेशा के लिए उस के पास चली आएगी. इसलिए तांत्रिक उस से जोजो काम करने के लिए कहता था, वह वैसा ही कर रहा था. एक दिन संजय बाबा ने उस से कहा कि एक विशेष तांत्रिक क्रिया करनी जरूरी है, जो शाजापुर में नहीं, बल्कि दूसरी किसी जगह पर करनी होगी. अंकित तुरंत तैयार हो गया. उसे लगा कि इस क्रिया के बाद नेहा उस के साथ भागने को तैयार हो जाएगी. फिर दोनों कहीं दूर जा कर शादी कर लेंगे.

संजय ने उसे बताया था कि यह काम 16 जनवरी शनिवार को करना ठीक रहेगा. अंकित तैयार हो गया. उस ने संजय को बताया कि वह ठीक वक्त पर गाड़ी ले कर आ जाएगा. इस के बाद पूजा के लिए चले चलेंगे. अंकित उस समय शाजापुर की ही एक संभ्रांत महिला निर्मला गौर के यहां ड्राइवर की नौकरी कर रहा था. उस दिन उस ने निर्मला से यह कह कर उन की कार मांग ली कि वह कुछ दोस्तों के साथ उज्जैन जाना चाहता है. निर्मला को इस पर कोई ऐतराज नहीं हुआ. उन्होंने कार की चाबियां अंकित को दे दीं.

16 जनवरी की सुबह अंकित तांत्रिक बाबा के पास पहुंच गया. तांत्रिक उसे बैरसिया होते हुए विदिशा रोड पर स्थित भोजापुरा के जंगल में ले गया. यह जंगल आमतौर पर सुनसान रहता है. इस जंगल में हत्या करने की सलाह दरअसल में मोहन सक्सेना ने ही दी थी, ताकि इतनी दूर लाश मिलने पर उस की शिनाख्त न हो सके. जंगल में एक जगह पर बैठ कर संजय व्यास अंकित से पूजा करवाने लगा. कुछ देर बाद तांत्रिक संजय ने कहा, ‘‘इस सिद्धि के लिए तुम्हें अपने सारे कपड़े उतारने पड़ेंगे.’’

पहले तो अंकित तांत्रिक की इस बात पर चौंका, पर यह क्रिया प्रेमिका को पाने के लिए की जा रही थी, इसलिए वह तैयार हो गया. पूजा वाली जगह से कुछ दूरी पर मोहन सक्सेना अपने बेटे नितिन के साथ छिपे बैठे थे. अंकित जब पूरी तरह पूजा में डूब गया तो तांत्रिक संजय का इशारा पा कर दोनों आहिस्ते से अंकित के पीछे आ गए. मोहन ने मौके का फायदा उठाते हुए लोहे की रौड का एक भरपूर वार उस के सिर पर कर दिया, इस के बाद नितिन और तांत्रिक भी उस पर टूट पड़े. तीनों को जब उस के मरने की तसल्ली हो गई तो योजना के मुताबिक उन्होंने एक बड़े पत्थर से उस का चेहरा कुचल दिया, जिस से लाश की पहचान न हो पाए.

अंकित की हत्या करने के बाद तांत्रिक संजय और नितिन बैरसिया होते हुए वापस आए तो मोहन पहले इंदौर गए, फिर शाजापुर आए. इस दौरान तीनों ने अपने मोबाइल बंद रखे. क्योंकि मोहन सक्सेना जानते थे कि जांचपड़ताल में मोबाइल की लोकेशन पता चल जाती है. इसलिए उन्होंने यह अहतियात बरती थी. 17 जनवरी, 2016 की सुबह गांव वाले जंगल की तरफ गए तो उन्होंने वहां लाश देखी. इस की खबर उन्होंने बैरसिया थाने को दी तो एसडीओपी बीना सिंह के निर्देश पर पुलिस टीम घटनास्थल के लिए रवाना हो गई. मौके पर जितने लोग खड़े थे, पुलिस ने उन से उस निर्वस्त्र लाश की शिनाख्त करानी चाही, पर चेहरा कुचला हुआ होने की वजह से कोई भी उसे पहचान नहीं पाया. वहां कोई ऐसा सामान भी नहीं मिला, जिस से लाश की शिनाख्त हो सकती.

पुलिस को लाश से कुछ दूरी एक आई-20 कार लावारिस हालत में खड़ी मिली. पर उस की नंबर प्लेट्स गायब थीं. कार खोल कर तलाशी ली गई तो उस के दस्तावेज मिल गए. कागजों से पता चला कि वह कार शाजापुर की निर्मला गौर नाम की महिला के नाम है. कार की नंबर प्लेट गायब होने पर पुलिस को शक हुआ कि हो न हो, कार का इस हत्या के मामले से जरूर कोई संबंध है.

पुलिस जब शाजापुर में निर्मला गौर के पास पहुंची तो उन्होंने बता दिया कि कार उन का ड्राइवर अंकित ले गया था. उन्होंने ड्राइवर अंकित का हुलिया पुलिस को बताया तो कदकाठी से वह लाश के हुलिए जैसा ही था. उन्होंने पुलिस को अंकित का पता बताया तो पुलिस अंकित के घर पहुंच गई और लाश की शिनाख्त के लिए उस के घर वालों को पोस्टमार्टम स्थल पर ले गई. घर वालों ने लाश की शिनाख्त अंकित के रूप में कर दी.

लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस हत्यारों का पता लगाने में जुट गई. जांच में पुलिस को मृतक जानकारी मिली. उन के ही महकमे के एएसआई मोहन सक्सेना के यहां नौकरी करता था और उस का उन की बहू नेहा के साथ चक्कर चल रहा था. पुलिस को मुखबिर से यह भी जानकारी मिली थी कि 16 जनवरी, 2016 की रात तांत्रिक बाबा संजय व्यास को कार में अंकित के साथ देखा गया था.

तांत्रिक संजय को पुलिस ने थाने बुलवा लिया. उस से अंकित के बारे में पूछताछ की गई तो वह किसी तरह की जानकारी होने से इंकार करता रहा. पर जैसे ही उसे यह बताया गया कि पिछली रात उस के मोबाइल की लोकेशन बैरसिया के आसपास थी तो वह घबरा गया. इस के बाद उस ने अंकित की हत्या की सच्चाई बता दी. तांत्रिक के बयान पर पुलिस ने मोहन और नितिन को भी गिरफ्तार कर लिया. तीनों अभियुक्तों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

अंकित नेहा से शादी करने की हसरत दिल में लिए दुनिया से चला गया और नेहा अब मायके में है. शाजापुर में किसी को उस से सहानुभूति नहीं है, उलटे लोग उसे ही इस कांड की वजह मान रहे हैं. अपनी सेवा अवधि में कइयों को हवालात पहुंचा चुके मोहन सक्सेना अब खुद अपने बेटे नितिन के साथ जेल की हवा खा रहे हैं, साथ में तथाकथित तांत्रिक संजय व्यास भी है, जिस की कलई खुलने पर लोग उसे भी कोस रहे हैं. Family Crime

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, नेहा परिवर्तित नाम है)

 

Real Crime Story: मुंबई की सायरा मनीमाजरा में दफन

Real Crime Story: पैसे कमाने के लिए मनोहरलाल गुप्ता जो कर रहा था, वह वैसे ही गलत था, लेकिन सायरा बानो के साथ उस ने जो किया वह उस से भी ज्यादा गलत हुआ. परंतु ऐसे लोगों के लिए तो पैसा ही सब कुछ होता है. पैसे के लिए किसी की जान भी लेनी पड़े तो वे पीछे नहीं हटते.

उस काली लांसर का नंबर था एचआर 20 एफ 4529. रफ्तार ज्यादा नहीं थी, इसलिए पीसीआर की गाड़ी पर सवार एएसआई दर्शन सिंह की निगाह अचानक उस के भीतर चली गई. गाड़ी की पिछली सीट पर पड़ा कंबल उन्हें संदिग्ध लगा. ऐसा लग रहा था, जैसे कंबल के नीचे कुछ छिपाया गया है. उस वक्त सुबह के साढ़े 5 बजे थे. तारीख थी 13 जनवरी, 2016. दर्शन सिंह नाइट ड्यूटी खत्म कर के लौट रहे थे.

काली लांसर उन की पुलिस वैन के एकदम पास से निकल कर आगे बढ़ गई थी. एक तो लांसर ने पीसीआर की गाड़ी को बाईं तरफ से ओवरटेक किया था, जो यातायात नियम के विरुद्ध था, दूसरे बगल से निकलते ही लांसर के ड्राइवर ने रफ्तार बढ़ा दी थी. इस से वह संदेह के दायरे में आ गया था.  उस समय दर्शन सिंह की वैन पंचकूला के सैक्टर-19 स्थित अमरटैक्स चौक के पास थी. दर्शन सिंह ने अपने साथी एएसआई अनिल कुमार, जो गाड़ी ड्राइव कर रहे थे, से लांसर को रुकवाने को कहा.

लांसर रिहाइशी एरिया की तरफ से निकल कर चौक से वीरान जगहों की ओर जाने वाली सड़क पर मुड़ गई थी. अनिल कुमार ने वैन की रफ्तार बढ़ा कर लांसर से आगे निकाली और लांसर के ड्राइवर को रुकने का इशारा किया. ड्राइविंग सीट पर बैठे व्यक्ति ने रफ्तार कम कर के सड़क के बाएं किनारे पर कार रोक दी. ड्राइविंग सीट पर जो व्यक्ति बैठा था, वह मजबूत कदकाठी वाला था. कड़ाके की ठंड के बावजूद उस ने आधे बाजू वाली शर्ट के साथ हाफ स्वेटर पहन रखा था. भीतर बैठेबैठे ही वह नरमी से बोला, ‘‘जी सर, कोई गलती हो गई हो तो हुक्म करें.’’

लांसर के रुकते ही एएसआई दर्शन सिंह वैन से उतर कर उस के पास आ गए थे. उन्होंने ड्राइविंग सीट पर बैठे व्यक्ति से पूछा, ‘‘पुलिस को देख कर तुम ने अपनी गाड़ी की रफ्तार क्यों बढ़ाई और इस कंबल के नीचे क्या छिपा रखा है?’’

वह आदमी भी अपनी कार से बाहर आ गया था. आगे बढ़ कर दर्शन सिंह के पैर छूते हुए वह दोनों हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘नहीं सर, आप लोगों को देख कर रफ्तार नहीं बढ़ाई. पहुंचने की जल्दी में खाली सड़क देख कर यूं ही एक्सेलेटर दबा दिया था. कंबल ठंड की वजह से रख रखा है. इस के नीचे कुछ नहीं है, अभी दिखाए देता हूं.’’

कहने के साथ ही उस आदमी ने गाड़ी का पिछला दरवाजा खोल कर कंबल बाहर निकाल लिया. उस के नीचे कुछ नहीं था, न ही उस में कुछ लिपटा था. इस के बाद एएसआई अनिल कुमार ने गाड़ी के अंदर की पूरी तलाशी ले ली. गाड़ी में कोई संदिग्ध चीज नहीं मिली.

‘‘ठीक है सर, अब मैं जाऊं? अगर चायनाश्ते की कोई सेवा हो तो बता दीजिए.’’ लांसर ड्राइवर ने कहा और बिना पुलिस वालों की ओर देखे, कंबल को मोड़ कर गाड़ी में रख दिया और ड्राइविंग सीट पर बैठने लगा.

तभी दर्शन सिंह ने उस के कंधे पर हाथ रख कर उसे गाड़ी में बैठने से रोकते हुए कहा, ‘‘ठहरो, ऐसी भी क्या जल्दी है. जरा अपना नाम, पता वगैरह तो नोट करवा दो. यह भी बताओ कि इतनी सुबह तुम कहां से आ रहे हो और कहां जा रहे हो?’’

‘‘जी सर,’’ उस ने पीछे मुड़ते हुए कहा, ‘‘मेरा नाम मनोहरलाल गुप्ता है और पिता का नाम अच्छेलाल गुप्ता. मैं चंडीगढ़ के सैक्टर 56 के फ्लैट नंबर 6308 में रहता हूं. यह मेरा अपना फ्लैट है.’’

‘‘तो इधर पंचकूला में क्या करने आए थे?’’ दर्शन सिंह ने पूछा.

‘‘पंचकूला में सैक्टर 10 में मेरा एक दोस्त रहता है.’’

‘‘क्या नाम है उस का और सैक्टर 10 के किस नंबर के मकान में रहता है तुम्हारा दोस्त?’’

‘‘उस का नाम राजन है और वह कोठी नंबर 1081 में किराए पर रहता है. वह कोठी चंडीगढ़ के किसी पुलिस अफसर की है. कल मैं अपने दोस्त से मिलने आया था तो उस ने जिद कर के अपने पास रोक लिया था. अब मैं वहीं से आ रहा हूं और घर जा रहा हूं.’’

‘‘लेकिन तुम तो चंडीगढ़ के बजाय उलटी दिशा में जा रहे हो?’’

‘‘सर, मैं ने शिमलाअंबाला हाईवे से जीरकपुर के रास्ते चंडीगढ़ जाने की सोची थी. दूसरी तरफ से जाने पर घर दूर पड़ता है.’’

‘‘चलो ठीक है, गाड़ी के कागजात चैक करवाओ, फिर चले जाना.’’

‘‘सर, गाड़ी के कागज तो इस वक्त मेरे पास नहीं हैं.’’

‘‘क्यों, यह गाड़ी तुम्हारी नहीं है क्या?’’

‘‘नहीं सर, यह मेरे एक दोस्त निशांत की गाड़ी है. उस का चंडीगढ़ के सैक्टर 45 में अपना होटल था, कुछ दिनों पहले वह होटल बेच कर कहीं चला गया. जाते वक्त यह कह कर अपनी यह कार मेरे पास छोड़ गया कि कुछ दिनों बाद आ कर गाड़ी ले जाएगा.’’

‘‘गाड़ी के कागजात नहीं दे गया?’’

‘‘नहीं सर, गाड़ी के सारे कागजात उसी के पास हैं.’’

‘‘निशांत का फोन नंबर होगा तुम्हारे पास, उस से बात करवाओ.’’ दर्शन सिंह ने कथित मनोहरलाल को गौर से देखते हुए कहा.

‘‘सर, निशांत ने अपना पुराना नंबर बदल दिया है, नया नंबर मुझे अभी तक नहीं दिया.’’

‘‘तो पुराना नंबर ही बता दो. क्या था पुराना नंबर?’’

‘‘सर, वह तो मैं ने डिलीट कर दिया है.’’

दर्शन सिंह को उस की इन बातों पर यकीन नहीं हुआ. उन का संबंध कंट्रोल रूम से था, जबकि संदिग्ध व्यक्ति से वांछित पूछताछ करना थाना या चौकी पुलिस के अधिकार में होता है. इसलिए उन्होंने मनोहरलाल से ज्यादा पूछताछ न कर के उस के बारे में सैक्टर 19 की पुलिस चौकी को बता दिया. थोड़ी देर में पुलिस चौकी के इंचार्ज एसआई राजेंद्र सिंह और थाना सैक्टर 20 के थानाप्रभारी इंसपेक्टर अजीत सिंह पुलिस टीम के साथ वहां आ पहुंचे. उन्हें संदेह था कि पकड़े गए व्यक्ति के पास चोरी की कार है और इस का संबंध किसी बड़े कार चोर गिरोह से है. उन्हें लगा कि पूछताछ में किसी बड़े कार चोर गिरोह का खुलासा हो सकता है.

मनोहरलाल से हल्कीफुल्की पूछताछ के बाद अजीत सिंह ने बरामद कार की तलाशी के लिए डिक्की खुलवाई. डिक्की में एक बोरी रखी थी, जिस का मुंह सिला हुआ था. बोरी में पालक, धनिया और मेथी भरी होने की बात कह कर मनोहरलाल ने बताया कि उस के परिवार में एक पारिवारिक फंक्शन है, उसी के लिए उस ने बीते दिन चंडीगढ़ की सदर सब्जी मंडी से ये सब्जियां खरीदी थीं. इस में संदेह जैसा कुछ नजर नहीं आया. फिर भी पुलिसिया स्वभाव के चलते अजीत सिंह ने पूछ लिया कि बोरी में कुल कितने वजन का सामान है. इस सवाल का जवाब देने में मनोहरलाल की जुबान लड़खड़ा गई. इस पर अजीत सिंह ने अपने 2 सिपाहियों से बोरी उठा कर उस के वजन का अनुमान लगाने को कहा.

पालक और धनिया वगैरह का वजन ज्यादा नहीं होता, लेकिन पुलिस के 2 जवान भी उस बोरी को आसानी से नहीं उठा सके. उन्होंने बताया कि बोरी का वजन एक क्विंटल के आसपास है. निस्संदेह बोरी में अन्य कोई भारी चीज थी. इस से संदेह का दायरा और बढ़ गया. बोरी की सिलाई उधेड़ कर उस के भीतर भरे सामान को देखने का प्रयास किया गया तो एक ऐसा अप्रत्याशित दृश्य पुलिस के सामने आया, जिसे देख सब की आंखें फटी की फटी रह गईं. बोरी में पालक व धनिया के बीच एक युवती की लाश को मोड़ कर रखा गया था. उस के हाथ और पैर पीछे की ओर बंधे हुए थे. उस की नाक से कुछ खून भी निकला था, जो जम गया था.

कार और उस के ड्राइवर की हकीकत सामने आने के बाद अजीत सिंह ने मोबाइल द्वारा घटना की सूचना जिला पंचकूला के डीसीपी अनिल धवन को दे कर उन से दिशानिर्देशन हासिल किए. इस के बाद उन्होंने पीसीआर 19 के इंचार्ज एएसआई दर्शन सिंह से तहरीर ले कर धारा 302/201/34 के तहत मुकदमा दर्ज करने के लिए थाने भिजवा दी. इसी के साथ उन्होंने मनोहरलाल गुप्ता को विधिवत हिरासत में ले कर मौके पर ही उस से पूछताछ शुरू कर दी. उस ने जल्दी ही अपना अपराध स्वीकार कर लिया. मनोहरलाल ने बताया कि मृतका का नाम सायरा बानो था और वह मुंबई की रहने वाली थी.

मनोहरलाल ने आगे बताया, ‘‘इसे मैं ने अपने दोस्त राजन गुप्ता और उस की पत्नी पायल गुप्ता के साथ मिल कर मारा है. इस की हत्या के पीछे एक लंबी कहानी है. मैं आप को हर बात विस्तारपूर्वक बताऊंगा, कोर्ट में भी वही बयान दूंगा. मैं आप लोगों का पूरा सहयोग करूंगा. बस आप लोग मेरा टौर्चर मत कीजिएगा. मैं पहले भी कुछ केसों में गिरफ्तार हो कर पुलिस की मार झेल चुका हूं.’’  कुछ देर बाद डीसीपी

अनिल धवन के अलावा सीआईए इंसपेक्टर नरेंद्र कादियान भी वहां आ पहुंचे. इन पुलिस अधिकारियों ने भी मनोहरलाल से पूछताछ की. उस के बाद अनिल धवन के निर्देश पर अजीत सिंह ने मौके की बाकी काररवाई पूरी कर लाश पोस्टमार्टम के लिए पंचकूला के सिविल अस्पताल भिजवा दिया. जरूरी काररवाई निपटा कर पुलिस मनोहरलाल को थाने के बजाय पहले पंचकूला के सेक्टर-10 स्थित राजन गुप्ता की कोठी 1081 ले गई. वह पहले ही बता चुका था कि जिस चादर में सायरा की लाश लपेट कर रखी गई थी और जिस तौलिए पर उस के खून के छीटें पड़े थे, वे राजन के घर पर ही रह गए थे.

इस समय इन चीजों को वे दोनों कहीं छिपाने गए होंगे. मनोहरलाल ही उन दोनों को पहचानता था. लिहाजा उसे साथ ले कर पुलिस गुप्ता दंपति की तलाश में लग गई. आखिर पुलिस की मेहनत रंग लाई और उसी दिन दोपहर बाद 3 बजे दोनों पंचकूला के माजरी चौक पर पुलिस को मिल गए. पुलिस ने तीनों को ले जा कर थाने में अलगअलग लौकअप में बंद कर दिया. रात में उन से कोई खास पूछताछ नहीं की गई. अगले दिन पुलिस ने तीनों को इलाका मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर के एक सप्ताह के कस्टडी रिमांड पर ले लिया.

दालत से निपटने के बाद पूछताछ के लिए तीनों को सीआईए के पूछताछ केंद्र ले जाया गया, जहां तीनों से विस्तृत पूछताछ की गई. इस पूछताछ में तीनों ने पुलिस को जो बताया, उस से सायरा बानो हत्याकांड की सारी कहानी खुल कर सामने आ गई : चंडीगढ़ का रहने वाला मनोहरलाल गुप्ता खूब पैसा कमा कर बड़ा आदमी बनने के सपने देखता था. उस के पिता सब्जी बेचने का काम करते थे. इस काम में उसे इतनी कमाई नहीं थी कि बच्चों को साफसुथरे माहौल में रख कर सलीके से पढ़ायालिखाया जा सकता. मनोहरलाल का बड़ा भाई अशोक भी रेहड़ी पर सब्जियां लाद कर गलीमोहल्लों में बेचने जाता था. गुजारे लायक पढ़ाई कर लेने के बाद मनोहरलाल भी भाई के साथ वही काम करने लगा.

सन 2000 में जब वह 20 साल का हुआ तो सब्जी बेचने के साथसाथ वह स्थानीय सिनेमाघरों में जा कर टिकटें ब्लैक करने लगा. बाद में उसे जुए की लत लग गई तो उस का उठनाबैठना गलत लोगों के साथ हो गया. इस का नतीजा यह निकला कि वह 2 बार दुष्कर्म के केस में और एक बार ब्लाइंड मर्डर केस में जेल गया. हालांकि इन सभी आरोपों से वह बरी हो गया. लेकिन पुलिस की मार खाने के अलावा उस ने अपनी जिंदगी का काफी समय जेल में गुजारा था.

जेल से निकलने के बाद उस ने इन कामों से तौबा कर के सेक्टर-45, चंडीगढ़ के एक होटल में नौकरी कर ली. इस होटल का मालिक निशांत कुछ रहस्यमय सा व्यक्ति था. उस के बारे में मनोहरलाल बस इतना ही जान पाया था कि वह मूलरूप से हिमाचल प्रदेश का रहने वाला था. मनोहरलाल को वह समझाया करता था कि इस दुनिया में सीधे रास्ते से इतना ही कमाया जा सकता है कि गुजर होता रहे. मजे की जिंदगी जीने के लिए मोटा पैसा कमाना हो तो किसी भी उलटेसीधे काम से गुरेज नहीं करना चाहिए. दरअसल वह अपने होटल में आने वाले अपने ग्राहकों को कालगर्ल्स उपलब्ध करा कर उन से अच्छा पैसा वसूलता था. उस ने इस काम के गुर मनोहरलाल को भी सिखा दिए थे.

इस का नतीजा यह निकला कि थोड़े ही दिनों में वह भी इस काम से पैसों में खेलने लगा. इस बीच उस ने शादी कर ली और 2 बेटियों तथा एक बेटे का पिता बन गया. रहने को उस ने चंडीगढ़ के सैक्टर-56 में एक बढि़या फ्लैट खरीद लिया. निशांत के संपर्क में कई कालगर्ल्स थीं. इन्हीं में एक थी सायरा बानो. वह खुद को मुंबई की रहने वाली बताया करती थी. निशांत इस तरह की लड़कियों के बारे में जानने के लिए ज्यादा गहराई में नहीं जाता था. वह इन के जिस्म व हुस्न के हिसाब से कीमत लगा कर उन्हें ग्राहक के पास भेज देता था, जिस का 2 तिहाई हिस्सा वह अपने पास रखता था.

लड़कियों को नए नाम दे कर वह नसीहत दे दिया करता था कि वे किसी भी ग्राहक को न तो अपना असली नाम बताए और न ही कभी अपने मूल पते व परिवार वगैरह की जानकारी दें. सायरा बानो को उस ने पूनम नाम दे रखा था. निशांत बिना मेहनत के खूब पैसे बटोर रहा था. फिर भी एक दिन कई लड़कियों की कमाई समेट कर वह चंडीगढ़ छोड़ कर चला गया. होटल उस ने किसी को बेच दिया था. उस के जाने के बाद लड़कियों ने दूसरे ठिकाने ढूंढ़ लिए.

मनोहरलाल इस धंधे के गुर सीख गया था. लेकिन होटल बिक जाने की वजह से उसे आगे यह धंधा चलतेफिरते ही करना था. इसी सिलसिले में उस ने मोटी रकम का लालच दे कर सायरा को अपने साथ रख लिया. निशांत की लांसर कार उस के पास रह गई थी, जिसे वह अपने इसी काम के लिए इस्तेमाल करने लगा था. मनोहरलाल का एक जानकार था राजन गुप्ता. वह शिवमंदिर वाली गली, कीर्तिनगर, सिरसा हरियाणा का रहने वाला था. उस ने नेपाली लड़की पायल से शादी कर रखी थी और इसी तरह के धंधे के लिए पंचकूला में रह रहा था.

एक दिन अचानक उस की मुलाकात पुराने जानकार मनोहरलाल से हुई तो उस ने उसे व उस की पत्नी को पार्टनर बना कर इस काम को बड़े स्तर पर करने का मन बना लिया. धंधा करने वाली लड़कियां अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा या तो अपने घर भेज देती थीं या फिर किसी विश्वसनीय व्यक्ति पर भरोसा कर के उस के पास जमा करवाती रहती थीं.जब उन्हें जरूरत होती थी, वे अपना पैसा वापस ले लेती थीं. निशांत पर तमाम लड़कियों ने भरोसा किया था, लेकिन वह उन्हें धोखा दे कर उन का पैसा ले उड़ा था. इन में सायरा भी थी. इस स्थिति में उसे आगे किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए था. लेकिन उसे मनोहरलाल के अलावा राजन और पायल भी भले लोग लगे थे.

एक बार सायरा बीमार हुई तो इन लोगों ने एक प्राइवेट क्लीनिक में उस का इलाज कराया. वहां पता चला कि उसे एड्स है. यह जानते हुए भी कि उस के संपर्क में आने वाले लोगों की जान जोखिम में पड़ सकती है, इन्होंने उस से धंधा करवाना बंद नहीं किया. सायरा ने एक बार इन लोगों को बताया भी था कि उस की मां बीमार रहती है, मां के इलाज के लिए वह पैसा इकट्ठा कर रही है ताकि मुंबई जा कर ठीक से मां का इलाज करा सके. 11 जनवरी, 2016 को सायरा इन लोगों को बिना बताए सीधे एक ग्राहक के पास चली गई. रात में उस ने मनोहरलाल को पंचकूला की एक जगह के बारे में बता कर वहां से पिकअप करने को कहा. मनोहरलाल बताई गई जगह पर पहुंचा तो वह शराब के नशे में धुत्त थी. वह उसे राजन के यहां ले गया.

वहां पहुंच कर सायरा ने झगड़ा करते हुए कहा, ‘‘आप लोगों के पास मेरे जो ढाई लाख रुपए जमा हैं, वे मुझे दे दो. मुझे अपनी मां का इलाज कराने मुंबई जाना है.’’

‘‘देखो,’’ मनोहरलाल ने उसे समझाना चाहा, ‘‘तुम्हारे इलाज पर काफी पैसा खर्च हो रहा है. फिर भी तुम चिंता मत करो, एक हफ्ते के अंदर हम तुम्हें तुम्हारा सारा पैसा लौटा देंगे.’’

‘‘अपना इलाज भी मैं खुद करवाऊंगी. बस तुम लोग अभी के अभी मेरा ढाई लाख रुपया वापस कर दो.’’

इस के बाद वह चिल्लाने लगी. समझाने पर भी वह नहीं मानी तो पायल ने आगे बढ़ कर उसे 5-6 थप्पड़ जड़ दिए. इस पर चुप होने के बजाय वह और जोरों से चिल्लाने लगी. राजन को गुस्सा आया तो उस ने रसोई से बेलन ला कर उस के सिर व कंधे पर कई वार कर दिए.

सायरा को निढाल होते देख मनोहरलाल ने उसे धक्का दे कर बैड पर गिरा दिया. पायल ने तुरंत उस के मुंह में रूमाल ठूंस कर उस के हाथपैर पीछे ले जा कर बांध दिए. मुंह में रूमाल ठूंसते वक्त उस के मुंह से खून निकलने लगा था. इस पर मनोहरलाल ने उस की नाक व मुंह को दबा दिया, जिस से उस की मौत हो गई. तीनों ने मिल कर उस की लाश को मखमल की चादर में लपेट कर एक जगह छिपा कर रख दिया. उस रात और अगले पूरे दिन लाश उसी तरह पड़ी रही. अब तक उस में से हलकी बदबू आने लगी थी. ऐसे में लाश को जल्दी ठिकाने लगाना जरूरी था.

3 जनवरी की सुबह मनोहरलाल अकेला जा कर बड़ी सी बोरी में पालक, धनिया और गोभी वगैरह ले आया. उसी में लाश को रख कर बोरी को सिल दिया और अकेला ही सायरा की लाश को ठिकाने लगाने के लिए घर से निकल पड़ा. संयोग से रास्ते में ही पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया. इस बीच राजन व पायल वारदात में इस्तेमाल चादर व तौलिया किसी वीरान जगह पर फेंकने चले गए थे, बाद में उन्हें भी उसी दिन पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. पूछताछ के बाद उन की निशानदेही पर पुलिस ने चादर, तौलिया और बेलन बरामद कर लिए. कार पहले ही कब्जे में ली जा चुकी थी.

सायरा के फोन में उस की बड़ी बहन शबाना बानो का फोन नंबर था. उस से संपर्क कर के पुलिस ने उन लोगों से पंचकूला आ कर शव की पहचान करने के लिए कहा, ताकि पोस्टमार्टम करवाया जा सके. लेकिन शबाना व उस की मां फातिमा ने कहा कि वह तो उन के लिए 10 साल पहले तब ही मर चुकी थी, जब वह 16 साल की उम्र में घर से भाग गई थी. उन लोगों ने अपनी बदतर माली हालत का हवाला दे कर पंचकूला आने में असमर्थता जाहिर की. उन्होंने पुलिस से अनुरोध किया कि सायरा का अंतिम संस्कार वही करवा दें.

इस के बाद पुलिस के सामने दूसरा कोई चारा नहीं बचा था. 72 घंटों तक शव को मार्च्युरी में रखने के बाद उस का पोस्टमार्टम करवा कर 7 जनवरी, 2016 की शाम पुलिस की देखरेख में मनीमाजरा के कब्रिस्तान में दफना दिया गया. रिमांड अवधि समाप्त होने पर पुलिस ने मनोहरलाल गुप्ता, राजन गुप्ता व पायल गुप्ता को फिर से न्यायालय में पेश कर के न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. Real Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Delhi Crime Story: प्रियंका के आखिरी खत की दर्दनाक कहानी

Delhi Crime Story: इवेंट मैनेजर प्रियंका कपूर चावला अपनी जिंदगी को जिंदादिली के साथ जीना चाहती थीं. वह जिंदगी की ऊंची उड़ान भर कर शोहरत पाना चाहती थीं, लेकिन बिजनेसमैन नितिन चावला की मोहब्बत में फंस कर उस से शादी करना उन की जिंदगी की एक बड़ी भूल साबित हुई.

प्रियंका से शादी करने के बाद नितिन चावला ने दक्षिणी दिल्ली के पौश इलाके डिफेंस कालोनी में रहने लगा था. वह एक बिजनेसमैन था, जबकि प्रियंका इवेंट मैनेजर थी. उन की शादी करीब सवा महीने पहले हुई थी. 25 मार्च को प्रियंका ने अपनी मां रूमा को दोपहर बाद फोन कर के कहा, ‘‘मम्मी आज शाम को मैं घर आऊंगी. आप मेरे पसंद का खाना राजमा चावल बना कर रखना.’’

बेटी के घर आने की बात सुन कर रूमा खुश हो गईं. उन्होंने अपने यहां खाना बनाने वाली नौकरानी को बेटी की पसंद का खाना बनाने के लिए कह दिया. प्रियंका कितने बजे आएगी, यह जानने के लिए उन्होंने शाम 5 बजे फोन किया. घंटी जाती रही, पर उस ने फोन रिसीव नहीं किया. उन्होंने सोचा कि वह किसी काम में व्यस्त होगी, इसलिए दोबारा फोन नहीं किया. आधे घंटे बाद उन्होंने फिर से फोन किया. इस बार भी फोन की घंटी बजती रही, लेकिन उस ने फोन नहीं उठाया. इसी तरह रात 11 बजे तक उन्होंने प्रियंका को कई बार फोन किए, पर उस ने एक बार भी फोन रिसीव नहीं किया.

रूमा को चिंता हुई कि प्रियंका फोन क्यों नहीं उठा रही. उन्होंने प्रियंका के यहां काम करने वाले नेपाली नौकर को फोन किया तो उस ने बताया कि सुबह 9 बजे से मेमसाब अपने कमरे में हैं.

‘‘उस ने सुबह से कुछ खायापीया भी है या नहीं?’’ रूमा ने पूछा.

‘‘मेमसाब जब से कमरे में गई हैं, तब से मुझ से कोई चीज नहीं मंगाई है.’’ नौकर ने कहा.

नौकर से बात करने के बाद रूमा परेशान हो गईं, क्योंकि प्रियंका पिछले 14 घंटों से भूखी अपने कमरे में थी. उसे तो उन के यहां आना था, आखिर वह बंद कमरे में क्या कर रही है? उन्होंने उसी समय नितिन को फोन किया, ‘‘नितिन बेटा, मैं ने प्रियंका को कई बार फोन किया, वह फोन नहीं उठा रही.’’

‘‘आप फ्लैट पर जा कर देख लें.’’ नितिन ने कहा.

‘‘बेटा, तुम्हारे नौकर ने बताया है कि वह सुबह 9 बजे से अपने कमरे में है. तब से उस ने कुछ खायापीया नहीं है.’’ रूमा ने कहा.

‘‘उस ने खाना नहीं खाया तो आप को तकलीफ हो रही है. ऐसी तकलीफ मुझे उस वक्त हुई थी, जब मैं अपने 11 साल के बेटे को घर लाया था और प्रियंका ने उसे भूखा रखा था.’’ नितिन ने ताना देते हुए कहा.

नितिन की पहली पत्नी से एक बेटी और एक बेटा है. पहली पत्नी को वह तलाक दे चुका है. उस के बाद ही उस ने प्रियंका से शादी की थी. कुछ दिनों पहले वह अपने बेटे को फ्लैट पर लाया था. नितिन का आरोप है कि उस वक्त प्रियंका ने उसे खाना नहीं खिलाया था. रूमा को नितिन की पुरानी बातें याद आ गईं. उस ने उन से प्रियंका की शिकायत की थी. रूमा ने इस बारे में जब प्रियंका से पूछा था तो उस ने कहा था कि उस ने उस के बच्चे को बारबार खानेपीने की तमाम चीजें दी थीं, लेकिन उस ने कोई भी चीज नहीं खाई थी.

रूमा समझ गईं कि नितिन के मन में अब भी पुरानी बातें बैठी हुई हैं. उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, तुम्हारी जो शिकायत है, उस पर हम बाद में बात कर लेंगे, लेकिन तुम इसी समय घर आ जाओ. आखिर देखो तो प्रियंका सुबह से कमरे में क्यों बंद है?’’

‘‘मम्मी, मैं अभी नहीं जा सकता. अभी मुझे द्वारका में समय लगेगा. ऐसा करें, आप ही फ्लैट पर चली जाइए.’’ नितिन ने कहा.

‘‘इतनी रात को मैं अकेली कैसे जा सकती हूं?’’ रूमा ने कहा.

‘‘ऐसा करता हूं, मैं ड्राइवर को गाड़ी ले कर आप के पास भेज देता हूं. उस के साथ आप चली जाइए.’’ नितिन ने कहा.

कुछ देर बाद नितिन का ड्राइवर उन के यहां आया तो वह अपनी ननद की बेटी नेहा को साथ ले कर प्रियंका के यहां पहुंच गईं. फ्लैट पर उन्हें बेटी का नौकर मिला. उन्होंने बेटी के कमरे का दरवाजा खटखटाया. अंदर से जब कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो उन्होंने आवाज दी. उन की आवाज सुन कर आसपास रहने वाले निकल आए, लेकिन प्रियंका के कमरे का दरवाजा नहीं खुला. रूमा को बेटी को ले कर चिंता हुई. उन्होंने दिल्ली पुलिस के कंट्रोल रूम को फोन कर के सारी जानकारी दे दी. चूंकि पुलिस को दरवाजा अंदर से बंद होने की जानकारी मिली थी, इसलिए थाना डिफेंस कालोनी की पुलिस और दिल्ली फायर ब्रिगेड के जवान फ्लैट पर पहुंच गए.

पुलिस ने पहले दरवाजा खटखटाया. जब दरवाजा नहीं खुला तो कुछ आशंका नजर आई. दरवाजे पर इंटरलौक लगा था. पुलिस ने नौकर से चाबी के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि इस की चाबी साब और मेमसाब के पास ही रहती है. दरवाजा नहीं खुला तो फायर ब्रिगेड के जवानों ने अपने साथ लाए औजारों से दरवाजे को उखाड़ दिया. दरवाजा खुलने पर प्रियंका घुटनों के बल पलंग पर बैठी दिखी, गले में दुपट्टा बंधा हुआ था, जिस का दूसरा सिरा पंखे से बंधा था और गरदन एक ओर झुकी थी. बैड पर एक ट्रे रखी थी, जिस में कांच का बड़ा सा कटोरा पानी से भरा रखा था. ट्रे में ही एक रेजर और एक छोटा सा चाकू रखा था.

बेटी के शरीर में जब कोई हरकत नहीं हुई तो रूमा रोते हुए पुलिस वालों से हेल्प करने को कहने लगीं. इस पर एक पुलिस वाले ने ट्रे में रखे चाकू से दुपट्टा काट कर प्रियंका के गले का फंदा खोला. इसी बीच नितिन भी वहां आ गया. पुलिस वालों के कहने पर रूमा ने बेटी को बिस्तर पर लिटा कर उस के सीने पर हाथों से दबाना शुरू किया, ताकि उस के फेफड़े काम करना शुरू कर दें. इस के बाद नितिन ने भी यही प्रक्रिया दोहराई, पर कोई लाभ नहीं हुआ. पुलिस उसे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ले गई, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. डाक्टरों ने जांच की तो उस के शरीर पर कई स्थानों पर चोट के निशान मिले. उस के बाएं हाथ की कलाई पर कटे के निशान थे.

बेटी की मौत की खबर पा कर रूमा फूटफूट कर रोने लगीं. उन्होंने यह खबर गुड़गांव में नौकरी कर रहे अपने पति अशोक कपूर, घर पर मौजूद छोटी बेटी डिंपी कपूर और अपने नातेरिश्तेदारों को दी. थोड़ी ही देर सभी एम्स अस्पताल पहुंच गए.

थानाप्रभारी सतीशचंद्र शर्मा ने घटनास्थल की जांच के लिए क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीम को बुला लिया था. टीम ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. छानबीन में पुलिस को कमरे से 2 पेज का एक सुसाइड नोट मिला, जिस में लिखा था, ‘मेरे पास जानीपहचानी तकलीफ है, खुशी है, दुख है और इमोशंस है. लेकिन पति ने पहली बार बेबस कर दिया. नितिन पर मुंबई में रेप का केस दर्ज है. मालूम नहीं था कि वह मेरे साथ इतना बुरा करेगा. वही एकमात्र ऐसा इंसान है, जिस से मैं डरती हूं.

‘शादी के एक महीने बाद ही उस ने मुझे राक्षस की तरह मारा. मैं ने अपनी फैमिली को बुलाने को कहा तो उस ने और बुरी तरह मारा. मैं ने नितिन से सिर्फ इसलिए शादी की थी, क्योंकि उस ने कहा था कि वह मुझ से बहुत प्यार करता है और हमेशा करता रहेगा. लेकिन अब वही इंसान मुझे घर छोड़ने को कहता है. इस आदमी के साथ रहने के लिए मैं ने अपनी मां से संबंध खत्म कर लिए थे. वह सब से ज्यादा स्वार्थी है.

‘मुझे लगा कि यहां मुझे मोहब्बत मिलेगी, लेकिन दर्द मिला. नितिन की मां के मुताबिक नितिन ने कुछ गलत नहीं किया. पिछली 3 रातों से नितिन घर पर नहीं है. उस ने मुझे वाट्सऐप पर मैसेज किया कि मैं घर खाली कर दूं, अब मेरे पास कोई रास्ता नहीं है.’

पुलिस ने सुसाइड नोट सहित अन्य जरूरी सबूत अपने कब्जे में ले लिए. थानाप्रभारी ने प्रियंका के घर वालों से बात की तो उस की मां रूमा ने बताया कि शादी के बाद नितिन के घर वालों ने प्रियंका की सारी गोल्ड और डायमंड ज्वैलरी अपने पास रख ली थी. यही नहीं, उस ने मायके से उस की महंगी घडि़यां भी मंगा ली थीं. इस के बावजूद वह उस पर दबाव बना रहा था कि वह अपने मायके वालों से कार खरीदवा कर दे. इस के लिए नितिन ने उन पर भी दबाव डाला था. रूमा और उन की बेटी डिंपी कपूर ने आरोप लगाया कि प्रियंका की मौत में उस के पति नितिन चावला, सास हर्ष चावला और देवर जतिन चावला का हाथ है.

चूंकि मामला दहेज एक्ट के तहत दर्ज हुआ था, इसलिए इस में मजिस्ट्रैट के सामने पीडि़त पक्ष के बयान होने जरूरी थे. इसलिए एसआई शिवदेव सिंह डिंपी और उस की मां रूमा को तहसील कालकाजी के तहसीलदार अजीत कुमार चौधरी के पास ले गए. तहसीलदार ने रूमा और डिंपी के बयान दर्ज किए. उन्होंने कमरे से मिले सुसाइड नोट को भी पढ़ा. उन के बयानों के आधार पर ही पुलिस ने नितिन चावला, उस के भाई जतिन चावला और मां हर्ष चावला के खिलाफ भादंवि की धारा 498ए/304बी/34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली.

अस्पताल में जरूरी काररवाई करने के बाद पुलिस ने प्रियंका की लाश पोस्टमार्टम के लिए एम्स की मोर्चरी में भेज दी थी. इस के बाद नितिन को हिरासत में ले लिया गया. जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि वह प्रियंका का बहुत ध्यान रखता था, इस के बावजूद उस ने सुसाइड क्यों कर लिया, इस के बारे में उसे कुछ नहीं पता. प्रियंका मूलरूप से हरियाणा के रोहतक जिले के रहने वाले अशोक कपूर की बड़ी बेटी थी. इस के अलावा अशोक कपूर की एक बेटी और थी डिंपी. अशोक कपूर भारतीय वायु सेना में औफिसर थे.

अशोक कपूर की पोस्टिंग लंबे समय तक चंडीगढ़ में रही. वहीं पर दोनों बच्चों की स्कूली पढ़ाई हुई. उन का दिल्ली ट्रांसफर हुआ तो वह परिवार के साथ दिल्ली आ गए और लाजपत नगर में रहने लगे. वह नौकरी के बजाय अपना कोई बिजनैस करना चाहते थे. इसलिए उन्होंने वीआरएस (ऐच्छिक सेवानिवृत्ति) ले कर गुड़गांव में टेलीकौम का बिजनैस शुरू किया. लेकिन घाटा होने से उन्हें बिजनैस बंद करना पड़ा. इस के बाद उन्होंने गुड़गांव की एक निजी कंपनी में नौकरी कर ली. दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रैजुएशन करने के बाद प्रियंका ने एक जर्मन कंपनी में नौकरी की. उसे डांसिंग का शौक था. नौकरी से छुट्टी होने के बाद वह डांस सीखने चली जाती थी.

वह चाहती थी कि उस की मधुर आवाज को दुनिया भर में नई पहचान मिले, इसलिए उस ने रेडियो जौकी का कोर्स किया. रेडियो जौकी का कोर्स करने के बाद उसे आस्ट्रेलियन रेडियो में रेडियो जौकी की नौकरी मिल गई. प्रियंका बेहद खूबसूरत थी. अपनी काया को स्वस्थ बनाए रखने के लिए उस ने योगा में भी डिप्लोमा ले रखा था. इस के अलावा वह मैडिटेशन, हीलिंग और विपश्यना में एक्सपर्ट थी.

प्रियंका एक संपन्न परिवार से थी. नौकरी को वह किसी मजबूरी की वजह से नहीं, बल्कि शौक के तौर पर कर रही थी. कुछ दिनों बाद उस ने रेडियो जौकी की नौकरी छोड़ दी और एक गैरसरकारी सामाजिक संस्था से जुड़ कर काम करने लगी. इस के बाद वह एक कंपनी में अपनी दोस्त तेहरीमा जाकी के साथ इवेंट मैनेजर के रूप में काम करने लगी. प्रियंका की नितिन चावला से पहली मुलाकात ग्रैटर कैलाश पार्ट-2 में उस के ही सिनेमा लाउंज पब में हुई थी. नितिन चावला एक बड़ा बिजनेसमैन था. ग्रेटर कैलाश के आलवा पंजाबी बाग और चंडीगढ़ में उस के सिनेमा लाउंज नाम से 5 पब हैं. इस के अलावा दिल्ली एनसीआर में उस का स्टील का कारोबार है. वह दिल्ली के पंजाबी बाग में अपने परिवार के साथ रहता था.

पहली ही मुलाकात में नितिन चावला प्रियंका का दीवाना हो गया. उस ने प्रियंका की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो खुले विचारों की प्रियंका ने उस से दोस्ती करने में कोई गुरेज नहीं समझा. उन की फोन पर बातचीत होने लगी. इस से उन की दोस्ती और गहरी हो गई. प्रियंका से फोन पर बात कर के वह कार ले कर निश्चित जगह पहुंच जाता, जहां दोनों कार से घूमते और महंगे रेस्टोरेंट में खाना खाते. प्रियंका को प्रभावित करने के लिए वह उसे उस की पसंद के गिफ्ट भी देता. एक दिन उस ने प्रियंका से अपने प्यार का इजहार भी कर दिया. इस पर प्रियंका चौंकी, ‘‘नितिन, अभी मुझे अपना कैरियर बनाने दो. इस के बाद ही मैं प्यारव्यार के बारे में सोचूंगी.’’

‘‘प्रियंकाजी, प्यार के बारे में सोचा नहीं जाता, बल्कि खुदबखुद हो जाता है. जैसे कि मुझे हो गया.’’ नितिन बोला, ‘‘क्या मुझ में कोई कमी है, जिस की वजह से तुम मुझे पसंद नहीं करतीं.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है. अगर तुम पसंद नहीं होते तो मैं दोस्ती ही क्यों करती, लेकिन यह संबंध अभी मैं केवल दोस्ती तक ही सीमित रखना चाहती हूं.’’

‘‘चलो मैं उस वक्त का इंतजार करूंगा, जब तुम्हारे दिल में मेरे प्रति चाहत पैदा होगी. प्रियंका मैं केवल इतना जानता हूं कि मैं तुम्हें दिलोजान से चाहता हूं.’’ नितिन ने कहा.

प्रियंका मुसकराई, ‘‘हां…हां, यह बात मैं भी महसूस कर रही हूं कि तुम मजनूं हुए जा रहे हो, पर अपना ध्यान रखो.’’

इस के बाद वह कई महीनों तक दोस्त की तरह ही मिलते रहे. वह प्रियंका के घर भी जाने लगा. उस का जब मन करता, वह प्रियंका को फोन कर देता. बारबार फोन करने पर वह भी परेशान हो जाती थी. तब वह उस की काल रिसीव नहीं करती. इस तरह लगातार मिलते रहने का नतीजा यह निकला कि प्रियंका नितिन को प्यार करने लगी.  इतना ही नहीं, नितिन ने उस के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो वह तैयार हो गई.

प्रियंका ने नितिन से शादी करने का प्रस्ताव घर वालों के सामने रखा तो मां रूमा ने नितिन से शादी करने को मना कर दिया. इस की वजह यह थी कि नितिन प्रियंका से 15 साल बड़ा था. पर प्रियंका शादी के लिए अड़ गई. न चाहते हुए भी घर वालों को प्रियंका की बात माननी पड़ी. 6 जनवरी, 2016 को नितिन चावला और प्रियंका की शादी सामाजिक रीतिरिवाज से हो गई. नितिन ने डिफेंस कालोनी में जो फ्लैट किराए पर लिया था, शादी का कार्यक्रम उसी फ्लैट की छत पर आयोजित किया गया. इस शादी में दोनों परिवारों की तरफ से चुनिंदा लोग ही शामिल हुए थे.

शादी के बाद प्रियंका खुश थी, क्योंकि नितिन उसे बहुत प्यार करता था. इस के अलावा दूसरी बात यह थी कि जिस फ्लैट में वह रह रही थी, वहां पर उन दोनों के अलावा घर का कोई और सदस्य नहीं रहता था. केवल एक नौकर ही था. प्रियंका की शादी को अभी कुछ ही दिन हुए थे कि उसे ऐसी खबर मिली, जिस ने उसे झकझोर कर रख दिया. उसे पता चला कि जिस नितिन से उस ने शादी की है, वह पहले से शादीशुदा ही नहीं, बल्कि 2 बच्चों का बाप है. यह उस के साथ एक बड़ा धोखा था. इस बारे में उस ने नितिन से बात की तो उस ने बताया कि उस ने अपनी पत्नी को तलाक दे दिया है और बच्चे भी उसी के साथ हैं. उस से उस का अब कोई मतलब नहीं है.

नितिन ने अपनी बातों से प्रियंका को भले ही समझाने की कोशिश की थी, लेकिन प्रियंका को इस बात का दुख था कि उस ने खुद के शादीशुदा होने वाली बात उसे बताई क्यों नहीं? बात छिपा कर उस ने उस के साथ बहुत बड़ा धोखा किया है. उस ने नितिन से अपनी नाराजगी भी प्रकट की, लेकिन नितिन ने अपनी चिकनीचुपड़ी बातों से उसे मना लिया. प्रियंका ने भी होहल्ला मचाना उचित नहीं समझा, लिहाजा वह चुप हो गई. जो हो चुका, उस पर तनाव में रहने के बजाय वह अपनी लाइफ को खुशमिजाजी के साथ जीने की कोशिश में लग गई.

मूलचंद फ्लाईओवर के पास प्रियंका के एक दोस्त का रेस्टोरेंट है. शादी के बाद वह दोस्त प्रियंका और उस के पति नितिन चावला को अपने रेस्टोरेंट में पार्टी के लिए बुलाना चाहता था. उस ने जनवरी के आखिरी हफ्ते में नितिन और प्रियंका को कई बार फोन कर के बुलाया, पर नितिन को टाइम नहीं मिल रहा था. नितिन से बात करने के बाद प्रियंका ने दोस्त से कह दिया कि वह 29 जनवरी को पति के साथ रेस्टोरेंट पर पहुंच जाएगी. शाम को प्रियंका पार्टी में जाने की तैयारी करने लगी. नितिन उस समय घर पर नहीं था. उस ने उसे फोन किया तो उस ने कहा कि उसे घर आने में देर हो जाएगी. वह उस का इंतजार न करे और अकेली पार्टी में चली जाए.

उसी समय प्रियंका का दोस्त उस के यहां आ गया. वह उस के साथ जैसे ही उस की कार में बैठने को हुई, तभी नितिन आ गया. प्रियंका नितिन को देख कर खुश हो गई. उस ने नितिन से चलने को कहा तो उस ने पार्टी में जाने से साफ मना कर दिया. तब प्रियंका अकेली ही चली गई और एकडेढ़ घंटे में वहां से लौट आई. प्रियंका घर लौटी तो नितिन वहीं था. वह एकदम सामान्य था. बातचीत कर के दोनों सो गए. उसी रात को अचानक नितिन के दिमाग में न जाने क्या फितूर पैदा हुआ कि रात 3 बजे उठ कर उस ने प्रियंका की पिटाई शुरू कर दी. लातघूसों से उस ने उसे बुरी तरह पीटा.

पिटाई से प्रियंका का चेहरा सूज गया, होंठ फट गए. इस के अलावा उस के शरीर पर भी चोटें आईं. खून से उस की टीशर्ट भी भीग गई. प्रियंका समझ नहीं पाई की आखिर उस से ऐसी क्या गलती हो गई, जो नितिन ने उसे सजा दी. इस पिटाई से वह बुरी तरह डर गई. सुबह 4 बजे के करीब प्रियंका ने अपने सूजे हुए चेहरे की सेल्फी ले कर वाट्सऐप से मां रूमा के पास भेज दी. उस ने उन्हें अपने पिटाई करने की बात भी बता दी.

बेटी की पिटाई की बात सुन कर रूमा का खून खौल उठा. उन्होंने बेटी पर कभी हाथ तक नहीं उठाया था. आखिर उस ने उस की बेटी को इतनी बेदर्दी से क्यों मारा. उन का मन कर रहा था कि वह उसी समय उस के पास जाएं, पर उस समय एक तो अंधेरा था और दूसरे उन के पति घर पर नहीं थे.

बेटी डिंपी भी दोस्त की शादी में पूर्वी दिल्ली गई हुई थी. रूमा ने तुरंत डिंपी को फोन कर के प्रियंका के घर पहुंचने को कहा. उजाला होने पर रूमा बेटी प्रियंका के घर पहुंच गईं. डिंपी भी अपने दोस्तों के साथ वहां पहुंच चुकी थी. प्रियंका की चोटें देख कर सभी हैरान थे कि आखिर इस से ऐसी क्या गलती हो गई, जो नितिन इतना बेदर्द हो गया. रूमा ने नितिन से बात की तो उस ने बताया कि यह बातबात पर बहसबाजी करती है. उसी बहसबाजी में बात इतनी बढ़ गई कि वह अपना आपा खो बैठा.

रूमा ने उस समय उस से ज्यादा बात करनी जरूरी नहीं समझी. वह प्रियंका को अपने घर ले आईं. जाने से पहले नितिन ने खून से सनी उस की टीशर्ट उतरवा कर दूसरी पहना दी थी. उन्होंने उसे एक क्लिनिक में भरती करा दिया. प्रियंका का अंगअंग दुख रहा था. इतनी पिटाई होने के बाद भी प्रियंका ने पुलिस काररवाई करने से मना कर दिया था. रूमा ने नितिन के पिता दलजीत चावला को फोन कर के जानकारी दी तो उन्होंने कहा कि वह अभी अपने किसी रिश्तेदार के अंतिम संस्कार में आए हुए हैं. नितिन के भाई जतिन को फोन किया तो उस ने भी कोई बहाना बना दिया.

उस के घर वालों ने जब उन की बात को गंभीरता से नहीं लिया तो उन्हें गुस्सा आ गया. उन्होंने जतिन को धमकी दी कि अगर वह नहीं आए तो उस के भाई के खिलाफ थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई जाएगी. इस से जतिन डर गया और प्रियंका के घर पहुंच गया. जतिन ने नितिन को भी वहीं बुला लिया. प्रियंका की चोटें देख कर जतिन भी हैरान था. उस ने नितिन को समझाया. तब नितिन ने अपनी गलती मानी और वादा किया कि भविष्य में वह ऐसा नहीं करेगा.

इस के बाद नितिन प्रियंका को लिवाने ससुराल गया, लेकिन रूमा ने कह दिया कि जिस घर में उन की बेटी के साथ जानवरों जैसा सलूक किया जाए, वहां वह उसे हरगिज नहीं भेजेंगी. नितिन ने अपनी इस गलती की कई बार माफी मांगी. इस पर प्रियंका के दिल में रहम आ गया और वह उस के साथ जाने के लिए तैयार हो गई. नितिन उसे अपने फ्लैट पर ले आया. नितिन शक्की स्वभाव का था. 2 हफ्ते बाद ही नितिन ने प्रियंका के साथ फिर से सख्ती बरतनी शुरू कर दी. जब प्रियंका पूरी तरह स्वस्थ हो गई तो वह अपने खाली समय में सोशल साइट्स पर दोस्तों आदि से बातें करती रहती थी. नितिन को शक था कि वह अपने किसी बौयफ्रैंड से बात करती है. इसलिए उस ने प्रियंका के फोन से वाट्सऐप और फेसबुक अनस्टाल करा दी.

इस के अलावा नितिन ने प्रियंका के अकेली घर से बाहर निकलने पर भी पाबंदी लगा दी. खुले आसमान में उड़ने वाली प्रियंका अब पिंजड़े में बंद एक चिडि़या बन कर रह गई थी. यही नहीं नितिन के तुगलकी फरमान की वजह से घर का खाना उसे खुद बनाना पड़ता था. जबकि खाना बनाने के लिए रखा नौकर दिन भर खाली रहता था. अब प्रियंका को नितिन  के साथ शादी करने का पछतावा हो रहा था. प्रियंका कभी किसी बात पर बहस करती तो नितिन उस की पिटाई कर देता. इस से उस के अंदर इतना खौफ बैठ गया कि वह उस के सामने अपना मुंह नहीं खोल पाती थी. वह उसी के आदेशानुसार काम करती थी.

एक दिन नितिन अपनी पहली पत्नी से पैदा हुए बेटे को फ्लैट पर लाया. उसे उसी समय बिजनैस के सिलसिले में कहीं जाना था तो वह 8 वर्षीय बेटे को प्रियंका के पास छोड़ कर चला गया. उस के जाने के बाद उस लड़के ने प्रियंका के हाथों खाना तो दूर, कोई दूसरी चीज भी नहीं खाई. ऐसा लग रहा था, जैसे उसे किसी ने सिखा कर भेजा हो कि कोई चीज नहीं खानी है. शाम को जब नितिन को पता चला कि उस का बेटा दिन भर भूखा रहा है तो उसे पत्नी पर बहुत गुस्सा आया. उस ने उसे जम कर डांटा.

प्रियंका मां को फोन कर के अपना दुखड़ा रोती, तब मां को लगता कि उन की आपस की बातों में ज्यादा टांग अड़ाना ठीक नहीं है. छोटेमोटे झगड़े तो होते ही रहते हैं. बेटी की ससुराल के मामलों में ज्यादा दखलंदाजी करने पर कभीकभी रिश्ते बिगड़ जाते हैं. उन्होंने सोचा कुछ दिनों में रिश्ते सामान्य हो जाएंगे तो सब ठीक हो जाएगा. रूमा ने 24 मार्च, 2016 को भी प्रियंका से बात की थी, तब प्रियंका ने कहा था कि वह कल शाम को नितिन के साथ घर आएगी और खाना खाने के बाद लौट आएगी. 25 मार्च को उन्होंने फिर से प्रियंका से बात की. इस के बाद उन की उस से बात नहीं हो सकी.

पूछताछ में नितिन चावला बारबार खुद को बेगुनाह बता रहा था. वह पत्नी की मौत को आत्महत्या ही कह रहा था. नितिन से पूछताछ करने पर पुलिस को कोई खास जानकारी नहीं मिली तो पुलिस ने उसे 27 मार्च, 2016 को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. प्रियंका की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से स्पष्ट नहीं हो सका कि प्रियंका ने आत्महत्या की थी या उस की हत्या कर आत्महत्या का रूप दिया गया था. इसलिए डाक्टरों ने उस का विसरा सुरक्षित कर जांच के लिए भेज दिया.

प्रियंका के मातापिता का आरोप है कि उन की बेटी इतनी कमजोर नहीं थी कि वह सुसाइड करती. वह हीलिंग, मैडिटेशन और विपश्यना की एक्सपर्ट थी. मार्च के पहले हफ्ते में भी वह 15 दिनों के लिए विपश्यना के लिए पुष्कर गई थी. उन्होंने बताया कि जिस समय फ्लैट का दरवाजा तोड़ा गया था, वह बिस्तर पर घुटनों के बल बैठी थी. उस स्थिति में फांसी लगा कर किसी की भी मौत नहीं हो सकती. पुलिस को उस स्थिति का फोटो खिंचवाना चाहिए था, लेकिन पुलिस ने ऐसा नहीं किया.

फ्लैट पर जो नेपाली नौकर था, उस से भी पुलिस ने पूछताछ नहीं की. सुसाइड नोट में प्रियंका ने लिखा था कि नितिन 3 दिनों से घर नहीं आ रहा. जबकि नौकर ने रूमा को बताया था कि साहब कल भी घर पर थे. इस से तो यही लग रहा है कि वह सुसाइड नोट 25 मार्च से पहले का लिखा है. शायद पहले कभी प्रियंका ने सुसाइड करने की कोशिश की होगी. अगर पुलिस नितिन के मोबाइल फोन की डिटेल्स निकलवाती तो कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिल सकती थीं.

प्रियंका को डेली डायरी लिखने का शौक था. रूमा का कहना था कि अगर उस ने सुसाइड किया है तो इस बात को उस ने अपनी डायरी में जरूर लिखा होगा, लेकिन पुलिस डायरी के बारे में कुछ भी नहीं बता रही. जिस कमरे में उन की बेटी मरी मिली, उस कमरे का लौक सिस्टम ऐसा है, जो अंदर और बाहर दोनों तरफ से बंद किया जा सकता है. इसलिए उन का कहना यही है कि प्रियंका की हत्या करने के बाद नितिन कमरे का ताला लगा कर चला गया था.

पिता अशोक कपूर का कहना है कि सन 2014 में नितिन के खिलाफ मुंबई की किसी मौडल ने वर्सोवा थाने में रेप का केस दर्ज कराया था. इस की जानकारी प्रियंका को भी हो गई थी. वह नितिन के जुल्मोसितम से तंग आ कर घर लौटना चाहती थी. यह जानकारी नितिन को लग गई थी, इसलिए उस ने उन की बेटी की हत्या कर दी.

उन्होंने इस केस की निष्पक्ष जांच करा कर दोषियों के खिलाफ सख्त काररवाई करने की मांग की है. बहरहाल मामला चाहे जो भी हो, यह तो जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा. मामले की जांच एसआई शिवदेव सिंह कर रहे हैं. कथा लिखे जाने तक नितिन की मां हर्ष चावला और भाई जतिन चावला पुलिस की गिरफ्त में नहीं आ सके थे. Delhi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों और मृतका के घर वालों से की गई बातचीत पर आधारित

 

Bihar Crime News: रंगदारी नही दींं तो ले ली जान

Bihar Crime News: रविकांत को किसी से कोई मतलब नहीं था, वह अपना कमाताखाता था. लेकिन उस की कमाई पर जब कुछ बदमाशों की नजर लगी तो वह तो मारा ही गया, बेटे की मौत के गम में बाप की भी मौत हो गई.

26 जनवरी, 2016 की सुबह पटना के बेउर मोहल्ले में रहने वाले 45 वर्षीय रविकांत अपनी दुकान पर जाने के लिए घर से मोटरसाइकिल से निकले थे. राजापुर बाजार में उन की ज्वैलर्स शौप थी. करीब पौने 10 बजे वह अपनी दुकान पर पहुंच गए. दुकान की साफसफाई कर के वह अपनी गद्दी पर बैठे ही थे कि उन की दुकान में 3 लड़के घुस आए.

रविकांत उन सभी को जानते थे. वे तीनों इलाके के बदमाश थे. सुबहसुबह उन्हें अपनी दुकान में देख कर वह समझ गए कि ये आज भी कुछ लेने आए हैं. वह सहम उठे. उन का भयभीत चेहरा देख कर एक लड़के ने कहा, ‘‘चल, सोने की चेन और 2 लाख रुपए अभी निकाल.’’

रविकांत उस लड़के का चेहरा ताकने लगे. इस पर वह लड़का थोड़ा गुस्से में बोला, ‘‘सुना नहीं? चल, जो कहा है, जल्दी निकाल वरना जान से मार देंगे.’’

‘‘तुम जब भी आते हो, मैं तुम लोगों को कुछ न कुछ देता रहता हूं, मैं ने कभी मना नहीं किया. लेकिन आज मेरे पास पैसे नहीं हैं, इसलिए आज मैं कुछ नहीं दे सकता.’’ रविकांत ने कहा.

लड़के ने फिर धमकाया, ‘‘रुपए निकाल नहीं तो अंजाम ठीक नहीं होगा.’’

‘‘तुम मेरी बात समझने की कोशिश करो. सुबहसुबह इतने पैसे मैं कहां से लाऊं?’’ रविकांत गिड़गिड़ाए.

‘‘लगता है, मेरी बात सीधी तरह से तेरे भेजे में नहीं घुस रही है.’’ लड़के ने धमकाते हुए कहा, ‘‘मैं आखिरी बार कह रहा हूं. बात मान ले, वरना जान से हाथ धो बैठेगा.’’

इसी बात पर उस बदमाश और रविकांत में बहस होने लगी. एकदम से गुस्से में आ कर बदमाश ने देसी कट्टे से रविकांत के सीने में एक के बाद एक कर के कई गोलियां दाग दीं. चीख कर रविकांत वहीं ढेर हो गए. उन बदमाशों ने रविकांत को हिलाडुला कर देखा. जब उन्हें विश्वास हो गया कि वह मर चुका है तो वे वहां से पैदल ही मैनपुरा मोहल्ले की ओर चले गए. गोलियों की आवाज सुन कर दुकानदारों ने दुकानों के शटर गिराने शुरू कर दिए थे. बाजार में भगदड़ मच गई थी. थोड़ी ही देर में बाजार में सन्नाटा पसर गया था.

कुछ लोग हिम्मत कर के रविकांत की दुकान पर पहुंच गए. उन्होंने रविकांत को लहूलुहान हालत में देखा तो घबरा गए. उन्होंने तुरंत उन्हें औटो में लादा और पटना मैडिकल कालेज अस्पताल ले गए. जांच के बाद डाक्टरों ने रविकांत को मृत घोषित कर दिया. इसी बीच किसी ने इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी थी. पुलिस ने घटनास्थल पर पहुंच कर जरूरी काररवाई की और लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

रविकांत के करीबियों ने पुलिस को बताया कि अपराधी दुर्गेश शर्मा और मुनचुन गोप पिछले 3 महीने से रविकांत से 10 लाख रुपए की रंगदारी मांग रहे थे. जब उन्होंने इतनी बड़ी रकम देने में मजबूरी जताई तो वे उन से सोने के गहनों की मांग करने लगे. एक बार रविकांत ने उन्हें 36 ग्राम सोने की चेन बना कर दी भी थी. इस के बाद भी वे चुप नहीं बैठे और पैसे मांगते रहे.

घटना के समय रविकांत के पिता सुरेश्वर प्रसाद अस्पताल में भरती थे. जब उन्हें पता चला कि उन के बेटे की हत्या कर दी गई है तो उन्हें इतना गहरा सदमा लगा कि उन्हें हार्टअटैक आ गया और उन की भी मौत हो गई. इस तरह 24 घंटे में घर में 2 मौतें हो गईं. पति और बेटे की मौत पर लाडली देवी टूट गईं. वह रोरो कर बारबार बेहोश हो रही थीं. रिश्तेदार उन्हें किसी तरह संभाल रहे थे. रविकांत के घर में मातमी सन्नाटा पसरा था.

गनीमत इस बात की थी कि रोज की तरह उस दिन रविकांत का बेटा सौरभ उन के साथ शोरूम पर नहीं गया था, वरना उस की जान को भी खतरा हो सकता था. संयोग से उस दिन सौरभ अपने बीमार दादा को देखने अस्पताल गया था. रविकांत ने ही सौरभ को 10 हजार रुपए दे कर अस्पताल भेजा था. पुलिस ने रविकांत की पत्नी शोभा से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि बदमाश दुर्गेश शर्मा, मुनचुन गोप आदि उस के पति को बारबार फोन कर के 100 ग्राम सोने की चेन और 10 लाख रुपए की मांग कर रहे थे. ये सब न देने पर उन्होंने उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी थी.

मोबाइल पर बारबार धमकी आने से उस के पति बेहद परेशान रहते थे. जब बदमाशों ने उन्हें ज्यादा ही परेशान करना शुरू कर दिया तो पति ने मोबाइल का सिमकार्ड तोड़ कर फेंक दिया और नया सिमकार्ड ले लिया. चूंकि वे बदमाश काफी खतरनाक थे, इसलिए पति ने डर की वजह से पुलिस में रिपोर्ट नहीं लिखाई थी. जिस दिन रविकांत की हत्या हुई थी, उसी दिन शाम को अपराधी मुनचुन गोप ने लूटपाट और मारपीट के केसों में वांछित रहने की वजह से अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया था. उस के खिलाफ ये दोनों मामले पिछले साल दर्ज हुए थे. दोनों ही मामलों में पुलिस को उस की तलाश थी.

पुलिस को जब पता चला कि मुनचुन गोप ने कोर्ट में सरेंडर कर दिया है तो पुलिस ने उसे रिमांड पर ले कर पूछताछ की. इस पूछताछ में उस ने बताया कि वह अपने साथियों गणेश राय और करमू राय के साथ रविकांत की दुकान पर रुपए लेने गया था. उस का मकसद रविकांत की हत्या करना नहीं, बल्कि वह उसे डराने व अन्य दुकानदारों में दहशत फैलाने के लिए उस के पैर में गोली मारना चाहता था, लेकिन करमू राय ने हड़बड़ी में उस के सीने में गोली मार दी.

पूछताछ में पुलिस को पता चला कि गणेश राय काफी दिनों से दुर्गेश के लिए काम कर रहा था. गणेश के ही कहने पर करमू राय ने 12 जनवरी, 2016 को रविकांत से 100 ग्राम सोने की चेन और 10 लाख रुपए की रंगदारी मांगी थी. रविकांत ने रंगदारी देने से साफ मना कर दिया था. उसी रात गणेश राय ने करमू राय, मुनचुन गोप और पगला विक्रम को अपने घर पर बुलाया था. सभी ने मिल कर योजना बनाई कि रविकांत और बाकी कारोबारियों में खौफ फैलाने के लिए रविकांत की दुकान पर फायरिंग की जाए. अगर ज्यादा जरूरी हो तो रविकांत के पैरों में गोली मार कर उसे जख्मी कर दिया जाए.

रविकांत हत्याकांड में दुर्गेश का नाम आने के बाद भी पुलिस ने उसे ढूंढ़ने की कोशिश नहीं की. इस की वजह शायद यह थी कि उस की राजनीतिक पहुंच बहुत ऊंची थी. पुलिस ने उस के गुर्गों पगला विक्रम उर्फ राजा, रंजीत उर्फ भोला, जितेंद्र कुमार और पप्पू कुमार को गिरफ्तार कर लिया था.

ये उस के ऐसे गुर्गे थे, जो उस के इशारे पर कुछ भी करने को तैयार रहते थे. यही बोरिंग रोड, राजापुर, मैनपुरा, मंदिरी और दानापुर इलाके में व्यवसायियों और ठेकेदारों से रंगदारी वसूलते थे. पगला विक्रम तो दुर्गेश का दाहिना हाथ माना जाता है. मूलरूप से नालंदा का रहने वाला पगला विक्रम बड़ी ही ईमानदारी से दुर्गेश के साथ काम करता था. यही वजह थी कि जब पिछले साल वह जेल गया था तो दुर्गेश ने ही उस के घर का सारा खर्च चलाया था.

जेल से निकलने के बाद पगला विक्रम उस के लिए खुल कर काम करने लगा था और दुर्गेश की गैरमौजूदगी में वही गिरोह को चलाता था. पिछले 15 सालों से दुर्गेश अपराध की दुनिया में छाया हुआ था. उस में एक खास बात यह थी कि वह ऊंची पहुंच रखने वाले लोगों से अपने संबंध बनाए हुए था. इसी वजह से पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं करती थी. उस के खिलाफ आपराधिक मामले तो दर्ज होते थे, लेकिन वह गिरफ्तार नहीं होता था.

पिछले साल 12 फरवरी को मैनपुरा के राजकीय माध्यमिक विद्यालय के पास पूर्व पार्षद रंतोष के भाई संतोष की हत्या में भी उस का नाम आया था. उस के कुछ दिनों पहले राजापुर पुल के पास मधु सिंह की हत्या में भी उस का नाम उछला था. हर अपराध में पुलिस ने उस के गुर्गों को तो पकड़ कर जेल भेज दिया था, लेकिन वह खुलेआम रंगदारी वसूलता रहता था. बिहार के जिला छपरा के थाना गरखा के फुलवरिया गांव का रहने वाला दुर्गेश ने सन 2000 के आसपास पटना के मैनपुरा इलाके में अपना अड्डा बनाया था. उस के खिलाफ पहला केस 10 अक्तूबर, 2000 को बुद्धा कालोनी थाने में डकैती का मुकदमा दर्ज हुआ था.

शुरूशुरू में उस ने दुर्दांत अपराधी सुल्तान मियां और चांदीलाल गोप के गिरोह में शूटर के रूप में काम किया था. लेकिन कुछ ही दिनों बाद उस ने अपने इन दोनों आकाओं को ठिकाने लगा दिया और खुद ही गिरोह की कमान थाम ली. सन 2008 में उस ने आरा में बैंक डकैती डाली. केवल इसी मामले में वह गिरफ्तार हुआ था. पुलिस ने गिरफ्तार कर के उसे बेऊर जेल भेज दिया था. पर किसी तरह उस ने माननीय उच्च न्यायालय में फरजी जमानती आदेश बनवा लिए और जेल से बाहर आ गया. इस के बाद वह पुलिस के लिए दूर की कौड़ी हो गया. धीरेधीरे उस पर पटना के थाना पाटलिपुत्र, राजीवनगर, बुद्धा कालोनी, एस.के. पुरी, दीघा और कोतवाली में 30 मुकदमे दर्ज हो गए.

सुल्तान और चांदीलाल के गायब होने के रहस्य का आज तक खुलासा नहीं हो सका है. इस के बाद उस ने अपनी राह में बड़ी बाधा बन कर उभरे संतोष को भी 12 फरवरी, 2015 को मार डाला. संतोष अपराधियों से कारोबारियों की सुरक्षा मुहैया कराने लगा था. इस से दुर्गेश को रंगदारी का पैसा मिलना बंद हो गया था. इस के बाद दुर्गेश पहले से ज्यादा खूंखार हो गया. उस ने रंगदारी वसूलने के लिए कड़ा रवैया अपना लिया. पुलिस सूत्रों के मुताबिक दुर्गेश पिछले कई सालों से आरा में रह कर अपना गैंग चला रहा था. वह अकसर अपने गिरोह के लोगों से मिलने पटना और आरा के बीच स्थित नेउरा स्टेशन पर आता था.

आखिरी बार वह फरवरी, 2015 में पटना आया था. इलेक्ट्रीशियन रह चुका दुर्गेश अपने पास कोई मोबाइल फोन नहीं रखता. उस के साथ रहने वाले बदमाश भी कुछकुछ दिनों में अपना सिमकार्ड बदल लेते थे. जब भी उसे किसी व्यवसायी को धमकी देनी होती थी या उस से रंगदारी वसूलनी होती थी, वह फोन का इस्तेमाल करने के बजाय अपने किसी गुर्गे के जरिए व्यवसायी तक संदेश भिजवा देता था.

पुलिस को यह भी पता चला है कि दुर्गेश ने कोलकाता में अपना बिजनैस फैला रखा है. दुर्गेश राजापुर पुल के पास अपने नाम से एक शौपिंग कौम्पलेक्स बनवा रहा है. इस कौम्पलेक्स में उस के साथी पप्पू, बबलू, गिरीश और गुड्डू सिंह भी पार्टनर हैं. रंगदारी और लूट के पैसे से दुर्गेश ने पटना और उस के आसपास के इलाकों में अच्छीखासी प्रौपर्टी बना ली है. रविकांत की हत्या के बाद एसएसपी मनु महाराज ने उस की और उस के गिरोह के लोगों की जांच करानी शुरू कर दी है. उन का कहना है कि वह उन सब की संपत्ति का पता कर के उसे जब्त करने की काररवाई करेंगे. Bihar Crime News

Social Crime Story: सहेली ही निकली ब्लैकमेलर

Social Crime Story: मनजीत कौर ने प्रवीण कुमारी को सहेली समझ कर उस के कहने पर अपनी वीडियो क्लिप बनवा ली थी, तब उसे क्या पता था कि यही वीडियो क्लिप उस की जान का जंजाल बन जाएगी.

तनवीर सिंह ने अपनी बहन मनजीत कौर को एटीएम कार्ड देते हुए कहा, ‘‘पापा ने मुझे पैसे निकालने के लिए दिया था, लेकिन मेरा कालेज जाना जरूरी है. इसलिए तुम ऐसा करना कि थोड़ी देर में जा कर पहले एटीएम से रुपए निकाल लेना, उस के बाद बाजार जा कर दरजी से अपने कपड़े ले लेना और लौटते हुए दहीहांडी रेस्टोरेंट वाले शमीजी को 20 हजार रुपए दे देना.’’

‘‘ठीक है, तुम्हारा कालेज जाना जरूरी है तो तुम जाओ. मैं घर के काम करा कर चली जाऊंगी.’’ मनजीत ने कहा.

‘‘और हां, प्रेस वाले से भी पूछ लेना कि उस ने कार्ड छाप दिए या नहीं? अगर नहीं छापे हों तो उन से कह देना कार्ड जल्दी छाप दें. शादी में कुछ ही दिन बाकी रह गए हैं, कार्ड बांटने में भी बड़ा समय लगता है. यह काम जितनी जल्दी निपट जाए, उतना ठीक रहेगा.’’ तनवीर ने कपड़े पहनते हुए कहा.

मनजीत कौर ने भाई से एटीएम कार्ड ले कर अपने पर्स में रख लिया. इस के बाद वह मां के साथ घर के कामों में लग गई. घर के काम कराने के बाद खाना वगैरह खा कर मनजीत दोपहर को बाजार के लिए निकली. पहले उस ने एटीएम से रुपए निकाले.

उस के बाद औटो से गुमार मंडी बाजार गई, जहां दरजी के यहां से उस ने अपने कपड़े लिए. वहां से घंटाघर जा कर लहंगे वाले के यहां से होते हुए वह सिविल लाइन स्थित दहीहांडी रेस्टोरैंट पहुंची. रेस्टोरैंट के मालिक शमीजी को उस ने 20 हजार रुपए दिए, क्योंकि शादी में चायनाश्ते का इंतजाम शमीजी को ही करना था.

सारे काम निपटा कर मनजीत कौर औटो से घर पहुंची. औटो का किराया दे कर जैसे ही वह गेट में घुसी, उस के फोन की घंटी बजी. उस ने फोन रिसीव किया तो दूसरी ओर से एक लड़की की आवाज आई. उस ने अपनी मोटी आवाज में लापरवाही से पूछा, ‘‘मनजीत बोल रही हैं?’’

‘‘जी हां, आप कौन?’’ मनजीत ने पूछा.

‘‘मनजीत है न तो ध्यान से सुन,’’ फोन करने वाली लड़की रौब से धमकी भरे लहजे में बोली. इस के बाद उस ने मनजीत से जो कहा, उसे सुन कर उस का चेहरा सफेद पड़ गया. हाथपैर कांपने लगे. उसे लगा, जैसे फोन हाथ से छूट कर गिर जाएगा. फोन ही नहीं, वह खुद भी गिर जाएगी.

उस लड़की की बातों से मनजीत इतना घबरा गई कि उस से एक कदम भी नहीं चला गया. फोन कटने के तुरंत बाद मनजीत के फोन पर एक वीडियो का एमएमएस आ गया. कांपते हाथों से उस ने इनबौक्स खोल कर वीडियो देखी तो उस के होश उड़ गए. उस का दिलदिमाग और शरीर से नियंत्रण खो गया, जिस से वह चकरा कर गेट के पास ही गिर गई.

संयोग से उसी समय उधर से उस की पड़ोसन गुजर रही थी. उस ने मनजीत को गिरते देखा तो शोर मचाते हुए वह उस के पास पहुंच गई. घर वालों के बाहर आतेआते शोर सुन कर अन्य पड़ोसी भी आ गए थे. पड़ोसियों की मदद से मनजीत के पिता जरनैल सिंह उसे उठा कर अंदर ले गए. डाक्टर को बुलाया गया. उस ने इंजैक्शन लगाया. पूछने पर बताया कि शायद इसे एकदम से किसी बात का गहरा सदमा लगा है.

कुछ दिनों बाद ही मनजीत की शादी होने वाली थी. ऐसे में इस तरह कुछ हो जाना चिंता की बात थी. घर वालों को कुछ पता नहीं था. मनजीत को जो सदमा लगा था, वह फोन पर बात होने और वीडियो देखने के बाद लगा था. आखिर किस ने उसे फोन किया था, फोन करने वाले ने ऐसा क्या कह दिया था और उस वीडियो में ऐसा क्या था, जिसे सुन कर उसे इस तरह का सदमा लगा कि वह बेहोश हो गई थी.

यह सब जानने से पहले आइए थोड़ा मनजीत और उस के घर वालों के बारे में जान लेते हैं. मनजीत के पिता सरदार जरनैल सिंह सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके थे. रिटायर होने के बाद उन्होंने लुधियाना के जस्सियां रोड स्थित नवीननगर में शानदार कोठीनुमा मकान बनवाया था. उन के परिवार में पत्नी के अलावा बेटा तनवीर सिंह और बेटी मनजीत कौर थी.

जरनैल सिंह का छोटा परिवार था. वह हर तरह से सुखी और संपन्न थे. दोनों बच्चों को उन्होंने अच्छी शिक्षा दिलाई थी. मनजीत कौर ने पटना साहिब हिमाचल से बीडीएस (दंत चिकित्सक) की पढ़ाई की थी, जबकि बेटा तनवीर सिंह लुधियाना के आर्य कालेज से बीबीए की पढ़ाई कर रहा था. मनजीत अभी और पढ़ना चाहती थी, लेकिन उस की उम्र शादी लायक हो गई थी, इसलिए मातापिता ने उस का विवाह करना उचित समझा. लड़का देख कर उन्होंने उस की शादी ही नहीं तय कर दी थी, बल्कि जल्दी ही उस की शादी होने वाली थी.

मनजीत सहित पूरा परिवार इस शादी से खुश था. घर में शादी की तैयारियां बड़े जोरोंशोरों से चल रही थीं. इसी बीच मनजीत कौर के साथ यह हादसा हो गया था. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक हंसतीखेलती मनजीत को यह क्या हो गया? मनजीत बिस्तर पर पड़ गई. उसे बिस्तर पर पड़े धीरेधीरे एक सप्ताह हो गया. वह न कुछ खातीपीती थी और न किसी से बात करती थी. अकेली पड़ीपड़ी आंसू बहाती रहती थी. कुछ पूछने पर ठीक से जवाब भी नहीं देती थी. हर समय खोईखोई सी रहती थी. घर का हंसीखुशी का माहौल एक अबूझ से सन्नाटे में तब्दील हो गया था.

शादी के दिन नजदीक आते जा रहे थे. कार्ड बांटे जा चुके थे, करीबी रिश्तेदार आने भी लगे थे. पहले की कुछ रस्में निभाई भी जाने लगी थीं, लेकिन उन रस्मों में भाग लेते समय मनजीत के चेहरे पर उदासी सी छाई रहती थी. पूरा परिवार परेशान था. सब लोग पूछपूछ कर थक गए थे, लेकिन मनजीत ने कुछ नहीं बताया. उस ने जैसे अपने होठों पर ताला जड़ लिया था. यही खामोशी उसे भीतरभीतर खाए जा रही थी.

आखिर इस तरह कब तक चलता. हर चीज का एक अंत होता है. एक दिन भाई तनवीर ने गुरुग्रंथ साहब के पावन स्वरूप श्री जपुजी साहब का गुटखा ले कर मनजीत के सिर पर रखते हुए कहा, ‘‘आप को गुरुग्रंथ साहबजी की कसम, सचसच बताओ क्या बात है, जो तुम अपनी यह हालत किए हो?’’

मनजीत काफी धार्मिक विचारों वाली थी. वह रोजाना सुबह ज्वालानगर स्थित गुरु निवारण साहब गुरुद्वारा जाती थी, शाम की अरदास में भी वह शामिल होती थी. इस के अलावा दिन में जब भी उसे समय मिलता था, वह नामसिमरन करती थी. लेकिन जब से उस की यह हालत हुई थी, उस ने गुरुद्वारा जाना बंद कर दिया था. उस दिन भाई तनवीर ने जब जपुजी साहब का गुटखा उस के सिर पर रखा तो गुटखा हाथ में ले कर वह जोरजोर से गुरु का नाम ले कर रोने लगी. तनवीर ने उसे चुप नहीं कराया. वह चुपचाप खड़ा उसे रोते देखता रहा. शायद वह चाहता था कि उस के मन में जो गुबार भरा है, वह निकाल दे, तभी ठीक रहेगा.

काफी देर तक रोने के बाद जब मनजीत का मन हलका हुआ तो उस ने तनवीर को जो बताया, उसे सुन कर तनवीर को भी चक्कर आने लगा. उस ने भाई को जो बताया था, वह कुछ इस तरह था. मनजीत रोजाना सुबह गुरुद्वारा साहब जाती थी. वहीं उस की मुलाकात प्रवीण कुमारी से हुई. वह भी लगभग रोज ही गुरुद्वारा आती थी. दोनों में परिचय हुआ तो बातचीत में उस ने खुद को मनजीत के सामने बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति की बताया. इस की वजह यह थी कि मनजीत की गुरुघर में बड़ी श्रद्धा थी. इस तरह दोनों जल्दी ही गहरी दोस्त बन गईं. कुछ दिनों की मुलाकात में मनजीत उसे बहन मानने लगी थी.

गुरुद्वारा साहब में अरदास के बाद मनजीत प्रवीण कुमारी के साथ बैठ कर काफी देर तक बातें करती. इसी बातचीत में प्रवीण कुमारी ने मनजीत कौर के घरपरिवार, आर्थिक स्थिति और उस की शादी के बारे में जान लिया था. यही नहीं, उसे यह भी पता चल गया था कि उस के हाथों में काफी रुपए हैं.

इस के बाद एक दिन याद रखने के बहाने प्रवीण कुमारी ने गुरुद्वारा प्रांगण में मनजीत की एक छोटी सी वीडियो क्लिप बना ली. प्रवीण कुमारी यह वीडियो यादगार के लिए बना रही थी, इसलिए मनजीत कौर ने खुशीखुशी बनवा ली थी. तब उसे क्या पता था कि यही वीडियो उस की जान के लिए आफत बन जाएगी. उसे यह वीडियो बनवाने का पछतावा तो उस दिन हुआ, जिस दिन प्रवीण कुमारी ने उसे ब्लैकमेल करने के लिए फोन पर उस वीडियो  की क्लिप भेजी.

दरअसल, प्रवीण कुमारी ने उस समय तो यादगार के तौर पर मनजीत कौर की वह सीधीसादी वीडियो क्लिप बनाई थी, लेकिन बाद में उस ने उस वीडियो के साथ छेड़छाड़ कर के उसे अश्लील बना दिया था. दरअसल, वह वीडियो मिक्सिंग की एक्सपर्ट थी. अपना यह ज्ञान अच्छे काम में लगाने के बजाय वह गलत काम में लगाने लगी, जो एक तरह से अपराध था. अश्लील वीडियो बना कर उस ने अपने मोबाइल फोन से वीडियो मनजीत कौर के मोबाइल पर भेज कर उस से ढाई लाख रुपए मांगे. इसी के साथ उसे धमकी भी दी कि अगर उस ने उसे रुपए नहीं दिए तो वह उस वीडियो को उस की ससुराल वालों के पास भेजने के साथसाथ इंटरनैट पर भी डाल देगी.

प्रवीण कुमारी की धमकी सुन कर और अपना वीडियो देख कर मनजीत कौर की हालत खराब हो गई थी. क्योंकि ढाई लाख रुपए देना उस के वश की बात नहीं थी. अगर वह वीडियो उस की ससुराल पहुंच जाती तो उस का रिश्ता तो टूटता ही, बदनामी ऊपर से होती. मांबाप की छोड़ो, वह किसी को भी मुंह दिखाने लायक नहीं रहती. इसी बात को मन में लिए मनजीत कौर घुटघुट कर जी रही थी. कई बार तो उस के मन में आत्महत्या करने तक की बात आ चुकी थी.

प्रवीण कुमारी ने तो ढाई लाख रुपए की मांग करते हुए मनजीत कौर को धमकाया ही था, उस के 2 दिनों बाद किसी आदमी ने भी फोन कर के रुपए मांगे थे. उस ने भी रुपए न देने पर अंजाम भुगतने की धमकी दी थी. इस के बाद तो लगातार उस के फोन आने लगे थे. वह उस से रुपए तो मांगता ही था, अश्लील बातें भी करता था, जिस से मनजीत और ज्यादा डर गई थी. मनजीत कौर की पूरी बात सुनने के बाद इस विषय पर तनवीर काफी देर तक सोचता रहा. मामला गंभीर ही नहीं, बहुत नाजुक भी था. छोटी सी गलती उस की बहन की जिंदगी तबाह कर सकती थी. आखिर काफी सोचविचार कर उस ने जो कदम उठाया, वह एकदम सही था.

तनवीर सिंह मनजीत को साथ ले कर जगतपुरी पुलिस चौकी पहुंचा और चौकीइंचार्ज एएसआई जगतार सिंह को पूरी बात बता दी. उस ने जगतार सिंह से इस मामले को गुपचुप तरीके से निपटा कर दोषियों को गिरफ्तार करने की प्रार्थना की. मामले की गंभीरता को देखते हुए जगतार सिंह ने तुरंत इस बात की जानकारी थानाप्रभारी अवतार सिंह को देने के साथ, तनवीर की शिकायत डीडी नंबर 24 पर दर्ज कर के तुरंत काररवाई शुरू कर दी.

थानाप्रभारी अवतार सिंह ने इस मामले को सुलझाने के लिए हैडकांस्टेबल हरविंदर सिंह, जसवीर सिंह और कांस्टेबल जतिंदर सिंह की एक टीम बनाई, जिसे उन्होंने ज्वालानगर स्थित दुख निवारण गुरुद्वारा के पास लगा दिया. क्योंकि उन्हें लग रहा था कि प्रवीण कुमारी गुरुद्वारे जरूर आएगी, जहां से उसे पकड़ लिया जाएगा. लेकिन पुलिस की यह चाल बेकार गई, क्योंकि प्रवीण कुमार वहां आई ही नहीं. फिर भी वहां से यह जरूर पता चल गया कि वह अपने पति महेंद्र के साथ कहां रहती है.

इस का मतलब यह था कि मनजीत कौर को फोन पर प्रवीण के अलावा जिस आदमी ने धमकी दी थी, वह उस का पति महेंद्र रहा होगा. घर का पता मिलने के बाद चौकीइंचार्ज जगतार सिंह ने प्रवीण कुमारी के घर छापा मारा तो पतिपत्नी घर पर नहीं मिले. इस के बाद मुखबिरों को उन के पीछे लगा दिया गया, साथ ही उन के घर पर एक सिपाही भी तैनात कर दिया गया. सिपाही प्रवीण कुमारी के घर इस तरह नजर रख रहा था कि किसी को पता नहीं चल रहा था कि घर पर नजर रखी जा रही है.

30 दिसंबर को जगतार सिंह जैसे ही चौकी पर पहुंचे, मुखबिर ने उन्हें बताया कि प्रवीण कुमारी अपने पति महेंद्र के साथ बसअड्डे पर मौजूद है. उन्होंने देर करना उचित नहीं समझा और सहयोगियों को साथ ले कर तुरंत बसअड्डे पर पहुंच गए. लेकिन प्रवीण कुमारी उन्हें वहां नहीं मिली. तब वह जस्सिया रोड पर संगम पैलेस की ओर बढ़े. थोड़ी दूर जाने पर प्रवीण कुमारी उन्हें 2 लोगों के साथ जाते दिखाई दे गई. पुलिस ने उन्हें घेर कर पकड़ लिया. पूछने पर पता चला प्रवीण कुमारी के साथियों के नाम महेंद्र और सुखचरण थे. महेंद्र तो प्रवीण कुमारी का पति था, जबकि सुखचरण उन का साथी था. पुलिस तीनों को पकड़ कर जगतपुरी पुलिस चौकी ले आई.

चौकी में की गई पूछताछ में पता चला यह सारी योजना प्रवीण कुमारी और महेंद्र के साथ पकड़े गए सुखचरण सिंह ने बनाई थी. वह उसी गुरुद्वारे में ग्रंथी था, जहां मनजीत कौर रोज माथा टेकने आती थी. उसे मनजीत कौर के परिवार की आर्थिक स्थिति का पता था, इसलिए उस ने प्रवीण कुमारी और महेंद्र के साथ मिल कर उसे ब्लैकमेल करने की योजना बनाई थी.

गुंथी सुखचरण सिंह शादीशुदा था और काफी दिनों से उसी गुरुद्वारा में ग्रंथी था, जबकि महेंद्र उन दिनों बेकार था. महेंद्र का पहले अच्छाखासा काम चल रहा था. लेकिन वह और प्रवीण कुमारी अय्याश प्रवृति के थे, इसलिए अय्याशी के चक्कर में उन का कामधंधा बंद हो गया था. इस के बावजूद उन के शाही खर्चों में कोई कमी नहीं आई थी.

खर्चों की वजह से प्रवीण कुमारी और महेंद्र पर काफी कर्ज हो गया. कर्ज देने वाले परेशान करने लगे तो उन्होंने ग्रंथी सुखचरण सिंह के कहने पर मनजीत को ब्लैकमेल करने की योजना बना ली. सीधीसादी मनजीत उन के जाल में फंस भी गई. अच्छा तो यह हुआ कि उस का भाई समझदार था. वह पुलिस के पास चला गया, जिस से एक लड़की की जिंदगी बरबाद होने से बच गई. पूछताछ के बाद जगतार सिंह ने उसी दिन यानी 30 दिसंबर, 2015 को अपराध संख्या 221/15 पर भादंवि की धारा 389/120बी के तहत प्रवीण कुमारी, उस के पति महेंद्र और ग्रंथी सुखचरण सिंह के खिलाफ केस दर्ज कर तीनों को सक्षम अदालत में पेश कर एक दिन के पुलिस रिमांड पर ले लिया.

रिमांड के दौरान जगतार सिंह ने तीनों अभियुक्तों के मोबाइल फोन कब्जे में ले कर उन्हें जांच के लिए भेज दिए. रिमांड अवधि समाप्त होने पर सभी को एक बार फिर अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Social Crime Story

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, बदनामी की वजह से कुछ पात्रों के नाम बदले हुए हैं)

Superstition: अंधविश्वास ने ली पिता पुत्र की जान

Superstition: अंधविश्वास हमारे समाज में अमरवेल की तरह फल फूल रहा है.और इसको खाद पानी देने का काम धर्म के ठेकेदार पंडो , पुजारियों के द्वारा बखूबी किया जा रहा है. समाज में फैले तरह-तरह के अंधविश्वास लोगों की जेब से  रुपए पैसे तो ऐंठते  ही हैं, साथ ही जरा सी असावधानी की वजह से जान माल का नुक़सान भी कर रहे हैं.अंधविश्वास के शिकार दलित, पिछड़ों के साथ पढ़े लिखे  नौकरी पेशा लोग भी हो रहे हैं.

एक ऐसा ही ताजा मामला मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में देखने को मिला है. लोगों को न्याय देने जज की कुर्सी पर बैठने वाले एक अंधविश्वासी शख्स की नासमझी ने अपने साथ अपने पुत्र की जान भी गंवा दी. बताया जा रहा है कि  जज के एक महिला मित्र से संबंधों की बजह से परिवार में कलह चल रही थी, जिससे छुटकारा पाने जज साहब तंत्र मंत्र के चक्कर में पड़ गये.

बैतूल  जिला न्यायालय में पदस्थ अतिरिक्त जिला सत्र न्यायाधीश  महेन्द्र कुमार त्रिपाठी  और इसके दो बेटे अभियान राज त्रिपाठी, और  छोटा बेटा आशीष राज त्रिपाठी ने  20 जुलाई 2020 को रात्रि 10.30 बजे के लगभग एक साथ बैठकर डायनिंग टेबल पर  खाना खाया. कुछ समय बाद अचानक वे तीनों उल्टीयां करने लगे . जिस भोजन में परोसी ग‌ई रोटियों की बजह  से तीनों की तबीयत खराब हुई ,वह  जज साहब की पत्नी श्रीमती भाग्य त्रिपाठी ने तैयार की थी.

जज साहब की पत्नी ने दोपहर की बची  रोटियां खाई थी, इस कारण उन्हें कुछ नहीं हुआ.  21  एवं 22 जुलाई  तक जज साहब और इनके बेटो का इलाज न्यायाधीश आवास परिसर बैतूल में ही  चलता रहा. 23 जुलाई को जिला चिकित्सालय के चिकित्सक डॉ. आनद मालवीय की सलाह पर  जज साहब व इनके दोनो बेटों को पाढर अस्पताल में आईसीयू में भर्ती कराया गया.

छोटे बेटे आशीष राज त्रिपाठी की तबीयत में सुधार होने के कारण वह घर पर ही रहे .25 जुलाई को शाम के समय जज साहब एवं इनके बड़े बेटे अभियान राज त्रिपाठी की तबीयत अचानक ज्यादा खराब होने से  इन्हे नागपुर के प्रतिष्ठित एलेक्सिसी अस्पताल ले जाया गया . जहां अस्पताल के चिकित्सको ने अभियान राज त्रिपाठी को मृत घोषित किया. और जज श्री महेन्द्र त्रिपाठी जी का ईलाज चलता रह . 26 जुलाई को प्रातः 04.30 बजे के लगभग जज महेन्द्र त्रिपाठी  की भी मौत हो गई.

दोनो पिता पुत्र की मृत्यु के बाद नागपुर के  मानकापुर पुलिस थाने में एफआईआर  जज के छोटे बेटे आशीष राज त्रिपाठी ने दर्ज कराते हुए पुलिस को बताया कि नागपुर आते समय उसके पिता महेन्द्र त्रिपाठी ने रास्ते में उसे बताया था कि उनकी किसी परिचित महिला संध्या सिह ने उन्हें  किसी पंडित से पूजा पाठ करवा कर  गेहूं का आटा दिया था और कहा था कि आटा घर के आटे में मिलाकर खाना बनाना . उसी आटे से तैयार रोटी खाने के बाद फुड पाईजनिग से उसके पापा और भाई की मौत हो गई.

न्यायिक क्षेत्र का मामला होने से पुलिस अधीक्षक द्वारा सम्पूर्ण जांच पड़ताल हेतु विशेष कार्य दल का गठन किया गया . इसी संदर्भ में जज महेन्द्र कुमार त्रिपाठी के घर से 20 जुलाई को प्रयुक्त शेष आटे के पैकेट को जप्त कर जांज के लिए लैब भेजा गया. लैब से आई रिपोर्ट में आटे में जहर मिले होने की पुष्टि हुई. पुलिस की जांच में जो कहानी सामने आई वह चौकाने वाली थी.

मूलतः रीवा निवासी श्रीमति संध्या सिंह विगत कई वर्षों से छिन्दवाडा में रहकर एन.जी.ओ चलाती है . महिलाओं को कानूनी सलाह देने जैसे कार्यक्रम आयोजित करने की वजह से जज महेन्द्र त्रिपाठी से नजदीकियां हो गई थी . चूंकि जज बैतूल में अकेले रहते थे, तो अक्सर दोनों की मेल मुलाकात होती रहती थी संध्या जज साहब से रूपए पैसों की मांग भी करने लगी थी.

लाक डाउन की बजह से जज साहब की पत्नी व वेटों के बैतूल आ जाने के कारण से संध्या विगत चार माह से जज  से नहीं मिल पा रही थी. परेशान होकर  उसने छिन्दवाड़ा में अपने ड्रायवर संजू , संजू के फूफा देवीलाल  चन्द्रवशी  और बाबा रामदयाल के साथ मिलकर एक योजना बनाई.   योजना के अनुसार श्रीमति संध्या सिंह ने बैतूल आकर  जज साहब से उनके घर से आटा मंगवाया और वही आटा पन्नी में भरकर बाबा उर्फ रामदयाल को दिया गया .

दो दिन  बाद बाबा उर्फ रामदयाल ने आटे में जहर मिला कर संध्या को दे दिया. 20 जुलाई को  सर्किट हाउस बैतूल में संध्या और जज ने एकांत में मुलाकात की.  संध्या सिंह ने बाबा की पूजा वाला जहरीला आटा जज साहब को देते हुए कहा-

“बाबा ने इस‌ आटे को तंत्र मंत्र से सिद्ध किया है, इसकी रोटी खाने से सारी परेशानियां दूर हो जायेगी और हमारा मिलना जुलना आसान हो जाएगा.”

घर आकर  इसी तंत्र मंत्र वाले आटे को जज साहब ने घर में रखे आटे के डिब्बे में मिला दिया.  इसी आटे की रोटी खाने के बाद जज साहब और इनके दोनो बेटो की तबीयत खराब हुई और अंत में जज  महेन्द्र कुमार त्रिपाठी और इनके बड़े बेटे श्री अभियान राज त्रिपाठी की मौत हो गई .

एक पढ़ें लिखे उच्च पद पर काम करने वाले जज की यह कहानी बताती है कि हम किस तरह आंख मूंदकर तंत्र मंत्र और चमत्कारों पर विश्वास करने लगते हैं. अपनी गर्लफ्रेंड के प्यार में अंधे कानूनी पढाई वाले जज ने कैसे विश्वास कर लिया कि बाबा द्वारा दिए गए इस आटे के टोटके से  घर की परेशानियां दूर हो जायेगी.

आज भी विज्ञान के युग में भले ही हम आधुनिक तकनीक का उपयोग कर अपने आपको माडर्न समझने लगे हैं, परन्तु हमारे समाज में वैज्ञानिक सोच विकसित नहीं हुई है. जब हमारे देश के वैज्ञानिक चंद्रयान की सफलता के लिए पूजा पाठ और हवन करते हो, देश के रक्षा मंत्री राफेल विमान की नारियल और नींबू से पूजा करते हों,तो फिर समाज के दूसरे वर्ग से क्या उम्मीद की जा सकती हैं.

अंधविश्वास का आलम ये है रोज सोशल मीडिया पर देवी देवताओं की पोस्ट वाले मेसैज 5 ग्रुप में फारवर्ड करने की अपील पर हम बिना सोचे समझे भेड़ चाल चलने लगते हैं. ज्ञान विज्ञान और समाज को जागरूक करने  वाली पत्रिकाओं को पढ़ने की रूचि लोगों की खत्म होती जा रही है.

ऐसे में दिल्ली प्रेस की पत्रिकाएं सरिता, सरस सलिल, मुक्ता, गृहशोभा समाज में फैले पाखंड और अंधविश्वास के प्रति समाज को जागरूक करने का काम कर रही हैं. इसी तरह सत्यकथा और मनोहर कहानियां जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित अपराध कथाओं में यह सीख प्रमुखता से दी जाती है कि अपराध का अंजाम सुखद नहीं होता. नशा, अंधविश्वास, धार्मिक आडंबर और अपराध पैसे से तंगहाली लाकर हमें  बर्बाद की ओर ले जाते हैं. Superstition

Punjab Crime: गर्भ में पल रहे बच्चे का सौदा करने वाला गिरोह

Punjab Crime: पंजाब के लुधियाना में औरतों का एक ऐसा गिरोह पकड़ा गया है, जो नवजात बच्चों की तो खरीदफरोख्त करता ही था, गर्भ में पलने वाले बच्चे का भी सौदा कर लेता था.

फोन पर दूसरी ओर से बारबार यही आवाज आ रही थी कि जिस नंबर पर आप बात करना चाहते हैं, वह या तो कवरेज एरिया से बाहर है या बंद है. लेकिन शामलाल ने हिम्मत नहीं हारी और थोड़ीथोड़ी देर पर वह उस नंबर को मिलाते रहे. आखिर उन की मेहनत रंग लाई और दूसरी ओर घंटी बज उठी. उस समय शाम के साढ़े 4 बज रहे थे और तारीख थी 15 फरवरी, 2016. दूसरी ओर से फोन रिसीव किया गया तो शामलाल के कानों में किसी आदमी की भारी आवाज गूंजी, ‘‘हां जी बताइए, किस से बात करनी है, कहीं किसी गलत नंबर पर तो फोन नहीं मिला दिया? मैं तो आप को जानता नहीं.’’

‘‘नहीं जी, मैं ने एकदम सही नंबर मिलाया है. काफी देर से कोशिश कर रहा हूं, तब कहीं जा कर आप का फोन लगा है.’’ शामलाल ने कहा.

‘‘वह तो ठीक है, लेकिन आप बोल कौन रहे हैं? आप को किस से बात करनी है?’’ दूसरी ओर से अक्खड़ अंदाज में पूछा गया.

‘‘दरअसल, हमारी पहली बार बात हो रही है, इस से पहले हमारी कभी बात नहीं हुई. आप मिस्टर तेजवीर सिंह बोल रहे हैं न?’’

‘‘देखिए, पहले आप अपने बारे में बताइए. उस के बाद किस काम के लिए फोन किया है, यह बताइए. और हां, मेरा यह नंबर आप को कहां से मिला?’’ दूसरी ओर से उसी अक्खड़ अंदाज में पूछा गया.

‘‘आप का नंबर आप के एक खास दोस्त काला ने मुझे दिया है.’’

‘‘कहां रहता है यह काला?’’

‘‘यहीं लुधियाना में, उस का पता बताऊं?’’

‘‘तब तो आप भी लुधियाना से ही बोल रहे होंगे?’’ इस बार दूसरी ओर से थोड़ा नरमी से पूछा गया.

‘‘जी हां, मैं लुधियाना से ही बोल रहा हूं. वर्धमान चौक के पास मेरी कोठी है और घंटाघर के सामने वाली बिल्डिंग में मेरा औफिस है. यहां मुझे सब ठेकेदार शामलाल के नाम से जानते हैं. काला आप की बड़ी तारीफें कर रहा था. कह रहा था कि आप मेरा काम चुटकी बजा कर करवा देंगे.’’

‘‘बताइए, आप की परेशानी क्या है?’’

‘‘ऐसा है कि मेरी शादी हुए 5 साल से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन अभी तक मैं बच्चे का मुंह देखने को तरस रहा हूं. मां न बन पाने की वजह से मेरी पत्नी भी डिप्रैशन का शिकार हो गई है. न कहीं आतीजाती है और न किसी से ज्यादा मिलतीजुलती है, गुमसुम सी अपने कमरे में पड़ी रहती है.’’

‘‘डाक्टर को नहीं दिखाया, आखिर बच्चा क्यों नहीं हो रहा?’’

‘‘बड़ेबड़े डाक्टरों को दिखा दिया है, लेकिन कहीं से कोई फायदा नहीं हुआ. अब यही सोच रहे हैं कि किसी और का बच्चा ले कर पाल लें.’’

‘‘तो किसी अनाथ आश्रम से बच्चा गोद ले लीजिए. इस में परेशानी क्या है?’’

‘‘आप की बात सही है, लेकिन मेरी पत्नी इस के लिए राजी नहीं है. क्योंकि ऐसा करने से उस पर बांझ की मोहर लग जाएगी. हमें तुरंत का जन्मा बच्चा चाहिए, जिस के बारे में मेरी पत्नी कह सके कि उसे उस ने पैदा किया है. इस बारे में मेरी काला से बात हुई तो उस ने कहा कि पैसा ले कर आप मेरा काम आसानी से कर देंगे.’’

‘‘आसानी से कैसे कर देंगे भाई? यह बहुत ही मुश्किल काम है. कई लोगों से संपर्क करना पड़ेगा. वैसे भी यह काम मैं सीधे नहीं कर सकता. जो भी करेंगी, डाक्टर साहब करेंगी. मैं उन से एक बार बात कर लेता हूं, उस के बाद आप को बताता हूं. और हां, काला ने आप को यह भी बताया ही होगा कि इस तरह के काम में काफी पैसा लगता है.’’

‘‘बताया है न. मैं ने उस से भी कहा था और आप से भी कह रहा हूं कि आप पैसों की जरा भी चिंता न करें. बस मेरा काम होना चाहिए. आप जितना भी पैसा मांगेंगे, मैं उस से ज्यादा दूंगा. पैसों की मेरे पास कोई कमी नहीं है. बस हां, बच्चा इस तरह का होना चाहिए कि देखने में अच्छे घर का लगे. खूबसूरत भी होना चाहिए.’’

‘‘वह तो ठीक है, लेकिन हम तो पेमेंट के हिसाब से बच्चा देते हैं. आप जैसा पेमेंट करेंगे, आप को वैसा ही बच्चा मिलेगा. मैं डाक्टर मैडम से बात करता हूं.’’ कह कर उस आदमी ने फोन काट दिया.

फरवरी, 2016 के दूसरे सप्ताह में लुधियाना के डीसीपी डा. नरेंद्र भार्गव को अपने किसी माध्यम से सूचना मिली थी कि शहर में कुछ महिलाओं का एक ऐसा गिरोह सक्रिय है, जो किसी गरीब महिला के गर्भवती होने पर उस के पेट में पल रहे बच्चे (भ्रूण) को अच्छेखासे दामों में बेच कर आपराधिक धंधा कर के अच्छीखासी कमाई कर रहा है. दरअसल, महिलाओं का यह गिरोह बिना औलाद वाली महिलाओं को नवजात बच्चा बेच कर उन से अच्छीखासी रकम वसूल करता था.

यही नहीं, इस गिरोह के सदस्य उन गरीब औरतों के बारे में पता लगाती रहती थीं, जिन के कई बच्चे पहले से ही होते थे, इस के बावजूद वे गर्भवती हो जाती थीं. ऐसी महिलाओं को गर्भ ठहरने की खुशी कम, समस्या ज्यादा प्रतीत होती थी. ऐसी ही महिलाओं को पैसों का लालच दे कर वे औरतें उस का बच्चा पैदा होते ही ले कर बेऔलाद अमीर महिलाओं को अच्छेखासे दामों में बेच देती थीं. नरेंद्र भार्गव ने इस गिरोह के बारे में पता लगाने के लिए एडिशनल डीसीपी (मुख्यालय) ध्रुव दहिया के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस में सीआईए-2 के इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह, उन के रीडर सुखपाल सिंह, एएसआई सतनाम सिंह, हवलदार कुलवंत सिंह, राजेश कुमार, सिपाही दलजीत सिंह, होमगार्ड के जवान जितेंद्र कुमार एवं महिला सिपाही सुरेंद्र कौर को शामिल किया गया.

टीम नवजात बच्चों का सौदा करने वाले गिरोह के बारे में पता लगाने के लिए भागदौड़ करने लगी. इसी के साथ इस टीम ने अपने मुखबिरों को भी सहेज दिया था. पुलिस टीम ने बहुत जल्दी इस गिरोह के बारे में पता कर लिया. उस में एक पुरुष भी शामिल था, जिस का नाम तेजवीर सिंह था. वही फोन पर ग्राहकों से बात कर के सौदा करता था. उस का मोबाइल नंबर भी पुलिस के हाथ लग गया था. इस के बाद एक आदमी को नकली ग्राहक बना कर नवजात बच्चा खरीदने के लिए तेजवीर सिंह को फोन किया गया. नकली ग्राहक ने अपना नाम रखा था- ठेकेदार शामलाल.

15 फरवरी, 2016 की शाम 4 बजे नकली ग्राहक ठेकेदार शामलाल की तेजवीर से बात हुई थी. 6 बजे तक कोई जवाब नहीं मिला तो शामलाल ने उसे दोबारा फोन किया. दूसरी ओर से तेजबीर ने छूटते ही कहा, ‘‘ऐसा है ठेकेदार साहब, मैं ने डाक्टर मैडम से बात कर ली है, उन्होंने आप के काम के लिए आगे की काररवाई शुरू कर दी है. मेरे सामने ही उन्होंने कई लोगों को फोन किए हैं.’’

‘‘आप को क्या लग रहा है, मेरा काम हो जाएगा न?’’ शामलाल ने उतावलेपन से पूछा.

‘‘बिलकुल हो जाएगा जी. बस आप हमें थोड़ा समय दीजिए. मेरे पास कुछ बच्चे हैं, लेकिन उन में आप जैसा बच्चा चाहते हैं, वैसा नहीं है. आप के लिए हम एकदम गोराचिट्टा और सेहतमंद बच्चा देख रहे हैं, जो पहली ही नजर में अमीर घर का लगे. क्योंकि उसे बनाना भी तो अमीर घर की औलाद है.’’

‘‘यह बात आप ने एकदम सही कही. सुन कर मन इतना खुश हुआ कि अगर आप सामने होते तो डील की रकम से अलग लाख रुपए अभी निकाल कर इनाम के रूप में आप के हाथ में रख देता.’’

‘‘कोई बात नहीं ठेकेदार साहब, हम आप से इनाम जरूर लेंगे. लेकिन पहले आप के आदेश के अनुसार काम कर दूं. आप को ऐसा खूबसूरत बच्चा ला कर देंगे कि आप और आप की मेमसाहब देखते रह जाएंगे.’’

‘‘अच्छा, अब यह बताओ कि बच्चा हमें कब मिल रहा है? मैं ने इस बारे में अपनी पत्नी को भी बता दिया है. इसलिए वह बारबार फोन कर के एक ही बात पूछ रही है कि बच्चा कब ला कर उस की गोद में डाल रहा हूं.’’

‘‘आप को ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा ठेकेदार साहब. जैसे ही बच्चा हमारे पास पहुंचेगा, हम तुरंत आप को फोन कर के बता देंगे और उसी समय आप के पास तक बच्चे को पहुंचाने चल देंगे. बस आप कैश तैयार रखिएगा. डील फाइनल होते ही मैं आप को पैसे के बारे में बता दूंगा.’’

‘‘मैं ने कहा न कि आप को पैसों की चिंता करने की जरूरत नहीं है. उम्मीद से कहीं ज्यादा पैसे मिलेंगे आप लोगों को.’’

फिलहाल बात यहीं खत्म हो गई.

इस के बाद उसी दिन रात 9 बजे तेजवीर सिंह का फोन आया. उस ने जल्दीजल्दी कहा, ‘‘निहायत खूबसूरत बच्चे की व्यवस्था हो गई है. हम उसे मारुति कार नंबर पीबी 10 एम 0685 से ले कर एक घंटे बाद यानी ठीक 10 बजे वर्धमान चौक पर पहुंच रहे हैं. इस के लिए आप को 5 लाख रुपए देने हैं, जो आप को कैश में लाना है. बच्चा अभी एक हफ्ते का भी नहीं हुआ है, उसे संभालने के लिए आप अपनी पत्नी को भी साथ ले आइएगा.’’

‘‘ठीक है, मैं रुपए ले कर 10 बजे से पहले ही वर्धमान चौक के बाईं ओर वाले फुटपाथ पर अपनी पत्नी के साथ खड़ा रहूंगा.’’ नकली ग्राहक बने ठेकेदार शामलाल ने कहा.  इस के बाद फोन कट गया.

तेजवीर सिंह से फोन पर यह बातचीत सीआईए के औफिस से ही हो रही थी. इस बात की जानकारी डीसीपी नरेंद्र भार्गव को दी गई तो उन्होंने कहा, ‘‘किसी की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर के वर्धमान चौक के पास पूरी फोर्स के साथ तैनात हो जाओ. नकली ग्राहक को ब्रीफकेस दे कर फुटपाथ पर खड़ा कर दो. उन लोगों के आने पर वह उन से बातचीत करे. गिरोह के बारे में पता चलते ही वह अपने फोन से तुम्हारे फोन पर मिस्डकाल करे. उस के बाद तुम अपनी टीम के साथ उन्हें घेर कर गिरफ्तार कर लो. और हां, नकली ग्राहक इस बात का भी ध्यान रखे कि उस समय बच्चा उन के पास मौजूद होना चाहिए.’’

‘‘जी हां, ऐसा ही होगा.’’ जितेंद्र सिंह ने कहा.

इस के बाद उन्होंने मुखबिरी को आधार बना कर एएसआई सतनाम सिंह से तहरीर ले कर भादंवि की धारा 370 एवं ह्यूमन ट्रैफिकिंग एक्ट की धारा 2 के तहत थाना डिवीजन नंबर 7 में अपराध क्रमांक 30 पर रिपोर्ट दर्ज करवा दी. इस के बाद अपनी पुलिस टीम के साथ नकली ग्राहक बने कथित ठेकेदार शामलाल को साथ ले कर वर्धमान चौक पहुंच गए. अब उन्हें इंतजार था तेजवीर सिंह के अगले फोन का. नकली ग्राहक ठेकेदार शामलाल को एक खाली ब्रीफकेस दे कर चौक के बाईं ओर फुटपाथ पर खड़ा कर दिया गया था. बाकी पुलिस टीम वहीं एक जगह छिप कर खड़ी हो गई थी. अपनी सरकारी गाड़ी बोलेरो पीबी 10 बीयू 8036 को भी उन्होंने छिपा दिया था.

ठीक 10 बजे तेजवीर सिंह ने शामलाल को फोन किया, ‘‘हां जी ठेकेदार साहब, हम वर्धमान चौक से थोड़ा पीछे हैं. बस 2 मिनट में पहुंच जाएंगे. आप पैसा ले कर पहुंच गए हैं न?’’

‘‘जी हां, मैं बताई गई जगह पर पैसों से भरा ब्रीफकेस लिए आप का ही इंतजार कर रहा हूं.’’ शामलाल ने कहा.

‘‘ठीक है ठेकेदार साहब, बस 2 मिनट में हम भी पहुंच रहे हैं आप तक.’’ कह कर तेजवीर ने फोन काट दिया. शामलाल ने तुरंत इस बारे में जितेंद्र सिंह को उन के मोबाइल पर बता दिया, जिस से उन्होंने अपनी पुलिस टीम को सतर्क कर दिया. मुश्किल से 5 मिनट गुजरे होंगे कि सफेद रंग की मारुति कार नंबर पीबी 10 एम 0685 फुटपाथ के पास वहीं आ कर रुकी, जहां ब्रीफकेस लिए शामलाल खड़े थे. कार के रुकते ही शामलाल तेज कदमों से उस के पास पहुंच कर कार के अंदर देखा तो उस की ड्राइविंग सीट पर एक सरदार बैठा था और बगल वाली सीट पर एक औरत बैठी थी.

शामलाल को देखते ही सरदार ने खिड़की से सिर बाहर निकाल कर कहा, ‘‘आप ठेकेदार शामलाल हो न?’’

‘‘और आप तेजवीर सिंह?’’

‘‘जी, मैं ही तेजवीर हूं, मुझ से ही आप की फोन पर बात हुई थी. मैं ने आप की आवाज पहचान ली है. अच्छा, यह ब्रीफकेस मुझे दे दो, पूरे 5 लाख हैं न?’’

‘‘उस से ज्यादा हैं, लेकिन पहले बच्चा तो दो. उस के बाद ही पैसे मिलेंगे.’’

‘‘हां…हां, क्यों नहीं. पिछली सीट पर देखो, कितना प्यारा बच्चा है.’’ कह कर तेजवीर ने कार के अंदर की लाइट जला दी.

शामलाल ने कार की उस रोशनी में पिछली सीट पर देखा तो वहां 2 औरतें बैठी थीं, जिन में से एक ने अपनी गोद में पड़े कपड़े को हटाया तो उस की गोद में बहुत ही खूबसूरत बच्चा लेटा दिखाई दिया. शामलाल ने खुशी का इजहार करते हुए कहा, ‘‘बच्चा तो ठीक वैसा ही है, जैसा मैं चाहता था.’’

‘‘तो जल्दी से बच्चा उठाइए और पैसे मेरे हवाले कीजिए.’’ तेजवीर ने इधरउधर देखते हुए कहा.

‘‘भई ये पैसे तो मैं आप के लिए ही लाया हूं. बस मेरी मिसेज जरा आ जाएं.’’

‘‘वह कहां हैं? उन्हीं को तो संभालना है यह छोटा सा बच्चा.’’

‘‘वह अपनी बहन को लेने गई हैं. बस आती ही होंगी. आप कहें तो मैं फोन कर के पूछ लूं.’’

‘‘बिलकुल पूछ लो.’’ तेजवीर ने जल्दी से कहा.

शामलाल ने तुरंत इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह का नंबर मिला दिया. लेकिन उन्होंने बात करने के बजाय मिस्डकाल कर के छोड़ दिया. इस के बाद तेजवीर से कहा, ‘‘फोन रिसीव करने के बजाय काट दिया. इस का मतलब वह पास में ही हैं.’’

‘‘चलो, कोई बात नहीं. थोड़ा इंतजार कर लेते हैं.’’ कह कर तेजवीर ने कार का इंजन बंद कर दिया.

तभी पुलिस टीम ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया. तेजवीर को समझते देर नहीं लगी कि ठेकेदार शामलाल ने ग्राहक बन कर होशियारी से उसे फंसाया है. जितेंद्र सिंह ने बच्चे को एक महिला सिपाही के हवाले कर दिया और वहीं पूछताछ शुरू कर दी. सइस पूछताछ में तेजवीर ने जो बताया, उस के अनुसार, वह पंजाब के जिला मोगा के कस्बा धर्मकोट का रहने वाला था. उस की बगल वाली सीट पर उस की पत्नी रछपाल कौर बैठी थी. वह आरएमपी डाक्टर थी. कार की पिछली सीट पर जो 2 महिलाएं बैठी थीं, उन के नाम बलजिंदर कौर और गुरमीत कौर थे.

बलजिंदर कौर लुधियाना के शिमलापुरी के रहने वाले जागीर सिंह की पत्नी थी, जबकि गुरमीत कौर फरीदकोट के जैतो मंडी के रहने वाले हरभजन सिंह की पत्नी थी. उन्होंने वहीं स्वीकार कर लिया था कि वे सभी नवजात बच्चों की खरीदफरोख्त के अलावा गर्भ में पलने वाले बच्चों का भी सौदा करते थे. सीआईए केंद्र ला कर रात में पूछताछ करने के बजाय इन सभी के हवालात में बंद कर दिया गया था. अगले दिन चारों को लुधियाना के प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी अजयपाल सिंह की अदालत में पेश कर के विस्तार से पूछताछ के लिए 2 दिनों के कस्टडी रिमांड पर लिया गया. बच्चे को अदालत के आदेश पर एक धार्मिक संस्थान के बाल संरक्षण केंद्र के हवाले कर दिया गया.

रिमांड अवधि के दौरान पूछताछ में गिरफ्तार चारों अभियुक्तों ने जो बताया, उस से जो कहानी निकल कर सामने आई, वह हैरान करने वाली थी. ये लोग नवजात बच्चों की खरीदफरोख्त तो करते ही थे, ये गर्भ में पल रहे बच्चों तक का सौदा कर लेते थे. तेजवीर सिंह ड्राइवर था. वह टैक्सी के रूप में दूसरों की गाडि़यां चलाता था. अपनी कार खरीद कर उसे टैक्सी के रूप में चलाना उस का सपना था, जो अरसा बीत जाने के बाद भी पूरा नहीं हो रहा था. उस की पत्नी रछपाल कौर आरएमपी (रजिस्टर्ड मैडिकल प्रैक्टीशनर) डाक्टर थी. घर के एक कमरे में उस ने अपना क्लिनिक खोल रखा था, लेकिन उस के यहां मरीज नाममात्र के ही आते थे. लिहाजा उन का गुजारा बड़ी मुश्किल से होता था.

करीब 2 साल पहले की बात है. बगल के गांव की एक औरत रछपाल की क्लिनिक पर आई. वह गर्भवती थी. वह इस अजन्मे बच्चे से छुटकारा चाहती थी. यानी वह अपना गर्भपात कराना चाहती थी. इस काम के लिए रछपाल कौर को अच्छाखासा पैसा मिल सकता था, लेकिन यह सब करने का उसे अनुभव नहीं था. फिर यह गैरकानूनी भी था. इसलिए वह ऐसा करने से घबरा रही थी. लेकिन उस की क्लिनिक पर मुश्किल से यह मरीज आया था, इसलिए वह उसे खाली हाथ लौटाना भी नहीं चाहती थी.

उस के दिमाग में एक तरकीब आई. उस ने उस औरत को सुझाव दिया कि वह गर्भ गिराने के बजाय अपने इस बच्चे को जन्म दे कर उसे दे दे. वह उसे सर्टिफिकेट दे देगी कि उसे मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ था. उस ने सोचा कि इस के बाद वह बच्चा किसी बेऔलाद दंपत्ति को दे देगी. इस से वह जीव हत्या से भी बच जाएगी और किसी उदास परिवार को खुशियां मिल जाएंगी. उस औरत को रछपाल की बात जंच गई. रछपाल ने उस से जो कहा था, वह उस के लिए तैयार हो गई.

रछपाल ने औरत से बच्चे को जन्म देने के लिए कह तो दिया, लेकिन यह तय नहीं कर पाई थी कि वह उस बच्चे का करेगी क्या? इस के कुछ महीने बाद एक दिन रछपाल लुधियाना जा रही थी तो बस में उस की मुलाकात बलजिंदर कौर और गुरमीत कौर से हो गई. तीनों एक ही सीट पर अगलबगल बैठी थीं. बातचीत शुरू हुई तो रछपाल ने उन्हें अपने बारे में बता कर उस महिला का किस्सा कह सुनाया. इस पर बलजिंदर और गुरमीत ने कहा, ‘‘वह बच्चा हमें दे देना, उस के लिए हम आप को एक लाख रुपए देंगे.’’

रछपाल की तो जैसे लौटरी लग गई. समय पर उस ने उस महिला की डिलिवरी करा कर उस से 2 हजार रुपए ले कर सर्टीफिकेट बना दिया कि उसे मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ था. इस के बाद रछपाल ने बच्चा बलजिंदर और गुरमीत को दे कर एक लाख रुपए ले लिए. दरअसल, बलजिंदर कौर और गुरमीत कौर का यही धंधा था. वे नवजात बच्चा खरीद कर उसे दोगुनीतिगुनी कीमत पर निस्संतान लोगों को बेच देती थीं. यही नहीं, वे गर्भवती गरीब औरतों को एडवांस दे कर उन के पेट में पल रहे बच्चों का भी सौदा कर लेती थीं.

उन के गिरोह में कई आशा वर्करों के अलावा 2 महिलाएं और शामिल थीं. उन में एक थी परमजीत कौर. वह लुधियाना के जमालपुर के रहने वाले देवेंद्र सिंह की पत्नी थी. दूसरी थी मधु वर्मा. वह लुधियाना के बसंतनगर के रहने वाले मंजीत सिंह की विधवा थी. इस के बाद बलजिंदर और गुरमीत ने रछपाल कौर को असलियत बता कर उसे भी अपने गिरोह में शामिल कर लिया. इस के बाद रछपाल ने अपने पति तेजवीर सिंह को एक पुरानी मारुति कार दिला कर उसे भी इसी धंधे से लगा दिया.

पुलिस पूछताछ में इन लोगों ने 7 नवजात बच्चों को बेचने और गर्भ में पल रहे कई बच्चों का सौदा करने की बात स्वीकार की थी. इसी पूछताछ में यह भी पता चला था कि गुरमीत कौर और बलजिंदर कौर एक बार इसी तरह के मामले में फरीदकोट पुलिस द्वारा पकड़ी गई थीं. दोनों जमानत पर छूटी थीं. फरीदकोट की अदालत में अभी भी उन पर मुकदमा चल रहा है. एक बार फिर तेजवीर सिंह, रछपाल, बलजिंदर कौर और गुरमीत कौर को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

उसी दिन समरासा चौक से परमजीत कौर और मधु वर्मा को भी हिरासत में ले लिया गया. उन्हें भी 2 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले कर पूछताछ की गई. पूछताछ कर उन्हें भी अदालत के आदेश पर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. पुलिस के अनुसार, इस गिरोह ने पंजाब में अपना अच्छाखासा नैटवर्क बना रखा था. पुलिस इन से जुड़े तमाम लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रही थी. इन लोगों ने जो बच्चा नकली ग्राहक शामलाल को बेचना चाहा था, उसे जिला फाजिल्का के गांव आरनीया के एक परिवार से ढाई लाख रुपए में खरीदा था.

लुधियाना पुलिस के वहां पहुंचने तक वह परिवार भूमिगत हो गया था. लुधियाना पुलिस इस मामले के पीछे हाथ धो कर पड़ी है. वह इस गिरोह से जुड़े हर आदमी को जल्दी से जल्दी गिरफ्तार करना चाहती है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, ठेकेदार शामलाल बदला हुआ नाम है Punjab Crime

Bhopal Crime Story: आधी हकीकत आधा फसाना

Bhopal Crime Story: कुछ लोग प्राकृतिक रूप से किन्नर होते हैं, जबकि कुछ को किन्नर बनाया जाता है. अबरार उर्फ सारिका के साथ भी ऐसा ही कुछ था. फैशनेबल सारिका जब शहर की सड़कों पर निकलती थी तो मनचलों की तो छोडि़ए, कई शरीफजादों तक की नीयत डोल जाती थी. पुराने भोपाल के कैंची छोला इलाके की रहने वाली इस खूबसूरत लड़की के बारे में लोग ज्यादा कुछ नहीं जानते थे. अलबत्ता कुछ लोगों को यह जरूर पता था कि सारिका हकीकत में लड़की नहीं, लड़का है, जिस का असली नाम अबरार है.

अबरार उर्फ सारिका भी उन लाखों लोगों में से एक था, जिस का जन्म तो लड़के के रूप हुआ था, लेकिन उस की शक्ल, सूरत, नजाकत और अदाएं लड़कियों जैसी थीं. आम बोलचाल की भाषा में ऐसे लोगों को किन्नर कहा जाता है. सारिका मूलरूप से कहां की रहने वाली थी, उस के मांबाप कौन थे, इस की जानकारी जिन लोगों को थी, उन में से अधिकांश अब जेल में हैं. कुछ दिनों पहले किन्नरों की एक टोली जो शहर में मंजू एंड पार्टी के नाम से जानी जाती थी, ने सारिका से ताल्लुक बढ़ाने के बाद झांसा दिया कि वह उन लोगों के साथ रहे और उन की टोली में शामिल हो जाए. काम के नाम पर उसे बधाई के समय बस उन के साथ डांस करना है. इस के एवज में उसे रोज 3 हजार रुपए मिलेंगे.

पेशकश बुरी नहीं थी. एक दिन में 3 हजार रुपए कमाना बड़ी बात थी, इसलिए सारिका मना नहीं कर पाई. मंजू एंड पार्टी भी उसे बेवजह इतना पैसा नहीं दे रही थी. दरअसल सारिका के जलवे और अदाएं देख कर पार्टी के सदस्यों को लगा था कि अगर वह भी उन के साथ आ जाए तो कमाई बढ़ जाएगी. वजह यह, हूबहू लड़कियों जैसे दिखने वाले किन्नरों की खासी पूछ रहती है. लोग इन पर पैसा लुटाने से परहेज नहीं करते. बातचीत के बाद सारिका ने टोली के साथ नाचनागाना शुरू कर दिया. साथसाथ काम करते हुए अभी कुछ ही दिन ही गुजरे थे कि सारिका पर शारीरिक रूप से किन्नर बनने का दबाव पड़ने लगा.

लेकिन सारिका के अंदर बैठे अबरार को यह मंजूर नहीं था. लिहाजा उस ने पूरी तरह किन्नर बनने से इनकार कर दिया. फलस्वरूप कुछ दिनों बाद ही मंजू एंड पार्टी ने उस पर चोरी का इलजाम लगा दिया. लेकिन तब तक अच्छाखासा पैसा कमा चुकी सारिका पर इस इलजाम का कोई खास फर्क नहीं पड़ा. वह इस की वजह भी समझ रही थी. अपने अतीत को छिपाए रखने वाली सारिका बीती 9 फरवरी, 2016 को अचानक उस समय सुर्खियों में आई जब उस ने जहांगीराबाद थाने जा कर यह रिपोर्ट लिखाई कि आधा दरजन किन्नरों ने उसे अगवा कर के किन्नर बना दिया.

उस दिन बदहवास सी सारिका जब पुलिस मुख्यालय में एसपी अंशुमान सिंह के पास पहुंची तो धारीदार फुल शर्ट और काले रंग की हाफ पैंट पहने थी. उसे देख कर एसपी ने भी यही सोचा कि इस लड़की के साथ जरूर कोई ज्यादती हुई है. बाद में पूछताछ करने पर सारिका ने पुलिस वालों को जो कुछ बताया, वह न केवल दिलचस्प था, बल्कि चौंका देने वाला भी था. सारिका के मुताबिक करीब 5 दिन पहले 6 किन्नर उस के घर आए और उसे अगवा कर के सुरैया मुजरा किन्नर के घर ले गए.

सुरैया किन्नर समुदाय का मुखिया है, इसलिए भोपाल में उसे सभी जानते थे. वह विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुका है. भोपाल का मंगलवारा इलाका किन्नरों की रिहाइश के लिए जाना जाता है. यहीं सुरैया मुजरा भी रहता है. सारिका ने आगे बताया कि किन्नर उसे मंगलवारा स्थित सुरैया के अड्डे पर ले गए और बेहोश कर दिया. 5 दिन बाद जब उसे होश आया तो उस का गुप्तांग गायब था. पूछने पर किन्नरों ने उसे बताया कि हम ने तुझे भी अपने जैसा बना दिया है.

सारिका उर्फ अबरार की जिंदगी में पहले से ही गमों की कमी नहीं थी, अब उसे यह बड़ा सदमा मिला था. वैसे किन्नर और उन की दुनिया उस के लिए नए और अनजाने नहीं थे. सच तो यह है कि धीरेधीरे उन की दुनिया उस की जिंदगी का हिस्सा बनती जा रही थी. ज्ञापन में उन्होंने बताया कि नकली किन्नरों के लीडर निम्मा और सुनील हैं. इन के ग्रुप में नैना, बुलबुल, तानिया, दिव्या, रूपाली, अलकिया, बिहारन, हिना, छमिया, बिल्लो, नेहा, रानी और सारिका शामिल हैं.

सारिका की बात सुन कर एसपी अंशुमान सिंह ने उसे रिपोर्ट लिखाने के लिए जहांगीराबाद थाने भेज दिया. जहां सारिका ने थाने में 6 किन्नरों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई. इन में सब से ऊपर जो नाम थे, उन में प्रमुख थे सुरैया मुजरा, खुशी और काजल. मामला पुलिस तक पहुंच गया था, इसलिए किन्नर गुटों के बीच भीतरी तौर पर तलवारें खिंचने लगी थीं.

सारिका के साथ जहां घटना घटी थी, वह इलाका मंगलवारा थानाक्षेत्र में आता था, इसलिए इस केस को मंगलवारा थाने में ट्रांसफर कर दिया गया. थाना पुलिस ने मैडिकल जांच के लिए सारिका को अस्पताल भेज दिया. इस दौरान सुरैया और उस के साथी किन्नर नेताओं, पत्रकारों, अफसरों और वकीलों के चक्कर काटते रहे. क्योंकि पुलिस ने आरोपी किन्नरों सुरैया, शिल्पा, सबा, नीतू और शबाब आदि के खिलाफ धारदार हथियार से जान लेने की कोशिश करने, बंधक बनाने, मारपीट करने और जान से मारने की धमकी देने का मामला दर्ज कर लिया था.

उसी दिन खुद को असली बताने वाले नगर के किन्नरों ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया. उन का कहना था कि कुछ नकली किन्नर नाचगा कर पैसा वसूल रहे हैं, जिस से उन की छवि भी बिगड़ रही है और रोजीरोटी पर भी संकट खड़ा हो गया है. किन्नरों के एक गुट ने राजभवन जा कर राज्यपाल रामनरेश यादव के नाम एक ज्ञापन भी दिया था. सुरैया और उस के साथियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हो गया तो गिरफ्तारी से बचने के लिए पांचों किन्नर फरार हो गए. लेकिन मुखबिर की सूचना पर सबा और नीतू को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. उन का कहना था कि अबरार उर्फ सारिका अपनी मरजी से किन्नर बना है. पूछताछ के बाद गिरफ्तार हुए किन्नरों को जेल भेज दिया गया.

जो किन्नर फरार चल रहे थे, उन्होंने अपर सत्र न्यायाधीश दिनेश प्रसाद मिश्रा की अदालत में अग्रिम जमानत की अर्जी लगाई, लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने उन की जमानत की अर्जी खारिज कर दी. आखिरकार 24 फरवरी, 2016 को पुलिस ने किन्नर वाली गली से सुरैया और सबा को भी धर दबोचा. दोनों को अदालत में पेश कर के उन का पुलिस कस्टडी रिमांड लिया गया, ताकि उन से विस्तृत पूछताछ की जा सके.

पूछताछ के बाद उन्हें अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. अब यह अदालत तय करेगी कि सारिका का गुप्तांग जबरन काटा था या इस में उस की कोई रजामंदी थी. और थी भी तो इस संबंध में कानून क्या कहता है. किन्नर जब इस तरह किसी का लिंग काट कर उसे किन्नर बनाते हैं तो कोई समारोह आयोजित नहीं करते और न ही पुलिस को सूचना देते हैं. असली किन्नर कौन और नकली किन्नर कौन, इस का कोई तयशुदा पैमाना नहीं है.

बहरहाल इस घटना से मध्य प्रदेश सरकार की किन्नरों को मुख्यधारा में जोड़ने की कोशिशों को झटका लगा है. पिछले साल किन्नर घरघर जा कर ताली बजाते सरकारी टैक्स वसूली करते नजर आए थे. इस साल उन्हें लोगों को हेलमेट पहनने के लिए जागरूक करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. कुछ दूसरी सरकारी योजनाओं का भी प्रचारप्रसार उन से करवाया गया था. खास बात यह कि सरकार की ओर से बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में उन के लिए अलग से स्टडी सेंटर खोलने की मंजूरी दी गई है.

इस लड़ाई के बाद किन्नरों का पुराना गुट तितरबितर हो गया है, जबकि एक नया गुट वजूद में आ रहा है. बहरहाल यह किन्नर वार कब, कैसे और कहां जा कर थमेगा, यह कह पाना मुश्किल है. Bhopal Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित