Best Crime Story: मजबूरी में बनी कोठे की जीनत

Best Crime Story: मैनब नेपाल के जिला लुंबिनी की रहने वाली थी. उस की शादी पटना के मोहल्ला धोबीघाट  निवासी आरिफ से हुई थी. आरिफ और उस के 2 बच्चे थे. लगभग 4 साल पहले की बात है, मैनब अपने मायके जाने के लिए ससुराल से निकली. उस के साथ उस के दोनों बच्चे भी थे. जनसेवा जननायक एक्सप्रेस से वह बस्ती रेलवे स्टेशन पर उतर गई, क्योंकि वहां से उसे बस पकड़ कर लुंबिनी जाना था.

जब तक मैनब की ट्रेन बस्ती पहुंची, तब तक रात हो चुकी थी. मैनब ने बच्चों के साथ नाश्ता वगैरह किया और अपना सामान प्लेटफार्म के एक कोने में रख कर बच्चों को वहीं सुला दिया. वह खुद इधरउधर टहल कर रात गुजारने की कोशिश करने लगी.

24 साल की मैनब को देख कर यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि वह 2 बच्चों की मां होगी. उस का छरहरा बदन, गोरा रंग किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकता था. रेलवे स्टेशन पर मौजूद जावेद की नजर मैनब पर पड़ी तो उस की आंखों में चमक आ गई. वह मैनब से बात करने का कोई बहाना तलाशने लगा. जावेद चालू किस्म का आदमी था.

वह किसी ऐसे ही शिकार की तलाश में था. इसलिए अकेली महिलाओं से बात करने का हुनर अच्छी तरह जानता था. उस ने बिना किसी परिचय, बिना किसी भूमिका के मैनब के पास जा कर पूछा, ‘‘इतनी रात में स्टेशन पर परेशान सी घूम रही हो, कहीं जाना है क्या?’’

जावेद का हमदर्दी भरा लहजा देख कर मैनब ने कह दिया, ‘‘मुझे नेपाल जाना है, लेकिन समझ में नहीं आ रहा है, कैसे जाऊं?’’

जावेद पहले ही समझ चुका था कि वह अकेली और इस जगह से अनजान है. इसलिए उस ने इस मौके का फायदा उठाने की सोच ली थी. जावेद बस्ती रेलवे स्टेशन के पास ही पुरानी बस्ती थाने के मोहल्ला रसूलपुर का रहने वाला था. बस्ती रेलवे स्टेशन के पास स्थित देह की मंडी में उस का आनाजाना लगा रहता था. मैनब की नासमझी का लाभ उठाने के लिए उस ने उसे देहव्यापार की मंडी में पहुंचाने का फैसला कर लिया. इस के लिए उस ने मन ही मन योजना भी बना ली.

अपनी उसी योजना के मद्देनजर उस ने मैनब से कहा,  ‘‘देखो, नेपाल जाने के लिए तुम्हें बस पकड़नी पड़ेगी. बसअड्डा यहां से थोड़ी दूर है. तुम मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें वहां छोड़ दूंगा. रात भर स्टेशन पर पड़े रहने का कोई फायदा नहीं है. तुम्हें अकेली देख कर पुलिस वाले अलग तंग करेंगे. बेहतर होगा, अभी निकल जाओ. नेपाल के लिए बसें जाती रहती हैं. सुबह तक अपने मायके पहुंच जाओगी.’’

अकेलेपन की वजह से मैनब पहले ही घबराई हुई थी. जावेद की हमदर्दी से वह पिघल गई. बिना सहीगलत का अंदाजा लगाए वह परेशान से स्वर में बोली, ‘‘ठीक है, मैं बच्चों को ले लेती हूं. आप हमें बसअड्डे पहुंचा दीजिए, बड़ी मेहरबानी होगी.’’

बच्चों का नाम सुन कर जावेद ने आश्चर्य से उस की ओर देखा. वह उसे अकेला समझ रहा था. उस ने मैनब से पूछा, ‘‘तुम्हारे बच्चे भी हैं? तुम्हें देख कर तो ऐसा लगता जैसे तुम्हारी शादी हालफिलहाल ही हुई होगी?’’

अपनी तारीफ हर इंसान को अच्छी लगती है. जावेद का कमेंट सुन कर मैनब को भी अच्छा लगा. बातचीत हुई तो परिचय के नाम पर दोनों ने अपनेअपने नाम एकदूसरे को बता दिए. मैनब को यह जान कर अच्छा लगा कि उस की मदद करने वाला भी मुसलमान है. वह न तो भेड़ की खाल में छिपे भेडि़ए को समझ पाई और न यह कि गलत और गंदे लोगों का कोई ईमान धर्म नहीं होता.

मैनब अपने बच्चों को साथ ले कर उस के साथ जाने को तैयार हो गई. जावेद उसे मोटरसाइकिल पर बैठा कर बसअड्डे ले गया. वहां जा कर पता चला कि सिद्धार्थनगर होते हुए ककहरा बौर्डर के लिए बस सुबह 7 बजे जाएगी.

जावेद इस बात को अच्छी तरह जानता था कि बस सुबह जाती है. वह मैनब को जानबूझ कर बसअड्डे ले गया था. बस नहीं मिली तो उस ने मैनब से कहा, ‘‘तुम मेरे साथ चलो, रात को आराम कर के सुबह चली जाना. मैं तुम्हें बस में बैठा दूंगा.’’

मैनब उस पर भरोसा कर के उस के घर आ गई. घर पर जावेद ने उसे चाय पिलाई, जिस में नशीली दवा मिली हुई थी. चाय पी कर उसे नींद आ गई. तब तक उस के बच्चे भी सो चुके थे. नींद के आगोश में डूबी मैनब और भी सुंदर दिख रही थी. जावेद उस के यौवन का स्वाद लेने के लिए बेचैन हो उठा. नशे की हालत में मैनब कुछ समझ नहीं पाई. वह जावेद का साथ देती गई. वह 2 बच्चों की मां जरूर थी, पर उस के बदन की गरमी किसी को भी पिघला सकती थी.

सुबह को जब मैनब का नशा टूटा और वह नींद से जागी तो उसे सब कुछ समझ में आ गया. लेकिन अब वह कुछ नहीं कर सकती थी. वह जावेद से बस अड्डे पहुंचाने की जिद करने लगी. इस पर जावेद ने समझाया, ‘‘तुम कुछ दिन हमारे साथ रह कर पैसा कमा लो, फिर मायके चली जाना. तुम खूबसूरत हो, जवान भी. तुम पर पैसे लुटाने वाले मैं ढूंढ लाऊंगा. यहां रहोगी तो पटना और नेपाल की गरीबी से भी पीछा छूट जाएगा. हम तुम्हारे बच्चों का यहीं के स्कूल में दाखिला करा देंगे.’’

मैनब इस के लिए तैयार नहीं थी. उस ने घरेलू मारपीट से तंग आ कर पति का साथ और घर छोड़ कर मायके में रहने का फैसला किया था. वहीं वह जा भी रही थी. लेकिन बीच रास्ते में यह मुसीबत आ गई थी. मैनब चूंकि घरेलू युवती थी, इसलिए वह जावेद की बात मानने के लिए तैयार नहीं हुई. जबकि वह उसे सोने की अंडा देने वाली मुर्गी मान चुका था. उस ने मैनब को बस्ती की देहव्यापार मंडी में उतारने की योजना बना ली थी.

इसी योजना के तहत उस ने उसे अपने जाल में फंसाया. इस के लिए उस ने मोहरा बनाया उस के बच्चों को. जब मैनब समझाने से नहीं मानी तो जावेद ने उस पर जुल्म ढाने शुरू कर दिए. वह उस के साथ मनमानी करता, नशे की गोलियां खिला कर ज्यादा से ज्यादा नशे में रखने की कोशिश करता. इस से भी बात नहीं बनती तो उस के बच्चों को मार डालने की धमकी देता.

एक हफ्ते तक किए गए अत्याचारों से मैनब टूट गई. अपने बच्चों की खातिर अंतत: वह अपनी देह बेचने को राजी हो गई. इस के बाद जावेद ने उसे पूरी तरह तैयार कर के देहव्यापार की मंडी में उतार दिया. बाजारू लड़कियों के बीच रह कर वह भी जल्दी ही उन की तरह ग्राहक फंसाने के लटकेझटके सीख गई.

वह शाम ढलते ही मेकअप कर के सड़क किनारे खड़ी हो जाती. जावेद उस के लिए ग्राहक ले आता. मैनब कमाने लगी तो जावेद ने उसे एक कमरा अलग से किराए पर दिलवा दिया. वह उसी कमरे में रहने लगी. जावेद ने उस के दोनों बच्चों को स्कूल में दाखिल करवा दिया. उन्हें वह अपने साथ अपने घर में रखता था, ताकि उस की डोर उस के हाथ में रहे.

उधर जब नेपाल के रहने वाले मैनब के पिता हबीब को यह चला कि उस की बेटी अपनी ससुराल से नाराज हो कर मायके के लिए निकली थी तो उसे आश्चर्य हुआ. क्योंकि वह मायके नहीं पहुंची थी. मैनब के पिता हबीब ने आरिफ से बात की तो उस ने किसी भी तरह की जानकारी नहीं दी. उस ने दो टूक कह दिया कि मैनब उस के लिए मर चुकी है.

पति भले ही कितना भी निष्ठुर क्यों न हो जाए, पिता अपनी बेटी को कभी नहीं भूल सकता. हबीब का मैनब के साथ बहुत लगाव था. हबीब ने उसे तलाश करने की बहुत कोशिश की, पर वह कहीं नहीं मिली. उधर जावेद के जाल में फंसी मैनब दिनरात वहां से भागने के मंसूबे बनाती रहती थी. लेकिन जावेद ने उस के बच्चों को उस से अलग अपने कब्जे में रख कर उस के पर काट दिए थे.

वेश्या बाजार में काम करने वाली औरतें 3-4 माह में एक बार सरकारी अस्पताल में यौन रोगों की जांच कराने के लिए जाती थीं. एक बार मैनब भी उन के साथ अस्पताल जाने लगी तो उस ने बच्चों की बीमारी का वास्ता दे कर उन्हें भी साथ ले लिया था. उस का इरादा चुपचाप भाग जाने का था. लेकिन पता नहीं कैसे जावेद को उस के मंसूबे का पता चल गया. उस ने मैनब को अस्पताल से बाहर निकलते ही पकड़ लिया. इस के बाद उस ने मैनब को बुरी तरह मारापीटा.

कुछ दिनों के बाद मैनब ने फिर से भागने की योजना बनाई, लेकिन  इस बार भी वह पकड़ी गई. इस के बाद भी वह वहां से भागने की कोशिश करती रही, पर कामयाब नहीं हो सकी. देखतेदेखते करीब साढ़े 4 साल गुजर गए. मैनब जब नरक भोग रही थी, तभी एक दिन उस के साथ रात गुजारने के लिए लुंबिनी का रहने वाले श्यामप्रसाद आया. श्यामप्रसाद की बहन बस्ती में ब्याही थी.

श्याम जब भी बस्ती आता था, वहां की धंधा करने वाली औरतों के पास जरूर जाता था. उस दिन इत्तेफाक से वह मैनब के पास पहुंच गया था. श्याम के बातचीत करने के तौर तरीके से मैनब समझ गई कि वह उस के ही इलाके का रहने वाला है. उस ने उसे अपनी पूरी कहानी बताई.

मैनब की कहानी सुन कर श्याम को बहुत दुख हुआ. उस ने मैनब से वादा किया कि वह उस के पिता को तलाश कर रहेगा. श्याम मैनब से उस के पिता का नामपता ले कर लुंबिनी आया और उस के पिता हबीब से मिला. उस ने उन्हें मैनब के बारे में कुछ न बता कर उन का फोन नंबर ले लिया. उस ने सोचा था कि इस बार जब वह बस्ती जाएगा तो उन की मैनब से सीधी बात करा देगा.

मौका निकाल कर श्याम बस्ती आया. इस बार उस ने फोन कर के सीधे मैनब से ही मिलने का वक्त तय किया. मिलने पर उस ने उसे सारी बात बताई. साथ ही कहा भी कि वह उसे उस के पिता से मिला कर रहेगा. उस ने मैनब से शारीरिक संबंध बनाने से भी मना कर दिया. बातोंबातों में श्याम ने मैनब के पिता को फोन लगा दिया.

पिता की आवाज सुन कर मैनब खुद पर काबू नहीं रख सकी. वह फोन पर ही फफक कर रोने लगी. कुछ देर तो हबीब को समझ ही नहीं आया कि वह क्या करे? फिर उस ने खुद को संभाल कर बेटी को दिलासा दी. हबीब बूढ़ा जरूर हो चुका था, पर बेटी से मिलने की इच्छा ने उसे अलग तरह की ताकत दे दी थी. वह बोला, ‘‘बेटी, तू परेशान मत हो, मैं जल्दी ही बस्ती आऊंगा तुम्हें लेने. अब तुम्हें वहां कोई नहीं रोक पाएगा.’’

पिता की बातों से मैनब को भरोसा होने लगा कि अब वह उस नरक से निकल जाएगी. हां उसे शातिर दिमाग जावेद से जरूर डर लग रहा था. साथ ही वह यह सोच कर भी डर रही थी कि कहीं उस की वजह से उस का बूढ़ा बाप किसी मुश्किल में न पड़ जाए. एक बार तो उस ने सोचा भी कि पिता को मना कर दे और अपनी बाकी की जिंदगी उसी दलदल में निकाल दे. लेकिन अपने बच्चों के बारे में सोच कर वह हर तरह का खतरा उठाने को तैयार हो गई.

जनवरी, 2014 के पहले सप्ताह में हबीब मैनब को तलाश करने के लिए बस्ती की देहव्यापार मंडी में आ पहुंचा. बस्ती रेलवे स्टेशन के पास ही बसा वेश्या बाजार पुरानी पतली गलियों में बने छेटेछोटे बदबूदार कमरों से भरा हुआ था. दोपहर के समय हबीब इस बस्ती में गया. वह मैनब को तलाशने के लिए जानबूझ कर श्याम का सहारा नहीं लेना चाहता था. उसे डर था कि कहीं उस की मौजूदगी से जावेद को शक न हो जाए.

हबीब जब वेश्या बाजार की तरफ जाने लगा तो उस का जमीर साथ नहीं दे रहा था. बुढापे में उसे वेश्या बाजार में जाना ठीक नहीं लग रहा था. लेकिन इस के अलावा उस के पास कोई रास्ता भी नहीं था. कई लोगों ने उसे व्यंग्य भरी नजरों से देखा भी, लेकिन उस ने उन की परवाह नहीं की.

वेश्या बाजार में आदमी की उम्र नहीं, पैसा देखा जाता है. हबीब ने भी पैसे दिखाने शुरू किए तो देहजीवा उस के करीब आने लगीं. हबीब उन से बात करता और आगे बढ़ जाता. इस तरह उस ने कई दिन मंडी में इधरउधर घूमते निकाल दिए. वेश्या बाजार में बेटी की तलाश में भटकते एक पिता को ग्राहक बन कर घूमना पड़ रहा था.

बस्ती के वेश्या बाजार में हर उम्र की औरतें देह व्यापार करती हैं. ये सभी औरतें खुद को एकदूसरी से ज्यादा जवान और कमउम्र की समझती हैं. कई बार वह उम्रदराज पुरुषों का मजाक उड़ाने से भी नहीं चूकतीं. कई जगह हबीब का भी मजाक उड़ाया गया. लेकिन उस ने परवाह नहीं की.

2 दिन इसी तरह निकाल गए. तीसरे दिन हबीब को मैनब दिख गई. बाजार की बात थी, इसलिए हबीब ने उसे इशारा कर के अपने पास बुलाया और ग्राहक की तरह बात की. मैनब ने भी पिता से उसी अंदाज में बात की और उन्हें ले कर अपने कमरे में आ गई. अकेले में वह पिता से लिपट कर फूटफूट कर रोई. बेटी का हालत देख हबीब ने सोचा कि क्यों न वह अपने बल पर ही मैनब को बाहर ले जाए.

उस ने अपनी यह इच्छा मैनब को भी बताई तो उस ने समझाया, ‘‘आप नहीं जानते, यहां गुंडों का राज है. किसी को जरा सा भी शक हो गया तो मुझे कहीं ऐसी जगह छिपा देंगे कि पता भी नहीं चल पाएगा.’’

‘‘बेटी, तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हें कल यहां से बाहर निकाल ले जाऊंगा.’’ कह कर हबीब वहां से बाहर आ गया. बाहर आ कर वह सीधे पुरानी बस्ती थाने गया. बस्ती का वेश्या बाजार इसी थानाक्षेत्र में आता है. लोगों ने हबीब को बताया था कि पुरानी बस्ती थाने के थानाप्रभारी प्रदीप सिंह तुम्हारी बेटी को वेश्या बाजार से बाहर निकालने का काम कर सकते हैं.

हबीब थानाप्रभारी प्रदीप सिंह के पास गया और उन के पैर पकड़ कर पूरी दास्तान बताई. प्रदीप सिंह ने हबीब की बात सुन कर बस्ती के एसपी वी.पी. श्रीवास्तव से संपर्क किया. उन्होंने आदेश दिया कि तुरंत काररवाई करें. इस के बाद प्रदीप सिंह ने पुलिस फोर्स के साथ 11 जनवरी, 2014 को बस्ती के वेश्या बाजार पर छापा मारा.

नतीजतन मैनब और उस के बच्चों को देहव्यापार कराने वालों के चंगुल से बाहर निकाल लिया गया. पुलिस ने मैनब से पूछ कर देहव्यापार कराने वाले रसूलनगर मोहल्ले के जावेद को भी पकड़ लिया. उस के खिलाफ अनैतिक देहव्यापार अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर के उसे जेल भेज दिया गया.

वेश्या बाजार से आजाद होने के बाद मैनब ने बताया कि उस ने वहां 4 साल से ज्यादा समय तक नरक जैसी जिंदगी गुजारी थी. हर रोज उस के शरीर को 5-10 ग्राहकों द्वारा रौंदा और नोचाखसोटा जाता था. वह तो जिल्लतभरी जिंदगी से बाहर निकल आई, पर अभी भी वहां उस की जैसी कई और लड़कियां हैं. मैनब ने बताया कि वहां जो लड़की आती है, वह पूरी तरह से दलालों के चंगुल में फंस कर रह जाती है.

शुरू में उसे नशे की गोलियां खिला कर मारपीट कर इस धंधे में उतरने के लिए तैयार किया जाता है. बाद में मजबूर हो कर उसे उन की बात माननी पड़ती है. यहां नेपाल और बिहार की गरीब और लाचार लड़कियों को लाया जाता है. उस की किस्मत अच्छी थी कि देर से ही सही, पर बच गई. उस के पिता बहुत अच्छे हैं, जिन्होंने यहां रहने के बाद भी मुझे अपना लिया.

मैनब के पिता हबीब ने बताया कि उस ने तो अपनी बेटी को मरा समझ कर भुला दिया था. उस की बेटी इस स्थिति में मिलेगी, उस ने कभी सोचा भी नहीं था.

मैनब के बरामद होने के बाद बस्ती के एसपी वी.पी. श्रीवास्तव ने इस वेश्या बाजार को जबरन देहव्यापार का अड्डा नहीं बनने देने का संकल्प लिया और एक मुहिम चला कर दलालों को वहां से खदेड़ने की शुरुआत कर दी. देखने वाली बात यह है कि वह कब तक अपना संकल्प पूरा कर पाते हैं. मैनब अपने पिता के साथ अपने घर नेपाल चली गई है, जहां वह मेहनतमजदूरी कर के अपनी जिंदगी का बोझ खुद उठाएगी और अपने बच्चों को पालेगी. Best Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों और मैनब की बातचीत पर आधारित. कहानी में कुछ नाम बदल दिए गए हैं.

Crime Story Hindi: खुल गया महंत की हत्या का राज

Crime Story Hindi: 20 जून, 2014 को सुबह से ही भीषण गरमी थी. सुबह के 11 बजे के आसपास उत्तराखंड के जिला हरिद्वार के कुंभ मेला  नियंत्रण कक्ष के बाहर काफी भीड़ जमा थी. क्योंकि थोड़ी देर बाद वहां हरिद्वार के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डा. सदानंद दाते 2 साल पहले महानिर्वाणी अखाड़े के श्रीमहंत सुधीर गिरि हत्याकांड का खुलासा करने वाले थे. इसलिए वहां के साधुसंत, राजनेता, पत्रकार और अन्य लोग तरहतरह की चर्चाएं कर रहे थे.

श्रीमहंत की हत्या 14 अप्रैल, 2012 की रात को उस समय हुई थी, जब वह कार से हरिद्वार से गांव बेलड़ा स्थित अपने महानिर्वाणी अखाड़े जा रहे थे.  38 वर्षीय युवा श्रीमहंत सुधीर गिरि की हत्या हुए 2 साल से भी ज्यादा का समय बीत चुका था, मगर उन के हत्यारों का पुलिस को पता नहीं चल सका था. इसलिए संत समाज में पुलिस के प्रति काफी रोष था. हत्या के वक्त रुड़की के थानाप्रभारी कुलदीप सिंह असवाल थे, जो काफी तेजतर्रार थे. उन्होंने भी इस मामले में दरजनों संदिग्धों से पूछताछ की थी. सर्विलांस के माध्यम से भी उन्होंने हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने की कोशिश की थी, मगर उन्हें सफलता नहीं मिली थी.

इस के बाद इस केस को सुलझाने के लिए थाना ज्वालापुर, पथरी, कनखल के थानाप्रभारियों और देहरादून की एसटीएफ टीम को लगाया गया था, लेकिन वे भी पता नहीं लगा सके थे कि श्रीमहंत का हत्यारा कौन है. मीडिया ने भी इस मामले को काफी उछाला था, फिर भी यह केस नहीं खुल सका था. इस मामले के खुलने की किसी को कोई उम्मीद भी नहीं थी.

अब 2 साल बाद जैसे ही लोगों को श्रीमहंत सुधीर गिरि के हत्यारों के गिरफ्तार होने की जानकारी मिली साधुसंतों, पत्रकारों के अलावा आम लोग भी कुंभ मेला नियंत्रण कक्ष के बाहर जमा हो गए थे. सभी के मन में हत्यारों के बारे में जानने की उत्सुकता थी. एसएसपी ने जब मौजूद लोगों के सामने महंत के हत्यारे की घोषणा की तो सभी दंग रह गए. क्योंकि पुलिस ने जिस आदमी का नाम बताया था, वह एक कंस्ट्रक्शन कंपनी का मालिक था और वह श्रीमहंत सुधीर गिरि के अखाड़े में मुंशी भी रह चुका था. उस का नाम था आशीष शर्मा.

आशीष शर्मा ने श्रीमहंत सुधीर गिरि की हत्या जो कहानी पुलिस को बताई थी, वह इस प्रकार थी. सुधीर गिरि का जन्म पुरानी रुड़की रोड स्थित दौलतपुर गांव के रहने वाले दर्शन गिरि के यहां हुआ था. दर्शन गिरि गांव में खेतीबाड़ी करते थे. उन के 2 बेटे और 2 बेटियां थीं. बच्चों को उस ने खेतीकिसानी से दूर रख कर उन्हें उच्च शिक्षा हासिल कराई.

पढ़लिख कर बड़े बेटे प्रदीप की रेल कोच फैक्ट्री कपूरथला (पंजाब) में नौकरी लग गई. दोनों बेटियों की वह शादी कर चुके थे. कहते हैं कि पूत के पैर पालने में ही दिख जाते हैं. सुधीर गिरि का साधुसंतों के प्रति लगाव बचपन से ही था. वर्ष 1981 में इन के पिता दर्शन गिरि ने उन्हें पढ़ने के लिए कनखल, हरिद्वार के एक स्कूल में भेजा तो सुधीर स्कूल से लौटने के बाद शाम को महानिर्वाणी अखाड़े के मंदिर में जरूर जाते थे.

उस समय वह बाबा हनुमान के सान्निध्य में रह कर मंदिर की देखरेख करते थे. हनुमान बाबा के सान्निध्य में रहने की वजह से सुधीर गिरि पर धीरेधीरे संन्यास का रंग चढ़ने लगा. उन का संसार, समाज और रिश्तेनाते से मोह भंग होने लगा.

सुधीर गिरि ने एक दिन अपने पिता से स्पष्ट कह भी दिया कि वह जल्द ही संन्यास ले लेंगे. यह सुन कर पिता हैरान रह गए. उन्होंने बेटे को समझाया. बाद में मां भी बेटे के सामने गिड़गिड़ाई, लेकिन सुधीर गिरि ने जिद नहीं छोड़ी. सुधीर गिरि के इस फैसले से घर में कोहराम मच गया. भाईबहनों और रिश्तेदारों ने भी सुधीर गिरि को समझाया और संन्यास न लेने की सलाह दी.

सुधीर गिरि ने सब की बात अनसुनी कर दी. बात सितंबर, 1988 की है. उस समय सुधीर गिरि की उम्र मात्र 13 साल थी और वह उस समय कक्षा 8 में पढ़ रहे थे. उसी दौरान वह अचानक घर से गायब हो गए. सुधीर गिरि के अचानक गायब होने से घर वाले परेशान हो गए. उन्होंने आसपास के क्षेत्रों व हरिद्वार के अखाड़ों में उन की काफी तलाश की. लेकिन सुधीर गिरि का कहीं भी पता नहीं चला. पिता दर्शन गिरि ने जब हनुमान बाबा से पूछा तो उन्होंने कहा कि सुधीर गिरि ने उन से दीक्षा तो ली थी, मगर इस समय वह कहां है, उन्हें मालूम नहीं.

घर वालों के जेहन में एक सवाल यह भी उठ रहा था कि कहीं उस की किसी ने हत्या तो नहीं कर दी. बहरहाल काफी खोजबीन के बाद भी जब सुधीर गिरि का कोई सुराग नहीं मिला तो घर वाले थकहार कर बैठ गए. 10 साल बाद दर्शन गिरि को कहीं से पता चला कि सुधीर गिरि कुरुक्षेत्र (हरियाणा) के एक आश्रम में है और उस ने संन्यास ले लिया है. दर्शन गिरि परिवार सहित बेटे से मिलने कुरुक्षेत्र के आश्रम पहुंचे तो पहले सुधीर गिरि ने अपने परिजनों से मिलने से ही मना कर दिया.

किसी तरह जब मां व बहनें उस से मिलीं तो उन्होंने उन से साफ कह दिया कि अब उन्होंने संन्यास ले लिया है, इसलिए उन का इस समाज व संसार से कोई नाता नहीं है. यह सुनते ही मां और बहनों की आंखों में आंसू आ गए. वह उस से वापस घर चलने के लिए गिड़गिड़ाने लगीं. लेकिन सुधीर गिरि पर उन के गिड़गिड़ाने का कोई असर नहीं पड़ा.

सुधीर गिरि ने अंत में यही कहा, ‘‘संन्यास ले कर मैं ने कुछ ऐसा नहीं किया, जिस से परिवार की प्रतिष्ठा को धब्बा लगे. इसलिए मेरी आप लोगों से विनती है कि आप अब मेरा पीछा करना और मुझे खोजना बंद कर दें.’’

इतना कह कर सुधीर गिरि आश्रम के अंदर चले गए. परिजन रोतेबिलखते घर लौट गए.

इस के बाद सुधीर गिरि लगभग 6 सालों तक कुरुक्षेत्र में रहे. फिर वह हरिद्वार स्थित अखाड़े में रहने लगे. वह महंत हो गए तो उन के नाम के साथ श्रीमहंत जुड़ गया. श्रीमहंत सुधीर गिरि ज्यादातर अखाड़े की प्रौपर्टी की देखरेख में व्यस्त रहते थे. वह अकसर अखाड़े के संतों द्वारा जमीन बेचने का विरोध करते थे. अखाड़े में प्रौपर्टी डीलरों के आने पर उन्हें ऐतराज रहता था, इसलिए वह अपने अखाड़े में किसी प्रौपर्टी डीलर को घुसने नहीं देते थे.

इसी अखाड़े में आशीष शर्मा उर्फ टुल्ली काम करता था. वह कनखल के रहने वाले सुभाष शर्मा का बेटा था. अखाड़े की काफी जमीनजायदाद थी. आशीष का काम अखाड़े की आयव्यय का ब्यौरा रखना था. सालों पहले आशीष ने अखाड़े के संतों से कुछ जमीन सस्ते में खरीद कर महंगे दामों में बेच दी थी. इस के बाद वह कुछ प्रौपर्टी डीलरों व बिल्डरों से भी जुड़ गया था. सन 2004 में जब श्रीमहंत सुधीर गिरि गुरु हनुमान बाबा इस अखाड़े से जुड़े तो उन्होंने अखाड़े की जमीन बेचने का विरोध किया. इसी बात को ले कर एक बार आशीष और हनुमान बाबा की बहस हुई तो आशीष को अखाड़े से निकाल दिया गया.

सन 2006 में आशीष दोबारा अखाड़े में आया, तो उसे अखाड़े का मुंशी बना दिया गया. कुछ दिनों बाद आशीष ने अखाड़े की एक प्रौपर्टी को बेचने की बात चलाई तो हनुमान बाबा ने इस का विरोध किया. सन 2010 के कुंभ मेले के दौरान गुरु हनुमान के शिष्य श्रीमहंत सुधीर गिरि को अखाड़े का सचिव बनाया गया तो उन्होंने भी अखाड़े की जमीन बेचने का विरोध करना शुरू कर दिया. इस के एक साल बाद आशीष ने अपनी मरजी से अखाड़े की नौकरी छोड़ दी. प्रौपर्टी के धंधे में आशीष करोड़ों के वारेन्यारे कर चुका था.

आशीष पहले से ही श्रीमहंत से रंजिश रखता था, क्योंकि उन के विरोध की वजह से वह अखाड़े की जमीन नहीं बेच पाया था. इस के अलावा उसे इस बात का भी डर था कि कहीं श्रीमहंत उस के कारनामों की पुलिस प्रशासन के सामने पोलपट्टी न खोल दे, इसलिए आशीष उर्फ टुल्ली ने श्रीमहंत की हत्या कराने की ठान ली.

श्रीमहंत की हत्या करवाने के लिए आशीष ने मुजफ्फरनगर की सरकुलर रोड निवासी प्रौपर्टी डीलर हाजी नौशाद से संपर्क किया. हाजी नौशाद ने आशीष की मुलाकात इम्तियाज और महताब से कराई, जो शूटर थे. दोनों ही शूटर मुजफ्फरनगर में रहते थे. वे दोनों मुजफ्फरनगर के बदमाश थे. 9 लाख रुपए में श्रीमहंत सुधीर गिरि की हत्या की बात तय हो गई.

उस वक्त श्रीमहंत कभी कनखल तो कभी बेलड़ा स्थित महानिर्वाणी अखाड़े में रहते थे. दोनों शूटर कई महीने तक आशीष के साथ बतौर ड्राइवर रहे और श्रीमहंत की रेकी करते रहे. 14 अप्रैल, 2012 को रात 8 बजे श्रीमहंत सुधीर गिरि हरिद्वार से गांव बेलड़ा स्थित महानिर्वाणी अखाड़े जा रहे थे. दोनों शूटर उन का पीछा कर रहे थे. जैसे ही श्रीमहंत की कार रुड़की के निकट बेलड़ा गांव के बाहर पहुंची, दोनों शूटरों ने उन पर फायरिंग कर के उन की हत्या कर दी.

हत्या करने के बाद दोनों शूटर वापस मुजफ्फरनगर चले गए. फिर कुछ महीने बाद ये शूटर हरिद्वार आ कर आशीष के साथ प्रौपर्टी के धंधे में लग गए. आशीष का प्रौपर्टी का धंधा अच्छा चल रहा था. उस ने एक कंस्ट्रक्शन कंपनी भी बना ली थी. इम्तियाज और महताब को आशीष 25-25 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन देता था. इन दोनों शूटरों को उस ने अपने पास इसलिए रख रखा था कि विवाद वाली प्रौपर्टी का सौदा करने में उन का उपयोग कर सके.

मामला एक महंत की हत्या का था, इसलिए पुलिस प्रशासन हरकत में आ गया. तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों के अलावा एसटीएफ ने भी श्रीमहंत सुधीर गिरि की हत्या के मामले को सुलझाने की भरसक कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली. जांच अधिकारियों को आशीष उर्फ टुल्ली पर शक तो हुआ था. लेकिन अपनी ऊंची पहुंच की वजह से बच गया था. पुलिस जब भी उस से सख्ती से पूछताछ करती, वह अपनी ऊंची पहुंच के बल पर विवेचना अधिकारी को ही बदलवा देता था.

श्रीमहंत की हत्या को तकरीबन 2 साल बीत चुके थे, इसलिए आशीष और दोनों शूटर निश्चिंत हो गए थे. आशीष इन शूटरों के जरिए देहरादून की एक प्रौपर्टी को हथियाने की योजना बना रहा था. श्रीमहंत की हत्या के बाद तत्कालीन क्षेत्रीय सांसद हरीश रावत अफसोस जताने कनखल स्थित महानिर्वाणी अखाड़े गए थे. उस वक्त हरीश रावत ने इस हत्याकांड की सीबीआई जांच कराने की मांग तत्कालीन बहुगुणा सरकार से की थी. उत्तराखंड में राजनैतिक बयार बदलने पर हरीश रावत प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो संत समाज में श्रीमहंत सुधीर गिरि हत्याकांड खुलने की आस जागी.

अखिल भारतीय दशनाम गोस्वामी समाज के मीडिया प्रभारी प्रमोद गिरि ने 14 जून, 2014 को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत को पत्र लिख कर श्रीमहंत की हत्या की सीबीआई जांच कराने की मांग की. प्रमोद गिरि के इस पत्र का जादू की तरह असर हुआ. पत्र पढ़ते ही मुख्यमंत्री हरीश रावत को अपने वे शब्द याद आ गए जो उन्होंने महानिर्वाणी आश्रम में कहे थे. इसलिए उन्होंने श्रीमहंत सुधीर गिरि की हत्या का राज खोलने के लिए प्रदेश पुलिस मुख्यालय को सख्त निर्देश दिए, साथ ही उन्होंने यह हिदायत भी दी कि इस केस की तफतीश करने वाले पुलिस अधिकारियों पर कोई दबाव न बनाया जाए.

एसएसपी डा. सदानंद दाते ने इस हत्याकांड की जांच के लिए एक पुलिस टीम बनाई, जिस में एसपी (सिटी) एस.एस. पंवार, रुड़की के थानाप्रभारी योगेंद्र चौधरी, हरिद्वार के एसओजी प्रभारी नरेंद्र बिष्ट व रुड़की के एसओजी प्रभारी मोहम्मद यासीन को शामिल किया. टीम का निर्देशन एसपी (देहात) अजय सिंह कर रहे थे. केस की फाइल का विस्तृत अध्ययन करने के बाद टीम को आशीष शर्मा उर्फ टुल्ली पर शक हुआ.

तब एसपी (सिटी) एस.एस. पंवार ने आशीष शर्मा को अपने कार्यालय में बुला कर सख्ती से पूछताछ की तो इस हत्या पर पड़ा परदा हट गया. उस ने स्वीकार कर लिया कि श्रीमहंत की हत्या उसी ने कराई थी. इस के बाद उस ने हत्या की पूरी कहानी पुलिस को बता दी. आशीष से पूछताछ के बाद पुलिस ने 20 जून, 2014 को मुजफ्फरनगर से हाजी नौशाद, इम्तियाज और मेहताब को भी गिरफ्तार कर लिया.

तीनों आरोपियों को हरिद्वार ला कर गहन पूछताछ की गई. पूछताछ में इम्तियाज और महताब ने पुलिस को बताया कि उन की मुलाकात हाजी नौशाद ने ही आशीष शर्मा से कराई थी. उसी के कहने पर उन्होंने श्रीमहंत सुधीर गिरि की हत्या की थी. थानाप्रभारी योगेंद्र चौधरी ने चारों आरोपियों के बयान दर्ज कर लिए. उन की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त पिस्टल, एक देशी तमंचा और भारी मात्रा में कारतूस भी बरामद किया गया.

इंसपेक्टर योगेंद्र सिंह चौधरी ने बताया कि इस प्रकरण में आशीष से जुड़े कुछ नेताओं, पत्रकारों  और पुलिस वालों के नाम भी सामने आ रहे हैं. केस में अगर उन की संलिप्तता पाई जाती है तो सुबूत जुटा कर उन के खिलाफ भी काररवाई की जाएगी. पूछताछ और सुबूत जुटा कर सभी अभियुक्तों को कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Lucknow Crime News: बेइज्जत करना पड़ा भारी

Lucknow Crime News: बेइज्जतमहत्त्वाकांक्षी नंदिनी पति को छोड़ कर लखनऊ में प्रौपर्टी का कारोबार करने के साथसाथ सैक्स रैकेट भी चलाने लगी थी. यही सैक्स का कारोबार उस की जान का दुश्मन बन गया.

9 सितंबर की दोपहर लखनऊ के थाना इंदिरानगर की राहुल विहार कालोनी में रोज की तरह सब ठीकठाक चल रहा था कि अचानक सायरन बजाती पुलिस की गाडि़यां कालोनी के एक मकान के सामने आ कर रुकीं तो लोग किसी अनहोनी की आशंका से घरों से बाहर निकल आए. घटना पंकज कुमार सिंह के मकान में घटी थी, जिसे इंदिरानगर के सेक्टर 17 के मकान नंबर 646 में किराए पर रहने वाली नंदिनी तिवारी ने किराए पर ले रखा था. पुलिस के पहुंचते ही उत्सुकतावश भारी संख्या में लोग इकट्ठा हो गए थे.

दरअसल, उस मकान में किराए पर रहने वाली नंदिनी तिवारी को गोली मारे जाने की सूचना थाना इंदिरानगर पुलिस को उस के बेटे मनीष ने दी थी. उसी की सूचना पर पुलिस वहां पहुंची थी. दिनदहाड़े महिला को गोली मारे जाने की सूचना पा कर डीआईजी डी.के. चौधरी, एसएसपी राजेश पांडेय, सीओ (गाजीपुर) दिनेश पुरी और थानाप्रभारी धीरेंद्र यादव पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गए थे.

पुलिस अधिकारी मकान के बाहरी कमरे को पार कर के पीछे वाले कमरे में पहुंचे तो बैड के पास पड़ी कुरसी पर 45-46 वर्षीया नंदिनी तिवारी घायल पड़ी थी. उस का सिर दाईं ओर झुका था. सिर के नीचे गरदन के ऊपरी हिस्से पर घाव था. इस के अलावा पीठ पर भी गहरा घाव था. इन घावों से बहा खून फर्श पर फैला था. अनुमान लगाया गया कि गोली काफी नजदीक से खड़े हो कर मारी गई थी, जो गरदन से घुस कर पीठ से निकल गई थी.

नंदिनी की सांसें चलती हुई महसूस हुईं तो पुलिस उसे लोहिया अस्पताल ले गई, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. इस के बाद धीरेंद्र यादव ने पुलिसिया काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भिजवा दिया.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. बैड पर चाय के कप रखे थे, जिन में सिगरेट के कई टुकड़े पड़े थे. इस का मतलब हत्यारे एक से अधिक थे और मृतका के परिचित थे. कमरे में ही कई मोबाइल फोन टूटे पड़े थे, जिन्हें पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. कुर्सी के पास ही नंदिनी का मंगलसूत्र टूटा पड़ा था. मकान का कोनाकोना खंगाला गया, लेकिन हत्यारों से जुड़ा कोई सबूत नहीं मिला. मकान में फर्नीचर न के बराबर था. ड्राइंगरूम में एक तख्त, फ्रिज और टीवी था. दूसरे कमरे में डबलबैड और अलमारी थी, जिस में कपड़े और कौस्मैटिक्स का सामान रखा था. जिस बैडरूम में हत्या हुई थी, उस में एक बैड, कुर्सी और अलमारी थी. अलमारी में कपड़े थे.

इन के अलावा तीनों कमरों से शराब की बोतलें, डिब्बे और भारी मात्रा में आपत्तिजनक चीजें बरामद हुईं, जिस से अंदाजा लगाया गया कि नंदिनी सैक्स रैकेट चलाती थी. इस का मतलब उसी धंधे से जुड़े किसी आदमी से उस का विवाद हो गया था, जिस में उस की हत्या हो गई थी. पुलिस अधिकारियों ने नंदिनी के बेटे मनीष से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस की मां नंदिनी उस के और भाई संदीप के साथ इंदिरानगर के सेक्टर 17 में रहती थी. वह प्रौपर्टी डीलिंग का काम करती थी. 3 महीने पहले उस ने यह मकान किराए पर लिया था. इस में वह दिन में एक बार जरूर आती थी.

इस मकान में उस की परिचित एक महिला पुनीता उर्फ खुशी करीब एक महीने से पति संजय यादव और बेटे के साथ रह रही थी. लगभग ढाई बजे खुशी और एक अन्य महिला सोनिया मेहरोत्रा ने आ कर उसे घटना की सूचना दी थी. सोनिया एलआईसी एजेंट थी. वह चौक में पान वाली गली में रहती थी. नंदिनी को गोली मारी गई तो खुशी और सोनिया घर में ही मौजूद थीं, इस का मतलब हत्या उन के सामने हुई थी. इस के बाद पुलिस अधिकारियों ने खुशी और सोनिया से पूछताछ की. खुशी ने बताया कि लगभग डेढ़ बजे 2 लड़के आए तो नंदिनी उन्हें ले कर पीछे वाले कमरे, जो बैडरूम था, में चली गईं.

उन के कहने पर वह उन के लिए चायनाश्ता भी दे आई. लगभग 2 बजे सोनिया जन्माष्टमी का प्रसाद ले कर मिलने आई तो नंदिनी के व्यस्त होने की वजह से वह बाहरी कमरे, जो ड्राइंगरूम था, में रुक गई और उस के साथ बैठ कर टीवी देखने लगी. कुछ देर बाद नंदिनी ने आवाज दे कर उन्हें बैडरूम में अपने पास बुला लिया. उस समय नंदिनी की दोनों लड़कों से कहासुनी हो रही थी. दोनों लड़कों ने उसे और सोनिया को एक तरफ खड़ा कर दिया और उन में से एक लड़के ने जेब से पिस्तौल निकाल कर नंदिनी को गोली मार दी. उन्होंने उन्हें भी गोली मारने की कोशिश की, लेकिन किसी कारण से गोली नहीं चली.

इस के बाद उन लड़कों ने उन के और नंदिनी के गहने तथा मोबाइल छीन लिए. मोबाइलों को तो उन्होंने तोड़ कर वहीं फेंक दिए और बाहर से कमरा बंद कर के भाग गए. कमरे में बने रोशनदान से किसी तरह वह निकल कर बाहर आई और कमरा खोल कर सोनिया को निकाला. इस के बाद उस ने घटना की सूचना मनीष को दी. सोनिया ने खुशी की बात की पुष्टि की. उस ने बताया कि वह नंदिनी को 6 साल से जानती थी. उस ने नंदिनी का बीमा किया था. इस के बाद नंदिनी ने उस से कई लोगों का बीमा करवाया था. आज वह जन्माष्टमी का प्रसाद देने आई थी, तभी यह घटना घट गई. इस के बाद खुशी और सोनिया ने दोनों अज्ञात हत्यारों का जो हुलिया बताया था, उस के हिसाब से उन की उम्र 22-23 साल रही होगी.

अब तक फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड आ गए थे. फोरैंसिंक टीम घटनास्थल से साक्ष्य जुटाने में लग गई. डौग स्क्वायड का खोजी कुत्ता कमरे से निकल कर बाहर आया और कालोनी की गलियों में घूमता हुआ करीब 2 सौ मीटर दूर बनी झोपड़पट्टी के पास जा कर रुक गया. आसपास के लोगों से भी पूछताछ की गई, लेकिन उन से भी कोई ठोस सुराग हाथ नहीं लग सका.

थाने से चंद कदमों की दूरी पर यह घटना घटी थी. नंदिनी के घर से थाने के लिए 2 रास्ते थे. एक तो काफी खराब था, दूसरा पक्का था. दोनों रास्तों पर सीसीटीवी कैमरे तलाशे गए, लेकिन कहीं भी कैमरा लगा नहीं मिला. हत्यारों के थाने के सामने से निकलने के बारे में सोच कर थाने के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज खंगाली गई तो उस में भी ऐसा कोई आदमी नजर नहीं आया, जैसा हुलिया खुशी और सोनिया ने बताया था.

पुलिस ने घर वालों, सभी करीबियों तथा परिचितों के मोबाइल नंबर ले लिए. इस के बाद थाने आ कर धीरेंद्र यादव ने मृतका के बेटे मनीष तिवारी की तहरीर पर अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. सोनिया और खुशी को बुला कर उन के बताए अनुसार, हत्यारों के स्कैच बनवाए गए. अब तक की जांच में पता चला था, नंदिनी अपने पति अजय तिवारी से 19 सालों से अलग रह रही थी. अजय बिहार के सीवान जिले में नौकरी करता था. नंदिनी के बेटे मनीष ने अपने पिता को घटना की खबर न दे कर लखनऊ में ही रहने वाले अपने मौसीमौसा को खबर दी थी.

घटना की खबर पा कर सभी रिश्तेदार पोस्टमार्टम हाउस पहुंच गए थे. रिश्तेदारों ने अजय को भी नंदिनी की हत्या की सूचना दी थी, पर वह नहीं आया था. पोस्टमार्टम के बाद शव मिलने पर बेटों ने रिश्तेदारों की मदद से उस का अंतिम संस्कार कर दिया था. अगले दिन जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो उस में गोली मारने से पहले नंदिनी के साथ मारपीट किए जाने की भी पुष्टि हुई. नंदिनी की गरदन के पीछे ऐसे निशान पाए गए थे, जो उस के साथ हुई मारपीट की तरफ इशारा कर रहे थे.

धीरेंद्र यादव ने नंदिनी के तीनों मोबाइल नंबरों को चेक किया. उस के वाट्सएप नंबर वाले मोबाइल पर कई लड़कियों के ऐसे फोटो और मैसेज मिले, जिस से उस के गलत कामों में लिप्त होने के संकेत मिल रहे थे. घटनास्थल से मिली आपत्तिजनक चीजों और मोबाइल से मिले फोटो से लग रहा था कि नंदिनी सैक्स रैकेट चलाती थी. सोशल मीडिया द्वारा भेजे गए संदेशों से भी लग रहा था कि नंदिनी के कई लड़कियों से संपर्क थे. पुलिस ने जब नंदिनी के बड़े बेटे संदीप का मोबाइल चेक किया तो उस के मोबाइल में भी कई लड़कियों के फोटो मिले, जो उस ने वाट्सएप से दूसरों को भेजे थे.

पुलिस ने नंदिनी के नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस में जिन नंबरों पर नंदिनी की ज्यादा बातचीत होती थी, उन नंबरों को अलग कर लिया गया. उन नंबरों की घटना के दिन की लोकेशन देखी गई. जिस नंबर की लोकेशन घटनास्थल के नजदीक की थी. उन का रिकौर्ड देखा गया. उन नंबरों में से एक नंबर की लोकेशन पहले इंदिरानगर और फिर खुर्रमनगर की थी. उस नंबर से घटना के दिन नंदिनी के नंबर पर फोन भी आया था.

उस नंबर के बारे में पता किया गया तो वह नंबर लखनऊ के गोमतीनगर थानाक्षेत्र के विनीत खंड निवासी अभिषेक कनौजिया का निकला. थानाप्रभारी ने अभिषेक के कालेज का पता कर के कालेज से उस की फोटो निकलवाई. इस बात की भनक अभिषेक और उस के किसी करीबी को भी नहीं लगने दी गई. वह फोटो उन्होंने खुशी और सोनिया को दिखाया तो उन्होंने उसे पहचान लिया. वह दोनों हत्यारों में से एक था और उसी ने नंदिनी की गोली मार कर हत्या की थी. इस के बाद पुलिस ने अभिषेक के घर पर दबिश दी तो वह घर से फरार मिला. 12 सितंबर को धीरेंद्र यादव ने एक गुप्त सूचना पर गोमतीनगर में हुसडि़या पुल के पास से अभिषेक कनौजिया को उस के एक साथी के साथ गिरफ्तार कर लिया.

अभिषेक के साथ गिरफ्तार हुए युवक का नाम विनय चौहान था और वह गोमतीनगर में विनय खंड में रहता था. अभिषेक से पूछताछ की गई तो उस ने विनय के साथ मिल कर नंदिनी की हत्या करने का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने हत्या के पीछे की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी. नंदिनी बिहार के सीवान जिले की रहने वाली थी. उस के पति अजय तिवारी कृषि विभाग में नौकरी करते थे. उन के 2 बेटे थे, संदीप और मनीष. नंदिनी पहले तो ठीकठाक थी, लेकिन 2 बेटों के होने के बाद उस में अचानक आश्चर्यजनक परिवर्तन आ गया था. इस की वजह थी, उस की संगति कुछ अमीर घर की महिलाओं से हो गई थी.

वे महिलाएं दिल खोल कर पैसे खर्च करती थीं और ठाठ से रहती थीं. संगति का असर तो होना ही था. नंदिनी को भी उन महिलाओं की तरह पैसे खर्च करने की आदत पड़ गई. वैसे भी साथ में रह कर खर्च करना ही पड़ता है. इस फिजूलखर्ची को ले कर नंदिनी की पति से रोज कहासुनी होने लगी. अजय ने उसे काफी समझाया, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ. रोजरोज झगड़े होने लगे तो नंदिनी को अजय के साथ रहना दुश्वार लगने लगा. आखिर उस ने अजय से अलग होने का फैसला कर लिया.

अजय ऐसा नहीं चाहता था, लेकिन वह भी नंदिनी की हरकतों से आजिज हो चुका था. इसलिए वह भी अलग होने को तैयार हो गया. अजय ने उसे एक निश्चित रकम दे कर पीछा छुड़ा लिया. दोनों बेटों के साथ नंदिनी 1996 में लखनऊ आ गई. यहां उस ने जानकीपुरम के सेक्टर 3 में एक तीनमंजिला मकान नंबर 407 खरीद लिया और उसी में अपने दोनों बेटों के साथ रहने लगी. उस ने घर में किराएदार भी रख लिए, जिस से उस का खर्च चलने लगा. लखनऊ में उस ने कुछ परिचितों की मदद से प्रौपर्टी डीलिंग का काम शुरू किया. यहां पारा थानाक्षेत्र में उस के बहनोई रहते थे, उन से भी उसे मदद मिलती थी.

धीरेधीरे नंदिनी का काम चल निकला. इस काम से उसे अच्छा मुनाफा होेने लगा. जल्दी ही उस का परिचय रसूखदारों, नेताओं और अधिकारियों से हो गया. महिला होने का उसे फायदा भी काफी मिला. हाईसोसायटी के लोगों में उठनाबैठना शुरू हुआ तो तरहतरह के लोगों से उस का वास्ता पड़ने लगा. नंदिनी उन के साथ रह कर शराब भी पीने लगी. वह अमर सिंह की पार्टी से भी जुड़ गई, जिस में उसे महिला लोकमंच का नगर अध्यक्ष बना दिया गया.

हाईसोसायटी में 2 चीजें प्रसिद्ध होती हैं, एक शराब और दूसरी शबाब. इस की वजह यह है कि ऐसे लोगों के पास पैसों की कमी तो होती नहीं. जब इंसान के पास अथाह पैसा होता है तो उस में ऐब आ ही जाते हैं. इन में सब से बड़े ऐब शराब और शबाब हैं. इन चीजों की जानकारी नंदिनी को भी हो गई. उस ने देखा, इस काम में बैठेबिठाए जितना पैसा मिलता है, उतना किसी काम में नहीं है. कमाई देख कर नंदिनी ने इस काम को अपनाने का फैसला कर लिया. उस के संपर्क में कुछ ऐसी लड़कियां थीं, जो पैसों की खातिर कुछ भी करने को तैयार थीं. नंदिनी ने उन से बात की तो वे चोरीछिपे यह काम करने को तैयार हो गईं. कुछ घंटों में हजारों कमाने की चाहत में वे लड़कियां इस दलदल में उतर गईं.

लड़कियों के आने के बाद नंदिनी उन की डीलिंग करने लगी. अपने संबंधों का फायदा उठा कर वह लोगों को पैसों के बदले लड़कियां होटलों या उन के बताए ठिकाने पर उपलब्ध कराने लगी. उस का यह धंधा दिन दूना रात चौगुना तरक्की करने लगा. इसी बीच नंदिनी ने देखा कि कई ग्राहक ऐसे होते हैं, जो होटलों में जाने का खतरा नहीं उठाना चाहते. ऐसे लोगों के लिए नंदिनी ने इंदिरानगर के सेक्टर 17 में मकान नंबर 646 किराए पर ले लिया. यह मकान एलआईसी में नौकरी करने वाले विनोद सिंह का था. इसी मकान में लोगों को लड़कियां मुहैया कराती थी. नंदिनी ग्राहकों से मिले रुपयों से 25 प्रतिशत लड़कियों को देती थी, बाकी खुद रख लेती थी.

इस के बाद वह अपने बेटों के साथ इंदिरानगर वाले मकान में शिफ्ट हो गई. यहां आने के बाद उस ने सैक्स वाला धंधा बंद कर दिया. उस ने जानकीपुरम वाला अपना मकान किराए पर उठा दिया था. धंधे के लिए उस ने राहुलविहार में एक मकान किराए पर ले लिया. वह अपना काम इतने गुपचुप ढंग से करती थी कि किसी को खबर नहीं लगती थी. उस के बेटों तक को इस बात की खबर नहीं थी कि उन की मां ने और भी कोई मकान किराए पर ले रखा है. थोड़ेथोड़े समय पर वह मकान  बदल देती थी.

चूंकि वह प्रौपर्टी डीलिंग के धंधे से जुड़ी थी, इसलिए उस के घर बड़ेबड़े लोगों का आनाजाना लगा रहता था. इस की वजह से आसपास के लोगों को उस पर शक नहीं होता था. यही वजह थी कि वह कभी पकड़ी नहीं गई. कोई भी मकान किराए पर लेने पर मकानमालिक सत्यापन कराता तो वह पाकसाफ निकलती. इसलिए आसानी से उसे मकान किराए पर मिल जाता था. दूसरी ओर नंदिनी के दोनों बेटे अपनी मां के कार्य से अंजान अपना कैरियर बनाने की कोशिश कर रहे थे. इस समय बड़ा बेटा संदीप माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय से मासकौम की पढ़ाई कर रहा है तो छोटा मनीष पीसीएस की तैयारी कर रहा है. नंदिनी ने स्पीक एशिया जैसी कंपनी में भी अपना पैसा लगा रखा था.

उस ने कई बीमे भी करा रखे थे. ये सारे बीमे उस ने चौक की पान वाली गली निवासी सोनिया मेहरोत्रा से कराए थे. 35 वर्षीया सोनिया एलआईसी एजेंट थी. उस का पति आजाद मेहरोत्रा भी एलआईसी एजेंट था. सोनिया के नंदिनी से इतने घनिष्ठ संबंध थे कि नंदिनी ने अपनी पहुंच से उसे कई मालदार आसामियों के बीमे कराए थे. लखनऊ के गोमतीनगर थानाक्षेत्र के विनीत खंड में अभिषेक कनौजिया उर्फ विस्सू रहता था. वह बाराबंकी के एक कालेज से बीकौम की पढ़ाई कर रहा था. उस के पिता अनिल कुमार कनौजिया लेखाविभाग में क्लर्क थे. कालेज के कुछ मित्रों की संगत में पड़ कर अभिषेक ने गलत राह पकड़ ली थी.

वह इतना खूबसूरत नहीं था कि कालेज की लड़कियां उस की ओर आकर्षित होतीं. दोस्तों के बीच हमेशा लड़कियों के बारे में बातें होती रहती थीं, लेकिन लड़कियों का सान्निध्य मिलना तो दूर, उन लोगों की तरफ कोई देखती तक नहीं थी. सभी दोस्त शराब और पोर्न फिल्मों के शौकीन थे. महंगे स्मार्टफोन पास में होने के कारण सोशल मीडिया के जरिए वे एकदूसरे को अश्लील फोटो व वीडियो क्लिप भेजते रहते थे. अभिषेक के कुछ दोस्त अपने तन की गरमी शांत करने के लिए कालगर्ल्स के पास भी जाने लगे थे.

कालगर्ल्स से मिलने वाले आनंद को वे दोस्तों के सामने आ कर बढ़ाचढ़ा कर बताते, जिस से अभिषेक के मन में भी वह आनंद पाने की चाहत जाग उठी. इस के लिए उस ने अपने बहराइच निवासी एक दोस्त सलमान से बात की तो उस ने उस की मुलाकात नंदिनी तिवारी से करा दी. सलमान नंदिनी के यहां मौजमस्ती करने जाता रहता था. अभिषेक की मुलाकात नंदिनी से हुई तो वह हर हफ्ते उस के यहां जाने लगा. नंदिनी उसे उस की पसंद की लड़की 2 घंटे के लिए अपने ही घर में उपलब्ध करा देती थी, बदले में उस से 8 से 10 हजार रुपए ले लेती थी. अभिषेक नंदिनी के मकान में शराब पीता और पसंद की हुई लड़की के साथ रंगरलियां मनाता.

धीरेधीरे अभिषेक ने इस मौजमस्ती में अपने सारे रुपए उड़ा दिए. जब उस के पास पैसे नहीं रहे तो उस ने दूसरों से कर्ज लेना शुरू कर दिया. वह शराब और सैक्स का इतना आदी हो गया था कि इन दोनों के बिना रह नहीं सकता था. कर्ज में लिए गए रुपए भी खत्म हो गए. ऐसी हालत में जब वह बिना पैसों के नंदिनी के यहां जाता तो नंदिनी उसे लड़कियों के सामने ही दुत्कारने लगती. जून, 2015 में नंदिनी ने किराए पर मकान दिलाने वाले ब्रोकर का पैंफ्लेट देखा तो उस में लिखे मोबाइल नंबर पर फोन किया और किराए का मकान दिलाने को कहा. उस ब्रोकर ने मूलरूप से सीतापुर निवासी प्रौपर्टी डीलर विनीत से नंदिनी को मिलवाया.

नंदिनी ने प्रौपर्टी डीलर विनीत को अपनी आईडी के तौर पर आधार कार्ड की छायाप्रति दी और कहा कि उस के पति बाहर नौकरी करते हैं और उस के 2 बच्चे हैं, जो स्कूल में पढ़ते हैं. यह झूठ बोल कर नंदिनी ने किसी तरह प्रौपर्टी डीलर को झांसे में ले लिया, जिस के बाद उस प्रौपर्टी डीलर ने नंदिनी को इंदिरानगर थानाक्षेत्र के राहुल विहार में पंकज कुमार सिंह का मकान 10 हजार रुपए मासिक किराए पर दिला दिया. मकान मालिक पंकज सिंह हरिद्वार में नौकरी करता था और परिवार के साथ रहता था. पंकज का भाई इंदिरानगर में रहता था, उसे ही हर महीने किराया देने की बात तय हुई.

इस मकान की देखभाल और आने वाले मेहमानों की आवभगत के लिए नंदिनी ने 8 अगस्त को पुनीता उर्फ खुशी को रख लिया. 30 वर्षीया खुशी नंदिनी के जानकीपुरम वाले मकान के पड़ोस में रहती थी. वहीं उस का नंदिनी से परिचय हुआ था. मूलरूप से बिहार निवासी पुनीता उर्फ खुशी तिवारी ने सीतापुर के संदना थानाक्षेत्र निवासी संजय यादव उर्फ छोटू से विवाह किया था. उस का 3 साल का बेटा था. संजय लखनऊ के विकासनगर थानाक्षेत्र की एक कपड़े की दुकान पर काम करता था. वह सुबह घर से निकलता था तो देर रात लौटता था.

इस मकान में 3 कमरे थे, जिन में से 2 कमरे बैडरूम और एक कमरा ड्राइंगरूम बना दिया गया. जो मिलने आता था, उसे ड्राइंगरूम में बैठा दिया जाता था और दोनों बैडरूम लोगों को लड़कियों के साथ मौजमस्ती के लिए मुहैया कराए जाते थे. नंदिनी इस मकान में अकसर दिन में आती थी, कभीकभी रात में भी रुक जाती थी.दूसरी ओर नंदिनी के तानों से आजिज अभिषेक ने उसे सबक सिखाने की ठान ली थी. उस ने अपनी मोटरसाइकिल खरगापुर निवासी सुरेंद्र बहादुर को 20 हजार रुपए में बेच दी और उसी पैसों से उस ने एक पिस्तौल खरीदी.

इस के बाद उस ने अपने दोस्त विनय चौहान से बात की. वह उस का साथ देने को तैयार हो गया. विनय गोमतीनगर में विनय खंड में रहता था. वह ताज होटल में वेटर था, लेकिन इधर उस ने नौकरी छोड़ दी थी.  9 सितंबर की सुबह अभिषेक ने नंदिनी को मिलने के लिए फोन किया तो उस ने उसे बुला लिया. लेकिन उस ने उसे अपने लिए वोदका शराब की एक बोतल लाने को कहा. अभिषेक ने नंदिनी के लिए वोदका शराब और अपने दोनों के लिए बीयर के 2 केन खरीदे. इस के बाद वह विनय के साथ औटो से नंदिनी के इंदिरानगर के राहुल विहार वाले मकान पर पहुंच गया.

अभिषेक ने नंदिनी के सामने आते ही पैर छुए. नंदिनी उन दोनों को ले कर बैडरूम में चली गई. उसी बीच उस ने खुशी से चायनाश्ता दे जाने के लिए कहा. नंदिनी से अभिषेक बातें करने लगा. खुशी चाय बना कर दे गई. तीनों ने चाय पी. इस के 15 मिनट बाद नंदिनी ने शराब पी तो अभिषेक और विनय ने बीयर पी. नंदिनी ने उन दोनों की बीयर में अपनी थोड़ी शराब भी डाल दी. तभी सोनिया जन्माष्टमी का प्रसाद देने आई. नंदिनी को 2 लड़कों से बातें करते देख वह ड्राइंगरूम में बैठ कर टीवी देखने लगी. जब शराब का नशा चढ़ा तो नंदिनी ने अभिषेक को ताना मारा कि उस के पास रुपए नहीं है तो वह क्यों चला आता है.

इस के बाद दोनों में कहासुनी होने लगी. नंदिनी से अभिषेक ने मारपीट की तो उस ने ड्राइंगरूम में बैठी खुशी और सोनिया को कमरे में बुला लिया. उस ने दोनों को कमरे में एक किनारे खड़ा कर दिया. विनय ने उन्हें कवर किया तो अभिषेक ने जेब से पिस्टल निकाल कर खड़ेखड़े कुर्सी पर बैठी नंदिनी को पास से गरदन के ऊपरी हिस्से में गोली मार दी, जो कि पीठ से बाहर निकल गई. नंदिनी घायल अवस्था में बेहोश हो गई. अभिषेक ने नंदिनी, खुशी और सोनिया के मोबाइल ले कर तोड़ दिए. अभिषेक को उन दोनों से खतरा नहीं था, क्योंकि वे उसे पहचानती नहीं थीं. फिर उन्हें कमरे में बंद कर के दोनों वहां से बाहर निकले और औटो से चले गए.

कमरे में एसी लगाने के लिए रोशनदान में गत्ता लगा हुआ था, जिसे हटा कर खुशी बाहर निकली और कमरे का दरवाजा खोल कर सोनिया को बाहर निकाला. इस के बाद उन्होंने नंदिनी के बेटे मनीष को घटना की सूचना दी. धीरेंद्र यादव ने अभियुक्तों की निशानदेही पर अंसल से हत्या में प्रयुक्त पिस्तौल बरामद कर ली. खुशी और सोनिया से हुई लूट की बात पुलिस जांच में गलत निकली. आवश्यक काररवाई के बाद दोनों को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया. Lucknow Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

True Crime Story: तेजाब की आंच से ताउम्र झुलसेंगे आरोपी

True Crime Story:अपनी प्रेमिका लावण्या को पाने के लिए हरदीप ने दोस्त के साथ मिल कर तेजाब कांड को अंजाम दिया. इस कांड के बाद उसे प्रेमिका तो नहीं मिली, लेकिन अदालत से ऐसी सजा जरूर मिल गई कि ताउम्र वह प्रेमिका से नहीं मिल सकेगा.

राकेश रेखी पंजाब पुलिस के रिटायर्ड एसपी देशराज के बेटे थे. मोहाली की फेज-1 मार्केट में रुद्राक्ष ग्रुप इमीग्रेशन नाम से उन की एक कंपनी थी. उन के दफ्तर में कई युवकयुवतियां काम करते थे. धार्मिक विचारों के राकेश जब भी माता चिंतपूर्णी देवी मंदिर जाते, अपने औफिस के कुछ कर्मचारियों को भी साथ ले जाते थे. पहली सितंबर, 2011 को भी एक कार्यक्रम बना कर अपनी फोर्ड आईकान कार नंबर सीएच03जे 2042 से माता चिंतपूर्णी देवी मंदिर के लिए निकले. इस बार भी वह अपने साथ औफिस से 4 जनों को ले गए थे. कार वह खुद चला रहे थे.

स्टाफ की 25 वर्षीया स्वातिका उन के बगल वाली सीट पर बैठी थी, जबकि 24 वर्षीया शिवालिका कार की पिछली सीट पर थी. स्टाफ के 2 लोग शेर खान और नवनीत इन के पीछे दूसरी गाड़ी में आ रहे थे. राकेश को अपनी गाड़ी में पैट्रोल भरवाना था, इसलिए वह राष्ट्रीय राजमार्ग-21 पर मोहाली और खरड़ के बीच स्थित एक पैट्रोल पंप पर चले गए. उस समय शाम के करीब 5 बजे थे, वह अकसर उसी पैट्रोल पंप पर कार में पैट्रोल भरवाने जाते थे. पैट्रोल टैंक फुल करवाने के बाद पेमेंट करने के लिए उन्होंने खिड़की का शीशा नीचे किया कि तभी उन के ऊपर जैसे कहर बरपा गया.

विपरीत दिशा से 2 बाइक सवार उन की कार के पास पहुंचे. आगे वाले ने हैलमेट लगा रखा था, जबकि दूसरा बिना हैलमेट के था. उस के हाथ में 5 लीटर की कैन थी, जिस का ऊपरी हिस्सा कटा हुआ था. जो शख्स कैन पकड़े था, वह राकेश के एकदम पास आ गया. राकेश को यह सब अजीब सा लगा. वह उस से कुछ बोलने को हुए, तभी उस युवक ने कैन में भरा तरल पदार्थ कार के अंदर बैठी युवतियों पर फेंक दिया. तरल पदार्थ फेंक कर वह युवक उसी बाइक से फरार हो गया. इस के बाद तो कार के भीतर चीखपुकार मच गई.

राकेश भी कराह उठे. कार का दरवाजा खोल कर वह बाहर आ गिरे थे. वह दर्द से तड़प रहे थे. कार के अंदर बैठी दोनों युवतियां भी चीखतीचिल्लाती हुई कार से बाहर निकल आई थीं. जरा सी देर में बात साफ हो गई कि बाइक सवारों द्वारा उन पर जो तरल पदार्थ डाला गया था, वह तेजाब था. उन का मुख्य निशाना वह लड़की थी, जो राकेश के बगल वाली सीट पर बैठी थी. वही तेजाब से सब से ज्यादा झुलसी थी. इस घटना के बाद पैट्रोल पंप पर भी अफरातफरी मच गई. कार में से बह कर तेजाब फर्श पर फैलने लगा था, जिस पर पैट्रोल पंप कर्मियों ने फोम डाल दी, ताकि अफरातफरी में वहां कोई फिसल कर न गिरे. पैट्रोल पंप कर्मियों ने इस घटना की सूचना पुलिस को दी और तीनों घायलों को पीजीआई अस्पताल ले गए.

सूचना मिलते ही थाना बलौंगी के थानाप्रभारी भूपेंद्र सिंह अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. बाद में खरड़ के डीएसपी सुखदेव सिंह विर्क और मोहाली के एसएसपी गुरप्रीत सिंह भुल्लर भी मौकाएवारदात पर पहुंच गए. पुलिस ने घटनास्थल पर मौजूद राकेश के कर्मचारी शेर खान और पैट्रोल पंप कर्मियों से घटना के बारे में पूछताछ की. घायलों से मिलने के लिए पुलिस अधिकारी पीजीआई अस्पताल भी गए और शेर खान की तरफ से अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज कर ली. एसपी ने इस सनसनीखेज मामले को सुलझाने के लिए डीएसपी सुखदेव सिंह विर्क के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई.

पुलिस ने पैट्रोल पंप पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की जांच शुरू की. इस में बाइक और उस पर सवार 2 लोग दिखाई तो दे रहे थे, मगर न तो बाइक का नंबर साफ पढ़ने में आ रहा था और न ही उस पर बैठे लड़के किसी की पहचान में आ रहे थे. घटना की सूचना पा कर राकेश की कंपनी के कई कर्मचारी अस्पताल और थाने पहुंचे. पुलिस ने उन्हें सीसीटीवी फुटेज दिखाई तो उन्होंने बताया कि तेजाब फेंकने वाला युवक उन के औफिस में काम करने वाली स्वातिका का बौयफ्रैंड हो सकता है. इस वारदात में स्वातिका भी झुलस चुकी थी, इसलिए पुलिस ने भी यही अनुमान लगाया कि शायद उस लड़के ने प्यार में नाकाम होने पर स्वातिका को निशाना बनाया होगा.

पुलिस ने जांच की तो पता चला कि स्वातिका का वह कथित बौयफ्रैंड पहले गुड़गांव में काम करता था, बाद में वह डेरा बस्ती की किसी फैक्ट्री में नौकरी करने लगा था. लेकिन इन दिनों उस के चंडीगढ़ में काम करने की जानकारी मिली. बिना नामपते के उस के पास पहुंचना आसान नहीं था. पुलिस ने स्वातिका की सहेलियों से इस बारे में पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि स्वातिका की उस लड़के से बोलचाल थी, वह उसे प्रपोज भी करने लगा था लेकिन स्वातिका उसे खास पसंद नहीं करती थी. फिर वह अकसर उसे परेशान करने लगा था. स्वातिका ने जब उस के प्रति अपना रुख सख्त किया तो वह उसे देख लेने की धमकियां भी देने लगा था.

पुलिस ने उन सभी सहेलियों से कहा कि वह उस के कथित बौयफ्रैंड का नामपता जुटाने में पुलिस का सहयोग करें. संदर्भवश बता दें कि 80 के दशक में सर्वथा पहली बार यह तेजाबकांड सुर्खियों में तब आया था, जब मध्यप्रदेश के जिला जबलपुर में एक सिरफिरे ने अपनी प्रेमिका के चेहरे पर तेजाब उड़ेला था. उसे अपनी प्रेमिका पर शक था कि उस के संबंध किसी और से हैं. हालांकि उस समय निजी न्यूज चैनल नहीं थे, इस के बावजूद भी इस घटना से पूरे देश में सनसनी फैल गई थी. इस के बाद तो देश भर में इस तरह की घटनाएं जैसे आम हो गईं. मजबूरन सरकार को तेजाब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाना पड़ा.

खैर, इस ताजा केस में तेजाब के हमले से 3 लोग घायल हो गए. स्वातिका 80 प्रतिशत, शिवालिका 10 प्रतिशत और राकेश रेखी 40 प्रतिशत झुलस चुके थे. तीनों पीजीआई के इमरजेंसी वार्ड में भरती थे. पुलिस अभी तक उन के बयान नहीं ले पाई थी. फिलहाल अनुमान यही लगाया जा रहा था कि यह एकतरफा प्यार का मामला है. साफ नजर आ रहा था कि स्वातिका के उन्मादी प्रेमी का निशाना वही थी, बाकी दोनों तो उस के साथ बैठे होने की वजह से लपेटे में आ गए थे. स्वातिका के कथित प्रेमी का पता लगाने को पुलिस ने अपने मुखबिर भी सक्रिय कर दिए थे. मुखबिरों से ही पता लग गया कि जिस शख्स ने तेजाब फेंका था, उस का नाम भावेश है और वह चंडीगढ़ के सेक्टर-49 का रहने वाला है.

एसएसपी के आदेश पर सीआईए इंसपेक्टर गुरचरन सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम भावेश की तलाश में उस के घर पहुंच गई. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. अगले दिन एक गुप्त सूचना के आधार पर सीआईए टीम ने भावेश को चंडीगढ़ से गिरफ्तार कर लिया. रातभर उस से व्यापक पूछताछ की गई. इस पूछताछ में पता चला कि वह भारतीय जीवन बीमा निगम में एजेंट था. डेढ़ साल पहले स्वातिका भी एलआईसी की उसी शाखा में एजेंट थी. एक ही जगह काम करने की वजह से दोनों की आपस में मुलाकात होती रहती थी.

उसी दौरान भावेश ने स्वातिका से प्यार का इजहार कर दिया. स्वातिका ने साफ कह दिया कि वह प्यारव्यार के चक्कर में न पड़ कर, अपने संबंध केवल दोस्ती तक ही सीमित रखना चाहती है. लेकिन भावेश तो जैसे उस के पीछे हाथ धो कर पड़ गया. तब स्वातिका ने परेशान हो कर एलआईसी का काम ही करना बंद कर दिया. इस के बाद वह राकेश रेखी के यहां नौकरी करने लगी. भावेश को जब पता चला तो वह उस का वहां भी पीछा करने लगा. अपनी एकतरफा प्यार की कहानी तो भावेश ने तमाम शिद्दत से सुना दी. लेकिन पुलिस द्वारा अपने सभी तरीकों से पूछताछ कर लेने पर भी वह यही दोहराता रहा कि स्वातिका पर तेजाब फेंकने में उस का कोई हाथ नहीं है.

उस ने भावुक हो कर कहा था, ‘‘सर, स्वातिका को मैं अपनी जान से ज्यादा चाहता हूं. उसे नुकसान पहुंचाने की तो मैं कभी सपने में भी नहीं सोच सकता. मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि उस के साथ ऐसी दुश्मनी निभाने की हिमाकत किस ने की.’’

गहन पूछताछ कर के इंसपेक्टर गुरचरन सिंह को वह बेकुसूर लगा तो उन्होंने हिदायत दे कर उसे घर भेज दिया. पुलिस ने जिस एंगल से जांच करनी शुरू की थी, वहां से कोई सफलता नहीं मिल पाई. पुलिस ने स्वातिका के घर वालों से भी बात की, लेकिन वहां से भी कोई खास जानकारी नहीं मिली. उसी दौरान पुलिस को मुखबिर से एक खास जानकारी मिली. उस सूचना पर पुलिस ने काम किया तो 16 सितंबर, 2011 को 2 ऐसे आदमी पुलिस के हत्थे चढ़ गए, जिन्होंने पुलिस की प्रारंभिक पूछताछ में स्वीकार कर लिया कि उन्होंने ही इस तेजाब कांड को अंजाम दिया था.

उन्होंने बताया कि उन का निशाना कोई और न हो कर राकेश रेखी था. दोनों लड़कियां तो राकेश के साथ कार में बैठी होने की वजह से लपेटे में आ गई थी, जिस का उन्हें भारी अफसोस हुआ. उन दोनों से की गई पूछताछ से जो खुलासा हुआ वह इस तरह से था कि गांव देसूमाजरा के रहने वाले हरदीप सिंह उर्फ दीपा और जगवंत सिंह उर्फ बिट्टू आपस में गहरे दोस्त थे. बिट्टू अपना निजी कारोबार करता था और दीपा मोहाली के कस्बे कुराली में अपना नशामुक्ति केंद्र चलाता था. एक बार एक औरत अपने शराबी पति के साथ उस की शराब छुड़ाने की दरकार को ले कर दीपा के नशामुक्ति केंद्र आई. वह औरत इतनी खूबसूरत थी कि पहली ही नजर में हरदीप उर्फ दीपा का उस पर दिल आ गया. खूबसूरती के अनुरूप उस का नाम भी निहायत खूबसूरत था— लावण्या.

हरदीप अभी कुंवारा था और लावण्या शादीशुदा थी. उस से बात करने के बाद हरदीप अपने दिल पर काबू नहीं रख सका. लावण्या तो जैसे सीधे उस के दिल में उतर कर उस के तनमन को सराबोर कर गई थी.  उस के पति को हरदीप ने अपने नशामुक्ति केंद्र में भरती कर लिया. इस के बाद वह लावण्या से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश करने लगा. उसे विश्वास में लेने के लिए उस ने उसे यह गारंटी दे दी थी कि आने वाले चंद महीनों में वह उस के पति में इतना सुधार कर देगा कि वह कभी शराब को हाथ नहीं लगाएगा. हरदीप की बात सुन कर लावण्या बहुत खुश हुई. बाद में वह 4-5 दिन पर पति के हालचाल जानने के लिए उस के नशामुक्ति केंद्र आने लगी. बीच में भी वह फोन कर के हरदीप से पति की जानकारी लेती रहती थी.

इस तरह लावण्या और हरदीप एकदूसरे के करीब आते गए. नशेड़ी पति के बजाय उस का झुकाव हरदीप की तरफ बढ़ता गया. लावण्या राकेश लेखी की कंपनी में काम करती थी. लावण्या का पति पुराना नशेड़ी था. इसलिए उस का नशा इतनी जल्दी नहीं छूट सकता था. इसलिए हरदीप को भरोसा था कि इस बीच वह लावण्या को अपने प्रेमजाल में फांस कर उस के पति से तलाक दिलवा कर उसे अपनी बना लेगा. इस तरह दोनों का मिलनाजुलना जारी रहा. लावण्या ने एक दफा हरदीप को मुलाकात का समय दे दिया. हरदीप निश्चित जगह पर उस का इंतजार करने लगा. काफी देर इंतजार के बाद भी वह उस से मिलने नहीं आई. हरदीप ने जब उसे फोन किया तो उस का फोन भी स्विच्ड औफ मिला. इस से हरदीप को गुस्सा आ गया.

अगले दिन लावण्या ने ही हरदीप को फोन कर के मुलाकात न हो पाने की मजबूरी बताई. उस ने कहा कि उस का बौस राकेश रेखी मां चिंतपूर्णी देवी मंदिर जाता है तो कंपनी के कुछ कर्मियों को अपने साथ ले जाता है. इस के लिए कोई इनकार नहीं करता. इस दफा उस ने एकदम अंतिम समय पर उसे साथ चलने को कहा. वह उसे मना नहीं कर पाई और अपना मोबाइल स्विच्ड औफ कर उस के साथ चली गई. अभी तक तो हरदीप को अपनी प्रेमिका लावण्या पर नाराजगी थी. पर जब उसे पता चला कि इस में गलती लावण्या की नहीं, बल्कि उस के बौस राकेश रेखी की है तो उस का खून खौल उठा. राकेश जब भी कहीं बाहर जाते तो लावण्या को अपने साथ जरूर ले जाते थे.

इस से हरदीप राकेश को अपना जानी दुश्मन समझने लगा. मन ही मन उन्हें सबक सिखाने की ठान ली. इस बारे में अपने खास दोस्त जगवंत सिंह बिट्टू से बात की तो वह उस का साथ देने को तैयार हो गया. दोनों ने राकेश को सबक सिखाने के लिए एक फूलपू्रफ योजना बना ली. हरदीप ने मोहाली की एक दुकान से तेजाब खरीदा. फिर उसे ऊपर से कटी हुई कैन में डाल लिया, ताकि वह आसानी से डाला जा सके. फिर योजना को अंजाम देने का मौका ढूंढने लगा. उसे पता चला कि पहली सितंबर को राकेश ने चिंतपूर्णी देवी जाने का प्रोग्राम बनाया है और इस बार वह लावण्या के बजाय अन्य लोगों को ले जा रहे हैं.

हरदीप औफिस से राकेश के निकलने का इंतजार करने लगा. वह मौका उसे पैट्रोल पंप पर उस समय मिल गया, जब राकेश ने पैट्रोल के पैसे देने के लिए खिड़की खोली. लेकिन जैसे ही उस ने राकेश को निशाना बना कर तेजाब फेंका, राकेश ने अपना चेहरा पीछे हटा लिया, जिस से निशाना अगली सीट पर बैठी स्वातिका बन गई. राकेश के बजाय दोनों युवतियों के जख्मी होने का हरदीप को बहुत अफसोस हुआ. दोनों अभियुक्तों से पूछताछ पूरी कर पुलिस ने उन्हें अदालत पर पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

उधर अस्पताल में भरती देहरादून की रहने वाली स्वातिका की हालत बिगड़ती जा रही थी. इन्फैक्शन बढ़ जाने के कारण 19 सितंबर को उस की अस्पताल में ही मौत हो गई. उस की मौत हो जाने के बाद पुलिस ने इस केस में धारा 302 भी बढ़ा दी. तेजाब की वजह से राकेश रेखी की एक आंख की रोशनी चली गई और उन के जिस्म पर इतनी सर्जरी हुई कि इस की गिनती उन्हें भी नहीं मालूम. बिना सहारे के वह कहीं आजा भी नहीं सकते. 90 दिनों के भीतर पुलिस ने दोनों अभियुक्तों के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर इलाका मैजिस्ट्रेट के सामने पेश कर दिया, जहां से सैशन कमिट हो कर यह केस मोहाली के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश परमिंदरपाल सिंह की अदालत में चला.

विद्वान न्यायाधीश ने दोनों पक्षों को तमाम तवज्जो दे कर सुना और सभी साक्ष्यों को विधिपूर्वक जांचापरखा. अभियोजन पक्ष की ओर से 48 गवाहों ने अपने बयान अदालत में दर्ज करवाए. 27 मई, 2015 को इस केस का फैसला सुना दिए जाने की उम्मीद थी. दोनों अभियुक्तों को सुबह ही अदालत में बैठा दिया गया था. उस दिन इस चर्चित केस की सुनवाई कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच हुई. अदालत के भीतरबाहर दोनों पक्षों की हिफाजत के लिए बाऊंसरों की भरमार थी. पुलिस द्वारा भी अदालत में आनेजाने वाले लोगों पर कड़ी नजर रखी जा रही थी. किसी को भी बिना पर्याप्त चैकिंग व पूछताछ के भीतर नहीं जाने दिया जा रहा था. राकेश रेखी अभी तक भी पूरी तरह ठीक नहीं हुए थे. वह अपने वकीलों के साथ अदालत में हाजिर थे.

सक्षम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश परमिंदरपाल सिंह ने उस दिन दोनों अभियुक्तों को धारा 302 एवं 307 का दोषी करार देते हुए 29 मई को सजा सुनाए जाने की बात कही. तब तक के लिए दोषियों को वापस जेल भिजवाने के आदेश दिए. 3 पुलिसकर्मी दोनों अभियुक्तों को ले कर कोर्ट रूम से बाहर निकले. वहां मीडिया के कुछ लोग खड़े थे, जिन्हें देखते ही दोनों अभियुक्तों ने पुलिस वालों से अपने हाथ छुड़वा कर मीडियाकर्मियों पर ही हमला बोल दिया. इस हमले में फोटो जर्नलिस्ट अमित वालिया की इन्होंने काफी पिटाई कर दी. बाद में इस पत्रकार ने इस संबंध में न केवल पुलिस को शिकायत दी, बल्कि अदालत को भी घटना के बारे में लिख कर दिया.

बहरहाल, 29 मई, 2015 को विद्वान एवं सक्षम जज परमिंदरपाल सिंह ने हरदीप सिंह उर्फ दीपा व जगवंत सिंह उर्फ बिट्टू को उक्त केस में ताउम्र कैद की सजा के अलावा 5-5 लाख रुपयों का जुरमाना भी किया. इस राशि में 4.60 लाख रुपए मृतका के परिजनों व 4.60 लाख राकेश रेखी को अदा करने के साथ 80 हजार रुपए सरकारी खजाने में जमा कराने के आदेश दिए. 29 मई, 2015 को दोनों अभियुक्तों को सजा सुनाई जानी थी. उस दिन मोहाली अदालत का परिदृश्य बाकी दिनों से एकदम अलग था. चारों तरफ पुलिस ही पुलिस नजर आ रही थी. दोनों अभियुक्तों के परिजन व अनेक दोस्त भी वहां पहुंचे थे. राकेश की हालत दयनीय थी, इस के बावजूद भी 50 बाउंसरों के घेरे में वहां आए हुए थे. वह अदालत के फैसले से बहुत खुश हुए.

उन का कहना था कि जिस लड़ाई को वह पिछले 4 सालों से जारी रखे हुए थे, उस का परिणाम संतोषजनक निकला. जिन लोगों ने एक युवती की जान लेने के साथ उन्हें जिंदा लाश बना कर रख दिया, उसे देखते हुए ऐसी सख्त सजा उन्हें मिलनी ही चाहिए थी. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

लावण्या नाम परिवर्तित है.

Thriller Hindi Story: प्रेम कहानी का स्याह रंग

Thriller Hindi Story: अति की आजादी मिलने पर बच्चों का बिगड़ जाना कोई बड़ी बात नहीं है. कारा भी अपने मातापिता की लापरवाही से बिगड़ी थी. मांबाप यह तो जानते थे कि गलत राह पर उठे पैरों को रोकना संभव नहीं है, उन्हें यह पता नहीं था कि वह किस हद तक जा सकती है. उस दिन मौसम का मिजाज बहुत खुशगवार था. शाम को भी यही स्थिति बनी रही.देखतेदेखते शाम सिमट गई और डूबते सूरज को अलविदा कह कर अंधेरे ने अपनी चादर फैला दी.

आसमान साफ था. छोटेबड़े सभी तारे जगमगाने लगे थे. चांद ने भी कुछ पल पहले अपने आने की आहट दे दी थी. चांदनी रात थी. हवा ऐसे गायब थी, जैसे चलना ही भूल गई हो. हवा बंद होने की वजह से लंबेघने दरख्तों पर झुंड में सिर से सिर जोड़े पत्ते भी खामोश थे. चारों तरफ सन्नाटा पसरा था. ठंड अपने यौवन पर थी, जिस के कारण लोग अपने घरों में दुबके हुए थे. उसी शांत वातावरण में कहकहों की कई आवाजें एक साथ गूंजीं. यह आवाजें बोर्डन हाऊस नाम की एक विशाल इमारत के मुख्य दरवाजे से आई थीं. यहां माइकम बोर्डन अपनी पत्नी कैथरीन बोर्डन और 3 बच्चों के साथ रहते थे. बड़ी बेटी कैटीलिन 15 साल की थी, उस से छोटी कारा 14 साल की तो सब से छोटा बेटा जेम्स महज 11 साल का था.

आज जेम्स की पहली गर्लफ्रैंड पहली बार घर आई थी. इस खुशी को सेलीब्रेट करने के लिए घर में छोटी सी पार्टी रखी गई थी. जब जेम्स की फ्रैंड जाने लगी तो सभी उसे विदा करने दरवाजे तक आए थे. तभी किसी ने कुछ ऐसा कह दिया था कि सभी दिल खोल कर हंस पड़े थे. इसी हंसीखुशी भरे माहौल को बीते एक घंटा भी नहीं हुआ था कि बोर्डन हाऊस से फिर एक के बाद एक 2 आवाजें गूंजीं. ये आवाजें गोलियां चलने की थीं. गोलियों की आवाजें सुन कर पड़ोसियों की नींद उड़ गई. सभी उस ओर भागे. जरूर बोर्डन हाऊस में कोई हादसा पेश आया था. हादसा वाकई दिल दहला देने वाला था. लोगों ने अंदर जा कर देखा तो मुंह से चीख निकल गई.

सामने माइकल और कैथरीन की लाशें पड़ी थीं, जबकि जेम्स और कैटीलिन कोने में सहमेदुबके बैठे थे. माइकल और कैथरीन की हत्या गोली मार कर की गई थी. इसी बीच किसी ने इस मामले की सूचना पुलिस को दे दी. कुछ ही देर में पुलिस वहां आ पहुंच गई. घटनास्थल और दोनों लाशों का निरीक्षण करने के दौरान पाया गया कि माइकल को गोली सिर के पीछे और कैथरीन को माथे पर मारी गई थी. लगता था, इस दोहरे हत्याकांड को एक सोचीसमझी योजना के तहत अंजाम दिया गया था. हत्यारे का उद्देश्य लूटपाट नहीं था, बल्कि कोई दुश्मनी थी या गहरी खुन्नस.

पुलिस ने कोने में सहमेदुबके बैठे जेम्स और कैटीलिन के सिर पर प्यार से हाथ फेरा तो दोनों फफकफफक कर रो पड़े. पूछने पर कैटीलिन ने बताया कि उस ने न केवल हत्यारे को अच्छी तरह से देखा था, बल्कि वह उसे पहचानती भी थी. हत्यारा कोई और नहीं, उस की बहन कारा का प्रेमी डेविड था. उस ने रोते हुए कहा, ‘‘वह कारा को भी साथ भगा कर ले गया है.’’

‘‘पर उस ने ऐसा क्यों किया?’’ पुलिस का सवाल था.

‘‘मम्मीपापा डेविड को पसंद नहीं करते थे. वह कारा को भी उस से नहीं मिलने देते थे.’’ कैटीलिन ने कहा, ‘‘वह कह रहा था कि कारा को कहीं दूर भगा ले जाएगा.’’

पुलिस ने अंदाजा लगाया कि माइकल और कैथरीन की हत्या कर के डेविड ने कारा का अपहरण कर लिया है और वह उसे हवाई जहाज द्वारा कहीं दूर ले जाएगा. इसी सब के चलते दोनों लाशों को आननफानन में पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. साथ ही सभी हवाई अड्डों को डेविड और कारा का हुलिया बताते हुए सचेत कर दिया गया कि दोनों दिखाई दें तो उन्हें रोक लिया जाए और पुलिस को सूचना दे दी जाए. शहर के सभी बार्डर पर तैनात पुलिस को भी सूचना दे दी गई. टीवी चैनलों पर भी यह खबर प्रसारित करवा दी गई कि एक 18 साल का युवक 2 हत्याएं कर के एक नाबालिग लड़की को भगा ले गया है. डेविड की फोटो तो नहीं मिल पाई थी, अलबत्ता कारा की फोटो जरूर चैनलों पर प्रसारित करवाई गई.

यह घटना 13 नवंबर, 2008 की रात की थी. पुलिस डेविड और कारा की खोज में जुटी थी. अगले दिन यानी 14 नवंबर को इंडियाना स्टेट में एक बीली विली कार तेज गति से सड़क पर दौड़ती दिखाई दी. इसे एक लड़का चला रहा था, जबकि लड़की उस की बगल वाली सीट पर बैठी थी. संभवत: यह कारा ही थी. इंडियाना अथौरिटी पुलिस उन का पीछा करने लगी. पुलिस ने कई बार कार को रोकने का संकेत भी दिया, पर कार नहीं रुकी. इस से यह बात पुख्ता हो गई कि वे दोनों डेविड और कारा ही थे. पुलिस करीब 5 किलोमीटर तक पुलिस कार का पीछा कर चुकी थी, पर कार नहीं रुकी थी. कार शहर से बाहर जंगलों में गुजर रही थी कि इसी दौरान संतुलन न रख पाने के कारण एक पेड़ से टकरा गई.

पुलिस की जीप वहां से थोड़ी दूरी पर थी, तभी पुलिस ने देखा कि कार के आगे की तरफ के दोनों दरवाजे खुले और एक तरफ से एक लड़का और दूसरी तरफ से एक लड़की बाहर निकली. दोनों भाग पाते, इस से पहले ही पुलिस वहां पहुंच गई और दोनों को हिरासत में ले लिया. ये दोनों कारा और डेविड ही थे. कार आगे से क्षतिग्रस्त हो गई थी, पर कारा और डेविड सुरक्षित थे. उन्हें खरोंच तक नहीं आई थी. डेविड को उसी समय गिरफ्तार कर लिया गया. कारा को बरामद कर के उस के एक रिश्तेदार के पास भेज दिया गया, जहां अनाथ हो चुके उस के भाईबहन भी रह रहे थे. अगले दिन डेविड को अदालत में पेश कर के उसे 2 हत्याओं और एक लड़की के अपहरण के जुर्म में जेल भेज दिया गया.

इस मामले की तफ्तीश इंडियाना अथौरिटी पुलिस कर रही थी. कई सप्ताह की तफ्तीश के बाद एक चौंका देने वाला सच सामने आया कि डेविड और कारा एकदूसरे से बेइंतहा प्यार करते थे. कारा को डेविड ने भगाया नहीं था, बल्कि वह खुद उस के साथ भागी थी. इतना ही नहीं उस के मांबाप का कत्ल भी उस की सहमति से उसी की मौजूदगी में किया गया था. यह जानकारी डेविड और कारा के इंटरनेट पर ब्लौगों को जांचने के बाद सामने आई थी. कारा के ब्लौग से साफ हो गया था कि वह अपनी मर्जी से डेविड के साथ भागी थी. अपने पिता माइकल और मां कैथरीन की हत्या की साजिश कारा ने डेविड के साथ रची थी. इतना ही नहीं, घटना वाले दिन कारा ने उसे फोन पर घटना को अंजाम देने को भी कहा था.

घटना के समय वह भी कमरे में मौजूद थी और डेविड को आंखों ही आंखों में इशारा कर रही थी कि वह फौरन उस के पिता व मां की हत्या कर दे. जैसे ही डेविड ने उस के पिता माइकल की हत्या की, कारा अंदर से दौड़ कर बाहर खड़ी डेविड की कार के पास आ गई थी और उस का इंतजार करने लगी थी. जब डेविड उस के पिता के बाद मां कैथरीन की हत्या कर के कार के पास आया तो कारा ने उस से कहा, ‘‘अब जल्दी यहां से भाग चलो, वरना पकड़े जाओगे. मैं आजाद होना चाहती हूं.’’

यह जानकारी पुलिस के लिए चौंका देने वाली थी. वह सहज ही विश्वास नहीं कर पा रही थी कि एक 14 साल की मासूम लड़की इतनी बड़ी घटना को अंजाम दिलवा सकती है. पर यही सच था. कारा ने अपने मातापिता का कत्ल क्यों करवाया, यह बात अभी साफ नहीं हो पाई थी. खैर, पुलिस ने डेविड को एक बार फिर से अदालत में पेश किया. अब उस पर से कारा के अपहरण का आरोप हटा दिया गया था. जबकि दूसरी तरफ कारा को पुलिस हिरासत में ले लिया गया था. डेविड अब भी यही दोहराए जा रहा था कि उस ने कोई कत्ल नहीं किया. पर जब सबूत खुद बोलने लगे तो उस की जुबान खामोश हो गई. उस ने कुछ देर के बाद चुप्पी तोड़ी,

‘‘हां, मैं ने ही किया था कारा के मांबाप का कत्ल. यह अपराध मैं ने कारा के कहने पर किया था.’’ इस के साथ ही उस ने वह हैंडगन भी बरामद करवा दी, जिस से उस ने दोनों कत्ल किए थे.

इधर कारा भी शुरुआती दौर में यह मानने को कतई तैयार नहीं थी कि उस ने ही अपने मांबाप का कत्ल करवाया है. उस ने कहा, ‘‘यह सच है कि डेविड मेरा बौयफ्रैंड है, पर मैं ने उसे कभी नहीं कहा कि वह मेरे मम्मीपापा की हत्या कर दे. यह उसी की चाल थी. उस ने घटना को अंजाम देने के बाद मेरा भी अपहरण कर लिया था.’’

कारा के बयान पर पुलिस को हंसी आ रही थी, क्योंकि उस के खिलाफ पुख्ता सबूत थे. बावजूद इस के वह सफेद झूठ बोल रही थी. खैर, पुलिस ने उसे भी अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. डेविड के बयान और कारा के ब्लौग पर उस के द्वारा लिखी इबारत और डेविड के साथ की गई उस की फोन पर बातचीत की जांच के बाद इस हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह चौंका देने वाली थी. कारा अपने मातापिता की दूसरे नंबर की संतान थी. पिता माइकल पेशे से स्कूल टीचर थे, साथ ही चर्च के प्रमुख कार्यकर्ता भी. मां कैथरीन भी पढ़ीलिखी थी, पर उस ने कोई नौकरी न कर के अपनी सारी शिक्षा अपने बच्चों की परवरिश और उन्हें अच्छे संस्कार देने में लगा दी थी.

घर का माहौल धार्मिक था. बावजूद इस के जाने कहां संस्कारों में कमी रह गई थी कि 14 साल की कारा सब कुछ नजरअंदाज कर अपने अलग ढंग से जीने लगी थी. कारा खूबसूरत तो थी ही, उम्र से पहले ही समझदार और जवान भी हो गई थी. जिस उम्र में बच्चे स्कूल और अपनी किताबों के अलावा कुछ सोचते भी नहीं, उस उम्र में कारा डांस बार में जाने लगी थी. संगीत से उसे बेहद प्रेम था. वह चाहती थी कि रात भर संगीत की धुन पर नाचती रहे. बार में एक युवक गिटार बजाता था. उम्र में वह कारा से दोगुना था.

बावजूद इस के वह उस के गिटार बजाने पर ही नहीं, उस पर भी मुग्ध हो गई थी. वह घंटों उस गिटारवादक को बिना पलक झपकाए निहारती रहती थी. वह कल्पना करती थी कि वह अपने स्पर्श से उस के मन और तन की तरंगों को इस तरह छेड़े कि नसनस में आनंद प्रवाहित हो जाए. वह गिटारवादक भी कारा की चाहत से अंजान नहीं था. इसीलिए उस ने उस के साथ नजदीकी बढ़ाई. धीरेधीरे दोनों ने शारीरिक सुख भी हासिल करना शुरू कर दिया. हर मिलन में चरम पर पहुंचने के बाद कारा कहती थी, ‘‘तुम वाकई अद्भुत कलाकार हो. संगीत से मेरे मन को तृप्त करते हो तो एकांत में मेरे रोमरोम में आनंद भर देते हो.’’

सब ठीक चल रहा था, लेकिन उस के प्रति कारा का मोह ज्यादा दिन कायम नहीं रह पाया. कारण, उस गिटारवादक के कई अन्य लड़कियों के साथ भी संबंध थे, जिन्हें कारा ने खुद अपनी आंखों से देखा था. इस कारण वह जब भी उस के साथ किसी लड़की को देखती तो बुरी तरह जलभुन जाती थी. धीरेधीरे जब उस की जलन नफरत में बदल गई तो कारा ने उस से किनारा कर लिया. संयोग से इसी दौरान डांस बार भी बंद हो गया. कुछ दिन तो कारा घर में कैद रही, पर जब फिर से उसे उस युवक के साथ बिताए देहसुख के पल याद आने लगे तो वह तड़पने लगी.

उस की तलाश में उस ने शहर के तमाम डांस बार छान मारे, पर उस का कुछ पता नहीं चला. इस पर कारा ने उसे भुलाने के लिए इंटरनेट का सहारा लिया. वह घंटों कंप्यूटर पर बैठी इंटरनेट खोल कर लड़कों से चैटिंग करती रहती. चैटिंग के दौरान ही उसे डेविड से मोहब्बत हो गई. दोनों के खयालात एक जैसे ही थे. इस लिए दोनों को नजदीक आते देर नहीं लगी. दोनों एकदूसरे को दिन में कईकई बार ईमेल भेज कर अपनी मोहब्बत का इजहार करने लगे. दोनों ने मेल के जरिए अपनीअपनी फोटो भी एकदूसरे को भेज दी थी.

जब कारा को पता चला कि डेविड भी उसी शहर में रहता है तो उस ने उस का मोबाइल नंबर ले लिया. रात के समय जब घर के सभी सदस्य सो जाते तो वह घंटों डेविड से मोबाइल पर बात करती. दोनों के बीच होने वाली बात अब सामान्य नहीं रह गई थी. दोनों जहां एकदूसरे से अश्लील बातें करते, वहीं एकदूसरे को शारीरिक सुख देने की चाहत का भी इजहार करते. इसी बीच एक दिन दोनों ने पिकनिक पर जाने का प्रोग्राम बना लिया. दोनों पहली बार शहर से दूर एक पिकनिक स्पाट पर मिले. पहली नजर में ही एकदूसरे को देखने के बाद दोनों ने कबूल किया कि उन की पसंद गलत नहीं थी. मोहब्बत कर के उन्होंने कोई भूल नहीं की थी. कारा की तरह डेविड भी सुंदर और जवान था.

वह 18 साल का था, जबकि कारा 14 साल की थी. डेविड भी एक धनाढ्य और सम्मानित परिवार का एकलौता बेटा था. उसे प्यार और पैसे की कभी कमी नहीं रही थी, जिस की वजह से वह राह भटक गया था. उस की संगत ऐसे दोस्तों से हो गई थी, जिन का शौक नशा करना और लड़कियों के साथ ऐश करना था. पहली मुलाकात में ही कारा और डेविड इस हद तक एकदूसरे से खुल गए थे कि एकदूसरे की बांहों में तो समा ही गए, उन्होंने देहसुख की चाहत भी मन में पाल ली. दोनों भीड़ से दूर घनी झाडि़यों के बीच जा बैठे. वहां बैठ कर दोनों अपने मन की इच्छा को ज्यादा देर नहीं दबा पाए और एकदूसरे के शरीर की गहराई नापने लगे. इस से कारा तो तृप्त हुई ही, डेविड भी उस के अधखिले शरीर को पा कर दीवाना हो गया.

इसी बीच डेविड ने न केवल दोनों के बीच देहसुख के पलों की तसवीर कैमरे में कैद कर ली थीं, बल्कि विभिन्न पोजों में कारा की न जाने कितनी नग्न तसवीरें भी उतार ली थीं. कारा उस की अंधी मोहब्बत और उस से मिले देहसुख में इस हद तक खो गई थी कि उस ने इस सब का कोई विरोध नहीं किया था. उस दिन दोनों चाहत की एक अनूठी अनुभूति ले कर घर लौटे. इस के बाद तो जब दिल करता, दोनों इस अनुभूति को ताजा कर लेते. जैसेजैसे दोनों में नजदीकी बढ़ रही थी, वैसेवैसे उमंगे भी बेलगाम होती जा रही थीं. चुलबुले स्वभाव की कारा तो डेविड की दीवानगी में इतनी डूब गई थी कि वह उस की नजदीकी पाने के लिए हर शर्त मंजूर कर लेती थी.

एक दिन डेविड ने कारा के सामने शर्त रखी कि वह अपनी बड़ी बहन कैटीलिन को राजी करे कि वह उस के दोस्त के साथ दोस्ती बढ़ा कर उस से देह संबंध बनाए. फिर चारों मिल कर खूब ऐश किया करेंगे. कारा ने बिना कुछ सोचे हामी भर दी. इस के बाद उस ने किसी तरह अपनी बहन को भी राजी कर लिया. फिर एक दिन चारों एक जगह मिले तो डेविड ने देह के इस खेल की वीडियो रिकौर्डिंग का भी इंतजाम कर लिया था. उस समय डेविड काले रंग के कपड़े पहने हुए था. डेविड ने अपने 19 वर्षीय दोस्त के साथ पहले हाथों में रिवौल्वर ले कर मारपीट का दृश्य रिकौर्ड किया और फिर हाथ में नंगी तलवार ले कर ऐसे दहाड़ा, जैसे किसी का सिर कलम करने वाला हो. उस समय उस की नजर कारा पर ही थी, जो उसे ही निहार रही थी.

इस के बाद डेविड और कारा के बीच निर्वस्त्र अवस्था में बनाए गए देहसंबंधों की वीडियो बनाई गई. फिर डेविड के दोस्त और कारा की बड़ी बहन कैटीलिन के देहसंबंध की बारीकी से रिकौर्डिंग की गई. उस वक्त मस्ती के जुनून में डेविड और उस का दोस्त यह भूल गए थे कि दोनों ने न केवल नाबालिग बहनों के साथ देहसंबंध बनाने का गुनाह किया है, बल्कि बतौर सबूत उस की रिकौर्डिंग भी कर ली थी, जो कभी भी जी का जंजाल बन सकती थी. इधर कारा इतनी आजाद खयाल हो गई थी कि उसे किसी का खौफ नहीं रहा था. जब भी उस का दिल करता, डेविड को रात के समय अपने घर बुला लेती. इस के बाद सारी रात दोनों खूब मस्ती करते.

जबतब कारा रातरात भर घर से गायब हो जाती और डेविड के साथ रात गुजार कर घर लौटती. अब उस का यह आचरण घर वालों से छिपा नहीं रह गया था. उस के पिता माइकल कारा को समझाने की कोशिश करते तो वह उत्तेजित हो कर कहने लगती, ‘‘यह मेरी जिंदगी है. मैं जिस तरह भी जीना चाहूं, मुझे कोई नहीं रोक सकता.’’

बेटी के इस दुस्साहस पर माइकल का हाथ उस पर उठ जाता तो वह घायल शेरनी की तरह दहाड़ पड़ती. मां कैथरीन ने भी कारा को परिवार की इज्जत और उस के खुद के भविष्य का वास्ता दे कर राह पर आने के लिए काफी समझाया, पर वह उस राह से नहीं लौटी. इसे ले कर माइकल और कैथरीन अकसर परेशान रहते थे. उधर कारा को भी आए दिन की टोकाटाकी नागवार लगती थी. कारा आधीआधी रात तक इंटरनेट पर डेविड से अश्लील चैटिंग करती रहती थी. इस से आहत कैथरीन ने इंटरनेट का कनेक्शन ही कटवा दिया, जिस से कारा बौखला गई. अब उस ने खुलेआम डेविड को घर बुलाना शुरू कर दिया. रात भर दोनों कमरे में बंद रहते. माइकल और कैथरीन चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते थे.

एक रात जब दोनों कमरे का दरवाजा बगैर बंद किए बिस्तर पर बेलिबास एकदूसरे की बांहों में खोए अश्लीलता की हदें पार कर रहे थे तो माइकल से देखा नहीं गया. उन्होंने डेविड को खूब खूरीखोटी सुनाई और अपने घर न आने की हिदायत दी. इस से डेविड का पारा तो चढ़ा ही, कारा भी भड़क उठी, ‘‘डैडी, आप को कोई अधिकार नहीं है इस तरह मेरे दोस्त की बेइज्जती करने का.’’

‘‘बेइज्जती तो उन की होती है, जिन की कोई इज्जत हो. तुम दोनों ने तो बेहयाई की हद पार कर दी है, कुछ तो शरम करो. तुम्हारे भाईबहन पर इस का क्या असर पड़ेगा? लोग जानेंगे तो कितनी बदनामी होगी हमारी? सिर उठा कर घर से निकलना दूभर हो जाएगा.’’ माइकल ने कारा को लताड़ लगाई.

‘‘गेट आउट फ्राम माई रूम.’’ कारा ने अपने ही जन्मदाता को जलील करते हुए कहा तो बेचारे माइकल अपनी इज्जत की खातिर खून का घूंट पी कर उस के कमरे से बाहर आ गए.

जातेजाते उन के कानों में डेविड की आवाज पड़ी. वह धमकी दे रहा था, ‘‘मुझे यह कतई मंजूर नहीं कि कोई मेरे प्यार के बीच में आए. अगर मेरे प्यार में ज्यादा दखल दिया तो मैं कत्ल भी कर सकता हूं, बगैर यह देखे कि कत्ल होने वाला कौन है?’’

माइकल और कैथरीन समझ चुके थे कि कारा उन के हाथों से पूरी तरह निकल चुकी है, पर उसे कैसे राह पर लाया जाए? यह सोच कर दोनों परेशान थे. वह समझ नहीं पा रहे थे कि उन के प्यार में आखिर कहां कमी रह गई थी, जो उन्हें यह दिन देखना पड़ रहा था. कैथरीन ने कारा की करीबी सहेली 16 वर्षीया जेफ होवर्थ से भी कहा कि वह ही कारा को समझाए.

जेफ ने ऐसा किया भी. उस ने कारा को समझाया, ‘‘कारा तुम जो कर रही हो, वह सही नहीं है.’’

‘‘क्या सही है, क्या गलत, यह मैं अच्छी तरह समझती हूं. मैं डेविड से इतनी मोहब्बत करती हूं कि उस की चाहत में किसी हद तक भी जा सकती हूं. मैं यह बिलकुल बरदाश्त नहीं कर सकती कि मेरे प्यार में, मेरी व्यक्तिगत जिंदगी में कोई दखल दे. चाहे वह मेरे मम्मीपापा ही क्यों न हों.’’

‘‘उन्होंने तुम्हें जन्म दिया है. तुम्हारा भलाबुरा भला उन से ज्यादा कौन समझ सकता है. फिर तुम जिस राह पर जा रही हो, उस की कोई मंजिल नहीं होती. तुम खुद अपनी राह में कांटें बिखेर रही हो. देखना इस का अंजाम दुखद होगा, इसलिए वक्त रहते संभल जाओ.’’ जेफ ने कारा को समझाया.

‘‘अब चाहे कांटे मिलें या फूल, मैं इस राह पर इतना आगे बढ़ चुकी हूं कि लौट कर आना संभव नहीं है. अब तो प्यार ही मेरी जिंदगी है. डेविड ही मेरी सांसें हैं. बेहतर होगा कि तुम भी मेरे बीच में न आओ.’’ कारा ने उलटा उसे ही नसीहत दे डाली. फलस्वरूप जेफ भी हार कर चुप हो गई.

इधर कारा बेलगामी की सारी हदें पार करती जा रही थी. अब वह डेविड को घर नहीं बुलाती थी, खुद ही उस के पास पहुंच जाती थी. यहां तक कि वह 2-2 रातों तक घर नहीं लौटती थी. यह देख माइकल और कैथरीन का विरोध भी नरम पड़ गया था. कारा ने इस का उलटा ही अंदाजा लगाया और 11 नवंबर, 2008 की रात उस ने डेविड को फिर से घर बुलवा लिया.

वह आ गया तो कमरे का दरवाजा खुला छोड़ कर कारा डेविड के साथ बिस्तर में घुस गई. कारा के कमरे से आने वाली आवाजों ने सभी की नींद उचाट कर दी थी. माइकल काफी देर तक खुद को रोके रहे, पर अंत में वह कारा के कमरे में जा पहुंचे और चीख कर बोले, ‘‘अगर तुम्हें यह गंदगी फैलानी है तो कहीं और जा कर फैलाओ. मेरे घर में ऐसा नहीं होगा.’’

‘‘वरना क्या कर लेंगे आप?’’ कारा बेशरमी की हद पार करते हुए डेविड की बांहों में सिमटी हुई बोली.

‘‘मैं तेरी खाल खींच दूंगा.’’ इस के साथ ही माइकल ने कारा को बिस्तर से घसीट कर जमीन पर पटक दिया. वह उस पर हाथ उठाते, इस से पहले ही डेविड ने उन का हाथ पकड़ लिया, ‘‘खबरदार, अगर कारा को हाथ लगाया तो.’’

माइकल का गुस्सा अब डेविड पर भड़क गया, ‘‘तू ने ही मेरी बेटी को बरबाद किया है. तू ने इसे राह से भटकाया है. मैं तेरे खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट करूंगा.’’

इतना सुनते ही डेविड भी तैश में आ गया, ‘‘अबे ओए बुड्ढे, जुबान संभाल कर बात कर, वरना…’’

‘‘वरना क्या कर लेगा तू?’’ माइकल की सांसें तेजी से धड़कने लगीं.

‘‘छोड़ो डेविड.’’ कारा ने उठ कर डेविड की बांह थाम ली, ‘‘क्यों इन के मुंह लगते हो. इन्हें बकवास करने दो. यह हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते.’’ उस ने अपने पिता माइकल पर घृणा भरी दृष्टि डाली.

‘‘कर तो बहुत कुछ सकता हूं.’’ इतना कहते हुए माइकल कमरे से चले गए.

यह देख डेविड और कारा घबरा गए थे. कारा डेविड से बोली, ‘‘कुछ करो डेविड, वरना ये लोग कुछ भी कर सकते हैं. मैं तुम से जुदा नहीं होना चाहती. मैं अभी नाबालिग हूं, अगर पापा ने तुम्हारे खिलाफ पुलिस में अपनी नाबालिग बेटी को बहकाने और जबरन शारीरिक संबंध बनाने की रिपोर्ट लिखवा दी तो पुलिस तुम्हें जेल भेज देगी. ऐसा हो, इस से पहले इन्हें ही दुनिया से विदा कर दो. फिर कोई हमें रोकनेटोकने वाला नहीं रहेगा.’’

डेविड कारा का इशारा समझ गया था. साथ ही डर भी गया था कि अगर उस के खिलाफ नाबालिग के साथ बलात्कार करने की रिपोर्ट लिखवा दी गई तो उसे जेल जाने से कोई नहीं बचा पाएगा. तभी उसे याद आया कि उस ने कहीं पढ़ा था कि 19 वर्षीय चार्ल्स सर्टाकवली 14 वर्षीया कारिल एनन से बेइंतहा मोहब्बत करता था, पर कारिल के मांबाप बीच में आ गए थे. इस पर दोनों ने मिल कर कारिल के मांबाप व बहन का कत्ल कर दिया था. फिर दोनों दूसरे शहर भाग गए थे. लंबी अवधि के बाद आखिर वे पकड़े गए थे.

डेविड के दिमाग में शैतान ने पांव जमा लिए थे. उस ने पहला पक्ष सोचा, दूसरा नहीं. अंजाम की परवाह न करते हुए उस ने कारा से कहा, ‘‘ठीक है, मैं अपनी मोहब्बत के कांटों को जड़ से ही हटा दूंगा. मगर तुम्हें मेरा साथ देना होगा.’’

‘‘मैं तो हर समय, हर कदम पर तुम्हारे साथ हूं.’’ कारा उस की बांहों में सिमट गई, ‘‘मुझे सब कुछ मंजूर है, पर तुम से अलग होना नहीं.’’

‘‘तुम परसों तक का इंतजार करो, मैं कुछ करता हूं.’’ डेविड बोला, ‘‘हां, परसों शाम को मुझे फोन कर के बता देना कि तुम्हारे मम्मीपापा घर पर हैं कि नहीं.’’

‘‘ठीक है, मगर जो भी करना, होशियारी से करना. हमारे ऊपर आंच न आए.’’ कारा बोली.

सुबह होते ही डेविड कारा के घर से चला गया. उस ने उसी दिन 40 कैलिबर हैंडगन का इंतजाम कर लिया. 13 नवंबर को कारा का छोटा भाई जेम्स अपनी गर्लफ्रैंड को पहली बार घर लाया था. इसी खुशी में घर में एक छोटी सी पार्टी रखी गई थी. कारा ने यह खबर डेविड को दी तो उस ने अपनी योजना कारा को समझा दी. रात करीब 9 बजे वह कार से कारा के घर पहुंच गया और कुछ दूरी पर कार खड़ी कर के उस के इशारे का इंतजार करने लगा. करीब साढ़े 9 बजे जेम्स की गर्लफ्रैंड वहां से चली गई तो कारा ने घर से बाहर आ कर डेविड को इशारा कर दिया. वह तुरंत चौकन्ना हो कर कारा के घर में पहुंच गया. उस समय कारा के पिता माइकल और मां कैथरीन ड्राइंगरूम में ही थे. कारा खुद भी वहां आ गई थी. उस के भाईबहन भी वहीं थे.

डेविड ने आते ही एक फायर माइकल के सिर पर पीछे से किया. यह देख कैथरीन उस की तरफ दौड़ी. मगर वह कदम आगे नहीं बढ़ा पाई. डेविड ने उस के सिर में भी गोली दाग दी. दोनों की उसी समय मौत हो गई. यह देख कारा पहले ही डेविड की कार के पास आ गई थी. डेविड के आते ही दोनों कार से भाग निकले, पर दूसरे दिन दोनों पकड़े गए. गिरफ्तारी के वक्त और बाद में भी कारा खुद को निर्दोष बताती रही, मगर सारे सबूत उस के विरुद्ध थे. बचाव का कोई रास्ता नहीं था.

अत: दूसरी पेशी पर कारा ने भी अदालत में अपना अपराध स्वीकारते हुए कहा, ‘‘डेविड ने मेरे मातापिता की हत्या की है. फिर भी मैं उस से प्यार करती हूं और करती रहूंगी. मैं उस के बिना नहीं रह सकती. जेल से छूटने के बाद हम फिर से एक हो जाएंगे.’’

अदालत में उपस्थित सभी लोग कारा की इस बेहयाई पर उस का मुंह ताकते रह गए. वह सोच नहीं पा रहे थे कि प्यार में एक लड़की इतनी भी अंधी हो सकती है. अदालत ने डेविड को दोहरे हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा सुनाई. वहीं कारा को हत्या के लिए उकसाने और सहयोग देने पर 25 साल की सश्रम कैद सजा सुनाई गई. साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि जब तक कारा व डेविड बालिग नहीं हो जाते, उन्हें जेल के बजाय बाल बंदीगृह में रखा जाएगा. बालिग होने पर दोनों को इंडियाना जेल में भेज दिया जाएगा.

डेविड अच्छे घर से था. उस के पिता ने कई बड़े वकील किए, पर तमाम कोशिशों के बाद भी उस की जमानत नहीं हो पाई. जबकि कारा की तरफ से एक एनजीओ का वकील केस देख रहा था. सन 2013 के जून माह में कारा को 5 दिन के पैरोल पर रिहा किया गया था. लेकिन वह घर पहुंची तो उस के भाई ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया. उस की बहन अपने फ्रैंड के साथ घर बसा चुकी थी. कारा और डेविड ने नासमझी और प्यार में अंधे हो कर जो अपराध किया, उस की ग्लानि दोनों को अब होने लगी थी. 25 फरवरी, 2015 को डेविड के वकील ने फिर से उस की जमानत अर्जी अदालत में लगाई, जिसे नामंजूर कर दिया गया. फिलहाल दोनों जेल में हैं. Thriller Hindi Story

 

UP Crime: होटल के कमरे में प्यार का खूनी अंत, लाश के साथ बीती पूरी रात

UP Crime: एक ऐसी खौफनाक घटना सामने आई है, जिस ने प्यार जैसे रिश्ते को शर्मसार कर दिया. जिस हाथ को थामकर साथ निभाने की कसमें खाई जाती हैं, उसी हाथ ने प्रेमिका की जान ले ली. यह कहानी है उस प्रेमी की, जो प्यार के नाम पर पनपी नफरत और गुस्से से हैवान बन गया. मामूली विवाद से शुरू हुआ झगड़ा इतना बढ़ गया कि प्रेमी ने  प्रेमिका को बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया और उस की पसलियां तक तोड़ डालीं.

सवाल यह है कि आखिर वह कौन सी वजह थी, जिस ने प्यार को हिंसा में बदल दिया? आइए जानते हैं इस दिल दहला देने वाली क्राइम स्टोरी की पूरी सच्चाई.

यह शर्मनाक घटना उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से सामने आई है. 10 जनवरी, 2026 को सफाई कर्मचारी प्रवीण कुमार अपनी प्रेमिका आरती को एक होटल में ले गया. कमरे में दोनों ने साथ बैठकर शराब पी. नशे के दौरान किसी मामूली बात को ले कर दोनों के बीच विवाद हो गया. यह विवाद इतना बढ़ गया कि गुस्से में प्रवीण ने आरती पर लातघूंसे बरसाने शुरू कर दिए.

पुलिस के मुताबिक आरती और प्रवीण के बीच पिछले 3 सालों से प्रेम संबंध थे. आरती के पति की पहले ही संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी थी और उस के 2 बच्चे थे, जबकि प्रवीण भी अपनी पत्नी से अलग रह रहा था. पुलिस जांच में सामने आया कि शराब के नशे में आरती ने गुस्से में प्रवीण का चेहरा नोच लिया था. इसी बात से बौखलाकर प्रवीण ने उस पर बेरहमी से हमला किया. लगातार पिटाई के कारण आरती की कई पसलियां टूट गईं और अंदरूनी चोटों की वजह से उस की मौत हो गई. आरती ने खुद को बचाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन आरोपी का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा था.

हत्या के बाद प्रवीण पूरी रात शव के पास बैठा रहा. 11 जनवरी की सुबह जब वह होटल से निकलने लगा तो होटल के एक कर्मचारी ने उसे रोक लिया. महिला के बारे में पूछने पर प्रवीण गोलमोल जवाब देने लगा, जिस से उस कर्मचारी को शक हो गया.

इस के बाद में उस ने खुद पुलिस को फोन कर मैडिकल इमरजेंसी होने का नाटक किया, लेकिन सच सामने आ गया. पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है और उस से  पूछताछ जारी है. UP Crime

Emotional Story: मेरी ममता की आवाज

Emotional Story: लोगों ने बहुत कहा कि मुझे एक ही बेटी पैदा हुई है, लेकिन मैं मां थी, इसलिए मुझे पता था कि मुझे एक नहीं, 2 बेटियां पैदा हुई थीं. और मैं ने यह बात साबित भी कर दी, लेकिन इस में 9 साल लग गए.

शादी के 2 सालों बाद मैं ने जुड़वां बेटियों को जन्म दिया था, लेकिन डिलीवरी के बाद जब मैं वार्ड में पहुंची तो मुझे बताया गया कि मेरे एक ही बच्ची पैदा हुई थी. जब मैं लेबर रूम में थी, तब प्रसव पीड़ा के बीच मुझे इतना तो अहसास था कि मैं ने 2 बच्चे पैदा किए थे. वहां किसी ने कहा भी था कि जुड़वां लड़कियां हुई हैं. जब मैं ने 2 लड़कियां पैदा की थीं तो एक कहां चली गई? मैं ने सास से इस बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि एक ही लड़की पैदा हुई थी. मुझे सास पर ही शक हुआ, क्योंकि वह मुझ से पहले कई बार कह चुकी थीं कि मुझे लड़का ही चाहिए, इसलिए लड़का पैदा करना.

मुझे लगा कि सास ऐसे ही कह रही होंगी, इसलिए मैं तब कुछ नहीं बोली थी. लेकिन जब अस्पताल से बच्ची गायब हो गई तो मुझे उन की धमकी याद आ गई. लेकिन मैं वहां कर भी क्या सकती थी, इसलिए उस बच्ची के लिए बेजार रोतीबिलखती  रही, पर वहां मुझ पर किसी को तरस नहीं आया. सब यही कहते रहे कि मुझे एक लड़की ही पैदा हुई होगी, सास भला बच्ची क्यों गायब करेगी. मान लिया जाए कि उसे अगर पोते की चाहत थी तो वह एक ही क्यों, दोनों लड़कियों को गायब कर देती. लेकिन उन लोगों की बातें मेरे दिल को तसल्ली नहीं दे पा रही थीं. मुझे ताज्जुब इस बात पर हो रहा था कि एक अस्पताल के लेबर रूम से बच्ची को आखिर कैसे गायब कर दिया गया.

यह काम बिना नर्स की मिलीभगत के बिलकुल संभव नहीं था. लेकिन नर्स जसपाल के व्यवहार और सेवा भाव को देख कर उस पर अंगुली उठाना मेरे दिल को गवारा नहीं लग रहा था. बहरहाल, घर वाले मुझे आश्वस्त करते हुए अस्पताल से घर ले आए. मेरे न मानने से घर में क्लेश होने लगा. गनीमत यह थी कि ससुराल के अन्य लोगों की तरह पति अशोकजीत ने मेरा साथ नहीं छोड़ा. इस का नतीजा यह निकला कि उस क्लेश की वजह से मुझे और पति को पुश्तैनी घर छोड़ कर किराए के घर में जाने के लिए मजबूर होना पड़ा. किराए के मकान में शिफ्ट होने के बाद हमें बहुत आर्थिक परेशानियां हुईं, इस के बावजूद भी पति ने पुश्तैनी घर में जाने से मना कर दिया. मेरी बात पर सास ने उन्हें बड़े कड़वे बोल बोले थे.

उन्होंने कहा था, ‘‘डायन भी 7 घर छोड़ देती है, लेकिन तेरी बहू ने तो मुझ पर तोहमत लगाने में डायनों को भी पीछे छोड़ दिया. उस ने मुझ पर यह आरोप तो लगा दिया, लेकिन अब मैं हकीकत में ऐसा ही कर के दिखाऊंगी. जिस बच्ची पर यह इतरा रही है, उसे मैं ऐसे गायब कर दूंगी कि सारी जिंदगी उसे नहीं ढूंढ पाएगी. पता नहीं एक कैसे पैदा कर दी, बात करती है 2-2 की.’’

घर में सास ने जो क्लेश किया था, उसे याद कर के अशोकजीत सिहर उठते थे. मां के रौद्र रूप की वजह से ही उन्होंने उस घर से दूर रहने का फैसला किया था. मुझे तो यही चिंता खाए जा रही थी कि मेरी एक बेटी तो पहले ही छिन गई, कहीं दूसरी भी न छिन जाए. कुछ दिनों बाद मेरे पति अशोक को भी लगने लगा कि मुझे 2 बेटियां पैदा होने की शायद गलतफहमी पैदा हुई थी. पति ने जब भी मुझे समझाना चाहा, मैं जोरजोर से रोने लगती. तब मैं कहती, ‘‘मां हूं मैं. इस बात की खबर मुझे नहीं, किसी और को होगी कि मुझे एक नहीं 2 बच्चे पैदा हुए. मैं अब भी पूरे दावे के साथ कह रही हूं कि तुम्हारी मां ने ही मेरी एक बेटी को गायब किया है.’’

अशोक मेरे दर्द को समझता था, इसलिए वह अकसर समझाने की कोशिश करता. लेकिन मैं उस अनदेखी बेटी को भुला नहीं पा रही थी. पति को जब लगा कि मैं बेटी वाली बात पर नरवस हो जाती हूं तो उन्होंने इस मुद्दे पर बात करनी ही बंद कर दी. वह मुझे खुश रखने की पूरी कोशिश करते. लेकिन मैं न कभी खुश रह पाई और न अपनी अनदेखी बेटी भुला पाई. वक्त का पहिया घूमता रहा. देखतेदेखते मेरी बेटी 9 साल की हो गई. इस की जुड़वा बहन भी आज इतनी ही बड़ी होगी. उस की याद में आंसू बहाते हुए मैं अपनी इस बेटी में दूसरी बेटी का रूप देखने की कोशिश करती. उस समय मैं भावुक भी हो उठती थी. उस बेटी को मैं भले ही भुला नहीं पा रही थी, लेकिन उसे वापस पाने की उम्मीद छोड़ दी थी.

लेकिन एक दिन अजीब घटना घटी. बाजार में खरीदारी करते समय मुझे एक अनजान औरत मिली. मुझे देखते ही उस ने कहा, ‘‘अरे, तुम तो वही स्वीटी हो न, जिस ने सिविल अस्पताल में जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया था, जिस में से एक बच्ची को नर्स ने बेच दिया था?’’

‘‘हां,’’ मैं हैरान हो कर बोली, ‘‘मगर तुम कौन हो, मेरा नाम तुम कैसे जानती हो? और तुम जिस बच्ची को बेचने की बात कह रही हो, तुम्हें कैसे पता चली?’’

‘‘मेरी छोड़ो, तुम अपनी बताओ कि क्या तुम्हें तुम्हारी बेटी मिल गई थी?’’ उस ने पूछा, ‘‘तुम ने शोर तो बहुत मचाया था, इस से मुझे लगा था कि तुम्हें तुम्हारी बेटी मिल गई होगी?’’

‘‘मेरे शोर मचाने का कोई फायदा नहीं हुआ था. मेरी वहां किसी ने नहीं सुनी. लेकिन बहन एक बात बताओ, तुम्हें कैसे पता कि मेरी बेटी को नर्स ने बेचा था.’’ मैं ने उस महिला से बड़ी विनम्रता से पूछा.

‘‘नर्स जसपाल कौर को मैं ने बच्ची को किसी और के हाथों में सौंपते हुए अपनी आंखों से देखा था. उस ने जिस आदमी को बच्ची दी थी, उस ने नर्स को नोटों की गड्डी भी दी थी. जिन दिनों तुम अस्पताल में भरती थी, उन दिनों हमारी भी एक रिश्तेदार वहां भरती थी. मैं उसे देखने छोटी बहन के साथ रोजाना अस्पताल जाया करती थी. उसी आनेजाने से नर्स जसपाल कौर से हमारी जानपहचान हो गई थी.’’

उस महिला की बात से मुझे बल मिला. मैं ने उस से पूछा, ‘‘इस के आगे तुम ने वहां और क्या देखा था, मतलब जिसे मेरी बच्ची सौंपी थी, वह कौन था?’’

‘‘जिसे तुम्हारी बच्ची सौंपी थी उस शख्स को तो मैं नहीं जानती. लेकिन जिस समय नर्स उस आदमी को बच्ची सौंप रही थी, मेरी निगाहें उसी पर टिकी थीं. उसी दौरान नर्स ने मुझे देख लिया था. तुम्हारा शोर खत्म होने के बाद नर्स मेरे पास आई थी. उस ने मुझे धमकाते हुए कहा था कि चुपचाप तमाशा देखती रहो. ध्यान रखो, अगर मैं फंस गई तो यही कहूंगी कि बच्ची उठा कर मैं ने उसे दिया था. तब उस के साथसाथ मैं भी जेल जाऊंगी.’’

‘‘बहन, तुम से मेरी एक गुजारिश है, बस नर्स जसपाल कौर का पता बता दो, अपनी बेटी को तो मैं पाताल से भी ढूंढ लाऊंगी.’’ मैं ने उस महिला से कहा.

‘‘वह तो अब भी सिविल अस्पताल में ही है. मगर देखो, इस मामले में मेरा कहीं भी जिक्र नहीं आना चाहिए वरना मैं अपनी कही बातों से साफ मुकर जाऊंगी.’’ उस ने कहा.

‘‘तुम इस की चिंता मत करो. मैं किसी से तुम्हारे बारे में कुछ नहीं कहूंगी. मुझे अपनी बच्ची से मतलब है. पिछले 9 सालों से तड़प रही हूं मैं अपनी उस औलाद के लिए. उस नर्स ने मेरी बेटी को किस के हाथों बेचा है, बस इतना पता लग जाए.’’ मैं ने उसे भरोसा दिया.

बाजार से सामान ले कर मैं जल्दी से घर लौट आई. मैं ने नर्स जसपाल के पास सीधे जाना उचित नहीं समझा, क्योंकि उस ने उस समय बच्ची के बारे में कुछ नहीं बताया था तो अब 9 साल बाद क्यों बताती. अस्पताल के लोग उलटे मुझे ही बेवकूफ बनाते. इसलिए मैं सीधे थाने पहुंची. लेकिन थाना पुलिस ने मेरी बात को तवज्जो नहीं दी. उन्होंने कहा कि इतने पुराने मामले में वे बिना सबूत के कुछ नहीं कर सकते. निराश हो कर मैं घर लौट आई. इस बारे में मैं ने अशोक से बात की तो अगले दिन वह मुझे ले कर एसएसपी के यहां गए. हम ने अपनी पीड़ा उन से कही. उन्होंने हमारी बात ध्यान से सुनी. मेरा यह अजीबोगरीब मामला था.

क्योंकि एक मां 9 साल बाद अपनी उस बच्ची के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराना चाह रही थी, जिस की उस ने शक्ल तक नहीं देखी थी. एसएसपी साहब ने हमारे सामने ही कुछ पुलिस अफसरों को बुला कर इस बात पर चर्चा की. मीटिंग खत्म हो गई, लेकिन एसएसपी समझ नहीं पाए कि उन्हें इस मामले में क्या काररवाई करनी चाहिए. मैं ने जो शिकायत उन्हें दी थी. उस में नर्स जसपाल कौर के अलावा अपनी सास को भी नामजद करने की बात कही थी.

फिलहाल एसएसपी ने यह कह कर हमें वापस भेज दिया कि वह इस मामले पर गहराई से अध्ययन कर के ही कुछ कर पाएंगे. हमें लगा कि थाना पुलिस की तरह वह भी हमें टरका रहे हैं. अब इतने बड़े अफसर से हम कह भी क्या सकते थे. इसलिए भरे मन से घर लौट आए. उन के यहां जा कर अपनी बच्ची तक पहुंचने की जो थोड़ीबहुत आस मुझे हुई थी, उन की बातों से मुझ से वह भी दूर होती दिखाई देने लगी थी. लेकिन कुछ दिनों बाद एसएसपी ने हमें अपने औफिस में बुला कर एक बार फिर हमारी पूरी दास्तान गौर से सुनी. इस के बाद उन्होंने मेरी सास और नर्स जसपाल कौर को बुलवाया. उन्होंने उन दोनों से भी पूछताछ की. पूछताछ में दोनों ज्यादा देर तक झूठ नहीं बोल सकीं. आखिर उन्होंने कबूल कर लिया कि मुझे 2 बेटियां पैदा हुई थीं. उन में से एक को उन्होंने एक बेऔलाद आदमी को बेच दी थी.

अशोक को जब पता चला कि इस काम में उन की मां का भी हाथ था तो वह दंग रह गए. जब मैं उस समय सास पर बच्ची चोरी का आरोप लगा रही थी तब उन्होंने मुझ पर ही गलतफहमी होने का आरोप लगाया था. पूछताछ में मेरी बेटी को चोरी करने की उन्होंने जो कहानी बताई थी, इस प्रकार निकली. इंदरजीत सिंह को औलाद नहीं थी. वह नर्स जसपाल कौर को अच्छी तरह जानते थे. उस से वह कई बार मिल कर कह चुके थे कि किसी लावारिस बच्चे का मामला उस की जानकारी में आए तो वह उसे बता दे. वह उसे अपनी औलाद बना लेंगे. नर्स जसपाल ने उन से कहा था कि वह उन के लिए बच्चे का इंतजाम कर देगी, मगर इस के लिए मोटी रकम खर्च करनी होगी.

इंदरजीत कई फैक्ट्रियों के मालिक थे. उन के पास पैसों की कमी नहीं थी, इसलिए उन्होंने बच्चे के लिए मुंहमांगी रकम देने की हामी भर ली थी. बच्चा पैदा होने के लिए जब मुझे अस्पताल लाया गया तो मेरी सास एक ही रोना रोती रही थीं, ‘‘हाय रब्बा, देखना स्वीटी के कहीं लड़की न हो जाए, इसे तो बेटा ही होना चाहिए, तभी मेरा वंश चलेगा.’’

सास ने यही बात नर्स जसपाल कौर के सामने भी कही तो उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘क्यों बड़ी बी, लड़का न हो कर लड़की हो गई तो क्या करोगी?’’

‘‘अरी, शुभशुभ बोल. लड़की हो गई न तो उसे यहीं मार कर गाड़ दूंगी, अस्पताल की मिट्टी में.’’ मेरी सास ने नर्स जसपाल कौर से कहा.

मैं उस अस्पताल में चैकअप के लिए जाती रहती थी, इसलिए उस नर्स को पता था कि मेरे पेट में जुड़वां बच्चे हैं. तभी तो उस ने मेरी सास से सीधे कहा, ‘‘देख माई, तेरी बहू को होने हैं जुड़वां बच्चे. एक को ला कर मेरे हवाले कर देना, मुंहमांगी रकम दूंगी.’’

‘‘सुन मेरी बात. लड़कियां हुईं तो भले दोनों ले जाना, लड़के हुए तो नहीं ले जाने दूंगी एक को भी.’’

आखिर समय आने पर मैं ने जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया. मेरी सास वहीं थी. उस ने एक बच्ची उठा कर जसपाल के हवाले कर दी. यह काम उस ने इतनी होशियारी से किया कि किसी को कुछ पता नहीं चला. यह भी संभव था कि इस अपराध में अस्पताल के कुछ अन्य लोग पहले से मिले रहे हों. जसपाल के बुलाने पर इंदरजीत सिंह भी वहां पहुंचे हुए थे. उसे अच्छीखासी रकम दे कर वह बच्ची को अपने साथ ले गए. उन लोगों ने कुछ ऐसी व्यवस्था कर रखी थी कि मेरे शोर मचाने के बाद भी मेरी बात पर किसी ने विश्वास नहीं किया. फिर तो यह मामला कुछ ऐसा टला कि नर्स जसपाल और इस मामले से जुड़े अन्य लोग इस तरह भूल गए कि कभी यह मामला खुल भी सकता है.

लेकिन मैं ने हिम्मत नहीं हारी. और आखिर यह मामला खुल ही गया. पूरे 9 साल बाद केस खुलने पर पुलिस ने इंदरजीत के यहां दबिश दी. वह सचमुच बहुत बड़े आदमी थे. उन की बहुत बड़ी कोठी थी. मैं ने जब उन के यहां पल रही लड़की को देखा तो मेरा दिल खिल उठा. उस लड़की की शक्ल मेरी दूसरी बेटी से हूबहू मिल रही थी. लेकिन वह जिस शानोशौकत से उन के यहां रह रही थी, उस की मैं ने कल्पना भी नहीं की थी. इंदरजीत ने उस का दाखिला शहर के एक नामचीन स्कूल में करा रखा था. जमाने भर की सुखसुविधाएं उसे मुहैया थीं. हमें वह पहली बार देख रही थी, इसलिए पहचानने तक से उस ने मना कर दिया.

उस के लिए तो इंदरजीत सिंह और उन की पत्नी ही उस के असली मांबाप थे. जो सुविधाएं उसे वहां मिल रही थीं, हम उसे ताउम्र नहीं दे सकते थे. पुलिस टीम ने उन्हें एसएसपी के सामने पेश किया. पूरी बात सामने आने के बाद एसएसपी ने अशोक और मुझे विश्वास में ले कर समझाना शुरू किया कि हम लोग आगे जो भी निर्णय लें, ठंडे दिमाग से सोचसमझ कर पूरी गहराई से लें. खासकर इस बात का हम ध्यान रखें कि इंदरजीत सिंह के यहां पल रही बच्ची के भविष्य पर कोई आंच न आए. जब हम ने गहराई से सोचा तो हमारे दिमाग में बारबार यही बात आती रही कि हमारी दूसरी बेटी का भविष्य इंदरजीत के यहां ही सुरक्षित है. जो परवरिश इंदरजीत के यहां बच्ची को मिल रही है, वैसी उसे हमारे यहां कदापि नहीं मिल सकती.

इस के बाद मेरी ममता ने कुछ इस तरह उछाल मारा कि मामला दर्ज करवाने की बात मैं भूल गई. उसी समय मेरे दिमाग में आया कि अगर मेरी दूसरी बेटी इंदरजीत के यहां रहती है, तभी उस का भविष्य संवर सकता है. इस से हमारा संबंध भी बना रहेगा और दोनों बहनें साथसाथ रह सकती हैं. बेटी के भविष्य को देखते हुए मैं ने और अशोक ने इतनी बड़ी कुर्बानी देने का फैसला कर लिया. इस के बाद अपनी सोच से इंदरजीत सिंह को अवगत कराया. खुश होते हुए उन्होंने हमारे प्रस्ताव को स्वीकार लिया. इस के बाद इंदरजीत के साथ कचहरी जा कर बच्ची को विधिवत गोद दिए जाने की औपचारिकताएं पूरी करवाईं.

इस एवज में मेरे पति और मैं ने इंदरजीत से कोई तोहफा लेने से इनकार कर दिया. पैसा लेने का तो सवाल ही नहीं उठता था. लेकिन हां, इंदरजीत ने दोनों बच्चियों को बेहतरीन परवरिश का वादा किया और उन्होंने दोनों बच्चियों को एक बड़े स्कूल के हौस्टल में दाखिल करवा दिया. हर हफ्ते मैं पति के साथ दोनों बेटियों से मिलने जाती रही. दोनों ही पढ़ाई में होशियार थीं. यह क्रम कभी नहीं टूटा.

इसी तरह वक्त आगे बढ़ता गया. आज दोनों लड़कियां एमबीबीएस कर रही हैं. एमबीबीएस के बाद की उच्च शिक्षा के लिए उन का विदेश जाने का इरादा है. दोनों बेटियों की सफलता पर मैं और पति दोनों खुश हैं. हमें उम्मीद है कि वे आसमान की बुलंदियों को छुएंगी. मैं ने गलत किया या सही, मैं नहीं जानती. मगर किया वही, जो मेरी ममता ने मुझ से करवाना चाहा. Emotional Story

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Crime Story Hindi: लीना मारिया पौल – फिल्मों की ही नहीं, ठगी की भी नायिका

Crime Story Hindi: लीना मारिया पौल ने दक्षिण भारतीय ही नहीं बौलीवुड में भी अपनी पहचान बना ली थी. लेकिन बालाजी के प्यार में पड़ कर उस ने अपना बनाबनाया कैरियर तो बरबाद किया ही, अपराध की राह भी पकड़ ली.

29 मई की सुबह 8 बजे के आसपास मुंबई के उपनगर गोरेगांव के पौश इलाके तिलक रोड स्थित बहुमंजिली इमारत इंपीरियल हाइट्स के नीचे एकएक कर के पुलिस की कई गाडि़यां आ कर रुकीं तो देखने वालों को हैरानी के साथ उत्सुकता भी हुई. इमारत में अचानक ऐसा क्या हो गया कि इतनी सुबह पुलिस की इतनी गाडि़यां आ गईं. कौन क्या सोच रहा है, पुलिस को इस से क्या मतलब था? वे अपनी गाडि़यों से उतरे और लिफ्ट से इमारत की 32वीं मंजिल पर जा कर एक फ्लैट की डोरबेल बजाई. जैसे ही फ्लैट का दरवाजा खुला, उस में रहने वाली एक युवती और उस के साथी युवक को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. आखिर कौन थी वह युवती और युवक, पुलिस ने उन्हें हिरासत में क्यों लिया था? यह सब इमारत वालों को अगले दिन तब पता चला, जब उन के बारे में अखबारों में विस्तार से छपा.

पता चला कि युवती का नाम लीना मारिया पौल और उस के साथ पकड़े गए युवक का नाम बालाजी उर्फ शेखर रेड्डी उर्फ सुकेशचंद शेखर था. लीना ने दक्षिण भारत की कई फिल्मों में ही नहीं, 1-2 हिंदी फिल्मों में भी काम किया था. दोनों लिवइन रिलेशन में रह रहे थे. उन के ऊपर चेन्नई और मुंबई में करोड़ों रुपए की ठगी का आरोप था. दोनों को गिरफ्तार किया था मुंबई क्राइम ब्रांच के आर्थिक अपराध शाखा के सीनियर इंसपेक्टर दिनेश जोशी, शिवाजी फडतरे, इंसपेक्टर अशोक खेडकर, जगदीश कुलकर्णी, तनवीर शेख, सबइंसपेक्टर कदम ने. इन की मदद के लिए एक दरजन पुलिस कांस्टेबल भी थे.

दरअसल, इंसपेक्टर दिनेश जोशी और शिवाजी फडतरे को सूचना मिली थी कि बहुमंजिली इमारत इंपीरियल हाइट्स की 32वीं मंजिल के एक फ्लैट में रहने वाली फिल्म अभिनेत्री लीना मारिया पौल बालाजी की मदद से लगभग एक साल से कुछ रसूखदारों की मदद से जालसाजी का एक बड़ा रैकेट चला रही है. एक कंपनी बना कर उस के जरिए तरहतरह की लुभावनी स्कीमों में लोगों की मेहनत की कमाई को कम समय में डबल ट्रिपल और चौगुना करने का लालच दे कर उन्हें ठगी का शिकार बना रही है.

सूचना महत्त्वपूर्ण थी, इसलिए सीनियर इंसपेक्टर दिनेश जोशी और शिवाजी फडतरे ने तत्काल इस की सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों जौइंट पुलिस कमिश्नर धनंजय कमलाकर और एडिशनल पुलिस कमिश्नर धनंजय कुलकर्णी को दी. दोनों अधिकारियों ने पहले मामले का गहराई से अध्ययन किया, उस के बाद काररवाई करने के आदेश दिए. वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर ही दोनों पुलिस अधिकारियों ने टीम बना कर अभिनेत्री लीना मारिया पौल और बालाजी के फ्लैट पर छापा मार कर गिरफ्तार किया था. क्राइम ब्रांच के औफिस ला कर जब दोनों से पूछताछ की गई तो उन के द्वारा की जाने वाली ठगी की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी.

27 वर्षीया लीना मारिया पौल केरल के रहने वाले सी.एस. पौल की बेटी थी. वह दुबई स्थित मैस्को कंपनी में इंजीनियर थे, और परिवार को वहीं साथ रखते थे. इसलिए लीना वहीं पैदा ही नहीं, पलीबढ़ी भी. लीना ने बीडीएस (बैचलर औफ डैंटल सर्जरी) की पढ़ाई की. दांतों की डाक्टर बनने के बाद प्रैक्टिस करने या नौकरी करने के बजाय अचानक उस पर हीरोइन बनने का भूत सवार हो गया. दरअसल, लीना के मातापिता अकसर नातेरिश्तेदारों और घर वालों से मिलनेजुलने केरल आते रहते थे. मातापिता के साथ आनेजाने में लीना को भारत आनाजाना अच्छा लगने लगा. बाद में वह समझदार हो गई तो अकेली भी भारत आने लगी.

लीना खूबसूरत तो थी ही, उस की फिगर भी आकर्षक थी, इसलिए उस ने भारतीय फिल्मों में काम करने वाली हीरोइनों से अपनी तुलना की तो उसे लगा कि वह भी हीरोइन बन सकती है. पैसा और शोहरत के लालच में डाक्टरी का पेशा छोड़ कर वह हीरोइन बनने के सपने देखने लगी. लीना ने अपनी इच्छा पिता को बताई तो उन्हें हैरानी हुई. उन्होंने लीना को समझाया कि यह सब इतना आसान नहीं है. लेकिन लीना ने तो ठान लिया था, इसलिए वह जिद पर अड़ गई. आखिर पिता को ही झुकना पड़ा. मजबूरी में ही सही, उन्होंने अनुमति दे दी. लीना दुबई से चेन्नई पहुंच गई. क्योंकि उसे लगता था कि दक्षिण भारतीय फिल्मों में उसे आसानी से काम मिल जाएगा.

लीना को पता था कि सीधे फिल्मों में काम मिलना आसान नहीं है. इसलिए वह चेन्नई पहुंच कर मौडलिंग के लिए हाथपैर मारने लगी. इस के लिए उस ने अपना पोर्टफोलियो तैयार करा कर बड़ीबड़ी एजेंसियों से संपर्क किया. इस सब की बदौलत उसे कुछ विज्ञापन मिले तो उस की खूबसूरती और आकर्षक फिगर कुछ दक्षिण भारतीय फिल्म मेकरों के सामने आई. अंतत: उसे दक्षिण भारत की कुछ फिल्में मिल ही गईं और तो वह बड़े परदे पर आ गई. उस की कुछ फिल्में बौक्स औफिस पर सफल भी रहीं. इस तरह लीना दक्षिण भारतीय फिल्मों की हीरोइन बन गई. चूंकि वह दक्षिण भारतीय फिल्मों तक सीमित नहीं रहना चाहती थी, इसलिए हिंदी फिल्मों में काम पाने की कोशिश करती रही.

उस की कोशिश सफल रही और फिल्म निर्माता सुजित सरकार की नजर पड़ गई. उन्होंने लीना को अपनी हिंदी फिल्म ‘मद्रास कैफे’ में काम दे दिया. इस फिल्म में उसे लिट्टे के एक विद्रोही सदस्य की भूमिका करनी थी. फिल्म में हीरो थे जौन अब्राहम. कहते हैं, लीना की इस सफलता का राज था वे पार्टियां, जिन में वह अकसर जाया करती थीं. लीना फिल्मी पार्टियों की हौट गर्ल मानी जाती थी. शायद इसलिए जल्दी ही उस समय पुलिस की हिटलिस्ट में उस का नाम आ गया, जब वह चेन्नई और दिल्ली पुलिस के जौइंट औपरेशन में अपने बौयफ्रैंड बालाजी के साथ ठगी के आरोपों में पकड़ी गई.

बालाजी ने लीना को अपने प्यार के प्रभाव में कुछ इस तरह लिया था कि वह फिल्मों तक की डगर भूल कर उस के हर अच्छेबुरे कामों में उस का साथ देने लगी थी. उस ने लीना की जिंदगी ही नहीं, उद्देश्य तक बदल कर रख दिए थे. मूलरूप से बंगलुरु का रहने वाला बालाजी सुंदर और आकर्षक व्यक्तित्व का युवक था. वह लोगों को अपना परिचय बड़े ही रुतबेदार अंदाज में देता था. वह खुद को कभी कर्नाटक कैडर का आईएएस अधिकारी तो कभी करुणानिधि का पोता बताता था. वह कभी अपना नाम शेखर रेड्डी तो कभी सुकेश चंद्रशेखर या बालाजी बताता था.

बालाजी ने लीना को किसी फाइवस्टार पार्टी में देखा था. उस समय उस ने लीना से खुद को पूर्व मुख्यमंत्री करणानिधि का पोता और एक बड़ा बिल्डर बताया था. उस ने लीना की फिल्में देखी थीं. साथ ही वह उसे पसंद भी करता था. इसीलिए जब वह उस से मिला तो उसे लीना से प्यार हो गया था. वह किसी भी हालत में लीना को पाना चाहता था. आखिर उस ने अपनी झूठी बातों से लीना को अपने प्रेमजाल में फांस ही लिया. लीना को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए उस ने फिल्म निर्माता निर्देशक रामगोपाल वर्मा को अपना जिगरी दोस्त बताया था.

लीना ने बिना सोचेविचारे बालाजी की बातों पर विश्वास कर लिया. उसे लगा कि जिस रामगोपाल वर्मा की फिल्मों में काम करने के लिए लड़कियां लालायित रहती हैं, बालाजी उसे उन की फिल्मों में आसानी से काम दिला देगा. इस के बाद उस की किस्मत चमक जाएगी. इस मुलाकात के बाद लीना की बालाजी से अकसर मुलाकातें होने लगीं. इन मुलाकातों में लीना उस के बारे में कुछ नहीं जान पाई. शायद वह उस से भी बड़ा ऐक्टर था.

लीना और बालाजी की मुलाकातें बढ़ीं तो जल्दी ही उन में गहरी दोस्ती हो गई. इस बीच बालाजी ने लीना को रामगोपाल वर्मा के अलावा और भी कई बौलीवुड की हस्तियों से मिलवाने का लालच दिया. लीना बालाजी के रहनसहन और बातचीत से काफी प्रभावित थी. इसलिए उन की यह दोस्ती जल्दी ही प्यार में बदल गई. परिणामस्वरूप लीना ने अपना तनमन बालाजी को सौंप दिया. इस के बाद दोनों लिवइन रिलेशन में रहने लगे. बालाजी ने लीना को अपने प्यार के जाल में कुछ इस तरह फंसाया कि उस की यह सच्चाई जानने के बाद भी कि वह एक बड़ा जालसाज है, लीना उस से अलग नहीं हो पाई. सन 2013 में लीना और जौन अब्राहम द्वारा अभिनीत फिल्म ‘मद्रास कैफे’ रिलीज हुई.

फिल्म ठीक चली. लीना के अभिनय की काफी तारीफ हुई. अगर वह चाहती तो उसे फिल्मों में आगे भी अच्छी भूमिकाएं मिल सकती थीं. लेकिन बालाजी के साथ आने के बाद उस ने ऐसी कोई कोशिश ही नहीं की. उस ने खुद फिल्मों से नाता तोड़ लिया. क्योंकि जितनी मेहनत कर के लीना साल भर में कमाती थी, उतना पैसा तो बालाजी एक झटके में कमा लेता था. शायद इसी वजह से उस का फिल्मों से मोहभंग हो गया था. वह बालाजी के साथ उस के ठगी के कारोबार में उस की मदद करने लगी थी. लीना के साथ आने के बाद बालाजी का दिमाग कंप्यूटर की तरह चलने लगा था. लोगों पर अपना प्रभाव जमाने के लिए वह लीना को साथ रखता था.

लीना के साथ आने के बाद बालाजी ने बड़ीबड़ी हस्तियों को ठगी का शिकार बनाया. उन दिनों कोच्चि के रहने वाले कुछ बिजनैसमैनों ने अपने प्रोजैक्टों और शोरूम के बिजनैस प्रमोशन के लिए उस का उद्घाटन फिल्मी हस्तियों से करवाना शुरू किया. इन्हीं में एक नया नाम इमैनुवल सिल्क टैक्सटाइल कंपनी के मालिक बैजू साहब का भी था. बैजू साहब 2012 में चेन्नई में अपना एक शोरूम खोल रहे थे. वह अपने इस शोरूम का उद्घाटन किसी बड़ी फिल्मी हस्ती से कराना चाहते थे. इस बात की जानकारी बालाजी को हुई तो वह बैजू साहब से मिला, और उन्हें उन के शोरूम के उद्घाटन के लिए बड़ी अभिनेत्री कैटरीना कैफ का नाम सुझा कर 20 लाख रुपए का खर्च बताया.

बैजू साहब बालाजी से किसी फाइवस्टार पार्टी में मिल चुके थे. इसलिए बैजू ने सहज ही बालाजी पर विश्वास कर के 20 लाख रुपए दे दिए. इस के बाद कैटरीना कैफ को शोरूम के उद्घाटन के लिए लाने की बात कौन कहे, वह खुद ही गायब हो गया. कई दिनों तक बैजू साहब बालाजी को फोन करते रहे, लेकिन जब बालाजी का कुछ पता नहीं चला तो उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि वह बालाजी द्वारा ठग लिए गए हैं. इस के बाद उन्होंने थाना कलसमरी जा कर बालाजी के खिलाफ धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज करा दी. इस मामले की जांच सबइंसपेक्टर अब्दुल लतीफ को सौंपी गई.

एक ओर पुलिस बालाजी की तलाश कर रही थी, दूसरी ओर शातिरदिमाग बालाजी चेन्नई के अन्नानगर पश्चिम एक्सटेंशन में फ्यूचर टेक्निक प्राइवेट लिमिटेड नामक फरजी कंपनी खोल कर मोटा हाथ मारने की तैयारी में था. इस के लिए उस ने अपने एक परिचित एम बाला सुब्रमण्यम और उन की पत्नी चित्रा सुब्रमण्यम को कंपनी का मैनेजिंग डायरैक्टर बना कर कैनरा बैंक से 19 करोड़ रुपए का लोन ले लिया. पैसा हाथ में आते ही वह लीना के साथ भूमिगत हो गया.

जब यह धोखाधड़ी सामने आई तो बैंक अधिकारियों के होश उड़ गए. बैंक का डिप्टी जनरल मैनेजर टीएस नालाशिवन ने बालाजी के खिलाफ धारा 420, 406, 419, 170 और 34 के तहत थाने में शिकायत दर्ज कराई. मामला एक बड़ी ठगी और सरकारी पैसों का था, इसलिए पुलिस ने तत्काल काररवाई करते हुए कंपनी के बेकुसूर मैनेजिंग डायरैक्टर टी.एस. सुब्रमण्यम और उन की पत्नी चित्रा सुब्रमण्यम को गिरफ्तार कर लिया. जबकि असली ठग बालाजी पुलिस के हाथ नहीं लगा. पुलिस उसे तलाश रही थी. इस के बावजूद बालाजी चुप नहीं बैठा. उस ने चेन्नई स्थित स्काईलार्क टैक्सटाइल्स एंड आउटफिटर नामक कंपनी के मालिक चक्रवर्ती को अपने निशाने पर ले लिया. चक्रवर्ती राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के कर्मचारियों की वर्दियां तैयार कराने का ठेका लेते थे. इस के लिए वह अधिकारियों से साठगांठ रखते थे.

लीना और बालाजी ने चक्रवर्ती को कर्नाटक राज्य के मैडिकल तथा ट्रांसपोर्ट डिपार्टमैंट के कर्मचारियों की वर्दियां तैयार कराने का ठेका दिलाने के नाम पर 63 लाख रुपए ऐंठ लिए थे. चक्रवर्ती से उस ने खुद को तमिलनाडु अरबन डेवलपमैंट प्रोजेक्ट का डायरैक्टर जयकुमार और लीना को अपनी सेक्रैटरी बताया था. खुद के ठगे जाने का एहसास होने पर चक्रवर्ती ने अपना सिर पीट लिया. हाथ मलते हुए वह 6 मई, 2013 को थाने पहुंचे और शिकायत दर्ज करा दी. उन की यह शिकायत लीना और बालाजी के खिलाफ धारा 420, 406, 419, 120बी के तहत दर्ज हुई थी.

इस तरह जब बालाजी और लीना के खिलाफ एक के बाद एक कई शिकायतें दर्ज हुईं तो चेन्नई पुलिस और सेंट्रल क्राइम ब्रांच पुलिस लीना और बालाजी के पीछे हाथ धो कर पड़ गई. पुलिस का शिकंजा कसते देख दोनों चेन्नई छोड़ कर दिल्ली चले गए. दिल्ली में वे एक फार्महाउस किराए पर ले कर वीआईपी की तरह रहने लगे. लेकिन पुलिस की निगाहों से वे वहां भी नहीं बच सके और 27 मई, 2013 को एएटीएस द्वारा पकड़े गए.

एक साल तक जेल में रहने के बाद मार्च, 2014 में जब लीना और बालाजी जमानत पर बाहर आए तो वे मुंबई आ गए और यहां भी उन्होंने अपना पुराना जालसाजी का कारोबार शुरू कर दिया. लेकिन इस बार उन की सोच कुछ अलग तरह की थी. यहां उन्होंने महज एक साल में करीब एक हजार लोगों को अपनी ठगी का शिकार बना कर लगभग 10 करोड़ रुपए ठग लिए. लोगों को जाल में फंसाने के लिए बालाजी खुद को एक बड़ा बिजनैसमैन और बंगलुरु का सांसद बताता था.

रहने के लिए उस ने गोरेगांव के पौश इलाके में 3 हजार स्क्वायर फुट का एक आलीशान फ्लैट अपने ड्राइवर के नाम पर किराए पर लिया था, जिस की डिपौजिट 3 लाख रुपए और किराया 75 हजार रुपए था. आनेजाने के लिए महंगी लग्जरी विदेशी गाडि़यां थीं. इन्होंने अंधेरी के पौश इलाके लोखंडवाला के इनफिनिटी मौल में किंग ग्रुप औफ लायन ओके इंडिया नामक एक फरजी वित्तीय संस्था का औफिस खोला. लोगों को आकर्षित करने के लिए उन्होंने घर और औफिस में लाखों रुपए इंटीरियर में खर्च किया. संस्था का चेयरमैन उन्होंने सलमान रिजवी को बनाया. उन की मदद के लिए स्टाफ भी रखा गया. कंपनी में निवेश कराने के लिए मोटे कमीशन पर एजेंटों की नियुक्ति की गई.

निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बालाजी और लीना खुद महंगी विदेशी गाडि़यों से 2-3 घंटे के लिए किंग ग्रुप औफ लायन ओके इंडिया के औफिस आते थे. इस के साथसाथ इस वित्तीय संस्था का प्रचारप्रसार कुछ इस तरह किया गया कि निवेशकों को सहज उन पर और उन की संस्था पर विश्वास हो गया. संस्था निवेशकों से 60 से ले कर 2 सौ और 15 सौ प्रतिशत तक अकल्पनीय ब्याज देने का वादा करती थी. इस के अलावा कंपनी की ओर से निवेशकों को उन के निवेश के आधार पर उपहारस्वरूप महंगी घड़ी, नैनो कार, कीमती चश्मा और विदेश घूमने का पैकेज दिया जाता था. साथ ही किसीकिसी को उस के द्वारा किए गए निवेश का 20 प्रतिशत तुरंत वापस कर दिया जाता था.

इस तरह के महंगे उपहारों के प्रचार से आकर्षित हो कर निवेशक खुदबखुद उस की कंपनी की ओर खिंचे चले आते थे. किसी निवेशक को संस्था और उन पर शक न हो, इस के लिए वे बाकायदा निवेशकों को उन के रिटर्न की गारंटी और बैंकों की ओर से फिक्स डिपौजिट की रसीद देते थे. यह अलग बात थी कि उन के द्वारा दी गई फिक्स डिपौजिट की रसीदें कैश नहीं होती थीं. क्योंकि उस के कैश होने की तारीख आने पर लीना अपनी अदाओं से और बालाजी अपनी प्रतिभा से निवेशकों को लालच दे कर उन्हें अपनी अन्य किसी स्कीम में पैसा लगाने के लिए तैयार कर लेते थे.

लीना और बालाजी ने किंग ग्रुप औफ लायन ओके इंडिया कंपनी के तहत कई अन्य लुभावनी स्कीमें भी चला रखी थीं. मसलन सुपर नंबर-5, स्पेशल हार्वेस्ट वीक, सुपर हार्वेस्ट प्लस वन, न्यू ईयर बोनस, क्रिसमस बोनस, वन प्लस वन, वन प्लस टू, गणेश स्पैशल, दुर्गा पूजा पोंगल स्पैशल और दीपावली गोल्डन डायमंड. लीना से डा. बोहरा की मुलाकात उस के इलाज के दौरान हुई थी. जब लीना के इलाज के लिए डा. बोहरा उस के फ्लैट पर गए तो उस के फ्लैट का डेकोरेशन और रहनसहन देख कर हैरान रह गए.

डाक्टर होने के नाते वह तमाम बिजनैसमैनों और उद्योगपतियों के घर गए थे, लेकिन उन्होंने इस तरह ठाठबाट से रहते हुए किसी को नहीं देखा था. लीना को देख डा. बोहरा चलने लगे तो लीना ने उन की फीस से 3 गुना फीस दी थी. इस से वह लीना और बालाजी से काफी प्रभावित हुए. वह उन के बारे में सोचने लगे कि इन का ऐसा कौन सा बिजनैस है, जो ये इस तरह शानोशौकत से रहते हैं. काफी सोचनेविचारने के बाद भी बात उन की समझ में नहीं आई.

अगले दिन जब वह लीना को देखने उन के घर गए तो उन्होंने बालाजी से उन के कारोबार के बारे में पूछ ही लिया. इस के बाद लीना और बालाजी ने उन्हें अपने कारोबार के बारे में बताया तो सच्चाई जान कर उन का मुंह खुला का खुला रह गया. यही नहीं, लीना और बालाजी ने उन से यह भी कहा कि अगर वह भी चाहे तो उन की तरह ठाठ से रह सकते हैं. उन के पास एक ऐसी स्कीम है, जिस में मात्र एक साल में 5 लाख रुपए का 15 लाख और 3 साल में 50 लाख हो सकते हैं.

डा. बोहरा पढ़ेलिखे और समझदार थे. वह अच्छी तरह जानते थे कि देश के सभी वित्तीय संस्थान रिजर्व बैंक के नियमानुसार काम करते हैं और रिजर्व बैंक में कोई ऐसी स्कीम नहीं है, जो मात्र एक साल में रकम को दोगुना और 3 गुना कर दे. इस के बावजूद डा. बोहरा ने आंख मूंद कर अपने 70 लाख रुपए लीना और बालाजी की फरजी कंपनी किंग औफ लायन ओके इंडिया में निवेश कर दिए. इस की वजह यह थी कि उन्हें विश्वास था कि जिस कंपनी के निदेशक मंडल में ‘मद्रास कैफे’ जैसी सुपरहिट फिल्म की अभिनेत्री के अलावा मशहूर फिल्मी हस्ती गीतकार स्व. हसरत जयपुरी के घर के लोग शामिल हों, उस संस्था में रुपए डूबने का सवाल ही नहीं पैदा होता.

इस के अलावा कंपनी ने विश्वास जमाने के लिए बैंकों की गारंटी और फिक्स डिपौजिट की रसीदें दी थीं, जिन में सारी शर्तें लिखी थीं. डा. बोहरा लीना और बालाजी के रहनसहन तथा बातव्यवहार से कुछ इस तरह प्रभावित हुए थे कि उन्होंने यह बात अपने दोस्तों और क्लीनिक में आने वाले कई संपन्न मरीजों को भी बताई. उन के कहने पर ही भारीभरकम ब्याज के लालच में कई लोगों ने लीना और बालाजी की संस्था में रुपए लगा दिए. उन के एक दोस्त डा. शेख ने तो 50 लाख रुपए निवेश किए ही, उन के कई अन्य जानपहचान वालों ने भी लीना और बालाजी की इस फरजी कंपनी में रुपए लगा दिए.

लीना और बालाजी जिस तरह करोड़ों रुपए कमा रहे थे, उसी तरह खर्च भी कर रहे थे. उन का मकसद सिर्फ मौजमस्ती करना था. वे अपने लिए महंगीमहंगी चीजें खरीदते थे. जिस का पेमेंट वह कैश में करते थे. वे बड़ीबड़ी विदेशी गाडि़यों में फाइव स्टार होटलों में जाते और वहां पार्टियां करते और अपनी फरजी कंपनी और स्कीमों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करते. लीना और बालाजी जहां बड़े और संपन्न लोगों का ध्यान अपनी कंपनी की ओर खींच रहे थे वहीं दूसरी तरफ उन की कंपनी के कर्मचारी और एजेंट मोटे कमीशन के लालच में मध्यमवर्गीय और उच्च मध्यमवर्गीय लोगों को ज्यादा से ज्यादा ब्याज का लालच दे कर उन्हें लुटवा रहे थे.

ये वे लोग थे, जो अपना पेट काट कर अपनी परेशानियों को दूर करने के लिए एकएक पैसा जोड़ कर जमा कर रहे थे. ऐसे लोगों को कम समय में उन की रकम को दोगुना करने का लालच दिया जा रहा था. उन का सोचना था कि ब्याज मिलेगा तो उन की परेशानियां दूर हो जाएंगी. लेकिन इस का मौका ही नहीं आता था. जब उन के पैसे वापस करने का समय आता था तो उस पैसे का कुछ हिस्सा दे कर बाकी पैसे और अधिक ब्याज के लालच में किसी अन्य स्कीम में लगवा लिया जाता था. इस से वे खुश हो जाते थे और खुशहाल जिंदगी के सपने देखने लगते थे.

लीना और बालाजी ने इस मामले में अपने घर में काम करने वाली नौकरानी यशोदाबेन हरिजन को भी नहीं बख्शा. लीना ने उस के 50 हजार रुपए और कई महीने का वेतन रोक कर अपनी कंपनी की किसी स्कीम में लगवा दिए थे. चेन्नई से मुंबई आने के बाद लीना की मुलाकात सब से पहले फिल्म गीतकार स्व. हसरत जयपुरी के पोते आदिल अख्तर हुसैन जयपुरी से जुहू के एक जिम में हुई थी. आदिल ने लीना की फिल्म ‘मद्रास कैफे’ देखी थी, जिस से वह उस से काफी प्रभावित थे. आदिल भी फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों में थे इसलिए लीना से जल्दी ही उन की दोस्ती हो गई.

दोस्ती घनिष्ठता में बदली तो लीना और बालाजी ने उन्हें अपनी योजना के बारे में बताया. आदिल पौश इलाके मौडल टाउन सोसायटी, गुलमोहर रोड जेवीसीडी स्कीम जुहू विलेपार्ले पश्चिम स्थित गजल विला में अपने मातापिता के साथ रहते थे. उन्होंने लीना और बालाजी को अपने पिता अख्तर हुसैन से मिलवा कर उन की योजना के बारे में बताया तो उन्हें भी खुशी हुई. बिना सोचेविचारे वह आदिल और अपने एक रिश्तेदार नासिर हुसैन जयपुरी तथा एक परिचित सलमान रिजवी के साथ उन की योजना में शामिल हो गए.

चूंकि स्व. हसरत जयपुरी का परिवार हाई प्रोफाइल था, इसलिए उस का उठनाबैठना भी वैसे ही लोगों में था. उन की वजह से तमाम लोग लीना और बालाजी की इस फरजी कंपनी पर विश्वास ही नहीं किया, बल्कि जुड़ भी गए. सलमान रिजवी तो उन के कहने पर मैनेजिंग डायरैक्टर बन गए. इन की वजह से फिल्मों से जुड़े लोगों ने भी लीना और बालाजी की संस्था में रुपए निवेश किए. लीना मारिया पौल और बालाजी उर्फ शेखर रेड्डी उर्फ सुकेश चंद्रशेखर उर्फ जयकुमार न जाने कितने लोगों को शिकार बनाता, उस के पहले ही मुंबई की आर्थिक अपराध शाखा के अधिकारियों को उस के इस गोरखधंधे की सूचना मिल गई और दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया.

इस के बाद उन के फ्लैट और औफिस की तलाशी में उन के इस गोरखधंधे से जुड़े 4 सौ से अधिक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज और निवेशकों के ढेरों फार्म बरामद हुए. दिल्ली की ही तरह ही उन के पास 7 लग्जरी गाडि़यां, जिन में रोल्स रायस फैंटम, निसान जीटीआर, एस्टन मार्टिन, हमर, पजेरो, रेंज रोवर, मित्सुबिशी इवो, बीएमडब्लू 5300, लैंड क्रूजर जैसी गाडि़यां थीं. इन गाडि़यों को लीना पौल और बालाजी ने ओएलएक्स डौट कौम से खरीदा था. जिन का उन्होंने नगद भुगतान किया था.

इस के अलावा लीना पौल और बालाजी के फ्लैट से लगभग 1 करोड़ मूल्य की 117 विदेशी घडि़यां, 4 लाख 80 हजार रुपए के 12 महंगे मोबाइल फोन, लीना पौल के 78 हैंडबैग, 8 जैकेट, 37 सनग्लास, 43 ट्राउजर्स, 40 जोड़े जूते और नामीगिरामी कंपनियों के परफ्यूम, जिस की कीमत लाखों में थी, प्राप्त हुए हैं. इन लोगों ने बाथरूम में गोल्ड प्लेटेड नल लगवा रखे थे. बालाजी की अलमारी से 42 जींस, 200 टीशर्ट, 73 शर्ट और 80 जोड़े जूते मिले. उन की इन चीजों को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये लोग कितनी शानोशौकत से रहते थे.

विस्तृत पूछताछ के बाद फिल्म अभिनेत्री से ठग बनी लीना मारिया पौल और बालाजी उर्फ शेखर रेड्डी उर्फ सुकेशचंद्रशेखर उर्फ जयकुमार, अख्तर हुसैन जयपुरी, आदिल अख्तर जयपुरी, नासिर हुसैन जयपुरी, सलमान रिजवी के खिलाफ अपराध क्रमांक 33/15 पर भादंवि की धारा 420, 120बी, 3, 5, प्राइज चिटफंड सर्क्युलेशन बैंकिंग ऐक्ट 3 एमपीआईडी के तहत मुकदमा दर्ज कर सभी को अदालत में पेश किया गया, जहां से इन्हें जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक सभी अभियुक्त जेल में बंद थे. आगे की तफ्तीश क्राइम ब्रांच की आर्थिक अपराध शाखा के इंसपेक्टर अशोक खेडकर कर रहे थे. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Kahani: खुशियों के दुश्मन

Hindi Kahani: थानेदार ने तफ्तीश कर के रिपोर्ट पेश कर दी थी कि जमील की मौत हादसा है, लेकिन उस की मां का कहना था कि जमील की मौत हादसा नहीं, साजिश के तहत की गई हत्या है. जब इस मामले की जांच दूसरे थानेदार इंसपेक्टर अहमदयार खान ने की तो यह बात सच भी निकली.

दिल्ली की सीआईए (क्राइम ब्रांच) में तैनात एसपी पी.एल. थांपसन को हिंदुस्तानी सिपाही ही नहीं, अंगरेज अफसर भी बास्टर्ड कहा करते थे, क्योंकि वह बहुत सख्त अधिकारी था. थांपसन के चेहरे पर कभी मुसकराहट नहीं आती थी. अनुशासन के मामले में वह इतना सख्त था कि अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को कुछ नहीं समझता था. किसी मजबूरी की वजह से भी किसी से कोई गलती हो जाती थी तो उस की मजबूरी को समझते हुए भी वह उसे माफ नहीं करता था.

थांपसन हर समय काम में लगा रहता था और किसी दूसरे को भी खाली नहीं बैठने देता था. अपने स्टाफ से वह सप्ताह में एक बार जरूर कहता था कि लोगों की इज्जत और जानमाल की सुरक्षा की जिम्मेदारी तुम्हारी है. अगर कोई घटना हो जाए तो अपराधी को पकड़ने के लिए तब तक काम में लगे रहो, जब तक वह पकड़ा न जाए. वह अपने अफसरों को तांगे के घोड़ों की तरह काम में लगाए रखता था. मैं ने भी उस से सब से अच्छी बात जो सीखी थी, वह यह थी कि जो भी काम करो, लगातार और मेहनत से करो. निराशा को पास मत आने दो. जिस किसी पर जरा भी शक हो, उसे मत छोड़ो. तुम्हारी सारी सहानुभूति पीडि़त के साथ होनी चाहिए.

जिस अधिकारी को हम बास्टर्ड कहा करते थे, वह बहुत न्यायप्रिय और अपने काम को अपना नैतिक कर्तव्य समझता था. एक दिन मेरे साथी इंसपेक्टर टेनिसन ने मुझे बुला कर एक कागज पकड़ाते हुए कहा, ‘‘इसे पढ़ो.’’

वह एक महिला का प्रार्थना पत्र था, जिस का जवान बेटा जिस ईंटों के भट्ठे पर काम करता था, उसी में गिर कर जल कर मर गया था. इस बात को 2 महीने बीत चुके थे. थांपसन ने बताया था कि यह प्रार्थना पत्र उसे एक बड़े सम्मानित व्यक्ति ने दिया था. जिस औरत का पत्र था, वह संबंधित थाने में जाती रही थी. उसे शक था कि उस का बेटा खुद गिर कर नहीं मरा, बल्कि उसे गिरा कर मारा गया है. थाने का थानेदार उसे यह कह कर टालता रहा कि उस ने तफतीश कर ली है, उस का बेटा मारा नहीं गया था, बल्कि खुद गिर कर मरा था. जिस सम्मानित व्यक्ति ने यह कागज दिया था, वह हाईकोर्ट में एडवोकेट थे. वह अपने एक मित्र डीएसपी के साथ थांपसन से मिले थे. उस आदमी ने एसपी थांपसन को बताया था कि वह भट्ठे के मालिक को जानते हैं और उन्हें लड़के  की मौत पर शक है.

थांपसन ने इस मामले में उस इलाके के थानेदार से बात की थी, लेकिन वह थानेदार की बात से संतुष्ट नहीं थे. एसपी ने कहा कि तुम दोनों इस केस की तफ्तीश करो, अगर थानेदार ने जानबूझ कर कोई गलती की है या बिना तफतीश किए रिपोर्ट में उस की मौत संयोगवश लिख दी है तो उसे गिरफ्तार कर के मुझे रिपोर्ट करो. थांपसन के कहे अनुसार, मैं और टेनिसन उस इलाके के थाने गए, जिस इलाके में भट्ठा था. थानेदार सदाकत अली खान अंबाला का रहने वाला था. वह मौजमस्ती करने वाला अनुभवी आदमी था. उस का परिवार काफी असरदार था.

थाने पहुंच कर हम ने उसे अपने आने के बारे मे बताया तो उस ने कहा, ‘‘उस औरत ने तो मेरी नाक में दम कर रखा है. यह सच है कि उस का जवान बेटा मरा है, मैं ने उसे संतुष्ट करने की बहुत कोशिश की, लेकिन अब पता चला कि वह ऊपर पहुंच गई है. आप लोगों को उस ने बिना वजह कष्ट दिया.’’

‘‘मां तो कभी संतुष्ट नहीं होगी, लेकिन आप हमें संतुष्ट करने के लिए केस की फाइल दिखा दें.’’ मैं ने कहा तो वह फाइल ले आया.

फाइल के अनुसार, किसी व्यक्ति ने आ कर बताया था कि उस का एक नौकर पांव फिसलने से भट्ठे में गिर गया और जल कर मर गया. वह घटनास्थल पर पहुंचा और लाश देखी. वह इतनी बुरी तरह जल गई थी कि पहचानी नहीं जा सकती थी. उस ने मौके पर 3 लोगों से पूछताछ की, जिन्होंने बताया कि वह फिसलने से ही भट्ठे में गिर कर मरा था. थानेदार ने इस घटना को संयोगवश हुई घटना बता कर केस बंद कर दिया था.

‘‘खान साहब, आप ने जबानी तौर पर मालूमात कर के जो तफतीश की थी, वह भी हमें सुना दो.

उस ने बताया, ‘‘पहली बात तो यह पता चली कि मरने वाला जमील अहमद विधवा मां का बेटा था. उस ने 2, ढाई साल पहले मैट्रिक की परीक्षा पास की थी और उस के बाद भट्ठे के मालिक के यहां नौकर हो गया था. भट्ठे का मालिक बहुत बड़ा ठेकेदार था, जो सरकारी ठेके ले कर निर्माण कार्य कराता था.’’

मैं ने थानेदार से पूछा, ‘‘इस के अलावा और कुछ बताएंगे?’’

‘‘आप पूछिए, बताता हूं.’’ उस ने कहा तो टेनिसन ने पूछा, ‘‘मरने वाले को भट्ठे पर क्या काम दिया गया था?’’

थानेदार ने कहा, ‘‘मैं ने यह नहीं पूछा था कि उसे क्या काम दिया गया था, बस इतना पता चला था कि वह वहां नौकर था.’’

‘‘आप को जरा भी शक नहीं हुआ कि मरने वाले की वहां किसी से दुश्मनी रही हो और उसे भटठे में धक्का दे दिया गया हो?’’

‘‘मैं ने फाइल में तो नहीं लिखा, लेकिन मैं ने पता किया था. उस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी.’’

मैं ने नोट किया था कि यह कहते हुए थानेदार की जबान साथ नहीं दे रही थी. इस का मतलब वह झूठ बोल रहा था.

‘‘सदाकत भाई, हम तफतीश करने आए हैं, अगर कोई संदेह वाली बात हो तो हमें बता दो या यह कह दो कि आप ने तफ्तीश में उतनी रुचि नहीं ली, जितनी लेनी चाहिए थी. आप का यह कह देना काफी नहीं है कि वह मां है, इसलिए तंग कर रही है.’’

सदाकत अली बेचैन हो गया. उस के चेहरे के भावों से साफ लग रहा था कि उस से गलती हुई थी. अगर मेरे साथ अंगरेज अफसर नहीं होता तो शायद वह मुझ से बिना झिझके बात करता. अंगरेज अफसरों से हिंदुस्तानी अफसर डरते थे. इंसपेक्टर टेनिसन ने कहा कि वह हमें उस औरत के घर तक पहुंचा दे, क्योंकि पुरानी दिल्ली में किसी का मकान ढूंढना आसान नहीं था.

सदाकत अली ने हमें एक हेडकांस्टेबल के साथ उस औरत के घर भेज दिया. जाते वक्त टेनिसन ने कहा, ‘‘एक काम करना खान, ठेकेदार खलील से कहना कि वह थाने आ जाए. हम वापस थाने आएंगे.’’

उस औरत के घर पहुंच कर हम ने घर का दरवाजा खटखटाया. 5-6 मिनट बाद एक अधेड़ उम्र की औरत ने दरवाजा खोला. चेहरेमोहरे और पहनावे से वह मिडिल क्लास की अच्छीभली महिला लग रही थी. इस उम्र में भी वह काफी सुंदर थी. वह हमें घर के अंदर ले गई. औरत का नाम राशिदा था. उस के पति को मरे 4-5 साल हो गए थे. उस का भाई कुछ पैसे दे दिया करता था, जिस से घर का खर्च चलता था. उस का बेटा जमील दसवीं पास कर के भट्ठे पर नौकरी करने लगा था.

‘‘आप यह बताइए कि आप को कैसे शक हुआ कि आप का बेटा भट्ठे में खुद नहीं गिरा, बल्कि उसे धक्का दे कर आग में गिराया गया था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मेरा बेटा हर रात मेरे सपने में आता है और मुझ से कहता है कि मेरे हत्यारों को पकड़वाओ, मैं खुद नहीं गिरा.’’ उस ने भावुक हो कर कहा.

‘‘क्या वह यह नहीं बताता कि उसे किस ने धक्का दिया था?’’

‘‘नहीं, मैं पूछती हूं, तब भी नहीं बताता.’’ उस ने कहा, ‘‘लेकिन उस के इस तरह सपने में आने से मुझे पूरा यकीन है कि वह खुद नहीं गिरा.’’

यह एक मां के उदगार थे. उस की बात काटने के बजाय मैं ने और इंसपेक्टर टेनिसन ने कहा कि हम सच्चाई का पता लगाना चाहते हैं, जिस से कि हम हत्यारे को पकड़ सकें. मैं ने राशिदा से पूछा, ‘‘जमील भट्ठे पर कितने दिनों से काम कर रहा था, वह वहां क्या काम करता था?’’

‘‘मेरा बेटा वहां 3 सालों से काम कर रहा था, वह वहां नौकर नहीं, मुंशी था. ठेकेदार के घर भी जाता था और घरपरिवार की जरूरत की चीजें भी ला कर देता था. ठेकेदार की एक बेटी कालेज में पढ़ती थी, उसे लाने ले जाने के लिए एक तांगा लगा था. मेरा बेटा सुबह को उस लड़की को ले कर जाता था और शाम को वापस घर लाता था. ठेकेदार इस काम का उसे अलग से पैसे देता था. 5-6 दिनों से वह भट्ठे पर जा रहा था. उस ने बताया था कि भट्ठे का मुंशी छुट्टी गया है और उस के आने तक उसे ही वहां का हिसाबकिताब रखना पड़ेगा.’’

इंसपेक्टर टेनिसन ने पूछा, ‘‘ठेकेदार को आप के बेटे पर पूरा भरोसा था?’’

‘‘हां जी, भरोसा था तभी तो खलील अपनी बेटी को मेरे बेटे के साथ भेजता था. भरोसे की एक वजह यह भी थी कि ठेकेदार हमारा दूर का रिश्तेदार था. पहले उस का यही एक भट्ठा था. तब मकान कम बनते थे, इसलिए काम भी कम था. जब हिंदूमुसलमानों ने मकान बनाने शुरू किए तो उस के भट्ठे का काम बढ़ गया और खलील ठेकेदार भी बन गया.

‘‘आदमी होशियार और चालाक था, हर किसी को खुश करना जानता था. इसलिए जल्दी ही उस का कारोबार फैलता गया. 2 साल पहले उस ने नई दिल्ली में अपनी कोठी भी बना ली. मेरे पति के मरने के बाद उस ने हमारे ऊपर एक उपकार यह किया कि दसवीं पास करते ही मेरे बेटे को नौकरी पर रख लिया. जमील जल कर मर गया तो ठेकेदार ने मुझे 5 हजार रुपए भिजवाए, लेकिन मैं ने यह कह कर लेने से मना कर दिया कि मैं अपने बेटे की कीमत नहीं लूंगी.’’

‘‘आप को ठेकेदार पर तो शक नहीं है?’’ टेनिसन ने पूछा.

‘‘नहीं, उस पर शक नहीं है,’’ राशिदा ने कहा, ‘‘लेकिन उस से शिकायत जरूर है.’’

‘‘कैसी शिकायत?’’ मैं ने पूछा तो उस ने कुछ ऐसी बातें बताईं, जिन पर वह खुद भी मुतमईन नहीं थी.

‘‘अगर तुम्हें ठेकेदार पर शक है तो साफ बता दो और अग

नहीं है तो कह दो कि शक नहीं है.’’ मैं ने थोड़ी झुंझलाहट में कहा.

‘‘ठेकेदार पर शक का कोई कारण नहीं है,’’ राशिदा ने कहा, ‘‘इतने अमीर आदमी के साथ हमारी क्या दुश्मनी हो सकती है? उसे जमील पर भरोसा था, तभी वह अपनी जवान बेटी को उस के साथ भेजा करता था.’’

‘‘यह भी तो एक कारण हो सकता है कि उस की बेटी जवान थी और आप का बेटा भी. हो सकता है ठेकेदार ने उन दोनों को आपत्तिजनक हालत में देख लिया हो.’’

‘‘मैं यह नहीं मान सकती, मेरा बेटा इतना होशियार और चालाक नहीं था. अगर ऐसी बात होती तो ठेकेदार मुझ से शिकायत करता या उसे नौकरी से निकाल देता. उसे पता था कि हमारे लिए यही सजा बहुत है.’’

बातोंबातों में राशिदा ने हमें बताया था कि ठेकेदार ने पहले उसे 5 हजार रुपए देने चाहे थे, बाद में यह रकम बढ़ा कर 8 हजार कर दी थी. आजकल हजार रुपए कुछ नहीं हैं, लेकिन उस जमाने के एक हजार रुपए आज के एक लाख रुपए के बराबर होते थे. राशिदा ने यह रकम नहीं ली थी और थाने पहुंच गई थी.

2 महीने गुजर गए, जमील का चालीसवां होने के बाद ठेकेदार ने अपनी बेटी की शादी कर दी थी. राशिदा 3-4 बार थाने गई. उस ने हमें बताया कि थानेदार कभी तो उस से बड़े प्यार से बातें करता था, कभी उसे थाने से निकाल देता था. जिस एडवोकेट ने उस का प्रार्थना पत्र एसपी थांपसन के पास पहुंचाया था, वह उस के पति का दोस्त था. राशिदा से हमें कोई सबूत नहीं मिला. बस एक ही बात जो शक पैदा कर रही थी, वह यह थी कि जमील ठेकेदार की बेटी को स्कूल ले जाता और ले आता था. हमें यह पता करना था कि ठेकेदार की लड़की का चरित्र कैसा था.

मैं और टेनिसन लौट कर थाने पहुंचे तो खलील ठेकेदार थानेदार के पास बैठा था. उस की उमर 50-60 साल के लगभग थी. शक्ल और सूरत से वह सम्मानित व्यक्ति लगता था. मेरी राय में वह या तो बहुत सभ्य और सम्मानित आदमी था या फिर पक्का गुरुघंटाल था. मैं ने और टेनिसन ने तय कर लिया था कि उसे भट्ठे पर ले जा कर बात करेंगे, क्योंकि हमें भट्ठा भी देखना था. हम ने उस से कहा कि वह हमें अपने भट्ठे पर ले चले. उस का भट्ठा दिल्ली के बाहरी इलाके में था.

ठेकेदार खलील के भट्ठे पर पहुंच कर हम ने उस से वह जगह दिखाने को कहा, जहां से जमील आग में गिरा था. उस ने हमें वह जगह दिखाई. मैं ने और टेनिसन ने भट्ठे का किनारा ध्यान से देखा. वहां फिसलने लायक नहीं था. ठेकेदार ने हमें बताया कि जमील किनारे तक चला गया था.

‘‘उस समय वह अकेला था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं,’’ ठेकेदार ने जवाब दिया, ‘‘मजदूर बहुत होते हैं, उन पर एक मेट होता है, जो उन्हें संभालता है. उस समय वही उस के साथ था. उसी ने मुझे यह सब बताया था.’’

‘‘तब आप को जरा भी शक नहीं हुआ कि उसे किसी ने गिरा दिया होगा?’’ मैं ने पूछा.

‘‘आप का मतलब है कि उस की किसी से दुश्मनी रही होगी,’’ ठेकेदार ने कहा, ‘‘उस बेचारे की किसी से क्या दुश्मनी हो सकती थी. उसे तो भट्ठे पर आए 4 दिन हुए थे.’’

ठेकेदार का पूरा बयान हमें बाद में लेना था, अभी तो हम घटनास्थल देखने आए थे. हमें यह भी देखना था कि कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह था या नहीं? जिस मेट के साथ होने की बात ठेकेदार ने कही थी, वह वहीं था. मजदूर चले गए थे, चौकीदार आ गए थे. हम ने ठेकेदार से कहा कि वह रात को 9 बजे मेट को ले कर क्राइम ब्रांच औफिस आ जाए. हम दोनों रात 10 बजे हेडक्वार्टर पहुंचे. ठेकेदार मेट को लिए हमारे इंतजार में बैठा था. हम ने उसे 9 बजे का समय दिया था, लेकिन हम एक घंटा लेट आए थे. हम ने ठेकेदार को बुलाया. हमारे सवालों के जवाब में उस ने जमील के बारे में वही बातें बताईं, जो उस की मां बता चुकी थी.

‘‘साहब, मुझे इस लड़के के मरने का इतना दुख है कि आप अंदाजा नहीं लगा सकते. बेचारा अनाथ था, छोटे भाई और मां का एकलौता सहारा. मेरे पास इतना कुछ है कि मैं उस लड़के को नौकरी पर लगा कर सब से ज्यादा वेतन दिया करता था. बहुत सज्जन और भरोसे का लड़का था. उस के रहते मुझे किसी बात की चिंता नहीं थी. मेरी जवान बेटी को कालेज ले जाता था. मैं उस की मां का सामना नहीं कर सकता.’’

यह सब कहते हुए ऐसा लग रहा था, जैसे वह अभी रो पड़ेगा. मैं ने उस से पूछा, ‘‘तुम ने उस की मां को देने के लिए 5 हजार रुपए भेजे थे, लेकिन उस ने लेने से मना कर दिया. उस के बाद तुम ने 3 हजार और बढ़ा कर भेजे, लेकिन वह भी उस ने लेने से मना कर दिया. तब तुम ने उसे धमकी दी कि वह दूसरे बेटे को भी खो दोगी, यह धमकी तुम ने क्यों दी?’’

‘‘नहीं साहब, मैं ने उसे कोई धमकी नहीं दी. मैं ने तो कहा था कि उस का दूसरा बेटा मैट्रिक पास कर ले तो उसे मैं नौकरी दे दूंगा.’’ यह बातें कहने में वह घबरा रहा था, ‘‘असली बात यह है साहब कि वह मां है, उस का जवान बेटा मर गया है. उसे शक है कि उस के बेटे को किसी ने उठा कर आग में फेंक दिया है. ऐसी स्थिति में मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता. हो सकता है, मैं ने उसे थाने जाने से रोकने के लिए कोई सख्त बात कह दी हो और वह उसे धमकी समझ बैठी हो. मैं ने खुद ही पुलिस को बुलाया था. थानेदार साहब ने इस मामले की बहुत मेहनत से तफ्तीश की थी.’’

‘‘जमील तुम्हारे दूसरे काम करता था, फिर तुम ने उसे भट्ठे पर क्यों भेजा था?’’ इंसपेक्टर टेनिसन ने पूछा.

‘‘भट्ठे का मुंशी 7-8 दिनों के लिए छुट्टी पर चला गया था. जो नौकर थे, वे पैसों में गड़बड़ कर देते थे, जमील मेरे घर का मेंबर था, इसलिए उसे भेजा था.’’

‘‘तुम्हारा मुंशी इस के पहले कब छुट्टी पर गया था?’’ इंसपेक्टर टेनिसन ने पूछा.

अचानक पूछे गए इस सवाल से उस की जबान जरा हकला सी गई, ‘‘यह मैं पूछ कर बताऊंगा.’’

इस के बाद मैं ने और टेनिसन ने उस पर सवालों की बौछार कर दी, जिस से वह घबरा गया. घबराहट उस के चेहरे पर साफ नजर आ रही थी. अपने सवालों और उस के जवाबों से हम कई बातें समझ गए थे.

‘‘खलील साहब, मैं तुम्हें भाई की हैसियत से सलाह देता हूं कि अभी तुम्हारे पास समय है. अगर तुम हमें सच्ची बात बता देते हो तो तुम्हारे लिए आसानी रहेगी, क्योंकि हमें बाद में सच्चाई पता चली तो तुम्हारे लिए ठीक नहीं रहेगा. यह बात अच्छी तरह समझ लो कि इस केस की तफ्तीश सीआईए कर रही है. अभी तो तुम से बहुत आदर से बातें हो रही हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर हम दूसरे तरीके भी अपना सकते हैं.’’

‘‘आप को क्या शक है साहब?’’ उस ने पूछा.

‘‘शक नहीं, हमें पूरा यकीन है कि जमील को आग में फेंका गया है और तुम्हें इस की पूरी जानकारी है.’’

‘‘नहीं, मुझे कुछ नहीं मालूम. लेकिन जब आप कह रहे हैं कि उसे आग में फेंका गया है तो मैं इस बात का पता लगाऊंगा.’’ ठेकेदार ने कहा.

‘‘ठेकेदार साहब, हम तुम्हें कल शाम तक का समय देते हैं. अगर तुम्हारे दिल में कोई बात हो तो हमें बता दो.’’ कह कर ठेकेदार को घर भेज दिया.

ठेकेदार के जाने के बाद हम ने उस के मेट को बुलाया. वह 35-36 साल का छरहरे बदन का आदमी था. उस ने अपना नाम सिराज बताया. लेकिन सब उसे सागर के नाम से पुकारते थे. उस ने बताया कि वह पिछले 10 सालों से खलील के भट्ठे पर काम कर रहा था.

‘‘एक बात ध्यान में रख लो सागर, झूठ बोलोगे तो पिस जाओगे. यह धनी लोग अपना पाप गरीबों के खाते में डाल देते हैं. यहां भी मुझे ऐसा ही दिखाई दे रहा है. अच्छा यह बताओ कि जमील को ठेकेदार ने अन्य कामों से हटा कर भट्ठे पर क्यों लगाया था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मुंशी छुट्टी चला गया था, उस की जगह जमील आया था.’’ उस ने कहा.

‘‘मुंशी कब से काम कर रहा है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘हुजूर, कोई 6-7 साल से काम कर रहा है.’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘वह इस के पहले कब छुट्टी गया था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘जहां तक मुझे याद है 3 साल पहले गया था.’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘क्या उस समय भी ठेकेदार ने जमील को या किसी और को उस की जगह भट्ठे पर भेजा था?’’ मैं ने सवाल किया.

‘‘नहीं साहब.’’ उस ने कहा.

‘‘अच्छा यह बताओ, भट्ठे पर पैसे कौन खाता है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘कोई नहीं खा सकता, क्योंकि मेमो बनता है.’’ उस ने कहा.

‘‘झूठ बोल रहे हो. पैसे तुम मारते हो,’’ मैं ने उसे भड़काने के लिए कहा, ‘‘ठेकेदार ने जमील को भट्ठे पर इसीलिए भेजा था.’’

‘‘क्या यह बात ठेकेदार ने कही है?’’ उस ने चौंक कर पूछा.

‘‘यही नहीं, ठेकेदार ने तुम्हारी बहुत सी करतूत बताई हैं.’’ मेरे इतना कहते ही उस के चेहरे का रंग बदलने लगा.

मैं ने और टेनिसन ने उस दौरान भी उस से कई सवाल पूछे. वह उन के जवाब तो दे रहा था, लेकिन हम उस के जवाब के बजाय उस के चेहरे के उतारचढ़ाव को देख रहे थे. इस से हमें लगा कि उस के दिल में कोई बात है. मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए हम ने कुछ देर के लिए उसे दूसरे कमरे में भेज दिया और हम दोनों आपसी विचारविमर्श करने लगे. भट्ठे के मजदूरों पर जो मेट लगाए जाते हैं, उन में ज्यादातर अपराधी प्रवृत्ति के होते हैं. ठेकेदार खलील का यह मेट भी मुझे ऐसा ही लग रहा था. मैं ने और टेनिसन ने विचारविमर्श कर के तय किया कि इस मेट को भट्ठे पर न जाने दिया जाए, वरना इस के डर से कोई मजदूर सही बात नहीं बताएगा.

मेट सागर को हम ने दोबारा अपने कमरे में बुलाया और उस से पूछा कि जमील का चरित्र कैसा था? उस ने बताया कि उस का चरित्र ठीकठाक था. वह अपने काम से काम रखता था. उस ने यह भी बताया कि जमील ठेकेदार का दूर का रिश्तेदार था, इसलिए सब उस का सम्मान करते थे. मैं ने अपने शक की बिना पर उस से पूछा कि ठेकेदार की लड़की से जमील का क्या चक्कर चल रहा था?

‘‘मैं इस मामले में कुछ नहीं जानता सरकार. जमील उन के घर भी जाता था और उन की बेटी को कालेज भी ले जाता था और ले भी आता था.’’ उस ने कहा.

‘‘और लड़की के बारे में तुम्हारा क्या खयाल है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘लड़की परदे में रहती थी, कालेज भी बुरका पहन कर जाती थी. वैसे हुजूर, मैं आप को बता दूं कि ठेकेदार की सभी औरतें परदे में रहती हैं.’’ वह बोला.

‘‘जमील जब भट्ठे में गिरा था, उस समय तुम उस के साथ थे. तब तुम ने उसे आगे जाने से रोका क्यों नहीं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं ने उसे रोका था साहब, लेकिन उस का पांव ऐसा फिसला कि वह उस में गिर गया. मुझे लगा कि जैसे वह भट्ठे की आग देखने जा रहा है.’’ सागर ने बताया.

अगले दिन सुबह 8, साढ़े 8 बजे हम भट्ठे पर गए. ठेकेदार को हम ने नहीं बताया था कि हम वहां जाएंगे. वहां वही मुंशी मिल गया, जिस की जगह पर जमील को लगाया गया था. हम ने उस की बातचीत से महसूस किया कि मुंशी सागर से डरासहमा रहता था.

‘‘तुम पिछली बार छुट्टी पर कब गए थे?’’ मैं ने पूछा.

‘‘कोई 3 साल हो गए होंगे.’’ वह बोला.

‘‘इन 3 सालों में तुम्हें छुट्टी नहीं मिली या तुम खुद नहीं गए?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं कहीं दूर का आदमी नहीं हूं साहब,’’ उस ने हाथ के इशारे से कहा, ‘‘वह जो गली दिखाई दे रही है, उसी में रहता हूं.’’

‘‘अब शायद कोई लंबा काम आ पड़ा था, इसीलिए छुट्टी पर चले गए थे?’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं साहब, मुझे कोई काम नहीं था. वह तो एक दिन सागर ने मुझ से कहा कि तुम्हारे छुट्टी न लेने से ठेकेदार तुम्हें मैडल तो देगा नहीं. इसलिए छुट्टी लो और घूमोफिरो, मौजमस्ती करो. इस के बाद उस ने ठेकेदार से मुझे 8 दिनों की छुट्टी दिलवा दी थी.’’

जब मैं छुट्टी से लौटा तो पता चला कि जमील भट्ठे की आग में गिर कर मर गया. उस की मौत के बारे में जान कर मुझे बहुत दुख हुआ. मुंशी की बातों से साफ लग रहा था कि मुंशी को छुट्टी भिजवाना जमील की हत्या के षडयंत्र की एक कड़ी थी. अब हमें यह पता करना था कि यह साजिश अकेले सागर की थी या उस में ठेकेदार खलील भी शामिल था.

‘‘तुम बड़े काम के आदमी हो. ठेकेदार का यह भट्ठा तुम्हीं चला रहे हो. सागर तो कुछ काम करता नहीं, वह तो सिर्फ गुंडागर्दी करता रहता है.’’ उस की पीठ थपथपाते हुए मैं ने उस के अंदर खूब हवा भरी, जिस से वह कुछ और उगल दे. इंसपेक्टर टेनिसन ने भी उस की प्रशंसा के बड़ेबड़े पुल बांधे.

‘‘एक बात बताओ इदरीस,’’ मैं ने मुंशी से कहा, ‘‘जमील को मरे 2 महीने से ज्यादा हो गए हैं, जब तुम छुट्टी से लौट कर आए तो तुम ने मजदूरों से पूछा होगा कि जमील आग में कैसे गिरा? इस के बाद तुम ने सागर से पूछा होगा?’’

‘‘सब को हैरानी इस बात पर थी कि वह आग में गिरा कैसे? इतनी तेज आग के पास तो कोई जाता तक नहीं.’’ मुंशी ने जवाब दिया.

मैं ने कहा, ‘‘इदरीस कहीं ऐसा तो नहीं कि जमील का यहां किसी लड़की से चक्कर चल रहा हो और उस लड़की को सागर भी चाहता हो?’’ मैं ने पूछा.

‘‘साहब, इस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है और सही बात यह है कि सागर के विरुद्ध यहां कोई जबान नहीं खोल सकता. मैं भी उस से डरता हूं,’’ मुंशी ने कहा.

‘‘कहां है सागर?’’ इंसपेक्टर टेनिशन ने पूछा.

‘‘वह अभी आ जाएगा, वह साढ़े 10 बजे तक आता है.’’ मुंशी ने बताया.

‘‘वह अब नहीं आएगा, वह हवालात में बंद है.’’ टेनिसन ने कहा.

मुंशी हैरान हो कर देखने लगा.

‘‘हैरान न हो इदरीस,’’ मैं ने कहा, ‘‘सागर को हम ने गिरफ्तार कर लिया है.’’

हमारे साथ एक हेडकांस्टेबल और एक कांस्टेबल भी था. हम ने उन से कहा कि वे सागर को हथकड़ी लगा कर यहां ले आएं. मुंशी को जब पक्का यकीन हो गया कि उन का मेट गिरफ्तार हो गया है तो उस ने कहा, ‘‘साहब, अब मेरी समझ में आ गया कि सागर छुट्टी जाने के लिए मेरे पीछे क्यों पड़ा था. सच बात तो यह है कि यहां का हर मजदूर सागर से डरता है. यह आदमी मनमानी करता है.’’

पूछने पर मुंशी ने दिल्ली स्थित उस के घर का पता भी बता दिया था. इस के बाद मुंशी ने वहां काम करने वाले 5 मजदूरों को भी बुला लिया. हम ने उन सभी के बयान लिए. उन से पता चला कि सागर ही एक योजना के तहत जमील को भट्टे पर उस जगह ले गया था, जहां आग जल रही थी और उस ने उसे उस आग में धकेल दिया था. हम मजदूरों से पूछताछ कर रहे थे कि ठेकेदार आ गया. मैं ने उसे वहां से हटा दिया. ठेकेदार वहां से चला गया तो हम मजदूरों से और पूछताछ करने लगे. कुछ देर में पुलिस कांस्टेबल सागर को हथकड़ी लगाए ले आए. मैं ने देखा, मजदूर काम छोड़ कर हैरानी से सागर को हथकड़ी में बंधा देख रहे थे. उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि इतना दबंग आदमी भी गिरफ्तार हो सकता है.

इस के बाद हम ने मजदूरों से सागर के बारे में पूछा तो उन्होंने उस के गंदे कामों से परदा उठाना शुरू कर दिया. वह सभी मजदूरों से 5 रुपए हर महीने कमीशन लेता था. उन की लड़कियों को अपनी नौकरानी समझता था. हमें जो कुछ पता करना था, कर लिया था. फिर उसे हेडक्वार्टर ले आए. सागर पुरानी दिल्ली का रहने वाला था. मैं ने उस इलाके के थानेदार को उस का नामपता बता कर उस के बारे में और जानकारी जुटाने को कहा, साथ ही यह भी कहा कि अगर उस का कोई जानकार हो तो उसे भी साथ ले आएं.

थानेदार ने मुझे फोन पर ही बता दिया कि यह आदमी थाने के रिकौर्ड में है और एक बार इसे सजा भी हो चुकी है. सागर के आपराधिक रिकौर्ड की पूरी रिपोर्ट उन्होंने एक कांस्टेबल द्वारा मेरे पास भिजवा दी. उस सिपाही की सागर से दोस्ती थी. उस ने सागर की पूरी कहानी हमें सुना दी. उस ने जीबी रोड की एक वेश्या का नाम भी बताया, जिस के पास सागर अकसर जाता रहता था. मैं ने उस कांस्टेबल से उस वेश्या का पता ले लिया.

अगले दिन मैं हेडक्वार्टर गया तो टेनिसन को थानेदार द्वारा सागर के बारे में दी गई रिपोर्ट दिखाई और कांस्टेबल ने जो बातें जुबानी बताई थीं, वह भी बता दीं. टेनिसन ने उस वेश्या को बुलाने के लिए एक एएसआई को भेजा. यहां मैं आप को अपराधियों की मानसिकता के बारे में बता दूं कि इस तरह के लोग मन बहलाने के लिए वेश्याओं के पास जा कर शराब पीते हैं और लूटे हुए माल से ऐश करते हैं. छोटीमोटी घटनाएं ऐसे लोगों की आदत में शामिल होती हैं, लेकिन हत्या ऐसी घटना होती है, जिसे कोई भी हजम नहीं कर सकता. आम तौर पर देखा गया है कि पेशेवर हत्यारे भी हत्या कर के अपनी प्रिय वेश्या के पास जा कर शराब के नशे में बड़े घमंड से वेश्या को बता देते हैं कि वे हत्या कर के आए हैं.

हम ने उस वैश्या को इसी आशय से बुलाया था कि उस से हत्या का कोई सुराग जरूर मिल जाएगा. लगभग एक घंटे बाद वह वेश्या आ गई. 35 की उमर रही होगी उस की. बहुत सुंदर थी वह. हम ने उसे बिठाया. उस के चेहरे पर घबराहट और डर था. हम ने उसे सामान्य करने के लिए इधरउधर की बातें कीं. वह एक वेश्या थी, जिस का सोसाइटी में न कोई स्थान था और न आदरसम्मान. मेरे इज्जत देने पर वह गुब्बारे की तरह फूलती चली गई. कुछ देर बाद बोली कि उसे यहां क्यों बुलवाया गया है?

‘‘तुम्हारा यार सागर फांसी चढ़ रहा है.’’ मैं ने कहा, ‘‘उस रात सागर तुम्हारे पास गया था, तब उस ने तुम्हें पूरी घटना बता दी थी. यह बात वह कुबूल कर चुका है. तुम्हें केवल पुष्टि के लिए बुलाया है.’’

‘‘हां.’’ उस ने एक ठंडी सांस ले कर कहा, ‘‘उस रात वह बहुत अधिक पी कर आया था. उल्टीसीधी बकबक कर रहा था. उस ने कहा था कि आज बहुत पैसे कमाए हैं. एक लड़के को जिंदा जला कर भस्म कर दिया है. मैं समझी कि डींगे मार रहा है.’’

‘‘नहीं, डींगें नहीं, वह सच कह रहा था. तुम्हें उस ने कितनी रकम बताई थी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘5 हजार रुपए बता रहा था, लेकिन मैं ने विश्वास नहीं किया कि इतनी रकम कौन देगा.’’

इस के बाद सागर को हवालता से निकलवा कर उस के कारनामों का पुलिंदा रख दिया, साथ ही वेश्या की बात भी उसे बता दी. इस के बाद उस से अपराध कबूलवाने के लिए कहा, ‘‘सागर, तुम ने किस आदमी पर भरोसा किया. उस ठेकेदार पर, जिस ने बयान में कहा है कि तुम ने जमील को धक्का दिया था. ठेकेदार ने हमें गवाह भी उपलब्ध करा दिए हैं. जिस वेश्या पर तुम ने भरोसा किया था, अभीअभी बयान दे कर गई है. इसलिए गनीमत इसी में है कि तुम अपना जुर्म स्वीकार कर लो, वरना तुम्हारी जुबान खुलवाने के लिए हमें दूसरा तरीका अपनाना पड़ेगा.’’

यह सुनते ही उस ने ठेकेदार को गालियां देते हुए कहा कि उसी के कहने पर ही उस ने इतना बड़ा अपराध किया था और वही मेरे खिलाफ बयान दे गया. इस के बाद उस ने पूरी कहानी बयां कर दी. सिराज उर्फ सागर ठेकेदार का बौडीगार्ड था, साथ ही भट्ठे पर काम करने वाले मजदूरों को भी कंट्रोल करता था. किसी व्यक्ति को डरानेधमकाने या रुकी हुई रकम निकलवाने के लिए ठेकेदार उसी को इस्तेमाल करता था. एक दिन ठेकेदार ने सागर से कहा कि जमील को जमींदोज करना है. सागर ने कारण पूछा तो उस ने कहा कि उस की बेटी को जमील ने प्रेमजाल में फांस लिया है. उन का यह चक्कर बचपन से चल रहा है. लेकिन वह उसे स्कूल ले आने और ले जाने लगा तो उसे मिलने का मौका मिल गया.

शाइस्ता के लिए एक बहुत अच्छा रिश्ता आया था. लड़का शिक्षित और धनी व्यापारी का बेटा था. ठेकेदार ने रिश्ते के लिए हां कर दी. लेकिन शाइस्ता ने मां से साफ कह दिया कि वह जमील के अलावा किसी और से शादी नहीं करेगी. अगर उस के साथ जबरदस्ती की गई तो वह निकाह के समय मना कर देगी. उसे मांबाप और बहनों ने बहुत समझाया, लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रही. ठेकेदार ने उस की पढ़ाई छुड़वा कर शादी की तैयारियां शुरू कर दीं. शाइस्ता ने अपनेआप को एक कमरे में बंद कर लिया. उस ने धमकी दी कि वह दरवाजा तभी खोलेगी, जब जमील आ कर कहेगा. उस ने खानापीना तक छोड़ दिया.

बेटी की हालत देख कर ठेकेदार ने जमील को बुलाया. अब ठेकेदार को जमील दुश्मन दिख रहा था. उस ने सागर से कहा कि जमील को इस तरह से मारा जाए कि उस की बेटी को पता न चले कि उस की हत्या हुई है. सागर ने उसे 2-3 तरीके बताए, लेकिन ठेकेदार ने यह कह कर मना कर दिया कि इस से हत्या और अपहरण का शक होगा. तब ठेकेदार ने ही बताया कि जमील को भट्ठे की आग में डाल दिया जाए. यह तरीका सागर को भी आसान लगा. ठेकेदार ने उसे भरोसा दिया कि काम हो जाने पर वह उसे 5 हजार रुपए देगा.

सागर और ठेकेदार ने जमील को भट्ठे की आग में जलाने की योजना बनाई. इस के बाद योजना के अनुसार सागर ने मुंशी इदरीस को छुट्टी पर भेज कर उस की जगह जमील को काम पर लगवा दिया. 2-3 दिनों में सागर ने जमील से दोस्ती कर ली और एक दिन जमील के पास आ कर बोला, ‘‘आओ, मैं तुम्हें दिखाऊं कि भट्ठे में कच्ची ईंटें कैसे रखी जाती हैं और आग कैसे जलाई जाती है.’’

जमील सागर की बातों में आ कर उस के साथ भट्ठे पर चला गया. सागर ने मजदूरों को दूर भेज दिया. जमील को भट्ठे के किनारेकिनारे ले जाते हुए सागर उसे वहां ले आया, जहां तेज आग जल रही थी. जमील आग की गरमी से दूर हटने लगा तो सागर ने जमील को कूल्हे से इतनी जोर से धक्का मारा कि जमील आग में जा गिरा. जिस जगह वह गिरा था, वह जगह 10 फुट गहरी थी. जमील की केवल एक चीख सुनाई दी.

सागर ने शोर मचाया तो मजदूर इकट्ठा हो गए. तब तक जमील जल कर कोयला हो चुका था. आग में पानी फेंका गया. आग तो बुझ गई, लेकिन यह पता नहीं चल सका कि उस में आदमी जला है या पेड़ की टहनी. ठेकेदार को सूचना दी गई, वह आया और उस ने थाने को सूचना दी. इलाके का थानेदार सदाकत अली भट्ठे पर आया और थोड़ीबहुत पूछताछ कर के चला गया. मैं ने सागर से पूछा, ‘‘थानेदार ने तफतीश तो की होगी?’’

‘‘अजी उस ने कोई तफतीश नहीं की, 5 सौ रुपए ले कर लिख दिया कि मौके का निरीक्षण करने पर पता चला कि मौत दुर्घटना के कारण हुई थी. हम तो खुश थे कि मामला खतम हो गया. लेकिन जमील की मां की आहें रंग लाईं और असलियत सामने आ गई.’’

सागर के इस खुलासे के बाद ठेकेदार को गिरफ्तार कर लिया गया. जब उसे पता चला कि सागर ने सारा खुलासा कर दिया है तो उस के सामने भी अपना अपराध स्वीकार करने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं था. पूरा मामला खुल चुका था. दोनों अभियुक्त भी गिरफ्तार किए जा चुके थे. इस में सदाकत अली की भूमिका संदिग्ध दिखी. इंसपेक्टर टेनिसन ने एसपी थांपसन के सामने दोनों अभियुक्तों को पेश किया. उन्होंने भी उस से पूछताछ की. जांच के बाद एसपी ने थानेदार सदाकत अली को निलंबित कर दिया. यह हत्या शाइस्ता की वजह से हुई थी, इसलिए उस का बयान भी जरूरी था. हम ने उसे भी थाने बुलवा लिया.

लेकिन उस की जगह उस का पति आया. मैं ने कहा, ‘‘आप शाइस्ता को हमारे पास भेजें. आप निश्चिंत रहें, हम उस से दोएक बातें पूछ कर उसे आप के साथ भेज देंगे.’’

दरअसल, शाइस्ता को आप के पास भेजने से पहले मैं आप को एक जरूरी बात बताना चाहता हूं. आप मेरी बात सुन लें, फिर शाइस्ता से जो चाहें, पूछ लें.’’

मैं ने इंसपेक्टर टेनिसन की ओर देखा. उन्होंने सिर हिलाया. इस के बाद उस ने कहा, ‘‘मैं आप को ऐसी बात बताने जा रहा हूं, जिसे सुन कर आप हैरान रह जाएंगे. शाइस्ता से शादी के बाद मैं बहुत खुश था. लेकिन शादी की पहली रात उस ने मुझ से कहा, ‘आप ने न मेरा अपहरण किया है और न ही आप के मातापिता ने मेरे साथ कोई ज्यादती की है. इस में आप का कोई दोष नहीं है, इसलिए आप को यह बताना जरूरी है कि मैं ने आप को दिल से कबूल नहीं किया है. लेकिन मैं आप को मायूस नहीं करूंगी. मेरा शरीर आप का है, आप इसे जिस तरह चाहे प्रयोग करें, लेकिन भावनात्मक तौर पर मैं आप का साथ नहीं दे सकूंगी.’

‘‘मैं उस की बातें सुन कर हिल गया. मैं ने उस से पूछा कि क्या तुम किसी और को पसंद करती हो? उस ने कहा, ‘आप ने सुना होगा कि हमारे भट्ठे पर जमील नाम का एक लड़का आग में गिर कर मर गया था. मैं उसी से प्यार करती थी. वह दुर्घटना नहीं, बल्कि उसे मेरे घर वालों ने साजिश रच कर मारा है. लेकिन कोई भी ताकत उसे मेरे दिल से नहीं निकाल सकती. मैं आप से बागी नहीं हो सकती, आप का हर हुक्म मानूंगी.’

‘‘पता नहीं क्या हुआ सर, उस की हृदयस्पर्शी बातें सुन कर मैं ने मन ही मन तय कर लिया कि मैं शाइस्ता को उस के अतीत की बातें अपने मातापिता को भी पता नहीं चलने दूंगा. मुझ से जमील के बारे में कितनी भी बातें करे, मैं बुरा नहीं मानूंगा. मैं वही करूंगा जो वह कहेगी. उस ने मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में ले कर आंखों से लगाए और बहुत रोई. आज हमारी शादी को 20-21 दिन हो गए हैं, मैं ने उसे बिलकुल भी हाथ नहीं लगाया है.’’

उस की बातों को हम ने बड़े गौर से सुना और ताज्जुब भी हुआ. हमें शाइस्ता से बात करनी थी, इसलिए उसे हम ने कमरे में बुला लिया और उस से बात होने तक उस के पति को बाहर बैठ कर इंतजार करने को कहा. उस के जाने के बाद मैं और इंसपेक्टर टेनिसन एकदूसरे का मुंह देखते रहे. मैं ने अपनी सर्विस में बहुत से लोग देखे थे, लेकिन यह आदमी सब से अलग और अनोखा था. इंसपेक्टर टेनिसन ने शाइस्ता से बात करनी शुरू की. इंसपेक्टर टेनिसन ने कहा, ‘‘क्या तुम्हें अपने पिता की गिरफ्तारी पर दुख नहीं है?’’

‘‘नहीं,’’ उस ने दांत पीस कर कहा, ‘‘मुझे उस आदमी से नफरत है, उसे सख्त सजा दी जानी चाहिए.’’

2-3 बातें और पूछने के बाद हम ने कहा, ‘‘इस के लिए तुम्हें अदालत में गवाही देनी पड़ेगी.’’

‘‘मैं अदालत चलूंगी और वहां चिल्लाचिल्ला कर कहूंगी कि यह हत्यारा है और हत्या की वजह भी बताऊंगी.’’

सागर और ठेकेदार को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. इस के बाद न्यायालय में मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई. शाइस्ता ने अपने पिता के खिलाफ गवाही दी. मुकदमे की लंबी काररवाही के बाद जज ने सागर को मृत्युदंड और ठेकेदार को 8 साल की सजा सुनाई. दोनों ने हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन उन की अपील निरस्त कर दी गईं. लगभग एक साल बाद मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ आगरा घूमने गया तो इत्तफाक से वहां शाइस्ता और उस का पति मिल गया.

शाइस्ता ने बताया कि सागर को फांसी देने के बाद उस के पिता को जेल में 3 महीने बाद फालिज का अटैक पड़ा, जिस में उस की मौत हो गई. उस की लाश घर आई तो उस की ससुराल के सब लोग गए थे, लेकिन वह नहीं गई. बाप के मरने से उस के दिल को बहुत सुकून मिला था. अब वह पति के साथ खुश है. मैं ने उस के पति की ओर देखा, वह मुसकरा रहा था. उस के चेहरे से ही लग रहा था कि वह संतुष्ट है. Hindi Kahani

 

Thriller Hindi Story: अभिनेत्री शनाया की मोहब्बत का कांटा

Thriller Hindi Story: वह वर्गाकार बड़ा हाल था. हाल में मुख्यद्वार से सटे 3×6 के 2 मेज एकदूसरे को आपस में सटा कर बिछाए गए थे. नया और रंगीन कवर उन पर बिछाया गया था. मेज से सटी 4 कुरसियां थीं. कुरसियों पर कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री की उभरती हुई अभिनेत्री शनाया काटवे, फिल्म के डायरेक्टर राघवंका प्रभु और 2 अन्य मेहमान बैठे  हुए थे.

मेज के सामने करीब 4 फीट की दूरी पर कुछ और कुरसियां रखी हुई थीं. उन पर शहर के नामचीन, वीआईपी, रिश्तेदार, दोस्त और स्थानीय समाचारपत्रों के खबरनवीस बैठे हुए थे. हाल का कोनाकोना दुलहन की तरह सजा था. रंगीन और दूधिया रौशनी के सामंजस्य से पूरा हाल नहा उठा था. खूबसूरत और शानदार सजावट से किसी की आंखें हट ही नहीं रही थीं.

अभिनेत्री शनाया काटवे की ओर से यह शानदार पार्टी उस के फिल्म प्रमोशन ‘आेंडू घंटेया काठे’ के अवसर पर आयोजित की गई थी. पार्टी देर रात तक चलती रही. घूमघूम कर शनाया मेहमानों का खयाल रख रही थी. पार्टी में शामिल आगंतुकों ने वहां जम कर लुत्फ उठाया था. पार्टी खत्म हुई तो देर रात शनाया काटवे अपने मांबाप के साथ घर पहुंची. वह बहुत थक गई थी. कपड़े वगैरह बदल कर हाथमुंह धो कर अपने कमरे में बिस्तर पर लेटी तो दिन भर की थकान के चलते लेटते ही सो गई. उस के मांबाप अपने कमरे में जा कर सो गए थे. यह बात 9 अप्रैल, 2021 की है.

अगली सुबह जब शनाया और उस के मांबाप की नींद खुली और वे फ्रैश हो कर डायनिंग हाल में नाश्ता करने बैठे तो उन्हें अपने इर्दगिर्द एक कमी का एहसास हुआ. जब वे देर रात घर वापस लौटे थे तो भी घर पर उन का बेटा राकेश काटवे कहीं नजर नहीं आया था. जब सुबह नाश्ता करने के लिए सभी एक साथ डायनिंग हाल में बैठे तो भी राकेश वहां भी मौजूद नहीं था.

यह देख कर शनाया के पापा बलदेव काटवे थोड़ा परेशान हो गए कि आखिर वह कहां है, घर में कहीं दिख भी नहीं रहा है. ऐसा पहली बार हुआ था जब वह घर से कहीं बाहर गया और हमें नहीं बताया, लेकिन वह जा कहां सकता है. यह तो हैरान करने वाली बात हुई. बलदेव काटवे और उन की पत्नी सोनिया का नाश्ता करने का मन नहीं हो रहा था. दोनों एकएक प्याली चाय पी कर वहां से उठ गए. मांबाप को उठ कर जाते देख शनाया भी नाश्ता छोड़ कर उठ गई और उन के कमरे में जा पहुंची, जहां वे बेटे को ले कर परेशान और चिंतित थे.

बात चिंता करने वाली थी ही. जो इंसान घर छोड़ कर कहीं न जाता हो और फिर वह अचानक से गायब हो जाए तो यह चिंता वाली बात ही है. बलदेव, सोनिया और शनाया ने अपनेअपने स्तर से परिचितों और दोस्तों को फोन कर के राकेश के बारे में पता किया, लेकिन वह न तो किसी परिचित के वहां गया था और न ही किसी दोस्त के वहां ही. उस का कहीं पता नहीं चला.

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राकेश का जब कहीं पता नहीं चला तो बलदेव काटवे ने बेटे की गुमशुदगी की सूचना हुबली थाने में दे दी. एक जवान युवक के गायब होने की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी एस. शंकराचार्य हरकत में आए और राकेश की खोजबीन में अपने खबरियों को लगा दिया. यह 10 अप्रैल, 2021 की बात है. राकेश काटवे कोई छोटामोटा आदमी नहीं था. उस के नाम के पीछे अभिनेत्री शनाया काटवे का नाम जुड़ा था, इसलिए यह मामला हाईप्रोफाइल बन गया था. मुकदमा दर्ज कर लेने के बाद पुलिस राकेश काटवे का पता लगाने में जुटी हुई थी.

5 टुकड़ों में मिली लाश

इसी दिन शाम के समय हुबली थाना क्षेत्र के देवरागुडीहल के जंगल में एक कटा हुआ सिर बरामद हुआ तो इसी थाना क्षेत्र के गदर रोड से एक कुएं में गरदन से पैर तक शरीर के कई टुकड़े पानी पर तैरते बरामद हुए. टुकड़ों में मिली इंसानी लाश से इलाके में दहशत फैल गई थी. जैसे ही कटा सिर और टुकड़ों में बंटे शरीर के अंग पाए जाने की सूचना थानाप्रभारी एस. शंकराचार्य को मिली, वह चौंक गए. वह तुरंत टीम ले कर देवरागुडीहल जंगल की तरफ रवाना हो गए थे.

चूंकि राकेश काटवे की गुमशुदगी की सूचना थाने में दर्ज थी, घर वालों ने उस की एक रंगीन तसवीर थाने में दी थी. कटा हुआ सिर तसवीर से काफी हद तक मेल खा रहा था, इसलिए थानाप्रभारी ने घटनास्थल पर बलदेव काटवे को भी बुलवा लिया, जिस से उस की शिनाख्त हो जाए.  छानबीन के दौरान संदिग्ध अवस्था में घटनास्थल से कुछ दूरी पर एक मारुति रिट्ज और एक हुंडई कार बरामद की थी. दोनों कारों की पिछली सीटों पर खून के धब्बे लगे थे, जो सूख चुके थे. पुलिस का अनुमान था कि हत्यारों ने कार को लाश ठिकाने लगाने के लिए इस्तेमाल किया होगा. पुलिस ने दोनों कारों को अपने कब्जे में ले लिया.

दोनों कारों को कब्जे में लेने के बाद उन्होंने इस की सूचना एसपी (ग्रामीण) पी. कृष्णकांत और पुलिस कमिश्नर लभु राम को दे दी थी. दिल दहला देने वाली घटना की सूचना मिलते ही पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंच गए थे. उन्होंने घटनास्थल और कटे हुए अंगों का निरीक्षण किया. शरीर के अंगों को देखने से ऐसा लगता था जैसे हत्यारों ने बड़े इत्मीनान से किसी  धारदार हथियार से उसे छोटेछोटे टुकड़ों में काटा होगा. पुलिस उन तक पहुंच न पाए, इसलिए लाश जंगल में ले जा कर अलगअलग जगहों पर फेंक दी, ताकि लाश की शिनाख्त न हो सके.

बहरहाल, थानाप्रभारी की यह तरकीब वाकई काम कर गई. उन्होंने जब बलदेव काटवे को सिर के फोटो दिखाए तो फोटो देखते ही बलदेव काटवे पछाड़ मार कर जमीन पर गिर गए. यह देख कर पुलिस वालों को समझते देर न लगी कि कटे हुए सिर की पहचान उन्होंने कर ली है. थोड़ी देर बाद जब वह सामान्य हुए तो वह दहाड़ मारमार कर रोने लगे. वह कटा हुआ सिर उन के लाडले बेटे राकेश काटवे का था. पुलिस यह जान कर और भी हैरान थी कि कहीं गदग रोड स्थित कुएं से बरामद कटे अंग राकेश के तो नहीं हैं. लेकिन पुलिस की यह आशंका भी जल्द ही दूर हो गई थी. बलदेव काटवे ने हाथ और पैर की अंगुलियों से लाश की पहचान अपने बेटे के रूप में कर ली थी.

24 घंटे के अंदर पुलिस ने राकेश काटवे की गुमशुदगी के रहस्य से परदा उठा दिया था. हत्यारों ने बड़ी बेरहमी से उसे मौत के घाट उतारा था. पुलिस ने लाश का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. लेकिन एक बात से राकेश के मांबाप और पुलिस हैरान थे कि राकेश की जब किसी से दुश्मनी नहीं थी तो उस की हत्या किस ने और क्यों की? इस का जबाव न तो पुलिस के पास था और न ही उस के मांबाप के पास. दोनों ही इस सवाल से निरुत्तर थे.

किस ने और क्यों, का जबाव तो पुलिस को ढूंढना था. राकेश की हत्या की गुत्थी सुलझाने के लिए पुलिस ने वैज्ञानिक साक्ष्यों को अपना हथियार बनाया. पुलिस ने सब से पहले राकेश काटवे के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से पुलिस यह पता लगाने की कोशिश में जुट गई कि आखिरी बार राकेश से किस की और कब बात हुई थी? जांचपड़ताल में आखिरी बार उस की बहन शनाया से बातचीत के प्रमाण मिले थे. रात में 7 और 8 बजे के बीच में शनाया और राकेश के बीच लंबी बातचीत हुई थी. उस के बाद उस के फोन पर किसी और का फोन नहीं आया था. इस का मतलब आईने की तरह साफ था कि राकेश की हत्या रात 8 बजे के बाद की गई थी.

पुलिस के सामने एक और हैरानपरेशान कर देने वाली सच्चाई सामने आई थी. घटना वाले दिन शनाया ने अपने फिल्म के प्रमोशन पर एक पार्टी रखी थी. उस पार्टी में राकेश को छोड़ घर के घर सभी सदस्य शमिल थे तो उस का भाई राकेश पार्टी में शामिल क्यों नहीं हुआ? वह कहां था? इंसपेक्टर एस. शंकराचार्य के दिमाग में यह बात बारबार उमड़ रही थी कि जब घर के सभी सदस्य पार्टी में शमिल थे तो राकेश किस वजह से घर पर रुका रहा? इस ‘क्यों’ का जबाव मिलते ही हत्या की गुत्थी सुलझ सकती थी.

आखिरकार पुलिस की मेहनत रंग लाई. घटनास्थल से बरामद हुई दोनों कारों में से एक मारुति रिट्ज कार मृतक राकेश काटवे की बहन शनाया काटवे के नाम पर रजिस्टर्ड थी. दूसरी हुंडई कार किसी अमन नाम के व्यक्ति के नाम पर थी. यह जान कर पुलिस के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई कि शनाया काटवे की कार घटनास्थल पर कैसे पहुंची? राकेश के मर्डर से शनाया का क्या संबंध हो सकता है? क्या शनाया का हत्यारों के साथ कोई संबंध है? ऐसे तमाम सवालों ने पुलिस कमिश्नर लभु राम, एसपी (ग्रामीण) पी. कृष्णकांत और थानाप्रभारी को हिला कर रख दिया था.

एसपी (ग्रामीण) पी. कृष्णकांत के नेतृत्व में राकेश काटवे हत्याकांड की बिखरी कडि़यों को जोड़ने के लिए थानाप्रभारी बेताब थे. उन्होंने घटना का परदाफाश करने के लिए मुखबिरों को लगा दिया था. घटना के 4 दिनों बाद 14 अप्रैल को मुखबिर ने जो सूचना दी, उसे सुन कर थानाप्रभारी को मामले में प्रगति नजर आई. मुखबिर ने उन्हें बताया था कि भाईबहन शनाया और राकेश के बीच में अच्छे रिश्ते नहीं थे. बरसों से उन के बीच में छत्तीस का आंकड़ा बना हुआ था.

मुखबिर की यह सूचना पुलिस के लिए काम की थी. पुलिस ने दोनों के बिखरे रिश्तों का सच तलाशना शुरू किया तो जल्द ही सारा सच सामने आ गया. दरअसल, राकेश शनाया के प्रेम की राह में एक कांटा बना हुआ था. शनाया का नियाज अहमद काटिगार के साथ प्रेम संबंध था. इसी बात को ले कर अकसर दोनों भाईबहन के बीच में झगड़ा हुआ करता था. राकेश को बहन का नियाज से मेलजोल अच्छा नहीं लगता था, जबकि शनाया को भाई की टोकाटोकी सुहाती नहीं थी. यही दोनों के बीच खटास की वजह थी. घटना के खुलासे के लिए इतनी रौशनी काफी थी. सबूतों के आधार पर 17 अप्रैल को हुबली पुलिस ने नियाज अहमद काटिगार को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया और पूछताछ के लिए थाने ले आई.

अपराधी चढ़े पुलिस के हत्थे

थाने में कड़ाई से हुई पूछताछ में नियाज अहमद पुलिस के सामने टूट गया और राकेश की हत्या का अपना जुर्म कबूल कर लिया. आगे की पूछताछ में उस ने यह भी बताया कि इस घटना में उस के साथ उस के 3 साथी तौसीफ चन्नापुर, अलताफ तैजुद्दीन मुल्ला और अमन गिरनीवाला शमिल थे. उस के बयान के आधार पर उसी दिन तीनों आरोपी गिरफ्तार कर लिए गए.

पुलिस पूछताछ के दौरान नियाज अहमद ने प्रेमिका शनाया काटवे के कहने पर राकेश की हत्या करना कबूल किया था. 5 दिनों बाद 22 अप्रैल, 2021 को राकेश हत्याकांड की मास्टरमाइंड शनाया काटवे को हुबली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. शनाया ने बड़ी आसानी से पुलिस के सामने घुटने टेक दिए. उस ने भाई राकेश की हत्या कराने का अपना जुर्म मान लिया था. पुलिस पूछताछ में राकेश काटवे हत्याकांड की कहानी ऐसे सामने आई—

25 वर्षीया शनाया काटवे मूलरूप से उत्तरी कर्नाटक के धारवाड़ जिले की हुबली की रहने वाली थी. वह मां सोनिया काटवे और पिता बलदेव की इकलौती संतान थी. इस के अलावा काटवे दंपति की कोई और संतान नहीं थी. एक ही संतान को पा कर दोनों खुश थे और खुशहाल जीवन जी रहे थे. लेकिन बेटे की चाहत कहीं न कहीं पतिपत्नी के मन में बाकी थी. पतिपत्नी जब भी अकेले में होते तो एक बेटे की अपनी लालसा जरूर उजागर करते. आखिरकार उन्होंने फैसला किया कि वे एक बेटे को गोद लेंगे, अपनी कोख से नहीं जनेंगे. जल्द ही काटवे दंपति की वह मंशा पूरी हो गई.

गोद लिया भाई था राकेश

उन्होंने अपने एक रिश्तेदार के बेटे को कानूनी तौर पर गोद ले लिया और पालपोस कर उसे बड़ा किया. तब राकेश साल भर का रहा होगा. काटवे दंपति के गोद में राकेश पल कर बड़ा हुआ. उन की अंगुलियां पकड़ कर चलना सीखा. सयाना और समझदार हुआ तो मांबाप के रूप में उन्हें ही सामने पाया. वही उस के मांबाप थे, राकेश यही जानता था. उन्होंंने भी शनाया और राकेश के बीच कभी फर्क नहीं किया. लेकिन शनाया जानती थी कि राकेश उस का सगा भाई नहीं है, उसे मांबाप ने गोद लिया है.

बचपन से ही शनाया राकेश से नफरत करती थी, उस से चिढ़ती थी. चिढ़ उसे इस बात से हुई थी कि उस के हिस्से की आधी खुशियां और सुख राकेश की झोली में जा रहे थे. शनाया फुरसत में जब भी होती, यही सोचती कि वह नहीं होता तो जो सारी खुशियां, लाड़प्यार राकेश को मिलता है, उसे ही नसीब होता. लेकिन उस के हिस्से के प्यार पर डाका डालने न जाने वह कहां से आ गया.

यही वह खास वजह थी जब शनाया बचपन से ले कर जवानी तक राकेश को फूटी आंख देखना नहीं चाहती थी. उस से नफरत करती थी. लेकिन इस से राकेश को कोई फर्क नहीं पड़ता था कि शनाया उसे प्यार करती थी या नफरत. वह तो उस की परछाईं को अपना समझ कर उस के पीछे भागता था, उसे बहन के रूप में प्यार करता था. क्योंकि उस के मांबाप ने उसे यही बताया था.

खैर, शनाया और राकेश बचपन की गलियों को पीछे छोड़ अब जवानी की दहलीज पर खड़े थे. जिस प्यार को मांबाप ने दोनों में बराबर बांटा था, दोनों के अपने रास्ते अलगअलग थे. हुबली से ही स्नातक की डिग्री हासिल कर शनाया काटवे की बचपन से रुपहले परदे पर स्टार बन कर चमकने की दिली ख्वाहिश थी. अपने सपने पूरे करने के लिए वह दिनरात मेहनत करती थी. इस के लिए उस ने मौडलिंग की दुनिया को सीढ़ी बना कर आगे बढ़ना शुरू किया.

शनाया बला की खूबसूरत और बिंदास लड़की थी. अपनी सुंदरता पर उसे बहुत नाज था. आदमकद आईने के सामने घंटों खड़ी हो कर खुद को निहारना उस के दिल को सुकून देता था. यही नहीं, जीने की हसरत उस में कूटकूट कर भरी थी. उस के खयालों में नियाज अहमद काटिगार सुनहरे रंग भर रहा था.

अमीर बाप की बिगड़ी औलाद था नियाज

हुबली का रहने वाला 22 वर्षीय नियाज अहमद अमीर मांबाप की बिगड़ी हुई औलाद था. बाप के खूनपसीने से कमाई दौलत यारदोस्तों में दोनों हाथों से पानी की तरह बहा रहा था. उन यारदोस्तों में एक नाम शनाया काटवे का भी था. नियाज के दिल की धड़कन थी शनाया. उस के रगों में बहने वाला खून थी शनाया. शनाया के बिना जीने की वह कभी कल्पना नहीं कर सकता था. शनाया और नियाज एकदूसरे से बेपनाह मोहब्बत करते थे. दोनों की मुलाकात एक पार्टी में हुई थी. शनाया की खूबसूरती देख कर नियाज घायल हो गया था. वह पहली नजर में ही शनाया को दिल दे बैठा था. उठतेबैठते, सोतेजागते, खातेपीते हर जगह उसे शनाया ही नजर आती थी.

ऐसा नहीं था कि मोहब्बत की आग एक ही तरफ लगी हो. शनाया भी उसी मोहब्बत की आग में जल रही थी. मोहब्बत की आग दोनों ओर बराबर लगी थी. एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें दोनों ने खाईं और भविष्य को ले कर सपने देख रहे थे. खुले आसमान के नीचे अपनी बांहें फैलाए नियाज और शनाया भूल गए थे कि उन का प्यार ज्यादा दिनों तक चारदीवारी में कैद नहीं रह सकता. वह फिजाओं में खुशबू की तरह फैल जाता है.

शनाया और नियाज की मोहब्बत भी ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रही. शनाया के भाई राकेश काटवे को बहन के प्रेम की सूचना मिली तो वह आगबबूला हो गया था. उस ने अपनी तरफ से सच्चाई का पता लगाया तो बात सच निकली.

बहन को हिदायत दी थी राकेश ने

शनाया एक मुसलिम युवक नियाज अहमद से प्यार करती थी. उस ने बड़े प्यार से एक दिन बहन से पूछा, ‘‘यह मैं क्या सुन रहा हूं शनाया?’’

‘‘क्या सुन रहे हो भाई, मुझे भी तो बताओ.’’ शनाया ने पूछा.

‘‘क्या तुम सचमुच नहीं जानती कि मैं क्या कहना चाहता हूं?’’ वह बोला.

‘‘नहीं, सचमुच मैं नहीं जानती, आप क्या कहना चाहते हो और मेरे बारे में आप ने क्या सुना है?’’ शनाया ने सहज भाव से कहा.

‘‘उस नियाज से तुम दूरी बना लो, यही तुम्हारी सेहत के अच्छा होगा. मैं अपने जीते जी खानदान की नाक कटने नहीं दूंगा. अगर  तुम ने मेरी बात नहीं सुनी या नहीं मानी तो यह नियाज मियां के सेहत के लिए अच्छा नहीं होगा.’’ भाई के मुंह से नियाज का नाम सुनते ही शनाया के होश उड़ गए.

‘‘जैसा तुम सोच रहे हो भाई, हमारे बीच में ऐसी कोई बात नहीं है. हम दोनों एक अच्छे दोस्त भर हैं.’’ शनाया ने सफाई देने की कोशिश की, लेकिन वह घबराई हुई थी.

‘‘मेरी आंखों में धूल झोंकने की कोशिश मत करना. तुम दोनों के बारे में मुझे सब पता है. कई बार मैं ने खुद तुम दोनों को एक साथ बांहों में बांहें डाले देखा है. जी तो चाहा कि तुम्हें वहीं जान से मार दूं, लेकिन मम्मीपापा के बारे में सोच कर मेरे हाथ रुक गए. तुम अब भी संभल जाओ. तुम्हारी सेहत के लिए यही अच्छा होगा. नहीं तो इस का अंजाम बहुत बुरा हो सकता है, जो न मैं जानता हूं और न ही तुम, समझी.’’

‘‘प्लीज भाई, मम्मीपापा से कुछ मत कहना,’’ शनाया भाई के सामने गिड़गिड़ाई, ‘‘नहीं तो उन के दिल को बहुत ठेस लगेगी. वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे. मेरी उन की नजरों में सारी इज्जत खत्म हो जाएगी. प्लीज…प्लीज… प्लीज, मम्मीपापा से कुछ मत कहना, मेरे अच्छे भाई.’’

‘‘ठीक है, ठीक है, सोचूंगा. मुझे क्या करना होगा लेकिन तुम ने अपनी आदत में बदलाव नहीं लाया तो सोचना कि मैं तुम्हारे लिए कितना खतरनाक बन जाऊंगा, मैं खुद भी नहीं जानता.’’

राकेश ने शनाया को प्यार से समझाया भी और धमकाया भी. उस के बाद उस ने मम्मीपापा से बहन की पूरी हकीकत कह सुनाई. बेटी की करतूत सुन कर वे शर्मसार हो गए.

मांबाप ने भी बेटी को समझाया और नियाज से दूर रहने की सलाह दी. वैसे भी शनाया भाई से छत्तीस का आंकड़ा रखती थी. उस के मना करने के बावजूद राकेश ने उस के प्यार वाली बात मांबाप से बता दी थी.  यह सुन कर उस के सीने में भाई के प्रति नफरत की आग धधक उठी थी.

प्यार की राह का कांटा बना राकेश

राकेश बहन के प्रेम की राह का कांटा बना हुआ था. राकेश के कई बार समझाने के बावजूद शनाया ने नियाज से मिलना बंद नहीं किया था. इसे ले कर दोनों में अकसर झगड़े होते रहते थे. रोजरोज की किचकिच से शनाया ऊब चुकी थी. वह नहीं चाहती थी कि उस के और उस के प्यार के बीच में कोई कांटा बने. भाई की टोकाटोकी से तंग आ कर शनाया ने उसे रास्ते से हटाने की खतरनाक योजना बना ली. शनाया ने अपनी अदाओं से प्रेमी नियाज अहमद को उकसाया कि अगर मुझे प्यार करते हो तो हमारे प्यार के बीच कांटा बने भाई राकेश को रास्ते से हटा दो, नहीं तो मुझे हमेशा के लिए भूल जाओ.

नियाज अहमद शनाया से दूर हो कर जीने की कल्पना भी कर नहीं सकता था. उस ने प्रेमिका का दिल जीतने के लिए राकेश को रास्ते से हटाने के लिए हामी भर दी. इस खतरनाक योजना को अंजाम देने के लिए उस ने अपने 3 साथियों तौसीफ चन्नापुर, अलताफ तैजुद्दीन मुल्ला और अमन गिरनीवाला को शमिल कर लिया. इस के बाद राकेश को रास्ते से हटाने की योजना बनी. खतरनाक योजना खुद शनाया ने ही बनाई. इसे 9 अप्रैल, 2021 को अंजाम देने की तारीख तय की गई. उस दिन उस ने अपनी नई फिल्म ‘आेंडू घंटेया काठे’ की प्रमोशन रखवाई थी. चतुर शनाया ने इसलिए यह तारीख निर्धारित की थी ताकि उस पर किसी का शक न जाए और रास्ते का कांटा सदा के लिए हट भी जाए. यानी सांप भी मर जाए, लाठी भी न टूटे.

योजना के मुताबिक, 9 अप्रैल, 2021 को शनाया काटवे फिल्म प्रमोशन के लिए जब पार्टी में पहुंची, तभी उस ने नियाज अहमद को फोन कर के बता दिया कि राकेश पार्टी में नहीं आएगा, वह घर पर अकेला है. मांबाप भी पार्टी में आए हुए हैं. यही सही वक्त है, काम को अंजाम दे दो.

घर पर ही किए थे राकेश के टुकड़े

शनाया की ओर से हरी झंडी मिलते ही नियाज अहमद, साथियों के साथ अमन गिरनीवाला की हुंडई कार ले कर पार्टी वाली जगह पहुंचा. वहां से शनाया की मारुति रिट्ज कार ले कर रात साढ़े 8 बजे उस के घर पहुंचा. उस की कार नियाज अहमद खुद ड्राइव कर रहा था. उस कार में नियाज के साथ तौसीफ चन्नापुर बैठा था जबकि अमन गिरनीवाला की हुंडई कार में अलताफ तैजुद्दीन मुल्ला सवार था.

खैर, रात साढ़े 8 बजे जब नियाज शनाया के घर पहुंचा तो राकेश काटवे घर पर ही था. नियाज ने कालबैल बजाई तो राकेश ने दरवाजा खोल दिया. सामने नियाज को देख कर वह चौंक गया. इस से पहले कि वह सावधान हो पाता, नियाज और उस के साथी अचानक उस पर टूट पड़े.

नियाज ने गला दबा कर उसे मौत के घाट उतार दिया. फिर लाश को ठिकाने लगाने के लिए नियाज ने अपने साथ लाए धारदार चाकू से राकेश के शरीर को 5 टुकड़ों में काट दिया और फर्श पर पड़े खून को एक कपड़े से साफ कर साक्ष्य मिटा दिए. फिर एक पैकेट में सिर और दूसरे पैकेट में बाकी अंग रख कर चारों लोग 2 गाडि़यों में सवार हो कर देवरागुडीहल जंगल की तरफ रवाना हो गए. नियाज ने राकेश का कटा सिर जंगल में फेंक दिया और दोनों कार वहीं छोड़ कर चारों गदग रोड जा पहुंचे. वहां एक कुएं में कटे अंग डाल कर सभी फरार हो गए.

शनाया काटवे ने मौत की परफैक्ट प्लानिंग की थी. लेकिन वह यह भूल गई थी कि अपराधी कितना ही चालाक क्यों न हो, कोई न कोई सुराग छोड़ ही जाता है. शनाया ने भी वैसा ही किया. वह कानून के लंबे हाथों से बच नहीं पाई और पुलिस के हत्थे चढ़ गई. सभी अभियुक्तों से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. Thriller Hindi Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित