Hindi Story: छोटी बहू

Hindi Story: इंसपेक्टर नवाज खान को शक था कि चंदरमल के गायब होने के पीछे उस की मंझली बहू के प्रेमी का हाथ है. लेकिन जब उन्होंने इस मामले की जांच की तो…

उन दिनों मेरी पोस्टिंग अमृतसर के एक देहाती इलाके में थी. वहां लाला चंदरमल के बेटे अर्जुन से मेरा अच्छा दोस्ताना था. वह एक शरीफ और मुखलिस नौजवान था. अर्जुन का शालों का कारोबार था. उस की बीवी भी अच्छी औरत थी और मेरे घर आती थी. मेरी बीवी से उस की अच्छी पटती थी. उस का नाम सीता था. आज जो किस्सा मैं आप को सुनाने जा रहा हूं, उस में सीता की खास भूमिका है. वह एक नेक और भली औरत थी और चंदरमल की चहेती बहू थी. चंदरमल के दोनों बड़े बेटों की औरतें नाम की बहुएं थीं. न वे दोनों ससुर की कोई सेवा करती थीं, न उसे पूछती थीं. उस की सारी खिदमत और देखरेख सिर्फ सीता करती थी.

वैसे चंदरमल ने दोनों बड़े बेटों, विकास और प्रकाश को पहले ही अलग कर दिया था, जबकि अर्जुन ने अलग होने से साफ इनकार कर दिया था. वह और सीता बाप से अलग नहीं होना चाहते थे. पर चंदरमल ने समझाबुझा कर अपने घर के पास ही घर दिला कर उन्हें भी अलग कर दिया था. लेकिन अलग होने के बाद भी सीता सुबहशाम आ कर ससुर का खाना बनाती, खिलाती, सेवा करती. उस की जरूरतों का खयाल रखती.

लाला की बीवी मर चुकी थी. न चाहते हुए भी अर्जुन और सीता को लाला से अलग होना पड़ा था, इस के पीछे लाला चंदरमल की शराब की लत थी. वह रात होते ही पीना शुरू कर देता था, इसलिए वह नहीं चाहता था कि उस की बहू व उस के बच्चे नशे की हालत में उसे देखें. इसी वजह से उस ने अर्जुन को भी अलग कर दिया था. सोमवार के दिन वह सोमरस का पान कुछ ज्यादा ही कर लेता था. मदहोशी की हालत में कोई उसे गलत हरकतें करते न देखे, इसलिए वह अलग अकेले रहना पसंद करता था. ये सब बातें अर्जुन की बीवी मेरी बीवी को बताती थी.

फिर अचानक एक दिन लाला चंदरमल गायब हो गया. सीता ने बताया कि वह उस के घर के 3-4 चक्कर लगा चुकी है, पर वह नहीं मिला दरवाजे पर भी ताला लगा हुआ है. सीता बहुत परेशान थी. 2 दिनों बाद दीवाली थी और लाला दीवाली उस के घर पर मनाने वाला था. वह जब उस से मिलने गई तो घर बंद था. उसे खाना भी बनाना था, पर वह नहीं लौटा था. वह मेरे पास आ गई. हम ने समझाया, लौट आएंगे, कहीं काम से गए होंगे. समझदार आदमी हैं. पर हमारी तसल्ली कुछ काम न कर सकी. वह रोती रही, परेशान होती रही. उस की परेशानी अपनी जगह ठीक थी. वह ऐसा गायब हुआ कि लौट कर ही नहीं आया. कई दिन गुजर गए, उस का कोई सुराग न लगा. मैं ने भी काफी कोशिश की.

अर्जुन व सीता ने भी आसपास, रिश्तेदारों में काफी तलाश की, पर अब तक कुछ पता नहीं चला. मेरी तलाश भी बेकार गई. यह भी पता न चल सका कि वह खुद गया या कोई उसे उठा कर ले गया. वह कोई बच्चा नहीं था कि गुम हो जाता. मैं ने उसे सलाह दी कि वे लोग कानूनी तौर पर मामला उठाएं तो सही तरीके से तफ्तीश हो सकती है. इस पर वह बोली, ‘‘हम लोग राजी हैं, पर भाई प्रकाश और उन की पत्नी भगवती नहीं मान रहीं. वह कहती हैं कि फालतू के लफड़े में पड़ने से क्या फायदा? आप उसे जाने दें, मैं और मेरे पति कानूनी काररवाई करेंगे.’’

मुझे अर्जुन के भाईभाभी की बात समझ में नहीं आई. दूसरे दिन अर्जुन ने चंदरमल की गुमशुदगी दर्ज करा दी. मैं ने उस से पूछा, ‘‘प्रकाश और उस की पत्नी भगवती रिपोर्ट के विरोध में क्यों हैं? क्या वे नहीं चाहते कि चंदरमल मिल जाएं?’’

इस पर अर्जुन ने कई बातें बताईं. प्रकाश व भगवती की लाला से नहीं पटती थी. वह उन से नाराज रहता था. भगवती चाहती थी कि लाला की सारी दौलत उन दोनों को मिल जाए. प्रकाश की शादी भी लाला ने नहीं करवाई थी. उस ने ऐसी ही चलतीफिरती औरत से अपनी मरजी से शादी कर ली थी.

लाला प्रकाश व भगवती से जरा भी खुश नहीं था. मैं ने लाला के दुश्मनों के बारे में पूछा तो कहने लगा, ‘‘मेरे बाबू जुबान के व धंधे के बड़े खरे थे. उन की कभी कोई शिकायत नहीं आई. ईमानदारी से लेनदेन करते थे. उन का ऐसा कोई दुश्मन भी नहीं था, जो उन्हें गायब करवा दे. मुझे तो कभीकभी भगवती पर शक होता है.

‘‘वह प्रकाश पर भी दबाव डालती थी कि लाला से हिस्सा मांगो. प्रकाश ने बापू से नहीं, मुझ से हिस्से की बात की थी. मैं ने उसे समझाया था कि बापू सब की बराबर मदद करते हैं, इसलिए हमारी गृहस्थी अच्छी चल रही है.

‘‘अगर हिस्से की बात करोगे तो बापू नाराज हो कर कहीं ये मदद भी बंद न कर दें. तब उस ने बेबसी से कहा था कि वह भगवती की वजह से मजबूर है. उस वक्त बात टल गई. बापू के गायब होने से उन की मुराद पूरी हो जाएगी, क्योंकि बापू के न रहने से हिस्से बंट जाएंगे.’’

अर्जुन की बातों से मुझे तफतीश शुरू करने में काफी मदद मिली. सब से पहले मैं प्रकाश के घर गया. उन के दरवाजे पर बड़ा सा ताला लगा था. दोनों गायब थे. इस का मतलब कुछ गड़बड़ तो थी. मुझे उन की वापसी का इंतजार करना था.

मैं ने अर्जुन से कहा कि वह अपने सगेसंबंधियों, जानने वालों में उन के बारे में पता करवाए. मकान मालिक भी अर्जुन से उन के बारे में पूछ रहा था. यह तय था कि वे लोग जानबूझ कर गायब हुए थे. भगवती कोई अच्छी औरत नहीं थी. हो सकता है, उस का ताल्लुक जरायमपेशा लोगों से रहा हो. मैं ने सीता से, भगवती के मांबाप का पता मालूम किया और अपने मुखबिर से कहा कि मुझे किसी ऐसे आदमी से मिलवाओ, जिस का जरायमपेशा लोगों से याराना हो. उस ने एक ताड़ी बेचने वाले से मुझे मिलवाया, वह नाजायज धंधा करता था. इसलिए पुलिस के लिए कुछ भी काम करने को तैयार था.

मैं ने उसे भगवती के मांबाप का पता दे कर कहा कि इस घराने के बारे में मुझे पूरी मालूमात पता कर के खबर करे. उस के बाप का नाम सुन कर वह बोला, ‘‘साहब, भगवानदास मेरा ग्राहक है. उस का बदमाश गिरधारी से भी याराना है और ऐसा सुना है कि भगवानदास के मरने के बाद उस का याराना उस की लड़की भगवती से हो गया था. अब वह लड़की कहां है, मुझे नहीं मालूम. यह पुराने दिनों की बात है.’’

मैं ने उसे गिरधारी का पता लगाने को कहा और भगवती व उस के घराने के बारे में जानकारी लाने को कहा. कुछ दिनों बाद ताड़ी बेचने वाला, जिस का नाम मकरंदी था, बोला, ‘‘साहब, गिरधारी बड़ा बदमाश है. सारे गलत काम करता है, जुएं का बड़ा अड्डा चलाता है. मैं आप को मौका देख कर ऐसे समय उस के अड्डे पर ले चलूंगा, जब वह वहां मौजूद हो.’’

मुझे और कोई सुराग नहीं मिला था. चंदरमल अभी तक गायब था. मैं ने गिरधारी को निशाना बनाने की सोची, क्योंकि भगवती से भी उस के संबंध थे. मकरंदी के कई शराब के अड्डे थे, जहां वह ताड़ी बेचता था और पूरे वक्त पुलिस की खुशामद में लगा रहता था. उस दिन वह अपने साथ एक आदमी तिवारी को ले कर आया, जो सूरत से ही बदमाश लगता था. वह कहने लगा, ‘‘यह तिवारी गिरधारी का खास आदमी है, पर आजकल इस की गिरधारी से लड़ाई है. यह हमें उस तक पहुंचा देगा.’’

उसी रात को मैं तिवारी और मकरंदी के साथ गिरधारी के अड्डे के लिए रवाना हो गया. शहर के आखिरी छोर पर एक बड़े मैदान के बाद एक 2 मंजिला मकान था. नीचे तो अंधेरा था, ऊपर के कमरों में उजाला था. यही गिरधारी का अड्डा था. अभी हम सीढि़यों के पास खड़े थे कि एक आदमी सीढि़यों से लुढ़कता हुआ हमारे सामने आ कर गिरा. तिवारी ने बताया कि जब कोई जुआरी पैसे नहीं अदा करता तो गिरधारी उसे इसी तरह ऊपर से नीचे लुढ़का देता है.

हम चुपचाप ऊपर पहुंचे. सामने के कमरे में 5-6 लोग बैठे जुआ खेल रहे थे. उन के पास ताश व पैसे रखे थे. तिवारी मेरा हाथ पकड़ कर दूसरे कमरे में ले गया, जहां एक सांडनुमा आदमी एक टेबल के पीछे बैठा था. तिवारी धीरे से बोला, ‘‘यही है गिरधारी.’’

वह हट्टाकट्टा काला आदमी था. उस के बाजू मुगदल की तरह थे. चौड़ी छाती, भैसें जैसी गरदन, निस्संदेह वह एक मजबूत कदकाठी वाला अडि़यल आदमी था. गिरधारी तिवारी की आवाज सुन कर फुरती से खड़ा हो गया. उस ने अपने कुत्ते को इशारा किया तो उस ने तिवारी पर छलांग लगा दी. मेरा ध्यान गिरधारी पर था, वह सांड की तरह झूमता सिर की टक्कर मारने के लिए मेरी तरफ बढ़ा. मैं फुरती से एक तरफ से हो गया, वह अपनी पूरी ताकत से जा कर अलमारी से टकराया. अलमारी का पट टूट गया.

मैं ने सोचा, अगर यह मुझ से टकराया होता तो मेरा क्या हाल होता? मुझे उसे दूसरा मौका नहीं देना था. मैं ने खुद को तैयार कर लिया. जैसे ही वह मेरी तरफ बढ़ा, मैं ने सीधे हाथ का मुक्का इस के माथे पर जड़ दिया. मुझे लगा, जैसे मेरा हाथ किसी दीवार पर पड़ा हो. उस वक्त पिस्तौल निकालना खतरनाक हो सकता था. मुक्का जबरदस्त था, वह बिलबिला कर माथे पर हाथ रख कर पीछे हटा. उस की अंगुलियों से खून बाहर निकल रहा था. वह चकरा कर जमीन पर बैठ गया.

मैं ने तिवारी को इधरउधर देखा. वह कोने में गिरा पड़ा था. कुत्ते ने उस का पेट फाड़ दिया था, पर उस ने भी चाकू से कुत्ते को खत्म कर दिया था. मकरंदी पता नहीं कहां गायब हो गया था. तिवारी को देखना जरूरी था, मैं उस की तरफ बढ़ा. गिरधारी ने इस का फायदा उठाया, वह कमरे से खिसक गया. मुझे बड़ी हैरत हुई. नामीगिरामी गुंडा मेरे एक ही मुक्के में मुकाबले से डर गया. शायद और कोई वजह रही होगी, जो वह वहां से भाग गया. मुझे जल्द से जल्द तिवारी को अस्पताल भेजना था. मैं ने बाजू के कमरे से 2-3 लोगों को बुलाया, जो डरतेडरते आए.

मैं ने उन के साथ तिवारी को अस्पताल भिजवाया. सब मुझ से डर रहे थे. वे मुझे गिरधारी से बड़ा बदमाश समझ रहे थे, जिस ने गिरधारी के अड्डे पर आ कर उस का यह हाल कर दिया था. वे लोग तिवारी को एक चारपाई पर डाल कर अस्पताल ले गए. इस चक्कर में मकरंदी कब और कहां गायब हो गया, पता ही नहीं चला. मैं अपने थाने चला गया. तीसरे दिन मकरंदी मेरे पास आया. उसे देख कर मुझे गुस्सा तो बहुत आया, पर उस ने यह कहते हुए हाथ जोड़ कर माफी मांग ली कि वह दिल का कमजोर है. लड़ाईभिड़ाई से घबरा कर भाग गया था. मकरंदी को मैं ने माफ कर दिया, क्योंकि उस ने एक अच्छा काम किया था. जब गिरधारी छिपतेछिपाते वहां से भाग रहा था तो उस ने उस का पीछा किया था और यह मालूम कर लिया था कि वह कहां जा कर छिपा था.

मैं ने फैसला कर लिया कि मैं मकरंदी के साथ गिरधारी तक जरूर पहुचूंगा. मैं अर्जुन से मिलने उस के घर चला गया. उन दोनों को मैं ने सारी बातें बताईं. इस पर सीता कहने लगी, ‘‘मुझे पता था कि भगवती का ताल्लुक गिरधारी से है, पर मैं ने इस डर से यह बात किसी को नहीं बताई कि सब कहते कि मैं अपनी भाभी पर जलन में दोष लगा रही हूं. मैं ने कई बार प्रकाश की गैरमौजूदगी में एक काले सांड जैसे आदमी को उस के घर में देखा था.’’

अब मेरा गिरधारी तक पहुंचना जरूरी हो गया था. मकरंदी ने तिवारी का हाल भी बताया कि अब वह अच्छा है. उस के पेट में टांके लगे हैं, पर खतरे की कोई बात नहीं है. मकरंदी ने मुझे बताया कि उस ने गिरधारी को एक महंत की धरमशाला में जाते देखा था. जिस वक्त हम धरमशाला पहुंचे, शाम हो चुकी थी. धरमशाला की चारदीवारी काफी नीची थी, बीच में बड़ा मैदान था, जिस में एक तालाब सा बना हुआ था. सामने बड़ा सा बरामदा था, पीछे कमरों की लाइन थी. बरामदे में एक चारपाई पर एक आदमी लेटा था, दूसरा आदमी उस का बदन दबा रहा था.

मकरंदी धीरे से बोला, ‘‘जो लेटा है, वह महंत सोमनाथ है और जो बदन दबा रहा है, वह यहां का नौकर है. यहां आने से पहले मुझे मकरंदी बता चुका था कि सोमनाथ बड़ा अय्याश आदमी है. सब तरह के बुरे काम करता है, यहां तक कि लड़कियां भी उठवा लेता है.

हमें देख कर सोमनाथ उठ बैठा और हैरानी से देखने लगा. उस की हैरत देख कर मकरंदी जल्दी से बोला, ‘‘महाराज, हम गिरधारी से मिलने आए हैं. उस ने मुझे बुलवाया था.’’

महंत ने एक कमरे की तरफ इशारा कर दिया. मकरंदी महंत के पास चारपाई पर बैठ कर बातें करने लगा. मैं समझ गया कि वह डरपोक आदमी है, इसलिए गिरधारी के पास नहीं जाएगा. मैं ने सोमनाथ को सुनाने के लिए कहा, ‘‘तुम यहीं बैठो, मैं बात कर के आता हूं.’’

फिर मैं उस कमरे की तरफ बढ़ गया. इस बार मैं अचानक हमला करना चाहता था. मैं ने धीरे से दरवाजा खोला और तेजी से अंदर दाखिल हुआ. कमरे में एक ही चारपाई थी और उस पर वह सांड लेटा हुआ था. मुझे देख कर वह बड़ी फुरती से उठा, पर मैं ने उसे टक्कर मारने का मौका नहीं दिया. मैं ने पिस्तौल के दस्ते से वार कर के उस की गरदन का पुट्ठा तोड़ दिया. वह चकरा कर नीचे गिरा तो मैं ने उस के पेट पर कस कर घुटना मारा. उस ने हाथपैर ढीले छोड़ दिए. इस तरह सांड ने आसानी से हार मान ली.

मैं उसे थाने ले आया और 2 मजबूत बंदे उस की धुलाई पर लगा दिए. जब उस के सिर से गुंडागर्दी का भूत उतर गया तो मैं ने उस से सीधा सवाल किया, ‘‘तुम ने किस के कहने पर लाला चंदरमल को गायब किया है?’’

वह कानों को हाथ लगा कर बोला, ‘‘आप सच मानें यह काम मैं ने नहीं किया है, आप चाहे कसम उठवा लें.’’

मै ने कहा, ‘‘तुम नहीं जानते, मुझे सब पता है. भगवती लाला से दौलत में हिस्सा चाहती थी. उस ने प्रकाश को आगे कर दिया था कि ससुर से हिस्सा मांगे. जब लाला नहीं माना तो उस ने तुम से कहा कि लाला चंदरमल को गायब करवा दो. तुम्हें दौलत का लालच आ गया. तुम्हारा और भगवती का संबंध है, मुझे यह भी मालूम है, इसलिए तुम यह काम करने पर राजी हो गए.’’

मेरी बातें सुन कर गिरधारी सिर झुका कर बोला, ‘‘मेरा और भगवती का ताल्लुक है, यह बात सच है. मैं मानता हूं, पर लाला को मैं ने गायब नहीं किया. हां, मैं ने भगवती और प्रकाश को गायब हो जाने को जरूर कहा था, क्योंकि मुझे पता लग गया था कि आप उन दोनों पर शक कर रहे हैं और जल्द ही उन्हें पकड़वा लेंगे.

‘‘भगवती भी डर गई थी, इसलिए वे दोनों छिप गए. हम से गलती हो गई. गायब होने से आप का शक और बढ़ गया. अब मैं आप को बताता हूं, वह अपने पति के साथ अपने चाचा के घर छिपी है. मैं पता बताता हूं. मुझे पता है, मकरंदी ने आप को मेरे खिलाफ भड़काया है. उस की मुझ से दुश्मनी चल रही है. उसी के चलते उस ने आप को मेरे बारे बताया है.’’

‘‘तुम्हारी और मकरंदी की क्या दुश्मनी है और क्यों?’’

‘‘मैं कसम खा कर सच कह रहा हूं. इस कमीने मकरंदी ने एक दिन मुझ से कहा था कि चलो लाला को गायब कर देते हैं. उस के पास काफी दौलत है. काफी कुछ दे दिला कर वह हम से अपनी जान छुड़वाएगा. हमें अच्छाखासा पैसा भी मिल जाएगा. मैं नहीं माना, इसी पर हमारी कहासुनी हो गई.

‘‘इसी वजह से उस ने मुझे कुरबानी का बकरा बनाया. आप के मुखबिर की मुट्ठी गरम कर के मुखबिर के तौर पर आप तक पहुंचा. आप चाहें तो अपने मुखबिर से पूछ सकते हैं. उस ने खुद अपना नाम आप तक भिजवाया है, ताकि आप की नजर में मुझे मुजरिम बना सके. वह बड़ा शातिर और कमीना आदमी है, यह सब उसी की चाल है.’’

मैं ने अपने मुखबिर को बुला कर सख्ती से पूछा तो उस ने कबूल कर लिया कि मकरंदी ने ही पैसे दे कर अपना नाम मुखबिर की तौर पर बताने को कहा था. इस के बाद वह हाथ जोड़ कर माफी मांगने लगा. गिरधारी का बयान मुझे सच्चा लगा. एक बात और मैं ने नोट की थी कि मकरंदी गिरधारी के सामने आने से बचता था. मैं ने गिरधारी से कहा, ‘‘मैं तुम्हें अभी तो छोड़ रहा हूं, पर तुम रोज थाने आओगे. अगर नहीं आए या फरार हुए तो मैं तुम्हें ही मुजरिम समझ बंद करवा दूंगा.’’

वह हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘साहब, मैं ने सब सच कहा है. यह मकरंदी ही बदमाश है. उस ने ही लाला को उठाने की बात उस के शराबखाने के नौकर दीनानाथ के सामने कही थी. आप चाहें तो उस से भी पूछ लें, मैं बेकुसूर हूं.’’

गिरधारी के बयान के बाद मेरी अब तक की सारी तफतीश बेकार चली गई. अब मेरे सामने फिर वही सवाल खड़ा था कि लाला को किस ने गायब किया? मैं ने दूसरे दिन मकरंदी को थाने बुलाया और अपने हवलदार से कह दिया कि उसे बिठा कर पूछताछ करते रहो और मैं खुद मकरंदी के शराबखाने पहुंच गया. वहीं अड्डे पर मैं ने दीनानाथ को खूब धमकाया. उस से कहा कि एक चोर ने एक वारदात में उस का नाम लिया है. वह मुझे पहचानते ही डर गया, धमकी से भी घबराया. मैं ने कहा, ‘‘कल तुम थाने आओ, वहां कुछ पूछताछ करनी है, पर किसी को कुछ बताना नहीं. अगर किसी को कुछ पता चला तो मैं तुम्हें ही बंद कर दूंगा.’’

दूसरे दिन दीनानाथ मेरे पास थाने पहुंच गया. मैं ने उस से कहा, ‘‘मुझे लाला चंदरमल और मकरंदी के बारे में पूरी बात सचसच बताओ.’’

वह कहने लगा, ‘‘लाला शराब खूब पीता था और मकरंदी उस के पास शराब पहुंचाता था. इसलिए उन दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई थी. लाला पैसों के मामले में एकदम खरा था. उस का कारोबार बहुत अच्छा चलता था. वह अपने बेटों में पैसे बांटता था, बाकी की शराब पी कर बराबर कर देता था. उस की बीवी तो मर गई थी, घर में अकेला था, इसलिए कोई रोकटोक नहीं थी.’’

‘‘अच्छा यह बताओ कि क्या कभी मकरंदी ने तुम से कहा था कि लाला को गायब कर दें और उस से पैसे ऐंठ लें?’’ मैं ने पूछा.

‘‘यह बात पहले मुझ से नहीं, गिरधारी के साथ हुई थी साहब, मुझे याद है कि गिरधारी कुछ रकम का हिसाब करने मकरंदी के पास आया था. उस वक्त मैं भी अड्डे पर मौजूद था. गिरधारी ने मकरंदी से कहा था कि इस वक्त जरा हाथ तंग है, बाकी के पैसे कुछ दिनों बाद दे देगा, इस पर मकरंदी ने कहा कि किसी साहूकार से ले लो. गिरधारी  ने कहा, ‘साहूकार (लाला) तो तुम्हारा यार है.’

मकरंदी ने कहा था, ‘‘चलो गिरधारी, लाला को गायब कर देते हैं. अच्छीखासी रकम ले कर उसे छोड़ेंगे, काफी पैसा मिल जाएगा.’’

गिरधारी ने इनकार करते हुए कहा था, ‘‘मैं इस तरह के गंदे काम नहीं करता, न किसी जुर्म में शामिल होना चाहता हूं.’’

इस पर उन दोनों में कुछ कहासुनी भी हुई थी. फिर गिरधारी ने बाकी बचे पैसे 2 दिनों में तिवारी से भिजवा दिए थे. उसी दिन मकरंदी ने मुझ से कहा, ‘‘दीनानाथ, चलो अपन दोनों मिल कर लाला को गायब करते हैं. जो पैसे मिलेंगे, आपस में बांट लेंगे.’’

मैं ने साफ इनकार कर दिया. मैं शराब का धंधा करता हूं, बुरा आदमी हूं, पर किसी की जान जोखिम में नहीं डाल सकता. ऐसा काम नहीं करूंगा. दीनानाथ के इनकार के बाद मकरंदी ही बचता था, जिसे इस सवाल का जवाब देना था कि आखिर लाला कहां गया? गिरधारी और दीनानाथ दोनों ही मकरंदी की तरफ इशारा कर रहे थे. दोनों के बयान एक जैसे थे और सच्चे थे. अब मेरा शक मकरंदी की तरफ गया. मैं ने दीनानाथ को कहीं बाहर न जाने का पाबंद कर के जाने दिया.

दीनानाथ के बयान के बाद जब मकरंदी थाने आया तो मैं ने उसे कमरा बंद कर के बिठा लिया और सख्ती से कहा, ‘‘तुम ने काफी चक्कर दिए. लाला को तुम ने ही गायब किया है. अभी सच बता दो, नहीं तो मुश्किल में पड़ जाओगे.’’

वह एकदम से परेशान हो गया कि कल तक थानेदार उस के साथ था, आज एकदम से खिलाफ हो गया और उस पर शक कर रहा है. मुजरिम का घबराना तफतीश के लिए अच्छा रहता है. मैं उस पर दबाव बना सकता था. मैं ने उसे हवालात में डाल दिया. वह बड़ा ढीठ आदमी था. एक दिन तक तो साफ इनकार करता रहा. दूसरे दिन मैं ने दीनानाथ को बुलवा लिया. उसे मकरंदी के सामने बिठा कर पूछा. उस ने साफसाफ कह दिया कि मकरंदी ने गिरधारी से और उस से लाला को उठवाने की बात कही थी.

दीनानाथ पुलिस से छूटना चाहता था, इसलिए उस ने पूरा सच उगल दिया. सच सुन कर मकरंदी का चेहरा फक पड़ गया. मैं ने कहा, ‘‘मकरंदी भलाई इसी में है कि तुम सच्चाई कबूल कर लो, नहीं तो पुलिस की मार के आगे टिक नहीं सकोगे.’’

मकरंदी ने सिर झुका लिया. अब मेरे सामने बैठा, वह अपने जुर्म का इकरार कर रहा था, ‘‘दीनानाथ के इनकार करने के बाद मैं ने खुद यह काम करने का फैसला कर लिया. वह सोमवार का दिन था. मुझे पता था कि उस दिन वह जम कर पीता था. इसलिए उस के घर मैं ने जो शराब भिजवाई थी, वह बिना मिलावट की असली शराब थी. मैं चाहता था कि इस सोमवार को जब लाला शराब पिए तो ऐसा नशा चढ़े कि अपना होश खो बैठे.

‘‘मैं उस के घर चला गया. जब मैं वहां पहुंचा तो वह पूरे होशोहवास में घर से निकल रहा था. मुझे बड़ी हैरानी हुई. सोमवार के दिन लाला इतनी ठीक हालत में कैसे? मैं ने लाला से पूछा, ‘क्या बात है? जलपानी नहीं लिया क्या?’ इस पर वह कहने लगा, ‘आज मैं ने जलपानी नहीं लिया (वह शराब को जलपानी कहता था). मैं अभी दिवाली के लिए अपनी छोटी बहू के घर जा रहा हूं. मैं उन लोगों के सामने शराब पी कर नहीं जाता.’

‘‘लाला की इस बात ने मेरा सारा प्लान खतरे में डाल दिया. मैं ने लाला से कहा कि दिवाली की खुशी में मैं खुद उस के साथ जलपानी लेने आया हूं. एक गिलास से कोई फर्क नहीं पड़ेगा. पहले वह हिचकिचाया, ‘नहीं..नहीं..’ करने लगा. लेकिन मैं ने थोड़ा जोर डाला तो वह मान गया.

‘‘हम दोनों बातें करतेकरते अड्डे की तरफ चले. वहां मैं ने लाला को एक गिलास दिया. उस के बाद तो थोड़ा कहने पर वह पीता चला गया. उस के ढह जाने से पहले मैं उसे श्मशानघाट की तरफ ले कर चला गया. वहां एक जगह ऐसी है, जहां कुम्हार मिट्टी खोदते हैं. उस जगह बड़ेबड़े गड्ढे बन गए हैं.

‘‘उस के करीब एक सूखा कुंआ है. वहां बड़ी वीरानी थी. दूरदूर तक कोई नहीं था. मैं लाला को बातों में लगा कर वहां तक ले गया, फिर हम कुएं के पास आ गए. उस वक्त तक लाला नशे में धुत हो चुका था. उस के पांव सीधे नहीं पड़ रहे थे. वह बुरी तरह लड़खड़ा रहा था.

‘‘मैं ने उस की सदरी की जेब टटोली और चाबी निकाल कर संभाल कर रख ली. उस में एक तिजोरी की चाबी भी थी. फिर मैं ने लाला को कुएं में धकेल दिया. लाला की एक चीख सुनाई दी और अंदर से धप्प की आवाज आई. फिर सन्नाटा छा गया. कुछ देर मैं मुंडेर पर बैठा रहा और फिर वापस आ गया.’’

मकरंदी का बयान सुन कर मैं एकदम शौक्ड रह गया. एक बूढ़े भले आदमी को उस शराब बेचने वाले ने बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया था. वह आगे बोला, ‘‘वापसी के पहले मैं ने एक बार कुएं में झांक कर देखा, मुझे दूर नीचे एक गठरी सी दिखाई दी, वह लाला चंदरमल था. मैं वहां से सीधा लाला के घर गया, चाबियां मेरे पास थीं.

‘‘उस के घर का दरवाजा खोल कर मैं अंदर गया. घर में मैं ने सेफ तलाश ली. मैं ने उसे खोला उस में मुझे सोने की चंद इंटें और 10 हजार नकद मिल गए. मैं ने वह सब कुछ समेटा और ताला बंद कर के घर आ गया.

‘‘मैं ने घर में सारा सामान सुरक्षित रख दिया. फिर योजना बना कर आप को गिरधारी की राह पर लगा दिया, ताकि मुझ पर से शक हट जाए. लेकिन लगता है, लाला की रूह को चैन नहीं मिला, उस ने मुझे पकड़वा कर ही छोड़ा.’’

मकरंदी का बयान मैं ने मुंशी से लिखवाया. इस केस में आलाएकत्ल मिलने का कोई सवाल ही नहीं था. बस मुजरिम का इकबाली बयान था, जिस पर पूरा केस टिका था. मैं ने मकरंदी को हवालात में डाला और उस के घर खबर भिजवा दी. उस की बीवी और उस का एक भाई रोते हुए मेरे पास थाने आ पहुंचे. मैं ने उस के भाई को बता दिया कि उस ने कत्ल किया है. उसे मकरंदी से मिलवा भी दिया. उस की बीवी को यकीन ही नहीं हो रहा था कि उस का शौहर खून कर सकता है. अब लाश को बरामद करने का काम करना था.

फिर मैं अर्जुन के घर पहुंचा, दोनों तपाक से मिले. मैं ने उस के दूसरे दोनों भाइयों को भी बुलवा लिया. जब वे सब इकट्ठा हो गए तो मैं ने उन्हें सारी बात बता दी. उन्हें बातया कि लाला इस वक्त कहां है. वे सारे रोनेधोने लगे. सीता का तो रोरो कर बुरा हाल था. उस का ससुर जिस वक्त उस के घर आने को निकल रहा था, उसी वक्त उस का कत्ल हो गया था. मैं तीनों भाइयों और 3-4 सिपाहियों को ले कर कुएं पर पहुंचा. लाला के 2 बेटे अर्जुन और प्रकाश कुएं में नीचे उतरे. ऊपर से लटकाए गए रस्से में लाश बांध कर ऊपर लाई गई. लाश की खराब हालत देख कर अर्जुन और प्रकाश की तबीयत खराब होने लगी.

थाने आ कर मैं ने बरामदगी व तलाशी के कागजात बनाए. मकरंदी के घर से सोना व पैसा बरामद करवाया. चालान तैयार किया, फिर कागजी और अदालती कामकाज शुरू हो गया. इस केस में मकरंदी को उम्रकैद की सजा हुई, क्योंकि मौके का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था. अदालत की नजर में गिरधारी और दीनानाथ की गवाही संदेहास्पद थी.

इस पूरे केस को हल करने में छोटी बहू सीता की खास भूमिका थी, उसी के रोनेधोने पर रिपोर्ट दर्ज हुई थी और बाकायदा तफ्तीश की गई थी. Hindi Story

Social Crime Story: आशिकी ने लगाया गृहस्थी पर ग्रहण

Social Crime Story: सरस्वती को पता चला कि राजपाल का उस की भौजाई से याराना चल रहा है तो उस ने गांव के ही महेश से संबंध बना लिए. इस के बाद ऐसा क्या हुआ कि उसे पति का खून करना पड़ा. शादी के बाद उस की जिंदगी काफी खुशहाल थी. पति और सासससुर का उसे भरपूर प्यार मिलता था. नत्थू सिंह और जाविकी के 2 बेटे थे. बड़ा शिशुपाल और छोटा राजपाल. शादी के कुछ सालों बाद शिशुपाल और उस की पत्नी गुड्डो अपने बच्चों के साथ बगल वाले मकान में अलग रहने लगे थे. छोटे बेटे राजपाल की शादी के बाद जाविकी ने साफ कह दिया था कि बहूबेटा उन के साथ ही रहेंगे.

उत्तर प्रदेश के एटा जिले के गांव फरीदपुर के रहने वाले नत्थू सिंह के छोटे बेटे राजपाल का विवाह बदायूं जिले के गांव कलुआं ढेर निवासी प्रेमपाल की छोटी बेटी सरस्वती के साथ हुआ था. ससुराल में सरस्वती को पति का नहीं, सासससुर का भी खूब प्यार मिला. कालांतर में सरस्वती 3 बेटों, प्रदीप, पवन और मनीष की मां बनी. बेटों के जन्म के बाद ससुराल में सरस्वती का सम्मान और बढ़ गया. राजपाल एटा में नगरिया मोड़ पर स्थित दूध की डेयरी में काम करता था. उसे वहां से जो वेतन मिलता था, उस से परिवार का गुजारा आसानी से हो जाता था. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि इसी बीच एक दिन सरस्वती की भाभी रामस्नेही उस के यहां आई.

रामस्नेही उस के यहां रही तो 2-3 दिन ही, पर उतने ही दिनों में उस ने सरस्वती के गृहस्थ जीवन में आग लगा दी थी. उस की अपने ननदोई राजपाल से नजदीकियां बढ़ गई थीं, जिस की वजह से राजपाल का पत्नी सरस्वती से मन उचट गया था. उस की दिलचस्पी रामस्नेही में बढ़ गई थी. जल्दी ही सरस्वती को पति का प्यार दिखावा लगने लगा था. इस बारे में जब उस ने पति से पूछा तो वह पत्नी को समझाने के बजाय उस पर खीझ जाता था. पति का यह व्यवहार सरस्वती को जरा भी अच्छा नहीं लगता था. वह मन मसोस कर रह जाती थी.

गांव में राजपाल का एक दोस्त था महेश. उस का उस के यहां काफी आनाजाना था. महेश शादीशुदा था. उसे राजपाल और उस की पत्नी के बीच बढ़ रही दूरियों की जानकारी थी. इसी बात का वह फायदा उठाना चाहता था.

एक दिन महेश राजपाल की गैर मौजूदगी में उस के घर आया. सरस्वती ने उसे देख कर कहा, ‘‘वह तो ड्यूटी पर गए हैं.’’

‘‘जानता हूं भाभी, वह नहीं हैं तो क्या मैं आप से बातें नहीं कर सकता?’’

‘‘हां…हां, क्यों नहीं, आइए.’’ कहते हुए सरस्वती ने उसे घर में आने का इशारा किया.

महेश घर के अंदर आ कर चारपाई पर बैठ गया. उस ने सरस्वती का हालचाल पूछा तो उस ने कहा कि वह बिलकुल ठीक है. महेश ने मौके का फायदा उठाते हुए सरस्वती का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘भाभी, मैं जानता हूं आप कह जरूर रही हैं कि सब ठीक है, लेकिन कुछ भी ठीक नहीं हैं. आप अपने दिल पर हाथ रख कर कहिए कि राजपाल आप का दिल नहीं दुखा रहा है. सब कुछ सहते हुए भी आप के होंठों पर मुसकान है. भाभी, आप अपने मुंह से भले ही न कहें, लेकिन मैं आप का दुख समझता हूं.’’

महेश अपनी मीठीमीठी बातों से सरस्वती को पटाने की कोशिश करने लगा. सरस्वती काफी अवसाद में थी. ऐसी हालत में महेश उसे अपना सा दिखाई देने लगा. तभी महेश चारपाई से उठ कर चलते हुए बोला, ‘‘मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है भाभी कि राजपाल इतनी खूबसूरत बीवी की उपेक्षा क्यों कर रहा है?’’

इतना कह कर वह घर से निकल गया. महेश के जाने के बाद सरस्वती उस की बातों पर विचार करने लगी. उसे महेश की बातें बिलकुल ठीक लग रही थीं. उस का ध्यान महेश पर जम गया. अब उस का मन महेश के लिए बेचैन हो उठा. लेकिन इधर वह दिखाई नहीं दे रहा था. एक दिन दोपहर के समय महेश उस के यहां अचानक आ गया. उसे देखते ही वह खुश हो गई. मौका देख कर उस दिन महेश ने कह दिया कि वह उसे प्यार करता है.

सरस्वती कमजोर औरत थी, जरा सा सहारा मिलते ही वह महेश की बांहों में आ गिरी. वह यह भी भूल गई कि वह 3 बच्चों की मां है. उसे पता नहीं था कि पतन का रास्ता बड़ा ही फिसलन भरा होता है. एक बार जो इस पर कदम रख देता है, वह संभल नहीं पाता. सरस्वती के साथ भी यही हुआ. महेश के साथ नजदीकी बनने के बाद वह खुद को उस से अलग नहीं कर पाई. महेश ने जो चाहा था, वह उसे मिल चुका था, इसलिए उस का सरस्वती के यहां वक्तबेवक्त आनाजाना शुरू हो गया था. दोनों ने मिलनेजुलने में सावधानी तो खूब बरती, लेकिन मोहल्ले वालों की नजरों से नहीं बच सके. दोनों के बारे में लोग तरहतरह की बातें करने लगे.

बात राजपाल के कानों तक पहुंची तो उस ने पत्नी से पूछताछ की. पति की तरफ से सरस्वती का मन पहले से ही खट्टा था, इसलिए अपने बारे में कुछ कहने के बजाय उस ने पति को अपनी भाभी रामस्नेही के संबंधों को ले कर खरीखोटी सुना दी. मजबूरन राजपाल को अपना मुंह बंद करना पड़ा. राजपाल के बड़े भाई शिशुपाल का घर बिलकुल बगल में था. शिशुपाल की पत्नी गुड्डो ने जब उसे महेश और सरस्वती के संबंधों के बारे में बताया तो उस ने एक दिन राजपाल को अपने घर बुला कर कहा कि यह सब ठीक नहीं है. महेश का इस तरह सरस्वती से मेलजोल रखने का मतलब क्या है?

भाई की बात सुन कर राजपाल को लगा कि अब उस की मोहल्ले मे खासी बदनामी हो रही है. इस के बाद उस ने गुस्से में सरस्वती की पिटाई कर दी. पिटने के बाद भी सरस्वती कहती रही कि उस के महेश के साथ गलत संबंध नहीं है. लोग वैसे ही उसे बदनाम कर रहे हैं. लेकिन राजपाल को उस की बातों पर यकीन नहीं हुआ. वह अब पत्नी पर निगाह रखने लगा. महेश से संबंध बनने के बाद सरस्वती अपने सासससुर से अलग पति के साथ दूसरे मकान में रहने लगी थी. प्रेमी से मिलने के लिए उस ने एक दूसरा रास्ता निकाल लिया. वह रात के खाने में पति को नींद की गोलियां मिला कर खिला देती थी, जिस से जल्द ही वह गहरी नींद सो जाता था. इस के बाद प्रेमी महेश के साथ वह मौजमस्ती करती थी.

लेकिन एक दिन सरस्वती ने राजपाल को नींद की गोलियां खाने में खिलाईं तो उस के कुछ देर बाद उसे किसी वजह से उलटियां हो गईं, जिस से उस का खाया हुआ ज्यादातर खाना बाहर निकल गया. उलटियां कर के वह बिस्तर पर लेट गया. सरस्वती ने सोचा कि वह सो गया होगा, इसलिए रोज की तरह उस ने महेश को फोन कर दिया. बिना किसी डर के दोनों अपनी हसरतें पूरी करने लगे. उसी दौरान अचानक राजपाल की आंखें खुल गईं. उस के जागते ही महेश वहां से भाग गया. लेकिन राजपाल को पत्नी की हकीकत पता चल गई. उस दिन उस ने उस की खूब पिटाई की.

राजपाल को अब अपनी गृहस्थी बिखरती नजर आ रही थी. उस ने इस बारे में अपने भाई शिशुपाल से बात की. दोनों ने सलाह कर के इस मामले में पंचायत बुलाने का फैसला किया. पंचायत बुलाई गई. पंचायत में महेश के पिता इंदुपाल को भी बुलाया गया. पंचों ने इंदुपाल से साफ कह दिया कि वह महेश को समझा ले, वरना उस के परिवार का हुक्कापानी बंद कर दिया जाएगा.

घर वालों के दबाव में महेश ने सरस्वती से दूरी तो बना ली, लेकिन उस का दिल उस के लिए बेचैन रहता था. उधर सरस्वती की हालत भी बिन पानी मछली जैसी हो रही थी. इस बात ने सरस्वती के मन में पति के प्रति नफरत पैदा कर दी. पतिपत्नी के बीच दूरियां बढ़ती जा रही थीं. उसी बीच एक दिन राजपाल के पास रामस्नेही का फोन आया. उस ने कहा कि उस के पति नौबत सिंह की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई है.

राजपाल ने नौबत सिंह की बीमारी की बात सरस्वती को बताई और उसे ले कर कलुआं पहुंच गया. उस ने नौबत सिंह को अस्पताल में भरती करा दिया. लेकिन वह बच नहीं पाया. उस की मौत हो गई. नौबत सिंह की मौत के बाद रामस्नेही एकदम अकेली हो गई. नौबत सिंह रेलवे में नौकरी करता था. अब रामस्नेही राजपाल के सहयोग से मृतक आश्रित के तहत नौकरी पाने की कोशिश करने लगी.

सरस्वती तो कुछ दिनों बाद अपने घर आ गई, पर सलहज की नौकरी के सिलसिले में राजपाल का उस के यहां आनाजाना लगा रहा. सरस्वती मन ही मन बेचैन थी. वह महेश से मिलना चाहती थी, पर उसे एक बुरी खबर मिली कि महेश ट्रैक्टर के नीचे आ गया है, जिस से उस का पैर कट गया है. इस का सरस्वती को बड़ा दुख हुआ. इधर साले नौबत सिंह की मौत के बाद राजपाल सलहज की आर्थिक मदद भी करने लगा था. जब इस बात की जानकारी सरस्वती को हुई तो उस ने ऐसा करने से मना किया.

राजपाल ने उसे यह समझाने की कोशिश की कि रामस्नेही को जब नौकरी मिल जाएगी तो उस के सामने फिर कोई समस्या नहीं रहेगी. शक का एक कीड़ा सरस्वती के दिमाग में और बैठ गया. इसी बीच एक दिन रामस्नेही और उस के बच्चों को राजपाल अपने घर लिवा लाया. वह उस के यहां लगभग 15 दिनों तक रही. उस दौरान राजपाल रामस्नेही से खूब हंसीमजाक करता था. इस बात से सरस्वती को लगा कि उस का पति उस के हाथ से निकल गया है. रामस्नेही तो अपने घर चली गई, पर सरस्वती और राजपाल के रिश्तों में जो कड़वाहट पैदा हुई, वह खत्म नहीं हो सकी. आए दिन उन के बीच झगड़ा होने लगा. सरस्वती का गुस्सा बढ़ता जा रहा था. उसे अपना और अपने बच्चों का भविष्य खतरे में दिखाई देने लगा था.

उस के मन में डर पैदा हो रहा था कि यदि पति ने उसे छोड़ दिया तो वह बच्चों को ले कर कहां जाएगी. राजपाल की अपनी सलहज रामस्नेही से नजदीकी लगातार बढ़ती जा रही थी. अब वह कईकई दिनों तक घर नहीं आता था. वह रामस्नेही के पास चला जाता. सरस्वती जब कभी पूछती तो कह देता कि डेयरी पर ज्यादा काम होने की वजह से वह वहीं रुक गया था. सरस्वती जानती थी कि वह झूठ बोलता है. गुस्से में एक दिन सरस्वती ने अपनी भाभी रामस्नेही को खूब खरीखोटी सुनाई, तब रामस्नेही ने उसे अपने दिल की बात बताते हुए कहा कि वह राजपाल से दूर नहीं रह सकती और वे दोनों साथ रह सकती हैं. सरस्वती आगबबूला होते हुए बोली, ‘‘भाभी, तुम जो कर रही हो, ठीक नहीं है. देखना एक दिन तुम्हें इस का अंजाम भुगतना पड़ेगा.’’

इधर रामस्नेही के भाई को जब बहन की हरकतों की जानकारी हुई तो उस ने भी रामस्नेही को समझाया और कहा कि वह जो कर रही है, उस से समाज में उस की अच्छीखासी बदनामी हो रही है. यह सब ठीक नहीं है. रामस्नेही ने भाई से भी कह दिया कि मरते वक्त उस के पति ने उस का और बच्चों का भार राजपाल पर डाल दिया था. इसलिए अब वह उन के साथ ही रहेगी. बहन के इस जवाब से भाई नाराज हो गया, लेकिन रामस्नेही ने इस की कोई परवाह नहीं की.

अब रामस्नेही और राजपाल ने साथसाथ रहने का फैसला कर लिया. उन्हें समाज की कोई परवाह नहीं थी. रामस्नेही को मर्द की जरूरत थी, वह जरूरत उस के ननदोई राजपाल से पूरी हो रही थी. लोग उस के बारे में क्या कह रहे हैं, इस की उसे कोई परवाह नहीं थी. सरस्वती को इस बात का डर था कि कहीं किसी दिन राजपाल रामस्नेही को ले कर घर न आ जाए. यदि उस ने ऐसा किया तो उसे बाहर का रास्ता दिखा देगा. एक दिन वह अपनी जेठानी गुड्डो के पास जा कर अपनी व्यथा बता कर कहने लगी कि वह राजपाल को समझाए. वह भाभी को अपनी सौत के रूप में स्वीकार नहीं करेगी.

देवरानी की समस्या बड़ी जटिल थी. इसलिए उस ने अपने हिसाब से राजपाल को समझाया, लेकिन राजपाल पर तो इश्क का भूत सवार था. उस ने भाभी की सलाह को एक कान से सुना, दूसरे से निकाल दिया. राजपाल पिछले 15 दिनों से घर नहीं आया था. अचानक 16 अगस्त, 2015 की शाम को आ गया. सरस्वती पहले से ही गुस्से से भरी हुई थी. वह समझ गई कि सौतन के घर से ही आया होगा. वह तुनक कर बोली, ‘‘तुम आ गए?’’

‘‘हां, बहुत काम होता है डेयरी में. आज जा कर फुरसत मिली है.’’ राजपाल ने जवाब दिया.

‘‘मैं अच्छी तरह से जानती हूं कि आजकल तुम कौन सा काम कर रहे हो.’’

‘‘तुम्हें तो जलीकटी सुनाने की आदत हो गई है. अच्छा अब जोरों की भूख लगी है, खाना ले आओ.’’ कह कर राजपाल चारपाई पर बैठ गया. सरस्वती ने एक नजर बच्चों पर डाली. वे डरेसहमे एक तरफ बैठे थे. राजपाल ने एक बार भी उन्हें नहीं देखा. उस का दिल जल गया, उस ने खाने की थाली राजपाल की ओर बढ़ाई और उसी क्षण तय कर लिया कि अब वह और नहीं सहेगी.

राजपाल खापी कर निश्चिंत हो कर चारपाई पर लेट गया. उस की यह निश्चिंतता सरस्वती को अखर गई. बच्चों को खाना खिलाने के बाद उस ने रसोई की सफाई की. इस के बाद वह बच्चों को ले कर ऊपर छत पर चली गई. देर रात को वह उठी और धीरे से नीचे आ गई. राजपाल नीचे चारपाई पर सो रहा था. वह अलमारी के पास गई और धड़कते दिल से दरवाजा खोल कर तमंचा व कारतूस निकाल लाई. तमंचे में कारतूस भरा और राजपाल की चारपाई के पास पहुंच गई. इस से पहले कि उस का इरादा बदल जाता, उस ने तमंचा राजपाल की कनपटी से सटा कर फायर कर दिया. यह 16/17 अगस्त की रात की बात थी.

राजपाल को चीखने का भी मौका नहीं मिला. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई. सरस्वती ने कुछ देर बाद मुख्य दरवाजा खोला. बाहर अभी भी सन्नाटा पसरा था. वह तेजी से खेत की ओर बढ़ी, अपने खेत में पहुंच कर उस ने गड्ढा खोदा और उसी में तमंचा दबा दिया. वापस लौट कर उस ने मृत पति पर घृणा भरी नजर डाली और ऊपर जा कर लेट गई. वह सोचने लगी कि अब आगे क्या करना है? सुबह 6 बजे के करीब उठ कर वह अपनी जेठानी के यहां गई और उस से कहा कि राजपाल खून की उलटी कर रहा है. जेठजेठानी घबरा कर उस के यहां आए तो देखा कि राजपाल चारपाई पर लहूलुहान पड़ा था. शिशुपाल ने घूर कर सरस्वती से पूछा, ‘‘किस ने मारी इसे गोली?’’

‘‘मैं क्या जानूं, मैं तो ऊपर सो रही थी.’’ सरस्वती बोली.

शिशुपाल ने उस समय ज्यादा कुछ  कहना उचित नहीं समझा. उस ने पड़ोसियों को इकट्ठा किया और पुलिस को फोन कर दिया. थाना मारघा के थानाप्रभारी घनश्याम सिंह सूचना मिलते ही मयफोर्स के वहां आ गए. उन्होंने राजपाल के शव को देखा, गोली उस की कनपटी पर लगी थी. थानाप्रभारी ने लोगों से पूछताछ की तो लोगों ने बताया कि राजपाल की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. तभी उन की निगाह सरस्वती की ओर गई, जो चारपाई की पाटी पर सिर रख कर रो रही थी. उन्होंने हैरानी से उसे देखा, फिर पूछा, ‘‘रात में तुम कहां थीं? क्या तुम्हें फायरिंग की भी आवाज नहीं सुनाई दी?’’

‘‘साहब, मैं तो सो रही थी. मैं ने कोई आवाज नहीं सुनी. सुबह उठी तो खून देख कर डर गई और अपनी जेठानी को जा कर बताया.’’ उस ने रोते हुए कहा.

सरस्वती की बौडी लैंग्वेज देख कर थानाप्रभारी को उस पर शक हो गया. खैर, उन्होंने घटनास्थल की काररवाई निपटाने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और हत्या कर मामला दर्ज कर के केस की जांच शुरू कर दी. जांच में उन्हें पता चला कि राजपाल और उस की सलहज रामस्नेही के बीच नाजायज संबंध थे. उन्हें लगा, कहीं यह हत्या इन्हीं संबंधों की वजह से तो नहीं हुई. उन्होंने रामस्नेही से पूछताछ की. उस ने कहा कि यह सब सरस्वती ने किया होगा. इस के बाद थानाप्रभारी ने सरस्वती को थाने बुला कर पूछताछ की. थोड़ी सख्ती के बाद सरस्वती ने सचाई उगल दी. उस ने हत्या का जुर्म स्वीकारते हुए सारी कहानी पुलिस को बता दी.

सरस्वती द्वारा पति की हत्या का गुनाह कबूल कर लेने के बाद पुलिस ने राहत की सांस ली. अब सरस्वती जेल में है. उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त तमंचा पुलिस ने बरामद कर लिया है. Social Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

True Crime Story: धोखे की नाव पर सवार – अपनों ने ही ली जान

—श्वेता पांडेय

True Crime Story: गंगाराम अपनी मां दुलारीबाई से किसी भटियारिन की तरह हाथ नचाता हुआ गुस्से से बोला, ‘‘मैं ने तुम्हें कितनी बार बोला है कि मुझे निकासी के लिए रास्ता दो. मुझे लंबा चक्कर काट कर घर तक पहुंचना पड़ता है. उस समय तो और परेशानी बढ़ जाती है जब खेतों से फसल बैलगाड़ी में लाद कर लाते हैं.

‘‘आखिर मेरी बात तुम कब समझोगी. हर साल इसी बात का रोना होता है. सवा महीने बाकी हैं, फसल तैयार हो चुकी है. मुझे निकासी के लिए रास्ता चाहिए. और उस 2 एकड़ खेत में से हिस्सा भी चाहिए. मैं भी परिवार वाला हूं.’’

‘‘अच्छा. अभी तो मांबाप को पूछता नहीं है और जिस दिन जमीन से हिस्सा मिल गया, मांबाप मानने से भी इनकार कर देगा. गंगाराम, मैं ने दुनिया देखी है. बंटवारा हुआ नहीं कि मांबाप के हाथ में कटोरा थमा दोगे. बुढ़ौती में भीख मांगनी पड़ जाएगी.

दोनों मांबेटे में इसी तरह काफी देर तक झगड़ा चलता रहा. उसी समय गंगाराम के पिता बालाराम खेत से घर लौटे. दुलारी ने बेटे की शिकायत अपने पति से की, ‘‘लो, संभालो अपने बेटे को, जो जी में आता है बोलता ही चला जाता है.’’

गंगाराम अपने पिता से बोला, ‘‘बाबूजी, मां को समझाओ और संभालो नहीं तो किसी दिन मेरा मूड खराब हो गया तो इसे गंडासे से काट कर नदी में.’’

बालाराम ने बीच में हस्तक्षेप किया, ‘‘बहुत बोल चुका,’’ उन्होंने अपनी पत्नी दुलारी का पक्ष लिया, ‘‘अब अगर तू अपनी मां को एक भी शब्द बोला तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

इस झगड़े के बीच गंगाराम की पत्नी निर्मला पति का हाथ पकड़ कर बाहर लाने लगी. गंगाराम ने निर्मला का हाथ झटक दिया, ‘‘आज मैं बुड्ढे बुढि़या को छोड़ूंगा नहीं.’’

कहता हुआ गंगाराम अपने पिता बालाराम से जा भिड़ा. बापबेटे को एकदूसरे से हाथपाई करते देख गांव के लोग जमा हो गए.

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गांव वालों ने बापबेटे को बड़ी मुश्किल से एकदूसरे से अलग किया. गंगाराम लोगों की बांहों में जकड़ा हुआ कसमसा रहा था. साथ ही गुस्से से चीखता रहा.

दोनों एकदूसरे के कट्टर विरोधी हो गए. कोढ़ में खाज यह हुआ कि इसी बीच निर्मला बीमार रहने लगी. इस के लिए निर्मला अपनी सास दुलारीबाई को जिम्मेदार ठहराने लगी. वह सास पर यह आरोप लगाती कि उस ने उस के ऊपर कोई टोनाटोटका करा दिया है. गंगाराम ने कई ओझागुनिया को पत्नी को दिखाया. मर्ज यह था कि निर्मला के सिर में दर्द बना रहता था और शाम को बुखार चढ़ने लगता था.

झाड़फूंक से कोई सुधार न हुआ तो वह डाक्टर के पास गया. टेस्ट करवाने पर पता चला कि निर्मला को टायफायड है. एलोपैथी दवा भी चली और झाड़फूंक भी. पता नहीं किस ने असर दिखाया, निर्मला धीरेधीरे ठीक होने लगी. गंगाराम और उस की पत्नी निर्मला के दिमाग में यह बात घर कर गई थी कि उस की सास दुलारीबाई किसी तांत्रिक ओझा से मिल कर उन्हें बरबाद करने पर तुली है.

इस बात पर गंगाराम की सोच भी निर्मला की सोच से अलग नहीं थी. निर्मला जब पूरी तरह से ठीक हो गई और उस के शरीर में जान आ गई तब वह अपनी सास पर इलजाम लगाने लगी. एक बार फिर दोनों पक्षों में तकरार और झिकझिक होने लगी. वह एकदूसरे के लिए गलत भावनाएं रखने लगे. फिर वही समय आया, नवंबर दिसंबर का. फसल तैयार हो कर खेत से कोठरी में जाने को तैयार थी.

मुद्दा फिर वही उठा कि बैलगाड़ी में रखे अनाज को दूसरे रास्ते से लाना होगा. बालाराम और दुलारी किसी भी तरह से इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि निकासी के लिए बाड़ी से जगह दी जाए. हर साल फसल तैयार होने के बाद यही सवाल खड़ा हो जाया करता था. कई सालों से यह निकासी का मसला न तो सुलझ रहा था और न ही दूरदूर तक कोई समाधान ही दिखाई दे रहा था. आज भी इसी विवाद को ले कर गंगाराम और निर्मला दोनों का मन खिन्न था. खाना खाने के बाद दोनों पतिपत्नी टीवी देखने लगे.

टीवी पर वह क्राइम स्टोरी पर आधारित सीरियल देख रहे थे. उस सीरियल की कहानी उन की जिंदगी से जुड़ी जैसी थी. दोनों ने बड़े ध्यान से खामोशी के साथ वह सीरियल देखा. सीरियल खत्म होने के बाद दोनों ने उस पर चर्चा की. गंगाराम और उस की पत्नी को इस बात की चिंता हो रही थी कि कहीं ऐसा न हो कि मांबाप पूरी जमीन छोटे भाई रोहित के नाम कर जाएं. वैसे भी छोटा होने के नाते वह मांबाप का चहेता था.

इस सोच ने निर्मला और गंगाराम को परेशान कर डाला. जब इंसान को कोई चीज मिलने की संभावना दिखाई न देती है, तब वह उसे किसी दूसरे ही तरीके से हासिल करने की कोशिश में लग जाता है. इन दोनों ने भी एक योजना बना ली. गंगाराम और निर्मला ने एक योजना के तहत अपने व्यवहार में थोड़ाबहुत बदलाव किया. अपने पिता बालाराम और मां दुलारीबाई से सहजता से पेश आने लगे. बालाराम और दुलारी को आश्चर्य हुआ कि हमेशा कड़वे बोल बोलने वालों की जुबान में शहद कैसे घुल गया.

इस के बाद उन दोनों ने विचारविमर्श किया कि अपनी योजना में किसे शामिल किया जाए, जिस से उन की योजना सफल हो जाए. नजर और दिमाग के घोड़े दौड़ाने के बाद गंगाराम ने धुधवा गांव के ही नरेश सोनकर, योगेश सोनकर और कोपेडीह निवासी रोहित सोनकर से जिक्र किया.

पैसों के लालच में तीनों ही उन की योजना में शामिल हो गए. तीनों ने योजना बना कर वारदात को अंजाम देने के लिए 21 दिसंबर, 2020 का दिन तय किया. योजना के अनुसार, चारों लोग खेत पर पहुंच गए. वहां बालाराम और उस का छोटा बेटा रोहित तड़के में खेतों पर पानी लगा रहे थे. उन्होंने उन दोनों को दबोच लिया और सीमेंट की बनी पानी की हौदी में डुबो कर दोनों को मार दिया.

अगला निशाना अब दुलारीबाई और उस की बहू कीर्तिनबाई रही. चारों दबेपांव वहां पहुंचे, जहां वे सब्जियों का गट्ठर तैयार करने में व्यस्त थीं. शिकारी की तरह दबेपांव वे उन के करीब पहुंचे और कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ वार कर उन दोनों की जिंदगी भी खत्म कर दी. इतना सब कुछ करने के बाद उन लोगों ने चैन की सांस ली. यहां यह बताते चलें कि निर्मला उन चारों को ऐसा करते हुए दरवाजे की ओट से देख रही थी. काम को अंजाम देने के बाद गंगाराम ने तीनों साथियों को वहां से रवाना कर दिया.

निर्मला और गंगाराम दोनों ने मिल कर कुल्हाड़ी को बाड़ी में ही दबा दिया. सुबह के 5 बजतेबजते पूरे खुरमुड़ा गांव में इस दहला देने वाली हत्या की चर्चा होने लगी. अम्लेश्वर थाने में संजू सोनकर निवासी खुरमुड़ा की रिपोर्ट पर अमलेश्वर थानाप्रभारी वीरेंद्र श्रीवास्तव ने इस नृशंस हत्याकांड की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दी.

जांचपड़ताल के लिए फोरैंसिक टीम घटनास्थल पर पहुंच गई. आईजी विवेकानंद सिन्हा के सुपरविजन में जांच होती रही. पुलिस को किसी तरह का कोई सूत्र नहीं मिल रहा था जिस से जांच आगे बढ़ती. डौग स्क्वायड टीम घटनास्थल पर पहुंच चुकी थी. मृतकों के शव के समीप ले जा कर कुत्ते को छोड़ दिया गया. खोजी कुत्ता गोलगोल चक्कर लगाता हुआ मृतकों को सूंघ कर खेत की ओर कुछ दूर तक गया.

मौके की जांच से इतना तो स्पष्ट था कि हत्यारे 2-3 से कम नहीं थे. खेत में रासायनिक छिड़काव कर दिया गया था, जिस के कारण खोजी कुत्ते को सही दिशा नहीं मिल पा रही थी. बहरहाल, पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. जब पुलिस को किसी तरह का सूत्र नहीं मिला तो पुलिस ने गंगाराम के साढ़ू नरेश सोनकर को विश्वास में ले कर मुखबिरी का जिम्मा सौंपा.

नरेश मंझा हुआ खिलाड़ी था. उस ने पुलिस को मुखबिरी करने के बहाने उलझाए रखा. जांच के लिए आईजी विवेकानंद सिन्हा ने कुछ बिंदु तय किए. उन बिंदुओं को आधार बना कर पुलिस जांच में जुटी रही. इस सामूहिक हत्याकांड को हुए 3 महीने बीत चुके थे. लेकिन अपराधियों का कोई अतापता नहीं था. थानाप्रभारी वीरेंद्र श्रीवास्तव ने अपने एक मुखबिर को नरेश के पीछे लगा दिया. नरेश की एक्टिविटी पुलिस को शुरू से ही संदेहास्पद लगी थी.

फोरैंसिक विशेषज्ञों की टीम के सहयोग से भौतिक साक्ष्य जुटाया गया. टीम ने वैज्ञानिक एवं तकनीकी साक्ष्य को आधार बना कर बारीकी से पूछताछ कर जानकारी इकट्ठी की. पुलिस ने संदेहियों को हिरासत में ले कर सघन पूछताछ की. इस घटना का मास्टरमाइंड बालाराम का अपना सगा बड़ा बेटा गंगाराम निकला. गंगाराम की स्वीकारोक्ति के बाद योगेश सोनकर, नरेश सोनकर, रोहित सोनकर उर्फ रोहित मौसा को गिरफ्तार कर लिया गया. सभी को घटनास्थल पर ले जा सीन रीक्रिएशन कराया गया.

आरोपियों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त कुल्हाड़ी पुलिस ने बालाराम की बाड़ी से बरामद कर ली. घटना के वक्त पहने गए कपड़ों को इन चारों ने ठिकाने लगा दिया था. 18 मार्च, 2021 को आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिस में निर्मला भी शामिल थी. इन चारों आरोपियों का नारको टेस्ट भी कराया गया.

आईजी विवेकानंद सिन्हा ने अमलेश्वर थाना स्टाफ की पीठ थपथपाई. पुलिस ने सभी आरोपियों गंगाराम, उस की पत्नी निर्मला, योगेश सोनकर, नरेश सोनकर और रोहित सोनकर को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. True Crime Story

True Crime Story: बदनामी का दाग

True Crime Story: शादी के बाद भी सरोज अपने प्रेमी सूरज को भुला नहीं पाई थी. फिर एक दिन वह मायके में आई तो प्रेमी के साथ भाग गई. बदनामी के इस दाग को धोने के लिए सरोज की ससुराल और मायके वालों ने ऐसी खौफनाक साजिश को अंजाम दिया कि…

उ त्तर प्रदेश के लखनऊ-हरदोई मार्ग पर थाना कस्बा मलिहाबाद बसा है, जो आमों के लिए भी मशहूर है. इसी थाने के गांव वंशीगढ़ी से थोड़ा आगे निकलते ही जंगल शुरू हो जाता है. 26 जुलाई की सुबह गांव के कुछ लोग जानवरों को चराने इसी जंगल में गए तो उन्हें वहां एक लड़के और एक लड़की की लाश पड़ी दिखाई दी. उन्होंने यह बात गांव के चौकीदार निहाल पासी को बताई तो उस ने यह सूचना थाना मलिहाबाद पुलिस को दे दी.

लाशें पड़ी होने की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी सुधाकर पांडेय, एसएसआई अमरनाथ और कुछ सिपाहियों को साथ ले कर बंशीगढ़ी के जंगल पहुंच गए. जंगल में काफी अंदर एक जवान लड़के और लड़की की क्षतविक्षत लाश पड़ी थी. सबूत की तलाश में सुधाकर पांडेय ने आसपास की झाडि़यों में ताकझांक की तो उन्हें एक हैंडबैग मिला. उस की तलाशी ली गई तो उस में लड़की के कुछ कपड़े और एक पहचानपत्र मिला.

वह पहचानपत्र मृतक युवक का था. उस के अनुसार मृतक सूरज धानुक था, जो थाना मलिहाबाद के गांव सिरगामऊ का रहने वाला था. घर वालों से उस की पहचान हो सकती थी. इसलिए सुधाकर पांडेय ने लाशों की फोटोग्राफी करा कर मृतकों का सामान कब्जे में ले लिया और लाशों को पोस्टमार्टम के लिए लखनऊ भिजवा दिया. थाने लौट कर थानाप्रभारी ने चौकीदार निहाल की ओर से अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी.

सुधाकर पांडेय ने पहचानपत्र से मिले पते पर एक सिपाही को भेजा तो वहां उस की मां गुडि़या मिली. जब उस से सूरज की हत्या के बारे में बताया गया तो वह अपने देवर के बेटे के साथ रोते हुए थाना मलिहाबाद पहुंची. गुडि़या ने लाशों के फोटो देखने के बाद रोते हुए बताया कि सूरज के साथ जिस युवती की लाश मिली है, वह लड़की सरोज है. दोनों एकदूसरे को बहुत प्यार करते थे. कुछ दिनों पहले सूरज सरोज को उस की ससुराल से ले कर भाग गया था, जिस की वजह से सरोज की ससुराल तथा मायके वाले काफी नाराज थे. 18 जुलाई को सरोज के पति मंजेश ने हरदोई के थाना संडीला में सूरज और उस के दोस्त धर्मेंद्र के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी. उसे पूरा यकीन है कि दोनों की हत्या उन्हीं लोगों ने की है.

गुडि़या के बताए अनुसार, मृतका का नाम सरोज था. वह उसी के गांव के रहने वाले रामऔतार पाल की बेटी थी, जो हरदोई के थाना संडीला के गांव ककराली के रहने वाले मंजेश के साथ ब्याही थी. गुडि़या ने यह भी बताया कि थाना संडीला में सरोज को भगाने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी. उन्होंने पता किया तो सचमुच वहां रिपोर्ट दर्ज थी. उन्होंने इस मामले को वहां ट्रांसफर करने की कोशिश शुरू कर दी. लेकिन अधिकारियों के आदेश के बाद मुकदमा ट्रांसफर नहीं हो सका.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, सूरज और सरोज की मौत बेरहमी से मारपीट और गला घोंटने से हुई थी. पोस्टमार्टम के बाद लाशें सौंपने की बात आई तो सूरज के घर वाले तो उस की लाश ले गए, लेकिन सरोज की लाश लेने न तो उस की ससुराल से कोई आया और न ही मायके से. काफी देर बाद उस की मां और बहनें आईं तो पुलिस ने सरोज की लाश उन के हवाले कर दी. पुरुषों के न आने से पुलिस को संदेह हुआ. सुधाकर पांडेय सरोज के पति मंजेश की तलाश में उस के घर पहुंचे तो मंजेश ही नहीं, घर के अन्य पुरुष भी गायब थे. इस से पुलिस को विश्वास हो गया कि दोनों हत्याएं इन्हीं लोगों ने की होंगी.

मंजेश की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने उस के सभी रिश्तेदारों के घर छापा मारा, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. पुलिस ने मंजेश के नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि सरोज जब ससुराल से भागी थी, तभी से मंजेश अपने दोनों सालों दिनेश उर्फ तिवारी और शिवकुमार के संपर्क में था. इस के बाद सुधाकर पांडेय सिरगामऊ स्थित सरोज के मायके पहुंचे तो उस के भाई दिनेश और शिवकुमार भी घर से गायब मिले.

5 अगस्त को सुधाकर पांडेय ने मुखबिर की सूचना पर दिनेश और शिवकुमार को उन के घरों से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर की गई पूछताछ में दिनेश और शिवकुमार ने अपना जुर्म कबूल करते हुए इस सनसनीखेज दोहरे हत्याकांड के बारे में पुलिस के सामने जो बयान दिया, उस में औनर किलिंग की एक खौफनाक कहानी सामने आई, जो इस प्रकार थी. लखनऊ की थानाकोतवाली मलिहाबाद का एक गांव है सिरगामऊ. इसी गांव में शुकुल धानुक  अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी गुडि़या, 2 बेटे सूरज, रोहित और 2 बेटियां थीं. शुकुल धानुक खेतीबाड़ी कर के गुजारा करता था. घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, जिस की वजह से वह बच्चों को पढ़ालिखा नहीं सका.

22 साल का सूरज खेती करने के साथसाथ आम के बागों की देखभाल करता था. बेटियां और दूसरा बेटा अभी छोटे थे. इसी गांव में रामऔतार भी परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी रूपमती, 3 बेटियां तथा 2 बेटे दिनेश और शिवकुमार थे. रामऔतार लखनऊ में सिक्यूरिटी गार्ड की नौकरी करता था. बड़ा बेटा दिनेश एक स्कूल की बस चलाता था. गांव में थोड़ीबहुत जमीन थी, जिस से खानेपीने भर का अनाज पैदा हो जाता था. इस तरह परिवार का गुजारा आराम से हो रहा था. रामऔतार और शुकुल धानुक के घर अगलबगल थे. लेकिन अलगअलग जाति के होने की वजह से दोनों परिवारों में ज्यादा मेलजोल नहीं था. हां, उन के बच्चे जातिपांत को न मानते हुए आपस में मेलजोल रखते थे.

सूरज और रामऔतार की तीसरे नंबर की बेटी सरोज हमउम्र थे, इसलिए बचपन से साथसाथ खेल कर बड़े हुए थे. सूरज को सरोज बहुत अच्छी लगती थी. जब भी वह सरोज को देखता, उस की आंखों में अनोखी चमक आ जाती. इसलिए वह उसे हमेशा देखते रहना चाहता था. सरोज ने भी इस बात को महसूस किया तो उस के मन में भी सूरज के लिए कोमल भावनाएं अंगड़ाई लेने लगीं. इस का परिणाम यह निकला कि दोनों एकदूसरे को चाहने लगे.

सरोज उर्फ बउवा गोरे रंग की खूबसूरत लड़की थी. शोख, चंचल और मिलनसार स्वभाव की होने की वजह से सभी उसे प्यार करते थे. सूरज का घर बगल में ही था, इसलिए वह जैसे ही घर से बाहर निकलता, सरोज को पता चल जाता. इस के बाद किसी बहाने से वह सूरज से मिलने बागों की ओर निकल जाती, जहां दोनों घंटों अकेले में बैठ कर प्यार की मीठीमीठी बातें करते और एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें खाते. लेकिन जब शादी की बात आई तो सूरज ने कहा कि वह छोटी जाति का है, इसलिए उस के घर वाले इस शादी के लिए कभी तैयार नहीं होंगे.

इस बात से सरोज उदास हो गई. उसे उदास देख कर सूरज ने कहा कि वह उस के बिना जीने की बात सोच नहीं सकता, इसलिए गांव से भाग कर कहीं दूर चले जाएंगे, जहां उन के घर वाले उन्हें खोज नहीं पाएंगे. इस के बाद कुछ पैसे ले कर दोनों भाग गए. शाम को जब सरोज के घर से भाग जाने का पता चला तो बदनामी के डर से रामऔतार बेटों के साथ चोरीछिपे उस के बारे में पता लगाने लगा. उस ने थाने में सूरज के खिलाफ रिपोर्ट भी नहीं दर्ज कराई. उस के घर जा कर धमकी जरूर दे आए कि अगर सूरज ने सरोज को जल्दी घर ला कर नहीं छोड़ा तो इस का परिणाम बहुत भयानक होगा.

शुकुल धानुक और गुडि़या वैसे भी सीधेसादे स्वभाव के थे, उन्होंने इस मामले में चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी. दूसरी ओर जीनेमरने की योजना बना कर भागे सूरज और सरोज के पास जब तक पैसे रहे, तब तक पतिपत्नी के रूप में अपनी ही दुनिया में डूबे रहे. लेकिन जब पैसे खत्म हो गए तो आटेदाल के भाव का पता चला. सूरज ने कामधंधे की बहुत तलाश की, लेकिन जहां भी काम मिलता, वेतन इतना कम होता कि दोनों का गुजारा होना मुश्किल था. जब उन के भूखों मरने की नौबत आ गई तो घर लौटने के अलावा उन के पास कोई उपाय नहीं बचा. आखिर हिम्मत कर के दोनों घर लौट आए. उन का सोचना था कि वे घर वालों से कह कर शादी कर लेंगे.

सरोज के लौटने पर पहले तो घर वालों ने उसे जी भर कर कोसा, उस के बाद उस के लिए लड़के की तलाश करने लगे. इसी के साथ उस के घर से बाहर निकलने पर सख्त पाबंदी लगा दी गई. सरोज समझ गई कि अब सूरज के साथ जिंदगी बिताने का उस का सपना सपना ही बन कर रह जाएगा, क्योंकि उस के घर वाले किसी भी हालत में उस की शादी सूरज के साथ नहीं करेंगे. काफी दौड़धूप के बाद रामऔतार को पड़ोस के गांव ककराली में मिश्रीलाल का बेटा मंजेश सरोज के लिए पसंद आ गया. इस के बाद मंजेश से उस की शादी हो गई. यह सन 2012 की बात है.

शादी के बाद सरोज ससुराल चली गई. मंजेश सरोज जैसी सुंदर पत्नी पा कर बेहद खुश था. यही वजह थी कि वह पत्नी की हर इच्छा का खयाल रखता था. इस के बावजूद सरोज सूरज को भुला नहीं पाई. वह जब भी अकेली होती, सूरज को याद कर के आंसू बहाती रहती. धीरेधीरे ढाई साल गुजर गए. इस बीच वह मंजेश के बेटे की मां बन गई. सूरज भी सरोज को नहीं भुला सका था. दिनरात सरोज उस के खयालों में छाई रहती. शायद वह अपनी जिंदगी सरोज की यादों में काटना चाहता था. इसीलिए अभी तक उस ने शादी नहीं की थी. उसी बीच उस के पिता की मौत हो गई तो परिवार चलाने की सारी जिम्मेदारी उसी पर आ गई.

एक दिन वह बागों से लौटा तो पता चला कि सरोज मायके आई है. उस ने मन ही मन ठान लिया कि चाहे जो भी हो, वह सरोज से जरूर मिलेगा और उस के दिल का हाल पूछेगा. अब तक सरोज के घर वालों को लगने लगा था कि सरोज सूरज को भूल चुकी होगी, इसलिए उन्होंने उसे गांव में किसी के घर आनेजाने की छूट दे दी होगी. सूरज मौके की तलाश में रहने लगा. एक दिन दोनों मिले तो एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए. सरोज ने सूरज का नंबर सहेली के नाम से सेव कर लिया. इस बीच दोनों सब की नजरें बचा कर कई बार मिले. इन मुलाकातों में जब सरोज ने बताया कि वह इस शादी से जरा भी खुश नहीं है तो सूरज चौंका. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि सरोज अब भी उसे अपने दिल में बसाए है. उसे लगता था कि सरोज उसे भुला कर अपने परिवार में रम गई होगी.

सूरज ने पूछा, ‘‘क्या तुम अब भी मेरे साथ जिंदगी गुजारने को तैयार हो.’’

‘‘हां, मैं तुम्हारे लिए अपना बसा-बसाया घर छोड़ने को लिए तैयार हूं.’’

इस के बाद दोनों ने खूब सोचविचार कर योजना बना डाली. मायके से सरोज का भागना ठीक नहीं था. वैसे भी उस के घर वाले ज्यादा देर तक बाहर रहने पर चौकन्ने हो जाते थे. इसलिए उस ने कहा कि ससुराल जाने के कुछ दिनों बाद वह बच्चे को छोड़ कर अकेली सूरज के साथ भाग जाएगी. सरोज के साथ घर से भागने की योजना बनाने के बाद सूरज पैसों का इंतजाम करने लगा. कुछ दिनों बाद मंजेश आया तो सरोज ससुराल चली गई. ससुराल में किसी को भी उस के घर से भाग जाने का अंदाजा नहीं था, इसलिए उस के घर से बाहर आनेजाने की पूरी छूट थी.

16 जुलाई को सूरज सरोज से संडीला कस्बे में शीतला देवी के मेले में मिला तो कहा कि रात में वह गांव के बाहर आ कर उसे फोन कर देगा. उस के बाद वह तुरंत घर से निकल कर उस के पास आ जाए. सरोज ने हामी भर दी. रात में सूरज ने फोन किया तो अपने 8 महीने के बेटे को सोता छोड़ कर सरोज गांव के बाहर इंतजार कर रहे सूरज के पास आ गई. सूरज सरोज को साथ ले कर मन में नई जिंदगी बसाने के सतरंगी सपने देखता हुआ लखनऊ की ओर चल पड़ा. कुछ देर बाद बच्चे का रोना सुन कर उस की सास सोमा देवी ने सरोज को आवाज देते हुए बच्चे को चुप कराने को कहा. जब बच्चा चुप नहीं हुआ तो वह बहू सरोज के कमरे में गई. लेकिन वह कमरे में नहीं मिली. सोमा को चिंता हुई कि इतनी रात में बहू कहां चली गई. उस ने बेटे को जगाया. इस के बाद सभी सरोज को तलाशने लगे.

सरोज के न मिलने पर घर वालों को शक हो गया कि जरूर वह किसी के साथ भाग गई होगी. इस के बाद मंजेश ने सरोज के घर छोड़ कर कहीं जाने की बात अपने साले दिनेश को बता कर पूछा कि कहीं सरोज वहां तो नहीं गई है. दिनेश ने कह दिया कि वह यहां नहीं आई है. बहन की करतूत सुन कर दिनेश ने अपना सिर पीट लिया. उसे कतई उम्मीद नहीं थी कि शादी के ढाई, तीन साल बाद सरोज इस तरह घर छोड़ कर चली जाएगी. उन्होंने मंजेश से कहा कि वह पता लगाए कि सरोज को जाते हुए किसी ने देखा तो नहीं, वह किस के साथ गई है.

काफी खोजबीन के बाद भी जब सरोज का कुछ पता नहीं चला तो 2 दिन बाद मंजेश ससुराल आ कर गांव में हो रही अपनी बदनामी के बारे में बता कर गालीगलौच करने लगा. रामऔतार का परिवार बेटी की इस करतूत से काफी दुखी था. दामाद की पीड़ा को समझते हुए उन्होंने उसे सब कुछ बता दिया. तब 18 जुलाई को मंजेश ने संडीला कोतवाली में सूरज और उस के दोस्त धर्मेंद्र के खिलाफ अपनी पत्नी को बहलाफुसला कर भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. संडीला पुलिस ने काररवाई करते हुए सूरज के घर जा कर पूछताछ की तो वे उस के बारे में कुछ नहीं बता सके. सूरज का दोस्त धर्मेंद्र घर में ही मिल गया. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह सूरज और सरोज के प्रेमसंबंधों के बारे में तो जानता था, लेकिन वे कहां हैं, इस बात की जानकारी उसे नहीं है.

पूछताछ के बाद धर्मेंद्र को छोड़ दिया गया. इधर पुलिस ने सूरज और सरोज के मोबाइल नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया था. दूसरी ओर मंजेश अपने साले दिनेश, शिवकुमार तथा अन्य कुछ रिश्तेदारों के साथ सरोज की तलाश में लगा था. मंजेश के गांव ककराली में उस की पत्नी सरोज के घर से भाग जाने की बात चर्चा का विषय बनी हुई थी. लोग चटखारे लेले कर आपस में तरहतरह की बातें कर रहे थे, जिस से घर वालों का बाहर निकलना दूभर हो गया था. 26 जुलाई की शाम मंजेश अपने चचेरे चाचा राकेश के साथ अपनी ससुराल पहुंचा, तभी उस के मोबाइल पर सरोज का फोन आया कि वह इस समय दुबग्गा में है और उस के साथ घर चलना चाहती है.

सरोज का फोन सुन कर मंजेश ने दिनेश से कहा कि गांव में उस की इतनी बदनामी हो चुकी है कि अब वह सरोज को अपने घर नहीं ले सकता. दिनेश और शिवकुमार भी उसे अपने घर में नहीं रखना चाहते थे. तुरंत सभी ने सरोज की हत्या की योजना बना डाली. इस में दिनेश और शिवकुमार ने अपने चचेरे भाई हिन्ना उर्फ सुनील को भी शामिल कर लिया. वे भी चाहते थे कि किसी तरह सूरज मिल जाए तो वे उस का भी काम तमाम कर दें. मंजेश की मोटरसाइकिल पर राकेश और हिन्ना और दिनेश व शिवकुमार अपनी मोटरसाइकिल से रात 11 बजे अंधे की चौकी के पास कलामंडी होते हुए दुबग्गा में सरोज द्वारा बताए स्थान पर पहुंच गए. सरोज वहां मिल गई.

सरोज से सूरज के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि अभी थोड़ी देर पहले वह उसे छोड़ कर बालागंज की ओर गया है. दिनेश के चचेरे भाई सुनील उर्फ हिन्ना ने राकेश को तुरंत अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाया और बालागंज की ओर चल पड़ा. थोड़ी दूर जाने पर सूरज दिखाई दे गया. हिन्ना उसे गांव में पंचायत के सामने सरोज से उस की शादी करवाने का झांसा दे कर मोटरसाइकिल पर बीच में बैठा लिया और उसे भी वहां ले आया जहां मंजेश, राकेश और दिनेश सरोज को ले कर उस का इंतजार कर रहे थे.

सरोज ने डरते हुए चोर नजरों से सब की ओर देखा. उन के चेहरों के भाव देख कर वह कांप उठी. लेकिन अब बाजी उस के हाथ से निकल चुकी थी. दोनों को ले कर वे माल की ओर जाने वाली रोड पर चलते हुए वंशीगढ़ी के जंगल में पहुंचे. जंगल में सन्नाटा छाया था. राकेश सूरज को पकड़ कर एक जगह खड़ा हो गया तो मंजेश सरोज को ले कर जंगल के अंदर चला गया. उस के पीछेपीछे सरोज के दोनों भाई दिनेश और शिवकुमार भी थे. मंजेश ने सरोज को पकड़ने का इशारा किया तो दिनेश और शिवकुमार ने सरोज के हाथ और पैर कस कर पकड़ लिए. इस के बाद मंजेश ने सरोज के गले में पड़ी चुन्नी से उस का गला कस दिया. सरोज के बेहोश होने पर मंजेश ने डंडे से तो दिनेश, हिन्ना और शिवकुमार ने उसे लातघूंसों से मारना शुरू किया. थोड़ी देर में सरोज की मौत हो गई.

सरोज को मार कर वे सूरज के पास पहुंचे. सूरज अब तक समझ चुका था कि उन लोगों ने सरोज की हत्या कर दी होगी, अब उस की बारी है. सरोज को भी वे उसी जगह ले गए, जहां सरोज की लाश पड़ी थी. दिनेश ने उस के दोनों हाथ पकड़े तो राकेश ने उस का मुंह दबाया. हिन्ना और शिवकुमार ने उस के पैर पकड़ लिए. सूरज के बैग से शर्ट निकाल कर उसे वहीं झाडि़यों में फेंक दिया. शर्ट से हिन्ना और शिवकुमार ने सूरज का गला कस दिया, जिस से वह भी बेहोश हो गया. इस के बाद उसे भी डंडे और लातघूंसों से पीटपीट कर मार दिया गया.

दोनों की हत्या करने के बाद मंजेश और उस के चाचा राकेश अपने गांव ककराली चले गए तो सरोज के भाई दिनेश, शिवकुमार तथा हिन्ना अपने गांव सिरगामऊ लौट आए. हत्या के 2 दिनों बाद जब उन्हें पता चला कि मलिहाबाद पुलिस लाशों को बरामद कर के जांच कर रही है तो सभी अपनेअपने घरों से फरार हो गए. लेकिन पुलिस के हाथ उन के गिरेबान तक पहुंच ही गए. शिवकुमार की  मोटरसाइकिल यूपी32-ईएल 3768 पुलिस ने बरामद कर ली थी. सूरज एसपी था, इसलिए मुकदमे में धारा 147 और 3(2)5 एससी/एसटी एक्ट की धारा और बढ़ा दी गई थी.

6 अगस्त को इंसपेक्टर सुधाकर पांडेय ने इस दोहरे हत्याकांड के आरोपी दिनेश उर्फ तिवारी तथा शिवकुमार को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. 7 अगस्त को सरोज के पति मंजेश ने भी न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया. 11 अगस्त को सुबह 10 बजे पुलिस ने हिन्ना उर्फ सुनील को कुशनगरी गांव के पास से उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वह अपनी मोटरसाइकिल से कहीं जाने की फिराक में था. पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त हिन्ना की मोटरसाइकिल यूपी32- डीएच3125 भी अपने कब्जे में ले ली. पूछताछ के बाद उसे भी जेल भेज दिया गया.

21 अगस्त को सुधाकर पांडेय ने अभियुक्तों की निशानदेही पर आलाकत्ल वे लाठीडंडे भी बरामद कर लिए गए, जिन से सूरज और सरोज की हत्या की गई थी. कथा लिखे जाने तक इस हत्याकांड का एक आरोपी राकेश फरान था. पुलिस सरगर्मी से उस की तलाश कर रही थी. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Jaunpur Crime: मुसलिम गर्लफ्रेंड के लिए मांबाप को 6 टुकड़ों में काट डाला

Jaunpur Crime: एक ऐसी शर्मनाक घटना सामने आई है जिस ने रिश्तों को तारतार कर रख दिया है. एक प्रेमी ने मुसलिम प्रेमिका के लिए अपने मांबाप को 6 टुकड़ों में काट डाला. आखिर ऐसा क्या था उस प्रेमिका में जिस से एक इंजीनियर बेटा ने मांबाप को इतनी बेरहमी से मार डाला?  क्या है इस मर्डर का पूरा सच जानने के लिए पढ़ते हैं आगे जो आप को करेगा होने वाली घटना से सचेत और सावधान?

यह दर्दनाक घटना उत्तर प्रदेश के जौनपुर से सामने आई है. यहां एक इंजीनियर बेटे अम्बेश कुमार ने अपने मांबाप की हत्या कर दी. अम्बेश ने मांबाप का सिर लोहे के खलबट्टे से कूच दिया था. फिर आरी से उन के 6 टुकडे कर डाले. इस के बाद उन टुकड़ों को बोरियों में भर कर गोमती नदी में बारीबारी से फेंक आया.

पुलिस के अनुसार, अम्बेश बीटेक की डिग्री लेने के बाद कोलकाता में एक कंपनी में बतौर क्वालिटी इंजीनियर कार्यरत था. वहां उसे 25 हजार की सैलरी मिलती थी. इसी जौब के दौरान उस की मुलाकात एक मुसलिम युवती से हुई. दोनों की नजदीकियां बढ़ी और 2019 में दोनों ने लव मैरिज शादी कर ली. दोनों के 2 बेटे हैं, जिन की उम्र 5 साल और 11 महीने है.

अम्बेश की लव मैरिज से परिवार खुश नहीं था. इसी को ले कर उस के पापा श्याम बहादुर और मम्मी बबीता के बीच बहस हो जाया करती थी. इसी बात को ले कर दोनों के बीच 8 दिसंबर, 2025 को झगड़ा हुआ  तो गुस्से में उस ने अपने मम्मीपापा की खलबट्टे से कूच कर हत्या कर दी.

हत्या करने के बाद अम्बेश ने अपनी बहन को फोन कर बताया कि मम्मी और पापा  कहीं चले गए हैं. वह इसी तरह नाटक करता रहा. 12 दिसंबर, 2025 को अचानक वह भी लापता हो गया. इस के बाद अम्बेश की बड़ी बहन वंदना ने उसे फोन मिलाया तो उस का कुछ पता नहीं चल सका. तब वंदना ने फिर अम्बेश की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करा दी.

पुलिस को उस ने बताया कि  उस के मम्मीपापा पहले गायब हो गए, अब भाई भी लापता है. इस के बाद पुलिस ने इस मामले की गंभीरता से जांच की तो पुलिस को अम्बेश मिल गया. उस से पूछताछ की गई तो उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

एएसपी आयुष श्रीवास्तव ने बताया कि अम्बेश ने बताया कि मम्मीपापा मेरी शादी तुड़वाना चाहते थे. वे चाहते थे कि वह दूसरी शादी कर ले. अम्बेश मुसलिम पत्नी को तलाक देने के लिए तैयार भी था, लेकिन उसे गुजारा भत्ता देना पड़ता. मम्मीपापा गुजारा भत्ता देने के लिए तैयार नहीं थे. तो उस ने पत्नी को तलाक देने से इनकार कर दिया.

इस के बाद मम्मी ने अम्बेश से घर से निकल जाने को कहा. तब अम्बेश ने कहा कि यह तो मेरी नानी का घर है. मुझे नेवासा में दिया था. इसी बात को ले कर मम्मी ने अम्बेश को धक्का मार दिया और कहा कि इसी समय घर से निकल जा. इसी बात को ले कर अम्बेश गुस्सा आ गया. पास में रखा टेबल के लोहे का खलबट्टा था. उस का मूसल उठाया और मम्मी के सिर पर मार दिया. इस के बाद पापा भी वहां आ गए.  वह पुलिस को फोन करने की धमकी देने लगे. वह पुलिस को फोन कर ही रहे थे तभी अम्बेश ने उन को भी मूसल मार दिया.

पापा और मम्मी चिल्लाए. दोनों फर्श पर जा गिरे. इस के बाद उन की सांसें थम चुकी थीं. दोनों की हत्या करने के बाद अम्बेश की समझ में नहीं  आ रहा था कि वह क्या करे.

यह अपराध छिपाने के लिए उस के दिमाग में एक आईडिया आया. वह बेसमेंट से सरिया काटने वाली इलेक्ट्रिक आरी ले आया और दोनों की लाशों के 3-3 टुकड़े कर दिए. फिर 6 को प्लास्टिक की बोरी में भर कर गोमती नदी में फेंक आया.

पुलिस ने आरोपी अम्बेश को अरेस्ट कर लिया है. पुलिस उस के खिलाफ सबूत इकट्ठे कर काररवाई कर रही है. Jaunpur Crime

Love Crime: इश्क की आग में कुछ इस तरह बरबाद हुआ एक परिवार

Love Crime: 2 लोगों के साथ जगराओं के थाना सिटी पहुंची लक्ष्मी ने थानाप्रभारी इंसपेक्टर इंद्रजीत सिंह को बताया था कि उस के पति प्रवासराम 2 दिन पहले काम पर गए तो अब तक लौट कर नहीं आए हैं. थानाप्रभारी ने पूरी बात बताने को कहा तो लक्ष्मी ने बताया कि उस के पति प्रवासराम मूलरूप से बिहार के जिला बांका के थाना रजौली के गांव उपराम के रहने वाले थे.

कई सालों पहले वह काम की तलाश में जगराओं आ गया था और पीओपी का काम सीख कर बडे़बडे़ मकानों में पीओपी करने के ठेके लेने लगा था. उस का काम ठीकठाक चलने लगा तो वह गांव से पत्नी और बच्चों को भी ले आया. जगराओं में वह डा. हरिराम अस्पताल के पास रहता था. सन 2001 में प्रवासराम की लक्ष्मी से शादी हुई थी. उस के कुल 6 बच्चे थे, जिन में 4 बेटियां और 2 बेटे थे. वह सुबह काम पर जाता था तो शाम 7 बजे तक वापस आता था. लक्ष्मी की बात सुन कर इंद्रजीत सिंह ने पूछा, ‘‘जिस जगह तुम्हारा पति काम करता था, वहां जा कर तुम ने पता किया था?’’

‘‘जी साहब, यह लड़का उन्हीं के साथ काम करता था.’’ साथ आए 20-22 साल के एक लड़के की ओर इशारा कर के लक्ष्मी ने कहा.

थानाप्रभारी ने उस लड़के की ओर देखा तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मेरा नाम सोनू है, मैं उन्हीं के साथ काम करता था. वह 2 दिनों से काम पर नहीं आए हैं, जिस से हम सभी बहुत परेशान हैं. हम सभी खाली बैठे हैं.’’

इंद्रजीत सिंह ने एएसआई बलजिंदर सिंह को पूरी बात समझा कर प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज करा कर उस की पत्नी से उस का एक फोटो लेने को कहा. थानाप्रभारी के आदेश पर बलजिंदर सिंह ने प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज कर लक्ष्मी से उस का एक फोटो ले लिया. इस के बाद उन्होंने उस की फोटो के साथ सभी थानों को उस की गुमशुदगी की सूचना दे दी. यह 4 अप्रैल, 2017 की बात है. इस का मतलब प्रवासराम 2 अप्रैल से गायब था.

6 अप्रैल, 2017 को पुलिस को जगराओं के बाहरी इलाके में सेम नानकसर रोड पर स्थित एक गंदे नाले में एक लाश मिली. उसे बिस्तर में लपेट कर फेंका गया था. मौके पर पहचान न होने की वजह से पुलिस ने लाश को मोर्चरी में रखवा कर उस के पोस्टर जारी कर दिए थे. पोस्टर देख कर अगवाड़ लोपो के रहने वाले मृतक के साढू समीर ने उस की शिनाख्त डा. हरिराम अस्पताल के पास रहने वाले प्रवासराम की लाश के रूप में कर दी थी.

इंद्रजीत सिंह ने तुरंत सिपाही भेज कर लक्ष्मी को बुलवा लिया था. लाश देखते ही लक्ष्मी रोने लगी. अब शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी. वह लाश उस के गुमशुदा पति प्रवासराम की ही थी. लाश की शिनाख्त होने के बाद इंद्रजीत सिंह ने प्रवासराम की गुमशुदगी की जगह अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लाश लक्ष्मी और उस के रिश्तेदारों को सौंप दी. उसी दिन शाम को उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, प्रवासराम की हत्या 4 दिनों पहले गला घोंट कर की गई थी. उस की गरदन पर रस्सी के निशान थे. थानाप्रभारी ने इस मामले की जांच बलजिंदर सिंह को ही सौंप दी थी. उन्होंने मृतक की पत्नी लक्ष्मी और उस के भाइयों को बुला कर विस्तार से पूछताछ की. मृतक के भाई अनूप का कहना था कि उस के भाई की न किसी से कोई दुश्मनी थी और न किसी तरह का कोई लेनादेना था. इस के बाद बलजिंदर सिंह ने लक्ष्मी से पूछा, ‘‘तुम सोच कर बताओ कि काम पर जाने से पहले तुम्हारी पति से कोई खास बात तो नहीं हुई थी?’’

‘‘कोई बात नहीं हुई थी साहब, रोज की तरह उस दिन भी वह अपना खाने का टिफिन ले कर सुबह साढ़े 7 बजे घर से गए तो लौट कर नहीं आए.’’

बलजिंदर सिंह ने वहां जा कर भी पूछताछ की, जहां प्रवासराम काम करा रहा था. उस के साथ काम करने वाले मजदूर ही नहीं, मकान के मालिक ने भी बताया कि प्रवासराम निहायत ही शरीफ और ईमानदार आदमी था. लड़ाईझगड़ा तो दूर, वह किसी से ऊंची आवाज में बात भी नहीं करता था. समय पर काम कर के मालिक से समय पर मजदूरी ले कर अपने मजदूरों को उन की मजदूरी दे कर उन्हें खुश रखता था. बलजिंदर सिंह को अब तक की पूछताछ में कोई ऐसा सुराग नहीं मिला था, जिस से वह हत्यारों तक पहुंच पाते. यह तय था कि हत्यारे 2 या 2 से अधिक थे. लेकिन उन की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसे शरीफ आदमी की भला किसी की क्या दुश्मनी हो सकती थी, जो उसे मार दिया.

थानाप्रभारी इंद्रजीत सिंह से सलाह कर के बलजिंदर सिंह मुखबिरों की मदद से यह पता करने लगे कि मृतक की पत्नी का किसी से अवैध संबंध तो नहीं था. इस की एक वजह यह थी कि लक्ष्मी ने कई बार बयान बदले थे. यही नहीं, पूछताछ के दौरान वह डरीडरी सी रहती थी. कभी वह कहती थी कि 2 अप्रैल को काम से लौटने के बाद वह कुछ लेने के लिए बाजार गए थे तो लौट कर नहीं आए तो कभी कहती थी कि सुबह काम पर गए थे तो लौट कर नहीं आए थे.

उस की इन्हीं बातों पर उन्हें उस पर शक हो गया था. मुखबिरों से उन्हें पता चला था कि लक्ष्मी के घर सिर्फ 20-22 सल के सोनू का ही आनाजाना था. उसी सोनू के साथ लक्ष्मी प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज कराने थाने आई थी. उस की उम्र लक्ष्मी से इतनी कम थी कि उस पर संदेह नहीं किया जा सकता था. लेकिन मुखबिर ने जो खबर दी थी, उस से सोनू ही संदेह के घेरे में आ गया था. पुलिस जब उसे गिरफ्तार करने पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला.

बलजिंदर सिंह महिला सिपाही की मदद से लक्ष्मी को थाने ले आए और जब उस से कहा कि उसी ने सोनू के साथ मिल कर अपने पति की हत्या की है तो वह अपने बच्चों की कसम खाने लगी. उस का कहना था कि पुलिस को शायद गलतफहमी हो गई है. वह भला अपने पति की हत्या क्यों करेगी. लेकिन पुलिस को मुखबिर पर पूरा भरोसा था. इसलिए जब उस के साथ थोड़ी सख्ती की गई तो उस ने अपने पति प्रवासराम की हत्या का अपराध स्वीकार करते हुए बता दिया कि उसी ने अपने प्रेमी सोनू के साथ साजिश रच कर पति प्रवासराम की हत्या कराई थी.

इस हत्या में उस का प्रेमी सोनू और उस के 2 दोस्त मिल्टन और छोटू सोनू शामिल थे. सोनू के दोस्त का नाम भी सोनू था, इसलिए यहां उस का नाम छोटू सोनू लिख दिया गया है. लक्ष्मी ने ही प्रवासराम की हत्या करा कर उस की लाश गंदे नाले में फेंकवा दी थी. इस के बाद लक्ष्मी की निशानदेही पर उस के प्रेमी सोनू और उस के साथी अवधेश (बदला हुआ नाम) को हिरासत में ले लिया गया था. जबकि उस का साथी सोनू फरार होने में कामयाब हो गया था. शायद उसे लक्ष्मी, अवधेश और सोनू के गिरफ्तार होने की सूचना मिल गई थी.

बलजिंदर सिंह ने उसी दिन यानी 9 अप्रैल, 2017 को तीनों अभियुक्तों लक्ष्मी, अवधेश और सोनू को जिला मजिस्टै्रट की अदालत में पेश कर के लक्ष्मी और सोनू को 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया, जबकि नाबालिग होने की वजह से अवधेश को बाल सुधारगृह भेज दिया गया. रिमांड अवधि के दौरान प्रवासराम की हत्या की जो कहानी प्रकाश में आई, वह  इस प्रकार थी- 6 बच्चों की मां बन जाने के बाद भी लक्ष्मी की देह की आग शांत होने के बजाय और भड़क उठी थी. इस की वजह यह थी कि प्रवासराम सीधासादा और शरीफ आदमी था. उस ने लक्ष्मी से कहा था कि अब उसे खुद पर संयम रखना चाहिए, क्योंकि उस के 6 बच्चे हो चुके हैं. अब उसे अपने इन बच्चों की फिक्र करनी चाहिए.

प्रवासराम दिनभर काम कर के थकामांदा घर लौटता और खाना खा कर अगले दिन काम पर जाने के लिए जल्दी सो जाता. लक्ष्मी को यह जरा भी नहीं सुहाता था. जब पति ने उस की ओर से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया तो उस की नजरें खुद से लगभग 22 साल छोटे सोनू पर जा टिकीं. काम से फारिग होने के बाद अकेला रहने वाला सोनू अक्सर प्रवासराम के साथ उस के घर आ जाता था. वह घंटों बैठा प्रवासराम और लक्ष्मी से बातें किया करता था. लक्ष्मी की नजरें उस पर टिकीं तो वह उस से हंसीमजाक के साथसाथ शारीरिक छेड़छाड़ भी करने लगी. युवा हो रहे सोनू को यह सब बहुत अच्छा लगता था.

एक दिन दोपहर को जब सोनू काम से छुट्टी ले कर लक्ष्मी के घर पहुंचा तो लक्ष्मी ने उसे पकड़ कर बैड पर पटक दिया और मनमानी कर डाली. सोनू के लिए यह एकदम नया सुख था. उसे ऐसा लगा, जैसे वह जन्नत की सैर कर रहा है. उस दिन के बाद यह रोज का नियम बन गया. सोनू काम के बीच कोई न कोई बहाना कर के लक्ष्मी के पास पहुंच जाता और मौजमस्ती कर के लौट जाता. यह सब लगभग एक साल तक चलता रहा. किसी तरह इस बात की जानकारी प्रवासराम को हुई तो उस ने लक्ष्मी को खरीखोटी ही नहीं सुनाई, बल्कि प्यार से समझाया भी, पर उस के कानों पर जूं नहीं रेंगी.

जब प्रवासराम ने लक्ष्मी पर रोक लगाने की कोशिश की तो सोनू के प्यार में पागल लक्ष्मी ने सोनू के साथ मिल कर प्रवासराम की हत्या की योजना बना डाली. एक दिन उस ने सोनू से कहा, ‘‘जब तक प्रवासराम जिंदा रहेगा तो हम दोनों इस तरह मिल नहीं पाएंगे. वैसे भी अब उस के वश का कुछ नहीं रहा. वह बूढा हो गया है, अब उस का मर जाना ही ठीक है.’’

लक्ष्मी के साथ मिल कर प्रवासराम की हत्या की योजना बना कर सोनू ने साथ काम करने वाले अवधेश और छोटू सोनू को कुछ रुपयों का लालच दे कर अपने साथ मिला लिया. घटना वाले दिन यानी 2 अप्रैल, 2017 को सोनू पार्टी देने के बहाने शराब की बोतल और चिकन ले कर लक्ष्मी के घर पहुंचा. अवधेश और छोटू सोनू भी उस के साथ थे. उस ने प्रवासराम से कहा, ‘‘भइया चिकन और शराब लाया हूं, आज पार्टी करने का मन है.’’

योजनानुसार चारों शराब पीने बैठ गए. खुद कम पी कर सोनू और उस के साथियों ने प्रवासराम को अधिक शराब पिला दी. रात के 11 बजे तक प्रवासराम जरूरत से ज्यादा शराब पी कर लगभग बेहोश हो गया तो लक्ष्मी ने सोनू को इशारा किया. सोनू ने छोटू सोनू और अवधेश की तरफ देखा तो छोटू सोनू ने बेसुध पड़े प्रवासराम के दोनों पैर कस कर पकड़ लिए. अवधेश उस की छाती पर सवार हो गया तो लक्ष्मी और सोनू ने प्रवासराम के गले में रस्सी डाल कर कस दिया. प्रवासराम तड़प कर शांत हो गया तो चारों ने मिल कर लाश को बैड से उतार कर नीचे खिसका दिया.

अवधेश और छोटू सोनू तो अपनेअपने घर चले गए, जबकि सोनू लक्ष्मी के कमरे पर ही रुक गया. दोनों पूरी रात उसी बैड पर मौजमस्ती करते रहे, जिस बैड के नीचे प्रवासराम की लाश पड़ी थी. अगले दिन यानी 3 अप्रैल की रात को अवधेश और छोटू सोनू की मदद से सोनू प्रवासराम की लाश को बिस्तर में लपेट कर रेहड़े से ले जा कर सेम नानकसर रोड पर बहने वाले गंदे नाले में फेंक आया. रिमांड अवधि के दौरान लक्ष्मी की निशानदेही पर पुलिस ने उस के घर से वह रस्सी बरामद कर ली थी, जिस से प्रवासराम का गला घोंटा गया था. हत्या करते समय लक्ष्मी ने अपने सभी बच्चों को दूसरे कमरे में सुला कर बाहर से कुंडी लगा दी थी, जिस से बच्चों को कुछ पता नहीं चल सका था.

रिमांड अवधि समाप्त होने पर 11 अप्रैल, 2017 को लक्ष्मी और उस के प्रेमी सोनू को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. अवधेश को पहले ही बाल सुधार गृह भेज दिया गया था. इस हत्याकांड का एक आरोपी छोटू सोनू अभी फरर है. पुलिस उस की तलाश कर रही है. प्रवासराम की हत्या और लक्ष्मी के जेल जाने के बाद उन के सभी बच्चों को प्रवासराम का छोटा भाई अपने घर ले गया है. लक्ष्मी ने अपनी वासना में अपना परिवार तो बरबाद किया ही, 3 लड़कों की जिंदगी पर सवालिया निशान लगा दिए. Love Crime

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. अवधेश बदला हुआ नाम है.

Gorakhpur Crime: रिश्तों की मर्यादा टूटी, चाची की यारी में चाचा का खौफनाक कत्ल

Gorakhpur Crime: 17 अक्तूबर, 2016 की सुबह जिला गोरखपुर के चिलुआताल के महेसरा पुल के नजदीक जंगल में एक पेड़ के सहारे एक साइकिल खड़ी देखी गई, जिस के कैरियर पर एक बोरा बंधा था. बोरा खून से लथपथ था, इसलिए देखने वालों को अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि बोरे में लाश हो सकती है. लाश  होने की संभावना पर ही इस बात की सूचना थाना चिलुआताल पुलिस को दे दी गई थी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर रामबेलास यादव पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर आ पहुंचे थे. बोरे से उस समय भी खून टपक रहा था.

इस का मतलब था कि बोरा कुछ देर पहले ही साइकिल से वहां लाया गया था. उन्होंने बोरा खुलवाया तो उस में से एक आदमी की लाश निकली. मृतक की उम्र 35-36 साल रही होगी. उस के सिर पर किसी वजनदार चीज से वार किया गया था. वह रंगीन सैंडो बनियान और लुंगी पहने था. शायद रात को सोते समय उस की हत्या की गई थी. पुलिस को लाश की शिनाख्त कराने में जरा भी दिक्कत नहीं हुई. वहां जमा भीड़ ने मृतक की शिनाख्त प्रौपर्टी डीलर सुरेश सिंह के रूप में कर दी थी. वह चिलुआताल गांव का ही रहने वाला था.

शिनाख्त होने के बाद रामबेलास यादव ने मृतक के घर वालों को सूचना देने के लिए 2 सिपाहियों को भेजा. दोनों सिपाही मृतक के घर पहुंचे तो घर पर कोई नहीं मिला. पड़ोसियों से पता चला कि सुरेश सिंह के बिस्तर पर भारी मात्रा में खून मिलने और उस के बिस्तर से गायब होने से घर के सभी लोग उसी की खोज में निकले हुए थे. घर पर पुलिस के आने की सूचना मिलने पर मृतक सुरेश सिंह के बड़े भाई दिनेश सिंह घर आए तो जंगल में एक लाश मिलने की बात बता कर दोनों सिपाही उन्हें अपने साथ ले आए. लाश देखते ही दिनेश सिंह फफक कर रो पड़े. इस से साफ हो गया कि मृतक उन का भाई सुरेश सिंह ही था.

इस के बाद पुलिस ने घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया और उस साइकिल को जब्त कर लिया, जिस पर लाश बोरे में भर कर वहां लाई गई थी. थाने लौट कर रामबेलास यादव ने मृतक के बडे़ भाई दिनेश सिंह की तहरीर पर सुरेश सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर लिया. मृतक सुरेश सिंह प्रौपटी डीलिंग का काम करता था. विवादित जमीनों को खरीदनाबेचना उस का मुख्य धंधा था. पुलिस ने इसी बात को ध्यान में रख कर जांच आगे बढ़ाई, लेकिन उस का ऐसा कोई दुश्मन नजर नहीं आया, जिस से लगे कि हत्या उस ने कराई है.

यह हत्याकांड अखबारों की सुर्खियां बना तो एसएसपी रामलाल वर्मा ने एसपी (सिटी) हेमराज मीणा को आदेश दिया कि वह जल्द से जल्द इस मामले का खुलासा कराएं. उन्होंने सीओ देवेंद्रनाथ शुक्ला और थानाप्रभारी रामबेलास यादव को सुरेश सिंह तथा उस के घरपरिवार के आसपास जांच का घेरा बढ़ाने को कहा. क्योंकि उन्हें लग रहा था कि यह हत्या दुश्मनी की वजह से नहीं, बल्कि अवैधसंबंधों की वजह से हुई है. क्योंकि मृतक को जिस तरह बेरहमी से मारा गया था, इस तरह लोग अवैध संबंधों में ही नफरत में मारे जाते हैं. इसी बात को ध्यान में रख कर जांच आगे बढ़ाई गई तो जल्दी ही नतीजा निकलता नजर आया.

किसी मुखबिर ने बताया कि पिछले कई सालों से सुरेश सिंह की अपनी पत्नी से पटती नहीं थी. दोनों में अकसर लड़ाईझगड़ा होता रहता था और इस की वजह सुरेश सिंह का सगा भतीजा राहुल चौधरी था. क्योंकि उस के अपनी चाची राधिका से अवैध संबंध थे. घटना से सप्ताह भर पहले भी इसी बात को ले कर सुरेश और राधिका के बीच काफी झगड़ा हुआ था. तब सुरेश ने पत्नी की पिटाई कर दी थी, जिस से नाराज हो कर वह बच्चे को ले कर मायके चली गई थी. रामबेलास यादव को हत्या की वजह का पता चल गया था. राहुल से पूछताछ करने के लिए वह उस के घर पहुंचा तो उस के पिता दिनेश सिंह ने बताया कि वह तो लखनऊ में है.

लखनऊ में राहुल गोमतीनगर में किराए का कमरा ले कर रहता है और सरकारी नौकरी के लिए तैयारी कर रहा है. पिता का कहना था कि हत्या वाले दिन के एक दिन पहले वह लखनऊ चला गया था. जबकि मुखबिर ने उन्हें बताया था कि घटना वाले दिन सुबह वह चिलुआताल में दिखाई दिया था. पिता का कहना था कि घटना से एक दिन पहले यानी 16 अक्तूबर, 2016 को राहुल लखनऊ चला गया था, जबकि मुखबिर का कहना था कि घटना वाले दिन वह चिलुआताल में दिखाई दिया था. मुखबिर की बात पर विश्वास कर के रामबेलास यादव ने राहुल को लखनऊ से लाने के लिए 2 सिपाहियों को भेज दिया.

लखनऊ पुलिस की मदद से गोरखपुर पुलिस 22 अक्तूबर, 2016 को लखनऊ के गोमतीनगर से राहुल चौधरी को गिरफ्तार कर गोरखपुर ले आई. थाने ला कर उस से सुरेश सिंह की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बिना किसी हीलाहवाली के चाची से अवैध संबंधों की वजह से चाचा सुरेश सिंह की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. राहुल ने चाची के प्रेम में पड़ कर चाचा की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर के थाना चिलुआताल में सुरेश सिंह पत्नी राधिका सिंह और 6 साल के बेटे के साथ रहता था. उस का बड़ा भाई था दिनेश सिंह. राहुल उसी का बेटा था. दोनों भाइयों के परिवार भले ही अलगअलग रहते थे, लेकिन रहते एक ही मकान में थे. सुखदुख में भी एकदूसरे की मदद भी करते थे. गांव वाले भाइयों के इस प्रेम को देख मन ही मन जलते थे. सुरेश सिंह चेन्नई में किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था. लेकिन पत्नी राधिका बेटे के साथ गांव में रहती थी. वह साल में एक या 2 बार ही घर आता था. उस के न रहने पर जरूरत पड़ने पर घर के छोटेमोटे काम उस के बड़े भाई का बेटा राहुल कर दिया करता था.

राहुल और राधिका थे तो चाचीभतीजा, लेकिन हमउम्र होने की वजह से दोनों दोस्तों की तरह रहते थे, बातचीत भी वे दोस्तों की ही तरह करते थे. इस का नतीजा यह निकला कि धीरेधीरे उन के बीच मधुर संबंध बन गए. उन के मन में एकदूसरे के लिए चाहत के फूल खिले तो एकदूसरे के स्पर्श मात्र से उन का रोमरोम खिल उठने लगा. राहुल चाची राधिका से जुनून के हद तक प्यार करने लगा तो राधिका ने भी उस के प्यार पर अपने समर्पण की मोहर लगा दी. एक बार मर्यादा टूटी तो उन्हें जब भी मौका मिलता, जिस्म की भूख मिटाने लगे. दोनों ने अपने इस अनैतिक रिश्ते पर परदा डालने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन पाप के इस रिश्ते को वे छिपा नहीं सके.

लोग राधिका और राहुल को ले कर तरहतरह की चर्चाएं भी करने लगे, पर उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया. जब सुरेश सिंह के किसी शुभचिंतक ने उसे फोन कर के चाचीभतीजे के बीच पक रही खिचड़ी की जानकारी दी तो वह नौकरी छोड़ कर गांव आ गया. यह सन 2014 की बात है. सुरेश ने खूब पैसे कमाए थे. उन्हीं पैसों से उस ने गांव में रह कर प्रौपर्टी का काम शुरू कर दिया, जो थोड़ी मेहनत के बाद अच्छा चल निकला. कामधंधे की वजह से अकसर उसे दिन भर घर से बाहर रहना पड़ता था, इसलिए राहुल और राधिका को मिलने में कोई परेशानी नहीं होती थी. लेकिन एक दिन अचानक वह दोपहर में घर आ गया तो उस ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ लिया.

फिर क्या था, सुरेश ने न पत्नी को छोड़ा और न भतीजे को. उस ने इस बात को ले कर भाई से बात की तो बेटे की हरकत से वह काफी शर्मिंदा हुए. समाज और रिश्तों की दुहाई दे कर उन्होंने बेटे को घर से निकाल दिया तो वह लखनऊ आ गया और गोमतीनगर में किराए पर कमरा ले कर रहने लगा. यहां वह सरकारी नौकरी की परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था. सुरेश की वजह से गांव में राहुल और उस की चाची की काफी बदनामी हुई थी. यही नहीं, उसे घर से भी निकाल दिया गया था. राधिका की खूब थूथू हुई थी. गांव से ले कर नातेरिश्तेदारों तक ने उस की खूब फजीहत की थी.

धीरेधीरे बात थमती गई. मांबाप से मांफी मांग कर राहुल फिर घर लौट आया. मांबाप ने उसे माफ जरूर कर दिया था, लेकिन उस पर कड़ी नजर रखी जा रही थी. राधिका से उसे मिलने की सख्त मनाही थी. जबकि वह चाची से मिलने के लिए तड़प रहा था. लेकिन सख्त पहरेदारी की वजह से दोनों का मिलन संभव नहीं हो पा रहा था. चाचा सुरेश की वजह से राहुल प्रेमिका चाची से मिल नहीं पा रहा था. उसे लग रहा था कि जब तक चाचा रहेगा, वह चाची से कभी मिल नहीं पाएगा. चाचा प्यार की राह का कांटा लगा तो वह उसे हटाने के बारे में सोचने लगा. आखिर उस ने उसे हटाने का निश्चय कर लिया.

अब वह ऐसी राह खोजने लगा, जिस पर चल कर उस का काम भी हो जाए और वह फंसे भी न. काफी सोचविचार कर उस ने तय किया कि वह अपना मोबाइल फोन औन कर के बाइब्रेशन पर लखनऊ वाले कमरे पर ही छोड़ देगा और रात में गोरखपुर पहुंच कर चाचा की हत्या कर के लखनऊ अपने कमरे पर आ जाएगा. पुलिस उस पर शक करेगी तो मोबाइल लोकेशन के सहारे वह बच जाएगा. तब वह शायद यह भूल गया था कि कातिल कितना भी चालाक क्यों न हो, कानून के लंबे हाथों से उस का बचना आसान नहीं है.

राहुल जब से घर आ कर रहने लगा था, सुरेश और उस की पत्नी राधिका के बीच उसे ले कर अकसर झगड़ा होता रहता था. जबकि इस बीच राहुल एक बार भी चाची से नहीं मिला था. रोजरोज के झगड़े से परेशान हो कर राधिका नाराज हो कर बेटे को ले कर मायके चली गई थी. राधिका के चली जाने से राहुल काफी दुखी था. उस का मन घर में नहीं लगा तो 16 अक्तूबर को मांबाप से कह कर वह लखनऊ चला गया. चाची से न मिल पाने की वजह से राहुल तड़प रहा था. तड़प की वेदना से आहत हो कर उस ने योजना को अमलीजामा पहना दिया. योजना के अनुसार 17 अक्तूबर की शाम 4 बजे इंटरसिटी ट्रेन से वह गोरखपुर के लिए चल पड़ा. रात 11 बजे के करीब वह गोरखुपर पहुंचा. स्टेशन से टैंपो ले कर वह चिलुआताल के बरगदवां चौराहे पर पहुंचा और वहां से पैदल ही घर पहुंच गया.

उसे घर तो जाना नहीं था, इसलिए सब से पहले उस ने पिता के कमरे के दरवाजे की सिटकनी बाहर से बंद कर दी, ताकि शोर होने पर वह बाहर न निकल सकें. इस के बाद पीछे की दीवार के सहारे वह सुरेश सिंह के कमरे में पहुंचा, जहां वह गहरी नींद सो रहा था. उसे देखते ही नफरत से राहुल का खून खौल उठा. उसे पता था कि चाचा के घर में लोहे की रौड कहां रखी है. उस ने लोहे की रौड उठाई और पूरी ताकत से सुरेश के सिर पर 3 वार कर के उसे मौत के घाट उतर दिया.

राहुल को विश्वास हो गया कि सुरेश की मौत हो चुकी है तो उस ने घर में रखा बोरा उठाया और उसी में उस की लाश भर कर रात के 4 बजे के करीब बाहर झांक कर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा. जब उसे लगा कि कोई नहीं देख रहा है तो उस ने सुरेश की ही साइकिल घर उस की लाश वाले बोरे को कैरियर पर रख कर जंगल की ओर चल पड़ा. लेकिन जब वह झील की ओर जा रहा था, तभी एक ट्रैक्टर आता दिखाई दिया. उसे देख कर वह घबरा गया और साइकिल को एक पेड़ से टिका कर भागा. ट्रैक्टर पर बैठे एक मजदूर ने उसे भागते देख लिया तो उस ने उस का नाम ले कर पुकारा भी, लेकिन रुकने के बजाए राहुल बरगदवां चौराहे की ओर भाग गया.

वहां से उस ने टैंपो पकड़ी और गोरखपुर रेलवे स्टेशन पहुंचा, जहां से ट्रेन पकड़ कर लखनऊ स्थित अपने कमरे पर चला गया. उस ने चालाकी तो बहुत दिखाई, लेकिन वह काम न आई और पकड़ा गया. राहुल चौधरी की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त लोहे की रौड बरामद कर ली थी. पूछताछ के बाद राहुल को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. राधिका के पति की हत्या की खबर पा कर ससुराल आ गई थी. राहुल ने जो किया था, उस से उसे काफी दुख पहुंचा. क्योंकि उस ने राहुल से कभी नहीं कहा था कि वह उस के पति की हत्या कर उसे विधवा बना दे.

राहुल के मांबाप भी काफी दुखी हैं. उन्होंने राहुल से अपना नाता तोड़ कर उसे उस के हाल पर छोड़ दिया है. Gorakhpur Crime

कथा में राधिका सिंह बदला नाम है. कथा पुलिस सूत्रों एवं राहुल के बयानों पर आधारित

Hindi Crime Stories: आशिकी में पति दफन

Hindi Crime Stories: जिस सुख और आनंद के लिए सुदेवी ने प्रेमी के साथ साजिश रच कर पति को ठिकाने लगवा दिया, क्या वह सुख उसे मिल सका…

एसपी (रूरल) सुरेंद्रनाथ तिवारी थाना महराजगंज निरीक्षण के लिए आए थे, तभी एक लड़का और एक औरत थाने पहुंची. दोनों काफी घबराए हुए थे. उन्हें देख कर ही लग रहा था कि वे किसी बड़ी मुसीबत में हैं. सुरेंद्रनाथ की नजर उन पर पड़ी तो उन्होंने दोनों को अपने पास बुला कर पूछा, ‘‘कहो, क्या बात है? जो भी परेशानी हो, सचसच बताओ?’’

लड़का हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘हुजूर, मेरा नाम दिनेश है.’’ इस के बाद औरत की ओर इशारा कर के बोला, ‘‘यह मेरी भाभी सुदेवी है. हम लोग थाना बिठूर के गांव हिंगूपुर से आए हैं. 21 अप्रैल को मेरा बड़ा भाई हरिश्चंद्र थाना महराजगंज के गांव जाना के रहने वाले अपने साढू मंगू के यहां गया था, तब से उस का कुछ पता नहीं है. हम ने उसे हर जगह खोज लिया है. मंगू ने ही भैया को गांव में लगने वाला मेला देखने को बुलाया था.’’

सुरेंद्रनाथ तिवारी को लगा कि सुदेवी भी कुछ कहना चाहती है, इसलिए उन्होंने उस की ओर देखते हुए कहा, ‘‘तुम भी कुछ कहना चाहती हो क्या? लेकिन एक बात का ध्यान रखना, जो भी कहना, सचसच कहना.’’

‘‘जी हुजूर,’’ सुदेवी बोली, ‘‘21 अप्रैल को जब मैं कन्नौज में अपनी बुआ की बेटी के यहां थी तो उन्होंने फोन कर के बताया था कि वह जाना में साढू के यहां मेला देखने आए हैं. आज घर लौटने को कहा था. लेकिन जब वह घर नहीं लौटे और फोन पर भी बात नहीं हुई तो मैं 23 अप्रैल को जाना गई और जीजा और उन के घर वालों से उन के बारे में पता किया. उन लोगों ने बताया कि उन्हें उस दिन शाम को सर्वेश के साथ देखा गया था.’’

‘‘यह सर्वेश कौन है?’’ एसपी साहब ने पूछा.

‘‘हुजूर, सर्वेश मेरे बहनोई का भतीजा है. मेरे ऊपर उस की नीयत खराब थी, जिस की वजह से एक बार मेरे पति ने उसे डांटा भी था. मुझे लगता है कि सर्वेश ने ही उन का अपहरण कर लिया है या फिर मार डाला है.’’

मामला गंभीर था, इसलिए सुरेंद्रनाथ तिवारी ने थानाप्रभारी जीवाराम को आदेश दिया कि तुरंत जाना जा कर सर्वेश को पकड़ कर सख्ती से पूछताछ करें, जिस से हरिश्चंद्र के बारे में पता लग सके. जीवाराम ने एसआई आर.के. सिंह, सरिता मिश्रा, सिपाही बृजेशचंद्र शर्मा, आशित कुमार तथा राजेंद्र कुमार सिंह को साथ लिया और जाना जा कर सर्वेश के घर छापा मारा. सर्वेश उस समय घर पर ही था, इसलिए जीवाराम उसे पकड़ कर थाने ले आए. थाने में जब उस से हरिश्चंद्र के बारे में पूछा गया तो वह साफ मुकर गया. लेकिन वह परेशान जरूर हो उठा. उस के चेहरे पर आई घबराहट से थानाप्रभारी ने भांप लिया कि यह झूठ बोल रहा है.

उन्होंने उस पर दबाव बनाने के लिए कहा, ‘‘तुम्हारे झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है, सुदेवी ने हमें सब बता दिया है. इसलिए तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम भी सब कुछ सचसच बता दो.’’

इस पर सर्वेश ने कहा, ‘‘साहब, हरिश्चंद्र को तो मैं ने मार दिया है. लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि जिस सुदेवी ने वादा किया था कि हत्या के इस राज को वह किसी को नहीं बताएगी. उसी ने आप से सब बता दिया. साहब,  हरिश्चंद्र की हत्या मैं ने सुदेवी के कहने पर ही की थी. हम दोनों के बीच नाजायज संबंध थे. हत्या की साजिश हम दोनों ने मिल कर रची थी. हत्या करने के बाद मैं ने सुदेवी को बताया भी था कि हरिश्चंद्र को ठिकाने लगा दिया है.’’

सुदेवी उस समय थाने में ही थी. जीवाराम ने उसे बुला कर जब बताया कि सर्वेश ने हरिश्चंद्र का कत्ल कर दिया है तो वह दहाडे़ मार कर रोने लगी. तब जीवाराम ने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘त्रियाचरित्र करने की जरूरत नहीं है. सर्वेश ने हमें यह भी बता दिया है कि तू ने ही साजिश रच कर हरिश्चंद्र की हत्या कराई है.’’

इस के बाद सुदेवी ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो सर्वेश की निशानदेही पर पुलिस ने जाना गांव के बगल से बहने वाले नाले के पास से हरिश्चंद्र का शव बरामद कर लिया. लाश सड़ चुकी थी. वहीं झाडि़यों से वह खून सनी ईंट भी बरामद कर ली गई, जिस से हत्या की गई थी. घटनास्थल की सारी औपचारिक काररवाई निपटा कर थाना महराजगंज पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. सर्वेश और सुदेवी ने हरिश्चंद्र की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया था, इसलिए थाना महराजगंज पुलिस ने मृतक के छोटे भाई दिनेश की ओर से सर्वेश और सुदेवी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. पुलिस पूछताछ में हरिश्चंद्र की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह एक औरत द्वारा आशिकी में अपना ही सिंदूर उजाड़ने की वाली थी.

कानपुर शहर से 40 किलोमीटर दूर जीटी रोड पर बसा है कस्बा शिवराजपुर. इसी कस्बे में रामबाबू अपने परिवार के साथ रहता था. इसी रामबाबू की बेटी है सुदेवी. सुदेवी शादी लायक हुई थी तो उस ने उस की शादी कानपुर के थाना बिठूर के गांव हिंगूपुर के रहने वाले छोटेलाल के बड़े बेटे हरिश्चंद्र से कर दी थी. छोटेलाल का खातापीता परिवार था. यह 10-12 साल पहले की बात है. सुदेवी ने जो चाहा था, उसे ससुराल में वह सब कुछ मिल गया था, इसलिए वह खुश थी. सब से बड़ी बात यह थी कि हरिश्चंद्र उसे हद से ज्यादा प्यार करता था. यही हर लड़की का सपना होता है. सुदेवी सचमुच भाग्यशाली थी. पति ही नहीं, ससुराल का हर आदमी उसे बहुत प्यार करता था.

हंसीखुशी से 5 साल बीत गए. इस बीच सुदेवी 2 बेटों, गोल्डी और निखिल की मां बन गई. 2 बच्चों की जिम्मेदारियां बढ़ीं तो हरिश्चंद्र को आय बढ़ाने के लिए ज्यादा मेहनत की जरूरत पड़ने लगी. वह अधिक कमाई के चक्कर में ज्यादा से ज्यादा घर से बाहर रहने लगा. बस, पति का साथ न मिलने की वजह से सुदेवी के कदम बहक गए. हुआ यह कि बरसात में हरिश्चंद्र का घर गिर गया. घर बनवाने के लिए उस ने जाना के रहने वाले अपने साढू गंगू से कोई राजमिस्त्री बताने को कहा तो उस ने कहा, ‘‘साढूभाई राजमिस्त्री तो घर में ही है. हमारा भतीजा सर्वेश बहुत अच्छा राजमिस्त्री है. आजकल वह बड़ेबड़े ठेके ले रहा है. वैसे तो वह खाली नहीं है, लेकिन घर का काम है, इसलिए उसे समय तो निकालना ही पड़ेगा. तुम जब कहो, मैं उसे भेज दूं.’’

‘‘ठीक है भाई, आप ने हमारी एक बहुत बड़ी समस्या हल कर दी. बरसात खत्म होते ही मकान बनवाना शुरू कर दूंगा.’’

28 वर्षीय सर्वेश हृष्टपुष्ट युवक था. वह काम भले राजमिस्त्री का करता था, लेकिन रहता ठाठ से था. सर्वेश रिश्तेदार था. इसलिए हरिश्चंद्र के यहां काम करने आया तो घर में ही रहताखाता और सोता था. सुदेवी उस की मौसी लगती थी, इसलिए वह उस से खूब बातें करता था. मौकेबेमौके हंसीठिठोली भी कर लेता था. सुदेवी भी उस की लच्छेदार बातों में खूब रस लेती थी. बातों ही बातों में दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित होने लगे. धीरेधीरे सर्वेश और सुदेवी के बीच की दूरियां सिमटती चली गईं. दोनों रिश्ते को भूल कर खुल कर हंसीमजाक और छेड़छाड़ करने लगे. कुंवारा सर्वेश जहां मौसी से स्त्री सुख पाने को लालायित रहने लगा था, वहीं पति की उपेक्षा का शिकार सुदेवी सर्वेश की जवानी पर मर मिटी थी.

आग दोनों तरफ लगी थी. बस उन्हें मौके की तलाश थी. एक दिन सुबह से बरसात हो रही थी, जिस की वजह से काम बंद था. हरिश्चंद्र किसी काम से ठिबूर चला गया था और बच्चे भी स्कूल चले गए थे. दोपहर को सर्वेश आंगन में आया तो सुदेवी पेटीकोट और ब्लाउज पहने नहा रही थी. भीगे कपड़े उस के बदन से चिपके हुए थे. उन कपड़ों में सुदेवी का अंगअंग साफ झलक रहा था. सुदेवी इस बात से अनजान थी कि उसे कोई देख रहा है. अचानक सर्वेश उस के सामने आ कर खड़ा हो गया तो उसे फटकारने या शरमाने के बजाय सुदेवी उसे अजीब नजरों से ताकने लगी.

सर्वेश के लिए यह एक तरह का इशारा था. इशारा समझते ही सर्वेश ने बाहर का दरवाजा बंद किया और सुदेवी को उठा कर कमरे में ले आया. इस के बाद मर्यादा की सारी सीमाएं टूट गईं और रिश्ते तारतार हो गए. सर्वेश के साथ यौवन का आनंद मिलने के बाद सुदेवी ने पति हरिश्चंद्र की ओर से मुंह मोड़ लिया. वह हरिश्चंद्र की उपेक्षा करने लगी. बातबात में उस से लड़नेझगड़ने लगी. इस की वजह यह थी कि उसे सर्वेश से जो शारीरिक सुख मिल रहा था, वैसा सुख हरिश्चंद्र काफी दिनों से नहीं दे सका था. सर्वेश हट्टाकट्टा जवान था, जबकि हरिश्चंद की जवानी ढल चुकी थी.

धीरेधीरे सर्वेश सुदेवी की जिंदगी में पूरी तरह से आ गया. घर के लोग इस सब से बेखबर थे. कोई सोच भी नहीं सकता था कि ऐसा भी हो सकता है. लेकिन जो सोचा नहीं जा सकता था, वैसा हो रहा था. जब भी दोनों को मौका मिलता वे एक हो जाते. यह भी सच है कि एक न एक दिन पाप का घड़ा ऐसा ही अवश्य भरता है. सुदेवी और सर्वेश के साथ भी हुआ. एक दिन रात में हरिश्चंद्र की नींद खुली तो सुदेवी बिस्तर से गायब थी. उतनी रात को पत्नी कहां गई, हरिश्चंद्र सोच में पड़ गया, क्योंकि दरवाजा भी अंदर से बंद था. वह सर्वेश के कमरे में गया तो वह भी नहीं था. इस के बाद हरिश्चंद्र को शक हुआ. कुछ सोच कर वह छत पर गया तो वहां का नजारा देख कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. सुदेवी और सर्वेश आपत्तिजनक स्थिति में थे.

हरिश्चंद्र को देखते ही सर्वेश तो भाग खड़ा हुआ, लेकिन सुदेवी कहां भाग कर जाती. हरिश्चंद्र ने उस की जम कर पिटाई की. शोर सुन कर घर वाले आ गए. जब उन्हें सच्चाई का पता चला तो सब ने सिर पीट लिया. इस के बाद हरिश्चंद सुदेवी पर नजर रखने लगा और सर्वेश के घर आने पर सख्त पाबंदी लगा दी. अब दोनों का मिलना असंभव हो गया, लेकिन फोन पर उन की बातें हो जाती थीं. जब कभी हरिश्चंद्र गांव से बाहर जाता, सुदेवी फोन कर के सर्वेश को बुला लेती. लेकिन हरिश्चंद्र को बच्चों से सर्वेश के आने की खबर मिल ही जाती. तब वह सुदेवी की जम कर पिटाई करता. उस समय सुदेवी रोते हुए यही कहती, ‘‘तुम्हारी जितनी इच्छा हो मार लो, लेकिन याद रखना, एक दिन इस का खामियाजा तुम्हें भुगतना ही पड़ेगा.’’

पत्नी की इस धमकी पर हरिश्चंद्र को और भी गुस्सा आ जाता. उस हालत में वह उस की और पिटाई करता. लेकिन सुदेवी के सिर से सर्वेश के प्यार का भूत नहीं उतरा तो नहीं उतरा. वह सर्वेश की इस कदर दीवानी हो गई थी कि उस के लिए पति को मिटाने का फैसला कर लिया. इस के बाद उस ने सर्वेश के साथ मिल कर एक ऐसी योजना बनाई, जिस की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी. उसी योजना के तहत सुदेवी खुद तो बुआ की बेटी की शादी में शामिल होने कन्नौज चली गई. जाने से पहले उस ने बड़ी बहन श्यामदुलारी को फोन कर के कह दिया था कि वह मेला देखने के बहाने उस के पति हरिश्चंद्र को अपने गांव जाना बुला ले. क्योंकि उन का मूड आजकल ठीक नहीं है.

छोटी बहन के कहने पर श्यामदुलारी ने मोबाइल पर हरिश्चंद्र से बात की तो वह मेला देखने के लिए जाने को राजी हो गया. 21 अप्रैल, 2015 को हरिश्चंद्र साढू गंगू के घर पहुंच गया. साढू के घर हरिश्चंद्र का सामना सर्वेश से हुआ तो उस ने लपक कर उस के पैर छू लिए और कुशलक्षेम पूछी. हर साल की तरह उस दिन जाना में मेला लगा था और रात में नौटंकी का कार्यक्रम था. सर्वेश और सुदेवी में मोबाइल पर लगातार बातें हो रही थीं. उस ने सुदेवी को बता दिया था कि बकरा (हरिश्चंद्र) हलाल होने के लिए आ गया है.

योजना के अनुसार, सर्वेश हरिश्चंद्र को मेला दिखाने ले गया. शाम तक दोनों मेला देखते रहे. उस के बाद वह उसे शराब के ठेके पर ले गया. सर्वेश ने खुद तो कम शराब पी, जबकि हरिश्चंद्र को ज्यादा पिलाई. इस के बाद टहलने के बहाने वह हरिश्चंद्र को गांव के बाहर बहने वाले नाले के पास ले गया और वहां धक्का दे कर जमीन पर गिरा दिया. हरिश्चंद्र जैसे ही जमीन पर गिरा, उस की गरदन पर पैर रख कर तब तक दबाए रहा, जब तक उस की मौत नहीं हो गई. मरने के बाद सर्वेश ने हरिश्चंद्र के चेहरे को ईंट से कुचल कर विकृत कर दिया और लाश को वहीं गड्ढे में दफना दिया. रात 11 बजे सर्वेश ने फोन कर के सुदेवी को बता दिया कि उस ने कांटे को निकाल दिया है.

इसी के साथ उस ने सुदेवी से अनुरोध किया कि वह गांव आ जाए, क्योंकि वह उस से मिलने के लिए तड़प रहा है. 23 अप्रैल को सुदेवी पति की खोज के बहाने जाना पहुंची. बहनबहनोई को उस ने पति के लापता होने की जानकारी दे कर पति को खोजने के बहाने सर्वेश के साथ मौजमस्ती करती रही. कुछ दिनों बाद वह घडि़याली आंसू बहाते हुए हिंगूपुर आ गई और जब ससुराल में हरिश्चंद्र के लापता होने की बात बताई तो सभी सन्न रह गए. हरिश्चंद्र के छोटे भाई दिनेश को शक हुआ कि भाई के लापता होने में भाभी सुदेवी का हाथ हो सकता है, इसलिए उस ने पहले तो भाभी को खूब खरीखोटी सुनाई, उस के बाद रिपोर्ट दर्ज करवाने को कहा. देवर के दबाव में सुदेवी डर गई और रिपोर्ट दर्ज कराने को राजी हो गई.

27 अप्रैल, 2015 को सुदेवी दिनेश के साथ थाना महराजगंज पहुंची और सर्वेश पर पति के अपहरण या मार डालने का आरोप लगा कर रिपोर्ट दर्ज करने का अनुरोध किया. इस के बाद सर्वेश पकड़ा गया तो सारा राज सामने आ गया. पूछताछ के बाद 28 अप्रैल, 2015 को पुलिस ने सर्वेश और सुदेवी को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानतें स्वीकृत नहीं हुई थीं. Hindi Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi True Crime: कंटीली राह का राही

Hindi True Crime: शादीशुदा होते हुए भी धर्मवीर बाजारू औरतों के पास जाता था. इस से खफा हो कर उस की बीवी भी मायके चली गई. फिर एक दिन उस का यही शौक उस के लिए जानलेवा साबित हुआ.

गोरखपुर राजकीय रेलवे पुलिस के थानाप्रभारी गिरिजाशंकर त्रिपाठी को उन के एक खास मुखबिर ने सूचना दी कि पुराना पार्सल गेट नंबर-6 पर स्थित आरपीएफ मालखाने के पास एक युवक लहूलुहान पड़ा तड़प रहा है. थानाप्रभारी ने टाइम देखा तो उस समय रात के करीब 10 बज रहे थे. यह सूचना मिलते ही वह उसी समय पुलिस टीम के साथ मुखबिर द्वारा बताई जगह पर पहुंच गए. स्ट्रीट लाइट की रोशनी में वहां सब कुछ साफ दिखाई दे रहा था. एक युवक पेट के बल खून से लथपथ पड़ा था. पास जा कर देखा तो पता चला कि उस की दाहिनी कनपटी पर किसी वजनदार चीज से वार किया गया था.

पास ही एक बड़ा पत्थर पड़ा था जिस पर ताजा खून लगा था. लग रहा था कि हत्यारों ने इसी पत्थर से उस के ऊपर वार किया था. मौके पर शराब की 2 खाली शीशियां भी पड़ी थीं. पुलिस ने युवक की जामातलाशी ली तो उस की पैंट की जेब से एक कागज की परची मिली. उस परची पर एक मोबाइल नंबर और एक बैंक का खाता नंबर लिखा था. पुलिस ने उन सबूतों को अपने कब्जे में ले लिया. युवक का जिस्म अभी भी गरम था. उस की सांसें भी चल रही थीं. रेलवे के नियम के अनुसार रेलवे परिक्षेत्र में हुई घटना, दुर्घटना के घायलों को आरपीएफ के जवान ही अस्पताल ले जाते हैं, इसलिए थानाप्रभारी ने आरपीएफ को घटना की सूचना दे दी.

सूचना पा कर आरपीएफ के 2 जवान मौके पर पहुंचे और गंभीर रूप से घायल युवक को टैंपो से नेताजी सुभाषचंद्र बोस जिला अस्पताल ले गए, जहां डाक्टरों ने युवक को मृत घोषित कर दिया. इस के बाद थानाप्रभारी गिरिजा शंकर त्रिपाठी ने जरूरी काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भेज दिया. यह बात 31 अक्तूबर, 2014 की है. मृतक कौन था और कहां का रहने वाला था, पुलिस के पास इस की कोई जानकारी नहीं थी. मृतक के पास से जो परची मिली थी, उस पर लिखे फोन नंबर को थानाप्रभारी ने अपने फोन से रात में ही मिलाया. दूसरी ओर से काल किसी पुरुष ने रिसीव की. उस ने पूछा, ‘‘हैलो, कौन बोल रहे हैं?’’

‘‘मैं गोरखपुर जीआरपी थाने से इंसपेक्टर गिरिजाशंकर त्रिपाठी बोल रहा हूं.’’ थानाप्रभारी ने अपना परिचय देने के बाद उस से पूछा, ‘‘क्या मैं जान सकता हूं कि तुम कौन बोल रहे हो और कहां रहते हो?’’

‘‘सर, मैं गोरखपुर से धर्मेश उपाध्याय बोल रहा हूं.’’ पुलिस का नाम सुनते ही धर्मेश की आंखों से नींद गायब हो गई, ‘‘क्या बात है सर, इतनी रात गए…’’

‘‘यह नंबर तुम्हारा ही है?’’ उस की बात बीच में काट कर इंसपेक्टर त्रिपाठी ने सवाल किया.

‘‘जी हां, यह मेरा ही नंबर है.’’ धर्मेश ने जवाब दिया.

‘‘हमें मालखाने के पास एक युवक घायलावस्था में मिला था. उसी की जेब से मिली परची पर यह नंबर लिखा था. तुम अस्पताल आ कर उस युवक को देख लो कि कहीं वह तुम्हारा कोई परिचित तो नहीं है?’’ थानाप्रभारी ने कहा.

धर्मेश का बड़ा भाई धर्मवीर कई दिनों से घर से निकला हुआ था. यह बात थानाप्रभारी को बताते हुए उस ने उन से घायल मिले युवक की कदकाठी और कपड़ों के बारे में पूछा तो थानाप्रभारी ने घायल युवक का जो हुलिया बताया, वह उस के भाई धर्मवीर से मेल खा रहा था. उसे चिंता होने लगी. यह बात उस ने दूसरे कमरे में सो रहे पिता प्रेमनारायण उपाध्याय को बताई तो उन की नींद भी हराम हो गई. थानाप्रभारी ने धर्मेश को उस युवक की मौत की खबर नहीं दी थी, ताकि घर वाले रात में परेशान न हों. लेकिन घर वालों की नींद तो गायब हो चुकी थी. बेटे की फिक्र में प्रेमनारायण का बदन कांपने लगा. धर्मेश का गांव डिगुलपुर जिला मुख्यालय से दूर था.

वहां से जिला अस्पताल जाने के लिए कोई साधन नहीं था, इसलिए भोर होते ही वह पिता के साथ गोरखपुर के लिए निकल पड़ा. रास्ते भर दोनों धर्मवीर की सलामती के लिए प्रार्थना करते रहे. सुबह 8 बजे तक दोनों गोरखपुर के थाना जीआरपी पहुंचे. थानाप्रभारी ने मृतक युवक के कपड़े उन्हें दिखाए तो कपड़े देखते ही दोनों रोने लगे. कपड़े धर्मवीर उपाध्याय के ही थे. मैडिकल कालेज ले जा कर जब उन्हें लाश दिखाई गई तो उन्होंने उस की पुष्टि धर्मवीर उपाध्याय के रूप में कर दी. शिनाख्त हो जाने के बाद पुलिस ने राहत की सांस ली. थानाप्रभारी गिरिजाशंकर त्रिपाठी ने प्रेमनारायण और उन के बेटे धर्मेश से बात की तो उन्होंने बताया कि धर्मवीर की हत्या महराजगंज के सुभाष पांडेय और कुशीनगर के संत यादव ने की होगी.

धर्मेश ने इन दोनों के खिलाफ थाने में रिपोर्ट भी दर्ज करा दी. नामजद मुकदमा दर्ज होते ही पुलिस ने दोनों की तलाश में उसी शाम उन के घरों पर दबिश डाली तो दोनों आरोपी अपनेअपने घरों से दबोच लिए गए. दोनों को पुलिस गोरखपुर ले आई. दोनों से सख्ती से पूछताछ की गई तो वे खुद को निर्दोष बताते हुए धर्मवीर की हत्या से साफ इनकार करते रहे. पूछताछ के बाद पता चला कि संत यादव कुशीनगर जिले के कसया कस्बे का बड़ा व्यवसाई था. उस के पास कई ट्रक थे. सुभाष पांडेय उस का बिजनैस पार्टनर था. घटना से करीब 15-20 दिनों पहले ही धर्मवीर उपाध्याय किसी परिचित के माध्यम से संत यादव के संपर्क में आया था.

धर्मवीर उपाध्याय गोरखपुर के सिकरीगंज इलाके डिगुलपुर गांव के रहने वाले प्रेमनारायण उपाध्याय का बड़ा बेटा था. प्रेमनारायण सीआरपीएफ के जवान थे, जो 2 साल पहले रिटायर हुए थे. धर्मवीर के अलावा उन का एक और बेटा धर्मेश था. संत यादव को ड्राइवर की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने उसे अपने यहां नौकरी पर रख लिया था. अक्तूबर 2014 में संत यादव ने उसे सामान से भरा ट्रक ले कर असम भेजा था. धर्मवीर सामान ले कर असम पहुंचा. लौटते समय उसे वहां से 67 हजार रुपए भाड़ा मिला. असम से वापस लौटते समय धर्मवीर की संत यादव से बातचीत भी हुई थी, तब उस ने भाड़े के 67 हजार रुपए मिलने की बात बता दी थी. लेकिन हफ्ते भर बाद भी वह गोरखपुर नहीं पहुंचा तो संत यादव को चिंता हुई.

उस ने धर्मवीर को फोन किया, पर उस का फोन लगातार स्विच्ड औफ मिला. कई दिनों बाद भी जब उस का धर्मवीर से संपर्क नहीं हुआ तो उस के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. इस के बाद संत यादव को विश्वास हो गया कि धर्मवीर ने उस के साथ बड़ा धोखा किया है. वह ट्रक और रुपए दोनों ले कर चंपत हो गया है. उस ने अपने स्तर पर उस का पता लगाना शुरू किया. कई दिनों बाद उसे ट्रक के बारे में पता चल गया. ट्रक बिहार के आरा जिले में लावारिस हालत में खड़ा था. आरा पहुंच कर संत यादव ट्रक ले कर वापस आ गया. उसे इस बात का शक होने लगा कि कहीं किसी ने धर्मवीर की हत्या तो नहीं कर दी.

इसी बीच धर्मवीर के घर वालों को उस की हत्या की जानकारी मिल गई. धर्मवीर के घर वालों को संत यादव और उस के साथी सुभाष पर ही शक हुआ. इसी शक के आधार पर धर्मेश ने दोनों के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज करवाया था. यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस को भी लगने लगा कि पैसों के विवाद में ही इन दोनों ने मिल कर धर्मवीर की हत्या कर दी होगी. सच उगलवाने के लिए पुलिस कई दिनों तक उन से सख्ती से पूछताछ करती रही, लेकिन पुलिस उन दोनों से कोई ठोस जानकारी नहीं उगलवा पाई. तब पुलिस ने हिदायत दे कर उन्हें छोड़ दिया.

इस केस की मौनिटरिंग कार्यवाहक रेलवे पुलिस उपाधीक्षक नम्रता श्रीवास्तव कर रही थीं. उन्होंने इस केस को खोलने में लगी टीम की बैठक बुलाई. बैठक में हत्या के विभिन्न कोणों पर रोशनी डाली गई. बैठक में धर्मवीर के पारिवारिक पहलुओं पर जांच केंद्रित करने का फैसला किया गया. पुलिस ने जांच की गई तो पता चला कि धर्मवीर और उस की पत्नी मनीषा के रिश्तों के बीच काफी गहरी खाई है. मनीषा अपनी तीनों बेटियों को ले कर महराजगंज के फरेंदा गांव स्थित अपने मायके में रह रही थी. पुलिस को एक और चौंका देने वाली सूचना मुखबिर से मिली कि मनीषा की बुआ का बेटा पूना में रहता था.

वह क्रिमिनल था. पुलिस का ध्यान इसी बात पर गया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मनीषा ने उसी की मदद से पति को ठिकाने लगवा दिया हो? यानी कुल मिला कर पुलिस के शक की सूई मनीषा की तरफ घूम गई. शक के आधार पर पुलिस ने मनीषा से कई चक्र में पूछताछ की, लेकिन इस पूछताछ से भी कोई हल नहीं निकला. पुलिस की जांच में वह भी बेकसूर दिखी. पुलिस की जांच जहां से चली थी, वहीं फिर आ कर रुक गई. पुलिस को उस की कालडिटेल्स से काफी उम्मीद बंधी थी. धर्मवीर की कालडिटेल्स पुलिस चेक कर चुकी थी, उस से भी कोई खास जानकारी नहीं मिली.

पुलिस को सारी उम्मीदों पर पानी फिरता दिखाई दे रहा था. थानाप्रभारी की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि धर्मवीर की हत्या किस ने और क्यों की? एक दिन थानाप्रभारी अपने कक्ष में बैठे इसी घटना पर मंथन कर रहे थे. उसी समय उन के दिमाग में एक आइडिया आया. उसी आइडिया को ध्यान में रखते हुए उन्होंने जिस जगह पर धर्मवीर की हत्या हुई थी, उस इलाके में उस दिन सक्रिय रहे मोबाइल नंबरों की जानकारी निकलवाई. पता चला कि उस दिन उस इलाके के फोन टावर के संपर्क में 35 हजार फोन नंबर आए थे. अब इतने नंबरों में से कातिल का नंबर ढूंढना आसान नहीं था. फिर भी उन्होंने अपनी टीम से उन सभी नंबरों का विश्लेषण कराया.

कई महीने की कड़ी मशक्कत के बाद उन नंबरों में से 4 नंबर संदिग्ध निकले. उन नंबरों की जांच की गई तो वे चारों नंबर स्विच्ड औफ मिले. उन नंबरों को पुलिस ने जांच के दायरे में ले लिया. इस बीच थानाप्रभारी एक बार फिर धर्मवीर के गांव डिगुलपुर पहुंचे. लोगों से बात करने पर उन्हें पता चला कि धर्मवीर शराबी तो था ही, अय्याश प्रवृत्ति का भी था. यह जानकारी उन के लिए अहम साबित हुई. छानबीन कर के वह गोरखपुर वापस लौट आए. इसी बीच मुखबिर ने उन्हें एक चौंका देने वाली सूचना दी. मुखबिर ने उन चारों संदिग्ध नंबरों को देख कर बताया कि उन में से एक नंबर कुशमिला उर्फ मुसकान नामक युवती का है. मुसकान कालगर्ल थी. उस का धंधा स्टेशन के इर्दगिर्द चलता था और घटना के बाद से वह गायब थी.

पुलिस ने मुसकान के फोन नंबर की जांच की तो पता चला कि उस ने अपना सिम फरजी आईडी पर लिया था, इसलिए पुलिस उस के ठिकाने तक नहीं पहुंच सकी. घटना को हुए 10 महीने बीत चुके थे, लेकिन पुलिस हत्यारों का पता तक नहीं लगा पाई थी. शक की सूई मुसकान पर थी, लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ था. पुलिस ने उस के नंबर को सर्विलांस पर लगा रखा था. अगस्त, 2015 में जैसे ही उस ने अपना फोन नंबर औन किया, तभी सर्विलांस से उस की लोकेशन बिहार के बेतिया जिले की आई. पुलिस ने कई दिनों तक उस के फोन पर होने वाली बातें सुनीं.

बातचीत के दौरान एक बार मुसकान के मुंह से गोरखपुर में मालखाने के पास एक युवक की हत्या करने की बात निकल गई. इस के बाद पुलिस को विश्वास हो गया कि धर्मवीर की हत्या में उस का हाथ है. उस के बाद पुलिस ने मुसकान की गिरफ्तारी की योजना बनाई. गुपचुप तरीके से गोरखपुर पुलिस बिहार के पश्चिमी चंपारण के बेतिया जिला पहुंची. स्थानीय पुलिस के सहयोग से गोरखपुर पुलिस ने पता लगा लिया कि मुसकान बेतिया में एक आर्केस्ट्रा कंपनी में काम करती है. पुलिस ने उस आर्केस्ट्रा कंपनी में दबिश दी. वहां जा कर पता चला कि वह तो 2 दिन पहले ही गोरखपुर चली गई. लिहाजा पुलिस खाली हाथ वापस लौट आई.

13 अगस्त, 2015 को सुबहसुबह एक मुखबिर ने इंसपेक्टर गिरिजा शंकर त्रिपाठी को फोन कर के सूचना दी कि पुराने पार्सल गेट पर मुसकान अपने एक साथी के साथ खड़ी है. वह कहीं भागने की फिराक में है. सूचना पक्की और बेहद महत्त्वपूर्ण थी, इंसपेक्टर त्रिपाठी बगैर देर किए घर से निकल लिए. जिस समय खबरी का फोन उन के पास आया था, उस समय वह घर से कार्यालय आने के लिए तैयार हो रहे थे. सूचना मिलने के 10 मिनट बाद वह थाने पहुंच गए. घर से निकलने से पहले उन्होंने टीम के सदस्यों को थाने में पहुंचने के लिए कह दिया था. थाने पहुंचते ही उन्हें एसएसआई सुधीर कुमार, एसआई राघवेंद्र मिश्र, हरीश तिवारी, हेडकांस्टेबल किसलय मिश्र, कांस्टेबल रणजीत पांडेय, अनिल कुमार, विजय सिंह, अभय पांडेय, संजय सिंह, संदीप यादव और महिला कांस्टेबल शीला गौड़ तैयार मिलीं.

टीम को ले कर वह पुराना पार्सल गेट नंबर 6 पर पहुंच गए. पुलिस ने गेट को चारों ओर से घेर लिया. पुलिस को देख कर मुसकान डर गई. उस ने वहां से खिसकने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उसे दबोच लिया. उसे और उस के साथी को गिरफ्तार कर के पुलिस थाने ले आई. पूछताछ में पता चला कि उस के साथ वाले युवक का नाम विजय पांडेय है. पुलिस ने उन से धर्मवीर उपाध्याय की हत्या किए जाने की वजह पूछी तो बिना किसी हीलाहवाली के दोनों ने अपना इकबालिया जुर्म कबूल करते हुए कहा कि उन्होंने ही धर्मवीर की हत्या की थी. घटना को अंजाम देने में उन के 2 और साथी विकास कुमार उर्फ मुकेश और सुमेर कुमार उर्फ समीर भी शामिल थे.

फिर मुसकान और विकास ने पुलिस के सामने रोंगटे खड़े कर देने वाली जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के गांव डिगुलपुर के रहने वाले प्रेमनारायण उपाध्याय सीआरपीएफ में नौकरी करते थे. वह 2 साल पहले ही नौकरी से रिटायर हुए थे. उन के 2 बेटे थे धर्मवीर और धर्मेश. धर्मवीर गांव के आवारा लड़कों के साथ रह कर बिगड़ गया था. तब उन्होंने यह सोच कर महराजगंज के फरेंदा की मनीषा के साथ उस की शादी कर दी कि गृहस्थी में फंस कर वह सुधर जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. यह बात 15 साल पहले की है.

शादी के बाद भी उस के चालचलन में कोई तब्दीली नहीं आई. आवारा दोस्तों के साथ घूमनेफिरने, शराब पीने की उस की आदत नहीं गई. मनीषा ने उसे समझाया भी, लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा. ऐसे में मनीषा के सामने आंसू बहाने के अलावा कोई उपाय नहीं बचा था. ऐसे शख्स से शादी कर के उस के सारे सपने रेत के ढेर की तरह ढह गए थे. इसी दौरान धर्मवीर ने ड्राइविंग सीख ली. वह ट्रक चलाने लगा. ट्रक ले कर वह जब भी बाहर जाता, 2-3 महीने बाद ही घर लौटता. इतने दिनों बाद घर लौटने पर भी वह परिवार के साथ कम यारदोस्तों के संग ज्यादा समय बिताता था. दोस्तों में ही कमा कर लाए हुए अधिकांश पैसे खर्च कर देता था. उस की इस आदत से उस के मांबाप ही नहीं, सासससुर भी चिंतित रहते थे.

इसी तरह शादी के 5-6 साल बीत गए. मनीषा भी 3 बेटियों की मां बन गई. मनीषा पति से नाखुश रहती थी. बच्चों के भविष्य की चिंता मनीषा को रहती थी. एक दिन वह तीनों बेटियों को ले कर ससुराल से मायके आ गई. धर्मवीर को जब यह पता चला तो वह गुस्से से पागल हो उठा. वह ससुराल पहुंच गया और पत्नी से लड़नेझगड़ने लगा. उस ने पत्नी को लाने के लिए काफी मिन्नतें कीं. लेकिन मनीषा ने ससुराल लौटने से साफ मना कर दिया. धर्मवीर ने ऐसा कई बार किया, पर मनीषा नहीं आई. 23-24 अक्तूबर, 2014 को धर्मवीर सामान से लदा ट्रक ले कर असम पहुंच गया था. सामान डिलीवरी करने के बाद उसे वहां से भाड़े के 67 हजार रुपए मिले.

एक साथ इतनी बड़ी रकम देखते ही धर्मवीर की नीयत डोल गई. ट्रक मालिक संत यादव ने जब भाड़े के बारे में उस से पूछा तो उस ने भाड़ा मिलने की बात बता दी. उस के बाद धर्मवीर ने अपना मोबाइल स्विच्ड औफ कर के रख दिया और ट्रक बिहार के आरा जिले में छोड़ कर ट्रेन से गोरखपुर आ गया. जब हफ्ते भर बाद भी धर्मवीर संत यादव के पास नहीं पहुंचा तो वह समझ गया कि धर्मवीर ने उस के साथ धोखा किया है. उधर रुपए ले कर धर्मवीर गोरखपुर के रास्ते अपनी ससुराल पहुंच गया. वह 1-2 दिन ससुराल में रुका. बच्चों और पत्नी को खुश करने के लिए खूब पैसे खर्च किए.

उस के बाद वहां से अपने साढ़ू के यहां महराजगंज चला गया. 2 दिन साढ़ू के यहां रुक कर 31 अक्तूबर, 2014 को शाम 6 बजे के करीब वह गोरखपुर पहुंच गया. उस समय उस के पास 40 हजार रुपए बचे थे. बाकी के 27 हजार रुपए वह खर्च कर चुका था. इधरउधर समय बिताने के बाद धर्मवीर साढ़े 9 बजे स्टेशन पहुंचा. वह अय्याश तो था ही, इसलिए वह यह भी जानता था कि उसे जिस चीज की तलाश है, वह यहीं मिलेगी. पैदल टहलते हुए वह पुराना पार्सल गेट नंबर-6 पहुंचा. वहां उसे 22 वर्षीय मुसकान मिली. बात करने पर मामला 500 रुपए में तय हो गया.

धर्मवीर मुसकान के साथ जाने से पहले शराब पीना चाहता था. उस ने मुसकान को यह बात बताई तो उस ने भी उस के साथ 2 पैग लेने को कह दिया. धर्मवीर उस की इच्छा जान कर खुश हो गया. वह उसे रिक्शे पर बैठा कर धर्मशाला बाजार ले गया. उस के पीछेपीछे मुसकान के साथी विकास पांडेय, विकास उर्फ मुकेश और सुमेर उर्फ समीर भी लग गए. वहीं से धर्मवीर ने शराब के साथ खाने के लिए मछली भी खरीदी. धर्मशाला बाजार के रेलवे लाइन के किनारे एक जगह बैठ कर दोनों ने मछली खाई और शराब पी. वहां से वे पुराना पार्सल गेट नंबर 6 पहुंचे. अब तक वहां गहरा सन्नाटा फैल गया था. वहीं पर धर्मवीर मुसकान के साथ हसरतें पूरी करना चाहता था. इस से पहले कि वह कुछ करता, तभी मुसकान के तीनों साथी वहां आ धमके.

अचानक सामने लड़कों को देख कर धर्मवीर सकपका गया. वे तीनों धर्मवीर से पैसों की मांग करने लगे तो दिखावे के लिए मुसकान ने उन लड़कों से विरोध जताया. धर्मवीर उन से उलझ गया. कुछ ही देर में धर्मवीर और उन तीनों लड़कों के बीच गुत्थमगुत्था हो गई. उसी दौरान सुमेर ने पीछे से धर्मवीर के दोनों हाथ पकड़ लिए और मुकेश ने धक्का दे कर पेट के बल गिरा दिया. सुमेर ने धर्मवीर की पीठ पर घुटना रख कर मुंह दबा दिया. विकास पांडेय के कहने पर मुसकान ने धर्मवीर के पैर दबोच लिए. तब धर्मवीर को लगा कि मुसकान भी इन लड़कों के साथ मिली है. वे लड़के नशेड़ी थे, इसलिए धर्मवीर उन के काबू में नहीं आ रहा था. फिर विकास पांडेय ने पास में पड़ा पत्थर उठा कर उस के सिर पर दे मारा.

पत्थर के वार से धर्मवीर का सिर फट गया और वह तड़पने लगा. विकास ने धर्मवीर की जेब टटोली. उस की जेब से 40 हजार रुपए निकले. इतने रुपए पा कर वे बहुत खुश हुए. चारों ने 10-10 हजार रुपए आपस में बांट लिए और तुरंत मौके से फरार हो गए. मुसकान और उस के साथियों ने पुलिस से बचने के लिए अपनेअपने मोबाइल औफ कर दिए. उन्होंने तय कर लिया कि कोई भी एकदूसरे को तब तक फोन नहीं करेगा जब तक मामला ठंडा नहीं हो जाता. मुसकान गोरखपुर छोड़ कर बेतिया, बिहार चली गई. कई साल पहले वह बेतिया में रह चुकी थी. वहां रह कर वह आर्केस्ट्रा कंपनी में नाचती थी. मुसकान गोरखपुर से बेतिया कैसे पहुंची, उस की रोमांचित कर देने वाली अपनी अलग कहानी है.

दरअसल, मुसकान गोरखपुर जिले के खोराबार के महेवा मंडी स्थित खिरवनिया गांव के रहने वाले रघुनाथ मल्लाह की बेटी थी. उसे बचपन से ही नाचनेगाने का शौक था. वह घर में टेलीविजन के कार्यक्रम देख कर नाचती थी. घर वालों को उस का यह काम पसंद नहीं था. 15 साल की उम्र में वह घर से बेतिया भाग गई और वहां अपने एक रिश्तेदार की मदद से आर्केस्ट्रा कंपनी में नाचने लगी. आर्केस्ट्रा कंपनी का मालिक उस का दैहिक शोषण करने लगा तो वह उस कंपनी को छोड़ कर दूसरी कंपनी में चली गई. वहां भी वह नहीं बच पाई. इस बार आर्केस्ट्रा के मालिक ने उस से प्रेमविवाह किया. 2-3 सालों तक मौजमस्ती करने के बाद उस ने मुसकान को छोड़ दिया.

ठोकरें खा कर मुसकान अपने घर लौट आई. घर वालों ने उसे घर में पनाह नहीं दी. दरदर की ठोकरें खाती मुसकान पेट की आग बुझाने के लिए अपने तन को बेचने पर मजबूर हो गई. उस से मिलने वाले पैसों से फुटपाथ पर खानाबदोश की जिंदगी शुरू की. फिर समय ने ऐसी करवट ली कि उस के हाथ खून से सन गए और वह हत्यारिन बन गई. कुशमिला उर्फ मुसकान को अपने किए पर बहुत पछतावा है. काश, उस ने घर वालों की बात मान ली होती तो शायद उसे यह दिन नहीं देखना पड़ता. कथा लिखे जाने तक चारों आरोपियों में से सुमेर उर्फ समीर को छोड़ कर बाकी 3 जेल की सलाखों के पीछे थे. समीर पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ पाया था. पुलिस तीनों के खिलाफ अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है. कथा लिखने तक किसी की जमानत नहीं हुई थी. Hindi True Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

True Crime Story: ढोंगी गुरू का अपराधिक अतीत

True Crime Story: कविता रानी को पूरा विश्वास था कि स्वामी सच्चिदानंद उस का परलोक सुधार देगा. परलोक सुधारने की कौन कहे, उस ने उस का सारा धन तो हड़प ही लिया, जान भी ले ली. पंजाब के जनपद नवांशहर में थाना काठगढ़ के तहत एक गांव है मत्तो. यहां के किराना दुकानदार सोमनाथ के 7 भाईबहनों में सब से छोटी थी कविता रानी, जिस की शादी मोहल्ला शिवनगर निवासी सुरेंद्र कुमार से हुई थी. कालांतर में इस दंपति के 2 बेटे हुए, जिन्हें ले कर सुरेंद्र स्पेन चला गया था. पति और बेटों के जाने के बाद कवितारानी नवांशहर के अपने मकान में अकेली रह गई थी.

सोमनाथ बहन का हालचाल लेने के लिए अकसर उस के घर जाया करते थे. पहली दिसंबर, 2009 को शाम 6 बजे उन्हें स्पेन से कविता के बड़े बेटे अजय का फोन आया, ‘‘मामाजी, पिछले 2-3 दिनों से मम्मी को फोन कर रहा हूं, उन से बात नहीं हो पा रही है. आप जा कर जरा मां को देख आएं.’’

अजय की बात ने सोमनाथ को भी चिंता में डाल दिया. वह तुरंत नवांशहर के लिए रवाना हो गए. वहां पहुंच कर उन्होंने देखा, घर के बाहरी गेट पर ताला लटक रहा है. 2 लड़कों ने उन के पास आ कर बताया कि वे कालेज स्टूडैंट हैं और सामने वाले घर में किराए पर रहते हैं. उन में से एक ने उन्हें चाबी सौंपते हुए कहा, ‘‘2-3 दिनों पहले यह चाबी हमें यहां पड़ी मिली थी. शायद आंटीजी के कहीं जाते वक्त उन के हाथ से छूट कर गिर गई है. हम आप को पहचानते हैं, आप आंटीजी के भाई हैं न?’’

दोनों लड़कों ने अपने नाम अजीत चौहान और ऋषि चौहान बताते हुए कविता के घर की ओर इशारा कर के एक साथ कहा, ‘‘यह चाबी हमें इसी गेट के ताले की लग रही है. हम ने इसे उठा कर अपने पास रख लिया था कि आंटीजी के आने पर उन्हें दे देंगे.’’

सोमनाथ ने लड़कों को साथ ले कर गेट का ताला खोला. वे भीतर गए तो सामने के कमरे में भी ताला लगा था, साथ ही अंदर से तेज बदबू आ रही थी. सोमनाथ समझदार आदमी थे. उन्हें समझते देर नहीं लगी कि बदबू लाश की है. उन के मन में आया, ‘कहीं ऐसा तो नहीं कि भीतर उन की बहन मरी पड़ी हो और यह बदबू उसी की लाश से आ रही हो?’

यह बात मन में आते ही सोमनाथ दोनों लड़कों को साथ ले कर थाने जा पहुंचे. थानाप्रभारी राजकुमार ने उन से तहरीर ले कर मामला दर्ज करवाया और पुलिसपार्टी के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. पुलिस ने ताला तोड़ा और मुंह पर कपड़ा लपेट कर भीतर गई. घर का सारा सामान बिखरा पड़ा था और उस के बीच चादर में लिपटी कविता की लाश पड़ी थी. लग रहा था कि मामला लूटपाट के लिए कत्ल का है. कविता के गले में उसी का दुपट्टा कस कर मारा गया था. अपनी काररवाई पूरी कर के पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दिया. रात काफी हो जाने की वजह से काररवाई रोक कर पुलिस ने घर को सील कर दिया.

अगली सुबह पुलिस ने घर को फिर से खोल कर वहां की तलाशी ली तो एक ड्राइविंग लाइसेंस हाथ लगा, जो स्वामी सच्चिदानंद के नाम से था. पासपड़ोस के लोगों ने लाइसेंस देख कर बताया कि यह बहुत मशहूर आदमी है, टीवी के साधना चैनल पर इस के नियमित प्रवचन आते हैं. पता चला कि यह बक्करखाना क्षेत्र में किराए का घर ले कर रहता था. वहीं अपना डेरा बना कर वह प्रवचन दिया करता था, जिसे सुनने के लिए काफी लोग आया करते थे, जिन में कविता रानी भी थी. स्वामी को संदेह के दायरे में रख कर पुलिस ने उस के यहां छापा मारा. पता चला कि स्वामीजी उस रात एक स्थानीय जागरण में व्यस्त थे, जहां से फारिग होने के बाद सुबह ही अपने कुछ शिष्यों के साथ कुरुक्षेत्र चले गए थे.

जागरण आयोजकों ने पुलिस को बताया कि उस रात स्वामीजी थोड़ीथोड़ी देर के लिए 2 बार जागरण में आए थे. मतलब यह रात भर वह जागरण में नहीं रहे थे. पुलिस ने अपना सारा ध्यान स्वामी सच्चिदानंद पर जमा दिया, साथ ही उन के बारे में पता करने के लिए मुखबिरों का भी सहारा लिया गया. मुखबिरी के आधार पर 7 दिसंबर, 2009 को स्वामी को उस वक्त बंगा रेलवे फाटक के पास से गिरफ्तार कर लिया गया, जब वह अपनी इंडिका कार से अपनी एक शिष्या के साथ कहीं जा रहा था.

विधिवत गिरफ्तारी के बाद सच्चिदानंद को अदालत पर पेश कर के 2 दिनों के कस्टडी रिमांड पर लिया गया. उस से व्यापक पूछताछ की गई. इस पूछताछ से स्वामी सच्चिदानंद की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस तरह थी: जिला गुरदासपुर का बड़ा कस्बा है कादियां. यहां के मोहल्ला धर्मपुरा के रहने वाले तिलकराज भारद्वाज छिटपुट काम कर के अपने परिवार का भरणपोषण करते थे. उन की 7 औलादें थीं, जिन में दूसरे नंबर का था सत्येंद्र कुमार. बचपन ही से उसे एक्टिंग का शौक था.

जैसेजैसे वह बड़ा होता गया, उस के मन में एक्टर बनने की इच्छा प्रबल होती गई. सत्येंद्र की यह इच्छा तो पूरी नहीं हुई, लेकिन दसवीं पास करने के बाद उसे पंजाब सरकार के रेवेन्यू विभाग में पटवारी की नौकरी जरूर मिल गई. यह अलग बात है कि अपनी इस नौकरी से वह संतुष्ट नहीं था. उसे जहां कहीं किसी फिल्म की शूटिंग होने की बात पता चलती, वह छुट्टी ले कर वहां पहुंच जाता. अपनी इसी सनक के चलते एक बार वह छुट्टी ले कर मुंबई गया तो काफी दिनों बाद लौटा. परिणामस्वरूप उसे नौकरी से बरखास्त कर दिया गया. इस के बाद वह किसी अन्य काम की तलाश में दिल्ली चला गया. यहांवहां भटकते हुए एक दिन वह पानी पीने के लिए एक ऐसे डेरे में चला गया, जहां एक संत का प्रवचन चल रहा था.

वहां बहुत भीड़ थी. पानी की तो छोडि़ए, वहां तरहतरह के पकवान मुफ्त में बांटे जा रहे थे. पेट भर खाने के बाद सत्येंद्र वहीं पसर गया. जितना बढि़या खाना उसे वहां खाने को मिला था, उस से भी कहीं ज्यादा मजा आया उसे प्रवचन सुनने में उस ने देखा कि श्रद्धालु न केवल संतजी के पैरों में माथा टेक रहे थे, बल्कि अच्छीभली रकम भी चढ़ा रहे थे. बस, यहीं से सत्येंद्र का दिमाग दूसरी दिशा में सोचने लगा. उसे लगा कि इस अंधविश्वासी देश में नाम और दाम कमाने का इस से बेहतर जरिया कोई दूसरा नहीं हो सकता.

पूछताछ में सत्येंद्र ने पुलिस को बताया, ‘‘वाकजाल फैलाने में मैं कुशल था ही, मेरी वाणी में भी ओज था. ऊपर वाले ने चेहरामोहरा भी आकर्षक दिया था. अपनी बात कहने का तरीका भी मुझे काफी हद तक आ गया था. बस थोड़ी जरूरत थी धर्म शास्त्रों की जानकारी की. बिना देरी किए मैं धर्मकर्म का ज्ञान जुटाने लगा. बाबाओं के प्रवचन पूरे ध्यान से सुनने लगा. टीवी चैनलों पर खरीदे गए वक्त में बाबा प्रवचन देने आते तो मैं ध्यान से उन का तौरतरीका देखता और पूरे मनोयोग से उन के प्रवचनों को सुनता.

‘‘आखिर मैं ने तय कर लिया कि मैं इसी धंधे को अपना कर नाम और दाम कमाऊंगा. इस के लिए मैं ने सब से पहले अपने लिए गेरुआ वस्त्र सिलवाए. फिर धार्मिक ग्रंथ खरीद कर उन का अध्ययन शुरू कर दिया. थोड़ीबहुत तैयारी कर के सन् 2004 में मैं छोटेमोटे धार्मिक समारोहों में प्रवचन देने लगा. आत्मविश्वास से भरे मेरे प्रवचन लोगों को पसंद आने लगे. अब मैं ने अपने आप को स्वामी सच्चिदानंद कहलवाना शुरू कर दिया था.’’

सत्येंद्र के बताए अनुसार, पता नहीं यह उस की आवाज का जादू था या उस के आकर्षक व्यक्तित्व का कमाल कि उस के प्रवचनों की धाक जमने लगी. धीरेधीरे उस का सर्कल बढ़ने लगा. जल्दी यह स्थिति आ गई कि उस के कार्यक्रमों में धर्मभीरु लोगों की अच्छीखासी भीड़ जुटने लगी. चढ़ावे के रूप में काफी पैसा भी आने लगा. लोगों की अंधश्रद्धा को देखते हुए उस ने अपना नाम स्वामी सतिंदरानंद की जगह स्वामी सच्चिदानंद रख लिया. क्योंकि इस नाम में कुछ ज्यादा आकर्षण था. उस के दिन तेजी से बदलने लगे. उन्हीं दिनों उस का संपर्क दिल्ली के गणेशनगर निवासी चमनलाल मोंगा से हुआ. उस का अपना कारोबार था. जल्दी ही वह उस का शिष्य बन कर दिनरात उस की सेवा करने लगा. मोंगा को किसी बात की कोई चिंता नहीं थी. लेकिन वह इस लोक में रहतेरहते अपना परलोक सुधारना चाहता था.

मोंगा ने इस बारे में जब स्वामी सच्चिदानंद से बात की तो उस ने उसे यह कह कर डरा दिया कि वह परलोक की चिंता छोड़े, अभी तो उस का यह लोक भी नहीं संवरा. इस पर उस ने सच्चिदानंद के पैर पकड़ लिए. तब उस ने उसे झांसे में लेने का प्रयास करते हुए कहा कि उस के एकलौते बेटे की उम्र केवल 3 महीने रह गई है. यही नहीं, उस की एकलौती बेटी भी उस की इस तरह दुश्मन बन जाएगी कि वह कहीं का नहीं रहेगा. इस पर मोंगा बच्चों की तरह फूटफूट कर रोते हुए सच्चिदानंद के पैरों पर नोटों की गड्डियां रख कर बर्बाद होने से बचाने की प्रार्थना करने लगा.

स्वामी सच्चिदानंद ने मोंगा को जो बातें बताईं थीं, उन्हें सच साबित करने के लिए उस ने जाल बिछाना शुरू कर दिया. उस ने मोंगा की जवान बेटी को बुला कर उसे अपने जाल में फंसा लिया. जब लड़की वश में हो गई तो उस ने उसे कुछ इस तरह से उकसाया कि उस ने अपने पिता समेत 11 लोगों पर गैंगरेप का केस दर्ज करवा दिया और खुद उस के साथ उस के डेरे में रहने लगी. साधना चैनल पर सच्चिदानंद का जो कार्यक्रम आता था, उस का सारा खर्च चमनलाल मोंगा उठाता था, लेकिन उस ने उस का चमन उजाड़ कर उस की बेटी को अपनी शिष्या बना लिया था.

फिर 2008 के अंत में वह उसे साथ ले कर नवांशहर चला गया. यहां आ कर उस ने प्रचार किया कि उस का एक भाई जज है. अपना प्रभाव जमाने के लिए उस ने यह भी प्रचारित किया कि पहले वह भी जज था, लेकिन मोहमाया त्याग कर उस ने साधु का चोला पहन लिया है. नवांशहर में वह खूब मशहूर हो गया. बक्करखाना रोड पर किराए का मकान ले कर सच्चिदानंद ने अपना डेरा बना लिया और रोज प्रवचन करने लगा. उस के यहां श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी. इन्हीं में कविता रानी भी थी, जो उस से कुछ ज्यादा ही प्रभावित हो गई थी. उस का पति और बेटे विदेश में थे. करने को उस के पास कुछ था नहीं. वह भी परलोक सुधारने की गरज से उस के यहां जाने लगी थी और उस की शिष्या बन गई थी. बहाने बना कर उस ने उस से करीब 6 लाख रुपए ऐंठ लिए थे.

एक दिन कविता को विश्वास में ले कर सच्चिदानंद ने उस से कहा कि उस से खार खाने वाले लोंगों ने उस पर झूठे मुकदमे कर दिए हैं, जिन्हें खत्म करवाने के लिए उसे 20 लाख रुपए चाहिए. इस से कविता को उस पर शक हो गया. परिणाम यह हुआ कि उस ने उस से अपना पिछला पैसा मांग लिया. तब सच्चिदानंद को लगा कि उस का पांसा उल्टा पड़ गया है. कुछ दिन तो वह उसे टालता रहा, लेकिन जब वह उस के पीछे ही पड़ गई तो उसे लगा कि कविता अपना पैसा वापस ले कर ही रहेगी. इस मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए सच्चिदानंद ने एक योजना बनाई. 28 नवंबर, 2009 को उस ने फोन कर के कविता से कहा कि पैसों का इंतजाम हो गया है, आज वह उसे उस के पूरे 6 लाख रुपए दे देगा.

साथ ही यह भी कहा कि जागरण की वजह से वह थोड़ा व्यस्त है, इसलिए रात में 10, साढ़े 10 बजे पैसा देने आएगा, क्योंकि सुबह उसे कुरुक्षेत्र जाना है. इस तरह जागरण के बीच से उठ कर वह कविता के यहां जा पहुंचा. कविता बेसब्री से उस का इंतजार कर रही थी. जैसे ही वह भीतर पहुंचा, उस ने सीधेसीधे अपने 6 लाख रुपए मांगे. उस ने रोनी सी सूरत बनाते हुए कहा, ‘‘क्या बताऊं, मैं ने तो पूरे 6 लाख रुपए का इंतजाम कर लिया था. लेकिन जगराता में झगड़ा हो जाने से किसी ने मेरी जेब से पैसे निकाल लिए.’’

‘‘देखो, तुम्हारा यह झूठफरेब मेरे आगे चलने वाला नहीं है. तुम सीधेसीधे मेरे 6 लाख रुपए निकालो वरना मैं तुम्हारी शिकायत पुलिस से करूंगी.’’

कविता के मुंह से इतना निकला था कि स्वामी सच्चिदानंद उर्फ सत्येंद्र ने पूरे जोर से उस की नाक पर घूंसा मारा. वह बेहोश सी हो कर नीचे गिरने को हुई, तभी उस ने उस के गले में पड़ा दुपट्टा उस की गरदन पर कस दिया. जरा सी देर में वह मौत की नींद सो गई. सच्चिदानंद ने उस की लाश चादर में लपेट कर एक तरफ रख दी. उस के बाद कमरे का सामान इस तरह बिखेर दिया, जैसे वहां किसी ने लूटपाट की हो. यह उस का दुर्भाग्य ही था कि यह सब करते समय उस का ड्राइविंग लाइसेंस वहां गिर गया. उस ने कविता के दोनों सैलफोन भी उठा लिए थे, जिन्हें बाद में उस ने तोड़ दिए थे.

कविता को ठिकाने लगाने के बाद कथित स्वामी सच्चिदानंद इत्मीनान से जा कर जागरण में बैठ गया, ताकि उस पर किसी को शक न हो. सुबह 6 बजे अपने चेलों को ले कर वह कुरुक्षेत्र चला गया. बाद में दिल्ली वाली अपनी शिष्या को भी उस ने वहीं बुला लिया. इस के बाद वह जालंधर और अमृतसर में घूमता रहा. आखिर बंगा फाटक से गुजरते हुए वह पकड़ा गया. कथित स्वामी सच्चिदानंद के साथ पकड़ी गई उस की शिष्या से भी पुलिस ने पूछताछ की. लेकिन वह कविता की हत्या के षडयंत्र में शामिल नहीं थी. वह तो खुद ढोंगी स्वामी के जाल में फंसी हुई थी, जिस ने उस के दबाव में अपने पिता तथा अन्य लोगों पर बलात्कार का मुकदमा दर्ज करा दिया था.

इस मामले में उस की कोई भूमिका न पाए जाने पर पुलिस ने उसे उस के अभिभावकों के हवाले कर दिया. 10 दिसंबर, 2009 को अभियुक्त सत्येंद्र उर्फ स्वामी सच्चिदानंद को फिर से अदालत में पेश कर के न्यायिक अभिरक्षा में भिजवा दिया गया. इस के ठीक एक महीने बाद कथित स्वामी सच्चिदानंद को जब पेशी पर अदालत ले जाया जा रहा था तो रास्ते में पुलिस वालों को गच्चा दे कर वह फरार हो गया. पंजाब पुलिस ने पूरा जोर लगा दिया, लेकिन वह आदमी दोबारा उन के हत्थे नहीं चढ़ा. देखतेदेखते साढ़े 5 साल का लंबा अरसा गुजर गया.

मगर जैसी कि कहावत है, 100 दिन चोर के 1 दिन साधु का. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सैल ने 6 जुलाई, 2015 को कथित स्वामी सच्चिदानंद को बेगमपुर इलाके के एक मकान से गिरफ्तार कर लिया. स्पैशल सैल के डीसीपी राजीव रंजन, एसीपी संदीप ब्याला और इंसपेक्टर संजय नागपाल ने उस से सख्ती से पूछताछ की तो अपनी उक्त कहानी बताने के बाद उस के आगे की दास्तान इस तरह से सुनाई: दरअसल ढोंगी सत्येंद्र उर्फ सच्चिदानंद नवांशहर में बहुत बुरी तरह फंस गया था. उस के खिलाफ कत्ल का मुकदमा दर्ज हो गया था. पुलिस ने उसे पकड़ कर जेल भी भिजवा दिया था. चूंकि उस के सारे सपने चकनाचूर हो गए थे, इसलिए वह भाग निकला. वहां से भागने के बाद सच्चिदानंद उत्तराखंड पहुंच कर साधुओं की एक टोली में शामिल हो कर उन की सेवा करने लगा. अपना रंगरूप भी उस ने साधुओं जैसा ही बना लिया था.

कुछ दिनों बाद वह उत्तरकाशी चला गया, जहां किस्मत से विश्वनाथ मंदिर में उसे पुजारी की नौकरी मिल गई. दिल्ली में उस की शिष्या यानी प्रेमिका थी कल्पना. एक दिन साधु वेश में ही वह दिल्ली जा कर उस से मिला. कल्पना उस की प्रेम दीवानी थी. नवांशहर में भी वह उस के साथ पकड़ी गई थी, मगर पुलिस ने उसे शुरू ही में निर्दोष मान कर उस के कुछ रिश्तेदारों के हवाले कर दिया था. सच्चिदानंद को कत्ल केस में गिरफ्तार कर के हवालात में डाल दिया गया. वहां से उस के फरार हो जाने के बारे में कल्पना को कुछ पता नहीं था. पता चलने पर भी न उस ने इस बात का बुरा माना और न जरा भी घबराई, बल्कि उस के साथ उत्तरकाशी में रहने को तैयार हो गई.

जबकि सच्चिदानंद के लिए फिलहाल यह संभव नहीं था. विश्वनाथ मंदिर से उसे इतना पैसा नहीं मिलता था कि वह अपने साथसाथ कल्पना का भी खर्च उठा पाता. दूसरी ओर वह कल्पना को छोड़ना भी नहीं चाहता था. इसलिए अतिरिक्त धन कमाने के लिए उस ने अलग से कोई धंधा करने की सोची. नए धंधे के रूप में उस ने पंजाब में स्मैक सप्लाई करना शुरू कर दिया. इस से उसे मोटी कमाई होने लगी तो वह विश्वनाथ मंदिर को छोड़ कर दिल्ली में ही रहने लगा. अब वह एक तरफ मादक पदार्थों की तस्करी कर रहा था तो दूसरी तरफ दिल्ली के कई इलाकों में प्रवचन कर के अपने आडंबर को भी जारी रखे हुए था. बीचबीच में वह धर्मांध लोगों को चूना लगाने से भी बाज नहीं आ रहा था. इन ठगियों से उस ने कई लोगों की संपत्तियां भी हथिया ली थीं.

कथित स्वामी सच्चिदानंद अपने सभी काम पूरी होशियारी से कर रहा था. फिर भी मादक पदार्थों की तस्करी करते 14 अक्तूबर, 2014 को वह पंजाब में पठानकोट पुलिस के हत्थे चढ़ गया. चूंकि वह साधु लिबास में था और मादक पदार्थों की मात्रा भी कुल 250 ग्राम थी, इसलिए उस ने पुलिस को यही बताया कि यह नशा वह अपने निजी इस्तेमाल के लिए रखे हुए था. जो भी हो, पुलिस ने उस की बातों में आ कर उस से सख्त पूछताछ नहीं की, वरना उस के द्वारा किए गए कत्ल जैसे संगीन अपराध का तभी खुलासा हो जाता और वह जालंधर की उसी जेल में सलाखों के पीछे होता, जहां से अदालत ले जाते वक्त फरार हुआ था.

खैर, पठानकोट पुलिस ने सच्चिदानंद से नरमी का व्यवहार करते हुए उस का कस्टडी रिमांड न ले कर उसे अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. इस का फायदा उठा कर एक दिन उस ने वहां से भी फरार होने की सोची. एक दिन जेल के अपने सैल में लेटे हुए उस ने यह कह कर जोरों से चिल्लाना शुरू कर दिया कि उस के पेट में जोरों का दर्द हो रहा है. जेल अधिकारियों ने तत्काल उसे अस्पताल में भरती करवाने की व्यवस्था कर दी. अस्पताल में उस की निगरानी के लिए 2 सिपाही भी तैनात किए गए. आखिर वह उन्हें चकमा दे कर पहली ही रात अस्पताल से फरार हो गया.

वहां से वापस दिल्ली पहुंच कर वह कल्पना के साथ लिव इन रिलेशन में रहने लगा, साथ ही स्वामी सच्चिदानंद के रूप में प्रवचनों के कार्यक्रम भी करता रहा. लेकिन पता नहीं कैसे पुलिस ने उस के आपराधिक अतीत का पता लगा कर उसे गिरफ्तार कर लिया. दिल्ली पुलिस ने अपनी पूछताछ पूरी कर सत्येंद्र उर्फ स्वामी सच्चिदानंद को न्यायिक हिरासत में भेजने की व्यवस्था करने के अलावा पंजाब पुलिस को उस की गिरफ्तारी की सूचना दे दी. पठानकोट पुलिस की एक टीम दिल्ली जा कर उसे ट्रांजिट रिमांड पर ले आई. इस बार उन्होंने स्वामी सच्चिदानंद उर्फ सत्येंद्र से गहन एवं व्यापक पूछताछ की. इस पूछताछ में भी उस ने वही सब बताया था, जो वह पहले ही दिल्ली पुलिस को बता चुका था.

पूछताछ के बाद उसे न्यायिक हिरासत में गुरदासपुर की सैंट्रल जेल भेज दिया गया, जहां से नवांशहर पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर ले गई. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.