Pune Crime News: रासिला ने ऐसा सोचा भी न था

Pune Crime News: आईटी क्षेत्र में बंगलुरु की इंफोसिस सौफ्टवेयर कंपनी का एक बड़ा नाम है. केरल की रहने वाली रासिला ओ.पी. इसी कंपनी के पुणे फेज-2 स्थित कंपनी में नौकरी करती थी. वह सौफ्टवेयर इंजीनियर थी. इस कंपनी के प्रोजेक्ट इतने महत्त्वपूर्ण होते हैं कि उन्हें पूरा करने के लिए कर्मचारियों और अधिकारियों को कभीकभी 24-24 घंटे तक काम करना पड़ता है. 29 जनवरी को रविवार था.

शहर के अधिकांश औफिस और प्रतिष्ठान बंद थे. लेकिन इंफोसिस कंपनी का एक प्रोजेक्ट इतना अर्जेंट था कि उसे पूरा करने के लिए कर्मचारियों को रविवार को भी औफिस आना पड़ा था. इस प्रोजेक्ट को पूरा करने की जिम्मेदारी पुणे और बंगलुरु टीम को सौंपी गई थी. रासिला भी उस दिन इसी प्रोजेक्ट की वजह से औफिस आई थी. बंगलुरु में कुछ कर्मचारी अपनेअपने घरों में बैठ कर उस की मदद कर रहे थे.

कंपनी का प्रोजेक्ट लगभग पूरा हो गया था. केवल कुछ ही औपचारिकताएं बाकी रह गई थीं कि शाम 7 बजे अचानक रासिला और बंगलुरु टीम के बीच फोन और ईमेल से होने वाली बातचीत बंद हो गई. बंगलुरु के कर्मचारी समझ नहीं पाए कि अचानक यह क्या हो गया.

तमाम कोशिशों के बाद भी रासिला और बंगलुरु के कर्मचारियों के बीच जब संपर्क नहीं हो पाया तो उन के मन में तरहतरह की आशंकाएं जन्म लेने लगीं. उन्होंने पुणे के बड़गांव में रहने वाले इंफोसिस सौफ्टवेयर के सीनियर एसोसिएट कंसलटेंट और रासिला के प्रोजेक्ट रिपोर्टिंग मैनेजर अभिजीत कोठारी को फोन किया.

उन्हें सारी बातें बता कर रासिला के विषय में पता लगाने के लिए कहा. अभिजीत ने उसी वक्त रासिला को फोन लगाया. उस के फोन की घंटी तो बज रही थी, पर वह फोन नहीं उठा रही थी. इस के बाद उन्होंने पुणे फेज-2 स्थित कंपनी के औफिस के लैंडलाइन पर फोन किया.

फोन एक सिक्योरिटी गार्ड ने उठाया. उस ने अभिजीत को बताया कि वह ड्यूटी पर अभीअभी आया है. उस के पहले ड्यूटी पर सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया था. वह अपनी ड्यूटी पूरी कर के अपना चार्ज उसे दे कर चला गया है. अभिजीत कोठारी ने जब ड्यूटी पर मौजूद गार्ड से रासिला के बारे में पूछा तो गार्ड रासिला की केबिन में गया. इस के बाद उस गार्ड ने जो जानकारी दी, उसे सुन कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

फिर क्या था, कुछ ही देर में अभिजीत कोठारी इंफोसिस के औफिस पहुंच गए. उन्होंने देखा कि औफिस के अंदर रासिला की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. शव के आसपास काफी खून फैला था. चेहरा पूरी तरह किसी भारी और ठोस वस्तु से कुचला गया था. अभिजीत कोठारी ने मामले की जानकारी कंपनी के प्रमुख अधिकारियों और रासिला के परिवार वालों को देने के बाद थाना हिंजवाली पुलिस को दे दी थी.

थाना हिंजवाली के थानाप्रभारी अरुण वायकर अपने सहायकों के साथ तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गए. हत्या की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दे कर वह मामले की जांच में जुट गए. वह घटनास्थल का निरीक्षण कर रहे थे कि पुणे शहर के डीसीपी गणेश शिंदे, एसीपी वैशाली जाधव भी घटनास्थल पर आ गईं.

उन के साथ डौग स्क्वायड और फिंगरप्रिंट ब्यूरो के अधिकारी भी आए थे. सभी ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया तो पाया कि रासिला की हत्या की बड़ी बेरहमी से की गई थी. उस के गले में एक पीले रंग का तार लपेटा हुआ था. वह कंप्यूटर का तार था. पुलिस यह जानने की कोशिश करने लगी कि ऐसा कौन व्यक्ति हो सकता है, जिस ने इस की हत्या के बाद चेहरा तक कुचल दिया.

घटनास्थल की काररवाई पूरी कर के पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए पुणे के मसन अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर अभिजीत कोठारी की ओर से रासिला की हत्या का मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी. शुरुआती जांच में पुलिस को पता चला कि रासिला जिस केबिन में बैठती थी, वह बेहद सुरक्षित थी.

उस का दरवाजा एक विशेष कार्ड के टच होने पर ही खुलता था. इस से पुलिस को यही लगा कि उस की हत्या में किसी ऐसे आदमी का हाथ है, जिस का उस केबिन में आनाजाना था. इस संबंध में पुलिस ने कंपनी के कर्मचारियों से पूछताछ की तो कंपनी का सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया पुलिस के शक के दायरे में आ गया. इस के बाद कंपनी के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी गई तो स्पष्ट हो गया कि सिक्योरिटी गार्ड भावेन ने ही रासिला की हत्या की थी.

एसीपी वैशाली जाधव के निर्देशन में जब पुलिस टीम सिक्योरिटी गार्ड भावेन के घर पर पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला. उस के घर के दरवाजे पर ताला लगा था. पड़ोसियों ने बताया कि भावेन की मां की तबीयत अचानक खराब हो गई थी, इसलिए वह अपने गांव चला गया है. जिस सिक्योरिटी एजेंसी में उस की नियुक्ति थी, उस से संपर्क कर पुलिस ने भावेन के बारे में सारी जानकारी ले ली.

जहांजहां से भावेन के गांव जाने के साधन मिलते थे, उन सभी रास्तों पर नाकेबंदी करवा दी गई. इस के अलावा जांच टीम को 7 भागों में विभाजित कर उन्हें महानगर मुंबई और पुणे के विभिन्न इलाकों के लिए रवाना कर दिया गया. रासिला की हत्या पुणे पुलिस के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुकी थी. क्योंकि पिछले साल आईटी प्रोफेशनल महिला ज्योति कुमारी, नयना पुजारी, दर्शना टोगारी और अंतरा दास की कंपनी के सिक्योरिटी गार्डों द्वारा जिस तरह हत्याएं की गई थीं, उसे देख कर आईटी कंपनियों में काम करने वाली महिलाओं के भीतर डर का माहौल बन गया था.

इसलिए इस मामले का खुलासा करने के लिए वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पर दबाव बढ़ गया था. यही वजह थी कि एसीपी वैशाली जाधव ने इस मामले की जांच अपने हाथों में ले ली थी. आखिरकार एसीपी वैशाली जाधव और उन की टीम की मेहनत रंग लाई और 8 घंटे की कोशिश के बाद सौफ्टवेयर इंजीनियर रासिला के हत्यारे भावेन सैकिया को महानगर मुंबई के छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया गया.

पुलिस टीम जिस समय छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन पहुंची थी, उस समय रात के लगभग 3 बज रहे थे. भावेन सैकिया अपना पूरा चेहरा कंबल के नीचे ढक कर टिकट खिड़की के पास बैठा खिड़की के खुलने का इंतजार कर रहा था. मुखबिर के इशारे पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था.

सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया को ले कर पुलिस पुणे आ गई. उस से थोड़ी पूछताछ कर के उसे पुणे के प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी ए.एस. वारूलकर के सामने पेश कर 4 फरवरी, 2017 तक की रिमांड पर ले लिया. पूछताछ में उस ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. उस ने इस हत्याकांड की जो कहानी बताई, इस प्रकार निकली.

27 वर्षीय भावेन सैकिया मूलरूप से असम के गांव ताती विहार का रहने वाला था. उस के पिता ने 3 शादियां की थीं. भावेन सैकिया उन की तीसरी पत्नी का बेटा था. भावेन महत्त्वाकांक्षी के साथ पढ़ाईलिखाई में भी होशियार था.

उस का स्वभाव उग्र था. इस वजह से उस की अपने सौतेले भाइयों से नहीं पटती थी. 12वीं कक्षा में अच्छे अंक पाने के बाद उस ने स्नातक की पढ़ाई करनी चाही पर उस के सौतेले भाई नहीं चाहते थे कि वह पढ़े. किसी न किसी बात को ले कर वह उस से झगड़ने लगते थे. फिर एक दिन झगड़ा इतना बढ़ गया कि सन 2013 में उस ने अपने सौतेले भाई की हत्या कर दी. हत्या के बाद वह घर से फरार हुआ तो वापस गांव नहीं लौटा.

सन 2014 में वह पुणे पहुंच गया और वहां की एक सिक्योरिटी एजेंसी में सिक्योरिटी गार्ड के पद पर उस की नौकरी लग गई. कंपनी की तरफ से भावेन की तैनाती इंफोसिस सौफ्टवेयर कंपनी के औफिस में हो गई. उस ने औफिस के पास ही हिजवाड़ी जयरामनगर के फेज-3 में एक कमरा किराए पर ले लिया.

नौकरी के दौरान उस में काफी परिवर्तन आ गया था. औफिस में काम करने वाली लड़कियों को वह चाहत की निगाहों से देखता. खूबसूरत लड़कियां उस की कमजोरी बन गई थीं. किसी न किसी बहाने वह उन से बातें करता और उन्हें छूने की कोशिश करता था. इसी प्रकार की कोशिश जब उस ने रासिला ओ.पी. के साथ की तो उस ने भावेन की बात अनदेखी नहीं की, बल्कि उस से अपनी नाराजगी भी जता दी.

घटना के 2 दिन पहले रासिला ने भावेन सैकिया को अपने केबिन में बुला कर काफी डांटाफटकारा और उस की हरकतों की शिकायत ईमेल द्वारा उस की सिक्योरिटी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों से करने की भी धमकी दी. इस धमकी से भावेन काफी डर गया था. उसे लग रहा था कि रासिला उस की शिकायत जरूर कर देगी. उस की शिकायत पर उसे अपनी नौकरी जाने का डर था.

24 वर्षीय रासिला ओझम पोईल पुराईत उर्फ रासिला ओ.पी. मूलरूप से केरल राज्य के कालीकट जिले के गांव कुदमंगलम की रहने वाली थी. उस के पिता ओझम पोईल पुराईत उर्फ राजू ओ.पी. होमगार्ड में एक तृतीय श्रेणी कर्मचारी थे. परिवार में उस के और पिता के अलावा एक बड़ा भाई तेजस कुमार ओ.पी. था. मां पुष्पलता का देहांत उस समय हो गया, जब छोटी थी. दोनों भाईबहन का बचपन बहुत ही गरीबी में बीता था. पिता से ही दोनों को मां का प्यार मिला था. घर की परिस्थतियों को देखते हुए दोनों बच्चों ने मन लगा कर पढ़ाई की.

रासिला और तेजस कुमार दोनों ने 98 प्रतिशत अंकों से 12वीं की परीक्षा पास की. इंजीनियरिंग की परीक्षाएं भी दोनों ने प्रथम श्रेणी से पास की थीं. इंजीनियरिंग के बाद तेजस कुमार को आबूधाबी की एयरलाइंस कंपनी में और रासिला की बंगलुरु की इंफोसिस सौफ्टवेयर कंपनी में असिस्टैंट इंजीनियर के पद पर नौकरी लग गई. अपने बच्चों को अच्छी जगह और अच्छे पद पर देख कर राजू ओ.पी. की सारी चिंताएं दूर हो गईं. रासिला की अच्छी पोस्ट देख कर तो उस की शादी के रिश्ते भी आने शुरू हो गए थे.

रासिला खूबसूरत तो थी ही, साथ ही वह कंपनी की जिस पोस्ट पर काम करती थी, उस की जिम्मेदारी भी अच्छी तरह निभा रही थी. अपने काम और व्यवहार से उस ने कंपनी के कई वरिष्ठ अधिकारियों के दिल में एक खास जगह बना ली थी. इस श्रेणी में एक बड़ा अधिकारी ऐसा था जो रासिला को अपने दिल में एक खास जगह देना चाहता था, पर रासिला को वह पसंद नहीं था. जिस के कारण वह अधिकारी रासिला से चिढ़ गया और उसे किसी न किसी बहाने परेशान करने लगा.

उस अधिकारी से परेशान हो कर रासिला ने कुछ वरिष्ठ अधिकारियों से उस की शिकायत कर दी. साथ ही अपना इस्तीफा भी दे दिया. लेकिन कंपनी ने उस का इस्तीफा स्वीकार नहीं किया. बल्कि कंपनी ने रासिला का ट्रांसफर इंफोसिस कंपनी की पुणे ब्रांच में कर दिया और पुणे के हिजवाड़ी के जयरामनगर फेज-1 में उस के रहने की व्यवस्था भी कर दी. पुणे ब्रांच में रासिला को आए अभी 5 महीने ही हुए थे कि उसे औफिस के सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया से दोचार होना पड़ा.

घटना के दिन सारा औफिस बंद होने के बावजूद भी कंपनी द्वारा सौंपे गए प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए रासिला को अपने औफिस आना पड़ा था. दिन के 2 बजे जब वह अपने औफिस में पहुंची तो काफी खुश थी. उस समय सिक्योरिटी गार्ड भावेन अपनी ड्यूटी पर तैनात था. रासिला ने अपने एक्सेस कार्ड से केबिन का लौक खोला और केबिन के अंदर जा कर अपने बंगलुरु ब्रांच के कुछ साथियों के साथ औनलाइन जुड़ कर अपने प्रोजेक्ट की तैयारी में जुट गई थी.

इधर रासिला की धमकी और अपनी नौकरी को ले कर भावेन काफी परेशान था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे क्या न करे. शिकायत को अपने वरिष्ठ अधिकारियों तक जाने से कैसे रोके इसी बारे में वह सोचने लगा. सोचविचार करने के बाद उस ने खतरनाक फैसला ले लिया.

उस समय रासिला औफिस में अकेली थी. बातचीत करने के लिए मौका अच्छा था. अपनी हरकतों की माफी मांगने के बहाने वह रासिला के केबिन में जाने में कामयाब हो गया. केबिन के अंदर पहुंचते ही उस ने रासिला से कहा, ‘‘मैडम, आप मेरी शिकायत मेरे अधिकारियों से नहीं करना वरना मेरी नौकरी चली जाएगी और मैं बेकार हो जाऊंगा.’’ वह गिड़गिड़ाया.

रासिला ने एक बार गार्ड के चेहरे को देखा. जिस पर मिलेजुले खौफ का असर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था. हालांकि रासिला ने उस की हरकतों को नजरअंदाज कर दिया था. लेकिन वह उसे थोड़ा और सबक सिखाना चाहती थी, जिस से वह सुधर जाए. इसलिए वह गंभीर होते हुए बोली, ‘‘नौकरी चली जाएगी, बेकार हो जाओगे तो मैं क्या करूं. तुम्हें  लड़कियों को परेशान करने का बड़ा शौक है न, अब भुगतो, मैं ने तो तुम्हारी शिकायत तुम्हारी कंपनी के सीनियर अधिकारियों को ईमेल से कर दी है. अब जाओ गांव में ही बैठना.’’

यह सुन कर भावेन का चेहरा क्रोध से तमतमा उठा. अपने आपे से बाहर होते हुए उस ने इंटरनेट का वायर खींच कर रासिला के गले में डालते हुए कहा, ‘‘मैडम, यह तुम ने अच्छा नहीं किया. अब तुम्हें इस की सजा तो भुगतनी ही पड़ेगी.’’

रासिला उस का इरादा जान कर अपने बचाव के लिए काफी चीखीचिल्लाई. पर उस वक्त उस की मदद के लिए वहां कोई नहीं था. उस ने उस इंटरनेट वायर से रासिला का गला घोंट दिया. उस की हत्या करने के बाद उस ने अपने बूटों से ठोकरें मारमार कर उस का चेहरा लहूलुहान कर दिया.

रासिला की हत्या करने के बाद जब भावेन का गुस्सा शांत हुआ तो वह बाहर आ कर आराम से अपनी जगह बैठ गया. उसे पुलिस और कानून का डर लगने लगा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अब कहां जाए. गांव जा नहीं सकता था, क्योंकि उस पर सौतेले भाई की  हत्या का आरोप था. पुणे और गांव की पुलिस से बचने के लिए उस के पास कोई रास्ता नहीं था. ऐसे में उसे बस आत्महत्या के अलावा और कोई चारा नहीं दिखा.

उस की ड्यूटी का टाइम भी पूरा हो चुका था. जैसे ही दूसरा सिक्योरिटी गार्ड शिफ्ट बदलने आया तो उसे जिम्मेदारी सौंप कर भावेन औफिस से निकल गया. आत्महत्या करने के लिए वह पुणे रेलवे स्टेशन पर पहुंचा ताकि किसी टे्रेन के सामने कूद कर जीवनलीला खत्म कर ले लेकिन ऐसा करने की उस की हिम्मत नहीं हुई.

फिर उस ने आत्महत्या करने के बजाय किसी दूसरे शहर में जाने का इरादा बनाया. अपने कमरे से उसे कुछ जरूरी सामान भी साथ लेना था. इसलिए कमरे पर पहुंच कर उस ने पड़ोसियों से झूठ कह दिया कि उस की मां की तबीयत खराब है. बैग में कपड़े आदि भर कर वह महानगर मुंबई के छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन पहुंचा. वहां से टिकिट ले कर उसे अपनी किसी मंजिल की ओर रवाना होना था. पर इस के पहले ही वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया. भावेन मराली सैकिया से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने न्यायालय में पेश कर उसे जेल भेज दिया.

पुलिस ने रासिला ओ.पी. के शव को पोस्टमार्टम के बाद उस के पिता राजू ओ.पी. और परिजनों को सौंप दिया. पिता और परिवार वालों का कहना था कि रासिला की हत्या एक साजिश के तहत इंफोसिस कंपनी के ही एक बड़े अधिकारी ने कराई है, जिस की शिकायत उन्होंने हिजवाड़ी पुलिस थाने में दर्ज करवा दी.

पुलिस ने उन्हें भरोसा दिया कि रासिला की हत्या के मामले में जो भी दोषी होगा, उस के खिलाफ सख्त काररवाई की जाएगी. मामले की जांच थानाप्रभारी अरुण वायकर कर रहे थे. कथा लिखे जाने तक भावेन सैकिया की जमानत नहीं हो सकी थी. Pune Crime News

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Haryana Crime News: दोस्त बना जीजा, खतरनाक नतीजा

सुबह का उजाला अभी फैलना शुरू हुआ था कि ‘बचाओ बचाओ’ की मर्मभेदी चीख ने वहां मौजूद लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था. चीखने वाले पर तेजधार हथियार से एक युवक ने हमला किया था, जिस से गंभीर रूप से घायल हो कर वह चीखा था. चीखने के साथ ही वह सड़क पर गिर पड़ा था और गिरते ही बेहोश हो गया था.

उस युवक के गिरते ही उस पर हमला करने वाला युवक लंबे फल का खून सना चाकू हाथ में लिए भागा था. सुबह का समय होने की वजह से वहां बहुत कम लोग थे, लेकिन जो भी थे, वे उस का पीछा करने या पकड़ने की हिम्मत नहीं कर सके थे.

पर उन लोगों ने इतना जरूर किया कि हमलावर के भागने के बाद सड़क पर घायल पड़े युवक को पंचकूला के सैक्टर-6 स्थित जनरल अस्पताल पहुंचा दिया था. उसे देखते ही डाक्टरों ने मृत घोषित करने के साथ इस की सूचना पुलिस को दे दी थी.

सूचना मिलते ही थाना मौलीजागरां के एएसआई गुरमीत सिंह सुबह 7 बजे के करीब अस्पताल पहुंच गए थे. घटना की जानकारी ले कर उन्होंने थानाप्रभारी इंसपेक्टर बलदेव कुमार को सूचित किया तो सिपाही अमित कुमार के साथ वह भी अस्पताल पहुंच गए थे.

जरूरी काररवाई कर के बलदेव कुमार ने उन लोगों से बात की, जो मृतक को अस्पताल ले कर आए थे. वे 2 लोग थे, जिन में एक 19 साल का मोहम्मद चांद था और दूसरा था ड्राइवर अशोक कुमार. पूछताछ में चांद ने बताया था कि वह पंचकूला के सैक्टर-16 की इंदिरा कालोनी के मकान नंबर 1821 में रहता था और सैक्टर-17 की राजीव कालोनी स्थित शरीफ हलाल मीट शौप पर नौकरी करता था.

सुबह जल्दी जा कर चांद ही दुकान खोलता था. मृतक को ही नहीं, उस पर हमला करने वाले को भी वह अच्छी तरह से पहचानता था. वह सुबह 5 बजे दुकान पर पहुंचा तो मुर्गा सप्लाई करने वाली गाड़ी आ गई. गाड़ी के ड्राइवर अशोक कुमार ने मोहम्मद चांद को आवाज दे कर गाड़ी से मुर्गे उतारने को कहा.

मोहम्मद चांद गाड़ी के पीछे पहुंचा तो गाड़ी में बैठा ड्राइवर का सहायक इरफान उतर कर उस के पास आ गया. जैसे ही वह जाली वाला दरवाजा खोल कर मुर्गे निकालने के लिए आगे बढ़ा, शाहबाज हाथ में चाकू लिए वहां आया और इरफान के सिर पर उसी चाकू से वार कर दिया.

वार होते ही इरफान पीछे की ओर घूमा तो शाहबाज ने कहा, ‘तुम ने मेरी भोलीभाली बहन को अपनी मीठीमीठी बातों में फंसा कर मेरी मरजी के खिलाफ उस से शादी की है न? तो आज मैं तुझे उसी का सबक सिखा रहा हूं. आज मैं तुझे जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’

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इस के बाद शाहबाज ने इरफान की छाती, आंख के नीचे और कमर तथा पेट पर लगातार कई वार किए. इरफान ‘बचाओ…बचाओ’ की गुहार लगाते हुए नीचे गिर गया. शाहबाज का गुस्सा और उस के हाथ में चाकू देख कर कोई भी उस के पास जाने की हिम्मत नहीं कर सका.

लेकिन जैसे ही शाहबाज चला गया, मोहम्मद चांद और अशोक कुमार ने किसी तरह इरफान को अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे देखते ही मरा हुआ बताया. ऐसा ही कुछ अशोक कुमार ने भी बताया था, लेकिन उस का कहना था कि वह आगे था. शोर सुन कर पीछे आया. तब तक शाहबाज अपना काम कर के जा चुका था.

इंसपेक्टर बलदेव कुमार ने हत्याकांड के चश्मदीद मोहम्मद चांद के बयान के आधार पर शाहबाज के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने की अनुशंसा कर के तहरीर थाना भेज दी, जहां एफआईआर नंबर 101 पर भादंवि की धारा 302 के तहत यह केस दर्ज कर लिया गया. यह घटना 4 जून, 2016 की है.

उसी दिन पुलिस की एक टीम शाहबाज की तलाश में जुट गई. उस के बारे में पता करने के लिए विश्वस्त मुखबिर भी सक्रिय कर दिए गए थे. मुखबिर की ही सूचना पर शाहबाज को उसी दिन रात में गांव मक्खनमाजरा से गिरफ्तार कर लिया गया.

अदालत से कस्टडी रिमांड ले कर सब से पहले शाहबाज से उस चाकू के बारे में पूछा गया, जिस से उस ने इरफान का कत्ल किया था. 6 जून को उस की निशानदेही पर वह चाकू मौलीजागरां की एक कब्रगाह से बरामद कर लिया गया. उस ने वहां चाकू को पत्थरों के नीचे दबा कर रखा था. लेकिन उस पर लगा खून उस ने साफ कर दिया था.

इस के बाद शाहबाज से इरफान की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के रहने वाले शाहबाज और इरफान एक ही गांव के रहने वाले थे, इसलिए वे एक साथ खेलकूद कर बड़े हुए थे. कुछ दिनों पहले कामधंधे की तलाश में दोनों चंडीगढ़ आ गए. इरफान जहां अपने बड़े भाई के साथ आया था, वहीं शाहबाज अपने पूरे परिवार के साथ आया था. उस के परिवार में अब्बूअम्मी के अलावा एक छोटी बहन साहिबा थी.

चंडीगढ़ में दोनों पंचकूला की सीमा पर बसे गांव मौलीजागरां में थोड़ी दूरी पर अलगअलग किराए के मकान ले कर रहने लगे थे. मौलीजागरां जहां चंडीगढ़ में पड़ता है, वहीं मुख्य सड़क के उस पार की दुकानें हरियाणा के जिला पंचकूला के सैक्टर-17 की राजीव कालोनी के अंतर्गत आती हैं. उन्हीं में से एक दुकान पर शाहबाज जहां मुर्गे काटने का काम करने लगा था, वहीं इरफान को मुर्गे सप्लाई करने वाली गाड़ी पर सहायक की नौकरी मिल गई थी.

अपने हिसाब से दोनों का काम ठीकठाक चल रहा था. शाहबाज के अब्बू को भी नौकरी मिल गई थी. इरफान और शाहबाज हमउम्र थे. दोनों इतने गहरे दोस्त थे कि उन में सगे भाइयों जैसा प्यार था. एक दिन भी दोनों एकदूसरे से मिले बिना नहीं रह पाते थे. एकदूसरे के यहां आनाजाना, खाना खा लेना या फिर कभीकभार सो जाना आम बात थी.

साहिबा भी दोनों के साथ बचपन से खेलतीकूदती आई थी. मगर अब वह जवान हो चुकी थी. घर वाले उस के निकाह के बारे में सोचने लगे थे. देखनेदिखाने की बात चली तो साहिबा ने हिम्मत कर के शरमाते हुए घर वालों से कहा कि वह इरफान से प्यार करती है और उसी से निकाह करना चाहती है.

साहिबा की इस बात से शाहबाज के घर में तूफान सा आ गया. घर का कोई भी आदमी इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं था. शाहबाज ने साफ कहा, ‘‘इस से बड़ी जिल्लत मेरे लिए और क्या होगी कि लोग यह कह कर मेरा मजाक उड़ाएंगे कि अपनी बहन का निकाह करने के लिए ही मैं ने इरफान से दोस्ती की थी. क्या निकाह के लिए सिर्फ वही रह गया है? दुनिया में और कोई लड़का नहीं है? मैं यह निकाह किसी भी कीमत पर नहीं होने दूंगा.’’

शाहबाज ने साहिबा को तो लताड़ा ही, इरफान से भी झगड़ा किया. इरफान ने उसे समझाने की कोशिश करते हुए कहा कि जो भी होगा, घर वालों की रजामंदी से होगा. लेकिन शाहबाज ने साफ कह दिया कि वह साहिबा को भूल जाए और किसी अन्य लड़की से निकाह कर ले, वरना उस के लिए ठीक नहीं होगा.

शाहबाज की इस धमकी का नतीजा यह हुआ कि कुछ दिनों बाद इरफान साहिबा को भगा ले गया और एक धार्मिक स्थल पर दोनों ने निकाह कर लिया. वह वापस आया तो साहिबा को शरीकेहयात बना कर आया. शाहबाज को इस मामले में सारी गलती इरफान की नजर आ रही थी. उस ने अपने दिलोदिमाग में बैठा लिया कि इरफान ने साहिबा के भोलेपन का फायदा उठा कर उसे अपनी बातों में फंसा लिया है.

शाहबाज इरफान से पहले से ही नाराज था, जलती पर घी का काम किया उस ने साहिबा को भगा कर. उस के अब्बू ने इस से बहुत ज्यादा शर्मिंदगी महसूस की. इसी की वजह उन्होंने 2 दिनों बाद ही मौलीजागरां का अपना निवास छोड़ दिया था और वहां से 20 किलोमीटर दूर जा कर कस्बा डेराबस्सी में किराए का मकान ले कर रहने लगे थे. उन्होंने उधर जाना ही छोड़ दिया था. शाहबाज को नौकरी की वजह से उधर जाना पड़ता था.

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जिस मीट की दुकान पर शाहबाज काम करता था, इरफान रोजाना उधर मुर्गे की सप्लाई करने आता था. लेकिन निकाह के बाद वह उधर दिखाई नहीं दिया था. पता चला कि निकाह के दिन से ही उस ने छुट्टी ले रखी है.

4 जून, 2016 की बात है. साहिबा से इरफान को निकाह किए 5 दिन हो गए थे. सुबह के 5 बजे शाहबाज दुकान पर पहुंच कर मुर्गा काटने वाला चाकू तेज कर रहा था. तभी मुर्गेवाली गाड़ी आ कर उस की दुकान से थोड़ी दूरी पर सड़क के किनारे रुकी. इरफान उतर कर गाड़ी के पीछे की ओर आया.

शाहबाज ने उसे आते देखा तो उसे देख कर उस की आंखों में खून उतर आया. उस के पास सोचनेविचारने का वक्त नहीं था. वह मीट काटने वाला चाकू ले कर तेजी से भागता हुआ इरफान के पास पहुंचा और जरा सी देर में उसे मौत के घाट उतार कर भाग गया.

पहले तो उस ने कब्रिस्तान के पास एक जगह चाकू को साफ कर के पत्थरों के नीचे छिपा दिया. उस के बाद बचने के लिए इधरउधर छिपता रहा. लेकिन पुलिस ने उसे पकड़ लिया. उस ने कहा कि इरफान ने काम ही ऐसा किया था, जिस से उसे मारने का कोई अफसोस नहीं है. इरफान ने जो किया था, उस की उसे यही सजा मिलनी चाहिए थी.

पूछताछ के बाद पुलिस ने शाहबाज को फिर से अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में बुड़ैल जेल भेज दिया गया.

बलदेव कुमार ने उस के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर समय से निचली अदालत में दाखिल कर दिया, जहां से सैशन कमिट हो कर 13 सितंबर, 2016 से मामले की सुनवाई चंडीगढ़ के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अतुल कसाना की अदालत में शुरू हुई.

6 अक्तूबर को अदालत ने शाहबाज के खिलाफ धारा 302 का चार्ज फ्रेम कर दिया. उस ने अदालत में खुद को बेकसूर बताते हुए दरख्वास्त की थी कि पुलिस ने एक झूठी कहानी गढ़ कर इस केस में उसे बिना मतलब फंसा दिया है. वह अपने उन बयानों से भी मुकर गया, जो उस ने कस्टडी रिमांड के दौरान पुलिस को दिए थे.

मामले की विधिवत सुनवाई शुरू होते ही अभियोजन पक्ष ने डा. अमनदीप सिंह, डा. गौरव, मोहम्मद चांद, इंतजाम अली, अशोक कुमार, इंसपेक्टर बलदेव कुमार, फोटोग्राफर फूला सिंह, हवलदार सतनाम सिंह, रमेशचंद, धर्मपाल एवं यशपाल के अलावा सीनियर कांस्टेबल कृष्णकुमार, एसआई गुरमीत सिंह, एसआई गुरनाम सिंह और डा. मनदीप सिंह के रूप में 15 गवाह अदालत में पेश किए.

इस के बाद अतिरिक्त पब्लिक प्रौसीक्यूटर ने अभियोजन पक्ष की गवाहियों के पूरी होने के बाद सीआरपीसी की धारा 293 के तहत फोरैंसिक साइंस लैबोरेटरी की रिपोर्ट के अलावा विसरा रिपोर्ट भी पेश की.

अभियोजन पक्ष की काररवाई पूरी होने के बाद 20 जनवरी, 2017 को कोड औफ क्रिमिनल प्रोसीजर की धारा 313 के तहत अभियुक्त शाहबाज का स्टेटमैंट रिकौर्ड किया गया. अभियुक्त ने उक्त सभी गवाहों को झूठ करार देते हुए यही कहा कि वह बेकसूर है. उसे झूठा फंसाया गया है.

बचाव पक्ष की ओर से साहिबा को पेश किया गया. कोड औफ क्रिमिनल प्रोसीजर की धारा 315 के अधीन दर्ज अपने बयान में साहिबा ने अदालत को बताया कि उस ने इरफान से प्रेम विवाह किया था, जिस का परिवार वालों ने पहले तो विरोध किया, लेकिन बाद में मान गए थे.

इरफान ने उसे बताया था कि उस की कुछ गलत लोगों से ऐसी दुश्मनी हो गई है कि वे मौका मिलने पर उस की जान ले सकते हैं. ऐसे में हो सकता है, इरफान को उन्हीं लोगों ने मारा हो, न कि शाहबाज ने.

बचाव पक्ष की ओर से अशोक कुमार को अविश्वसनीय करार देते हुए अदालत ने उसे मुकरा गवाह घोषित करने की गुहार लगाई गई, जो अदालत ने मान भी ली. यह भी दलील दी गई कि पुलिस द्वारा बरामद चाकू पर डाक्टर की रिपोर्ट के मुताबिक मानवीय खून नहीं लगा था.

31 जनवरी, 2017 को विद्वान जज अतुल कसाना ने इस मामले का फैसला सुनाते हुए खुली अदालत में कहा कि उन्होंने दोनों पक्षों को ध्यानपूर्वक सुनने के अलावा सभी साक्ष्यों को गौर से जांचापरखा है, जिन से यह केस शीशे की तरह साफ है. अशोक कुमार को भले मुकरा गवाह करार दिया गया है, लेकिन उस की गवाही को नकारा नहीं जा सकता.

वह भी एक तरह से इस केस का चश्मदीद गवाह था. भले ही उस की गवाही में बाद में कुछ विपरीत बातें सामने आईं, जिस वजह से उसे मुकरा गवाह घोषित किया गया. लेकिन उस की शुरू की गवाही अभियोजन पक्ष को पूरी तरह मजबूती देने में सहायक सिद्ध हुई है.

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चाकू पर मानवीय खून का अंश होने की बात रिपोर्ट में पहले ही आ चुकी है. हालांकि अभियुक्त ने उसे फेंकने से पहले साफ कर दिया था. साहिबा को बचाव पक्ष ने गवाह के रूप में पेश कर के केस की दिशा बदलने का प्रयास किया. लेकिन उस की प्रेम विवाह वाली बात मान लेने से ही प्रौसीक्यूशन की कहानी को बल मिल जाता है.

लिहाजा यह अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में कामयाब रहा है और अभियुक्त शाहबाज खान मृतक मोहम्मद इरफान का कत्ल करने का दोषी पाया गया है. अभी वह जेल में है. सजा की बाबत सुनने के लिए उसे अगले दिन अदालत में पेश किया जाए.

अगले दिन शाहबाज को ला कर अदालत में पेश किया गया तो माननीय एडीजे अतुल कसाना ने उसे उम्रकैद के अलावा 10 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई. Haryana Crime News

– कथा अदालत के फैसले पर आधारित 

Hindi Stories: हुश्न की कीमत

Hindi Stories: लड़कियों के प्रति खासकर हसीन लड़कियों के प्रति सभी का रवैया एक जैसा होता है बेरहम और कांटेदार, जो उस हसीना के शरीर पर खराशें डाल देते हैं. ऐसा ही कुछ जरीना के साथ हुआ, जिस की वजह से वह डौली बन गई.

पहले मेरा नाम जरीना था. उन दिनों मेरे बदन पर ढंग के कपडे़ तक नहीं होते थे. हमारे घर में अच्छा खाना नहीं पकता था. लोग मेरे सिर पर सलीके से जमे हुए दुपट्टे और झुकी हुई निगाहों को देख कर मेरे बारे में दकियानूसी होने का फतवा लगा देते थे. कहने का मतलब कि हम बेहद गरीब थे. मैं अपने वालिदैन के साथ मलेर में रहती थी. यह शहर से कुछ फासले पर गरीबों की बस्ती थी. यहां हुकूमत की तरफ से क्वार्टर बना कर अलाट कर दिए गए थे. अब्बा को भी एक 80 गज का क्वार्टर अलाट हो गया था.

घर में हम 6 लोग थे—अब्बा, अम्मी, हम 2 बहनें और 2 भाई. मैं बहनभाइयों में सब से बड़ी थी. मैं समझती हूं कि लड़कियों को सब से बड़ी नहीं होना चाहिए, वरना उन की आधी उम्र दूसरों को समेटते हुए गुजर जाती है. कम से कम गरीब घराने में अव्वल तो लड़कियों की जरूरत ही नहीं होती. अगर हो भी तो तीसरे या चौथे नंबर पर हो. बहरहाल, अब्बा ने हम सब को एक पास के स्कूल में दाखिला दिला दिया था. जिंदगी बुरीभली गुजर रही थी. अब्बा एक औफिस में काम करते थे. मलेर से शहर का फासला लंबा था, इसलिए अब्बा 5 बजतेबजते घर से औफिस के लिए निकल जाते थे.

मैं ने अपनी कहानी शुरू तो कर दी है, लेकिन यह एक तल्ख कहानी है. अगर आप में हौसला है तो इसे पढ़ें. इस के बाद आप की मरजी है, चाहे गालियां दें या खामोश हो जाएं. लेकिन इतना जरूर जानती हूं कि आप इस बात से इनकार नहीं करेंगे कि इस कहानी के बेशुमार किरदारों में एक आप भी हैं. हां, आप जो एक ट्यूटर हैं, एक दुकानदार हैं, व्यापारी हैं, औफिस में काम करने वाले क्लर्क हैं, मालिक हैं. यह कहानी आप की है, क्योंकि इस समाज को आप ही ने बनाया है. आप चाहे कुछ भी हों, कोई भी हों, इस आईने में अपना चेहरा आप को घिनौना ही नजर आएगा.

हां तो, मैं उस से मुखातिब हो रही हूं, जो रोज स्कूल जाते समय हमारे रास्ते में खड़ा रहता था. उस वक्त हम दोनों बहनें ज्यादा बड़ी नहीं थीं. मेरी उम्र 15 बरस रही होगी और हसीना की 13 बरस. वह खड़ा रहने वाला नौजवान तकरीबन 20 का रहा होगा. वह एक अजीब मिजाज का नौजवान था. उस का गरेबान हमेशा खुला रहता था. बड़ेबड़े बालों को वह तेल लगा कर चिपकाए रखता था. तंग मोरी की पतलून और चारखाने की कमीज में उस का हुलिया बहुत फूहड़ लगता. उस के होंठों के दरम्यान हमेशा एक सिगरेट दबी रहती. वह हम दोनों को देख कर अजीब अंदाज से खंखारता और सीटियां बजाता हुआ पीछेपीछे चलने लगता. हम स्कूल के गेट तक पहुंच जातीं तो वह रफूचक्कर हो जाता. यह उस का रोजाना का काम था. हम दोनों बहनें इस सूरतेहाल से परेशान हो गई थीं.

उन दिनों मुझे जिंदगी के इन पहलुओं के बारे में ज्यादा मालूम नहीं था. घर में रेडियो हुआ करता था. कभीकभी हम नजदीकी सिनेमाघर में जा कर फिल्म देख लिया करती थीं. लेकिन उस जमाने की फिल्में भी बस यूं ही हुआ करती थीं. हम दोनों बहनें अकसर उसी के बारे में बातें करती थीं. हमारी समझ में नहीं आता था कि वह चाहता क्या है? एक दिन रोशी ने अचानक मुझे अहसास दिला दिया. उस ने यह अहसास इस तरह दिलाया था, जैसे अंधेरे में किसी के हाथों में मशाल दे दी जाए और उस मशाल की रोशनी में उसे सब कुछ दिखाई देने लगे. हुआ यों कि रोशी उस दिन स्कूल में कहीं से एक किताब ले आई थी.

रोशी उम्र में मुझ से 2 बरस बड़ी रही होगी, लेकिन पढ़ती मेरी क्लास में थी. उस ने पीरियड खत्म होते ही किताब मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘जरीना, यह देखो, इस में अच्छीअच्छी तसवीरें हैं.’’

मैं किताब देखने लगी. उस में वाकई खूबसूरत लड़कियों की तसवीरें थीं. एक से बढ़ कर एक लिबास पहने हुए. खूबसूरत लिबास पहने हुए खूबसूरत लड़कियां, जिन को देखने से खुशी महसूस होती थी.

‘‘अरे, ये तो वाकई बहुत प्यारीप्यारी लड़कियां हैं.’’ मैं ने कहा.

‘‘हां, हैं तो बहुत प्यारी, लेकिन इन में से कोई भी तुम्हारी तरह नहीं है.’’

‘‘क्या मतलब?’’ मैं ने चौंक कर किताब बंद कर दी.

‘‘तुम जरा अपने आप को आईने में देखो,’’ उस ने कहा, ‘‘तुम्हें खुद अहसास हो जाएगा कि तुम कितनी खूबसूरत हो.’’

मेरा दिल जोरजोर से धड़क उठा. क्या मैं वाकई उतनी खूबसूरत हूं? यह अपने को देखने का जज्बा तो हर एक में हुआ करता है. आप किसी बच्चे की भी जरा सी तारीफ कर दें तो वह इठलाइठला कर चलना शुरू कर देता है.

‘‘यह तुम क्या कह रही हो रोशी? पहले तो किसी ने ऐसी बात नहीं कही.’’

‘‘तो क्या हुआ? मैं सच कहती हूं. तुम्हारी वजह से हंगामा होगा, गोलियां चलेंगी. न जाने कितने नौजवान तुम पर मर मिटेंगे.’’

और उस वक्त मुझे अचानक अहसास हो गया कि वह नौजवान रास्ते में क्यों खड़ा रहता है. रोशी ने अनजाने में एक राज से परदा उठाया था, वरना मैं तो अभी तक उलझी हुई थी. मतलब यह था कि मैं बहुत खूबसूरत थी, इसीलिए वह नौजवान मेरे रास्ते में आया करता था. इस राज से परदा हटते ही अजीब किस्म की घबराहट होने लगी. अगर मैं खूबसूरत थी तो फिर उस को क्या? वह कौन होता था, मेरे रास्ते में खड़ा होने वाला? वह दिन स्कूल में बस इसी किस्म की बातें सोचते हुए गुजर गया.

अगले दिन वह नौजवान फिर दिखाई दिया. इस दफा पहली बार मेरे कदम लड़खड़ाए थे, वरना इस से पहले मैं उसे नजरअंदाज कर दिया करती थी. लेकिन आज एक कदम भी उठाना दूभर हो रहा था. मेरी बहन हसीना ने भी मेरी यह हालत महसूस कर ली थी.

‘‘अरे, क्या हो गया बाजी? चलो न. इतना आहिस्ताआहिस्ता क्यों चल रही हो?’’

मैं ने चौंक कर अपनी रफ्तार तेज कर दी. रोज की तरह वह नौजवान स्कूल के गेट से वापस हो गया था.

उस रात मैं ने अम्मी से उस नौजवान की शिकायत कर दी. अम्मी मेरी बात सुन कर बोलीं, ‘‘तुम्हारा वहम होगा जरीना. हो सकता है, उस का भी रास्ता वही हो.’’

‘‘नहीं अम्मी,’’ हसीना मेरी तरफ से बोली, ‘‘वह वाकई हम दोनों के लिए खड़ा रहता है और बाजी को यों घूरघूर कर देखता है कि क्या बताऊं.’’

अम्मी सोच में पड़ गईं. ऐसी बातें सुन कर गरीब मांएं आमतौर पर सोच में मुब्तिला हो जाती हैं, जबकि अमीर मांएं या तो मुसकरा कर बात टाल देती हैं या ऐसे आवारागर्द का फौरी तौर पर बंदोबस्त कर दिया जाता है. लेकिन मेरी अम्मी गरीब थीं, इसलिए सोचने लगीं और उन्होंने पहली बार मुझे ऐसी निगाहों से देखा, जिन की तपिश मुझे अपने चेहरे पर महसूस होने लगी थी. उन निगाहों में हैरानी भी थी और खौफ भी. बेटी के हुस्न की तारीफ भी और अंदेशे भी. उन निगाहों ने मुझे बेचैन कर दिया. वहां से उठ कर मैं कमरे में आ गई और कमरे में दाखिल होते ही आईना मेरे सामने था.

वह लकड़ी की अलमारी में लगा हुआ धुंधला सा आईना था. लेकिन उस वक्त वह मेरे वजूद से जगमगा रहा था. मैं ने पहली बार आईने को और आईने ने मुझे इस अंदाज से देखा था. मैं अपने आप पर फिदा होने लगी थी. एक खास किस्म का गुरूर, एक अजीब तरह की खुशी. क्या मैं वाकई इतनी खूबसूरत हूं? दूसरी सुबह वह नौजवान फिर दिखाई दिया. मुझे मालूम नहीं था कि अम्मी ने अब्बा से भी इस का जिक्र कर दिया होगा और न हमें यह मालूम था कि उस सुबह वह उस नौजवान की घात में थे. वह रोज की तरह हमारे पीछेपीछे चला और अब्बा न जाने किस तरफ से हाजिर हो कर उस की राह में आ गए.

उस दिन मुझे मालूम हुआ कि जब बेटी की इज्जत दांव पर हो तो एक दुबलेपतले इंसान में भी कितनी ताकत पैदा हो जाती है. अब्बा ने उस नौजवान को धुन कर रख दिया. यह मामला ऐसा था कि हर शख्स उन का साथ देने पर तैयार हो जाता. इसलिए राह चलते लोगों ने भी अब्बा का साथ दिया और वह नौजवान पिटपिटा कर वहां से चला गया. उस के बाद दोबारा वह दिखाई नहीं दिया.

वह तो फिर कभी मेरे रास्ते में नहीं आया, लेकिन आज मैं उसी से मुखातिब हूं. यह तुम ही थे, जिस ने मेरी जिंदगी के तालाब में पहला कंकड़ फेंका था. पहली बार दायरे बनाए थे, हालांकि तुम उस के बाद कभी दिखाई नहीं दिए. वक्त तुम्हें अपने बाजुओं में समेट कर किस तरफ ले गया, मुझे नहीं मालूम. लेकिन तुम ने जो कुछ भी किया, वह मुझे अभी तक याद है. और तुम…अब मैं तुम से मुखातिब हूं, तुम जो मेरे ट्यूटर बने थे. दुबलेपतले, चश्मा लगाए एक सभ्य नौजवान.

मैं ने नौवीं में पहुंच कर साइंस ले ली थी. खयाल था कि बड़ी हो कर डाक्टर बन जाऊंगी. आमतौर पर हर गरीब वालिदैन अपने बच्चों को डाक्टर बनाने के बारे में सोचते हैं या फिर उन्हें इंजीनियर बनाना चाहते हैं. वैसे उन्हें यह भी मालूम होता है कि इस दुनिया में हजार दूसरे काम भी हैं. बहरहाल मैं साइंस पढ़ रही थी.

मैं जहीन इतनी नहीं कि साइंस को बगैर किसी की मदद से पढ़ सकती और हमारी इतनी हैसियत भी नहीं थी कि हम कोई ट्यूटर रख सकते. एक दिन अब्बा के एक दोस्त ने उन्हें एक ट्यूटर की औफर कर दी. यह ट्यूटर उन के दोस्त का बेटा था.

‘‘भाई, अगर तुम चाहो तो मैं कामरान को तुम्हारे घर भेज दिया करूं.’’

‘‘वह तो ठीक है, लेकिन मैं…’’

‘‘ओहो, तुम से फीस कोई नहीं मांग रहा है. क्या मुझे तुम्हारी हालत मालूम नहीं है? तुम फीस की परवाह मत करो. बस बच्ची की तालीम पर ध्यान दो.’’

इस तरह कामरान ट्यूटर बन कर हमारे घर आने लगा. मैं ने महसूस किया कि मेरी खूबसूरती ने उसे बौखला कर रख दिया था. वह पहली मुलाकात में बस देखता ही रह गया और उस वक्त तक देखता रहा, जब तक अम्मी ने चाय की प्याली ला कर उस के सामने नहीं रख दी. वह खुद भी किसी बहाने से सामने वाली चौकी पर बैठ गईं.  उस 80 गज के क्वार्टर में पहले सिर्फ एक कमरा था, कमरे के साथ एक लाइन में किचन, बाथरूम और टायलेट बने हुए थे. लेकिन अब्बा ने दरवाजे के साथ एक छोटा सा कमरा और बनवा लिया था. उन दोनों कमरों के अलावा बाकी सेहन था. मैं उस सेहन में बैठ कर कामरान से पढ़ रही थी. एक चौकी भी उसी सेहन में रखी थी और अम्मी छालियां काटने के बहाने पानदान ले कर उस चौकी पर बैठ गई थीं.

गरीब घरानों की मांएं आमतौर पर इसी अंदाज से ट्यूटर और बेटी के सामने बैठ जाया करती हैं या फिर बहानेबहाने किसी को भी भेजती रहती हैं, जिस से यह मालूम हो सके कि वाकई पढ़ाई हो रही है या मोहब्बत का सबक याद कराया जा रहा है. कामरान ने उस दिन मुझे सिर्फ एक बार गहरी नजरों से देखा था. उस के बाद वह सिर झुकाए पढ़ाता रहा. कुछ देर बाद अम्मी को भी शायद उस की शराफत का अंदाजा हो गया था, इसलिए वह पानदान ले कर वहां से चली गईं. कई दिन बीत गए, अम्मी ने बैठना छोड़ दिया. कामरान अब किसी हद तक मुझ से इधरउधर की बातें कर लेता था. मैं ने महसूस किया कि वह बहुत देर तक मेरे पास बैठा रहता था. हुस्न में बहुत ताकत हुआ करती है.

यह वह जमाना था, जब मुझे अपनी उस ताकत का पूरी तरह ज्ञान हो गया था. आदमी के पास जब कोई दौलत आ जाए तो वह उसे बहुत सावधानी से बचाबचा कर रखता है. वक्त उसे दौलत के इस्तेमाल के तरीके सिखा देता है. मुझे भी यह आ गया था कि मैं किस तरह अपनी इस दौलत से फायदा उठा सकती हूं.

फिर एक दिन कामरान ने एक कदम आगे बढ़ा दिया. बातें वह करता ही था. उस दिन पहली बार मुझ से इजहारे मोहब्बत किया. क्या आप को इस पहली बार के जादू का अंदाजा है? यह ऐसा जादू होता है, जो आंखों के सामने खूबसूरत दृश्यों की चादर तान देता है. कानों में सुरीली घंटियां सी बजने लगती हैं. चेहरे पर चांद प्रकट हो जाता है. कान की लवें तपिश देने लगती हैं.

कामरान ने इजहारे मोहब्बत क्या किया, मेरे अंदर की दुनिया बदल गई. वह मेरी जिंदगी में पहला आदमी था, जिस ने सिर्फ देखते रहने पर संतोष न करते हुए एक कदम आगे बढ़ा दिया था. मैं लहक उठी थी. उस ने बड़े दिलकश अंदाज में कहा था, ‘‘मुझे नहीं मालूम कि मुझे इस किस्म की मोहब्बत करनी चाहिए कि नहीं, क्योंकि मैं तुम्हें पढ़ाने आता हूं. लेकिन जज्बा ऐसा होता है कि किसी बात की परवाह नहीं करता. इश्क अंधा होता है. मैं भी अंधा हो गया हूं. अगर तुम चाहो तो इस अंधे का हाथ थाम सकती हो, वरना हाथ को झटकने का भी अख्तियार है. तुम्हें याद होगा कि मैं ने जब तुम्हें पहली बार देखा तो मेरी क्या हालत हुई थी. जरीना! मैं तुम से मोहब्बत करने लगा हूं…बेपनाह मोहब्बत.’’

उस ने पहली बार मुझे अहसास दिलाया था कि हुस्न सिर्फ देखते रहने के लिए नहीं, बल्कि मोहब्बत करने के लिए हुआ करता है. हम लड़कियां पहली बार की मोहब्बत को नजरअंदाज नहीं करतीं. हर लड़की की जिंदगी में यह ‘पहली बार’ जरूर आता है. लिहाजा मैं भी उस की मोहब्बत का जवाब मोहब्बत से देने की पाबंद हो गई थी.

अब पढ़ाई के साथसाथ प्यार की बातें भी होने लगीं. इस किस्म की बातों का अपना अलग लुत्फ हुआ करता है. उसे पूरी तरह बयान भी नहीं किया जा सकता. बातें करते हुए डरेडरे अंदाज में इधरउधर देखना, एकदूसरे की खैरियत पूछना, एकदूसरे को अपनी मोहब्बत का बारबार यकीन दिलाते रहना, मौका देख कर एकदूसरे का हाथ थाम लेना, यह सब कुछ होता रहा. लेकिन बात इस से आगे नहीं बढ़ सकी.

इस किस्म की मोहब्बत का कोई साफ मकसद भी नहीं हुआ करता. उस वक्त यह खयाल नहीं होता कि इस सिलसिले को आगे किस तरह बढ़ाया जाए. तनहाई में मुलाकातें किस तरह की जाएं. कुछ लोग थोड़ी हिम्मत कर के अपने वालिदैन से अपना राज कह दिया करते हैं और ज्यादातर लोग खामोश रह कर अपने महबूब या महबूबा की शादी का नजारा करते हैं और बाद में कुछ दिनों तक उस की याद में आंसू बहाते रहते हैं. फिर वे खुद भी जमाने की भीड़ में कहीं गुम हो जाया करते हैं.

हमारी यह कहानी ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकी. एक बार अम्मी ने मुझे उस से इस किस्म की बातें करते हुए देखसुन लिया और उस दिन बेचारे की छुट्टी कर दी गई. अम्मी का खयाल था कि यह सिलसिला एकतरफा है, यानी वह यह समझ रही थीं कि जो कुछ भी हुआ है, वह उसी मास्टर की तरफ से हुआ है. हर मां अपनी औलाद के लिए इसी किस्म की खुशफहमी में रहती है. उस के बाद कामरान से मेरी मुलाकात नहीं हो सकी. 1-2 बार मैं ने उस को देखा, लेकिन वह भी दूर से. बहुत उदास नजर आ रहा था. तो कामरान, आज मैं तुम से इसलिए मुखातिब हूं कि तुम ने पूरी तरह मेरे दिल में मोहब्बत के जज्बात जगाए थे.

कामरान के बाद जिंदगी कुछ उदास और बेजार सी हो गई. यह और बात है कि मुझ को अपनी अहमियत का पूरी तरह अंदाजा हो गया था. यह भी अजीब बात थी कि हसीना मेरी तरह हरगिज नहीं थी. देखने वाले मेरे बारे में यह कहा करते थे कि हसीना मेरा नाम होना चाहिए था. हसीना एक आम सी लड़की थी.

फिर वाकयात की रफ्तार में तेजी आ गई. कभीकभी ऐसा होता है कि वाकयात बहुत सुस्त रफ्तार हो जाते हैं. एकएक लम्हा बोझिल होने लगता है और कभीकभी पंख लगा कर उड़ने लगता है. एक दिन अचानक अब्बा का इंतकाल हो गया. घर का एक कोना हमेशा के लिए खाली हो गया. वह कोना मोहब्बत का था, हिफाजत के अहसास का था. उन की मौत के बाद पता चला कि जिंदगी कितनी बेरहम, कितनी दुश्वार है. यह तो रगों से लहू निचोड़ कर रगों को खुश्क कर देती है. हमारे तालीमी खर्चे थे और भूख थी, जो मौत की ही तरह बेरहम हुआ करती है.

मैं उस जमाने में मैट्रिक कर चुकी थी. लेकिन अब्बा के जाते ही तालीम का सिलसिला तोड़ देना पड़ा. इंसान पहले दिन से भूख को तरजीह देता आया है तो भूख की मांग यह थी कि तालीम छोड़ दो. अच्छे लिबास न इस्तेमाल करो और अच्छी जिंदगी से बाज आओ. हम ने यही किया, लेकिन यह भी कब तक चल सकता था?

अब सवाल यह था कि किया क्या जाए? दोनों भाइयों ने नौकरी की तलाश शुरू कर दी, लेकिन नौकरी इतनी आसानी से कहां मिल सकती थी और वह भी उन को, जिन का बाप एक मामूली हैसियत का इंसान रहा हो और वह मर गया हो.

हम सब सिसकती हुई जिंदगी गुजार रहे थे कि एक दिन एक लंबी सी स्याह कार हमारे दरवाजे पर आ कर रुकी. वह पहला मौका था कि हमारे दरवाजे पर कोई गाड़ी आई थी. दरवाजों की ओट से चेहरे झांकने लगे. बच्चों ने कार के गिर्द घेरा डाल दिया. पूरे मोहल्ले में एक शोर सा बरपा हो गया. हम जल्दी से दरवाजे पर आ गए. गाड़ी से उतरने वाली एक मोटी सी औरत थी, जिस ने कीमती साड़ी पहन रखी थी. उस के हाथों में सोने की चूडि़यां थीं. वह सीधे हमारे दरवाजे आ गई. उस की गाड़ी में एक बावर्दी ड्राइवर बैठा था.

‘‘तुम नसीमा हो न?’’ उस मोटी औरत ने अम्मी की तरफ इशारा किया.

‘‘हां,’’ अम्मी ने जल्दी से अपनी गरदन हिला दी, ‘‘लेकिन आप…’’

‘‘मैं साजिदा हूं,’’ उस ने कहा, ‘‘तुम मुझे नहीं जानती, लेकिन मैं तुम से अच्छी तरह वाकिफ हूं.’’

अम्मी असमंजस में पड़ गईं, फिर भी उन्होंने एक तरफ हट कर उसे रास्ता दे दिया. वह मोटी औरत नाकभौं चढ़ाई हुई अंदर आ गई. उसे शायद घर से उठने वाली बू पसंद नहीं आई थी या इतने छोटे घर में उस का दम घुट रहा था. अम्मी ने उसे सेहन में रखी हुई चौकी पर बैठा दिया.

‘‘मैं अभी तक आप को पहचान नहीं सकी.’’ अम्मी ने कहा.

अम्मी की बात का जवाब देने के बजाय उस की निगाहें पूरे घर का जायजा ले रही थीं. मैं और मेरे सारे बहनभाई वहीं खड़े थे. मैं उस की निगाहों के अंदाज से शर्मिंदगी महसूस कर रही थी. वह छोटा सा घर उस की शान के काबिल नहीं था. जिस औरत के पास इतनी शानदार गाड़ी हो, उस का घर भी यकीनन बहुत शानदार होगा. चारों तरफ का जायजा लेने के बाद उस ने अपनी निगाहें मुझ पर गड़ा दीं. मुझे उस की निगाहों से कुछ बेचैनी सी होने लगी थी.

‘‘आप के शौहर के औफिस में शेरवानी साहब काम करते थे. आप ने उन का नाम जरूर सुना होगा?’’

अम्मी को याद आ गया, ‘‘हां हां, याद आया.’’

‘‘मैं उन की बीवी हूं,’’ उस औरत ने बताया, ‘‘मैं तो बहुत दिनों से यहां आने की सोच रही थी, लेकिन फुरसत ही नहीं मिलती थी. आज फुरसत मिली है तो आप लोगों से मिलने चली आई हूं.’’

‘‘आप की बहुत मेहरबानी.’’ अम्मी ने कहा और मेरे एक भाई को कोल्डड्रिंक लाने के लिए दौड़ा दिया.

वह औरत कुछ देर तक बातें करने के बाद चली गई. जातेजाते उस ने हम सब के हाथों पर 100-100 के नोट भी रखती गई. उस की कृपा दृष्टि मुझ पर ज्यादा ही महसूस हो रही थी. मुझे तो यों महसूस हो रहा था, जैसे वह सिर्फ मुझ से ही मिलने आई थी. वह चली तो गई, लेकिन अम्मी को परेशान कर गई. मैं ने महसूस किया कि उस के जाने के बाद वह बहुत देर तक उलझी रही थीं. मैं अम्मी के बाद घर में सब से बड़ी थी, इसलिए मुझे उन की परेशानी पूछने का हक हासिल था.

‘‘मुझे इस औरत का यहां आना अच्छा नहीं लगा.’’ अम्मी बोलीं.

‘‘क्यों? वह तो बहुत अच्छी औरत लग रही थी.’’ मैं ने न जाने क्यों उस की हिमायत की, ‘‘जरा सोचें, हमारे घर में आता ही कौन है और वह भी इतने पैसे वाली औरत…कितनी शानदार गाड़ी थी उस की और उस के हाथों में सोने की चूडि़यां कितनी थीं.’’

‘‘यही तो परेशानी की बात है कि यह सब कुछ जायज नहीं है.’’ अम्मी ने कहा.

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘ओहो, अब तू मुझ से बहस करेगी?’’

‘‘नहीं अम्मी, मैं बहस नहीं कर रही हूं. आप मुझे बताएं न. मैं अब बड़ी हो गई हूं. जब आप ही मुझे अच्छाबुरा नहीं बताएंगी तो कौन बताएगा?’’

‘‘तेरे अब्बा बताया करते थे कि शेरवानी साहब अच्छे आदमी नहीं हैं,’’ अम्मी ने कहा, ‘‘उन के पास बेपनाह दौलत है, जबकि जाहिर है नौकरी से इतनी दौलत कभी नहीं आ सकती.’’

‘‘बस अम्मी, इतनी सी बात? हो सकता है शेरवानी का नौकरी के अलावा और कोई कारोबार हो या जायदाद हो.’’

‘‘अच्छा, अच्छा… अब तू खामोश रह.’’

उस रात मैं और हसीना सोने से पहले उसी की बातें करती रही थीं.

वह खातून एक बार फिर मेरे घर आई. इस बार भी उस के आने से मोहल्ले में हंगामा बरपा हो गया. अम्मी कुछ उखड़ीउखड़ी थीं, लेकिन वह ऐसी औरत थी कि उस ने अम्मी के रवैए का बुरा नहीं माना. उस का ध्यान इस बार भी मुझ पर ही था और जहां तक मेरा सवाल था, मैं उस की दौलत की चमकदमक से प्रभावित हो चुकी थी. उस दिन उस ने एक अजीब हरकत की. उस ने उस वक्त मेरे हाथ में कागज का एक पुरजा थमा दिया, जब अम्मी उस के लिए चाय बनाने गई थीं. वह मुझे कागज देते हुए बोली, ‘‘इस को जल्दी से अपने पास रख लो. इस में मेरा पता है. किसी दिन आ जाना. तुम से जरूरी बात करनी है, लेकिन किसी को पता न चले.’’

मैं ने न जाने क्या सोच कर खामोशी अख्तियार कर ली. मैं ने अम्मी को भी नहीं बताया. अलबत्ता तनहाई में सोचती रही थी कि उस ने मुझे अपने घर क्यों बुलाया है? मैं उस के किस काम आ सकती हूं? मैं तो एक गरीब लड़की हूं और उस के लिए किसी भी तरह फायदेमंद नहीं हो सकती हूं. होना तो यह चाहिए था कि मैं उस की पेशकश को कबूल न करती. मैं ने अम्मी के विश्वास को कभी ठेस नहीं पहुंचाई थी, लेकिन उस की चमकदमक ने मुझे प्रभावित कर रखा था. इस के अलावा मेरे दिल में उत्सुकता भी जाग उठी थी. आखिर मैं ने बहुत सोचविचार के बाद उस के घर जाने का फैसला कर लिया.

अब सवाल यह था कि घर से किस तरह निकलूं. तालीम का सिलसिला खत्म हो चुका था. इसलिए मुझे अम्मी से झूठ बोलना पड़ा. मैं ने अम्मी से किसी सहेली के घर जाने का झूठ बोला था. और यह मेरी जिंदगी का पहला झूठ था. झूठ बोलते हुए शुरूशुरू में थोड़ी सी झिझक होती है, निगाहें झुकी रहती हैं, जुमले टूटटूट जाते हैं. फिर 2-4 बार के बाद यह झिझक खत्म हो जाती है. लहजे में आत्मविश्वास पैदा हो जाता है.

मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ. मैं झिझक रही थी, मेरे जुमले टूट रहे थे, लेकिन अम्मी को कोई शक नहीं हुआ, क्योंकि उन्हें मुझ पर विश्वास था. मैं घर से निकल पड़ी. उस औरत का पता मेरी मुट्ठी में दबा हुआ था. वह मेरा पहला सफर था. अब तो यह पता ही नहीं चलता कि मैं कहीं ठहरी हूं या सफर में हूं. बहरहाल, मैं उस के आलीशान मकान में पहुंच गई. उस मकान को देख कर आंखें फटी रह गई थीं. यकीन नहीं आता था कि मकान इतना बड़ा भी होता है. मैं जब मकान में दाखिल हुई तो मेरे जिस्म पर कंपकंपी छाई हुई थी.  मैं ने

अब तक अपने हुस्न से दूसरों को सम्मोहित होते देखा था, लेकिन उस वक्त दौलत की ताकत ने मुझे सम्मोहित कर दिया था. उस मकान में ऐसीऐसी चीजें थीं, जिन को मैं ने ख्वाब में भी नहीं देखा होगा, क्योंकि ख्वाब भी तजुर्बात से पैदा होते हैं. और मुझे कीमती कालीनों, खूबसूरत फानूसों, आरामदेह सोफे वगैरह का कहां तजुर्बा था? वह औरत मेरे साथसाथ चल रही थी. उस ने मुझे पूरे मकान की सैर करवाई. उस के होंठों पर एक ऐसी गहरी मुसकराहट थी, जिस का मतलब उस समय समझ में नहीं आया था. मकान देखने के बाद मैं उस के साथ लंबेचौड़े ड्राइंगरूम में आ गई.

‘‘चलो, बैठ जाओ,’’ उस ने सोफे की तरह इशारा किया, ‘‘तुम थक गई होगी.’’

मैं चुपचाप बैठ गई. नरमनरम सोफा ऐसा लग रहा था, जैसे ढेर से झाग ने मुझे समेट लिया हो. मेरे जिस्म की कंपकंपी अभी तक कम नहीं हुई थी.

‘‘घर कैसा लगा तुम्हें?’’ उस ने पूछा.

‘‘बहुत अच्छा,’’ मैं ने अटकते हुए जवाब दिया, ‘‘मैं ने ऐसा घर पहले कभी नहीं देखा था.’’

‘‘अगर तुम चाहो तो यह सब कुछ तुम्हारा हो सकता है.’’ उस ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘क्या?’’ मैं ने आंखें फाड़ कर उस की तरफ देखा, ‘‘मेरा…यह आप क्या कह रही हैं?’’

‘‘हां तुम्हारा…देखो जरीना, मैं ने एक खास मकसद से तुम्हें यहां बुलाया है, क्योंकि मैं समझती हूं, तुम एक समझदार लड़की हो. यहां जो कुछ देखोगी और सुनोगी, उस का जिक्र किसी से नहीं करोगी. देखो, आज हालात बहुत बदल गए हैं. आज की सब से बड़ी सच्चाई दौलत है. दौलत, जो पेट भर खाने को देती है. दौलत, जो लिबास मुहैया कराती है. दौलत, जो समाज में इज्जत बढ़ाती है. बाकी जो है, सब बकवास है. तुम्हारे हुस्न की मिसाल मिलनी मुश्किल है. लेकिन गरीबी ने तुम्हारा क्या हाल कर दिया है. तुम्हारे खूबसूरत गालों पर भूख ने जर्दी की तह जमा दी है. तुम्हारी खूबसूरत आंखें वीरान होने लगी हैं. तुम्हारा शानदार जिस्म अच्छे लिबास को तरस रहा है. क्या यह सब तुम्हें अच्छा लगता है?’’

‘‘नहीं..,’’ मैं ने अनजाने तौर पर अपनी गरदन हिला दी.

‘‘मैं जानती थी कि तुम्हारा यही जवाब होगा,’’ उस ने कहा, ‘‘आहिस्ताआहिस्ता आने वाली मौत किस को अच्छी लगती है और गरीबी ऐसी ही मौत है. तुम को शायद यह अंदाजा न हो कि मैं ने तुम्हारे यहां सिर्फ तुम्हारी वजह से आनाजाना शुरू किया है. मेरे शौहर शेरवानी ने तुम्हारा जिक्र किया था. मेरे शौहर और तुम्हारे अब्बू एक ही औफिस में काम करते थे. यह नौकरी तो सिर्फ एक आड़ है, वरना मेरे शौहर को नौकरी की कोई जरूरत नहीं है. तो एक दिन शेरवानी तुम्हारे अब्बू के साथ तुम्हारे घर गए थे. वहां उन्होंने तुम्हें देख लिया था. फिर कुछ दिनों बाद तुम्हारे अब्बू का इंतकाल हो गया और मुझे तुम्हारे घर जाने का मौका मिला. मैं यह चाहती थी कि मैं तनहाई में कुछ देर तुम से बातें कर लूं. सो आज मौका मिल गया है.’’

‘‘लेकिन क्यों?’’ मैं ने हैरान हो कर पूछा. उस वक्त मेरी घबराहट कुछ कम हो गई थी.

‘‘इस सवाल का जवाब तुम्हें आईना देगा. तुम आईने में अपने आप को देख कर सवाल करो. आईने से यह पूछो कि क्या इतनी खूबसूरत आंखें वीरान होने के लिए हैं? क्या यह नायाब जिस्म इसलिए बनाया गया है कि अच्छे लिबास को तरसता रहे? क्या यह तरोताजा चेहरा भूख का सदमा बरदाश्त करने के लिए है? क्या तुम इसलिए हो कि 80 गज के एक घुटन भरे क्वार्टर में अपनी जिंदगी बिता दो? क्या तुम्हारा बेमिसाल हुस्न इसलिए है कि एक मामूली दर्जे का गंदा, कंगाल सा आदमी तुम्हें ब्याह कर ले जाए और तुम उस के गंदे घर में सिसकते हुए सारी जिंदगी गुजार दो? बताओ, क्या तुम्हें अच्छी जिंदगी पसंद नहीं है? क्या तुम यह सब हासिल करना नहीं चाहती, जो इस वक्त तुम्हारे इर्दगिर्द फैला हुआ है?’’

मैं उस की बातों के सम्मोहन में फंस गई थी. उस ने मुझे एक दूसरी किस्म के अहसास में मुब्तिला कर दिया था. इस से पहले लोगों ने यह तो अहसास दिला दिया था कि मैं बेहद हसीन हूं, लेकिन किसी ने यह नहीं बताया था कि ऐसा हुस्न 80 गज के क्वार्टर में नहीं रहता है. ऐसे हुस्न के लिए एक खूबसूरत मकान और उम्दा फर्नीचर चाहिए. इसलिए मुझे उस की बातें अच्छी लग रही थीं.

‘‘बताओ, क्या तुम यह सब नहीं चाहतीं?’’ उस ने फिर सवाल किया.

‘‘क्यों नहीं चाहती, मैं भी इंसान हूं. मेरी भी ख्वाहिशें हैं.’’ मैं ने कहा.

‘‘शाबाश! असल चीज इरादा है, ख्वाहिश है. अगर इरादा पुख्ता और ख्वाहिश में शिद्दत हो तो सब कुछ हासिल किया जा सकता है.’’

‘‘किस तरह?’’

‘‘हां, इस सवाल का जवाब जरा मुश्किल है, क्योंकि हो सकता है कि तुम्हारा जमीर जाग उठे. इज्जत वगैरह का खयाल आ जाए और तुम नाराज हो कर चल दो. मुझे मालूम है कि मैं ने अगर बता दिया तो वही होगा, जो मैं कह रही हूं यानी तुम नाराज हो जाओगी, मुझे बुराभला कहोगी, गालियां दोगी, लेकिन मुझे तुम्हारी नाराजगी की परवाह नहीं होगी. मैं बुरा नहीं मानूंगी, क्योंकि शुरूशुरू में ऐसा ही होता है. लेकिन इस घर के दरवाजे एक शानदार भविष्य ले कर तुम्हारे लिए खुले रहेंगे. तुम जब आना चाहो, यहां आ सकती हो.’’

‘‘आप बताएं तो सही, मुझे करना क्या होगा?’’

उस ने जो कुछ बताया, उस ने मेरे पूरे बदन में आग भर दी थी. मैं नहीं कह सकती थी कि वह आग लज्जत दे रही थी या उस की तपिश में तकलीफ हो रही थी. एक अजीब सी हालत थी. अहसास हो रहा था कि शायद मैं ने यहां आ कर गलती की है या शायद कोई गलती नहीं की. आदमी के पास जब एक कीमती शै है तो उसे ज्यादा से ज्यादा कीमत पर बेचने का हक हासिल है.

‘‘तो यह है दौलत हासिल करने का तरीका.’’ मैं ने अपनी हैरानी पर काबू पाते हुए पूछा.

‘‘हां, मुझे मालूम है कि इस वक्त तुम्हारी क्या हालत हो रही होगी. हमारे पास जबरदस्ती नाम की कोई चीज नहीं है. यहां सब कुछ अपनी मरजी से हुआ करता है. मैं यह बता दूं कि इस समाज में अच्छाईबुराई नाम की कोई चीज नहीं है. सब बकवास करते हैं. तुम इस मकान में आने वालों को देख लो तो तुम्हारे होश उड़ जाएं. ये वे लोग हैं, जिन के चर्चे अखबारों और रिसालों में होते हैं, जिन की पाकीजगी की कसमें खाई जाती हैं. जिन पर कौम विश्वास करती है. सब यहां आते हैं. रात के अंधेरों में आते हैं और सुबह होने से पहले चले जाते हैं, ताकि उन की पारसाई का भरम कायम रहे.

‘‘तुम इस शहर में इतने खूबसूरत मकान और गाडि़यां देखती हो तो यह सब कहां से आता है? किसी ने हलाल की कमाई से कोई महल नहीं बनवाया है. तुम मुझे किसी एक का नाम बता दो. अब जायज और नाजायज एकदूसरे में गड्डमड्ड हो कर रह गए हैं तो इस मौके का फायदा क्यों न उठा लिया जाए. मैं फिर यह कह रही हूं कि तुम पर जबरदस्ती नहीं कर रही, क्योंकि यह सौदा अपनी खुशी से होता है. तुम घर जाओ और जब तुम्हें जमीर और इज्जत वगैरह बेकार की बातें लगने लगें तो यहां चली आना. यह घर एक शानदार भविष्य के साथ तुम्हारा इंतजार करेगा.’’

मैं वहां से घर आ गई. उस औरत की बातों ने मुझे एक दोराहे पर खड़ा कर दिया था. बरसों की पढ़ाईलिखाई और घर के माहौल ने मुझे यह याद करा दिया था कि मैं ऐसी दौलत, ऐसी जिंदगी पर लात मार दूं. जमीर बहुत आला चीज है. औरत का सब कुछ उस की इज्जत हुआ करती है. लेकिन दूसरी तरफ उस की बातें मुझे अहसास दिला रही थीं कि शायद वह ठीक ही कह रही थी. हो सकता है कि आप को भी यह सब नागवार गुजर रहा हो. आप सोच रहे हों कि मुझे उस औरत को गाली दे कर वापस आ जाना चाहिए था. लेकिन क्यों?

मेरे घर में फाके होते हैं. हम लोग रूखी रोटी चाय के साथ भिगोभिगो कर खाते हैं तो क्या उस वक्त आप हमारे जमीर की दाद देने के लिए आते हैं? नहीं, आप ऐसा नहीं करते. आप को तो अहसास भी नहीं होता और जब हम अपनी मंजिल तय कर के अपना सफर शुरू कर देते हैं, उस वक्त आप समाज के ठेकेदार बन कर हमारे सामने आ जाते हैं. लेकिन ऐसे ठेकेदार कि हमारे खिलाफ तकरीर करते हुए आप की निगाहें हमारे जिस्मों को तौलती रहती हैं. खैर, तो मैं ने किसी से जिक्र नहीं किया, क्योंकि मुझे उस रास्ते पर सफर नहीं करना था. इस दौरान घर की हालत और भी बिगड़ चुकी थी. भाइयों ने मायूसी के बाद आवारागर्दी शुरू कर दी थी.

एक दिन अम्मी ने अपने दिल पर काबू करते हुए मुझे एक बात बताई, ‘‘बेटी, मेरा दिल तो नहीं चाहता, लेकिन क्या करूं? पेट की आग कम ही नहीं होती. दोनों बेटे तो किसी काम के नहीं रहे. सौ दफा समझा चुकी हूं कि जब अच्छी नौकरी नहीं मिल रही है तो कोई और काम कर लो. अब भूख और कंगाली बरदाश्त नहीं होती. मोहल्ले में जो अजीम साहब रहते हैं न, वह कल आए थे मेरे पास. बता रहे थे कि उन्होंने तुम्हारे लिए किसी फर्म में नौकरी की बात कर ली है. अभी 7 सौ रुपए मिलेंगे. बाद में तनख्वाह बढ़ा दी जाएगी.’’

मैं ने तो नौकरी करने का कभी तसव्वुर भी नहीं किया होगा. अम्मी यह क्या कह रही थीं. मैं इनकार भी नहीं कर सकती थी. घर की मजबूरियां मेरे सामने खुली हुई किताब की तरह थीं, लिहाजा मैं ने नौकरी के लिए हामी भर दी. 7 सौ ही सही, उस में रूखीसूखी रोटी तो आ सकती थी. मेरे दोनों भाइयों को जब मेरी नौकरी के बारे में मालूम हुआ तो वे चुप रह गए. और ऐसा होना भी चाहिए. अगर वे ऐतराज करते तो घर का गुजारा कैसे होता?

तीसरे दिन मैं उस फर्म की फैक्ट्री में पहुंच गई. वहां मेरे अलावा और लड़कियां भी थीं. लेकिन वहां मेरा पहुंचना ऐसा था, जैसे आसमान से चांद उतर आया हो या फैक्ट्री में बहार आ गई हो. मैं उन के दरम्यान किसी शहजादी की तरह थी. पैकिंग के कागजात मेरे खूबसूरत हाथों में आ कर जगमगाने लगते थे. मेरे पास हुस्न की जो ताकत थी, उस ताकत ने फैक्ट्री में अपना हुनर दिखाना शुरू कर दिया था और उस फैक्ट्री के 2 आदमी मेरी जिंदगी में दाखिल हो गए. यह मेरे सफर का एक और पड़ाव था. अंदाजा हो गया कि रिश्ते किस झूठ के नाम हैं. असल चीज है हविस और दौलत. जिंदगी में इस के अलावा और कुछ नहीं है. हविस, जो हमेशा मुझ जैसी लड़की के पीछे लगी रहती है और दौलत जिस से रोटी, कपड़ा और मकान खरीदा जा सकता है.

और आज मैं तुम दोनों से भी मुखातिब हूं. तुम राशिद अली, जो इस फैक्ट्री के मालिक के बेटे थे और इफ्तखार अली, जो इस फैक्ट्री के मालिक थे. मैं तुम दोनों के दरम्यान एक ऐसी नेमत की तरह थी, जिस को तुम दोनों हासिल करना चाहते थे. खुद बताओ, कहां गया तुम्हारा रिश्ता? बापबेटे का रिश्ता तो बहुत अजीम हुआ करता है. फिर तुम दोनों को क्या हो गया था? तुम दोनों ने मेरी खातिर एकदूसरे से रकाबत तक मोल ले ली थी. पूरी फैक्ट्री तुम दोनों का मजाक उड़ाती थी और मैं बदनाम हुई जा रही थी. तुम दोनों ने बारीबारी से मुझे इतनी सुविधाएं दीं कि मैं खुद को हवाओं में महसूस करने लगी थी.

आज मैं पूछती हूं कि तुम दोनों ने ऐसा क्यों किया? मेरी खातिर तुम्हारे दरम्यान बापबेटे की शिनाख्त क्यों खत्म हो गई थी? क्या हुस्न ऐसा जादू है, जो आंखों पर पट्टियां बांध देता है? वैसे मैं तुम दोनों की शुक्रगुजार हूं. अगर तुम ऐसा न करते तो अब तक मैं और मेरे घर वाले भूख से हलाक हो चुके होते. उस फैक्ट्री में काम करते हुए तीसरा दिन था कि एक औरत ने आ कर बताया कि राशिद अली मुझ से मिलना चाहता है. मैं उस वक्त तक राशिद अली को नहीं जानती थी. मेरे पूछने पर उस ने बताया कि राशिद अली उस फैक्ट्री के मालिक का बेटा है और फैक्ट्री की देखभाल उसी के जिम्मे है.

मेरी समझ में नहीं आया कि उस ने मुझे क्यों बुलाया है. शायद मेरे काम में कोई कोताही थी या वह मुझे किसी और काम में लगाना चाहता था. बहरहाल मैं उस के साथ हो ली. वह औरत मुझे एक शानदार कमरे में पहुंचा कर वापस चली गई. उस वक्त उस कमरे में सिवाय दौलत के इजहार के और कुछ नहीं था. यह दौलत कैसी चीज थी, जो मुझे प्रभावित करने पर तुली हुई थी. वह मेरे सामने रूप बदलबदल आ रही थी.

मैं उस औफिस को आंखें फाड़फाड़ कर देखती रही. सब कुछ इतना कीमती था कि सिर्फ उसी औफिस में मेरी जिंदगी भर की कमाई से कई गुना ज्यादा रकम लगी हुई थी. मैं अभी उन सब चीजों को देख रही थी कि राशिद कमरे में दाखिल हुआ. वह एक खूबसूरत नौजवान था. अच्छी सूरतशक्ल के बावजूद उस के चेहरे पर एक खास किस्म की अय्यारी का अक्स था. वह मेरे सामने आ कर खड़ा हो गया. मैं उसे देख कर सिटपिटा गई.

‘‘मैं राशिद अली हूं,’’ उस ने कहा, ‘‘यह फैक्ट्री मेरी है और मैं ने तुम्हें इसलिए बुलाया है कि तुम मुझे वहां काम करती हुई अच्छी नहीं लग रही थीं.’’

‘‘जी, क्या कहा आप ने?’’

‘‘हां, देखो, मैं बहुत साफ कहने वाला आदमी हूं. अपने दिल में कुछ छिपा कर नहीं रखता. मैं यह कह रहा हूं कि कुदरत ने तुम जैसी हसीना को इसलिए नहीं बनाया कि तुम मामूली से काम करती रहो. तुम्हें तो हुकूमत करने के लिए बनाया गया है.’’

‘‘पता नहीं, आप क्या कह रहे हैं?’’ मैं जल्दी से बोली.

वैसे मैं अच्छी तरह समझ गई थी कि वह क्या कह रहा था. वह मेरे हुस्न की तारीफ कर रहा था और मेरे पास इस ताकत के अलावा और था ही क्या, गोया उस ने भी मुझे मेरी ताकत का अहसास दिला दिया था. अपने हुस्न की तारीफ सुनते हुए मुझे अच्छा लग रहा था. इस से पहले जो लोग मेरी जिंदगी में आए और जिन्होंने मेरे हुस्न को सराहा था, वे मेरे ही तबके से ताल्लुक रखते थे. लेकिन राशिद अली एक दौलतमंद इंसान था. उस ने न जाने कितने मुल्कों की सैर की होगी. कितनी लड़कियों से उस का वास्ता पड़ा होगा और जब वह मेरे हुस्न की तारीफ कर रहा था तो इस का मतलब यह था कि मैं वाकई बेहद हसीन थी. राशिद के पास अगर दौलत थी तो मेरे पास हुस्न था. उस कमरे में हम दोनों बराबर के थे.

मैं उस के सामने तन कर खड़ी हो सकती थी. उसे अपनी अहमियत का अहसास दिला सकती थी.

‘‘आप ने मुझे क्यों बुलाया है?’’

‘‘सिर्फ यह कहने के लिए कि तुम आज से पैकिंग नहीं करोगी, बल्कि तुम्हें उस डिपार्टमेंट का इंचार्ज बना दिया गया है,’’ उस ने कहा, ‘‘और वक्त गुजरने के साथसाथ तुम्हारी और भी तरक्की होती रहेगी. मैं जानता हूं कि तुम में कितनी खूबियां हो सकती हैं.’’

मैं ने सोचा, उस से कह दूं कि खूबियां मुझ में नहीं, मेरे हुस्न में हैं. लेकिन गरदन झुका कर खामोश खड़ी रही. उस दिन के बाद से फैक्ट्री में काम करने वाली लड़कियां मुझ से ईर्ष्या करने लगी थीं. यह पहला मौका था कि किसी लड़की को इतनी जल्दी तरक्की मिल गई थी. लेकिन शायद उस फैक्ट्री में मुझ जैसी खूबसूरत लड़की भी पहली बार आई थी. मेरी तनख्वाह फौरी तौर पर 7 सौ से 12 सौ कर दी गई थी.

कुछ दिनों बाद मुझे फिर बुलाया गया. इस बार बेटे ने नहीं, बल्कि बाप ने बुलाया था. बापबेटे में ज्यादा फर्क दिखाई नहीं देता था. उस ने भी गुफ्तगू की शुरुआत मेरे हुस्न की तारीफ से की थी, लेकिन उस का अंदाज अलग था. उस की उम्र ने उसे होशबंदी सिखा दी थी. इसलिए वह जानता था कि किसी लड़की के लिए किस अंदाज का जाल बिछाना चाहिए.

‘‘मैं तुम्हें देखते ही समझ गया था कि तुम ऐसी लड़की नहीं हो, जो फैक्ट्री में रह कर अपनी जिंदगी तबाह कर दे,’’ उस ने कहा, ‘‘इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम औफिस में आ जाओ. वहां तुम्हारी तरक्की की भी रोशन उम्मीदें हैं.’’

‘‘लेकिन सर, मुझे तो औफिस का कोई काम नहीं आता.’’ मैं ने कहा.

‘‘इस से कोई फर्क नहीं पड़ता,’’ इफ्तखार मुसकरा दिए, ‘‘शुरूशुरू में तो किसी को भी कुछ नहीं आता. आहिस्ताआहिस्ता सब कुछ आ जाता है.’’

फैक्ट्री की लड़कियों ने जब यह खबर सुनी तो मेरे खिलाफ उन के गुस्से की आग और तेज हो गई, लेकिन मुझे उन की परवाह नहीं थी. मैं ने तो अपना सफर शुरू कर दिया था और सफर में कामयाबी की शर्त यह होती है कि न तो पीछे मुड़ कर देखा जाए और न ही झिझक कर पांव रोक दिए जाएं. औफिस में मेरी तनख्वाह 15 सौ रुपए माहवार कर दी गई. हमारे सभी मसले हल हो सकते थे, लेकिन यह सिलसिला ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सका. औफिस में एक दिन कयामत आ गई. उन दोनों की बीवियां औफिस चली आईं. क्या तमाशा था कि सासबहू दोनों एक ही लड़की से परेशान हो कर औफिस चली आई थीं. मैं सास की भी सौतन हुई जा रही थी और बहू की भी. औफिस में अच्छाखासा हंगामा बरपा हो गया था और उसी दिन मुझे नौकरी से निकाल दिया गया. मैं आसमान में उड़तेउड़ते अचानक जमीन पर आ गिरी.

घर पहुंची तो मुझ से पहले मेरी बदनामी वहां पहुंच चुकी थी. किसी ने मेरे घर वालों को सूरतेहाल से आगाह कर दिया था. पूरा घर मेरे खिलाफ खड़ा था. खासतौर पर दोनों भाई बहुत नाराज हो रहे थे.

‘‘इस में मेरा क्या कुसूर है?’’ मैं ने उन लोगों से कहा, ‘‘अगर मैं खूबसूरत हूं तो यह खूबसूरती मैं ने अपनी मरजी से तो हासिल नहीं की. मेरा तो सिर्फ इतना कुसूर है कि मैं ने हालात से फायदा उठाते हुए तरक्की करनी चाही थी. इस के अलावा मैं ने कुछ नहीं किया.’’

‘‘लेकिन जो कुछ भी हुआ, वह हमारी इज्जत और शान के खिलाफ है.’’ एक भाई गुस्से से बोला.

‘‘आप लोग किस इज्जत और शान की बात कर रहे हैं?’’ मैं ने तल्ख हो कर कहा, ‘‘फर्ज करें, अगर मैं फैक्ट्री में काम करती और हर महीने अपनी तनख्वाह ला कर दिया करती और पूरा घर उस तनख्वाह से परवरिश पाता रहता तो क्या इज्जत और शान कायम रहती कि लड़की घर चला रही है, जबकि यह काम मर्दों का है?’’

‘‘लेकिन अब क्या होगा?’’ अम्मी ने परेशान हो कर अपने आप से सवाल किया.

मैं उन की परेशानी के मतलब से वाकिफ हो चुकी थी. उन की परेशानी इसलिए नहीं थी कि मैं बदनाम हो चुकी थी, बल्कि इस परेशानी की वजह यह थी कि नौकरी खत्म होने के बाद गुजारा किस तरह होगा. उस वक्त मुझे अहसास हो रहा था कि गरीबी जब हद से गुजर जाए तो हर वह शख्स काबिलेकबूल हो जाता है, जिस के हाथ में नोट हों, दूसरे हाथ में चाहे हविस की तलवार ही क्यों न हो. यह एक बेरहम हकीकत है और हमें उसे स्वीकार भी कर लेना चाहिए. मैं ने महसूस किया कि उस दिन के बाद से अम्मी कुछ उखड़ीउखड़ी रहने लगी थीं. दोनों भाई भी जराजरा सी बात पर नाराज हो रहे थे. हसीना ने मुंह फुला रखा था.

अम्मी ने अच्छे वक्त के कुछ जेवर बचा रखे थे. उन्हें भी बेच दिया गया. मैं कभीकभी खुद को आईने में देखती तो अपने आप पर तरस आने लगता था. खूबसूरत आंखें जो मुरझाने के लिए नहीं थीं, मुरझाई जा रही थीं. दिलकश रंग फीका पड़ता जा रहा था. कुदरत ने मुझे एक नेमत तो दी, लेकिन अफसोस, मैं उस की हिफाजत नहीं कर पा रही थी. फिर मेरी मुलाकात फिरोज से हो गई. यह मेरी आखिरी मुलाकात थी. उस के बाद मैं ने किसी से मुलाकात नहीं की. सिर्फ समझौता किया, सौदा किया. वह मेरे अब्बा के किसी दोस्त का लड़का था, जो किसी औफिस में मामूली सा नौकर था. इसलिए उस के जिस्म पर लिबास भी मामूली हुआ करता था. इस के बावजूद वह मुझे पसंद आ गया, क्योंकि पसंदीदगी का अमल हिमाकत से शुरू हो कर शर्मिंदगी पर खत्म हो जाता है.

वह सिर्फ एक बार हमारे घर आया था, लेकिन मुझ से मिलने के बाद उस का आनाजाना शुरू हो गया था. जब उस ने मेरी तरफ मोहब्बत का हाथ बढ़ाया तो मैं न जाने क्यों, उस के बढ़े हुए हाथ को झटक न सकी. कैसेकैसे लोगों ने मुझे हासिल करने की कोशिश की थी, लेकिन मैं ने उस का हाथ कबूल कर लिया था, जो एक मामूली सा क्लर्क था और जिस के जिस्म पर ढंग का लिबास भी नहीं होता था. हम दोनों छिपछिप कर मिलते रहे. मेरा खयाल था कि फिरोज हमारे घर के हालात से आगाह था और वह हम लोगों के लिए सहारा बन जाएगा. हम घंटों एकदूसरे के साथ बैठे पूरी दुनिया को फतह करने की बातें करते रहे. हम ने कैसेकैसे ख्वाब देखे थे. दुनिया की हर लड़की का ख्वाब एक जैसा होता है. एक मोहब्बत करने वाला शौहर, एक छोटा सा घर, उस में शरारतें करते हुए मासूम बच्चे.

फिरोज ने मुझ से कहा था, ‘‘मैं शायद दुनिया का खुशकिस्मततरीन इंसान हूं, क्योंकि मुझे दुनिया की खूबसूरततरीन लड़की से मोहब्बत हो गई है. तुम ने मुझे जिंदा रहने के अंदाज सिखा दिए हैं. देख लेना, मैं तुम्हारी मोहब्बत हासिल करने के बाद कितनी तरक्की करूंगा. औफिस के मालिक ने मुझ से कहा है कि मैं शार्टहैंड सीख लूं तो मेरी तनख्वाह बढ़ा दी जाएगी.’’

पहली बार मुझे झटका सा लगा. मेरा हुस्न इसलिए नहीं था कि किसी के तनख्वाह के इजाफे पर खुश होता रहे. फिरोज की सोच इस से बुलंद उड़ान नहीं भर सकती थी. मैं ने फिर भी उस से कुछ नहीं कहा, क्योंकि मैं पहली बार मोहब्बत के  तजुर्बे से गुजर रही थी. एक दिन फिरोज मुझे अपने एक दोस्त के घर ले गया. उस दोस्त के घर में कोई भी नहीं था. सिर्फ मैं थी और फिरोज. उस दिन पहली बार मेरे गालों पर सुर्खी उमड़ आई. मैं पहली बार एक ऐसी बात से वाकिफ हो गई, जिस से वाकिफ कराने के लिए राशिद अली, इफ्तखार अली और न जाने कितने लोग कोशिश करते रहे थे.

मैं जब फिरोज के साथ उस घर से वापस आई तो अपने आप को हार चुकी थी, लेकिन न जाने क्यों मुझे इत्मीनान सा था. यह इत्मीनान खुद फिरोज ने दिलाया था. उस ने कहा था कि वह बहुत जल्दी मुझे अपना लेगा और मैं खयालों में डूबी अपने घर आ गई. उस वक्त मेरे चलने का अंदाज बदल चुका था. मेरे लहजे में ठहराव पैदा हो गया था. मेरे अंदाजे में एक खास किस्म की खुशी थी. 4-5 दिनों के बाद घर में एक हादसा हो गया. अम्मी गुसलखाने में गिर पड़ी थीं. उन के कूल्हे की हड्डी टूट गई थी.

कंगाली में अगर जुकाम भी हो जाए तो उस का बोझ कंधों पर महसूस होने लगता है और यह तो कूल्हे की हड्डी थी, जिस के इलाज के खर्च इतने थे कि पूरे घर की चीजें फरोख्त हो जातीं.  उस वक्त दोनों भाई किसी काम नहीं आ सकते थे, क्योंकि उन के पास सिवाय बेकारी के और कोई काम न था. गरीबों के रिश्तेदार भी कम ही होते हैं या होते ही नहीं हैं. लिहाजा हम कहीं से भी कोई मदद हासिल नहीं कर सकते थे.

उस वक्त मुझे फिरोज का खयाल आया. वही हमारी मदद कर सकता था. वह मेरी मोहब्बत और जिस्म का रखवाला था. उस से कोई तकल्लुफ नहीं था. मोहब्बत के रिश्ते में यही तो एक लुत्फ है कि एकदूसरे से खुल कर बातें कर ली जाती हैं.

मैं फिरोज से मिलने पहुंच गई. वह मुझे घर पर ही मिल गया था और यह इत्तफाक था कि वह घर पर अकेला ही था. मुझे देख कर उस के चेहरे पर खुशी के रंग दौड़ गए.

‘‘फिरोज, मैं तुम्हारे पास एक बहुत जरूरी काम से आई हूं.’’ मैं ने कहा.

‘‘बताओ, तुम्हारे लिए तो जान भी हाजिर है.’’

‘‘मेरी अम्मी गिर गई हैं. कूल्हे की हड्डी फ्रैक्चर हो गई है. तुम किसी भी तरह 5 हजार रुपए का बंदोबस्त कर दो.’’

एक लम्हे के लिए उस के चेहरे पर फीका सा रंग आ कर गुजर गया. वह कुछ सोचने लगा.

‘‘अब क्या सोचने लगे? क्या इतनी रकम नहीं है तुम्हारे पास?’’

‘‘नहीं, बात पैसों की नहीं है.’’

‘‘तो फिर क्या है?’’

‘‘मैं सोच रहा हूं कि तुम ने कुछ देर लगा दी,’’ वह मुसकराते हुए बोला, ‘‘तुम्हें तो अपने हुस्न की कीमत वसूल करने के लिए बहुत पहले आ जाना चाहिए था.’’

बस, यह वह आखिरी जुमला था, जो जरीना ने सुना था, क्योंकि उस के बाद जरीना ‘डौली’ हो गई थी. जरीना के नकाब को उस ने अपने सिर से उतार फेंका था. जरीना ने जब यह जुमला सुना तो जमीनआसमान एक हो गए थे. हवाएं रुक गई थीं. सूरज बहुत जल्दी डूब गया था और वह सब कुछ हो गया था, जो नहीं होना चाहिए था. क्या मैं अपने हुस्न की कीमत वसूल करने गई थी? क्या मैं इतनी सस्ती थी? क्या लड़कियों के मुकद्दर में सिर्फ धोखे ही लिख दिए जाते हैं? क्या इस जमीन पर उगने वाले सारे रिश्ते झूठे हैं?

अब तो आप को यकीन हो गया होगा कि मैं इतनी तल्ख हकीकत क्यों हूं. बताइए, मैं उस वक्त क्या करती? हर तरफ तो आप जैसे लोगों की सल्तनत है और सल्तनत इतनी बड़ी कि कोई आप की हविस के दायरे से निकल ही नहीं सकता. आप चाहे कोई भी हों, लड़कियों के लिए और खासतौर पर हसीन लड़कियों के लिए आप का रवैया एक जैसा ही होता है, बेरहम और कांटेदार. आप के रवैए के नाखून हसीन जिस्मों पर खराशें डाल देते हैं. आप को मालूम है कि बाद में मैं ने क्या किया होगा? हां, मैं ने वही किया जो मुझे करना चाहिए था. मैं उस औरत के घर पहुंच गई, जिस ने कहा था कि मेरे लिए उस के दरवाजे खुले रहेंगे.

…और उस के दरवाजे खुले हुए थे. सब से पहले तो उस ने मुझे पुराने नाम से निजात दिलाई. जरीना से डौली हो गई. उस घर में और भी लड़कियां थीं, लेकिन मेरी तरह कोई नहीं थी. इसलिए मेरे हालात बहुत तेजी से बदलने लगे. मैं ने कहा था कि मुझे इस समाज में पारसा कोई नहीं दिखाई दिया. सब एक जैसे हैं.

उस मकान में जाने के बाद यह बात बिलकुल सच साबित हो रही है. वहां आने वाले व्यापारी, नेता, अफसर, लेखक, अदाकार, गर्ज यह कि हर पेशे के लोग वही लोग हैं, जो दूसरों के सामने कुछ और होते हैं, लेकिन मेरे बदन के आईने में उन के चेहरों की बनावट कुछ और हो जाती है. एक दफा खुद फिरोज भी आ चुका है, लेकिन मुझे देख कर भाग गया था. शुरूशुरू में मेरे घर वालों ने मुझ से ताल्लुक खत्म कर लिया था, लेकिन जब मैं ने उन के आगे पैसों के ढेर लगा दिए, एक खूबसूरत सा मकान उन के हवाले कर दिया तो उन्होंने भी समझौता कर लिया. यह एक तल्ख बात है, लेकिन है हकीकत. अब हम सब साथ रहते हैं. एक ही घर में, एक ही छत के नीचे.

मेरे दोनों भाई अब भी कोई काम नहीं करते. अब उन्हें जरूरत भी नहीं है. उन की जेबें हमेशा नोटों से भरी रहती हैं. मेरी अम्मी को आज अगर जुकाम भी होता है तो शहर भर के डाक्टर ‘बेगम साहिबा, बेगम साहिबा’ कहते हुए दौड़ लगा देते हैं. मेरी बहन हसीना को जब लिबास की जरूरत होती है तो मैं उस के लिए इतने लिबास खरीद देती हूं कि उस के लिए पसंद करना मुश्किल हो जाता है.

आप मेरी कहानी पढ़ कर मुझ पर अफसोस न करें, क्योंकि डौली बहुत खुश है. हो सकता है कि जरीना खुश न रहती, लेकिन मैं जरीना नहीं, डौली हूं. अगर आप को कभी मेरी जरूरत महसूस हो तो मेरा पता जानने की जद्दोजहद न करें. अपने इर्दगिर्द नजर डालें, आलीशान मकानों में कोई न कोई डौली आप को जरूर मिल जाएगी. Hindi Stories

लेखक – जरीना  

  

MP Crime: काली करतूतों से बुने रंगीन सपने

MP Crime: मीनाक्षी ने खुशहाल परिवार के व्यवसाई मनीष से प्रेम विवाह किया था. फिर ऐसा क्या हुआ कि यार के साथ मिल कर उसे पति की हत्या करानी पड़ी.

भोर की लालिमा फैलनी शुरू हुई ही थी कि उज्जैन के महाकाल मंदिर से उठते आरती के स्वर फिजा में गूंजने लगे. रोजाना की तरह घंटेघडि़यालों की गूंज के बीच इस दिन यानी 18 अगस्त, 2015 को भी उज्जैन अंगड़ाई लेने लगा. शहर की विवेकानंद कालोनी के विष्णुनगर की रहने वाली मीनाक्षी भी मंदिर से आने वाली आवाज सुन कर जाग गई. अब लेटे रहना उस के वश में नहीं था. उस ने जल्दी से बिस्तर छोड़ दिया.

आमतौर पर सुबहसुबह के इस शोर से जागने के बाद मीनाक्षी चिड़चिड़ा उठती थी लेकिन वह दिन उस के लिए कुछ खास था, तभी तो उसे पहली बार मंदिर के घंटों की आवाज मधुर लग रही थी. फ्रैश होने के लिए वह बाथरूम में घुस गई और करीब आधे घंटे बाद जब बाहर निकली तो उस का पति मनीष पहले की तरह गहरी नींद में सो रहा था. अपने गीले बालों का जूड़ा बांधते हुए उस ने पति को झकझोरते हुए उठाया. मनीष अलसाया सा उठ गया. उसे भी अपने औफिस जाना था इसलिए वह भी जाने की तैयारी में जुट गया. मीनाक्षी घर के रोजाना के काम करने लगी. काम निपटातेनिपटाते करीब साढ़े 9 बज गए.

सुबह के 10 बजने को थे. मनीष और मीनाक्षी दोनों के काम पर जाने का वक्त हो चुका था. इसलिए दोनों एक ही कमरे में तैयार हो रहे थे. इसी दौरान कंघी करते मनीष ने आईने में अपने पीछे खड़ी मीनाक्षी को कुरता पहनते देखा तो उसे शरारत सूझी. उसे छेड़ने के लिए वह पीछे मुड़ा ही था कि इस बीच मीनाक्षी का मोबाइल बज उठा. रिंगटोन सुन कर मीनाक्षी ने हवा में उठी अपनी बांहें नीचे झुका लीं. इस से मनीष अपनी सोची शरारत अधूरी रह जाने से मन मसोस कर रह गया.

‘‘हैलो, हां बस 5 मिनट में निकलने वाली हूं.’’ कहते हुए मीनाक्षी ने मोबाइल पर बात खत्म की और जल्दी से कपड़े ठीक करने के बाद पैरों में सैंडिल डालते हुए बोली, ‘‘तुम तैयार हो मनीष?’’

‘‘हां.’’ मनीष ने भी कह दिया.

‘‘तो चलो.’’ कहते हुए मीनाक्षी कमरे से बाहर आ गई. मनीष भी कमरे से निकल आया तो मीनाक्षी ने दरवाजे पर ताला लगाया और पास बैठे सासससुर को उपेक्षा की नजर से देखती हुई मनीष के साथ घर से बाहर निकल गई.

मनीष मीणा उज्जैन की विवेकानंद कालोनी में रहने वाले आर.के. मीणा का एकलौता बेटा था. उज्जैन के टावर चौराहे के पास वसावड़ा पैट्रोल पंप के पीछे की गली में वह श्रीजी नाम से एक फाइनैंस कंपनी चलाता था. जबकि मीनाक्षी बेगमगंज इलाके में स्थित अरुणोदय सर्वेश्वरी कल्याण समिति नाम के एनजीओ में काम करती थी. पतिपत्नी दोनों सुबह एक साथ स्कूटी पर घर से निकलते थे.

मनीष को टावर चौराहे पर उस के औफिस छोड़ कर मीनाक्षी अपने औफिस चली जाती थी. उस रोज भी वह हमेशा की तरह स्कूटी चला रही थी और मनीष पीछे बैठा था. हवा के झोंकों में उड़ते मीनाक्षी के खुले बाल मनीष के चेहरे से टकरा कर उस के मन में अजीब सी हलचल पैदा कर रहे थे. इस से रोमांचित हो कर मनीष ने अपनी बाहें पत्नी की कमर में डाल दीं. तभी मीनाक्षी ने उसे रूखे स्वर में टोका, ‘‘हम अपने कमरे में नहीं, सड़क पर हैं.’’

‘‘जानता हूं, मैं तुम्हें भगा कर नहीं लाया, बैंडबाजे के साथ तमाम लोगों के सामने ब्याह कर लाया हूं.’’ मनीष ने शरारत से कहा.

‘‘मुझे भी पता है. लेकिन शादीशुदा होने का मतलब यह तो नहीं कि सड़क पर ही कपड़े उतार दूं.’’ मीनाक्षी ने चिढ़ कर कहा.

मीनाक्षी के इस व्यवहार पर मनीष को गुस्सा आ गया. उस ने अपने हाथ वापस खींच लिए. इस के बाद वह टावर चौराहे तक न केवल चुप रहा, बल्कि मीनाक्षी ने जब स्कूटी रोकी तो बिना उस की ओर देखे अपने औफिस की तरफ चल पड़ा तो मीनाक्षी बोली, ‘‘सुनो, नाराज हो गए क्या?’’

मनीष कुछ नहीं बोला तो मीनाक्षी ने फिर पूछा, ‘‘नाराज हो गए?’’ मनीष फिर भी चुप रहा. इस पर मीनाक्षी ने हंसते हुए कहा, ‘‘अच्छा बाबा, आज शाम को जल्दी घर आ जाऊंगी. फिर अपनी सारी नाराजगी दूर कर लेना, ओके.’’

मनीष हलके से मुसकरा दिया और वापस मुड़ कर औफिस की तरफ चल पड़ा. उस के जाते ही स्कूटी मोड़ कर मीनाक्षी भी आगे बढ़ गई. कुछ दूरी पर जा कर उस ने सड़क के किनारे स्कूटी खड़ी कर के पीछे मुड़ कर मनीष की तरफ देखा. इस के बाद मोबाइल पर कोई नंबर डायल कर के 2-3 सेकेंड बात की और फिर तेजी से स्कूटी चला कर वहां से चली गई.

इधर मनीष ने रोज की तरह अपने औफिस से पहले पड़ने वाली चाय की एक दुकान पर चाय पी. इस के बाद वह पैट्रोल पंप के पास की गली में घुस गया. उस का औफिस उसी गली में था. उस समय सुबह के करीब साढ़े 10 बजे थे. वह औफिस पहुंच पाता, उस से पहले ही किसी ने उसे गोली मार दी. गली के दुकानदार मनीष को जानते थे. जैसे ही लोगों को इस घटना का पता चला, लोग वहां जमा हो गए और किसी ने फोन द्वारा इस की सूचना थाना माधोनगर को दे दी.

किसी को गोली मारने की खबर पा कर थानाप्रभारी एम.एस. परमार कुछ ही देर में घटनास्थल पर पहुंच गए. वहां पता चला कि मनीष मीणा के सिर पर नजदीक से गोली मारी गई है. थानाप्रभारी ने गंभीर रूप से घायल मनीष को सिविल अस्पताल भेज दिया और घटना की जानकारी एसपी एम.एस. वर्मा, एएसपी अमरेंद्र सिंह और एसपी (सिटी) विजय डाबर को दे दी. थानाप्रभारी को किसी तरह मनीष की पत्नी और उस के घर वालों के फोन नंबर हासिल हो गए तो उन्होंने उन्हें भी फोन कर के अस्पताल बुला लिया. थानाप्रभारी को लोगों ने बताया कि गोली चलने की आवाज सुन कर जब वे दुकानों से बाहर आए तो उन्होंने एक मोटरसाइकिल पर सवार 2 युवकों को जाते देखा था.

घटनास्थल पर 7.65 एमएम कारतूस का एक खाली खोखा मिला. पुलिस को लगा कि यह हमलावरों द्वारा चलाई गई गोली का ही होगा. कुछ ही देर में एसपी, एएसपी और सीएसपी भी मौके पर पहुंच गए. उन्होंने भी घटना के बारे में लोगों से बात की. पुलिस द्वारा सूचना देने के कुछ देर में ही मनीष की पत्नी मीनाक्षी अस्पताल पहुंच गई. गंभीर अवस्था में घायल पति को अस्पताल में देख कर मीनाक्षी जोरजोर से रोने लगी. रोतेरोते ही वह बेहोश हो गई. उसी समय मनीष के मातापिता भी अस्पताल पहुंच गए.

मनीष की हालत इतनी गंभीर थी कि पुलिस उस का बयान तक नहीं ले सकती थी. डाक्टरों की टीम आईसीयू में उस का उपचार करने में लगी थी. बहरहाल पुलिस ने हत्या की कोशिश करने का मामला दर्ज कर घटना की जांच शुरू कर दी. उस गली में कुछ सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे. पुलिस ने उन कैमरों की फुटेज देखी तो उस में 2 लड़के मोटरसाइकिल पर दिखाई तो दे रहे थे, लेकिन तसवीर इतनी धुंधली थी कि न तो उन के चेहरे पहचाने जा सके और न ही मोटरसाइकिल का नंबर.

इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि हमलावर काफी शातिर रहे होंगे. उधर मनीष की न तो बेहोशी टूट रही थी और न ही पुलिस को जांच की कोई दिशा मिल रही थी. चूंकि मनीष फाइनैंस एजेंसी के अलावा विवादित प्रौपर्टी की खरीदफरोख्त भी करता था. इसलिए पुलिस को लग रहा था कि उस की हत्या के पीछे कोई प्रौपर्टी विवाद हो सकता है. इस बिंदु को ध्यान में रखते हुए पुलिस इस बात की जांच की कि वह किनकिन लोगों से ज्यादा मिलताजुलता था और उस ने कौनकौन से विवादित प्रौपर्टी का सौदा किया था.

एसपी एम.एस. वर्मा ने साइबर सेल प्रभारी इंसपेक्टर दीपिका शिंदे को मृतक और उस से जुड़े लोगों के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स की जांच करने की जिम्मेदारी सौंप दी. दीपिका शिंदे सेल के आरक्षक राहुल कुशवाहा के साथ इस काम में जुट गईं. दीपिका शिंदे ने सब से पहले मृतक मनीष के अलावा उस की पत्नी मीनाक्षी के मोबाइल नंबरों की भी काल डिटेल्स निकाल कर उस की स्कैनिंग की.

जांच में पता चला कि मनीष को टावर चौराहे पर छोड़ने के बाद मीनाक्षी ने जिस नंबर पर बात की थी, घटना के कुछ समय बाद उसी नंबर से मीनाक्षी के पास भी फोन आया था. इंसपेक्टर शिंदे ने दोनों फोन के समय के साथ मीनाक्षी के अस्पताल पहुंचने के समय का मिलान किया तो यह बात सामने आई कि पति को गोली मारे जाने की सूचना मिलने पर मीनाक्षी आश्चर्यजनक रूप से बहुत कम समय में ही अस्पताल पहुंच गई थी.

मीनाक्षी जिस एनजीओ में नौकरी करती थी, इंसपेक्टर शिंदे ने उस एनजीओ के संचालक से पूछताछ की तो पता चला कि मीनाक्षी उस रोज सुबह 10 बज कर 35 मिनट पर औफिस पहुंची थी और केवल 5 मिनट रुक कर वापस चली गई थी. इधर पुलिस जांच में कड़ी से कड़ी जोड़ने की कोशिश कर रही थी. घटना को हुए 3 दिन बीत चुके थे. मीनाक्षी पुलिस पर दबाव बनाने के लिए कुछ लोगों के साथ आईजी औफिस गई.

पति के हमलावरों की गिरफ्तारी की मांग को ले कर उस ने आईजी औफिस का घेराव करने की कोशिश की. पुलिस अधिकारियों ने किसी तरह उसे समझाया. उस के हंगामे को देखते हुए वह खुद पुलिस के शक के दायरे में आ गई. इसी के मद्देनजर आरक्षक राहुल कुशवाहा मीनाक्षी के फोन को सर्विलांस पर लगा कर उस की निगरानी करने लगे. इस से यह पता लग रहा था कि वह फोन पर किसकिस से बातें कर रही थी.

कुशवाहा मीनाक्षी के हर मूवमेंट की जानकारी इंसपेक्टर दीपिका शिंदे को दे रहे थे. इस से यह बात निकल कर सामने आ रही थी कि मनीष भले ही अस्पताल में जिंदगी और मौत से संघर्ष कर रहा था, लेकिन मीनाक्षी ने घटना के पहले और बाद में जिस मोबाइल नंबर पर बात की थी, उसी नंबर पर उस की अब भी लगातार लंबीलंबी बातें हो रही थीं. वह मोबाइल नंबर हनीफ का था.

जबकि घटना के बाद से 2 दिन तक मीनाक्षी अस्पताल नहीं आई थी. मनीष के मातापिता ही उस की देखभाल कर रहे थे. पुलिस ने जब उन से मीनाक्षी के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि मीनाक्षी मनीष की जान बचाने के लिए घर पर रह कर 48 घंटे की अखंड पूजा कर रही है. उस का कहना था कि पूजा के बाद वह महाकाल से अपने पति को मौत के मुंह से वापस ले आएगी. लेकिन घटना के पांचवे रोज ही मनीष जिंदगी की जंग हार गया. उस की मौत के बाद पुलिस ने इस मामले में हत्या की धारा जोड़ कर जांच आगे बढ़ाई.

पुलिस को यह बात हजम नहीं हुई थी कि एक ओर तो वह अस्पताल में पति को उस के हाल पर छोड़ कर घर में थी, वहीं दूसरी ओर मोबाइल पर उस की किसी से लंबीलंबी बातें चल रहीं थी. इंसपेक्टर शिंदे ने एसपी एम.एस. वर्मा के सामने मीनाक्षी पर अपनी शंका व्यक्त की तो एसपी ने मीनाक्षी से पूछताछ करने के निर्देश दिए. एसपी के निर्देश पर पुलिस टीम मीनाक्षी के घर पहुंची तो मनीष के पिता ने मीनाक्षी को थाने ले जाने पर कड़ा विरोध जताया. लेकिन पुलिस ने उन की एक न सुनी. पुलिस मीनाक्षी को साइबर सेल ले आई. जैसे ही मीनाक्षी साइबर सेल पहुंची, आरक्षक राहुल ने उसे देखते ही पहचान लिया. क्योंकि उन्होंने उसे इसी साल अप्रैल महीने में अंबरनगर कालोनी के एक सूने मकान में अपने प्रेमी हनीफ के संग रंगरलियां मनाते पकड़ा था. तब मीनाक्षी के पति को भी साइबर सेल बुलाया गया था.

जिस युवक के साथ उसे पकड़ा गया था, वह मीनाक्षी के साथ एनजीओ में काम करता था. काल डिटेल्स से पता चला कि इसी हनीफ के साथ मीनाक्षी की फोन पर लंबीलंबी बातें हो रही थीं. इस बात की जानकारी मिलते ही पुलिस की एक टीम हनीफ की तलाश में उस के एनजीओ के औफिस पहुंची. पुलिस को देख कर हनीफ डर गया. उस ने झट से अपने मोबाइल का सिम और मेमोरी कार्ड निकाल कर अपने मुंह में छिपा लिया. लेकिन पुलिस ने उसे ऐसा करते हुए देख लिया था. पुलिस ने हनीफ को हिरासत में ले कर उस के मुंह से सिमकार्ड और डाटा कार्ड निकलवा कर बरामद कर लिया.

जांच में यह भी पता चला कि घटना वाले दिन एनजीओ के हाजिरी रजिस्टर में हनीफ के औफिस आने का समय साढ़े 11 बजे का लिखा था, जिसे ओवर राइट कर के साढ़े 10 बनाया गया था. मनीष को गोली साढ़े 10 बजे के करीब मारी गई थी. इस से पुलिस समझ गई कि वह साढ़े 10 बजे औफिस में नहीं था. लेकिन उस ने अपनी मौजूदगी औफिस में दिखाने के लिए रिकौर्ड में छेड़खानी की कोशिश की थी. पुलिस हनीफ को हिरासत में ले कर साइबर सेल आ गई. उन दोनों से पुलिस ने पूछताछ की तो उन्होंने यह बात तो स्वीकार कर ली कि उन के आपस में प्रेमसंबंध हैं, लेकिन मनीष की हत्या की बात से दोनों मुकर गए.

काल डिटेल्स के आधार पर पुलिस को पता लग गया था कि जिस वक्त मनीष को गोली मारी गई थी, उस वक्त हनीफ के फोन की लोकेशन टावर चौराहे के पास थी. जबकि मनीष उस समय अपनी उपस्थिति अपने औफिस की बता रहा था. इस के बाद पुलिस ने उन दोनों से सख्ती से पूछताछ की. फलस्वरूप दोनों ने मनीष की हत्या की बात स्वीकार करते हुए पूरी कहानी सिलसिलेवार सुना दी, जो इस प्रकार निकली. विवेकानंद कालोनी निवासी आर.के. मीणा के एकलौते बेटे मनीष की करीब 5 साल पहले मीनाक्षी से मुलाकात हुई थी. दरअसल मनीष पहले एक एनजीओ चलाता था. मीनाक्षी उसी के एनजीओ में काम करती थी. मीनाक्षी तराना की रहने वाली थी. रोजरोज तराना से औफिस आनेजाने में उसे बड़ी परेशानी होती थी. इसलिए वह उज्जैन में किराए का मकान ले कर अकेली रहने लगी. यह बात मनीष भी जानता था.

मनीष उस का बौस था, सो वह मीनाक्षी के अकेलेपन का फायदा उठा कर उस के नजदीक आने की कोशिश करने लगा. इस में वह सफल भी हो गया. दरअसल मीनाक्षी को पता था कि मनीष एक रईस मातापिता की एकलौती संतान है. उसे लगा कि मनीष से मोहब्बत कर के उसे बड़ा फायदा हो सकता है, इसलिए उस ने मनीष के लिए अपने तनमन की लगाम ढीली छोड़ दी. इस के बाद उन दोनों के बीच की दूरियां कुछ ही मुलाकातों में खत्म हो गईं. मीनाक्षी मनीष के दिल और दिमाग पर छा गई.

मनीष के घर वाले बेटे के लिए किसी शरीफ परिवार की बहू चाहते थे. लेकिन जब उन्हें बेटे के द्वारा पता चला कि वह अपने ही औफिस में काम करने वाली मीनाक्षी को चाहता है तो उस की खुशी देख कर उन्होंने अपनी रजामंदी दे दी. इस तरह 2 साल पहले मीनाक्षी अपने बौस की पत्नी बन कर उस के घर आ गई.

चूंकि दोनों का प्रेमविवाह था, इसलिए शादी के बाद का शुरुआती वक्त तो पंख लगा कर बीत गया. शादी के कुछ समय बाद मनीष ने एनजीओ बंद कर के टावर चौराहे के पास श्रीजी फाइनैंस कंपनी खोल ली. कंपनी के माध्यम से मनीष केवल लोगों को विभिन्न बैंकों से लोन ही नहीं दिलवाता था, बल्कि उस ने विवादित प्रौपर्टी की खरीद- फरोख्त का काम भी शुरू कर दिया था.

मीनाक्षी चाहती तो अपने पति की कंपनी में सहयोग कर सकती थी, लेकिन उस ने ऐसा न कर के बेगमगंज इलाके में स्थित अरुणोदय सर्वेश्वरी कल्याण समिति नामक एनजीओ में नौकरी कर ली. मनीष ने मीनाक्षी के इस फैसले का विरोध इसलिए नहीं किया क्योंकि वह अपनी फाइनैंस कंपनी के माध्यम से न केवल ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी कर रहा था, बल्कि विवादित प्रौपर्टियों में भी रुचि ले रहा था. इसलिए वह मीनाक्षी को कंपनी से दूर ही रखना चाहता था.

उस की योजना मीनाक्षी के लिए नया एनजीओ खुलवा कर लाखों कमाने की थी. लेकिन पति से अलग रह कर नौकरी करते हुए मीनाक्षी की मुलाकात खंदार मोहल्ले में रहने वाले हनीफ से हुई. हनीफ एकदूसरे एनजीओ में काम करता था. मुलाकात के बाद वे वाट्सएप के माध्यम से अपने विचारों का आदानप्रदान करते रहे. उन के बीच गहरी दोस्ती हो गई. दोनों दिनभर एकदूसरे के संपर्क में रहने लगे. फिर रोज ही उन की मुलाकातें होने लगीं.

मीनाक्षी बचपन से ही महत्त्वाकांक्षी थी. अपने बारे में बढ़ाचढ़ा कर बातें करना उस की आदत में शुमार था. उस ने हनीफ को भी यही बताया था कि मनीष करोड़पति है और उस की ज्यादातर प्रौपर्टी मेरे ही नाम पर है. हनीफ मीनाक्षी जैसी कितनी लड़कियों को रंगीन सपने दिखा कर उन का शारीरिक शोषण कर चुका था. इसलिए उसे लगा कि मीनाक्षी के हाथ आने पर वह आसानी से करोड़पति बन सकता है. उस ने मीनाक्षी के नजदीक आने की कोशिश करनी शुरू कर दी.

2 साल पहले मनीष के साथ मोहब्बत की कमसें खाने और उस से प्रेमविवाह करने वाली मीनाक्षी ने भी अपनी तरफ बढ़ते हनीफ के कदमों को रोकने की कोशिश नहीं की. इस बीच मीनाक्षी और हनीफ के बीच शारीरिक रिश्ते भी कायम हो गए. इस के बाद तो मीनाक्षी को मनीष में 50 कमियां और हनीफ में हजार अच्छाइयां नजर आने लगीं.

हनीफ दूसरे एनजीओ में काम करता था, इसलिए दोनों का आसानी से मिलना संभव नहीं हो पाता था. इसलिए मीनाक्षी ने उस की नौकरी अपने ही एनजीओ में लगवा दी. इस से दोनों का मिलना काफी आसान हो गया. काम के नाम पर हनीफ और मीनाक्षी औफिस से बाहर निकल जाते. इस के बाद हनीफ मीनाक्षी को ले कर अपने एक दोस्त के कमरे पर चला जाता. वहीं पर दोनों अपनी हसरतें पूरी करते. हसरतें पूरी कर के वह औफिस आ जाते थे.

इस तरह धीरेधीरे मीनाक्षी मनीष से दूर हो कर हनीफ के पास होती गई. लेकिन इन का खेल ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रह सका. हुआ यह कि हनीफ अकसर मीनाक्षी को ले कर अंबरनगर स्थित अपने एक दोस्त के कमरे पर जाता था. लेकिन रोजरोज का यह खेल मोहल्ले वालों की नजरों में आ गया. अप्रैल, 2015 में जब एक दिन मीनाक्षी और हनीफ उस दोस्त के यहां गए तो मोहल्ले वालों ने दोनों को पकड़ कर पुलिस को खबर कर दी. पुलिस आने पर विवाद की स्थिति बन गई. खबर मिलने पर मीनाक्षी का पति भी वहां आ गया. तब मीनाक्षी का कहना था कि वह अपने दोस्त के घर खाना खाने आई थी. बहरहाल पुलिस ने उन्हें हिदायत दे कर छोड़ दिया.

मीनाक्षी ने मनीष को लाख सफाई देने की कोशिश की, लेकिन मनीष समझ गया था कि मीनाक्षी जैसी लड़की केवल खाना खाने के लिए तो ऐसे गंदे माहौल में नहीं जा सकती. वह कभी अंडे को हाथ तक नहीं लगाती थी. वह हनीफ का मन रखने के लिए मांसाहार कैसे कर सकती है. घर पहुंच कर मनीष ने गुस्से में मीनाक्षी की पिटाई कर दी. इतना ही नहीं, उस ने मीनाक्षी को चेतावनी भी दे दी कि उस के 1-2 दोस्त जेल में बंद हैं, जिन के बाहर आते ही वह हनीफ को ठिकाने लगवा देगा. मीनाक्षी पति की आदत और पहुंच को जानती थी. इसलिए उसे विश्वास था कि वह हनीफ को जरूर मरवा देगा. इसलिए वह फिर हनीफ से मिली और उस ने उसे बता दिया कि मनीष उस की हत्या करवा सकता है.

हनीफ डर गया. उस के सोचा कि इस से पहले मनीष उस के खिलाफ कोई कदम उठाए, क्यों न मनीष को ही ठिकाने लगा दिया जाए. उस ने मीनाक्षी को अपनी योजना बताई तो वह राजी हो गई. क्योंकि वह जानती थी कि एक बार मनीष की नजरों में गिरने के बाद अब वह उस घर में कभी अपनी पुरानी हैसियत नहीं पा सकती. तब हनीफ ने मीनाक्षी को सलाह दी कि वह मनीष के साथ गहरे प्यार का नाटक कर उस का मकान और जायजाद सब अपने नाम करवा ले, ताकि मनीष की हत्या के बाद उस के मातापिता को घर से निकाल कर दोनों आपस में निकाह कर आराम से रह सकें.

मीनाक्षी को भी प्रेमी की बात पसंद आ गई. इसलिए घटना से कुछ दिनों पहले जब मनीष ने 35 लाख की एक जमीन खरीदी तो मीनाक्षी ने जिद कर के उस की रजिस्ट्री अपने नाम करवा ली. इस के बाद हनीफ और मीनाक्षी ने मिल कर मनीष की हत्या की फूलप्रूफ योजना बनाई. इस के लिए हनीफ ने 2 महीने तक मनीष के औफिस के चारों तरफ रैकी कर गली में गोली मारने का फैसला किया. मीनाक्षी और मनीष जानते थे कि हत्या के बाद मीनाक्षी की काल डिटेल्स भी निकाली जाएगी, जिस के चलते हनीफ और मीनाक्षी से पुलिस पूछताछ कर सकती है. इसलिए पुलिस के सभी संभावित प्रश्नों के जवाब भी उन्होंने पहले से ही तैयार कर लिए थे.

यह सब करने के बाद हनीफ ने अपनी मौसी के लड़के रिजवान को साथ देने के लिए तैयार किया. दोनों ने कई बार मनीष की गली से मोटरसाइकिल ले कर तेजी से निकलने की प्रैक्टिस की. अंतत: परफेक्ट हो जाने के बाद 18 अगस्त, 2015 को हनीफ ने मनीष की हत्या कर दी. इतनी फूलप्रूफ योजना के तहत हत्या करने के बावजूद भी आखिर वे पुलिस के चंगुल में फंस ही गए. काली करतूतों की बुनियाद पर रंगीन सपने सजाने वाले हनीफ और मीनाक्षी से पूछताछ के बाद उन्हें कोर्ट में पेश कर के सलाखों के पीछे पहुंचा दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Best Crime Story: मजबूरी में बनी कोठे की जीनत

Best Crime Story: मैनब नेपाल के जिला लुंबिनी की रहने वाली थी. उस की शादी पटना के मोहल्ला धोबीघाट  निवासी आरिफ से हुई थी. आरिफ और उस के 2 बच्चे थे. लगभग 4 साल पहले की बात है, मैनब अपने मायके जाने के लिए ससुराल से निकली. उस के साथ उस के दोनों बच्चे भी थे. जनसेवा जननायक एक्सप्रेस से वह बस्ती रेलवे स्टेशन पर उतर गई, क्योंकि वहां से उसे बस पकड़ कर लुंबिनी जाना था.

जब तक मैनब की ट्रेन बस्ती पहुंची, तब तक रात हो चुकी थी. मैनब ने बच्चों के साथ नाश्ता वगैरह किया और अपना सामान प्लेटफार्म के एक कोने में रख कर बच्चों को वहीं सुला दिया. वह खुद इधरउधर टहल कर रात गुजारने की कोशिश करने लगी.

24 साल की मैनब को देख कर यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि वह 2 बच्चों की मां होगी. उस का छरहरा बदन, गोरा रंग किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकता था. रेलवे स्टेशन पर मौजूद जावेद की नजर मैनब पर पड़ी तो उस की आंखों में चमक आ गई. वह मैनब से बात करने का कोई बहाना तलाशने लगा. जावेद चालू किस्म का आदमी था.

वह किसी ऐसे ही शिकार की तलाश में था. इसलिए अकेली महिलाओं से बात करने का हुनर अच्छी तरह जानता था. उस ने बिना किसी परिचय, बिना किसी भूमिका के मैनब के पास जा कर पूछा, ‘‘इतनी रात में स्टेशन पर परेशान सी घूम रही हो, कहीं जाना है क्या?’’

जावेद का हमदर्दी भरा लहजा देख कर मैनब ने कह दिया, ‘‘मुझे नेपाल जाना है, लेकिन समझ में नहीं आ रहा है, कैसे जाऊं?’’

जावेद पहले ही समझ चुका था कि वह अकेली और इस जगह से अनजान है. इसलिए उस ने इस मौके का फायदा उठाने की सोच ली थी. जावेद बस्ती रेलवे स्टेशन के पास ही पुरानी बस्ती थाने के मोहल्ला रसूलपुर का रहने वाला था. बस्ती रेलवे स्टेशन के पास स्थित देह की मंडी में उस का आनाजाना लगा रहता था. मैनब की नासमझी का लाभ उठाने के लिए उस ने उसे देहव्यापार की मंडी में पहुंचाने का फैसला कर लिया. इस के लिए उस ने मन ही मन योजना भी बना ली.

अपनी उसी योजना के मद्देनजर उस ने मैनब से कहा,  ‘‘देखो, नेपाल जाने के लिए तुम्हें बस पकड़नी पड़ेगी. बसअड्डा यहां से थोड़ी दूर है. तुम मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें वहां छोड़ दूंगा. रात भर स्टेशन पर पड़े रहने का कोई फायदा नहीं है. तुम्हें अकेली देख कर पुलिस वाले अलग तंग करेंगे. बेहतर होगा, अभी निकल जाओ. नेपाल के लिए बसें जाती रहती हैं. सुबह तक अपने मायके पहुंच जाओगी.’’

अकेलेपन की वजह से मैनब पहले ही घबराई हुई थी. जावेद की हमदर्दी से वह पिघल गई. बिना सहीगलत का अंदाजा लगाए वह परेशान से स्वर में बोली, ‘‘ठीक है, मैं बच्चों को ले लेती हूं. आप हमें बसअड्डे पहुंचा दीजिए, बड़ी मेहरबानी होगी.’’

बच्चों का नाम सुन कर जावेद ने आश्चर्य से उस की ओर देखा. वह उसे अकेला समझ रहा था. उस ने मैनब से पूछा, ‘‘तुम्हारे बच्चे भी हैं? तुम्हें देख कर तो ऐसा लगता जैसे तुम्हारी शादी हालफिलहाल ही हुई होगी?’’

अपनी तारीफ हर इंसान को अच्छी लगती है. जावेद का कमेंट सुन कर मैनब को भी अच्छा लगा. बातचीत हुई तो परिचय के नाम पर दोनों ने अपनेअपने नाम एकदूसरे को बता दिए. मैनब को यह जान कर अच्छा लगा कि उस की मदद करने वाला भी मुसलमान है. वह न तो भेड़ की खाल में छिपे भेडि़ए को समझ पाई और न यह कि गलत और गंदे लोगों का कोई ईमान धर्म नहीं होता.

मैनब अपने बच्चों को साथ ले कर उस के साथ जाने को तैयार हो गई. जावेद उसे मोटरसाइकिल पर बैठा कर बसअड्डे ले गया. वहां जा कर पता चला कि सिद्धार्थनगर होते हुए ककहरा बौर्डर के लिए बस सुबह 7 बजे जाएगी.

जावेद इस बात को अच्छी तरह जानता था कि बस सुबह जाती है. वह मैनब को जानबूझ कर बसअड्डे ले गया था. बस नहीं मिली तो उस ने मैनब से कहा, ‘‘तुम मेरे साथ चलो, रात को आराम कर के सुबह चली जाना. मैं तुम्हें बस में बैठा दूंगा.’’

मैनब उस पर भरोसा कर के उस के घर आ गई. घर पर जावेद ने उसे चाय पिलाई, जिस में नशीली दवा मिली हुई थी. चाय पी कर उसे नींद आ गई. तब तक उस के बच्चे भी सो चुके थे. नींद के आगोश में डूबी मैनब और भी सुंदर दिख रही थी. जावेद उस के यौवन का स्वाद लेने के लिए बेचैन हो उठा. नशे की हालत में मैनब कुछ समझ नहीं पाई. वह जावेद का साथ देती गई. वह 2 बच्चों की मां जरूर थी, पर उस के बदन की गरमी किसी को भी पिघला सकती थी.

सुबह को जब मैनब का नशा टूटा और वह नींद से जागी तो उसे सब कुछ समझ में आ गया. लेकिन अब वह कुछ नहीं कर सकती थी. वह जावेद से बस अड्डे पहुंचाने की जिद करने लगी. इस पर जावेद ने समझाया, ‘‘तुम कुछ दिन हमारे साथ रह कर पैसा कमा लो, फिर मायके चली जाना. तुम खूबसूरत हो, जवान भी. तुम पर पैसे लुटाने वाले मैं ढूंढ लाऊंगा. यहां रहोगी तो पटना और नेपाल की गरीबी से भी पीछा छूट जाएगा. हम तुम्हारे बच्चों का यहीं के स्कूल में दाखिला करा देंगे.’’

मैनब इस के लिए तैयार नहीं थी. उस ने घरेलू मारपीट से तंग आ कर पति का साथ और घर छोड़ कर मायके में रहने का फैसला किया था. वहीं वह जा भी रही थी. लेकिन बीच रास्ते में यह मुसीबत आ गई थी. मैनब चूंकि घरेलू युवती थी, इसलिए वह जावेद की बात मानने के लिए तैयार नहीं हुई. जबकि वह उसे सोने की अंडा देने वाली मुर्गी मान चुका था. उस ने मैनब को बस्ती की देहव्यापार मंडी में उतारने की योजना बना ली थी.

इसी योजना के तहत उस ने उसे अपने जाल में फंसाया. इस के लिए उस ने मोहरा बनाया उस के बच्चों को. जब मैनब समझाने से नहीं मानी तो जावेद ने उस पर जुल्म ढाने शुरू कर दिए. वह उस के साथ मनमानी करता, नशे की गोलियां खिला कर ज्यादा से ज्यादा नशे में रखने की कोशिश करता. इस से भी बात नहीं बनती तो उस के बच्चों को मार डालने की धमकी देता.

एक हफ्ते तक किए गए अत्याचारों से मैनब टूट गई. अपने बच्चों की खातिर अंतत: वह अपनी देह बेचने को राजी हो गई. इस के बाद जावेद ने उसे पूरी तरह तैयार कर के देहव्यापार की मंडी में उतार दिया. बाजारू लड़कियों के बीच रह कर वह भी जल्दी ही उन की तरह ग्राहक फंसाने के लटकेझटके सीख गई.

वह शाम ढलते ही मेकअप कर के सड़क किनारे खड़ी हो जाती. जावेद उस के लिए ग्राहक ले आता. मैनब कमाने लगी तो जावेद ने उसे एक कमरा अलग से किराए पर दिलवा दिया. वह उसी कमरे में रहने लगी. जावेद ने उस के दोनों बच्चों को स्कूल में दाखिल करवा दिया. उन्हें वह अपने साथ अपने घर में रखता था, ताकि उस की डोर उस के हाथ में रहे.

उधर जब नेपाल के रहने वाले मैनब के पिता हबीब को यह चला कि उस की बेटी अपनी ससुराल से नाराज हो कर मायके के लिए निकली थी तो उसे आश्चर्य हुआ. क्योंकि वह मायके नहीं पहुंची थी. मैनब के पिता हबीब ने आरिफ से बात की तो उस ने किसी भी तरह की जानकारी नहीं दी. उस ने दो टूक कह दिया कि मैनब उस के लिए मर चुकी है.

पति भले ही कितना भी निष्ठुर क्यों न हो जाए, पिता अपनी बेटी को कभी नहीं भूल सकता. हबीब का मैनब के साथ बहुत लगाव था. हबीब ने उसे तलाश करने की बहुत कोशिश की, पर वह कहीं नहीं मिली. उधर जावेद के जाल में फंसी मैनब दिनरात वहां से भागने के मंसूबे बनाती रहती थी. लेकिन जावेद ने उस के बच्चों को उस से अलग अपने कब्जे में रख कर उस के पर काट दिए थे.

वेश्या बाजार में काम करने वाली औरतें 3-4 माह में एक बार सरकारी अस्पताल में यौन रोगों की जांच कराने के लिए जाती थीं. एक बार मैनब भी उन के साथ अस्पताल जाने लगी तो उस ने बच्चों की बीमारी का वास्ता दे कर उन्हें भी साथ ले लिया था. उस का इरादा चुपचाप भाग जाने का था. लेकिन पता नहीं कैसे जावेद को उस के मंसूबे का पता चल गया. उस ने मैनब को अस्पताल से बाहर निकलते ही पकड़ लिया. इस के बाद उस ने मैनब को बुरी तरह मारापीटा.

कुछ दिनों के बाद मैनब ने फिर से भागने की योजना बनाई, लेकिन  इस बार भी वह पकड़ी गई. इस के बाद भी वह वहां से भागने की कोशिश करती रही, पर कामयाब नहीं हो सकी. देखतेदेखते करीब साढ़े 4 साल गुजर गए. मैनब जब नरक भोग रही थी, तभी एक दिन उस के साथ रात गुजारने के लिए लुंबिनी का रहने वाले श्यामप्रसाद आया. श्यामप्रसाद की बहन बस्ती में ब्याही थी.

श्याम जब भी बस्ती आता था, वहां की धंधा करने वाली औरतों के पास जरूर जाता था. उस दिन इत्तेफाक से वह मैनब के पास पहुंच गया था. श्याम के बातचीत करने के तौर तरीके से मैनब समझ गई कि वह उस के ही इलाके का रहने वाला है. उस ने उसे अपनी पूरी कहानी बताई.

मैनब की कहानी सुन कर श्याम को बहुत दुख हुआ. उस ने मैनब से वादा किया कि वह उस के पिता को तलाश कर रहेगा. श्याम मैनब से उस के पिता का नामपता ले कर लुंबिनी आया और उस के पिता हबीब से मिला. उस ने उन्हें मैनब के बारे में कुछ न बता कर उन का फोन नंबर ले लिया. उस ने सोचा था कि इस बार जब वह बस्ती जाएगा तो उन की मैनब से सीधी बात करा देगा.

मौका निकाल कर श्याम बस्ती आया. इस बार उस ने फोन कर के सीधे मैनब से ही मिलने का वक्त तय किया. मिलने पर उस ने उसे सारी बात बताई. साथ ही कहा भी कि वह उसे उस के पिता से मिला कर रहेगा. उस ने मैनब से शारीरिक संबंध बनाने से भी मना कर दिया. बातोंबातों में श्याम ने मैनब के पिता को फोन लगा दिया.

पिता की आवाज सुन कर मैनब खुद पर काबू नहीं रख सकी. वह फोन पर ही फफक कर रोने लगी. कुछ देर तो हबीब को समझ ही नहीं आया कि वह क्या करे? फिर उस ने खुद को संभाल कर बेटी को दिलासा दी. हबीब बूढ़ा जरूर हो चुका था, पर बेटी से मिलने की इच्छा ने उसे अलग तरह की ताकत दे दी थी. वह बोला, ‘‘बेटी, तू परेशान मत हो, मैं जल्दी ही बस्ती आऊंगा तुम्हें लेने. अब तुम्हें वहां कोई नहीं रोक पाएगा.’’

पिता की बातों से मैनब को भरोसा होने लगा कि अब वह उस नरक से निकल जाएगी. हां उसे शातिर दिमाग जावेद से जरूर डर लग रहा था. साथ ही वह यह सोच कर भी डर रही थी कि कहीं उस की वजह से उस का बूढ़ा बाप किसी मुश्किल में न पड़ जाए. एक बार तो उस ने सोचा भी कि पिता को मना कर दे और अपनी बाकी की जिंदगी उसी दलदल में निकाल दे. लेकिन अपने बच्चों के बारे में सोच कर वह हर तरह का खतरा उठाने को तैयार हो गई.

जनवरी, 2014 के पहले सप्ताह में हबीब मैनब को तलाश करने के लिए बस्ती की देहव्यापार मंडी में आ पहुंचा. बस्ती रेलवे स्टेशन के पास ही बसा वेश्या बाजार पुरानी पतली गलियों में बने छेटेछोटे बदबूदार कमरों से भरा हुआ था. दोपहर के समय हबीब इस बस्ती में गया. वह मैनब को तलाशने के लिए जानबूझ कर श्याम का सहारा नहीं लेना चाहता था. उसे डर था कि कहीं उस की मौजूदगी से जावेद को शक न हो जाए.

हबीब जब वेश्या बाजार की तरफ जाने लगा तो उस का जमीर साथ नहीं दे रहा था. बुढापे में उसे वेश्या बाजार में जाना ठीक नहीं लग रहा था. लेकिन इस के अलावा उस के पास कोई रास्ता भी नहीं था. कई लोगों ने उसे व्यंग्य भरी नजरों से देखा भी, लेकिन उस ने उन की परवाह नहीं की.

वेश्या बाजार में आदमी की उम्र नहीं, पैसा देखा जाता है. हबीब ने भी पैसे दिखाने शुरू किए तो देहजीवा उस के करीब आने लगीं. हबीब उन से बात करता और आगे बढ़ जाता. इस तरह उस ने कई दिन मंडी में इधरउधर घूमते निकाल दिए. वेश्या बाजार में बेटी की तलाश में भटकते एक पिता को ग्राहक बन कर घूमना पड़ रहा था.

बस्ती के वेश्या बाजार में हर उम्र की औरतें देह व्यापार करती हैं. ये सभी औरतें खुद को एकदूसरी से ज्यादा जवान और कमउम्र की समझती हैं. कई बार वह उम्रदराज पुरुषों का मजाक उड़ाने से भी नहीं चूकतीं. कई जगह हबीब का भी मजाक उड़ाया गया. लेकिन उस ने परवाह नहीं की.

2 दिन इसी तरह निकाल गए. तीसरे दिन हबीब को मैनब दिख गई. बाजार की बात थी, इसलिए हबीब ने उसे इशारा कर के अपने पास बुलाया और ग्राहक की तरह बात की. मैनब ने भी पिता से उसी अंदाज में बात की और उन्हें ले कर अपने कमरे में आ गई. अकेले में वह पिता से लिपट कर फूटफूट कर रोई. बेटी का हालत देख हबीब ने सोचा कि क्यों न वह अपने बल पर ही मैनब को बाहर ले जाए.

उस ने अपनी यह इच्छा मैनब को भी बताई तो उस ने समझाया, ‘‘आप नहीं जानते, यहां गुंडों का राज है. किसी को जरा सा भी शक हो गया तो मुझे कहीं ऐसी जगह छिपा देंगे कि पता भी नहीं चल पाएगा.’’

‘‘बेटी, तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हें कल यहां से बाहर निकाल ले जाऊंगा.’’ कह कर हबीब वहां से बाहर आ गया. बाहर आ कर वह सीधे पुरानी बस्ती थाने गया. बस्ती का वेश्या बाजार इसी थानाक्षेत्र में आता है. लोगों ने हबीब को बताया था कि पुरानी बस्ती थाने के थानाप्रभारी प्रदीप सिंह तुम्हारी बेटी को वेश्या बाजार से बाहर निकालने का काम कर सकते हैं.

हबीब थानाप्रभारी प्रदीप सिंह के पास गया और उन के पैर पकड़ कर पूरी दास्तान बताई. प्रदीप सिंह ने हबीब की बात सुन कर बस्ती के एसपी वी.पी. श्रीवास्तव से संपर्क किया. उन्होंने आदेश दिया कि तुरंत काररवाई करें. इस के बाद प्रदीप सिंह ने पुलिस फोर्स के साथ 11 जनवरी, 2014 को बस्ती के वेश्या बाजार पर छापा मारा.

नतीजतन मैनब और उस के बच्चों को देहव्यापार कराने वालों के चंगुल से बाहर निकाल लिया गया. पुलिस ने मैनब से पूछ कर देहव्यापार कराने वाले रसूलनगर मोहल्ले के जावेद को भी पकड़ लिया. उस के खिलाफ अनैतिक देहव्यापार अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर के उसे जेल भेज दिया गया.

वेश्या बाजार से आजाद होने के बाद मैनब ने बताया कि उस ने वहां 4 साल से ज्यादा समय तक नरक जैसी जिंदगी गुजारी थी. हर रोज उस के शरीर को 5-10 ग्राहकों द्वारा रौंदा और नोचाखसोटा जाता था. वह तो जिल्लतभरी जिंदगी से बाहर निकल आई, पर अभी भी वहां उस की जैसी कई और लड़कियां हैं. मैनब ने बताया कि वहां जो लड़की आती है, वह पूरी तरह से दलालों के चंगुल में फंस कर रह जाती है.

शुरू में उसे नशे की गोलियां खिला कर मारपीट कर इस धंधे में उतरने के लिए तैयार किया जाता है. बाद में मजबूर हो कर उसे उन की बात माननी पड़ती है. यहां नेपाल और बिहार की गरीब और लाचार लड़कियों को लाया जाता है. उस की किस्मत अच्छी थी कि देर से ही सही, पर बच गई. उस के पिता बहुत अच्छे हैं, जिन्होंने यहां रहने के बाद भी मुझे अपना लिया.

मैनब के पिता हबीब ने बताया कि उस ने तो अपनी बेटी को मरा समझ कर भुला दिया था. उस की बेटी इस स्थिति में मिलेगी, उस ने कभी सोचा भी नहीं था.

मैनब के बरामद होने के बाद बस्ती के एसपी वी.पी. श्रीवास्तव ने इस वेश्या बाजार को जबरन देहव्यापार का अड्डा नहीं बनने देने का संकल्प लिया और एक मुहिम चला कर दलालों को वहां से खदेड़ने की शुरुआत कर दी. देखने वाली बात यह है कि वह कब तक अपना संकल्प पूरा कर पाते हैं. मैनब अपने पिता के साथ अपने घर नेपाल चली गई है, जहां वह मेहनतमजदूरी कर के अपनी जिंदगी का बोझ खुद उठाएगी और अपने बच्चों को पालेगी. Best Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों और मैनब की बातचीत पर आधारित. कहानी में कुछ नाम बदल दिए गए हैं.

Crime Story Hindi: खुल गया महंत की हत्या का राज

Crime Story Hindi: 20 जून, 2014 को सुबह से ही भीषण गरमी थी. सुबह के 11 बजे के आसपास उत्तराखंड के जिला हरिद्वार के कुंभ मेला  नियंत्रण कक्ष के बाहर काफी भीड़ जमा थी. क्योंकि थोड़ी देर बाद वहां हरिद्वार के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डा. सदानंद दाते 2 साल पहले महानिर्वाणी अखाड़े के श्रीमहंत सुधीर गिरि हत्याकांड का खुलासा करने वाले थे. इसलिए वहां के साधुसंत, राजनेता, पत्रकार और अन्य लोग तरहतरह की चर्चाएं कर रहे थे.

श्रीमहंत की हत्या 14 अप्रैल, 2012 की रात को उस समय हुई थी, जब वह कार से हरिद्वार से गांव बेलड़ा स्थित अपने महानिर्वाणी अखाड़े जा रहे थे.  38 वर्षीय युवा श्रीमहंत सुधीर गिरि की हत्या हुए 2 साल से भी ज्यादा का समय बीत चुका था, मगर उन के हत्यारों का पुलिस को पता नहीं चल सका था. इसलिए संत समाज में पुलिस के प्रति काफी रोष था. हत्या के वक्त रुड़की के थानाप्रभारी कुलदीप सिंह असवाल थे, जो काफी तेजतर्रार थे. उन्होंने भी इस मामले में दरजनों संदिग्धों से पूछताछ की थी. सर्विलांस के माध्यम से भी उन्होंने हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने की कोशिश की थी, मगर उन्हें सफलता नहीं मिली थी.

इस के बाद इस केस को सुलझाने के लिए थाना ज्वालापुर, पथरी, कनखल के थानाप्रभारियों और देहरादून की एसटीएफ टीम को लगाया गया था, लेकिन वे भी पता नहीं लगा सके थे कि श्रीमहंत का हत्यारा कौन है. मीडिया ने भी इस मामले को काफी उछाला था, फिर भी यह केस नहीं खुल सका था. इस मामले के खुलने की किसी को कोई उम्मीद भी नहीं थी.

अब 2 साल बाद जैसे ही लोगों को श्रीमहंत सुधीर गिरि के हत्यारों के गिरफ्तार होने की जानकारी मिली साधुसंतों, पत्रकारों के अलावा आम लोग भी कुंभ मेला नियंत्रण कक्ष के बाहर जमा हो गए थे. सभी के मन में हत्यारों के बारे में जानने की उत्सुकता थी. एसएसपी ने जब मौजूद लोगों के सामने महंत के हत्यारे की घोषणा की तो सभी दंग रह गए. क्योंकि पुलिस ने जिस आदमी का नाम बताया था, वह एक कंस्ट्रक्शन कंपनी का मालिक था और वह श्रीमहंत सुधीर गिरि के अखाड़े में मुंशी भी रह चुका था. उस का नाम था आशीष शर्मा.

आशीष शर्मा ने श्रीमहंत सुधीर गिरि की हत्या जो कहानी पुलिस को बताई थी, वह इस प्रकार थी. सुधीर गिरि का जन्म पुरानी रुड़की रोड स्थित दौलतपुर गांव के रहने वाले दर्शन गिरि के यहां हुआ था. दर्शन गिरि गांव में खेतीबाड़ी करते थे. उन के 2 बेटे और 2 बेटियां थीं. बच्चों को उस ने खेतीकिसानी से दूर रख कर उन्हें उच्च शिक्षा हासिल कराई.

पढ़लिख कर बड़े बेटे प्रदीप की रेल कोच फैक्ट्री कपूरथला (पंजाब) में नौकरी लग गई. दोनों बेटियों की वह शादी कर चुके थे. कहते हैं कि पूत के पैर पालने में ही दिख जाते हैं. सुधीर गिरि का साधुसंतों के प्रति लगाव बचपन से ही था. वर्ष 1981 में इन के पिता दर्शन गिरि ने उन्हें पढ़ने के लिए कनखल, हरिद्वार के एक स्कूल में भेजा तो सुधीर स्कूल से लौटने के बाद शाम को महानिर्वाणी अखाड़े के मंदिर में जरूर जाते थे.

उस समय वह बाबा हनुमान के सान्निध्य में रह कर मंदिर की देखरेख करते थे. हनुमान बाबा के सान्निध्य में रहने की वजह से सुधीर गिरि पर धीरेधीरे संन्यास का रंग चढ़ने लगा. उन का संसार, समाज और रिश्तेनाते से मोह भंग होने लगा.

सुधीर गिरि ने एक दिन अपने पिता से स्पष्ट कह भी दिया कि वह जल्द ही संन्यास ले लेंगे. यह सुन कर पिता हैरान रह गए. उन्होंने बेटे को समझाया. बाद में मां भी बेटे के सामने गिड़गिड़ाई, लेकिन सुधीर गिरि ने जिद नहीं छोड़ी. सुधीर गिरि के इस फैसले से घर में कोहराम मच गया. भाईबहनों और रिश्तेदारों ने भी सुधीर गिरि को समझाया और संन्यास न लेने की सलाह दी.

सुधीर गिरि ने सब की बात अनसुनी कर दी. बात सितंबर, 1988 की है. उस समय सुधीर गिरि की उम्र मात्र 13 साल थी और वह उस समय कक्षा 8 में पढ़ रहे थे. उसी दौरान वह अचानक घर से गायब हो गए. सुधीर गिरि के अचानक गायब होने से घर वाले परेशान हो गए. उन्होंने आसपास के क्षेत्रों व हरिद्वार के अखाड़ों में उन की काफी तलाश की. लेकिन सुधीर गिरि का कहीं भी पता नहीं चला. पिता दर्शन गिरि ने जब हनुमान बाबा से पूछा तो उन्होंने कहा कि सुधीर गिरि ने उन से दीक्षा तो ली थी, मगर इस समय वह कहां है, उन्हें मालूम नहीं.

घर वालों के जेहन में एक सवाल यह भी उठ रहा था कि कहीं उस की किसी ने हत्या तो नहीं कर दी. बहरहाल काफी खोजबीन के बाद भी जब सुधीर गिरि का कोई सुराग नहीं मिला तो घर वाले थकहार कर बैठ गए. 10 साल बाद दर्शन गिरि को कहीं से पता चला कि सुधीर गिरि कुरुक्षेत्र (हरियाणा) के एक आश्रम में है और उस ने संन्यास ले लिया है. दर्शन गिरि परिवार सहित बेटे से मिलने कुरुक्षेत्र के आश्रम पहुंचे तो पहले सुधीर गिरि ने अपने परिजनों से मिलने से ही मना कर दिया.

किसी तरह जब मां व बहनें उस से मिलीं तो उन्होंने उन से साफ कह दिया कि अब उन्होंने संन्यास ले लिया है, इसलिए उन का इस समाज व संसार से कोई नाता नहीं है. यह सुनते ही मां और बहनों की आंखों में आंसू आ गए. वह उस से वापस घर चलने के लिए गिड़गिड़ाने लगीं. लेकिन सुधीर गिरि पर उन के गिड़गिड़ाने का कोई असर नहीं पड़ा.

सुधीर गिरि ने अंत में यही कहा, ‘‘संन्यास ले कर मैं ने कुछ ऐसा नहीं किया, जिस से परिवार की प्रतिष्ठा को धब्बा लगे. इसलिए मेरी आप लोगों से विनती है कि आप अब मेरा पीछा करना और मुझे खोजना बंद कर दें.’’

इतना कह कर सुधीर गिरि आश्रम के अंदर चले गए. परिजन रोतेबिलखते घर लौट गए.

इस के बाद सुधीर गिरि लगभग 6 सालों तक कुरुक्षेत्र में रहे. फिर वह हरिद्वार स्थित अखाड़े में रहने लगे. वह महंत हो गए तो उन के नाम के साथ श्रीमहंत जुड़ गया. श्रीमहंत सुधीर गिरि ज्यादातर अखाड़े की प्रौपर्टी की देखरेख में व्यस्त रहते थे. वह अकसर अखाड़े के संतों द्वारा जमीन बेचने का विरोध करते थे. अखाड़े में प्रौपर्टी डीलरों के आने पर उन्हें ऐतराज रहता था, इसलिए वह अपने अखाड़े में किसी प्रौपर्टी डीलर को घुसने नहीं देते थे.

इसी अखाड़े में आशीष शर्मा उर्फ टुल्ली काम करता था. वह कनखल के रहने वाले सुभाष शर्मा का बेटा था. अखाड़े की काफी जमीनजायदाद थी. आशीष का काम अखाड़े की आयव्यय का ब्यौरा रखना था. सालों पहले आशीष ने अखाड़े के संतों से कुछ जमीन सस्ते में खरीद कर महंगे दामों में बेच दी थी. इस के बाद वह कुछ प्रौपर्टी डीलरों व बिल्डरों से भी जुड़ गया था. सन 2004 में जब श्रीमहंत सुधीर गिरि गुरु हनुमान बाबा इस अखाड़े से जुड़े तो उन्होंने अखाड़े की जमीन बेचने का विरोध किया. इसी बात को ले कर एक बार आशीष और हनुमान बाबा की बहस हुई तो आशीष को अखाड़े से निकाल दिया गया.

सन 2006 में आशीष दोबारा अखाड़े में आया, तो उसे अखाड़े का मुंशी बना दिया गया. कुछ दिनों बाद आशीष ने अखाड़े की एक प्रौपर्टी को बेचने की बात चलाई तो हनुमान बाबा ने इस का विरोध किया. सन 2010 के कुंभ मेले के दौरान गुरु हनुमान के शिष्य श्रीमहंत सुधीर गिरि को अखाड़े का सचिव बनाया गया तो उन्होंने भी अखाड़े की जमीन बेचने का विरोध करना शुरू कर दिया. इस के एक साल बाद आशीष ने अपनी मरजी से अखाड़े की नौकरी छोड़ दी. प्रौपर्टी के धंधे में आशीष करोड़ों के वारेन्यारे कर चुका था.

आशीष पहले से ही श्रीमहंत से रंजिश रखता था, क्योंकि उन के विरोध की वजह से वह अखाड़े की जमीन नहीं बेच पाया था. इस के अलावा उसे इस बात का भी डर था कि कहीं श्रीमहंत उस के कारनामों की पुलिस प्रशासन के सामने पोलपट्टी न खोल दे, इसलिए आशीष उर्फ टुल्ली ने श्रीमहंत की हत्या कराने की ठान ली.

श्रीमहंत की हत्या करवाने के लिए आशीष ने मुजफ्फरनगर की सरकुलर रोड निवासी प्रौपर्टी डीलर हाजी नौशाद से संपर्क किया. हाजी नौशाद ने आशीष की मुलाकात इम्तियाज और महताब से कराई, जो शूटर थे. दोनों ही शूटर मुजफ्फरनगर में रहते थे. वे दोनों मुजफ्फरनगर के बदमाश थे. 9 लाख रुपए में श्रीमहंत सुधीर गिरि की हत्या की बात तय हो गई.

उस वक्त श्रीमहंत कभी कनखल तो कभी बेलड़ा स्थित महानिर्वाणी अखाड़े में रहते थे. दोनों शूटर कई महीने तक आशीष के साथ बतौर ड्राइवर रहे और श्रीमहंत की रेकी करते रहे. 14 अप्रैल, 2012 को रात 8 बजे श्रीमहंत सुधीर गिरि हरिद्वार से गांव बेलड़ा स्थित महानिर्वाणी अखाड़े जा रहे थे. दोनों शूटर उन का पीछा कर रहे थे. जैसे ही श्रीमहंत की कार रुड़की के निकट बेलड़ा गांव के बाहर पहुंची, दोनों शूटरों ने उन पर फायरिंग कर के उन की हत्या कर दी.

हत्या करने के बाद दोनों शूटर वापस मुजफ्फरनगर चले गए. फिर कुछ महीने बाद ये शूटर हरिद्वार आ कर आशीष के साथ प्रौपर्टी के धंधे में लग गए. आशीष का प्रौपर्टी का धंधा अच्छा चल रहा था. उस ने एक कंस्ट्रक्शन कंपनी भी बना ली थी. इम्तियाज और महताब को आशीष 25-25 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन देता था. इन दोनों शूटरों को उस ने अपने पास इसलिए रख रखा था कि विवाद वाली प्रौपर्टी का सौदा करने में उन का उपयोग कर सके.

मामला एक महंत की हत्या का था, इसलिए पुलिस प्रशासन हरकत में आ गया. तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों के अलावा एसटीएफ ने भी श्रीमहंत सुधीर गिरि की हत्या के मामले को सुलझाने की भरसक कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली. जांच अधिकारियों को आशीष उर्फ टुल्ली पर शक तो हुआ था. लेकिन अपनी ऊंची पहुंच की वजह से बच गया था. पुलिस जब भी उस से सख्ती से पूछताछ करती, वह अपनी ऊंची पहुंच के बल पर विवेचना अधिकारी को ही बदलवा देता था.

श्रीमहंत की हत्या को तकरीबन 2 साल बीत चुके थे, इसलिए आशीष और दोनों शूटर निश्चिंत हो गए थे. आशीष इन शूटरों के जरिए देहरादून की एक प्रौपर्टी को हथियाने की योजना बना रहा था. श्रीमहंत की हत्या के बाद तत्कालीन क्षेत्रीय सांसद हरीश रावत अफसोस जताने कनखल स्थित महानिर्वाणी अखाड़े गए थे. उस वक्त हरीश रावत ने इस हत्याकांड की सीबीआई जांच कराने की मांग तत्कालीन बहुगुणा सरकार से की थी. उत्तराखंड में राजनैतिक बयार बदलने पर हरीश रावत प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो संत समाज में श्रीमहंत सुधीर गिरि हत्याकांड खुलने की आस जागी.

अखिल भारतीय दशनाम गोस्वामी समाज के मीडिया प्रभारी प्रमोद गिरि ने 14 जून, 2014 को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत को पत्र लिख कर श्रीमहंत की हत्या की सीबीआई जांच कराने की मांग की. प्रमोद गिरि के इस पत्र का जादू की तरह असर हुआ. पत्र पढ़ते ही मुख्यमंत्री हरीश रावत को अपने वे शब्द याद आ गए जो उन्होंने महानिर्वाणी आश्रम में कहे थे. इसलिए उन्होंने श्रीमहंत सुधीर गिरि की हत्या का राज खोलने के लिए प्रदेश पुलिस मुख्यालय को सख्त निर्देश दिए, साथ ही उन्होंने यह हिदायत भी दी कि इस केस की तफतीश करने वाले पुलिस अधिकारियों पर कोई दबाव न बनाया जाए.

एसएसपी डा. सदानंद दाते ने इस हत्याकांड की जांच के लिए एक पुलिस टीम बनाई, जिस में एसपी (सिटी) एस.एस. पंवार, रुड़की के थानाप्रभारी योगेंद्र चौधरी, हरिद्वार के एसओजी प्रभारी नरेंद्र बिष्ट व रुड़की के एसओजी प्रभारी मोहम्मद यासीन को शामिल किया. टीम का निर्देशन एसपी (देहात) अजय सिंह कर रहे थे. केस की फाइल का विस्तृत अध्ययन करने के बाद टीम को आशीष शर्मा उर्फ टुल्ली पर शक हुआ.

तब एसपी (सिटी) एस.एस. पंवार ने आशीष शर्मा को अपने कार्यालय में बुला कर सख्ती से पूछताछ की तो इस हत्या पर पड़ा परदा हट गया. उस ने स्वीकार कर लिया कि श्रीमहंत की हत्या उसी ने कराई थी. इस के बाद उस ने हत्या की पूरी कहानी पुलिस को बता दी. आशीष से पूछताछ के बाद पुलिस ने 20 जून, 2014 को मुजफ्फरनगर से हाजी नौशाद, इम्तियाज और मेहताब को भी गिरफ्तार कर लिया.

तीनों आरोपियों को हरिद्वार ला कर गहन पूछताछ की गई. पूछताछ में इम्तियाज और महताब ने पुलिस को बताया कि उन की मुलाकात हाजी नौशाद ने ही आशीष शर्मा से कराई थी. उसी के कहने पर उन्होंने श्रीमहंत सुधीर गिरि की हत्या की थी. थानाप्रभारी योगेंद्र चौधरी ने चारों आरोपियों के बयान दर्ज कर लिए. उन की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त पिस्टल, एक देशी तमंचा और भारी मात्रा में कारतूस भी बरामद किया गया.

इंसपेक्टर योगेंद्र सिंह चौधरी ने बताया कि इस प्रकरण में आशीष से जुड़े कुछ नेताओं, पत्रकारों  और पुलिस वालों के नाम भी सामने आ रहे हैं. केस में अगर उन की संलिप्तता पाई जाती है तो सुबूत जुटा कर उन के खिलाफ भी काररवाई की जाएगी. पूछताछ और सुबूत जुटा कर सभी अभियुक्तों को कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Lucknow Crime News: बेइज्जत करना पड़ा भारी

Lucknow Crime News: बेइज्जतमहत्त्वाकांक्षी नंदिनी पति को छोड़ कर लखनऊ में प्रौपर्टी का कारोबार करने के साथसाथ सैक्स रैकेट भी चलाने लगी थी. यही सैक्स का कारोबार उस की जान का दुश्मन बन गया.

9 सितंबर की दोपहर लखनऊ के थाना इंदिरानगर की राहुल विहार कालोनी में रोज की तरह सब ठीकठाक चल रहा था कि अचानक सायरन बजाती पुलिस की गाडि़यां कालोनी के एक मकान के सामने आ कर रुकीं तो लोग किसी अनहोनी की आशंका से घरों से बाहर निकल आए. घटना पंकज कुमार सिंह के मकान में घटी थी, जिसे इंदिरानगर के सेक्टर 17 के मकान नंबर 646 में किराए पर रहने वाली नंदिनी तिवारी ने किराए पर ले रखा था. पुलिस के पहुंचते ही उत्सुकतावश भारी संख्या में लोग इकट्ठा हो गए थे.

दरअसल, उस मकान में किराए पर रहने वाली नंदिनी तिवारी को गोली मारे जाने की सूचना थाना इंदिरानगर पुलिस को उस के बेटे मनीष ने दी थी. उसी की सूचना पर पुलिस वहां पहुंची थी. दिनदहाड़े महिला को गोली मारे जाने की सूचना पा कर डीआईजी डी.के. चौधरी, एसएसपी राजेश पांडेय, सीओ (गाजीपुर) दिनेश पुरी और थानाप्रभारी धीरेंद्र यादव पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गए थे.

पुलिस अधिकारी मकान के बाहरी कमरे को पार कर के पीछे वाले कमरे में पहुंचे तो बैड के पास पड़ी कुरसी पर 45-46 वर्षीया नंदिनी तिवारी घायल पड़ी थी. उस का सिर दाईं ओर झुका था. सिर के नीचे गरदन के ऊपरी हिस्से पर घाव था. इस के अलावा पीठ पर भी गहरा घाव था. इन घावों से बहा खून फर्श पर फैला था. अनुमान लगाया गया कि गोली काफी नजदीक से खड़े हो कर मारी गई थी, जो गरदन से घुस कर पीठ से निकल गई थी.

नंदिनी की सांसें चलती हुई महसूस हुईं तो पुलिस उसे लोहिया अस्पताल ले गई, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. इस के बाद धीरेंद्र यादव ने पुलिसिया काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भिजवा दिया.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. बैड पर चाय के कप रखे थे, जिन में सिगरेट के कई टुकड़े पड़े थे. इस का मतलब हत्यारे एक से अधिक थे और मृतका के परिचित थे. कमरे में ही कई मोबाइल फोन टूटे पड़े थे, जिन्हें पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. कुर्सी के पास ही नंदिनी का मंगलसूत्र टूटा पड़ा था. मकान का कोनाकोना खंगाला गया, लेकिन हत्यारों से जुड़ा कोई सबूत नहीं मिला. मकान में फर्नीचर न के बराबर था. ड्राइंगरूम में एक तख्त, फ्रिज और टीवी था. दूसरे कमरे में डबलबैड और अलमारी थी, जिस में कपड़े और कौस्मैटिक्स का सामान रखा था. जिस बैडरूम में हत्या हुई थी, उस में एक बैड, कुर्सी और अलमारी थी. अलमारी में कपड़े थे.

इन के अलावा तीनों कमरों से शराब की बोतलें, डिब्बे और भारी मात्रा में आपत्तिजनक चीजें बरामद हुईं, जिस से अंदाजा लगाया गया कि नंदिनी सैक्स रैकेट चलाती थी. इस का मतलब उसी धंधे से जुड़े किसी आदमी से उस का विवाद हो गया था, जिस में उस की हत्या हो गई थी. पुलिस अधिकारियों ने नंदिनी के बेटे मनीष से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस की मां नंदिनी उस के और भाई संदीप के साथ इंदिरानगर के सेक्टर 17 में रहती थी. वह प्रौपर्टी डीलिंग का काम करती थी. 3 महीने पहले उस ने यह मकान किराए पर लिया था. इस में वह दिन में एक बार जरूर आती थी.

इस मकान में उस की परिचित एक महिला पुनीता उर्फ खुशी करीब एक महीने से पति संजय यादव और बेटे के साथ रह रही थी. लगभग ढाई बजे खुशी और एक अन्य महिला सोनिया मेहरोत्रा ने आ कर उसे घटना की सूचना दी थी. सोनिया एलआईसी एजेंट थी. वह चौक में पान वाली गली में रहती थी. नंदिनी को गोली मारी गई तो खुशी और सोनिया घर में ही मौजूद थीं, इस का मतलब हत्या उन के सामने हुई थी. इस के बाद पुलिस अधिकारियों ने खुशी और सोनिया से पूछताछ की. खुशी ने बताया कि लगभग डेढ़ बजे 2 लड़के आए तो नंदिनी उन्हें ले कर पीछे वाले कमरे, जो बैडरूम था, में चली गईं.

उन के कहने पर वह उन के लिए चायनाश्ता भी दे आई. लगभग 2 बजे सोनिया जन्माष्टमी का प्रसाद ले कर मिलने आई तो नंदिनी के व्यस्त होने की वजह से वह बाहरी कमरे, जो ड्राइंगरूम था, में रुक गई और उस के साथ बैठ कर टीवी देखने लगी. कुछ देर बाद नंदिनी ने आवाज दे कर उन्हें बैडरूम में अपने पास बुला लिया. उस समय नंदिनी की दोनों लड़कों से कहासुनी हो रही थी. दोनों लड़कों ने उसे और सोनिया को एक तरफ खड़ा कर दिया और उन में से एक लड़के ने जेब से पिस्तौल निकाल कर नंदिनी को गोली मार दी. उन्होंने उन्हें भी गोली मारने की कोशिश की, लेकिन किसी कारण से गोली नहीं चली.

इस के बाद उन लड़कों ने उन के और नंदिनी के गहने तथा मोबाइल छीन लिए. मोबाइलों को तो उन्होंने तोड़ कर वहीं फेंक दिए और बाहर से कमरा बंद कर के भाग गए. कमरे में बने रोशनदान से किसी तरह वह निकल कर बाहर आई और कमरा खोल कर सोनिया को निकाला. इस के बाद उस ने घटना की सूचना मनीष को दी. सोनिया ने खुशी की बात की पुष्टि की. उस ने बताया कि वह नंदिनी को 6 साल से जानती थी. उस ने नंदिनी का बीमा किया था. इस के बाद नंदिनी ने उस से कई लोगों का बीमा करवाया था. आज वह जन्माष्टमी का प्रसाद देने आई थी, तभी यह घटना घट गई. इस के बाद खुशी और सोनिया ने दोनों अज्ञात हत्यारों का जो हुलिया बताया था, उस के हिसाब से उन की उम्र 22-23 साल रही होगी.

अब तक फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड आ गए थे. फोरैंसिंक टीम घटनास्थल से साक्ष्य जुटाने में लग गई. डौग स्क्वायड का खोजी कुत्ता कमरे से निकल कर बाहर आया और कालोनी की गलियों में घूमता हुआ करीब 2 सौ मीटर दूर बनी झोपड़पट्टी के पास जा कर रुक गया. आसपास के लोगों से भी पूछताछ की गई, लेकिन उन से भी कोई ठोस सुराग हाथ नहीं लग सका.

थाने से चंद कदमों की दूरी पर यह घटना घटी थी. नंदिनी के घर से थाने के लिए 2 रास्ते थे. एक तो काफी खराब था, दूसरा पक्का था. दोनों रास्तों पर सीसीटीवी कैमरे तलाशे गए, लेकिन कहीं भी कैमरा लगा नहीं मिला. हत्यारों के थाने के सामने से निकलने के बारे में सोच कर थाने के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज खंगाली गई तो उस में भी ऐसा कोई आदमी नजर नहीं आया, जैसा हुलिया खुशी और सोनिया ने बताया था.

पुलिस ने घर वालों, सभी करीबियों तथा परिचितों के मोबाइल नंबर ले लिए. इस के बाद थाने आ कर धीरेंद्र यादव ने मृतका के बेटे मनीष तिवारी की तहरीर पर अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. सोनिया और खुशी को बुला कर उन के बताए अनुसार, हत्यारों के स्कैच बनवाए गए. अब तक की जांच में पता चला था, नंदिनी अपने पति अजय तिवारी से 19 सालों से अलग रह रही थी. अजय बिहार के सीवान जिले में नौकरी करता था. नंदिनी के बेटे मनीष ने अपने पिता को घटना की खबर न दे कर लखनऊ में ही रहने वाले अपने मौसीमौसा को खबर दी थी.

घटना की खबर पा कर सभी रिश्तेदार पोस्टमार्टम हाउस पहुंच गए थे. रिश्तेदारों ने अजय को भी नंदिनी की हत्या की सूचना दी थी, पर वह नहीं आया था. पोस्टमार्टम के बाद शव मिलने पर बेटों ने रिश्तेदारों की मदद से उस का अंतिम संस्कार कर दिया था. अगले दिन जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो उस में गोली मारने से पहले नंदिनी के साथ मारपीट किए जाने की भी पुष्टि हुई. नंदिनी की गरदन के पीछे ऐसे निशान पाए गए थे, जो उस के साथ हुई मारपीट की तरफ इशारा कर रहे थे.

धीरेंद्र यादव ने नंदिनी के तीनों मोबाइल नंबरों को चेक किया. उस के वाट्सएप नंबर वाले मोबाइल पर कई लड़कियों के ऐसे फोटो और मैसेज मिले, जिस से उस के गलत कामों में लिप्त होने के संकेत मिल रहे थे. घटनास्थल से मिली आपत्तिजनक चीजों और मोबाइल से मिले फोटो से लग रहा था कि नंदिनी सैक्स रैकेट चलाती थी. सोशल मीडिया द्वारा भेजे गए संदेशों से भी लग रहा था कि नंदिनी के कई लड़कियों से संपर्क थे. पुलिस ने जब नंदिनी के बड़े बेटे संदीप का मोबाइल चेक किया तो उस के मोबाइल में भी कई लड़कियों के फोटो मिले, जो उस ने वाट्सएप से दूसरों को भेजे थे.

पुलिस ने नंदिनी के नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस में जिन नंबरों पर नंदिनी की ज्यादा बातचीत होती थी, उन नंबरों को अलग कर लिया गया. उन नंबरों की घटना के दिन की लोकेशन देखी गई. जिस नंबर की लोकेशन घटनास्थल के नजदीक की थी. उन का रिकौर्ड देखा गया. उन नंबरों में से एक नंबर की लोकेशन पहले इंदिरानगर और फिर खुर्रमनगर की थी. उस नंबर से घटना के दिन नंदिनी के नंबर पर फोन भी आया था.

उस नंबर के बारे में पता किया गया तो वह नंबर लखनऊ के गोमतीनगर थानाक्षेत्र के विनीत खंड निवासी अभिषेक कनौजिया का निकला. थानाप्रभारी ने अभिषेक के कालेज का पता कर के कालेज से उस की फोटो निकलवाई. इस बात की भनक अभिषेक और उस के किसी करीबी को भी नहीं लगने दी गई. वह फोटो उन्होंने खुशी और सोनिया को दिखाया तो उन्होंने उसे पहचान लिया. वह दोनों हत्यारों में से एक था और उसी ने नंदिनी की गोली मार कर हत्या की थी. इस के बाद पुलिस ने अभिषेक के घर पर दबिश दी तो वह घर से फरार मिला. 12 सितंबर को धीरेंद्र यादव ने एक गुप्त सूचना पर गोमतीनगर में हुसडि़या पुल के पास से अभिषेक कनौजिया को उस के एक साथी के साथ गिरफ्तार कर लिया.

अभिषेक के साथ गिरफ्तार हुए युवक का नाम विनय चौहान था और वह गोमतीनगर में विनय खंड में रहता था. अभिषेक से पूछताछ की गई तो उस ने विनय के साथ मिल कर नंदिनी की हत्या करने का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने हत्या के पीछे की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी. नंदिनी बिहार के सीवान जिले की रहने वाली थी. उस के पति अजय तिवारी कृषि विभाग में नौकरी करते थे. उन के 2 बेटे थे, संदीप और मनीष. नंदिनी पहले तो ठीकठाक थी, लेकिन 2 बेटों के होने के बाद उस में अचानक आश्चर्यजनक परिवर्तन आ गया था. इस की वजह थी, उस की संगति कुछ अमीर घर की महिलाओं से हो गई थी.

वे महिलाएं दिल खोल कर पैसे खर्च करती थीं और ठाठ से रहती थीं. संगति का असर तो होना ही था. नंदिनी को भी उन महिलाओं की तरह पैसे खर्च करने की आदत पड़ गई. वैसे भी साथ में रह कर खर्च करना ही पड़ता है. इस फिजूलखर्ची को ले कर नंदिनी की पति से रोज कहासुनी होने लगी. अजय ने उसे काफी समझाया, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ. रोजरोज झगड़े होने लगे तो नंदिनी को अजय के साथ रहना दुश्वार लगने लगा. आखिर उस ने अजय से अलग होने का फैसला कर लिया.

अजय ऐसा नहीं चाहता था, लेकिन वह भी नंदिनी की हरकतों से आजिज हो चुका था. इसलिए वह भी अलग होने को तैयार हो गया. अजय ने उसे एक निश्चित रकम दे कर पीछा छुड़ा लिया. दोनों बेटों के साथ नंदिनी 1996 में लखनऊ आ गई. यहां उस ने जानकीपुरम के सेक्टर 3 में एक तीनमंजिला मकान नंबर 407 खरीद लिया और उसी में अपने दोनों बेटों के साथ रहने लगी. उस ने घर में किराएदार भी रख लिए, जिस से उस का खर्च चलने लगा. लखनऊ में उस ने कुछ परिचितों की मदद से प्रौपर्टी डीलिंग का काम शुरू किया. यहां पारा थानाक्षेत्र में उस के बहनोई रहते थे, उन से भी उसे मदद मिलती थी.

धीरेधीरे नंदिनी का काम चल निकला. इस काम से उसे अच्छा मुनाफा होेने लगा. जल्दी ही उस का परिचय रसूखदारों, नेताओं और अधिकारियों से हो गया. महिला होने का उसे फायदा भी काफी मिला. हाईसोसायटी के लोगों में उठनाबैठना शुरू हुआ तो तरहतरह के लोगों से उस का वास्ता पड़ने लगा. नंदिनी उन के साथ रह कर शराब भी पीने लगी. वह अमर सिंह की पार्टी से भी जुड़ गई, जिस में उसे महिला लोकमंच का नगर अध्यक्ष बना दिया गया.

हाईसोसायटी में 2 चीजें प्रसिद्ध होती हैं, एक शराब और दूसरी शबाब. इस की वजह यह है कि ऐसे लोगों के पास पैसों की कमी तो होती नहीं. जब इंसान के पास अथाह पैसा होता है तो उस में ऐब आ ही जाते हैं. इन में सब से बड़े ऐब शराब और शबाब हैं. इन चीजों की जानकारी नंदिनी को भी हो गई. उस ने देखा, इस काम में बैठेबिठाए जितना पैसा मिलता है, उतना किसी काम में नहीं है. कमाई देख कर नंदिनी ने इस काम को अपनाने का फैसला कर लिया. उस के संपर्क में कुछ ऐसी लड़कियां थीं, जो पैसों की खातिर कुछ भी करने को तैयार थीं. नंदिनी ने उन से बात की तो वे चोरीछिपे यह काम करने को तैयार हो गईं. कुछ घंटों में हजारों कमाने की चाहत में वे लड़कियां इस दलदल में उतर गईं.

लड़कियों के आने के बाद नंदिनी उन की डीलिंग करने लगी. अपने संबंधों का फायदा उठा कर वह लोगों को पैसों के बदले लड़कियां होटलों या उन के बताए ठिकाने पर उपलब्ध कराने लगी. उस का यह धंधा दिन दूना रात चौगुना तरक्की करने लगा. इसी बीच नंदिनी ने देखा कि कई ग्राहक ऐसे होते हैं, जो होटलों में जाने का खतरा नहीं उठाना चाहते. ऐसे लोगों के लिए नंदिनी ने इंदिरानगर के सेक्टर 17 में मकान नंबर 646 किराए पर ले लिया. यह मकान एलआईसी में नौकरी करने वाले विनोद सिंह का था. इसी मकान में लोगों को लड़कियां मुहैया कराती थी. नंदिनी ग्राहकों से मिले रुपयों से 25 प्रतिशत लड़कियों को देती थी, बाकी खुद रख लेती थी.

इस के बाद वह अपने बेटों के साथ इंदिरानगर वाले मकान में शिफ्ट हो गई. यहां आने के बाद उस ने सैक्स वाला धंधा बंद कर दिया. उस ने जानकीपुरम वाला अपना मकान किराए पर उठा दिया था. धंधे के लिए उस ने राहुलविहार में एक मकान किराए पर ले लिया. वह अपना काम इतने गुपचुप ढंग से करती थी कि किसी को खबर नहीं लगती थी. उस के बेटों तक को इस बात की खबर नहीं थी कि उन की मां ने और भी कोई मकान किराए पर ले रखा है. थोड़ेथोड़े समय पर वह मकान  बदल देती थी.

चूंकि वह प्रौपर्टी डीलिंग के धंधे से जुड़ी थी, इसलिए उस के घर बड़ेबड़े लोगों का आनाजाना लगा रहता था. इस की वजह से आसपास के लोगों को उस पर शक नहीं होता था. यही वजह थी कि वह कभी पकड़ी नहीं गई. कोई भी मकान किराए पर लेने पर मकानमालिक सत्यापन कराता तो वह पाकसाफ निकलती. इसलिए आसानी से उसे मकान किराए पर मिल जाता था. दूसरी ओर नंदिनी के दोनों बेटे अपनी मां के कार्य से अंजान अपना कैरियर बनाने की कोशिश कर रहे थे. इस समय बड़ा बेटा संदीप माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय से मासकौम की पढ़ाई कर रहा है तो छोटा मनीष पीसीएस की तैयारी कर रहा है. नंदिनी ने स्पीक एशिया जैसी कंपनी में भी अपना पैसा लगा रखा था.

उस ने कई बीमे भी करा रखे थे. ये सारे बीमे उस ने चौक की पान वाली गली निवासी सोनिया मेहरोत्रा से कराए थे. 35 वर्षीया सोनिया एलआईसी एजेंट थी. उस का पति आजाद मेहरोत्रा भी एलआईसी एजेंट था. सोनिया के नंदिनी से इतने घनिष्ठ संबंध थे कि नंदिनी ने अपनी पहुंच से उसे कई मालदार आसामियों के बीमे कराए थे. लखनऊ के गोमतीनगर थानाक्षेत्र के विनीत खंड में अभिषेक कनौजिया उर्फ विस्सू रहता था. वह बाराबंकी के एक कालेज से बीकौम की पढ़ाई कर रहा था. उस के पिता अनिल कुमार कनौजिया लेखाविभाग में क्लर्क थे. कालेज के कुछ मित्रों की संगत में पड़ कर अभिषेक ने गलत राह पकड़ ली थी.

वह इतना खूबसूरत नहीं था कि कालेज की लड़कियां उस की ओर आकर्षित होतीं. दोस्तों के बीच हमेशा लड़कियों के बारे में बातें होती रहती थीं, लेकिन लड़कियों का सान्निध्य मिलना तो दूर, उन लोगों की तरफ कोई देखती तक नहीं थी. सभी दोस्त शराब और पोर्न फिल्मों के शौकीन थे. महंगे स्मार्टफोन पास में होने के कारण सोशल मीडिया के जरिए वे एकदूसरे को अश्लील फोटो व वीडियो क्लिप भेजते रहते थे. अभिषेक के कुछ दोस्त अपने तन की गरमी शांत करने के लिए कालगर्ल्स के पास भी जाने लगे थे.

कालगर्ल्स से मिलने वाले आनंद को वे दोस्तों के सामने आ कर बढ़ाचढ़ा कर बताते, जिस से अभिषेक के मन में भी वह आनंद पाने की चाहत जाग उठी. इस के लिए उस ने अपने बहराइच निवासी एक दोस्त सलमान से बात की तो उस ने उस की मुलाकात नंदिनी तिवारी से करा दी. सलमान नंदिनी के यहां मौजमस्ती करने जाता रहता था. अभिषेक की मुलाकात नंदिनी से हुई तो वह हर हफ्ते उस के यहां जाने लगा. नंदिनी उसे उस की पसंद की लड़की 2 घंटे के लिए अपने ही घर में उपलब्ध करा देती थी, बदले में उस से 8 से 10 हजार रुपए ले लेती थी. अभिषेक नंदिनी के मकान में शराब पीता और पसंद की हुई लड़की के साथ रंगरलियां मनाता.

धीरेधीरे अभिषेक ने इस मौजमस्ती में अपने सारे रुपए उड़ा दिए. जब उस के पास पैसे नहीं रहे तो उस ने दूसरों से कर्ज लेना शुरू कर दिया. वह शराब और सैक्स का इतना आदी हो गया था कि इन दोनों के बिना रह नहीं सकता था. कर्ज में लिए गए रुपए भी खत्म हो गए. ऐसी हालत में जब वह बिना पैसों के नंदिनी के यहां जाता तो नंदिनी उसे लड़कियों के सामने ही दुत्कारने लगती. जून, 2015 में नंदिनी ने किराए पर मकान दिलाने वाले ब्रोकर का पैंफ्लेट देखा तो उस में लिखे मोबाइल नंबर पर फोन किया और किराए का मकान दिलाने को कहा. उस ब्रोकर ने मूलरूप से सीतापुर निवासी प्रौपर्टी डीलर विनीत से नंदिनी को मिलवाया.

नंदिनी ने प्रौपर्टी डीलर विनीत को अपनी आईडी के तौर पर आधार कार्ड की छायाप्रति दी और कहा कि उस के पति बाहर नौकरी करते हैं और उस के 2 बच्चे हैं, जो स्कूल में पढ़ते हैं. यह झूठ बोल कर नंदिनी ने किसी तरह प्रौपर्टी डीलर को झांसे में ले लिया, जिस के बाद उस प्रौपर्टी डीलर ने नंदिनी को इंदिरानगर थानाक्षेत्र के राहुल विहार में पंकज कुमार सिंह का मकान 10 हजार रुपए मासिक किराए पर दिला दिया. मकान मालिक पंकज सिंह हरिद्वार में नौकरी करता था और परिवार के साथ रहता था. पंकज का भाई इंदिरानगर में रहता था, उसे ही हर महीने किराया देने की बात तय हुई.

इस मकान की देखभाल और आने वाले मेहमानों की आवभगत के लिए नंदिनी ने 8 अगस्त को पुनीता उर्फ खुशी को रख लिया. 30 वर्षीया खुशी नंदिनी के जानकीपुरम वाले मकान के पड़ोस में रहती थी. वहीं उस का नंदिनी से परिचय हुआ था. मूलरूप से बिहार निवासी पुनीता उर्फ खुशी तिवारी ने सीतापुर के संदना थानाक्षेत्र निवासी संजय यादव उर्फ छोटू से विवाह किया था. उस का 3 साल का बेटा था. संजय लखनऊ के विकासनगर थानाक्षेत्र की एक कपड़े की दुकान पर काम करता था. वह सुबह घर से निकलता था तो देर रात लौटता था.

इस मकान में 3 कमरे थे, जिन में से 2 कमरे बैडरूम और एक कमरा ड्राइंगरूम बना दिया गया. जो मिलने आता था, उसे ड्राइंगरूम में बैठा दिया जाता था और दोनों बैडरूम लोगों को लड़कियों के साथ मौजमस्ती के लिए मुहैया कराए जाते थे. नंदिनी इस मकान में अकसर दिन में आती थी, कभीकभी रात में भी रुक जाती थी.दूसरी ओर नंदिनी के तानों से आजिज अभिषेक ने उसे सबक सिखाने की ठान ली थी. उस ने अपनी मोटरसाइकिल खरगापुर निवासी सुरेंद्र बहादुर को 20 हजार रुपए में बेच दी और उसी पैसों से उस ने एक पिस्तौल खरीदी.

इस के बाद उस ने अपने दोस्त विनय चौहान से बात की. वह उस का साथ देने को तैयार हो गया. विनय गोमतीनगर में विनय खंड में रहता था. वह ताज होटल में वेटर था, लेकिन इधर उस ने नौकरी छोड़ दी थी.  9 सितंबर की सुबह अभिषेक ने नंदिनी को मिलने के लिए फोन किया तो उस ने उसे बुला लिया. लेकिन उस ने उसे अपने लिए वोदका शराब की एक बोतल लाने को कहा. अभिषेक ने नंदिनी के लिए वोदका शराब और अपने दोनों के लिए बीयर के 2 केन खरीदे. इस के बाद वह विनय के साथ औटो से नंदिनी के इंदिरानगर के राहुल विहार वाले मकान पर पहुंच गया.

अभिषेक ने नंदिनी के सामने आते ही पैर छुए. नंदिनी उन दोनों को ले कर बैडरूम में चली गई. उसी बीच उस ने खुशी से चायनाश्ता दे जाने के लिए कहा. नंदिनी से अभिषेक बातें करने लगा. खुशी चाय बना कर दे गई. तीनों ने चाय पी. इस के 15 मिनट बाद नंदिनी ने शराब पी तो अभिषेक और विनय ने बीयर पी. नंदिनी ने उन दोनों की बीयर में अपनी थोड़ी शराब भी डाल दी. तभी सोनिया जन्माष्टमी का प्रसाद देने आई. नंदिनी को 2 लड़कों से बातें करते देख वह ड्राइंगरूम में बैठ कर टीवी देखने लगी. जब शराब का नशा चढ़ा तो नंदिनी ने अभिषेक को ताना मारा कि उस के पास रुपए नहीं है तो वह क्यों चला आता है.

इस के बाद दोनों में कहासुनी होने लगी. नंदिनी से अभिषेक ने मारपीट की तो उस ने ड्राइंगरूम में बैठी खुशी और सोनिया को कमरे में बुला लिया. उस ने दोनों को कमरे में एक किनारे खड़ा कर दिया. विनय ने उन्हें कवर किया तो अभिषेक ने जेब से पिस्टल निकाल कर खड़ेखड़े कुर्सी पर बैठी नंदिनी को पास से गरदन के ऊपरी हिस्से में गोली मार दी, जो कि पीठ से बाहर निकल गई. नंदिनी घायल अवस्था में बेहोश हो गई. अभिषेक ने नंदिनी, खुशी और सोनिया के मोबाइल ले कर तोड़ दिए. अभिषेक को उन दोनों से खतरा नहीं था, क्योंकि वे उसे पहचानती नहीं थीं. फिर उन्हें कमरे में बंद कर के दोनों वहां से बाहर निकले और औटो से चले गए.

कमरे में एसी लगाने के लिए रोशनदान में गत्ता लगा हुआ था, जिसे हटा कर खुशी बाहर निकली और कमरे का दरवाजा खोल कर सोनिया को बाहर निकाला. इस के बाद उन्होंने नंदिनी के बेटे मनीष को घटना की सूचना दी. धीरेंद्र यादव ने अभियुक्तों की निशानदेही पर अंसल से हत्या में प्रयुक्त पिस्तौल बरामद कर ली. खुशी और सोनिया से हुई लूट की बात पुलिस जांच में गलत निकली. आवश्यक काररवाई के बाद दोनों को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया. Lucknow Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

True Crime Story: तेजाब की आंच से ताउम्र झुलसेंगे आरोपी

True Crime Story:अपनी प्रेमिका लावण्या को पाने के लिए हरदीप ने दोस्त के साथ मिल कर तेजाब कांड को अंजाम दिया. इस कांड के बाद उसे प्रेमिका तो नहीं मिली, लेकिन अदालत से ऐसी सजा जरूर मिल गई कि ताउम्र वह प्रेमिका से नहीं मिल सकेगा.

राकेश रेखी पंजाब पुलिस के रिटायर्ड एसपी देशराज के बेटे थे. मोहाली की फेज-1 मार्केट में रुद्राक्ष ग्रुप इमीग्रेशन नाम से उन की एक कंपनी थी. उन के दफ्तर में कई युवकयुवतियां काम करते थे. धार्मिक विचारों के राकेश जब भी माता चिंतपूर्णी देवी मंदिर जाते, अपने औफिस के कुछ कर्मचारियों को भी साथ ले जाते थे. पहली सितंबर, 2011 को भी एक कार्यक्रम बना कर अपनी फोर्ड आईकान कार नंबर सीएच03जे 2042 से माता चिंतपूर्णी देवी मंदिर के लिए निकले. इस बार भी वह अपने साथ औफिस से 4 जनों को ले गए थे. कार वह खुद चला रहे थे.

स्टाफ की 25 वर्षीया स्वातिका उन के बगल वाली सीट पर बैठी थी, जबकि 24 वर्षीया शिवालिका कार की पिछली सीट पर थी. स्टाफ के 2 लोग शेर खान और नवनीत इन के पीछे दूसरी गाड़ी में आ रहे थे. राकेश को अपनी गाड़ी में पैट्रोल भरवाना था, इसलिए वह राष्ट्रीय राजमार्ग-21 पर मोहाली और खरड़ के बीच स्थित एक पैट्रोल पंप पर चले गए. उस समय शाम के करीब 5 बजे थे, वह अकसर उसी पैट्रोल पंप पर कार में पैट्रोल भरवाने जाते थे. पैट्रोल टैंक फुल करवाने के बाद पेमेंट करने के लिए उन्होंने खिड़की का शीशा नीचे किया कि तभी उन के ऊपर जैसे कहर बरपा गया.

विपरीत दिशा से 2 बाइक सवार उन की कार के पास पहुंचे. आगे वाले ने हैलमेट लगा रखा था, जबकि दूसरा बिना हैलमेट के था. उस के हाथ में 5 लीटर की कैन थी, जिस का ऊपरी हिस्सा कटा हुआ था. जो शख्स कैन पकड़े था, वह राकेश के एकदम पास आ गया. राकेश को यह सब अजीब सा लगा. वह उस से कुछ बोलने को हुए, तभी उस युवक ने कैन में भरा तरल पदार्थ कार के अंदर बैठी युवतियों पर फेंक दिया. तरल पदार्थ फेंक कर वह युवक उसी बाइक से फरार हो गया. इस के बाद तो कार के भीतर चीखपुकार मच गई.

राकेश भी कराह उठे. कार का दरवाजा खोल कर वह बाहर आ गिरे थे. वह दर्द से तड़प रहे थे. कार के अंदर बैठी दोनों युवतियां भी चीखतीचिल्लाती हुई कार से बाहर निकल आई थीं. जरा सी देर में बात साफ हो गई कि बाइक सवारों द्वारा उन पर जो तरल पदार्थ डाला गया था, वह तेजाब था. उन का मुख्य निशाना वह लड़की थी, जो राकेश के बगल वाली सीट पर बैठी थी. वही तेजाब से सब से ज्यादा झुलसी थी. इस घटना के बाद पैट्रोल पंप पर भी अफरातफरी मच गई. कार में से बह कर तेजाब फर्श पर फैलने लगा था, जिस पर पैट्रोल पंप कर्मियों ने फोम डाल दी, ताकि अफरातफरी में वहां कोई फिसल कर न गिरे. पैट्रोल पंप कर्मियों ने इस घटना की सूचना पुलिस को दी और तीनों घायलों को पीजीआई अस्पताल ले गए.

सूचना मिलते ही थाना बलौंगी के थानाप्रभारी भूपेंद्र सिंह अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. बाद में खरड़ के डीएसपी सुखदेव सिंह विर्क और मोहाली के एसएसपी गुरप्रीत सिंह भुल्लर भी मौकाएवारदात पर पहुंच गए. पुलिस ने घटनास्थल पर मौजूद राकेश के कर्मचारी शेर खान और पैट्रोल पंप कर्मियों से घटना के बारे में पूछताछ की. घायलों से मिलने के लिए पुलिस अधिकारी पीजीआई अस्पताल भी गए और शेर खान की तरफ से अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज कर ली. एसपी ने इस सनसनीखेज मामले को सुलझाने के लिए डीएसपी सुखदेव सिंह विर्क के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई.

पुलिस ने पैट्रोल पंप पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की जांच शुरू की. इस में बाइक और उस पर सवार 2 लोग दिखाई तो दे रहे थे, मगर न तो बाइक का नंबर साफ पढ़ने में आ रहा था और न ही उस पर बैठे लड़के किसी की पहचान में आ रहे थे. घटना की सूचना पा कर राकेश की कंपनी के कई कर्मचारी अस्पताल और थाने पहुंचे. पुलिस ने उन्हें सीसीटीवी फुटेज दिखाई तो उन्होंने बताया कि तेजाब फेंकने वाला युवक उन के औफिस में काम करने वाली स्वातिका का बौयफ्रैंड हो सकता है. इस वारदात में स्वातिका भी झुलस चुकी थी, इसलिए पुलिस ने भी यही अनुमान लगाया कि शायद उस लड़के ने प्यार में नाकाम होने पर स्वातिका को निशाना बनाया होगा.

पुलिस ने जांच की तो पता चला कि स्वातिका का वह कथित बौयफ्रैंड पहले गुड़गांव में काम करता था, बाद में वह डेरा बस्ती की किसी फैक्ट्री में नौकरी करने लगा था. लेकिन इन दिनों उस के चंडीगढ़ में काम करने की जानकारी मिली. बिना नामपते के उस के पास पहुंचना आसान नहीं था. पुलिस ने स्वातिका की सहेलियों से इस बारे में पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि स्वातिका की उस लड़के से बोलचाल थी, वह उसे प्रपोज भी करने लगा था लेकिन स्वातिका उसे खास पसंद नहीं करती थी. फिर वह अकसर उसे परेशान करने लगा था. स्वातिका ने जब उस के प्रति अपना रुख सख्त किया तो वह उसे देख लेने की धमकियां भी देने लगा था.

पुलिस ने उन सभी सहेलियों से कहा कि वह उस के कथित बौयफ्रैंड का नामपता जुटाने में पुलिस का सहयोग करें. संदर्भवश बता दें कि 80 के दशक में सर्वथा पहली बार यह तेजाबकांड सुर्खियों में तब आया था, जब मध्यप्रदेश के जिला जबलपुर में एक सिरफिरे ने अपनी प्रेमिका के चेहरे पर तेजाब उड़ेला था. उसे अपनी प्रेमिका पर शक था कि उस के संबंध किसी और से हैं. हालांकि उस समय निजी न्यूज चैनल नहीं थे, इस के बावजूद भी इस घटना से पूरे देश में सनसनी फैल गई थी. इस के बाद तो देश भर में इस तरह की घटनाएं जैसे आम हो गईं. मजबूरन सरकार को तेजाब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाना पड़ा.

खैर, इस ताजा केस में तेजाब के हमले से 3 लोग घायल हो गए. स्वातिका 80 प्रतिशत, शिवालिका 10 प्रतिशत और राकेश रेखी 40 प्रतिशत झुलस चुके थे. तीनों पीजीआई के इमरजेंसी वार्ड में भरती थे. पुलिस अभी तक उन के बयान नहीं ले पाई थी. फिलहाल अनुमान यही लगाया जा रहा था कि यह एकतरफा प्यार का मामला है. साफ नजर आ रहा था कि स्वातिका के उन्मादी प्रेमी का निशाना वही थी, बाकी दोनों तो उस के साथ बैठे होने की वजह से लपेटे में आ गए थे. स्वातिका के कथित प्रेमी का पता लगाने को पुलिस ने अपने मुखबिर भी सक्रिय कर दिए थे. मुखबिरों से ही पता लग गया कि जिस शख्स ने तेजाब फेंका था, उस का नाम भावेश है और वह चंडीगढ़ के सेक्टर-49 का रहने वाला है.

एसएसपी के आदेश पर सीआईए इंसपेक्टर गुरचरन सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम भावेश की तलाश में उस के घर पहुंच गई. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. अगले दिन एक गुप्त सूचना के आधार पर सीआईए टीम ने भावेश को चंडीगढ़ से गिरफ्तार कर लिया. रातभर उस से व्यापक पूछताछ की गई. इस पूछताछ में पता चला कि वह भारतीय जीवन बीमा निगम में एजेंट था. डेढ़ साल पहले स्वातिका भी एलआईसी की उसी शाखा में एजेंट थी. एक ही जगह काम करने की वजह से दोनों की आपस में मुलाकात होती रहती थी.

उसी दौरान भावेश ने स्वातिका से प्यार का इजहार कर दिया. स्वातिका ने साफ कह दिया कि वह प्यारव्यार के चक्कर में न पड़ कर, अपने संबंध केवल दोस्ती तक ही सीमित रखना चाहती है. लेकिन भावेश तो जैसे उस के पीछे हाथ धो कर पड़ गया. तब स्वातिका ने परेशान हो कर एलआईसी का काम ही करना बंद कर दिया. इस के बाद वह राकेश रेखी के यहां नौकरी करने लगी. भावेश को जब पता चला तो वह उस का वहां भी पीछा करने लगा. अपनी एकतरफा प्यार की कहानी तो भावेश ने तमाम शिद्दत से सुना दी. लेकिन पुलिस द्वारा अपने सभी तरीकों से पूछताछ कर लेने पर भी वह यही दोहराता रहा कि स्वातिका पर तेजाब फेंकने में उस का कोई हाथ नहीं है.

उस ने भावुक हो कर कहा था, ‘‘सर, स्वातिका को मैं अपनी जान से ज्यादा चाहता हूं. उसे नुकसान पहुंचाने की तो मैं कभी सपने में भी नहीं सोच सकता. मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि उस के साथ ऐसी दुश्मनी निभाने की हिमाकत किस ने की.’’

गहन पूछताछ कर के इंसपेक्टर गुरचरन सिंह को वह बेकुसूर लगा तो उन्होंने हिदायत दे कर उसे घर भेज दिया. पुलिस ने जिस एंगल से जांच करनी शुरू की थी, वहां से कोई सफलता नहीं मिल पाई. पुलिस ने स्वातिका के घर वालों से भी बात की, लेकिन वहां से भी कोई खास जानकारी नहीं मिली. उसी दौरान पुलिस को मुखबिर से एक खास जानकारी मिली. उस सूचना पर पुलिस ने काम किया तो 16 सितंबर, 2011 को 2 ऐसे आदमी पुलिस के हत्थे चढ़ गए, जिन्होंने पुलिस की प्रारंभिक पूछताछ में स्वीकार कर लिया कि उन्होंने ही इस तेजाब कांड को अंजाम दिया था.

उन्होंने बताया कि उन का निशाना कोई और न हो कर राकेश रेखी था. दोनों लड़कियां तो राकेश के साथ कार में बैठी होने की वजह से लपेटे में आ गई थी, जिस का उन्हें भारी अफसोस हुआ. उन दोनों से की गई पूछताछ से जो खुलासा हुआ वह इस तरह से था कि गांव देसूमाजरा के रहने वाले हरदीप सिंह उर्फ दीपा और जगवंत सिंह उर्फ बिट्टू आपस में गहरे दोस्त थे. बिट्टू अपना निजी कारोबार करता था और दीपा मोहाली के कस्बे कुराली में अपना नशामुक्ति केंद्र चलाता था. एक बार एक औरत अपने शराबी पति के साथ उस की शराब छुड़ाने की दरकार को ले कर दीपा के नशामुक्ति केंद्र आई. वह औरत इतनी खूबसूरत थी कि पहली ही नजर में हरदीप उर्फ दीपा का उस पर दिल आ गया. खूबसूरती के अनुरूप उस का नाम भी निहायत खूबसूरत था— लावण्या.

हरदीप अभी कुंवारा था और लावण्या शादीशुदा थी. उस से बात करने के बाद हरदीप अपने दिल पर काबू नहीं रख सका. लावण्या तो जैसे सीधे उस के दिल में उतर कर उस के तनमन को सराबोर कर गई थी.  उस के पति को हरदीप ने अपने नशामुक्ति केंद्र में भरती कर लिया. इस के बाद वह लावण्या से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश करने लगा. उसे विश्वास में लेने के लिए उस ने उसे यह गारंटी दे दी थी कि आने वाले चंद महीनों में वह उस के पति में इतना सुधार कर देगा कि वह कभी शराब को हाथ नहीं लगाएगा. हरदीप की बात सुन कर लावण्या बहुत खुश हुई. बाद में वह 4-5 दिन पर पति के हालचाल जानने के लिए उस के नशामुक्ति केंद्र आने लगी. बीच में भी वह फोन कर के हरदीप से पति की जानकारी लेती रहती थी.

इस तरह लावण्या और हरदीप एकदूसरे के करीब आते गए. नशेड़ी पति के बजाय उस का झुकाव हरदीप की तरफ बढ़ता गया. लावण्या राकेश लेखी की कंपनी में काम करती थी. लावण्या का पति पुराना नशेड़ी था. इसलिए उस का नशा इतनी जल्दी नहीं छूट सकता था. इसलिए हरदीप को भरोसा था कि इस बीच वह लावण्या को अपने प्रेमजाल में फांस कर उस के पति से तलाक दिलवा कर उसे अपनी बना लेगा. इस तरह दोनों का मिलनाजुलना जारी रहा. लावण्या ने एक दफा हरदीप को मुलाकात का समय दे दिया. हरदीप निश्चित जगह पर उस का इंतजार करने लगा. काफी देर इंतजार के बाद भी वह उस से मिलने नहीं आई. हरदीप ने जब उसे फोन किया तो उस का फोन भी स्विच्ड औफ मिला. इस से हरदीप को गुस्सा आ गया.

अगले दिन लावण्या ने ही हरदीप को फोन कर के मुलाकात न हो पाने की मजबूरी बताई. उस ने कहा कि उस का बौस राकेश रेखी मां चिंतपूर्णी देवी मंदिर जाता है तो कंपनी के कुछ कर्मियों को अपने साथ ले जाता है. इस के लिए कोई इनकार नहीं करता. इस दफा उस ने एकदम अंतिम समय पर उसे साथ चलने को कहा. वह उसे मना नहीं कर पाई और अपना मोबाइल स्विच्ड औफ कर उस के साथ चली गई. अभी तक तो हरदीप को अपनी प्रेमिका लावण्या पर नाराजगी थी. पर जब उसे पता चला कि इस में गलती लावण्या की नहीं, बल्कि उस के बौस राकेश रेखी की है तो उस का खून खौल उठा. राकेश जब भी कहीं बाहर जाते तो लावण्या को अपने साथ जरूर ले जाते थे.

इस से हरदीप राकेश को अपना जानी दुश्मन समझने लगा. मन ही मन उन्हें सबक सिखाने की ठान ली. इस बारे में अपने खास दोस्त जगवंत सिंह बिट्टू से बात की तो वह उस का साथ देने को तैयार हो गया. दोनों ने राकेश को सबक सिखाने के लिए एक फूलपू्रफ योजना बना ली. हरदीप ने मोहाली की एक दुकान से तेजाब खरीदा. फिर उसे ऊपर से कटी हुई कैन में डाल लिया, ताकि वह आसानी से डाला जा सके. फिर योजना को अंजाम देने का मौका ढूंढने लगा. उसे पता चला कि पहली सितंबर को राकेश ने चिंतपूर्णी देवी जाने का प्रोग्राम बनाया है और इस बार वह लावण्या के बजाय अन्य लोगों को ले जा रहे हैं.

हरदीप औफिस से राकेश के निकलने का इंतजार करने लगा. वह मौका उसे पैट्रोल पंप पर उस समय मिल गया, जब राकेश ने पैट्रोल के पैसे देने के लिए खिड़की खोली. लेकिन जैसे ही उस ने राकेश को निशाना बना कर तेजाब फेंका, राकेश ने अपना चेहरा पीछे हटा लिया, जिस से निशाना अगली सीट पर बैठी स्वातिका बन गई. राकेश के बजाय दोनों युवतियों के जख्मी होने का हरदीप को बहुत अफसोस हुआ. दोनों अभियुक्तों से पूछताछ पूरी कर पुलिस ने उन्हें अदालत पर पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

उधर अस्पताल में भरती देहरादून की रहने वाली स्वातिका की हालत बिगड़ती जा रही थी. इन्फैक्शन बढ़ जाने के कारण 19 सितंबर को उस की अस्पताल में ही मौत हो गई. उस की मौत हो जाने के बाद पुलिस ने इस केस में धारा 302 भी बढ़ा दी. तेजाब की वजह से राकेश रेखी की एक आंख की रोशनी चली गई और उन के जिस्म पर इतनी सर्जरी हुई कि इस की गिनती उन्हें भी नहीं मालूम. बिना सहारे के वह कहीं आजा भी नहीं सकते. 90 दिनों के भीतर पुलिस ने दोनों अभियुक्तों के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर इलाका मैजिस्ट्रेट के सामने पेश कर दिया, जहां से सैशन कमिट हो कर यह केस मोहाली के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश परमिंदरपाल सिंह की अदालत में चला.

विद्वान न्यायाधीश ने दोनों पक्षों को तमाम तवज्जो दे कर सुना और सभी साक्ष्यों को विधिपूर्वक जांचापरखा. अभियोजन पक्ष की ओर से 48 गवाहों ने अपने बयान अदालत में दर्ज करवाए. 27 मई, 2015 को इस केस का फैसला सुना दिए जाने की उम्मीद थी. दोनों अभियुक्तों को सुबह ही अदालत में बैठा दिया गया था. उस दिन इस चर्चित केस की सुनवाई कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच हुई. अदालत के भीतरबाहर दोनों पक्षों की हिफाजत के लिए बाऊंसरों की भरमार थी. पुलिस द्वारा भी अदालत में आनेजाने वाले लोगों पर कड़ी नजर रखी जा रही थी. किसी को भी बिना पर्याप्त चैकिंग व पूछताछ के भीतर नहीं जाने दिया जा रहा था. राकेश रेखी अभी तक भी पूरी तरह ठीक नहीं हुए थे. वह अपने वकीलों के साथ अदालत में हाजिर थे.

सक्षम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश परमिंदरपाल सिंह ने उस दिन दोनों अभियुक्तों को धारा 302 एवं 307 का दोषी करार देते हुए 29 मई को सजा सुनाए जाने की बात कही. तब तक के लिए दोषियों को वापस जेल भिजवाने के आदेश दिए. 3 पुलिसकर्मी दोनों अभियुक्तों को ले कर कोर्ट रूम से बाहर निकले. वहां मीडिया के कुछ लोग खड़े थे, जिन्हें देखते ही दोनों अभियुक्तों ने पुलिस वालों से अपने हाथ छुड़वा कर मीडियाकर्मियों पर ही हमला बोल दिया. इस हमले में फोटो जर्नलिस्ट अमित वालिया की इन्होंने काफी पिटाई कर दी. बाद में इस पत्रकार ने इस संबंध में न केवल पुलिस को शिकायत दी, बल्कि अदालत को भी घटना के बारे में लिख कर दिया.

बहरहाल, 29 मई, 2015 को विद्वान एवं सक्षम जज परमिंदरपाल सिंह ने हरदीप सिंह उर्फ दीपा व जगवंत सिंह उर्फ बिट्टू को उक्त केस में ताउम्र कैद की सजा के अलावा 5-5 लाख रुपयों का जुरमाना भी किया. इस राशि में 4.60 लाख रुपए मृतका के परिजनों व 4.60 लाख राकेश रेखी को अदा करने के साथ 80 हजार रुपए सरकारी खजाने में जमा कराने के आदेश दिए. 29 मई, 2015 को दोनों अभियुक्तों को सजा सुनाई जानी थी. उस दिन मोहाली अदालत का परिदृश्य बाकी दिनों से एकदम अलग था. चारों तरफ पुलिस ही पुलिस नजर आ रही थी. दोनों अभियुक्तों के परिजन व अनेक दोस्त भी वहां पहुंचे थे. राकेश की हालत दयनीय थी, इस के बावजूद भी 50 बाउंसरों के घेरे में वहां आए हुए थे. वह अदालत के फैसले से बहुत खुश हुए.

उन का कहना था कि जिस लड़ाई को वह पिछले 4 सालों से जारी रखे हुए थे, उस का परिणाम संतोषजनक निकला. जिन लोगों ने एक युवती की जान लेने के साथ उन्हें जिंदा लाश बना कर रख दिया, उसे देखते हुए ऐसी सख्त सजा उन्हें मिलनी ही चाहिए थी. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

लावण्या नाम परिवर्तित है.

Thriller Hindi Story: प्रेम कहानी का स्याह रंग

Thriller Hindi Story: अति की आजादी मिलने पर बच्चों का बिगड़ जाना कोई बड़ी बात नहीं है. कारा भी अपने मातापिता की लापरवाही से बिगड़ी थी. मांबाप यह तो जानते थे कि गलत राह पर उठे पैरों को रोकना संभव नहीं है, उन्हें यह पता नहीं था कि वह किस हद तक जा सकती है. उस दिन मौसम का मिजाज बहुत खुशगवार था. शाम को भी यही स्थिति बनी रही.देखतेदेखते शाम सिमट गई और डूबते सूरज को अलविदा कह कर अंधेरे ने अपनी चादर फैला दी.

आसमान साफ था. छोटेबड़े सभी तारे जगमगाने लगे थे. चांद ने भी कुछ पल पहले अपने आने की आहट दे दी थी. चांदनी रात थी. हवा ऐसे गायब थी, जैसे चलना ही भूल गई हो. हवा बंद होने की वजह से लंबेघने दरख्तों पर झुंड में सिर से सिर जोड़े पत्ते भी खामोश थे. चारों तरफ सन्नाटा पसरा था. ठंड अपने यौवन पर थी, जिस के कारण लोग अपने घरों में दुबके हुए थे. उसी शांत वातावरण में कहकहों की कई आवाजें एक साथ गूंजीं. यह आवाजें बोर्डन हाऊस नाम की एक विशाल इमारत के मुख्य दरवाजे से आई थीं. यहां माइकम बोर्डन अपनी पत्नी कैथरीन बोर्डन और 3 बच्चों के साथ रहते थे. बड़ी बेटी कैटीलिन 15 साल की थी, उस से छोटी कारा 14 साल की तो सब से छोटा बेटा जेम्स महज 11 साल का था.

आज जेम्स की पहली गर्लफ्रैंड पहली बार घर आई थी. इस खुशी को सेलीब्रेट करने के लिए घर में छोटी सी पार्टी रखी गई थी. जब जेम्स की फ्रैंड जाने लगी तो सभी उसे विदा करने दरवाजे तक आए थे. तभी किसी ने कुछ ऐसा कह दिया था कि सभी दिल खोल कर हंस पड़े थे. इसी हंसीखुशी भरे माहौल को बीते एक घंटा भी नहीं हुआ था कि बोर्डन हाऊस से फिर एक के बाद एक 2 आवाजें गूंजीं. ये आवाजें गोलियां चलने की थीं. गोलियों की आवाजें सुन कर पड़ोसियों की नींद उड़ गई. सभी उस ओर भागे. जरूर बोर्डन हाऊस में कोई हादसा पेश आया था. हादसा वाकई दिल दहला देने वाला था. लोगों ने अंदर जा कर देखा तो मुंह से चीख निकल गई.

सामने माइकल और कैथरीन की लाशें पड़ी थीं, जबकि जेम्स और कैटीलिन कोने में सहमेदुबके बैठे थे. माइकल और कैथरीन की हत्या गोली मार कर की गई थी. इसी बीच किसी ने इस मामले की सूचना पुलिस को दे दी. कुछ ही देर में पुलिस वहां आ पहुंच गई. घटनास्थल और दोनों लाशों का निरीक्षण करने के दौरान पाया गया कि माइकल को गोली सिर के पीछे और कैथरीन को माथे पर मारी गई थी. लगता था, इस दोहरे हत्याकांड को एक सोचीसमझी योजना के तहत अंजाम दिया गया था. हत्यारे का उद्देश्य लूटपाट नहीं था, बल्कि कोई दुश्मनी थी या गहरी खुन्नस.

पुलिस ने कोने में सहमेदुबके बैठे जेम्स और कैटीलिन के सिर पर प्यार से हाथ फेरा तो दोनों फफकफफक कर रो पड़े. पूछने पर कैटीलिन ने बताया कि उस ने न केवल हत्यारे को अच्छी तरह से देखा था, बल्कि वह उसे पहचानती भी थी. हत्यारा कोई और नहीं, उस की बहन कारा का प्रेमी डेविड था. उस ने रोते हुए कहा, ‘‘वह कारा को भी साथ भगा कर ले गया है.’’

‘‘पर उस ने ऐसा क्यों किया?’’ पुलिस का सवाल था.

‘‘मम्मीपापा डेविड को पसंद नहीं करते थे. वह कारा को भी उस से नहीं मिलने देते थे.’’ कैटीलिन ने कहा, ‘‘वह कह रहा था कि कारा को कहीं दूर भगा ले जाएगा.’’

पुलिस ने अंदाजा लगाया कि माइकल और कैथरीन की हत्या कर के डेविड ने कारा का अपहरण कर लिया है और वह उसे हवाई जहाज द्वारा कहीं दूर ले जाएगा. इसी सब के चलते दोनों लाशों को आननफानन में पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. साथ ही सभी हवाई अड्डों को डेविड और कारा का हुलिया बताते हुए सचेत कर दिया गया कि दोनों दिखाई दें तो उन्हें रोक लिया जाए और पुलिस को सूचना दे दी जाए. शहर के सभी बार्डर पर तैनात पुलिस को भी सूचना दे दी गई. टीवी चैनलों पर भी यह खबर प्रसारित करवा दी गई कि एक 18 साल का युवक 2 हत्याएं कर के एक नाबालिग लड़की को भगा ले गया है. डेविड की फोटो तो नहीं मिल पाई थी, अलबत्ता कारा की फोटो जरूर चैनलों पर प्रसारित करवाई गई.

यह घटना 13 नवंबर, 2008 की रात की थी. पुलिस डेविड और कारा की खोज में जुटी थी. अगले दिन यानी 14 नवंबर को इंडियाना स्टेट में एक बीली विली कार तेज गति से सड़क पर दौड़ती दिखाई दी. इसे एक लड़का चला रहा था, जबकि लड़की उस की बगल वाली सीट पर बैठी थी. संभवत: यह कारा ही थी. इंडियाना अथौरिटी पुलिस उन का पीछा करने लगी. पुलिस ने कई बार कार को रोकने का संकेत भी दिया, पर कार नहीं रुकी. इस से यह बात पुख्ता हो गई कि वे दोनों डेविड और कारा ही थे. पुलिस करीब 5 किलोमीटर तक पुलिस कार का पीछा कर चुकी थी, पर कार नहीं रुकी थी. कार शहर से बाहर जंगलों में गुजर रही थी कि इसी दौरान संतुलन न रख पाने के कारण एक पेड़ से टकरा गई.

पुलिस की जीप वहां से थोड़ी दूरी पर थी, तभी पुलिस ने देखा कि कार के आगे की तरफ के दोनों दरवाजे खुले और एक तरफ से एक लड़का और दूसरी तरफ से एक लड़की बाहर निकली. दोनों भाग पाते, इस से पहले ही पुलिस वहां पहुंच गई और दोनों को हिरासत में ले लिया. ये दोनों कारा और डेविड ही थे. कार आगे से क्षतिग्रस्त हो गई थी, पर कारा और डेविड सुरक्षित थे. उन्हें खरोंच तक नहीं आई थी. डेविड को उसी समय गिरफ्तार कर लिया गया. कारा को बरामद कर के उस के एक रिश्तेदार के पास भेज दिया गया, जहां अनाथ हो चुके उस के भाईबहन भी रह रहे थे. अगले दिन डेविड को अदालत में पेश कर के उसे 2 हत्याओं और एक लड़की के अपहरण के जुर्म में जेल भेज दिया गया.

इस मामले की तफ्तीश इंडियाना अथौरिटी पुलिस कर रही थी. कई सप्ताह की तफ्तीश के बाद एक चौंका देने वाला सच सामने आया कि डेविड और कारा एकदूसरे से बेइंतहा प्यार करते थे. कारा को डेविड ने भगाया नहीं था, बल्कि वह खुद उस के साथ भागी थी. इतना ही नहीं उस के मांबाप का कत्ल भी उस की सहमति से उसी की मौजूदगी में किया गया था. यह जानकारी डेविड और कारा के इंटरनेट पर ब्लौगों को जांचने के बाद सामने आई थी. कारा के ब्लौग से साफ हो गया था कि वह अपनी मर्जी से डेविड के साथ भागी थी. अपने पिता माइकल और मां कैथरीन की हत्या की साजिश कारा ने डेविड के साथ रची थी. इतना ही नहीं, घटना वाले दिन कारा ने उसे फोन पर घटना को अंजाम देने को भी कहा था.

घटना के समय वह भी कमरे में मौजूद थी और डेविड को आंखों ही आंखों में इशारा कर रही थी कि वह फौरन उस के पिता व मां की हत्या कर दे. जैसे ही डेविड ने उस के पिता माइकल की हत्या की, कारा अंदर से दौड़ कर बाहर खड़ी डेविड की कार के पास आ गई थी और उस का इंतजार करने लगी थी. जब डेविड उस के पिता के बाद मां कैथरीन की हत्या कर के कार के पास आया तो कारा ने उस से कहा, ‘‘अब जल्दी यहां से भाग चलो, वरना पकड़े जाओगे. मैं आजाद होना चाहती हूं.’’

यह जानकारी पुलिस के लिए चौंका देने वाली थी. वह सहज ही विश्वास नहीं कर पा रही थी कि एक 14 साल की मासूम लड़की इतनी बड़ी घटना को अंजाम दिलवा सकती है. पर यही सच था. कारा ने अपने मातापिता का कत्ल क्यों करवाया, यह बात अभी साफ नहीं हो पाई थी. खैर, पुलिस ने डेविड को एक बार फिर से अदालत में पेश किया. अब उस पर से कारा के अपहरण का आरोप हटा दिया गया था. जबकि दूसरी तरफ कारा को पुलिस हिरासत में ले लिया गया था. डेविड अब भी यही दोहराए जा रहा था कि उस ने कोई कत्ल नहीं किया. पर जब सबूत खुद बोलने लगे तो उस की जुबान खामोश हो गई. उस ने कुछ देर के बाद चुप्पी तोड़ी,

‘‘हां, मैं ने ही किया था कारा के मांबाप का कत्ल. यह अपराध मैं ने कारा के कहने पर किया था.’’ इस के साथ ही उस ने वह हैंडगन भी बरामद करवा दी, जिस से उस ने दोनों कत्ल किए थे.

इधर कारा भी शुरुआती दौर में यह मानने को कतई तैयार नहीं थी कि उस ने ही अपने मांबाप का कत्ल करवाया है. उस ने कहा, ‘‘यह सच है कि डेविड मेरा बौयफ्रैंड है, पर मैं ने उसे कभी नहीं कहा कि वह मेरे मम्मीपापा की हत्या कर दे. यह उसी की चाल थी. उस ने घटना को अंजाम देने के बाद मेरा भी अपहरण कर लिया था.’’

कारा के बयान पर पुलिस को हंसी आ रही थी, क्योंकि उस के खिलाफ पुख्ता सबूत थे. बावजूद इस के वह सफेद झूठ बोल रही थी. खैर, पुलिस ने उसे भी अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. डेविड के बयान और कारा के ब्लौग पर उस के द्वारा लिखी इबारत और डेविड के साथ की गई उस की फोन पर बातचीत की जांच के बाद इस हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह चौंका देने वाली थी. कारा अपने मातापिता की दूसरे नंबर की संतान थी. पिता माइकल पेशे से स्कूल टीचर थे, साथ ही चर्च के प्रमुख कार्यकर्ता भी. मां कैथरीन भी पढ़ीलिखी थी, पर उस ने कोई नौकरी न कर के अपनी सारी शिक्षा अपने बच्चों की परवरिश और उन्हें अच्छे संस्कार देने में लगा दी थी.

घर का माहौल धार्मिक था. बावजूद इस के जाने कहां संस्कारों में कमी रह गई थी कि 14 साल की कारा सब कुछ नजरअंदाज कर अपने अलग ढंग से जीने लगी थी. कारा खूबसूरत तो थी ही, उम्र से पहले ही समझदार और जवान भी हो गई थी. जिस उम्र में बच्चे स्कूल और अपनी किताबों के अलावा कुछ सोचते भी नहीं, उस उम्र में कारा डांस बार में जाने लगी थी. संगीत से उसे बेहद प्रेम था. वह चाहती थी कि रात भर संगीत की धुन पर नाचती रहे. बार में एक युवक गिटार बजाता था. उम्र में वह कारा से दोगुना था.

बावजूद इस के वह उस के गिटार बजाने पर ही नहीं, उस पर भी मुग्ध हो गई थी. वह घंटों उस गिटारवादक को बिना पलक झपकाए निहारती रहती थी. वह कल्पना करती थी कि वह अपने स्पर्श से उस के मन और तन की तरंगों को इस तरह छेड़े कि नसनस में आनंद प्रवाहित हो जाए. वह गिटारवादक भी कारा की चाहत से अंजान नहीं था. इसीलिए उस ने उस के साथ नजदीकी बढ़ाई. धीरेधीरे दोनों ने शारीरिक सुख भी हासिल करना शुरू कर दिया. हर मिलन में चरम पर पहुंचने के बाद कारा कहती थी, ‘‘तुम वाकई अद्भुत कलाकार हो. संगीत से मेरे मन को तृप्त करते हो तो एकांत में मेरे रोमरोम में आनंद भर देते हो.’’

सब ठीक चल रहा था, लेकिन उस के प्रति कारा का मोह ज्यादा दिन कायम नहीं रह पाया. कारण, उस गिटारवादक के कई अन्य लड़कियों के साथ भी संबंध थे, जिन्हें कारा ने खुद अपनी आंखों से देखा था. इस कारण वह जब भी उस के साथ किसी लड़की को देखती तो बुरी तरह जलभुन जाती थी. धीरेधीरे जब उस की जलन नफरत में बदल गई तो कारा ने उस से किनारा कर लिया. संयोग से इसी दौरान डांस बार भी बंद हो गया. कुछ दिन तो कारा घर में कैद रही, पर जब फिर से उसे उस युवक के साथ बिताए देहसुख के पल याद आने लगे तो वह तड़पने लगी.

उस की तलाश में उस ने शहर के तमाम डांस बार छान मारे, पर उस का कुछ पता नहीं चला. इस पर कारा ने उसे भुलाने के लिए इंटरनेट का सहारा लिया. वह घंटों कंप्यूटर पर बैठी इंटरनेट खोल कर लड़कों से चैटिंग करती रहती. चैटिंग के दौरान ही उसे डेविड से मोहब्बत हो गई. दोनों के खयालात एक जैसे ही थे. इस लिए दोनों को नजदीक आते देर नहीं लगी. दोनों एकदूसरे को दिन में कईकई बार ईमेल भेज कर अपनी मोहब्बत का इजहार करने लगे. दोनों ने मेल के जरिए अपनीअपनी फोटो भी एकदूसरे को भेज दी थी.

जब कारा को पता चला कि डेविड भी उसी शहर में रहता है तो उस ने उस का मोबाइल नंबर ले लिया. रात के समय जब घर के सभी सदस्य सो जाते तो वह घंटों डेविड से मोबाइल पर बात करती. दोनों के बीच होने वाली बात अब सामान्य नहीं रह गई थी. दोनों जहां एकदूसरे से अश्लील बातें करते, वहीं एकदूसरे को शारीरिक सुख देने की चाहत का भी इजहार करते. इसी बीच एक दिन दोनों ने पिकनिक पर जाने का प्रोग्राम बना लिया. दोनों पहली बार शहर से दूर एक पिकनिक स्पाट पर मिले. पहली नजर में ही एकदूसरे को देखने के बाद दोनों ने कबूल किया कि उन की पसंद गलत नहीं थी. मोहब्बत कर के उन्होंने कोई भूल नहीं की थी. कारा की तरह डेविड भी सुंदर और जवान था.

वह 18 साल का था, जबकि कारा 14 साल की थी. डेविड भी एक धनाढ्य और सम्मानित परिवार का एकलौता बेटा था. उसे प्यार और पैसे की कभी कमी नहीं रही थी, जिस की वजह से वह राह भटक गया था. उस की संगत ऐसे दोस्तों से हो गई थी, जिन का शौक नशा करना और लड़कियों के साथ ऐश करना था. पहली मुलाकात में ही कारा और डेविड इस हद तक एकदूसरे से खुल गए थे कि एकदूसरे की बांहों में तो समा ही गए, उन्होंने देहसुख की चाहत भी मन में पाल ली. दोनों भीड़ से दूर घनी झाडि़यों के बीच जा बैठे. वहां बैठ कर दोनों अपने मन की इच्छा को ज्यादा देर नहीं दबा पाए और एकदूसरे के शरीर की गहराई नापने लगे. इस से कारा तो तृप्त हुई ही, डेविड भी उस के अधखिले शरीर को पा कर दीवाना हो गया.

इसी बीच डेविड ने न केवल दोनों के बीच देहसुख के पलों की तसवीर कैमरे में कैद कर ली थीं, बल्कि विभिन्न पोजों में कारा की न जाने कितनी नग्न तसवीरें भी उतार ली थीं. कारा उस की अंधी मोहब्बत और उस से मिले देहसुख में इस हद तक खो गई थी कि उस ने इस सब का कोई विरोध नहीं किया था. उस दिन दोनों चाहत की एक अनूठी अनुभूति ले कर घर लौटे. इस के बाद तो जब दिल करता, दोनों इस अनुभूति को ताजा कर लेते. जैसेजैसे दोनों में नजदीकी बढ़ रही थी, वैसेवैसे उमंगे भी बेलगाम होती जा रही थीं. चुलबुले स्वभाव की कारा तो डेविड की दीवानगी में इतनी डूब गई थी कि वह उस की नजदीकी पाने के लिए हर शर्त मंजूर कर लेती थी.

एक दिन डेविड ने कारा के सामने शर्त रखी कि वह अपनी बड़ी बहन कैटीलिन को राजी करे कि वह उस के दोस्त के साथ दोस्ती बढ़ा कर उस से देह संबंध बनाए. फिर चारों मिल कर खूब ऐश किया करेंगे. कारा ने बिना कुछ सोचे हामी भर दी. इस के बाद उस ने किसी तरह अपनी बहन को भी राजी कर लिया. फिर एक दिन चारों एक जगह मिले तो डेविड ने देह के इस खेल की वीडियो रिकौर्डिंग का भी इंतजाम कर लिया था. उस समय डेविड काले रंग के कपड़े पहने हुए था. डेविड ने अपने 19 वर्षीय दोस्त के साथ पहले हाथों में रिवौल्वर ले कर मारपीट का दृश्य रिकौर्ड किया और फिर हाथ में नंगी तलवार ले कर ऐसे दहाड़ा, जैसे किसी का सिर कलम करने वाला हो. उस समय उस की नजर कारा पर ही थी, जो उसे ही निहार रही थी.

इस के बाद डेविड और कारा के बीच निर्वस्त्र अवस्था में बनाए गए देहसंबंधों की वीडियो बनाई गई. फिर डेविड के दोस्त और कारा की बड़ी बहन कैटीलिन के देहसंबंध की बारीकी से रिकौर्डिंग की गई. उस वक्त मस्ती के जुनून में डेविड और उस का दोस्त यह भूल गए थे कि दोनों ने न केवल नाबालिग बहनों के साथ देहसंबंध बनाने का गुनाह किया है, बल्कि बतौर सबूत उस की रिकौर्डिंग भी कर ली थी, जो कभी भी जी का जंजाल बन सकती थी. इधर कारा इतनी आजाद खयाल हो गई थी कि उसे किसी का खौफ नहीं रहा था. जब भी उस का दिल करता, डेविड को रात के समय अपने घर बुला लेती. इस के बाद सारी रात दोनों खूब मस्ती करते.

जबतब कारा रातरात भर घर से गायब हो जाती और डेविड के साथ रात गुजार कर घर लौटती. अब उस का यह आचरण घर वालों से छिपा नहीं रह गया था. उस के पिता माइकल कारा को समझाने की कोशिश करते तो वह उत्तेजित हो कर कहने लगती, ‘‘यह मेरी जिंदगी है. मैं जिस तरह भी जीना चाहूं, मुझे कोई नहीं रोक सकता.’’

बेटी के इस दुस्साहस पर माइकल का हाथ उस पर उठ जाता तो वह घायल शेरनी की तरह दहाड़ पड़ती. मां कैथरीन ने भी कारा को परिवार की इज्जत और उस के खुद के भविष्य का वास्ता दे कर राह पर आने के लिए काफी समझाया, पर वह उस राह से नहीं लौटी. इसे ले कर माइकल और कैथरीन अकसर परेशान रहते थे. उधर कारा को भी आए दिन की टोकाटाकी नागवार लगती थी. कारा आधीआधी रात तक इंटरनेट पर डेविड से अश्लील चैटिंग करती रहती थी. इस से आहत कैथरीन ने इंटरनेट का कनेक्शन ही कटवा दिया, जिस से कारा बौखला गई. अब उस ने खुलेआम डेविड को घर बुलाना शुरू कर दिया. रात भर दोनों कमरे में बंद रहते. माइकल और कैथरीन चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते थे.

एक रात जब दोनों कमरे का दरवाजा बगैर बंद किए बिस्तर पर बेलिबास एकदूसरे की बांहों में खोए अश्लीलता की हदें पार कर रहे थे तो माइकल से देखा नहीं गया. उन्होंने डेविड को खूब खूरीखोटी सुनाई और अपने घर न आने की हिदायत दी. इस से डेविड का पारा तो चढ़ा ही, कारा भी भड़क उठी, ‘‘डैडी, आप को कोई अधिकार नहीं है इस तरह मेरे दोस्त की बेइज्जती करने का.’’

‘‘बेइज्जती तो उन की होती है, जिन की कोई इज्जत हो. तुम दोनों ने तो बेहयाई की हद पार कर दी है, कुछ तो शरम करो. तुम्हारे भाईबहन पर इस का क्या असर पड़ेगा? लोग जानेंगे तो कितनी बदनामी होगी हमारी? सिर उठा कर घर से निकलना दूभर हो जाएगा.’’ माइकल ने कारा को लताड़ लगाई.

‘‘गेट आउट फ्राम माई रूम.’’ कारा ने अपने ही जन्मदाता को जलील करते हुए कहा तो बेचारे माइकल अपनी इज्जत की खातिर खून का घूंट पी कर उस के कमरे से बाहर आ गए.

जातेजाते उन के कानों में डेविड की आवाज पड़ी. वह धमकी दे रहा था, ‘‘मुझे यह कतई मंजूर नहीं कि कोई मेरे प्यार के बीच में आए. अगर मेरे प्यार में ज्यादा दखल दिया तो मैं कत्ल भी कर सकता हूं, बगैर यह देखे कि कत्ल होने वाला कौन है?’’

माइकल और कैथरीन समझ चुके थे कि कारा उन के हाथों से पूरी तरह निकल चुकी है, पर उसे कैसे राह पर लाया जाए? यह सोच कर दोनों परेशान थे. वह समझ नहीं पा रहे थे कि उन के प्यार में आखिर कहां कमी रह गई थी, जो उन्हें यह दिन देखना पड़ रहा था. कैथरीन ने कारा की करीबी सहेली 16 वर्षीया जेफ होवर्थ से भी कहा कि वह ही कारा को समझाए.

जेफ ने ऐसा किया भी. उस ने कारा को समझाया, ‘‘कारा तुम जो कर रही हो, वह सही नहीं है.’’

‘‘क्या सही है, क्या गलत, यह मैं अच्छी तरह समझती हूं. मैं डेविड से इतनी मोहब्बत करती हूं कि उस की चाहत में किसी हद तक भी जा सकती हूं. मैं यह बिलकुल बरदाश्त नहीं कर सकती कि मेरे प्यार में, मेरी व्यक्तिगत जिंदगी में कोई दखल दे. चाहे वह मेरे मम्मीपापा ही क्यों न हों.’’

‘‘उन्होंने तुम्हें जन्म दिया है. तुम्हारा भलाबुरा भला उन से ज्यादा कौन समझ सकता है. फिर तुम जिस राह पर जा रही हो, उस की कोई मंजिल नहीं होती. तुम खुद अपनी राह में कांटें बिखेर रही हो. देखना इस का अंजाम दुखद होगा, इसलिए वक्त रहते संभल जाओ.’’ जेफ ने कारा को समझाया.

‘‘अब चाहे कांटे मिलें या फूल, मैं इस राह पर इतना आगे बढ़ चुकी हूं कि लौट कर आना संभव नहीं है. अब तो प्यार ही मेरी जिंदगी है. डेविड ही मेरी सांसें हैं. बेहतर होगा कि तुम भी मेरे बीच में न आओ.’’ कारा ने उलटा उसे ही नसीहत दे डाली. फलस्वरूप जेफ भी हार कर चुप हो गई.

इधर कारा बेलगामी की सारी हदें पार करती जा रही थी. अब वह डेविड को घर नहीं बुलाती थी, खुद ही उस के पास पहुंच जाती थी. यहां तक कि वह 2-2 रातों तक घर नहीं लौटती थी. यह देख माइकल और कैथरीन का विरोध भी नरम पड़ गया था. कारा ने इस का उलटा ही अंदाजा लगाया और 11 नवंबर, 2008 की रात उस ने डेविड को फिर से घर बुलवा लिया.

वह आ गया तो कमरे का दरवाजा खुला छोड़ कर कारा डेविड के साथ बिस्तर में घुस गई. कारा के कमरे से आने वाली आवाजों ने सभी की नींद उचाट कर दी थी. माइकल काफी देर तक खुद को रोके रहे, पर अंत में वह कारा के कमरे में जा पहुंचे और चीख कर बोले, ‘‘अगर तुम्हें यह गंदगी फैलानी है तो कहीं और जा कर फैलाओ. मेरे घर में ऐसा नहीं होगा.’’

‘‘वरना क्या कर लेंगे आप?’’ कारा बेशरमी की हद पार करते हुए डेविड की बांहों में सिमटी हुई बोली.

‘‘मैं तेरी खाल खींच दूंगा.’’ इस के साथ ही माइकल ने कारा को बिस्तर से घसीट कर जमीन पर पटक दिया. वह उस पर हाथ उठाते, इस से पहले ही डेविड ने उन का हाथ पकड़ लिया, ‘‘खबरदार, अगर कारा को हाथ लगाया तो.’’

माइकल का गुस्सा अब डेविड पर भड़क गया, ‘‘तू ने ही मेरी बेटी को बरबाद किया है. तू ने इसे राह से भटकाया है. मैं तेरे खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट करूंगा.’’

इतना सुनते ही डेविड भी तैश में आ गया, ‘‘अबे ओए बुड्ढे, जुबान संभाल कर बात कर, वरना…’’

‘‘वरना क्या कर लेगा तू?’’ माइकल की सांसें तेजी से धड़कने लगीं.

‘‘छोड़ो डेविड.’’ कारा ने उठ कर डेविड की बांह थाम ली, ‘‘क्यों इन के मुंह लगते हो. इन्हें बकवास करने दो. यह हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते.’’ उस ने अपने पिता माइकल पर घृणा भरी दृष्टि डाली.

‘‘कर तो बहुत कुछ सकता हूं.’’ इतना कहते हुए माइकल कमरे से चले गए.

यह देख डेविड और कारा घबरा गए थे. कारा डेविड से बोली, ‘‘कुछ करो डेविड, वरना ये लोग कुछ भी कर सकते हैं. मैं तुम से जुदा नहीं होना चाहती. मैं अभी नाबालिग हूं, अगर पापा ने तुम्हारे खिलाफ पुलिस में अपनी नाबालिग बेटी को बहकाने और जबरन शारीरिक संबंध बनाने की रिपोर्ट लिखवा दी तो पुलिस तुम्हें जेल भेज देगी. ऐसा हो, इस से पहले इन्हें ही दुनिया से विदा कर दो. फिर कोई हमें रोकनेटोकने वाला नहीं रहेगा.’’

डेविड कारा का इशारा समझ गया था. साथ ही डर भी गया था कि अगर उस के खिलाफ नाबालिग के साथ बलात्कार करने की रिपोर्ट लिखवा दी गई तो उसे जेल जाने से कोई नहीं बचा पाएगा. तभी उसे याद आया कि उस ने कहीं पढ़ा था कि 19 वर्षीय चार्ल्स सर्टाकवली 14 वर्षीया कारिल एनन से बेइंतहा मोहब्बत करता था, पर कारिल के मांबाप बीच में आ गए थे. इस पर दोनों ने मिल कर कारिल के मांबाप व बहन का कत्ल कर दिया था. फिर दोनों दूसरे शहर भाग गए थे. लंबी अवधि के बाद आखिर वे पकड़े गए थे.

डेविड के दिमाग में शैतान ने पांव जमा लिए थे. उस ने पहला पक्ष सोचा, दूसरा नहीं. अंजाम की परवाह न करते हुए उस ने कारा से कहा, ‘‘ठीक है, मैं अपनी मोहब्बत के कांटों को जड़ से ही हटा दूंगा. मगर तुम्हें मेरा साथ देना होगा.’’

‘‘मैं तो हर समय, हर कदम पर तुम्हारे साथ हूं.’’ कारा उस की बांहों में सिमट गई, ‘‘मुझे सब कुछ मंजूर है, पर तुम से अलग होना नहीं.’’

‘‘तुम परसों तक का इंतजार करो, मैं कुछ करता हूं.’’ डेविड बोला, ‘‘हां, परसों शाम को मुझे फोन कर के बता देना कि तुम्हारे मम्मीपापा घर पर हैं कि नहीं.’’

‘‘ठीक है, मगर जो भी करना, होशियारी से करना. हमारे ऊपर आंच न आए.’’ कारा बोली.

सुबह होते ही डेविड कारा के घर से चला गया. उस ने उसी दिन 40 कैलिबर हैंडगन का इंतजाम कर लिया. 13 नवंबर को कारा का छोटा भाई जेम्स अपनी गर्लफ्रैंड को पहली बार घर लाया था. इसी खुशी में घर में एक छोटी सी पार्टी रखी गई थी. कारा ने यह खबर डेविड को दी तो उस ने अपनी योजना कारा को समझा दी. रात करीब 9 बजे वह कार से कारा के घर पहुंच गया और कुछ दूरी पर कार खड़ी कर के उस के इशारे का इंतजार करने लगा. करीब साढ़े 9 बजे जेम्स की गर्लफ्रैंड वहां से चली गई तो कारा ने घर से बाहर आ कर डेविड को इशारा कर दिया. वह तुरंत चौकन्ना हो कर कारा के घर में पहुंच गया. उस समय कारा के पिता माइकल और मां कैथरीन ड्राइंगरूम में ही थे. कारा खुद भी वहां आ गई थी. उस के भाईबहन भी वहीं थे.

डेविड ने आते ही एक फायर माइकल के सिर पर पीछे से किया. यह देख कैथरीन उस की तरफ दौड़ी. मगर वह कदम आगे नहीं बढ़ा पाई. डेविड ने उस के सिर में भी गोली दाग दी. दोनों की उसी समय मौत हो गई. यह देख कारा पहले ही डेविड की कार के पास आ गई थी. डेविड के आते ही दोनों कार से भाग निकले, पर दूसरे दिन दोनों पकड़े गए. गिरफ्तारी के वक्त और बाद में भी कारा खुद को निर्दोष बताती रही, मगर सारे सबूत उस के विरुद्ध थे. बचाव का कोई रास्ता नहीं था.

अत: दूसरी पेशी पर कारा ने भी अदालत में अपना अपराध स्वीकारते हुए कहा, ‘‘डेविड ने मेरे मातापिता की हत्या की है. फिर भी मैं उस से प्यार करती हूं और करती रहूंगी. मैं उस के बिना नहीं रह सकती. जेल से छूटने के बाद हम फिर से एक हो जाएंगे.’’

अदालत में उपस्थित सभी लोग कारा की इस बेहयाई पर उस का मुंह ताकते रह गए. वह सोच नहीं पा रहे थे कि प्यार में एक लड़की इतनी भी अंधी हो सकती है. अदालत ने डेविड को दोहरे हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा सुनाई. वहीं कारा को हत्या के लिए उकसाने और सहयोग देने पर 25 साल की सश्रम कैद सजा सुनाई गई. साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि जब तक कारा व डेविड बालिग नहीं हो जाते, उन्हें जेल के बजाय बाल बंदीगृह में रखा जाएगा. बालिग होने पर दोनों को इंडियाना जेल में भेज दिया जाएगा.

डेविड अच्छे घर से था. उस के पिता ने कई बड़े वकील किए, पर तमाम कोशिशों के बाद भी उस की जमानत नहीं हो पाई. जबकि कारा की तरफ से एक एनजीओ का वकील केस देख रहा था. सन 2013 के जून माह में कारा को 5 दिन के पैरोल पर रिहा किया गया था. लेकिन वह घर पहुंची तो उस के भाई ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया. उस की बहन अपने फ्रैंड के साथ घर बसा चुकी थी. कारा और डेविड ने नासमझी और प्यार में अंधे हो कर जो अपराध किया, उस की ग्लानि दोनों को अब होने लगी थी. 25 फरवरी, 2015 को डेविड के वकील ने फिर से उस की जमानत अर्जी अदालत में लगाई, जिसे नामंजूर कर दिया गया. फिलहाल दोनों जेल में हैं. Thriller Hindi Story

 

UP Crime: होटल के कमरे में प्यार का खूनी अंत, लाश के साथ बीती पूरी रात

UP Crime: एक ऐसी खौफनाक घटना सामने आई है, जिस ने प्यार जैसे रिश्ते को शर्मसार कर दिया. जिस हाथ को थामकर साथ निभाने की कसमें खाई जाती हैं, उसी हाथ ने प्रेमिका की जान ले ली. यह कहानी है उस प्रेमी की, जो प्यार के नाम पर पनपी नफरत और गुस्से से हैवान बन गया. मामूली विवाद से शुरू हुआ झगड़ा इतना बढ़ गया कि प्रेमी ने  प्रेमिका को बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया और उस की पसलियां तक तोड़ डालीं.

सवाल यह है कि आखिर वह कौन सी वजह थी, जिस ने प्यार को हिंसा में बदल दिया? आइए जानते हैं इस दिल दहला देने वाली क्राइम स्टोरी की पूरी सच्चाई.

यह शर्मनाक घटना उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से सामने आई है. 10 जनवरी, 2026 को सफाई कर्मचारी प्रवीण कुमार अपनी प्रेमिका आरती को एक होटल में ले गया. कमरे में दोनों ने साथ बैठकर शराब पी. नशे के दौरान किसी मामूली बात को ले कर दोनों के बीच विवाद हो गया. यह विवाद इतना बढ़ गया कि गुस्से में प्रवीण ने आरती पर लातघूंसे बरसाने शुरू कर दिए.

पुलिस के मुताबिक आरती और प्रवीण के बीच पिछले 3 सालों से प्रेम संबंध थे. आरती के पति की पहले ही संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी थी और उस के 2 बच्चे थे, जबकि प्रवीण भी अपनी पत्नी से अलग रह रहा था. पुलिस जांच में सामने आया कि शराब के नशे में आरती ने गुस्से में प्रवीण का चेहरा नोच लिया था. इसी बात से बौखलाकर प्रवीण ने उस पर बेरहमी से हमला किया. लगातार पिटाई के कारण आरती की कई पसलियां टूट गईं और अंदरूनी चोटों की वजह से उस की मौत हो गई. आरती ने खुद को बचाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन आरोपी का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा था.

हत्या के बाद प्रवीण पूरी रात शव के पास बैठा रहा. 11 जनवरी की सुबह जब वह होटल से निकलने लगा तो होटल के एक कर्मचारी ने उसे रोक लिया. महिला के बारे में पूछने पर प्रवीण गोलमोल जवाब देने लगा, जिस से उस कर्मचारी को शक हो गया.

इस के बाद में उस ने खुद पुलिस को फोन कर मैडिकल इमरजेंसी होने का नाटक किया, लेकिन सच सामने आ गया. पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है और उस से  पूछताछ जारी है. UP Crime