Death Penalty Police Case: बापबेटे की हिरासत में मौत 9 पुलिस वालों को फांसी

Death Penalty Police Case: बात करीब 6 साल पहले की है. पूरे देश में कोविड का दौर चरम पर था. लौकडाउन की जबरदस्त परिस्थितियां बनी हुई थीं. अधिकतर लोग कोरोना के भय से अपनेअपने घरों में कैद थे. उन्हीं दिनों तमिलनाडु के शहर सथानकुलम में 58 साल के कारोबारी पी. जयराज और उन के 31 साल के बेटे जे. बेनिक्स कोविड लौकडाउन नियमों के कथित उल्लंघन के आरोप में एक थाने की लौकअप में थे. आरोप था कि उन्होंने लौकडाउन के दौरान दुकान खोल रखी थी.

बेटे को तब हिरासत में लिया गया था, जब वह अपने पिता से मिलने थाने गए थे. दोनों को सथानकुलम पुलिस स्टेशन में रखा गया था. कई सालों तक कोर्ट में चले इस मामले की आखिरी सुनवाई मदुरै की फस्र्ट एडिशनल डिस्ट्रिक्ट ऐंड सेशंस कोर्ट में 7 अप्रैल 2026 को हुई थी. न्यायाधीश ने एक चौंकाने वाला फैसला सुनाते हुए सभी 10 दोषी पुलिसकर्मियों को मौत की सजा दे दी.

सजा पाने वालों में एक आरोपी की कोविड के दौरान ही कोरोना से मौत हो गई थी. इस कारण फांसी की सजा पाने वाले 9 पुलिसकर्मियों के नाम हैं—

तत्कालीन इंसपेक्टर एस. श्रीधर, एसआई के. बालकृष्णन, पी. रघु गणेश, हैडकांस्टेबल एस. मुरुगन, ए. समदुरई, कांस्टेबल एम. मुतुराजा, एस. चेल्लादुरई, एक्स. थौमस फ्रांसिस और एस. वैलमुतु. इस केस के 10वें आरोपी पल्दुरई (तत्कालीन स्पैशल सबइंसपेक्टर) थे. बचे पुलिसकर्मी 23 मार्च, 2026 को ही इस डबल मर्डर के दोषी ठहराए थे. मगर तब सजा नहीं सुनाई गई थी. इस केस को इस अंजाम तक पहुंचाने के लिए कई कदम उठाने पड़े थे.

इस की शुरुआत तब हुई, जब दोनों बापबेटे की मौत के बाद तमिलनाडु में बड़े स्तर पर विरोध शुरू हुआ. लोगों ने विरोध में अपनी दुकानें बंद कीं और उस बर्बरता के खिलाफ आवाज उठाई, जिस में जयराज और बेनिक्स को पीटा गया था. उन की कहानी आज भी सुनने पर लोगों में गुस्सा और दहशत दोनों महसूस होता है. चार्जशीट के अनुसार इस के बाद पूरी रात दोनों की पुलिस ने बुरी तरह पिटाई की. मकसद था उन्हें यह ‘सबक’ सिखाना कि पुलिस से कैसे पेश आना चाहिए.

सीबीआई के मुताबिक, पिटाई के बाद दोनों पितापुत्र को अपने ही जख्मों से बह रहे खून को साफ करने पर मजबूर किया गया. मगर इस का असली मकसद सफाई नहीं, बल्कि उत्पीडऩ था, क्योंकि सबूत मिटाने के लिए अगली सुबह अलग से सफाई कर्मचारी बुलाया गया था. जिस ने पुलिस स्टेशन के फर्श से सारा खून साफ किया, ताकि निशान मिटाए जा सके. इन घटनाओं की बारीकियां सिर्फ उन की क्रूरता से नहीं, बल्कि इस बात से सिहरन पैदा करने जैसी हैरानी होती है कि इन्हें किस हद तक साधारण दिखाने की कोशिश की गई. जब यह सब हो रहा था, तब उस पूरी रात जयराज का परिवार थाने के बाहर इंतजार करता रहा.

इस केस का सब से डरावना पहलू यह था कि दोनों को मजिस्ट्रैट के सामने ठीक से पेश ही नहीं किया गया, न ही रिमांड से पहले उन की चोटों की जांच हुई. इस बारे में जयराम के साले जोसेफ का कहना है कि मजिस्ट्रैट ऊपर की मंजिल से ही दिखाई दिए और सिर्फ एक इशारे से उन्हें रिमांड पर भेज दिया. जांच अधिकारियों के अनुसार, बेहद गंभीर चोटों के बावजूद दोनों के लिए ‘फिट फौर रिमांड सर्टिफिकेट’ ले लिया गया. यानी कागज पर यह दर्ज करा दिया गया कि वे रिमांड के लिए बिलकुल स्वस्थ हैं.

दोनों के खून से सने कपड़े अस्पताल के डस्टबिन में फेंक दिए गए. इस के बाद जयराज और बेनिक्स को कोविलपट्टी सब जेल में रखा गया. जब उन की हालत और बिगड़ गई, तब उन्हें सरकारी अस्पताल में भरती करवाया गया. वहीं 22 जून, 2020 को भारी मात्रा में खून बहने और हेमरेज से बेनिक्स की मौत हो गई. अगले दिन उन के पिता जयराज की भी मौत हो गई. मामले की गंभीरता को देखते हुए 24 जून, 2020 को मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने स्वत:संज्ञान लेते हुए न्यायिक जांच के आदेश दिए. लोकल पुलिस पर भरोसा नहीं करते हुए सीबीआई को जांच करने के लिए कहा.

इस जांच के आधार पर ही तमिलनाडु की मदुरै सेशन कोर्ट ने सथानकुलम कस्टोडियल डेथ केस में 9 पुलिसकर्मियों को मौत की सजा सुनाई. कोर्ट ने इसे ‘रेयरेस्ट औफ रेयर’ बताया. Death Penalty Police Case

Haryana Crime: पुलिस के शिकंजे में शातिर जालसाज

Haryana Crime: एक बार किसी के हस्ताक्षर देख कर हूबहू वैसे ही हस्ताक्षर कर लेना धनीराम मित्तल के बाएं हाथ का खेल था. उस के द्वारा किए गए फरजी हस्ताक्षरों को हैंडराइटिंग एक्सपर्ट भी नहीं पकड़ सकते थे. फरजी हस्ताक्षरों के सहारे वह अफसर ही नहीं बना, झज्जर की कोर्ट में सवा महीने तक जज बन कर उस ने तमाम मुलजिमों को जेल से रिहा भी करा दिया था.

अब तक एक हजार से अधिक आपराधिक वारदातों को अंजाम दे चुके धनीराम मित्तल का जन्म 29 जून, 1939 को हरियाणा के भिवानी शहर के रहने वाले अमीलाल मित्तल के घर हुआ था. अमीलाल एक साधनसंपन्न व्यक्ति थे. उन के परिवार में पत्नी किन्नी देवी के अलावा 4 बेटियां और 5 बेटे थे. उन की एक आटा मिल थी, जिस से आमदनी अच्छी हो रही थी, सो उन्हें 9 बच्चों का पालनपोषण करने में कोई दिक्कत नहीं आई. अमीलाल ने उस जमाने में अपने सभी बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवाई थी. धनीराम ने रोहतक के हिंदू कालेज से बीएससी की थी.

धनीराम तेजतर्रार होने के साथ पढ़ाई में भी होशियार था. बीएससी करने के बाद उस ने राजस्थान के श्रीगंगानगर के खालसा कालेज से एलएलबी की. इस के बाद उस ने करनाल स्थित ‘मौडर्न सेल’ नाम के इंस्टीट्यूट से हस्तलिपि विशेषज्ञ का एक साल का डिप्लोमा किया. इसी क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए उस ने कोलकाता में रह कर हैंडराइटिंग एक्सपर्ट का 3 साल का डिप्लोमा किया. पढ़ाई के साथसाथ वह सरकारी नौकरी पाने की भी तैयारी कर रहा था. उस की मेहनत रंग लाई. रेलवे में क्लर्क की परीक्षा पास करने के बाद सन 1942 में वह दिल्ली जंक्शन पर बुकिंग क्लर्क बन गया. सरकारी नौकरी मिलने से घर वाले भले ही खुश थे, लेकिन धनीराम इस नौकरी से खुश नहीं था.

बुकिंग क्लर्क की नौकरी से वह ऊब गया तो दूसरी नौकरी की कोशिश करने लगा. आज की तरह उन दिनों नौकरी के लिए इतनी मारामारी नहीं थी. फिर धनीराम एक काबिल इंसान था, इसलिए थोड़ी कोशिश के बाद उसे हरियाणा राज्य परिवहन निगम में सुपरवाइजर के पद पर नौकरी मिल गई. उस की पोस्टिंग अंबाला में हुई. उसी दौरान उस की लक्ष्मी से शादी हो गई, जिस से बाद में उसे 3 बच्चे हुए. यह नौकरी भी उस की इच्छा के अनुरूप नहीं थी. नौकरी से उसे जो पगार मिलती थी, उस से वह संतुष्ट नहीं था. वह तो कोई ऐसा काम करना चाहता था, जिस से वह कम समय में ज्यादा पैसे कमा सके और उस की काबिलियत का भी इस्तेमाल हो.

काम में मन नहीं लगा तो उस ने यह नौकरी भी छोड़ दी. धनीराम ने हस्तलिपि विशेषज्ञ का जो कोर्स किया था, उस से वह दूसरों के हस्ताक्षरों को हूबहू करना जान गया था. अपनी योग्यता को जांचने के लिए वह ब्लौक, तहसील स्तर के अधिकारियों के हस्ताक्षर कर के लोगों के छोटेमोटे काम कराने लगा. उस के द्वारा किए गए फरजी हस्ताक्षर विभाग में किसी की पकड़ में नहीं आ सके तो धनीराम की हिम्मत बढ़ती गई. यह प्रयोग सफल हो गया तो उस के दिमाग में तरहतरह की योजनाएं घूमने लगीं. इस के बाद उस ने रोहतक के आरटीओ विभाग से अपना जालसाजी का धंधा शुरू किया.

वह जानता था कि इस विभाग में भ्रष्टाचार खुलेआम होता है. वह विभाग के कुछ अधिकारियों के हस्ताक्षर करना जान गया था. फिर क्या था, उन के जाली हस्ताक्षर से वह लोगों को ड्राइविंग लाइसेंस व अन्य दस्तावेज तैयार कर के देने लगा. इस के बदले वह लोगों से मोटी रकम वसूलता था. अधिकारियों के फरजी हस्ताक्षर से दस्तावेज बनाने का उस का यह धंधा चल निकला. लेकिन उस का यह धंधा ज्यादा दिनों तक चल नहीं सका. लिहाजा वह पुलिस की गिरफ्त में आ गया. सन 1964 में उस के खिलाफ रोहतक के सिटी थाने में पहली रिपोर्ट दर्ज हुई. भादंवि की धारा 380/379/420/468/471 के तहत उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

करीब 52 साल पहले धनीराम मित्तल जब जेल गया था, उस समय उस की उम्र करीब 25 साल थी. अगर वह चाहता तो अपनी गलती पर पश्चाताप कर के अपराध का रास्ता छोड़ सकता था, लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया, बल्कि वह नएनए तरीके से जालसाजी करने के बारे में सोचने लगा. जमानत पर जेल से बाहर आने के बाद वह फिर से जालसाजी के काम करने लगा. धनीराम के पास एलएलबी की डिग्री थी. वह न्यायालय से संबंधित सभी कामों को जानना चाहता था. इसलिए वह दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट के एडवोकेट श्यामसुंदर शर्मा के यहां मुंशी का काम करने लगा. बाद में वह दिल्ली और हरियाणा की अदालतों में वकालत करने लगा. वह अपने मुकदमे भी खुद ही लड़ रहा था.

एक बार तो उस ने ऐसा काम किया, जिस से रेलवे के बड़े अधिकारी भी सकते में आ गए. बीकानेर रेलवे स्टेशन अधीक्षक ओमप्रकाश शर्मा को एक दिन टेलीग्राम मिला. टेलीग्राम में लिखा था ‘तत्काल प्रभाव से आप का तबादला किया जाता है. 2 दिनों बाद दिल्ली मुख्यालय आ कर रिपोर्ट करें.’

टेलीग्राम को पढ़ कर ओमप्रकाश शर्मा हैरान रह गए, क्योंकि उन का ट्रांसफर ड्यू नहीं था. वह समझ नहीं पा रहे थे कि अचानक उन का ट्रांसफर क्यों कर दिया गया. उन्होंने सोचा कि ड्यूटी खत्म होने के बाद अपने जानने वाले अधिकारियों से इस बारे में बात करेंगे. उन की ड्यूटी खत्म भी नहीं हुई थी कि टेलीग्राम मिलने के 2 घंटे बाद सूटेडबूटेड धनीराम मित्तल हाथ में ब्रीफकेस लिए उन के पास पहुंच गया.

उस ने ओमप्रकाश शर्मा को बताया कि उसे दिल्ली से ट्रांसफर कर के यहां का चार्ज लेने के लिए कहा गया है. उस ने अपनी नियुक्ति की प्रति भी शर्मा को सौंप दी. शर्मा ने उस का नियुक्ति पत्र पढ़ा और उस की तरफ देखने लगे. तभी धनीराम बोला, ‘‘शर्माजी, बधाई हो, आप का प्रमोशन हुआ है और मुख्यालय में आप के कार्यों और ईमानदारी की बड़ी चर्चा हो रही है. आप को मुख्यालय में पोस्टिंग दी गई है.’’

अपनी प्रशंसा से ओमप्रकाश शर्मा काफी खुश हुए. उन्होंने उस दिन धनीराम को अपने साथ रख कर उस की खूब खातिरदारी की. वह जल्द से जल्द दिल्ली पहुंच जाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने फटाफट टिकिट बिक्री और पार्सल का सारा कैश धनीराम को सौंप दिया और दिल्ली रवाना हो गए. ओमप्रकाश शर्मा अपने प्रमोशन की बात सोचसोच कर रास्ते भर खुश होते रहे. उन्होंने सोच रखा था कि दिल्ली में चार्ज संभालने के बाद वह अपने प्रमोशन की खुशखबरी टेलीग्राम द्वारा गांव में रह रहे अपनी बीवीबच्चों को देंगे. उन्होंने प्लान भी कर लिया था कि अब वह बीवीबच्चों को गांव से बुला कर दिल्ली में रखेंगे.

खुशीखुशी वह मुख्यालय पहुंचे. संबंधित अधिकारी के पास वह अपना ट्रांसफर लेटर ले कर पहुंचे तो वह अधिकारी भी आश्चर्यचकित रह गया, क्योंकि वह लेटर मुख्यालय से भेजा ही नहीं गया था और ना ही उन का कोई प्रमोशन हुआ था. यह सुन कर शर्माजी के होश उड़ गए. प्रमोशन की खुशी से उन्होंने जो प्लान बनाए थे, वे काफूर हो गए. वह समझ नहीं पा रहे थे कि जिस आदमी को उन्होंने चार्ज सौंपा है, आखिर वह है कौन और उन के पास टेलीग्राम से जो ट्रांसफर लेटर आया था उस पर बाकायदा संबंधित अधिकारी के हस्ताक्षर और मुहर भी थी. यह खेल किस ने और क्यों खेला है?

वह बीकानेर पहुंचे तो पता चला कि धनीराम कलेक्शन की सारी रकम ले कर फरार हो चुका था. नौकरी बचाने के लिए ओमप्रकाश शर्मा ने सारी रकम अपनी जेब से भरी. धनीराम ने इस के 8 महीने बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर स्टेशन को अपना निशाना बनाया. कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर गंगा स्नान के लिए यहां हजारों लोग आते हैं, जिस से यहां टिकिटों की बिक्री खूब होती है. धनीराम इस बात को जानता था. लंबा हाथ मारने के लिए धनीराम ने कार्तिक पूर्णिमा का ही दिन चुना.

गढ़मुक्तेश्वर के स्टेशन मास्टर को भी उस ने फरजी ट्रांसफर लेटर दे कर खुद वहां का चार्ज ले लिया और वहां से सारा कैश ले कर रफूचक्कर हो गया. फरजी जौइनिंग लेटर के जरिए उस ने दिल्ली जंक्शन, हरिद्वार, श्रीगंगानगर रेलवे स्टेशनों पर भी स्टेशन मास्टर बन कर कैश पर हाथ साफ किया. अब तक रेल विभाग में धनीराम मित्तल चर्चित हो गया था. हालत यह हो गई कि अब विभाग में किसी का ट्रांसफर होता तो वह कर्मचारी संबंधित अधिकारी से पहले अपने ट्रांसफर की पुष्टि करता, उस के बाद ही दूसरे कर्मचारी को चार्ज सौंपता. इस दौरान धनीराम जालसाजी के मामलों में अलगअलग जगहों पर गिरफ्तार भी होता रहा, पर जमानत पर छूटने के बाद वह फिर से यही काम करने लगता.

सन 1970 में देश में चीनी और मिट्टी के तेल की किल्लत हुई. सरकार राशन कार्ड पर ही इन चीजों को सस्ते दाम पर उपलब्ध करा रही थी. उसी दौरान धनीराम ने रोहतक जिले में 5 हजार फरजी राशन कार्ड बना कर वहां के हलवाइयों और अन्य लोगों को दे दिए थे. ऐसा नहीं था कि उस ने वे राशन कार्ड फ्री में दिए थे, उस ने उन लोगों से पैसे लिए थे. 2 महीने तक उन राशन कार्डों से लोगों ने सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान से चीनी और मिट्टी का तेल लिया था. बाद में भेद खुलने पर खाद्य एवं आपूर्ति विभाग ने वे राशन कार्ड निरस्त कर दिए थे और धनीराम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

सन 1970 में ही शातिरदिमाग धनीराम ने ऐसा काम किया कि लोग हैरान रह गए. दरअसल हुआ यह कि हरियाणा के झज्जर जिले के जज साहब लंबी छुट्टी पर गए हुए थे. इसी का फायदा उठाते हुए उस ने पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के फरजी कागजात बनाए और उन्हीं के बूते पर उस ने उस जज की कुरसी संभाल ली. वह अदालती काम से वाकिफ था ही, साथ ही उसे कानून की भी जानकारी थी.

इस के अलावा उस में एक खास बात यह थी कि वह निडर हो कर काम करता था. इसी वजह से किसी को भी उस पर शक नहीं होता था. अदालती काररवाई की उसे अच्छी जानकारी थी, इसलिए वह 28 दिनों तक जज की कुरसी पर बैठ कर केसों की सुनवाई करता रहा. इस बीच उस ने कई केसों के फैसले भी सुनाए. इतना ही नहीं, मोटे पैसे ले कर उस ने हत्या और संगीन मामलों के 30 मुलजिमों को जेल से रिहा भी करा दिया. ताज्जुब की बात यह रही कि 28 दिनों में उस ने वहां रह कर अच्छी कमाई की, पर वहां काम कर रहे किसी भी कर्मचारी को उस पर शक नहीं हुआ. लेकिन जब यह मामला खुला तो उसे एक बार फिर जेल जाना पड़ा. धनीराम फरजी जमानती वारंट बनाने में भी एक्सपर्ट था.

कोर्ट में वकालत करने के दौरान वह मोटी रकम ले कर फरजी जमानती वारंट तैयार कर देता था और उन्हीं की बदौलत उस ने तमाम मुजरिमों को जेल से बाहर निकलवाया. इतना ही नहीं, फरजी जज वाले मामले में भी उस ने जेल में रहते हुए किसी तरह अपना भी फरजी जमानती वारंट तैयार कर लिया और जेल से बाहर आ गया. एक बार सन 1976 में पुलिस किसी मामले में उसे पेश करने के लिए रोहतक जेल से बीकानेर की अदालत में ले गई. वहां मजिस्ट्रेट ने उसे जमानत पर छोड़ने से इनकार कर दिया. धनीराम ने वापस आ कर रोहतक जेल के अधीक्षक को जज के फरजी हस्ताक्षर वाला जमानती वारंट दिखाया तो जेल अधीक्षक ने उसे रिहा कर दिया. बाद में पता चला कि वह वारंट फरजी था.

धनीराम जालसाजी के ये काम केवल पैसे कमाने के लिए ही नहीं करता था, बल्कि निजी खुन्नस निकालने के लिए भी उस ने रोहतक के तत्कालीन चीफ ज्यूडीशियल मजिस्ट्रेट एन.एल. पारुथी को ऐसा सबक सिखाया था कि शायद वह उसे कभी भूल पाएं. इस की वजह यह थी कि उन की अदालत में धनीराम का एक केस चल रहा था. धनीराम खुद ही अपना केस लड़ रहा था. वह कोर्ट में ऐसा व्यवहार कर रहा था, जो अदालत के हिसाब से ठीक नहीं था. चीफ ज्यूडीशियल मजिस्टे्रट एन.एल. पारुथी ने धनीराम को लताड़ते हुए अदालत में अपना आचरण ठीक करने को कहा.

भरी अदालत में लताड़े जाने से धनीराम की बेइज्जती हुई थी. यह बात उसे बहुत खली. उस ने उसी समय जज पारुथी को इस बेइज्जती का खामियाजा भुगतने की धमकी दे दी. जज पारुथी को क्या सबक सिखाना है, इस की रूपरेखा धनीराम ने तुरंत तैयार कर ली. एक दिन जज पारुथी को रजिस्टर्ड डाक से पंजाब व हरियाणा हाइकोर्ट के न्यायाधीश का पत्र मिला. पत्र में लिखा था, ‘तत्काल प्रभाव से आप का इस्तीफा मंजूर कर लिया गया है. अत: आप तुरंत अपना पद और कार्यभार छोड़ दें.’

पत्र पढ़ते ही पारुथी का हलक सूख गया. वह परेशान हो उठे कि उन्होंने जब इस्तीफा दिया ही नहीं है तो वह मंजूर कैसे हो गया. यही बात सोचसोच कर रात भर उन्हें नींद नहीं आई. अगले दिन वह उस पत्र को ले कर चंडीगढ़ के लिए रवाना हो गए. वहां मुख्य न्यायाधीश से मिल कर उन्होंने कहा, ‘‘सर, कल मुझे यह लैटर मिला है. जबकि मैं ने अपने इस्तीफे के बारे में कोई पत्र दिया ही नहीं है.’’

मुख्य न्यायाधीश ने उन्हें वह फाइल दिखाई, जिस में उन के इस्तीफे की दरख्वास्त लगी थी. पारुथी ने उस दरख्वास्त को पढ़ा तो उस पर जो दस्तखत थे, वे उन के ही थे. उन का माथा चकराया कि जब उन्होंने दरख्वास्त लिखी ही नहीं है तो यह दस्तखत कैसे हो गए? उन्होंने कहा, ‘‘सर, यह दरख्वास्त मैं ने नहीं लिखी. जरूर यह किसी की साजिश है.’’

‘‘भले ही साजिश हो, पर यहां तो तुम्हारी सेवानिवृत्ति की विभागीय औपचारिकताएं लगभग पूरी हो चुकी हैं.’’ मुख्य न्यायाधीश ने कहा.

‘‘प्लीज सर, रुकवा दीजिए, वरना मेरी सालों की मेहनत बेकार जाएगी. मैं तबाह हो जाऊंगा,’’ पारुथी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘मुझे लगता है, यह सब धनीराम का किया है. इस तरह के काम वही करता है.’’

मुख्य न्यायाधीश के हस्तक्षेप पर पारुथी के इस्तीफे की प्रक्रिया रोकी गई. इस के बाद पारुथी ने रोहतक पहुंच कर सिटी थाने में धनीराम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. देशी चार्ल्स शोभराज के रूप में मशहूर धनीराम जालसाजी से कागज तैयार करने में ही माहिर नहीं था, बल्कि एक बार वह दिनदहाड़े पुलिस हिरासत से बहुत आराम से फरार भी हो गया था. किसी मामले में रोहतक पुलिस ने बड़ी मशक्कत के बाद धनीराम को गिरफ्तार किया था. 4 नवंबर, 1995 को रोहतक जेल से उसे फरीदाबाद की कोर्ट में पेश करने के लिए ले जाया गया. लेकिन फरीदाबाद कोर्ट परिसर में भीड़ का फायदा उठा कर वह वहां से नौ दो ग्यारह हो गया. लाख ढूंढने के बाद भी पुलिस उसे ढूंढ नहीं सकी.

हरियाणा की भिवानी जेल में कुख्यात अपराधी जिले सिंह बंद था. विभिन्न धाराओं में उसे 25 साल की सजा हुई थी. उसे किसी तरह पता चला कि धनीराम फरजी जमानती वारंट से सैकड़ों लोगों को जेल से रिहा करा चुका है. अपनी रिहाई के लिए उस ने अपने एक संबंधी को धनीराम के पास भेजा. मोटी रकम ले कर धनीराम उस का यह काम कराने को तैयार हो गया. चूंकि जिले सिंह सजायाफ्ता कैदी था, इसलिए उस की रिहाई के लिए उसे काफी मशक्कत करनी पड़ी थी.

जेल के अधिकारियों की मिलीभगत के बिना यह काम करना आसान नहीं था. उस समय आर.के. गुप्ता जेल अधीक्षक थे. धनीराम ने आर.के. गुप्ता के बेटे पंकज गुप्ता के माध्यम से बात आगे बढ़ाई. पैसों के लालच में आर.के. गुप्ता अपनी जिम्मेदारियों को भूल गए. धनीराम ने फरजी तरीके से जिले सिंह की रिहाई के जाली पेपर तैयार कर दिए और उस की 25 साल की सजा पूरी होने से पहले ही उसे जेल से रिहा करा दिया. बाद में जब यह मामला प्रकाश में आया तो पुलिस ने धनीराम, पंकज गुप्ता, जेल के 2 कनिष्ठ कर्मचारियों नरेश व अंजू सहित 5 लोगों को गिरफ्तार किया.

धनीराम फरजी वकील बन कर कोर्ट में अपने केसों की ही पैरवी नहीं करता, बल्कि अन्य केसों की भी पैरवी करता था था. फरवरी, 2005 में वह अपने एक मुवक्किल विजय के चैक बाउंस के केस के सिलसिले में पटियाला हाउस कोर्ट में आया, तभी वकीलों ने उसे घेर लिया. पूछने पर वह अपना रजिस्ट्रेशन नंबर तक नहीं बता पाया. सूचना मिलने पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में पता चला कि उस के पास केवल एलएलबी की डिग्री है. कोर्ट में प्रैक्टिस करने का कोई भी वैध दस्तावेज वह नहीं दिखा सका, पुलिस ने उस के पास से विभिन्न केसों की 7 फाइलें भी बरामद की थीं. इस मामले में पुलिस ने उसे जेल भेज दिया था.

जेल से जमानत पर बाहर आने के बाद वह फिर से वकालत करने लगा. 6 दिसंबर, 2005 को उसे दिल्ली के तीसहजारी न्यायालय में महानगर दंडाधिकारी राजेश कुमार की अदालत में फिर से फरजी वकील के रूप में गिरफ्तार किया गया. उस दिन वह अपने मुवक्किल के आर्म्स एक्ट के मामले की पैरवी करने आया था. धनीराम ठगी और जालसाजी के अलावा छोटीमोटी चोरियां भी कर लेता था. कार से स्टीरियो, स्टेपनी, ब्रीफकेस या अटैची उड़ाना वह हाथ की सफाई समझता था. 3 दिसंबर, 1996 को उसे दिल्ली स्थित डब्लूएचओ औफिस में कार्यरत दीप्ति नाग की मारुति कार से स्टीरियो चुराते रंगेहाथों पकड़ा गया था.

तिहाड़ जेल में ही धनीराम की मुलाकात अशोक कुमार से हुई. अशोक कुमार एक कार चोर था. जबकि धनीराम चोरी के अलावा जाली कागज बनाने में माहिर था. दोनों ने मिल कर कार चुराने और फरजी कागज बना कर उन्हें ठिकाने लगाने की योजना बनाई. अलगअलग समय पर दोनों जेल से जमानत पर बाहर आए. दोनों ही हरियाणा, पंजाब, दिल्ली आदि जगहों से कार चुरा कर फरजी कागजात तैयार कर के बेचने लगे. इस दौरान धनीराम अपने रहने के ठिकाने बदलता रहा.

26 अप्रैल, 2004 को दोनों कार चुराने के लिए चंडीगढ़ पहुंचे. हाइकोर्ट परिसर में उन्होंने सफेद रंग की चमचमाती मारुति कार नंबर एचआर01 पी 4177 देखी. वह कार जानेमाने एडवोकेट अशोक कुमार खुंगर की थी. मौका मिलते ही उन्होंने मास्टर चाबी से वह कार चुरा ली. एडवोकेट खुंगर अपनी गाड़ी लेने पहुंचे तो कार न देख कर वह परेशान हो उठे. उन्होंने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दे दी. पुलिस ने बैरिकेड्स लगा कर जांच की तो जीरकपुर रोड पर पुलिस ने चुराई गई कार के साथ धनीराम को गिरफ्तार कर लिया. जबकि उस का साथी अशोक बस द्वारा दिल्ली के लिए पहले ही रवाना हो गया था. धनीराम को गिरफ्तार कर बुड़ैल जेल भेज दिया गया.

चंडीगढ़ के वकील की कार चुराने का मामला अभी भी न्यायालय में विचाराधीन है. लंबे समय तक जब वह चंडीगढ़ कोर्ट की तारीखों पर नहीं पहुंचा तो चंडीगढ़ न्यायालय के जज श्री बलविंदर कुमार ने 6 मार्च, 2008 को उसे भगोड़ा घोषित कर दिया. दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश के विभिन्न राज्यों में धनीराम एक हजार से ज्यादा आपराधिक वारदातों को अंजाम दे चुका है. विभिन्न राज्यों के थानों में उस के खिलाफ 127 केस दर्ज हो चुके हैं. उस की खास बात यह है कि उस ने कभी भी अपना नाम और हुलिया नहीं बदला और न ही जालसाजी जैसे आपराधिक कामों से उस ने संन्यास लिया. 77 साल की उम्र में भी वह इस काम में जुटा है.

दिल्ली के रानीबाग इलाके में 5 नवंबर, 2015 को एक शख्स की सैंट्रो कार चोरी हो गई. पुलिस ने जब वहां के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज देखी तो पता चला कि कार चुराने वाला और कोई नहीं, धनीराम मित्तल है. दिल्ली पुलिस के पास धनीराम के फोटो तो थे, पर उस का ठिकाना नहीं था. पश्चिम जिले के वाहन चोर निरोधक दस्ते के इंसपेक्टर राजपाल डबास के पास धनीराम का पूरा इतिहास मौजूद था. वह अपने स्तर से उसे तलाशने लगे.

उन की मेहनत रंग लाई. उन्हें धनीराम मित्तल के बारे में सुराग मिला कि वह उत्तरी दिल्ली के नत्थूपुरा इलाके में रहता है. डीसीपी पुष्पेंद्र कुमार को उन्होंने इस सूचना से अवगत करा दिया. डीसीपी ने एसीपी दिनेश शर्मा की अध्यक्षता में एक टीम बनाई, जिस में एसआई सुमेर सिंह, एएसआई सतीश कौशिक, हैडकांस्टेबल नवीन कुमार, कांस्टेबल हरिप्रकाश को शामिल किया गया. टीम का नेतृत्व एडीशनल डीसीपी मोनिका भारद्वाज कर रही थीं. टीम ने मुखबिरों को भी लगा दिया.

31 मार्च, 2016 को इंसपेक्टर राजपाल डबास को सूचना मिली कि धनीराम रोहिणी कोर्ट से पश्चिम विहार की तरफ आने वाला है. यह सूचना मिलते ही पुलिस टीम ने पश्चिम विहार डिस्ट्रिक्ट पार्क के नजदीक बाहरी रिंग रोड पर बैरिकेड्स लगा कर वाहनों की जांच शुरू कर दी. तभी डीएल4सीएपी1880 नंबर की एक सैंट्रो कार रोहिणी की तरफ से आई. वह कार बैरिकेड्स के पास पहुंच कर धीमी हुई तो ड्राइविंग सीट पर बैठे धनीराम को पुलिस ने पहचान लिया. हिरासत में ले कर उसे इंसपेक्टर राजपाल डबास अपने औफिस ले आए.

उन्होंने धनीराम से पूछताछ की तो उस ने आसानी से बता दिया कि इस सैंट्रो कार का असली नंबर डीएल4सीएपी0882 था, जिसे उस ने बदल कर फरजी नंबर लगा लिया था. उस ने बताया कि यह कार उस ने दिल्ली के रानीबाग इलाके से चुराई थी. इसे वह किसी को बेचने जा रहा था. धनीराम ने बताया कि जालसाजी और कार चोरी करना उस का एक शौक है और शौक आसानी से नहीं छूटता.

उस ने बताया कि फरजी जमानती वारंट के जरिए वह अब तक ढाई हजार से ज्यादा मुलजिमों को विभिन्न जेलों से निकलवा चुका है. इंसपेक्टर राजपाल डबास को केवल कार चोरी के मामले में उस की तलाश थी. उन्हें यह भी पता चला कि वह चंडीगढ़ कोर्ट द्वारा भगोड़ा घोषित किया जा चुका है, इसलिए उन्होंने चंडीगढ़ पुलिस को भी उस की गिरफ्तारी की सूचना दे दी. दिल्ली पुलिस की सूचना पर अगले दिन चंडीगढ़ पुलिस दिल्ली पहुंच गई. पुलिस ने जब धनीराम को रोहिणी कोर्ट में पेश किया तो वहीं से चंडीगढ़ पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर अपने साथ ले गई.

धनीराम मित्तल बहुत ही होशियार शख्स है. लेकिन उस ने अपनी शिक्षा और काबिलियत को गैरकानूनी कामों में प्रयोग किया. अपनी काबिलियत के बूते पर वह किसी सरकारी विभाग में बड़ा अधिकारी बन सकता था, पर उस ने शुरुआत में ही ऐसे रास्ते पर कदम बढ़ा दिए, जिन का अंजाम हमेशा गलत ही होता है. पता चला है कि उस के रास्ते पर उस का बेटा संजय कुमार मित्तल भी चल निकला है. बहरहाल अब देखना यह है कि जेल से छूटने के बाद वह क्या करता है. Haryana Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आध

Illegal Relationship: हिस्ट्रीशीटर की बहन से आशनाई

Illegal Relationship: प्रदीप उपाध्याय जिस राह पर चल रहा था, वह जहरीले कांटों से भरी हुई थी. प्रेमिका का भाई हिस्ट्रीशीटर है, यह जानने के बाद उसे राधिका से संबंध तोड़ लेने चाहिए थे, लेकिन उस ने जानबूझ कर जो किया उसे तो घातक साबित होना ही था.

उत्तर प्रदेश के जिला बस्ती के थाना पुरानी बस्ती के थानाप्रभारी रणधीर मिश्र अपने औफिस में बैठे थे, तभी संधौली गांव के चौकीदार बाबूलाल ने उन्हें फोन कर के बताया कि गोरखपुरलखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग 28 पर डुमरियागंज जाने वाली सड़क के पास एक युवक की लाश पड़ी है. उस की हत्या शायद कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंक दी गई है. जवाब में रणधीर मिश्र ने कहा, ‘‘बाबूलाल, जब तक मैं वहां नहीं पहुंच जाता, तुम लाश के पास रुको. और हां, एक बात का खास खयाल रखना, लाश के पास किसी को जाने मत देना.’’

रणधीर मिश्र ने इस मामले की सूचना पुलिस अधिकारियों को दी और खुद सहयोगियों को साथ ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल पर पहुंच कर पहले उन्होंने वहां मौजूद भीड़ को हटाया, उस के बाद लाश का निरीक्षण करने लगे. मृतक 23-24 साल का नौजवान था. उस के शरीर पर नीले रंग की टीशर्ट, जींस और पैरों में जूते थे. शिनाख्त के लिए लाश की तलाशी ली गई तो उस के पास ऐसी कोई चीज नहीं मिली, जिस से उस की शिनाख्त हो पाती.

युवक की हत्या गला दबा कर की गई थी. उस के गले पर रस्सी के निशान स्पष्ट नजर आ रहे थे. स्थितियां यही बता रही थीं कि युवक की हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी. चूंकि मृतक नौजवान था, इसलिए पुलिस को मामला अवैध संबंधों में हत्या का लगा. घटनास्थल की सारी जरूरी काररवाई पूरी कर के रणधीर मिश्र ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. इस के बाद थाने आ कर उन्होंने चौकीदार बाबूलाल की ओर से हत्या के इस मामले को भादंवि की धारा 302, 201 के तहत अज्ञात के खिलाफ दर्ज करा दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद स्पष्ट हो गया कि हत्या रस्सी से गला घोंट कर की गई थी. परेशानी यह थी कि 2 दिन बीत जाने के बाद भी मृतक की शिनाख्त नहीं हुई थी. दूसरी ओर घटना का खुलासा करने के लिए एसपी जटाशंकर सिंह ने सीओ पंकज सिंह की देखरेख में थानाप्रभारी रणधीर मिश्र, सबइंसपेक्टर मोहम्मद शहाबुद्दीन, प्रशिक्षण के लिए आए एसआई दिनेश सरोज, अरविंद कुमार राय, सिपाही योगेंद्र, रामपाल, इंद्रेश यादव, गिरजेश यादव और राहुल सिंह की एक टीम गठित कर दी थी. इस पुलिस टीम ने युवक की शिनाख्त के लिए जिले के अन्य थानों की पुलिस को मृतक की फोटो भेज कर शिनाख्त की कोशिश की, लेकिन कहीं से भी मृतक के बारे में कोई सूचना नहीं मिली.

इस के बाद रणधीर मिश्र ने मृतक की शिनाख्त के लिए बड़ेबड़े पोस्टर छपवा कर जगहजगह चिपकवाए और उस की कौपी व्हाट्सएप, फेसबुक इलेक्ट्रौनिक और प्रिंट मीडिया के माध्यम से बस्ती समेत कई जनपदों में प्रसारित कराए. यही नहीं, कुछ पोस्टर उन्होंने बसों व ट्रेनों में भी चिपकवाए. 25 मार्च, 2016 को जिला अंबेडकरनगर के गांव नूनशिला के रहने वाले चंद्रमणि उर्फ ननकू किसी काम से बस्ती आए थे. उन्होंने बस स्टेशन पर लगे पोस्टर को देखा तो उन्हें लगा कि यह उन के रिश्तेदार प्रदीप उपाध्याय की फोटो है. इस की वजह यह थी कि उन के रिश्तेदार कृष्णदेव उपाध्याय का बेटा प्रदीप उपाध्याय करीब 20 दिनों से गायब था.

उन्होंने गोरखपुर के थाना में इस बात की रिपोर्ट भी दर्ज करा रखी थी. गोरखपुर में रिपोर्ट दर्ज कराने की वजह यह थी कि प्रदीप गोरखपुर में रह कर आईटीआई कर रहा था. चंद्रमणि ने तुरंत कृष्णदेव उपाध्याय को फोन कर के बताया कि बस्ती जिले के बस स्टेशन पर शिनाख्त के लिए एक युवक का फोटोयुक्त पोस्टर चिपकाया गया है, जिस में छपा फोटो उन्हें उन के बेटे प्रदीप का लग रहा है. संयोग से यह घटना उन के बेटे के गायब होने के एक दिन बाद की है. कृष्णदेव उपाध्याय को उस पोस्टर के बारे में पता चला तो वह अपने परिवार के कुछ लोगों और रिश्तेदारों के साथ बस्ती के बस स्टेशन पर जा पहुंचे.

पोस्टर देखते ही उन लोगों ने उस में छपी फोटो की शिनाख्त प्रदीप कुमार उपाध्याय के रूप में कर दी. इस के बाद सभी लोग रोतेबिलखते थाना पुरानी बस्ती पहुंचे, जहां उन्होंने थानाप्रभारी रणधीर मिश्र को बताया कि जो पोस्टर बस्ती के बस स्टेशन पर चिपकाए गए हैं, उस में छपा फोटो उन के बेटे प्रदीप उपाध्याय का है. रणधीर मिश्र ने उन लोगों को मृतक के कपड़े और जूते दिखाए तो उन्हें देख कर यह बात साफ हो गई कि मृतक मूलरूप से फैजाबाद का रहने वाला था और उस ने गोरखपुर में एल्युमिनियम फैक्ट्री के पास किराए का कमरा ले रखा था. वहीं रहते हुए वह आईटीआई कर रहा था. 8 मार्च को बस्ती में चैनपुरवा ओवरब्रिज के नीचे से जो लाश मिली थी, वह प्रदीप कुमार उपाध्याय की ही थी.

मृतक की शिनाख्त तो हो गई, लेकिन पुलिस के लिए अब भी इस हत्याकांड का पर्दाफाश करना किसी चुनौती से कम नहीं था, क्योंकि हत्यारों ने कोई ऐसा सबूत नहीं छोड़ा था, जिस के आधार पर पुलिस हत्या के कारणों का पता लगा कर हत्यारों तक पहुंच पाती. लाश की शिनाख्त के बाद पुलिस टीम गोरखपुर की एल्युमिनियम फैक्ट्री के पास स्थित मृतक प्रदीप के किराए के कमरे पर पहुंची और आसपास के लोगों से पूछताछ की.

इस पूछताछ में पता चला कि मृतक की नान्हू पांडेय से गहरी मित्रता थी. लेकिन किसी बात को ले कर उस का नान्हू से झगड़ा हुआ था. पुलिस को लगा कि हो सकता है यही झगड़ा प्रदीप की हत्या का कारण बना हो. इस के बाद पुलिस ने मृतक प्रदीप के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. पता चला कि उस की जिला गोंडा के थाना मनकापुर के रहने वाले नान्हू से अक्सर बातें होती रहती थीं. इस के अलावा उस की काल डिटेल्स में एक नंबर और मिला, जिस पर सब से ज्यादा बातें हुई थीं. पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया तो वह नंबर एक लड़की का निकला.

इस से पुलिस के सामने हत्या का कारण लगभग स्पष्ट हो गया. यह हत्या आशनाई की वजह से हुई थी, क्योंकि काल डिटेल्स के अनुसार वह लड़की कोई और नहीं, नान्हू पांडेय की बहन थी. इस के बाद पुलिस ने अखिलेश पांडेय उर्फ नान्हू पांडेय के जिला गोंडा थाना मनकापुर के गांव हरसिंहपुरवा स्थित घर छापा मारा. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. इस पर पुलिस ने मुखबिरों का जाल बिछा कर नान्हू की गिरफ्तारी के प्रयास तेज कर दिए. इस का नतीजा यह निकला कि पुलिस को नान्हू के छिपे होने के स्थान की जानकारी मिल गई. पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर विश्वास कर के जिला बस्ती के थाना पैकोलिया स्थित नान्हू पांडेय की ससुराल में छापा मारा.

पुलिस को आया देख कर उस ने अपने साले नीरज पांडेय और मित्र सुनील सिंह के साथ भागने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने तीनों को धर दबोचा. गिरफ्तारी के बाद तीनों को पूछताछ के लिए थाना पुरानी बस्ती लाया गया.

पुलिस ने जब नान्हू से प्रदीप की हत्या के बारे में पूछा तो पहले उस ने बहानेबाजी की, लेकिन जब पुलिस ने सबूतों के आधार पर उसे घेरा तो उस ने प्रदीप की हत्या की बात स्वीकार कर ली. उस ने बताया कि प्रदीप की हत्या उस ने अपने साले नीरज पांडेय, दोस्त सुनील सिंह और बृजकिशोर सिंह के साथ मिल कर 7 मार्च की रात को की थी. हत्या करने के बाद उस ने लाश बस्ती में हाईवे पर फेंक दी थी. हत्या की वजह उस ने अपनी बहन से प्रदीप के अवैध संबंध बताए. उस ने प्रदीप की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

फैजाबाद जिले का रहने वाला प्रदीप कुमार उपाध्याय गोरखपुर स्थित एल्युमिनियम फैक्ट्री के पास किराए का मकान ले कर आईटीआई कर रहा था. उस के पिता कृष्णदेव उपाध्याय रेलवे में थे. इस समय वह वाराणसी में हैं. प्रदीप का ज्यादातर समय गोरखपुर में बीतता था. हां, छुट्टियों में वह जरूर घर चला जाता था. गोरखपुर में ही उस की दोस्ती गोंडा जिले के रहने वाले हिस्ट्रीशीटर अखिलेश कुमार पांडेय उर्फ नान्हू पांडेय से हो गई. दोस्ती की वजह से प्रदीप उस के घर भी आनेजाने लगा.

नान्हू के घर जाने पर प्रदीप ने उस की बहन राधिका (काल्पनिक नाम) को देखा तो पहली ही नजर में वह उस के दिल में उतर गई. उसे पाने की तमन्ना लिए वह गोरखपुर वापस तो आ गया, लेकिन उस के लिए बेचैन रहने लगा. इस के बाद वह राधिका के लिए किसी न किसी बहाने अक्सर नान्हू के घर आनेजाने लगा. परिणामस्वरूप दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं. एक समय ऐसा भी आया, जब दोनों दुनिया से बेखबर हो कर प्रेम के समंदर में गोते लगाने लगे. प्रेम गहराया तो राधिका ने कहा, ‘‘प्रदीप, मैं अब तुम्हारे बिना नहीं रह सकती. अब तुम शादी कर के मुझे अपनी दुलहन बना कर अपने घर ले चलो.’’

प्रदीप ने कहा, ‘‘कुछ दिन सब्र रखो, समय आने पर मैं अपने पिताजी से शादी की बात करूंगा.’’

प्रदीप ने राधिका से शारीरिक संबंध तो बना ही लिए थे, मोबाइल से उस के कुछ अश्लील फोटो भी खींच लिए थे. कहते हैं कि इश्क मुश्क छिपाए नहीं छिपते. इस मामले में भी यही हुआ. आखिर राधिका और प्रदीप के संबंधों की भनक नान्हू को लग गई. वह दोनों पर नजर तो रखने ही लगा, साथ ही उस ने प्रदीप से अपनी बहन से दूर रहने को भी कहा. लेकिन जब उसे पता चला कि प्रदीप और राधिका के संबंध हद से आगे बढ़ गए हैं तो उस ने प्रदीप से कहा कि वह राधिका से शादी कर ले.

प्रदीप ने शादी से तो मना कर ही दिया, साथ ही राधिका के अश्लील चित्रों के आधार पर उसे धमकी भी दी कि अगर उस ने उसे राधिका से मिलने से रोका तो वह उस की बहन के फोटो सार्वजनिक कर देगा. इतना सब होने के बाद भी प्रदीप नान्हू के घर राधिका से मिलने जाता रहा. यह नान्हू की सरासर बेइज्जती थी. उस ने गोरखपुर जा कर प्रदीप से काफी झगड़ा किया और उसे जान से मारने की धमकी दी.

7 मार्च, 2016 को नान्हू ने अपने साले नीरज तथा दोस्त सुनील के साथ मिल कर प्रदीप को ठिकाने लगाने की योजना बनाई और फोन कर के प्रदीप को मिलने के लिए बुलाया. प्रदीप गोरखपुर से बाघ एक्सप्रेस द्वारा मनकापुर आया, जहां पहले से मौजूद नान्हू और उस के साले से प्रदीप की कहासुनी हो गई. इस के बाद नान्हू और नीरज ने प्रदीप को पीटपीट कर अधमरा कर दिया. फिर अपने बदमाश मित्रों सुनील सिंह और बृजकिशोर सिंह को फोन कर के बुलाया और प्रदीप को होंडा सिटी कार में डाल कर बस्ती की ओर चल पड़े. रास्ते में उन्होंने प्रदीप के गले में रस्सी डाल कर कस दी, जिस से उस की मौत हो गई. इस के बाद वे लाश को चैनपुरवा हाईवे ओवरब्रिज के नीचे डाल कर लौट आए. होंडा सिटी कार नान्हू पांडेय की थी.

हत्याभियुक्त अखिलेश पांडेय उर्फ नान्हू पांडेय के ऊपर पहले से ही 12 मुकदमे दर्ज हैं, जिन में लूट, हत्या का प्रयास, छिनैती, गुंडा एक्ट, मारपीट और आर्म्स एक्ट जैसे संगीन अपराध शामिल हैं. उस के साले नीरज पर भी लूट, हत्या का प्रयास, विस्फोटक अधिनियम, धोखाधड़ी सहित दर्जन भर मुकदमे बस्ती जिले के विभिन्न थानों में दर्ज हैं. तीसरे हत्याभियुक्त सुनील सिंह पर भी गोंडा जिले के विभिन्न थानों में हत्या, लूट, गुंडा एक्ट, आर्म्स एक्ट सहित कई मुकदमें दर्ज हैं. चौथा अभियुक्त बृजकिशोर सिंह कथा लिखे जाने तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर था.

जबकि पकड़े गए हत्याभियुक्तों को कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया गया था. घटना का परदाफाश करने वाली पुलिस टीम को एसपी ने 5 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की है. Illegal Relationship

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है.

Social Crime Story: बदले की आग

Social Crime Story: इकबाल को इस बात का अहसास था कि उसी की गलती से पत्नी और बेटी हुस्न के बाजार में पहुंची हैं. शायद इसी वजह से वह उन्हें वापस घर ले जाने आया था. लेकिन वे नहीं मानीं. इस के बाद जो हुआ, वह बहुत बुरा था.

पूरा प्लेटफार्म रोशनी में नहाया हुआ था. कराची एक्सप्रेस अभीअभी आई थी, जो यात्रियों को उतार कर आगे बढ़ गई थी. प्लेटफार्म पर कुछ यात्रियों और स्टेशन स्टाफ के अलावा काली चादर में लिपटी अपनी 10 वर्षीया बेटी और 8 वर्षीय बेटे के साथ एक जवान औरत भी थी. ऐसा लगता था, जैसे वह किसी की प्रतीक्षा कर रही हो. अक्की अकबर उर्फ अक्को कुली उस के पास से दूसरी बार उन्हें देखते हुए उधर से गुजरा तो उस महिला ने उसे इशारा कर के अपने पास बुलाया.

अक्को मुड़ा और उस के पास जा कर मीठे स्वर में पूछा, ‘‘जी, आप को कौन सी गाड़ी से जाना है?’’

‘‘मुझे कहीं नहीं जाना, मैं ने तो केवल यह पूछने के लिए बुलाया है कि यहां चाय और खाने के लिए कुछ मिल जाएगा?’’

‘‘जी, बिलकुल मिल जाएगा, केक, रस, बिस्किट वगैरह सब कुछ मिल जाएगा.’’ अक्को ने उस महिला की ओर ध्यान से देखते हुए कहा.

गोरेचिट्टे रंग और मोटीमोटी आंखों वाली वह महिला ढेर सारे गहने और अच्छे कपड़े पहने थी. वह किसी अच्छे घर की लग रही थी. दोनों उस से लिपटे हुए थे. महिला के हाथ से सौ रुपए का नोट ले कर वह बाहर की ओर चला गया. कुछ देर में वह चाय और खानेपीने का सामान ले कर आ गया. चाय पी कर महिला बोली, ‘‘यहां ठहरने के लिए कोई सुरक्षित मकान मिल जाएगा?’’

महिला की जुबान से ये शब्द सुन कर अक्को को लगा, जैसे किसी ने उछाल कर उसे रेल की पटरी पर डाल दिया हो. उस ने घबरा कर पूछा, ‘‘जी, मैं कुछ समझा नहीं?’’

‘‘मैं अपने घर से दोनों बच्चों को ले कर हमेशा के लिए यहां आ गई हूं.’’ उस ने दोनों बच्चों को खुद से सटाते हुए कहा.

‘‘आप को यहां ऐसा कोई ठिकाना नहीं मिल सकता. हां, अगर आप चाहें तो मेरा घर है, वहां आप को वह सब कुछ मिल जाएगा, जो एक गरीब के घर में होता है.’’ अक्को ने कुछ सोचते हुए अपने घर का औफर दिया.

महिला कुछ देर सोचती रही, फिर अचानक उस ने चलने के लिए कह दिया. अक्को ने उस की अटैची तथा दोनों बैग उठाए और उन लोगों को अपने पीछे आने को कह कर चल दिया. मालगोदाम वाला गेट टिकिट घर के पीछे था, जहां लोगों का कम ही आनाजाना होता था. महिला को उधर ले जाते हुए उसे कोई नहीं देख सकता था. अक्को ने वही रास्ता पकड़ा. बाहर आ कर उस ने एक औटो में सामान रखा और महिला के बेटे को अपनी गोद में ले कर अगली सीट पर बैठ गया.

औटो चल पड़ा. रेलवे फाटक पार कर के अक्को ने औटो वाले से टैक्सी वाली गली में चलने को कहा. उस गली में कुछ दूर चल कर रास्ता खराब था, जिस की वजह से औटो वाले ने हाथ खड़े कर दिए. अक्को सामान उठा कर पैदल ही उन सब को अपने घर ले गया. दरवाजे पर पहुंच कर उस ने आवाज लगाई, ‘‘अम्मा.’’

अंदर से कमजोर सी आवाज आई, ‘‘आई बेटा.’’

मां ने दरवाजा खोला. पहले उस ने अपने बेटे को देखा, उस के बाद हैरानी भरी निगाह उन तीनों पर जम गई. अक्को सामान ले कर अंदर चला गया. वह एक छोटा सा 2 कमरों का पुराने ढंग का मकान था. इस घर में मांबेटे ही रह रहे थे. बहन की शादी हो चुकी थी, पिता गुजर गए थे. बाप कुली था, इसलिए बाप के मरने के बाद बेटे ने लाल पगड़ी पहन ली थी और स्टेशन पर कुलीगिरी करने लगा था. मां ने महिला और उस के दोनों बच्चों के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और अक्को की ओर देखने लगी.

अक्को ने कहा, ‘‘मां, ये लोग कुछ दिन हमारे घर मेहमान बन कर रहेंगे.’’

मां उन लोगों की ओर देख कर बोली, ‘‘कोई बात नहीं बेटा, मेहमानों के आने से तो घर में रौनक आ जाती है.’’

सुबह हो चुकी थी, अक्को ने मां से कहा, ‘‘अम्मा, तुम चाय बनाओ, मैं नाश्ते का सामान ले आता हूं.’’

कुछ देर में वह सामान ले आया. मां, बेटे और बेटी ने नाश्ता किया. अक्को ने अपना कमरा मेहमानों को दे दिया और खुद अम्मा के कमरे में चला गया. नाश्ते के बाद तीनों सो गए.

मां ने अक्को को अलग ले जा कर पूछा, ‘‘बेटा, ये लोग कौन हैं, इन का नाम क्या है?’’

उस ने जवाब दिया, ‘‘मां, मुझे खुद इन का नाम नहीं मालूम. ये लोग कौन हैं, यह भी पता नहीं. ये स्टेशन पर परेशान बैठे थे. छोटे बच्चों के साथ अकेली औरत कहीं किसी मुसीबत में न फंस जाए, इसलिए मैं इन्हें घर ले आया. अम्मा तुम्हें तो स्टेशन का पता ही है, कैसेकैसे लोग आते हैं. किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता.’’

‘‘बेटे, तुम ने यह बहुत अच्छा किया, जो इन्हें यहां ले आए. खाने के बाद इन से पूछेंगे.’’

दोपहर ढलने के बाद वे जागे. कमरे की छत पर बाथरूम था, तीनों बारीबारी से नहाए और कपड़े बदल कर नीचे आ गए. मां ने खाना लगा दिया. आज काफी दिनों बाद उन के घर में रौनक आई थी. सब ने मिल कर खाना खाया. खाने के बाद महिला ने मां से कहा, ‘‘मेरा नाम सुरैया है, बेटे का नाम शावेज और बेटी का शाहिदा. हम बहावलपुर के रहने वाले हैं. मेरे पति का नाम मोहम्मद इकबाल है. वह सरकारी दफ्तर में अफसर हैं.’’ कह कर सुरैया मां के साथ बरतन साफ करने लगी. इस के बाद उस ने खुद ही चाय बनाई और चाय पीते हुए बोली, ‘‘आप की बड़ी मेहरबानी, जो हमें रहने का ठिकाना दे दिया.’’

मां ने कहा, ‘‘कोई बात नहीं बेटी, जिस ने पैदा किया है, वह रहने का भी इंतजाम करता है और खाने का भी. लेकिन यह बताओ बेटी कि इतना बड़ा कदम तुम ने उठाया किस लिए?’’

‘‘मां जी, मेरे साथ जो भी हुआ, वह वक्त का फेर था. मेरे साथसाथ बच्चे भी घर से बेघर हो गए. मेरे पति और मैं ने शादी अपनी मरजी से की थी. मेरे मांबाप मेरी मरजी के आगे कुछ नहीं बोल सके. शादी के कुछ सालों तक तो सब ठीक रहा, लेकिन धीरेधीरे पति का रवैया बदलता गया.’’

थोड़ा रुक कर वह आगे बोली, ‘‘शाहिदा के बाद शावेज पैदा हुआ. इस के जन्म के कुछ दिनों बाद मुझे पता चला कि इकबाल ने दूसरी शादी कर ली है. मैं ने एक दिन उन से कहा, ‘तुम ने दूसरी शादी कर ली है तो उसे घर ले आओ. हम दोनों बहनें बन कर रह लेंगे. तुम 2-2 दिन घर नहीं आते तो बच्चे पूछते हैं, मैं इन्हें क्या जवाब दूं?’

‘‘उस ने कुछ कहने के बजाए मेरे मुंह पर थप्पड़ मारने शुरू कर दिए. उस के बाद बोला, ‘मैं ने तुम्हें इतनी इजाजत नहीं दी है कि तुम मेरी निजी जिंदगी में दखल दो. और हां, कान खोल कर सुन लो, तुम अपने आप को अपने बच्चों तक सीमित रखो, नहीं तो अपने बच्चों को साथ लो और मायके चली जाओ.’

‘‘इस के बाद इकबाल अपना सामान ले कर चला गया और कई दिनों तक नहीं आया. फोन भी नहीं उठाता था. एकदो बार औफिस का चपरासी आ कर कुछ पैसे दे गया. काफी छानबीन के बाद मैं ने पता लगा लिया कि उन की दूसरी बीवी कहां रहती है. बच्चों को स्कूल भेज कर मैं उस के फ्लैट पर पहुंच गई.

‘‘कालबैल बजाने के थोड़ी देर बाद एक लड़की ने दरवाजा खोला. मैं ने अनुमान लगा लिया कि यही वह लड़की है, जिस ने मेरे जीवन में जहर घोला है. वह भी समझ गई कि मैं इकबाल की पत्नी हूं. उस ने मुझे अंदर आने को कहा. मैं अंदर गई, कमरे में सामने इकबाल की बड़ी सी फोटो लगी थी, उसे देखते ही मेरे शरीर में आग सी लग गई.

‘आपी, मैं ने उन से कई बार कहा कि वह अपने बच्चों के पास जा कर रहें, लेकिन वह मुझे डांट कर चुप करा देते हैं.’ उस ने कहा. इस के बाद उस ने मुझे पीने के लिए कोक दी.

‘‘मैं ने उस के पहनावे पर ध्यान दिया, वह काफी महंगा सूट पहने थी और सोने से लदी थी. इस से मैं ने अनुमान लगाया कि इकबाल उस पर दिल खोल कर खर्च कर रहे हैं. जबकि हमें केवल गुजारे के लिए ही पैसे देते हैं. उस ने अपना नाम नाहिदा बताया.

मैं ने कहा, ‘देखो नाहिदा, तुम इकबाल को समझाओ कि वह तुम्हें ले कर घर में आ कर रहें. हम सब साथसाथ रहेंगे. बच्चों को उन की बहुत जरूरत है. उस ने कहा, ‘आपी, मैं उन्हें समझाऊंगी.’

‘‘उस से बात कर के मैं घर आ गई. जो आंसू मैं ने रोक रखे थे, वह घर आ कर बहने लगे. शाम को इकबाल का फोन आया. उन्होंने मुझे बहुत गालियां दीं, साथ ही कहा कि मेरी हिम्मत कैसे हुई उन का पीछा करने की. मैं ने 2-3 बार उन्हें फोन किया, उन्होंने केवल इतना ही कहा कि उन्हें मेरे ऊपर भरोसा नहीं है. बच्चों के बारे में उन्होंने कहा कि उन्हें शक है कि ये उन के बच्चे नहीं हैं. फिर मैं ने सोच लिया कि अब मुझे उन के साथ नहीं रहना. वह पत्थर हो चुके हैं.’’

इतना कह कर सुरैया सिसकियां भरभर कर रो पड़ी. अक्को और उस की मां ने कहा, ‘‘आप रोएं नहीं, जब तक आप का दिल चाहे, आप यहां रहें, आप को किसी चीज की कमी नहीं रहेगी.’’

जिस आबादी में अक्को कुली का घर था, उस के आखिरी छोर पर नई आबादी थी. वह रेडलाइट एरिया था. गरमियों के दिन थे, छत पर चारपाइयां लगा दी जातीं. सब लोग छत पर ही सोते थे. शाम होते ही नई आबादी में रोशनी हो जाती, संगीत और घुंघरुओं की आवाज पर सुरैया बुरी तरह चौंकी. अक्को ने बताया कि ये रेडलाइट एरिया है, यहां शाम होते ही नाचगाना शुरू हो जाता है. मोहल्ले वालों ने बहुत कोशिश की कि रेडलाइट एरिया यहां से खत्म हो जाए, लेकिन किसी की नहीं सुनी गई. अब हमारे कान तो इस के आदी हो गए हैं.

ऊपर छत पर खड़ेखड़े बाजार में बैठी वेश्याएं और आतेजाते लोग दिखाई देते थे. शाहिदा ने वहां का नजारा देख कर एक दिन अपने भाई शावेज से पूछा, ‘‘भाई, इन दरवाजों के बाहर कुरसी पर जो औरतें बैठी हैं, वे क्या करती हैं? कभी दरवाजा बंद कर लेती हैं तो थोड़ी देर बाद खोल देती हैं. फिर किसी दूसरे के साथ अंदर जाती हैं और फिर दरवाजा बंद कर लेती हैं.’’

शावेज ने जवाब दिया, ‘‘मुझे क्या पता, होगा कोई उन के घर का मामला.’’

उस समय शावेज भी खुलते बंद होते दरवाजों को देख रहा था. सुरैया भी यह सब रोजाना देखती थी, कुछ इस नजरिए से मानो कोई फैसला करना चाहती हो. जो पैसे वह अपने साथ लाई थी, धीरेधीरे वे खत्म हो रहे थे. बस कुछ जेवरात बाकी थे, जिन में से एक लौकेट और चेन बिक चुकी थी.

एक दिन अक्को कुली और सुरैया छत पर बैठे दीवार के दूसरी ओर उन दरवाजों को खुलता और बंद होते देख रहे थे. तभी सुरैया ने पूछा, ‘‘अक्को, धंधा करने वाली इन औरतों को पुलिस नहीं पकड़ती?’’

अक्को ने बताया कि उन्हें सरकार की ओर से धंधा करने का लाइसेंस दिया गया है. उन्हें लाइसेंस की शर्तों पर ही काम करना होता है.

सुरैया ने पूछा, ‘‘अक्को, क्या तुम कभी उधर गए हो?’’

‘‘एकआध बार अनजाने में उधर चला गया था, लेकिन तुम यह सब क्यों पूछ रही हो?’’ अक्को ने आश्चर्य से पूछा.

सुरैया कहने लगी, ‘‘मेरे अंतरमन में एक अजीब सी लड़ाई चल रही है. मैं इकबाल को यह बताना चाहती हूं कि औरत जब बदला लेने पर आ जाए तो सभी सीमाएं लांघ सकती है.’’

‘‘मैं कुछ समझा नहीं?’’ अक्को चौंका.

‘‘मैं इस बाजार की शोभा बनना चाहती हूं.’’

‘‘तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है?’’ अक्को ने साधिकार उसे डांटते हुए कहा.

‘‘अक्को तुम मेरे जीवन के उतारचढ़ाव को नहीं जानते. मैं ने इकबाल के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया. उस की खूब सेवा भी की और इज्जत भी बना कर रखी. लेकिन उस ने मुझे क्या दिया?’’ सुरैया की आवाज भर्रा गई.

अक्को ने उसे सांत्वना दे कर पूछा, ‘‘तुम अपनी सोच बताओ, फिर मैं तुम्हें कोई सलाह दूंगा.’’

वह कुछ सोच कर बोली, ‘‘मैं शाहिदा को नाचनागाना सिखाना चाहती हूं.’’

अक्को कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘अच्छा, मैं इस बाजार के चौधरी दारा से बात करूंगा.’’

अगले दिन उस ने दारा से बात कर के सुरैया को उस से मिलवा दिया. शाहिदा के भोलेपन, सुंदरता और सुरैया की भरपूर जवानी ने दारा के दिल पर भरपूर वार किया. उस ने चालाकी से अपना घर उन के लिए पेश कर दिया और थाने जा कर सुरैया और शाहिदा का वेश्या बनने का प्रार्थना पत्र जमा कर दिया. कुछ ही दिनों में मांबेटी ने उस इलाके के जानेमाने उस्तादों से नाचनेगाने की ट्रेनिंग ले ली. पहली बार मांबेटी सजधज कर कोठे पर बैठीं तो लोगों की भीड़ लग गई.

शाहिदा की आवाज में जादू था, फिर पूरे बाजार में यह बात मशहूर हो गई कि यह किसी बड़े घर की शरीफ लड़की है, जिस ने अपनी इच्छा से वेश्या बनना पंसद किया है. दारा चूंकि शाहिदा को अपनी बेटी बना कर कोठे पर लाया था, इसलिए दोनों की इज्जत थी. पूरे शहर में शाहिदा के हुस्न के चर्चे थे. देखतेदेखते बड़ेबड़े रईसजादे उस की जुल्फों में गिरफ्तार हो गए. जब शाहिदा अपनी आवाज का जादू चला तो नोटों के ढेर लग जाते. उस के एक ठुमके पर नोट उछलउछल कर दीवारों से टकरा कर गिरने लगते.

शाहिदा के भाई शावेज के खून में बेइज्जती तो आ गई थी, लेकिन जब कभी उस के शरीर में खानदानी खून जोश मारने लगता तो वह अपनी मांबहन से झगड़ने लगता. लेकिन वे दोनों उस की एक भी नहीं चलने देती थीं. शाहिदा की नथ उतराई की रस्म शहर के बहुत बड़े रईस असलम के हाथों हुई, जिस के एवज में लाखों की रकम हाथ लगी. असलम जब आता, ढेरों सामान ले कर आता. घर में किसी चीज की कमी नहीं थी. असलम शहर का बदमाश भी था. बातबात पर वह रिवौल्वर निकाल लेता था, लेकिन वही असलम शाहिदा के पैरों की मिट्टी चाटने लगता था.

एक दिन दबी जुबान से असलम ने उस की मां से शाहिदा को कोठे पर मुजरा न करने के लिए कहा तो उस की मां ने कहा, ‘‘उतर जाओ इस कोठे से, तुम से बढ़ कर सैकड़ों धनवान है मेरी शाहिदा के चाहने वाले. अब कभी इस कोठे पर आने की हिम्मत भी न करना.’’

असलम ने माफी भी मांगी, लेकिन सुरैया नरम नहीं पड़ी. असलम चला गया. सुरैया अक्को कुली को कुछ न कुछ देती रहती थी, क्योंकि उसी की वजह से वह इस कोठे पर बैठी थी. पूरे शहर में शाहिदा और असलम के चरचे थे. मांबेटी बनठन कर रोज शाम को तांगे में बैठ कर निकलतीं तो लोग उन्हें देखते रह जाते. तांगे पर उन का इस तरह निकलना कारोबारी होता था, इस से वे रोज कोई न कोई नया पंछी फांस लेती थीं.

एक दिन शावेज अपनी बहन शाहिदा और मां से उलझ गया. बात हाथापाई तक पहुंच गई. उस ने शाहिदा के मुंह पर इतनी जोरों से थप्पड़ मारा कि उस के गाल पर निशान पड़ गया. सुरैया को गुस्सा आया तो उस ने उसे डांटडपट कर घर से निकाल दिया. शावेज गालियां देता हुआ घर से निकल गया और एक हकीम की दुकान पर जा बैठा. वहां वह अकसर बैठा करता था. उस की मां को वहां बैठने पर आपत्ति थी, क्योंकि उसे लगता था कि वही हकीम उसे उन के खिलाफ भड़काता है. शावेज ने असलम और एकदो ग्राहकों से भी अभद्र व्यवहार किया था.

वेश्या बाजार के वातावरण ने शावेज को नशे का आदी बना दिया था, वह जुआ भी खेलने लगा था. उस के खरचे बढ़ रहे थे, लेकिन उस की मां उसे खरचे भर के ही पैसे देती थी. वह जानबूझ कर लोगों से लड़ाईझगड़ा मोल लेता था. इसी चक्कर में वह कई बार थाने की यात्रा भी कर आया था, जिस की वजह से उस के मन से पुलिस का डर निकल गया था. रात गए तक शावेज हकीम की दुकान के आगे बैठा रहा. जब बाजार बंद हुआ तो सुरैया को शावेज की चिंता हुई. मांबेटी उसे देखने आईं तो वह हकीम की दुकान पर बैठा मिला. दोनों उसे मना कर कोठे पर ले गई.

उधर इकबाल को पता चला कि उस की बीवी और बेटी हुस्न के बाजार में बैठ कर उस की इज्जत का जनाजा निकाल रही हैं तो अपनी इज्जत बचाने के लिए वह परेशान हो उठा. उस ने अपनी पत्नी सुरैया और बच्चों के घर से जाने की खबर पुलिस को नहीं दी थी. 8 सालों बाद एक दिन उस के एक जानने वाले ने सुरैया और उस की बेटी को कोठे पर बैठे देखा तो यह बात उसे बताई थी. इकबाल चाहता तो पुलिस को सूचना दे कर उन्हें अपने साथ ले जा सकता था. लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया. हुस्न का बाजार जनरल बसस्टैंड के पास था. इकबाल ने वहां पास के एक होटल में कमरा लिया और शाम होने का इंतजार करने लगा.

शाम होते ही वेश्या बाजार सज गया. इकबाल ने कमरा लौक किया और रेडलाइट एरिया में आ गया. उसे सुरैया बेगम का कोठा ढूंढने में कोई परेशानी नहीं हुई. मांबेटी दोनों सजसंवर कर ग्राहकों के इंतजार में बैठी थीं. इकबाल को देख कर दोनों पत्थर की मूर्ति बन गईं. दोनों उठीं और इकबाल को कमरे के अंदर आने के लिए इशारा किया. इकबाल उन के पीछे कमरे में अंदर गया तो देखा शावेज टीवी देख रहा था. पिता को देख कर वह खड़ा हो गया. चारों एकदूसरे को देख रहे थे.

इकबाल ने कहा, ‘‘सुरैया, तुम ने इतनी छोटी गलती के लिए मुझे इतनी बड़ी सजा दी. तुम्हारे घर से निकलने के बाद मैं ने तुम्हारे लिए अपनी दूसरी पत्नी को भी छोड़ दिया. कहांकहां नहीं ढूंढा तुम्हें. शायद मैं यह दिन देखने के लिए जिंदा था. काश, मैं पहले ही मर गया होता.’’

इकबाल की आंखों से आंसू निकलने लगे. सुरैया के मन में पति का प्रेम उमड़ पड़ा. वह उस के आंसू पोंछने पास गई और गुजरी स्थितियों के बारे में बताने लगी. दोनों बच्चे भी अपने पिता से लिपट कर रो पड़े. उन सब को रोता देख चौधरी दारा अंदर आया तो इकबाल को देख कर ठिठक गया. सुरैया ने बताया कि यह उस के पति हैं. जब सब रो चुके तो इकबाल ने सुरैया से घर चलने को कहा. लेकिन उस ने यह कह कर मना कर दिया कि अब वे शरीफ लोगों में नहीं जा सकते. हां, अगर शावेज जाना चाहे तो इसे ले जा सकते हो.

इकबाल अपनी बेटी शाहिदा से चलने को कहा तो उस ने मां के स्वर में स्वर मिलाया, ‘‘अब्बू, अम्मी ठीक कह रही हैं, मैं आप के साथ नहीं जा सकती.’’

जबकि शावेज ने अपने पिता से कहा, ‘‘अब्बू चलिए, मैं आप के साथ चलूंगा.’’

दोनों कमरे से निकल कर चले गए और होटल के कमरे पर आ गए. शावेज अपने पिता के साथ अपने आप को बहुत सुरक्षित महसूस कर रहा था. बापबेटे अपनीअपनी कहानी सुनातेसुनाते सो गए. सुबह नाश्ता करने के बाद शावेज अपने पिता से इजाजत ले कर अपनी मां और बहन को समझा कर लाने के लिए चला गया. सुरैया ने शावेज को देख कर कहा, ‘‘एक रात भी नहीं काट सका अपने बाप के साथ?’’

इस पर शावेज बोला, ‘‘नहीं मां, यह बात नहीं है. तुम्हें इस सच्चाई का पता है कि यह सब तुम्हारा ही कियाधरा है. तुम ने ही हमें शराफत की दुनिया से निकाल कर इस गंदगी के ढेर पर ला पटका है.’’

शाहिदा ने गुस्से से फुफकारते हुए कहा, ‘‘यह भाषण देना बंद कर. अगर यहां रहना है तो शराफत से रह, नहीं तो अपना बोरियाबिस्तर उठा और जा यहां से.’’

‘‘तू अपनी बकवास बंद कर, मैं अम्मा से बात कर रहा हूं.’’

‘‘यह ठीक कह रही है शावेज, अगर तुझे यहां रहना है तो रह, नहीं तो मेरी भी सलाह यही है कि यहां से चला जा,’’ सुरैया ने कहा.

‘‘मां इतनी पत्थर दिल न बनो, अब्बू अपनी गलती पर बहुत शर्मिंदा हैं. अब वह भी तुम्हें ले जाने के लिए तैयार हैं. इस गंदगी से निकलो और मेरे साथ चलो.’’

इस पर शाहिदा बिफर पड़ी और चिल्ला कर उसे वहां से बाहर निकल जाने को कहा. शावेज उस के इस व्यवहार से इतना दुखी हुआ कि वह तेजी से ऊपर वाले कमरे की ओर दौड़ा. वह वापस लौटा तो हाथ में चमकीली कटार लिए हुए था. सुरैया कुछ बोलती, इस से पहले ही उस ने कटार शाहिदा के पेट में भोंक दी. मां बचाने आई तो उस ने दूसरा वार मां पर कर दिया. दोनों फर्श पर गिर कर तड़पने लगीं, वह तब तक वहां खड़ा रहा, जब तक वे ठंडी नहीं हो गईं. जब उसे यकीन हो गया कि दोनों जीवन की बाजी हार चुकी हैं तो कटार हाथ में लिए वह बाहर निकल गया. उस पर जिस की भी नजर पड़ी, वह इधरउधर छिप गया.

बाहर आ कर शावेज ने तांगा रोका और उस में बैठ कर सीधा थाने पहुंचा. वहां इंसपेक्टर मौजूद था. शावेज ने खूनसनी कटार इंसपेक्टर की मेज पर रख कर अपनी मां और बहन की हत्या के बारे में बता कर अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पोस्टमार्टम के बाद इकबाल मांबेटी की लाशों को अपने घर ले गया और अपने बेटे के खिलाफ थाने में हत्या की तहरीर लिख कर दे दी. इस तरह एक व्यक्ति की गलती की वजह से हंसताखेलता पूरा परिवार बरबाद हो गया. Social Crime Story

Social Crime Story: तंत्रमंत्र का शूल

Social Crime Story: बेटे की चाह रखने वाले अनिल रस्तोगी ने अपने दोस्त कल्लू तांत्रिक की बातों में आ कर अपनी बेटी को उस के हवाले कर दिया था ताकि वह उस की बलि चढ़ा दे. उस ने सोचा भी नहीं था कि उस का दोस्त उस की बेटी को मारने से पहले उस के साथ दुष्कर्म भी करेगा.

सलोनी का अचानक गायब होना किसी को भी आश्चर्य में डाल सकता था. उस के मातापिता क्या पूरा गांव हैरत में था कि चंद कदम दूर सहेली के घर ट्यूशन पढ़ने गई सलोनी आखिर गई तो कहां गई? उस की सहेली का कहना था कि सलोनी उस के घर आई ही नहीं थी. घरपरिवार वाले, गांव वाले उसे ढूंढढूंढ कर थक गए थे. थाने में उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट भी लिखा दी गई थी, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला था.

सलोनी 15 दिसंबर, 2015 की शाम को अपनी मां सारिका से यह कह कर घर से निकली थी कि वह अपनी सहेली के घर ट्यूशन पढ़ने जा रही है. उस समय उस का पिता अनिल कुमार रस्तोगी अपनी ड्यूटी पर गया था. अनिल बिलारी स्थित अजुध्या शुगर मिल्स में गन्ने की पर्ची काटने का काम करता था. सलोनी ट्यूशन पढ़ कर एक घंटे में लौट आती थी. उस दिन जब वह डेढ़ घंटे तक भी नहीं लौटी तो सारिका उस की सहेली के घर गई. सहेली ने जब यह बताया कि सलोनी वहां आई ही नहीं थी तो सारिका सन्न रह गई. वापस लौट कर उस ने पति के मोबाइल पर संपर्क करने की कोशिश की तो पता चला कि उस का फोन बंद है. हैरानपरेशान सारिका को कुछ भी नहीं सूझ रहा था.

रात को करीब 8 बजे जब अनिल रस्तोगी घर लौटा तो नशे में धुत था. सारिका ने उसे सलोनी के गायब होने की बात बताई तो वह बोला, ‘‘मैं तो ड्यूटी से आ रहा हूं, मुझे क्या पता? गई होगी अपनी किसी सहेली के पास, आ जाएगी.’’

नशे की वजह से अनिल रस्तोगी इस स्थिति में नहीं था कि बेटी को खोज सके. लेकिन सारिका ने उस पर दबाव डाला तो वह बेटी को खोजने निकल पड़ा. उस स्थिति में वह न तो किसी के घर जा सकता था और न ही किसी का सहयोग ले सकता था. इसलिए थोड़ी देर इधरउधर भटक कर लौट आया. सारिका ने खाना बना रखा था, वह बेताबी से बेटी का इंतजार कर रही थी. देखने से ही लगता था कि वह बेटी को ले कर बहुत परेशान है. लेकिन अनिल रस्तोगी को न तो बेटी की चिंता थी और न पत्नी की. वह खाना खा कर सो गया.

अनिल रस्तोगी के परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटी थी सलोनी और एक बेटा, जो अभी काफी छोटा था. अनिल परिवार सहित अजुध्या शुगर मिल्स की वर्कर्स कालोनी में रहता था. 11 वर्षीया सलोनी स्थानीय सरकारी स्कूल में 7वीं में पढ़ रही थी. घरपरिवार में सब कुछ ठीक चल रहा था कि तभी 15 दिसंबर, 2015 की शाम को सलोनी गायब हो गई थी. सारिका ने वह पूरी रात जागतेजागते गुजारी. रातभर उस के दिमाग में बुरेबुरे खयाल आते रहे. जैसेतैसे सुबह हुई तो उस ने खुद घर से बाहर जा कर कालोनी के लोगों से बात की. कुछ लोगों को साथ ले कर उस ने सलोनी को ढूंढने की कोशिश भी की. यह देख कर अनिल रस्तोगी भी घर से निकल आया था.

जब सलोनी का कोई पता नहीं चला तो लोगों ने सारिका और अनिल को सलाह दी कि हाथ पर हाथ रख कर बैठने से कुछ नहीं होगा, पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराओ. बात जब थाने जाने की आई तो अनिल रस्तोगी ने फोन कर के अपने जिगरी दोस्त कल्लू को भी बुला लिया. अनिल रस्तोगी अपने दोस्त कल्लू और कालोनी के कुछ लोगों के साथ स्थानीय थाना बिलारी पहुंचा. थानाप्रभारी तेजेंद्र सिंह यादव उस समय थाने में ही थे.

उन लोगों की बात सुन कर श्री यादव ने सलोनी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवा दी, साथ ही अनिल रस्तोगी से कहा भी, ‘‘हो सकता है, लड़की नाराज हो कर कहीं चली गई हो. इसलिए उसे नातेरिश्तेदारों के यहां ढूंढो. हां, अगर आप की किसी से दुश्मनी हो या फिर किसी पर शक हो तो हमें बताओ, ताकि हम अपने हिसाब से काररवाई कर सकें.’’

अनिल रस्तोगी ने दुश्मनी या किसी पर शक होने की बात से इनकार कर दिया. गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा कर अनिल और उस के साथी लौट आए और सलोनी को ढूंढने लगे. लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी उस का कोई पता नहीं चला. सलोनी की मां सारिका का मायका पीलीभीत के न्यूरिया कस्बे में था. सलोनी के गायब होने की खबर पा कर उस के मायके वाले भी आ गए थे. आसपास की अन्य रिश्तेदारियों में भी पता कर लिया गया था. सलोनी का कहीं कोई पता नहीं चल पा रहा था. इस बीच उसे गायब हुए 2 दिन बीत चुके थे.

अनिल रस्तोगी का दोस्त कल्लू बिलारी के निकटवर्ती गांव खंडऊआ का रहने वाला था. उस की पत्नी सालों पहले उसे छोड़ कर किसी और के साथ भाग गई थी. इस के बाद कल्लू ने न तो शादी की थी और न पत्नी को ढूंढने की कोशिश. इस के बजाय वह तंत्रमंत्र और झाड़फूंक करने लगा था. दोस्त होने के नाते वह अनिल रस्तोगी के घर आता रहता था. जिस दिन से सलोनी गायब हुई थी, कल्लू अनिल के साथ ही था. 17 दिसंबर की सुबह अनिल रस्तोगी ने कल्लू से कहा, ‘‘सलोनी को ढूंढढूंढ कर परेशान हो गए हैं, उस का कहीं पता नहीं चल रहा. क्यों न तंत्रमंत्र से उस का पता लगाने की कोशिश की जाए?’’

‘‘हां, तंत्र क्रियाओं से उस का पता तो लग सकता है लेकिन बिना वजह खर्चा हो जाएगा.’’ कल्लू ने अनिल रस्तोगी को समझाने के लिए कहा तो वह छूटते ही बोला, ‘‘मेरी बेटी गायब है और तुम कह रहे हो बिना वजह खर्च हो जाएगा? तुम खर्चे की चिंता मत करो, बस किसी भी तरह मेरी बेटी का पता लगाओ.’’

‘‘ठीक है, तुम जरूरत का सामान मंगा दो, मैं चौकी लगाऊंगा. इस से हमें अवश्य ही सलोनी का पता चल जाएगा.’’

अनिल रस्तोगी ने वह सारा सामान मंगवा लिया, जो कल्लू ने बताया. सामान आ गया तो कल्लू ने पूरे विधिविधान से चौकी लगाई. इस काम में अनिल रस्तोगी ने भी उस की मदद की. कल्लू का लाइव तमाशा देखने के लिए कालोनी के तमाम लोग एकत्र हो गए थे. दिन भर तांत्रिक क्रियाएं करने के बाद शाम को कल्लू ने बताया कि ईष्टदेव को प्रसन्न करने में परेशानी आ रही है, लेकिन वह जल्दी ही प्रसन्न हो जाएंगे. क्रिया पूरी होने के बाद 20 दिसंबर को सलोनी का पता चल पाएगा.

18 और 19 दिसंबर को कल्लू की तांत्रिक क्रियाएं चलती रहीं. हकीकत जानने के लिए 20 दिसंबर को सुबह से ही लोग अनिल रस्तोगी के घर जुटने लगे थे. अंतत: सुबह करीब 9 बजे अपनी तंत्र क्रियाओं में लीन कल्लू ने आंखें बंद कर के विचित्र सी आवाज में बताया, ‘‘सलोनी मर चुकी है. उस की लाश यहां से 3 किलोमीटर दूर बिचौला गांव के किसान जयपाल सिंह के गन्ने के खेत में पड़ी है.’’

उस की बात सुन कर वहां मौजूद सभी लोग चौंके. पलभर के लिए निस्तब्धता छा गई. चंद पलों की उस शांति को भंग किया सारिका के रुदन ने. अविश्वास वाली कोई बात नहीं थी. फिर भी तांत्रिक कल्लू की बातकी सच्चाई जानने के लिए लोगों का एक जत्था सलोनी की लाश की तलाश में निकल पड़ा. अनिल और कल्लू भी साथ थे. कल्लू की बात सही निकली. सलोनी की लाश जयपाल सिंह के गन्ने के खेत में ही पड़ी मिली. लोगों ने तत्काल थाना बिलारी को सूचना दी. खबर मिलते ही थानाप्रभारी तेजेंद्र सिंह यादव पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे.

लाश सड़ने लगी थी. मृतका के कपड़े देख कर अनिल रस्तोगी ने बताया कि लाश उस की बेटी सलोनी की ही है. लाश की शिनाख्त हो गई तो तेजेंद्र सिंह यादव ने मुरादाबाद के एसपी देहात प्रमोद कुमार सिंह और एसएसपी नितिन तिवारी को इस मामले की पूरी जानकारी दे दी. 11 वर्षीया बच्ची की हत्या की सूचना मिलते ही एसपी देहात प्रमोद कुमार सिंह घटनास्थल पर जा पहुंचे. उन्होंने भी अपने नजरिए से लाश का मुआयना किया. मृतका की नाक से खून निकला था, जो सूख चुका था. उस के गले पर ऐसे निशान दिख रहे थे, जैसे उस का गला घोंटा गया हो.

एसपी देहात ने मृतका सलोनी के पिता अनिल रस्तोगी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि गायब होने से पहले सलोनी कानों में सोने की बाली, नाक में सोने की लौंग और पैरों में चांदी की पायल पहने हुए थी. जबकि इन में से कोई भी चीज उस के शरीर पर नहीं थी. प्राथमिक काररवाई के बाद पुलिस ने सलोनी की लाश पोस्टमार्टम के लिए मुरादाबाद भिजवा दी. आशंका थी कि सलोनी को मौत के घाट उतारने से पहले उस के साथ दुष्कर्म किया गया था. इस के साथ ही थाना बिलारी में अज्ञात के खिलाफ हत्या का केस दर्ज कर लिया गया.

जिलाधिकारी के आदेश पर 20 दिसंबर, 2015 की रात को ही डा. निर्मल ओझा, डा. सुजाता गौतम और डा. पवन कुमार के पैनल ने सलोनी की लाश का पोस्टमार्टम किया. पोस्टमार्टम से यह बात साफ हो गई कि सलोनी की हत्या गला घोंट कर की गई थी और यह काम उस के गायब होने वाली रात में कर दिया गया था. पोस्टमार्टम में यह भी साफ हो गया था कि मारने से पहले मृतका के साथ दुष्कर्म किया गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट पढ़ने के बाद एसपी (देहात) प्रमोद कुमार सिंह ने थानाप्रभारी बिलारी तेजेंद्र सिंह यादव से कहा कि वह मृतका के परिवार वालों को थाने बुला लें.

इस के बाद प्रमोद कुमार सिंह थाना बिलारी पहुंच गए. तब तक सलोनी के घर वाले आ चुके थे. प्रमोद कुमार सिंह ने मृतका की मां और पिता से विस्तृत पूछताछ की, लेकिन उन की बातों से कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था. तब प्रमोद कुमार सिंह ने थानाप्रभारी तेजेंद्र सिंह यादव से पूछा कि सलोनी की लाश खेत में पड़ी होने की सूचना किस ने दी थी? उन्होंने बताया कि सूचना मृतका के पिता अनिल रस्तोगी ने दी थी. प्रमोद कुमार सिंह ने अनिल रस्तोगी को अलग बैठा कर उस से पूछा कि उसे कैसे पता चला कि सलोनी की लाश 3 किलोमीटर दूर गन्ने के खेत में पड़ी है.

अनिल रस्तोगी ने उन्हें बताया कि जब कई दिन बीत गए तो उस ने लोगों के साथ खेतों में ढूंढना शुरू किया. इसी दौरान जब गन्ने के एक खेत से बदबू आई तो हम लोगों ने अंदर घुस कर देखा. खेत के अंदर सलोनी की लाश पड़ी थी. प्रमोद कुमार सिंह को लग रहा था कि अनिल रस्तोगी कुछ छिपाने की कोशिश कर रहा है. हकीकत जानने के लिए उन्होंने यही बात अकेले में अनिल की पत्नी सारिका से पूछी. सारिका ने जो कुछ बताया, उसे सुन कर प्रमोद कुमार सिंह चौंके.

सारिका ने बताया कि उस का पति और उस का दोस्त कल्लू दोनों ही तांत्रिक हैं. उन दोनों ने 3 दिन तक साधना कर के अपने ईष्टदेव को प्रसन्न किया था. उसी ने 20 दिसंबर की सुबह को कल्लू को बताया कि सलोनी की लाश बिचौला गांव के जयपाल सिंह के गन्ने के खेत में पड़ी है. सोचने वाली बात यह थी कि अनिल रस्तोगी ने झूठ क्यों बोला? दूसरे यह कि अभी तक कल्लू का नाम कहीं नहीं आया था. जबकि लाश के बारे में उसी ने बताया था. अनिल रस्तोगी थाने में था ही. प्रमोद कुमार सिंह ने थानाप्रभारी तेजेंद्र सिंह यादव से कहा कि वह अपनी टीम के साथ जाएं और कल्लू को तुरंत थाने ले आएं.

कल्लू गांव खंडऊआ का रहने वाला था. पुलिस उस की तलाश में उस के गांव पहुंची तो वह शराब पी रहा था. पुलिस उसे उठा कर थाने ले आई. प्रमोद कुमार सिंह ने अनिल और कल्लू को छोड़ कर सभी को कमरे से बाहर निकाल दिया. इस के बाद उन्होंने दोनों से पूछताछ की. इस पर उन्होंने बताया कि वे दोनों सिद्ध तांत्रिक हैं और उन्होंने अपनी तंत्रविद्या से लाश का पता लगाया था. जाहिर है, यह बात किसी के गले उतरने वाली नहीं थी. प्रमोद कुमार सिंह ने दोनों से मनोवैज्ञानिक ढंग से पूछताछ की. थोड़ी सख्ती भी की गई. इस के बावजूद दोनों खुद को निर्दोष बताते रहे. लेकिन पुलिस के सामने दोनों कब तक जुबान बंद रख सकते थे. उन्होंने प्रमोद कुमार सिंह को जो कुछ बताया, उसे सुन कर वह भी हैरत में रह गए.

हैरान अनिल रस्तोगी भी था, क्योंकि उसे यह तो पता था कि सलोनी की हत्या कर दी गई है, पर यह मालूम नहीं था कि हत्या से पहले उस के साथ दुष्कर्म भी किया गया था. बहरहाल, उन से पूछताछ के बाद जो हकीकत सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी. 17-18 साल पहले अनिल रस्तोगी की शादी पीलीभीत के कस्बा न्यूरिया की रहने वाली सारिका से हुई थी. शादी के 7 साल बाद तक सारिका मां नहीं बन सकी तो अनिल रस्तोगी ने कई तरह के नुस्खे आजमाए. डाक्टर से इलाज भी कराया. आखिरकार सारिका बेटी की मां बन गई. बेटी का नाम रखा गया सलोनी.

3 साल पहले सलोनी जब 8 साल की थी तो सारिका ने दूसरी बेटी को जन्म दिया. लेकिन जन्म के 14 दिनों बाद ही संदिग्ध परिस्थितियों में उस की मौत हो गई. दरअसल, हुआ यह था कि सारिका बच्ची को दूध पिलाने के बाद सुला कर नहाने चली गई थी. बच्ची को ठंड न लगे, यह सोच कर उस ने उसे ठीक से सारिका ने नहाने के बाद बच्ची को देखा तो वह मरी पड़ी थी. नवजात बेटी की मौत के एक साल बाद सारिका फिर मां बनी. इस बार उस ने बेटे को जन्म दिया. बेटे के जन्म से अनिल रस्तोगी और सारिका दोनों ही खुश थे.

पिछले 38 सालों से अनिल रस्तोगी की दोस्ती खंडऊआ गांव के रहने वाले कल्लू से थी. दोनों साथ उठतेबैठते, खातेपीते तो थे ही, एकदूसरे के घर भी आतेजाते थे. कल्लू शादीशुदा था. शादी के कुछ दिनों बाद कल्लू को हरियाणा के जिला झज्जर स्थित एक ईंट भट्ठे पर काम मिल गया था. कुछ दिन काम कर के जब उस का मन रम गया तो वह अपनी पत्नी को भी झज्जर ले आया. वहीं रहते उस की पत्नी एक अन्य मजदूर के प्रेमजाल में फंस गई. बाद में वह कल्लू का दामन छोड़ कर उसी मजदूर के साथ भाग गई.

पत्नी के चले जाने के बाद कल्लू अपने गांव लौट आया और तंत्रमंत्र और झाडफूंक से लोगों का इलाज करने लगा. वह खुद को सिद्धहस्त (डिग्रीधारी) तांत्रिक बताता था. उसे यह काम कुछ ऐसा रास आया कि उसे इस के अलावा कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ी. अनिल रस्तोगी अपने 38 साल पुराने इस दोस्त की तंत्रविद्या से कुछ ज्यादा ही प्रभावित था. इसलिए वह उसे अकसर अपने घर लाता रहता था.

3 साल पहले जब सारिका दूसरी बेटी की मां बनी थी तो अनिल रस्तोगी ने बेटे की चाहत की बात उसे बताई थी. कल्लू ने कुछ तांत्रिक क्रियाएं करने के बाद उसे बताया था कि वह अपनी छोटी बेटी की बलि चढ़ा दे तो अगली बार बेटा होगा. उस के कहने पर अनिल रस्तोगी ने अपनी 14 दिन की बच्ची का गला दबा कर उसे उस समय मौत के घाट उतार दिया था, जब उस की पत्नी बेटी को सुला कर नहाने गई हुई थी. सारिका को पति पर शक भी हुआ था, लेकिन चाह कर भी यह बात मुंह से नहीं निकाल सकी थी. इसे इत्तफाक ही कहेंगे कि अगली बार जब सारिका मां बनी तो उसे बेटा हुआ.

अनिल रस्तोगी ने इस का सारा श्रेय कल्लू की तांत्रिक क्रियाओं को दिया. उस ने यह बात सारिका को भी बताई कि कल्लू ने उसे 8 महीने पहले ही बता दिया था कि बेटा होगा. अनिल रस्तोगी की बेटी सलोनी 11 साल की हो चुकी थी. वह 7वीं कक्षा में पढ़ रही थी. किशोरावस्था से गुजर रही सलोनी के शरीर में स्त्रियोचित लक्षण नजर आने लगे थे. कल्लू उसे बुरी नजर से देखता था. कई बार उस ने बहाने से उस के शरीर का स्पर्श करने की भी कोशिश की थी. यह बात सारिका से छिपी नहीं थी.

कहते हैं, स्त्रियों में पुरुष की कामुक नजरों को पहचानने की क्षमता होती है. सारिका को जब लगा कि कल्लू की नजर सलोनी पर है तो उस ने अपने पति अनिल से कहा कि वह कल्लू का घर में आनाजाना बंद करा दे. लेकिन उस ने इसे सारिका का वहम बता कर बात खत्म कर दी. अलबत्ता कल्लू को इस बात का पता जरूर चल गया था कि सारिका को उस का घर में आनाजाना पसंद नहीं है.

इधर सारिका फिर से गर्भवती हो गई थी. अनिल रस्तोगी ने यह बात कल्लू को बता कर कहा कि वह इस बार भी बेटा चाहता है. दोस्त के मुंह से यह बात सुन कर कल्लू बोला, ‘‘बेटा तो मिल जाएगा, लेकिन इस के लिए तुम्हें अपनी बेटी सलोनी को मौत के घाट उतारना होगा. वैसे भी तुम्हारी बेटी तुम्हारे लिए ठीक नहीं है. वह गलत नक्षत्र में पैदा हुई थी, इसलिए तुम पर भारी है. उस की वजह से तुम्हारी मौत भी हो सकती है.’’

अनिल रस्तोगी कल्लू पर आंखें बंद कर के विश्वास करता था. वह सलोनी को मौत के घाट उतारने को तैयार हो गया. इस के बाद दोनों ने मिल कर सलोनी को मौत के घाट उतारने का तानाबाना बुन लिया. इस के लिए तारीख तय हुई 15 दिसंबर, 2015. सलोनी हर रोज शाम के समय अपनी सहेली के घर ट्यूशन पढ़ने जाती थी. 15 दिसंबर को जब वह ट्यूशन पढ़ने जाने के लिए घर से निकली तो गली में उसे उस का पिता अनिल मिल गया. उस दिन साप्ताहिक बाजार का दिन था. अनिल रस्तोगी ने सलोनी से कहा, ‘‘बेटी, ट्यूशन थोड़ी देर से या कल पढ़ लेना. घर का कुछ सामान खरीदना है, मेरे साथ बाजार चल. तुझे भी कुछ लेना हो तो खरीद दूंगा.’’

सलोनी पिता की बातों में आ कर साथ चल दी. थोड़ी दूर आगे कल्लू मिल गया तो अनिल ने उसे भी साथ ले लिया. सलोनी उन दोनों की दोस्ती को जानती थी, इसलिए उसे कोई संदेह नहीं हुआ. जब अनिल और कल्लू सलोनी को बाजार की ओर न ले जा कर दूसरे रास्ते पर ले जाने लगे तो उस ने पूछा, ‘‘इधर तो बाजार नहीं है, आप कहां ले जा रहे हैं मुझे?’’

इस पर अनिल ने पहले सोचासमझा, फिर जवाब दिया, ‘‘मुझे बिचौला गांव के एक आदमी से पैसे लेने हैं. उस से पैसे ले कर फिर बाजार चलेंगे.’’

सलोनी ने पिता की बात पर विश्वास कर लिया. उस समय तक शाम ढल चुकी थी. लोगों का आवागमन भी बंद हो चुका था. 2-ढाई किलोमीटर चलने के बाद अनिल रस्तोगी ने सलोनी और कल्लू से कहा, ‘‘तुम दोनों यहीं ठहरो, मैं पैसे ले कर आता हूं. मेरी फोन पर बात हो गई है, जिस से पैसे लेने हैं, वह गांव के बाहर मेरा इंतजार कर रहा है.’ अनिल रस्तोगी बेटी सलोनी और कल्लू को बीच रास्ते में छोड़ कर चला गया. सलोनी बच्ची थी, उसे दुनियादारी की समझ नहीं थी. कल्लू की गलत नजर की भी उसे कोई जानकारी नहीं थी. वैसे भी वह उसे ताऊ कहती थी.

आधा घंटा बीत गया. अंधेरा घिरने में ज्यादा देर नहीं थी. जबकि अनिल अभी तक नहीं लौटा था. सही मौका और वक्त देख कल्लू ने सलोनी से कहा, ‘‘तेरा बाप तो अब तक आया नहीं. चल, चल कर गन्ना खाते हैं. इंतजार तो करना ही पड़ेगा.’’

अच्छा गन्ना लाने के बहाने कल्लू सलोनी को गन्ने के खेत में ले गया. अंदर जा कर जब उस ने सलोनी को दबोचा तो वह चिल्लाई, ‘‘ताऊ, यह क्या कर रहे हो…मुझे छोड़ दो.’’

सलोनी रोईगिड़गिड़ाई, गुहार लगाई, लेकिन कल्लू उस वक्त दरिंदा बना हुआ था. उस ने पहले सलोनी के साथ दुष्कर्म किया और फिर गला दबा कर उस की हत्या कर दी. जब वह मर गई तो कल्लू ने उस के कानों की सोने की बालियां, नाक की लौंग और पैरों की पायल निकाल कर अपनी जेब में डाल लीं. सलोनी को ठिकाने लगा कर वह बिलारी के गांधी मूर्ति चौक पर पहुंचा. वहां अनिल रस्तोगी पहले से ही उस का इंतजार कर रहा था. कल्लू ने सलोनी को ठिकाने लगाने की बात उसे बता दी. उस के साथ दुष्कर्म की बात को वह दबा गया.

इस के बाद दोनों दोस्तों ने गांधी चौराहे के पास वाले ठेके पर जा कर शराब पी. पीनेपिलाने के बाद दोनों अपनेअपने घर चले गए. घर पर सारिका ने जब सलोनी के लापता होने की बात अनिल को बताई तो उस ने उसे ढूंढने का थोड़ा सा नाटक किया. जबकि वह हकीकत जानता था. अनिल रस्तोगी और कल्लू के मुंह से हकीकत जानने के बाद पुलिस ने इस केस में भादंवि की धारा 302 के साथसाथ 364 और 201 और जोड़ दी. दोनों अभियुक्तों को विधिवत गिरफ्तार कर के पुलिस ने उन्हें अदालत पर पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

अंधविश्वास की वजह से सलोनी की तो जान गई ही, अनिल को भी जेल जाना पड़ा. अब उस की पत्नी छोटे से बेटे के साथ अकेली रह गई है. Social Crime Story

—कथा में सलोनी नाम परिवर्तित है

 

Lover Crime Story: प्रेमिका के लिए गुनाह

Lover Crime Story: आवारा प्रवृत्ति के हिमांशु के प्रेमिल संबंध  ममता से हुए तो उस की ख्वाहिश पूरी करने के लिए उस ने तीन महीने के असद का अपहरण तो कर लिया, लेकिन इस के बाद उस ने जो किया खुद तो जेल गया ही प्रेमिका और उस का पति भी सलाखों के पीछे जा पहुंचा.

उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर के पुलिस कंट्रोल रूम को 2 मार्च, 2016 की शाम जो सूचना मिली थी, उस से विभाग अफरातफरी मच गई थी. इस की वजह यह थी कि महज 3 महीने के बच्चे का सरेआम अपहरण कर लिया गया था. वारदात में न मारपीट हुई थी, न खूनखराबा और न ही किसी हथियार का इस्तेमाल किया गया था. जिस तरह बच्चे का अपहरण हुआ था, वह हैरान करने वाला था.

सूचना पा कर पुलिस घटनास्थल पर पहुंची तो वहां लोगों की भीड़ लगी थी. घटना को ले कर लोग काफी नाराज थे. जिस परिवार के बच्चे का अपहरण हुआ था, उस में कोहराम मचा हुआ था. अपहृत बच्चे का नाम असद था. वह थाना जनकपुरी के मोहल्ला खानआलपुरा के रहने वाले असलम का बेटा था. उस के परिवार में पत्नी शाहीन के अलावा अन्य सदस्य भी थे. शाहीन का रोरो कर बुरा हाल था. वह बारबार बेटे को ढूंढ़ कर लाने की गुहार लगा रही थी. थोड़ीथोड़ी देर में वह बेहोश भी हो जा रही थी. आसपड़ोस की महिलाएं किसी तरह उसे संभाल रही थीं. सूचना पा कर पहुंचे सीओ (द्वितीय) अमित नागर और थानाप्रभारी यशपाल सिंह ने घटना के बारे में पूछताछ की.

असद के घर वालों और आसपास रहने वाले लोगों ने बताया कि असलम का 10 साल का भतीजा जुनैद असद को गोद में लिए घर के बाहर गली में घूम रहा था. करीब पौने 6 बजे एक्टिवा सवार एक युवक आया और जुनैद की गोद से बच्चे को छीन कर भाग गया था. सब कुछ इतनी जल्दी में हुआ कि जुनैद को संभलने तक का मौका नहीं मिला. वह चिल्लाया कि कोई असद को ले कर भाग रहा है, उसे बचाओ. लोगों का ध्यान उस तरफ गया तो उन्होंने फुर्ती दिखाते हुए स्कूटी सवार का पीछा किया, लेकिन वह तेजी से घंटाघर की ओर भाग गया. उस के बाद पुलिस को सूचना दी गई.

जमा लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा था. सभी असद को जल्द से जल्द बरामद करने की मांग कर रहे थे. यही नहीं, उन्होंने मोहल्ले से बाहर आ कर देहरादून मार्ग पर जाम भी लगा दिया था. पुलिस ने युवक का हुलिया पूछ कर जिले में चैकिंग अभियान चलाया, लेकिन इस का कोई फायदा नहीं मिला. घटना काफी गंभीर थी. एसएसपी आर.पी. सिंह यादव को इस की सूचना मिली तो उन्होंने अधीनस्थों को हालात पर निमंत्रण पा कर जल्द से जल्द बच्चे की सकुशल बरामदगी के निर्देश दिए. जाम और लोगों की नाराजगी को देखते हुए अन्य थानों की पुलिस भी बुलवा ली गई. कोतवाली प्रभारी संजय पांडेय और थाना सदर के थानाप्रभारी एस.के. दुबे भी वहां आ पहुंचे.

पुलिस ने किसी तरह लोगों को समझाबुझा कर जाम खुलवाया. अबोध बच्चे के अपहरण के पीछे किसी का क्या मकसद हो सकता है, यह सवाल पुलिस के सामने था. असलम की माली हालत भी ऐसी नहीं थी कि फिरौती के लिए उस के बेटे का अपहरण किया जाता. मामला रंजिश का हो सकता था. पुलिस ने इस बारे में पूछताछ की तो उस ने किसी से भी रंजिश होने की बात से साफ इंकार कर दिया. लोगों ने आशंका जाहिर की कि असद को तंत्रमंत्र के लिए भी उठाया जा सकता है. पुलिस भी इस आशंका से इंकार नहीं कर रही थी, क्योंकि नरबलि आदि के मामलों में अंधविश्वासी लोग ऐसा ही करते हैं. पुलिस ने असलम की तहरीर पर मुकदमा दर्ज किया और तहकीकात में जुट गई.

अपहर्ता युवक तक पहुंचने को पुलिस के पास कोई सुराग नहीं था. हुलिए के आधार पर पुलिस उस की तलाश में लग गई. बेटे की जुदाई और बुरे खयालों ने पूरी रात असलम के घर वालों को सोने नहीं दिया. पुलिस किसी नतीजे पर पहुंचती, अगली सुबह बुरी खबर सुनाई दी. मानकमऊ क्षेत्र स्थित नहर में शमशाद नामक युवक ने एक अबोध का शव देख कर पुलिस को सूचना दी. मौके पर पहुंची पुलिस ने बच्चे की लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. असलम को इस की सूचना दी गई. पोस्टमार्टम हाउस पहुंच कर उस ने लाश देखी तो वह बिलख पड़ा. वह उसी के बेटे की लाश थी. उस की हत्या की खबर पूरे परिवार पर बिजली बन कर गिरी.

मोहल्ले में आक्रोश फैल गया और लोग जाम लगाने की कोशिश करने लगे, लेकिन वहां पहुंचे एसपी (सिटी) महेंद्र यादव, सिटी मजिस्ट्रेट आर.के. गुप्ता और सीओ अमित नागर ने लोगों को समझाया और हत्यारे को गिरफ्तार करने का आश्वासन दिया. कोई बुरी घटना न घटे, इस के लिए पीएसी की टुकड़ी तैनात कर दी गई. पुलिस के लिए अबोध बच्चे की हत्या चुनौती बन गई. हत्यारा जो भी था, बेहद क्रूर था. उसे मासूम पर जरा भी दया नहीं आई थी. शाम तक असद की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई, जिस में मौत की वजह दम घुटना बताया गया था. हत्यारे ने मुंह दबा कर उस की सांसों की डोर काट दी थी.

पुलिस को हत्या की 2 वजहें नजर आ रही थीं, पहली रंजिश और दूसरी तांत्रिक क्रिया. लेकिन दोनों के ही कोई सबूत नहीं मिले थे. पुलिस ने असद के घर वालों से एक बार फिर पूछताछ की. पुलिस ने असलम और उस की पत्नी का मोबाइल नंबर ले लिया. हत्यारे तक पहुंचने के लिए पुलिस टीम ने मुख्य मार्ग पर जहांजहां सीसीटीवी कैमरे लगे थे, उन की रिकौर्डिंग चैक की तो उस में असद को उठाने वाला युवक नजर आ गया. उस ने दाएं हाथ से बच्चे को पकड़ा हुआ था. लेकिन रिकौर्डिंग में उस का चेहरा स्पष्ट नजर नहीं आ रहा था. उस की स्कूटी के रंग का जरूर पता चल गया था. वह ग्रे रंग की एक्टिवा थी.

एसएसपी आर.पी. सिंह ने अबोध की हत्या की गुत्थी को सुलझाने के लिए कई पुलिस टीमों को लगा दिया था. पुलिस ने आरटीओ औफिस से ग्रे कलर की सैंकड़ों एक्टिवा की डिटेल हासिल कर के उन की जांच शुरू की. पुलिस रंजिश को भी ध्यान में रख कर चल रही थी. पुलिस का मानना था कि किसी ने खुंदक में बच्चे की जान ले ली है. पुलिस ने घंटाघर और आसपास के इलाके में मुखबिरों का जाल बिछा दिया. पुलिस सीसीटीवी फुटेज के जरिए हत्यारे तक पहुंचने की कोशिश कर रही थी. आखिर पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली कि वीडियो फुटेज से मिलतेजुलते हुलिए का एक युवक मोहल्ला पिलखनतला में रहता है. पुलिस ने उस के बारे में पता किया तो पता चला कि उस का नाम हिमांशु है.

पुलिस ने उस का मोबाइल नंबर हासिल किया और उस की लोकेशन और काल डिटेल्स निकलवा कर जांच की. उस की लोकेशन घटनास्थल पर पाई गई. इस से स्पष्ट हो गया कि घटना में उसी का हाथ है. 8 मार्च को पुलिस ने हिमांशु को हिरासत में ले लिया और थाने ले आई. उस से पूछताछ की गई तो उस ने वारदात में अपना हाथ होने से साफ मना कर दिया, लेकिन पुलिस के पास सबूत थे, इसलिए जब सबूतों के आधार पर पूछताछ की गई तो उस ने जो बताया, उसे सुन कर पुलिस हैरान रह गई. उस ने प्रेमिका की ख्वाहिश पूरी करने के लिए इतना बड़ा गुनाह कर डाला था. विस्तृत पूछताछ में जो कहानी निकल कर सामने आई, वह हैरान कर देने वाली थी.

शादियों में स्टौल लगाने का काम करने वाला हिमांशु आवारा प्रवृत्ति का युवक था. आवारगी के चक्कर में ही उस की दोस्ती मोहल्ला गौशाला निवासी संजय सैनी से हो गई थी. संजय भी उस का हमपेशा था. संजय के परिवार में पत्नी ममता और एक बेटी थी. दोस्ती हुई तो हिमांशु उस के घर भी आनेजाने लगा. इसी आनेजाने में हिमांशु संजय की पत्नी को दिल दे बैठा. चंद दिनों में ममता को भी अहसास हो गया कि हिमांशु के दिल में उस के लिए कुछ है. वह उस से खूब हंसीमजाक करता था. ममता उस के मजाक का बुरा मानने के बजाय खुल कर साथ देती थी. दोनों के बीच रिश्ता देवरभाभी का था. संजय भी उन के हंसीमजाक को गंभीरता से नहीं लेता था.

बाद में हिमांशु अक्सर ऐसे मौके पर आने लगा, जब संजय घर पर नहीं होता था. ममता कोई नादान नहीं थी. उस की लच्छेदार बातों और मजाक का मतलब वह अच्छी तरह समझ रही थी. वक्त के साथ रिश्ते गहराए तो हिमांशु ने अपने दिल की बात उस से कह दी. ममता ने भी खुशीखुशी उस के इजहार पर अपनी स्वीकृति की मोहर लगा दी. दोनों के रिश्ते मर्यादा तोड़ चुके थे. वक्त अपनी गति से चल रहा था. ममता को बेटी थी. उसे बेटे की चाहत थी, लेकिन किसी शारीरिक समस्या के चलते वह आगे बच्चा पैदा नहीं कर सकती थी. एक दिन बातोंबातों में उस ने अपना यह दर्द हिमांशु से कहा तो प्रेमिका के इस दुख ने उसे परेशान कर दिया. कई दिनों तक वह इस समस्या से निजात के बारे में सोचता रहा.

संजय भी इस बात से परेशान रहता था. करीब 6 महीने पहले की बात है. एक दिन संजय और ममता बैठे थे, तभी हिमांशु आ गया. वह काफी खुश नजर आ रहा था. उसे देख कर संजय ने पूछा, ‘‘क्या बात है, आज तुम बहुत खुश नजर आ रहे हो?’’

‘‘खुशी की ही बात है, मैं ने तुम्हारे घर बेटा लाने का रास्ता खोज लिया है.’’ हिमांशु ने कहा.

उस की बात सुन कर ममता के चेहरे पर जैसे खोई रौनक लौट आई, ‘‘सच?’’

‘‘हां भाभी, अब तुम्हें फिक्र करने की जरूरत नहीं है.’’

‘‘ऐसा क्या करोगे तुम?’’

‘‘मैं तुम्हारे लिए नवजात बेटे का इंतजाम कर दूंगा.’’

‘‘कैसे, क्या वह दुकान पर मिलेगा?’’

‘‘नहीं, अस्पताल में.’’

‘‘मतलब?’’ ममता ने जिज्ञासा से पूछा.

‘‘मैं बच्चा चोरी कर के ला दूंगा. आप उसे पाल लेना.’’

हिमांशु की बात हैरान करने वाली थी, लेकिन ममता और संजय भी कुछ देर की बहस के बाद इस के लिए तैयार हो गए. बच्चा पैदा होने की बात सही लगे, इस के लिए ममता ने अपने पेट पर कपड़ा बांध कर आसपड़ोस में कहना शुरू कर दिया कि वह गर्भवती है. सभी ने उस की बात पर सहज विश्वास भी कर लिया. जैसेजैसे समय बढ़ता गया, वैसेवैसे ममता खुद को गर्भवती दिखाने के लिए पेट पर कपड़ों की परतें बढ़ाती गई.

अपनी कोख में बच्चा होने का वह तमाशा भर कर रही थी. उस ने और संजय ने तय कर रखा था कि हिमांशु जब उन्हें तुरंत का पैदा बच्चा ला कर देगा तो वे उसे ले कर कुछ दिनों के लिए बाहर चले जाएंगे और आ कर बताएंगे कि उन्हें बेटा पैदा हुआ है. इस पर उन पर किसी को शक भी नहीं होगा. ममता और संजय की सारी उम्मीदें हिमांशु पर ही टिकी थीं. वे उसे अक्सर टोकते भी रहते थे. वह भी प्रेमिका की ख्वाहिश हर सूरत में पूरी करना चाहता था. उस ने सोच लिया था कि वह किसी भी तरह अस्पताल से बच्चा चोरी कर के लाएगा. वह इस की प्लानिंग भी करता रहता था.

2 मार्च को उस ने अपनी योजना को पूरा करने का फैसला कर लिया. वह बच्चा चोरी करने के इरादे से महिला जिला अस्पताल पहुंचा. वहां एकदो बच्चे थे, लेकिन उन के पास चूंकि घर वाले तो थे ही, अस्पताल का स्टाफ भी था, इसलिए पकड़े जाने के डर से वह बच्चा चुराने की हिम्मत नहीं कर सका. कुछ देर इधरउधर घूम कर वह लौट आया. वह हताश हो कर घूम रहा था कि उस की नजर असद पर पड़ गई. उसे लगा कि इस बच्चे को हासिल कर के वह प्रेमिका की ख्वाहिश पूरी कर सकता है. असद चूंकि छोटे बच्चे की गोद में था, इसलिए उसे हासिल करना उसे आसान लगा. उस ने मौका देख कर स्कूटी एकदम नजदीक जा कर रोकी और असद को बच्चे की गोद से छीन कर भाग गया.

उसे ले कर वह सीधे संजय के घर पहुंचा. उस ने सोचा था कि बच्चे को देख कर ममता खुशी से चहक उठेगी, लेकिन उस की उम्मीदों को तब झटका लगा, जब बच्चे को देख कर ममता के तेवर बदल गए. उस ने कहा, ‘‘यह किसे ले आए तुम?’’

‘‘लड़का है, जो तुम्हें चाहिए था.’’

‘‘लेकिन मुझे तुरंत का जन्मा बच्चा चाहिए, इतना बड़ा नहीं. इसे देख कर कोई भरोसा नहीं करेगा कि मैं ने जन्म दिया है.’’

‘‘तुम्हारी गोद भर रही है. तुम्हें और क्या चाहिए?’’ हिमांशु ने उसे समझाते हुए कहा.

‘‘नहीं, मुझे यह लड़का नहीं चाहिए. इसे ढूंढ़ा गया तो कोई भी इसे आसानी से पहचान लेगा.’’

संजय ने भी उसे लेने से मना कर दिया. हिमांशु आसमान से जमीन पर आ गिरा. उसी बीच असद ने रोना शुरू कर दिया तो तीनों घबरा गए. हिमांशु को लगा कि बच्चा ज्यादा रोया तो वह पकड़ा जाएगा. प्रेमिका के मना करने और बच्चे के रोने से वह हैवान बन गया. उस ने मासूम का मुंह दबा कर उस की हत्या कर दी.

तब तक रात हो चुकी थी. वह असद को मानकमऊ ले गया और नहर किनारे फेंक कर अपने घर चला गया. हिमांशु ने सोचा था कि उस के गुनाह का किसी को पता नहीं चलेगा, लेकिन उस की यह गलतफहमी पुलिस द्वारा पकड़े जाते ही दूर हो गई. उस के अपराध स्वीकार करने के बाद पुलिस ने ममता और उस के पति संजय को भी गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर उन से भी पूछताछ की गई. पुलिस ने वह स्कूटी भी बरामद कर ली, जिस से हिमांशु ने असद का अपहरण किया था.

एसएसपी आर.पी. सिंह ने प्रेसवार्ता कर के असद के अपहरा के मामले का खुलासा किया. उस समय असद के घर वाले भी वहां मौजूद थे, जो आरोपियों को फांसी देने की मांग कर रहे थे. सभी कागजी औपचारिकताएं पूरी कर के पुलिस ने तीनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक उन की जमानतें नहीं हुई थीं.

प्रेमिका की ख्वाहिश पूरी करने के फेर में हिमांशु एक बड़ा गुनाह कर के खुद तो हत्यारा बना ही, प्रेमिका और उस के पति का भी भविष्य चौपट कर दिया. असद के मातापिता बेटे के खोने का यह दुख अब इस जन्म में तो नहीं ही भुला पाएंगे. Lover Crime Story

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

True Crime Story: सहेली ने कराई प्रेमी से घिनौनी हरकत

True Crime Story: रोहित ने अपनी नाबालिग प्रेमिका रूबी के सामने जो शर्त रखी थी, अमूमन उस के लिए जल्दी कोई लड़की तैयार नहीं होती. लेकिन प्रेमी की बात मान कर उस ने सहेली के साथ गलत काम तो कराया ही, अपने बचाव में उस की जान भी ले ली.

मध्य प्रदेश के जिला भिंड के एक गांव के अशोक कुमार बरसों पहले हरियाणा के शहर कालका में आ कर बस गए थे. उन के परिवार में पत्नी सीतारानी के अलावा एक बेटा नरेश और बेटी दीक्षा थी. अशोक और उस की पत्नी सीता कालका की बगल में बसे हिमाचल प्रदेश के औद्योगिक नगर परवाणू की अलगअलग फर्मों में नौकरी करते थे. अशोक की ड्यूटी सुबह साढ़े 5 बजे से शाम साढ़े 4 बजे तक रहती थी तो वहीं सीतारानी की ड्यूटी सुबह साढ़े 7 बजे से साढ़े 4 बजे तक की होती थी. दोनों ही अपनी ड्यूटी खत्म कर के पैदल ही घर चले आते थे. एक लंबे अरसे से इन की यही दिनचर्या थी.

कालका और परवाणू के बीच केवल 3 किलोमीटर का फासला है. यहां चलने वाली लोकल बसें अकसर ट्रैफिक में फंस जाती हैं, जिस की वजह से यह दूरी तय करने में उन्हें काफी समय लग जाता है. इसलिए यहां के लोग अकसर इस दूरी को पैदल ही तय कर लेते हैं. परवाणू में किराए के मकान मिलते ही नहीं और अगर मिल भी जाते हैं तो उन का किराया इतना ज्यादा होता है कि फैक्ट्रियों में काम करने वाले लोग उसे वहन नहीं कर पाते, इसलिए परवाणू में काम करने वाले अधिकांश लोगों ने अपनी रिहाइश कालका में ही बना रखी है. अशोक भी पिछले 4 सालों से कालका की एक घनी बस्ती में रह रहा था.

उस के बेटे नरेश ने दसवीं पास कर ली थी. आगे की पढ़ाई करने के बजाय वह नौकरी की तलाश में था. बेटी दीक्षा अभी 3 महीने पहले 13 बरस की हुई थी. वह स्थानीय सरकारी स्कूल की नौवीं कक्षा में पढ़ रही थी. इन दिनों उस की सालाना परीक्षाएं चल रही थीं. 11 मार्च, 2016 को दोपहर बाद 2 बजे उसे अपनी परीक्षा देने जाना था. उस दिन उस का भाई अपनी रिश्तेदारी में कालका से बाहर गया था. वह घर में अकेली ही थी. वैसे भी यहां डर जैसी कोई बात नहीं थी. पासपड़ोस में सब इन्हें जानतेपहचानते थे. शाम के वक्त वह अकसर रोजाना गली के बच्चों के साथ खेलती भी थी.

11 मार्च, 2016 की शाम 6 बजे तक वह घर से बाहर नहीं निकली तो कुछ बच्चे उसे खेलने को बुलाने के लिए उस के घर गए. उस का घर खुला हुआ था. बच्चों ने दीक्षा को आवाज लगाई. जवाब न आने पर उन्होंने भीतर जा कर देखा. वहां का दृश्य देख कर उन के होश उड़ गए. अर्धनग्न अवस्था में दीक्षा बिस्तर पर बेसुध पड़ी थी. बच्चे बाहर आ कर शोर मचाने लगे तो मोहल्ले की औरतें और आदमी वहां आ गए. उन्होंने जा कर देखा तो दीक्षा मृत पड़ी थी. एक जानकार ने अशोक कुमार को फोन कर के कहा उस के यहां कुछ गड़बड़ है, इसलिए जितनी जल्दी हो सके, वह घर आ जाए.

अशोक ने पत्नी को फोन कर दिया. उस के बाद दोनों साथसाथ पैदल घर की तरफ चल दिए. दोनों को एक ही बात बेचैन कर रही थी कि पता नहीं घर पर क्या हो गया है. खैर, वे तेज कदमों से चलते हुए घर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उन के घर के पास काफी भीड़ जमा है. जब उन्होंने देखा कि किसी ने उन की बेटी की हत्या कर दी है तो वे फूटफूट कर रोने लगे. उन के पहुंचने से पहले ही किसी ने पुलिस को फोन कर दिया था.

थाना कालका के थानाप्रभारी उमेद सिंह एसआई रेशम सिंह, हवलदार प्रदीप कुमार, नरेश कुमार, महिला कांस्टेबल जसमीत कौर के अलावा कांस्टेबल रमेश कुमार के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. मामला पहले ही फ्लैश किया जा चुका था. सूचना पा कर कालका क्षेत्र के एसीपी राजेश कुमार व जिला पंचकूला के डीसीपी अनिल धवन भी वहां आ गए थे. पुलिस जांच में पहली ही नजर में मामला दुष्कर्म के बाद हत्या का लग रहा था. इसलिए पुलिस ने मृतका के पिता अशोक कुमार की तरफ से अज्ञात के खिलाफ हत्या का केस दर्ज कर लिया था.

लड़की के नीचे के कपड़े शरीर पर नहीं थे. बिस्तर पर जिस स्थिति में उस की लाश पड़ी थी, उस से साफ लग रहा था कि मरने से पहले उस के साथ दुराचार किया गया था. लेकिन बिना मैडिकल जांच के रेप का आरोप नहीं लगाया जा सकता था. देर शाम क्राइम इनवैस्टीगेशन व फोरैंसिक टीमें घटनास्थल पर पहुंच कर सबूत जुटाने में जुट गईं. मौके की प्रारंभिक काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए कालका के सिविल अस्पताल भेज दिया. अब तक काफी रात घिर आई थी. इस केस को हल करने में पुलिस को कोई सुराग नहीं मिल पाया था.

अगली सुबह एसएमओ डा. एस.एस. नरवाल की निगरानी में डाक्टरों के एक पैनल ने दीक्षा के शव का पोस्टमार्टम कर के रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी. रिपोर्ट में मौत की वजह दम घुटना बताते हुए दुष्कर्म की पुष्टि की गई थी. इस के अलावा मृतका की गरदन व जिस्म के कुछ अन्य हिस्सों पर ऐसे जख्मों के निशान पाए गए थे, जिस से यह बात साबित होती थी कि मरने से पहले मृतका ने हत्यारे से काफी संघर्ष किया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इस बात की भी पुष्टि की गई थी कि दुष्कर्म मरने से पहले किया गया था. मृतका का विसरा निकाल कर रासायनिक परीक्षण के लिए भिजवाने के लिए सुरक्षित रख लिया गया था. दुष्कर्म की पुष्टि हो जाने पर केस में भादंवि की धारा 376 भी जोड़ दी गई. तफ्तीश के नाम पर थाना पुलिस के हाथ अभी खाली थे.

डीसीपी अनिल धवन ने पहले से ही इस केस को गंभीरता से ले रखा था. इस केस का खुलासा करने के लिए उन्होंने पुलिस की 3 टीमें गठित कर दीं. जिन में से एक टीम ने अपनी जांच की शुरुआत मृतका के पड़ोसियों से पूछताछ कर के की. उन से जानकारी मिली कि पिछले कुछ दिनों से दीक्षा के घर के बाहर 2 लड़कों को चक्कर काटते देखा गया था. यह भी पता चला कि सांवले रंग की एक लड़की भी दीक्षा के पास आया करती थी.

पड़ोसियों से हुलिए हासिल कर के पुलिस ने उन के स्कैच तैयार करवाए, साथ ही मृतका का मोबाइल फोन भी चैक किया. पड़ोसियों ने सांवले रंग की जिस लड़की का जिक्र किया था, उसी के हुलिए से मिलतीजुलती एक लड़की का फोटो दीक्षा के वाट्सऐप पर मिल गया. पुलिस ने वह फोटो पड़ोसियों को दिखाया तो उन्होंने इस बात की पुष्टि कर दी कि यही लड़की दीक्षा से मिलने आया करती थी. पर दीक्षा के मातापिता ने उस लड़की को पहचानने से इंकार कर दिया. पुलिस ने वाट्सएप वाली उस लड़की का फोटो दीक्षा के स्कूल की कुछ लड़कियों को दिखाया तो उन्होंने छूटते ही कहा कि यह रूबी है.

वह लड़की भी उसी स्कूल में पढ़ती थी. पिछले साल आठवीं पास कर लेने के बाद इस ने पढ़ाई छोड़ दी थी. स्कूल से रूबी के घर का पता हासिल कर के पुलिस उस के घर पहुंच गई और पूछताछ के लिए उसे थाने ले आई. महिला पुलिस द्वारा उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की गई तो नाबालिग रूबी पुलिस की शुरुआती पूछताछ में ही टूट गई. इस के बाद उस ने अपनी खास सहेली दीक्षा की हत्या की जो कहानी सुनाई, उसे सुन कर पुलिस भी हैरान रह गई. 15 साल की रूबी के पिता परवाणू में ही एक चाय की दुकान चलाते थे. स्कूल से लौटने के बाद रूबी अकसर पिता के काम में हाथ बंटाने के लिए दुकान पर बैठ जाया करती थी. उस से बड़ी 2 बहनें और थीं, जिन की शादियां हो चुकी थीं. सब से छोटा एक भाई था, जो परवाणू के एक स्कूल में पढ़ता था.

रूबी की दुकान पर रोहित नाम का एक युवक रोजाना चाय लेने आता था. वह वहीं की एक फैक्ट्री में नौकरी करता था. 22 साल का रोहित मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला उन्नाव के गांव मुस्तफाबाद का रहने वाला था. वह करीब 4 साल पहले गांव के एक दोस्त के साथ काम के सिलसिले में परवाणू आया था. यहां उसे सैक्टर-2 स्थित गैसचूल्हा बनाने वाली एक फैक्ट्री में नौकरी मिल गई थी. वहां उस का काम चूल्हों की सफाई करना और फैक्ट्री के लोगों के लिए चाय वगैरह लाना था. रूबी की चाय की दुकान उस की फैक्ट्री के नजदीक थी, इसलिए वह वहीं से फैक्ट्री के कामगारों के लिए चाय लाता था. कई बार उसे दुकान पर रूबी बैठी मिलती थी.

रोहित का चाय का और्डर अन्य ग्राहकों के मुकाबले काफी बड़ा होता था. इस की पेमेंट भी उसी के जरिए होती थी, इसलिए रूबी उस का खास ध्यान रखती थी. रूबी थी तो काफी सांवली, पर उस के नयननक्श अच्छे थे, जिस की वजह से रोहित उसे चाहने लगा था. रूबी को खुश करने के लिए कई बार वह चाय के बिल में 10-12 कप ज्यादा लिखवा कर उसे अपनी फैक्ट्री से अतिरिक्त पैसे दिलवा दिया करता था. अपने पास से भी कई बार उस ने 100-50 का नोट उस के हाथों पर रख कर मुट्ठी बंद कर दी थी. इस से रूबी का झुकाव रोहित की तरफ हो गया. रोहित चौबीसों घंटे फैक्ट्री में रहता था.

फैक्ट्री के वर्करों की छुट्टी हो जाने के बाद एक दिन रोहित ने रूबी को फैक्ट्री में ही बुला लिया. उस दिन दोनों का शारीरिक मिलन हो गया. एक बार जिस्मानी संबंध बनने के बाद उन के बीच इस का सिलसिला चल निकला. पहले रोहित अपनी कमाई से हर महीने कुछ पैसे घर भेज दिया करता था. पर रूबी से संबंध बनने के बाद उस ने घर पैसे भेजने बंद कर दिए. उस ने सारे पैसे रूबी पर लुटाने शुरू कर दिए. रूबी के लिए वह एक तरह से सोने का अंडा देने वाली मुरगी बन गया था.

इसी तरह 2 बरस निकल गए. इस के बाद एक दिन अचानक कुछ ऐसा हो गया कि उन के संबंधों में दरार पड़ गई. दरअसल, एक दिन कालका के मुख्य बाजार में रोहित की रूबी से मुलाकात हुई तो उस के साथ एक गोरीचिट्टी लड़की भी थी. रूबी ने उस लड़की का परिचय अपनी सहेली दीक्षा के रूप में करा कर बताया कि दोनों दूसरी क्लास से आठवीं तक साथसाथ पढ़ी थीं. इसी पहली मुलाकात में रोहित का दिल दीक्षा पर आ गया. इस के बाद रूबी से जब भी उस की मुलाकात होती, वह उस से दीक्षा के बारे में ही बातें करता. इस तरह उस ने दीक्षा के बारे में उस से तमाम जानकारियां हासिल कर लीं.

इस के बाद दीक्षा की झलक पाने के लिए वह उस की गली के चक्कर लगाने लगा. लेकिन दीक्षा न तो किसी से फालतू बातें करती थी और न ही फिजूल में इधरउधर घूमती थी. वह अपनी पढ़ाई और पारिवारिक जिम्मेदारियों को समझने वाली गंभीर प्रवृत्ति की लड़की थी. रोहित को जब लगा कि दीक्षा आसानी से उस के जाल में फंसने वाली नहीं है तो उस ने एक योजना बनाई. उस योजना के तहत उस ने एक दिन रूबी से सीधे कहा, ‘‘देख रूबी, मेरा मन तेरी सहेली दीक्षा पर आ गया है.

अगर तू चाहती है कि हमारा और तेरा रिश्ता हमेशा बना रहे तो कैसे भी तू उस से मेरी एक बार अकेले में मुलाकात करवा दे, सिर्फ एक बार. इस के बाद उस की तरफ देखना तो दूर, मैं कभी उस के बारे में सोचूंगा भी नहीं. अगर तुम ने मेरा यह काम नहीं किया तो समझ लो मेरा और तुम्हारा संबंध हमेशा के लिए खत्म.’’

इस तरह की स्थिति में अमूमन लड़कियां अपने प्रेमी से झगड़ा करने लगती हैं. वह अपने प्यार को हरगिज नहीं बंटने देती. पर रूबी न जाने कैसी घटिया सोच वाली लड़की निकली कि वह रोहित की बात मान गई. इतना ही नहीं, प्रेमी की ख्वाहिश पूरी करवाने के लिए वह दीक्षा के यहां जा पहुंची.  वह दीक्षा से रोहित के मन की बात तो कह नहीं सकती थी, पर साहस जुटा कर उस ने दीक्षा से यह जरूर कह दिया कि उस का दोस्त रोहित परीक्षा वाले दिन मिठाई और चौकलेट से उस का मुंह मीठा करा कर उसे अपनी शुभकामनाएं देना चाहता है.

दीक्षा ने इस पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. इस के बावजूद रूबी ने मिठाई खरीद कर उस में बेहोशी की दवा मिला दी. उस के बाद मिठाई और चौकलेट रोहित को देते हुए बोली, ‘‘वह मान तो गई है, लेकिन सिर्फ एक बार के लिए. तुम मेरे ही साथ उस के घर चलना. मैं दरवाजे पर खड़ी हो कर बाहर का ध्यान रखूंगी और तुम उस के कमरे में चले जाना.’’

रोहित खुश हो गया कि अब उस की इच्छा जल्द पूरी हो जाएगी. रूबी को पता था कि दीक्षा की वार्षिक परीक्षा शुरू हो चुकी है और मांबाप के ड्यूटी पर जाने के बाद वह अकेली ही कमरे पर रहती है. 11 मार्च, 2016 को दोपहर के 2 बजे से दीक्षा का पेपर था. उस दिन 11 बजे रूबी रोहित को ले कर दीक्षा के घर पहुंच गई. उस समय दीक्षा अकेली ही बैड पर बैठ कर पढ़ रही थी. अचानक अपनी सहेली रूबी को आया देख कर दीक्षा खुश हुई. 1-2 मिनट बात करने के बाद रूबी कमरे से बाहर चली गई. कमरे में रोहित और दीक्षा रह गए.

इधरउधर की बातें करते हुए रोहित बैड पर उस के नजदीक पहुंच गया. वह उस के साथ छेड़छाड़ करने लगा तो दीक्षा घबरा गई. उस ने उसे डांटा तो रोहित ने जबरदस्ती उस के मुंह में बेहोशी की दवा मिली मिठाई का टुकड़ा डाल दिया. थोड़ी देर में वह निढाल हो गई. इस के बाद रोहित ने उस के साथ मनमानी की. दवा का असर शायद कम था, जिस से दीक्षा थोड़ी देर में होश में आ गई. वह शोर मचाने को हुई तो रोहित ने उस का मुंह दबा लिया. उस की घुटीघुटी आवाज बाहर आ रही थी, जिसे सुन कर रूबी कमरे में आ गई.

उसे देख कर दीक्षा ने अपने मुंह से रोहित का हाथ हटा कर धमकाया कि वह इस बारे में अपने मम्मीपापा को बता कर उसे ऐसा सबक सिखाएगी कि वह याद रखेगी. इस से रूबी डर गई. उसे लगा कि अगर इस ने अपने मांबाप को यह बात बता दी तो उस की मोहल्ले में बदनामी तो होगी, साथ ही वह जेल भी जाएगी. इस से बचने के लिए रूबी ने पास पड़ा तकिया उठा कर उस के चेहरे पर रख दिया. रोहित ने दीक्षा के हाथ पकड़ लिए, जिस से वह ज्यादा विरोध नहीं कर सकी. कुछ ही देर में सांस घुटने से दीक्षा की मौत हो गई. उस वक्त वह अर्धनग्न अवस्था में थी. उसी अवस्था में वे उसे छोड़ कर चले गए.

रूबी से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसी दिन यानी 13 मार्च, 2016 को रोहित को भी हिरासत में ले लिया. रूबी चूंकि नाबालिग थी, इसलिए  उसे अगले दिन जुवेनाइल कोर्ट में पेश कर के करनाल स्थित नारी निकेतन भेज दिया गया, जबकि रोहित को कालका के प्रथम श्रेणी के न्यायिक दंडाधिकारी श्री दानेश गुप्ता की अदालत में पेश कर 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. रिमांड अवधि में पुलिस ने रोहित से विस्तार से पूछताछ की. इस के बाद उसे फिर से अदालत में पेश कर अंबाला जेल भेज दिया गया. True Crime Story

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. रूबी, दीक्षा और दीक्षा के परिजनों के नाम परिवर्तित हैं)

 

Bangalore Crime News: प्यार का खौफनाक अंत. प्रपोजल के बहाने प्रेमी को जिंदा जलाया

Bangalore Crime News: प्यार करने वाले रिश्तों में तकरार होना आम बात है, लेकिन कभीकभी यही तकरार इतना खतरनाक रूप ले लेती है कि इंसान बदले की आग में कुछ भी कर बैठता है. एक ऐसा ही दिल दहला देने वाला मामला सामने आया, जिस ने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया. यहां एक प्रेमिका ने प्यार के नाम पर ऐसा खौफनाक खेल खेला, जिस की कल्पना करना भी नमुमकिन है. प्रपोजल के बहाने उसने अपने ही प्रेमी को जिंदा जला दिया.

यह सनसनीखेज घटना कर्नाटक के बेंगलुरु शहर से जुड़ी बताई जा रही है. 27 साल की प्रेरणा ने अपने प्रेमी किरण को एक खास सरप्राइज देने के बहाने घर बुलाया. घर में उस समय कोई और मौजूद नहीं था, जिस का फायदा उठाते हुए उस ने पूरी साजिश को अंजाम दिया. शुरुआत में सब कुछ सामान्य लगा, लेकिन धीरेधीरे हालात डरावने होते चले गए.

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बताया जाता है कि प्रेरणा ने किरण की आंखों पर पट्टी बांध दी और उस के हाथपैर कुरसी से कस कर बांध  दिए. जब किरण ने इस का विरोध किया तो उस ने इसे ‘फारेन स्टाइल प्रपोजल’ कहकर उसे भरोसे में लिया. प्यार में भरोसा करने वाले किरण को जरा भी अंदाजा नहीं था कि अगले ही पल उसकी जिंदगी खत्म होने वाली है.

कुछ ही देर बाद प्रेरणा ने उस पर पेट्रोल डाल दिया और आग लगा दी. बंधे होने की वजह से किरण खुद को बचा नहीं सका और मौके पर ही उस की दर्दनाक मौत हो गई. यह पूरी घटना इतनी भयावह थी कि जिस ने भी सुना, उस की रूह कांप उठी. जांच में सामने आया कि दोनों करीब एक साल से रिलेशनशिप में थे और एक ही टेलीकाम कंपनी में काम करते थे, लेकिन पिछले कुछ समय से उन के रिश्ते में खटास आ गई थी.

प्रेरणा इस बात से नाराज थी कि किरण उसे नजरअंदाज कर रहा था और शादी से बच रहा था. यही नाराजगी धीरेधीरे खतरनाक साजिश में बदल गई. घटना के बाद प्रेरणा ने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की और कहा कि वह बाथरूम में थी, बाहर आ कर उस ने किरण को आग में जलता हुआ पाया. लेकिन जांच के दौरान यह कहानी ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी. सीसीटीवी फुटेज और अन्य सबूतों ने सच्चाई उजागर कर दी.

पुलिस के मुताबिक, घर में पहले से पेट्रोल मौजूद था, जिस से साफ है कि हत्या की योजना पहले ही बना ली गई थी. सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि आरोपी ने इस पूरी घटना का वीडियो भी अपने मोबाइल में रिकौर्ड किया. जब किरण आग में जल रहा था, तब भी वह वीडियो बनाती रही, जो इस अपराध की निर्दयता को साफ दिखाता है.

फिलहाल पुलिस ने प्रेरणा को हिरासत में ले कर पूछताछ शुरू कर दी है. शुरुआती जांच में यह स्पष्ट हो चुका है कि हत्या उसी ने की है. अब पुलिस इस मामले के हर पहलू को खंगाल रही है, ताकि इस खौफनाक वारदात के पीछे की पूरी सच्चाई सामने लाई जा सके. Bangalore Crime News

Hindi Crime Story: गुनाह जो छिप न सका

Hindi Crime Story: पहली पत्नी की हत्या के आरोप में सजा काट चुके कपिल शर्मा ने दूसरी पत्नी पार्वती की भी हत्या कर आत्महत्या का रूप देना चाहा. पर लाख छिपाने पर भी उस का गुनाह छिप न सका.

24 मार्च, 2016 को शाम करीब 6 बजे 2 युवक एक युवती को एम्स के ट्रामा सेंटर ले कर पहुंचे. उन में से एक का नाम रामबीर और दूसरे का कपिल शर्मा था. जिस युवती को वे ट्रामा सेंटर ले कर आए थे, वह कपिल शर्मा की 27 वर्षीया पत्नी पार्वती थी. कपिल ने डाक्टरों को बताया कि पार्वती आत्महत्या के लिए गले में दुपट्टा बांध कर पंखे से झूल गई थी.

आपातकालीन सेवा में तैनात डाक्टर पार्वती का परीक्षण करने लगे तो उन्हें वह मृत दिखाई दी. उस की सांसें काफी देर पहले ही बंद हो चुकी थीं और शरीर ठंडा हो चुका था. उस के गले में चारों तरफ रस्सी के बांधने का निशान था. इस के अलावा उस के हाथपैर, ठोड़ी, चेहरे, होंठ आदि पर चोट के निशान थे. उस का होंठ कटा हुआ था, जिस से खून भी निकला था. उस के पति कपिल शर्मा के भी चेहरे व अन्य जगहों पर चोट के निशान थे, जिन से खून छलक आया था. वह भी अपना इलाज करने को कह रहा था.

चोटों के बारे में कपिल ने बताया कि जब वह पत्नी को इलाज के लिए बाइक से अस्पताल ला रहा था तो महारानीबाग टी पौइंट पर एक आटोरिक्शा से एक्सीडेंट हो गया था, जिस से उसे और पत्नी को चोटें आई थीं. इस बात की पुष्टि उस के साथ आए युवक रामबीर ने भी की. पार्वती के गले के चारों तरफ जो निशान था, उस से डाक्टरों को शक हुआ, क्योंकि गले में फंदा लगा कर आत्महत्या के अधिकांश मामलों में फंदे का निशान पूरे गले पर नहीं आता. निशान करीब आधे गले तक ही आता है, इसलिए डाक्टरों ट्रामा सेंटर में मौजूद पुलिस चौकी में इस संदिग्ध केस की सूचना दे दी.

डाक्टरों की सूचना पर कांस्टेबल जगबीर पुलिस चौकी में मौजूद इमरजेंसी वार्ड में पहुंच गए. उन्होंने डाक्टरों से बात की. मृतका के गले का निशान देख कर उसे भी शक हुआ. कपिल शर्मा दक्षिणपूर्वी दिल्ली के थाना न्यू फ्रैंड्स कालोनी के तहत तैमूर नगर में रहता था, इसलिए मामले की एमएलसी तैयार कर जगबीर ने सूचना न्यू फ्रैंड्स कालोनी थाने को दे दी. सूचना मिलने पर थाने से एसआई संतोष पाबरी, लोकेंद्र त्यागी, कांस्टेबल संदीप और कांस्टेबल कमलेश ट्रामा सेंटर के लिए निकल पड़े.

पुलिस ने सब से पहले मृतका पार्वती की लाश का मुआयना किया. इमरजेंसी वार्ड में भरती उस के पति कपिल शर्मा का इलाज चल रहा था. उस से पूछताछ की तो उस ने उन्हें वही बताया, जो पहले बताया था. पुलिस को कपिल की बातों पर शक हो रहा था. उसी बीच थानाप्रभारी कुलदीप सिंह भी ट्रामा सेंटर पहुंच गए. उन्होंने भी लाश का मुआयना कर कपिल से पूछताछ की.

कपिल शर्मा के साथ अस्पताल में मौजूद रामबीर से थानाप्रभारी ने बात की तो उस ने बताया कि कपिल के शोर मचाने पर जब वह मोहल्ले के दूसरे लोगों के साथ उस के कमरे में गया तो पार्वती बैड पर पड़ी थी और कपिल उस के पास बैठा रो रहा था. पूछने पर कपिल ने बताया था कि पार्वती गले में दुपट्टा बांध कर पंखे से लटकी हुई थी. चाकू से दुपट्टा काट कर उस ने उसे उतारा था. उस समय कपिल शर्मा गहरे दुख में था, इसलिए अस्पताल से छुट्टी हो जाने के बाद ही पुलिस ने उस से पूछताछ करना जरूरी समझा. मामला आत्महत्या का है या हत्या का, यह बात पोस्टमार्टम के बाद ही साफ होनी थी. इसलिए लाश को पोस्टमार्टम के लिए एम्स की मार्च्युरी भेज दिया गया.

कुलदीप सिंह कपिल शर्मा के तैमूरनगर स्थित कमरे का मुआयना करने पहुंचे. उस का कमरा पहली मंजिल पर था. वह एक छोटा सा कमरा था, जिस में दरवाजे के दाहिनी ओर एक बैड डला था. कोने में प्लास्टिक का छोटा कूलर रखा था. पुलिस को कमरे में सामान बिखरा हुआ मिला. वहीं पर दुपट्टे के 2 टुकड़े मिले और उन टुकड़ों के पास ही चाकू पड़ा मिला. कोने में बिजली का करीब एक 2 मीटर तार का टुकड़ा भी मिला. बिजली का स्विच बोर्ड भी टूटा हुआ मिला. कमरे के जिस पंखे से लटक कर फांसी लगाने की बात कही गई, उन्होंने उस पंखे का भी निरीक्षण किया. वह पंखा एकदम सहीसलामत था. उस पंखे पर धूल जमी थी.

थानाप्रभारी ने जांच के लिए फोरैंसिक विभाग के फिजिकल डिवीजन की एक्सपर्ट टीम और क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी बुला लिया.  दोनों टीमों ने घटनास्थल पर पहुंच कर जांच की और सबूत जुटाए. जिस दुपट्टे से कपिल ने फांसी लगाने की बात की थी, फोरैंसिक टीम ने दुपट्टे के उन दोनों टुकड़ों की जांच की. पता चला कि वह दुपट्टा इतना छोटा था कि उस से गले और पंखे में गांठें नहीं बंध सकती थीं. अब तक जो भी जांच हुई, उस से पार्वती के आत्महत्या करने की कहानी झूठी लग रही थी. कुल मिला कर शक की सूई उस के पति कपिल शर्मा पर ही जा रही थी. अगले दिन पुलिस को पार्वती की जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली, उस में बताया गया था कि उस की मौत फांसी लगा कर नहीं, बल्कि मुंह व नाक दबा कर की गई थी.

इतना ही नहीं, उस के शरीर पर चोटों के 26 निशान भी पाए गए थे. पुलिस का शक सही निकला. कपिल भी ट्रामा सेंटर से डिस्चार्ज हो चुका था. वह कहीं भाग न जाए, इसलिए पार्वती के अंतिम संस्कार के समय पुलिस मौजूद रही. पत्नी का क्रियाकर्म करने के बाद पुलिस ने 26 मार्च को थाने बुला कर कपिल शर्मा से पूछताछ की. अपना वही पुराना राग अलापता रहा कि पार्वती ने खुदकुशी की है. लेकिन पुलिस के पास इतने सबूत थे कि उन के आगे वह टिक नहीं सका.

कपिल शर्मा को लगा कि वह अपने बुने जाल में फंस चुका है तो उस ने सच बोलना ही उचित समझा. वह बोला, ‘‘सर, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. मैं ने ही गुस्से में पार्वती की हत्या की थी. लेकिन यह सब अचानक हो गया था.’’

इस के बाद उस ने पार्वती की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

32 वर्षीय कपिल शर्मा मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर का रहने वाला था. हाईस्कूल पास करने के बाद वह आगे की पढ़ाई नहीं कर सका तो पिता के साथ खेती के काम में लग गया. कपिल दबंग किस्म का था. छोटीछोटी बातों पर वह मोहल्ले में लोगों से झगड़ बैठता था. उस की इस आदत से घर वाले भी परेशान थे. वह उसे समझासमझा कर हार चुके थे, पर उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता था. तब पिता ने यह सोच कर उस की शादी कर दी कि शायद घरगृहस्थी में बंधने के बाद वह सुधर जाए. लेकिन शादी के बाद भी कपिल के स्वभाव में कोई फर्क नहीं आया बल्कि शादी के कुछ दिनों बाद ही उस का अपनी पत्नी से भी झगड़ा रहने लगा. दोनों के बीच की दूरियां बढ़ने लगीं. हालात यहां तक पहुंच गए कि उस ने शादी के डेढ़-दो साल बाद ही पत्नी को जला कर मार दिया. यह सन 2004 की बात है.

कपिल ने इस मामले को भी आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की थी, पर ससुराल वालों के रिपोर्ट करने के बाद कपिल को जेल जाना पड़ा. कोर्ट में केस चला, जिस में उस का दोष सिद्ध हो गया और उसे 7 साल की सजा हुई. जेल के नियम और कानूनों का सही से पालन करने की वजह से उसे साढ़े 4 साल बाद ही रिहाई मिल गई. जेल से छूटने के बाद कपिल अपने एक दोस्त के साथ काम की तलाश में दिल्ली चला आया. उस का दोस्त दिल्ली के एक निजी अस्पताल में नौकरी करता था. दोस्त कपिल के लिए भी नौकरी ढूंढने लगा, लेकिन उस समय उसे नौकरी नहीं मिली.

उसी दौरान हजरत निजामुद्दीन क्षेत्र के एक पुरुष मरीज की देखभाल के लिए एक नर्सिंग अटेंडेंट की जरूरत थी. कपिल को कोई काम नहीं मिल रहा था तो वह यह काम करने को तैयार हो गया. कपिल अस्पताल की ओर से उस मरीज की देखभाल करने के लिए हजरत निजामुद्दीन चला गया. रहने के लिए उसे उसी कोठी में एक कमरा भी मिल गया था. उसी कोठी में पार्वती नाम की एक युवती खाना बनाने आती थी. 21 साल की पार्वती मूलरूप से नेपाल की थी. वह शादीशुदा थी. उस के 2 बच्चे भी थे.

पार्वती भी तेजतर्रार थी, पति से उस की नहीं बनती थी. कुछ दिनों पहले ही वह गुस्से में पति को छोड़ कर दिल्ली चली आई थी. दोनों बच्चों को भी वह पति के पास ही छोड़ आई थी. दिल्ली आ कर वह कोठियों में खाना बनाने का काम करने लगी थी. कपिल और पार्वती एक ही जगह काम करते थे, इसलिए उन की दोस्ती हो गई थी. चूंकि कोठी में दोनों साथसाथ रहते थे, इसलिए उन की नजदीकियां बढ़ती गईं. फिर एक दिन ऐसा भी आया, जब उन के बीच शारीरिक संबंध बन गए.

इस के बाद उन्होंने एक मंदिर में शादी कर ली. शादी के बाद वे दक्षिणपूर्वी दिल्ली के थाना न्यू फ्रैंड्स कालोनी के तहत तैमूरनगर में किराए का कमरा ले कर रहने लगे. यह बात सन 2011 की है. कपिल और पार्वती दोनों ही कमा रहे थे, इसलिए उन के सामने कोई आर्थिक परेशानी नहीं थी, पर एक चिंता उन्हें सताए जा रही थी कि कई साल बाद भी उन के कोई बच्चा नहीं हुआ. पार्वती को कई बार गर्भ ठहरा भी, लेकिन 1-2 महीने बाद ही किसी वजह से गर्भपात हो जाता था.

बारबार गर्भ गिरने से पार्वती को तो दुख होता ही था, कपिल भी परेशान रहने लगा. इस के लिए वह हर बार पत्नी पार्वती को ही दोषी मानता था. कपिल ने शराब भी पीनी शुरू कर दी थी. नशे में धुत हो कर घर लौटना जैसे उस की आदत हो चुकी थी. पार्वती उसे ज्यादा शराब पीने को मना करती तो वह उस से झगड़ा करने लगता. कभीकभार बात बढ़ने पर वह उस की पिटाई भी कर देता. इसी दौरान हजरत निजामुद्दीन के बाद कपिल को पीतमपुरा में किसी मरीज की देखभाल करने का काम मिल गया. वह वहां अपनी मोटरसाइकिल से आताजाता था. जब कपिल पिता नहीं बन सका तो सोचने लगा कि पार्वती के अंदर ही कोई कमी है, जिस की वजह से उस के गर्भ में बच्चा नहीं रुक रहा.

कपिल ने पार्वती को छोड़ने की धमकी दी तो वह उस के सामने गिड़गिड़ाई, ‘‘मैं ने तुम्हारे लिए अपने पति और बच्चों तक को छोड़ दिया और तुम इस तरह की बात कर रहे हो. बताओ, ऐसे में मैं कहां जाऊंगी.’’

‘‘तुम भाड़ में जाओ. ऐसी औरत का क्या फायदा, जो बच्चा तक न दे सके.’’ कपिल ने गुस्से में कहा.

‘‘यह कोई मेरे हाथ में तो है नहीं, जब इलाज के बाद भी बच्चा नहीं रुक रहा तो मैं क्या करूं.’’ वह बोली.

‘‘अब तू एक ही शर्त पर यहां रहेगी. मैं चाहे कुछ भी करूं, तू मेरे काम में दखल नहीं देगी.’’ कपिल ने फरमान सुनाया.

पार्वती की मजबूरी थी. उस ने भी कह दिया कि वह अब उस से कुछ नहीं कहेगी. इस के बाद कपिल घर कितने बजे लौटता, वह कहां जाता, पार्वती इस बारे में उस से कुछ नहीं पूछती. बस वह उसे समय पर खाना बना कर दे देती थी. लेकिन इसी साल मार्च के महीने में कपिल को जब पता चला कि पत्नी को फिर से गर्भ ठहर गया है तो वह खुश हुआ. उस के मन में फिर से उम्मीद की किरण जाग उठी. उस ने पत्नी के प्रति अपना व्यवहार बदल दिया. वह उस के साथ प्यार से पेश आने लगा. इतना ही नहीं, वह उस के खानपान का भी ध्यान रखने लगा.

लेकिन होली से 2-3 दिन पहले अचानक फिर से गर्भपात हो गया. यह उन दोनों के लिए बड़े दुख की बात थी. इस के बाद कपिल की तो जैसे उम्मीद ही टूट गई. होली के अगले दिन धुलेंदी थी. उस दिन बहुत से लोग रंग में सराबोर और नशे में चूर होते हैं. कपिल उस दिन अपने काम से दोपहर बाद ढाई बजे घर लौट आया था. उस समय भी वह शराब पीए हुए था और शराब की एक बोतल अपने साथ लाया था. कमरे में आते ही वह पत्नी के साथ गालीगलौज करने लगा. पार्वती पहले तो सब बरदाश्त करती रही, जब बातें बरदाश्त से बाहर हुईं तो उस ने जवाब देने शुरू कर दिए.

पार्वती का बोलना ही था कि कपिल का गुस्सा उस पर फूट पड़ा. उस ने उस की लातघूंसों से पिटाई शुरू कर दी. इतना ही नहीं, गुस्से में तमतमाए कपिल ने अपने हाथों से उस की नाक और मुंह दबा कर हत्या कर दी. पत्नी के मर जाने के बाद कपिल का नशा उतर गया. अब उसे पुलिस द्वारा पकड़े जाने का डर था. पुलिस से बचने का वह उपाय सोचने लगा. तभी उस के दिमाग में आया कि यदि वह इस हत्या को आत्महत्या का रूप दे देगा तो वह आसानी से बच सकता है.

आत्महत्या का केस दिखाने के लिए उस ने कमरे में पड़े बिजली के तार को पत्नी की गरदन में डाल कर दोनों हाथों से कस दिया, जिस से उस के गले पर निशान पड़ जाएं. फिर पत्नी के एक दुपट्टे को चाकू से काट कर उसे लाश के पास ही डाल दिया. यह काम करने के बाद वह कमरे का दरवाजा भिड़ा कर हाथ में शराब की बोतल लिए पहली मंजिल से नीचे उतर आया. नीचे कुछ दोस्त मिले तो उन के साथ बैठ कर उस ने शराब पी. 2 पैग पी कर वह दोस्तों के बीच से उठ कर पास में स्थित पान की दुकान पर गया. वहां से पान खाते हुए वह सीधे अपने कमरे पर चला गया.

कमरे में घुसते ही उस ने योजनानुसार शोर मचाना शुरू कर दिया. शोर सुन कर आसपड़ोस के लोग उस के यहां इकट्ठा हुए तो उस ने उन्हें बताया कि पत्नी गले में दुपट्टे का फंदा बना कर पंखे से झूल गई. बड़ी मुश्किल से उस ने चाकू से दुपट्टा काट कर उसे उतारा है. उस समय पार्वती के शरीर में गरमाहट थी. लोगों के कहने पर वह अपने दोस्त रामबीर के साथ पत्नी को एम्स के ट्रामा सेंटर ले गया.

मोटरसाइकिल रामबीर चला रहा था. महारानी बाग के पास उस की बाइक एक औटोरिक्शा से भिड़ गई. रामबीर तो किसी तरह संभल गया, लेकिन कपिल और उस की मृत पत्नी को चोटें आईं. उसी दौरान औटोरिक्शा वाला वहां से भाग गया. जैसे ही वह ट्रामा सेंटर में पार्वती को ले कर पहुंचे, डाक्टरों ने उस के गले पर लगे निशान से ही पहचान लिया कि यह केस आत्महत्या का नहीं हो सकता. कपिल शर्मा से पूछताछ के बाद पुलिस ने 26 मार्च को उसे कोर्ट में पेश कर 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में जरूर सबूत जुटा कर उन्होंने उसे फिर से न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. मामले की विवेचना थानाप्रभारी कुलदीप सिंह कर रहे हैं.

पहली पत्नी की हत्या के आरोप में सजा काट चुके कपिल शर्मा को एहसास होना चाहिए था कि जुर्म चाहे कितने भी शातिराना तरीके से किया जाए, वह उजागर हो ही जाता है. पार्वती से शादी करने के बाद उसे फिर से अपनी बाकी की जिंदगी हंसीखुशी से बिताने का मौका मिला था, लेकिन उस की जिद और नासमझी ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा. यदि पार्वती के गर्भ में बच्चा नहीं ठहर रहा था तो उसे किसी अच्छे डाक्टर से इलाज कराना चाहिए था. बहरहाल, कपिल शर्मा के असंयमित काम की वजह से पार्वती को तो अपनी जान से हाथ धोना ही पड़ा, वह खुद भी सलाखों के पीछे पहुंच गया. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Mumbai Crime: गले की फांस

Mumbai Crime: सबीना से संबंध बनाते समय नसीम ने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन वह उस के गले की फांस बन जाएगी. जिस डर से उस ने उस फांस को निकालना चाहा, आखिर में वही हुआ.

शब्बीर खान के परिवार में पत्नी जन्नतुनिशां के अलावा 26 साल की विवाहिता बेटी सबीना कौसर और 2 साल की नातिन जिया थी. पति से तलाक होने के बाद सबीना बेटी के साथ मांबाप के साथ ही रह रही थी. शब्बीर खान अपने इस छोटे से परिवार के साथ मुंबई के उपनगर कुर्ला वेस्ट, संजय नगर, चांदतारा पुलिस चौकी के पास स्थित चाल नंबर डी-6 के रूम नंबर 6 में रहते थे. उन का अपना खुद का छोटा सा व्यवसाय था.

14 जनवरी, 2016 की शाम के यही कोई 6 बजे जब जन्नतुनिशां घर के कामों में व्यस्त थीं, तभी सबीना मजार पर जाने की बात कह कर घर से निकली तो लौट कर नहीं आई. वह लगभग रोजाना शाम को मजार पर जाती थी, इसलिए उस दिन भी जब उस ने मजार पर जाने की बात कही तो जन्नतुनिशां ने इजाजत दे दी थी. रोजाना सबीना मजार से जल्दी ही लौट आती थी, लेकिन उस दिन जब उसे लौटने में देर होने लगी तो जन्नतुनिशां को थोड़ा चिंता हुई. सबीना की बेटी जिया भी बारबार मम्मी को पूछ रही थी. थोड़ी देर तक तो जन्नतुनिशां को लगा कि सबीना किसी परिचित के यहां चली गई होगी, लेकिन जब समय ज्यादा होने लगा तो उन्हें चिंता होने लगी.

शब्बीर खान के आने पर सबीना की खोज शुरू हुई. पहले आसपड़ोस वालों से, उस के बाद जानपहचान तथा नातेरिश्तेदारों से पता किया गया. जब सबीना के बारे मे कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली तो पतिपत्नी घबरा गए. सबीना की बेटी ऊपर से परेशान किए थी. शब्बीर खान और जन्नतुनिशां को जब कोई राह नहीं सूझी तो सवेरा होते ही उन्होंने थाने का रुख किया. थाना घाटकोपर में उन्होंने सबीना की गुमशुदगी दर्ज करा दी. गुमशुदगी दर्ज होते ही पुलिस ने काररवाई शुरू कर दी. लेकिन कोई सूत्र हाथ न लगने से पुलिस भी उस के बारे में कुछ पता नहीं कर सकी. बेटी के बारे में पता न चलने से शब्बीर खान और जन्नतुनिशां की चिंता और परेशानी बढ़ती जा रही थी.

शब्बीर खान लगभग रोज ही थाने जाते थे, लेकिन वहां उन्हें निराशा के अलावा कुछ नहीं मिलता. इसी तरह 15 दिन बीत गए, लेकिन सबीना के बारे में कुछ पता नहीं चला. अब शब्बीर खान और जन्नतुनिशां के मन में किसी अनहोनी की आशंका होने लगी थी. उसी बीच मुंबई सायन अटौप हिल क्राइम ब्रांच यूनिट-4 के हैडकांस्टेबल गंगाधर पिलवटे को उन के किसी मुखबिर ने बताया कि एक आदमी किसी महिला की हत्या कर के उस के सारे गहने मुंबई में बेचने की कोशिश कर रहा है.

गंगाधर पिलवटे ने यह बात सीनियर इंसपेक्टर अशोक जाधव को बताई तो उन्होंने इंसपेक्टर सुनील जाधव के नेतृत्व में एसआई प्रदीप गायकवाड, अरुण जाधव, हैडकांस्टेबल गंगाधर पिलवटे, सुभाष बागुल, दीपक मांढरे, संभाजी सांलुके, प्रताप चौहाण की एक टीम बना कर उस आदमी पर नजर रखने के लिए लगा दिया, साथ ही इस  बात की जानकारी अधिकारियों को भी दे दी. जहांजहां मुखबिर द्वारा बताए आदमी के मिलने की संभावना थी, गंगाधर पिलवटे अपने साथियों के साथ वहांवहां नजर रखने लगे. कुर्ला, विद्याविहार, माटुंगा रेलवे स्टेशनों के साथसाथ धारावी बस्ती पर उन की खास नजर थी. लेकिन कई दिनों की अथक मेहनत के बाद भी मुखबिर द्वारा बताया गया वह आदमी उन की नजर में नहीं आया.

हैडकांस्टेबल गंगाधर पिलवटे निराश होने लगे थे कि 2 फरवरी, 2016 की दोपहर को मुखबिर के इशारे पर उन्होंने क्रीम रंग की शर्ट और खाकी रंग की पैंट पहने एक आदमी को सायन धारावी की बस्ती की ओर जाते हुए पकड़ लिया. पूछने पर उस ने अपना नाम नसीम खान बताया. उस समय वह भोपाल से आ रहा था. पुलिस टीम ने कुछ लोगों की उपस्थिति में नसीम खान की तलाशी ली तो उस के बैग से ट्रेन की 2 टिकटों के अलावा मैरून रंग के 2 डिब्बे मिले, जिन में से एक डिब्बे में प्लास्टिक की एक थैली में चांदी के कुछ गहने थे तो दूसरे डिब्बे में सोने के 2 हार, कर्णफूल, एक अंगूठी, कान की बालियां, नाक की लौंग थी, जिन की कीमत करीब 3 लाख रुपए थी. पुलिस ने औपचारिक काररवाई कर के सारा सामान अपने कब्जे में ले लिया.

इस के बाद नसीम को क्राइम ब्रांच के औफिस लाया गया, जहां पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में उस से पूछताछ शुरू हुई. इस पूछताछ में उस ने बताया कि ये सारे गहने उस की पत्नी के हैं, जिन्हें बेच कर वह गांव में अपना एक दवाखाना खोलना चाहता है. लेकिन जब पुलिस ने पूछा कि वह इन गहनों को गांव में भी तो बेच सकता था, मुंबई आने की क्या जरूरत थी? पुलिस के इस सवाल का वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका.

इस के बाद पुलिस ने जब उस से इसी तरह के कई और सवाल किए तो घबरा कर उस ने सच्चाई उगल दी. उस ने कहा, ‘‘साहब, ये गहने जिस औरत के हैं, उस की मैं ने हत्या कर दी है.’’

‘‘कहां की है हत्या?’’

‘‘साहब, गांव में.’’

‘‘हत्या गांव में की है और गहने यहां बेचने चला आया?’’ अशोक जाधव ने हैरानी से पूछा.

‘‘साहब, वह औरत यहीं मुंबई में रहती थी. मैं भी यहीं रहता था.’’ नसीम ने कहा.

‘‘क्या नाम था उस का, मुंबई में वह कहां रहती थी?’’

‘‘उस का नाम सबीना कौसर था. मुंबई में वह कुर्ला वेस्ट में रहती थी.’’

‘‘चलो, अच्छा पूरी कहानी विस्तार से बताओ?’’ अशोक जाधव ने कहा.

इस के बाद नसीम खान ने सबीना से प्रेम, उस की हत्या और मुंबई आ कर गहने बेचने की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

38 वर्षीय नसीम खान उर्फ वैद्यराज मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला फतेहपुर की थानातहसील ललौली का रहने वाला था. उस के पिता सुलेमान खान मुंबई के सायन धारावी की बस्ती पुट्टागली में रहते थे. वह खटाऊ मिल्स का कबाड़ खरीद कर बाहर बेचते थे. उन की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी तो नहीं थी, लेकिन खराब भी नहीं थी. नसीम का एक भाई था शरीफ खान, जो पिता के साथ रह कर उन के व्यवसाय में हाथ बंटाता था.

नसीम खान की शादी हो चुकी थी. उस की 3 बेटियां और एक बेटा था. सुलेमान की गांव में खेती की कुछ जमीन थी, जिसे नसीम खान ही संभालता था. जब दोनों भाइयों में बंटवारा हुआ तो मुंबई की सारी प्रौपर्टी और कारोबार उस के छोटे भाई शरीफ खान को मिला तो गांव की सारी प्रौपर्टी नसीम खान के हिस्से में आई. नसीम खान ज्यादा पढ़ालिखा तो नहीं था, लेकिन दिमाग का काफी तेज था. वह गांव की जमीन पर खेती तो करवाता ही था, इस के अलावा आयुर्वेदिक दवाओं से इलाज भी करता था. अपनी दवाओं से वह गुप्तरोगों को पूरी तरह से ठीक करने का दावा करता था. इसीलिए गांव में वह वैद्यराज के नाम से मशहूर था.

उस के यहां सैक्स रोग, बवासीर, शुगर और लैंगिक कमजोरी के मरीज आते थे. इन मरीजों को उस की दवा से कितना फायदा होता था, यह तो नहीं मालूम, लेकिन नसीम खान को इन मरीजों से अच्छाखासा फायदा हो रहा था. गांव में तो नसीम खान का यह आयुर्वेदिक दवाखाना चल ही रहा था, खाली समय में वह मुंबई, दिल्ली, इंदौर, कोलकाता और भोपाल जैसे महानगरों के भी चक्कर लगा लेता था. कुछ दिनों में ही वह इन शहरों से अच्छी कमाई कर के लौट आता था. लेकिन इन शहरों में से वह सब से ठीक मुंबई को समझता था. इस की वजह यह थी कि यह महानगर उस का जानासमझा था. यहां उस का एक भाई भी रहता था, इसलिए वहां उसे किसी तरह की परेशानी नहीं होती थी. यहां उस के ग्राहकों की भी संख्या बहुत थी.

सबीना के पिता शब्बीर खान भी उसी गांव के रहने वाले थे, जिस गांव का नसीम था. शब्बीर खान के बड़े भाई गांव में ही रहते थे, इसलिए वह गांव आतेजाते रहते थे. यही वजह थी कि जब उन की बेटी सबीना शादी लायक हुई तो उन्होंने उस का निकाह गांव में ही अपने एक रिश्तेदार के बेटे से कर दिया था. लेकिन सबीना उस के साथ अधिक दिनों तक रह नहीं सकी. ससुराल वालों के अत्याचारों से तंग आ कर उस ने पति से तलाक ले लिया और मुंबई आ कर मातापिता के साथ रहने लगी. कुछ दिनों तक इसी तरह चलता रहा, लेकिन समय के साथ शब्बीर खान और उन की पत्नी जन्नतुनिशां को बेटी की चिंता सताने लगी.

आखिर जवान बेटी को वह कब तक घर में बैठाए रखते. फिर अभी उस की उम्र ही क्या थी. पूरी जिंदगी तो वे बैठे नहीं रहते, यही सोच कर उन्होंने कौशर खान के साथ उस का दूसरा निकाह कर दिया. लेकिन दुर्भाग्य ने यहां भी सबीना का साथ नहीं छोड़ा. बेटी जिया के पैदा होने के बाद कौसर खान का व्यवहार उस के प्रति बदल गया. वह सबीना से मायके से रुपए मांग कर लाने को कहता. मांबाप की आर्थिक स्थिति को देखते हुए सबीना पैसे मांग कर लाने से मना करती तो वह मारतापीटता. कईकई दिनों तक खानापानी न देता. परेशान और दुखी हो कर सबीना बेटी को ले कर मांबाप के घर आ गई और ससुराल जाने से साफ मना कर दिया. तब से वह मांबाप के साथ ही रह रही थी.

नसीम खान और शब्बीर खान एक ही गांव के रहने वाले थे, इसलिए कभीकभार जब नसीम खान उधर से गुरजता तो शब्बीर खान से मिलने उस के घर चला जाता था. पति का घर छोड़ कर आने के बाद सबीना मर्द सुख से वंचित थी, इसलिए घर आनेजाने में नसीम खान उसे भा गया. स्वस्थ, सुंदर, हट्टेकट्टे नसीम को देख कर सबीना की कोमल भावनाएं जाग उठीं. उस का मन नसीम की नजदीकी के लिए मचल उठा. इस के बाद नसीम खान जब भी शब्बीर के घर आता, सबीना की नजरें उसी पर जमी रहतीं.

शुरूशुरू में तो नसीम ने सबीना की ओर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब उस ने सबीना की नजरों के भाव को समझा तो उस के नजदीक जाने से खुद को रोक नहीं सका. सबीना भी सुंदर और आकर्षक थी. 2 शादियों और एक बच्चे की मां होने के बाद भी उस में किसी भी पुरुष को आकर्षित करने की क्षमता थी. नसीम खान को सबीना की उतनी जरूरत नहीं थी, जितनी सबीना को उस की थी. इस की वजह यह थी कि नसीम खान महीने, 2 महीने में गांव जाता रहता था, जहां उस की पत्नी रहती थी. जबकि सबीना जब से पति से अलग हुई थी, उसे पुरुष का साथ नहीं मिला था. शायद यही वजह थी कि नसीम खान के आते ही वह उस के आगेपीछे घूमने लगती थी.

सबीना की इस मूक चाहत के आगे आखिर नसीम खान का ईमान डिग गया. वह भी सबीना की नजदीकियां पाने के लिए बेचैन हो उठा. नतीजा यह निकला कि जल्दी ही दोनों करीब आ गए. एक बार मर्यादा टूटी तो सिलसिला बन गया. कुछ दिनों तक तो नसीम और सबीना के ये संबंध छिपो रहे, लेकिन कुछ दिनों बाद पहले आसपड़ोस वालों को, उस के बाद मातापिता को बेटी के इस संबंध की जानकारी हो गई. कोई कुछ कह न सके, इस के लिए सबीना ने मातापिता और पड़ोसियों को यह कह कर चुप करा दिया कि नसीम से वह अपने किसी गुप्त रोग का इलाज करा रही है.

नसीम खान के संपर्क में आने के बाद जहां सबीना का उदास चेहरा खिल उठा था, वहीं नसीम खान का खिला चेहरा उदास रहने लगा था. इस की वजह यह थी कि नसीम खान अब इस अनैतिक संबंध को ढोना नहीं चाहता था. क्योंकि उसे लगता था कि जिस दिन सबीना और उस के संबंधों की जानकारी गांव में रह रही उस की पत्नी और बच्चों को हुई, वह कहीं का नहीं रहेगा. इस से सबीना का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, लेकिन उस की गृहस्थी में जरूर आग लग सकती है.

इसी बात से डर कर वह सबीना से दूरी बनाने लगा. घरपरिवार और समाज के डर से नसीम खान ने खुद पर काफी हद तक नियंत्रण पा लिया, लेकिन सबीना उसे छोड़ने को तैयार नहीं थी. नसीम खान को आने में ज्यादा दिन होने लगता तो वह कहीं भी होता, सबीना उसे फोन करकर के परेशान कर देती. मजबूरन उसे सबीना से मिलने आना पड़ता. वह उसे समझाता भी, लेकिन उस के समझाने का सबीना पर कोई असर नहीं पड़ता. अब तो वह उस के साथ  रहने की जिद करने लगी थी. जबकि नसीम खान के लिए यह संभव नहीं था.

जब सबीना हाथ धो कर नसीम खान के पीछे पड़ गई तो मजबूरन वह उसे गांव ले जा कर उस से किसी भी तरह पीछा छुड़ाने के बारे में सोचने लगा, क्योंकि अब वह उस के गले की फांस बन गई थी. 14 जनवरी, 2016 को नसीम खान को गांव जाना था. जब इस बात की जानकारी सबीना को हुई तो वह भी उस के साथ जाने को तैयार हो गई. उस ने बेटी जिया को मां के पास छोड़ा और मसजिद जाने के बहाने घर से निकल कर नसीम खान के पास पहुंच गई. नसीम उसे जीप से नासिक रेलवे स्टेशन पर ले आया और वहां से कानपुर जाने वाली ट्रेन पकड़ कर कानपुर पहुंच गया. कानपुर से उस ने बस पकड़ी और रात 10 बजे ललौली स्थित अपने घर पहुंच गया.

सर्दी के दिन थे, इसलिए रात 10 बजे गांव में सन्नाटा पसरा था. इस स्थिति में नसीम खान सबीना को अपने घर ले जाने के बजाय उसे उस के चाचा के घर ले गया. वहां नसीम खान ने ही नहीं, उस के चाचाचाची ने भी सबीना को समझाया कि वह उस का पीछा छोड़ दे और मुंबई जा कर अपनी बेटी की देखभाल करे. लेकिन नसीम खान के प्यार में पागल सबीना ने किसी की कोई बात नहीं मानी. इस पर उस की अपने चाचाचाची से भी कहासुनी हो गई. कहासुनी में ही बात हाथापाई तक पहुंच गई तो सबीना का सिर दीवार से कुछ इस तरह टकराया कि वह बेहोश हो कर जमीन पर गिरी तो उसे होश नहीं आया.

इस से सभी घबरा गए. अब क्या किया जाए, इस बारे में सोचा जाने लगा. जब किसी की समझ में कुछ नहीं आया तो उन्होंने सबीना के प्रति एक क्रूर फैसला ले लिया. नसीम खान रसोई से छुरी उठा लाया और बेहोश पड़ी सबीना की गला काट कर हत्या कर दी. उस ने सिर को एक प्लास्टिक की थैली में भर कर उसे पत्थरों के साथ गांव के बाहर स्थित तालाब में फेंक दिया, जबकि धड़ को एक बोरी में भर कर दूसरे मोहल्ले में फेंक आया. उसे लगता था कि बिना सिर के कोई उस की पहचान नहीं कर सकेगा.

सबीना मुंबई से अपने साथ जो गहने, कपड़े ले गई थी, नसीम खान ने उन्हें अपने पास रख लिया. इस तरह सबीना से पीछा छुड़ा कर नसीम खान अपने घर चला गया.mसुबह जब वह सो कर उठा तो गांव में हड़कंप मचा था. गांव के चौकीदार ने धड़ मिलने की सूचना थाना पुलिस को दी तो इंसपेक्टर मनोज कुमार तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल की काररवाई कर के उन्होंने धड़ को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. चूंकि धड़ की शिनाख्त नहीं हो सकी थी, इसलिए मनोज कुमार की जांच आगे नहीं बढ़ रही थी. फिर भी वह मामले की जांच में लगे थे. मामले में पुलिस की सक्रियता देख कर नसीम खान ने गांव में रुकना उचित नहीं समझा और सबीना के गहने ले कर भोपाल चला गया.

भोपाल में एक सप्ताह रह कर वह गहने बेचने के लिए मुंबई चला गया. वह अपने मकसद में कामयाब हो पाता, उस के पहले ही क्राइमब्रांच यूनिट-4 के एक मुखबिर को उस के इरादे की भनक लग गई और उस ने उसे गिरफ्तार करा लिया. पूछताछ के बार जांच अधिकारी सुनील जाधव ने नसीम खान के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर फतेहपुर के थाना ललौली पुलिस को उस के पकड़े जाने की सूचना दे दी. थाना ललौली पुलिस उसे पूछताछ के लिए ट्रांजिट रिमांड पर अपने साथ फतेहपुर ले गई. कथा लिखे जाने तक वह ललौली पुलिस की हिरासत में था. आगे की जांच इंसपेक्टर मनोज कुमार कर रहे थे. Mumbai Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित