Emotional Story: मेरी ममता की आवाज

Emotional Story: लोगों ने बहुत कहा कि मुझे एक ही बेटी पैदा हुई है, लेकिन मैं मां थी, इसलिए मुझे पता था कि मुझे एक नहीं, 2 बेटियां पैदा हुई थीं. और मैं ने यह बात साबित भी कर दी, लेकिन इस में 9 साल लग गए.

शादी के 2 सालों बाद मैं ने जुड़वां बेटियों को जन्म दिया था, लेकिन डिलीवरी के बाद जब मैं वार्ड में पहुंची तो मुझे बताया गया कि मेरे एक ही बच्ची पैदा हुई थी. जब मैं लेबर रूम में थी, तब प्रसव पीड़ा के बीच मुझे इतना तो अहसास था कि मैं ने 2 बच्चे पैदा किए थे. वहां किसी ने कहा भी था कि जुड़वां लड़कियां हुई हैं. जब मैं ने 2 लड़कियां पैदा की थीं तो एक कहां चली गई? मैं ने सास से इस बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि एक ही लड़की पैदा हुई थी. मुझे सास पर ही शक हुआ, क्योंकि वह मुझ से पहले कई बार कह चुकी थीं कि मुझे लड़का ही चाहिए, इसलिए लड़का पैदा करना.

मुझे लगा कि सास ऐसे ही कह रही होंगी, इसलिए मैं तब कुछ नहीं बोली थी. लेकिन जब अस्पताल से बच्ची गायब हो गई तो मुझे उन की धमकी याद आ गई. लेकिन मैं वहां कर भी क्या सकती थी, इसलिए उस बच्ची के लिए बेजार रोतीबिलखती  रही, पर वहां मुझ पर किसी को तरस नहीं आया. सब यही कहते रहे कि मुझे एक लड़की ही पैदा हुई होगी, सास भला बच्ची क्यों गायब करेगी. मान लिया जाए कि उसे अगर पोते की चाहत थी तो वह एक ही क्यों, दोनों लड़कियों को गायब कर देती. लेकिन उन लोगों की बातें मेरे दिल को तसल्ली नहीं दे पा रही थीं. मुझे ताज्जुब इस बात पर हो रहा था कि एक अस्पताल के लेबर रूम से बच्ची को आखिर कैसे गायब कर दिया गया.

यह काम बिना नर्स की मिलीभगत के बिलकुल संभव नहीं था. लेकिन नर्स जसपाल के व्यवहार और सेवा भाव को देख कर उस पर अंगुली उठाना मेरे दिल को गवारा नहीं लग रहा था. बहरहाल, घर वाले मुझे आश्वस्त करते हुए अस्पताल से घर ले आए. मेरे न मानने से घर में क्लेश होने लगा. गनीमत यह थी कि ससुराल के अन्य लोगों की तरह पति अशोकजीत ने मेरा साथ नहीं छोड़ा. इस का नतीजा यह निकला कि उस क्लेश की वजह से मुझे और पति को पुश्तैनी घर छोड़ कर किराए के घर में जाने के लिए मजबूर होना पड़ा. किराए के मकान में शिफ्ट होने के बाद हमें बहुत आर्थिक परेशानियां हुईं, इस के बावजूद भी पति ने पुश्तैनी घर में जाने से मना कर दिया. मेरी बात पर सास ने उन्हें बड़े कड़वे बोल बोले थे.

उन्होंने कहा था, ‘‘डायन भी 7 घर छोड़ देती है, लेकिन तेरी बहू ने तो मुझ पर तोहमत लगाने में डायनों को भी पीछे छोड़ दिया. उस ने मुझ पर यह आरोप तो लगा दिया, लेकिन अब मैं हकीकत में ऐसा ही कर के दिखाऊंगी. जिस बच्ची पर यह इतरा रही है, उसे मैं ऐसे गायब कर दूंगी कि सारी जिंदगी उसे नहीं ढूंढ पाएगी. पता नहीं एक कैसे पैदा कर दी, बात करती है 2-2 की.’’

घर में सास ने जो क्लेश किया था, उसे याद कर के अशोकजीत सिहर उठते थे. मां के रौद्र रूप की वजह से ही उन्होंने उस घर से दूर रहने का फैसला किया था. मुझे तो यही चिंता खाए जा रही थी कि मेरी एक बेटी तो पहले ही छिन गई, कहीं दूसरी भी न छिन जाए. कुछ दिनों बाद मेरे पति अशोक को भी लगने लगा कि मुझे 2 बेटियां पैदा होने की शायद गलतफहमी पैदा हुई थी. पति ने जब भी मुझे समझाना चाहा, मैं जोरजोर से रोने लगती. तब मैं कहती, ‘‘मां हूं मैं. इस बात की खबर मुझे नहीं, किसी और को होगी कि मुझे एक नहीं 2 बच्चे पैदा हुए. मैं अब भी पूरे दावे के साथ कह रही हूं कि तुम्हारी मां ने ही मेरी एक बेटी को गायब किया है.’’

अशोक मेरे दर्द को समझता था, इसलिए वह अकसर समझाने की कोशिश करता. लेकिन मैं उस अनदेखी बेटी को भुला नहीं पा रही थी. पति को जब लगा कि मैं बेटी वाली बात पर नरवस हो जाती हूं तो उन्होंने इस मुद्दे पर बात करनी ही बंद कर दी. वह मुझे खुश रखने की पूरी कोशिश करते. लेकिन मैं न कभी खुश रह पाई और न अपनी अनदेखी बेटी भुला पाई. वक्त का पहिया घूमता रहा. देखतेदेखते मेरी बेटी 9 साल की हो गई. इस की जुड़वा बहन भी आज इतनी ही बड़ी होगी. उस की याद में आंसू बहाते हुए मैं अपनी इस बेटी में दूसरी बेटी का रूप देखने की कोशिश करती. उस समय मैं भावुक भी हो उठती थी. उस बेटी को मैं भले ही भुला नहीं पा रही थी, लेकिन उसे वापस पाने की उम्मीद छोड़ दी थी.

लेकिन एक दिन अजीब घटना घटी. बाजार में खरीदारी करते समय मुझे एक अनजान औरत मिली. मुझे देखते ही उस ने कहा, ‘‘अरे, तुम तो वही स्वीटी हो न, जिस ने सिविल अस्पताल में जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया था, जिस में से एक बच्ची को नर्स ने बेच दिया था?’’

‘‘हां,’’ मैं हैरान हो कर बोली, ‘‘मगर तुम कौन हो, मेरा नाम तुम कैसे जानती हो? और तुम जिस बच्ची को बेचने की बात कह रही हो, तुम्हें कैसे पता चली?’’

‘‘मेरी छोड़ो, तुम अपनी बताओ कि क्या तुम्हें तुम्हारी बेटी मिल गई थी?’’ उस ने पूछा, ‘‘तुम ने शोर तो बहुत मचाया था, इस से मुझे लगा था कि तुम्हें तुम्हारी बेटी मिल गई होगी?’’

‘‘मेरे शोर मचाने का कोई फायदा नहीं हुआ था. मेरी वहां किसी ने नहीं सुनी. लेकिन बहन एक बात बताओ, तुम्हें कैसे पता कि मेरी बेटी को नर्स ने बेचा था.’’ मैं ने उस महिला से बड़ी विनम्रता से पूछा.

‘‘नर्स जसपाल कौर को मैं ने बच्ची को किसी और के हाथों में सौंपते हुए अपनी आंखों से देखा था. उस ने जिस आदमी को बच्ची दी थी, उस ने नर्स को नोटों की गड्डी भी दी थी. जिन दिनों तुम अस्पताल में भरती थी, उन दिनों हमारी भी एक रिश्तेदार वहां भरती थी. मैं उसे देखने छोटी बहन के साथ रोजाना अस्पताल जाया करती थी. उसी आनेजाने से नर्स जसपाल कौर से हमारी जानपहचान हो गई थी.’’

उस महिला की बात से मुझे बल मिला. मैं ने उस से पूछा, ‘‘इस के आगे तुम ने वहां और क्या देखा था, मतलब जिसे मेरी बच्ची सौंपी थी, वह कौन था?’’

‘‘जिसे तुम्हारी बच्ची सौंपी थी उस शख्स को तो मैं नहीं जानती. लेकिन जिस समय नर्स उस आदमी को बच्ची सौंप रही थी, मेरी निगाहें उसी पर टिकी थीं. उसी दौरान नर्स ने मुझे देख लिया था. तुम्हारा शोर खत्म होने के बाद नर्स मेरे पास आई थी. उस ने मुझे धमकाते हुए कहा था कि चुपचाप तमाशा देखती रहो. ध्यान रखो, अगर मैं फंस गई तो यही कहूंगी कि बच्ची उठा कर मैं ने उसे दिया था. तब उस के साथसाथ मैं भी जेल जाऊंगी.’’

‘‘बहन, तुम से मेरी एक गुजारिश है, बस नर्स जसपाल कौर का पता बता दो, अपनी बेटी को तो मैं पाताल से भी ढूंढ लाऊंगी.’’ मैं ने उस महिला से कहा.

‘‘वह तो अब भी सिविल अस्पताल में ही है. मगर देखो, इस मामले में मेरा कहीं भी जिक्र नहीं आना चाहिए वरना मैं अपनी कही बातों से साफ मुकर जाऊंगी.’’ उस ने कहा.

‘‘तुम इस की चिंता मत करो. मैं किसी से तुम्हारे बारे में कुछ नहीं कहूंगी. मुझे अपनी बच्ची से मतलब है. पिछले 9 सालों से तड़प रही हूं मैं अपनी उस औलाद के लिए. उस नर्स ने मेरी बेटी को किस के हाथों बेचा है, बस इतना पता लग जाए.’’ मैं ने उसे भरोसा दिया.

बाजार से सामान ले कर मैं जल्दी से घर लौट आई. मैं ने नर्स जसपाल के पास सीधे जाना उचित नहीं समझा, क्योंकि उस ने उस समय बच्ची के बारे में कुछ नहीं बताया था तो अब 9 साल बाद क्यों बताती. अस्पताल के लोग उलटे मुझे ही बेवकूफ बनाते. इसलिए मैं सीधे थाने पहुंची. लेकिन थाना पुलिस ने मेरी बात को तवज्जो नहीं दी. उन्होंने कहा कि इतने पुराने मामले में वे बिना सबूत के कुछ नहीं कर सकते. निराश हो कर मैं घर लौट आई. इस बारे में मैं ने अशोक से बात की तो अगले दिन वह मुझे ले कर एसएसपी के यहां गए. हम ने अपनी पीड़ा उन से कही. उन्होंने हमारी बात ध्यान से सुनी. मेरा यह अजीबोगरीब मामला था.

क्योंकि एक मां 9 साल बाद अपनी उस बच्ची के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराना चाह रही थी, जिस की उस ने शक्ल तक नहीं देखी थी. एसएसपी साहब ने हमारे सामने ही कुछ पुलिस अफसरों को बुला कर इस बात पर चर्चा की. मीटिंग खत्म हो गई, लेकिन एसएसपी समझ नहीं पाए कि उन्हें इस मामले में क्या काररवाई करनी चाहिए. मैं ने जो शिकायत उन्हें दी थी. उस में नर्स जसपाल कौर के अलावा अपनी सास को भी नामजद करने की बात कही थी.

फिलहाल एसएसपी ने यह कह कर हमें वापस भेज दिया कि वह इस मामले पर गहराई से अध्ययन कर के ही कुछ कर पाएंगे. हमें लगा कि थाना पुलिस की तरह वह भी हमें टरका रहे हैं. अब इतने बड़े अफसर से हम कह भी क्या सकते थे. इसलिए भरे मन से घर लौट आए. उन के यहां जा कर अपनी बच्ची तक पहुंचने की जो थोड़ीबहुत आस मुझे हुई थी, उन की बातों से मुझ से वह भी दूर होती दिखाई देने लगी थी. लेकिन कुछ दिनों बाद एसएसपी ने हमें अपने औफिस में बुला कर एक बार फिर हमारी पूरी दास्तान गौर से सुनी. इस के बाद उन्होंने मेरी सास और नर्स जसपाल कौर को बुलवाया. उन्होंने उन दोनों से भी पूछताछ की. पूछताछ में दोनों ज्यादा देर तक झूठ नहीं बोल सकीं. आखिर उन्होंने कबूल कर लिया कि मुझे 2 बेटियां पैदा हुई थीं. उन में से एक को उन्होंने एक बेऔलाद आदमी को बेच दी थी.

अशोक को जब पता चला कि इस काम में उन की मां का भी हाथ था तो वह दंग रह गए. जब मैं उस समय सास पर बच्ची चोरी का आरोप लगा रही थी तब उन्होंने मुझ पर ही गलतफहमी होने का आरोप लगाया था. पूछताछ में मेरी बेटी को चोरी करने की उन्होंने जो कहानी बताई थी, इस प्रकार निकली. इंदरजीत सिंह को औलाद नहीं थी. वह नर्स जसपाल कौर को अच्छी तरह जानते थे. उस से वह कई बार मिल कर कह चुके थे कि किसी लावारिस बच्चे का मामला उस की जानकारी में आए तो वह उसे बता दे. वह उसे अपनी औलाद बना लेंगे. नर्स जसपाल ने उन से कहा था कि वह उन के लिए बच्चे का इंतजाम कर देगी, मगर इस के लिए मोटी रकम खर्च करनी होगी.

इंदरजीत कई फैक्ट्रियों के मालिक थे. उन के पास पैसों की कमी नहीं थी, इसलिए उन्होंने बच्चे के लिए मुंहमांगी रकम देने की हामी भर ली थी. बच्चा पैदा होने के लिए जब मुझे अस्पताल लाया गया तो मेरी सास एक ही रोना रोती रही थीं, ‘‘हाय रब्बा, देखना स्वीटी के कहीं लड़की न हो जाए, इसे तो बेटा ही होना चाहिए, तभी मेरा वंश चलेगा.’’

सास ने यही बात नर्स जसपाल कौर के सामने भी कही तो उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘क्यों बड़ी बी, लड़का न हो कर लड़की हो गई तो क्या करोगी?’’

‘‘अरी, शुभशुभ बोल. लड़की हो गई न तो उसे यहीं मार कर गाड़ दूंगी, अस्पताल की मिट्टी में.’’ मेरी सास ने नर्स जसपाल कौर से कहा.

मैं उस अस्पताल में चैकअप के लिए जाती रहती थी, इसलिए उस नर्स को पता था कि मेरे पेट में जुड़वां बच्चे हैं. तभी तो उस ने मेरी सास से सीधे कहा, ‘‘देख माई, तेरी बहू को होने हैं जुड़वां बच्चे. एक को ला कर मेरे हवाले कर देना, मुंहमांगी रकम दूंगी.’’

‘‘सुन मेरी बात. लड़कियां हुईं तो भले दोनों ले जाना, लड़के हुए तो नहीं ले जाने दूंगी एक को भी.’’

आखिर समय आने पर मैं ने जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया. मेरी सास वहीं थी. उस ने एक बच्ची उठा कर जसपाल के हवाले कर दी. यह काम उस ने इतनी होशियारी से किया कि किसी को कुछ पता नहीं चला. यह भी संभव था कि इस अपराध में अस्पताल के कुछ अन्य लोग पहले से मिले रहे हों. जसपाल के बुलाने पर इंदरजीत सिंह भी वहां पहुंचे हुए थे. उसे अच्छीखासी रकम दे कर वह बच्ची को अपने साथ ले गए. उन लोगों ने कुछ ऐसी व्यवस्था कर रखी थी कि मेरे शोर मचाने के बाद भी मेरी बात पर किसी ने विश्वास नहीं किया. फिर तो यह मामला कुछ ऐसा टला कि नर्स जसपाल और इस मामले से जुड़े अन्य लोग इस तरह भूल गए कि कभी यह मामला खुल भी सकता है.

लेकिन मैं ने हिम्मत नहीं हारी. और आखिर यह मामला खुल ही गया. पूरे 9 साल बाद केस खुलने पर पुलिस ने इंदरजीत के यहां दबिश दी. वह सचमुच बहुत बड़े आदमी थे. उन की बहुत बड़ी कोठी थी. मैं ने जब उन के यहां पल रही लड़की को देखा तो मेरा दिल खिल उठा. उस लड़की की शक्ल मेरी दूसरी बेटी से हूबहू मिल रही थी. लेकिन वह जिस शानोशौकत से उन के यहां रह रही थी, उस की मैं ने कल्पना भी नहीं की थी. इंदरजीत ने उस का दाखिला शहर के एक नामचीन स्कूल में करा रखा था. जमाने भर की सुखसुविधाएं उसे मुहैया थीं. हमें वह पहली बार देख रही थी, इसलिए पहचानने तक से उस ने मना कर दिया.

उस के लिए तो इंदरजीत सिंह और उन की पत्नी ही उस के असली मांबाप थे. जो सुविधाएं उसे वहां मिल रही थीं, हम उसे ताउम्र नहीं दे सकते थे. पुलिस टीम ने उन्हें एसएसपी के सामने पेश किया. पूरी बात सामने आने के बाद एसएसपी ने अशोक और मुझे विश्वास में ले कर समझाना शुरू किया कि हम लोग आगे जो भी निर्णय लें, ठंडे दिमाग से सोचसमझ कर पूरी गहराई से लें. खासकर इस बात का हम ध्यान रखें कि इंदरजीत सिंह के यहां पल रही बच्ची के भविष्य पर कोई आंच न आए. जब हम ने गहराई से सोचा तो हमारे दिमाग में बारबार यही बात आती रही कि हमारी दूसरी बेटी का भविष्य इंदरजीत के यहां ही सुरक्षित है. जो परवरिश इंदरजीत के यहां बच्ची को मिल रही है, वैसी उसे हमारे यहां कदापि नहीं मिल सकती.

इस के बाद मेरी ममता ने कुछ इस तरह उछाल मारा कि मामला दर्ज करवाने की बात मैं भूल गई. उसी समय मेरे दिमाग में आया कि अगर मेरी दूसरी बेटी इंदरजीत के यहां रहती है, तभी उस का भविष्य संवर सकता है. इस से हमारा संबंध भी बना रहेगा और दोनों बहनें साथसाथ रह सकती हैं. बेटी के भविष्य को देखते हुए मैं ने और अशोक ने इतनी बड़ी कुर्बानी देने का फैसला कर लिया. इस के बाद अपनी सोच से इंदरजीत सिंह को अवगत कराया. खुश होते हुए उन्होंने हमारे प्रस्ताव को स्वीकार लिया. इस के बाद इंदरजीत के साथ कचहरी जा कर बच्ची को विधिवत गोद दिए जाने की औपचारिकताएं पूरी करवाईं.

इस एवज में मेरे पति और मैं ने इंदरजीत से कोई तोहफा लेने से इनकार कर दिया. पैसा लेने का तो सवाल ही नहीं उठता था. लेकिन हां, इंदरजीत ने दोनों बच्चियों को बेहतरीन परवरिश का वादा किया और उन्होंने दोनों बच्चियों को एक बड़े स्कूल के हौस्टल में दाखिल करवा दिया. हर हफ्ते मैं पति के साथ दोनों बेटियों से मिलने जाती रही. दोनों ही पढ़ाई में होशियार थीं. यह क्रम कभी नहीं टूटा.

इसी तरह वक्त आगे बढ़ता गया. आज दोनों लड़कियां एमबीबीएस कर रही हैं. एमबीबीएस के बाद की उच्च शिक्षा के लिए उन का विदेश जाने का इरादा है. दोनों बेटियों की सफलता पर मैं और पति दोनों खुश हैं. हमें उम्मीद है कि वे आसमान की बुलंदियों को छुएंगी. मैं ने गलत किया या सही, मैं नहीं जानती. मगर किया वही, जो मेरी ममता ने मुझ से करवाना चाहा. Emotional Story

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Crime Story Hindi: लीना मारिया पौल – फिल्मों की ही नहीं, ठगी की भी नायिका

Crime Story Hindi: लीना मारिया पौल ने दक्षिण भारतीय ही नहीं बौलीवुड में भी अपनी पहचान बना ली थी. लेकिन बालाजी के प्यार में पड़ कर उस ने अपना बनाबनाया कैरियर तो बरबाद किया ही, अपराध की राह भी पकड़ ली.

29 मई की सुबह 8 बजे के आसपास मुंबई के उपनगर गोरेगांव के पौश इलाके तिलक रोड स्थित बहुमंजिली इमारत इंपीरियल हाइट्स के नीचे एकएक कर के पुलिस की कई गाडि़यां आ कर रुकीं तो देखने वालों को हैरानी के साथ उत्सुकता भी हुई. इमारत में अचानक ऐसा क्या हो गया कि इतनी सुबह पुलिस की इतनी गाडि़यां आ गईं. कौन क्या सोच रहा है, पुलिस को इस से क्या मतलब था? वे अपनी गाडि़यों से उतरे और लिफ्ट से इमारत की 32वीं मंजिल पर जा कर एक फ्लैट की डोरबेल बजाई. जैसे ही फ्लैट का दरवाजा खुला, उस में रहने वाली एक युवती और उस के साथी युवक को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. आखिर कौन थी वह युवती और युवक, पुलिस ने उन्हें हिरासत में क्यों लिया था? यह सब इमारत वालों को अगले दिन तब पता चला, जब उन के बारे में अखबारों में विस्तार से छपा.

पता चला कि युवती का नाम लीना मारिया पौल और उस के साथ पकड़े गए युवक का नाम बालाजी उर्फ शेखर रेड्डी उर्फ सुकेशचंद शेखर था. लीना ने दक्षिण भारत की कई फिल्मों में ही नहीं, 1-2 हिंदी फिल्मों में भी काम किया था. दोनों लिवइन रिलेशन में रह रहे थे. उन के ऊपर चेन्नई और मुंबई में करोड़ों रुपए की ठगी का आरोप था. दोनों को गिरफ्तार किया था मुंबई क्राइम ब्रांच के आर्थिक अपराध शाखा के सीनियर इंसपेक्टर दिनेश जोशी, शिवाजी फडतरे, इंसपेक्टर अशोक खेडकर, जगदीश कुलकर्णी, तनवीर शेख, सबइंसपेक्टर कदम ने. इन की मदद के लिए एक दरजन पुलिस कांस्टेबल भी थे.

दरअसल, इंसपेक्टर दिनेश जोशी और शिवाजी फडतरे को सूचना मिली थी कि बहुमंजिली इमारत इंपीरियल हाइट्स की 32वीं मंजिल के एक फ्लैट में रहने वाली फिल्म अभिनेत्री लीना मारिया पौल बालाजी की मदद से लगभग एक साल से कुछ रसूखदारों की मदद से जालसाजी का एक बड़ा रैकेट चला रही है. एक कंपनी बना कर उस के जरिए तरहतरह की लुभावनी स्कीमों में लोगों की मेहनत की कमाई को कम समय में डबल ट्रिपल और चौगुना करने का लालच दे कर उन्हें ठगी का शिकार बना रही है.

सूचना महत्त्वपूर्ण थी, इसलिए सीनियर इंसपेक्टर दिनेश जोशी और शिवाजी फडतरे ने तत्काल इस की सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों जौइंट पुलिस कमिश्नर धनंजय कमलाकर और एडिशनल पुलिस कमिश्नर धनंजय कुलकर्णी को दी. दोनों अधिकारियों ने पहले मामले का गहराई से अध्ययन किया, उस के बाद काररवाई करने के आदेश दिए. वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर ही दोनों पुलिस अधिकारियों ने टीम बना कर अभिनेत्री लीना मारिया पौल और बालाजी के फ्लैट पर छापा मार कर गिरफ्तार किया था. क्राइम ब्रांच के औफिस ला कर जब दोनों से पूछताछ की गई तो उन के द्वारा की जाने वाली ठगी की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी.

27 वर्षीया लीना मारिया पौल केरल के रहने वाले सी.एस. पौल की बेटी थी. वह दुबई स्थित मैस्को कंपनी में इंजीनियर थे, और परिवार को वहीं साथ रखते थे. इसलिए लीना वहीं पैदा ही नहीं, पलीबढ़ी भी. लीना ने बीडीएस (बैचलर औफ डैंटल सर्जरी) की पढ़ाई की. दांतों की डाक्टर बनने के बाद प्रैक्टिस करने या नौकरी करने के बजाय अचानक उस पर हीरोइन बनने का भूत सवार हो गया. दरअसल, लीना के मातापिता अकसर नातेरिश्तेदारों और घर वालों से मिलनेजुलने केरल आते रहते थे. मातापिता के साथ आनेजाने में लीना को भारत आनाजाना अच्छा लगने लगा. बाद में वह समझदार हो गई तो अकेली भी भारत आने लगी.

लीना खूबसूरत तो थी ही, उस की फिगर भी आकर्षक थी, इसलिए उस ने भारतीय फिल्मों में काम करने वाली हीरोइनों से अपनी तुलना की तो उसे लगा कि वह भी हीरोइन बन सकती है. पैसा और शोहरत के लालच में डाक्टरी का पेशा छोड़ कर वह हीरोइन बनने के सपने देखने लगी. लीना ने अपनी इच्छा पिता को बताई तो उन्हें हैरानी हुई. उन्होंने लीना को समझाया कि यह सब इतना आसान नहीं है. लेकिन लीना ने तो ठान लिया था, इसलिए वह जिद पर अड़ गई. आखिर पिता को ही झुकना पड़ा. मजबूरी में ही सही, उन्होंने अनुमति दे दी. लीना दुबई से चेन्नई पहुंच गई. क्योंकि उसे लगता था कि दक्षिण भारतीय फिल्मों में उसे आसानी से काम मिल जाएगा.

लीना को पता था कि सीधे फिल्मों में काम मिलना आसान नहीं है. इसलिए वह चेन्नई पहुंच कर मौडलिंग के लिए हाथपैर मारने लगी. इस के लिए उस ने अपना पोर्टफोलियो तैयार करा कर बड़ीबड़ी एजेंसियों से संपर्क किया. इस सब की बदौलत उसे कुछ विज्ञापन मिले तो उस की खूबसूरती और आकर्षक फिगर कुछ दक्षिण भारतीय फिल्म मेकरों के सामने आई. अंतत: उसे दक्षिण भारत की कुछ फिल्में मिल ही गईं और तो वह बड़े परदे पर आ गई. उस की कुछ फिल्में बौक्स औफिस पर सफल भी रहीं. इस तरह लीना दक्षिण भारतीय फिल्मों की हीरोइन बन गई. चूंकि वह दक्षिण भारतीय फिल्मों तक सीमित नहीं रहना चाहती थी, इसलिए हिंदी फिल्मों में काम पाने की कोशिश करती रही.

उस की कोशिश सफल रही और फिल्म निर्माता सुजित सरकार की नजर पड़ गई. उन्होंने लीना को अपनी हिंदी फिल्म ‘मद्रास कैफे’ में काम दे दिया. इस फिल्म में उसे लिट्टे के एक विद्रोही सदस्य की भूमिका करनी थी. फिल्म में हीरो थे जौन अब्राहम. कहते हैं, लीना की इस सफलता का राज था वे पार्टियां, जिन में वह अकसर जाया करती थीं. लीना फिल्मी पार्टियों की हौट गर्ल मानी जाती थी. शायद इसलिए जल्दी ही उस समय पुलिस की हिटलिस्ट में उस का नाम आ गया, जब वह चेन्नई और दिल्ली पुलिस के जौइंट औपरेशन में अपने बौयफ्रैंड बालाजी के साथ ठगी के आरोपों में पकड़ी गई.

बालाजी ने लीना को अपने प्यार के प्रभाव में कुछ इस तरह लिया था कि वह फिल्मों तक की डगर भूल कर उस के हर अच्छेबुरे कामों में उस का साथ देने लगी थी. उस ने लीना की जिंदगी ही नहीं, उद्देश्य तक बदल कर रख दिए थे. मूलरूप से बंगलुरु का रहने वाला बालाजी सुंदर और आकर्षक व्यक्तित्व का युवक था. वह लोगों को अपना परिचय बड़े ही रुतबेदार अंदाज में देता था. वह खुद को कभी कर्नाटक कैडर का आईएएस अधिकारी तो कभी करुणानिधि का पोता बताता था. वह कभी अपना नाम शेखर रेड्डी तो कभी सुकेश चंद्रशेखर या बालाजी बताता था.

बालाजी ने लीना को किसी फाइवस्टार पार्टी में देखा था. उस समय उस ने लीना से खुद को पूर्व मुख्यमंत्री करणानिधि का पोता और एक बड़ा बिल्डर बताया था. उस ने लीना की फिल्में देखी थीं. साथ ही वह उसे पसंद भी करता था. इसीलिए जब वह उस से मिला तो उसे लीना से प्यार हो गया था. वह किसी भी हालत में लीना को पाना चाहता था. आखिर उस ने अपनी झूठी बातों से लीना को अपने प्रेमजाल में फांस ही लिया. लीना को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए उस ने फिल्म निर्माता निर्देशक रामगोपाल वर्मा को अपना जिगरी दोस्त बताया था.

लीना ने बिना सोचेविचारे बालाजी की बातों पर विश्वास कर लिया. उसे लगा कि जिस रामगोपाल वर्मा की फिल्मों में काम करने के लिए लड़कियां लालायित रहती हैं, बालाजी उसे उन की फिल्मों में आसानी से काम दिला देगा. इस के बाद उस की किस्मत चमक जाएगी. इस मुलाकात के बाद लीना की बालाजी से अकसर मुलाकातें होने लगीं. इन मुलाकातों में लीना उस के बारे में कुछ नहीं जान पाई. शायद वह उस से भी बड़ा ऐक्टर था.

लीना और बालाजी की मुलाकातें बढ़ीं तो जल्दी ही उन में गहरी दोस्ती हो गई. इस बीच बालाजी ने लीना को रामगोपाल वर्मा के अलावा और भी कई बौलीवुड की हस्तियों से मिलवाने का लालच दिया. लीना बालाजी के रहनसहन और बातचीत से काफी प्रभावित थी. इसलिए उन की यह दोस्ती जल्दी ही प्यार में बदल गई. परिणामस्वरूप लीना ने अपना तनमन बालाजी को सौंप दिया. इस के बाद दोनों लिवइन रिलेशन में रहने लगे. बालाजी ने लीना को अपने प्यार के जाल में कुछ इस तरह फंसाया कि उस की यह सच्चाई जानने के बाद भी कि वह एक बड़ा जालसाज है, लीना उस से अलग नहीं हो पाई. सन 2013 में लीना और जौन अब्राहम द्वारा अभिनीत फिल्म ‘मद्रास कैफे’ रिलीज हुई.

फिल्म ठीक चली. लीना के अभिनय की काफी तारीफ हुई. अगर वह चाहती तो उसे फिल्मों में आगे भी अच्छी भूमिकाएं मिल सकती थीं. लेकिन बालाजी के साथ आने के बाद उस ने ऐसी कोई कोशिश ही नहीं की. उस ने खुद फिल्मों से नाता तोड़ लिया. क्योंकि जितनी मेहनत कर के लीना साल भर में कमाती थी, उतना पैसा तो बालाजी एक झटके में कमा लेता था. शायद इसी वजह से उस का फिल्मों से मोहभंग हो गया था. वह बालाजी के साथ उस के ठगी के कारोबार में उस की मदद करने लगी थी. लीना के साथ आने के बाद बालाजी का दिमाग कंप्यूटर की तरह चलने लगा था. लोगों पर अपना प्रभाव जमाने के लिए वह लीना को साथ रखता था.

लीना के साथ आने के बाद बालाजी ने बड़ीबड़ी हस्तियों को ठगी का शिकार बनाया. उन दिनों कोच्चि के रहने वाले कुछ बिजनैसमैनों ने अपने प्रोजैक्टों और शोरूम के बिजनैस प्रमोशन के लिए उस का उद्घाटन फिल्मी हस्तियों से करवाना शुरू किया. इन्हीं में एक नया नाम इमैनुवल सिल्क टैक्सटाइल कंपनी के मालिक बैजू साहब का भी था. बैजू साहब 2012 में चेन्नई में अपना एक शोरूम खोल रहे थे. वह अपने इस शोरूम का उद्घाटन किसी बड़ी फिल्मी हस्ती से कराना चाहते थे. इस बात की जानकारी बालाजी को हुई तो वह बैजू साहब से मिला, और उन्हें उन के शोरूम के उद्घाटन के लिए बड़ी अभिनेत्री कैटरीना कैफ का नाम सुझा कर 20 लाख रुपए का खर्च बताया.

बैजू साहब बालाजी से किसी फाइवस्टार पार्टी में मिल चुके थे. इसलिए बैजू ने सहज ही बालाजी पर विश्वास कर के 20 लाख रुपए दे दिए. इस के बाद कैटरीना कैफ को शोरूम के उद्घाटन के लिए लाने की बात कौन कहे, वह खुद ही गायब हो गया. कई दिनों तक बैजू साहब बालाजी को फोन करते रहे, लेकिन जब बालाजी का कुछ पता नहीं चला तो उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि वह बालाजी द्वारा ठग लिए गए हैं. इस के बाद उन्होंने थाना कलसमरी जा कर बालाजी के खिलाफ धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज करा दी. इस मामले की जांच सबइंसपेक्टर अब्दुल लतीफ को सौंपी गई.

एक ओर पुलिस बालाजी की तलाश कर रही थी, दूसरी ओर शातिरदिमाग बालाजी चेन्नई के अन्नानगर पश्चिम एक्सटेंशन में फ्यूचर टेक्निक प्राइवेट लिमिटेड नामक फरजी कंपनी खोल कर मोटा हाथ मारने की तैयारी में था. इस के लिए उस ने अपने एक परिचित एम बाला सुब्रमण्यम और उन की पत्नी चित्रा सुब्रमण्यम को कंपनी का मैनेजिंग डायरैक्टर बना कर कैनरा बैंक से 19 करोड़ रुपए का लोन ले लिया. पैसा हाथ में आते ही वह लीना के साथ भूमिगत हो गया.

जब यह धोखाधड़ी सामने आई तो बैंक अधिकारियों के होश उड़ गए. बैंक का डिप्टी जनरल मैनेजर टीएस नालाशिवन ने बालाजी के खिलाफ धारा 420, 406, 419, 170 और 34 के तहत थाने में शिकायत दर्ज कराई. मामला एक बड़ी ठगी और सरकारी पैसों का था, इसलिए पुलिस ने तत्काल काररवाई करते हुए कंपनी के बेकुसूर मैनेजिंग डायरैक्टर टी.एस. सुब्रमण्यम और उन की पत्नी चित्रा सुब्रमण्यम को गिरफ्तार कर लिया. जबकि असली ठग बालाजी पुलिस के हाथ नहीं लगा. पुलिस उसे तलाश रही थी. इस के बावजूद बालाजी चुप नहीं बैठा. उस ने चेन्नई स्थित स्काईलार्क टैक्सटाइल्स एंड आउटफिटर नामक कंपनी के मालिक चक्रवर्ती को अपने निशाने पर ले लिया. चक्रवर्ती राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के कर्मचारियों की वर्दियां तैयार कराने का ठेका लेते थे. इस के लिए वह अधिकारियों से साठगांठ रखते थे.

लीना और बालाजी ने चक्रवर्ती को कर्नाटक राज्य के मैडिकल तथा ट्रांसपोर्ट डिपार्टमैंट के कर्मचारियों की वर्दियां तैयार कराने का ठेका दिलाने के नाम पर 63 लाख रुपए ऐंठ लिए थे. चक्रवर्ती से उस ने खुद को तमिलनाडु अरबन डेवलपमैंट प्रोजेक्ट का डायरैक्टर जयकुमार और लीना को अपनी सेक्रैटरी बताया था. खुद के ठगे जाने का एहसास होने पर चक्रवर्ती ने अपना सिर पीट लिया. हाथ मलते हुए वह 6 मई, 2013 को थाने पहुंचे और शिकायत दर्ज करा दी. उन की यह शिकायत लीना और बालाजी के खिलाफ धारा 420, 406, 419, 120बी के तहत दर्ज हुई थी.

इस तरह जब बालाजी और लीना के खिलाफ एक के बाद एक कई शिकायतें दर्ज हुईं तो चेन्नई पुलिस और सेंट्रल क्राइम ब्रांच पुलिस लीना और बालाजी के पीछे हाथ धो कर पड़ गई. पुलिस का शिकंजा कसते देख दोनों चेन्नई छोड़ कर दिल्ली चले गए. दिल्ली में वे एक फार्महाउस किराए पर ले कर वीआईपी की तरह रहने लगे. लेकिन पुलिस की निगाहों से वे वहां भी नहीं बच सके और 27 मई, 2013 को एएटीएस द्वारा पकड़े गए.

एक साल तक जेल में रहने के बाद मार्च, 2014 में जब लीना और बालाजी जमानत पर बाहर आए तो वे मुंबई आ गए और यहां भी उन्होंने अपना पुराना जालसाजी का कारोबार शुरू कर दिया. लेकिन इस बार उन की सोच कुछ अलग तरह की थी. यहां उन्होंने महज एक साल में करीब एक हजार लोगों को अपनी ठगी का शिकार बना कर लगभग 10 करोड़ रुपए ठग लिए. लोगों को जाल में फंसाने के लिए बालाजी खुद को एक बड़ा बिजनैसमैन और बंगलुरु का सांसद बताता था.

रहने के लिए उस ने गोरेगांव के पौश इलाके में 3 हजार स्क्वायर फुट का एक आलीशान फ्लैट अपने ड्राइवर के नाम पर किराए पर लिया था, जिस की डिपौजिट 3 लाख रुपए और किराया 75 हजार रुपए था. आनेजाने के लिए महंगी लग्जरी विदेशी गाडि़यां थीं. इन्होंने अंधेरी के पौश इलाके लोखंडवाला के इनफिनिटी मौल में किंग ग्रुप औफ लायन ओके इंडिया नामक एक फरजी वित्तीय संस्था का औफिस खोला. लोगों को आकर्षित करने के लिए उन्होंने घर और औफिस में लाखों रुपए इंटीरियर में खर्च किया. संस्था का चेयरमैन उन्होंने सलमान रिजवी को बनाया. उन की मदद के लिए स्टाफ भी रखा गया. कंपनी में निवेश कराने के लिए मोटे कमीशन पर एजेंटों की नियुक्ति की गई.

निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बालाजी और लीना खुद महंगी विदेशी गाडि़यों से 2-3 घंटे के लिए किंग ग्रुप औफ लायन ओके इंडिया के औफिस आते थे. इस के साथसाथ इस वित्तीय संस्था का प्रचारप्रसार कुछ इस तरह किया गया कि निवेशकों को सहज उन पर और उन की संस्था पर विश्वास हो गया. संस्था निवेशकों से 60 से ले कर 2 सौ और 15 सौ प्रतिशत तक अकल्पनीय ब्याज देने का वादा करती थी. इस के अलावा कंपनी की ओर से निवेशकों को उन के निवेश के आधार पर उपहारस्वरूप महंगी घड़ी, नैनो कार, कीमती चश्मा और विदेश घूमने का पैकेज दिया जाता था. साथ ही किसीकिसी को उस के द्वारा किए गए निवेश का 20 प्रतिशत तुरंत वापस कर दिया जाता था.

इस तरह के महंगे उपहारों के प्रचार से आकर्षित हो कर निवेशक खुदबखुद उस की कंपनी की ओर खिंचे चले आते थे. किसी निवेशक को संस्था और उन पर शक न हो, इस के लिए वे बाकायदा निवेशकों को उन के रिटर्न की गारंटी और बैंकों की ओर से फिक्स डिपौजिट की रसीद देते थे. यह अलग बात थी कि उन के द्वारा दी गई फिक्स डिपौजिट की रसीदें कैश नहीं होती थीं. क्योंकि उस के कैश होने की तारीख आने पर लीना अपनी अदाओं से और बालाजी अपनी प्रतिभा से निवेशकों को लालच दे कर उन्हें अपनी अन्य किसी स्कीम में पैसा लगाने के लिए तैयार कर लेते थे.

लीना और बालाजी ने किंग ग्रुप औफ लायन ओके इंडिया कंपनी के तहत कई अन्य लुभावनी स्कीमें भी चला रखी थीं. मसलन सुपर नंबर-5, स्पेशल हार्वेस्ट वीक, सुपर हार्वेस्ट प्लस वन, न्यू ईयर बोनस, क्रिसमस बोनस, वन प्लस वन, वन प्लस टू, गणेश स्पैशल, दुर्गा पूजा पोंगल स्पैशल और दीपावली गोल्डन डायमंड. लीना से डा. बोहरा की मुलाकात उस के इलाज के दौरान हुई थी. जब लीना के इलाज के लिए डा. बोहरा उस के फ्लैट पर गए तो उस के फ्लैट का डेकोरेशन और रहनसहन देख कर हैरान रह गए.

डाक्टर होने के नाते वह तमाम बिजनैसमैनों और उद्योगपतियों के घर गए थे, लेकिन उन्होंने इस तरह ठाठबाट से रहते हुए किसी को नहीं देखा था. लीना को देख डा. बोहरा चलने लगे तो लीना ने उन की फीस से 3 गुना फीस दी थी. इस से वह लीना और बालाजी से काफी प्रभावित हुए. वह उन के बारे में सोचने लगे कि इन का ऐसा कौन सा बिजनैस है, जो ये इस तरह शानोशौकत से रहते हैं. काफी सोचनेविचारने के बाद भी बात उन की समझ में नहीं आई.

अगले दिन जब वह लीना को देखने उन के घर गए तो उन्होंने बालाजी से उन के कारोबार के बारे में पूछ ही लिया. इस के बाद लीना और बालाजी ने उन्हें अपने कारोबार के बारे में बताया तो सच्चाई जान कर उन का मुंह खुला का खुला रह गया. यही नहीं, लीना और बालाजी ने उन से यह भी कहा कि अगर वह भी चाहे तो उन की तरह ठाठ से रह सकते हैं. उन के पास एक ऐसी स्कीम है, जिस में मात्र एक साल में 5 लाख रुपए का 15 लाख और 3 साल में 50 लाख हो सकते हैं.

डा. बोहरा पढ़ेलिखे और समझदार थे. वह अच्छी तरह जानते थे कि देश के सभी वित्तीय संस्थान रिजर्व बैंक के नियमानुसार काम करते हैं और रिजर्व बैंक में कोई ऐसी स्कीम नहीं है, जो मात्र एक साल में रकम को दोगुना और 3 गुना कर दे. इस के बावजूद डा. बोहरा ने आंख मूंद कर अपने 70 लाख रुपए लीना और बालाजी की फरजी कंपनी किंग औफ लायन ओके इंडिया में निवेश कर दिए. इस की वजह यह थी कि उन्हें विश्वास था कि जिस कंपनी के निदेशक मंडल में ‘मद्रास कैफे’ जैसी सुपरहिट फिल्म की अभिनेत्री के अलावा मशहूर फिल्मी हस्ती गीतकार स्व. हसरत जयपुरी के घर के लोग शामिल हों, उस संस्था में रुपए डूबने का सवाल ही नहीं पैदा होता.

इस के अलावा कंपनी ने विश्वास जमाने के लिए बैंकों की गारंटी और फिक्स डिपौजिट की रसीदें दी थीं, जिन में सारी शर्तें लिखी थीं. डा. बोहरा लीना और बालाजी के रहनसहन तथा बातव्यवहार से कुछ इस तरह प्रभावित हुए थे कि उन्होंने यह बात अपने दोस्तों और क्लीनिक में आने वाले कई संपन्न मरीजों को भी बताई. उन के कहने पर ही भारीभरकम ब्याज के लालच में कई लोगों ने लीना और बालाजी की संस्था में रुपए लगा दिए. उन के एक दोस्त डा. शेख ने तो 50 लाख रुपए निवेश किए ही, उन के कई अन्य जानपहचान वालों ने भी लीना और बालाजी की इस फरजी कंपनी में रुपए लगा दिए.

लीना और बालाजी जिस तरह करोड़ों रुपए कमा रहे थे, उसी तरह खर्च भी कर रहे थे. उन का मकसद सिर्फ मौजमस्ती करना था. वे अपने लिए महंगीमहंगी चीजें खरीदते थे. जिस का पेमेंट वह कैश में करते थे. वे बड़ीबड़ी विदेशी गाडि़यों में फाइव स्टार होटलों में जाते और वहां पार्टियां करते और अपनी फरजी कंपनी और स्कीमों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करते. लीना और बालाजी जहां बड़े और संपन्न लोगों का ध्यान अपनी कंपनी की ओर खींच रहे थे वहीं दूसरी तरफ उन की कंपनी के कर्मचारी और एजेंट मोटे कमीशन के लालच में मध्यमवर्गीय और उच्च मध्यमवर्गीय लोगों को ज्यादा से ज्यादा ब्याज का लालच दे कर उन्हें लुटवा रहे थे.

ये वे लोग थे, जो अपना पेट काट कर अपनी परेशानियों को दूर करने के लिए एकएक पैसा जोड़ कर जमा कर रहे थे. ऐसे लोगों को कम समय में उन की रकम को दोगुना करने का लालच दिया जा रहा था. उन का सोचना था कि ब्याज मिलेगा तो उन की परेशानियां दूर हो जाएंगी. लेकिन इस का मौका ही नहीं आता था. जब उन के पैसे वापस करने का समय आता था तो उस पैसे का कुछ हिस्सा दे कर बाकी पैसे और अधिक ब्याज के लालच में किसी अन्य स्कीम में लगवा लिया जाता था. इस से वे खुश हो जाते थे और खुशहाल जिंदगी के सपने देखने लगते थे.

लीना और बालाजी ने इस मामले में अपने घर में काम करने वाली नौकरानी यशोदाबेन हरिजन को भी नहीं बख्शा. लीना ने उस के 50 हजार रुपए और कई महीने का वेतन रोक कर अपनी कंपनी की किसी स्कीम में लगवा दिए थे. चेन्नई से मुंबई आने के बाद लीना की मुलाकात सब से पहले फिल्म गीतकार स्व. हसरत जयपुरी के पोते आदिल अख्तर हुसैन जयपुरी से जुहू के एक जिम में हुई थी. आदिल ने लीना की फिल्म ‘मद्रास कैफे’ देखी थी, जिस से वह उस से काफी प्रभावित थे. आदिल भी फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों में थे इसलिए लीना से जल्दी ही उन की दोस्ती हो गई.

दोस्ती घनिष्ठता में बदली तो लीना और बालाजी ने उन्हें अपनी योजना के बारे में बताया. आदिल पौश इलाके मौडल टाउन सोसायटी, गुलमोहर रोड जेवीसीडी स्कीम जुहू विलेपार्ले पश्चिम स्थित गजल विला में अपने मातापिता के साथ रहते थे. उन्होंने लीना और बालाजी को अपने पिता अख्तर हुसैन से मिलवा कर उन की योजना के बारे में बताया तो उन्हें भी खुशी हुई. बिना सोचेविचारे वह आदिल और अपने एक रिश्तेदार नासिर हुसैन जयपुरी तथा एक परिचित सलमान रिजवी के साथ उन की योजना में शामिल हो गए.

चूंकि स्व. हसरत जयपुरी का परिवार हाई प्रोफाइल था, इसलिए उस का उठनाबैठना भी वैसे ही लोगों में था. उन की वजह से तमाम लोग लीना और बालाजी की इस फरजी कंपनी पर विश्वास ही नहीं किया, बल्कि जुड़ भी गए. सलमान रिजवी तो उन के कहने पर मैनेजिंग डायरैक्टर बन गए. इन की वजह से फिल्मों से जुड़े लोगों ने भी लीना और बालाजी की संस्था में रुपए निवेश किए. लीना मारिया पौल और बालाजी उर्फ शेखर रेड्डी उर्फ सुकेश चंद्रशेखर उर्फ जयकुमार न जाने कितने लोगों को शिकार बनाता, उस के पहले ही मुंबई की आर्थिक अपराध शाखा के अधिकारियों को उस के इस गोरखधंधे की सूचना मिल गई और दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया.

इस के बाद उन के फ्लैट और औफिस की तलाशी में उन के इस गोरखधंधे से जुड़े 4 सौ से अधिक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज और निवेशकों के ढेरों फार्म बरामद हुए. दिल्ली की ही तरह ही उन के पास 7 लग्जरी गाडि़यां, जिन में रोल्स रायस फैंटम, निसान जीटीआर, एस्टन मार्टिन, हमर, पजेरो, रेंज रोवर, मित्सुबिशी इवो, बीएमडब्लू 5300, लैंड क्रूजर जैसी गाडि़यां थीं. इन गाडि़यों को लीना पौल और बालाजी ने ओएलएक्स डौट कौम से खरीदा था. जिन का उन्होंने नगद भुगतान किया था.

इस के अलावा लीना पौल और बालाजी के फ्लैट से लगभग 1 करोड़ मूल्य की 117 विदेशी घडि़यां, 4 लाख 80 हजार रुपए के 12 महंगे मोबाइल फोन, लीना पौल के 78 हैंडबैग, 8 जैकेट, 37 सनग्लास, 43 ट्राउजर्स, 40 जोड़े जूते और नामीगिरामी कंपनियों के परफ्यूम, जिस की कीमत लाखों में थी, प्राप्त हुए हैं. इन लोगों ने बाथरूम में गोल्ड प्लेटेड नल लगवा रखे थे. बालाजी की अलमारी से 42 जींस, 200 टीशर्ट, 73 शर्ट और 80 जोड़े जूते मिले. उन की इन चीजों को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये लोग कितनी शानोशौकत से रहते थे.

विस्तृत पूछताछ के बाद फिल्म अभिनेत्री से ठग बनी लीना मारिया पौल और बालाजी उर्फ शेखर रेड्डी उर्फ सुकेशचंद्रशेखर उर्फ जयकुमार, अख्तर हुसैन जयपुरी, आदिल अख्तर जयपुरी, नासिर हुसैन जयपुरी, सलमान रिजवी के खिलाफ अपराध क्रमांक 33/15 पर भादंवि की धारा 420, 120बी, 3, 5, प्राइज चिटफंड सर्क्युलेशन बैंकिंग ऐक्ट 3 एमपीआईडी के तहत मुकदमा दर्ज कर सभी को अदालत में पेश किया गया, जहां से इन्हें जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक सभी अभियुक्त जेल में बंद थे. आगे की तफ्तीश क्राइम ब्रांच की आर्थिक अपराध शाखा के इंसपेक्टर अशोक खेडकर कर रहे थे. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Kahani: खुशियों के दुश्मन

Hindi Kahani: थानेदार ने तफ्तीश कर के रिपोर्ट पेश कर दी थी कि जमील की मौत हादसा है, लेकिन उस की मां का कहना था कि जमील की मौत हादसा नहीं, साजिश के तहत की गई हत्या है. जब इस मामले की जांच दूसरे थानेदार इंसपेक्टर अहमदयार खान ने की तो यह बात सच भी निकली.

दिल्ली की सीआईए (क्राइम ब्रांच) में तैनात एसपी पी.एल. थांपसन को हिंदुस्तानी सिपाही ही नहीं, अंगरेज अफसर भी बास्टर्ड कहा करते थे, क्योंकि वह बहुत सख्त अधिकारी था. थांपसन के चेहरे पर कभी मुसकराहट नहीं आती थी. अनुशासन के मामले में वह इतना सख्त था कि अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को कुछ नहीं समझता था. किसी मजबूरी की वजह से भी किसी से कोई गलती हो जाती थी तो उस की मजबूरी को समझते हुए भी वह उसे माफ नहीं करता था.

थांपसन हर समय काम में लगा रहता था और किसी दूसरे को भी खाली नहीं बैठने देता था. अपने स्टाफ से वह सप्ताह में एक बार जरूर कहता था कि लोगों की इज्जत और जानमाल की सुरक्षा की जिम्मेदारी तुम्हारी है. अगर कोई घटना हो जाए तो अपराधी को पकड़ने के लिए तब तक काम में लगे रहो, जब तक वह पकड़ा न जाए. वह अपने अफसरों को तांगे के घोड़ों की तरह काम में लगाए रखता था. मैं ने भी उस से सब से अच्छी बात जो सीखी थी, वह यह थी कि जो भी काम करो, लगातार और मेहनत से करो. निराशा को पास मत आने दो. जिस किसी पर जरा भी शक हो, उसे मत छोड़ो. तुम्हारी सारी सहानुभूति पीडि़त के साथ होनी चाहिए.

जिस अधिकारी को हम बास्टर्ड कहा करते थे, वह बहुत न्यायप्रिय और अपने काम को अपना नैतिक कर्तव्य समझता था. एक दिन मेरे साथी इंसपेक्टर टेनिसन ने मुझे बुला कर एक कागज पकड़ाते हुए कहा, ‘‘इसे पढ़ो.’’

वह एक महिला का प्रार्थना पत्र था, जिस का जवान बेटा जिस ईंटों के भट्ठे पर काम करता था, उसी में गिर कर जल कर मर गया था. इस बात को 2 महीने बीत चुके थे. थांपसन ने बताया था कि यह प्रार्थना पत्र उसे एक बड़े सम्मानित व्यक्ति ने दिया था. जिस औरत का पत्र था, वह संबंधित थाने में जाती रही थी. उसे शक था कि उस का बेटा खुद गिर कर नहीं मरा, बल्कि उसे गिरा कर मारा गया है. थाने का थानेदार उसे यह कह कर टालता रहा कि उस ने तफतीश कर ली है, उस का बेटा मारा नहीं गया था, बल्कि खुद गिर कर मरा था. जिस सम्मानित व्यक्ति ने यह कागज दिया था, वह हाईकोर्ट में एडवोकेट थे. वह अपने एक मित्र डीएसपी के साथ थांपसन से मिले थे. उस आदमी ने एसपी थांपसन को बताया था कि वह भट्ठे के मालिक को जानते हैं और उन्हें लड़के  की मौत पर शक है.

थांपसन ने इस मामले में उस इलाके के थानेदार से बात की थी, लेकिन वह थानेदार की बात से संतुष्ट नहीं थे. एसपी ने कहा कि तुम दोनों इस केस की तफ्तीश करो, अगर थानेदार ने जानबूझ कर कोई गलती की है या बिना तफतीश किए रिपोर्ट में उस की मौत संयोगवश लिख दी है तो उसे गिरफ्तार कर के मुझे रिपोर्ट करो. थांपसन के कहे अनुसार, मैं और टेनिसन उस इलाके के थाने गए, जिस इलाके में भट्ठा था. थानेदार सदाकत अली खान अंबाला का रहने वाला था. वह मौजमस्ती करने वाला अनुभवी आदमी था. उस का परिवार काफी असरदार था.

थाने पहुंच कर हम ने उसे अपने आने के बारे मे बताया तो उस ने कहा, ‘‘उस औरत ने तो मेरी नाक में दम कर रखा है. यह सच है कि उस का जवान बेटा मरा है, मैं ने उसे संतुष्ट करने की बहुत कोशिश की, लेकिन अब पता चला कि वह ऊपर पहुंच गई है. आप लोगों को उस ने बिना वजह कष्ट दिया.’’

‘‘मां तो कभी संतुष्ट नहीं होगी, लेकिन आप हमें संतुष्ट करने के लिए केस की फाइल दिखा दें.’’ मैं ने कहा तो वह फाइल ले आया.

फाइल के अनुसार, किसी व्यक्ति ने आ कर बताया था कि उस का एक नौकर पांव फिसलने से भट्ठे में गिर गया और जल कर मर गया. वह घटनास्थल पर पहुंचा और लाश देखी. वह इतनी बुरी तरह जल गई थी कि पहचानी नहीं जा सकती थी. उस ने मौके पर 3 लोगों से पूछताछ की, जिन्होंने बताया कि वह फिसलने से ही भट्ठे में गिर कर मरा था. थानेदार ने इस घटना को संयोगवश हुई घटना बता कर केस बंद कर दिया था.

‘‘खान साहब, आप ने जबानी तौर पर मालूमात कर के जो तफतीश की थी, वह भी हमें सुना दो.

उस ने बताया, ‘‘पहली बात तो यह पता चली कि मरने वाला जमील अहमद विधवा मां का बेटा था. उस ने 2, ढाई साल पहले मैट्रिक की परीक्षा पास की थी और उस के बाद भट्ठे के मालिक के यहां नौकर हो गया था. भट्ठे का मालिक बहुत बड़ा ठेकेदार था, जो सरकारी ठेके ले कर निर्माण कार्य कराता था.’’

मैं ने थानेदार से पूछा, ‘‘इस के अलावा और कुछ बताएंगे?’’

‘‘आप पूछिए, बताता हूं.’’ उस ने कहा तो टेनिसन ने पूछा, ‘‘मरने वाले को भट्ठे पर क्या काम दिया गया था?’’

थानेदार ने कहा, ‘‘मैं ने यह नहीं पूछा था कि उसे क्या काम दिया गया था, बस इतना पता चला था कि वह वहां नौकर था.’’

‘‘आप को जरा भी शक नहीं हुआ कि मरने वाले की वहां किसी से दुश्मनी रही हो और उसे भटठे में धक्का दे दिया गया हो?’’

‘‘मैं ने फाइल में तो नहीं लिखा, लेकिन मैं ने पता किया था. उस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी.’’

मैं ने नोट किया था कि यह कहते हुए थानेदार की जबान साथ नहीं दे रही थी. इस का मतलब वह झूठ बोल रहा था.

‘‘सदाकत भाई, हम तफतीश करने आए हैं, अगर कोई संदेह वाली बात हो तो हमें बता दो या यह कह दो कि आप ने तफ्तीश में उतनी रुचि नहीं ली, जितनी लेनी चाहिए थी. आप का यह कह देना काफी नहीं है कि वह मां है, इसलिए तंग कर रही है.’’

सदाकत अली बेचैन हो गया. उस के चेहरे के भावों से साफ लग रहा था कि उस से गलती हुई थी. अगर मेरे साथ अंगरेज अफसर नहीं होता तो शायद वह मुझ से बिना झिझके बात करता. अंगरेज अफसरों से हिंदुस्तानी अफसर डरते थे. इंसपेक्टर टेनिसन ने कहा कि वह हमें उस औरत के घर तक पहुंचा दे, क्योंकि पुरानी दिल्ली में किसी का मकान ढूंढना आसान नहीं था.

सदाकत अली ने हमें एक हेडकांस्टेबल के साथ उस औरत के घर भेज दिया. जाते वक्त टेनिसन ने कहा, ‘‘एक काम करना खान, ठेकेदार खलील से कहना कि वह थाने आ जाए. हम वापस थाने आएंगे.’’

उस औरत के घर पहुंच कर हम ने घर का दरवाजा खटखटाया. 5-6 मिनट बाद एक अधेड़ उम्र की औरत ने दरवाजा खोला. चेहरेमोहरे और पहनावे से वह मिडिल क्लास की अच्छीभली महिला लग रही थी. इस उम्र में भी वह काफी सुंदर थी. वह हमें घर के अंदर ले गई. औरत का नाम राशिदा था. उस के पति को मरे 4-5 साल हो गए थे. उस का भाई कुछ पैसे दे दिया करता था, जिस से घर का खर्च चलता था. उस का बेटा जमील दसवीं पास कर के भट्ठे पर नौकरी करने लगा था.

‘‘आप यह बताइए कि आप को कैसे शक हुआ कि आप का बेटा भट्ठे में खुद नहीं गिरा, बल्कि उसे धक्का दे कर आग में गिराया गया था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मेरा बेटा हर रात मेरे सपने में आता है और मुझ से कहता है कि मेरे हत्यारों को पकड़वाओ, मैं खुद नहीं गिरा.’’ उस ने भावुक हो कर कहा.

‘‘क्या वह यह नहीं बताता कि उसे किस ने धक्का दिया था?’’

‘‘नहीं, मैं पूछती हूं, तब भी नहीं बताता.’’ उस ने कहा, ‘‘लेकिन उस के इस तरह सपने में आने से मुझे पूरा यकीन है कि वह खुद नहीं गिरा.’’

यह एक मां के उदगार थे. उस की बात काटने के बजाय मैं ने और इंसपेक्टर टेनिसन ने कहा कि हम सच्चाई का पता लगाना चाहते हैं, जिस से कि हम हत्यारे को पकड़ सकें. मैं ने राशिदा से पूछा, ‘‘जमील भट्ठे पर कितने दिनों से काम कर रहा था, वह वहां क्या काम करता था?’’

‘‘मेरा बेटा वहां 3 सालों से काम कर रहा था, वह वहां नौकर नहीं, मुंशी था. ठेकेदार के घर भी जाता था और घरपरिवार की जरूरत की चीजें भी ला कर देता था. ठेकेदार की एक बेटी कालेज में पढ़ती थी, उसे लाने ले जाने के लिए एक तांगा लगा था. मेरा बेटा सुबह को उस लड़की को ले कर जाता था और शाम को वापस घर लाता था. ठेकेदार इस काम का उसे अलग से पैसे देता था. 5-6 दिनों से वह भट्ठे पर जा रहा था. उस ने बताया था कि भट्ठे का मुंशी छुट्टी गया है और उस के आने तक उसे ही वहां का हिसाबकिताब रखना पड़ेगा.’’

इंसपेक्टर टेनिसन ने पूछा, ‘‘ठेकेदार को आप के बेटे पर पूरा भरोसा था?’’

‘‘हां जी, भरोसा था तभी तो खलील अपनी बेटी को मेरे बेटे के साथ भेजता था. भरोसे की एक वजह यह भी थी कि ठेकेदार हमारा दूर का रिश्तेदार था. पहले उस का यही एक भट्ठा था. तब मकान कम बनते थे, इसलिए काम भी कम था. जब हिंदूमुसलमानों ने मकान बनाने शुरू किए तो उस के भट्ठे का काम बढ़ गया और खलील ठेकेदार भी बन गया.

‘‘आदमी होशियार और चालाक था, हर किसी को खुश करना जानता था. इसलिए जल्दी ही उस का कारोबार फैलता गया. 2 साल पहले उस ने नई दिल्ली में अपनी कोठी भी बना ली. मेरे पति के मरने के बाद उस ने हमारे ऊपर एक उपकार यह किया कि दसवीं पास करते ही मेरे बेटे को नौकरी पर रख लिया. जमील जल कर मर गया तो ठेकेदार ने मुझे 5 हजार रुपए भिजवाए, लेकिन मैं ने यह कह कर लेने से मना कर दिया कि मैं अपने बेटे की कीमत नहीं लूंगी.’’

‘‘आप को ठेकेदार पर तो शक नहीं है?’’ टेनिसन ने पूछा.

‘‘नहीं, उस पर शक नहीं है,’’ राशिदा ने कहा, ‘‘लेकिन उस से शिकायत जरूर है.’’

‘‘कैसी शिकायत?’’ मैं ने पूछा तो उस ने कुछ ऐसी बातें बताईं, जिन पर वह खुद भी मुतमईन नहीं थी.

‘‘अगर तुम्हें ठेकेदार पर शक है तो साफ बता दो और अग

नहीं है तो कह दो कि शक नहीं है.’’ मैं ने थोड़ी झुंझलाहट में कहा.

‘‘ठेकेदार पर शक का कोई कारण नहीं है,’’ राशिदा ने कहा, ‘‘इतने अमीर आदमी के साथ हमारी क्या दुश्मनी हो सकती है? उसे जमील पर भरोसा था, तभी वह अपनी जवान बेटी को उस के साथ भेजा करता था.’’

‘‘यह भी तो एक कारण हो सकता है कि उस की बेटी जवान थी और आप का बेटा भी. हो सकता है ठेकेदार ने उन दोनों को आपत्तिजनक हालत में देख लिया हो.’’

‘‘मैं यह नहीं मान सकती, मेरा बेटा इतना होशियार और चालाक नहीं था. अगर ऐसी बात होती तो ठेकेदार मुझ से शिकायत करता या उसे नौकरी से निकाल देता. उसे पता था कि हमारे लिए यही सजा बहुत है.’’

बातोंबातों में राशिदा ने हमें बताया था कि ठेकेदार ने पहले उसे 5 हजार रुपए देने चाहे थे, बाद में यह रकम बढ़ा कर 8 हजार कर दी थी. आजकल हजार रुपए कुछ नहीं हैं, लेकिन उस जमाने के एक हजार रुपए आज के एक लाख रुपए के बराबर होते थे. राशिदा ने यह रकम नहीं ली थी और थाने पहुंच गई थी.

2 महीने गुजर गए, जमील का चालीसवां होने के बाद ठेकेदार ने अपनी बेटी की शादी कर दी थी. राशिदा 3-4 बार थाने गई. उस ने हमें बताया कि थानेदार कभी तो उस से बड़े प्यार से बातें करता था, कभी उसे थाने से निकाल देता था. जिस एडवोकेट ने उस का प्रार्थना पत्र एसपी थांपसन के पास पहुंचाया था, वह उस के पति का दोस्त था. राशिदा से हमें कोई सबूत नहीं मिला. बस एक ही बात जो शक पैदा कर रही थी, वह यह थी कि जमील ठेकेदार की बेटी को स्कूल ले जाता और ले आता था. हमें यह पता करना था कि ठेकेदार की लड़की का चरित्र कैसा था.

मैं और टेनिसन लौट कर थाने पहुंचे तो खलील ठेकेदार थानेदार के पास बैठा था. उस की उमर 50-60 साल के लगभग थी. शक्ल और सूरत से वह सम्मानित व्यक्ति लगता था. मेरी राय में वह या तो बहुत सभ्य और सम्मानित आदमी था या फिर पक्का गुरुघंटाल था. मैं ने और टेनिसन ने तय कर लिया था कि उसे भट्ठे पर ले जा कर बात करेंगे, क्योंकि हमें भट्ठा भी देखना था. हम ने उस से कहा कि वह हमें अपने भट्ठे पर ले चले. उस का भट्ठा दिल्ली के बाहरी इलाके में था.

ठेकेदार खलील के भट्ठे पर पहुंच कर हम ने उस से वह जगह दिखाने को कहा, जहां से जमील आग में गिरा था. उस ने हमें वह जगह दिखाई. मैं ने और टेनिसन ने भट्ठे का किनारा ध्यान से देखा. वहां फिसलने लायक नहीं था. ठेकेदार ने हमें बताया कि जमील किनारे तक चला गया था.

‘‘उस समय वह अकेला था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं,’’ ठेकेदार ने जवाब दिया, ‘‘मजदूर बहुत होते हैं, उन पर एक मेट होता है, जो उन्हें संभालता है. उस समय वही उस के साथ था. उसी ने मुझे यह सब बताया था.’’

‘‘तब आप को जरा भी शक नहीं हुआ कि उसे किसी ने गिरा दिया होगा?’’ मैं ने पूछा.

‘‘आप का मतलब है कि उस की किसी से दुश्मनी रही होगी,’’ ठेकेदार ने कहा, ‘‘उस बेचारे की किसी से क्या दुश्मनी हो सकती थी. उसे तो भट्ठे पर आए 4 दिन हुए थे.’’

ठेकेदार का पूरा बयान हमें बाद में लेना था, अभी तो हम घटनास्थल देखने आए थे. हमें यह भी देखना था कि कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह था या नहीं? जिस मेट के साथ होने की बात ठेकेदार ने कही थी, वह वहीं था. मजदूर चले गए थे, चौकीदार आ गए थे. हम ने ठेकेदार से कहा कि वह रात को 9 बजे मेट को ले कर क्राइम ब्रांच औफिस आ जाए. हम दोनों रात 10 बजे हेडक्वार्टर पहुंचे. ठेकेदार मेट को लिए हमारे इंतजार में बैठा था. हम ने उसे 9 बजे का समय दिया था, लेकिन हम एक घंटा लेट आए थे. हम ने ठेकेदार को बुलाया. हमारे सवालों के जवाब में उस ने जमील के बारे में वही बातें बताईं, जो उस की मां बता चुकी थी.

‘‘साहब, मुझे इस लड़के के मरने का इतना दुख है कि आप अंदाजा नहीं लगा सकते. बेचारा अनाथ था, छोटे भाई और मां का एकलौता सहारा. मेरे पास इतना कुछ है कि मैं उस लड़के को नौकरी पर लगा कर सब से ज्यादा वेतन दिया करता था. बहुत सज्जन और भरोसे का लड़का था. उस के रहते मुझे किसी बात की चिंता नहीं थी. मेरी जवान बेटी को कालेज ले जाता था. मैं उस की मां का सामना नहीं कर सकता.’’

यह सब कहते हुए ऐसा लग रहा था, जैसे वह अभी रो पड़ेगा. मैं ने उस से पूछा, ‘‘तुम ने उस की मां को देने के लिए 5 हजार रुपए भेजे थे, लेकिन उस ने लेने से मना कर दिया. उस के बाद तुम ने 3 हजार और बढ़ा कर भेजे, लेकिन वह भी उस ने लेने से मना कर दिया. तब तुम ने उसे धमकी दी कि वह दूसरे बेटे को भी खो दोगी, यह धमकी तुम ने क्यों दी?’’

‘‘नहीं साहब, मैं ने उसे कोई धमकी नहीं दी. मैं ने तो कहा था कि उस का दूसरा बेटा मैट्रिक पास कर ले तो उसे मैं नौकरी दे दूंगा.’’ यह बातें कहने में वह घबरा रहा था, ‘‘असली बात यह है साहब कि वह मां है, उस का जवान बेटा मर गया है. उसे शक है कि उस के बेटे को किसी ने उठा कर आग में फेंक दिया है. ऐसी स्थिति में मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता. हो सकता है, मैं ने उसे थाने जाने से रोकने के लिए कोई सख्त बात कह दी हो और वह उसे धमकी समझ बैठी हो. मैं ने खुद ही पुलिस को बुलाया था. थानेदार साहब ने इस मामले की बहुत मेहनत से तफ्तीश की थी.’’

‘‘जमील तुम्हारे दूसरे काम करता था, फिर तुम ने उसे भट्ठे पर क्यों भेजा था?’’ इंसपेक्टर टेनिसन ने पूछा.

‘‘भट्ठे का मुंशी 7-8 दिनों के लिए छुट्टी पर चला गया था. जो नौकर थे, वे पैसों में गड़बड़ कर देते थे, जमील मेरे घर का मेंबर था, इसलिए उसे भेजा था.’’

‘‘तुम्हारा मुंशी इस के पहले कब छुट्टी पर गया था?’’ इंसपेक्टर टेनिसन ने पूछा.

अचानक पूछे गए इस सवाल से उस की जबान जरा हकला सी गई, ‘‘यह मैं पूछ कर बताऊंगा.’’

इस के बाद मैं ने और टेनिसन ने उस पर सवालों की बौछार कर दी, जिस से वह घबरा गया. घबराहट उस के चेहरे पर साफ नजर आ रही थी. अपने सवालों और उस के जवाबों से हम कई बातें समझ गए थे.

‘‘खलील साहब, मैं तुम्हें भाई की हैसियत से सलाह देता हूं कि अभी तुम्हारे पास समय है. अगर तुम हमें सच्ची बात बता देते हो तो तुम्हारे लिए आसानी रहेगी, क्योंकि हमें बाद में सच्चाई पता चली तो तुम्हारे लिए ठीक नहीं रहेगा. यह बात अच्छी तरह समझ लो कि इस केस की तफ्तीश सीआईए कर रही है. अभी तो तुम से बहुत आदर से बातें हो रही हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर हम दूसरे तरीके भी अपना सकते हैं.’’

‘‘आप को क्या शक है साहब?’’ उस ने पूछा.

‘‘शक नहीं, हमें पूरा यकीन है कि जमील को आग में फेंका गया है और तुम्हें इस की पूरी जानकारी है.’’

‘‘नहीं, मुझे कुछ नहीं मालूम. लेकिन जब आप कह रहे हैं कि उसे आग में फेंका गया है तो मैं इस बात का पता लगाऊंगा.’’ ठेकेदार ने कहा.

‘‘ठेकेदार साहब, हम तुम्हें कल शाम तक का समय देते हैं. अगर तुम्हारे दिल में कोई बात हो तो हमें बता दो.’’ कह कर ठेकेदार को घर भेज दिया.

ठेकेदार के जाने के बाद हम ने उस के मेट को बुलाया. वह 35-36 साल का छरहरे बदन का आदमी था. उस ने अपना नाम सिराज बताया. लेकिन सब उसे सागर के नाम से पुकारते थे. उस ने बताया कि वह पिछले 10 सालों से खलील के भट्ठे पर काम कर रहा था.

‘‘एक बात ध्यान में रख लो सागर, झूठ बोलोगे तो पिस जाओगे. यह धनी लोग अपना पाप गरीबों के खाते में डाल देते हैं. यहां भी मुझे ऐसा ही दिखाई दे रहा है. अच्छा यह बताओ कि जमील को ठेकेदार ने अन्य कामों से हटा कर भट्ठे पर क्यों लगाया था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मुंशी छुट्टी चला गया था, उस की जगह जमील आया था.’’ उस ने कहा.

‘‘मुंशी कब से काम कर रहा है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘हुजूर, कोई 6-7 साल से काम कर रहा है.’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘वह इस के पहले कब छुट्टी गया था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘जहां तक मुझे याद है 3 साल पहले गया था.’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘क्या उस समय भी ठेकेदार ने जमील को या किसी और को उस की जगह भट्ठे पर भेजा था?’’ मैं ने सवाल किया.

‘‘नहीं साहब.’’ उस ने कहा.

‘‘अच्छा यह बताओ, भट्ठे पर पैसे कौन खाता है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘कोई नहीं खा सकता, क्योंकि मेमो बनता है.’’ उस ने कहा.

‘‘झूठ बोल रहे हो. पैसे तुम मारते हो,’’ मैं ने उसे भड़काने के लिए कहा, ‘‘ठेकेदार ने जमील को भट्ठे पर इसीलिए भेजा था.’’

‘‘क्या यह बात ठेकेदार ने कही है?’’ उस ने चौंक कर पूछा.

‘‘यही नहीं, ठेकेदार ने तुम्हारी बहुत सी करतूत बताई हैं.’’ मेरे इतना कहते ही उस के चेहरे का रंग बदलने लगा.

मैं ने और टेनिसन ने उस दौरान भी उस से कई सवाल पूछे. वह उन के जवाब तो दे रहा था, लेकिन हम उस के जवाब के बजाय उस के चेहरे के उतारचढ़ाव को देख रहे थे. इस से हमें लगा कि उस के दिल में कोई बात है. मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए हम ने कुछ देर के लिए उसे दूसरे कमरे में भेज दिया और हम दोनों आपसी विचारविमर्श करने लगे. भट्ठे के मजदूरों पर जो मेट लगाए जाते हैं, उन में ज्यादातर अपराधी प्रवृत्ति के होते हैं. ठेकेदार खलील का यह मेट भी मुझे ऐसा ही लग रहा था. मैं ने और टेनिसन ने विचारविमर्श कर के तय किया कि इस मेट को भट्ठे पर न जाने दिया जाए, वरना इस के डर से कोई मजदूर सही बात नहीं बताएगा.

मेट सागर को हम ने दोबारा अपने कमरे में बुलाया और उस से पूछा कि जमील का चरित्र कैसा था? उस ने बताया कि उस का चरित्र ठीकठाक था. वह अपने काम से काम रखता था. उस ने यह भी बताया कि जमील ठेकेदार का दूर का रिश्तेदार था, इसलिए सब उस का सम्मान करते थे. मैं ने अपने शक की बिना पर उस से पूछा कि ठेकेदार की लड़की से जमील का क्या चक्कर चल रहा था?

‘‘मैं इस मामले में कुछ नहीं जानता सरकार. जमील उन के घर भी जाता था और उन की बेटी को कालेज भी ले जाता था और ले भी आता था.’’ उस ने कहा.

‘‘और लड़की के बारे में तुम्हारा क्या खयाल है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘लड़की परदे में रहती थी, कालेज भी बुरका पहन कर जाती थी. वैसे हुजूर, मैं आप को बता दूं कि ठेकेदार की सभी औरतें परदे में रहती हैं.’’ वह बोला.

‘‘जमील जब भट्ठे में गिरा था, उस समय तुम उस के साथ थे. तब तुम ने उसे आगे जाने से रोका क्यों नहीं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं ने उसे रोका था साहब, लेकिन उस का पांव ऐसा फिसला कि वह उस में गिर गया. मुझे लगा कि जैसे वह भट्ठे की आग देखने जा रहा है.’’ सागर ने बताया.

अगले दिन सुबह 8, साढ़े 8 बजे हम भट्ठे पर गए. ठेकेदार को हम ने नहीं बताया था कि हम वहां जाएंगे. वहां वही मुंशी मिल गया, जिस की जगह पर जमील को लगाया गया था. हम ने उस की बातचीत से महसूस किया कि मुंशी सागर से डरासहमा रहता था.

‘‘तुम पिछली बार छुट्टी पर कब गए थे?’’ मैं ने पूछा.

‘‘कोई 3 साल हो गए होंगे.’’ वह बोला.

‘‘इन 3 सालों में तुम्हें छुट्टी नहीं मिली या तुम खुद नहीं गए?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं कहीं दूर का आदमी नहीं हूं साहब,’’ उस ने हाथ के इशारे से कहा, ‘‘वह जो गली दिखाई दे रही है, उसी में रहता हूं.’’

‘‘अब शायद कोई लंबा काम आ पड़ा था, इसीलिए छुट्टी पर चले गए थे?’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं साहब, मुझे कोई काम नहीं था. वह तो एक दिन सागर ने मुझ से कहा कि तुम्हारे छुट्टी न लेने से ठेकेदार तुम्हें मैडल तो देगा नहीं. इसलिए छुट्टी लो और घूमोफिरो, मौजमस्ती करो. इस के बाद उस ने ठेकेदार से मुझे 8 दिनों की छुट्टी दिलवा दी थी.’’

जब मैं छुट्टी से लौटा तो पता चला कि जमील भट्ठे की आग में गिर कर मर गया. उस की मौत के बारे में जान कर मुझे बहुत दुख हुआ. मुंशी की बातों से साफ लग रहा था कि मुंशी को छुट्टी भिजवाना जमील की हत्या के षडयंत्र की एक कड़ी थी. अब हमें यह पता करना था कि यह साजिश अकेले सागर की थी या उस में ठेकेदार खलील भी शामिल था.

‘‘तुम बड़े काम के आदमी हो. ठेकेदार का यह भट्ठा तुम्हीं चला रहे हो. सागर तो कुछ काम करता नहीं, वह तो सिर्फ गुंडागर्दी करता रहता है.’’ उस की पीठ थपथपाते हुए मैं ने उस के अंदर खूब हवा भरी, जिस से वह कुछ और उगल दे. इंसपेक्टर टेनिसन ने भी उस की प्रशंसा के बड़ेबड़े पुल बांधे.

‘‘एक बात बताओ इदरीस,’’ मैं ने मुंशी से कहा, ‘‘जमील को मरे 2 महीने से ज्यादा हो गए हैं, जब तुम छुट्टी से लौट कर आए तो तुम ने मजदूरों से पूछा होगा कि जमील आग में कैसे गिरा? इस के बाद तुम ने सागर से पूछा होगा?’’

‘‘सब को हैरानी इस बात पर थी कि वह आग में गिरा कैसे? इतनी तेज आग के पास तो कोई जाता तक नहीं.’’ मुंशी ने जवाब दिया.

मैं ने कहा, ‘‘इदरीस कहीं ऐसा तो नहीं कि जमील का यहां किसी लड़की से चक्कर चल रहा हो और उस लड़की को सागर भी चाहता हो?’’ मैं ने पूछा.

‘‘साहब, इस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है और सही बात यह है कि सागर के विरुद्ध यहां कोई जबान नहीं खोल सकता. मैं भी उस से डरता हूं,’’ मुंशी ने कहा.

‘‘कहां है सागर?’’ इंसपेक्टर टेनिशन ने पूछा.

‘‘वह अभी आ जाएगा, वह साढ़े 10 बजे तक आता है.’’ मुंशी ने बताया.

‘‘वह अब नहीं आएगा, वह हवालात में बंद है.’’ टेनिसन ने कहा.

मुंशी हैरान हो कर देखने लगा.

‘‘हैरान न हो इदरीस,’’ मैं ने कहा, ‘‘सागर को हम ने गिरफ्तार कर लिया है.’’

हमारे साथ एक हेडकांस्टेबल और एक कांस्टेबल भी था. हम ने उन से कहा कि वे सागर को हथकड़ी लगा कर यहां ले आएं. मुंशी को जब पक्का यकीन हो गया कि उन का मेट गिरफ्तार हो गया है तो उस ने कहा, ‘‘साहब, अब मेरी समझ में आ गया कि सागर छुट्टी जाने के लिए मेरे पीछे क्यों पड़ा था. सच बात तो यह है कि यहां का हर मजदूर सागर से डरता है. यह आदमी मनमानी करता है.’’

पूछने पर मुंशी ने दिल्ली स्थित उस के घर का पता भी बता दिया था. इस के बाद मुंशी ने वहां काम करने वाले 5 मजदूरों को भी बुला लिया. हम ने उन सभी के बयान लिए. उन से पता चला कि सागर ही एक योजना के तहत जमील को भट्टे पर उस जगह ले गया था, जहां आग जल रही थी और उस ने उसे उस आग में धकेल दिया था. हम मजदूरों से पूछताछ कर रहे थे कि ठेकेदार आ गया. मैं ने उसे वहां से हटा दिया. ठेकेदार वहां से चला गया तो हम मजदूरों से और पूछताछ करने लगे. कुछ देर में पुलिस कांस्टेबल सागर को हथकड़ी लगाए ले आए. मैं ने देखा, मजदूर काम छोड़ कर हैरानी से सागर को हथकड़ी में बंधा देख रहे थे. उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि इतना दबंग आदमी भी गिरफ्तार हो सकता है.

इस के बाद हम ने मजदूरों से सागर के बारे में पूछा तो उन्होंने उस के गंदे कामों से परदा उठाना शुरू कर दिया. वह सभी मजदूरों से 5 रुपए हर महीने कमीशन लेता था. उन की लड़कियों को अपनी नौकरानी समझता था. हमें जो कुछ पता करना था, कर लिया था. फिर उसे हेडक्वार्टर ले आए. सागर पुरानी दिल्ली का रहने वाला था. मैं ने उस इलाके के थानेदार को उस का नामपता बता कर उस के बारे में और जानकारी जुटाने को कहा, साथ ही यह भी कहा कि अगर उस का कोई जानकार हो तो उसे भी साथ ले आएं.

थानेदार ने मुझे फोन पर ही बता दिया कि यह आदमी थाने के रिकौर्ड में है और एक बार इसे सजा भी हो चुकी है. सागर के आपराधिक रिकौर्ड की पूरी रिपोर्ट उन्होंने एक कांस्टेबल द्वारा मेरे पास भिजवा दी. उस सिपाही की सागर से दोस्ती थी. उस ने सागर की पूरी कहानी हमें सुना दी. उस ने जीबी रोड की एक वेश्या का नाम भी बताया, जिस के पास सागर अकसर जाता रहता था. मैं ने उस कांस्टेबल से उस वेश्या का पता ले लिया.

अगले दिन मैं हेडक्वार्टर गया तो टेनिसन को थानेदार द्वारा सागर के बारे में दी गई रिपोर्ट दिखाई और कांस्टेबल ने जो बातें जुबानी बताई थीं, वह भी बता दीं. टेनिसन ने उस वेश्या को बुलाने के लिए एक एएसआई को भेजा. यहां मैं आप को अपराधियों की मानसिकता के बारे में बता दूं कि इस तरह के लोग मन बहलाने के लिए वेश्याओं के पास जा कर शराब पीते हैं और लूटे हुए माल से ऐश करते हैं. छोटीमोटी घटनाएं ऐसे लोगों की आदत में शामिल होती हैं, लेकिन हत्या ऐसी घटना होती है, जिसे कोई भी हजम नहीं कर सकता. आम तौर पर देखा गया है कि पेशेवर हत्यारे भी हत्या कर के अपनी प्रिय वेश्या के पास जा कर शराब के नशे में बड़े घमंड से वेश्या को बता देते हैं कि वे हत्या कर के आए हैं.

हम ने उस वैश्या को इसी आशय से बुलाया था कि उस से हत्या का कोई सुराग जरूर मिल जाएगा. लगभग एक घंटे बाद वह वेश्या आ गई. 35 की उमर रही होगी उस की. बहुत सुंदर थी वह. हम ने उसे बिठाया. उस के चेहरे पर घबराहट और डर था. हम ने उसे सामान्य करने के लिए इधरउधर की बातें कीं. वह एक वेश्या थी, जिस का सोसाइटी में न कोई स्थान था और न आदरसम्मान. मेरे इज्जत देने पर वह गुब्बारे की तरह फूलती चली गई. कुछ देर बाद बोली कि उसे यहां क्यों बुलवाया गया है?

‘‘तुम्हारा यार सागर फांसी चढ़ रहा है.’’ मैं ने कहा, ‘‘उस रात सागर तुम्हारे पास गया था, तब उस ने तुम्हें पूरी घटना बता दी थी. यह बात वह कुबूल कर चुका है. तुम्हें केवल पुष्टि के लिए बुलाया है.’’

‘‘हां.’’ उस ने एक ठंडी सांस ले कर कहा, ‘‘उस रात वह बहुत अधिक पी कर आया था. उल्टीसीधी बकबक कर रहा था. उस ने कहा था कि आज बहुत पैसे कमाए हैं. एक लड़के को जिंदा जला कर भस्म कर दिया है. मैं समझी कि डींगे मार रहा है.’’

‘‘नहीं, डींगें नहीं, वह सच कह रहा था. तुम्हें उस ने कितनी रकम बताई थी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘5 हजार रुपए बता रहा था, लेकिन मैं ने विश्वास नहीं किया कि इतनी रकम कौन देगा.’’

इस के बाद सागर को हवालता से निकलवा कर उस के कारनामों का पुलिंदा रख दिया, साथ ही वेश्या की बात भी उसे बता दी. इस के बाद उस से अपराध कबूलवाने के लिए कहा, ‘‘सागर, तुम ने किस आदमी पर भरोसा किया. उस ठेकेदार पर, जिस ने बयान में कहा है कि तुम ने जमील को धक्का दिया था. ठेकेदार ने हमें गवाह भी उपलब्ध करा दिए हैं. जिस वेश्या पर तुम ने भरोसा किया था, अभीअभी बयान दे कर गई है. इसलिए गनीमत इसी में है कि तुम अपना जुर्म स्वीकार कर लो, वरना तुम्हारी जुबान खुलवाने के लिए हमें दूसरा तरीका अपनाना पड़ेगा.’’

यह सुनते ही उस ने ठेकेदार को गालियां देते हुए कहा कि उसी के कहने पर ही उस ने इतना बड़ा अपराध किया था और वही मेरे खिलाफ बयान दे गया. इस के बाद उस ने पूरी कहानी बयां कर दी. सिराज उर्फ सागर ठेकेदार का बौडीगार्ड था, साथ ही भट्ठे पर काम करने वाले मजदूरों को भी कंट्रोल करता था. किसी व्यक्ति को डरानेधमकाने या रुकी हुई रकम निकलवाने के लिए ठेकेदार उसी को इस्तेमाल करता था. एक दिन ठेकेदार ने सागर से कहा कि जमील को जमींदोज करना है. सागर ने कारण पूछा तो उस ने कहा कि उस की बेटी को जमील ने प्रेमजाल में फांस लिया है. उन का यह चक्कर बचपन से चल रहा है. लेकिन वह उसे स्कूल ले आने और ले जाने लगा तो उसे मिलने का मौका मिल गया.

शाइस्ता के लिए एक बहुत अच्छा रिश्ता आया था. लड़का शिक्षित और धनी व्यापारी का बेटा था. ठेकेदार ने रिश्ते के लिए हां कर दी. लेकिन शाइस्ता ने मां से साफ कह दिया कि वह जमील के अलावा किसी और से शादी नहीं करेगी. अगर उस के साथ जबरदस्ती की गई तो वह निकाह के समय मना कर देगी. उसे मांबाप और बहनों ने बहुत समझाया, लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रही. ठेकेदार ने उस की पढ़ाई छुड़वा कर शादी की तैयारियां शुरू कर दीं. शाइस्ता ने अपनेआप को एक कमरे में बंद कर लिया. उस ने धमकी दी कि वह दरवाजा तभी खोलेगी, जब जमील आ कर कहेगा. उस ने खानापीना तक छोड़ दिया.

बेटी की हालत देख कर ठेकेदार ने जमील को बुलाया. अब ठेकेदार को जमील दुश्मन दिख रहा था. उस ने सागर से कहा कि जमील को इस तरह से मारा जाए कि उस की बेटी को पता न चले कि उस की हत्या हुई है. सागर ने उसे 2-3 तरीके बताए, लेकिन ठेकेदार ने यह कह कर मना कर दिया कि इस से हत्या और अपहरण का शक होगा. तब ठेकेदार ने ही बताया कि जमील को भट्ठे की आग में डाल दिया जाए. यह तरीका सागर को भी आसान लगा. ठेकेदार ने उसे भरोसा दिया कि काम हो जाने पर वह उसे 5 हजार रुपए देगा.

सागर और ठेकेदार ने जमील को भट्ठे की आग में जलाने की योजना बनाई. इस के बाद योजना के अनुसार सागर ने मुंशी इदरीस को छुट्टी पर भेज कर उस की जगह जमील को काम पर लगवा दिया. 2-3 दिनों में सागर ने जमील से दोस्ती कर ली और एक दिन जमील के पास आ कर बोला, ‘‘आओ, मैं तुम्हें दिखाऊं कि भट्ठे में कच्ची ईंटें कैसे रखी जाती हैं और आग कैसे जलाई जाती है.’’

जमील सागर की बातों में आ कर उस के साथ भट्ठे पर चला गया. सागर ने मजदूरों को दूर भेज दिया. जमील को भट्ठे के किनारेकिनारे ले जाते हुए सागर उसे वहां ले आया, जहां तेज आग जल रही थी. जमील आग की गरमी से दूर हटने लगा तो सागर ने जमील को कूल्हे से इतनी जोर से धक्का मारा कि जमील आग में जा गिरा. जिस जगह वह गिरा था, वह जगह 10 फुट गहरी थी. जमील की केवल एक चीख सुनाई दी.

सागर ने शोर मचाया तो मजदूर इकट्ठा हो गए. तब तक जमील जल कर कोयला हो चुका था. आग में पानी फेंका गया. आग तो बुझ गई, लेकिन यह पता नहीं चल सका कि उस में आदमी जला है या पेड़ की टहनी. ठेकेदार को सूचना दी गई, वह आया और उस ने थाने को सूचना दी. इलाके का थानेदार सदाकत अली भट्ठे पर आया और थोड़ीबहुत पूछताछ कर के चला गया. मैं ने सागर से पूछा, ‘‘थानेदार ने तफतीश तो की होगी?’’

‘‘अजी उस ने कोई तफतीश नहीं की, 5 सौ रुपए ले कर लिख दिया कि मौके का निरीक्षण करने पर पता चला कि मौत दुर्घटना के कारण हुई थी. हम तो खुश थे कि मामला खतम हो गया. लेकिन जमील की मां की आहें रंग लाईं और असलियत सामने आ गई.’’

सागर के इस खुलासे के बाद ठेकेदार को गिरफ्तार कर लिया गया. जब उसे पता चला कि सागर ने सारा खुलासा कर दिया है तो उस के सामने भी अपना अपराध स्वीकार करने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं था. पूरा मामला खुल चुका था. दोनों अभियुक्त भी गिरफ्तार किए जा चुके थे. इस में सदाकत अली की भूमिका संदिग्ध दिखी. इंसपेक्टर टेनिसन ने एसपी थांपसन के सामने दोनों अभियुक्तों को पेश किया. उन्होंने भी उस से पूछताछ की. जांच के बाद एसपी ने थानेदार सदाकत अली को निलंबित कर दिया. यह हत्या शाइस्ता की वजह से हुई थी, इसलिए उस का बयान भी जरूरी था. हम ने उसे भी थाने बुलवा लिया.

लेकिन उस की जगह उस का पति आया. मैं ने कहा, ‘‘आप शाइस्ता को हमारे पास भेजें. आप निश्चिंत रहें, हम उस से दोएक बातें पूछ कर उसे आप के साथ भेज देंगे.’’

दरअसल, शाइस्ता को आप के पास भेजने से पहले मैं आप को एक जरूरी बात बताना चाहता हूं. आप मेरी बात सुन लें, फिर शाइस्ता से जो चाहें, पूछ लें.’’

मैं ने इंसपेक्टर टेनिसन की ओर देखा. उन्होंने सिर हिलाया. इस के बाद उस ने कहा, ‘‘मैं आप को ऐसी बात बताने जा रहा हूं, जिसे सुन कर आप हैरान रह जाएंगे. शाइस्ता से शादी के बाद मैं बहुत खुश था. लेकिन शादी की पहली रात उस ने मुझ से कहा, ‘आप ने न मेरा अपहरण किया है और न ही आप के मातापिता ने मेरे साथ कोई ज्यादती की है. इस में आप का कोई दोष नहीं है, इसलिए आप को यह बताना जरूरी है कि मैं ने आप को दिल से कबूल नहीं किया है. लेकिन मैं आप को मायूस नहीं करूंगी. मेरा शरीर आप का है, आप इसे जिस तरह चाहे प्रयोग करें, लेकिन भावनात्मक तौर पर मैं आप का साथ नहीं दे सकूंगी.’

‘‘मैं उस की बातें सुन कर हिल गया. मैं ने उस से पूछा कि क्या तुम किसी और को पसंद करती हो? उस ने कहा, ‘आप ने सुना होगा कि हमारे भट्ठे पर जमील नाम का एक लड़का आग में गिर कर मर गया था. मैं उसी से प्यार करती थी. वह दुर्घटना नहीं, बल्कि उसे मेरे घर वालों ने साजिश रच कर मारा है. लेकिन कोई भी ताकत उसे मेरे दिल से नहीं निकाल सकती. मैं आप से बागी नहीं हो सकती, आप का हर हुक्म मानूंगी.’

‘‘पता नहीं क्या हुआ सर, उस की हृदयस्पर्शी बातें सुन कर मैं ने मन ही मन तय कर लिया कि मैं शाइस्ता को उस के अतीत की बातें अपने मातापिता को भी पता नहीं चलने दूंगा. मुझ से जमील के बारे में कितनी भी बातें करे, मैं बुरा नहीं मानूंगा. मैं वही करूंगा जो वह कहेगी. उस ने मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में ले कर आंखों से लगाए और बहुत रोई. आज हमारी शादी को 20-21 दिन हो गए हैं, मैं ने उसे बिलकुल भी हाथ नहीं लगाया है.’’

उस की बातों को हम ने बड़े गौर से सुना और ताज्जुब भी हुआ. हमें शाइस्ता से बात करनी थी, इसलिए उसे हम ने कमरे में बुला लिया और उस से बात होने तक उस के पति को बाहर बैठ कर इंतजार करने को कहा. उस के जाने के बाद मैं और इंसपेक्टर टेनिसन एकदूसरे का मुंह देखते रहे. मैं ने अपनी सर्विस में बहुत से लोग देखे थे, लेकिन यह आदमी सब से अलग और अनोखा था. इंसपेक्टर टेनिसन ने शाइस्ता से बात करनी शुरू की. इंसपेक्टर टेनिसन ने कहा, ‘‘क्या तुम्हें अपने पिता की गिरफ्तारी पर दुख नहीं है?’’

‘‘नहीं,’’ उस ने दांत पीस कर कहा, ‘‘मुझे उस आदमी से नफरत है, उसे सख्त सजा दी जानी चाहिए.’’

2-3 बातें और पूछने के बाद हम ने कहा, ‘‘इस के लिए तुम्हें अदालत में गवाही देनी पड़ेगी.’’

‘‘मैं अदालत चलूंगी और वहां चिल्लाचिल्ला कर कहूंगी कि यह हत्यारा है और हत्या की वजह भी बताऊंगी.’’

सागर और ठेकेदार को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. इस के बाद न्यायालय में मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई. शाइस्ता ने अपने पिता के खिलाफ गवाही दी. मुकदमे की लंबी काररवाही के बाद जज ने सागर को मृत्युदंड और ठेकेदार को 8 साल की सजा सुनाई. दोनों ने हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन उन की अपील निरस्त कर दी गईं. लगभग एक साल बाद मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ आगरा घूमने गया तो इत्तफाक से वहां शाइस्ता और उस का पति मिल गया.

शाइस्ता ने बताया कि सागर को फांसी देने के बाद उस के पिता को जेल में 3 महीने बाद फालिज का अटैक पड़ा, जिस में उस की मौत हो गई. उस की लाश घर आई तो उस की ससुराल के सब लोग गए थे, लेकिन वह नहीं गई. बाप के मरने से उस के दिल को बहुत सुकून मिला था. अब वह पति के साथ खुश है. मैं ने उस के पति की ओर देखा, वह मुसकरा रहा था. उस के चेहरे से ही लग रहा था कि वह संतुष्ट है. Hindi Kahani

 

Thriller Hindi Story: अभिनेत्री शनाया की मोहब्बत का कांटा

Thriller Hindi Story: वह वर्गाकार बड़ा हाल था. हाल में मुख्यद्वार से सटे 3×6 के 2 मेज एकदूसरे को आपस में सटा कर बिछाए गए थे. नया और रंगीन कवर उन पर बिछाया गया था. मेज से सटी 4 कुरसियां थीं. कुरसियों पर कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री की उभरती हुई अभिनेत्री शनाया काटवे, फिल्म के डायरेक्टर राघवंका प्रभु और 2 अन्य मेहमान बैठे  हुए थे.

मेज के सामने करीब 4 फीट की दूरी पर कुछ और कुरसियां रखी हुई थीं. उन पर शहर के नामचीन, वीआईपी, रिश्तेदार, दोस्त और स्थानीय समाचारपत्रों के खबरनवीस बैठे हुए थे. हाल का कोनाकोना दुलहन की तरह सजा था. रंगीन और दूधिया रौशनी के सामंजस्य से पूरा हाल नहा उठा था. खूबसूरत और शानदार सजावट से किसी की आंखें हट ही नहीं रही थीं.

अभिनेत्री शनाया काटवे की ओर से यह शानदार पार्टी उस के फिल्म प्रमोशन ‘आेंडू घंटेया काठे’ के अवसर पर आयोजित की गई थी. पार्टी देर रात तक चलती रही. घूमघूम कर शनाया मेहमानों का खयाल रख रही थी. पार्टी में शामिल आगंतुकों ने वहां जम कर लुत्फ उठाया था. पार्टी खत्म हुई तो देर रात शनाया काटवे अपने मांबाप के साथ घर पहुंची. वह बहुत थक गई थी. कपड़े वगैरह बदल कर हाथमुंह धो कर अपने कमरे में बिस्तर पर लेटी तो दिन भर की थकान के चलते लेटते ही सो गई. उस के मांबाप अपने कमरे में जा कर सो गए थे. यह बात 9 अप्रैल, 2021 की है.

अगली सुबह जब शनाया और उस के मांबाप की नींद खुली और वे फ्रैश हो कर डायनिंग हाल में नाश्ता करने बैठे तो उन्हें अपने इर्दगिर्द एक कमी का एहसास हुआ. जब वे देर रात घर वापस लौटे थे तो भी घर पर उन का बेटा राकेश काटवे कहीं नजर नहीं आया था. जब सुबह नाश्ता करने के लिए सभी एक साथ डायनिंग हाल में बैठे तो भी राकेश वहां भी मौजूद नहीं था.

यह देख कर शनाया के पापा बलदेव काटवे थोड़ा परेशान हो गए कि आखिर वह कहां है, घर में कहीं दिख भी नहीं रहा है. ऐसा पहली बार हुआ था जब वह घर से कहीं बाहर गया और हमें नहीं बताया, लेकिन वह जा कहां सकता है. यह तो हैरान करने वाली बात हुई. बलदेव काटवे और उन की पत्नी सोनिया का नाश्ता करने का मन नहीं हो रहा था. दोनों एकएक प्याली चाय पी कर वहां से उठ गए. मांबाप को उठ कर जाते देख शनाया भी नाश्ता छोड़ कर उठ गई और उन के कमरे में जा पहुंची, जहां वे बेटे को ले कर परेशान और चिंतित थे.

बात चिंता करने वाली थी ही. जो इंसान घर छोड़ कर कहीं न जाता हो और फिर वह अचानक से गायब हो जाए तो यह चिंता वाली बात ही है. बलदेव, सोनिया और शनाया ने अपनेअपने स्तर से परिचितों और दोस्तों को फोन कर के राकेश के बारे में पता किया, लेकिन वह न तो किसी परिचित के वहां गया था और न ही किसी दोस्त के वहां ही. उस का कहीं पता नहीं चला.

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राकेश का जब कहीं पता नहीं चला तो बलदेव काटवे ने बेटे की गुमशुदगी की सूचना हुबली थाने में दे दी. एक जवान युवक के गायब होने की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी एस. शंकराचार्य हरकत में आए और राकेश की खोजबीन में अपने खबरियों को लगा दिया. यह 10 अप्रैल, 2021 की बात है. राकेश काटवे कोई छोटामोटा आदमी नहीं था. उस के नाम के पीछे अभिनेत्री शनाया काटवे का नाम जुड़ा था, इसलिए यह मामला हाईप्रोफाइल बन गया था. मुकदमा दर्ज कर लेने के बाद पुलिस राकेश काटवे का पता लगाने में जुटी हुई थी.

5 टुकड़ों में मिली लाश

इसी दिन शाम के समय हुबली थाना क्षेत्र के देवरागुडीहल के जंगल में एक कटा हुआ सिर बरामद हुआ तो इसी थाना क्षेत्र के गदर रोड से एक कुएं में गरदन से पैर तक शरीर के कई टुकड़े पानी पर तैरते बरामद हुए. टुकड़ों में मिली इंसानी लाश से इलाके में दहशत फैल गई थी. जैसे ही कटा सिर और टुकड़ों में बंटे शरीर के अंग पाए जाने की सूचना थानाप्रभारी एस. शंकराचार्य को मिली, वह चौंक गए. वह तुरंत टीम ले कर देवरागुडीहल जंगल की तरफ रवाना हो गए थे.

चूंकि राकेश काटवे की गुमशुदगी की सूचना थाने में दर्ज थी, घर वालों ने उस की एक रंगीन तसवीर थाने में दी थी. कटा हुआ सिर तसवीर से काफी हद तक मेल खा रहा था, इसलिए थानाप्रभारी ने घटनास्थल पर बलदेव काटवे को भी बुलवा लिया, जिस से उस की शिनाख्त हो जाए.  छानबीन के दौरान संदिग्ध अवस्था में घटनास्थल से कुछ दूरी पर एक मारुति रिट्ज और एक हुंडई कार बरामद की थी. दोनों कारों की पिछली सीटों पर खून के धब्बे लगे थे, जो सूख चुके थे. पुलिस का अनुमान था कि हत्यारों ने कार को लाश ठिकाने लगाने के लिए इस्तेमाल किया होगा. पुलिस ने दोनों कारों को अपने कब्जे में ले लिया.

दोनों कारों को कब्जे में लेने के बाद उन्होंने इस की सूचना एसपी (ग्रामीण) पी. कृष्णकांत और पुलिस कमिश्नर लभु राम को दे दी थी. दिल दहला देने वाली घटना की सूचना मिलते ही पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंच गए थे. उन्होंने घटनास्थल और कटे हुए अंगों का निरीक्षण किया. शरीर के अंगों को देखने से ऐसा लगता था जैसे हत्यारों ने बड़े इत्मीनान से किसी  धारदार हथियार से उसे छोटेछोटे टुकड़ों में काटा होगा. पुलिस उन तक पहुंच न पाए, इसलिए लाश जंगल में ले जा कर अलगअलग जगहों पर फेंक दी, ताकि लाश की शिनाख्त न हो सके.

बहरहाल, थानाप्रभारी की यह तरकीब वाकई काम कर गई. उन्होंने जब बलदेव काटवे को सिर के फोटो दिखाए तो फोटो देखते ही बलदेव काटवे पछाड़ मार कर जमीन पर गिर गए. यह देख कर पुलिस वालों को समझते देर न लगी कि कटे हुए सिर की पहचान उन्होंने कर ली है. थोड़ी देर बाद जब वह सामान्य हुए तो वह दहाड़ मारमार कर रोने लगे. वह कटा हुआ सिर उन के लाडले बेटे राकेश काटवे का था. पुलिस यह जान कर और भी हैरान थी कि कहीं गदग रोड स्थित कुएं से बरामद कटे अंग राकेश के तो नहीं हैं. लेकिन पुलिस की यह आशंका भी जल्द ही दूर हो गई थी. बलदेव काटवे ने हाथ और पैर की अंगुलियों से लाश की पहचान अपने बेटे के रूप में कर ली थी.

24 घंटे के अंदर पुलिस ने राकेश काटवे की गुमशुदगी के रहस्य से परदा उठा दिया था. हत्यारों ने बड़ी बेरहमी से उसे मौत के घाट उतारा था. पुलिस ने लाश का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. लेकिन एक बात से राकेश के मांबाप और पुलिस हैरान थे कि राकेश की जब किसी से दुश्मनी नहीं थी तो उस की हत्या किस ने और क्यों की? इस का जबाव न तो पुलिस के पास था और न ही उस के मांबाप के पास. दोनों ही इस सवाल से निरुत्तर थे.

किस ने और क्यों, का जबाव तो पुलिस को ढूंढना था. राकेश की हत्या की गुत्थी सुलझाने के लिए पुलिस ने वैज्ञानिक साक्ष्यों को अपना हथियार बनाया. पुलिस ने सब से पहले राकेश काटवे के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से पुलिस यह पता लगाने की कोशिश में जुट गई कि आखिरी बार राकेश से किस की और कब बात हुई थी? जांचपड़ताल में आखिरी बार उस की बहन शनाया से बातचीत के प्रमाण मिले थे. रात में 7 और 8 बजे के बीच में शनाया और राकेश के बीच लंबी बातचीत हुई थी. उस के बाद उस के फोन पर किसी और का फोन नहीं आया था. इस का मतलब आईने की तरह साफ था कि राकेश की हत्या रात 8 बजे के बाद की गई थी.

पुलिस के सामने एक और हैरानपरेशान कर देने वाली सच्चाई सामने आई थी. घटना वाले दिन शनाया ने अपने फिल्म के प्रमोशन पर एक पार्टी रखी थी. उस पार्टी में राकेश को छोड़ घर के घर सभी सदस्य शमिल थे तो उस का भाई राकेश पार्टी में शामिल क्यों नहीं हुआ? वह कहां था? इंसपेक्टर एस. शंकराचार्य के दिमाग में यह बात बारबार उमड़ रही थी कि जब घर के सभी सदस्य पार्टी में शमिल थे तो राकेश किस वजह से घर पर रुका रहा? इस ‘क्यों’ का जबाव मिलते ही हत्या की गुत्थी सुलझ सकती थी.

आखिरकार पुलिस की मेहनत रंग लाई. घटनास्थल से बरामद हुई दोनों कारों में से एक मारुति रिट्ज कार मृतक राकेश काटवे की बहन शनाया काटवे के नाम पर रजिस्टर्ड थी. दूसरी हुंडई कार किसी अमन नाम के व्यक्ति के नाम पर थी. यह जान कर पुलिस के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई कि शनाया काटवे की कार घटनास्थल पर कैसे पहुंची? राकेश के मर्डर से शनाया का क्या संबंध हो सकता है? क्या शनाया का हत्यारों के साथ कोई संबंध है? ऐसे तमाम सवालों ने पुलिस कमिश्नर लभु राम, एसपी (ग्रामीण) पी. कृष्णकांत और थानाप्रभारी को हिला कर रख दिया था.

एसपी (ग्रामीण) पी. कृष्णकांत के नेतृत्व में राकेश काटवे हत्याकांड की बिखरी कडि़यों को जोड़ने के लिए थानाप्रभारी बेताब थे. उन्होंने घटना का परदाफाश करने के लिए मुखबिरों को लगा दिया था. घटना के 4 दिनों बाद 14 अप्रैल को मुखबिर ने जो सूचना दी, उसे सुन कर थानाप्रभारी को मामले में प्रगति नजर आई. मुखबिर ने उन्हें बताया था कि भाईबहन शनाया और राकेश के बीच में अच्छे रिश्ते नहीं थे. बरसों से उन के बीच में छत्तीस का आंकड़ा बना हुआ था.

मुखबिर की यह सूचना पुलिस के लिए काम की थी. पुलिस ने दोनों के बिखरे रिश्तों का सच तलाशना शुरू किया तो जल्द ही सारा सच सामने आ गया. दरअसल, राकेश शनाया के प्रेम की राह में एक कांटा बना हुआ था. शनाया का नियाज अहमद काटिगार के साथ प्रेम संबंध था. इसी बात को ले कर अकसर दोनों भाईबहन के बीच में झगड़ा हुआ करता था. राकेश को बहन का नियाज से मेलजोल अच्छा नहीं लगता था, जबकि शनाया को भाई की टोकाटोकी सुहाती नहीं थी. यही दोनों के बीच खटास की वजह थी. घटना के खुलासे के लिए इतनी रौशनी काफी थी. सबूतों के आधार पर 17 अप्रैल को हुबली पुलिस ने नियाज अहमद काटिगार को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया और पूछताछ के लिए थाने ले आई.

अपराधी चढ़े पुलिस के हत्थे

थाने में कड़ाई से हुई पूछताछ में नियाज अहमद पुलिस के सामने टूट गया और राकेश की हत्या का अपना जुर्म कबूल कर लिया. आगे की पूछताछ में उस ने यह भी बताया कि इस घटना में उस के साथ उस के 3 साथी तौसीफ चन्नापुर, अलताफ तैजुद्दीन मुल्ला और अमन गिरनीवाला शमिल थे. उस के बयान के आधार पर उसी दिन तीनों आरोपी गिरफ्तार कर लिए गए.

पुलिस पूछताछ के दौरान नियाज अहमद ने प्रेमिका शनाया काटवे के कहने पर राकेश की हत्या करना कबूल किया था. 5 दिनों बाद 22 अप्रैल, 2021 को राकेश हत्याकांड की मास्टरमाइंड शनाया काटवे को हुबली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. शनाया ने बड़ी आसानी से पुलिस के सामने घुटने टेक दिए. उस ने भाई राकेश की हत्या कराने का अपना जुर्म मान लिया था. पुलिस पूछताछ में राकेश काटवे हत्याकांड की कहानी ऐसे सामने आई—

25 वर्षीया शनाया काटवे मूलरूप से उत्तरी कर्नाटक के धारवाड़ जिले की हुबली की रहने वाली थी. वह मां सोनिया काटवे और पिता बलदेव की इकलौती संतान थी. इस के अलावा काटवे दंपति की कोई और संतान नहीं थी. एक ही संतान को पा कर दोनों खुश थे और खुशहाल जीवन जी रहे थे. लेकिन बेटे की चाहत कहीं न कहीं पतिपत्नी के मन में बाकी थी. पतिपत्नी जब भी अकेले में होते तो एक बेटे की अपनी लालसा जरूर उजागर करते. आखिरकार उन्होंने फैसला किया कि वे एक बेटे को गोद लेंगे, अपनी कोख से नहीं जनेंगे. जल्द ही काटवे दंपति की वह मंशा पूरी हो गई.

गोद लिया भाई था राकेश

उन्होंने अपने एक रिश्तेदार के बेटे को कानूनी तौर पर गोद ले लिया और पालपोस कर उसे बड़ा किया. तब राकेश साल भर का रहा होगा. काटवे दंपति के गोद में राकेश पल कर बड़ा हुआ. उन की अंगुलियां पकड़ कर चलना सीखा. सयाना और समझदार हुआ तो मांबाप के रूप में उन्हें ही सामने पाया. वही उस के मांबाप थे, राकेश यही जानता था. उन्होंंने भी शनाया और राकेश के बीच कभी फर्क नहीं किया. लेकिन शनाया जानती थी कि राकेश उस का सगा भाई नहीं है, उसे मांबाप ने गोद लिया है.

बचपन से ही शनाया राकेश से नफरत करती थी, उस से चिढ़ती थी. चिढ़ उसे इस बात से हुई थी कि उस के हिस्से की आधी खुशियां और सुख राकेश की झोली में जा रहे थे. शनाया फुरसत में जब भी होती, यही सोचती कि वह नहीं होता तो जो सारी खुशियां, लाड़प्यार राकेश को मिलता है, उसे ही नसीब होता. लेकिन उस के हिस्से के प्यार पर डाका डालने न जाने वह कहां से आ गया.

यही वह खास वजह थी जब शनाया बचपन से ले कर जवानी तक राकेश को फूटी आंख देखना नहीं चाहती थी. उस से नफरत करती थी. लेकिन इस से राकेश को कोई फर्क नहीं पड़ता था कि शनाया उसे प्यार करती थी या नफरत. वह तो उस की परछाईं को अपना समझ कर उस के पीछे भागता था, उसे बहन के रूप में प्यार करता था. क्योंकि उस के मांबाप ने उसे यही बताया था.

खैर, शनाया और राकेश बचपन की गलियों को पीछे छोड़ अब जवानी की दहलीज पर खड़े थे. जिस प्यार को मांबाप ने दोनों में बराबर बांटा था, दोनों के अपने रास्ते अलगअलग थे. हुबली से ही स्नातक की डिग्री हासिल कर शनाया काटवे की बचपन से रुपहले परदे पर स्टार बन कर चमकने की दिली ख्वाहिश थी. अपने सपने पूरे करने के लिए वह दिनरात मेहनत करती थी. इस के लिए उस ने मौडलिंग की दुनिया को सीढ़ी बना कर आगे बढ़ना शुरू किया.

शनाया बला की खूबसूरत और बिंदास लड़की थी. अपनी सुंदरता पर उसे बहुत नाज था. आदमकद आईने के सामने घंटों खड़ी हो कर खुद को निहारना उस के दिल को सुकून देता था. यही नहीं, जीने की हसरत उस में कूटकूट कर भरी थी. उस के खयालों में नियाज अहमद काटिगार सुनहरे रंग भर रहा था.

अमीर बाप की बिगड़ी औलाद था नियाज

हुबली का रहने वाला 22 वर्षीय नियाज अहमद अमीर मांबाप की बिगड़ी हुई औलाद था. बाप के खूनपसीने से कमाई दौलत यारदोस्तों में दोनों हाथों से पानी की तरह बहा रहा था. उन यारदोस्तों में एक नाम शनाया काटवे का भी था. नियाज के दिल की धड़कन थी शनाया. उस के रगों में बहने वाला खून थी शनाया. शनाया के बिना जीने की वह कभी कल्पना नहीं कर सकता था. शनाया और नियाज एकदूसरे से बेपनाह मोहब्बत करते थे. दोनों की मुलाकात एक पार्टी में हुई थी. शनाया की खूबसूरती देख कर नियाज घायल हो गया था. वह पहली नजर में ही शनाया को दिल दे बैठा था. उठतेबैठते, सोतेजागते, खातेपीते हर जगह उसे शनाया ही नजर आती थी.

ऐसा नहीं था कि मोहब्बत की आग एक ही तरफ लगी हो. शनाया भी उसी मोहब्बत की आग में जल रही थी. मोहब्बत की आग दोनों ओर बराबर लगी थी. एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें दोनों ने खाईं और भविष्य को ले कर सपने देख रहे थे. खुले आसमान के नीचे अपनी बांहें फैलाए नियाज और शनाया भूल गए थे कि उन का प्यार ज्यादा दिनों तक चारदीवारी में कैद नहीं रह सकता. वह फिजाओं में खुशबू की तरह फैल जाता है.

शनाया और नियाज की मोहब्बत भी ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रही. शनाया के भाई राकेश काटवे को बहन के प्रेम की सूचना मिली तो वह आगबबूला हो गया था. उस ने अपनी तरफ से सच्चाई का पता लगाया तो बात सच निकली.

बहन को हिदायत दी थी राकेश ने

शनाया एक मुसलिम युवक नियाज अहमद से प्यार करती थी. उस ने बड़े प्यार से एक दिन बहन से पूछा, ‘‘यह मैं क्या सुन रहा हूं शनाया?’’

‘‘क्या सुन रहे हो भाई, मुझे भी तो बताओ.’’ शनाया ने पूछा.

‘‘क्या तुम सचमुच नहीं जानती कि मैं क्या कहना चाहता हूं?’’ वह बोला.

‘‘नहीं, सचमुच मैं नहीं जानती, आप क्या कहना चाहते हो और मेरे बारे में आप ने क्या सुना है?’’ शनाया ने सहज भाव से कहा.

‘‘उस नियाज से तुम दूरी बना लो, यही तुम्हारी सेहत के अच्छा होगा. मैं अपने जीते जी खानदान की नाक कटने नहीं दूंगा. अगर  तुम ने मेरी बात नहीं सुनी या नहीं मानी तो यह नियाज मियां के सेहत के लिए अच्छा नहीं होगा.’’ भाई के मुंह से नियाज का नाम सुनते ही शनाया के होश उड़ गए.

‘‘जैसा तुम सोच रहे हो भाई, हमारे बीच में ऐसी कोई बात नहीं है. हम दोनों एक अच्छे दोस्त भर हैं.’’ शनाया ने सफाई देने की कोशिश की, लेकिन वह घबराई हुई थी.

‘‘मेरी आंखों में धूल झोंकने की कोशिश मत करना. तुम दोनों के बारे में मुझे सब पता है. कई बार मैं ने खुद तुम दोनों को एक साथ बांहों में बांहें डाले देखा है. जी तो चाहा कि तुम्हें वहीं जान से मार दूं, लेकिन मम्मीपापा के बारे में सोच कर मेरे हाथ रुक गए. तुम अब भी संभल जाओ. तुम्हारी सेहत के लिए यही अच्छा होगा. नहीं तो इस का अंजाम बहुत बुरा हो सकता है, जो न मैं जानता हूं और न ही तुम, समझी.’’

‘‘प्लीज भाई, मम्मीपापा से कुछ मत कहना,’’ शनाया भाई के सामने गिड़गिड़ाई, ‘‘नहीं तो उन के दिल को बहुत ठेस लगेगी. वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे. मेरी उन की नजरों में सारी इज्जत खत्म हो जाएगी. प्लीज…प्लीज… प्लीज, मम्मीपापा से कुछ मत कहना, मेरे अच्छे भाई.’’

‘‘ठीक है, ठीक है, सोचूंगा. मुझे क्या करना होगा लेकिन तुम ने अपनी आदत में बदलाव नहीं लाया तो सोचना कि मैं तुम्हारे लिए कितना खतरनाक बन जाऊंगा, मैं खुद भी नहीं जानता.’’

राकेश ने शनाया को प्यार से समझाया भी और धमकाया भी. उस के बाद उस ने मम्मीपापा से बहन की पूरी हकीकत कह सुनाई. बेटी की करतूत सुन कर वे शर्मसार हो गए.

मांबाप ने भी बेटी को समझाया और नियाज से दूर रहने की सलाह दी. वैसे भी शनाया भाई से छत्तीस का आंकड़ा रखती थी. उस के मना करने के बावजूद राकेश ने उस के प्यार वाली बात मांबाप से बता दी थी.  यह सुन कर उस के सीने में भाई के प्रति नफरत की आग धधक उठी थी.

प्यार की राह का कांटा बना राकेश

राकेश बहन के प्रेम की राह का कांटा बना हुआ था. राकेश के कई बार समझाने के बावजूद शनाया ने नियाज से मिलना बंद नहीं किया था. इसे ले कर दोनों में अकसर झगड़े होते रहते थे. रोजरोज की किचकिच से शनाया ऊब चुकी थी. वह नहीं चाहती थी कि उस के और उस के प्यार के बीच में कोई कांटा बने. भाई की टोकाटोकी से तंग आ कर शनाया ने उसे रास्ते से हटाने की खतरनाक योजना बना ली. शनाया ने अपनी अदाओं से प्रेमी नियाज अहमद को उकसाया कि अगर मुझे प्यार करते हो तो हमारे प्यार के बीच कांटा बने भाई राकेश को रास्ते से हटा दो, नहीं तो मुझे हमेशा के लिए भूल जाओ.

नियाज अहमद शनाया से दूर हो कर जीने की कल्पना भी कर नहीं सकता था. उस ने प्रेमिका का दिल जीतने के लिए राकेश को रास्ते से हटाने के लिए हामी भर दी. इस खतरनाक योजना को अंजाम देने के लिए उस ने अपने 3 साथियों तौसीफ चन्नापुर, अलताफ तैजुद्दीन मुल्ला और अमन गिरनीवाला को शमिल कर लिया. इस के बाद राकेश को रास्ते से हटाने की योजना बनी. खतरनाक योजना खुद शनाया ने ही बनाई. इसे 9 अप्रैल, 2021 को अंजाम देने की तारीख तय की गई. उस दिन उस ने अपनी नई फिल्म ‘आेंडू घंटेया काठे’ की प्रमोशन रखवाई थी. चतुर शनाया ने इसलिए यह तारीख निर्धारित की थी ताकि उस पर किसी का शक न जाए और रास्ते का कांटा सदा के लिए हट भी जाए. यानी सांप भी मर जाए, लाठी भी न टूटे.

योजना के मुताबिक, 9 अप्रैल, 2021 को शनाया काटवे फिल्म प्रमोशन के लिए जब पार्टी में पहुंची, तभी उस ने नियाज अहमद को फोन कर के बता दिया कि राकेश पार्टी में नहीं आएगा, वह घर पर अकेला है. मांबाप भी पार्टी में आए हुए हैं. यही सही वक्त है, काम को अंजाम दे दो.

घर पर ही किए थे राकेश के टुकड़े

शनाया की ओर से हरी झंडी मिलते ही नियाज अहमद, साथियों के साथ अमन गिरनीवाला की हुंडई कार ले कर पार्टी वाली जगह पहुंचा. वहां से शनाया की मारुति रिट्ज कार ले कर रात साढ़े 8 बजे उस के घर पहुंचा. उस की कार नियाज अहमद खुद ड्राइव कर रहा था. उस कार में नियाज के साथ तौसीफ चन्नापुर बैठा था जबकि अमन गिरनीवाला की हुंडई कार में अलताफ तैजुद्दीन मुल्ला सवार था.

खैर, रात साढ़े 8 बजे जब नियाज शनाया के घर पहुंचा तो राकेश काटवे घर पर ही था. नियाज ने कालबैल बजाई तो राकेश ने दरवाजा खोल दिया. सामने नियाज को देख कर वह चौंक गया. इस से पहले कि वह सावधान हो पाता, नियाज और उस के साथी अचानक उस पर टूट पड़े.

नियाज ने गला दबा कर उसे मौत के घाट उतार दिया. फिर लाश को ठिकाने लगाने के लिए नियाज ने अपने साथ लाए धारदार चाकू से राकेश के शरीर को 5 टुकड़ों में काट दिया और फर्श पर पड़े खून को एक कपड़े से साफ कर साक्ष्य मिटा दिए. फिर एक पैकेट में सिर और दूसरे पैकेट में बाकी अंग रख कर चारों लोग 2 गाडि़यों में सवार हो कर देवरागुडीहल जंगल की तरफ रवाना हो गए. नियाज ने राकेश का कटा सिर जंगल में फेंक दिया और दोनों कार वहीं छोड़ कर चारों गदग रोड जा पहुंचे. वहां एक कुएं में कटे अंग डाल कर सभी फरार हो गए.

शनाया काटवे ने मौत की परफैक्ट प्लानिंग की थी. लेकिन वह यह भूल गई थी कि अपराधी कितना ही चालाक क्यों न हो, कोई न कोई सुराग छोड़ ही जाता है. शनाया ने भी वैसा ही किया. वह कानून के लंबे हाथों से बच नहीं पाई और पुलिस के हत्थे चढ़ गई. सभी अभियुक्तों से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. Thriller Hindi Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Story: छोटी बहू

Hindi Story: इंसपेक्टर नवाज खान को शक था कि चंदरमल के गायब होने के पीछे उस की मंझली बहू के प्रेमी का हाथ है. लेकिन जब उन्होंने इस मामले की जांच की तो…

उन दिनों मेरी पोस्टिंग अमृतसर के एक देहाती इलाके में थी. वहां लाला चंदरमल के बेटे अर्जुन से मेरा अच्छा दोस्ताना था. वह एक शरीफ और मुखलिस नौजवान था. अर्जुन का शालों का कारोबार था. उस की बीवी भी अच्छी औरत थी और मेरे घर आती थी. मेरी बीवी से उस की अच्छी पटती थी. उस का नाम सीता था. आज जो किस्सा मैं आप को सुनाने जा रहा हूं, उस में सीता की खास भूमिका है. वह एक नेक और भली औरत थी और चंदरमल की चहेती बहू थी. चंदरमल के दोनों बड़े बेटों की औरतें नाम की बहुएं थीं. न वे दोनों ससुर की कोई सेवा करती थीं, न उसे पूछती थीं. उस की सारी खिदमत और देखरेख सिर्फ सीता करती थी.

वैसे चंदरमल ने दोनों बड़े बेटों, विकास और प्रकाश को पहले ही अलग कर दिया था, जबकि अर्जुन ने अलग होने से साफ इनकार कर दिया था. वह और सीता बाप से अलग नहीं होना चाहते थे. पर चंदरमल ने समझाबुझा कर अपने घर के पास ही घर दिला कर उन्हें भी अलग कर दिया था. लेकिन अलग होने के बाद भी सीता सुबहशाम आ कर ससुर का खाना बनाती, खिलाती, सेवा करती. उस की जरूरतों का खयाल रखती.

लाला की बीवी मर चुकी थी. न चाहते हुए भी अर्जुन और सीता को लाला से अलग होना पड़ा था, इस के पीछे लाला चंदरमल की शराब की लत थी. वह रात होते ही पीना शुरू कर देता था, इसलिए वह नहीं चाहता था कि उस की बहू व उस के बच्चे नशे की हालत में उसे देखें. इसी वजह से उस ने अर्जुन को भी अलग कर दिया था. सोमवार के दिन वह सोमरस का पान कुछ ज्यादा ही कर लेता था. मदहोशी की हालत में कोई उसे गलत हरकतें करते न देखे, इसलिए वह अलग अकेले रहना पसंद करता था. ये सब बातें अर्जुन की बीवी मेरी बीवी को बताती थी.

फिर अचानक एक दिन लाला चंदरमल गायब हो गया. सीता ने बताया कि वह उस के घर के 3-4 चक्कर लगा चुकी है, पर वह नहीं मिला दरवाजे पर भी ताला लगा हुआ है. सीता बहुत परेशान थी. 2 दिनों बाद दीवाली थी और लाला दीवाली उस के घर पर मनाने वाला था. वह जब उस से मिलने गई तो घर बंद था. उसे खाना भी बनाना था, पर वह नहीं लौटा था. वह मेरे पास आ गई. हम ने समझाया, लौट आएंगे, कहीं काम से गए होंगे. समझदार आदमी हैं. पर हमारी तसल्ली कुछ काम न कर सकी. वह रोती रही, परेशान होती रही. उस की परेशानी अपनी जगह ठीक थी. वह ऐसा गायब हुआ कि लौट कर ही नहीं आया. कई दिन गुजर गए, उस का कोई सुराग न लगा. मैं ने भी काफी कोशिश की.

अर्जुन व सीता ने भी आसपास, रिश्तेदारों में काफी तलाश की, पर अब तक कुछ पता नहीं चला. मेरी तलाश भी बेकार गई. यह भी पता न चल सका कि वह खुद गया या कोई उसे उठा कर ले गया. वह कोई बच्चा नहीं था कि गुम हो जाता. मैं ने उसे सलाह दी कि वे लोग कानूनी तौर पर मामला उठाएं तो सही तरीके से तफ्तीश हो सकती है. इस पर वह बोली, ‘‘हम लोग राजी हैं, पर भाई प्रकाश और उन की पत्नी भगवती नहीं मान रहीं. वह कहती हैं कि फालतू के लफड़े में पड़ने से क्या फायदा? आप उसे जाने दें, मैं और मेरे पति कानूनी काररवाई करेंगे.’’

मुझे अर्जुन के भाईभाभी की बात समझ में नहीं आई. दूसरे दिन अर्जुन ने चंदरमल की गुमशुदगी दर्ज करा दी. मैं ने उस से पूछा, ‘‘प्रकाश और उस की पत्नी भगवती रिपोर्ट के विरोध में क्यों हैं? क्या वे नहीं चाहते कि चंदरमल मिल जाएं?’’

इस पर अर्जुन ने कई बातें बताईं. प्रकाश व भगवती की लाला से नहीं पटती थी. वह उन से नाराज रहता था. भगवती चाहती थी कि लाला की सारी दौलत उन दोनों को मिल जाए. प्रकाश की शादी भी लाला ने नहीं करवाई थी. उस ने ऐसी ही चलतीफिरती औरत से अपनी मरजी से शादी कर ली थी.

लाला प्रकाश व भगवती से जरा भी खुश नहीं था. मैं ने लाला के दुश्मनों के बारे में पूछा तो कहने लगा, ‘‘मेरे बाबू जुबान के व धंधे के बड़े खरे थे. उन की कभी कोई शिकायत नहीं आई. ईमानदारी से लेनदेन करते थे. उन का ऐसा कोई दुश्मन भी नहीं था, जो उन्हें गायब करवा दे. मुझे तो कभीकभी भगवती पर शक होता है.

‘‘वह प्रकाश पर भी दबाव डालती थी कि लाला से हिस्सा मांगो. प्रकाश ने बापू से नहीं, मुझ से हिस्से की बात की थी. मैं ने उसे समझाया था कि बापू सब की बराबर मदद करते हैं, इसलिए हमारी गृहस्थी अच्छी चल रही है.

‘‘अगर हिस्से की बात करोगे तो बापू नाराज हो कर कहीं ये मदद भी बंद न कर दें. तब उस ने बेबसी से कहा था कि वह भगवती की वजह से मजबूर है. उस वक्त बात टल गई. बापू के गायब होने से उन की मुराद पूरी हो जाएगी, क्योंकि बापू के न रहने से हिस्से बंट जाएंगे.’’

अर्जुन की बातों से मुझे तफतीश शुरू करने में काफी मदद मिली. सब से पहले मैं प्रकाश के घर गया. उन के दरवाजे पर बड़ा सा ताला लगा था. दोनों गायब थे. इस का मतलब कुछ गड़बड़ तो थी. मुझे उन की वापसी का इंतजार करना था.

मैं ने अर्जुन से कहा कि वह अपने सगेसंबंधियों, जानने वालों में उन के बारे में पता करवाए. मकान मालिक भी अर्जुन से उन के बारे में पूछ रहा था. यह तय था कि वे लोग जानबूझ कर गायब हुए थे. भगवती कोई अच्छी औरत नहीं थी. हो सकता है, उस का ताल्लुक जरायमपेशा लोगों से रहा हो. मैं ने सीता से, भगवती के मांबाप का पता मालूम किया और अपने मुखबिर से कहा कि मुझे किसी ऐसे आदमी से मिलवाओ, जिस का जरायमपेशा लोगों से याराना हो. उस ने एक ताड़ी बेचने वाले से मुझे मिलवाया, वह नाजायज धंधा करता था. इसलिए पुलिस के लिए कुछ भी काम करने को तैयार था.

मैं ने उसे भगवती के मांबाप का पता दे कर कहा कि इस घराने के बारे में मुझे पूरी मालूमात पता कर के खबर करे. उस के बाप का नाम सुन कर वह बोला, ‘‘साहब, भगवानदास मेरा ग्राहक है. उस का बदमाश गिरधारी से भी याराना है और ऐसा सुना है कि भगवानदास के मरने के बाद उस का याराना उस की लड़की भगवती से हो गया था. अब वह लड़की कहां है, मुझे नहीं मालूम. यह पुराने दिनों की बात है.’’

मैं ने उसे गिरधारी का पता लगाने को कहा और भगवती व उस के घराने के बारे में जानकारी लाने को कहा. कुछ दिनों बाद ताड़ी बेचने वाला, जिस का नाम मकरंदी था, बोला, ‘‘साहब, गिरधारी बड़ा बदमाश है. सारे गलत काम करता है, जुएं का बड़ा अड्डा चलाता है. मैं आप को मौका देख कर ऐसे समय उस के अड्डे पर ले चलूंगा, जब वह वहां मौजूद हो.’’

मुझे और कोई सुराग नहीं मिला था. चंदरमल अभी तक गायब था. मैं ने गिरधारी को निशाना बनाने की सोची, क्योंकि भगवती से भी उस के संबंध थे. मकरंदी के कई शराब के अड्डे थे, जहां वह ताड़ी बेचता था और पूरे वक्त पुलिस की खुशामद में लगा रहता था. उस दिन वह अपने साथ एक आदमी तिवारी को ले कर आया, जो सूरत से ही बदमाश लगता था. वह कहने लगा, ‘‘यह तिवारी गिरधारी का खास आदमी है, पर आजकल इस की गिरधारी से लड़ाई है. यह हमें उस तक पहुंचा देगा.’’

उसी रात को मैं तिवारी और मकरंदी के साथ गिरधारी के अड्डे के लिए रवाना हो गया. शहर के आखिरी छोर पर एक बड़े मैदान के बाद एक 2 मंजिला मकान था. नीचे तो अंधेरा था, ऊपर के कमरों में उजाला था. यही गिरधारी का अड्डा था. अभी हम सीढि़यों के पास खड़े थे कि एक आदमी सीढि़यों से लुढ़कता हुआ हमारे सामने आ कर गिरा. तिवारी ने बताया कि जब कोई जुआरी पैसे नहीं अदा करता तो गिरधारी उसे इसी तरह ऊपर से नीचे लुढ़का देता है.

हम चुपचाप ऊपर पहुंचे. सामने के कमरे में 5-6 लोग बैठे जुआ खेल रहे थे. उन के पास ताश व पैसे रखे थे. तिवारी मेरा हाथ पकड़ कर दूसरे कमरे में ले गया, जहां एक सांडनुमा आदमी एक टेबल के पीछे बैठा था. तिवारी धीरे से बोला, ‘‘यही है गिरधारी.’’

वह हट्टाकट्टा काला आदमी था. उस के बाजू मुगदल की तरह थे. चौड़ी छाती, भैसें जैसी गरदन, निस्संदेह वह एक मजबूत कदकाठी वाला अडि़यल आदमी था. गिरधारी तिवारी की आवाज सुन कर फुरती से खड़ा हो गया. उस ने अपने कुत्ते को इशारा किया तो उस ने तिवारी पर छलांग लगा दी. मेरा ध्यान गिरधारी पर था, वह सांड की तरह झूमता सिर की टक्कर मारने के लिए मेरी तरफ बढ़ा. मैं फुरती से एक तरफ से हो गया, वह अपनी पूरी ताकत से जा कर अलमारी से टकराया. अलमारी का पट टूट गया.

मैं ने सोचा, अगर यह मुझ से टकराया होता तो मेरा क्या हाल होता? मुझे उसे दूसरा मौका नहीं देना था. मैं ने खुद को तैयार कर लिया. जैसे ही वह मेरी तरफ बढ़ा, मैं ने सीधे हाथ का मुक्का इस के माथे पर जड़ दिया. मुझे लगा, जैसे मेरा हाथ किसी दीवार पर पड़ा हो. उस वक्त पिस्तौल निकालना खतरनाक हो सकता था. मुक्का जबरदस्त था, वह बिलबिला कर माथे पर हाथ रख कर पीछे हटा. उस की अंगुलियों से खून बाहर निकल रहा था. वह चकरा कर जमीन पर बैठ गया.

मैं ने तिवारी को इधरउधर देखा. वह कोने में गिरा पड़ा था. कुत्ते ने उस का पेट फाड़ दिया था, पर उस ने भी चाकू से कुत्ते को खत्म कर दिया था. मकरंदी पता नहीं कहां गायब हो गया था. तिवारी को देखना जरूरी था, मैं उस की तरफ बढ़ा. गिरधारी ने इस का फायदा उठाया, वह कमरे से खिसक गया. मुझे बड़ी हैरत हुई. नामीगिरामी गुंडा मेरे एक ही मुक्के में मुकाबले से डर गया. शायद और कोई वजह रही होगी, जो वह वहां से भाग गया. मुझे जल्द से जल्द तिवारी को अस्पताल भेजना था. मैं ने बाजू के कमरे से 2-3 लोगों को बुलाया, जो डरतेडरते आए.

मैं ने उन के साथ तिवारी को अस्पताल भिजवाया. सब मुझ से डर रहे थे. वे मुझे गिरधारी से बड़ा बदमाश समझ रहे थे, जिस ने गिरधारी के अड्डे पर आ कर उस का यह हाल कर दिया था. वे लोग तिवारी को एक चारपाई पर डाल कर अस्पताल ले गए. इस चक्कर में मकरंदी कब और कहां गायब हो गया, पता ही नहीं चला. मैं अपने थाने चला गया. तीसरे दिन मकरंदी मेरे पास आया. उसे देख कर मुझे गुस्सा तो बहुत आया, पर उस ने यह कहते हुए हाथ जोड़ कर माफी मांग ली कि वह दिल का कमजोर है. लड़ाईभिड़ाई से घबरा कर भाग गया था. मकरंदी को मैं ने माफ कर दिया, क्योंकि उस ने एक अच्छा काम किया था. जब गिरधारी छिपतेछिपाते वहां से भाग रहा था तो उस ने उस का पीछा किया था और यह मालूम कर लिया था कि वह कहां जा कर छिपा था.

मैं ने फैसला कर लिया कि मैं मकरंदी के साथ गिरधारी तक जरूर पहुचूंगा. मैं अर्जुन से मिलने उस के घर चला गया. उन दोनों को मैं ने सारी बातें बताईं. इस पर सीता कहने लगी, ‘‘मुझे पता था कि भगवती का ताल्लुक गिरधारी से है, पर मैं ने इस डर से यह बात किसी को नहीं बताई कि सब कहते कि मैं अपनी भाभी पर जलन में दोष लगा रही हूं. मैं ने कई बार प्रकाश की गैरमौजूदगी में एक काले सांड जैसे आदमी को उस के घर में देखा था.’’

अब मेरा गिरधारी तक पहुंचना जरूरी हो गया था. मकरंदी ने तिवारी का हाल भी बताया कि अब वह अच्छा है. उस के पेट में टांके लगे हैं, पर खतरे की कोई बात नहीं है. मकरंदी ने मुझे बताया कि उस ने गिरधारी को एक महंत की धरमशाला में जाते देखा था. जिस वक्त हम धरमशाला पहुंचे, शाम हो चुकी थी. धरमशाला की चारदीवारी काफी नीची थी, बीच में बड़ा मैदान था, जिस में एक तालाब सा बना हुआ था. सामने बड़ा सा बरामदा था, पीछे कमरों की लाइन थी. बरामदे में एक चारपाई पर एक आदमी लेटा था, दूसरा आदमी उस का बदन दबा रहा था.

मकरंदी धीरे से बोला, ‘‘जो लेटा है, वह महंत सोमनाथ है और जो बदन दबा रहा है, वह यहां का नौकर है. यहां आने से पहले मुझे मकरंदी बता चुका था कि सोमनाथ बड़ा अय्याश आदमी है. सब तरह के बुरे काम करता है, यहां तक कि लड़कियां भी उठवा लेता है.

हमें देख कर सोमनाथ उठ बैठा और हैरानी से देखने लगा. उस की हैरत देख कर मकरंदी जल्दी से बोला, ‘‘महाराज, हम गिरधारी से मिलने आए हैं. उस ने मुझे बुलवाया था.’’

महंत ने एक कमरे की तरफ इशारा कर दिया. मकरंदी महंत के पास चारपाई पर बैठ कर बातें करने लगा. मैं समझ गया कि वह डरपोक आदमी है, इसलिए गिरधारी के पास नहीं जाएगा. मैं ने सोमनाथ को सुनाने के लिए कहा, ‘‘तुम यहीं बैठो, मैं बात कर के आता हूं.’’

फिर मैं उस कमरे की तरफ बढ़ गया. इस बार मैं अचानक हमला करना चाहता था. मैं ने धीरे से दरवाजा खोला और तेजी से अंदर दाखिल हुआ. कमरे में एक ही चारपाई थी और उस पर वह सांड लेटा हुआ था. मुझे देख कर वह बड़ी फुरती से उठा, पर मैं ने उसे टक्कर मारने का मौका नहीं दिया. मैं ने पिस्तौल के दस्ते से वार कर के उस की गरदन का पुट्ठा तोड़ दिया. वह चकरा कर नीचे गिरा तो मैं ने उस के पेट पर कस कर घुटना मारा. उस ने हाथपैर ढीले छोड़ दिए. इस तरह सांड ने आसानी से हार मान ली.

मैं उसे थाने ले आया और 2 मजबूत बंदे उस की धुलाई पर लगा दिए. जब उस के सिर से गुंडागर्दी का भूत उतर गया तो मैं ने उस से सीधा सवाल किया, ‘‘तुम ने किस के कहने पर लाला चंदरमल को गायब किया है?’’

वह कानों को हाथ लगा कर बोला, ‘‘आप सच मानें यह काम मैं ने नहीं किया है, आप चाहे कसम उठवा लें.’’

मै ने कहा, ‘‘तुम नहीं जानते, मुझे सब पता है. भगवती लाला से दौलत में हिस्सा चाहती थी. उस ने प्रकाश को आगे कर दिया था कि ससुर से हिस्सा मांगे. जब लाला नहीं माना तो उस ने तुम से कहा कि लाला चंदरमल को गायब करवा दो. तुम्हें दौलत का लालच आ गया. तुम्हारा और भगवती का संबंध है, मुझे यह भी मालूम है, इसलिए तुम यह काम करने पर राजी हो गए.’’

मेरी बातें सुन कर गिरधारी सिर झुका कर बोला, ‘‘मेरा और भगवती का ताल्लुक है, यह बात सच है. मैं मानता हूं, पर लाला को मैं ने गायब नहीं किया. हां, मैं ने भगवती और प्रकाश को गायब हो जाने को जरूर कहा था, क्योंकि मुझे पता लग गया था कि आप उन दोनों पर शक कर रहे हैं और जल्द ही उन्हें पकड़वा लेंगे.

‘‘भगवती भी डर गई थी, इसलिए वे दोनों छिप गए. हम से गलती हो गई. गायब होने से आप का शक और बढ़ गया. अब मैं आप को बताता हूं, वह अपने पति के साथ अपने चाचा के घर छिपी है. मैं पता बताता हूं. मुझे पता है, मकरंदी ने आप को मेरे खिलाफ भड़काया है. उस की मुझ से दुश्मनी चल रही है. उसी के चलते उस ने आप को मेरे बारे बताया है.’’

‘‘तुम्हारी और मकरंदी की क्या दुश्मनी है और क्यों?’’

‘‘मैं कसम खा कर सच कह रहा हूं. इस कमीने मकरंदी ने एक दिन मुझ से कहा था कि चलो लाला को गायब कर देते हैं. उस के पास काफी दौलत है. काफी कुछ दे दिला कर वह हम से अपनी जान छुड़वाएगा. हमें अच्छाखासा पैसा भी मिल जाएगा. मैं नहीं माना, इसी पर हमारी कहासुनी हो गई.

‘‘इसी वजह से उस ने मुझे कुरबानी का बकरा बनाया. आप के मुखबिर की मुट्ठी गरम कर के मुखबिर के तौर पर आप तक पहुंचा. आप चाहें तो अपने मुखबिर से पूछ सकते हैं. उस ने खुद अपना नाम आप तक भिजवाया है, ताकि आप की नजर में मुझे मुजरिम बना सके. वह बड़ा शातिर और कमीना आदमी है, यह सब उसी की चाल है.’’

मैं ने अपने मुखबिर को बुला कर सख्ती से पूछा तो उस ने कबूल कर लिया कि मकरंदी ने ही पैसे दे कर अपना नाम मुखबिर की तौर पर बताने को कहा था. इस के बाद वह हाथ जोड़ कर माफी मांगने लगा. गिरधारी का बयान मुझे सच्चा लगा. एक बात और मैं ने नोट की थी कि मकरंदी गिरधारी के सामने आने से बचता था. मैं ने गिरधारी से कहा, ‘‘मैं तुम्हें अभी तो छोड़ रहा हूं, पर तुम रोज थाने आओगे. अगर नहीं आए या फरार हुए तो मैं तुम्हें ही मुजरिम समझ बंद करवा दूंगा.’’

वह हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘साहब, मैं ने सब सच कहा है. यह मकरंदी ही बदमाश है. उस ने ही लाला को उठाने की बात उस के शराबखाने के नौकर दीनानाथ के सामने कही थी. आप चाहें तो उस से भी पूछ लें, मैं बेकुसूर हूं.’’

गिरधारी के बयान के बाद मेरी अब तक की सारी तफतीश बेकार चली गई. अब मेरे सामने फिर वही सवाल खड़ा था कि लाला को किस ने गायब किया? मैं ने दूसरे दिन मकरंदी को थाने बुलाया और अपने हवलदार से कह दिया कि उसे बिठा कर पूछताछ करते रहो और मैं खुद मकरंदी के शराबखाने पहुंच गया. वहीं अड्डे पर मैं ने दीनानाथ को खूब धमकाया. उस से कहा कि एक चोर ने एक वारदात में उस का नाम लिया है. वह मुझे पहचानते ही डर गया, धमकी से भी घबराया. मैं ने कहा, ‘‘कल तुम थाने आओ, वहां कुछ पूछताछ करनी है, पर किसी को कुछ बताना नहीं. अगर किसी को कुछ पता चला तो मैं तुम्हें ही बंद कर दूंगा.’’

दूसरे दिन दीनानाथ मेरे पास थाने पहुंच गया. मैं ने उस से कहा, ‘‘मुझे लाला चंदरमल और मकरंदी के बारे में पूरी बात सचसच बताओ.’’

वह कहने लगा, ‘‘लाला शराब खूब पीता था और मकरंदी उस के पास शराब पहुंचाता था. इसलिए उन दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई थी. लाला पैसों के मामले में एकदम खरा था. उस का कारोबार बहुत अच्छा चलता था. वह अपने बेटों में पैसे बांटता था, बाकी की शराब पी कर बराबर कर देता था. उस की बीवी तो मर गई थी, घर में अकेला था, इसलिए कोई रोकटोक नहीं थी.’’

‘‘अच्छा यह बताओ कि क्या कभी मकरंदी ने तुम से कहा था कि लाला को गायब कर दें और उस से पैसे ऐंठ लें?’’ मैं ने पूछा.

‘‘यह बात पहले मुझ से नहीं, गिरधारी के साथ हुई थी साहब, मुझे याद है कि गिरधारी कुछ रकम का हिसाब करने मकरंदी के पास आया था. उस वक्त मैं भी अड्डे पर मौजूद था. गिरधारी ने मकरंदी से कहा था कि इस वक्त जरा हाथ तंग है, बाकी के पैसे कुछ दिनों बाद दे देगा, इस पर मकरंदी ने कहा कि किसी साहूकार से ले लो. गिरधारी  ने कहा, ‘साहूकार (लाला) तो तुम्हारा यार है.’

मकरंदी ने कहा था, ‘‘चलो गिरधारी, लाला को गायब कर देते हैं. अच्छीखासी रकम ले कर उसे छोड़ेंगे, काफी पैसा मिल जाएगा.’’

गिरधारी ने इनकार करते हुए कहा था, ‘‘मैं इस तरह के गंदे काम नहीं करता, न किसी जुर्म में शामिल होना चाहता हूं.’’

इस पर उन दोनों में कुछ कहासुनी भी हुई थी. फिर गिरधारी ने बाकी बचे पैसे 2 दिनों में तिवारी से भिजवा दिए थे. उसी दिन मकरंदी ने मुझ से कहा, ‘‘दीनानाथ, चलो अपन दोनों मिल कर लाला को गायब करते हैं. जो पैसे मिलेंगे, आपस में बांट लेंगे.’’

मैं ने साफ इनकार कर दिया. मैं शराब का धंधा करता हूं, बुरा आदमी हूं, पर किसी की जान जोखिम में नहीं डाल सकता. ऐसा काम नहीं करूंगा. दीनानाथ के इनकार के बाद मकरंदी ही बचता था, जिसे इस सवाल का जवाब देना था कि आखिर लाला कहां गया? गिरधारी और दीनानाथ दोनों ही मकरंदी की तरफ इशारा कर रहे थे. दोनों के बयान एक जैसे थे और सच्चे थे. अब मेरा शक मकरंदी की तरफ गया. मैं ने दीनानाथ को कहीं बाहर न जाने का पाबंद कर के जाने दिया.

दीनानाथ के बयान के बाद जब मकरंदी थाने आया तो मैं ने उसे कमरा बंद कर के बिठा लिया और सख्ती से कहा, ‘‘तुम ने काफी चक्कर दिए. लाला को तुम ने ही गायब किया है. अभी सच बता दो, नहीं तो मुश्किल में पड़ जाओगे.’’

वह एकदम से परेशान हो गया कि कल तक थानेदार उस के साथ था, आज एकदम से खिलाफ हो गया और उस पर शक कर रहा है. मुजरिम का घबराना तफतीश के लिए अच्छा रहता है. मैं उस पर दबाव बना सकता था. मैं ने उसे हवालात में डाल दिया. वह बड़ा ढीठ आदमी था. एक दिन तक तो साफ इनकार करता रहा. दूसरे दिन मैं ने दीनानाथ को बुलवा लिया. उसे मकरंदी के सामने बिठा कर पूछा. उस ने साफसाफ कह दिया कि मकरंदी ने गिरधारी से और उस से लाला को उठवाने की बात कही थी.

दीनानाथ पुलिस से छूटना चाहता था, इसलिए उस ने पूरा सच उगल दिया. सच सुन कर मकरंदी का चेहरा फक पड़ गया. मैं ने कहा, ‘‘मकरंदी भलाई इसी में है कि तुम सच्चाई कबूल कर लो, नहीं तो पुलिस की मार के आगे टिक नहीं सकोगे.’’

मकरंदी ने सिर झुका लिया. अब मेरे सामने बैठा, वह अपने जुर्म का इकरार कर रहा था, ‘‘दीनानाथ के इनकार करने के बाद मैं ने खुद यह काम करने का फैसला कर लिया. वह सोमवार का दिन था. मुझे पता था कि उस दिन वह जम कर पीता था. इसलिए उस के घर मैं ने जो शराब भिजवाई थी, वह बिना मिलावट की असली शराब थी. मैं चाहता था कि इस सोमवार को जब लाला शराब पिए तो ऐसा नशा चढ़े कि अपना होश खो बैठे.

‘‘मैं उस के घर चला गया. जब मैं वहां पहुंचा तो वह पूरे होशोहवास में घर से निकल रहा था. मुझे बड़ी हैरानी हुई. सोमवार के दिन लाला इतनी ठीक हालत में कैसे? मैं ने लाला से पूछा, ‘क्या बात है? जलपानी नहीं लिया क्या?’ इस पर वह कहने लगा, ‘आज मैं ने जलपानी नहीं लिया (वह शराब को जलपानी कहता था). मैं अभी दिवाली के लिए अपनी छोटी बहू के घर जा रहा हूं. मैं उन लोगों के सामने शराब पी कर नहीं जाता.’

‘‘लाला की इस बात ने मेरा सारा प्लान खतरे में डाल दिया. मैं ने लाला से कहा कि दिवाली की खुशी में मैं खुद उस के साथ जलपानी लेने आया हूं. एक गिलास से कोई फर्क नहीं पड़ेगा. पहले वह हिचकिचाया, ‘नहीं..नहीं..’ करने लगा. लेकिन मैं ने थोड़ा जोर डाला तो वह मान गया.

‘‘हम दोनों बातें करतेकरते अड्डे की तरफ चले. वहां मैं ने लाला को एक गिलास दिया. उस के बाद तो थोड़ा कहने पर वह पीता चला गया. उस के ढह जाने से पहले मैं उसे श्मशानघाट की तरफ ले कर चला गया. वहां एक जगह ऐसी है, जहां कुम्हार मिट्टी खोदते हैं. उस जगह बड़ेबड़े गड्ढे बन गए हैं.

‘‘उस के करीब एक सूखा कुंआ है. वहां बड़ी वीरानी थी. दूरदूर तक कोई नहीं था. मैं लाला को बातों में लगा कर वहां तक ले गया, फिर हम कुएं के पास आ गए. उस वक्त तक लाला नशे में धुत हो चुका था. उस के पांव सीधे नहीं पड़ रहे थे. वह बुरी तरह लड़खड़ा रहा था.

‘‘मैं ने उस की सदरी की जेब टटोली और चाबी निकाल कर संभाल कर रख ली. उस में एक तिजोरी की चाबी भी थी. फिर मैं ने लाला को कुएं में धकेल दिया. लाला की एक चीख सुनाई दी और अंदर से धप्प की आवाज आई. फिर सन्नाटा छा गया. कुछ देर मैं मुंडेर पर बैठा रहा और फिर वापस आ गया.’’

मकरंदी का बयान सुन कर मैं एकदम शौक्ड रह गया. एक बूढ़े भले आदमी को उस शराब बेचने वाले ने बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया था. वह आगे बोला, ‘‘वापसी के पहले मैं ने एक बार कुएं में झांक कर देखा, मुझे दूर नीचे एक गठरी सी दिखाई दी, वह लाला चंदरमल था. मैं वहां से सीधा लाला के घर गया, चाबियां मेरे पास थीं.

‘‘उस के घर का दरवाजा खोल कर मैं अंदर गया. घर में मैं ने सेफ तलाश ली. मैं ने उसे खोला उस में मुझे सोने की चंद इंटें और 10 हजार नकद मिल गए. मैं ने वह सब कुछ समेटा और ताला बंद कर के घर आ गया.

‘‘मैं ने घर में सारा सामान सुरक्षित रख दिया. फिर योजना बना कर आप को गिरधारी की राह पर लगा दिया, ताकि मुझ पर से शक हट जाए. लेकिन लगता है, लाला की रूह को चैन नहीं मिला, उस ने मुझे पकड़वा कर ही छोड़ा.’’

मकरंदी का बयान मैं ने मुंशी से लिखवाया. इस केस में आलाएकत्ल मिलने का कोई सवाल ही नहीं था. बस मुजरिम का इकबाली बयान था, जिस पर पूरा केस टिका था. मैं ने मकरंदी को हवालात में डाला और उस के घर खबर भिजवा दी. उस की बीवी और उस का एक भाई रोते हुए मेरे पास थाने आ पहुंचे. मैं ने उस के भाई को बता दिया कि उस ने कत्ल किया है. उसे मकरंदी से मिलवा भी दिया. उस की बीवी को यकीन ही नहीं हो रहा था कि उस का शौहर खून कर सकता है. अब लाश को बरामद करने का काम करना था.

फिर मैं अर्जुन के घर पहुंचा, दोनों तपाक से मिले. मैं ने उस के दूसरे दोनों भाइयों को भी बुलवा लिया. जब वे सब इकट्ठा हो गए तो मैं ने उन्हें सारी बात बता दी. उन्हें बातया कि लाला इस वक्त कहां है. वे सारे रोनेधोने लगे. सीता का तो रोरो कर बुरा हाल था. उस का ससुर जिस वक्त उस के घर आने को निकल रहा था, उसी वक्त उस का कत्ल हो गया था. मैं तीनों भाइयों और 3-4 सिपाहियों को ले कर कुएं पर पहुंचा. लाला के 2 बेटे अर्जुन और प्रकाश कुएं में नीचे उतरे. ऊपर से लटकाए गए रस्से में लाश बांध कर ऊपर लाई गई. लाश की खराब हालत देख कर अर्जुन और प्रकाश की तबीयत खराब होने लगी.

थाने आ कर मैं ने बरामदगी व तलाशी के कागजात बनाए. मकरंदी के घर से सोना व पैसा बरामद करवाया. चालान तैयार किया, फिर कागजी और अदालती कामकाज शुरू हो गया. इस केस में मकरंदी को उम्रकैद की सजा हुई, क्योंकि मौके का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था. अदालत की नजर में गिरधारी और दीनानाथ की गवाही संदेहास्पद थी.

इस पूरे केस को हल करने में छोटी बहू सीता की खास भूमिका थी, उसी के रोनेधोने पर रिपोर्ट दर्ज हुई थी और बाकायदा तफ्तीश की गई थी. Hindi Story

Social Crime Story: आशिकी ने लगाया गृहस्थी पर ग्रहण

Social Crime Story: सरस्वती को पता चला कि राजपाल का उस की भौजाई से याराना चल रहा है तो उस ने गांव के ही महेश से संबंध बना लिए. इस के बाद ऐसा क्या हुआ कि उसे पति का खून करना पड़ा. शादी के बाद उस की जिंदगी काफी खुशहाल थी. पति और सासससुर का उसे भरपूर प्यार मिलता था. नत्थू सिंह और जाविकी के 2 बेटे थे. बड़ा शिशुपाल और छोटा राजपाल. शादी के कुछ सालों बाद शिशुपाल और उस की पत्नी गुड्डो अपने बच्चों के साथ बगल वाले मकान में अलग रहने लगे थे. छोटे बेटे राजपाल की शादी के बाद जाविकी ने साफ कह दिया था कि बहूबेटा उन के साथ ही रहेंगे.

उत्तर प्रदेश के एटा जिले के गांव फरीदपुर के रहने वाले नत्थू सिंह के छोटे बेटे राजपाल का विवाह बदायूं जिले के गांव कलुआं ढेर निवासी प्रेमपाल की छोटी बेटी सरस्वती के साथ हुआ था. ससुराल में सरस्वती को पति का नहीं, सासससुर का भी खूब प्यार मिला. कालांतर में सरस्वती 3 बेटों, प्रदीप, पवन और मनीष की मां बनी. बेटों के जन्म के बाद ससुराल में सरस्वती का सम्मान और बढ़ गया. राजपाल एटा में नगरिया मोड़ पर स्थित दूध की डेयरी में काम करता था. उसे वहां से जो वेतन मिलता था, उस से परिवार का गुजारा आसानी से हो जाता था. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि इसी बीच एक दिन सरस्वती की भाभी रामस्नेही उस के यहां आई.

रामस्नेही उस के यहां रही तो 2-3 दिन ही, पर उतने ही दिनों में उस ने सरस्वती के गृहस्थ जीवन में आग लगा दी थी. उस की अपने ननदोई राजपाल से नजदीकियां बढ़ गई थीं, जिस की वजह से राजपाल का पत्नी सरस्वती से मन उचट गया था. उस की दिलचस्पी रामस्नेही में बढ़ गई थी. जल्दी ही सरस्वती को पति का प्यार दिखावा लगने लगा था. इस बारे में जब उस ने पति से पूछा तो वह पत्नी को समझाने के बजाय उस पर खीझ जाता था. पति का यह व्यवहार सरस्वती को जरा भी अच्छा नहीं लगता था. वह मन मसोस कर रह जाती थी.

गांव में राजपाल का एक दोस्त था महेश. उस का उस के यहां काफी आनाजाना था. महेश शादीशुदा था. उसे राजपाल और उस की पत्नी के बीच बढ़ रही दूरियों की जानकारी थी. इसी बात का वह फायदा उठाना चाहता था.

एक दिन महेश राजपाल की गैर मौजूदगी में उस के घर आया. सरस्वती ने उसे देख कर कहा, ‘‘वह तो ड्यूटी पर गए हैं.’’

‘‘जानता हूं भाभी, वह नहीं हैं तो क्या मैं आप से बातें नहीं कर सकता?’’

‘‘हां…हां, क्यों नहीं, आइए.’’ कहते हुए सरस्वती ने उसे घर में आने का इशारा किया.

महेश घर के अंदर आ कर चारपाई पर बैठ गया. उस ने सरस्वती का हालचाल पूछा तो उस ने कहा कि वह बिलकुल ठीक है. महेश ने मौके का फायदा उठाते हुए सरस्वती का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘भाभी, मैं जानता हूं आप कह जरूर रही हैं कि सब ठीक है, लेकिन कुछ भी ठीक नहीं हैं. आप अपने दिल पर हाथ रख कर कहिए कि राजपाल आप का दिल नहीं दुखा रहा है. सब कुछ सहते हुए भी आप के होंठों पर मुसकान है. भाभी, आप अपने मुंह से भले ही न कहें, लेकिन मैं आप का दुख समझता हूं.’’

महेश अपनी मीठीमीठी बातों से सरस्वती को पटाने की कोशिश करने लगा. सरस्वती काफी अवसाद में थी. ऐसी हालत में महेश उसे अपना सा दिखाई देने लगा. तभी महेश चारपाई से उठ कर चलते हुए बोला, ‘‘मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है भाभी कि राजपाल इतनी खूबसूरत बीवी की उपेक्षा क्यों कर रहा है?’’

इतना कह कर वह घर से निकल गया. महेश के जाने के बाद सरस्वती उस की बातों पर विचार करने लगी. उसे महेश की बातें बिलकुल ठीक लग रही थीं. उस का ध्यान महेश पर जम गया. अब उस का मन महेश के लिए बेचैन हो उठा. लेकिन इधर वह दिखाई नहीं दे रहा था. एक दिन दोपहर के समय महेश उस के यहां अचानक आ गया. उसे देखते ही वह खुश हो गई. मौका देख कर उस दिन महेश ने कह दिया कि वह उसे प्यार करता है.

सरस्वती कमजोर औरत थी, जरा सा सहारा मिलते ही वह महेश की बांहों में आ गिरी. वह यह भी भूल गई कि वह 3 बच्चों की मां है. उसे पता नहीं था कि पतन का रास्ता बड़ा ही फिसलन भरा होता है. एक बार जो इस पर कदम रख देता है, वह संभल नहीं पाता. सरस्वती के साथ भी यही हुआ. महेश के साथ नजदीकी बनने के बाद वह खुद को उस से अलग नहीं कर पाई. महेश ने जो चाहा था, वह उसे मिल चुका था, इसलिए उस का सरस्वती के यहां वक्तबेवक्त आनाजाना शुरू हो गया था. दोनों ने मिलनेजुलने में सावधानी तो खूब बरती, लेकिन मोहल्ले वालों की नजरों से नहीं बच सके. दोनों के बारे में लोग तरहतरह की बातें करने लगे.

बात राजपाल के कानों तक पहुंची तो उस ने पत्नी से पूछताछ की. पति की तरफ से सरस्वती का मन पहले से ही खट्टा था, इसलिए अपने बारे में कुछ कहने के बजाय उस ने पति को अपनी भाभी रामस्नेही के संबंधों को ले कर खरीखोटी सुना दी. मजबूरन राजपाल को अपना मुंह बंद करना पड़ा. राजपाल के बड़े भाई शिशुपाल का घर बिलकुल बगल में था. शिशुपाल की पत्नी गुड्डो ने जब उसे महेश और सरस्वती के संबंधों के बारे में बताया तो उस ने एक दिन राजपाल को अपने घर बुला कर कहा कि यह सब ठीक नहीं है. महेश का इस तरह सरस्वती से मेलजोल रखने का मतलब क्या है?

भाई की बात सुन कर राजपाल को लगा कि अब उस की मोहल्ले मे खासी बदनामी हो रही है. इस के बाद उस ने गुस्से में सरस्वती की पिटाई कर दी. पिटने के बाद भी सरस्वती कहती रही कि उस के महेश के साथ गलत संबंध नहीं है. लोग वैसे ही उसे बदनाम कर रहे हैं. लेकिन राजपाल को उस की बातों पर यकीन नहीं हुआ. वह अब पत्नी पर निगाह रखने लगा. महेश से संबंध बनने के बाद सरस्वती अपने सासससुर से अलग पति के साथ दूसरे मकान में रहने लगी थी. प्रेमी से मिलने के लिए उस ने एक दूसरा रास्ता निकाल लिया. वह रात के खाने में पति को नींद की गोलियां मिला कर खिला देती थी, जिस से जल्द ही वह गहरी नींद सो जाता था. इस के बाद प्रेमी महेश के साथ वह मौजमस्ती करती थी.

लेकिन एक दिन सरस्वती ने राजपाल को नींद की गोलियां खाने में खिलाईं तो उस के कुछ देर बाद उसे किसी वजह से उलटियां हो गईं, जिस से उस का खाया हुआ ज्यादातर खाना बाहर निकल गया. उलटियां कर के वह बिस्तर पर लेट गया. सरस्वती ने सोचा कि वह सो गया होगा, इसलिए रोज की तरह उस ने महेश को फोन कर दिया. बिना किसी डर के दोनों अपनी हसरतें पूरी करने लगे. उसी दौरान अचानक राजपाल की आंखें खुल गईं. उस के जागते ही महेश वहां से भाग गया. लेकिन राजपाल को पत्नी की हकीकत पता चल गई. उस दिन उस ने उस की खूब पिटाई की.

राजपाल को अब अपनी गृहस्थी बिखरती नजर आ रही थी. उस ने इस बारे में अपने भाई शिशुपाल से बात की. दोनों ने सलाह कर के इस मामले में पंचायत बुलाने का फैसला किया. पंचायत बुलाई गई. पंचायत में महेश के पिता इंदुपाल को भी बुलाया गया. पंचों ने इंदुपाल से साफ कह दिया कि वह महेश को समझा ले, वरना उस के परिवार का हुक्कापानी बंद कर दिया जाएगा.

घर वालों के दबाव में महेश ने सरस्वती से दूरी तो बना ली, लेकिन उस का दिल उस के लिए बेचैन रहता था. उधर सरस्वती की हालत भी बिन पानी मछली जैसी हो रही थी. इस बात ने सरस्वती के मन में पति के प्रति नफरत पैदा कर दी. पतिपत्नी के बीच दूरियां बढ़ती जा रही थीं. उसी बीच एक दिन राजपाल के पास रामस्नेही का फोन आया. उस ने कहा कि उस के पति नौबत सिंह की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई है.

राजपाल ने नौबत सिंह की बीमारी की बात सरस्वती को बताई और उसे ले कर कलुआं पहुंच गया. उस ने नौबत सिंह को अस्पताल में भरती करा दिया. लेकिन वह बच नहीं पाया. उस की मौत हो गई. नौबत सिंह की मौत के बाद रामस्नेही एकदम अकेली हो गई. नौबत सिंह रेलवे में नौकरी करता था. अब रामस्नेही राजपाल के सहयोग से मृतक आश्रित के तहत नौकरी पाने की कोशिश करने लगी.

सरस्वती तो कुछ दिनों बाद अपने घर आ गई, पर सलहज की नौकरी के सिलसिले में राजपाल का उस के यहां आनाजाना लगा रहा. सरस्वती मन ही मन बेचैन थी. वह महेश से मिलना चाहती थी, पर उसे एक बुरी खबर मिली कि महेश ट्रैक्टर के नीचे आ गया है, जिस से उस का पैर कट गया है. इस का सरस्वती को बड़ा दुख हुआ. इधर साले नौबत सिंह की मौत के बाद राजपाल सलहज की आर्थिक मदद भी करने लगा था. जब इस बात की जानकारी सरस्वती को हुई तो उस ने ऐसा करने से मना किया.

राजपाल ने उसे यह समझाने की कोशिश की कि रामस्नेही को जब नौकरी मिल जाएगी तो उस के सामने फिर कोई समस्या नहीं रहेगी. शक का एक कीड़ा सरस्वती के दिमाग में और बैठ गया. इसी बीच एक दिन रामस्नेही और उस के बच्चों को राजपाल अपने घर लिवा लाया. वह उस के यहां लगभग 15 दिनों तक रही. उस दौरान राजपाल रामस्नेही से खूब हंसीमजाक करता था. इस बात से सरस्वती को लगा कि उस का पति उस के हाथ से निकल गया है. रामस्नेही तो अपने घर चली गई, पर सरस्वती और राजपाल के रिश्तों में जो कड़वाहट पैदा हुई, वह खत्म नहीं हो सकी. आए दिन उन के बीच झगड़ा होने लगा. सरस्वती का गुस्सा बढ़ता जा रहा था. उसे अपना और अपने बच्चों का भविष्य खतरे में दिखाई देने लगा था.

उस के मन में डर पैदा हो रहा था कि यदि पति ने उसे छोड़ दिया तो वह बच्चों को ले कर कहां जाएगी. राजपाल की अपनी सलहज रामस्नेही से नजदीकी लगातार बढ़ती जा रही थी. अब वह कईकई दिनों तक घर नहीं आता था. वह रामस्नेही के पास चला जाता. सरस्वती जब कभी पूछती तो कह देता कि डेयरी पर ज्यादा काम होने की वजह से वह वहीं रुक गया था. सरस्वती जानती थी कि वह झूठ बोलता है. गुस्से में एक दिन सरस्वती ने अपनी भाभी रामस्नेही को खूब खरीखोटी सुनाई, तब रामस्नेही ने उसे अपने दिल की बात बताते हुए कहा कि वह राजपाल से दूर नहीं रह सकती और वे दोनों साथ रह सकती हैं. सरस्वती आगबबूला होते हुए बोली, ‘‘भाभी, तुम जो कर रही हो, ठीक नहीं है. देखना एक दिन तुम्हें इस का अंजाम भुगतना पड़ेगा.’’

इधर रामस्नेही के भाई को जब बहन की हरकतों की जानकारी हुई तो उस ने भी रामस्नेही को समझाया और कहा कि वह जो कर रही है, उस से समाज में उस की अच्छीखासी बदनामी हो रही है. यह सब ठीक नहीं है. रामस्नेही ने भाई से भी कह दिया कि मरते वक्त उस के पति ने उस का और बच्चों का भार राजपाल पर डाल दिया था. इसलिए अब वह उन के साथ ही रहेगी. बहन के इस जवाब से भाई नाराज हो गया, लेकिन रामस्नेही ने इस की कोई परवाह नहीं की.

अब रामस्नेही और राजपाल ने साथसाथ रहने का फैसला कर लिया. उन्हें समाज की कोई परवाह नहीं थी. रामस्नेही को मर्द की जरूरत थी, वह जरूरत उस के ननदोई राजपाल से पूरी हो रही थी. लोग उस के बारे में क्या कह रहे हैं, इस की उसे कोई परवाह नहीं थी. सरस्वती को इस बात का डर था कि कहीं किसी दिन राजपाल रामस्नेही को ले कर घर न आ जाए. यदि उस ने ऐसा किया तो उसे बाहर का रास्ता दिखा देगा. एक दिन वह अपनी जेठानी गुड्डो के पास जा कर अपनी व्यथा बता कर कहने लगी कि वह राजपाल को समझाए. वह भाभी को अपनी सौत के रूप में स्वीकार नहीं करेगी.

देवरानी की समस्या बड़ी जटिल थी. इसलिए उस ने अपने हिसाब से राजपाल को समझाया, लेकिन राजपाल पर तो इश्क का भूत सवार था. उस ने भाभी की सलाह को एक कान से सुना, दूसरे से निकाल दिया. राजपाल पिछले 15 दिनों से घर नहीं आया था. अचानक 16 अगस्त, 2015 की शाम को आ गया. सरस्वती पहले से ही गुस्से से भरी हुई थी. वह समझ गई कि सौतन के घर से ही आया होगा. वह तुनक कर बोली, ‘‘तुम आ गए?’’

‘‘हां, बहुत काम होता है डेयरी में. आज जा कर फुरसत मिली है.’’ राजपाल ने जवाब दिया.

‘‘मैं अच्छी तरह से जानती हूं कि आजकल तुम कौन सा काम कर रहे हो.’’

‘‘तुम्हें तो जलीकटी सुनाने की आदत हो गई है. अच्छा अब जोरों की भूख लगी है, खाना ले आओ.’’ कह कर राजपाल चारपाई पर बैठ गया. सरस्वती ने एक नजर बच्चों पर डाली. वे डरेसहमे एक तरफ बैठे थे. राजपाल ने एक बार भी उन्हें नहीं देखा. उस का दिल जल गया, उस ने खाने की थाली राजपाल की ओर बढ़ाई और उसी क्षण तय कर लिया कि अब वह और नहीं सहेगी.

राजपाल खापी कर निश्चिंत हो कर चारपाई पर लेट गया. उस की यह निश्चिंतता सरस्वती को अखर गई. बच्चों को खाना खिलाने के बाद उस ने रसोई की सफाई की. इस के बाद वह बच्चों को ले कर ऊपर छत पर चली गई. देर रात को वह उठी और धीरे से नीचे आ गई. राजपाल नीचे चारपाई पर सो रहा था. वह अलमारी के पास गई और धड़कते दिल से दरवाजा खोल कर तमंचा व कारतूस निकाल लाई. तमंचे में कारतूस भरा और राजपाल की चारपाई के पास पहुंच गई. इस से पहले कि उस का इरादा बदल जाता, उस ने तमंचा राजपाल की कनपटी से सटा कर फायर कर दिया. यह 16/17 अगस्त की रात की बात थी.

राजपाल को चीखने का भी मौका नहीं मिला. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई. सरस्वती ने कुछ देर बाद मुख्य दरवाजा खोला. बाहर अभी भी सन्नाटा पसरा था. वह तेजी से खेत की ओर बढ़ी, अपने खेत में पहुंच कर उस ने गड्ढा खोदा और उसी में तमंचा दबा दिया. वापस लौट कर उस ने मृत पति पर घृणा भरी नजर डाली और ऊपर जा कर लेट गई. वह सोचने लगी कि अब आगे क्या करना है? सुबह 6 बजे के करीब उठ कर वह अपनी जेठानी के यहां गई और उस से कहा कि राजपाल खून की उलटी कर रहा है. जेठजेठानी घबरा कर उस के यहां आए तो देखा कि राजपाल चारपाई पर लहूलुहान पड़ा था. शिशुपाल ने घूर कर सरस्वती से पूछा, ‘‘किस ने मारी इसे गोली?’’

‘‘मैं क्या जानूं, मैं तो ऊपर सो रही थी.’’ सरस्वती बोली.

शिशुपाल ने उस समय ज्यादा कुछ  कहना उचित नहीं समझा. उस ने पड़ोसियों को इकट्ठा किया और पुलिस को फोन कर दिया. थाना मारघा के थानाप्रभारी घनश्याम सिंह सूचना मिलते ही मयफोर्स के वहां आ गए. उन्होंने राजपाल के शव को देखा, गोली उस की कनपटी पर लगी थी. थानाप्रभारी ने लोगों से पूछताछ की तो लोगों ने बताया कि राजपाल की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. तभी उन की निगाह सरस्वती की ओर गई, जो चारपाई की पाटी पर सिर रख कर रो रही थी. उन्होंने हैरानी से उसे देखा, फिर पूछा, ‘‘रात में तुम कहां थीं? क्या तुम्हें फायरिंग की भी आवाज नहीं सुनाई दी?’’

‘‘साहब, मैं तो सो रही थी. मैं ने कोई आवाज नहीं सुनी. सुबह उठी तो खून देख कर डर गई और अपनी जेठानी को जा कर बताया.’’ उस ने रोते हुए कहा.

सरस्वती की बौडी लैंग्वेज देख कर थानाप्रभारी को उस पर शक हो गया. खैर, उन्होंने घटनास्थल की काररवाई निपटाने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और हत्या कर मामला दर्ज कर के केस की जांच शुरू कर दी. जांच में उन्हें पता चला कि राजपाल और उस की सलहज रामस्नेही के बीच नाजायज संबंध थे. उन्हें लगा, कहीं यह हत्या इन्हीं संबंधों की वजह से तो नहीं हुई. उन्होंने रामस्नेही से पूछताछ की. उस ने कहा कि यह सब सरस्वती ने किया होगा. इस के बाद थानाप्रभारी ने सरस्वती को थाने बुला कर पूछताछ की. थोड़ी सख्ती के बाद सरस्वती ने सचाई उगल दी. उस ने हत्या का जुर्म स्वीकारते हुए सारी कहानी पुलिस को बता दी.

सरस्वती द्वारा पति की हत्या का गुनाह कबूल कर लेने के बाद पुलिस ने राहत की सांस ली. अब सरस्वती जेल में है. उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त तमंचा पुलिस ने बरामद कर लिया है. Social Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

True Crime Story: धोखे की नाव पर सवार – अपनों ने ही ली जान

—श्वेता पांडेय

True Crime Story: गंगाराम अपनी मां दुलारीबाई से किसी भटियारिन की तरह हाथ नचाता हुआ गुस्से से बोला, ‘‘मैं ने तुम्हें कितनी बार बोला है कि मुझे निकासी के लिए रास्ता दो. मुझे लंबा चक्कर काट कर घर तक पहुंचना पड़ता है. उस समय तो और परेशानी बढ़ जाती है जब खेतों से फसल बैलगाड़ी में लाद कर लाते हैं.

‘‘आखिर मेरी बात तुम कब समझोगी. हर साल इसी बात का रोना होता है. सवा महीने बाकी हैं, फसल तैयार हो चुकी है. मुझे निकासी के लिए रास्ता चाहिए. और उस 2 एकड़ खेत में से हिस्सा भी चाहिए. मैं भी परिवार वाला हूं.’’

‘‘अच्छा. अभी तो मांबाप को पूछता नहीं है और जिस दिन जमीन से हिस्सा मिल गया, मांबाप मानने से भी इनकार कर देगा. गंगाराम, मैं ने दुनिया देखी है. बंटवारा हुआ नहीं कि मांबाप के हाथ में कटोरा थमा दोगे. बुढ़ौती में भीख मांगनी पड़ जाएगी.

दोनों मांबेटे में इसी तरह काफी देर तक झगड़ा चलता रहा. उसी समय गंगाराम के पिता बालाराम खेत से घर लौटे. दुलारी ने बेटे की शिकायत अपने पति से की, ‘‘लो, संभालो अपने बेटे को, जो जी में आता है बोलता ही चला जाता है.’’

गंगाराम अपने पिता से बोला, ‘‘बाबूजी, मां को समझाओ और संभालो नहीं तो किसी दिन मेरा मूड खराब हो गया तो इसे गंडासे से काट कर नदी में.’’

बालाराम ने बीच में हस्तक्षेप किया, ‘‘बहुत बोल चुका,’’ उन्होंने अपनी पत्नी दुलारी का पक्ष लिया, ‘‘अब अगर तू अपनी मां को एक भी शब्द बोला तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

इस झगड़े के बीच गंगाराम की पत्नी निर्मला पति का हाथ पकड़ कर बाहर लाने लगी. गंगाराम ने निर्मला का हाथ झटक दिया, ‘‘आज मैं बुड्ढे बुढि़या को छोड़ूंगा नहीं.’’

कहता हुआ गंगाराम अपने पिता बालाराम से जा भिड़ा. बापबेटे को एकदूसरे से हाथपाई करते देख गांव के लोग जमा हो गए.

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गांव वालों ने बापबेटे को बड़ी मुश्किल से एकदूसरे से अलग किया. गंगाराम लोगों की बांहों में जकड़ा हुआ कसमसा रहा था. साथ ही गुस्से से चीखता रहा.

दोनों एकदूसरे के कट्टर विरोधी हो गए. कोढ़ में खाज यह हुआ कि इसी बीच निर्मला बीमार रहने लगी. इस के लिए निर्मला अपनी सास दुलारीबाई को जिम्मेदार ठहराने लगी. वह सास पर यह आरोप लगाती कि उस ने उस के ऊपर कोई टोनाटोटका करा दिया है. गंगाराम ने कई ओझागुनिया को पत्नी को दिखाया. मर्ज यह था कि निर्मला के सिर में दर्द बना रहता था और शाम को बुखार चढ़ने लगता था.

झाड़फूंक से कोई सुधार न हुआ तो वह डाक्टर के पास गया. टेस्ट करवाने पर पता चला कि निर्मला को टायफायड है. एलोपैथी दवा भी चली और झाड़फूंक भी. पता नहीं किस ने असर दिखाया, निर्मला धीरेधीरे ठीक होने लगी. गंगाराम और उस की पत्नी निर्मला के दिमाग में यह बात घर कर गई थी कि उस की सास दुलारीबाई किसी तांत्रिक ओझा से मिल कर उन्हें बरबाद करने पर तुली है.

इस बात पर गंगाराम की सोच भी निर्मला की सोच से अलग नहीं थी. निर्मला जब पूरी तरह से ठीक हो गई और उस के शरीर में जान आ गई तब वह अपनी सास पर इलजाम लगाने लगी. एक बार फिर दोनों पक्षों में तकरार और झिकझिक होने लगी. वह एकदूसरे के लिए गलत भावनाएं रखने लगे. फिर वही समय आया, नवंबर दिसंबर का. फसल तैयार हो कर खेत से कोठरी में जाने को तैयार थी.

मुद्दा फिर वही उठा कि बैलगाड़ी में रखे अनाज को दूसरे रास्ते से लाना होगा. बालाराम और दुलारी किसी भी तरह से इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि निकासी के लिए बाड़ी से जगह दी जाए. हर साल फसल तैयार होने के बाद यही सवाल खड़ा हो जाया करता था. कई सालों से यह निकासी का मसला न तो सुलझ रहा था और न ही दूरदूर तक कोई समाधान ही दिखाई दे रहा था. आज भी इसी विवाद को ले कर गंगाराम और निर्मला दोनों का मन खिन्न था. खाना खाने के बाद दोनों पतिपत्नी टीवी देखने लगे.

टीवी पर वह क्राइम स्टोरी पर आधारित सीरियल देख रहे थे. उस सीरियल की कहानी उन की जिंदगी से जुड़ी जैसी थी. दोनों ने बड़े ध्यान से खामोशी के साथ वह सीरियल देखा. सीरियल खत्म होने के बाद दोनों ने उस पर चर्चा की. गंगाराम और उस की पत्नी को इस बात की चिंता हो रही थी कि कहीं ऐसा न हो कि मांबाप पूरी जमीन छोटे भाई रोहित के नाम कर जाएं. वैसे भी छोटा होने के नाते वह मांबाप का चहेता था.

इस सोच ने निर्मला और गंगाराम को परेशान कर डाला. जब इंसान को कोई चीज मिलने की संभावना दिखाई न देती है, तब वह उसे किसी दूसरे ही तरीके से हासिल करने की कोशिश में लग जाता है. इन दोनों ने भी एक योजना बना ली. गंगाराम और निर्मला ने एक योजना के तहत अपने व्यवहार में थोड़ाबहुत बदलाव किया. अपने पिता बालाराम और मां दुलारीबाई से सहजता से पेश आने लगे. बालाराम और दुलारी को आश्चर्य हुआ कि हमेशा कड़वे बोल बोलने वालों की जुबान में शहद कैसे घुल गया.

इस के बाद उन दोनों ने विचारविमर्श किया कि अपनी योजना में किसे शामिल किया जाए, जिस से उन की योजना सफल हो जाए. नजर और दिमाग के घोड़े दौड़ाने के बाद गंगाराम ने धुधवा गांव के ही नरेश सोनकर, योगेश सोनकर और कोपेडीह निवासी रोहित सोनकर से जिक्र किया.

पैसों के लालच में तीनों ही उन की योजना में शामिल हो गए. तीनों ने योजना बना कर वारदात को अंजाम देने के लिए 21 दिसंबर, 2020 का दिन तय किया. योजना के अनुसार, चारों लोग खेत पर पहुंच गए. वहां बालाराम और उस का छोटा बेटा रोहित तड़के में खेतों पर पानी लगा रहे थे. उन्होंने उन दोनों को दबोच लिया और सीमेंट की बनी पानी की हौदी में डुबो कर दोनों को मार दिया.

अगला निशाना अब दुलारीबाई और उस की बहू कीर्तिनबाई रही. चारों दबेपांव वहां पहुंचे, जहां वे सब्जियों का गट्ठर तैयार करने में व्यस्त थीं. शिकारी की तरह दबेपांव वे उन के करीब पहुंचे और कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ वार कर उन दोनों की जिंदगी भी खत्म कर दी. इतना सब कुछ करने के बाद उन लोगों ने चैन की सांस ली. यहां यह बताते चलें कि निर्मला उन चारों को ऐसा करते हुए दरवाजे की ओट से देख रही थी. काम को अंजाम देने के बाद गंगाराम ने तीनों साथियों को वहां से रवाना कर दिया.

निर्मला और गंगाराम दोनों ने मिल कर कुल्हाड़ी को बाड़ी में ही दबा दिया. सुबह के 5 बजतेबजते पूरे खुरमुड़ा गांव में इस दहला देने वाली हत्या की चर्चा होने लगी. अम्लेश्वर थाने में संजू सोनकर निवासी खुरमुड़ा की रिपोर्ट पर अमलेश्वर थानाप्रभारी वीरेंद्र श्रीवास्तव ने इस नृशंस हत्याकांड की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दी.

जांचपड़ताल के लिए फोरैंसिक टीम घटनास्थल पर पहुंच गई. आईजी विवेकानंद सिन्हा के सुपरविजन में जांच होती रही. पुलिस को किसी तरह का कोई सूत्र नहीं मिल रहा था जिस से जांच आगे बढ़ती. डौग स्क्वायड टीम घटनास्थल पर पहुंच चुकी थी. मृतकों के शव के समीप ले जा कर कुत्ते को छोड़ दिया गया. खोजी कुत्ता गोलगोल चक्कर लगाता हुआ मृतकों को सूंघ कर खेत की ओर कुछ दूर तक गया.

मौके की जांच से इतना तो स्पष्ट था कि हत्यारे 2-3 से कम नहीं थे. खेत में रासायनिक छिड़काव कर दिया गया था, जिस के कारण खोजी कुत्ते को सही दिशा नहीं मिल पा रही थी. बहरहाल, पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. जब पुलिस को किसी तरह का सूत्र नहीं मिला तो पुलिस ने गंगाराम के साढ़ू नरेश सोनकर को विश्वास में ले कर मुखबिरी का जिम्मा सौंपा.

नरेश मंझा हुआ खिलाड़ी था. उस ने पुलिस को मुखबिरी करने के बहाने उलझाए रखा. जांच के लिए आईजी विवेकानंद सिन्हा ने कुछ बिंदु तय किए. उन बिंदुओं को आधार बना कर पुलिस जांच में जुटी रही. इस सामूहिक हत्याकांड को हुए 3 महीने बीत चुके थे. लेकिन अपराधियों का कोई अतापता नहीं था. थानाप्रभारी वीरेंद्र श्रीवास्तव ने अपने एक मुखबिर को नरेश के पीछे लगा दिया. नरेश की एक्टिविटी पुलिस को शुरू से ही संदेहास्पद लगी थी.

फोरैंसिक विशेषज्ञों की टीम के सहयोग से भौतिक साक्ष्य जुटाया गया. टीम ने वैज्ञानिक एवं तकनीकी साक्ष्य को आधार बना कर बारीकी से पूछताछ कर जानकारी इकट्ठी की. पुलिस ने संदेहियों को हिरासत में ले कर सघन पूछताछ की. इस घटना का मास्टरमाइंड बालाराम का अपना सगा बड़ा बेटा गंगाराम निकला. गंगाराम की स्वीकारोक्ति के बाद योगेश सोनकर, नरेश सोनकर, रोहित सोनकर उर्फ रोहित मौसा को गिरफ्तार कर लिया गया. सभी को घटनास्थल पर ले जा सीन रीक्रिएशन कराया गया.

आरोपियों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त कुल्हाड़ी पुलिस ने बालाराम की बाड़ी से बरामद कर ली. घटना के वक्त पहने गए कपड़ों को इन चारों ने ठिकाने लगा दिया था. 18 मार्च, 2021 को आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिस में निर्मला भी शामिल थी. इन चारों आरोपियों का नारको टेस्ट भी कराया गया.

आईजी विवेकानंद सिन्हा ने अमलेश्वर थाना स्टाफ की पीठ थपथपाई. पुलिस ने सभी आरोपियों गंगाराम, उस की पत्नी निर्मला, योगेश सोनकर, नरेश सोनकर और रोहित सोनकर को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. True Crime Story

True Crime Story: बदनामी का दाग

True Crime Story: शादी के बाद भी सरोज अपने प्रेमी सूरज को भुला नहीं पाई थी. फिर एक दिन वह मायके में आई तो प्रेमी के साथ भाग गई. बदनामी के इस दाग को धोने के लिए सरोज की ससुराल और मायके वालों ने ऐसी खौफनाक साजिश को अंजाम दिया कि…

उ त्तर प्रदेश के लखनऊ-हरदोई मार्ग पर थाना कस्बा मलिहाबाद बसा है, जो आमों के लिए भी मशहूर है. इसी थाने के गांव वंशीगढ़ी से थोड़ा आगे निकलते ही जंगल शुरू हो जाता है. 26 जुलाई की सुबह गांव के कुछ लोग जानवरों को चराने इसी जंगल में गए तो उन्हें वहां एक लड़के और एक लड़की की लाश पड़ी दिखाई दी. उन्होंने यह बात गांव के चौकीदार निहाल पासी को बताई तो उस ने यह सूचना थाना मलिहाबाद पुलिस को दे दी.

लाशें पड़ी होने की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी सुधाकर पांडेय, एसएसआई अमरनाथ और कुछ सिपाहियों को साथ ले कर बंशीगढ़ी के जंगल पहुंच गए. जंगल में काफी अंदर एक जवान लड़के और लड़की की क्षतविक्षत लाश पड़ी थी. सबूत की तलाश में सुधाकर पांडेय ने आसपास की झाडि़यों में ताकझांक की तो उन्हें एक हैंडबैग मिला. उस की तलाशी ली गई तो उस में लड़की के कुछ कपड़े और एक पहचानपत्र मिला.

वह पहचानपत्र मृतक युवक का था. उस के अनुसार मृतक सूरज धानुक था, जो थाना मलिहाबाद के गांव सिरगामऊ का रहने वाला था. घर वालों से उस की पहचान हो सकती थी. इसलिए सुधाकर पांडेय ने लाशों की फोटोग्राफी करा कर मृतकों का सामान कब्जे में ले लिया और लाशों को पोस्टमार्टम के लिए लखनऊ भिजवा दिया. थाने लौट कर थानाप्रभारी ने चौकीदार निहाल की ओर से अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी.

सुधाकर पांडेय ने पहचानपत्र से मिले पते पर एक सिपाही को भेजा तो वहां उस की मां गुडि़या मिली. जब उस से सूरज की हत्या के बारे में बताया गया तो वह अपने देवर के बेटे के साथ रोते हुए थाना मलिहाबाद पहुंची. गुडि़या ने लाशों के फोटो देखने के बाद रोते हुए बताया कि सूरज के साथ जिस युवती की लाश मिली है, वह लड़की सरोज है. दोनों एकदूसरे को बहुत प्यार करते थे. कुछ दिनों पहले सूरज सरोज को उस की ससुराल से ले कर भाग गया था, जिस की वजह से सरोज की ससुराल तथा मायके वाले काफी नाराज थे. 18 जुलाई को सरोज के पति मंजेश ने हरदोई के थाना संडीला में सूरज और उस के दोस्त धर्मेंद्र के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी. उसे पूरा यकीन है कि दोनों की हत्या उन्हीं लोगों ने की है.

गुडि़या के बताए अनुसार, मृतका का नाम सरोज था. वह उसी के गांव के रहने वाले रामऔतार पाल की बेटी थी, जो हरदोई के थाना संडीला के गांव ककराली के रहने वाले मंजेश के साथ ब्याही थी. गुडि़या ने यह भी बताया कि थाना संडीला में सरोज को भगाने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी. उन्होंने पता किया तो सचमुच वहां रिपोर्ट दर्ज थी. उन्होंने इस मामले को वहां ट्रांसफर करने की कोशिश शुरू कर दी. लेकिन अधिकारियों के आदेश के बाद मुकदमा ट्रांसफर नहीं हो सका.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, सूरज और सरोज की मौत बेरहमी से मारपीट और गला घोंटने से हुई थी. पोस्टमार्टम के बाद लाशें सौंपने की बात आई तो सूरज के घर वाले तो उस की लाश ले गए, लेकिन सरोज की लाश लेने न तो उस की ससुराल से कोई आया और न ही मायके से. काफी देर बाद उस की मां और बहनें आईं तो पुलिस ने सरोज की लाश उन के हवाले कर दी. पुरुषों के न आने से पुलिस को संदेह हुआ. सुधाकर पांडेय सरोज के पति मंजेश की तलाश में उस के घर पहुंचे तो मंजेश ही नहीं, घर के अन्य पुरुष भी गायब थे. इस से पुलिस को विश्वास हो गया कि दोनों हत्याएं इन्हीं लोगों ने की होंगी.

मंजेश की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने उस के सभी रिश्तेदारों के घर छापा मारा, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. पुलिस ने मंजेश के नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि सरोज जब ससुराल से भागी थी, तभी से मंजेश अपने दोनों सालों दिनेश उर्फ तिवारी और शिवकुमार के संपर्क में था. इस के बाद सुधाकर पांडेय सिरगामऊ स्थित सरोज के मायके पहुंचे तो उस के भाई दिनेश और शिवकुमार भी घर से गायब मिले.

5 अगस्त को सुधाकर पांडेय ने मुखबिर की सूचना पर दिनेश और शिवकुमार को उन के घरों से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर की गई पूछताछ में दिनेश और शिवकुमार ने अपना जुर्म कबूल करते हुए इस सनसनीखेज दोहरे हत्याकांड के बारे में पुलिस के सामने जो बयान दिया, उस में औनर किलिंग की एक खौफनाक कहानी सामने आई, जो इस प्रकार थी. लखनऊ की थानाकोतवाली मलिहाबाद का एक गांव है सिरगामऊ. इसी गांव में शुकुल धानुक  अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी गुडि़या, 2 बेटे सूरज, रोहित और 2 बेटियां थीं. शुकुल धानुक खेतीबाड़ी कर के गुजारा करता था. घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, जिस की वजह से वह बच्चों को पढ़ालिखा नहीं सका.

22 साल का सूरज खेती करने के साथसाथ आम के बागों की देखभाल करता था. बेटियां और दूसरा बेटा अभी छोटे थे. इसी गांव में रामऔतार भी परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी रूपमती, 3 बेटियां तथा 2 बेटे दिनेश और शिवकुमार थे. रामऔतार लखनऊ में सिक्यूरिटी गार्ड की नौकरी करता था. बड़ा बेटा दिनेश एक स्कूल की बस चलाता था. गांव में थोड़ीबहुत जमीन थी, जिस से खानेपीने भर का अनाज पैदा हो जाता था. इस तरह परिवार का गुजारा आराम से हो रहा था. रामऔतार और शुकुल धानुक के घर अगलबगल थे. लेकिन अलगअलग जाति के होने की वजह से दोनों परिवारों में ज्यादा मेलजोल नहीं था. हां, उन के बच्चे जातिपांत को न मानते हुए आपस में मेलजोल रखते थे.

सूरज और रामऔतार की तीसरे नंबर की बेटी सरोज हमउम्र थे, इसलिए बचपन से साथसाथ खेल कर बड़े हुए थे. सूरज को सरोज बहुत अच्छी लगती थी. जब भी वह सरोज को देखता, उस की आंखों में अनोखी चमक आ जाती. इसलिए वह उसे हमेशा देखते रहना चाहता था. सरोज ने भी इस बात को महसूस किया तो उस के मन में भी सूरज के लिए कोमल भावनाएं अंगड़ाई लेने लगीं. इस का परिणाम यह निकला कि दोनों एकदूसरे को चाहने लगे.

सरोज उर्फ बउवा गोरे रंग की खूबसूरत लड़की थी. शोख, चंचल और मिलनसार स्वभाव की होने की वजह से सभी उसे प्यार करते थे. सूरज का घर बगल में ही था, इसलिए वह जैसे ही घर से बाहर निकलता, सरोज को पता चल जाता. इस के बाद किसी बहाने से वह सूरज से मिलने बागों की ओर निकल जाती, जहां दोनों घंटों अकेले में बैठ कर प्यार की मीठीमीठी बातें करते और एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें खाते. लेकिन जब शादी की बात आई तो सूरज ने कहा कि वह छोटी जाति का है, इसलिए उस के घर वाले इस शादी के लिए कभी तैयार नहीं होंगे.

इस बात से सरोज उदास हो गई. उसे उदास देख कर सूरज ने कहा कि वह उस के बिना जीने की बात सोच नहीं सकता, इसलिए गांव से भाग कर कहीं दूर चले जाएंगे, जहां उन के घर वाले उन्हें खोज नहीं पाएंगे. इस के बाद कुछ पैसे ले कर दोनों भाग गए. शाम को जब सरोज के घर से भाग जाने का पता चला तो बदनामी के डर से रामऔतार बेटों के साथ चोरीछिपे उस के बारे में पता लगाने लगा. उस ने थाने में सूरज के खिलाफ रिपोर्ट भी नहीं दर्ज कराई. उस के घर जा कर धमकी जरूर दे आए कि अगर सूरज ने सरोज को जल्दी घर ला कर नहीं छोड़ा तो इस का परिणाम बहुत भयानक होगा.

शुकुल धानुक और गुडि़या वैसे भी सीधेसादे स्वभाव के थे, उन्होंने इस मामले में चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी. दूसरी ओर जीनेमरने की योजना बना कर भागे सूरज और सरोज के पास जब तक पैसे रहे, तब तक पतिपत्नी के रूप में अपनी ही दुनिया में डूबे रहे. लेकिन जब पैसे खत्म हो गए तो आटेदाल के भाव का पता चला. सूरज ने कामधंधे की बहुत तलाश की, लेकिन जहां भी काम मिलता, वेतन इतना कम होता कि दोनों का गुजारा होना मुश्किल था. जब उन के भूखों मरने की नौबत आ गई तो घर लौटने के अलावा उन के पास कोई उपाय नहीं बचा. आखिर हिम्मत कर के दोनों घर लौट आए. उन का सोचना था कि वे घर वालों से कह कर शादी कर लेंगे.

सरोज के लौटने पर पहले तो घर वालों ने उसे जी भर कर कोसा, उस के बाद उस के लिए लड़के की तलाश करने लगे. इसी के साथ उस के घर से बाहर निकलने पर सख्त पाबंदी लगा दी गई. सरोज समझ गई कि अब सूरज के साथ जिंदगी बिताने का उस का सपना सपना ही बन कर रह जाएगा, क्योंकि उस के घर वाले किसी भी हालत में उस की शादी सूरज के साथ नहीं करेंगे. काफी दौड़धूप के बाद रामऔतार को पड़ोस के गांव ककराली में मिश्रीलाल का बेटा मंजेश सरोज के लिए पसंद आ गया. इस के बाद मंजेश से उस की शादी हो गई. यह सन 2012 की बात है.

शादी के बाद सरोज ससुराल चली गई. मंजेश सरोज जैसी सुंदर पत्नी पा कर बेहद खुश था. यही वजह थी कि वह पत्नी की हर इच्छा का खयाल रखता था. इस के बावजूद सरोज सूरज को भुला नहीं पाई. वह जब भी अकेली होती, सूरज को याद कर के आंसू बहाती रहती. धीरेधीरे ढाई साल गुजर गए. इस बीच वह मंजेश के बेटे की मां बन गई. सूरज भी सरोज को नहीं भुला सका था. दिनरात सरोज उस के खयालों में छाई रहती. शायद वह अपनी जिंदगी सरोज की यादों में काटना चाहता था. इसीलिए अभी तक उस ने शादी नहीं की थी. उसी बीच उस के पिता की मौत हो गई तो परिवार चलाने की सारी जिम्मेदारी उसी पर आ गई.

एक दिन वह बागों से लौटा तो पता चला कि सरोज मायके आई है. उस ने मन ही मन ठान लिया कि चाहे जो भी हो, वह सरोज से जरूर मिलेगा और उस के दिल का हाल पूछेगा. अब तक सरोज के घर वालों को लगने लगा था कि सरोज सूरज को भूल चुकी होगी, इसलिए उन्होंने उसे गांव में किसी के घर आनेजाने की छूट दे दी होगी. सूरज मौके की तलाश में रहने लगा. एक दिन दोनों मिले तो एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए. सरोज ने सूरज का नंबर सहेली के नाम से सेव कर लिया. इस बीच दोनों सब की नजरें बचा कर कई बार मिले. इन मुलाकातों में जब सरोज ने बताया कि वह इस शादी से जरा भी खुश नहीं है तो सूरज चौंका. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि सरोज अब भी उसे अपने दिल में बसाए है. उसे लगता था कि सरोज उसे भुला कर अपने परिवार में रम गई होगी.

सूरज ने पूछा, ‘‘क्या तुम अब भी मेरे साथ जिंदगी गुजारने को तैयार हो.’’

‘‘हां, मैं तुम्हारे लिए अपना बसा-बसाया घर छोड़ने को लिए तैयार हूं.’’

इस के बाद दोनों ने खूब सोचविचार कर योजना बना डाली. मायके से सरोज का भागना ठीक नहीं था. वैसे भी उस के घर वाले ज्यादा देर तक बाहर रहने पर चौकन्ने हो जाते थे. इसलिए उस ने कहा कि ससुराल जाने के कुछ दिनों बाद वह बच्चे को छोड़ कर अकेली सूरज के साथ भाग जाएगी. सरोज के साथ घर से भागने की योजना बनाने के बाद सूरज पैसों का इंतजाम करने लगा. कुछ दिनों बाद मंजेश आया तो सरोज ससुराल चली गई. ससुराल में किसी को भी उस के घर से भाग जाने का अंदाजा नहीं था, इसलिए उस के घर से बाहर आनेजाने की पूरी छूट थी.

16 जुलाई को सूरज सरोज से संडीला कस्बे में शीतला देवी के मेले में मिला तो कहा कि रात में वह गांव के बाहर आ कर उसे फोन कर देगा. उस के बाद वह तुरंत घर से निकल कर उस के पास आ जाए. सरोज ने हामी भर दी. रात में सूरज ने फोन किया तो अपने 8 महीने के बेटे को सोता छोड़ कर सरोज गांव के बाहर इंतजार कर रहे सूरज के पास आ गई. सूरज सरोज को साथ ले कर मन में नई जिंदगी बसाने के सतरंगी सपने देखता हुआ लखनऊ की ओर चल पड़ा. कुछ देर बाद बच्चे का रोना सुन कर उस की सास सोमा देवी ने सरोज को आवाज देते हुए बच्चे को चुप कराने को कहा. जब बच्चा चुप नहीं हुआ तो वह बहू सरोज के कमरे में गई. लेकिन वह कमरे में नहीं मिली. सोमा को चिंता हुई कि इतनी रात में बहू कहां चली गई. उस ने बेटे को जगाया. इस के बाद सभी सरोज को तलाशने लगे.

सरोज के न मिलने पर घर वालों को शक हो गया कि जरूर वह किसी के साथ भाग गई होगी. इस के बाद मंजेश ने सरोज के घर छोड़ कर कहीं जाने की बात अपने साले दिनेश को बता कर पूछा कि कहीं सरोज वहां तो नहीं गई है. दिनेश ने कह दिया कि वह यहां नहीं आई है. बहन की करतूत सुन कर दिनेश ने अपना सिर पीट लिया. उसे कतई उम्मीद नहीं थी कि शादी के ढाई, तीन साल बाद सरोज इस तरह घर छोड़ कर चली जाएगी. उन्होंने मंजेश से कहा कि वह पता लगाए कि सरोज को जाते हुए किसी ने देखा तो नहीं, वह किस के साथ गई है.

काफी खोजबीन के बाद भी जब सरोज का कुछ पता नहीं चला तो 2 दिन बाद मंजेश ससुराल आ कर गांव में हो रही अपनी बदनामी के बारे में बता कर गालीगलौच करने लगा. रामऔतार का परिवार बेटी की इस करतूत से काफी दुखी था. दामाद की पीड़ा को समझते हुए उन्होंने उसे सब कुछ बता दिया. तब 18 जुलाई को मंजेश ने संडीला कोतवाली में सूरज और उस के दोस्त धर्मेंद्र के खिलाफ अपनी पत्नी को बहलाफुसला कर भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. संडीला पुलिस ने काररवाई करते हुए सूरज के घर जा कर पूछताछ की तो वे उस के बारे में कुछ नहीं बता सके. सूरज का दोस्त धर्मेंद्र घर में ही मिल गया. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह सूरज और सरोज के प्रेमसंबंधों के बारे में तो जानता था, लेकिन वे कहां हैं, इस बात की जानकारी उसे नहीं है.

पूछताछ के बाद धर्मेंद्र को छोड़ दिया गया. इधर पुलिस ने सूरज और सरोज के मोबाइल नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया था. दूसरी ओर मंजेश अपने साले दिनेश, शिवकुमार तथा अन्य कुछ रिश्तेदारों के साथ सरोज की तलाश में लगा था. मंजेश के गांव ककराली में उस की पत्नी सरोज के घर से भाग जाने की बात चर्चा का विषय बनी हुई थी. लोग चटखारे लेले कर आपस में तरहतरह की बातें कर रहे थे, जिस से घर वालों का बाहर निकलना दूभर हो गया था. 26 जुलाई की शाम मंजेश अपने चचेरे चाचा राकेश के साथ अपनी ससुराल पहुंचा, तभी उस के मोबाइल पर सरोज का फोन आया कि वह इस समय दुबग्गा में है और उस के साथ घर चलना चाहती है.

सरोज का फोन सुन कर मंजेश ने दिनेश से कहा कि गांव में उस की इतनी बदनामी हो चुकी है कि अब वह सरोज को अपने घर नहीं ले सकता. दिनेश और शिवकुमार भी उसे अपने घर में नहीं रखना चाहते थे. तुरंत सभी ने सरोज की हत्या की योजना बना डाली. इस में दिनेश और शिवकुमार ने अपने चचेरे भाई हिन्ना उर्फ सुनील को भी शामिल कर लिया. वे भी चाहते थे कि किसी तरह सूरज मिल जाए तो वे उस का भी काम तमाम कर दें. मंजेश की मोटरसाइकिल पर राकेश और हिन्ना और दिनेश व शिवकुमार अपनी मोटरसाइकिल से रात 11 बजे अंधे की चौकी के पास कलामंडी होते हुए दुबग्गा में सरोज द्वारा बताए स्थान पर पहुंच गए. सरोज वहां मिल गई.

सरोज से सूरज के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि अभी थोड़ी देर पहले वह उसे छोड़ कर बालागंज की ओर गया है. दिनेश के चचेरे भाई सुनील उर्फ हिन्ना ने राकेश को तुरंत अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाया और बालागंज की ओर चल पड़ा. थोड़ी दूर जाने पर सूरज दिखाई दे गया. हिन्ना उसे गांव में पंचायत के सामने सरोज से उस की शादी करवाने का झांसा दे कर मोटरसाइकिल पर बीच में बैठा लिया और उसे भी वहां ले आया जहां मंजेश, राकेश और दिनेश सरोज को ले कर उस का इंतजार कर रहे थे.

सरोज ने डरते हुए चोर नजरों से सब की ओर देखा. उन के चेहरों के भाव देख कर वह कांप उठी. लेकिन अब बाजी उस के हाथ से निकल चुकी थी. दोनों को ले कर वे माल की ओर जाने वाली रोड पर चलते हुए वंशीगढ़ी के जंगल में पहुंचे. जंगल में सन्नाटा छाया था. राकेश सूरज को पकड़ कर एक जगह खड़ा हो गया तो मंजेश सरोज को ले कर जंगल के अंदर चला गया. उस के पीछेपीछे सरोज के दोनों भाई दिनेश और शिवकुमार भी थे. मंजेश ने सरोज को पकड़ने का इशारा किया तो दिनेश और शिवकुमार ने सरोज के हाथ और पैर कस कर पकड़ लिए. इस के बाद मंजेश ने सरोज के गले में पड़ी चुन्नी से उस का गला कस दिया. सरोज के बेहोश होने पर मंजेश ने डंडे से तो दिनेश, हिन्ना और शिवकुमार ने उसे लातघूंसों से मारना शुरू किया. थोड़ी देर में सरोज की मौत हो गई.

सरोज को मार कर वे सूरज के पास पहुंचे. सूरज अब तक समझ चुका था कि उन लोगों ने सरोज की हत्या कर दी होगी, अब उस की बारी है. सरोज को भी वे उसी जगह ले गए, जहां सरोज की लाश पड़ी थी. दिनेश ने उस के दोनों हाथ पकड़े तो राकेश ने उस का मुंह दबाया. हिन्ना और शिवकुमार ने उस के पैर पकड़ लिए. सूरज के बैग से शर्ट निकाल कर उसे वहीं झाडि़यों में फेंक दिया. शर्ट से हिन्ना और शिवकुमार ने सूरज का गला कस दिया, जिस से वह भी बेहोश हो गया. इस के बाद उसे भी डंडे और लातघूंसों से पीटपीट कर मार दिया गया.

दोनों की हत्या करने के बाद मंजेश और उस के चाचा राकेश अपने गांव ककराली चले गए तो सरोज के भाई दिनेश, शिवकुमार तथा हिन्ना अपने गांव सिरगामऊ लौट आए. हत्या के 2 दिनों बाद जब उन्हें पता चला कि मलिहाबाद पुलिस लाशों को बरामद कर के जांच कर रही है तो सभी अपनेअपने घरों से फरार हो गए. लेकिन पुलिस के हाथ उन के गिरेबान तक पहुंच ही गए. शिवकुमार की  मोटरसाइकिल यूपी32-ईएल 3768 पुलिस ने बरामद कर ली थी. सूरज एसपी था, इसलिए मुकदमे में धारा 147 और 3(2)5 एससी/एसटी एक्ट की धारा और बढ़ा दी गई थी.

6 अगस्त को इंसपेक्टर सुधाकर पांडेय ने इस दोहरे हत्याकांड के आरोपी दिनेश उर्फ तिवारी तथा शिवकुमार को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. 7 अगस्त को सरोज के पति मंजेश ने भी न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया. 11 अगस्त को सुबह 10 बजे पुलिस ने हिन्ना उर्फ सुनील को कुशनगरी गांव के पास से उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वह अपनी मोटरसाइकिल से कहीं जाने की फिराक में था. पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त हिन्ना की मोटरसाइकिल यूपी32- डीएच3125 भी अपने कब्जे में ले ली. पूछताछ के बाद उसे भी जेल भेज दिया गया.

21 अगस्त को सुधाकर पांडेय ने अभियुक्तों की निशानदेही पर आलाकत्ल वे लाठीडंडे भी बरामद कर लिए गए, जिन से सूरज और सरोज की हत्या की गई थी. कथा लिखे जाने तक इस हत्याकांड का एक आरोपी राकेश फरान था. पुलिस सरगर्मी से उस की तलाश कर रही थी. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Jaunpur Crime: मुसलिम गर्लफ्रेंड के लिए मांबाप को 6 टुकड़ों में काट डाला

Jaunpur Crime: एक ऐसी शर्मनाक घटना सामने आई है जिस ने रिश्तों को तारतार कर रख दिया है. एक प्रेमी ने मुसलिम प्रेमिका के लिए अपने मांबाप को 6 टुकड़ों में काट डाला. आखिर ऐसा क्या था उस प्रेमिका में जिस से एक इंजीनियर बेटा ने मांबाप को इतनी बेरहमी से मार डाला?  क्या है इस मर्डर का पूरा सच जानने के लिए पढ़ते हैं आगे जो आप को करेगा होने वाली घटना से सचेत और सावधान?

यह दर्दनाक घटना उत्तर प्रदेश के जौनपुर से सामने आई है. यहां एक इंजीनियर बेटे अम्बेश कुमार ने अपने मांबाप की हत्या कर दी. अम्बेश ने मांबाप का सिर लोहे के खलबट्टे से कूच दिया था. फिर आरी से उन के 6 टुकडे कर डाले. इस के बाद उन टुकड़ों को बोरियों में भर कर गोमती नदी में बारीबारी से फेंक आया.

पुलिस के अनुसार, अम्बेश बीटेक की डिग्री लेने के बाद कोलकाता में एक कंपनी में बतौर क्वालिटी इंजीनियर कार्यरत था. वहां उसे 25 हजार की सैलरी मिलती थी. इसी जौब के दौरान उस की मुलाकात एक मुसलिम युवती से हुई. दोनों की नजदीकियां बढ़ी और 2019 में दोनों ने लव मैरिज शादी कर ली. दोनों के 2 बेटे हैं, जिन की उम्र 5 साल और 11 महीने है.

अम्बेश की लव मैरिज से परिवार खुश नहीं था. इसी को ले कर उस के पापा श्याम बहादुर और मम्मी बबीता के बीच बहस हो जाया करती थी. इसी बात को ले कर दोनों के बीच 8 दिसंबर, 2025 को झगड़ा हुआ  तो गुस्से में उस ने अपने मम्मीपापा की खलबट्टे से कूच कर हत्या कर दी.

हत्या करने के बाद अम्बेश ने अपनी बहन को फोन कर बताया कि मम्मी और पापा  कहीं चले गए हैं. वह इसी तरह नाटक करता रहा. 12 दिसंबर, 2025 को अचानक वह भी लापता हो गया. इस के बाद अम्बेश की बड़ी बहन वंदना ने उसे फोन मिलाया तो उस का कुछ पता नहीं चल सका. तब वंदना ने फिर अम्बेश की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करा दी.

पुलिस को उस ने बताया कि  उस के मम्मीपापा पहले गायब हो गए, अब भाई भी लापता है. इस के बाद पुलिस ने इस मामले की गंभीरता से जांच की तो पुलिस को अम्बेश मिल गया. उस से पूछताछ की गई तो उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

एएसपी आयुष श्रीवास्तव ने बताया कि अम्बेश ने बताया कि मम्मीपापा मेरी शादी तुड़वाना चाहते थे. वे चाहते थे कि वह दूसरी शादी कर ले. अम्बेश मुसलिम पत्नी को तलाक देने के लिए तैयार भी था, लेकिन उसे गुजारा भत्ता देना पड़ता. मम्मीपापा गुजारा भत्ता देने के लिए तैयार नहीं थे. तो उस ने पत्नी को तलाक देने से इनकार कर दिया.

इस के बाद मम्मी ने अम्बेश से घर से निकल जाने को कहा. तब अम्बेश ने कहा कि यह तो मेरी नानी का घर है. मुझे नेवासा में दिया था. इसी बात को ले कर मम्मी ने अम्बेश को धक्का मार दिया और कहा कि इसी समय घर से निकल जा. इसी बात को ले कर अम्बेश गुस्सा आ गया. पास में रखा टेबल के लोहे का खलबट्टा था. उस का मूसल उठाया और मम्मी के सिर पर मार दिया. इस के बाद पापा भी वहां आ गए.  वह पुलिस को फोन करने की धमकी देने लगे. वह पुलिस को फोन कर ही रहे थे तभी अम्बेश ने उन को भी मूसल मार दिया.

पापा और मम्मी चिल्लाए. दोनों फर्श पर जा गिरे. इस के बाद उन की सांसें थम चुकी थीं. दोनों की हत्या करने के बाद अम्बेश की समझ में नहीं  आ रहा था कि वह क्या करे.

यह अपराध छिपाने के लिए उस के दिमाग में एक आईडिया आया. वह बेसमेंट से सरिया काटने वाली इलेक्ट्रिक आरी ले आया और दोनों की लाशों के 3-3 टुकड़े कर दिए. फिर 6 को प्लास्टिक की बोरी में भर कर गोमती नदी में फेंक आया.

पुलिस ने आरोपी अम्बेश को अरेस्ट कर लिया है. पुलिस उस के खिलाफ सबूत इकट्ठे कर काररवाई कर रही है. Jaunpur Crime

Love Crime: इश्क की आग में कुछ इस तरह बरबाद हुआ एक परिवार

Love Crime: 2 लोगों के साथ जगराओं के थाना सिटी पहुंची लक्ष्मी ने थानाप्रभारी इंसपेक्टर इंद्रजीत सिंह को बताया था कि उस के पति प्रवासराम 2 दिन पहले काम पर गए तो अब तक लौट कर नहीं आए हैं. थानाप्रभारी ने पूरी बात बताने को कहा तो लक्ष्मी ने बताया कि उस के पति प्रवासराम मूलरूप से बिहार के जिला बांका के थाना रजौली के गांव उपराम के रहने वाले थे.

कई सालों पहले वह काम की तलाश में जगराओं आ गया था और पीओपी का काम सीख कर बडे़बडे़ मकानों में पीओपी करने के ठेके लेने लगा था. उस का काम ठीकठाक चलने लगा तो वह गांव से पत्नी और बच्चों को भी ले आया. जगराओं में वह डा. हरिराम अस्पताल के पास रहता था. सन 2001 में प्रवासराम की लक्ष्मी से शादी हुई थी. उस के कुल 6 बच्चे थे, जिन में 4 बेटियां और 2 बेटे थे. वह सुबह काम पर जाता था तो शाम 7 बजे तक वापस आता था. लक्ष्मी की बात सुन कर इंद्रजीत सिंह ने पूछा, ‘‘जिस जगह तुम्हारा पति काम करता था, वहां जा कर तुम ने पता किया था?’’

‘‘जी साहब, यह लड़का उन्हीं के साथ काम करता था.’’ साथ आए 20-22 साल के एक लड़के की ओर इशारा कर के लक्ष्मी ने कहा.

थानाप्रभारी ने उस लड़के की ओर देखा तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मेरा नाम सोनू है, मैं उन्हीं के साथ काम करता था. वह 2 दिनों से काम पर नहीं आए हैं, जिस से हम सभी बहुत परेशान हैं. हम सभी खाली बैठे हैं.’’

इंद्रजीत सिंह ने एएसआई बलजिंदर सिंह को पूरी बात समझा कर प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज करा कर उस की पत्नी से उस का एक फोटो लेने को कहा. थानाप्रभारी के आदेश पर बलजिंदर सिंह ने प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज कर लक्ष्मी से उस का एक फोटो ले लिया. इस के बाद उन्होंने उस की फोटो के साथ सभी थानों को उस की गुमशुदगी की सूचना दे दी. यह 4 अप्रैल, 2017 की बात है. इस का मतलब प्रवासराम 2 अप्रैल से गायब था.

6 अप्रैल, 2017 को पुलिस को जगराओं के बाहरी इलाके में सेम नानकसर रोड पर स्थित एक गंदे नाले में एक लाश मिली. उसे बिस्तर में लपेट कर फेंका गया था. मौके पर पहचान न होने की वजह से पुलिस ने लाश को मोर्चरी में रखवा कर उस के पोस्टर जारी कर दिए थे. पोस्टर देख कर अगवाड़ लोपो के रहने वाले मृतक के साढू समीर ने उस की शिनाख्त डा. हरिराम अस्पताल के पास रहने वाले प्रवासराम की लाश के रूप में कर दी थी.

इंद्रजीत सिंह ने तुरंत सिपाही भेज कर लक्ष्मी को बुलवा लिया था. लाश देखते ही लक्ष्मी रोने लगी. अब शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी. वह लाश उस के गुमशुदा पति प्रवासराम की ही थी. लाश की शिनाख्त होने के बाद इंद्रजीत सिंह ने प्रवासराम की गुमशुदगी की जगह अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लाश लक्ष्मी और उस के रिश्तेदारों को सौंप दी. उसी दिन शाम को उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, प्रवासराम की हत्या 4 दिनों पहले गला घोंट कर की गई थी. उस की गरदन पर रस्सी के निशान थे. थानाप्रभारी ने इस मामले की जांच बलजिंदर सिंह को ही सौंप दी थी. उन्होंने मृतक की पत्नी लक्ष्मी और उस के भाइयों को बुला कर विस्तार से पूछताछ की. मृतक के भाई अनूप का कहना था कि उस के भाई की न किसी से कोई दुश्मनी थी और न किसी तरह का कोई लेनादेना था. इस के बाद बलजिंदर सिंह ने लक्ष्मी से पूछा, ‘‘तुम सोच कर बताओ कि काम पर जाने से पहले तुम्हारी पति से कोई खास बात तो नहीं हुई थी?’’

‘‘कोई बात नहीं हुई थी साहब, रोज की तरह उस दिन भी वह अपना खाने का टिफिन ले कर सुबह साढ़े 7 बजे घर से गए तो लौट कर नहीं आए.’’

बलजिंदर सिंह ने वहां जा कर भी पूछताछ की, जहां प्रवासराम काम करा रहा था. उस के साथ काम करने वाले मजदूर ही नहीं, मकान के मालिक ने भी बताया कि प्रवासराम निहायत ही शरीफ और ईमानदार आदमी था. लड़ाईझगड़ा तो दूर, वह किसी से ऊंची आवाज में बात भी नहीं करता था. समय पर काम कर के मालिक से समय पर मजदूरी ले कर अपने मजदूरों को उन की मजदूरी दे कर उन्हें खुश रखता था. बलजिंदर सिंह को अब तक की पूछताछ में कोई ऐसा सुराग नहीं मिला था, जिस से वह हत्यारों तक पहुंच पाते. यह तय था कि हत्यारे 2 या 2 से अधिक थे. लेकिन उन की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसे शरीफ आदमी की भला किसी की क्या दुश्मनी हो सकती थी, जो उसे मार दिया.

थानाप्रभारी इंद्रजीत सिंह से सलाह कर के बलजिंदर सिंह मुखबिरों की मदद से यह पता करने लगे कि मृतक की पत्नी का किसी से अवैध संबंध तो नहीं था. इस की एक वजह यह थी कि लक्ष्मी ने कई बार बयान बदले थे. यही नहीं, पूछताछ के दौरान वह डरीडरी सी रहती थी. कभी वह कहती थी कि 2 अप्रैल को काम से लौटने के बाद वह कुछ लेने के लिए बाजार गए थे तो लौट कर नहीं आए तो कभी कहती थी कि सुबह काम पर गए थे तो लौट कर नहीं आए थे.

उस की इन्हीं बातों पर उन्हें उस पर शक हो गया था. मुखबिरों से उन्हें पता चला था कि लक्ष्मी के घर सिर्फ 20-22 सल के सोनू का ही आनाजाना था. उसी सोनू के साथ लक्ष्मी प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज कराने थाने आई थी. उस की उम्र लक्ष्मी से इतनी कम थी कि उस पर संदेह नहीं किया जा सकता था. लेकिन मुखबिर ने जो खबर दी थी, उस से सोनू ही संदेह के घेरे में आ गया था. पुलिस जब उसे गिरफ्तार करने पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला.

बलजिंदर सिंह महिला सिपाही की मदद से लक्ष्मी को थाने ले आए और जब उस से कहा कि उसी ने सोनू के साथ मिल कर अपने पति की हत्या की है तो वह अपने बच्चों की कसम खाने लगी. उस का कहना था कि पुलिस को शायद गलतफहमी हो गई है. वह भला अपने पति की हत्या क्यों करेगी. लेकिन पुलिस को मुखबिर पर पूरा भरोसा था. इसलिए जब उस के साथ थोड़ी सख्ती की गई तो उस ने अपने पति प्रवासराम की हत्या का अपराध स्वीकार करते हुए बता दिया कि उसी ने अपने प्रेमी सोनू के साथ साजिश रच कर पति प्रवासराम की हत्या कराई थी.

इस हत्या में उस का प्रेमी सोनू और उस के 2 दोस्त मिल्टन और छोटू सोनू शामिल थे. सोनू के दोस्त का नाम भी सोनू था, इसलिए यहां उस का नाम छोटू सोनू लिख दिया गया है. लक्ष्मी ने ही प्रवासराम की हत्या करा कर उस की लाश गंदे नाले में फेंकवा दी थी. इस के बाद लक्ष्मी की निशानदेही पर उस के प्रेमी सोनू और उस के साथी अवधेश (बदला हुआ नाम) को हिरासत में ले लिया गया था. जबकि उस का साथी सोनू फरार होने में कामयाब हो गया था. शायद उसे लक्ष्मी, अवधेश और सोनू के गिरफ्तार होने की सूचना मिल गई थी.

बलजिंदर सिंह ने उसी दिन यानी 9 अप्रैल, 2017 को तीनों अभियुक्तों लक्ष्मी, अवधेश और सोनू को जिला मजिस्टै्रट की अदालत में पेश कर के लक्ष्मी और सोनू को 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया, जबकि नाबालिग होने की वजह से अवधेश को बाल सुधारगृह भेज दिया गया. रिमांड अवधि के दौरान प्रवासराम की हत्या की जो कहानी प्रकाश में आई, वह  इस प्रकार थी- 6 बच्चों की मां बन जाने के बाद भी लक्ष्मी की देह की आग शांत होने के बजाय और भड़क उठी थी. इस की वजह यह थी कि प्रवासराम सीधासादा और शरीफ आदमी था. उस ने लक्ष्मी से कहा था कि अब उसे खुद पर संयम रखना चाहिए, क्योंकि उस के 6 बच्चे हो चुके हैं. अब उसे अपने इन बच्चों की फिक्र करनी चाहिए.

प्रवासराम दिनभर काम कर के थकामांदा घर लौटता और खाना खा कर अगले दिन काम पर जाने के लिए जल्दी सो जाता. लक्ष्मी को यह जरा भी नहीं सुहाता था. जब पति ने उस की ओर से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया तो उस की नजरें खुद से लगभग 22 साल छोटे सोनू पर जा टिकीं. काम से फारिग होने के बाद अकेला रहने वाला सोनू अक्सर प्रवासराम के साथ उस के घर आ जाता था. वह घंटों बैठा प्रवासराम और लक्ष्मी से बातें किया करता था. लक्ष्मी की नजरें उस पर टिकीं तो वह उस से हंसीमजाक के साथसाथ शारीरिक छेड़छाड़ भी करने लगी. युवा हो रहे सोनू को यह सब बहुत अच्छा लगता था.

एक दिन दोपहर को जब सोनू काम से छुट्टी ले कर लक्ष्मी के घर पहुंचा तो लक्ष्मी ने उसे पकड़ कर बैड पर पटक दिया और मनमानी कर डाली. सोनू के लिए यह एकदम नया सुख था. उसे ऐसा लगा, जैसे वह जन्नत की सैर कर रहा है. उस दिन के बाद यह रोज का नियम बन गया. सोनू काम के बीच कोई न कोई बहाना कर के लक्ष्मी के पास पहुंच जाता और मौजमस्ती कर के लौट जाता. यह सब लगभग एक साल तक चलता रहा. किसी तरह इस बात की जानकारी प्रवासराम को हुई तो उस ने लक्ष्मी को खरीखोटी ही नहीं सुनाई, बल्कि प्यार से समझाया भी, पर उस के कानों पर जूं नहीं रेंगी.

जब प्रवासराम ने लक्ष्मी पर रोक लगाने की कोशिश की तो सोनू के प्यार में पागल लक्ष्मी ने सोनू के साथ मिल कर प्रवासराम की हत्या की योजना बना डाली. एक दिन उस ने सोनू से कहा, ‘‘जब तक प्रवासराम जिंदा रहेगा तो हम दोनों इस तरह मिल नहीं पाएंगे. वैसे भी अब उस के वश का कुछ नहीं रहा. वह बूढा हो गया है, अब उस का मर जाना ही ठीक है.’’

लक्ष्मी के साथ मिल कर प्रवासराम की हत्या की योजना बना कर सोनू ने साथ काम करने वाले अवधेश और छोटू सोनू को कुछ रुपयों का लालच दे कर अपने साथ मिला लिया. घटना वाले दिन यानी 2 अप्रैल, 2017 को सोनू पार्टी देने के बहाने शराब की बोतल और चिकन ले कर लक्ष्मी के घर पहुंचा. अवधेश और छोटू सोनू भी उस के साथ थे. उस ने प्रवासराम से कहा, ‘‘भइया चिकन और शराब लाया हूं, आज पार्टी करने का मन है.’’

योजनानुसार चारों शराब पीने बैठ गए. खुद कम पी कर सोनू और उस के साथियों ने प्रवासराम को अधिक शराब पिला दी. रात के 11 बजे तक प्रवासराम जरूरत से ज्यादा शराब पी कर लगभग बेहोश हो गया तो लक्ष्मी ने सोनू को इशारा किया. सोनू ने छोटू सोनू और अवधेश की तरफ देखा तो छोटू सोनू ने बेसुध पड़े प्रवासराम के दोनों पैर कस कर पकड़ लिए. अवधेश उस की छाती पर सवार हो गया तो लक्ष्मी और सोनू ने प्रवासराम के गले में रस्सी डाल कर कस दिया. प्रवासराम तड़प कर शांत हो गया तो चारों ने मिल कर लाश को बैड से उतार कर नीचे खिसका दिया.

अवधेश और छोटू सोनू तो अपनेअपने घर चले गए, जबकि सोनू लक्ष्मी के कमरे पर ही रुक गया. दोनों पूरी रात उसी बैड पर मौजमस्ती करते रहे, जिस बैड के नीचे प्रवासराम की लाश पड़ी थी. अगले दिन यानी 3 अप्रैल की रात को अवधेश और छोटू सोनू की मदद से सोनू प्रवासराम की लाश को बिस्तर में लपेट कर रेहड़े से ले जा कर सेम नानकसर रोड पर बहने वाले गंदे नाले में फेंक आया. रिमांड अवधि के दौरान लक्ष्मी की निशानदेही पर पुलिस ने उस के घर से वह रस्सी बरामद कर ली थी, जिस से प्रवासराम का गला घोंटा गया था. हत्या करते समय लक्ष्मी ने अपने सभी बच्चों को दूसरे कमरे में सुला कर बाहर से कुंडी लगा दी थी, जिस से बच्चों को कुछ पता नहीं चल सका था.

रिमांड अवधि समाप्त होने पर 11 अप्रैल, 2017 को लक्ष्मी और उस के प्रेमी सोनू को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. अवधेश को पहले ही बाल सुधार गृह भेज दिया गया था. इस हत्याकांड का एक आरोपी छोटू सोनू अभी फरर है. पुलिस उस की तलाश कर रही है. प्रवासराम की हत्या और लक्ष्मी के जेल जाने के बाद उन के सभी बच्चों को प्रवासराम का छोटा भाई अपने घर ले गया है. लक्ष्मी ने अपनी वासना में अपना परिवार तो बरबाद किया ही, 3 लड़कों की जिंदगी पर सवालिया निशान लगा दिए. Love Crime

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. अवधेश बदला हुआ नाम है.