Hindi True Crime: कंटीली राह का राही

Hindi True Crime: शादीशुदा होते हुए भी धर्मवीर बाजारू औरतों के पास जाता था. इस से खफा हो कर उस की बीवी भी मायके चली गई. फिर एक दिन उस का यही शौक उस के लिए जानलेवा साबित हुआ.

गोरखपुर राजकीय रेलवे पुलिस के थानाप्रभारी गिरिजाशंकर त्रिपाठी को उन के एक खास मुखबिर ने सूचना दी कि पुराना पार्सल गेट नंबर-6 पर स्थित आरपीएफ मालखाने के पास एक युवक लहूलुहान पड़ा तड़प रहा है. थानाप्रभारी ने टाइम देखा तो उस समय रात के करीब 10 बज रहे थे. यह सूचना मिलते ही वह उसी समय पुलिस टीम के साथ मुखबिर द्वारा बताई जगह पर पहुंच गए. स्ट्रीट लाइट की रोशनी में वहां सब कुछ साफ दिखाई दे रहा था. एक युवक पेट के बल खून से लथपथ पड़ा था. पास जा कर देखा तो पता चला कि उस की दाहिनी कनपटी पर किसी वजनदार चीज से वार किया गया था.

पास ही एक बड़ा पत्थर पड़ा था जिस पर ताजा खून लगा था. लग रहा था कि हत्यारों ने इसी पत्थर से उस के ऊपर वार किया था. मौके पर शराब की 2 खाली शीशियां भी पड़ी थीं. पुलिस ने युवक की जामातलाशी ली तो उस की पैंट की जेब से एक कागज की परची मिली. उस परची पर एक मोबाइल नंबर और एक बैंक का खाता नंबर लिखा था. पुलिस ने उन सबूतों को अपने कब्जे में ले लिया. युवक का जिस्म अभी भी गरम था. उस की सांसें भी चल रही थीं. रेलवे के नियम के अनुसार रेलवे परिक्षेत्र में हुई घटना, दुर्घटना के घायलों को आरपीएफ के जवान ही अस्पताल ले जाते हैं, इसलिए थानाप्रभारी ने आरपीएफ को घटना की सूचना दे दी.

सूचना पा कर आरपीएफ के 2 जवान मौके पर पहुंचे और गंभीर रूप से घायल युवक को टैंपो से नेताजी सुभाषचंद्र बोस जिला अस्पताल ले गए, जहां डाक्टरों ने युवक को मृत घोषित कर दिया. इस के बाद थानाप्रभारी गिरिजा शंकर त्रिपाठी ने जरूरी काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भेज दिया. यह बात 31 अक्तूबर, 2014 की है. मृतक कौन था और कहां का रहने वाला था, पुलिस के पास इस की कोई जानकारी नहीं थी. मृतक के पास से जो परची मिली थी, उस पर लिखे फोन नंबर को थानाप्रभारी ने अपने फोन से रात में ही मिलाया. दूसरी ओर से काल किसी पुरुष ने रिसीव की. उस ने पूछा, ‘‘हैलो, कौन बोल रहे हैं?’’

‘‘मैं गोरखपुर जीआरपी थाने से इंसपेक्टर गिरिजाशंकर त्रिपाठी बोल रहा हूं.’’ थानाप्रभारी ने अपना परिचय देने के बाद उस से पूछा, ‘‘क्या मैं जान सकता हूं कि तुम कौन बोल रहे हो और कहां रहते हो?’’

‘‘सर, मैं गोरखपुर से धर्मेश उपाध्याय बोल रहा हूं.’’ पुलिस का नाम सुनते ही धर्मेश की आंखों से नींद गायब हो गई, ‘‘क्या बात है सर, इतनी रात गए…’’

‘‘यह नंबर तुम्हारा ही है?’’ उस की बात बीच में काट कर इंसपेक्टर त्रिपाठी ने सवाल किया.

‘‘जी हां, यह मेरा ही नंबर है.’’ धर्मेश ने जवाब दिया.

‘‘हमें मालखाने के पास एक युवक घायलावस्था में मिला था. उसी की जेब से मिली परची पर यह नंबर लिखा था. तुम अस्पताल आ कर उस युवक को देख लो कि कहीं वह तुम्हारा कोई परिचित तो नहीं है?’’ थानाप्रभारी ने कहा.

धर्मेश का बड़ा भाई धर्मवीर कई दिनों से घर से निकला हुआ था. यह बात थानाप्रभारी को बताते हुए उस ने उन से घायल मिले युवक की कदकाठी और कपड़ों के बारे में पूछा तो थानाप्रभारी ने घायल युवक का जो हुलिया बताया, वह उस के भाई धर्मवीर से मेल खा रहा था. उसे चिंता होने लगी. यह बात उस ने दूसरे कमरे में सो रहे पिता प्रेमनारायण उपाध्याय को बताई तो उन की नींद भी हराम हो गई. थानाप्रभारी ने धर्मेश को उस युवक की मौत की खबर नहीं दी थी, ताकि घर वाले रात में परेशान न हों. लेकिन घर वालों की नींद तो गायब हो चुकी थी. बेटे की फिक्र में प्रेमनारायण का बदन कांपने लगा. धर्मेश का गांव डिगुलपुर जिला मुख्यालय से दूर था.

वहां से जिला अस्पताल जाने के लिए कोई साधन नहीं था, इसलिए भोर होते ही वह पिता के साथ गोरखपुर के लिए निकल पड़ा. रास्ते भर दोनों धर्मवीर की सलामती के लिए प्रार्थना करते रहे. सुबह 8 बजे तक दोनों गोरखपुर के थाना जीआरपी पहुंचे. थानाप्रभारी ने मृतक युवक के कपड़े उन्हें दिखाए तो कपड़े देखते ही दोनों रोने लगे. कपड़े धर्मवीर उपाध्याय के ही थे. मैडिकल कालेज ले जा कर जब उन्हें लाश दिखाई गई तो उन्होंने उस की पुष्टि धर्मवीर उपाध्याय के रूप में कर दी. शिनाख्त हो जाने के बाद पुलिस ने राहत की सांस ली. थानाप्रभारी गिरिजाशंकर त्रिपाठी ने प्रेमनारायण और उन के बेटे धर्मेश से बात की तो उन्होंने बताया कि धर्मवीर की हत्या महराजगंज के सुभाष पांडेय और कुशीनगर के संत यादव ने की होगी.

धर्मेश ने इन दोनों के खिलाफ थाने में रिपोर्ट भी दर्ज करा दी. नामजद मुकदमा दर्ज होते ही पुलिस ने दोनों की तलाश में उसी शाम उन के घरों पर दबिश डाली तो दोनों आरोपी अपनेअपने घरों से दबोच लिए गए. दोनों को पुलिस गोरखपुर ले आई. दोनों से सख्ती से पूछताछ की गई तो वे खुद को निर्दोष बताते हुए धर्मवीर की हत्या से साफ इनकार करते रहे. पूछताछ के बाद पता चला कि संत यादव कुशीनगर जिले के कसया कस्बे का बड़ा व्यवसाई था. उस के पास कई ट्रक थे. सुभाष पांडेय उस का बिजनैस पार्टनर था. घटना से करीब 15-20 दिनों पहले ही धर्मवीर उपाध्याय किसी परिचित के माध्यम से संत यादव के संपर्क में आया था.

धर्मवीर उपाध्याय गोरखपुर के सिकरीगंज इलाके डिगुलपुर गांव के रहने वाले प्रेमनारायण उपाध्याय का बड़ा बेटा था. प्रेमनारायण सीआरपीएफ के जवान थे, जो 2 साल पहले रिटायर हुए थे. धर्मवीर के अलावा उन का एक और बेटा धर्मेश था. संत यादव को ड्राइवर की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने उसे अपने यहां नौकरी पर रख लिया था. अक्तूबर 2014 में संत यादव ने उसे सामान से भरा ट्रक ले कर असम भेजा था. धर्मवीर सामान ले कर असम पहुंचा. लौटते समय उसे वहां से 67 हजार रुपए भाड़ा मिला. असम से वापस लौटते समय धर्मवीर की संत यादव से बातचीत भी हुई थी, तब उस ने भाड़े के 67 हजार रुपए मिलने की बात बता दी थी. लेकिन हफ्ते भर बाद भी वह गोरखपुर नहीं पहुंचा तो संत यादव को चिंता हुई.

उस ने धर्मवीर को फोन किया, पर उस का फोन लगातार स्विच्ड औफ मिला. कई दिनों बाद भी जब उस का धर्मवीर से संपर्क नहीं हुआ तो उस के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. इस के बाद संत यादव को विश्वास हो गया कि धर्मवीर ने उस के साथ बड़ा धोखा किया है. वह ट्रक और रुपए दोनों ले कर चंपत हो गया है. उस ने अपने स्तर पर उस का पता लगाना शुरू किया. कई दिनों बाद उसे ट्रक के बारे में पता चल गया. ट्रक बिहार के आरा जिले में लावारिस हालत में खड़ा था. आरा पहुंच कर संत यादव ट्रक ले कर वापस आ गया. उसे इस बात का शक होने लगा कि कहीं किसी ने धर्मवीर की हत्या तो नहीं कर दी.

इसी बीच धर्मवीर के घर वालों को उस की हत्या की जानकारी मिल गई. धर्मवीर के घर वालों को संत यादव और उस के साथी सुभाष पर ही शक हुआ. इसी शक के आधार पर धर्मेश ने दोनों के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज करवाया था. यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस को भी लगने लगा कि पैसों के विवाद में ही इन दोनों ने मिल कर धर्मवीर की हत्या कर दी होगी. सच उगलवाने के लिए पुलिस कई दिनों तक उन से सख्ती से पूछताछ करती रही, लेकिन पुलिस उन दोनों से कोई ठोस जानकारी नहीं उगलवा पाई. तब पुलिस ने हिदायत दे कर उन्हें छोड़ दिया.

इस केस की मौनिटरिंग कार्यवाहक रेलवे पुलिस उपाधीक्षक नम्रता श्रीवास्तव कर रही थीं. उन्होंने इस केस को खोलने में लगी टीम की बैठक बुलाई. बैठक में हत्या के विभिन्न कोणों पर रोशनी डाली गई. बैठक में धर्मवीर के पारिवारिक पहलुओं पर जांच केंद्रित करने का फैसला किया गया. पुलिस ने जांच की गई तो पता चला कि धर्मवीर और उस की पत्नी मनीषा के रिश्तों के बीच काफी गहरी खाई है. मनीषा अपनी तीनों बेटियों को ले कर महराजगंज के फरेंदा गांव स्थित अपने मायके में रह रही थी. पुलिस को एक और चौंका देने वाली सूचना मुखबिर से मिली कि मनीषा की बुआ का बेटा पूना में रहता था.

वह क्रिमिनल था. पुलिस का ध्यान इसी बात पर गया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मनीषा ने उसी की मदद से पति को ठिकाने लगवा दिया हो? यानी कुल मिला कर पुलिस के शक की सूई मनीषा की तरफ घूम गई. शक के आधार पर पुलिस ने मनीषा से कई चक्र में पूछताछ की, लेकिन इस पूछताछ से भी कोई हल नहीं निकला. पुलिस की जांच में वह भी बेकसूर दिखी. पुलिस की जांच जहां से चली थी, वहीं फिर आ कर रुक गई. पुलिस को उस की कालडिटेल्स से काफी उम्मीद बंधी थी. धर्मवीर की कालडिटेल्स पुलिस चेक कर चुकी थी, उस से भी कोई खास जानकारी नहीं मिली.

पुलिस को सारी उम्मीदों पर पानी फिरता दिखाई दे रहा था. थानाप्रभारी की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि धर्मवीर की हत्या किस ने और क्यों की? एक दिन थानाप्रभारी अपने कक्ष में बैठे इसी घटना पर मंथन कर रहे थे. उसी समय उन के दिमाग में एक आइडिया आया. उसी आइडिया को ध्यान में रखते हुए उन्होंने जिस जगह पर धर्मवीर की हत्या हुई थी, उस इलाके में उस दिन सक्रिय रहे मोबाइल नंबरों की जानकारी निकलवाई. पता चला कि उस दिन उस इलाके के फोन टावर के संपर्क में 35 हजार फोन नंबर आए थे. अब इतने नंबरों में से कातिल का नंबर ढूंढना आसान नहीं था. फिर भी उन्होंने अपनी टीम से उन सभी नंबरों का विश्लेषण कराया.

कई महीने की कड़ी मशक्कत के बाद उन नंबरों में से 4 नंबर संदिग्ध निकले. उन नंबरों की जांच की गई तो वे चारों नंबर स्विच्ड औफ मिले. उन नंबरों को पुलिस ने जांच के दायरे में ले लिया. इस बीच थानाप्रभारी एक बार फिर धर्मवीर के गांव डिगुलपुर पहुंचे. लोगों से बात करने पर उन्हें पता चला कि धर्मवीर शराबी तो था ही, अय्याश प्रवृत्ति का भी था. यह जानकारी उन के लिए अहम साबित हुई. छानबीन कर के वह गोरखपुर वापस लौट आए. इसी बीच मुखबिर ने उन्हें एक चौंका देने वाली सूचना दी. मुखबिर ने उन चारों संदिग्ध नंबरों को देख कर बताया कि उन में से एक नंबर कुशमिला उर्फ मुसकान नामक युवती का है. मुसकान कालगर्ल थी. उस का धंधा स्टेशन के इर्दगिर्द चलता था और घटना के बाद से वह गायब थी.

पुलिस ने मुसकान के फोन नंबर की जांच की तो पता चला कि उस ने अपना सिम फरजी आईडी पर लिया था, इसलिए पुलिस उस के ठिकाने तक नहीं पहुंच सकी. घटना को हुए 10 महीने बीत चुके थे, लेकिन पुलिस हत्यारों का पता तक नहीं लगा पाई थी. शक की सूई मुसकान पर थी, लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ था. पुलिस ने उस के नंबर को सर्विलांस पर लगा रखा था. अगस्त, 2015 में जैसे ही उस ने अपना फोन नंबर औन किया, तभी सर्विलांस से उस की लोकेशन बिहार के बेतिया जिले की आई. पुलिस ने कई दिनों तक उस के फोन पर होने वाली बातें सुनीं.

बातचीत के दौरान एक बार मुसकान के मुंह से गोरखपुर में मालखाने के पास एक युवक की हत्या करने की बात निकल गई. इस के बाद पुलिस को विश्वास हो गया कि धर्मवीर की हत्या में उस का हाथ है. उस के बाद पुलिस ने मुसकान की गिरफ्तारी की योजना बनाई. गुपचुप तरीके से गोरखपुर पुलिस बिहार के पश्चिमी चंपारण के बेतिया जिला पहुंची. स्थानीय पुलिस के सहयोग से गोरखपुर पुलिस ने पता लगा लिया कि मुसकान बेतिया में एक आर्केस्ट्रा कंपनी में काम करती है. पुलिस ने उस आर्केस्ट्रा कंपनी में दबिश दी. वहां जा कर पता चला कि वह तो 2 दिन पहले ही गोरखपुर चली गई. लिहाजा पुलिस खाली हाथ वापस लौट आई.

13 अगस्त, 2015 को सुबहसुबह एक मुखबिर ने इंसपेक्टर गिरिजा शंकर त्रिपाठी को फोन कर के सूचना दी कि पुराने पार्सल गेट पर मुसकान अपने एक साथी के साथ खड़ी है. वह कहीं भागने की फिराक में है. सूचना पक्की और बेहद महत्त्वपूर्ण थी, इंसपेक्टर त्रिपाठी बगैर देर किए घर से निकल लिए. जिस समय खबरी का फोन उन के पास आया था, उस समय वह घर से कार्यालय आने के लिए तैयार हो रहे थे. सूचना मिलने के 10 मिनट बाद वह थाने पहुंच गए. घर से निकलने से पहले उन्होंने टीम के सदस्यों को थाने में पहुंचने के लिए कह दिया था. थाने पहुंचते ही उन्हें एसएसआई सुधीर कुमार, एसआई राघवेंद्र मिश्र, हरीश तिवारी, हेडकांस्टेबल किसलय मिश्र, कांस्टेबल रणजीत पांडेय, अनिल कुमार, विजय सिंह, अभय पांडेय, संजय सिंह, संदीप यादव और महिला कांस्टेबल शीला गौड़ तैयार मिलीं.

टीम को ले कर वह पुराना पार्सल गेट नंबर 6 पर पहुंच गए. पुलिस ने गेट को चारों ओर से घेर लिया. पुलिस को देख कर मुसकान डर गई. उस ने वहां से खिसकने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उसे दबोच लिया. उसे और उस के साथी को गिरफ्तार कर के पुलिस थाने ले आई. पूछताछ में पता चला कि उस के साथ वाले युवक का नाम विजय पांडेय है. पुलिस ने उन से धर्मवीर उपाध्याय की हत्या किए जाने की वजह पूछी तो बिना किसी हीलाहवाली के दोनों ने अपना इकबालिया जुर्म कबूल करते हुए कहा कि उन्होंने ही धर्मवीर की हत्या की थी. घटना को अंजाम देने में उन के 2 और साथी विकास कुमार उर्फ मुकेश और सुमेर कुमार उर्फ समीर भी शामिल थे.

फिर मुसकान और विकास ने पुलिस के सामने रोंगटे खड़े कर देने वाली जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के गांव डिगुलपुर के रहने वाले प्रेमनारायण उपाध्याय सीआरपीएफ में नौकरी करते थे. वह 2 साल पहले ही नौकरी से रिटायर हुए थे. उन के 2 बेटे थे धर्मवीर और धर्मेश. धर्मवीर गांव के आवारा लड़कों के साथ रह कर बिगड़ गया था. तब उन्होंने यह सोच कर महराजगंज के फरेंदा की मनीषा के साथ उस की शादी कर दी कि गृहस्थी में फंस कर वह सुधर जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. यह बात 15 साल पहले की है.

शादी के बाद भी उस के चालचलन में कोई तब्दीली नहीं आई. आवारा दोस्तों के साथ घूमनेफिरने, शराब पीने की उस की आदत नहीं गई. मनीषा ने उसे समझाया भी, लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा. ऐसे में मनीषा के सामने आंसू बहाने के अलावा कोई उपाय नहीं बचा था. ऐसे शख्स से शादी कर के उस के सारे सपने रेत के ढेर की तरह ढह गए थे. इसी दौरान धर्मवीर ने ड्राइविंग सीख ली. वह ट्रक चलाने लगा. ट्रक ले कर वह जब भी बाहर जाता, 2-3 महीने बाद ही घर लौटता. इतने दिनों बाद घर लौटने पर भी वह परिवार के साथ कम यारदोस्तों के संग ज्यादा समय बिताता था. दोस्तों में ही कमा कर लाए हुए अधिकांश पैसे खर्च कर देता था. उस की इस आदत से उस के मांबाप ही नहीं, सासससुर भी चिंतित रहते थे.

इसी तरह शादी के 5-6 साल बीत गए. मनीषा भी 3 बेटियों की मां बन गई. मनीषा पति से नाखुश रहती थी. बच्चों के भविष्य की चिंता मनीषा को रहती थी. एक दिन वह तीनों बेटियों को ले कर ससुराल से मायके आ गई. धर्मवीर को जब यह पता चला तो वह गुस्से से पागल हो उठा. वह ससुराल पहुंच गया और पत्नी से लड़नेझगड़ने लगा. उस ने पत्नी को लाने के लिए काफी मिन्नतें कीं. लेकिन मनीषा ने ससुराल लौटने से साफ मना कर दिया. धर्मवीर ने ऐसा कई बार किया, पर मनीषा नहीं आई. 23-24 अक्तूबर, 2014 को धर्मवीर सामान से लदा ट्रक ले कर असम पहुंच गया था. सामान डिलीवरी करने के बाद उसे वहां से भाड़े के 67 हजार रुपए मिले.

एक साथ इतनी बड़ी रकम देखते ही धर्मवीर की नीयत डोल गई. ट्रक मालिक संत यादव ने जब भाड़े के बारे में उस से पूछा तो उस ने भाड़ा मिलने की बात बता दी. उस के बाद धर्मवीर ने अपना मोबाइल स्विच्ड औफ कर के रख दिया और ट्रक बिहार के आरा जिले में छोड़ कर ट्रेन से गोरखपुर आ गया. जब हफ्ते भर बाद भी धर्मवीर संत यादव के पास नहीं पहुंचा तो वह समझ गया कि धर्मवीर ने उस के साथ धोखा किया है. उधर रुपए ले कर धर्मवीर गोरखपुर के रास्ते अपनी ससुराल पहुंच गया. वह 1-2 दिन ससुराल में रुका. बच्चों और पत्नी को खुश करने के लिए खूब पैसे खर्च किए.

उस के बाद वहां से अपने साढ़ू के यहां महराजगंज चला गया. 2 दिन साढ़ू के यहां रुक कर 31 अक्तूबर, 2014 को शाम 6 बजे के करीब वह गोरखपुर पहुंच गया. उस समय उस के पास 40 हजार रुपए बचे थे. बाकी के 27 हजार रुपए वह खर्च कर चुका था. इधरउधर समय बिताने के बाद धर्मवीर साढ़े 9 बजे स्टेशन पहुंचा. वह अय्याश तो था ही, इसलिए वह यह भी जानता था कि उसे जिस चीज की तलाश है, वह यहीं मिलेगी. पैदल टहलते हुए वह पुराना पार्सल गेट नंबर-6 पहुंचा. वहां उसे 22 वर्षीय मुसकान मिली. बात करने पर मामला 500 रुपए में तय हो गया.

धर्मवीर मुसकान के साथ जाने से पहले शराब पीना चाहता था. उस ने मुसकान को यह बात बताई तो उस ने भी उस के साथ 2 पैग लेने को कह दिया. धर्मवीर उस की इच्छा जान कर खुश हो गया. वह उसे रिक्शे पर बैठा कर धर्मशाला बाजार ले गया. उस के पीछेपीछे मुसकान के साथी विकास पांडेय, विकास उर्फ मुकेश और सुमेर उर्फ समीर भी लग गए. वहीं से धर्मवीर ने शराब के साथ खाने के लिए मछली भी खरीदी. धर्मशाला बाजार के रेलवे लाइन के किनारे एक जगह बैठ कर दोनों ने मछली खाई और शराब पी. वहां से वे पुराना पार्सल गेट नंबर 6 पहुंचे. अब तक वहां गहरा सन्नाटा फैल गया था. वहीं पर धर्मवीर मुसकान के साथ हसरतें पूरी करना चाहता था. इस से पहले कि वह कुछ करता, तभी मुसकान के तीनों साथी वहां आ धमके.

अचानक सामने लड़कों को देख कर धर्मवीर सकपका गया. वे तीनों धर्मवीर से पैसों की मांग करने लगे तो दिखावे के लिए मुसकान ने उन लड़कों से विरोध जताया. धर्मवीर उन से उलझ गया. कुछ ही देर में धर्मवीर और उन तीनों लड़कों के बीच गुत्थमगुत्था हो गई. उसी दौरान सुमेर ने पीछे से धर्मवीर के दोनों हाथ पकड़ लिए और मुकेश ने धक्का दे कर पेट के बल गिरा दिया. सुमेर ने धर्मवीर की पीठ पर घुटना रख कर मुंह दबा दिया. विकास पांडेय के कहने पर मुसकान ने धर्मवीर के पैर दबोच लिए. तब धर्मवीर को लगा कि मुसकान भी इन लड़कों के साथ मिली है. वे लड़के नशेड़ी थे, इसलिए धर्मवीर उन के काबू में नहीं आ रहा था. फिर विकास पांडेय ने पास में पड़ा पत्थर उठा कर उस के सिर पर दे मारा.

पत्थर के वार से धर्मवीर का सिर फट गया और वह तड़पने लगा. विकास ने धर्मवीर की जेब टटोली. उस की जेब से 40 हजार रुपए निकले. इतने रुपए पा कर वे बहुत खुश हुए. चारों ने 10-10 हजार रुपए आपस में बांट लिए और तुरंत मौके से फरार हो गए. मुसकान और उस के साथियों ने पुलिस से बचने के लिए अपनेअपने मोबाइल औफ कर दिए. उन्होंने तय कर लिया कि कोई भी एकदूसरे को तब तक फोन नहीं करेगा जब तक मामला ठंडा नहीं हो जाता. मुसकान गोरखपुर छोड़ कर बेतिया, बिहार चली गई. कई साल पहले वह बेतिया में रह चुकी थी. वहां रह कर वह आर्केस्ट्रा कंपनी में नाचती थी. मुसकान गोरखपुर से बेतिया कैसे पहुंची, उस की रोमांचित कर देने वाली अपनी अलग कहानी है.

दरअसल, मुसकान गोरखपुर जिले के खोराबार के महेवा मंडी स्थित खिरवनिया गांव के रहने वाले रघुनाथ मल्लाह की बेटी थी. उसे बचपन से ही नाचनेगाने का शौक था. वह घर में टेलीविजन के कार्यक्रम देख कर नाचती थी. घर वालों को उस का यह काम पसंद नहीं था. 15 साल की उम्र में वह घर से बेतिया भाग गई और वहां अपने एक रिश्तेदार की मदद से आर्केस्ट्रा कंपनी में नाचने लगी. आर्केस्ट्रा कंपनी का मालिक उस का दैहिक शोषण करने लगा तो वह उस कंपनी को छोड़ कर दूसरी कंपनी में चली गई. वहां भी वह नहीं बच पाई. इस बार आर्केस्ट्रा के मालिक ने उस से प्रेमविवाह किया. 2-3 सालों तक मौजमस्ती करने के बाद उस ने मुसकान को छोड़ दिया.

ठोकरें खा कर मुसकान अपने घर लौट आई. घर वालों ने उसे घर में पनाह नहीं दी. दरदर की ठोकरें खाती मुसकान पेट की आग बुझाने के लिए अपने तन को बेचने पर मजबूर हो गई. उस से मिलने वाले पैसों से फुटपाथ पर खानाबदोश की जिंदगी शुरू की. फिर समय ने ऐसी करवट ली कि उस के हाथ खून से सन गए और वह हत्यारिन बन गई. कुशमिला उर्फ मुसकान को अपने किए पर बहुत पछतावा है. काश, उस ने घर वालों की बात मान ली होती तो शायद उसे यह दिन नहीं देखना पड़ता. कथा लिखे जाने तक चारों आरोपियों में से सुमेर उर्फ समीर को छोड़ कर बाकी 3 जेल की सलाखों के पीछे थे. समीर पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ पाया था. पुलिस तीनों के खिलाफ अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है. कथा लिखने तक किसी की जमानत नहीं हुई थी. Hindi True Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

True Crime Story: ढोंगी गुरू का अपराधिक अतीत

True Crime Story: कविता रानी को पूरा विश्वास था कि स्वामी सच्चिदानंद उस का परलोक सुधार देगा. परलोक सुधारने की कौन कहे, उस ने उस का सारा धन तो हड़प ही लिया, जान भी ले ली. पंजाब के जनपद नवांशहर में थाना काठगढ़ के तहत एक गांव है मत्तो. यहां के किराना दुकानदार सोमनाथ के 7 भाईबहनों में सब से छोटी थी कविता रानी, जिस की शादी मोहल्ला शिवनगर निवासी सुरेंद्र कुमार से हुई थी. कालांतर में इस दंपति के 2 बेटे हुए, जिन्हें ले कर सुरेंद्र स्पेन चला गया था. पति और बेटों के जाने के बाद कवितारानी नवांशहर के अपने मकान में अकेली रह गई थी.

सोमनाथ बहन का हालचाल लेने के लिए अकसर उस के घर जाया करते थे. पहली दिसंबर, 2009 को शाम 6 बजे उन्हें स्पेन से कविता के बड़े बेटे अजय का फोन आया, ‘‘मामाजी, पिछले 2-3 दिनों से मम्मी को फोन कर रहा हूं, उन से बात नहीं हो पा रही है. आप जा कर जरा मां को देख आएं.’’

अजय की बात ने सोमनाथ को भी चिंता में डाल दिया. वह तुरंत नवांशहर के लिए रवाना हो गए. वहां पहुंच कर उन्होंने देखा, घर के बाहरी गेट पर ताला लटक रहा है. 2 लड़कों ने उन के पास आ कर बताया कि वे कालेज स्टूडैंट हैं और सामने वाले घर में किराए पर रहते हैं. उन में से एक ने उन्हें चाबी सौंपते हुए कहा, ‘‘2-3 दिनों पहले यह चाबी हमें यहां पड़ी मिली थी. शायद आंटीजी के कहीं जाते वक्त उन के हाथ से छूट कर गिर गई है. हम आप को पहचानते हैं, आप आंटीजी के भाई हैं न?’’

दोनों लड़कों ने अपने नाम अजीत चौहान और ऋषि चौहान बताते हुए कविता के घर की ओर इशारा कर के एक साथ कहा, ‘‘यह चाबी हमें इसी गेट के ताले की लग रही है. हम ने इसे उठा कर अपने पास रख लिया था कि आंटीजी के आने पर उन्हें दे देंगे.’’

सोमनाथ ने लड़कों को साथ ले कर गेट का ताला खोला. वे भीतर गए तो सामने के कमरे में भी ताला लगा था, साथ ही अंदर से तेज बदबू आ रही थी. सोमनाथ समझदार आदमी थे. उन्हें समझते देर नहीं लगी कि बदबू लाश की है. उन के मन में आया, ‘कहीं ऐसा तो नहीं कि भीतर उन की बहन मरी पड़ी हो और यह बदबू उसी की लाश से आ रही हो?’

यह बात मन में आते ही सोमनाथ दोनों लड़कों को साथ ले कर थाने जा पहुंचे. थानाप्रभारी राजकुमार ने उन से तहरीर ले कर मामला दर्ज करवाया और पुलिसपार्टी के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. पुलिस ने ताला तोड़ा और मुंह पर कपड़ा लपेट कर भीतर गई. घर का सारा सामान बिखरा पड़ा था और उस के बीच चादर में लिपटी कविता की लाश पड़ी थी. लग रहा था कि मामला लूटपाट के लिए कत्ल का है. कविता के गले में उसी का दुपट्टा कस कर मारा गया था. अपनी काररवाई पूरी कर के पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दिया. रात काफी हो जाने की वजह से काररवाई रोक कर पुलिस ने घर को सील कर दिया.

अगली सुबह पुलिस ने घर को फिर से खोल कर वहां की तलाशी ली तो एक ड्राइविंग लाइसेंस हाथ लगा, जो स्वामी सच्चिदानंद के नाम से था. पासपड़ोस के लोगों ने लाइसेंस देख कर बताया कि यह बहुत मशहूर आदमी है, टीवी के साधना चैनल पर इस के नियमित प्रवचन आते हैं. पता चला कि यह बक्करखाना क्षेत्र में किराए का घर ले कर रहता था. वहीं अपना डेरा बना कर वह प्रवचन दिया करता था, जिसे सुनने के लिए काफी लोग आया करते थे, जिन में कविता रानी भी थी. स्वामी को संदेह के दायरे में रख कर पुलिस ने उस के यहां छापा मारा. पता चला कि स्वामीजी उस रात एक स्थानीय जागरण में व्यस्त थे, जहां से फारिग होने के बाद सुबह ही अपने कुछ शिष्यों के साथ कुरुक्षेत्र चले गए थे.

जागरण आयोजकों ने पुलिस को बताया कि उस रात स्वामीजी थोड़ीथोड़ी देर के लिए 2 बार जागरण में आए थे. मतलब यह रात भर वह जागरण में नहीं रहे थे. पुलिस ने अपना सारा ध्यान स्वामी सच्चिदानंद पर जमा दिया, साथ ही उन के बारे में पता करने के लिए मुखबिरों का भी सहारा लिया गया. मुखबिरी के आधार पर 7 दिसंबर, 2009 को स्वामी को उस वक्त बंगा रेलवे फाटक के पास से गिरफ्तार कर लिया गया, जब वह अपनी इंडिका कार से अपनी एक शिष्या के साथ कहीं जा रहा था.

विधिवत गिरफ्तारी के बाद सच्चिदानंद को अदालत पर पेश कर के 2 दिनों के कस्टडी रिमांड पर लिया गया. उस से व्यापक पूछताछ की गई. इस पूछताछ से स्वामी सच्चिदानंद की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस तरह थी: जिला गुरदासपुर का बड़ा कस्बा है कादियां. यहां के मोहल्ला धर्मपुरा के रहने वाले तिलकराज भारद्वाज छिटपुट काम कर के अपने परिवार का भरणपोषण करते थे. उन की 7 औलादें थीं, जिन में दूसरे नंबर का था सत्येंद्र कुमार. बचपन ही से उसे एक्टिंग का शौक था.

जैसेजैसे वह बड़ा होता गया, उस के मन में एक्टर बनने की इच्छा प्रबल होती गई. सत्येंद्र की यह इच्छा तो पूरी नहीं हुई, लेकिन दसवीं पास करने के बाद उसे पंजाब सरकार के रेवेन्यू विभाग में पटवारी की नौकरी जरूर मिल गई. यह अलग बात है कि अपनी इस नौकरी से वह संतुष्ट नहीं था. उसे जहां कहीं किसी फिल्म की शूटिंग होने की बात पता चलती, वह छुट्टी ले कर वहां पहुंच जाता. अपनी इसी सनक के चलते एक बार वह छुट्टी ले कर मुंबई गया तो काफी दिनों बाद लौटा. परिणामस्वरूप उसे नौकरी से बरखास्त कर दिया गया. इस के बाद वह किसी अन्य काम की तलाश में दिल्ली चला गया. यहांवहां भटकते हुए एक दिन वह पानी पीने के लिए एक ऐसे डेरे में चला गया, जहां एक संत का प्रवचन चल रहा था.

वहां बहुत भीड़ थी. पानी की तो छोडि़ए, वहां तरहतरह के पकवान मुफ्त में बांटे जा रहे थे. पेट भर खाने के बाद सत्येंद्र वहीं पसर गया. जितना बढि़या खाना उसे वहां खाने को मिला था, उस से भी कहीं ज्यादा मजा आया उसे प्रवचन सुनने में उस ने देखा कि श्रद्धालु न केवल संतजी के पैरों में माथा टेक रहे थे, बल्कि अच्छीभली रकम भी चढ़ा रहे थे. बस, यहीं से सत्येंद्र का दिमाग दूसरी दिशा में सोचने लगा. उसे लगा कि इस अंधविश्वासी देश में नाम और दाम कमाने का इस से बेहतर जरिया कोई दूसरा नहीं हो सकता.

पूछताछ में सत्येंद्र ने पुलिस को बताया, ‘‘वाकजाल फैलाने में मैं कुशल था ही, मेरी वाणी में भी ओज था. ऊपर वाले ने चेहरामोहरा भी आकर्षक दिया था. अपनी बात कहने का तरीका भी मुझे काफी हद तक आ गया था. बस थोड़ी जरूरत थी धर्म शास्त्रों की जानकारी की. बिना देरी किए मैं धर्मकर्म का ज्ञान जुटाने लगा. बाबाओं के प्रवचन पूरे ध्यान से सुनने लगा. टीवी चैनलों पर खरीदे गए वक्त में बाबा प्रवचन देने आते तो मैं ध्यान से उन का तौरतरीका देखता और पूरे मनोयोग से उन के प्रवचनों को सुनता.

‘‘आखिर मैं ने तय कर लिया कि मैं इसी धंधे को अपना कर नाम और दाम कमाऊंगा. इस के लिए मैं ने सब से पहले अपने लिए गेरुआ वस्त्र सिलवाए. फिर धार्मिक ग्रंथ खरीद कर उन का अध्ययन शुरू कर दिया. थोड़ीबहुत तैयारी कर के सन् 2004 में मैं छोटेमोटे धार्मिक समारोहों में प्रवचन देने लगा. आत्मविश्वास से भरे मेरे प्रवचन लोगों को पसंद आने लगे. अब मैं ने अपने आप को स्वामी सच्चिदानंद कहलवाना शुरू कर दिया था.’’

सत्येंद्र के बताए अनुसार, पता नहीं यह उस की आवाज का जादू था या उस के आकर्षक व्यक्तित्व का कमाल कि उस के प्रवचनों की धाक जमने लगी. धीरेधीरे उस का सर्कल बढ़ने लगा. जल्दी यह स्थिति आ गई कि उस के कार्यक्रमों में धर्मभीरु लोगों की अच्छीखासी भीड़ जुटने लगी. चढ़ावे के रूप में काफी पैसा भी आने लगा. लोगों की अंधश्रद्धा को देखते हुए उस ने अपना नाम स्वामी सतिंदरानंद की जगह स्वामी सच्चिदानंद रख लिया. क्योंकि इस नाम में कुछ ज्यादा आकर्षण था. उस के दिन तेजी से बदलने लगे. उन्हीं दिनों उस का संपर्क दिल्ली के गणेशनगर निवासी चमनलाल मोंगा से हुआ. उस का अपना कारोबार था. जल्दी ही वह उस का शिष्य बन कर दिनरात उस की सेवा करने लगा. मोंगा को किसी बात की कोई चिंता नहीं थी. लेकिन वह इस लोक में रहतेरहते अपना परलोक सुधारना चाहता था.

मोंगा ने इस बारे में जब स्वामी सच्चिदानंद से बात की तो उस ने उसे यह कह कर डरा दिया कि वह परलोक की चिंता छोड़े, अभी तो उस का यह लोक भी नहीं संवरा. इस पर उस ने सच्चिदानंद के पैर पकड़ लिए. तब उस ने उसे झांसे में लेने का प्रयास करते हुए कहा कि उस के एकलौते बेटे की उम्र केवल 3 महीने रह गई है. यही नहीं, उस की एकलौती बेटी भी उस की इस तरह दुश्मन बन जाएगी कि वह कहीं का नहीं रहेगा. इस पर मोंगा बच्चों की तरह फूटफूट कर रोते हुए सच्चिदानंद के पैरों पर नोटों की गड्डियां रख कर बर्बाद होने से बचाने की प्रार्थना करने लगा.

स्वामी सच्चिदानंद ने मोंगा को जो बातें बताईं थीं, उन्हें सच साबित करने के लिए उस ने जाल बिछाना शुरू कर दिया. उस ने मोंगा की जवान बेटी को बुला कर उसे अपने जाल में फंसा लिया. जब लड़की वश में हो गई तो उस ने उसे कुछ इस तरह से उकसाया कि उस ने अपने पिता समेत 11 लोगों पर गैंगरेप का केस दर्ज करवा दिया और खुद उस के साथ उस के डेरे में रहने लगी. साधना चैनल पर सच्चिदानंद का जो कार्यक्रम आता था, उस का सारा खर्च चमनलाल मोंगा उठाता था, लेकिन उस ने उस का चमन उजाड़ कर उस की बेटी को अपनी शिष्या बना लिया था.

फिर 2008 के अंत में वह उसे साथ ले कर नवांशहर चला गया. यहां आ कर उस ने प्रचार किया कि उस का एक भाई जज है. अपना प्रभाव जमाने के लिए उस ने यह भी प्रचारित किया कि पहले वह भी जज था, लेकिन मोहमाया त्याग कर उस ने साधु का चोला पहन लिया है. नवांशहर में वह खूब मशहूर हो गया. बक्करखाना रोड पर किराए का मकान ले कर सच्चिदानंद ने अपना डेरा बना लिया और रोज प्रवचन करने लगा. उस के यहां श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी. इन्हीं में कविता रानी भी थी, जो उस से कुछ ज्यादा ही प्रभावित हो गई थी. उस का पति और बेटे विदेश में थे. करने को उस के पास कुछ था नहीं. वह भी परलोक सुधारने की गरज से उस के यहां जाने लगी थी और उस की शिष्या बन गई थी. बहाने बना कर उस ने उस से करीब 6 लाख रुपए ऐंठ लिए थे.

एक दिन कविता को विश्वास में ले कर सच्चिदानंद ने उस से कहा कि उस से खार खाने वाले लोंगों ने उस पर झूठे मुकदमे कर दिए हैं, जिन्हें खत्म करवाने के लिए उसे 20 लाख रुपए चाहिए. इस से कविता को उस पर शक हो गया. परिणाम यह हुआ कि उस ने उस से अपना पिछला पैसा मांग लिया. तब सच्चिदानंद को लगा कि उस का पांसा उल्टा पड़ गया है. कुछ दिन तो वह उसे टालता रहा, लेकिन जब वह उस के पीछे ही पड़ गई तो उसे लगा कि कविता अपना पैसा वापस ले कर ही रहेगी. इस मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए सच्चिदानंद ने एक योजना बनाई. 28 नवंबर, 2009 को उस ने फोन कर के कविता से कहा कि पैसों का इंतजाम हो गया है, आज वह उसे उस के पूरे 6 लाख रुपए दे देगा.

साथ ही यह भी कहा कि जागरण की वजह से वह थोड़ा व्यस्त है, इसलिए रात में 10, साढ़े 10 बजे पैसा देने आएगा, क्योंकि सुबह उसे कुरुक्षेत्र जाना है. इस तरह जागरण के बीच से उठ कर वह कविता के यहां जा पहुंचा. कविता बेसब्री से उस का इंतजार कर रही थी. जैसे ही वह भीतर पहुंचा, उस ने सीधेसीधे अपने 6 लाख रुपए मांगे. उस ने रोनी सी सूरत बनाते हुए कहा, ‘‘क्या बताऊं, मैं ने तो पूरे 6 लाख रुपए का इंतजाम कर लिया था. लेकिन जगराता में झगड़ा हो जाने से किसी ने मेरी जेब से पैसे निकाल लिए.’’

‘‘देखो, तुम्हारा यह झूठफरेब मेरे आगे चलने वाला नहीं है. तुम सीधेसीधे मेरे 6 लाख रुपए निकालो वरना मैं तुम्हारी शिकायत पुलिस से करूंगी.’’

कविता के मुंह से इतना निकला था कि स्वामी सच्चिदानंद उर्फ सत्येंद्र ने पूरे जोर से उस की नाक पर घूंसा मारा. वह बेहोश सी हो कर नीचे गिरने को हुई, तभी उस ने उस के गले में पड़ा दुपट्टा उस की गरदन पर कस दिया. जरा सी देर में वह मौत की नींद सो गई. सच्चिदानंद ने उस की लाश चादर में लपेट कर एक तरफ रख दी. उस के बाद कमरे का सामान इस तरह बिखेर दिया, जैसे वहां किसी ने लूटपाट की हो. यह उस का दुर्भाग्य ही था कि यह सब करते समय उस का ड्राइविंग लाइसेंस वहां गिर गया. उस ने कविता के दोनों सैलफोन भी उठा लिए थे, जिन्हें बाद में उस ने तोड़ दिए थे.

कविता को ठिकाने लगाने के बाद कथित स्वामी सच्चिदानंद इत्मीनान से जा कर जागरण में बैठ गया, ताकि उस पर किसी को शक न हो. सुबह 6 बजे अपने चेलों को ले कर वह कुरुक्षेत्र चला गया. बाद में दिल्ली वाली अपनी शिष्या को भी उस ने वहीं बुला लिया. इस के बाद वह जालंधर और अमृतसर में घूमता रहा. आखिर बंगा फाटक से गुजरते हुए वह पकड़ा गया. कथित स्वामी सच्चिदानंद के साथ पकड़ी गई उस की शिष्या से भी पुलिस ने पूछताछ की. लेकिन वह कविता की हत्या के षडयंत्र में शामिल नहीं थी. वह तो खुद ढोंगी स्वामी के जाल में फंसी हुई थी, जिस ने उस के दबाव में अपने पिता तथा अन्य लोगों पर बलात्कार का मुकदमा दर्ज करा दिया था.

इस मामले में उस की कोई भूमिका न पाए जाने पर पुलिस ने उसे उस के अभिभावकों के हवाले कर दिया. 10 दिसंबर, 2009 को अभियुक्त सत्येंद्र उर्फ स्वामी सच्चिदानंद को फिर से अदालत में पेश कर के न्यायिक अभिरक्षा में भिजवा दिया गया. इस के ठीक एक महीने बाद कथित स्वामी सच्चिदानंद को जब पेशी पर अदालत ले जाया जा रहा था तो रास्ते में पुलिस वालों को गच्चा दे कर वह फरार हो गया. पंजाब पुलिस ने पूरा जोर लगा दिया, लेकिन वह आदमी दोबारा उन के हत्थे नहीं चढ़ा. देखतेदेखते साढ़े 5 साल का लंबा अरसा गुजर गया.

मगर जैसी कि कहावत है, 100 दिन चोर के 1 दिन साधु का. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सैल ने 6 जुलाई, 2015 को कथित स्वामी सच्चिदानंद को बेगमपुर इलाके के एक मकान से गिरफ्तार कर लिया. स्पैशल सैल के डीसीपी राजीव रंजन, एसीपी संदीप ब्याला और इंसपेक्टर संजय नागपाल ने उस से सख्ती से पूछताछ की तो अपनी उक्त कहानी बताने के बाद उस के आगे की दास्तान इस तरह से सुनाई: दरअसल ढोंगी सत्येंद्र उर्फ सच्चिदानंद नवांशहर में बहुत बुरी तरह फंस गया था. उस के खिलाफ कत्ल का मुकदमा दर्ज हो गया था. पुलिस ने उसे पकड़ कर जेल भी भिजवा दिया था. चूंकि उस के सारे सपने चकनाचूर हो गए थे, इसलिए वह भाग निकला. वहां से भागने के बाद सच्चिदानंद उत्तराखंड पहुंच कर साधुओं की एक टोली में शामिल हो कर उन की सेवा करने लगा. अपना रंगरूप भी उस ने साधुओं जैसा ही बना लिया था.

कुछ दिनों बाद वह उत्तरकाशी चला गया, जहां किस्मत से विश्वनाथ मंदिर में उसे पुजारी की नौकरी मिल गई. दिल्ली में उस की शिष्या यानी प्रेमिका थी कल्पना. एक दिन साधु वेश में ही वह दिल्ली जा कर उस से मिला. कल्पना उस की प्रेम दीवानी थी. नवांशहर में भी वह उस के साथ पकड़ी गई थी, मगर पुलिस ने उसे शुरू ही में निर्दोष मान कर उस के कुछ रिश्तेदारों के हवाले कर दिया था. सच्चिदानंद को कत्ल केस में गिरफ्तार कर के हवालात में डाल दिया गया. वहां से उस के फरार हो जाने के बारे में कल्पना को कुछ पता नहीं था. पता चलने पर भी न उस ने इस बात का बुरा माना और न जरा भी घबराई, बल्कि उस के साथ उत्तरकाशी में रहने को तैयार हो गई.

जबकि सच्चिदानंद के लिए फिलहाल यह संभव नहीं था. विश्वनाथ मंदिर से उसे इतना पैसा नहीं मिलता था कि वह अपने साथसाथ कल्पना का भी खर्च उठा पाता. दूसरी ओर वह कल्पना को छोड़ना भी नहीं चाहता था. इसलिए अतिरिक्त धन कमाने के लिए उस ने अलग से कोई धंधा करने की सोची. नए धंधे के रूप में उस ने पंजाब में स्मैक सप्लाई करना शुरू कर दिया. इस से उसे मोटी कमाई होने लगी तो वह विश्वनाथ मंदिर को छोड़ कर दिल्ली में ही रहने लगा. अब वह एक तरफ मादक पदार्थों की तस्करी कर रहा था तो दूसरी तरफ दिल्ली के कई इलाकों में प्रवचन कर के अपने आडंबर को भी जारी रखे हुए था. बीचबीच में वह धर्मांध लोगों को चूना लगाने से भी बाज नहीं आ रहा था. इन ठगियों से उस ने कई लोगों की संपत्तियां भी हथिया ली थीं.

कथित स्वामी सच्चिदानंद अपने सभी काम पूरी होशियारी से कर रहा था. फिर भी मादक पदार्थों की तस्करी करते 14 अक्तूबर, 2014 को वह पंजाब में पठानकोट पुलिस के हत्थे चढ़ गया. चूंकि वह साधु लिबास में था और मादक पदार्थों की मात्रा भी कुल 250 ग्राम थी, इसलिए उस ने पुलिस को यही बताया कि यह नशा वह अपने निजी इस्तेमाल के लिए रखे हुए था. जो भी हो, पुलिस ने उस की बातों में आ कर उस से सख्त पूछताछ नहीं की, वरना उस के द्वारा किए गए कत्ल जैसे संगीन अपराध का तभी खुलासा हो जाता और वह जालंधर की उसी जेल में सलाखों के पीछे होता, जहां से अदालत ले जाते वक्त फरार हुआ था.

खैर, पठानकोट पुलिस ने सच्चिदानंद से नरमी का व्यवहार करते हुए उस का कस्टडी रिमांड न ले कर उसे अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. इस का फायदा उठा कर एक दिन उस ने वहां से भी फरार होने की सोची. एक दिन जेल के अपने सैल में लेटे हुए उस ने यह कह कर जोरों से चिल्लाना शुरू कर दिया कि उस के पेट में जोरों का दर्द हो रहा है. जेल अधिकारियों ने तत्काल उसे अस्पताल में भरती करवाने की व्यवस्था कर दी. अस्पताल में उस की निगरानी के लिए 2 सिपाही भी तैनात किए गए. आखिर वह उन्हें चकमा दे कर पहली ही रात अस्पताल से फरार हो गया.

वहां से वापस दिल्ली पहुंच कर वह कल्पना के साथ लिव इन रिलेशन में रहने लगा, साथ ही स्वामी सच्चिदानंद के रूप में प्रवचनों के कार्यक्रम भी करता रहा. लेकिन पता नहीं कैसे पुलिस ने उस के आपराधिक अतीत का पता लगा कर उसे गिरफ्तार कर लिया. दिल्ली पुलिस ने अपनी पूछताछ पूरी कर सत्येंद्र उर्फ स्वामी सच्चिदानंद को न्यायिक हिरासत में भेजने की व्यवस्था करने के अलावा पंजाब पुलिस को उस की गिरफ्तारी की सूचना दे दी. पठानकोट पुलिस की एक टीम दिल्ली जा कर उसे ट्रांजिट रिमांड पर ले आई. इस बार उन्होंने स्वामी सच्चिदानंद उर्फ सत्येंद्र से गहन एवं व्यापक पूछताछ की. इस पूछताछ में भी उस ने वही सब बताया था, जो वह पहले ही दिल्ली पुलिस को बता चुका था.

पूछताछ के बाद उसे न्यायिक हिरासत में गुरदासपुर की सैंट्रल जेल भेज दिया गया, जहां से नवांशहर पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर ले गई. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Hindi Crime Story: वासना की आग – परिवार हुआ बरबाद

Hindi Crime Story:‘‘तुम्हारी बात तो कोई नहीं है, क्योंकि तुम तो कभी मेरा कहना मानती ही नहीं हो. पर कम से कम बेटियों का तो खयाल रखो. तुम्हारी आदतों का उन पर गलत प्रभाव पड़ सकता है. उन के बारे में तो सोचो.’’ राम सजीवन ने अपनी पत्नी फूलमती को समझाते हुए कहा.

‘‘हमें पता है कि हमें अपनी बेटियों को कैसे रखना है. हम कोई नासमझ नहीं हैं, जो अच्छीबुरी बात न समझें. लेकिन तुम्हें तो केवल दूसरों की बातें सुन कर हमारे ऊपर आरोप लगाने में ही मजा आता है.’’ पत्नी फूलमती ने झल्लाते हुए पति की बातों का जबाव दिया.

‘‘दूसरे की बातों में क्यों आऊंगा मैं? क्या मुझे दिखाई नहीं दे रहा कि तुम क्या करती हो. तुम्हारी बातें पूरे मोहल्ले में किसी से भी छिपी हुई नहीं हैं.’’ कहते हुए राम सजीवन घर से बाहर जाने लगा.

‘‘दरअसल, अब तुम शक्कीमिजाज के हो गए हो. हमारे पास जो भी खड़ा हो जाए. जो भी हमारे काम आ जाए. हमारे दुखदर्द में शामिल हो जाए, उसे देख कर तुम केवल यही सोचते हो कि उस के हमारे साथ संबंध बन गए हैं.’’ फूलमती बोली.

‘‘हम शक नहीं कर रहे बल्कि हकीकत है. हमें अब तुम्हारी चिंता नहीं है क्योंकि तुम मनमानी करोगी. हम तो बस बेटियों को ले कर परेशान हो रहे हैं. एक बार वे अपने घर चली जाएं. बस, उस के बाद तो हम तुम्हें कभी देखेंगे भी नहीं.’’ राम सजीवन ने कहा.

पत्नी की गलत आदतों की वजह से राम सजीवन मानसिक रूप से परेशान रहने लगा था. उस के एक बेटा और 3 बेटियां थीं. वह अपने तीनों जवान बच्चों को भी अच्छी सीख देता रहता था. जब उसे लगा कि पत्नी पर उस के कहने का कोई असर नहीं हो रहा है तो उस ने खुद को परिवार से दूर करना शुरू किया. वह स्वभाव से एकाकी रहने लगा. 38 साल की फूलमती ने 20-22 साल के कई लड़कों के साथ दोस्ती कर ली थी. वह उन लड़कों को अपने घर पर बुलाती रहती थी. यह बात मोहल्ले वालों से भला कैसे छिपी रह सकती थी. जिस से पूरे मोहल्ले में फूलमती के ही चर्चे होते रहते थे.

राम सजीवन को लगता था कि पत्नी की बुरी हरकतों का प्रभाव उस की जवान हो रही बेटियों पर पड़ेगा. इस कारण वह पत्नी को लड़कों की संगत से दूर रहने को कहता था. पति की बात को मानने के बजाय फूलमती उस से झगड़ने लगती थी. इस कारण पति और पत्नी अलगअलग रहने लगे.

राम सजीवन अपने घर से दूर अपने प्लौट पर बने मकान में रहने लगा था. जबकि फूलमती लखनऊ के ही थाना गोसाईंगंज स्थित बखारी गांव के मजरा रानीखेड़ा में एक बेटे रवि कुमार और तीनों बेटियों के साथ रह रही थी. पति के अलग रहने से फूलमती को और भी आजादी मिल गई थी. क्योंकि अब उसे कोई रोकनेटोकने वाला नहीं था. अलग मकान पर रहने के बाद भी राम सजीवन पत्नी को अकसर समझाता रहता था, जिस की वजह से दोनों में झगड़ा भी हो जाता था.

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11 मई, 2021 की बात है. लखनऊ शहर के थाना गोसाईंगंज स्थित बखारी गांव के मजरा रानी खेड़ा के रहने वाले रवि कुमार ने पुलिस को सूचना दी कि उस के पिता 40 साल के राम सजीवन की हत्या किसी ने गांव के बाहर कर दी गई है. उस के पिता अपने घर से दूर प्लौट पर रहते थे. सूचना पा कर थानाप्रभारी अमरनाथवर्मा पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने लाश का निरीक्षण किया तो उस का चेहरा ईंट से कुचला हुआ था. खून सनी ईंट भी वहीं पड़ी थी. मृतक के घर के लोग वहां मौजूद थे. उन से प्रारंभिक पूछताछ के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. अज्ञात के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने के बाद पुलिस ने जांच शुरू कर दी.

राम सजीवन दलित था. गांव में उस की किसी से ऐसी कोई दुश्मनी नहीं थी जिस की वजह से हत्या की जा सके. ऐसे में पुलिस को हत्या की वजह समझ नहीं आ रही थी. लखनऊ के पुलिस कमिश्नर डी.के. ठाकुर के निर्देश पर डीसीपी (दक्षिण) डा. ख्याती गर्ग, अपर पुलिस उपायुक्त (दक्षिण) पूर्णेंदु सिंह और एसीपी स्वाति चौधरी के निर्देशन में गोसाईंगंज के थानाप्रभारी इंसपेक्टर अमरनाथ वर्मा के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई गई.

टीम में इंसपेक्टर डा. रामफल प्रजापति, एसआई फिरोज आलम सिद्दीकी, दीपक कुमार पांडेय, महिला एसआई नीरू यादव, कांस्टेबल गिरजेश यादव, रमापति पांडेय, अकबर, कुलदीप, सगीर अहमद, किशन जायसवाल, जितेंद्र भाटी को शामिल किया गया. थाना पुलिस के अलावा क्राइम ब्रांच की टीम को भी केस की जांच में लगा दिया गया. इस टीम में इंसपेक्टर तेज बहादुर सिंह, एसआई संतोष कुमार सिंह, दिलीप मिश्रा, प्रमोद कुमार सिंह कांस्टेबल विनय यादव, वीर सिंह, अजय तेवतिया, राजीव कुमार और अभिषेक कुमार शामिल थे.

राम सजीवन की हत्या की वजह जानने के लिए जब पुलिस ने उस की पत्नी फूलमती से पूछा तो वह बोली, ‘‘उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. हमारे साथ भी कोई लड़ाईझगड़ा नहीं था. बस वह नाराज हो कर गांव के बाहर वाले मकान में रहते थे.’’

फूलमती के पति की हत्या हुई थी. इस कारण वह परेशान थी. इस वजह से पुलिस बहुत दबाव डाल कर उस से पूछताछ नहीं कर पा रही थी. फूलमती हर बार बयान बदल रही थी. एक बार उस ने कहा, ‘‘वह खराब संगत में रहता था. इस कारण कुछ नशेड़ी लोगों से उस की दोस्ती हो गई थी. हो सकता है कि उन लोगों में से किसी ने नशे में हत्या की हो.’’

पुलिस को भी राम सजीवन का शव जिस हालत में मिला था, उसे देख कर ऐसा ही लग रहा था जैसे किसी ने मारने के बाद भी अपना गुस्सा निकालने के लिए ईंट से हमला कर के मुंह को कुचल दिया हो. जिस से उस की पहचान न हो सके. पर यह मसला पहचान छिपाने का नहीं दुश्मनी का लग रहा था. पुलिस ने गांव के लोगों से भी पूछताछ शुरू की तो पता चला कि राम सजीवन और उस की पत्नी के झगड़े की वजह पत्नी का कुछ अलग लोगों से संबंध था. 4 बच्चों की मां होने के बाद भी फूलमती दूसरे लोगों से हंसीमजाक करने में आगे रहती थी.

इस जानकारी के बाद पुलिस ने फूलमती से फिर से पूछताछ शुरू की. बारबार बयान बदलने से पुलिस को भी यह विश्वास होने लगा कि हत्या की जानकारी फूलमती को जरूर होगी. पुलिस के साथ पूछताछ और सवालों में वह फंस गई. थानाप्रभारी ने पूछा, ‘‘तुम्हें यह तो पता है कि किस ने मारा है. भले ही तुम उस में शामिल न रही हो. अगर तुम सच बता दोगी तो तुम्हें कुछ नहीं होगा. जिस ने यह हत्या की है, उसी को सजा मिलेगी.’’

पुलिस से यह भरोसा पा कर फूलमती ने कहा, ‘‘गांव बखारी के ही रहने वाले कल्याण ने यह किया है. राम सजीवन उसे हमारे घर आता देख कर गुस्सा होता था. यह बात उस से सहन नहीं हुई तो उस ने राम सजीवन की हत्या कर दी.’’

अब पुलिस टीम ने बिना समय गंवाए कल्याण को पकड़ लिया. कल्याण ने खुद को फंसता देख पूरी कहानी बता दी. कल्याण ने बताया, ‘‘राम सजीवन को मेरा फूलमती से मिलनाजुलना अच्छा नहीं लगता था. इस बात से वह फूलमती से नाराज रहता था. फूलमती भी पति की रोजरोज की कलह से परेशान हो गई थी. उसी के कहने पर राम सजीवन को रास्ते से हटाया.

‘‘फूलमती के दबाव डालने के बाद मैं ने उसे रास्ते से हटाने की योजना बनाई. मैं अकेले यह काम करने की हालत में नहीं था. इसलिए मैं ने अपने साथी सतीश से बात की. सतीश आपराधिक प्रवृत्ति का था. वह सुरियामऊ गांव का रहने वाला था.

‘‘हम लोगों ने अपने 2 और साथी सूरज और नीरज को भी शामिल किया. इस के बाद 11 मई की रात को राम सजीवन के घर में घुस कर हम चारों ने उस की हत्या कर दी.’’

कल्याण ने बताया, ‘‘राम सजीवन की हत्या करने के बाद उस के शव को घर से 100 मीटर दूर गांव से बाहर वाली सड़क पर डाल दिया. इस की जानकारी फृलमती को दी तो उस ने अपने मन की भड़ास और गुस्सा निकालने के लिए ईंट से मृत पति के चेहरे पर कई वार किए. मुंह को बुरी तरह से कुचल दिया.’’

कल्याण से मिली जानकारी के आधार पर गोसाईंगंज पुलिस ने सब से पहले फूलमती को पकड़ा उस के बाद रानीखेड़ा के रहने वाले 20 साल के सूरज, सुरियामऊ के रहने वाले 22 साल के सतीश, इसी गांव के 19 साल के नीरज को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने आरोपियों के पास से खून लगे कपड़े भी बरामद किए.

पुलिस ने राम सजीवन हत्याकांड में 5 अभियुक्तों राम सजीवन की पत्नी फूलमती, कल्याण, सतीश, सूरज और नीरज के खिलाफ धारा 302, 147, 149 और 201 आईपीसी के साथ 3 (2) (5) एससीएसटी ऐक्ट के तहत गिरफ्तार कर लिया. गोसाईंगंज थाना पुलिस और क्राइम टीम ने राम सजीवन की निर्मम हत्या करने वाले सभी आरोपियों को गिरफ्तारकर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया. Hindi Crime Story

UP News: प्यार में खत्म हुई ‘सीमा’

UP News: नाबालिग सीमा अपने प्रेमी प्रभु के साथ भाग गई थी. पुलिस ने सीमा को बरामद कर के प्रभु को गिरफ्तार भी कर लिया. इस के बावजूद जब सीमा की हत्या हो गई तो पुलिस को संदेह उस के घर वालों पर ही हुआ. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बरेली जनपद के थाना विशारतगंज के मोहल्ला वार्ड नंबर 11 में भूरे खां अपने परिवार के साथ रहता था. भूरे के परिवार में पत्नी नसीम, 6 बेटियां और 2 बेटे थे. इन में केवल सब से बड़ी सकीना का विवाह हुआ था, बाकी सभी अविवाहित थे.

इश्तियाक दिल्ली में किसी फैक्ट्री में नौकरी करता था. मुश्ताक भी कुछ दिनों तक दिल्ली में रहा था, लेकिन इधर वह घर पर ही रह रहा था. पूरा परिवार जरी का काम करता था, जिस से होने वाली कमाई से उन के घर का खर्च आसानी से चल रहा था. भूरे की 15 साल की बेटी सीमा किशोरावस्था की सीमा पार कर के जवानी की दहलीज पर कदम रख रही थी. जवानी की चमक से उस का रूपरंग दमकने लगा था. वह ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, इस के बावजूद उसे फिल्मों का जबरदस्त शौक था. उस की सहेलियां भी उसी जैसी सोच की थीं. इसलिए उन में जब भी बातें होतीं, फिल्मों और उन में दिखाए जाने वाले प्रेमसंबंधों को ले कर होतीं.

यह उम्र का ही तकाजा था कि सीमा को उन बातों में खूब मजा आता था. उस के दिल में भी उमंगें थीं, उस के ख्यालों में भी अपने चाहने वाले की तस्वीर थी. लेकिन यह तस्वीर कुछ धुंधली सी थी. उस की आंखें ख्यालों की तस्वीर के चाहने वाले की तलाश किया करती थीं. लेकिन काफी कोशिशों के बाद भी वह धुंधली तस्वीर साफ हो रही थी और न वह कहीं नजर आ रहा था. उस के आगेपीछे चक्कर लगाने वाले लड़के कम नहीं थे, लेकिन उन में से एक भी ऐसा नहीं था, जो उस के ख्यालों की तस्वीर में फिट बैठता.

2 साल पहले सीमा पिता भूरे के साथ एक रिश्तेदारी में बरेली के ही एक गांव रेवती गई. यह गांव उस के गांव से ज्यादा दूर नहीं था. लौटते समय वह रेवती रेलवे स्टेशन पर खड़ी ट्रेन का इंतजार कर रही थी, तभी एक वेंडर युवक पानी की बोतल बेचते हुए उस के पास से गुजरा. उस लड़के में सीमा ने न जाने क्या देखा कि उस का दिल एकदम से धड़क उठा. उस की निगाहें उस पर टिक कर रह गई. उस के दिल से आवाज आई, ‘सीमा यही है तेरा चाहने वाला.’

उस युवक का चेहरा आंखों के रास्ते दिल में पहुंचा तो उस के ख्यालों में बनी धुंधली तस्वीर, बिलकुल साफ हो गई. वह युवक जब तक उस की नजरों के सामने रहा, सीमा उसे एकटक निहारती रही. उसे अपनी ओर इस तरह निहारते देख वह युवक भी बारबार उसी को देखने लगा. जब उन की निगाहें आपस में मिल जातीं तो दोनों के होंठों पर मुसकराहट तैर उठती. ट्रेन आई तो सीमा पिता के साथ ट्रेन में बैठ गई. पूरे रास्ते उस की आंखें के सामने उसी युवक का चेहरा घूमता रहा.

वह विशारतगंज रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से उतर कर स्टेशन से बाहर आई तो उस नवयुवक को एक अंडे की दुकान पर देखा. वह ग्राहकों को अंडे बेच रहा था. इस का मतलब वह दुकान उसी की थी. इस का मतलब युवक विशारतगंज का रहने वाला था. यह जान कर सीमा को काफी खुशी हुई. उस ने सोचा कि वह जब भी चाहेगी, उस युवक के बारे में पता कर के उस से मिल सकेगी. यह बात दिमाग में आते ही उसे काफी सुकून मिला. वह पिता के साथ घर आ गई.

सीमा ने जल्दी ही उस युवक के बारे में पता कर लिया. उस का नाम था प्रभु गोस्वामी. वह वार्ड नंबर 6 में रहता था. उस के पिता महेश की मौत हो चुकी थी. परिवार में मां और 2 छोटे भाई थे. घर प्रभु की ही कमाई से चल रहा था. रेलवे स्टेशन के पास वह अंडे की दुकान लगाता था, साथ ही स्टेशन और ट्रेन में पानी की बोतलें बेच लेता था. एक दिन सुबह प्रभु छत पर बैठा मौसम का आनंद ले रहा था, तभी अचानक उस के मोबाइल की घंटी बज उठी. इतनी सुबह फोन करने वाला उस का कोई दोस्त ही होगा, यह सोच कर वह मोबाइल स्क्रीन पर नंबर देखे बगैर ही बोला, ‘‘हां बोल?’’

‘‘जी, आप कोन बोल रहे हैं?’’ दूसरी ओर से किसी लड़की की मधुर आवाज आई तो प्रभु चौंका. उसे अपनी गलती का अहसास हुआ तो उस ने तुरंत ‘सौरी’ कहते हुए कहा, ‘‘माफ करना, दरअसल मैं ने सोचा कि इतनी सुबहसुबह कोई दोस्त ही फोन कर सकता है, इसीलिए… वैसे आप को किस से बात करनी है, आप कौन बोल रही हैं?’’

‘‘मैं सीमा बोल रही हूं. मुझे भी अपनी दोस्त से बात करनी थी. लेकिन लगता है नंबर गलत डायल हो गया है.’’

‘‘कोई बात नहीं, आप को अपनी दोस्त का नंबर सेव कर के रखना चाहिए. ऐसा करेंगी तो गलती नहीं होगी.’’

‘‘आप पुलिस में हैं क्या?’’

‘‘नहीं तो, क्यों?’’

‘‘बात तो पुलिस वालों की ही तरह कर रहे हो. सवाल के साथ सलाह भी.’’ कह कर सीमा जोर से हंसी.

‘‘अरे नहीं, मैं ने तो वैसे ही कह दिया. दोस्त आप की, फोन भी आप का. आप चाहें नंबर सेव करें या न करें.’’

‘‘आप बुजुर्ग हैं?’’ सीमा ने फिर छेड़ा.

‘‘जी नहीं, अभी मैं नौजवान हूं.’’

‘‘तब तो किसी न किसी के खास होंगे?’’

‘‘आप बहुत बातें करती हैं.’’

‘‘अच्छी या बुरी?’’

‘‘अच्छी.’’

‘‘क्या अच्छा है मेरी बातों में?’’

अब हंसने की बारी प्रभु की थी. वह जोर से हंसा फिर बोला, ‘‘माफ करना, मैं आप से नहीं जीत सकता.’’

‘‘और मैं माफ न करूं तो?’’

‘‘तो आप ही बताएं, मैं क्या करूं?’’ प्रभु ने हथियार डाल दिए.

‘‘अच्छा जाओ, माफ किया.’’

दरअसल, सीमा ने किसी तरह प्रभु का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया था. सीमा के पास खुद का मोबाइल नहीं था. इसलिए उस ने अपनी सहेली का मोबाइल ले कर बात की थी. पहली ही बातचीत में दोनों काफी घुलमिल गए. उन के बीच कुछ ऐसी बातें हुईं कि दोनों ही एकदूसरे के लिए अपनापन महसूस करने लगे. इस के बाद उन के बीच अक्सर बातें होने लगीं. सीमा ने प्रभु को बता दिया था कि उस दिन उस ने अनजाने में नहीं, जानबूझ कर फोन किया था और वह भी उस का नंबर हासिल कर के. इतना ही नहीं, उन की मुलाकात भी हो चुकी है.

जब प्रभु ने मुलाकात के बारे में पूछा तो सीमा ने रेवती रेलवे स्टेशन पर हुई मुलाकात के बारे में बता दिया. प्रभु यह जान कर खुश हआ, क्योंकि उस दिन सीमा का खूबसूरत चेहरा आंखों के जरिए उस के दिल में उतर चुका था. इस के बाद दोनों की मुलाकातें होने लगीं. दिनोंदिन उन का प्यार प्रगाढ़ होता गया. सीमा दीवानगी की हद तक प्रभु को चाहने लगी थी. प्रभु इस बात को बखूबी जानता था, लेकिन उस के दिमाग में जातिधर्म की बात बैठी हुई थी, इसलिए उसे हमेशा सीमा को खो देने का डर सताता रहता था. प्रेम दीवानों के प्रेम की खुशबू जब जमाने तक पहुंचती है तो लोग उन दीवानों पर तमाम बंदिशें लगाने लगते हैं. यही सीमा के घर वालों ने भी किया.

सीमा का गैरधर्म के लड़के के साथ इश्क लड़ाना घर वालों को रास नहीं आया. उन्होंने सीमा पर प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए. लेकिन तमाम बंदिशों के बाद भी सीमा प्रभु से मिलने का मौका निकाल ही लेती थी. इसी बीच एक मुलाकात में प्रभु को उदास देखा. सीमा ने कारण पूछा, ‘‘तुम्हारे दिल में ऐसी क्या बात है, जिस की वजह से तुम्हारे चेहरे पर उदासी छाई है?’’

‘‘कुछ नहीं, तुम्हें ऐसे ही लग रहा है.’’ प्रभु ने टालने की कोशिश की.

‘‘मुझे ऐसे ही नहीं लग रहा, कोई बात है जिस की वजह से तुम उदास हो. तुम्हें मेरी कसम, बताओ क्या बात है?’’

‘‘सीमा मुझे डर है कि मैं तुम्हें खो न दूं.’’

‘‘क्यों, तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?’’

‘‘हम दोनों की जाति तो छोड़ो, धर्म भी अलगअलग है. ऐसे में घर समाज ही नहीं, घर वाले ही हमारी शादी के लिए नहीं राजी होंगे.’’

‘‘सच्चा प्यार ऊंचनीच और जातिधर्म का मोहताज नहीं होता. लोग कहते हैं न कि जोडि़यां ऊपर वाला बनाता है. इसलिए हम दोनों में प्यार हुआ है तो इस का मतलब है कि ऊपर वाले को हमारा प्यार मंजूर है. फिर इस में संदेह की कोई बात कहां है.’’

‘‘लेकिन तुम्हरे घर वाले तो हमें दूर करने के लिए जमीनआसमान एक किए हुए हैं.’’

‘‘चिंता मत करो, मैं अपने घर वालों को किसी न किसी तरह समझा लूंगी. अगर नहीं समझा पाई तो हमारे सामने और भी रास्ते हैं. देखो प्रभु, हमें दुनिया से जितना लड़ना पड़े, हम लड़ेंगे और जीतेंगे भी. कोई ताकत हमें जुदा नहीं कर सकती.’’

इतना कह कर सीमा प्रभु के सीने से लग गई. ऐसी विपरीत परिस्थिति में भी सीमा ने हार नहीं मानी. उस की हिम्मत उस का प्यार था, जिसे वह हर हाल में अपने से जुदा नहीं कर सकती थी. फिर कुछ देर और बात कर के दोनों अपनेअपने घरों को लौट गए. सीमा ने अपने घर वालों से बात की, लेकिन वे राजी नहीं हुए, उल्टे उस की पिटाई कर दी. बंदिशों के बाद भी उन के चोरीछिपे मिलने की भनक सीमा के घरवालों को लग ही जाती थी. उसी बीच रामलीला मेले में प्रभु पर चाकू से जानलेवा हमला किया गया. लेकिन संयोग था कि प्रभु बच गया. पुलिस में शिकायत भी की गई, लेकिन पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की.

इस घटना ने सीमा को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर वे यहां रहें तो दोनें की जान को खतरा बना रहेगा. उन दोनों को अलग करने के लिए उस के घर वाले किसी भी हद तक जा सकते हैं, इसलिए उस ने एक फैसला लिया. 18 फरवरी को सीमा रेलवे स्टेशन पहुंची और प्रभु से भाग चलने की जिद करने लगी. प्रभु तैयार नहीं हुआ तो वह वहां खड़ी सद्भावना एक्सप्रेस के आगे लेट गई और जान देने की धमकी देने लगी. हार कर प्रभु को उस की बात माननी पड़ी. वह सीमा को वहां से अपने घर ले गया और छिपा दिया. रात में दोनों रेलवे स्टेशन पहुंचे और ट्रेन से हिमाचल प्रदेश चले गए. प्रभु घर से 10 हजार रुपए ले कर गया था. वहां दोनों ने विवाह कर लिया और पतिपत्नी की तरह रहने लगे.

इधर सीमा के घर वालों को प्रभु के साथ उस के भाग जाने की खबर लगी तो उन्होंने उस की खोजबीन शुरू कर दी. काफी खोजबीन के बाद भी जब उस का कुछ पता नहीं चला तो एक मार्च को सीमा के पिता भूरे ने विशारतगंज थाने में प्रभु और उस के चाचा रमेश पर तमंचे की नोक पर सीमा का अपहरण करने का आरोप लगाते हुए तहरीर दी. थानाप्रभारी शुजाउर रहीम ने प्रभु और रमेश के विरूद्ध भादंवि की धारा 363, 366, 452, 504 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस ने प्रभु के घरवालों और रिश्तेदारों पर दबाव बनाना शुरू किया तो प्रभु ने होली के एक दिन पहले 5 मार्च को एक भाजपा नेता के माध्यम से सीमा को पुलिस के हवाले कर दिया.

पुलिस ने उसे महिला थाना भेजने के बजाय बिना मैडिकल कराए ही परिजनों के हवाले कर दिया. 9 मार्च को उस के कोर्ट में बयान होने थे. इसी बीच 8 मार्च को देर रात पुलिस ने प्रभु को भी गिरफ्तार कर लिया.  9 मार्च की सुबह साढ़े 7 बजे भूरे विशारतगंज थाने पहुंचा कि किसी नकाबपोश ने सुबह 4 बजे सीमा की हत्या कर दी है. उस समय घर का मेनगेट खुला हुआ था. सीमा की मां नसीम टौयलेट गई थी, बाकी लोग सो रहे थे. अचानक गोली चलने की आवाज सुनाई दी तो सभी उठ कर दौड़े. पास जा कर देखा तो सीमा के सिर से खून बह रहा था और उस का शरीर शिथिल पड़ चुका था. उस की मौत हो चुकी थी. उन्होंने एक नकाबपोश को वहां से भागते देखा था, वह कोई और नहीं प्रभु था.

उस का आरोप सुन कर थानाप्रभारी शुजाउर रहीम ने कहा कि प्रभु तो उन की हिरासत में है, वह कैसे खून कर सकता है? बहरहाल, शुजाउर रहीम पुलिस फोर्स के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने घटना की जानकारी उच्चाधिकारियों को दे दी और खुद सिपाहियों के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. कुछ ही देर में एसपी (ग्रामीण) ब्रजेश श्रीवास्तव और सीओ (आंवला) धर्म सिंह मार्छाल भी घटनास्थल पर पहुंच गए. सीमा के सिर में काफी गहरा घाव था, जिस से अनुमान लगाया कि हत्यारे ने बहुत नजदीक से गोली चलाई थी. पुलिस अधिकारियों ने घर वालों से पूछताछ की तो सभी के बयान अलगअलग थे. शुरुआती जांच में और अब तक की पूछताछ में यह मामला औनर किलिंग का लग रहा था.

घटना के बाद से ही सीमा का बड़ा भाई इश्तियाक घर से गायब था. पुलिस ने आसपड़ोस में पूछताछ की तो पता चला कि देर रात तक सीमा के घरवाले जागते रहे थे. सीमा से लड़ाईझगड़ा होने की बात भी सामने आई. देर रात तक उन के घर में अफरातफरी का माहौल बना रहा था. उस के बाद कुछ समय के लिए सब शांत हो गया. सुबह 4 बजे गोली चलने की आवाज आई और फिर उस के बाद रोनेपीटने की आवाजें आने लगीं. इस के बाद सीमा की हत्या किए जाने की बात सामने आई. सीमा की हत्या में सारे हालात किसी अपने की ओर इशारा कर रहे थे. वह अपना कोई और नहीं, उस का बड़ा भाई इश्तियाक हो सकता था. वही घर से गायब था और उस का मोबाइल भी बंद था.

पूछताछ के बाद सीमा की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई. इस के बाद पुलिस ने घर की तलाशी ली, लेकिन कुछ खास हाथ नहीं लगा. आगे की जांच में पता चला कि घटना की रात सीमा का मामा गुड्डू भी आया था. गुड्डू बरेली के थाना सिरौल के गांव हरदासपुर में रहता था. पुलिस ने उस के घर छापा मारा तो वह घर में ही था. लेकिन पुलिस को देखते ही वह छत के रास्ते भागने में सफल हो गया.

14 मार्च को थानाप्रभारी शुजाउर रहीम, एसआई चमन सिंह, प्रताप सिंह और अतुल दुबे की टीम ने गुड्डू को बदायूं के कुंवरगांव से गिरफ्तार कर लिया. उस के पास से हत्या में प्रयुक्त 315 बोर का तमंचा भी बरामद हो गया. दरअसल, सीमा का मामा गुड्डू पंजाब में फेरी लगा कर कबाड़ी का काम करता था. उसे फोन से सीमा के गैर धर्म के लड़के के साथ भाग जाने की जानकारी मिली तो वह क्रोध से जल उठा. जब पुलिस ने सीमा को बरामद कर घर वालों के हवाले किया तो गुड्डू ने भूरे से सीमा को समझाने को कहा. लेकिन सीमा प्रभु के पास जाने की जिद पर अड़ी थी. गुड्डू ने भी उसे समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानी. इस के बाद गुड्डू के सामने एक ही रास्ता बचा कि वह सीमा को खत्म कर दे.

8 मार्च की सुबह वह हावड़ा-अमृतसर एक्सपे्रस टे्रन से बरेली के आंवला स्टेशन पर उतरा. वहां से वह अपने गांव हरदासपुर गया और शाम को विशारतगंज आ गया. देर रात वह भूरे के घर पहुंचा. उस ने सीमा को अपनी जिद छोड़ने के लिए काफी समझाया, जिसे ले कर काफी देर तक बहस चलती रही. सीमा का बड़ा भाई इश्तियाक भी मामा गुड्डू के सुर में सुर मिला रहा था. जब किसी तरह बात नहीं बनी तो सीमा के सो जाने पर गुड्डू ने इश्तियाक के साथ मिल कर सीमा के सिर से तमंचा सटा कर गोली मार दी. एक ही झटके में सीमा मौत की नींद सो गई. इस के बाद दोनों वहां से फरार हो गए. कुछ लोगों ने गुड्डू का पीछा भी किया, लेकिन वह किसी के हाथ नहीं आया.

शुजाउर रहीम ने गुड्डू और इश्तियाक के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा कर गुड्डू को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक इश्तियाक फरार था. पुलिस उस की तलाश कर रही थी. गुड्डू को जरा भी कानून का ज्ञान होता तो सीमा की जान बच सकती थी. सीमा नाबालिग थी. ऐसी स्थिति में अदालत उसे उस के घर वालों को ही सौंपती न कि प्रेमी प्रभु को. UP News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Suspense Story: जहरीलों निगाहों का निशाना

Suspense Story: प्रगट मसीह ने सुमन से शादी सिर्फ इसलिए की थी, क्योंकि उस की मां के पास लाखों का मकान था. इस के बाद प्रगट ने उस मकान को हासिल करने के लिए ऐसा क्या किया कि उसे जेल जाना पड़ा?

‘‘सा हब, मेरे बेटे को ढूंढ दीजिए. मैं गरीब विधवा औरत हूं, मेरे बेटे के सिवाय मेरा कोई और सहारा नहीं है.’’ कृष्णा नामक एक विधवा औरत ने थाना सदर के अंतर्गत पड़ने वाली पुलिस चौकी मरांडो के प्रभारी बलबीर सिंह के पास जा कर गुहार लगाई. कृष्णा के साथ समाजसेवक सरदार प्रगट सिंह भी थे, जो ग्राम प्रधान भी थे. चौकीप्रभारी ने पूरी बात विस्तार से बताने के लिए कहा तो कृष्णा ने बताया कि वह न्यू गुरु तेगबहादुर नगर के मकान नंबर 15 में रहती है. काफी समय पहले उस के पति मगट सिंह की मृत्यु हो चुकी है. उस की 2 संताने हैं, एक 32 वर्षीय बेटा वीर सिंह, दूसरी 28 वर्षीया बेटी सुमन. 7 साल पहले सुमन की शादी प्रगट मसीह के साथ हुई थी.

कृष्णा ने आगे बताया, ‘‘मेरे घर पर केवल मैं और मेरा बेटा वीर सिंह ही रहते थे. 27 जुलाई, 2014 को वीर सिंह कोल्डड्रिंक पीने के लिए गली के कोने तक गया. उस के बाद लौट कर नहीं आया. मैं ने उस की तलाश उन जगहों पर कर ली है, जहां उस के मिलने की संभावना थी. इसलिए साहब, आप से निवेदन है कि आप मेरे बेटे को ढूंढने में मेरी मदद करें.’’

यह 28 जुलाई, 2014 की बात है. चौकीप्रभारी बलबीर सिंह ने समाजसेवक सरदार प्रगट सिंह और कृष्णा देवी के बयान के आधार पर वीर सिंह की गुमशुदगी दर्ज कर के उस की तलाश शुरू कर दी. लेकिन वह किसी नतीजे पर पहुंच पाते इस के पहले ही उन का तबादला हो गया. उन की जगह चौकी का प्रभार एएसआई निशान सिंह ने संभाला. निशान सिंह ने गुमशुदा वीर सिंह के फोटो की कौपी सभी थानों को भेज दी. लुधियाना व निकटवर्ती शहर के थानों को वीर सिंह का हुलिया बता कर वायरलैस मैसेज करवा दिए गए. इस के बावजूद वीर सिंह का कोई सुराग नहीं मिला.

निशान सिंह ने वीर सिंह के पड़ोसियों से भी पूछताछ की. उन के अनुसार वीर सिंह सीधासादा मंदबुद्घि इंसान था. अब तक की गई तफ्तीश से यह बात स्पष्ट हो गई थी कि वीर सिंह का अपहरण नहीं हुआ था. ऐसे में एक संभावना यह बनती थी कि मंदबुद्धि होने की वजह से वह खुद ही कहीं चला गया हो. इस के अलावा एक संभावना यह भी थी कि कहीं किसी दुश्मनी की वजह से किसी ने उसे न उठा लिया हो. बहरहाल, निशान सिंह ने समाजसेवक प्रगट सिंह से इस बारे में बात की तो एक नई बात यह पता चली कि लापता होने वाले दिन वीर सिंह अपने बहनोई प्रगट मसीह के साथ बाइक पर बैठ कर कहीं जाते देखा गया था. मोहल्ले में की गईं पूछताछ के दौरान एक प्रौपर्टी डीलर ने यह भी बताया कि कृष्णा देवी अपना मकान बेचना चाहती थीं.

इस बारे में निशान सिंह ने जब कृष्णा से पूछा तो उस ने इस बात से इनकार करते हुए बताया कि उस ने अपना मकान बेचने की बात कभी नहीं की. हां, उस का दामाद प्रगट मसीह उस पर मकान बेचने के लिए दबाव जरूर डाल रहा था. यहां तक कि उस का बेटा वीर सिंह भी इस बात का विरोध कर रहा था. इन 2 लोगों के बयानों से इस केस की जांच को नई दिशा मिल गई. निशान सिंह का शक विश्वास मे बदलने लगा. उन्होंने प्रगट मसीह की तलाश काररवाईं तो वह घर से फरार मिला. इस के बाद पुलिस ने उस की तलाश में छापेमारी शुरू कर दी. आखिर कई महीनों की मेहनत के बाद 25 मार्च, 2015 को प्रगट मसीह को मलेरकोटला रोड से गिरफ्तार कर लिया गया. उस से पूछताछ के बाद निशान सिंह ने उस की निशान देही पर गांव लोहारा में दबिश दे कर उस के साथी निर्मल सिंह उर्फ मिंटू को भी गिरफ्तार कर लिया.

गिरफ्तारी के बाद हुई पूछताछ के दौरान दोनों ने हर अपराधी की तरह अपने आप को निर्दोष बताया, लेकिन जब निशान सिंह ने थोड़ी सख्ती की तो दोनों की जुबान खुल गई. अपना अपराध स्वीकार करते हुए प्रगट मसीह ने जो कहानी बताई, वह प्रेम और विश्वास में धोखा देने वाले एक धूर्त इंसान की शर्मनाक कहानी थी. मगट सिंह व उन की पत्नी कृष्णा देवी निहायत ही शरीफ और सीधेसादे लोग थे. उन की 2 संतानें थीं, बेटा वीर सिंह और बेटी सुमन. वीर सिंह मंदबुद्धि था. उसे पागल कहना बेईमानी होगी, क्योंकि वह जो भी काम करता था, उसे भले ही धीरेधीरे करे, लेकिन काफी सोचविचार कर करता था. मगट सिंह ने दोनों बच्चों की पढ़ाई का पूरा खयाल रखा. उस वक्त वह पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में लिपिक थे. घरपरिवार अच्छे से चल रहा था.

सन 2001 में मगट सिंह अपनी नौकरी से रिटायर हो गए. रिटायरमेंट में उन्हें अच्छाखासा पैसा मिला. उन पैसों से उन्होंने गिल गांव की हरगोविंद कालोनी में 100 गज का प्लौट खरीद कर अपना मकान बना लिया. फिलहाल इस मकान की कीमत लाखों में है. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि अचानक एक सुबह सैर करते समय प्रगट सिंह फिसल कर गिर गए. उन की रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई. वह बिस्तर पर पड़ गए. उन का चलनाफिरना बंद हो गया. वक्त का पहिया ऐसा उल्टा घूमा कि उन्होंने एक बार बिस्तर पकड़ा तो फिर वह उन की मौत के बाद ही छूट पाया. उन की मौत के बाद कृष्णा देवी ने अकेले ही अपने दम पर बच्चों की परवरिश की. मंदबुद्धि होने के कारण वीर सिंह ज्यादा नहीं पढ़ सका, इसलिए कृष्णा ने उसे मशीन का काम सीखने पर लगा दिया.

कृष्णा की बेटी सुमन जवान हो चुकी थी. उसी दौर में उस की मुलाकात प्रगट मसीह से हुई. दरअसल सुमन को पास वाले गांव में अपनी किसी सहेली के विवाह समारोह में जाना था. वह मेन रोड पर खड़ी हो कर आटो का इंतजार कर रही थी. सर्दियों के दिन थे, ऊपर से हलकीहलकी बूंदाबांदी हो रही थी. काफी इंतजार के बाद भी उसे कोई साधन नहीं मिला. बारिश की वजह से सुमन के कपड़े भीगने लगे थे कि तभी सुमन के पास एक कार आ कर रुकी. ड्राइविंग सीट पर बैठा युवक प्रगट मसीह था. उस ने सुमन से बड़ी शालीनता से कहा, ‘‘आइए, मैं आप को छोड़ देता हूं.’’

संकोचवश सुमन ने एक बार तो मना कर दिया, पर मौसम का मिजाज और प्रगट मसीह की शालीनता देख कर उस ने बात मान ली. वह कार में बैठ गई. प्रगट मसीह ने उसे उस की सहेली के गांव पहुंचाया ही नहीं, बल्कि अगले दिन सहेली के घर से वापस भी ले आया. प्रगट मसीह के इस व्यवहार से सुमन काफी प्रभावित हुई. इस मुलाकात के बाद रास्ते में आतेजाते कहीं न कहीं प्रगट मसीह सुमन को दिखाई देने लगा. दोनों मिलते तो 2-4 बातें भी हो जातीं. सुमन भी धीरेधीरे उस की ओर आकर्षित होने लगी. फिर जल्दी ही वह दिन भी आ गया जब एक दिन दोनों ने अपनेअपने प्यार का इजहार कर दिया.

इस के बाद दोनों की रोजाना कहीं न कहीं मुलाकातें होने लगीं. जल्दी ही दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया. सुमन की मां कृष्णा इस के पक्ष में नहीं थी, वह उस की शादी अपनी बिरादरी में करना चाहती थी, किसी ईसाई के साथ नहीं. लेकिन सुमन हर हाल में प्रगट मसीह से ही शादी करना चाहती थी. अंतत: उस ने मां से विद्रोह कर के अप्रैल, 2007 में प्रगट मसीह के साथ कोर्टमैरिज कर ली. दरअसल, कहानी वह नहीं थी, जो प्रत्यक्ष में दिखाई दे रही थी. हकीकत में प्रगट मसीह लोहरा गांव निवासी पाल सिंह का बेटा था. वह बचपन से ही आवारा और आपराधिक प्रवृत्ति का था, वह बिना हाथपैर हिलाए खूब पैसा कमाना चाहता था. युवा होते ही उस ने आवारा दोस्तों की एक मंडली बना ली थी और उन के साथ शराबजुआ चोरीचकारी आदि करता रहता था.

सुमन से उस की मुलाकात इत्तफाक से नहीं, बल्कि सोचीसमझी योजना के तहत हुई थी. प्रगट ने कालोनी के बसस्टौप पर सुमन को खड़ी देखा था. उस ने अपने दोस्तों से जब उस के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया, ‘‘गुरु, यह सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि इस की मां विधवा है. भाई मंदबुद्धि और इन का मकान लाखों रुपए का है. अगर इस चिडि़या को जाल में फांस लो तो समझो लाखों रुपए का मकान तुम्हारा.’’

बस, उसी दिन से वह सुमन को अपने जाल में फांसने की योजना बनाने लगा. सुमन अपनी सहेली की शादी में पास के गांव जाएगी, यह बात प्रगट मसीह को पहले ही पता लग गई थी. इसीलिए वह सुमन को लिफ्ट देने और उस पर अपना प्रभाव जमाने के लिए अपने एक दोस्त की कार मांग लाया था. बहरहाल, सुमन से शादी होने के बाद प्रगट मसीह सुमन के घर पर ही रहने लगा. जबकि यह बात न सुमन को अच्छी लगती थी और न उस की मां को. इस बात को ले कर घर में क्लेश शुरू हो गया. धीरेधीरे झगड़ा इतना बढ़ा कि मजबूरन प्रगट मसीह को अपनी ससुराल छोड़ कर अपने घर लोहारा जाना पड़ा.

समय अपनी गति से चलता रहा. इसबीच एकएक कर सुमन 5 बच्चों की मां बन गई. प्रगट मसीह को जब भी मौका मिलता, वह अपनी सास कृष्णा देवी पर दबाव डालता कि वह यह मकान बेच कर चंडीगढ़ रोड पर मकान ले ले. पर कृष्णा उस की बातों में कभी नहीं आई. इस के बावजूद प्रगट ने इलाके के कई प्रौपर्टी डीलरों को मकान बेचने के लिए कह रखा था. प्रगट मसीह और सुमन की शादी को लगभग 7 साल हो चुके थे. मकान हथियाने के जिस मकसद से प्रगट सुमन से शादी की थी, वह अभी तक पूरा नहीं हुआ था. आखिर उस ने अपना मकसद पूरा करने के लिए एक योजना बनाई. अपनी योजना में उस ने अपने दोस्त निर्मल सिंह उर्फ मिठू को भी शामिल कर लिया था. निर्मल पेंटर का काम करता था. प्रगट ने योजना पूरी होने के बाद उसे एक लाख रूपए देने का वादा किया था.

अपनी योजना को अंजाम देने के लिए प्रगट ने 28 जुलाई, 2014 की तारीख तय की और निर्मल के साथ घात लगा कर अपनी ससुराल वाली गली के नुक्कड़ पर बैठ गया. उस समय शाम का वक्त था और वह जानता था कि उस का साला इस वक्त टहलने और कोल्डड्रिंक पीने गली से निकल कर रोड तक आता है. वीर सिंह जैसे ही दुकान पर कोल्डड्रिंक पी कर मुड़ा, प्रगट मसीह ने उसे आवाज दे कर रोक लिया और घुमाने के बहाने बाइक पर बैठा कर नहर की ओर चल दिया. बाइक प्रगट मसीह खुद चला रहा था. बीच में वीर सिंह और पीछे निर्मल सिंह बैठा था. रास्ते में बाइक रोक कर प्रगट मसीह ने शराब खरीद ली.

घवदी नहर पर आगे जा कर प्रगट मसीह ने बाइक रोक ली उस के बाद वहीं बैठ कर तीनों ने शराब पी. वीर सिंह को नशा हो गया तो निर्मल सिंह की मदद से उस ने अंगोछे से वीर सिंह का गला घोंट कर उस की हत्या कर दी. तत्पश्चात दोनों ने मिल कर उस की लाश नहर में फेंक दी और वापस लौट आए. किसी को उस पर शक न हो, इस के लिए वह अपनी सास व प्रधान के साथ मिल कर वीर सिंह की तलाश का नाटक करता रहा. एएसआई निशान सिंह ने प्रगट मसीह और निर्मल सिंह के बयान दर्ज कर के दोनों को 25 मार्च, 2015 को मैडम अमनदीप कौर की अदालत में पेश कर के 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि के दौरान दोनों अभियुक्तों की निशानदेही पर मृतक वीर सिंह का पर्स, आधार कार्ड, अंगोछा और बाइक बरामद कर ली गई.

रिमांड की अवधि समाप्त होने पर 27 मार्च, 2015 को दोनों को पुन: अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जिला भेज दिया गया. चूंकि अब वीर सिंह की हत्या हो चुकी थी, इसलिए अपहरण की धारा 365 के साथ हत्या की धारा 302, 201, 34 और जोड़ दी गईं. एएसआई निशान सिंह ने नहर में बड़ी दूर तक जाल डलवा कर वीर सिंह की लाश तलाशने का प्रयास किया, पर कथा लिखे जाने तक लाश बरामद नहीं हो सकी थी. शायद पानी के तेज बहाव के कारण लाश दूर तक चली गई थी. Suspense Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Superstition : तांत्रिक के कहने पर कलेजा निकाल खा गया कपल

Superstition : शादी के 10 साल बाद भी जब परशुराम और सुनयना के कोई बच्चा नहीं हुआ तो सुनयना तांत्रिकों के चक्कर लगाने लगी. एक तांत्रिक ने सुनयना को एक बच्ची की बलि दे कर कलेजा खाने की सलाह दी. संतान प्राप्ति के लिए सुनयना और उस के पति ने ऐसा किया भी लेकिन…

उस दिन नवंबर, 2020 की 15 तारीख थी. सुबह के यही कोई 8 बज रहे थे. तभी थाना घाटमपुर प्रभारी इंसपेक्टर राजीव सिंह को नरबलि की खबर मिली. यह खबर भदरस गांव के किसी व्यक्ति ने उन के मोबाइल फोन पर दी थी. उस ने बताया कि दीपावली की रात गांव के करन कुरील की 7 वर्षीय बेटी श्रेया उर्फ भूरी की बलि दी गई है. उस की लाश भद्रकाली मंदिर के पास पड़ी है. खबर पाते ही थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ भदरस गांव पहुंच गए. भद्रकाली मंदिर गांव के बाहर था. वहां भारी भीड़ जुटी थी. दरअसल मासूम बच्ची की बलि चढ़ाए जाने की बात भदरस ही नहीं, बल्कि अड़ोसपड़ोस के गांवों तक फैल गई थी. अत: सैंकड़ों लोगों की भीड़ वहां जमा थी.

भीड़ देख कर राजीव सिंह के हाथपांव फूल गए. क्योंकि वहां मौजूद लोगों में गुस्सा भी था. लोगों ने साफ कह दिया था कि जब तक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर नहीं आएंगे, तब तक वह बच्ची के शव को नहीं उठने देंगे. थानाप्रभारी राजीव सिंह ने यह जानकारी पुलिस अधिकारियों को दे दी फिर जांच में जुट गए. श्रेया उर्फ भूरी की नग्न लाश भद्रकाली मंदिर के समीप नीम के पेड़ के नीचे गन्नू तिवारी के खेत में पड़ी थी. शव के पास मृत बच्ची का पिता करन कुरील बदहवास खड़ा था और उस की पत्नी माया कुरील दहाड़े मार कर रो रही थी. घर की महिलाएं उसे संभालने की कोशिश कर रही थीं.

मासूम का पेट किसी नुकीले व धारवाले औजार से चीरा गया था और पेट के अंदर के अंग दिल, फेफड़े, लीवर, आंतें तथा किडनी गायब थीं. मासूम श्रेया के गुप्तांग पर चोट के निशान थे. माथे पर तिलक लगा था और पैर लाल रंग से रंगे थे. देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि नरपिशाचों ने बलि देने से पहले मासूम के साथ दुराचार भी किया था. शव के पास ही मृतका की चप्पल, जींस तथा अन्य कपड़े पड़े थे. नमकीन का एक खाली पैकेट भी वहां पड़ा मिला. थानाप्रभारी सिंह ने वहां पड़ी चीजों को साक्ष्य के तौर पर सुरक्षित कर लिया. उसी दौरान एसएसपी प्रीतिंदर सिंह, एसपी (ग्रामीण) बृजेश कुमार श्रीवास्तव तथा सीओ (घाटमपुर) रवि कुमार सिंह भी वहां आ गए.

पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम तथा कई थानों की फोर्स बुलवा ली. पुलिस अधिकारियों ने उत्तेजित भीड़ को आश्वासन दिया कि जिन्होंने भी इस वीभत्स कांड को अंजाम दिया है, वह जल्द ही पकड़े जाएंगे और उन्हें सख्त से सख्त सजा दिलाई जाएगी. अधिकारियों के इस आश्वासन पर लोग नरम पड़ गए. उस के बाद उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया. मासूम बालिका का शव देख कर पुलिस अधिकारी भी सिहर उठे. एसएसपी के बुलावे पर डौग स्क्वायड टीम भी घटनास्थल पर पहुंची. डौग स्क्वायड प्रभारी अवधेश सिंह ने जांच शुरू की. उन्होंने नीम के पेड़ के नीचे पड़ी मासूम के खून के अंश व उस की चप्पल खोजी कुतिया को सुंघाई. उसे सूंघने के बाद यामिनी खेत की पगडंडी से होते हुए गांव की ओर दौड़ पड़ी.

कई जगह रुकने के बाद वह सीधे मृतक बच्ची के घर पहुंची. यहां से बगल के घर से होते हुए गली के सामने बने एक घर पर पहुंची. 4 घरों में जाने के बाद गली के कोने में स्थित एक मंदिर पर जा कर रुक गई. टीम ने पड़ताल की, लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा. इस के बाद यामिनी गांव का चक्कर लगा कर घटनास्थल पर वापस वह आ गई. यामिनी हत्यारों तक नहीं पहुंच सकी. निरीक्षण के बाद पुलिस अधिकारियों ने मृतका श्रेया के शव को पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय चिकित्सालय कानपुर भिजवा दिया. मोर्चरी के बाहर भी भारी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया गया गया. उधर नरबलि की खबर न्यूज चैनलों तथा इंटरनेट मीडिया पर वायरल होते ही कानपुर से ले कर लखनऊ तक सनसनी फैल गई.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं इस दुस्साहसिक वारदात को संज्ञान में लिया. मुख्यमंत्री ने मंडलायुक्त, डीएम व एसएसपी प्रीतिंदर सिंह से वार्ता की और तुरंत आरोपियों के खिलाफ सख्त से सख्त काररवाई करने का आदेश दिया. उन्होंने दुखी परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की और 5 लाख रुपए आर्थिक मदद देने की घोषणा की. उन्होंने कहा, ‘सरकार इस प्रकरण की फास्टट्रैक कोर्ट में सुनवाई करा कर अपराधियों को जल्द सजा दिलाएगी.’

मुख्यमंत्री ने नाराजगी जताई तो प्रशासन एक पैर पर दौड़ने लगा. आननफानन में 3 डाक्टरों का पैनल गठित किया गया और शव का पोस्टमार्टम कराया गया. मासूम के शव का परीक्षण करते समय पोस्टमार्टम करने वाली टीम के हाथ भी कांप उठे थे. मासूम के पेट के अंदर कोई अंग था ही नहीं. दिल, फेफड़े, लीवर, आंतें, किडनी, स्पलीन और इन अंगों को आपस में जोड़े रखने वाली मेंब्रेन तक गायब थी. मासूम के निजी अंगों में चोट के निशान थे, जिस से दुष्कर्म की पुष्टि हुई थी. मासूम के पेट में कुछ था या नहीं, आंतें गायब होने से इस की पुष्टि नहीं हो सकी. पोस्टमार्टम के बाद श्रेया का शव उस के पिता करन कुरील को सौंप दिया गया.

इधर रात 10 बजे एसडीएम (नर्वल) रिजवाना शाहीद के साथ नवनिर्वाचित विधायक (घाटमपुर क्षेत्र) उपेंद्र पासवान भदरस गांव पहुंचे और मृतका श्रेया के पिता करन कुरील को 5 लाख रुपए का चैक सौंपा. उन्हें 2 बीघा कृषि भूमि का पट्टा दिलाने का भी भरोसा दिया गया. चैक लेते समय करन व उन की पत्नी माया की आंखों में आंसू थे. उन्होंने नर पिशाचों को जल्द गिरफ्तार करने की मांग की. चूंकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मामले को वर्क आउट करने में देरी पर नाराजगी जताई थी, इसलिए एसएसपी प्रीतिंदर सिंह व एसपी (ग्रामीण) बृजेश कुमार श्रीवास्तव ने थाना घाटमपुर में डेरा डाल दिया और डीएसपी रवि कुमार सिंह के निर्देशन में खुलासे के लिए पुलिस टीम गठित कर दी.

इस टीम ने भदरस गांव पहुंच कर अनेक लोगों से गहन पूछताछ की. गांव के एक झोलाछाप डाक्टर ने गांव के गोंगा के मझले बेटे अंकुल कुरील पर शक जताया. पड़ोसी परिवार की एक बच्ची ने भी बताया कि शाम को उस ने श्रेया को अंकुल के साथ जाते हुए देखा था. अंकुल कुरील पुलिस की रडार पर आया तो पुलिस टीम ने उसे घर से उठा लिया. उस समय वह ज्यादा नशे में था. उसे थाना घाटमपुर लाया गया. उस से कई घंटे तक पूछताछ की लेकिन अंकुल नहीं टूटा. आधी रात के बाद जब नशा कम हुआ तब उस से सख्ती के साथ दूसरे राउंड की पूछताछ की गई. इस बार वह पुलिस की सख्ती से टूट गया और मासूम श्रेया की हत्या करने का जुर्म कबूल कर लिया.

अंकुल ने जो बताया उस से पुलिस अधिकारियों के रोंगटे खड़े हो गए और मामला ही पलट गया. अंकुल ने बताया कि उस के चाचा परशुराम व चाची सुनयना ने 1500 रुपए में मासूम बच्ची का कलेजा लाने की सुपारी दी थी. उस के बाद उस ने अपने दोस्त वीरन के साथ मिल कर करन की बेटी श्रेया को पटाखा देने के बहाने फुसलाया. उसे वह गांव से एक किलोमीटर दूर भद्रकाली मंदिर के पास ले गए. वहां दोनों ने उस के साथ दुराचार किया फिर अंगौछे से उस का गला घोंट दिया. उस के बाद चाकू से उस का पेट चीर कर अंगों को निकाल लिया गया. उस ने कलेजा पौलीथिन में रख कर चाची सुनयना को ला कर दिया. सुनयना और परशुराम ने कलेजे के 2 टुकड़े किए और कच्चा ही खा गए. ऐसा उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए किया था.

इस के बाद वादे के मुताबिक चाची ने 500 रुपए मुझे तथा हजार रुपए वीरन को दिए, फिर हम लोग घर चले गए. 16 नवंबर, 2020 की सुबह 7 बजे पुलिस टीम ने पहले वीरन फिर परशुराम तथा उस की पत्नी सुनयना को गिरफ्तार कर लिया. सुनयना के घर से पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त अंगौछा तथा 2 चाकू बरामद कर लिए. चाकू को सुनयना ने भूसे के ढेर में छिपा दिया था. उन तीनों को थाने लाया गया. यहां तीनों की मुलाकात हवालात में बंद अंकुल से हुई तो वे समझ गए कि अब झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है. अत: उन तीनों ने भी पूछताछ में सहज ही श्रेया की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया.

पुलिस ने जब परशुराम कुरील से कलेजा खाने की वजह पूछी तो उस के चेहरे पर पश्चाताप की जरा भी झलक नहीं थी. उस ने कहा कि सभी जानते हैं कि किसी बच्ची का कलेजा खाने से निसंतानों के बच्चे हो जाते हैं. वह भी निसंतान था. उस ने बच्चा पाने की चाहत में कलेजा खाया था. चूंकि सभी ने जुर्म कबूल कर लिया था और आलाकत्ल भी बरामद करा दिया था. अत: थानाप्रभारी राजीव सिंह ने मृतका के पिता करन कुरील की तहरीर पर भादंवि की धारा 302/201/120बी के तहत अंकुल, वीरन, परशुराम व सुनयना के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कर ली और सभी को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.

अंकुल व वीरन के खिलाफ दुराचार तथा पोक्सो एक्ट के तहत भी मुकदमा दर्ज किया गया. पुलिस जांच में एक ऐसे दंपति की कहानी प्रकाश में आई, जिस ने अंधविश्वास में पड़ कर संतान पाने की चाह में एक मासूम के कलेजे की सुपारी दी और उसे खा भी लिया. उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से करीब 40 किलोमीटर दूर एक बड़ा कस्बा है घाटमपुर. इस कस्बे से कुछ दूरी पर स्थित है-भदरस गांव. परशुराम कुरील इसी दलित बाहुल्य इस गांव में रहता था. लगभग 10 साल पहले उस की शादी सुनयना के साथ हुई थी. परशुराम के पास कृषि भूमि नाममात्र की थी. वह साबुन का व्यवसाय करता था.

वह गांव कस्बे में फेरी लगा कर साबुन बेचता था. इसी व्यवसाय से वह अपने घर का खर्च चलाता था. भदरस और उस के आसपास के गांव में अंधविश्वास की बेल खूब फलतीफूलती है. जिस का फायदा ढोंगी तांत्रिक उठाते हैं. भदरस गांव भी तांत्रिकों के मकड़जाल में फंसा है. यहां घरघर कोई न कोई तांत्रिक पैठ बनाए हुए है. बीमारी में तांत्रिक अस्पताल नहीं मुर्गे की बलि, पैसा कमाने को मेहनत नहीं, बकरे की बलि, दुश्मन को ठिकाने लगाने के लिए शराब और बकरे की बलि, संतान के लिए नरबलि की सलाह देते हैं. इन तांत्रिकों पर पुलिस भी काररवाई से बचती है. कोई जघन्य कांड होने पर ही पुलिस जागती है.

परशुराम और उस की पत्नी सुनयना भी तांत्रिकों के मकड़जाल में फंसे हुए थे. महीने में एक या दो बार उन के घर तंत्रमंत्र व पूजापाठ करने कोई न कोई तांत्रिक आता रहता था. दरअसल, सुनयना की शादी को 10 वर्ष से अधिक का समय बीत गया था. लेकिन उस की गोद सूनी थी. पहले तो उस ने इलाज पर खूब पैसा खर्च किया. लेकिन जब सफलता नहीं मिली तो वह अंधविश्वास में उलझ गई और तांत्रिकों व मौलवियों के यहां माथा टेकने लगी. तांत्रिक उसे मूर्ख बना कर पैसे ऐंठते. धीरेधीरे 5 साल और बीत गए. लेकिन सुनयना की गोद सूनी की सूनी रही.

सुनयना की जातिबिरादरी के लोग उसे बांझ समझने लगे थे और उस का सामाजिक बहिष्कार करने लगे थे. समाज का कोई भी व्यक्ति परशुराम को सामाजिक काम में नहीं बुलाता था. कोई भी औरत अपने बच्चे को उस की गोद में नहीं देती थी. क्योंकि उसे जादूटोना करने का शक रहता था. परिवार के लोग उसे अपने बच्चे के जन्मदिन, मुंडन आदि में भी नहीं बुलाते थे, जिस से उसे सामाजिक पीड़ा होती थी. सामाजिक अवहेलना से सुनयना टूट जरूर गई थी, लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी थी. 10 सालों से उस का तांत्रिकों के पास आनाजाना बना हुआ था. एक रोज वह विधनू कस्बा के एक तांत्रिक के पास गई और उसे अपनी पीड़ा बताई.

तांत्रिक ने उसे आश्वासन दिया कि वह अब भी मां बन सकती है, यदि वह उपाय कर सके.

‘‘कौन सा उपाय?’’ सुनयना ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘यही कि तुम्हें दीपावली की रात 10 साल से कम उम्र की एक बालिका की पूजापाठ कर बलि देनी होगी. फिर उस का कलेजा निकाल कर पतिपत्नी को आधाआधा खाना होगा. बलि देने तथा कलेजारूपी प्रसाद चखने से मां काली प्रसन्न होंगी और तुम्हें संतान प्राप्ति होगी.’’

‘‘ठीक है बाबा. मैं उपाय करने का प्रयत्न करूंगी. अपने पति से भी रायमशविरा करूंगी.’’ सुनयना ने तांत्रिक से कहा. उन्हीं दिनों परशुराम के हाथ ‘कलकत्ता का काला जादू’ नामक तंत्रमंत्र की एक पुस्तक हाथ लगी. इस किताब में भी संतान प्राप्ति के लिए उपाय लिखा था और मासूम बालिका का कलेजा कच्चा खाने का जिक्र किया गया था. परशुराम ने यह बात पत्नी सुनयना को बताई तो वह बोली, ‘‘विधनू के तांत्रिक ने भी उसे ऐसा ही उपाय करने को कहा था.’’

अब परशुराम और सुनयना के मन में यह अंधविश्वास घर कर गया कि मासूम बालिका का कच्चा कलेजा खाने से उन को संतान हो सकती है. इस पर उन्होंने गंभीरता से सोचना शुरू किया तो उन्हें लगा अंकुल उन की मदद कर सकता है. अंकुल, परशुराम के बड़े भाई गोंगा कुरील का बेटा था. 3 भाइयों में वह मंझला था. वह नशेबाज और निर्दयी था, गंजेड़ी भी. अपने भाईबहनों के साथ मारपीट और हंगामा भी करता रहता था. अपने स्वार्थ के लिए परशुराम ने भतीजे अंकुल को मोहरा बनाया. अब वह उसे घर बुलाने लगा और मुफ्त में शराब पिलाने लगा. गांजा फूंकने को पैसे भी देता. अंकुल जब हां में हां मिलाने लगा तब एक रोज सुनयना ने उस से कहा, ‘‘अंकुल, तुम्हें तो पता ही है कि हमारे पास बच्चा नहीं है. लेकिन तुम चाहो तो मैं मां बन सकती हूं.’’

‘‘वह कैसे चाची?’’

‘‘इस के लिए तुम्हें मेरा एक काम करना होगा. आने वाली दीपावली की रात तुम्हें किसी बच्ची का कलेजा ला कर देना होगा. देखो ‘न’ मत करना. यदि तुम मेरा काम कर दोगे तो हमारे घर में खुशी आ सकती है.’’

‘‘ठीक है चाची, मैं तुम्हारे लिए यह काम कर दूंगा.’’

अंकुल राजी हो गया तो उन लोगों ने मासूम बच्ची पर मंथन किया. मंथन करतेकरते उन के सामने भूरी का चेहरा आ गया. श्रेया उर्फ भूरी करन कुरील की बेटी थी. उस की उम्र 7 साल थी. करन परशुराम के घर के समीप रहता था. उस की 3 बेटियों में श्रेया दूसरे नंबर की थी. वह कक्षा 2 में पढ़ती थी. करन किसान था. उसी से जीविका चलाता था. वीरन कुरील अंकुल का दोस्त था. पारिवारिक रिश्ते में वह उस का भाई था. वीरन भी नशेड़ी था, सो उस की अंकुल से खूब पटती थी. अंकुल ने वीरन को सारी बात बताई और अपने साथ मिला लिया था. अब अंकुल के साथ वीरन भी परशुराम के घर जाने लगा और नशेबाजी करने लगा.

14 नवंबर, 2020 को दीपावली थी. अंकुल और वीरन शाम 5 बजे परशुराम के घर पहुंच गए. परशुराम ने दोनों को खूब शराब पिलाई. सुनयना ने दोनों को कलेजा लाने की एवज में 1500 रुपए देने का भरोसा दिया. इस के बाद उस ने अंकुल व वीरन को गोश्त काटने वाले 2 चाकू दिए. इन चाकुओं को पत्थर पर घिस कर दोनों ने धार बनाई. सुनयना ने लाल रंग से भरी एक डब्बी अंकुल को दी और कुछ आवश्यक निर्देश दिए. शाम 6 बजे अंकुल और वीरन, परशुराम के घर से निकले. तब तक अंधेरा घिर चुका था. वे दोनों जब करन के घर के सामने आए तो उन की निगाह मासूम श्रेया पर पड़ी. वह नए कपड़े पहने पेड़ के नीचे एक बच्ची के साथ खेल रही थी. अंकुल ने भूरी को बुलाया और पटाखों का लालच दिया.

भूरी पर मौत का साया मंडरा रहा था. वह मान गई और अंकुल के साथ चल दी. दोनों भूरी को ले कर गांव के बाहर आए और फिर भद्रकाली मंदिर की ओर चल पड़े. श्रेया को आशंका हुई तो उस ने पूछा, ‘‘भैया, कहां ले जा रहे हो?’’ यह सुनते ही अंकुल ने उस का मुंह दबा दिया और वीरन ने चाकू चुभो कर उसे डराया, जिस से उस की घिग्घी बंध गई. फिर वे दोनों भूरी को भद्रकाली मंदिर के पास ले गए और नीम के पेड़ के नीचे पटक दिया. उन दोनों ने श्रेया उर्फ भूरी के शरीर से कपड़े अलग किए तो उन के अंदर का शैतान जाग उठा. उन्होंने बारीबारी से उस के साथ दुराचार किया. इस बीच मासूम चीखी तो उन्होंने अंगौछे से उस का गला कस दिया, जिस से उस की मौत हो गई.

इस के बाद सुनयना के निर्देशानुसार अंकुल ने श्रेया के पैरों में लाल रंग लगाया तथा माथे पर टीका किया. फिर चाकू से उस का पेट चीर डाला. अंदर से अंग काट कर निकाल लिए और कलेजा पौलीथिन में रख कर वहां से निकल लिए. रास्ते में पानी भरे एक गड्ढे में बाकी अंग फेंक दिए और कलेजा ला कर परशुराम को दे दिया. परशुराम ने कलेजे को शराब से धोया फिर चाकू से उस के 2 टुकड़े किए. उस ने एक टुकड़ा स्वयं खा लिया तथा दूसरा टुकड़ा पत्नी सुनयना को खिला दिया. सुनयना ने खुश हो कर 500 रुपए अंकुल को और 1000 रुपए वीरन को दिए. उस के बाद वे दोनों अपनेअपने घर चले गए.

इधर दीया जलाते समय करन को श्रेया नहीं दिखी तो उस ने खोज शुरू की. करन व उस की पत्नी माया रात भर बेटी की खोज करते रहे. लेकिन उस का कुछ भी पता नहीं चला. सुबह गांव के कुछ लोगों ने उसे बेटी की हत्या की जानकारी दी. तब वह वहां पहुंचा. इसी बीच किसी ने घटना की जानकारी थाना घाटमपुर पुलिस को दे दी थी. 17 नवंबर, 2020 को पुलिस ने अभियुक्त अंकुल, वीरन, परशुराम व सुनयना को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन चारों को जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Rajasthan Crime News : शादी से पहले बैंक मैनेजर ने बैंक में कराई 1 करोड़ 13 लाख की डकैती

Rajasthan Crime News : बैंक मैनेजर सुशील कुमार की 10 नवंबर को शादी होनी थी. कार उस ने खरीद  ली थी. लोन ले कर आलीशान मकान भी बनवा लिया था. वह शानोशौकत से शादी करना चाहता था. इस के लिए उस ने अपने ममेरे भाई नितेश, उस के 2 दोस्तों सतपाल व सुखविंद्र के साथ मिल कर साजिश रची और अपने ही बैंक में 1 करोड़ 13 लाख की डकैती करा दी, लेकिन…

‘हैं डसअप’. मुख्य गेट का शटर डाल कर अंदर घुसे तीनों युवकों ने बैंक भवन के अंदर मेज पर रखी रखी फाइलों में उलझे बैंक प्रबंधक सुशील कुमार व केशिय परमपाल सिंह को हथियारों की नोक पर लेते हुए कर्कश आवाज में कहा था. आगंतुकों के चेहरे के हावभाव व आंखों से उगलती आग दर्शा रही थी कि विरोध करने पर वे किसी भी हद तक जा सकते थे. अचानक आई आफत को देख दोनों बैंककर्मियों की घिग्घी बंध गई. हाथों में हथियार व 2 युवकों के कंधे पर लटकते पिट्ठू बैग देख उन को आभास हो गया था कि वे लोग बैंक लूटने आए हैं. दो पगड़ीधारी युवकों के हाथों में पिस्टल व तीसरे के हाथ में लंबे फल वाला का चाकू था.

दोनों बैंककर्मियों ने कोई प्रतिरोध न कर के आत्मसमर्पण कर दिया. तीनों लुटेरे केशियर व बैंक मैंनेजर को धकिया कर बैंक के स्ट्रांग रूम में ले गए. वहां तीनों ने तिजोरी में रखी 2 हजार, 5 सौ व एक सौ रुपयों की गड्डियां दोनों बैगों में ठूंसठूंस कर भर ली. दोनों बैंक अफसरों के मोबाइल पहले ही छीन लिए गए थे. मैनेजर व कैशियर को स्ट्रांगरूम में बंद कर ताला लगा दिया गया. एक लुटेरे ने मैनेजर की मेज पर रखी कार की चाबी उठा ली थी. स्ट्रांग रूप की चाबी लुटेरों ने स्ट्रांग रूम के सामने ही फेंक दी. नकदी भरे बैग उठाए तीनों युवक फुर्ती से बाहर निकल गए. जाते समय मुख्य गेट का शटर बंद कर तीनों लुटेरे बैंक मैनेजर की बाहर खड़ी गाड़ी आई10 नंबर आरजे 13 सीसी 1283 में भाग निकले.

आधा घंटा बाद स्ट्रौगरूम में बंद मैनेजर व कैशियर कुछ सहज हुए. दोनों ने मिल कर स्ट्रौंगरूम में लगी प्लास्टिक की एक पाइप को उखाड़ा और जैसेतैसे स्ट्रांगरूम से बाहर निकले. लूट की इस बड़ी बारदात को महज 7 मिनट में अंजाम दे दिया गया था. बैंक गार्ड आधा घंटा पहले ही छुट्टी कर घर चला गया था. लूट की यह सनसनीखेज घटना 17 सितंबर, 2020 को राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले की प्रमुख मंडी संगरिया की धान मंडी स्थित एक्सिस बैंक शाख में रात तकरीबन 8 बजे हुई थी. बैंक प्रबंधन की सूचना मिलते ही संगरिया थाना के टीआई इंद्र कुमार ने मौकामुआयना कर अविलंब उच्च अधिकारियों को सूचना प्रेषित कर दी.

बैंक मैनेजर ने हथियारों की नोक पर एक करोड़ 13 लाख रुपए लूट ले जाने के आरोप में 3 अज्ञात लोगों के खिलाफ पुलिस में मुकदमा दर्ज कर दिया. पुलिस ने मुकदमा आईपीसी 292 व 34 के तहत दर्ज कर लिया. संयोग से सवा करोड़ की लूट की यह वारदात संभवत: मंडी सांगरिया की पहली घटना थी. सूचना मिलते ही बीकानेर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक प्रफुल्ल कुमार जिला पुलिस अधीक्षक राशि डोगरा सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने घटना स्थल पर पहुंच कर स्थिति का जायजा लिया. पुलिस अधिकारियों को बताया गया कि कई दिनों से बैंक में लगे सीसीटीवी कैमरा सिस्टम गड़बड़ था. पुलिस जांच में यह तथ्य भले ही परेशानी साबित हो सकता था पर एसपी राशि डोगरा ने कैमरों के गड़बड़झाले को जांच में एक अहम क्लू माना. आईजी प्रफुल्ल कुमार ने इस लूट प्रकरण को जल्दी से ट्रेस आउट करने का आदेश दे दिया.

एसपी राशि डोगरा ने एकएक बिंदु को देखा, परखा जिला मुख्यालय से महज 30 किलोमीटर दूर घटित बैंक लूट की इस घटना को युवा आईपीएस राशि डोगरा ने एक चैलेंज के रूप में लिया. एसपी डोगरा ने एएसपी जस्साराम बोस और स्वयं के सुपरविजन में जिला क्षेत्र के सीओ दिनेश एजोश, सीओ प्रशांत कौशिक, सीओ नारायण सिंह, सर्किल इंस्पेक्टर इंद्रकुमार, एसआई फूल सिंह और राजाराम व सुरेश के नेतृत्व में दर्जनभर हैड कांस्टेबलों को लगाया. इस के तहत 8 टीमों का गठन कर जांच में लगा दिया गया. साइबर व सीसीटीवी कैमरा एक्सपर्ट भी लगाए गए.

अपराधी कितना भी शातिर हो, अनजाने में कोई न कोई भूल कर घटनास्थल पर कोई न कोई क्लू जरूर छोड़ जाता है. इसी तथ्य को स्वीकारकर राशि डोगरा ने अपने अनुभव इस वारदात को खोलने में लगा दिए. शुरुआती जांच व बैंक के नजदीक स्थित दुकानों पर लगे कैमरों से यह साबित हो गया था कि जाते समय लुटेरे मैनेजर की कार में भागे थे. लेकिन आते समय बैंक तक पैदल ही आए थे. पुलिस की आठो टीम पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, यूपी, मध्य प्रदेश सहित हनुमानगढ़ व श्री गंगानगर जिला क्षेत्र में उतर गई थीं. 15 दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस के हाथ खाली थे. एक दुकान के बाहर लगे कैमरों में तीनों लुटेरों की कदकाठी नजर आ रही थी पर पगड़ी के पल्लु व कैप लगी होने के कारण तीनों में से एक का भी चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था.

सीसीटीवी कैमरा एक्सपर्ट ने जांच कर खुलासा कर दिया था कि बैंक के अंदर लगे सीसीटीवी कैमरों में हाल ही में छेड़छाड़ की गई थी. जांचपड़ताल में मिल रहे मामूली क्लू बैंक प्रबंधन के खिलाफ जा रहे थे. पर पुख्ता साक्ष्य के अभाव में पुलिस प्रमुख राशि डोगरा कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थीं. बड़ी रकम का मामला था. अन्य प्रदेशों व स्थलों पर गई टीमों के भी हाथ खाली थे. बैंक मैनेजर सुशील व कैशियर परमपाल सिंह से अलगअलग व संयुक्त रूप से कई दौर में पूछताछ की गई पर नतीजा शून्य रहा. दूसरे दिन मैनेजर सुशील की कार संगरिया से 30 किलोमीटर दूर हरियाणा के डबवाली शहर में लावारिस हालात में मिल गई.

पूछताछ में पता चला कि 2 दिन पहले कार की जगह एक मोटर साइकिल कई घंटे खड़ी रही थी. राशि डोगरा की नजर में बैंक मैनेजर सुशील कुमार चढ़ चुका था. उन्होंने सुशील की जन्म कुंडली खंगालना शुरू कर दी. उन्हें बताया गया कि सुशील को कुछ अरसा पहले ही बैंक परीक्षा पास करने पर मैनेजर की नौकरी मिली थी. इसी 10 नवंबर को सुशील की शादी होनी थी. उन का रिहायशी आलीशान बंगला बिना कर्ज लिए बनना मुश्किल था. सुशील की ननिहाल पंजाब के जनखुआ (राजपुरा) में है. एसपी डोगरा ने संगरिया के तेजतर्रार सर्किल इंस्पेक्टर इंद्रकुमार को टीम के साथ जनसुआ भेज दिया. हाईकमान के आदेशानुसार 4 सदस्यीय टीम ने यूनिफार्म की जगह ग्रामीणों के वेश धर लिए.

खुद इंद्रकुमार ने शरीर पर सफेद कुरता और व लुंगी पहना. पैरों में चमड़े की जूती व सिर पर चैकदार साफा. सीआई ने टीम के साथ सुशील के ननिहाल में रैकी शुरू कर दी थी. वहीं 3 अन्य पुलिसकर्मी शराब ठेकों व बाजार की रैकी में लग गए थे. इस पुलिस टीम का टारगेट था एक्सिस बैंक संगरिया के नजदीक सीसीटीवी कैमरों में दर्ज हुए लुटेरों की चालढाल व कदकाठी वाले युवकों की तलाशना. टीम ने 2 लोगों की कदकाठी व चाल को पहचान लिया. एक तो सुशील के नाना के घर आजा रहा था. दूसरे को शराब ठेके पर शराब की महंगी बोतल खरीदते समय पहचाना गया. सीओ इंद्रकुमार ने डेली रिपोर्ट के रूप में इस प्रोगेस को एसपी राशि डोगरा से साझा किया. एसपी के आदेश पर इंद्रकुमार की टीम संगरिया लौट आई.

टीम की मेहनत रंग लाई इंद्रकुमार की टीम ने दोनों संदिग्धों के चोरीछिपे विडियो मोबाइल कैमरे में कैद कर लिए थे. कैमरों व वीडियो में कैद फोटोज लुटेरों से मिल रहे थे. शक की गुंजाइश नहीं थी. बैंक मैनेजर वारदात के बाद से लगातार ड्यूटी पर आ रहा था. 21 अक्तूबर को पुलिस ने अपराधियों को एक साथ उठाने का निर्णय लिया. सब से पहले जांच अधिकारी इंद्रकुमार ने मैनेजर सुशील को पूछताछ के बहाने पुलिस थाने बुलाया. एक मुस्तैद सिपाही जो डंडा लिए था की तरफ इशारा करते हुए सीओ ने कहा, ‘मैनेजर साहब, आप  बिना लागलपेटे सारा कुछ सचसच उगल दो. वरना इन डंडे वालों को संभालना मुश्किल हो जाएगा.’’

‘‘सर, मैं सब कुछ सचसच बता दूंगा,’’ सुशील ने कहा.

बिना लागलपेट सुशील कुमार ने बयां किया, ‘‘बैंक परीक्षा पास करने के बाद मुझे बैंक में नौकरी मिल गई थी. मैं ने कर्जा उठा कर भव्य मकान बनवा लिया. अब 10 नवंबर को मेरी शादी होनी थी. शानोशौकत की चाह भावी दांपत्य जीवन को मनमोहक बना देती है. इसी इच्छा के चलते बैंक की तिजौरी में रखी नोटों की गड्डियों ने मेरा इमान डोला दिया. मैं ने अपने ममेरे भाई नितेश को बुला कर उस से गुफ्तगू की. मेरी रजामंदी के चलते नितेश ने अपने 2 दोस्तों सतपाल व सुखविंद्र को शामिल कर लिया. कुछ दिन पहले नितेश अपने दोस्तों के साथ बैंक आया था. तीनों ने गहनता से बैंक भवन व आसपास का जायाजा लिया था.

वारदात के दिन तीनों दोस्त मोटरसाइकिल से डबवाली पहुंचे. डबवाली के बाजार से एक काली व एक रंगीन पगड़ी खरीदी गई. पिट्ठू बैग भी यहीं से खरीदे गए थे. दो जनों ने पगड़ी इसलिए बांधी कि पुलिस भ्रमित हो जाए. मोटरसाइकिल डबवाली में रोड़ पर खड़ी कर तीनों बस से 6 बजे शाम संगरिया पहुंच गए थे. निर्धारित प्रोग्राम के मुताबिक गार्ड को छुट्टी दे दी गई थी. बैंक में लगे कैमरे कई दिन पहले ही डिस्टर्ब कर दिए थे. दोनों बैंककर्मियों को स्टं्रागरूम में बंद कर चाबी वहीं डाल दी गई थी ताकि स्ट्रांगरूम का दरवाजा तोड़ने की नौबत न आ जाए. मैनेजर की कार प्लानिंग के अनुसार ली गई थी. तीनों सहयोगियों की पहचान भी सुशील ने जाहिर कर दी थी.

सुशील के बताए अनुसार तीनों लोग उसी दिन नकदी के साथ कुल्लू-मनाली पहुंच गए. तीनों ने वहां महंगे होटलों व शराबखोरी में दोतीन दिनों में 3 लाख रुपए उड़ा दिए. पुलिस सांगरिया में साजिशकर्ता सुशील निवासी भूना जिला फतेहाबाद से पूछताछ कर रही थी. वहीं 2 टीमें जनसुआ तहसील राजपुरा में अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी में जुटी थीं. जनसुआ से पुलिस ने सुशील के ममेरे भाई नितेश जो 8वीं तक पढ़ा और अविवाहित है, अंबाला का सुखविंद्र एमए तक शिक्षित व 2 बेटों का पिता है. सतपाल 5वीं तक पढ़ा था, वह जनसुआ में हैयर ड्रैसिंग का काम करता था, गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने चारों से अलगअलग व आमनेसामने बिठा कर पूछताछ शुरू की.

पर चारों रिकवरी के बिंदु पर पुलिस को गच्चा देते रहे. जांच अधिकारी इंद्रकुमार ने चारों आरोपियों को अदालत में पेश कर पुलिस रिमांड पर ले लिया. दोबारा पूछताछ में चारों ने अपने घरों में छिपा कर रखी एक करोड़ 5 लाख रुपयों की बरामदगी करवा दी थी. अदालत में दोबारा पेश करने पर अदालत ने तीनों को जेल भिजवा दिया. मुख्य साजिशकर्ता सुशील को पुलिस ने रिकवरी के लिए दोबारा 2 दिनों के रिमांड पर ले लिया था. इस अवधि में सुशील ने अपने घर से 5 लाख रुपए और बरामद करवाए. पुलिस ने वारदात में इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल, कार व अन्य साक्ष्य जुटा लिए. आईजी बीकानेर ने एसपी साहित अन्य अधकारियों की दिल खोल कर हौसलाअफजाई की. एसपी राशि डोगरा ने सीआई इंद्रकुमार की विशेष सराहना की.

चारों आरोपियों ने रूपयों की खनकदमक के आगे पहली बार अपराध किया था ताकि उन का व उन के परिवार का भविष्य संवर जाए. पर हकीकत में चारों ने न केवल खुद को बल्कि परिवार को भी अंधेरे की गहराइयों में धकेल दिया है.

 

Rajasthan News : राजनीति की आड़ में चल रहा था सैक्स रैकेट

Rajasthan News : सुनीता वर्मा और पूजा उर्फ पूनम चौधरी भाजपा और कांग्रेस पार्टी की नेता थीं. क्षेत्र में उन का मानसम्मान था, साथ ही अच्छीखासी पहचान भी. लेकिन राजनीति की आड़ में दोनों महिला नेता ऐसा घिनौना काम कर रही थीं, जिस के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था. जब सच्चाई सामने आई तो…

राजस्थान में बलात्कार के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. मासूम बच्चियों से ले कर विवाहित महिलाएं तक शिकार बन रही हैं. बढ़ती वारदातों से ऐसा लगता है जैसे अपराधियों को न तो खाकी वर्दी का डर है और न ही सरकार का. घटना के बाद विपक्षी पार्टियों के लोग हायतौबा मचाते हैं और फिर थोड़े दिन बाद मामला शांत हो जाता है. पिछले दिनों राजस्थान के सवाई माधोपुर शहर में एक ऐसा मामला सामने आया जो राजस्थान में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में चर्चित हो गया. ताज्जुब की बात यह कि इस सनसनीखेज अपराध में सत्तापक्ष और विपक्ष की जिलास्तर की महिला नेता शामिल थीं.

जिन महिलाओं की हम बात कर रहे हैं, वे दोनों सवाई माधोपुर में रहती थीं. उन में सुनीता वर्मा भारतीय जनता पार्टी (महिला मोर्चा) की जिलाध्यक्ष थी तो दूसरी पूजा उर्फ पूनम चौधरी कांग्रेस सेवा दल (महिला प्रकोष्ठ) की पूर्व जिलाध्यक्ष थी. चूंकि दोनों ही जिला स्तर की नेता थीं, इसलिए उन की क्षेत्र में अच्छी साख थी. पूजा और सुनीता वर्मा लोगों के सरकारी काम कराने में मदद करती थीं. लोग उन पर भरोसा करते थे और दोनों को गरीबों की मसीहा मानते थे. अलगअलग राष्ट्रीय पार्टियों की जिलाध्यक्ष थीं, इसलिए जिले के सरकारी महकमों में उन की अच्छी जानपहचान थी. एक दिन कांग्रेस सेवादल (महिला प्रकोष्ठ) की पूर्व जिलाध्यक्ष पूनम चौधरी नेम सिंह के घर पहुंची.

दरअसल, नेम सिंह पूनम से कई बार कह चुका था कि उसे किसी बैंक से लोन दिला देंगी तो वह कोई व्यवसाय शुरू कर देगा. पूनम ने नेम सिंह को भरोसा दिया था कि वह उस का लोन करा देगी. नेम सिंह की एक 16 वर्षीय बेटी थी उर्मिला. वह गरीब परिवार में जन्मी जरूर थी, लेकिन थी गोरीचिट्टी और खूबसूरत. पूनम ने नेम सिंह से कहा, ‘‘तुम्हारी बेटी उर्मिला दिन भर घर में पड़ी क्या करती है. इसे हमारे साथ भेज दो. साथ रहने पर दुनियादारी सीख जाएगी. देखना, इस की जिंदगी ही बदल जाएगी.’’

नेम सिंह पूनम को बड़ी नेता समझता था. उस ने सोचा कि संभव है अपनी ऊंची पहुंच के चलते पूनम उर्मिला की कहीं नौकरी लगवा दें. इसलिए उस ने बिना किसी झिझक के उर्मिला को पूनम के साथ भेज दिया. पूनम उर्मिला को भाजपा की नेता सुनीता वर्मा के पास ले कर पहुंची और कहा कि इस लड़की का नाम उर्मिला है. यह बहुत अच्छी लड़की है. आप इसे अपने पास रखो और इस की जिंदगी बना दो. उर्मिला बन गई सुनीता की हुंडी उर्मिला को देख कर सुनीता की आंखों में चमक आ गई क्योंकि वह खूबसूरत थी. सुनीता वर्मा ने मन ही मन सोचा कि लड़की काम की है. सुनीता उसे प्यार से रखने लगी. शहर में वह जहां भी जाती, उर्मिला साथ होती थी. जिला उद्योग केंद्र, कलेक्ट्रेट और बैंक वगैरह भी सुनीता उर्मिला को साथ ले जाती.

सुनीता वर्मा के घर पर एफसीआई का कर्मचारी हीरालाल मीणा आता रहता था. वह उस का जानकार था. साल 2013 में सुनीता वर्मा ने बतौर निर्दलीय विधानसभा का चुनाव लड़ा था. हीरालाल ने उस वक्त उस का तनमनधन से साथ दिया था. सुनीता वर्मा वह चुनाव तो नहीं जीत पाई, मगर उस की जानपहचान का दायरा बढ़ गया था. चुनाव हारने के बाद भी हीरालाल का सुनीता के घर बदस्तूर आनाजाना जारी रहा. हीरालाल ने जब सुनीता के साथ एक किशोर युवती को देखा तो उस के बारे में पूछा. तब सुनीता ने बताया कि इस का नाम उर्मिला है और अब यह उस के साथ ही रहेगी.

हीरालाल का अधेड़ मन उर्मिला का सामीप्य पाने को लालायित हो उठा. अपने मन की बात उस ने सुनीता को बता दी. साथ ही यह भी कहा कि वह इस के लिए कुछ भी करने को तैयार है. लालची सुनीता तैयार हो गई और उस  ने एक दिन उर्मिला को हीरालाल मीणा के साथ एक कमरे में बंद कर दिया. हीरालाल ने उस मासूम से बलात्कार किया. सुनीता ने उस का वीडियो बना लिया और फोटो भी खींच लिए. इज्जत लुटने के बाद उर्मिला रोने लगी. तब सुनीता ने उसे वीडियो एवं अश्लील फोटो दिखा कर कहा, ‘‘अगर किसी से इस घटना की चर्चा की तो यह वीडियो और फोटो सोशल मीडिया पर वायरल कर दूंगी. तब तुम किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगी. रोनाधोना बंद कर और भूल जा इस घटना को. यही तेरे लिए बेहतर होगा.’’

उर्मिला अपनी ब्लू फिल्म व अश्लील फोटो देख कर अंदर तक कांप गई. वह इतनी नादान नहीं थी कि कुछ समझती न हो. वह समझ गई कि अगर उस ने घर पर किसी को बताया तो यह अश्लील वीडियो और फोटो वायरल कर देगी. तब वह और उस का परिवार किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे. सुनीता वर्मा अब उर्मिला का भरपूर लाभ उठाना चाहती थी. लिहाजा उस ने डराधमका कर उसे और भी कई सरकारी मुलाजिमों के सामने पेश कर उन से अपने काम निकलवाए. उर्मिला उस के हाथ की ऐसी कठपुतली बन गई थी, जो चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती थी.

एक दिन सुनीता ने डराधमका कर उर्मिला को घर भेज दिया. वह डरीसहमी घर चली गई. उस का मन तो कर रहा था कि अपनी मम्मी को सब कुछ बता दे. मगर वीडियो और फोटो वायरल होने की बात ध्यान में आते ही उस ने चुप रहने में ही भलाई समझी. उर्मिला चुप रहने लगी. एक दिन उस की मम्मी ने वजह पूछा तो कह दिया, ‘‘दिन भर इधरउधर घूमने से थक गई हूं. थोड़ी कमजोरी है, ठीक हो जाएगी.’’

‘‘ठीक है बेटी, अगर लोन मिल जाएगा तो हमारे दिन फिर जाएंगे. तुम सुनीता दीदी के साथ रहो. वह काम करवा देंगी, अच्छी इंसान हैं?’’ मम्मी ने कहा तो उर्मिला मन ही मन सोचने लगी कि सुनीता औरत के नाम पर वह कलंक है जो अपनी बेटी की उम्र की लड़की को लोगों के साथ सोने को मजबूर करती है, अश्लील वीडियो, फोटो बनवा कर ब्लैकमेल करती है. धमकाती है. सुनीता वर्मा ने अगले रोज उर्मिला को अपने घर बुला कर एकांत में कहा, ‘‘तूने अपने साथ घटी घटना के बारे में घर पर किसी को बताया तो नहीं है?’’

‘‘नहीं, मैं ने किसी को नहीं बताया.’’ उर्मिला ने कांपते स्वर में कहा.

‘‘वेरी गुड. मुझे तुम से यही उम्मीद थी. कभी भी भूल कर भी किसी को भी नहीं बताना. वर्ना यह वीडियो और फोटो…’’ सुनीता ने धमकाया.

‘‘मैं किसी से नहीं कहूंगी.’’ उर्मिला बोली.

‘‘जब तक तुम मेरा कहना मानोगी तब तक इन्हें वायरल नहीं करूंगी. ठीक है. तुम चिंता न करो?’’ सुनीता ने कहा तो उर्मिला की जान में जान आई. सुनीता वर्मा के पास कई लड़कियां आती थीं. वे सब भी उर्मिला की तरह सुनीता के इशारों पर नाच रही थीं. हीरालाल ने उर्मिला को कई लोगों के साथ भेजा. जिन्होंने उस के साथ बलात्कार किया. 5 हजार का उधार चुकाने को सुनीता ने इलैक्ट्रिशियन से किया सौदा सुनीता वर्मा के घर पर राजूराम रेगर नाम का इलैक्ट्रिशियन आता था. उस ने सुनीता के घर बिजली का कोई काम किया था, जिस का सुनीता को 5 हजार का भुगतान करना था. मगर सुनीता ने उसे रुपए नहीं दिए. कह दिया कि दोचार दिन में दे दूंगी.

राजू अपने पैसे मांगने सुनीता के घर आने लगा. तब सुनीता ने राजू रेगर से कहा कि मेरे साथ जो लड़की रहती है उस के तन का स्वाद चखा देती हूं 5 हजार रुपए वसूल हो जाएंगे. राजू रेगर ने उर्मिला को देखा था. वह सुंदर, खिलती कली थी. सुनीता ने उर्मिला को धमका कर राजू के साथ भेजा. राजू उर्मिला को होटल स्वागत में ले गया और उस के साथ मौजमस्ती की. सुनीता वर्मा की तरह पूनम उर्फ पूजा चौधरी भी नाबालिग उर्मिला को डराधमका कर अपने साथ ले गई और एक व्यक्ति के आगे परोस दिया. उस व्यक्ति ने पीडि़ता से रेप किया.

कई ऐसे सरकारी कर्मचारी थे, जो सुनीता और पूनम का काम करते थे. कुछ ऐसे लोग थे जिन से पैसा ले कर सुनीता व पूनम पीडि़ता को उन के हवाले कर देती थीं. वे लोग उर्मिला को किसी होटल या कमरे पर ले जा कर उस के साथ यौन संबंध बनाते और फिर उसे  सुनीता या पूनम चौधरी के पास छोड़ देते थे. उर्मिला करीब 8-10 लोगों के साथ भेजी गई थी. घर वालों ने लिखाई रिपोर्ट उर्मिला पिछले काफी महीनों से यह सब सह रही थी. मगर हर चीज एक हद होती है. जब वह नाबालिग लड़की थक गई तो घर पर मां के पास रोने लगी. मां ने पूछा तो उस ने सुनीता व पूनम की काली करतूत के बारे में सारी बातें बता दीं. मां ने बेटी की पीड़ा सुनी तो उस का दिल दहल गया.

बेटी के साथ इतना कुछ घटित हो गया और उसे पता तक नहीं चला. इस के बाद मां ने तय कर लिया कि उस की नाबालिग बेटी की जिंदगी को नरक बनाने वालों को सजा दिला कर रहेगी. उर्मिला की मां ने अपने पति वगैरह को सारी बात बताई. इस के बाद घर वाले 22 सितंबर, 2020 को नाबालिग उर्मिला को ले कर महिला थाना सवाई माधोपुर गए और सुनीता वर्मा उर्फ संपति बाई, हीरालाल मीणा, पूनम उर्फ पूजा चौधरी और अन्य लोगों के खिलाफ यौनशोषण की रिपोर्ट दर्ज करा दी. मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस ने जांच शुरू की. सवाई माधोपुर के एसपी ओम प्रकाश सोलंकी ने महिला थाने में दर्ज रिपोर्ट का अध्ययन किया और अपने नेतृत्व में एक टीम गठित कर जांच शुरू की. पुलिस ने साक्ष्य एकत्रित किए, पीडि़ता द्वारा बताए गए होटल में जा कर रिकौर्ड चैक किया.

इस के बाद भाजपा महिला मोर्चा अध्यक्ष सुनीता वर्मा उर्फ संपति बाई, सहयोगी हीरालाल मीणा को गिरफ्तार कर लिया. इन दोनों को कोर्ट में पेश कर रिमांड पर ले कर पूछताछ की गई. पूछताछ में सामने आया कि राजू रेगर निवासी खड्डा कालोनी, सवाई माधोपुर ने सुनीता से बिजली फिटिंग के रुपए मांगने पर नाबालिग लड़की को साथ भेज दिया था,जिसे होटल में ले जा कर उस ने रेप किया था. पुलिस ने राजू रेगर को भी गिरफ्तार कर लिया. सुनीता और हीरालाल ने 2 सरकारी कर्मचारियों के नाम भी बताए. उन में से एक जिला उद्योग केंद्र का क्लर्क संदीप शर्मा और दूसरा कलेक्टर कार्यालय का चपरासी श्योराज मीणा था. पुलिस ने इन दोनों को भी गिरफ्तार कर लिया.

पूनम उर्फ पूजा चौधरी को अपने खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की जानकारी मिली तो वह घर से फरार हो गई थी. पुलिस को पता चला कि पूनम चौधरी बिहार की रहने वाली है. इसलिए अनुमान लगाया गया कि शायद वह बिहार भाग गई है. लोगों ने 30 सितंबर, 2020 तक पूनम चौधरी को सवाई माधोपुर में देखा गया था. तब पुलिस ने उसे क्यों नहीं गिरफ्तार किया? लोगों में इस बात की चर्चा होने लगी कि कहीं पुलिस के ऊपर सत्तासीन लोगों का दबाब तो नहीं था?

निचले स्तर के सरकारी कर्मचारियों से थे रिश्ते जांच में पुलिस को यह भी पता चला कि पूनम चौधरी को अप्रैल, 2020 में उस की निष्क्रियता को देख कर पार्टी हाईकमान ने जिलाध्यक्ष के पद से हटा दिया था. पूनम की सवाई माधोपुर में सीमेंट की फैक्ट्री भी है. पूनम ने उर्मिला को उस फैक्ट्री के पास ले जा कर अपनी पहचान के आदमी के साथ भेज कर दुष्कर्म कराया था. सरकारी कर्मचारियों संदीप शर्मा और श्योराज मीणा ने पुलिस को बताया कि सुनीता वर्मा उन के पास कामकाज के लिए आती रहती थी. इसी से उन की जानपहचान थी. वह जिला उद्योग केंद्र व श्रम विभाग में लोन, सब्सिडी, श्रम डायरी सहित विभिन्न योजनाओं का लाभ दिलाने का काम करती थी.

आरोपी संदीप शर्मा ने इसी का फायदा उठा कर राज नगर स्थित नर्सिंग होम के पास अपने मकान में उर्मिला के साथ दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया था. सुनीता वर्मा कलेक्टर कार्यालय में ज्ञापन वगैरह देने जाती रहती थी. चपरासी श्योराज मीणा सुनीता वर्मा को कलेक्टर से मुलाकात के लिए भेजता था. इसी दौरान दोनों की जानपहचान हो गई थी. श्योराज मीणा लौकडाउन के दौरान सुनीता वर्मा के साथ लोगों को मास्क व सेनेटाइजर भी वितरित करता था. श्योराज मीणा ने लौकडाउन के समय सुनीता वर्मा के औफिस में ही नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया था. पीडि़त उर्मिला ने दूसरे कई लोगों द्वारा भी देह शोषण के आरोप लगाए. लेकिन मुकदमा दर्ज होने के बाद जब यह खबर मीडिया की हाईलाइट बनी तो वे लोग फरार हो गए.

अगर पीडि़त के घर से रुपए गायब नहीं हुए होते तो शायद यह मामला अभी प्रकाश में नहीं आता. दरअसल, हुआ यह कि नेमसिंह के घर से कुछ रुपए गायब हो गए थे. इस बारे में उन्होंने बेटी उर्मिला से पूछताछ की तो उस ने बताया कि रुपए उस ने चोरी किए थे. उर्मिला ने पिता से कहा कि ये रुपए सुनीता वर्मा ने मंगाए थे. रुपए क्यों मंगाए थे, यह पूछने पर बालिका ने सारा राज फाश कर दिया कि किस तरह उसे जिंदगी बनाने और अच्छे घर में शादी का प्रलोभन दे कर कई लोगों के साथ सोने पर मजबूर किया गया. ब्लैकमेलिंग के लिए उन्होंने उस की अश्लील वीडियो बना ली थी और उसे आधार बना कर उसे ब्लैकमेल कर रही थीं. सुनीता ने ही उसे घर से पैसे लाने के लिए मजबूर किया था.

पीडि़त बालिका और उस की मां ने बताया कि सुनीता और पूनम के पास करीब 30-35 लड़कियां हैं, जो उन के इशारों पर शहर से बाहर भी जाती हैं. इन लड़कियों को सरकारी कर्मचारी, अधिकारी और सफेदपोश लोगों के पास भेजा जाता है, जहां उन का देह शोषण किया जाता है. पीडि़ता ने दावा किया कि कई बड़े सफेदपोश राजनेता और अधिकारी भी इस सैक्स रैकेट में शामिल हैं. सूत्रों के मुताबिक यह धंधा सुनीता वर्मा और पूनम चौधरी मिल कर करती थीं. चर्चा तो यह भी रही कि लड़कियों के साथ गलत काम करने वाले पुरुषों को भी ये दोनों महिला नेता अश्लील वीडियो व फोटो के माध्यम से ब्लैकमेल करती थीं.

बदनामी के डर से वे लोग रुपए दे कर पीछा छुड़ाते थे, क्योंकि पुलिस के पास जा कर बेइज्जती के अलावा कुछ नहीं मिलना था. दोनों ब्लैकमेलर नेत्रियां मौज की जिंदगी जीती थीं. उन्होंने अच्छीखासी प्रौपर्टी बना ली थी. जब इस घटना की खबरें अखबारों में प्रकाशित हुई तो लोग हैरान रह गए. 2 राजनैतिक पार्टियों की जिलाध्यक्ष वह भी महिलाएं ऐसा काम कर रही थीं, जिस के बारे में किसी ने कभी सोचा तक नहीं था. पूछताछ पूरी होने के बाद पुलिस ने सुनीता वर्मा, हीरालाल मीणा, संदीप शर्मा, श्योराज मीणा और राजूलाल रेगर को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. पूजा उर्फ पूनम चौधरी और अन्य आरोपी भी पकड़े जाएंगे.

पीडि़ता के परिवार का कहना है कि उन्होंने सभी दुष्कर्मियों के बारे में पुलिस को बता दिया था, इस के बावजूद पुलिस ने सिर्फ 5 लोगों को गिरफ्तार किया. इस घटना के प्रकाश में आने के बाद कयास लगाया जा रहा है कि अन्य पीडि़त युवतियां रिपोर्ट दर्ज करा कर अपने परिवार की रहीबची इज्जत दांव पर नहीं लगाना चाहतीं, इसलिए चुप हैं. सैक्स रैकेट की पड़ताल में जुटी पुलिस को पता चला कि अब तक वह जिस पूजा को खोज रही थी, हकीकत में वह कांगे्रस सेवादल महिला प्रकोष्ठ की पूर्व जिलाध्यक्ष पूनम चौधरी है. पूनम ने इस खेल को पूजा के रूप में अपनी छद्म पहचान बना कर अंजाम दिया था.

पुलिस को यह जानकारी भी मिली कि इस सैक्स रैकेट गिरोह ने नाबालिग उर्मिला को जयपुर में बेचने का सौदा कर लिया था. इस के लिए उसे जयपुर भेजने की तैयारी थी. हीरालाल उसे सवाई माधोपुर बस स्टैंड तक छोड़ने गया, लेकिन पीडि़ता जैसेतैसे उस से बच निकली. पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि जयपुर में किन लोगों से बालिका का सौदा किया गया था. पीडि़त उर्मिला कक्षा 9 में पढ़ती थी. कोराना काल में स्कूल बंद थे. ऐसे में वह अपनी जिंदगी बनाने इन के लिए महिला नेत्रियों की शरण में गई थी. लेकिन उन्होंने उस की जिंदगी तबाह कर डाली.

 

Social Crime : झाड़फूंक के बहाने काले कपड़े वाला बाबा करता था महिलाओं से छेड़छाड़

Social Crime : देश में शिक्षा का प्रचारप्रसार चाहे कितना भी बढ़ गया हो लेकिन लोगों के मन से अंधविश्वास अभी भी नहीं गया है. एक मजार के बाबा अंसार हुसैन ने तो महिलाओं की समस्याएं दूर करने का ऐसा तरीका बना रखा था कि…

हर इंसान दुनिया में किसी न किसी परेशानी या समस्या से घिरा रहता है. लेकिन ऐसी कोई समस्या नहीं, जिस का हल न हो. कुछ समझदार लोग बड़ी से बड़ी समस्या का हल अपनी सूझबूझ से निकाल लेते हैं, लेकिन कुछ मूढ़मति भटक कर रह जाते हैं. निस्संदेह भटकने वाले लोगों का फायदा गलत किस्म के इंसान उठाते हैं. ढोंगी बाबाओं, तांत्रिकों और झाड़फूंक करने वाले कथित पीर बाबाओं मौलानाओं की दुकानदारियां ऐसे ही लोगों से चलती हैं. जिन के चक्कर में पड़ कर अपनी जिंदगी तो खराब करते ही हैं, आर्थिक नुकसान भी उठाते हैं.

गंभीर रोगों पर किसी प्रकार की शारीरिक समस्या अथवा निस्संतान होने पर महिलाएं अच्छे डाक्टर के बजाय इन बाबाओं के चक्कर में पड़ जाती हैं. मातृत्व की प्राप्ति के बिना नारीत्व सार्थक नहीं होता. निस्संतान महिला ससुराल में उपेक्षा की पात्र बन कर रह जाती है. दूसरे लोग भी उस पर टीकाटिप्पणी करने से बाज नहीं आते. ऐसे में कोई उसे बांझ कह दे तो महिला के दिल को गहरी चोट लगती है. ऐसी उपेक्षित महिला के लिए बांझ कोई शब्द नहीं, बल्कि गाली होती है. ऐसी गाली सुन कर उस पर क्या बीतती है, केवल वही समझ सकती है, जो इस दर्द से गुजरी हो.

ऐसी ही एक निस्संतान महिला थी सलमा (परिवर्तित नाम) जोकि लखनऊ के सआदतगंज इलाके में रहती थी. उस के निकाह को 10 साल हो चुके थे, मगर उस की गोद सूनी थी. संतानोत्पत्ति के लिए सलमा जो कर सकती थी, सब किया लेकिन उस की मुराद पूरी नहीं हुई. सलमा ने भी मान लिया था कि उस की किस्मत में संतान नहीं है. संतान न होने का गम उठा कर भी सलमा घुटघुट कर जी लेती, लेकिन अचानक उस के शौहर ने उस का जीना हराम कर दिया. वही शौहर जो कभी उस पर जान छिड़कता था. अचानक उसे दुश्मन की नजर से देखने लगा. दोष सलमा का था जो पति को उस का वारिस नहीं दे सकी थी, इसलिए वह चुप रह कर उस की गालियां भी सुन लेती और पिट भी लेती. सलमा की खामोशी ने उस के शौहर के जुल्म बढ़ा दिए थे.

सलमा ने शौहर में अचानक आए बदलाव का कारण पता किया तो उस के जैसे होश उड़ गए. पता चला कि उस का दूसरे मोहल्ले में रहने वाली एक युवती से इश्क चल रहा था. शौहर अपनी प्रेमिका को अपनी बेगम बना कर घर लाना चाहता था. सलमा अपनी छाती पर भला सौतन को कैसे बरदाश्त कर सकती थी. इसलिए उस ने इस का विरोध किया तो शौहर ने उस की पिटाई कर दी. उधर शौहर की माशूका उस से निकाह करने को राजी थी. लेकिन उस ने साफ कह दिया था कि पहले वह अपनी बेगम सलमा को घर से दफा करे, उस के बाद वह उस से निकाह करेगी.

यही कारण था कि शौहर सलमा पर जुल्मों के पहाड़ ढा रहा था. उस की मंशा थी कि सलमा हमेशा के लिए अपने मायके चली जाए और प्रेमिका से उस का निकाह करने का रास्ता साफ हो जाए. एक या कुछ दिन की बात होती तो सलमा सह लेती. यहां तो हर सुबह उसे गालियों का नाश्ता मिलता और पिटाई का डिनर करती फिर पूरी रात चुपकेचुपके रोती रहती. एक दिन तो गजब हो गया. सलमा के शौहर को बेड टी लेने की आदत थी. वह चाय की चुस्कियां लेने के बाद ही बिस्तर से उठता था. उस सुबह सलमा चाय ले कर शौहर को जगाने गई, ‘‘उठिए, चाय पी लीजिए.’’

शौहर पहले से जाग रहा था. सुबहसुबह सलमा को पीटने का मन भी बनाए हुए था. बस, उसे एक बहाना चाहिए था. सलमा ने जैसे ही उसे आवाज दी तो वह उस पर बरस पड़ा, ‘‘साली बांझ, मेरी आंखों के सामने आ कर क्यों खड़ी हो गई. तूने मेरा पूरा दिन बरबाद कर दिया.’’

उस के बाद उस ने सलमा के सीने पर लात मारी. सलमा दीवार से टकराई, उस पर गरम चाय गिर गई. एक तो चोट, दूसरे चाय से जलन की पीड़ा. सलमा बिलबिला कर रो पड़ी. मगर उस के शौहर को कहां तरस आने वाला था. सलमा को चोट पहुंचाने के लिए ही तो उस ने उस के सीने पर लात मारी थी. सलमा बिलबिला कर रोने लगी तो शौहर का पारा हाई हो गया. वह बैड से उतरा और जमीन पर गिरी सलमा को लातों से कुचलने लगा, ‘‘बांझ औरत, मैं तेरा मनहूस चेहरा नहीं देखना चाहता. जीना चाहती है तो शराफत से मायके चली जा और लौट कर यहां कभी मत आना. और नहीं गई तो मैं पीटपीट कर तेरी जान ले लूंगा.’’

रोनेसिसकने के अलावा सलमा कर भी क्या सकती थी. सलमा को अधमरा करने के बाद शौहर फ्रैश हुआ और कपडे़ बदल कर घर से चला गया. चोटें सहलाते हुए सलमा अपनी फूटी किस्मत पर आंसू बहाती रही.  दिमाग बहुत कुछ सोच रहा था. अब सलमा को अपना जीवन निरर्थक लग रहा था. सोच यही थी कि जलालत और दुखों से भरी ऐसी जिंदगी जीने से क्या लाभ. इन हालातों से कभी छुटकारा नहीं मिलने वाला. ऐसे जीवन से तो मौत भली. इस के बाद सलमा के जेहन में मौत को गले लगाने का विचार हावी होता चला गया. वह उठी और मुंह पर पानी के छींटें मार कर चेहरा दुरुस्त किया, फिर दरवाजे पर ताला लगा कर चाबी पड़ोसन को दे दी और कहा कि उस का शौहर आए तो चाभी दे देना. इस के बाद सलमा के जिस ओर कदम उठे, वह चल पड़ी.

मन में विचार आ रहा था कि कैसे मरे. इसी बीच सड़क पर उस की एक खास परिचित महिला मिली. उस ने सलमा को परेशान देखा तो उसे रोक कर पूछा कि कहां जा रही है. सलमा ने उसे दुखी मन से बोल दिया कि वह मरने जा रही है. यह सुन कर वह महिला चौंकी. वह सलमा को लेकर एक जगह बैठ गई. उस की परेशानी पूछी तो सलमा ने रोते हुए उसे पूरी आपबीती सुना दी. महिला को उस की स्थिति पर तरस आया. उस ने उसे उस की समस्या को दूर करने का रास्ता बताने का वादा किया. शर्त यह रखी कि वह मरने का इरादा छोड़ दे तो वह बताएगी. सलमा ने वादा किया कि उस की शर्त मानने को तैयार है. उस की समस्या दूर हो जाएगी तो उसे मरने की जरूरत ही नहीं पडे़गी.

महिला ने उसे वह रास्ता बताया तो जैसे सलमा को ऐसे लगा जैसे डूबते को तिनके का सहारा मिल गया. आस जगी तो वह घर वापस लौट गई. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के ठाकुरगंज थानाक्षेत्र के हुसैनाबाद में रईस मंजिल के पास सैयद अहमद शाह उर्फ पिन्नी वाले बाबा की मजार थी. मजार पर रोज काफी लोग मत्था टेकने आते थे और अपने लिए दुआएं मांगते थे. आने वालों में महिलाएं अधिक होती थीं.  मजार पर 65 वर्षीय मौलाना अंसार हुसैन उर्फ काला बाबा झाड़फूंक का काम करता था. अंसार हुसैन हमेशा काले कपड़े पहनता और काली टोपी लगाता था. इसीलिए लोग उसे काला बाबा कहने लगे थे. मजार के पास ही एक कमरा बना था. काला बाबा झाड़फूंक का काम उसी कमरे में करता था.

वह निस्संतानता, सफेद दाग और कई प्रकार के रोगों और परेशानियों को दूर करने का दावा करता था. उस का एक सहयोगी असलम था, जो कि बाबा का राजदार था और उस के हर काम में सहयोग करता था. परिचित महिला ने सलमा को इसी काला बाबा के बारे में बताया था. सलमा अपना दुख ले कर काला बाबा के पास पहुंची और अपना दुख उस के सामने जाहिर किया. काला बाबा ने उस पर ऊपरी साया होने की बात बताई जो कि उस की कोख हरी नहीं होने दे रहा. वह साया उस की कोख में अपनी जगह बनाए हुए था. इसलिए पूरे जतन करने के बाद भी वह मां नहीं बन पा रही थी. काला बाबा की बात सुन कर सलमा सहम गई. उस ने काला बाबा से उस का उपाय करने को कहा. बाबा ने उसे हर बुधवार को मजार पर पास आने को कहा. बाबा ने उस से कहा कि वह उस दिन नहा कर साफ कपड़े पहन कर आए. बाबा का मानना था कि बुधवार को ही कोई काम शुद्ध होता है.

उस दिन भी बुधवार था. काला बाबा उसे कमरे में ले गया और मोर पंखों की झाड़ू उस के सिर पर मार कर उस के ऊपरी साए को भगाने का जतन करने लगा. साथ ही कुछ बुदबुदाते हुए उस के ऊपर फूंक भी रहा था. कुछ देर तक ऐसा करने के बाद काला बाबा ने सलमा से कहा कि ऊपरी साए को दूर करने के लिए उसे अपने शरीर पर भभूत लगवानी होगी. सलमा कुछ झिझकी तो बाबा ने कहा कि जो तुम्हारी समस्या को दूर कर रहा हो, उस के सामने शरमाना और हिचकना नहीं चाहिए. सलमा वैसे ही परेशान थी और हर हाल में अपना दुख दूर करना चाहती थी. इसलिए वह काला बाबा की बात मानने को तैयार हो गई.

कमरे के आधे हिस्से को एक चादर से कवर किया गया था. वहां जमीन पर एक चादर भी बिछी थी. काला बाबा ने सलमा को वहां भेज दिया. सलमा ने अपने सारे कपडे़ उतार दिए और जमीन पर बिछी चादर पर लेट गई. काला बाबा उस के पास पहुंचा और उस के बदन पर साथ लाई भभूत को मलने लगा, साथ ही वह कुछ बुदबुदा भी रहा था. वह काफी देर तक भभूत लगाता रहा. सलमा मजबूरी में लेटी थी लेकिन बाबा का स्पर्श करना उसे भी अच्छा लग रहा था. उस दिन के बाद सलमा हर बुधवार बाबा के पास जाने लगी. बाबा के पास आने वाली महिलाओं में सलमा ही नहीं थी, उस जैसी कई महिलाएं थीं, काला बाबा जिन का इसी तरह इलाज करता था. किसी को भभूत लगाता तो किसी को लेप लगाता था.

इलाज के बहाने वह महिलाओं के शरीर से छेड़छाड़ करता, उन की अस्मत से खेलता था. कभी उस की तबियत खराब होती या चेले असलम का मन होता तो काला बाबा उसे महिलाओं से खेलने का मौका दे देता था. असलम अपने गुरु से भी चार हाथ आगे निकल गया. वह महिलाओं की इज्जत से तो खेलता ही था, साथ ही वह उन की वीडियो भी बना लेता था. वीडियो के सहारे बाद में वह उन महिलाओं को ब्लैकमेल करता था. बाबा और उस के चेले का यह गोरखधंधा कई सालों से चल रहा था. मजार पर महिलाएं जरूरत से ज्यादा आने लगीं तो आसपास के लोगों का माथा ठनका. उन्होंने काला बाबा और उस के चेले पर नजर रखनी शुरू कर दी.

वह काला बाबा से कुछ पूछते या टोकते तो बाबा और उस के घर वाले लोगों से लड़ने को तैयार हो जाते थे. परिवार वाले बाबा का ही साथ देते थे. सआदतगंज क्षेत्र की एक महिला अपने शरीर पर पड़े सफेद दागों को दूर कराने के लिए एक साल से काला बाबा के पास आ रही थी. काला बाबा उस के सफेद दाग दूर करने के बहाने उस के नग्न बदन पर लेप लगाता था. 21 अक्तूबर, 2020 की शाम को भी वह महिला काला बाबा के पास लेप लगवाने आई. बाबा की तबियत ठीक नहीं थी. इसलिए उस ने अपने चेले असलम को लेप लगाने के लिए बोल दिया. असलम उस महिला को कमरे में ले जा कर लेप लगाने लगा. उस ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया था. काला बाबा दरवाजे के बाहर ही तैनात था.

तभी मोहल्ले वाले कमरे के अंदर किसी महिला के होने की जानकारी मिलते ही वहां पहुंच गए. वे लोग कमरे के अंदर क्या हो रहा है, काला बाबा से इस की जानकारी मांगने लगे. बाबा उन पर नाराज हो गया तो लोग उस से हाथापाई करने लगे. कुछ लोग इस सब का मोबाइल से वीडियो बना रहे थे, तभी शोर सुन कर कमरे के अंदर मौजूद असलम ने दरवाजा खोल कर बाहर देखना चाहा तो मोहल्ले के लोग कमरे के अंदर घुस गए. वहां परदे के पीछे एक नग्न महिला लेटी हुई थी. लोग वहां पहुंच गए और उस से सवालजवाब करने लगे. महिला कपड़े पहनते हुए सफाई देने लगी कि वह तो मजार पर मत्था टेकने आई थी. वह एक साल से मजार पर आ रही थी. लोगों ने वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिए.

बाबा की घिनौनी करतूत को जिस ने देखा उस ने बाबा को कोसा. मोहल्ले के लोगों ने ठाकुरगंज थाने में सूचना दे दी. सूचना पर इंसपेक्टर राजकुमार अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. मोहल्ले के लोगों ने काला बाबा की करतूतों के बारे में उन्हें बताया. पूरे मामले की बनाई गई वीडियो भी उन को दे दी. इस बीच काला बाबा का चेला असलम भाग गया था. इंसपेक्टर राजकुमार काला बाबा और उस महिला को साथ ले कर थाने आ गए. महिला ने बाबा के विरुद्ध थाने में शिकायत दर्ज कराने से मना कर दिया. तब पुलिस ने महिला को पूछताछ के बाद थाने से घर भेज दिया.

इस के बाद थाने के दरोगा ओमप्रकाश यादव की ओर से काला बाबा और उस के चेले असलम के खिलाफ अश्लील हरकत करने और धोखाधड़ी समेत अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया. कानूनी लिखापढ़ी करने के बाद काला बाबा को न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक पुलिस असलम की तलाश में लगी हुई थी.

Maharashtra News : सैक्स रैकेट और अवैध धंधों से वसूली करने वाली प्रीति की हैरान करने वाली दास्तां

Maharashtra News : खिलाड़ी औरतों के लिए हनीट्रैप कमाई का सब से अच्छा माध्यम है. लेकिन यह जरूरी नहीं कि इस में कामयाबी मिलेगी ही, क्योंकि पुलिस भी अपराधों की गंध सूंघती रहती है. प्रीति ने नेताओं और पुलिस के कंधों पर हाथ रख कर करोड़ों कमाए, लेकिन…

लौकडाउन से अनलौक की ओर कदम बढ़ते ही महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में यूं तो अपराध की जबरदस्त ताक धिना धिन सुनी जा रही थी. हत्याओं का सिलसिला सा बन गया था. राज्य के गृहमंत्री के गृहनगर की इस हालत पर राजनीतिक तीरतलवार चलाने वाले तरकश कसने लगे थे. पुलिस और प्रशासन पर तोहमत लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे. कोरोना योद्धा के तौर पर शाबासी लूट चुकी शहर पुलिस ऐसी किसी तोहमत को तवज्जो नहीं देना चाहती थी. दावा यही कि प्रत्यक्ष को प्रमाण की न जरूरत थी न ही होनी चाहिए.

शहर पुलिस ने बड़ेबड़े अपराधियों के अपराध के आशियानों को कुछ समय में ही बड़े स्तर पर ध्वस्त कर दिया था. ऐसे में एक मामला अचानक चर्चा में हौट हुआ. यह मामला चार सौ बीसी के खेल में पकड़ी गई प्रीति का. राजनीति के गलियारे में चहलकदमी के साथ समाजसेवा का नया मौडल बनी घूमती उस महिला के बारे में बड़ी चर्चा ये थी कि कई पुलिस वाले साहब उस के दबेल यानी उस के दबाव में थे. लिहाजा उस ने शहर व शहर के आसपास के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर दबावतंत्र बना कर कइयों की जिंदगी में जहर घोल दिया. पुलिस कभी उस का सत्कार करती थी तो कभी उस से सत्कार कराती थी.

समाजसेवा के चोले में हनी ट्रैपर घटना 5 जून, 2020 की है. एक शिकायतकर्ता पांचपावली पुलिस स्टेशन में बेबस मुद्रा में मदद की याचना ले कर पहुंचा. शिकायतकर्ता का नाम था उमेश उर्फ गुड्डू तिवारी. पांचपावली क्षेत्र में ही रहने वाले गुड्डू ने बताया कि उस का जीवन एकदम सामान्य था. वह एक स्कूल का कर्मचारी है. हर माह मिलने वाले वेतन से उस के परिवार का हंसीखुशी गुजारा हो रहा था. लेकिन जब से वह प्रीति की सोहबत में आया, उस की दुनिया लुटने लगी. उमेश उर्फ गुड्डू ने उस वक्त को कोसा है, जब वह फेसबुक पर प्रीति से जुड़ा था.

प्रीति का आकर्षक फोटो देख गुड्डू ने उस पर सहज कमेंट किया था. उस कमेंट के जवाब में प्रीति ने फेसबुक पर ही गुड्डू को पर्सनल मैसेज भेज कर मोबाइल फोन नंबर का आदानप्रदान कर लिया. गुड्डू इस बात को ले कर भी खुद को दोष देता है कि एकदो बार फोन पर बात के बाद वह उस अनजानी महिला के सामने पूरी तरह से खुल गया. उस ने अपने घरपरिवार की बातें साझा कर दीं. यहां तक कि वैवाहिक जीवन में भी उस ने अरमानों के सूखे कंठ की वेदना को स्वर दे दिया. प्रीति ने गुड्डू को बताया कि नागपुर के जिस इलाके में वह रहता है, उस के पास ही वह भी रहती है. उस ने अपनी पहचान के दायरे के ट्रेलर के तौर पर कुछ लोगों के नाम गिनाए.

कुछ दिनों बाद दोनों के मिलने का सिलसिला मोहब्बत की परवाज भरने लगा. कभी प्रीति मिलने पहुंचती तो कभी गुड्डू को बुला लेती थी. एक दिन प्रीति ने गुड्डू से साफ कह दिया कि वह उस के साथ जीवन गुजारने को तैयार है. बशर्ते उसे अपनी पत्नी को तलाक देना होगा. भविष्य की योजना भी उस ने गुड्डू से साझा की. 50 वर्षीय गुड्डू जिंदगी के नए सफर पर चलने के लिए न केवल राजी हुआ बल्कि अति उत्साहित भी था. माल मिलते ही बदला रंग गुड्डू की शिकायत का लब्बोलुआब यह था कि प्रीति मनचाहा धन मिलते ही तेवर बदलने लगती थी. बतौर गुड्डू प्रीति ने उस से फ्लैट खरीदने के लिए रुपयों की मांग की थी. उस का कहना था कि जब तक गुड्डू की पत्नी का तलाक नहीं हो जाता, तब तक दोनों उस फ्लैट में मिलतेजुलते रहेंगे.

गुड्डू ने अग्रिम के तौर पर प्रीति को फ्लैट के लिए 2.60 लाख रुपए दे दिए. तय समय पर फ्लैट नहीं लिया गया तो गुड्डू ने रुपए वापस मांगे. बस यहीं से गुड्डू पर दबाव का नया सिलसिला चल पड़ा. फ्लैट के नाम पर लिए गए रुपए वापस लौटाना तो दूर प्रीति ने रुपयों की नई पेशकश रख दी. उस ने कहा कि सोशल मीडिया पर जितनी भी हौट बातें हुई हैं और फोन पर लाइव चैटिंग हुई है, उन का सारा हिसाब उस के पास है. अगर वह उस रिकौर्डिंग को पुलिस को सौंप दे तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा. प्रीति की सीधी धमकी यह भी थी कि ज्यादा चूंचपड़ मत करना. मेरे हाथ काफी लंबे हैं. चुटकी बजा कर ऐसी जगह पर घुसेड़वा दूंगी, जहां से जीवन भर नहीं निकल पाएगा. और हां, अपनी इज्जत बचानी हो तो 5 लाख रुपए तैयार रखना.

प्रीति के ठग अंदाज का जिक्र करते हुए गुड्डू ने बताया कि उस ने डर के मारे प्रीति को 2.42 लाख रुपए और दिए, जिस से वह कहीं मुंह न खोले. लेकिन माल पाने के बाद तो वह और भी रंग बदलने लगी. रुपए और गिफ्ट ले कर यहांवहां बुलाने लगी. उस से दूर होने का प्रयास किया तो वह घर में आ कर पिटवा देने की धमकी देने लगी. कुछ ही दिनों में उस ने नकदी और गिफ्ट के रूप में 14.87 लाख रुपए ऐंठ लिए. आखिरकार उसे अपने बचाव में पुलिस की शरण लेनी पड़ी. पुलिस ने उस की शिकायत की शुरुआती पड़ताल करने के बाद प्रीति के खिलाफ भादंवि की धारा 420 व धारा 384 हफ्तावसूली के तहत केस दर्ज कर लिया.

मामला दर्ज करने के बाद पुलिस ने प्रीति के कामठी रोड स्थित प्रियदर्शिनी अपार्टमेंट के घर पर छापेमारी की. प्रीति वहां से चंपत हो गई थी. पुलिस ने उस के घर से काफी सामान और दस्तावेज बरामद किए. खुला भेद तो पुलिस भी रह गई दंग जिस पांचपावली पुलिस स्टेशन में प्रीति का आनाजाना लगा रहता था, उसी थाने की पुलिस उस के कारनामों की फेहरिस्त देख कर दंग रह गई. रिकौर्ड खंगालने पर पता चला कि प्रीति धोखाधड़ी के मामले में जेल की यात्रा कर चुकी है. उस के आपराधिक क्षेत्र के छोटेबड़े लोगों से भी करीबी संबंध है. उस के खिलाफ शहर के सीताबर्डी पुलिस स्टेशन में भादंवि की धारा 420, 406, 468, 467, 506, 507, 34 के  तहत प्रकरण दर्ज है.

धोखाधड़ी का वह प्रकरण शहर में काफी चर्चित हुआ था. इस के अलावा भंडारा के पुलिस स्टेशन में भी भादंवि की धारा 420 के तहत मुकदमा दर्ज था. शहर पुलिस के बड़े अधिकारियों के लिए यह जानकारी काफी चौंकाने वाली थी कि जिस महिला को वे केवल सामाजिक कार्यकर्ता समझ रहे थे वह ब्लैकमैलर है. यही नहीं वह पुलिस से संबंधों का नाजायज फायदा उठाती रहती है. शहर पुलिस की ओर से प्रीति के अपराधों की जानकारी जुटानी शुरू कर दी गई. बाकायदा प्रैस नोट जारी कर आह्वान किया गया कि इस महिला ने किसी से धोखाधड़ी की हो, तो तत्काल पुलिस से संपर्क करे.

इस बीच प्रीति फरार हो गई थी. पुलिस उसे ढूंढती रही. करीब हफ्ते भर प्रीति बचाव का रास्ता खोजती रही. उस ने वकील के माध्यम से जिला सत्र न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. कोशिश यही थी कि पुलिस गिरफ्तारी से बचते हुए उसे न्यायालय से जमानत मिल जाए. लेकिन उस की कोशिशों पर पानी फिर गया. न्यायालय ने उस की अरजी खारिज कर दी. लिहाजा उस ने 13 जून को पांचपावली पुलिस स्टेशन में आत्मसमर्पण किया. उसे पुलिस तक पहुंचाने वालों में राजनीतिक कार्यकर्ताओं के अलावा पुलिस के कुछ नुमाइंदे भी शामिल थे.

गिरफ्तारी के बाद प्रीति को पुलिस रिमांड पर लिया गया. उस के खिलाफ पुलिस ने सबूत जुटाने शुरू किए. जांच में जुटी पुलिस यह जान कर दंग रह गई कि कुछ समय पहले तक मामूली मोपेड पर घूमने वाली प्रीति अब करोड़पति हो गई है. वह महंगी कारों से घूमती है. उस ने अपने करीबियों व रिश्तेदारों के नाम पर बेनामी संपत्ति खरीद रखी है. बंगला, खेती की जमीन के अलावा वह एक कंपनी की भी संचालक भी थी. अवैध वसूली के लिए उस ने बाकायदा एक संस्था रजिस्टर्ड करा रखी थी. लिहाजा पुलिस ने धर्मदाय आयुक्तालय, विजिलैंस विभाग के अलावा अन्य विभागों को पत्र लिख कर उस के बारे में आवश्यक जानकारी मांगी.

घर में हुआ अपमान तो कर लिया सुसाइड प्रीति के कारनामों की जानकारी जुटाई ही जा रही थी कि पुलिस अधिकारियों तक एक गुहार और पहुंची. गुहार यह कि एक व्यक्ति ने प्रीति और उस के साथियों के डर से सुसाइड कर लिया था. मृतक के परिवार को न्याय दिलाने के लिए यह शिकायत जूनी मंगलवारी निवासी वैशाली पौनीकर की थी. शिकायत के अनुसार वैशाली के पति सुनील पौनीकर ने अक्तूबर 2019 में सतीश सोनकुसरे से कुछ रकम कर्ज ली थी. सुनील पौनीकर मेस संचालक था. काम में घाटे के कारण उसे कर्ज लेना पड़ा था. सतीश सोनकुसरे ने कर्ज वापसी के लिए सुनील पर दबाव बनाया. लेकिन समय पर रुपए नहीं लौटा पाने पर उस ने प्रीति की मदद ली.

प्रीति यह भी दावा करती थी कि वह कर्ज वसूली का काम भी करती है. शहर के सारे बड़े पुलिस अफसर व नेता उस के पहचान के हैं. बतौर वैशाली पौनीकर, प्रीति ने सतीश सोनकुसरे से कर्ज वसूली की सुपारी ली थी. वह कुछ पुलिस कर्मचारियों की मदद से सुनील को प्रताडि़त करती थी. प्रीति की धमकी से किया सुसाइड एक दिन प्रीति सतीश सोनकुसरे और मंगेश पौनीकर को साथ ले कर सुनील के घर पर पहुंच गई. प्रीति ने सुनील को कर्ज नहीं लौटाने पर धमकी दी. उस के साथ कुछ पुलिस वाले भी थे, जो घर में आ कर मांबहन की गालियां दे गए. यहीं नहीं, वह बस्ती में नंगा घुमाने की धमकी दे रहे थे. धमकी और घिनौनी बातों से सुनील बुरी तरह आहत हुआ.

लिहाजा उस ने 27 नवंबर, 2019 की दोपहर ढाई बजे लकड़गंज थाना क्षेत्र के बाबुलवन प्राथमिक शाला के मैदान में जहर पी लिया. मेयो अस्पताल में उपचार के दौरान 30 नवंबर, 2019 को सुनील ने दम तोड़ दिया था. पुलिस ने आकस्मिक मौत का मामला दर्ज कर जांच जारी रखी. अब वैशाली पौनीकर की शिकायत पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर लकड़गंज थाने की पुलिस ने प्रीति व उस के साथियों के खिलाफ सुनील आत्महत्या मामले में आत्महत्या के लिए उकसाने का प्रकरण दर्ज कर तलाश शुरू कर दी. मेस संचालक को आत्महत्या के लिए उकसाने का प्रकरण लकड़गंज थाने में दर्ज हो ही रहा था कि जरीपटका थाने में एक और शिकायत पहुंची.

शिकायत यह थी कि आरोपी प्रीति ने धौंस दिखा कर 25 हजार रुपए ऐंठ लिए. शिकायतकर्ता पूर्णाबाई सडमाके का बेटा नीतेश वायुसेना में लिपिक था. 8 मार्च, 2019 को उस की प्रणिता से शादी हुई थी. शादी के 2 माह बाद ही प्रणिता की अपनी सास पूर्णाबाई से अनबन होने लगी. प्रणिता अपना सामान ले कर मायके चली गई. समझाने पर भी वह नहीं मानी. उस ने पुलिस के भरोसा सेल में पूर्णाबाई की शिकायत दर्ज करा दी. भरोसा सेल में पूर्णाबाई की प्रीति से भेंट हुई. प्रीति भरोसा सेल की एजेंट बन कर घूमती थी. उस ने विवाद निपटाने का झांसा दे कर पूर्णाबाई से 25 हजार रुपए मांगे. रुपए नहीं देने पर उस के बेटे की नौकरी जाने का भय बताया. लिहाजा 17 अक्तूबर, 2019 को पूर्णाबाई ने प्रीति को 25 हजार रुपए दे दिए.

पूर्णाबाई ने प्रीति को फोन कर पूछताछ की. प्रीति ने बताया कि तुम्हारे बेटे का काम हो गया है. मैं ने मैडम को पैसे दे दिए हैं. बेटे से जुड़े मामले को ले कर एक बार पूर्णाबाई को भरोसा सेल की इंचार्ज इंसपेक्टर शुभदा शंखे ने पूछताछ के लिए बुलाया. उस दौरान पूर्णाबाई ने इंसपेक्टर शुभदा से सहज ही कह दिया कि मैं ने तो आप को 25 हजार रुपए दिए थे, फिर आप मुझ से इस तरह घुमावदार सवाल क्यों कर रही हो.  इंसपेक्टर शुभदा चौंकी. वह यह जान कर हैरान थी कि जिस प्रीति दास को वह सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर सम्मान देती रही, वह तो उस के नाम पर ही अवैध वसूलियां करने लगी है. लिहाजा, इंसपेक्टर शंखे ने पूर्णाबाई को शहर पुलिस के जोन-5 के उपायुक्त नीलोत्पल के पास भेजा.

पूर्णाबाई की शिकायत पर जरीपटका पुलिस ने आरोपी प्रीति के खिलाफ हफ्ता वसूली का मामला दर्ज कर लिया. 2 दिन बाद शहर पुलिस के पास एक और शिकायत पहुंची. शिकायतकर्ता युवती उच्चशिक्षित थी. उस के अनुसार उस के साथ एक युवक ने विवाह का झांसा दे कर दुष्कर्म किया था. प्रीति दास ने युवती को यह कह कर मदद का आश्वासन दिया था कि उस की पुलिस के बड़े अधिकारियों से खासी पहचान है. वह दुष्कर्म के आरोपी को सजा दिलाएगी. इस कार्य के लिए उस ने युवती से 25 हजार रुपए मांगे. रुपए मिलने के बाद प्रीति उस युवती से मिलती भी नहीं थी. ऐसे में एक रोज युवती ने प्रीति से तल्खी के साथ सवाल किया तो वह उसे धमकाने लगी. साथ ही यह औफर देने लगी कि उस की गैंग में शामिल हो जाए.

उस युवती का आरोप था कि प्रीति अकसर खूबसूरत युवतियों की मजबूरियों का फायदा उठाती है. युवतियों को पेश कर के वह रसूखदारों से मनचाहा माल वसूलती रहती है. 2 से 3 पुलिस कर्मचारी व अधिकारी को हनीट्रैप में फंसा देने का डर दिखा कर उसने कथित तौर पर लाखों की वसूली की है. उस ने यह भी बताया कि नागपुर में पश्चिम महाराष्ट्र के कई पुलिस अधिकारी बैचलर रहते हैं. उन का परिवार उन के गांव या शहर में है. लिहाजा उन्हें रात रंगीन कराने के एवज में प्रीति लगातार ब्लैकमेल करती रही है.

भंडारा पुलिस थाने में प्रीति के विरुद्ध दर्ज धोखाधड़ी के मामले में बताया गया कि वह नागपुर के बाहर के जिलों में खुद को बैंकर के तौर पर प्रचारित करती रही है. जरूरतमंदों को आसानी से लाखों का कर्ज दिलाने का झांसा देती रही है. उस के इस चक्रव्यूह में कुछ बैंक कर्मचारी व अधिकारी भी शामिल रहे हैं. दीवाने ही दीवाने प्रीति अपना पूरा नाम प्रीति ज्योतिर्मय दास लिखती है. 40 की उम्र की हो चली इस महिला के चेहरे से ही सादगी व शिष्टता झलकती है. लेकिन उस के शिकायतकर्ताओं की मानें, तो वह जैसी दिखती है वैसी है नहीं. उस की मित्रमंडली की फेहरिस्त में दीवाने ही दीवाने हैं.

उस के कारनामों के तराने न जाने कहांकहां गूंज रहे हैं. शिकायतकर्ता गुड्डू तिवारी की सुनें तो प्रीति कपड़ों की तरह रिश्ते बदलती है. लिबास ही नहीं, जरूरत हो तो वह जाति और धर्म भी बदल लेती है. कभी वह मसजिदों के इर्दगिर्द नजर आती है तो कभी गुरुद्वारे के आसपास. फर्राटेदार अंगरेजी तो बोलती ही है , मराठी और हिंदी में भी उस के तेवर तने रहते हैं. उस के जीवन में 4 लोगों के नाम प्रमुखता से जुड़े हैं. इन में एक मराठी, दूसरे कारोबारी हैं तो 2 मुसलिम हैं. चर्चा है कि अपना उल्लू सीधा करने के लिए उस ने संदीप दुधे, महेश गुप्ता, रफीक अहमद व मकसूद शेख से अलगअलग शादी रचाई. फिर उन को उस ने छोड़ दिया.

शिकायतकर्ता गुड्डू की शिकायत में इन नामों का जिक्र है. फिलहाल यह साफ नहीं हो पाया है कि प्रीति अपने पति से क्यों और कैसे दूर हुई. परिवार में उस की बुजुर्ग मां व बेटा है. खबर है कि प्रीति के पिता सेना में थे. पिता की मृत्यु के बाद उस की मां को अब पेंशन मिलती है. घर में अनुशासन व शिष्टाचार का पाठ तो मिलता रहा, लेकिन कहा जाता है कि प्रीति की हसरतों ने उसे नई राह पर ला दिया. उस की सोशल मीडिया पर साझा की गई एक तसवीर पर लिखा है, ‘मेरी सादगी ही गुमनाम रखती है मुझे, जरा सा बिगड़ जाऊं तो मशहूर हो जाऊं.’

उसे करीब से जानने वालों का कहना है कि वह आपराधिक प्रवृत्ति की नहीं थी. लेकिन शोहरत और दौलत पाने का जुनून कुछ ऐसा सवार है कि वह हर हद से गुजर जाने का दंभ भरती है. वह अपनी सोशल इमेज चमकाने का निरंतर प्रयास करती रही. हालत यह है कि अब भी कुछ लोग उसे धोखेबाज मानने को तैयार नहीं है. प्रीति एक भाजपा पार्षद की सामाजिक संस्था से भी जुड़ी थी. लौकडाउन में जरूरतमंदों को राहत सामग्री देने के अभियान में वह पूरी ताकत के साथ जुटी रही. लिहाजा उस संस्था से जुड़े नेता ने तो उसे निर्दोष ठहराने का अभियान ही शुरू कर दिया है. दावे के साथ सोशल मीडिया पर लिखा जा रहा है— हमारी ताई को फंसाया जा रहा है. उस ने कोई अपराध नहीं किया है.

यह भी सुना जा रहा है कि प्रीति स्वयं को बैंकर बताती रही है. वह खुद को एक राजनीतिक दल के पदाधिकारियों द्वारा संचालित एक बैंक की संचालक के रूप में भी प्रचारित करती रही है. सदर क्षेत्र में उस बैंक के कार्यालय में उस के कारनामों के किस्से हैं. बैंक का मैनेजर भी सिर पर हाथ धरे रहता है. बैंक अधिकारी बताते हुए सीज किए हुए वाहन सस्ते में दिलाने के दावे के साथ धोखाधड़ी करने के उस के किस्से भी सुने जा रहे हैं. खास बात है कि प्रीति अकसर सादे लिबास में रहती है. उस का बर्ताव उच्चशिक्षित सा आकर्षक है.

हमपेशेवर सहेलियों ने की चुगली यह चर्चा भी जोरों पर है कि प्रीति के कारनामों की चुगली उस की हमपेशेवर सहेलियों ने की. राजनीति से ले कर सामाजिक कार्यों में ऐसी कई नईपुरानी कार्यकर्ता हैं, जिन की पहचान वसूली एजेंट के तौर पर है. अब सब के काम और सोच के तरीके अलगअलग हो गए हैं. इन में से कुछ को केवल यह बात खटक रही है कि प्रीति कम समय में बहुतों की चहेती बन गई. नेता, पुलिस से ले कर अन्य क्षेत्र के बड़े लोग भी उस के साथ उठनेबैठने लगे. प्रीति का सोशल मीडिया पर इमेज चमकाने का तरीका भी कइयों की आंखों में चुभने लगा था.

लिहाजा प्रीति की चुगली भी होने लगी थी. कभी वह इंसपेक्टर स्तर के अफसर के साथ बदनाम होती तो कभी नेता के घर उस के नाम पर पारिवारिक झगड़ा होता था. बताते हैं कि चुगली के चक्कर में एक पुलिस वाले ने प्रीति से कुछ बातों को ले कर सवाल किए थे, जिस पर वह थाने में ही भड़क गई थी. उस ने उस अफसर को भी खरीखोटी सुनाते हुए ज्यादा चूंचपड़ नहीं करने को कहा था. थाने में सिपाहियों के सामने हुए उस अपमान को अफसर भूल नहीं पाया. शहर में हनीट्रैप के कारनामों में लिप्त कुछ महिलाओं के लिए भी प्रीति आंख का कांटा बनी है. उन्हें लगता है कि यह कल की आई महिला सब को पीछे छोड़ कर काफी आगे निकल चुकी है.

सैक्स रैकेट, भोजनालयों, अवैध धंधों के अड्डों से पुलिस के नाम पर वसूली कर गुजारा करने वालों के लिए यह बात और भी खटकने वाली है कि प्रीति तो सीधे पुलिस अफसरों की गाडि़यों में ही घूमने लगी. आइडियाज क्वीन प्रीति को पहचानने वाले उसे अवैध वसूली की आइडियाज क्वीन भी कहते हैं. अपनी सोशल इमेज बनाते हुए वह सत्कार कार्यक्रम का आयोजन करती रही है. चर्चा के अनुसार वह सत्कार के लिए ऐसे लोगों की तलाश करती रहती है जो कार्यक्रम में  शौल, श्रीफल मिलने के बदले 10 से 20 हजार रुपए खर्च कर सकें.

कार्यक्रम आयोजन के नाम पर सहयोग के तौर पर वह हजारों रुपए जमा कर लेती है. उन कार्यक्रमों में पुलिस के बड़े अधिकारी या अन्य क्षेत्र के सम्मानित लोगों को आमंत्रित करती रही है. सत्कार कराने के इस खेल में भी वह मोटी रकम बटोरती है. बड़े पुलिस अफसरों के लिए मुखबिरी कर के भी वह अपने स्वार्थ साधती रही है. इस के अलावा विविध मामलों को ले कर वह अफसरों व नेता, मंत्री को निवेदन सौंपने में भी आगे रही है. पुलिस मित्र के तौर पर शहर के सभी 33 पुलिस थानों में उस की खास पहचान है. अफसरों की निजी पार्टी के अलावा नेताओं की पर्सनल बैठकों में वह शामिल होती रही है.

खुशियों के मौकों पर मनपा के बड़े नेता भी उस के साथ ठुमके लगाते दिखे. लिहाजा कइयों को यही लगता है कि प्रीति की प्रीत केवल उस से है. उसे होनहार कार्यकर्ता मानने वालों की भी कमी नहीं है. सत्कार करनेकराने का दौर कुछ ऐसा चला है कि शहर में जिम्मेदार वर्ग कहलाने वाले सभी क्षेत्रों के प्रतिष्ठितों के साथ वह मंच साझा कर चुकी है. नगर सेवक, महापौर, विधायक स्तर के जनप्रतिनिधि उस की खास मित्रमंडली में शामिल हैं. वह सब से पहले अपने शिकार के बारे में जानकारी लेती है. मनचाही खुशियों का दाना फेंक कर शिकार फांसने का गुर वह जान चुकी है.

हनीट्रैप के मामलों में उत्तर नागपुर में ही एक गिरोह चर्चा में रहा है. प्रीति का नाम आते ही वह हवा हो गया था. इस के अलावा कुछ आपराधिक मामलों में उस का नाम थानों तक पहुंचा, लेकिन पुलिस के रिकौर्ड में दर्ज नहीं हो पाया. बहरहाल कहा जा रहा है कि प्रीति के चक्कर में दास बने लोगों की लंबी कतार है. इन में कई सफेदपोश लोग भी हैं. उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही सारी हकीकत सामने आने लगेगी.