मौज मजा बन गया सजा – भाग 2

अगले दिन जब डा. अशोक कुमार के लापता होने की खबर अखबारों में छपी तो मऊ पुलिस को लगा कि बरामद कार डा. अशोक कुमार की है, क्योंकि कार का जो नंबर था, उसी नंबर की जेन कार ले कर वह निकले थे. मऊ पुलिस ने कार बरामद होने की सूचना गोरखपुर पुलिस को दी तो गोरखपुर पुलिस डा. अशोक कुमार के घर वालों को साथ ले कर मऊ के थाना दक्षिण टोला जा पहुंची.

घर वालों ने कार की शिनाख्त कर दी. कार डा. अशोक कुमार की ही थी. कार की स्थिति देख कर सभी को यही लगा कि डा. अशोक कुमार के साथ कोई अनहोनी घट चुकी है. अखबारों में छपी खबर पढ़ कर देवरिया पुलिस ने गोरखपुर पुलिस को अपने यहां से एक लाश बरामद होने की सूचना दी.

उसी सूचना के आधार पर महावीर प्रसाद के बड़े दामाद जयराम प्रसाद गोरखपुर पुलिस के साथ देवरिया के थाना खुखुंदू जा पहुंचे. लाश के फोटो और कपड़े आदि देख कर उन्होंने बता दिया कि फोटो और सामान डा. अशोक कुमार के हैं. संदेह तो पहले ही था, अब साफ हो गया कि डा. अशोक कुमार की हत्या हो चुकी है. इस के बाद परिवार में कोहराम मच गया.

मामला हाईप्रोफाइल था, इसलिए इस मामले के खुलासे के लिए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक विजय कुमार ने इस मामले की जांच में चौराचौरी के क्षेत्राधिकारी, एसओजी प्रभारी और क्षेत्राधिकारी एस.के. भगत के नेतृत्व में 3 टीमें बना कर लगा दीं. चूंकि मामला एससी/एसटी का था, इसलिए इस मामले की जांच क्षेत्राधिकारी एस.के. भगत को सौंपी गई थी.

क्षेत्राधिकारी एस.के. भगत ने जब अपने हिसाब से इस मामले की जांच की तो पता चला कि डा. अशोक कुमार काफी आशिकमिजाज आदमी थे. वह अपने कुछ खास मित्रों के साथ पनियारा स्थित वन विभाग के बांकी डाक बंगले में अकसर मौजमस्ती के लिए जाया करते थे. उन्होंने जब उन के खास दोस्तों के बारे में पता किया तो वे थे बीआरडी मैडिकल कालेज के प्रोफेसर डा. सुनील आर्या, कपड़ा व्यवसायी शरीफ अहमद, साइबर कैफे चलाने वाला अविनाश चौहान और बलदाऊ यादव. इन में एक महिला भी थी, जिस का नाम था अराधना मिश्रा, जो नर्स थी.

इस जानकारी के बाद एस.के. भगत ने डा. सुनील आर्या, शरीफ अहमद, अविनाश चौहान और बलदाऊ यादव की ही नहीं, डा. अशोक कुमार की भी घटना के दिन एवं उस से 3 दिन पहले की मोबाइल फोन एवं लैंडलाइन फोनों की काल डिटेल्स निकलवा ली. इस से पता चला कि डा. अशोक कुमार के मोबाइल फोन पर अंतिम फोन डा. सुनील आर्या का आया था. उसी के बाद डा. अशोक कुमार गायब हुए थे.

इस से मामले की जांच कर रहे क्षेत्राधिकारी एस.के. भगत को डा. सुनील आर्या पर ही नहीं, उन के अन्य साथियों पर शक हुआ.  इस के बाद शक के आधार पर ही उन्होंने डा. सुनील आर्या, अविनाश चौहान, बलदाऊ यादव और शरीफ अहमद को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. कई चक्रों में की गई पूछताछ में जब घटना का खुलासा हुआ तो जो बातें सामने आईं, वह हैरान करने वाली थीं. पता चला कि डा. अशोक कुमार की हत्या उन के इन्हीं दोस्तों ने की थी.

डा. अशोक कुमार, डा. सुनील आर्या, शरीफ अहमद, अविनाश चौहान और बलदाऊ यादव शराब और शबाब के यार थे. ये सभी एक साथ शराब पीते और एक साथ अय्याशी करते. डा. अशोक कुमार अपने यार डा. सुनील आर्या के घर बैठ कर शराब पीते तो उन की पत्नी रंजना को जरा भी ऐतराज न होता. इसी तरह डा. सुनील डा. अशोक के यहां बैठ कर शराब पीते तो निर्मला भी ऐतराज नहीं करती थी. इस तरह दोनों लगभग रोज ही पार्टी करते थे.

6 जुलाई, 2001 को अविनाश चौहान के भांजे के जन्मदिन की पार्टी थी. उस पार्टी में डा. अशोक कुमार और डा. सुनील आर्या भी आमंत्रित थे. डा. अशोक कुमार तो निर्मला के साथ पार्टी में पहुंच गए, लेकिन डा. सुनील आर्या उस दिन लखनऊ में थे, इसलिए पार्टी में नहीं आ पाए. केवल उन की पत्नी रंजना आर्या ही आई थीं.

पार्टी में पीने की भी व्यवस्था थी. डा. अशोक कुमार पीने के शौकीन थे ही. वह शराब पी रहे थे, तभी किसी ने उन से पूछा, ‘‘डा. साहब, आज अकेलेअकेले ही पार्टी का मजा ले रहे हैं. आप के मित्र नहीं आए हैं क्या?’’

‘‘यार नहीं आया तो क्या हुआ, उस की मैडम तो आई हैं. उस की कमी मैं पूरी कर दूंगा. हम दोनों के बीच सब चलता है.’’ डा. अशोक कुमार ने नशे में कहा.

डा. अशोक कुमार के पास ही अविनाश खड़ा था, इसलिए उस ने ये बातें सुन ली थीं. डा. अशोक कुमार की बात से उसे हैरानी हुई कि यह नया खेल कब से शुरू हो गया? जबकि उन की दोस्ती काफी पुरानी थी. उस ने तो ऐसा कभी नहीं सुना था.

डा. अशोक कुमार की यह बात अविनाश को बहुत बुरी लगी. बुरी लगने की एक वजह यह थी कि वह डा. सुनील आर्या का सगा साढू था. देर रात पार्टी खत्म हुई तो अविनाश को अशोक कुमार की बात उस के दिमाग में घूमने लगी. क्योंकि अशोक ने एक तरह से उस की साली को गाली दी थी. गाली भी ऐसी, जो सहन करने लायक नहीं थी. उस से नहीं रहा गया तो उस ने डा. सुनील को फोन कर के डा. अशोक द्वारा रंजना के बारे में कही गई बात बता दी.

अविनाश की बातें सुन कर डा. सुनील आर्या के तनबदन में आग लग गई. उस ने कहा, ‘‘मैं अभी गोरखपुर के लिए निकल रहा हूं. उस कमीने ने जो उलटासीधा कहा है, उस की सजा तो उसे मिलनी ही चाहिए.’’

सवेरा होते ही डा. सुनील आर्या गोरखपुर के लिए रवाना हो गए. उस समय उन के साथ उन की महिला मित्र आराधना मिश्रा के अलावा बलदाऊ यादव भी था. वहीं से उन्होंने शरीफ अहमद को फोन कर के गोरखपुर में मिलने के लिए कहा.

गोरखपुर पहुंच कर डा. सुनील आर्या ने अपने सभी साथियों यानी अविनाश चौहान, शरीफ अहमद, बलदाऊ यादव और आराधना मिश्रा को विश्वास में ले कर डा. अशोक कुमार की हत्या की योजना बना डाली.

10 जुलाई की रात डा. सुनील आर्या पत्नी रंजना के साथ एक पार्टी में गए. पार्टी में खाना खा कर उन्होंने पत्नी को घर पहुंचाया और खुद कार से निकल पड़े. इस के बाद वह मैडिकल कालेज के उत्तरी गेट पर पहुंचे, जहां नर्स आराधना मिश्रा उन का इंतजार कर रही थी. आराधना को कार में बैठा कर उन्होंने डा. अशोक कुमार को फोन किया, ‘‘भई, आज रात का क्या प्रोग्राम है?’’

‘‘आज तो कोई प्रोग्राम नहीं है.’’

डा. अशोक कुमार ने कहा तो डा. सुनील आर्या ने कहा, ‘‘सोच रहा हूं, आज बढि़या सा प्रोग्राम रखा जाए, जिस में सब कुछ हो. तुम कहो तो आराधना मिश्रा को बुला लूं?’’

डा. अशोक कुमार भला क्यों मना करते. उन्होंने हामी भर दी. इस तरह डा. सुनील आर्या जो चाहते थे, वह हो गया.  डा. अशोक कुमार से बात करने के बाद डा. सुनील आर्या ने शरीफ और अविनाश को फोन कर के बुला लिया. शरीफ अपनी इंडिका कार से उस के यहां पहुंच गया.

लड़की के लिए दोस्त बना दुश्मन – भाग 2

राहुल के अनुसार उस युवक की उम्र 20-22 साल थी और वह आसमानी रंग की कमीज पहने हुए था. पुलिस ने डा. हर्षवर्धन से भी पूछताछ की. उन्होंने बताया कि उस युवक को उन्होंने 3 बजे देखा था. उस वक्त वह बेहोश जरूर था लेकिन जीवित था. इस का मतलब उस युवक की हत्या 3 बजे के बाद की गई थी. पुलिस ने वार्ड में भरती मरीजों के अलावा  उन के तीमारदारों से भी पूछताछ की.

तीमारदार रविंद्र ने ही सब से पहले उस युवक की गरदन से खून बहते देखा था और उसी ने दूसरों को यह बात बताई थी. इसलिए वह इस मामले की महत्त्वपूर्ण कड़ी था. उस के मुताबिक युवक के बिलकुल बराबर वाले बेड नंबर-11 पर उस की मरीज बेबी सो रही थी. बेड नंबर-9 खाली था इसलिए वह उस पर जा कर लेट गया था. बीचबीच में वह देखभाल के लिए बेबी के बेड के पास चक्कर लगाने चला जाता था.

पुलिस के पूछने पर रविंद्र ने बताया कि बीती शाम उस ने एक युवक को वहां घूमते देखा था. वह युवक आधे मुंह पर चादर लपेटे हुए था. चूंकि ठंड पड़ रही थी इसलिए उस ने उस पर कोई शक नहीं किया था. रविंद्र के पूछने पर उस ने बताया था कि उस का नाम सचिन है और वह घायल की देखभाल के लिए उस के साथ है. वह खुद को अलीगढ़ का रहने वाला बता रहा था.

एंबुलेंस चालक ने संदिग्ध युवक का जो हुलिया बताया था वह रविंद्र द्वारा बताए गए हुलिए से मैच नहीं कर रहा था. इमरजेंसी में घूमने वाला वह अज्ञात युवक ही शक के दायरे में था क्योंकि घटना के बाद से वह लापता था. मैडिकल कालेज 149.48 एकड़ में फैला था. वहां 24 घंटे लोगों की आवाजाही रहती थी. परिसर में छात्रछात्राओं के छात्रावास तो थे ही साथ ही विभिन्न वार्डों में हर वक्त सैकड़ों मरीज और उन के तीमारदार भी मौजूद रहते थे. परिसर के अंदर ही मेडीकल पुलिस थाना भी था. ऐसे में कौन कब आया और कत्ल कर के कैसे चुपचाप निकल गया यह पता लगाना आसान नहीं था.

न तो मृतक की शिनाख्त हो पा रही थी और न ही पुलिस को हत्या की वजह पता चल पा रही थी. कातिल के शातिराना तरीके को ले कर पुलिस हैरत में थी. उसे लग रहा था कि हत्यारे ने पहले उस युवक को ट्रेन से गिरा कर मारने की कोशिश की होगी ताकि यह हादसा लगे. जब वह बच गया, तो कातिल उस का पीछा करता रहा और मौका मिलते ही उस ने हत्या को अंजाम दे दिया.

उस का मकसद हर हाल में उस की हत्या करना था. पुलिस ने मृतक के शव का पंचनामा भर कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी और हत्या का केस दर्ज कर लिया. डीआईजी के. सत्यनारायण से ले कर एसएसपी ओंकार सिंह और सीओ विकास त्रिपाठी तक इस मामले को ले कर परेशान थे.

वारदात की गंभीरता को देखते हुए सीओ विकास त्रिपाठी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम का गठन किया गया ताकि जल्दी से जल्दी इस केस की तह तक पहुंचा जा सके.

जांच आगे बढ़ाने के लिए मृतक की शिनाख्त जरूरी थी. इस के लिए जिले के अन्य थानों से पता किया गया, लेकिन कहीं से किसी युवक के लापता होने की सूचना नहीं मिली. इसलिए पुलिस ने पोस्टमार्टम के बाद युवक के शव को शवगृह में सुरक्षित रखवा दिया.

इत्तफाक से अगले दिन ही मृतक की शिनाख्त हो गई. एक व्यक्ति ने कुछ लोगों के साथ अस्पताल आ कर बताया कि संभवत: मृतक उस का बेटा था. डा. सुभाष सिंह ने उसे पोस्टमार्टम हाउस ले जा कर शव दिखाया, तो वह फूटफूट कर रोने लगा. मृतक की पहचान हो गई है, यह सूचना मिलते ही पुलिस अस्पताल आ गई. पता चला मृतक जिला अमरोहा की तहसील मंडी धनौरा क्षेत्र के ग्राम जटपुरा निवासी रामबीर चौहान का बेटा नितिन चौहान था.

एसएसपी ओंकार सिंह और सीओ विकास त्रिपाठी ने मृतक के पिता रामबीर को सांत्वना दे कर उस से पूछताछ की. पुलिस के पूछने पर रामबीर सिंह ने बताया कि नितिन अपने रूम पार्टनर परमजीत के साथ मेरठ में ही रहता था. 24 अक्तूबर को वह कालेज गया था. जब वह शाम को वापस नहीं लौटा तो परमजीत ने फोन कर के यह बात उन्हें बताई. उन्होंने नितिन के नंबर पर फोन लगाया तो वह लगातार स्विच्ड औफ जाता रहा.

वह परेशान हो गए और मेरठ आ कर दिन भर उस की तलाश की. लेकिन कोई पता नहीं चला. आज जब यह खबर अखबार में छपी तो वह अस्पताल आए. अस्पताल में पता चला कि नितिन अब इस दुनिया में नहीं है. रामबीर चौहान ने इस बात से इनकार किया कि उन की या नितिन की किसी से कोई रंजिश थी. मृतक की शिनाख्त तो हो गई लेकिन पुलिस को हत्यारे तक पहुंचने के लिए कोई सूत्र नहीं मिल रहा था. मामला काफी उलझा हुआ था.

नितिन के पिता गांव के सीधेसाधे किसान थे. उन के परिवार में पत्नी पुष्पा के अलावा 3 बच्चे थे. नितिन सब से बड़ा था, उस से छोटी 2 बेटियां थीं निशी और आशू. नितिन ने सन 2012 में गांव से इंटर करने के बाद अलीगढ़ जा कर शिवदान कालेज में बीफार्मा की पढ़ाई के लिए दाखिला ले लिया था. लेकिन अलीगढ़ में नितिन का पढ़ाई में मन नहीं लगा, तो इसी साल उस ने मेरठ के मवाना रोड स्थित ट्रांसलेम इंस्टीट्यूट में दाखिला ले लिया था. रहने के लिए उस ने अपने एक सहपाठी परमजीत के साथ गंगापुरम कालोनी में किराए का एक कमरा ले लिया था.

नितिन की लगभग हर रोज अपने घर वालों से बात होती थी. 24 अक्तूबर को उस की कोई बातचीत नहीं हुई थी. इसी बीच सनसनीखेज ढंग से उस की हत्या हो गई थी. पुलिस ने नितिन के रूम पार्टनर परमजीत से पूछताछ की. उस ने बताया कि 24 तारीख को नितिन कालेज के लिए निकला तो था लेकिन अंदर न जा कर कालेज के गेट पर ही रुक गया था. जब वह क्लास में नहीं आया तो उस ने सोचा कि वह उसे बिना बताए कहीं घूमने चला गया होगा. जब वह शाम को कमरे पर नहीं लौटा तो उस ने फोन कर के यह बात उस के पिता को बता दी.

‘‘तुम ने उस का पता लगाने की कोशिश नहीं की?’’ विकास त्रिपाठी के पूछने पर उस ने बताया, ‘‘की थी. लेकिन उस का मोबाइल स्विच्ड औफ था.’’

पुलिस ने कालेज में भी पूछताछ की. परमजीत सच बोल रहा था. वह उस दिन क्लास में मौजूद था जबकि नितिन गैरहाजिर था. पुलिस ने अन्य छात्रछात्राओं से भी पूछताछ की. इस पूछताछ में पता चला कि नितिन कालेज के गेट से ही एक युवक के साथ मोटरसाइकिल पर बैठ कर चला गया था. मोटरसाइकिल वाला कौन था, इस बारे में किसी को पता नहीं था. अस्पताल में जिस युवक को नितिन के पास देखा गया था उस से भी मोटरसाइकिल वाले का हुलिया नहीं मिल रहा था जो नितिन को मोटरसाइकिल पर ले कर गया था.

इस से पुलिस को लगा कि नितिन की हत्या में एक नहीं 2 युवक शामिल रहे होंगे. हत्यारे तक पहुंचने के लिए पुलिस ने नितिन के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई, लेकिन इस से भी कोई नतीजा नहीं निकला. इस से यह साफ हो गया कि हत्यारा जो भी था बेहद चालाक था. उस ने अपने पीछे कोई सुबूत नहीं छोड़ा था.

मौज मजा बन गया सजा – भाग 1

गोरखपुर के अपर सत्र न्यायाधीश (विशेष) अनुसूचित जाति/जनजाति श्री सुरेंद्र कुमार यादव  की अदालत में एक बहुत ही चर्चित मामले का फैसला सुनाया जाने वाला था, इसलिए उस दिन अदालत में मीडिया वालों के साथसाथ आम लोगों की कुछ ज्यादा ही भीड़ थी.

दरअसल हत्या के जिस मामले का फैसला सुनाया जाना था, उस मामले में मृतक डा. अशोक कुमार कोई मामूली आदमी नहीं थे. वह कांगे्रस के जानेमाने नेता और हरियाणा के राज्यपाल रहे स्व. महावीर प्रसाद के दामाद थे. उस भीड़ में मृतक डा. अशोक कुमार के ही नहीं, उन की हत्या के आरोपी अविनाश चौहान, शरीफ अहमद, डा. सुनील आर्या और बलदाऊ यादव के घर वाले भी मौजूद थे.

सरकारी वकील इरफान मकबूल खान ने जहां चारों अभियुक्तों को हत्या का दोषी ठहरा कर कठोर से कठोर सजा देने की मांग की थी, वहीं बचाव पक्ष के वकील का कहना था कि उन के मुवक्किलों को गलत तरीके से फंसाया गया है. पुलिस ने जो सुबूत पेश किए हैं, वे घटना एवं घटनास्थल से मेल नहीं खाते, उन के मुवक्किल निर्दोष हैं, जिस से उन्हें बरी किया जाए.

इस हत्याकांड का फैसला जानने से पहले आइए इस हत्याकांड के बारे में जान लें, जिस से फैसला जानने में थोड़ी आसानी रहेगी.

जिन डा. अशोक कुमार की हत्या के मुकदमे का फैसला सुनाया जाना था, वह उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर की कोतवाली शाहपुर की पौश कालोनी आवासविकास के मकान नंबर बी-88 में रहने वाले सबइंस्पेक्टर के पद से रिटायर हुए दूधनाथ के 3 बेटों में सब से बड़े बेटे थे.

दूधनाथ सरकारी नौकरी में थे, इसलिए उन्होंने अपने सभी बच्चों की पढ़ाईलिखाई पर खास ध्यान दिया था. इसी का नतीजा था कि उन के बड़े बेटे अशोक कुमार का चयन सीपीएमटी में हो गया था. कानपुर के गणेशशंकर विद्यार्थी मैडिकल कालेज से एमबीबीएस करने के बाद नेत्र चिकित्सा में विशेष योग्यता हासिल करने के लिए वह दिल्ली स्थित आल इंडिया इंस्टीट्यूट आफ मैडिकल साइंसेज चले गए थे.

एम्स से एमएस करने के बाद डा. अशोक कुमार ने दिल्ली के आई केयर सेंटर में नौकरी कर ली. वहां से ठीकठाक अनुभव प्राप्त कर के वह गोरखपुर आ गए और गोरखपुर के शाहपुर में नेहा आई केयर सेंटर के नाम से अपना खुद का अस्पताल खोल लिया.

जल्दी ही डा. अशोक कुमार की गिनती गोरखपुर के मशहूर नेत्र विशेषज्ञों में होने लगी, जिस से शोहरत भी मिली और पैसा भी आया. फिर दोस्तों की भी संख्या बढ़ने लगी. लेकिन उन की सब से ज्यादा घनिष्ठता थी डा. सुनील आर्या से. इस की एक वजह यह थी कि डा. सुनील आर्या उन के किशोरावस्था के दोस्त थे. इस के अलावा दोनों एक ही पेशे से जुड़े थे, फिर दोनों के स्वभाव भी एक जैसे थे. डा. सुनील आर्या मैडिकल कालेज में प्रोफेसर थे.

डा. अशोक कुमार डाक्टरी की पढ़ाई कर रहे थे, तभी गोरखपुर की तहसील बांसगांव के गांव उज्जरपार के रहने वाले कांगे्रस के कद्दावर नेता महावीर प्रसाद ने अपनी छोटी बेटी निर्मला की शादी उन से कर दी थी. उन की सिर्फ 2 ही बेटियां थीं. बड़ी बेटी का ब्याह उन्होंने गोरखपुर के दाउदपुर के रहने वाले जयराम कुमार के साथ किया था. वह सिंचाई विभाग में अधिशाषी अभियंता थे.

शादी के बाद महावीर प्रसाद ने दोनों ही बेटियों को उपहार में एकएक गैस एजेंसी दी थी. विमला की गैस एजेंसी महाराजगंज में थी, जबकि निर्मला की गैस एजेंसी उन के बेटे हिमांशु के नाम से गोरखपुर के राप्तीनगर के मोहल्ला चकसा हुसैननगर में थी.

10 जुलाई, 2001 की रात साढ़े नौ बजे के करीब डा. अशोक कुमार गैस एजेंसी के काम से अकेले ही अपनी मारुति जेन कार यूपी 53 एल 2345 से इलाहाबाद के लिए निकले. उस समय उन के पास गैस एजेंसी के कागजतों के अलावा 1 लाख 10 हजार रुपए नकद थे.

11 जुलाई की सुबह 7 बजे के आसपास पति का हालचाल लेने के लिए निर्मला ने उन के मोबाइल पर फोन किया. फोन बंद होने की वजह से बात नहीं हो पाई. उन्हें लगा, लंबे सफर की वजह से वह थक गए होंगे. कोई परेशान न करे, इसलिए फोन बंद कर दिया होगा.

11 बजे तक डा. अशोक कुमार का फोन नहीं आया तो निर्मला ने एक बार फिर फोन किया. इस बार भी फोन बंद था. इस के बाद निर्मला रहरह कर पति का फोन मिलाती रही, लेकिन हर बार उन का फोन स्विच औफ बताता रहा. जब पति से किसी भी तरह संपर्क नहीं हुआ तो उन का दिल घबराने लगा.

निर्मला ने बहनोई जयराम प्रसाद को फोन किया तो पता चला कि वह भी गैस एजेंसी के ही काम से इलाहाबाद गए हुए हैं. इस के बाद निर्मला ने इलाहाबाद में रहने वाले अपने परिचितों को फोन कर के पति के बारे में पूछा. उन में से कोई भी डा. अशोक कुमार के बारे में कुछ नहीं बता सका. इसी तरह 2 दिन बीत गए. जब डा. अशोक के बारे में कुछ पता नहीं चला तो परिवार में बेचैनी हुई. निर्मला ने दिल्ली में रह रहे अपने पिता महावीर प्रसाद को फोन कर के सारी बात बताई.

दामाद के इस तरह अचानक गायब हो जाने से महावीर प्रसाद परेशान हो उठे. उन्होंने निर्मला से थाने में गुमशुदगी दर्ज कराने को कह कर गोरखपुर के पुलिस अधिकारियों से बात की. पिता के कहने पर निर्मला ने तीसरे दिन थाना शाहपुर में तहरीर दे कर पति डा. अशोक कुमार की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

डा. अशोक कुमार कोई मामूली आदमी नहीं थे. वह दरोगा के बेटे होने के साथसाथ कांग्रेस के बड़े नेता के दामाद भी थे. महावीर प्रसाद ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को फोन कर ही दिया था, इसलिए गुमशुदगी दर्ज होते ही जिले के सभी थानों की पुलिस सक्रिय हो गई.

11 जुलाई, 2001 को गोरखपुर से जुड़े जिला देवरिया के थाना खुखुंदु पुलिस ने चौकीदार लालजी यादव की सूचना पर सलेमपुरदेवरिया रोड पर बनी वन विभाग की पौधशाला के पास से एक लाश बरामद की. लाश के पास एक तौलिया और एक तकिया का कवर मिला था. दोनों ही चीजें खून से सनी थीं. मृतक की उम्र 35-36 साल के करीब थी. देखने से ही लग रहा था कि यह हत्या का मामला है, इसलिए थानाप्रभारी श्यामलाल चौधरी ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करा दिया.

मृतक की तलाशी में ऐसी कोई भी चीज नहीं मिली थी, जिस से उस की शिनाख्त हो सकती. इस से पुलिस को यही लगा कि मृतक की हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेकी गई थी. पुलिस ने लाश के फोटो करवा कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. लाश की शिनाख्त न होने से थाना खुखुंदू पुलिस ने पोस्टमार्टम के बाद उसे लावारिस मान कर उसी दिन उस का अंतिम संस्कार करा दिया था.

अगले दिन यानी 12 जुलाई की देर रात आजमगढ़ के करीबी जिला मऊ के थाना दक्षिण टोला पुलिस ने जहांगीराबाद से सड़क के किनारे से एक मारुति जेन कार बरामद की. पुलिस ने कार की खिड़कियों के शीशे तुड़वा कर टार्च की रोशनी में चैक किया तो कार की पिछली सीट पर खून के कुछ निशान दिखाई दिए.

अगली सीट पर कनियार पुल के टोल टैक्स की रसीद के साथ 12 बोर की गोली का एक खोखा बरामद हुआ. कार के अंदर ही गाड़ी के कागजात मिल गए थे, जो गोरखपुर के शाहपुर की आवासविकास कालोनी, गीतावाटिका के रहने वाले डा. अशोक कुमार के नाम थे. इस के अलावा कार से एक जोड़ी चप्पलें और भोजपुरी गीतों के 6 औडियो कैसेट बरामद हुए थे. पुलिस ने कार को कब्जे में ले कर इस की सूचना जिला नियंत्रण कक्ष को दे दी थी.

लड़की के लिए दोस्त बना दुश्मन – भाग 1

सुबह के 4 बजे थे. बाहर रात का अंधेरा अभी तक दामन फैलाए हुए था, लेकिन मेरठ के लाला लाजपतराय मैडिकल कालेज स्थित सरदार वल्लभ भाई पटेल चिकित्सालय के इमरजेंसी वार्ड में जलती ट्यूब लाइटों की रोशनी फैली थी. हल्की रोशनी के बावजूद कई मरीज नींद में थे. तभी अचानक वहां अफरातफरी मच गई. दरअसल हुआ यह कि एक मरीज का तीमारदार रविंद्र  अपनी मरीज को देखने के लिए उठा तो उस ने बेड नंबर 12 के मरीज की गरदन से खून बहते देखा. वह तड़पते हुए हाथपैर पटक रहा था.

बीते दिन जब उस मरीज को लाया गया था तो वह बेहोश था. उसे काफी चोटें लगी थीं. बाद में पता चला कि उस के पैर में फै्रक्चर है. डाक्टरों ने उस की मरहमपट्टी कर के उस के पैर पर प्लास्टर चढ़ा दिया था. उस की गरदन से खून बहता देख रविंद्र चिल्लाया, ‘‘डाक्टर साहब… डाक्टर साहब…’’

‘‘क्या हुआ, क्यों चिल्ला रहे हो?’’ वहां से कुछ दूर बैठे वार्ड बौय दीपक ने चौंक कर पूछा, तो रविंद्र ने हड़बड़ाते हुए कहा, ‘‘जल्दी आइए, किसी ने इस की गरदन काट दी है.’’ यह सुन कर दीपक सन्न रह गया. उस ने यह बात ड्यूटी पर मौजूद स्टाफ को बताई. खबर मिलते ही डा. हर्षवर्धन व अन्य स्टाफ वहां आ गया. बेड पर खून से लथपथ पड़े उस युवक की हालत देख सभी सन्न रह गए. उस की गरदन को धारदार हथियार से रेता गया था. खून लगातार बह रहा था, बिस्तर खून से तरबतर हो चुका था. उस की हालत बहुत चिंताजनक थी.

डा. हर्षवर्धन ने उस की गरदन को देखने के बाद खून रोकने के लिए रुई रख कर पट्टी लपेट दी. उन्होंने कांपते हाथों से उसे कुछ इंजेक्शन भी दिए. निस्संदेह वह मौत के बेहद करीब था. उपचार के बावजूद उस ने कुछ ही देर में लंबीलंबी सांसें लेते हुए दम तोड़ दिया. तब तक वहां अन्य मरीजों के तीमारदार भी जमा हो गए थे. सभी सहमे हुए थे. जाहिर तौर पर यह हत्या का मामला था. इमरजेंसी वार्ड में एक मरीज की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी और किसी को पता तक नहीं चला था, यह हैरत की बात थी.

इमरजेंसी वार्ड में रात की ड्यूटी पर डा. हर्षवर्धन के अलावा स्टाफ नर्स महिमा सिंह और नर्सिंग छात्रा अंजलि सिंह सहित 8 लोगों का स्टाफ था. इन लोगों के अलावा वार्ड में दरजनों मरीज और उन के तीमारदार भी थे. वार्ड में एंट्री करते ही अल्युमिनियम के फ्रेम में जड़े शीशों वाला स्टाफ रूम था. जिस में आरपार दिखाई देता था. उस रूम से ही अटैच इमरजेंसी वार्ड था जिस में दोनों साइडों में 21 बेड लगे हुए थे.

यह चूंकि मेरठ का एकलौता बड़ा सरकारी अस्पताल था इसलिए वहां चौबीसों घंटे आनेजाने वालों का सिलसिला लगा रहता था. इस के अलावा स्टाफ भी ड्यूटी पर रहता था. बाहर से आने वाले सभी मरीजों को सब से पहले इमरजेंसी में ही लाया जाता था. तत्कालिक चिकित्सा के बाद में उन्हें अलगअलग वार्डों में शिफ्ट कर दिया जाता था.

जिस युवक का इमरजेंसी वार्ड में कत्ल किया गया था उसे पिछले दिन ही वहां भरती कराया गया था. हुआ यह था कि कैंट रेलवे स्टेशन के माल गोदाम के सामने लगभग साढ़े 11 बजे सफाईकर्मी रामफल व राजेंद्र ने उस युवक को 2 रेलवे ट्रैक के बीच बेहोश पड़े देखा था. उस वक्त वह बुरी तरह घायल था. कुछ ही देर पहले वहां से जालंधर एक्सप्रेस व एक अन्य टे्रन एकदूसरे को क्रौस करते हुए अलगअलग ट्रैक से गुजरी थीं.

राजेंद्र और रामफल ने घायल युवक को देखने के बाद इस की सूचना रेलवे पुलिस को दी. पुलिस ने उसे उठा कर प्यारे लाल शर्मा जिला चिकित्सालय में भरती करा दिया था. उस की हालत चूंकि गंभीर थी इसलिए प्राथमिक उपचार के बाद उसे सरकारी एंबुलेंस से मैडिकल कालेज स्थित अस्पताल में रेफर कर दिया गया था.  युवक के शरीर पर काफी चोटें थीं और उस का एक पैर रेल की चपेट में आ कर टूट चुका था. डाक्टरों का अनुमान था कि उस के साथ यह हादसा रेल से गिरने की वजह से हुआ होगा.

पुलिस ने भी उस युवक के रेल से गिरने की वजह जानने की कोशिश नहीं की थी क्योंकि प्रथम दृष्टया यह हादसा लग रहा था. इसीलिए पुलिस ने न तो इस बाबत कोई मामला दर्ज किया था और न यह जानने की कोशिश की थी कि हादसा कैसे हुआ? एक परेशानी यह भी थी कि घटना का प्रत्यक्षदर्शी कोई भी नहीं था. युवक चूंकि बेहोश था इसलिए यह भी पता नहीं लग सका था कि वह कौन है. पहचान के लिए पुलिस ने उस की तलाशी भी ली, लेकिन उस के पास कोई पहचान पत्र या मोबाइल नंबर वगैरह नहीं मिला था.

बहरहाल, डाक्टरों ने उस की मरहमपट्टी की और एक्सरे के बाद पैर पर प्लास्टर चढ़ा दिया. इस के बाद उसे इमरजेंसी वार्ड के बेड नंबर-12 पर शिफ्ट कर दिया गया. इस के बाद भी युवक की बेहोशी नहीं टूटी थी. डाक्टरों को उम्मीद थी कि उसे सुबह तक होश आ जाएगा. लेकिन वह होश में आ कर अपनी पहचान और हादसे के बारे में कुछ बता पाता इस से पहले ही अलसुबह उस की हत्या कर दी गई थी.

वार्ड में हत्या के मामले में स्टाफ के लोग फंस सकते थे इसलिए तुरंत अस्पताल अधीक्षक डा. सुभाष सिंह को इस मामले की जानकारी दी गई. खबर मिलते ही वह आ गए. जरूरी पूछताछ के बाद उन्होंने इस की सूचना पुलिस को दे दी. सूचना पा कर थाना मैडिकल प्रभारी राकेश सिसौदिया घटनास्थल पर आ गए. दिन निकलते ही इस वारदात ने सनसनी फैला दी. चौंकाने वाली बात यह थी कि वारदात अस्पताल के अंदर हुई थी. अस्पताल में हत्या की खबर मिली तो डीआईजी के. सत्यनारायण, एसएसपी ओंकार सिंह, एसपी सिटी ओमप्रकाश सिंह और सीओ सिविल लाइंस विकास त्रिपाठी भी घटनास्थल पर आ गए.

पुलिस अधिकारियों ने इस मामले की हर नजरिए से जांचपड़ताल शुरू की. पूछताछ में पता चला कि वार्ड में मरीजों के नामपते की तो एंट्री होती थी, लेकिन उन से मिलने कौन आताजाता है इस का कोई ब्यौरा नहीं रखा जाता था. वार्ड में सीसीटीवी कैमरे भी नहीं लगे थे. पुलिस अधिकारी अस्पताल कर्मियों पर इसलिए नाराज थे क्योंकि हत्या जैसा गंभीर अपराध हो गया था और उन्हें पता तक नहीं चला था.

अधीक्षक डा. सुभाष सिंह ने मरीजों और उन्हें भरती कराने वालों की सूची पुलिस को उपलब्ध करा दी. सीओ विकास त्रिपाठी ने उस एंबुलेंस चालक राहुल से पूछताछ की जिस ने उस युवक को जिला अस्पताल ला कर भरती कराया था. उस से काम की एक बात यह पता चली कि जब उस युवक को अस्पताल लाया जा रहा था तो वहां एक युवक मौजूद था जो उसे अस्पताल ले जाने के लिए कोई प्राइवेट वाहन लाने की बात कर रहा था. लेकिन जब उस से प्राइवेट वाहन लाने की वजह पूछी गई तो वह टालमटोल करने लगा.

देवर के इश्क़ में

सीमा हैदर : प्रेम दीवानी या पाकिस्तानी जासूस – भाग 3

सचिन के गांव में चर्चा का विषय बन गई थी खूबसूरत सीमा

अगले दिन से जब लोगों ने नेत्रपाल के घर में एक खूबसूरत महिला व 4 बच्चों को देखा तो गांव में खुसरफुसर होने लगी. मांग में सिंदूर और सिर पर साड़ी का पल्लू डाल कर रखने वाली सीमा बेहद खूबसूरत थी. लोगों ने जब नेत्रपाल व उस के परिवार वालों से घर में आई अंजान महिला के बारे में पूछा तो परिवार ने बताया कि ये उन की बहू सीमा है, जिस के साथ सचिन ने प्रेम विवाह किया है.

परिवार ने गांव वालों को बताया कि सीमा का अपने पति से तलाक हो चुका है, इसलिए वह अपने चारों बच्चों के साथ सचिन के साथ रहने आ गई है, लेकिन अचानक सामने आई इस प्रेम कहानी को ले कर गांव में रहस्यभरी बातें होने लगीं. सीमा और सचिन अपनी शादी को वैध करना चाहते थे. इसलिए उन्होंने नोएडा कोर्ट में मैरिज के लिए आवेदन किया तो पुलिस ने वैरीफिकेशन के लिए सचिन व सीमा के दस्तावेज पुलिस को सौंपे गए.

पुलिस ने गांव में जा कर जब सचिन व उस की पत्नी के बारे में पड़ताल शुरू की तो किसी ने बताया कि उसे शक है कि जिस लडक़ी से सचिन ने शादी की है वो मुसलिम है और शायद पाकिस्तानी भी. क्योंकि जिस शख्स ने पुलिस को ये जानकारी दी, उस ने सीमा को ईद के दिन घर में नमाज पढ़ते देख लिया था.

बस फिर क्या था, 4 जून को सीमा को रबूपुरा थाने की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. नोएडा पुलिस के साथ इंटैलीजेंस के अधिकारियों ने भी सीमा से पूछताछ शुरू कर दी. सचिन मीणा के साथ रबूपुरा में अवैध रूप से रह रही पाकिस्तान की सीमा हैदर को पुलिस, स्वाट व सर्विलांस की संयुक्त टीम ने आ कर कस्बा रबूपुरा के मोहल्ला अंबेडकरनगर में 13 मई, 2023 से सचिन के साथ अवैध रूप से रहने के आरोप में धारा 14 विदेशी अधिनियम, 120 बी, 34 भादंवि एवं 3/4/5 द पासपोर्ट (एंट्री इंटू इंडिया) एक्ट 1920 के तहत गिरफ्तार कर लिया.

लेकिन अगले दिन ही उन दोनों को जमानत मिल गई. पुलिस ने सचिन और उस के पिता नेत्रपाल उर्फ नित्तर को भी महिला को संरक्षण देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था. हालांकि नोएडा कोर्ट ने उन्हें अगले ही दिन जमानत दे दी थी, लेकिन उन की गिरफ्तारी के साथ ही इस मामले ने तूल पकड़
लिया.

सोशल मीडिया पर वायरल हो गई पाकिस्तानी बहू

जमाना सोशल मीडिया और अभिव्यक्ति की आजादी का है. वैसे भी हिंदुस्तान में पाकिस्तान से जुड़ी हर चीज को संदेह की नजर से देखा जाता है. एक दुश्मन देश की महिला अपना घरबार बेच कर एक साधारण से नौजवान से शादी करने के लिए अवैध रूप से कई देशों की सीमा लांघ कर देश में आ गई तो पूरे देश के लोगों में कौतूहल पैदा होना ही था.

एक तरफ जहां पाकिस्तान वाली भाभी कह कर दूरदूर से लोग सीमा को देखने के लिए सचिन के रबूपूरा स्थित घर पहुंचने लगे तो कुछ लोगों ने उसे पाकिस्तानी जासूस कह कर सवाल भी उठाने शुरू कर दिए.
जब बात शक और संदेह की होती है तो लोग सवाल भी पूछते हैं. लोग सीमा को विषकन्या कह कर कई तरह के सवाल पूछने लगे. सीमा अचानक भारत में अखबारों व टीवी की हैडलाइन बन गई. जाहिर है जिस मुल्क की रहने वाली थी, उस पाकिस्तान में भी उस की चर्चा शुरू होनी थी.

इधर भारत की जांच एजेंसियां सीमा के जासूस होने के शक में उस की छानबीन करने लगीं तो दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर भी सीमा को ले कर नित नए सवाल खड़े होने लगे. पुलिस ने सीमा हैदर के पास से पासपोर्ट के अलावा उस का मैरिज सर्टिफिकेट, 3 आधार कार्ड, गवर्नर औफ पाकिस्तान नैशनल डाटाबेस ऐंड रजिस्ट्रैशन अथारिटी (मिनिस्ट्री औफ इंटीरियर) की एक सूची भी बरामद की है. महिला के पास 5
वैक्सीनेशन कार्ड और काठमांडू से दिल्ली तक की यात्रा के बस टिकट भी बरामद किए गए.

सीमा और उस के बच्चों के पासपोर्ट पर नेपाल का वीजा भी मिला है. इतना ही नहीं, सीमा की पहली शादी के 2 वीडियो कैसेट भी मिले, वो अपनी शादी से जुड़े सभी दस्तावेज और सबूत ले कर भारत आई है. पबजी से शुरू हुई ये लव स्टोरी ग्रेटर नोएडा में आ कर खत्म हो गई है. पुलिस की सीमा पर शक की वजह भी थी. अकसर हनीट्रैप या ऐसे ही दूसरे मामलों में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी अपने जासूसों को भारत भेजती रही है. अब पुलिस इसी बात की जांच कर रही है कि सीमा सच में मोहब्बत की मारी है या फिर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी का कोई मोहरा.

फिलहाल उत्तर प्रदेश पुलिस की एटीएस व केंद्रीय जांच एजेंसियों को कोई भी सबूत नहीं मिला है, जिस से सीमा को पाकिस्तानी जासूस साबित किया जा सके, लेकिन उस के बयानों में इतने विरोधाभास हैं कि उस ने पुलिस को सीमा पर शक के लिए मजबूर कर दिया है.

सचिन की शुरुआती जांच के बाद ऐसा ही लगता है कि वो भी इश्क का ही शिकार है. सचिन का कोई पुराना क्रिमिनल रिकौर्ड नहीं मिला है, लेकिन बगैर वीजा और कानूनी यात्रा दस्तावेज के सीमा और उस के बच्चों के भारत आने और ये सब कुछ जानते हुए भी सचिन का उस को पनाह देना कानून की नजर में जुर्म है. जांच एजेंसियों का कहना है कि कानूनन सीमा को पाकिस्तान तो वापस जाना ही होगा.

देह की राह के राही

सीमा हैदर : प्रेम दीवानी या पाकिस्तानी जासूस – भाग 2

बच्चों को अच्छी तालीम मिले, उस का अपना घर हो, इन्हीं सपनों को पूरा करने के लिए गुलाम हैदर कोविड बीमारी से पहले 3 साल के कौन्ट्रैक्ट पर 2019 में नौकरी का मौका मिलने पर सऊदी अरब चला गया. उस वक्त सब से छोटी बेटी सीमा के पेट में थी.

ये था सीमा की जिंदगी का वो पहलू जब वो पाकिस्तान में थी. शौहर के सऊदी अरब जाने के बाद वह बच्चों के साथ के बावजूद एकदम तन्हा हो गई. हालांकि गुलाम के सऊदी जाने के बाद सीमा और उस के बच्चों की गुजरबसर पहले से कहीं ज्यादा अच्छे ढंग से होने लगी. क्योंकि शुरू में गुलाम सीमा को वहां से 40-50 हजार रुपए भेजता था, जो कुछ महीने बाद उस ने 70-80 हजार कर दिए.

इतना ही नहीं, उस ने बैंक से लोन ले कर व कुछ उधार ले कर सीमा को 17 लाख रुपए भी भिजवाए. क्योंकि सीमा की चाहत थी कि वो अपना मकान खरीदे. इधर पाकिस्तान में सीमा की जिदंगी मजे में जरूर गुजर रही थी, लेकिन अब उस में न कोई प्रेम रस रहा न कोई ऐसा साथी जिस के साथ वक्त बिताया जा सके. ऐसे में 2 चीजें सीमा की जिंदगी का सहारा बनीं. एक सोशल मीडिया पर रील बनाना तो दूसरा मोबाइल पर पब्जी का खेल.

दोनों ही शौक कुछ समय बाद सीमा की दीवानगी बन गए. सीमा डांस करने के साथ बेहद रोमांटिक वीडियो बना कर अपने इंस्टाग्राम व फेसबुक पर डालने लगी. इस सब से उस का वक्त मजे से गुजरने लगा. इस दौरान सीमा का कनेक्शन सचिन मीणा से हो गया.

पबजी के द्वारा परवान चढ़ा प्यार

दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा के कस्बा रबूपुरा में रहने वाला सचिन मीणा (25 साल) रबूपुरा के अपने पैतृक गांव में पिता नेत्रपाल, मां व भाईबहन के साथ रहता है. पिता के साथ वह उन की किराने की दुकान में उन का हाथ बंटाता है. सचिन को औनलाइन गेम खेलने का शौक है. इस की लत उसे तब लगी, जब सिंतबर 2020 में पबजी पर प्रतिबंध लगने से पहले युवा उम्र के लोगों में यह खेल एक लत बन गया था.

इसी पबजी के खेल के दौरान अकसर उस की पबजी चैट 2020 में पाकिस्तान से पबजी खेलने वाली सीमा से होने लगी. कुछ बार पबजी चैट के बाद सचिन व सीमा का एकदूसरे से वाट्सऐप मोबाइल नंबर का आदानप्रदान हुआ और जल्द ही दोनों की वाट्सऐप चैट होने लगी.

शुरुआत औपचारिक बातचीत और पारिवारिक जानकारियों के आदानप्रदान से हुई, लेकिन जल्द ही जब दोनों एकदूसरे से वीडियां चैट करने लगे और एकदूसरे को देखा तो जल्द ही एकदूसरे के प्रति आकृष्ट भी हो गए. सोशल मीडिया की ये चैट और वीडियो कालिंग कब दोनों में प्यार का अहसास जगा गई, पता ही नहीं चला.

हालांकि 2020 के सितंबर में पबजी तो भारत में बंद हो गया, लेकिन इस के कारण सचिन व सीमा के बीच जो दोस्ती बनी थी, उसे वाट्सऐप ने प्यार के मुकाम तक पहुंचा दिया. अब कोई ऐसा दिन नहीं जाता, जब दोनों एकदूसरे से वीडियो चैट पर बात न करते थे.

सीमा और सचिन की पबजी खेलने के दौरान बातचीत कोरोना काल में हुई थी. दोस्ती अब प्यार में तब्दील हो चुकी थी. उन का प्रेम प्रसंग बढ़ता जा रहा था. इंतजार था तो सिर्फ एकदूजे से मिलने का. साल 2023 आतेआते दोनों ने तय किया कि अब वह ज्यादा दिन तक अलग नहीं रह सकते हैं.

सीमा हैदर ने इस दौरान बारबार भारत का वीजा अप्लाई किया, क्योंकि वह सचिन से मिलना चाहती थी. हर बार यह वीजा की अपील खारिज होती गई, ऐसे में सीमा ने दूसरा तरीका अपनाया. वह अब सऊदी अरब के जरिए भारत आने की कोशिश करने लगी.

कुछ मुश्किलें हुईं तो उस ने दुबई के रास्ते नेपाल का रास्ता अपना लिया. सीमा और सचिन 10 मार्च, 2023 को नेपाल में मिले. दोनों करीब 7 दिनों तक फरजी नाम व पता लिखा कर न्यू विनायक होटल में साथ रहे. यहीं पर उन दोनों ने काठमांडू के पशुपतिनाथ मंदिर में शादी कर ली और हमेशा साथ रहने की कसमें खाईं.

दुबई से नेपाल फिर भारत पहुंची सीमा

लेकिन कहानी सिर्फ यहीं खत्म होने वाली नहीं थी, क्योंकि असली चिंता सीमा और उस के चारों बच्चों को सुरक्षित भारत लाने की थी. तब सचिन वहां से वापस भारत आ गया और सीमा अपने बच्चों के साथ कुछ वक्त वहीं रुकी. जब मालूम पड़ा कि नेपाल से अगर कोई भारतीय बौर्डर के जरिए आता है तो किसी वीजा की जरूरत नहीं होती है.

सचिन और सीमा की इस बारे में पहले ही बात हो गई थी कि वे दोनों नेपाल में शादी करेंगे और उस के बाद सीमा वापस पाकिस्तान जा कर अपने बच्चों के साथ भारत आएगी. इसीलिए सचिन ने पहले से ही अपनी पत्नी के रूप में सीमा का व पिता के तौर पर उस के 3 बच्चों का आधार कार्ड तैयार करा लिया था. सचिन से शादी करने के बाद सीमा पाकिस्तान चली गई और सचिन रबूपुरा अपने घर आ गया.

नेपाल टूर के दौरान ही सचिन और सीमा ने साथ रहने का मन बना लिया था. यही वजह थी कि नेपाल से वापस कराची लौटने के बाद सीमा ने सब से पहले कराची में एक ट्रैवल एजेंट से संपर्क किया. सीमा ने ट्रैवल एजेंसी से पूछा कि वह किस तरह से अपने 4 बच्चों के साथ हिंदुस्तान जा सकती है. तब उसे पता चला कि नेपाल के रास्ते वह हिंदुस्तान बड़ी आसानी से दाखिल हो सकती है.

इस के बाद शुरू हुई एक नाटकीय प्रेम कथा की शुरुआत. सीमा ने सब से पहले पाकिस्तान में अपना घर बेच कर पैसा एकत्र किया, जिसे उस ने कुछ साल पहले खरीदा था. उस ने अपने तीनों बच्चों के पासपोर्ट तैयार कराए. उस के बाद वहां से वीजा ले कर सीमा 13 मई, 2023 को अपने 4 बच्चों को ले कर पाकिस्तान से पहले दुबई पहुंची. इस के बाद वहां से टूरिस्ट बन कर नेपाल आ गई.

इस के बाद सीमा वहां से बौर्डर पार कर के भारत आ गई. फिर गुपचुप तरीके से दिल्ली पहुंच कर पहले सचिन ने उसे आईएसबीटी बस अड्डे से रिसीव किया. बाद में एक जंगल में पहले अपने पिता नेत्रपाल से सीमा व उस के बच्चों की मुलाकात कराई. पिता को सचिन की प्रेम कहानी पहले से पता थी. उसी रात सचिन सीमा को अपने घर ले आया.

सीमा हैदर : प्रेम दीवानी या पाकिस्तानी जासूस – भाग 1

ग्रेटर नोएडा में उत्तर प्रदेश की एंटी टेररिस्ट स्क्वाड यानी एटीएस के अधिकारी पिछले 2 दिनों से सीमा से लगातार एक ही जैसे सवाल घुमाफिरा कर पूछ रहे थे. शुरू में 1-2 बार सीमा ने अफसरों के सभी सवालों के जवाब बेबाकी से दिए थे. लेकिन इस के बाद उस के रोनेबिलखने का जो सिलसिला शुरू हुआ तो फिर उस ने एटीएस के अफसरों को भी विचलित कर दिया.

हर सवाल के जवाब में सीमा का अब एक ही जवाब था, ‘सर, मैं कोई जासूस नहीं हूं, खुदा के लिए आप मेरा यकीन क्यों नहीं करते. मैं ने एक इंसान से प्यार किया है, क्या प्यार करना कोई गुनाह है? क्या 2 मुल्कों की सरहद किसी इंसान से प्यार करने का हक छीन सकती है?  सर, आप चाहे तो मुझे यहीं फांसी पर लटका दीजिए, लेकिन अब मैं पाकिस्तान वापस नहीं जाऊंगी. आप लोग भी जानते हैं कि अगर मैं वापस गई तो वे लोग मुझे और मेरे बच्चों का जिंदा नहीं छोड़ेंगे.’

खुद एटीएस के एडीजी नवीन अरोड़ा सीमा हैदर से 2 बार पूछताछ कर चुके थे. सीमा के बयान जरूर विरोधाभासी थे, लेकिन अभी तक उन के पास ऐसा कोई पुख्ता सबूत नहीं था जिस के आधार पर वे कह सकें कि सीमा हैदर पाकिस्तानी जासूस है.

‘देखो सीमा ये 2 मुल्कों के बीच कानूनी दांवपेंच का मामला है. तुम बिना वीजा लिए हिंदुस्तान में अपने बच्चों के साथ आई हो, इसलिए तुम को ये मुल्क छोड़ कर जाना ही होगा.’ जब एटीएस के सब से बड़े अफसर ने सीमा से ये कहा तो वह एक बार फिर फूटफूट कर रोने लगी.

दरअसल, एटीएस के अधिकारियों के कान सीमा हैदर की प्रेम कहानी को सुनसुन कर बुरी तरह पक चुके थे. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि सीमा हैदर मीरा जैसी कोई पागल प्रेम दीवानी है या वो पाकिस्तान से आया एक खूबसूरत छलावा है, जिसे भारत में तबाही मचाने के लिए भेजा गया है. ये शक जरूर था, लेकिन इस के पीछे कोई पुख्ता सबूत अभी तक किसी के पास नहीं था.

सीमा हैदर अपने जिस प्रेमी सचिन मीना के लिए अपना घरबार अपना मुल्क पाकिस्तान और शौहर को छोड़ कर 4 बच्चों के साथ भारत आ गई है वो एक ऐसी प्रेम कहानी है, जिस में एक तरफ जहां सरहदों के बंधन का कानून है तो दूसरी तरफ सीमा पर जासूस होने के इल्जाम भी.

इस अनोखी प्रेम कहानी का अंत क्या होगा, ये तो आने वाले वक्त में पता चलेगा, लेकिन अभी तक पुलिस की जांच मीडिया से सीमा हैदर की बातचीत के आधार पर जो जानकारियां सामने आई हैं, वे इस प्रेम कहानी को रोचक को और रहस्यमई बनाती हैं.

सीमा ने गुलाम हैदर से भी की थी लव मैरिज

सीमा हैदर 25 साल की एक ऐसी खूबसूरत महिला है, जो पिछले कुछ दिनों से पूरे देश में चर्चा में हैं. हालांकि दस्तावेज के हिसाब से उस की उम्र मात्र 21 साल है. दरअसल, सीमा ने ही बताया कि पाकिस्तान में मातापिता अपने बच्चों की उम्र सर्टिफिकेट में 3 साल कम लिखवाते हैं.

सीमा हैदर मूलरूप से पाकिस्तान के सिंध प्रांत के जैस्माबाद कस्बे में ग्राम रिंद , तालुका कोट दीजी, जिला खैरपुर के रहने वाले गुलाम रजा की बेटी है. गरीब गुलाम रजा की कई संतानें थीं. बेटी को जवानी की दहलीज पर कदम रखता देख अम्मीअब्बू को उस के निकाह की चिंता सताने लगी.

वे चाहते थे बिना दानदहेज कहीं भी उस की शादी कर दें, लेकिन सीमा के खयाल कुछ अलग थे. वह अम्मीअब्बू की इच्छा को पूरा करने के लिए यूं ही किसी से निकाह नहीं कर सकती थी. इसलिए 2014 में उस ने अपनी अम्मी व अब्बू का घर छोड़ दिया और जिला जकोबाबाद, तालुका गढ़ी खैरो के अमीर जान जखरानी के घर चली आई.

दरअसल, अमीर जान के बेटे गुलाम हैदर से कुछ समय पहले ही सीमा की सोशल मीडिया के जरिए दोस्ती हुई थी. बाद में उन का प्यार परवान चढऩे लगा और अम्मीअब्बू का घर छोड़ने से 10 दिन पहले सीमा ने गुलाम हैदर से कहा कि वे अपना घर छोड़ कर उस के पास आ कर निकाह करना चाहती है.

सीमा व गुलाम दोनों ही बलूच थे, लेकिन सीमा जहां रिंद कबीले से थी तो गुलाम जखरानी कबीले से. गुलाम हैदर तो पहले ही सीमा की खूबसूरती व मोहब्बत का गुलाम बन चुका था. लिहाजा वह इंकार नहीं कर सका. सीमा जब गुलाम हैदर के घर पहुंची तो पता चला कि वह तो पहले से शादीशुदा है. हालांकि उस की कोई संतान नहीं थी.

शादी को भी महज 3 साल ही हुए थे. वैसे तो पाकिस्तान में बहुविवाह प्रथा है, लेकिन इस के बावजूद गुलाम के मांबाप जो पुराने खयालात के थे, वे प्रेम विवाह के सख्त खिलाफ थे. इसलिए सीमा से निकाह करने की लाख मिन्नतों के बावजूद उन्होंने दोनों को निकाह की इजाजत नहीं दी.

सीमा गुलाम से कहने लगी, ‘पहले कोर्ट मैरिज कर लो, फिर घर वालों को मना लेंगे.’

गुलाम सीमा के प्यार में पागल था, लिहाजा गुलाम ने सीमा के साथ घर छोड़ दिया और किराए का घर ले कर उस ने सीमा से निकाह कर लिया. बाद में उस ने अपनी शादी को कोर्ट में रजिस्टर्ड भी करवा लिया.

उन दिनों गुलाम हैदर टाइल्स लगाने की कारीगरी का काम करता था. धीरेधीरे गुजरबसर होने लगी. 2-3 महीने गुजरने के बाद गुलाम हैदर सीमा के कहने पर सिंध छोड़ कर कराची आ गया. शुरुआत में उसे वहां गुजरबसर के लिए रिक्शा चलाना पड़ा. इसी तरह जिंदगी की मुश्किलों के बीच गुलाम हैदर और सीमा की जिंदगी तेजी से आगे बढऩे लगी.

2014 में गुलाम हैदर से हुई सीमा की शादी के बाद उन के 4 बच्चे हुए, जिन में 3 बेटियां और एक बेटा है, जिन की उम्र क्रमश: 7 साल, 6 साल, 5 साल और 3 साल है.

हैदर पत्नी को तन्हा छोड़ कर चला गया सऊदी अरब

गुलाम हैदर कराची में कोई ऐसा कामधंधा नहीं ढूंढ पाया, जिस से परिवार की गुजरबसर ठीक से हो सके. जैसेजैसे परिवार बढ़ा तो गुलाम के सिर पर जिम्मेदारियों का बोझ व बच्चों की परिवरिश के लिए ज्यादा पैसा कमाने की चिंता भी बढी. अब सीमा भी उस पर ज्यादा पैसा कमाने व बच्चों को भविष्य संवारने का दबाव बनाने लगी थी.

काली कमाई का कुबेर : यादव सिंह