Crime News: बर्बरता और दरिंदगी का दूसरा नाम है आईएस आईएस

Crime News: युद्ध हो या गृहयुद्ध, आतंकवादी घटनाएं हों या मारकाट, इन में सब से ज्यादा क्षति होती है तो महिलाओं की, क्योंकि इस स्थिति में उन का सहारा तो छिनता ही है, धन और इज्जत भी लुट जाती है…

‘‘है लो, मैं वाइट हाउस वाशिंगटन से बोल रहा हूं.’’ ‘‘यस प्लीज.’’ फोन वाइट हाउस से है, यह जान कर रिसीव करने वाला थोड़ी खुशी, थोड़ी दहशत और थोड़ी बेचैनी में अटपटा सा गया.

‘‘आप कायला मुलर के फादर बोल रहे हैं न?’’ फोन करने वाले ने दर्दभरी बेचारगी के साथ पूछा.

‘‘जी हां.’’

‘‘सौरी सर, वाइट हाउस आप के दुख में बराबर का हिस्सेदार है. कायला मुलर अब इस दुनिया में नहीं रहीं. बर्बर आईएस ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया है. पूरा अमेरिका इस दुख में डूबा हुआ है. राष्ट्रपति ने पार्लियामेंट में संकल्प लिया है कि जिन लोगों ने कायला को कायरों की तरह मारा है, यह देश उन दरिंदों से अपनी प्यारी बेटी का बदला जरूर लेगा.’’

इतना कह कर फोन करने वाले वाइट हाउस के उस अधिकारी ने फोन काट दिया था, क्योंकि उसे सूझ ही नहीं रहा था कि वह आगे क्या कहे? शायद वह यह भी जानता था कि वह जो कुछ भी कहेगा, वह पीडि़त परिवार के दुख को और बढ़ाएगा. दरअसल, बीते कुछ दिनों से कायला मुलर के घर वाले काफी परेशान थे. इधर कुछ दिनों से पूरी दुनिया में अपनी बर्बरता से खौफ पैदा करने वाले आईएसआईएस का कहना था कि जौर्डन की सेना ने उस के लड़ाकों को मारने के लिए उस पर जो हवाई हमले किए थे, उसी से कायला की भी मौत हो गई थी, जो पिछले काफी दिनों से उस के कब्जे में थीं और प्राप्त जानकारी के अनुसार, ये आतंकी उसे लोहे के पिंजरे में बंद कर के रखते थे और बारीबारी से ‘सैक्स स्लेव’ की तरह इस्तेमाल करते थे.

अमेरिकी प्रशासन ने कायला के मारे जाने के आईएसआईएस के दावे पर यकीन नहीं किया था, इसलिए 26 वर्षीया युवती कायला के परिवार वालों को तमाम आशंकाओं के बीच भी उस के जीवित होने की थोड़ी उम्मीद थी. लेकिन 9 फरवरी, 2015 को वाइट हाउस के उस फोन ने कायला के घर वालों की तमाम उम्मीदों पर एक झटके में पानी फेर दिया था. 9 फरवरी को जब कायला की हत्या की सूचना दी गई तो मुलर परिवार बिलख पड़ा था. लगभग 6 महीनों में बर्बर खौफ का पर्याय बने इस संगठन द्वारा यह 27वीं ऐसी बर्बर हत्या थी, जिस में ऐसे लोगों को मौत के घाट उतारा गया था, जो न तो इस दरिंदे संगठन से लड़ रहे थे और न ही उसे चुनौती दे रहे थे. ये सभी तो बस मानवीय गरिमा का फर्ज अदा कर रहे थे.

लेकिन इस दरिंदे संगठन ने ऐसे सौफ्ट टारगेटों को खौफनाक ढंग से मौत के घाट उतार कर सनसनीखेज सुर्खियां तो हासिल की ही हैं, साथ ही दुनिया भर में अपने खौफ का भी विस्तार किया है. अब तक इस इस्लामिक संगठन ने 21 पत्रकारों और 6 सताए लोगों की मदद कर रहे मानवीय कार्यकर्ताओं की हत्या की है. कायला मुलर भी इंसानियत के नाते सताए लोगों की मदद करने के लिए मध्यपूर्व गई थीं, लेकिन वह आईएस के चंगुल में फंस गईं. कायला को श्रद्धांजलि देते हुए अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा, ‘‘वह अमेरिका के सब से अच्छे गुणों का प्रतिनिधित्व करती थीं. उन्हीं के चलते हम सब अमेरिकियों का सिर आज गर्व से ऊंचा है.’’

अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने आईएस को कायला का हत्यारा कहा है और जौर्डन ने भी आईएस के दावे को खारिज करते हुए कहा है कि कायला की मौत के लिए कायर बगदादी के दहशतगर्द जिम्मेदार हैं. गौरतलब है कि आईएस ने अगस्त, 2013 में कायला को सीरिया से अगवा किया गया था.  यह वह समय था, जब यह बर्बर संगठन क्रूरता और बर्बरता में अलकायदा को पीछे छोड़ कर दुनिया के दिलोदिमाग में अपनी दहशत भर चुका था. अमेरिका ने बीते साल गर्मियों में कायला और अन्य अमेरिकी बंधकों को रिहा करवाने के लिए सैन्य औपरेशन भी चलाया था, लेकिन वह नाकाम रहा. 2 दिन पहले ही आईएस के लड़ाके उस ठिकाने को छोड़ कर जा चुके थे.

कायला मुलर आईएस की कैद में मारी गई चौथी अमेरिकी नागरिक थीं. उन से पहले आईएस 3 अमेरिकी पत्रकारों की भी हत्या कर चुका था. कायला के रिश्तेदार और दोस्त ही नहीं, दुनिया भर के अपरिचित लोग भी स्तब्ध हैं कि कैसे एक खूनी संगठन दुनिया से इंसानियत को खत्म करने पर तुला है. कायला मुलर एक भावुक युवती थीं, जो युद्ध की मार झेल रहे सीरिया में आम लोगों की परेशानी से विचलित थीं. अमेरिका में किशोरावस्था से ही मानवीय कार्यों में जुट जाने वाली कायला सीरियाई शरणार्थियों की मदद करना चाहती थीं. अगवा होने से पहले अपने ब्लौग में उन्होंने लिखा था, ‘हर इंसान को हरकत में आना चाहिए. उन्हें इस हिंसा को रोकना चाहिए.’

लेकिन दुनिया का सब से खूंखार संगठन बन चुका आईएसआईएस भला मानवता की इस बात को कैसे समझ सकता था, जो लाशों को गिन कर खुश होता है, जो पत्रकारों का जानवरों की तरह बेरहमी से गला रेतता है.  यह संगठन वास्तव में जून, 2014 में बना एक अमान्य राज्य तथा इराक एवं सीरिया में सक्रिय जेहादी सुन्नी सैन्य समूह है. अरबी भाषा में इस संगठन का नाम है ‘अल दौलतुल इस्लामिया फिल इराक वल शाम’, जिस का हिंदी में मतलब है ‘इराक एवं शाम का इस्लामी राज्य’. शाम सीरिया का प्राचीन नाम है. आईएसआईएस अर्थात ‘इस्लामिक स्टेट औफ इराक ऐंड सीरिया’ के अलावा भी इस बर्बर संगठन के पहले कई अन्य नाम रहे हैं, जैसे आईएसआईएल, दाइश आदि.

आईएसआईएस नाम से इस संगठन का गठन अप्रैल, 2013 में हुआ. इब्राहीम अव्वल अल बदरी उर्फ अबू बकर अल बगदादी इस का मुखिया है. शुरू में यह अलकायदा का ही एक विस्तृत अंग था, जिस की वजह से अलकायदा ने भी इस का हर तरह से समर्थन किया, लेकिन बाद में अलकायदा इस संगठन से अलग हो गया. पर अब यह अलकायदा से भी अधिक मजबूत और क्रूर संगठन के रूप में जाना जाता है. विशेषकर औरतों के मामले में इस संगठन की दरिंदगी ने तो सारे रिकौर्ड तोड़ दिए हैं.

अब तक किसी भी इस्लामिक संगठन ने और न ही दुनिया के किसी भी कोने में सक्रिय किसी गैरइस्लामी संगठन ने कभी खुल्लमखुल्ला लोगों से यह नहीं कहा कि उसे सैक्स के लिए महिलाएं उपलब्ध कराई जाएं. लेकिन इस संगठन ने तो न केवल यह फरमान जारी किया है, बल्कि इराक के जिन शहरों में इस ने कब्जा किया, उन शहरों की सैकड़ों गैरसुन्नी महिलाओं को सैक्स गुलाम की तरह इस्तेमाल किया है. यह संगठन इतना क्रूर है कि इस की गतिविधियों के सामने क्रूरता की अब तक की सारी परिभाषाएं बहुत संवेदनशील और मानवीय लगने लगी हैं. यह महज महिलाओं के मामले में ही बर्बर नहीं है, लूटखसोट के मामले में भी इस का कोई सानी नहीं है. शायद इसीलिए यह दुनिया का सब से अमीर आतंकी संगठन है. इस का अपनी गतिविधियों के संचालन का बजट 2 अरब डौलर सालाना है.

पिछले साल 29 जून, 2014 को इस ने अपने मुखिया को विश्व के सभी मुसलमानों का खलीफा घोषित किया था और धमकी भी दी थी कि जिस ने उस के फरमान को न मानने की जुर्रत की, उसे दुनिया से दफा कर दिया जाएगा. विश्व के अधिकांश मुसलिम आबादी वाले क्षेत्रों को सीधे अपने राजनीतिक नियंत्रण में लेना इस का घोषित लक्ष्य है. इस के लिए इस ने सब से पहले लेवेंत या लेवांट क्षेत्र को अपने अधिकार में लेने का अभियान चलाया था. पुराने समय में लेवांट उस इलाके को कहा जाता था, जिस में आज सीरिया, लेबनान और फिलिस्तीन आते हैं. लेवांट एक ऐसे इलाके के रूप में जाना जाता है, जहां दुनिया के लिखित इतिहास में सब से अधिक खूनी संघर्ष हुए हैं. जिस के अंतर्गत जौर्डन, इजरायल, कुवैत, फिलिस्तीन, लेबनान, साइप्रस तथा दक्षिणी तुर्की का कुछ भाग आता है.

आईएसआईएस के लड़ाकों की संख्या करीब 1 लाख है. शुरू में ये बमुश्किल 10 हजार थे. लेकिन मिली जबरदस्त कामयाबियों  के बाद दुनिया भर से कट्टरपंथी मुस्लिम युवा इस में भरती होने के लिए आकर्षित हुए हैं. इराक के मोसुल शहर पर कब्जा करने के बाद इस की ताकत एकदम से बढ़ गई है. इस संगठन के लड़ाकों ने हेलीकौप्टर और टैंकों के साथ वे तमाम आधुनिक हथियार भी हासिल कर लिए हैं, जो अमेरिका ने कभी इराकी सेना को दिए थे. दरअसल इराकी सैनिक बिना लड़े ही मोसुल से भाग खड़े हुए थे, जिस की वजह से इस दुर्दांत संगठन के आत्मविश्वास में ही नहीं, ताकत में भी जबरदस्त इजाफा हुआ, वह भी बिना कुछ गंवाए. क्योंकि जो इराकी सैनिक इन से डर कर भाग खड़े हुए थे, वे लगभग 30 हजार के करीब थे और आईएसआईएस के सुन्नी लड़ाके महज 800.

इसी से उत्साहित हो कर इन लड़ाकों ने मोसुल की बैंकों से करीब 42 करोड़ डौलर की नकदी लूट ली थी. हालांकि अलकायदा ने खुद को अब आईएसआईएस से अलग कर लिया है, लेकिन शियाओं पर हमले करना दोनों संगठनों की रणनीति रही है, इसलिए आम सुन्नी मुसलमानों में भी इस संगठन के प्रति काफी सहानुभूति है.  एक जमाने में किसी और नाम से आईएसआईएस अलकायदा का सहयोगी संगठन था, जो पूरे मध्यपूर्व में और हर उस देश के खिलाफ जेहाद करते थे, जो उन के मुताबिक काफिर हैं. आईएसआईएस के मुखिया अबू बकर अल बगदादी को आज का तैमूर लंग कहा जाए तो लगेगा कि तैमूर भला आदमी था. कहा जाता है कि तैमूर इतिहास के सब से जालिम आक्रमणकारियों में से एक था.

1338 में जब उस ने दिल्ली पर आक्रमण किया था, तब एक लाख लोगों को मरवा दिया था. अब वही सब अबू बकर कर रहा है.  जब उस के लड़ाकों ने इराक के शहर तिकरित पर कब्जा किया था तो वहां जबरदस्त मारकाट मचाई थी. लगभग 50 लाख लोग शहर छोड़ कर भाग गए थे. पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने मध्यपूर्व में आईएसआईएस की तेजी से फैली इस जहरीली ताकत से निपटने के लिए नाटो देशों से बात की थी और स्वयं अपने बलबूते पर इराक में 300 सैनिक भेजे थे, जिन का मकसद अमेरिकी दूतावास और अन्य संपत्तियों की सुरक्षा करना था. इस के बाद दूसरे दौर में अमेरिकी मदद के तहत 16 सौ सैनिक भेजे गए थे.

आईएसआईएस की ताकत का अंदाजा शायद शुरू में अमेरिका और गठबंधन देशों को नहीं हुआ, लेकिन अब कायला की हत्या के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति का यह कहना कि एक जिम्मेदार देश के मुखिया के नाते हम धरती पर कहीं भी इस तरह की अराजकता और मानवता को बंधक बनते नहीं देख सकते. दरअसल, सीरिया से होता हुआ आईएसआईएस का काफिला इराक में जब से दाखिल हुआ है और जिधर भी गया है, अपने पीछे खौफ, कहर और बर्बरता के निशान ही छोड़ता गया है. इसलिए आज पूरी दुनिया इस दरिंदे संगठन के विरुद्ध एक हो रही है, जिस ने समूची मानवता को बंधक बना लिया है.

आईएसआईएस एक ऐसा संगठन है, जो बेकुसूर पत्रकारों की कैमरे के सामने इस तरह बर्बरता से गरदन हलाल करता है, जैसे बकरे की कुरबानी दी जा रही हो, जो विज्ञान, इतिहास, सामाजिक विषयों और अर्थशास्त्र की हजारों किताबें यह कह कर जला देता है कि इसी ने युवाओं को इस्लाम से विमुख किया है, जो लड़कियों की 7 से 9 साल की उम्र में भी शादी को मंजूरी देता है और 16 साल तक हर हाल में शादी करने की हिदायत देता है, जो खुलेआम अपने लड़ाकों को सैक्स के लिए महिलाओं की मांग करता है और साफ चेतावनी देता है कि अगर उस की बात अनसुनी की गई तो खैर नहीं.

आखिर ऐसे अमानवीय और बर्बर संगठन के प्रति लड़कियां इस कदर सौफ्ट कार्नर क्यों रखती हैं, उस में शामिल क्यों होना चाहती हैं, इस के लिए उन में दीवानगी क्यों है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो इन दिनों पश्चिमी देशों के समाजशास्त्रियों को परेशान कर रहे हैं. क्योंकि दि इंस्टीट्यूट फौर स्ट्रैटजिक डायलौग के एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, सीरिया या इराक जाने वाले करीब 3 हजार यूरोपीय युवाओं में 500 से ज्यादा युवतियां शामिल हैं. इन में कुछ किशोर उम्र की हैं तो कुछ (भले अपवाद के ही तौर पर हो) 50 पार की प्रौढ़ महिलाएं हैं.

‘बिकमिंग मुलान’ नामक इस रिपोर्ट के मुताबिक वास्तव में ये तमाम महिलाएं, फिर चाहे वे जिस उम्र समूह से रिश्ता रखती हों, इस बात से प्रभावित हैं कि मुसलमानों के लिए एक नए इलाके का निर्माण हो रहा है. एक नई दुनिया बन रही है, जहां किसी और के लिए कोई जगह नहीं होगी, यहां तक कि मुसलमानों में गैरसुन्नियों के लिए भी नहीं. इसीलिए तमाम सुखसुविधाओं में पलीबढ़ी पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका और इंग्लैंड की लड़कियां रोमांचित हैं. जाहिर है, वे उस सपने का हिस्सा होना चाहती हैं, यहां तक कि युद्ध के मोर्चे पर डट कर भी.

सवाल है कि ये महिलाएं क्या दिमागी रूप से बीमार हैं? समाजशास्त्रियों की मानें तो कुछकुछ ऐसा ही है. इन में से कई महिलाओं का व्यक्तित्व कई हिस्सों में बंटा सा लगता है. ऐसी कुछ महिलाएं, जिन के बारे में माना जाता है कि वे इस वक्त सीरिया या इराक में हैं और उन के ट्विटर या फेसबुक एकाउंट को देखने पर यह बात साफ प्रतीत होती है. क्योंकि ये महिलाएं जहां एक पल को किसी फिल्म से संबंधित कोई बात कहती हैं या अपने पालतू कुत्ते के बच्चे के साथ अपनी वाल पर तसवीर लगाती हैं, वहीं दूसरे ही पल वे किसी सार्वजनिक जगह पर आईएस के लड़ाकों की किसी का सिर काटते या नृशंसता से पेश आने वाली तसवीरों को पोस्ट कर रही होती हैं.

सवाल है कि आखिर ये महिलाएं ऐसा क्यों कर रही हैं? इस बहुचर्चित हो रही बिकमिंग मुलान रिपोर्ट के मुताबिक वास्तव में ये महिलाएं भी वही चाहती हैं, जो इन दिनों आईएसआईएस की तरफ आकर्षित दुनिया भर के खासतौर पर पश्चिम के युवा मुस्लिम चाहते हैं या कहें जिन बातों से मुसलिम युवक प्रेरित हैं, उन्हीं से ये महिलाएं भी प्रेरित हैं. मुसलिम युवाओं की तरह ही ये मुसलिम महिलाएं भी आईएसआईएस की खलीफा के शासन की स्थापना, पश्चिम से नफरत, पहचान की तलाश जैसे वैचारिक कारणों से प्रेरित हैं. आईएस के आतंकियों के कब्जे वाले इलाके में, ऐसे ही अफगानिस्तान या बाल्कन में सक्रिय कट्टरपंथियों से इसलिए भूमिका बिलकुल अलग है, क्योंकि आईएस के आतंकी यहां एक राष्ट्र का निर्माण करना चाह रहे हैं. इसलिए यहां स्थानीयता के साथ कोई टकराव नहीं है.

इसीलिए यह गतिविधि आतंक के मनोविज्ञान से ऊपर उठ कर एक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा हो जाती है. इसीलिए इस में भाग लेते हुए महिलाएं भी इतिहास रचने वालों में शामिल होना चाहती हैं. फिर चाहे भले ही लड़ाकों के लिए सैक्स परोस कर या उन के लिए घर की देखरेख कर के ही क्यों न यह संभव हो. सच तो यह है कि ज्यादातर महिलाएं अपनी भूमिका घर की देखरेख करने वाले के तौर पर ही देख रही हैं. इसीलिए ये महिलाएं जेहादियों को अपने पति के रूप में चुन रही हैं. कुछ महिलाओं के सोशल मीडिया एकाउंट के अनुसार, जेहादी लड़ाके से शादी करने पर उन्हें घर इत्यादि की सुविधाएं मिलती हैं. यानी इस उन्माद में आर्थिक असुरक्षा भी एक कारण है.

इन महिलाओं की मंशा को उजागर करने वाली कई वेबसाइटों के मुताबिक, सीरिया में होने का दावा करने वाले कुछ लोग ‘खलीफा के राज्य’ में शादी की संभावना से जुड़े सवालों का जवाब देते हैं. हालांकि इन में से कई शादियां ज्यादा समय तक नहीं चलतीं, क्योंकि उन के पति लड़ाई में मारे जाते हैं. ऐसे में ये महिलाएं ट्विटर पर अपने पतियों के ‘शहीद’ हो जाने की घोषणा करती हैं. आईएस से तेजी से जुड़ रही ये महिलाएं एक मामले में पुरुषों से काफी हद तक अलग हैं कि इन में से ज्यादातर ने इस्लाम में धर्मांतरण किया है यानी ये जन्म से मुसलिम नहीं थीं. इसलिए ये इस्लाम से बहुत गहरे तक वाकिफ भी नहीं हैं.

शायद यही इस सवाल का जवाब भी है कि कम उम्र की लड़कियां ऐसा माहौल क्यों स्वीकार करना चाहती हैं. असली सवाल इन के इस्लाम की तरफ झुकाव का है. आईएस की तरफ तीव्रता से आकर्षित ज्यादातर लड़कियों की उम्र 16 से 25 साल के बीच है. इस्लाम ग्रहण करने वाली इन ज्यादातर लड़कियों को इस्लाम धर्म के बारे में बिलकुल भी पता नहीं होता. वास्तव में इन्होंने इंटरनेट पर इस के बारे में सर्च किया होता है, जैसा आम लोग करते हैं. उन्होंने यूट्यूब पर ऐसे वीडियो देखे होते हैं, जिन में अतिशयोक्तिपूर्ण दावे किए गए होते हैं.

धर्म के बारे में जानने के लिए उन के पास यही एक आधुनिक और आसान रास्ता होता है. ऐसी लड़कियां न कभी मसजिद गई होती हैं, न किसी लाइब्रेरी. वे पूरी तरह यूट्यूब, गूगल, सोशल मीडिया पर निर्भर होती हैं. इसीलिए ये इस्लाम की संवेदनशीलता से परिचित नहीं होतीं. ऐसे में ये अपना भी नुकसान करती हैं और इस्लाम को भी बदनाम करती हैं. खैर, जो आकर्षित हैं, उन की बात छोड़ दी जाए तो चाहे युद्ध हो या आतंकवादियों द्वारा किए गए जगहजगह विस्फोट, ऐसे मामलों में सब से ज्यादा नुकसान महिलाओं का ही होता है. उन के पति और बच्चे तो मारे ही जाते हैं, उन्हीं की अस्मत भी लुटती है. वे बेसहारा जीवन जीने के लिए मजबूर होने के साथ ऐसा कलंक भी ले लेती हैं, जो उन्हें न मरने देता है, न जीने. ISIS Terrorism

 

Crime Story : दरिंदगी की पराकाष्ठा

Crime Story : समाज में ऐसे दरिंदों की कोई कमी नहीं है जो मौका मिलने पर छोटीछोटी बच्चियों को भी हवस का शिकार बनाने से नहीं चूकते. ऐसे ज्यादातर मामलों में दरिंदगी की शिकार हुई बच्ची को मौत के घाट उतार दिया जाता है. नीरजा के साथ भी यही हुआ था.

पिथौरागढ़ निवासी विशंभरलाल अपने परिवार के साथ जब हल्द्वानी आए थे तो बहुत खुश थे. खुशी स्वभाविक ही थी. 18 नवंबर, 2014 को उन के साले विष्णु की शादी थी. विशंभरलाल भी बड़े व्यवसाई थे और विष्णु भी. खुशीखुशी शादी संपन्न भी हो गई. 20 नवंबर की रात विष्णु ने हल्द्वानी के शीशमहल इलाके के रामलीला मैदान में अपनी शादी की रिसैप्शन पार्टी रखी थी. शानदार पार्टी थी, जिस में कई सौ लोग आए हुए थे. जब पार्टी चल रही थी, तभी साढ़े 7 बजे विशंभरलाल की बेटी नीरजा अचानक लापता हो गई. 7 वर्षीया नीरजा दूल्हे की सगी भांजी थी और विशंभरलाल के परिवार की आंख का तारा. तुरंत उस की खोजबीन शुरू हो गई.

जब वह कहीं नहीं मिली तो रिसैप्शन पार्टी के रंग में भंग पड़ गया. दोनों परिवार, रिश्तेदार और उन के परिचित पार्टी भूल कर नीरजा की खोज में लग गए. जब घंटों तक नीरजा का कोई पता न चला तो उस के लापता होने की सूचना कोतवाली पुलिस को दी गई. पुलिस ने भी अपने स्तर पर बच्ची को हर जगह खोजा, लेकिन उस का कहीं पता न चला. ऐसे में संभावना व्यक्त की गई कि किसी ने नीरजा का अपहरण कर लिया है. इसी संभावना के चलते पुलिस ने थाना कोतवाली में अज्ञात लोगों के खिलाफ अपहरण का केस दर्ज कर लिया. 21 नवंबर की सुबह से ही नीरजा की खोजबीन शुरू हो गई. बडे़ लोगों का मामला था, इसलिए पुलिस एसओजी टीम और एलआईयू की टीमें नीरजा को ढूंढने में लगी थीं.

बच्ची के पिता और मामा के परिवार और रिश्तेदार तो जीजान से उस की खोज में जुटे थे. लेकिन किसी का कोई भी प्रयास सार्थक नहीं रहा. अपहरण की संभावना इसलिए निर्मूल लग रही थी, क्योंकि फिरौती के लिए कोई फोन नहीं आया था. नीरजा के इस तरह रिसैप्शन पार्टी से गायब हो जाने से सभी आश्चर्य में थे. पुलिस यह मान कर चल रही थी कि यह दुश्मनी का मामला भी हो सकता है और फिरौती के लिए अपहरण का भी. दुश्मनी की बात से विशंभरलाल और विष्णु दोनों ही इनकार कर रहे थे. दूसरी और फिरौती के लिए तीसरे दिन भी कोई फोन नहीं आया तो पुलिस की परेशानी और भी बढ़ गई. स्थानीय मीडिया इसे पुलिस की नाकामी बता कर सुर्खियों पर सुर्खियां बना रहा था.

ऐसी स्थिति में पुलिस ने दुश्मनी और अपहरण की ओर से ध्यान हटा कर अपनी जांच का केंद्रबिंदु शहर के नशेडि़यों, जुआरियों, भिखारियों और पाखंडी बाबाओं को बनाया. क्योंकि ऐसे लोग बच्चों को उठा कर बच्चा चोर गिरोहों को बेच देते हैं और इन गिरोहों के सदस्य उन्हें दूरदराज के प्रदेशों में बेच आते हैं. लेकिन इस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. जब कई दिन बीत जाने पर भी नीरजा का कोई पता नहीं चला तो स्थानीय लोगों के सब्र का बांध टूट गया. पुलिस की लचर काररवाई से नाराज हल्द्वानी के लोग सड़कों पर उतर आए. धरनाप्रदर्शन शुरू हो गया. लोग पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करने लगे. नरीमन तिराहे पर नैनीताल-काठगोदाम मार्ग जाम कर दिया. जिस से सारे शहर की रफ्तार थम गई.

जब नैनीताल काठगोदाम मार्ग पर 2 किलोमीटर लंबा जाम लग गया तो स्थानीय प्रशासन परेशान हो उठा. इस स्थिति से निपटने के लिए उच्चाधिकारियों ने लोगों को आश्वासन दे कर नीरजा का पता लगाने के लिए एक दिन का समय मांगा. प्रशासनिक आश्वासन के बाद लोगों ने धरना खत्म कर दिया. वादा किया था तो निभाना भी जरूरी हो गया था. मंगलवार 25 नवंबर को क्षेत्राधिकारी जी.सी. टम्टा के नेतृत्व में कई टीमें बना कर पुलिस फोर्स नीरजा की तलाश में जुट गई. लेकिन इस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. घबराई हुई पुलिस अभी आगे की योजना बना रही थी कि एक घोड़ेतांगे वाले ने कोतवाली आकर पुलिस को बताया कि उस का घोड़ा छूट कर गोला नदी के जंगल की ओर भाग गया था.

वह उस के पीछे जंगल में गया तो वहां उस ने एक बच्ची की लाश पड़ी देखी. यह खबर सुन कर पुलिस के हाथपांव फूल गए. उसे विश्वास हो गया कि वह लाश नीरजा की ही होगी. पुलिस नीरजा के घर वालों और उस घोड़े वाले बुजुर्ग को साथ ले कर गोला नदी पार कर के जंगल में गई. घोड़े वाले ने जो जगह बताई थी, वहां एक बच्ची की लाश पड़ी थी. वह लाश नीरजा की ही थी. उस का मुंह खून से सना था. उस के अंडरगारमेंट के अलावा उस की टांगों पर भी खून के छींटे थे. जाहिरा तौर पर कहा जा सकता था कि बच्ची के साथ दुष्कर्म हुआ था और बाद में उस की हत्या कर दी गई थी. नीरजा के घर वाले यह देख कर गहरे सदमे में आ गए.

यह खबर मिलते ही एसएसपी सेंथल अबुदई, एएसपी श्वेता चौबे सहित तमाम बड़े पुलिस अफसर घटनास्थल पर पहुंच गए. फोरेंसिक एक्सपर्ट डा. दयाल शरण को भी बुलवा लिया गया. जिस ने भी मासूम नीरजा की लाश देखी, उसी का कलेजा मुंह को आ गया. बच्ची के साथ हुई दरिंदगी वाकई हैरान कर देने वाली थी. बहरहाल पुलिस ने घटना स्थल से साक्ष्य एकत्र करने की कवायद शुरू की तो वहां बीड़ी और टौफी के रैपर पड़े मिले, जिन्हें जाब्ते की काररवाई में शामिल कर लिया गया. फोरेंसिक विशेषज्ञ डा. दयाल शरण ने वहां से कुछ फिंगरप्रिंट भी लिए.

करीब 2 घंटे तक घटनास्थल की सूक्ष्म जांच के बाद पुलिस ने पंचनामा बना कर नीरजा की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. उधर नीरजा की हत्या की खबर मिलते ही शहर भर में आक्रोश फैल गया. उस के परिवार वालों का तो बहुत बुरा हाल था. इस बीच पुलिस ने इस केस में अपहरण के साथसाथ दुष्कर्म और हत्या की धाराएं भी जोड़ दी थीं. नीरजा की लाश का पोस्टमार्टम डाक्टरों के एक पैनल ने किया, जिस की वीडियोग्राफी भी कराई गई. डाक्टरी रिपोर्ट में जो बताया गया था, उस ने सभी के होश उड़ा दिए.

रिपोर्ट के अनुसार, नीरजा की हत्या दुष्कर्म के बाद हुई थी. उस की मौत अत्यधिक खून रिसाव के कारण हुई थी. यहां तक कि दरिंदे ने हैवानियत की सभी हदें पार करते हुए मासूम बच्ची के हाथपैर तक तोड़ दिए थे. नाखूनों से उस का चेहरा बिगाड़ने की भी कोशिश की थी. उस के अंगों पर भी गहरे घाव थे. पोस्टमार्टम के बाद बच्ची की लाश उस के परिजनों को सौंप दी गई. बेटी की मौत और उस के साथ हुई हैवानियत से आहत नीरजा के घर वालों ने कहा कि वे तब तक लाश को नहीं उठाएंगे, जब तक पुलिस कातिल को नहीं पकड़ लेती. उधर नीरजा की मौत की खबर सुन कर उस की दादी और मां की हालत बिगड़ गई थी.

उन्हें अस्पताल में भरती कराना पड़ा. एक नन्ही बच्ची के साथ हुए इस दर्दनाक हादसे से पूरा कुमांऊ शोक में डूब गया. कातिलों के प्रति मन में गुस्सा लिए हल्द्वानी के लोग फिर सड़कों पर उतर आए. ये लोग जल्दी से जल्दी कातिलों को गिरफ्तार कर के फांसी पर लटकाने की मांग कर रहे थे. 26 नवंबर को पूरा हल्द्वानी दिन भर गुस्से की आग से सुलगता रहा. शहर के सभी सरकारी दफ्तर, शिक्षण संस्थान, बैंक और टेंपोटैक्सी सर्विस पूरी तरह बंद रहे. नीरजा की हत्या से उस के घर वाले इतने आहत थे कि पोस्टमार्टम हो जाने के बावजूद वे बच्ची की लाश तक ले जाने को तैयार नहीं थे. उत्तराखंड के एडीजी राम सिंह मीणा ने नीरजा के घर वालों को लाख मनाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने कातिलों की गिरफ्तारी होने तक बच्ची की लाश उठाने से इनकार कर दिया.

मजबूरी में पुलिस को बच्ची की लाश को मोर्चरी में रखवाना पड़ा. उधर नीरजा के साथ हुए दुष्कर्म और हत्या से नाराज लोगों ने हल्द्वानी के निकटवर्ती शहर काठगोदाम को भी पूरी तरह से बंद रखा. लोगों ने अपनी दुकानें बंद कर के पूरे शहर में पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन किया. हालात इतने बिगड़ गए कि मासूम नीरजा के साथ हुए कुकृत्य और उस की हत्या का मामला विधानसभा तक भी पहुंचा. बुधवार 26 नवंबर को इस मामले को ले कर विपक्ष ने जम कर हंगामा किया. इस दौरान नियम 310 के तहत सदन में इस की चर्चा कराने की मांग पर अड़ा विपक्ष वेल में उतर कर धरने पर बैठ गया. विपक्षी नेताओं का कहना था कि इस घटना से यह बात स्पष्ट हो गई है कि प्रदेश में कानूनव्यवस्था चौपट हो चुकी है.

उन्होंने नियम-310 के तहत सदन की काररवाई स्थगित कर इस मुद्दे पर चर्चा कराने की मांग की, जिसे पीठ ने स्वीकार नहीं किया. इस से खफा भाजपा विधायक अपनी बैंच पर खड़े हो गए. विधायक मदन कौशिक, बंधीधर भगत, हरबंस कपूर, संजय गुप्ता, यतीश्वरानंद, आदेश चौहान, सुरेंद्र सिंह जीना समेत तमाम सदस्यों ने इस मामले पर तुरंत चर्चा कराने की मांग की. इस पर संसदीय एवं विधायी कार्य मंत्री इंदिरा हृदयेश ने कहा कि तुरंत चर्चा कराने की स्थिति में सरकार के पास तुरंत जवाब उपलब्ध नहीं होगा. इस मुद्दे पर सत्तापक्ष और विपक्ष के विधायकों के बीच हल्की नोकझोंक भी हुई. बाद में मुख्यमंत्री हरीश रावत ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि सरकार इस मार्मिक घटना की चर्चा के लिए तैयार है.

उन्होंने बताया कि अपराधियों को पकड़ने के लिए सरकार पूरी ताकत लगाएगी. हत्यारों को जल्द पकड़ने हेतु स्थानीय पुलिस की मदद के लिए एसटीएफ की टीम को हल्द्वानी भेजा गया है. दूसरी ओर मासूम बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म और उस की हत्या को ले कर पूरे कुंमाऊ में आक्रोश का लावा फूट पड़ा. उत्तराखंड के सभी शहरों में विरोध प्रदर्शन और जाम की स्थिति बनी रही. जिले के कई संगठनों ने बच्ची की आत्मा की शांति के लिए कैंडिल मार्च निकाला. सभी स्कूल संस्थान बंद रहे, स्कूली बच्चों ने भी कैंडिल मार्च निकाल कर नीरजा को श्रद्धांजलि दी.

इस मामले ने पूरे शासन को हिला कर रख दिया था. जब पुलिस हत्यारों की खोज में हर तरह की खाक छान चुकी और कहीं कुछ पता नहीं चला तो उस का ध्यान घटनास्थल से मिले बीड़ी के बंडल और टौफी के रेपर पर जम गया. इस की तहकीकात के लिए पुलिस ने क्षेत्र के मजदूरों और डंपर चालकों का सत्यापन किया. इसी दौरान पुलिस की नजर 3 ऐसे संदिग्ध लोगों पर पड़ी, जो इस कांड के बाद देर रात घर आते थे और सवेरे ही घर से निकल जाते थे. जबकि इन तीनों में से एक शख्स ऐसा भी था, जो घटना वाले दिन के बाद अपने कमरे पर आया ही नहीं था. इस के साथ ही पुलिस को एक अहम जानकारी यह भी मिली कि घटनास्थल से जिस ब्रांड की बीड़ी के रैपर मिले थे, वे तीनों उसी ब्रांड की बीड़ी पीते थे. उन के साथ रहने वाले अन्य मजदूरों ने पुलिस को बताया कि वे तीनों ही नशेड़ी हैं और अफीम वगैरह खाते हैं.

इस जानकारी के बाद पुलिस उन तीनों की तलाश में लग गई. पुलिस ने देर रात उन के आवास पर छापा मारा तो उन में से 2 पुलिस के हत्थे चढ़ गए. इन में एक का नाम प्रेमपाल और दूसरे का जूनियर मसीह था. पुलिस दोनों को हिरासत में ले कर कोतवाली ले आई. कोतवाली में उन से कड़ी पूछताछ की गई. पुलिस पूछताछ में दोनों ने बताया कि इस अपराध को अंजाम देने वाला अख्तर अली है. पुलिस ने प्रेमपाल और मसीह से उस के बारे में पूछा तो दोनों ने बताया कि अख्तर अली उसी रात से गायब है, जिस रात घटना घटी थी.

पुलिस ने उन दोनों से अख्तर के किसी फोटो के बारे में पूछा. लेकिन उन के पास अख्तर अली का कोई फोटो नहीं था. उस का फोटो नहीं मिला तो पुलिस ने उन दोनों की मदद ले कर उस का स्केच बनवाया. स्केच की मदद से पुलिस ने उस की खोजबीन शुरू कर दी. साथ ही उस के पैंफ्लेट छपवा कर दीवारों पर भी लगवा दिए गए. अख्तर के साथियों से उस का मोबाइल नंबर मिल गया था. पुलिस ने उस के मोबाइल की लोकेशन पता की तो वह दिल्ली की पाई गई. अख्तर की लोकेशन मिलते ही एसटीएफ के एसपी डा. सदानंद दाते पुलिस टीम के साथ बुधवार शाम को ही दिल्ली के लिए रवाना हो गए. लेकिन पुलिस दिल्ली पहुंची तो उस की लोकेशन लुधियाना आने लगी.

फलस्वरूप पुलिस टीम को लुधियाना जाना पड़ा. आखिरकार लोकेशन के आधार पर खोजबीन कर के उसे लुधियाना से गिरफ्तार कर लिया गया. आरोपी के गिरफ्तार होने की सूचना उसी समय नीरजा के घर वालों को दे दी गई. पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के समझाने के बाद नीरजा के घर वाले उस की लाश उठाने के लिए तैयार हुए. गुरुवार को फूलों से सजे वाहन में बच्ची के शव को पोस्टमार्टम हाउस से बरेली मार्ग होते हुए रानीबाग स्थित चित्रशिला घाट ले जाया गया. यह हल्द्वानी में पहला ऐसा मामला था, जिस में हल्द्वानी ही नहीं, पूरे राज्य के वीआईपी, नेता, पत्रकार, वकील और अन्य गणमान्य लोगों के साथ बच्चेबूढ़े व महिला भी शामिल हुईं.

अगले दिन उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत, राजस्व मंत्री यशपाल आर्य और आपदा प्रबंधन समिति के अध्यक्ष प्रयाग भट्ट सांत्वना देने के लिए हल्द्वानी पहुंचे तो गुस्साए लोगों ने उन की कारों के शीशे तोड़ दिए. यशपाल आर्य और प्रयाग भट्ट को तो चोटें भी आईं. पुलिस ने जैसेतैसे स्थिति को संभाला. मासूम नीरजा की अंतिम विदाई को अभी कुछ ही समय बीता था कि एसटीएफ की टीम आरोपी अख्तर को लेकर हल्द्वानी पहुंच गई. हल्द्वानी लाते ही अख्तर से कड़ी पूछताछ की गई. पूछताछ में उस ने बताया कि इस घिनौने अपराध में प्रेमपाल और जूनियर मसीह भी ने सहयोग किया था. लेकिन बच्ची जिस हालत में मिली थी, उस से पुलिस को उस की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था.

उन दोनों को पुलिस ने पहले ही हिरासत में ले रखा था. उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया. डंपर चालक अख्तर अली उर्फ शमीम मूलरूप से बिहार के चंपारण जिले के बेतिया थाना के गांव महानाजनी का रहने वाला था, जो हल्द्वानी में रह कर डंपर चलाता था. 20 नवंबर को देर रात शादी के रिसैप्शन के दौरान अख्तर अली शराब के नशे में समारोह में घुस आया. उस ने वहीं खाना भी खाया. खाना खाते समय नीरजा उस की नजरों में चढ़ गई. नीरजा को देखते ही उस के मन में पाप घर कर गया और वह उस के अकेले होने का इंतजार करने लगा.

नीरजा जैसे ही अपने मांबाप से अलग हुई, उस ने उसे अपने विश्वास में ले कर टौफी दिलाने का लालच दिया. वह बच्ची को चुपचाप वहां मौजूद लोगों की नजरों से दूर ले गया. बाहर जा कर एक दुकान से उस ने टौफी खरीदी. इस के बाद वह उस मासूम को बहलाफुसला कर जंगल की तरफ ले गया. उसी जंगल के पास उसे प्रेमपाल और जूनियर मसीह मिल गए. उस वक्त वे दोनों भी नशे में थे. वे समझ गए कि अख्तर बच्ची को क्यों लाया है. वे उस के साथ चल दिए. तब तक मासूम नीरजा रोने लगी थी. उन शैतानों ने उस का मुंह बंद कर दिया और उसे उठा कर जंगल में ले गए. वहां अख्तर ने हैवानियत दिखाते हुए मासूम बच्ची का मुंह बंद कर के उस के साथ दुराचार किया और उसे वैसे ही छोड़ कर साथियों के साथ चला आया. घटना को अंजाम देने के बाद तीनों अपने कमरे पर लौट आए.

अगले दिन बच्ची की खोजबीन को देख कर अख्तर डर की वजह से पहले दिल्ली, फिर गुड़गांव और बाद में लुधियाना चला गया. अख्तर के दिल्ली चले जाने की बात प्रेमपाल और मसीह को मालूम थी. लेकिन फंसने के डर से दोनों ने अपना मुंह बंद रखा और अपनेअपने कमरे से गायब रहे, ताकि पुलिस उन से किसी तरह की पूछताछ न कर सके. बाद में प्रेमपाल और जूनियर मसीह पुलिस के हत्थे चढ़ गए थे. इस केस में पुलिस ने साक्ष्य छिपाने व आरोपी को बचाने के जुर्म में प्रेमपाल व जूनियर मसीह को भी गिरफ्तार कर लिया. मूलरूप से पीलीभीत का रहने वाला प्रेमपाल घटना के समय काठगोदाम में रह रहा था. जबकि जूनियर मसीह कंटोपा, रुद्रपुर का निवासी था.

केस के खुलने के बाद पुलिस ने तीनों आरोपियों को बी.डी. पांडे अस्पताल ले जा कर उन का मेडिकल कराया. उन की मेडिकल रिपोर्ट से पता चला कि तीनों ही चरस और शराब पीने के आदी थे. इस घटना को अंजाम देते समय तीनों नशे में थे. मासूम नीरजा के साथ ददिंरगी की हदें पार करने के बाद उसे तड़पता छोड़ कर तीनों वापस चले आए थे. अगले दिन सारे शहर में पुलिस की खोजबीन को देखते हुए मुख्य आरोपी अख्तर दिल्ली भाग गया था और उस ने अपना मोबाइल बंद कर लिया था, ताकि पुलिस उस का पीछा न कर सके.

कड़ी सुरक्षा के बीच अभियुक्तों से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें गुप्त रूप से जिला एवं सत्र न्यायाधीश एन.एस. धानिक की अदालत में पेश किया. उसी वक्त महिला संगठन ‘आशा’ की कुछ महिलाएं अदालत में पहुंच गईं. बी.डी. पांडे अस्पताल में जुटीं आशा संगठन की महिलाओं में आरोपियों के प्रति इतना गुस्सा था कि वे उन्हें एक बार जूता मारना चाहती थीं. वे मांग कर रही थीं कि आरोपियों को एक बार जूता मारने दिया जाए तो उन्हें तसल्ली मिल जाएगी. महिलाओं के आक्रोश को देखते हुए पुलिस ने किसी तरह उन्हें झांसा दिया और आरोपियों को अस्पताल के पीछे के रास्ते से निकाल कर अदालत में पेश किया.

तीनों आरोपियों पर भादंवि की धारा 376, 302, 363, 201 और पोक्सो एक्ट के तहत दर्ज मुकदमे के अवलोकन के बाद जिला जज ने उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेजने के आदेश दिए. इस मामले की विवेचना कर रहे एसआई दिनेश पंत ने बताया कि अदालत से आरोपियों की डीएनए जांच के लिए आवेदन किया गया है. आदेश मिलने के बाद डीएनए जांच कराई गई. जांच से साबित हो गया है कि दुराचार सिर्फ अख्तर ने ही किया था. प्रेमपाल और जूनियर मसीह ने मदद की थी. इस बीच पुलिस ने वारदात के दौरान पहने गए आरोपियों के कपड़े भी बरामद कर लिए थे. जिन्हें जिला जज के अवलोकन के बाद सील कर दिया गया.

पिछले कुछ समय से समाज में यौन अपराधों में दरिंदगी बढ़ती जा रही है. मासूम बच्चियों के मामले में तो अपराधी हैवानियत की सारी हदों को पार कर जाते हैं. ऐसे दरिंदो को जब तक त्वरित रूप से सख्त से सख्त सजा नहीं दी जाएगी, तब तक ऐसी घटनाओं पर रोक लगाना संभव नहीं है. कानून को ऐसे मामलों को गंभीरता से लेना चाहिए और पुलिस को भी. Crime Story

—कहानी में नीरजा, उस के पिता और मामा के नाम बदल दिए गए हैं.