मां के प्रेम का जब खुला राज

जिस के लिए घर छोड़ा उसी ने दिल तोड़ा – भाग 2

पूछताछ में उस आदमी ने अपना नाम महेश बताया. वह अनुराधा के पति प्रशांत सूर्यवंशी रंगोजी का दोस्त था. प्रशांत ने ही उसे अनुराधा का बकाया वेतन लेने के लिए वहां भेजा था. पुलिस को उस से प्रशांत का पता और फोन नंबर मिल गया. लेकिन जब पुलिस महेश को ले कर प्रशांत के घर पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला.

दरअसल, प्रशांत को महेश के पकड़े जाने की जानकारी हो गई थी. वह समझ गया कि अब पुलिस उसे भी पकड़ लेगी. इसलिए वह पुलिस से बचने का रास्ता खोजने लगा. उस का एक रिश्तेदार ट्रक चलाता था. वह ट्रक ले कर अन्य शहरों में आताजाता रहता था. प्रशांत अपने उसी रिश्तेदार के यहां पहुंचा तो उसे पता चला कि उस का वह रिश्तेदार ट्रक ले कर गुजरात के बड़ौदा शहर जा रहा है.

पुलिस से बचने के लिए प्रशांत घूमने के बहाने उस के ट्रक पर सवार हो गया और उस के साथ बड़ौदा चला गया. इंसपेक्टर विलास सोड़े ने महेश रंगोजी को साथ ले कर प्रशांत की तलाश शुरू की तो उन्हें रिश्तेदार के साथ ट्रक पर उस के बड़ौदा जाने की जानकारी मिल गई.

पता करते हुए विलास सोड़े उस ट्रांसपोर्ट कंपनी पहुंच गए, जिस ट्रांसपोर्ट कंपनी का वह ट्रक था. वहां से उन्हें पता चला कि जिस ट्रक से प्रशांत बड़ौदा जा रहा है, वह ट्रक नासिक से आगे निकल चुका है. पुलिस ट्रक का नंबर और वहां का पता ले कर चल पड़ी, जहां बड़ौदा में उस ट्रक को माल पहुंचाना था. 6 जुलाई को बड़ौदा में जब ट्रक से माल उतारा जा रहा था, तभी इंसपेक्टर विलास सोड़े अपने सहायकों के साथ वहां पहुंच गए और प्रशांत सूर्यवंशी को गिरफ्तार कर लिया.

प्रशांत को पूना के थाना येरवड़ा ला कर उस से पूछताछ की गई तो उस ने अनुराधा की हत्या का अपराध बड़ी आसानी से स्वीकार कर लिया. प्रशांत ने उस की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह एक पत्नी की महत्वाकांक्षाओं और जिद से दुखी पति के हत्यारे बनने की थी.

मराठा समाज का 23 वर्षीय प्रशांत सूर्यवंशी महाराष्ट्र के जिला लातूर की तहसील निलंगा के गांव माकड़ीपोर के रहने वाले जीवन सूर्यवंशी का बेटा था. पिता गांव के सीधेसाधे किसान थे. परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी. इसी वजह से वह ज्यादा पढ़लिख नहीं सका. सरकारी स्कूल से किसी तरह हायर सेकेंडरी कर के पैसा कमाने के लिए वह तहसील निलंगा आ कर टाटा डोकोमो कंपनी के औफिस के सामने एक गुमटी ले कर चाऊमीन वगैरह बना कर बेचने लगा.

यहीं प्रशांत की मुलाकात अनुराधा कुलकर्णी से हुई. अनुराधा टाटा डोकोमो कंपनी के औफिस में काम करती थी. प्रशांत वहां मोबाइल के लिए सिम खरीदने गया तो उस की नजर सुंदरसलोनी अनुराधा पर पड़ी. पहली ही नजर में उस का दिल अनुराधा पर आ गया.

अनुराधा जितनी खूबसूरत थी, उस से कहीं ज्यादा तेजतर्रार और व्यवहारकुशल थी. आंखें नचाने के साथसाथ कंधे उचकाउचका कर उस का बातें करना किसी भी पुरुष को आकर्षित कर सकता था. प्रशांत उस की इसी अदा पर मर मिटा था. इस के बाद वह उस की एक झलक पाने के लिए किसी न किसी बहाने टाटा डोकोमो कंपनी के औफिस में आनेजाने लगा.

22 वर्षीया अनुराधा कुलकर्णी निलंगा कस्बे की ही रहने वाली थी. उस के पिता अनिल कुलकर्णी की मौत हो चुकी थी. जिस की वजह से परिवार की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी. घर की सारी जिम्मेदारी मां के कंधे पर थी. परिवार में मां के अलावा एक बड़ी बहन थी. गरीबी की वजह से मात्र नौवीं पास कर के अनुराधा टाटा डोकोमो कंपनी के इस औफिस में नौकरी करने लगी थी.

अनुराधा भले ही छोटे घर की थी, लेकिन उस के सपने बहुत बड़े थे. यही वजह थी कि जब उस ने प्रशांत की आंखों में अपने लिए चाहत देखी तो उस का भी झुकाव उस की ओर हो गया. इस तरह चाहत दोनों ओर जाग उठी थी. प्रशांत उसे देखने के लिए उस के औफिस आता ही रहता था. अब अनुराधा भी जब तक उसे देख नहीं लेती थी, उसे चैन नहीं मिलता था. प्रशांत का गठा शरीर, चौड़ा सीना और आकर्षक चेहरा उसे भा गया था.

यही वजह थी कि अनुराधा भी स्वयं को रोक नहीं पाई और समय निकाल कर प्रशांत की गुमटी पर आनेजाने लगी. इसी आनेजाने और मिलनेजुलने में उन के प्यार का इजहार भी हो गया था. प्यार परवान चढ़ा तो दोनों शादी के बारे में सोचने लगे.

लेकिन प्रशांत ने अनुराधा की मां और बहन से शादी की बात की तो अलगअलग जाति होने की वजह से दोनों ने ही अनुराधा की शादी उस से करने से मना कर दिया. उन का कहना था कि वे ब्राह्मण हैं, इसलिए अपनी बेटी की शादी किसी गैर जाति में नहीं कर सकतीं. प्रशांत के घर वाले भी इस शादी के लिए राजी नहीं थे.

दोनों के परिवारों के विरोध के बावजूद अनुराधा और प्रशांत शादी की जिद पर अड़े थे, इसलिए दोनों ने अपनाअपना घरपरिवार छोड़ कर सिद्धेश्वर मंदिर में एकदूसरे के गले में जयमाल डाल कर शादी कर ली. उन की इस शादी से घर में ही नहीं, पूरे समाज में बवाल मच सकता था, इसलिए दोनों ने तय किया कि अब वे गांव में न रह कर पूना जा कर रहेंगे.

अनुराधा और प्रशांत पूना आ गए और हंसीखुशी से अपने दांपत्य जीवन की शुरुआत की. उन के इस कदम से जातिबिरादरी पर तो कोई फर्क नहीं पड़ा, लेकिन अनुराधा की मां यह सदमा बरदाश्त नहीं कर सकी और इस तरह बीमार हुई कि 6 महीने बीततेबीतते उस की मौत हो गई.

पूना के घोरपड़ी जाधव बस्ती में प्रशांत का दूर का एक रिश्तेदार रहता था. उस की मदद से प्रशांत को जाधव बस्ती के जनाई निवास में किराए का एक मकान मिल गया था. उसी रिश्तेदार ने उसे नौकरी भी दिला दी थी. नौकरी भले ही टैंपरेरी थी, लेकिन एक सहारा तो मिल ही गया था. नौकरी भरोसेमंद नहीं थी, इसलिए समय निकाल कर प्रशांत आटो चलाना सीखने लगा.

आटो चलाना सीख कर प्रशांत ने ड्राइविंग लाइसेंस बनवा लिया तो नौकरी छोड़ दी और किराए का आटो ले कर चलाने लगा. आटो की कमाई से घर चलाने में दिक्कत होने लगी तो अनुराधा ने भी नौकरी करने की इच्छा जाहिर की. दरअसल इस की वजह यह थी कि जब प्रशांत की कमाई से घर के खर्च ही नहीं पूरे हो रहे थे तो अनुराधा के शौक कैसे पूरे होते. अपने शौक पूरे करने के लिए ही अनुराधा नौकरी करना चाहती थी.

प्रशांत को अनुराधा के नौकरी करने पर कोई ऐतराज नहीं था, क्योंकि शादी से पहले वह नौकरी कर ही रही थी. थोड़ी कोशिश के बाद अनुराधा को पूना कैंप के पास एक कपड़े की दुकान में सेल्सगर्ल्स की नौकरी मिल गई. लेकिन कुछ दिनों बाद उस ने यह नौकरी छोड़ दी. क्योंकि उसे क्लोजर सेंटर कैंप में बौडी टौक के शोरूम में ज्यादा वेतन और ज्यादा सुविधा की नौकरी मिल गई थी.

प्रशांत ने सोचा था कि अनुराधा कमाएगी तो थोड़ी मदद मिलेगी, लेकिन वह अपनी कमाई का एक भी पैसा घर खर्च में नहीं खर्च करती थी. वह प्रशांत की कमाई से घर चलाती थी और अपनी कमाई सिर्फ अपने ऊपर खर्च करती थी. खैर, प्रशांत ने कभी उस से कुछ मांगा भी नहीं था.

जिस के लिए घर छोड़ा उसी ने दिल तोड़ा – भाग 1

सुबह के यही कोई 10 बजे पूना के थाना येरवड़ा के सीनियर इंसपेक्टर संजय पाटिल को पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिली कि पूना नगर रोड पर स्थित घोरपड़ी एयर खराड़ी  गांव के पास तेल निकालने वाली मशीन के पीछे एक लाल रंग का बड़ा सा लावारिस बैग पड़ा है. बैग एकदम नया और काफी महंगा है. उस में ताला लगा है. बैग जहां पड़ा है, वह वहां रखा नहीं गया, बल्कि फेंका गया है. उस में लाश है या कोई गैरकानूनी सामान, यह बात खोलने पर ही पता चल सकती है.

मामला गंभीर था, इसलिए सीनियर इंसपेक्टर संजय पाटिल ने ड्यूटी पर तैनात पुलिस अफसर से यह सूचना दर्ज कराई और तुरंत इस की जानकारी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दे दी. इस के बाद वह सहायक इंसपेक्टर विलास सोडे़, असिस्टैंट पुलिस इंसपेक्टर चंद्रकांत जाधव, हेडकांस्टेबल राजाराम धोगरे, कांस्टेबल हरी मोरे, प्रदीप गोलार, तुषार अह्वाण और महेश मोहोल के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.

चूंकि बैग लावारिश पड़ा था, इसलिए उस में बम होने की भी संभावना थी. इस संभावना को देखते हुए इंसपेक्टर संजय पाटिल ने बम निरोधक दस्ते को भी इस की सूचना दे दी. उन की इसी सूचना पर बम निरोधक दस्ते की टीम भी घटनास्थल पर पहुंच गई.

बम निरोधक दस्ते ने जांच कर के बताया कि बैग में किसी तरह की विस्फोटक सामग्री नहीं है तो सीनियर इंसपेक्टर संजय पाटिल ने ताला तुड़वा कर बैग खुलवाया. बैग खोला गया तो पता चला कि उस में लाश रखी है. लाश किसी लड़की की थी, जिसे बड़ी बेरहमी से बैग में ठूंस कर रखा गया था. उन्होंने फोटोग्राफर से फोटो खिंचवा कर लाश बाहर निकलवाई.

मृतका की उम्र 24-25 साल रही होगी. मृतका काफी खूबसूरत थी. पहनावे और शक्लसूरत से वह ठीकठाक घर की लग रही थी. उस के गले पर बाईं ओर नाखून के गहरे निशान थे, जिस से अंदाजा लगाया गया कि मृतका की हत्या गला दबा कर की गई थी. वह काले रंग का ट्राउजर और हरेसफेद रंग की टीशर्ट पहने थी.

बैग यहां बाहर से ला कर फेंका गया था. इसलिए मृतका की शिनाख्त होनी मुश्किल थी. लेकिन पुलिस को तो अपनी काररवाई करनी ही थी. लाश के फोटो वगैरह कराने के बाद पुलिस ने वहां एकत्र लोगों से मृतका की शिनाख्त कराने की कोशिश की. आखिर पुलिस का शक सच साबित हुआ, वहां मौजूद लोगों में से कोई भी उस की शिनाख्त नहीं कर सका. इस का मतलब था कि मृतका वहां की रहने वाली नहीं थी.

इस से साफ हो गया कि लाश कहीं बाहर से ला कर यहां फेंकी गई थी. लाश के कपड़ों या बैग से भी पुलिस को ऐसी कोई चीज नहीं मिली थी, जिस से लाश की शिनाख्त हो पाती. लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पुलिस आगे की काररवाई करने लगी.

सीनियर इंसपेक्टर संजय पाटिल सहायकों की मदद से लाश का पंचानामा तैयार करवा रहे थे कि एडिशनल पुलिस कमिश्नर मनोज पाटिल, असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर श्याम मोहिते और राजन भोसले भी घटनास्थल पर आ पहुंचे. इन अधिकारियों ने भी घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया.

लाश और घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद एडिशनल पुलिस कमिश्नर मनोज पाटिल और असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर श्याम मोहिते, सीनियर इंसपेक्टर राजन भोसले संजय पाटिल को दिशानिर्देश दे कर चले गए. इस के बाद घटनास्थल की औपचारिकताएं पूरी कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए पूना के सरकारी अस्पताल भिजवा दी गई.

थाने लौट कर राजन भोसले हत्या का मामला दर्ज करा दिया और इस मामले की जांच अपने सहायक इंसपेक्टर विलास सोडे को सौंप दी. यह 28 जून  की बात है.

सहायक इंसपेक्टर विलास सोडे़ की जांच तब तक आगे नहीं बढ़ सकती थी, जब तक मृतका की शिनाख्त न हो जाती. इस के लिए उन्होंने मृतका का हुलिया बता कर पूना शहर के सभी थानों को सूचना दे दी कि अगर इस हुलिए की किसी भी लड़की की गुमशुदगी दर्ज हो तो उन्हें तुरंत सूचना दी जाए. इस के अलावा उन्होंने मुखबिरों को भी सतर्क कर दिया था.

उन्हें उम्मीद थी कि किसी न किसी थाने से उन्हें मृतका के बारे में कोई न कोई जानकारी मिल ही जाएगी. मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. मुखबिरों से भी मृतका के बारे में कुछ पता नहीं चल सका. इस स्थिति में यह मामला उन के लिए सिरदर्द बनने लगा था.

अगला दिन बीत गया और मृतका के बारे में कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली तो इंसपेक्टर विलास सोड़े ने पैंफ्लैट और सोशल मीडिया की मदद लेने का विचार किया. उन्होंने मृतका की शिनाख्त के लिए उस की लाश के फोटो के पैंफ्लैट छपवा कर पूना शहर के हर गलीमोहल्ले में तो चस्पा कराए ही, इस के अलावा पूना, मुंबई, अहमदाबाद के रेलवे स्टेशनों और बसअड्डों के साथ ट्रेनों और बसों में भी चस्पा करा दिए.

पैंफ्लैट के अलावा उन्होंने सोशल मीडिया के फेसबुक और वाट्सऐप पर भी मृतका के फोटो डलवा कर लोगों से शिनाख्त की अपील की. उन का मानना था कि वाट्सऐप और फेसबुक पर मृतका की जानपहचान का कोई न कोई जरूर मिल जाएगा. किसी भी तरह उस की शिनाख्त हो जाए तो उन्हें मामले को सुलझाने में देर नहीं लगेगी. और फिर हुआ भी वही. वाट्सऐप के जरिए मृतका की शिनाख्त हो गई तो हत्यारा भी पकड़ में आ गया.

मृतका की पहचान अनुराधा प्रशांत सूर्यवंशी के रूप में हुई. वह पूना के जिस शोरूम में नौकरी करती थी, उसी शोरूम में नौकरी करने वाले किसी कर्मचारी ने जब वाट्सऐप पर अनुराधा की लाश की फोटो देखी तो वह हैरान रह गया. पहले तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ, क्योंकि उस के पति ने तो बताया था कि अनुराधा की बहन की तबीयत खराब है, इसलिए वह गांव गई है.

उस कर्मचारी की पत्नी अनुराधा की अच्छी सहेलियों में थी, इसलिए उस ने वह फोटो अपनी पत्नी को दिखाई. जब उस की पत्नी ने कहा कि यह फोटो अनुराधा का ही है, तब कहीं जा कर उसे विश्वास हुआ.

फोटो के साथ शिनाख्त की अपील की गई थी, इसलिए पतिपत्नी ने देर किए बगैर पूना के थाना लश्कर से संपर्क कर के पुलिस को सारी जानकारी दे दी. इसी जानकारी में उन्होंने पुलिस को यह भी बताया कि अनुराधा का बकाया वेतन लेने के लिए एक आदमी आज शोरूम पर आने वाला है.

पुलिस के लिए यह बहुत अहम जानकारी थी. क्योंकि जो आदमी वेतन लेने आने वाला था, उस से कुछ सुराग मिल सकता था, इसलिए पुलिस उसे पकड़ने के लिए शोरूम पर पहुंच गई. इस के बाद जैसे ही वह आदमी शोरूम पर आया, शोरूम के कर्मचारियों ने उसे पुलिस के हवाले कर दिया. लश्कर पुलिस ने उसे येरेवड़ा पुलिस के इंसपेक्टर विलास सोड़े को सौंप दिया.

मां के प्रेम का जब खुला राज – भाग 4

चादर में लिपटी मिली साहनी की लाश

चूंकि मामला मासूम बच्ची की गुमशुदगी का था. उस के साथ दरिंदगी जैसी घटना घटित न हो जाए, इसलिए कोतवाल विमलेश कुमार बिना देरी के आवश्यक पुलिस बल के साथ सिरसा दोगड़ी गांव पहुंच गए और बच्ची की खोज शुरू कर दी. परिवार व गांव के युवक भी पुलिस के साथ हो लिए.

पुलिस ने गांव के बाहर खेतखलिहान, बागबगीचा, कुआंतालाब तथा नदीनहर किनारे झाडिय़ों में बच्ची की खोज की. लेकिन उस का कुछ भी पता नहीं चला. पुलिस ने गांव के कुछ संदिग्ध घरों की तलाशी भी ली. कई नवयुवकों से सख्ती से पूछताछ भी की. परंतु साहनी का पता नहीं चला.

रात 12 बजे के बाद कोतवाल विमलेश कुमार पुलिसकर्मियों व अश्वनी के घर वालों के साथ साहनी की खोज करते गांव के बाहर निर्माणाधीन अस्पताल के पास पहुंचे. वहां उन्हें केले की झाडिय़ों के बीच सफेद चादर में लिपटी कोई वस्तु दिखाई दी. सहयोगी पुलिसकर्मियों ने जब चादर हटाई तो सभी की आंखें फटी रह गईं. चादर में लिपटी एक बच्ची की लाश थी.

इस लाश को जब अश्वनी ने देखा तो वह फफक पड़ा और कोतवाल साहब को बताया कि लाश उस की बेटी साहनी की है. कोतवाल ने साहनी मर्डर केस की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी तो सवेरा होतेहोते एसपी डा. ईरज राजा, एएसपी असीम चौधरी तथा डीएसपी रवींद्र गौतम भी घटनास्थल आ गए. अब तक गांव में भी सनसनी फैल गई थी, अत: सैकड़ों लोग वहां जुट गए थे.

राधा को बेटी की हत्या की खबर लगी तो वह बदहवास हालत में घटनास्थल पर पहुंची और बेटी के शव के पास विलाप करने लगी. ओमप्रकाश भी नातिन का शव देख कर रो पड़े. पुलिस अधिकारियों ने उन दोनों को समझा कर किसी तरह शव से अलग किया फिर जांच में जुट गए.

मृतक बच्ची की उम्र 5 वर्ष के आसपास थी. उस के शरीर पर किसी तरह के चोट के निशान नहीं थे. देखने से लग रहा था कि उस की हत्या नाक-मुंह दबा कर की गई थी. क्योंकि नाक से खून निकला था. ऐसा भी लग रहा था कि बच्ची की हत्या कहीं और की गई और फिर शव को चादर में लपेट कर वहां फेंका गया. चादर पर खून लगा था. जांच से यह भी अनुमान लगाया गया कि उस के साथ दरिंदगी नहीं की गई थी. जांच के बाद पुलिस अधिकारियों ने बच्ची के शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल, उरई भिजवा दिया.

दादा ने जताया बहू पर शक

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल पर मौजूद मृतका के पिता अश्वनी दुबे तथा दादा ओमप्रकाश से पूछताछ की. ओमप्रकाश ने बताया कि नातिन की हत्या का भेद उस की बहू राधा के पेट में छिपा है. यदि राधा से सख्ती से पूछताछ की जाए तो सच्चाई सामने आ जाएगी.

“भला एक मां अपनी मासूम बच्ची की हत्या क्यों करेगी?” पुलिस अधिकारियों ने पूछा.

“साहब, पड़ोसी युवक नेत्रपाल सिंह का हमारे घर आनाजाना था. वह बच्चों को टौफी, बिस्कुट खिलाता था. मना करने के बावजूद नहीं मानता था. उस ने बहू को भी अपने जाल में फंसा लिया था. मुझे शक है कि इन दोनों ने ही कोई खेला किया है.”

यह जानकारी पाते ही डीएसपी रविंद्र गौतम ने पुलिस टीम के साथ नेत्रपाल सिंह व राधा को उन के घर से हिरासत में ले लिया और थाना माधौगढ़ ले आए. थाने में जब उन दोनों से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने मासूम साहनी हत्याकांड का जुर्म कुबूल कर लिया.

नेत्रपाल सिंह ने बताया कि पड़ोसी अश्वनी के घर उस का आनाजाना था. घर आतेजाते अश्वनी की पत्नी राधा और उस के बीच नाजायज संबंध बन गए. 4 अप्रैल, 2023 की दोपहर उस ने शराब पी, फिर नशे की हालत में वह राधा के घर पहुंच गया.

राधा उस समय घर में अकेली थी. राधा का पति खेत पर था और बच्चे दादा की झोपड़ी में थे. राधा को अकेली पा कर उस की कामाग्नि भडक़ उठी. उस ने राधा को बांहों में भरा और चारपाई पर लिटा दिया. मस्ती के आलम में उन्होंने दरवाजा भी बंद नहीं किया.

भेद खुलने के डर से की हत्या

राधा के बिस्तर पर वह वासना की आग बुझा ही रहा था कि तभी राधा की बेटी साहनी आ गई. उस ने दोनों को उस हालत में देखा तो वह चीखने लगी. राधा को लगा उस की बेटी उस का भांडा फोड़ देगी. अत: उस ने उसे पकड़ लिया और उस के मुंह पर हाथ रख दिया.

नेत्रपाल सिंह नशे में था. उसे भी लगा कि भेद खुल जाएगा. वह भी उस के पास पहुंचा और फिर मुंह नाक दबा कर साहनी को मार डाला. इस के बाद यह अपराध छिपाने के लिए उन दोनों ने साहनी की लाश को सफेद चादर में लपेटा और गांव के बाहर निर्माणाधीन अस्पताल के पास फेंक दिया.

चूंकि दोनों ने साहनी की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था, अत: कोतवाल ने मृतका के दादा ओमप्रकाश की तहरीर पर भादंवि की धारा 302/201 के तहत नेत्रपाल सिंह व उस की प्रेमिका राधा के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया तथा उन्हें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.

7 अप्रैल, 2023 को पुलिस ने आरोपी नेत्रपाल सिंह व राधा को उरई कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

-कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मां के प्रेम का जब खुला राज – भाग 3

एक दिन ओमप्रकाश दोपहर में ही खेत से वापस आ गया. घर के बाहर बनी झोपड़ी में राधा की बेटी मौजूद थी. उस के हाथ में नमकीन का पैकेट था. वह मजे से खा रही थी. ओमप्रकाश ने नातिन से पूछा, “बिटिया, नमकीन किस ने दी?”

“नेत्रपाल चाचा ने. वह घर के अंदर मम्मी से बतिया रहे हैं,” नातिन ने बताया.

नातिन की बात सुन कर ओमप्रकाश के मन में शक के बादल उमडऩे-घुमडऩे लगे. सच्चाई जानने के लिए उस के कदम ज्यों ही घर के दरवाजे की ओर बढ़े, त्यों ही नेत्रपाल घर के अंदर से निकला. ओमप्रकाश ने उसे टोका भी. लेकिन नेत्रपाल बिना जवाब दिए ही चला गया. लेकिन राधा कहां जाती? ओमप्रकाश ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई.

पति को राधा ने दिखा दिया त्रियाचरित्र

शाम को अश्वनी जब खेत से घर वापस आया तो ओमप्रकाश ने बेटे को सारी बात बताई और इज्जत को ले कर चिंता जताई. बाप की बात सुन कर अश्वनी का माथा ठनका. उस ने इस बाबत राधा से पूछा तो वह पति पर हावी हो गई.

“पिताजी सठिया गए हैं. उन की अक्ल पर पत्थर पड़ गए हैं. वह लोगों की कानाफूसी को सही मान लेते हैं. ये वो लोग हैं, जो हम से जलते हैं और हमारी गृहस्थी को आग लगाना चाहते हैं.”

राधा यहीं नहीं रुकी और बोली, “वैसे भी नेत्रपाल हमारा पड़ोसी है. घर में आनाजाना है. रिश्ते में देवर है. इस नाते वह केवल हंसबोल लेता है. हंसीमजाक कर लेता है. इस में बुराई क्या है. तुम्हारा भी तो वह दोस्त है. तुम भी तो उस के साथ खातेपीते हो. मैं मानती हूं कि नेत्रपाल आज दोपहर घर आया था, लेकिन फावड़ा मांगने आया था. पिताजी ने उसे घर से निकलते देख लिया तो शक कर बैठे. फिर न जाने कितने इल्जाम मुझ पर लगा दिए. समझा देना उन्हें. आज तो मैं ने उन्हें जवाब नहीं दिया, लेकिन कल चुप नहीं बैठूंगी.”

राधा ने त्रियाचरित्र का ऐसा नाटक किया कि अश्वनी की बोलती बंद हो गई. वह सोचने लगा कि पिताजी को जरूर कोई गलतफहमी हो गई. राधा तो पाकसाफ है. नेत्रपाल के साथ उस का कोई लफड़ा नहीं है. उस ने किसी तरह राधा का गुस्सा दूर कर उसे मना लिया. राधा अपनी जीत पर जैसे शेरनी बन गई.

अश्वनी ने पत्नी को क्लीन चिट तो दे दी थी, लेकिन उस के मन में शक का कीड़ा कुलबुलाने लगा था. वह राधा पर चोरीछिपे निगाह भी रखने लगा था. यही नहीं, नेत्रपाल सिंह पर भी उस का विश्वास उठ गया था. उस ने उस के साथ शराब पीनी भी बंद कर दी थी. उस ने नेत्रपाल से भी साफ कह दिया था कि वह उस के घर तभी आए, जब वह घर पर मौजूद हो.

अश्वनी की बेटी अब तक 5 साल की हो चुकी थी. वह दिखने में गोरीचिट्टी तथा बातूनी थी. गांव के प्राइमरी स्कूल में वह पढ़ रही थी. अश्वनी ने बेटी से भी कह दिया था कि कोई बाहरी व्यक्ति घर में आए तो शाम को उसे जरूर बताए.

अचानक साहनी हुई लापता

अश्वनी के पिता ओमप्रकाश की माली हालत तो अच्छी नहीं थी, लेकिन गांव में उन की अच्छी इज्जत थी. अपने घर की इज्जत पर खतरा भांप कर वह चिंतित रहने लगे थे. उन्होंने खेत पर जाना कम कर दिया था और बहू राधा की निगरानी करने लगे थे. पड़ोसी युवक नेत्रपाल को तो वह घर के आसपास भी फटकने नहीं देते थे.

कड़ी निगरानी से राधा और नेत्रपाल सिंह का मिलन बंद हो गया. अब वे दोनों एकदूसरे से मिलने के लिए छटपटाने लगे. राधा जब तक मोबाइल फोन से अपने आशिक से बतिया नहीं लेती थी, उस के दिल को तसल्ली नहीं मिलती थी. लेकिन एक दिन उस की यह चोरी भी पकड़ी गई. फोन को ले कर राधा और अश्वनी के बीच खूब तूतू मैंमैं हुई. गुस्से में अश्वनी ने सिम ही तोड़ दिया.

4 अप्रैल, 2023 की शाम 5 बजे अश्वनी दुबे खेत से घर वापस आया तो उसे बच्चे नहीं दिखे. उस ने इधरउधर नजर दौड़ाई फिर पत्नी से पूछा, “राधा, दोनों बच्चे नहीं दिख रहे. कहां है वे दोनों?”

“दोनों ससुरजी के पास होंगे. साहनी तो यही कह कर घर से निकली थी कि वह दादा के पास जा रही है. वे दोनों वहीं होंगे.” राधा ने जवाब दिया.

अश्वनी तब पिता की झोपड़ी में पहुंचा. वहां ढाई वर्षीय बेटा तो सो रहा था, लेकिन बेटी साहनी नहीं थी. अश्वनी ने पिता से साहनी के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि लगभग 12 बजे साहनी छोटे भाई के साथ आई थी. कुछ देर दोनों उन के पास रहे. उस के बाद साहनी घर चली गई थी.

लेकिन पिताजी साहनी घर पर नहीं है. इस के बाद बाप बेटे साहनी की खोज करने लगे. उन्होंने मोहल्ले का हर घर छान मारा, लेकिन साहनी का पता न चला. सूर्यास्त होतेहोते पूरे गांव में यह खबर फैल गई कि अश्वनी दुबे की बेटी साहनी कहीं गुम हो गई है. इस के बाद गांव के दरजनों लोग 5 वर्षीय साहनी की खोज में जुट गए. उस की तलाश बागबगीचों, खेतखलिहान व कुआंतालाब में शुुरू हो गई. लेकिन साहनी का कुछ भी पता नहीं चला.

साहनी के न मिलने से राधा का रोरो कर बुरा हाल हो गया था. अड़ोसपड़ोस की महिलाएं राधा को हिम्मत बंधाती कि उस की बेटी का पता जल्दी ही चल जाएगा, लेकिन राधा पर महिलाओं के समझाने का कोई असर नहीं हो रहा था.

रात 8 बजे तक जब साहनी का कुछ भी पता नहीं चला तो अश्वनी कुमार दुबे जालौन जिले की ही कोतवाली माधौगढ़ पहुंचा और बोझिल कदमों से चलता हुआ कोतवाल विमलेश कुमार के सामने जा खड़ा हुआ. कोतवाल विमलेश कुमार ने उसे एक बार सिर से पांव तक घूरा. उस के चेहरे पर दुख व परेशानी के भाव साफ नजर आ रहे थे. आंखें भी नम थीं.

“बैठिए,” विमलेश कुमार ने कुरसी की ओर इशारा करते हुए कहा, “कहिए, मैं आप की क्या मदद कर सकता हूं?”

“साहब, मेरा नाम अश्वनी दुबे है. सिरसा दोगड़ी गांव का रहने वाला हूं. दोपहर बाद से मेरी 5 साल की बेटी साहनी अचानक लापता हो गई. मैं ने गांव के हर घर में उस की खोज की. जब कहीं नहीं मिली तो मैं आप की शरण में आया हूं,” अपनी बात पूरी कर अश्वनी रो पड़ा.

“देखो अश्वनी, रोने से काम नहीं चलेगा, हिम्मत रखो. मैं यकीन दिलाता हूं कि पुलिस आप की बेटी को तलाश करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी.” विमलेश कुमार ने कहा तो उस ने आंसू पोंछे. पूछताछ के बाद कोतवाल विमलेश कुमार ने साहनी की गुमशुदगी दर्ज कर ली और जिले के सभी थानों को वायरलैस से इस की सूचना दे दी. साथ ही पुलिस अधिकारियों को भी इस मामले से अवगत करा दिया.

सावधान! ऐसे दोस्तों से : दोस्त की बेटी पर बुरी नजर – भाग 3

रईस मंसूरी ने बाद में इनवर्टर का काम शुरू कर दिया. उस ने एकएक कर के 4 शादियां कीं. 3 बीवियों को वह तलाक दे चुका था, अब चौथी बीवी नुसरतजहां के साथ रह रहा था. पति के मरने के बाद तसलीमा को आर्थिक परेशानी हुई तो रईस ने उस की काफी मदद की. इस वजह से वह रईस की एहसानमंद हो गई.

तसलीमा की बेटियां जवान हो चुकी थीं. रईस की नीयत उस की बड़ी बेटी पर खराब हो गई. वह उसे फंसाने की कोशिश करने लगा. उसे इस बात की भी शर्म नहीं आई कि वह उस के लंगोटिया यार की बेटी है. एक तरह से वह उस की बेटी की तरह है. लेकिन उस ने इस ओर ध्यान नहीं दिया.

उसे फंसाने के लिए वह उस की पसंद की चीजें खरीद कर देने लगा. आखिर एक दिन वह अपनी योजना में सफल हो गया. नाजायज संबंध बने तो यह सिलसिला काफी दिनों तक चला. उस ने उस के अंतरंग संबंधों की मोबाइल से फिल्म भी बना ली थी.

तसलीमा के घर वालों को रईस मंसूरी पर इतना विश्वास था कि कोई उस के बारे में कुछ गलत सोच भी नहीं सकता था. इसी की आड़ में वह अपने मंसूबे पूरे कर रहा था. कुछ दिनों बाद तसलीमा की बेटी ने महसूस किया कि रईस से संबंध बना कर उस ने ठीक नहीं किया, क्योंकि वह उस की पिता की उम्र का है. उस से वह शादी भी नहीं कर सकती.

यह अहसास होने के बाद वह उस से दूरियां बनाने लगी. लेकिन रईस उस का पीछा छोडऩे को तैयार नहीं था. उस ने जो वीडियो बना रखी थी, उसी के बल पर वह उसे ब्लैकमेल करने लगा. रईस ने उसे धमकी दी कि अगर उस ने उस की बात नहीं मानी तो वह उस वीडियो को इंटरनेट पर डाल देगा. इस धमकी से वह डर गई. इस तरह रईस उस का शारीरिक व मानसिक शोषण करने लगा.

तसलीमा का बेटा आलम अब जवान हो चुका था. वह दुनियादारी समझने लगा था. अपने घर आने वाले रईस की गतिविधियां उसे अच्छी नहीं लगती थीं. क्योंकि वह जब भी उस के घर आता था, उस की बहन के आगेपीछे मंडराता रहता था. वह रईस से तो कुछ कह नहीं कहा, क्योंकि वह उस के मरहूम पिता की उम्र का था. उस की अम्मी भी उस की बड़ी इज्जत करती थी. इसलिए उस ने बहन को ही डांटा कि वह रईस ज्यादा बातें न किया करे.

आलम को पता नहीं था कि बात तो उस की बहन भी नहीं करना चाहती, पर रईस ने वीडियो फिल्म का ऐसा खौफ उस के दिल में बैठा दिया है कि ना चाहते हुए भी वह रईस की हर बात मानती है. एक दिन आलम के एक दोस्त ने अपने मोबाइल में उसे एक वीडियो दिखाई. वह वीडियो देख कर आलम का खून खौल उठा. उस वीडियो में उस की बहन रईस के साथ आपत्तिजनक स्थिति में थी. उस के दोस्त को वह फिल्म रईस ने ही दी थी.

इस के बाद रईस आलम का दुश्मन बन गया. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि वह उसे उस के किए की सजा जरूर देगा. अपने दिल में उठ रहे गुस्से के सैलाब को उस ने जाहिर नहीं होने दिया और रईस को ठिकाने लगाने का उपाय खोजने लगा. आखिर उस ने एक खौफनाक योजना बना ही ली.

आलम को अपने घर में इनवर्टर लगवाना था. चूंकि रईस इनवर्टर का काम करता था, इसलिए उस ने रईस को इनवर्टर लगाने के लिए 5 हजार रुपए दे दिए. रईस के पास काम ज्यादा था, इसलिए उस ने सोचा कि जिस दिन उसे टाइम मिलेगा, वह आलम के यहां जा कर इनवर्टर लगा देगा.

आलम ने रईस को फोन किया तो उस ने आलम से कह दिया कि 15 दिसंबर की शाम को वह उस के यहां इनवर्टर लगा देगा. आलम ने उसी दिन रईस को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. इस काम में उस ने अपने एक दोस्त शोएब को भी शामिल कर लिया.

उस दिन शाम को वह रईस के आने का इंतजार करने लगा. शाम साढ़े 7 बजे तक रईस उस के यहां नहीं पहुंचा तो उस ने उसे फोन किया. फोन पर बात करने के कुछ देर बाद रईस अपनी स्कूटी से आलम के यहां पहुंच गया.

योजना के अनुसार, आलम ने शराब की एक बोतल पहले से ही खरीद कर रख ली थी. रईस ने जब उस के यहां इनवर्टर लगा दिया तो वह रईस को एक कमरे में ले गया. उस कमरे में मेज पर शराब की बोतल और नमकीन पहले से ही रखी थी.

आलम ने कहा, “इनवर्टर लगने की खुशी में मैं ने छोटी सी पार्टी रखी है.”

रईस मना नहीं कर सका और आलम तथा शोएब के साथ शराब पीने बैठ गया. आलम ने तेज आवाज में डेक बजा दिया. जैसे ही उन का पीनेपिलाने का दौर खत्म हुआ, आलम अपनी जगह से उठा और कमरे में पहले से रखे हथौड़े से रईस के सिर पर जोरदार वार कर दिया. एक ही वार में रईस बिना कोई आवाज किए नीचे गिर गया. सिर से खून बहने लगा. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई.

हत्या के बाद उन के सामने समस्या लाश ठिकाने लगाने की थी. नाराज आलम ने उस की गरदन काट दी. इस के बाद उस ने लाश के टुकड़े कर के 4 बोरों में भर दिए और आधी रात को उन बोरों को एकएक कर के रामगंगा नदी के किनारे फेंक आया. कमरे में जमीन पर जो खून फैला था, उसे भी उस ने मिट्टी सहित कुरच कर एक बोरे में भर दिया और उसे भी जामा मस्जिद के नाले में डाल आया. उस की स्कूटी को उस ने रामगंगा नदी के पार मजार के पास बने कुंड में फेंक दी.

पूछताछ के बाद पुलिस ने आलम के साथी शोएब को भी गिरफ्तार कर लिया. आलम की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त हथौड़ा, चाकू, आरी के ब्लेड, मृतक का मोबाइल फोन और स्कूटी बरामद कर ली. इस के बाद उन्हें न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

(कथा पुलिस सूत्रों व अभियुक्त आलम के बयान पर आधारित. कथा में तसलीमा परिवर्तित नाम है)

प्रेम में डूबी जब प्रेमलता – भाग 3

स्कूल में छुट्टी होने की वजह से गवेंद्र पत्नी से मिलने आगरा पहुंच गया. उस का वहां आना प्रेमलता को अच्छा तो नहीं लगा, लेकिन वह उसे भगा भी नहीं सकती थी. रात का खाना खा कर वह सो गया.

अचानक उस की आंख खुली तो उस ने प्रेमलता को मोबाइल पर किसी से हंसहंस कर बात करते पाया. उस की बातचीत सुन कर पता चला कि वह किसी बबलू से बातें कर रही थी. उस ने फोन काटा तो गवेंद्र ने पूछा, “यह बबलू कौन है, जिस से तुम इतनी रात को बातें कर रही थी?”

“यहीं पड़ोस में रहता है. उस से किसी काम के लिए कहा था, उसी के बारे में बात कर रही थी.”

“उस के बारे में तुम सुबह भी तो पूछ सकती थी.”

“अभी पूछ लिया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा.” प्रेमलता ने तमक कर कहा.

इस के बाद गवेंद्र को नींद नहीं आई. सुबह दोनों में बबलू को ले कर खूब झगड़ा हुआ. बबलू को पता नहीं था कि गवेंद्र अभी गया नहीं है, इसलिए जब दोनों में झगड़ा हो रहा था तो वह प्रेमलता के कमरे पर आ पहुंचा. उसे देख कर गवेंद्र ने पूछा, “तो तुम्हीं बबलू हो?”

गवेंद्र के इस सवाल पर बबलू सिटपिटा गया. घबराहट में बोला, “जी, हम ही बबलू हैं. पिंकी दीदी से कुछ काम था, इसलिए आ गया. जरूरत पडऩे पर कुछ मदद कर देता हूं.”

“कोई अपनी दीदी से देर रात को बातें नहीं करता. बबलू यह सब ठीक नहीं है. मेरे खयाल से तुम्हारा यहां आनाजाना ठीक नहीं है. इन की मदद के लिए मैं हूं न.”

गवेंद्र ने बबलू को दरवाजे से वापस कर दिया. प्रेमलता को यह बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा. इसलिए उस ने तय कर लिया कि अब उसे किसी भी तरह गवेंद्र से छुटकारा पाना है. दूसरी ओर गवेंद्र की समझ में नहीं आ रहा था कि वह प्रेमलता के बारे में पिता को बताए या न बताए. उसे लगा कि यह पतिपत्नी के बीच मामला है, इस में पिता को बता कर परेशान करना ठीक नहीं है.

इस तरह रामसेवक को कुछ पता नहीं चला. बच्चों की छुट्टियां पड़ गईं तो गवेंद्र ने बच्चों को आगरा पहुंचा दिया. इस बीच बबलू के साथसाथ उस के दोस्तों विनयकांत और सर्वेंद्र का भी प्रेमलता के यहां आनाजाना हो गया. सर्वेंद्र और विनयकांत भी उसी कालेज से बीएमएस कर रहे थे. वहां रहते हुए उमंग और तमन्ना भी बबलू से हिलमिल गए थे.

एक दिन सभी ताजमहल देखने गए, जहां बबलू ने प्रेमलता के साथ फोटो खिंचवाए. इस तरह उन के प्यार का एक प्रमाण भी हो गया. इस के बाद तय हुआ कि गवेंद्र को रास्ते से हटा कर दोनों शादी कर लेंगे. यही नहीं, उस ने पूरी तैयारी भी कर ली. अब उसे मौके की तलाश थी.

30 नवंबर को प्रेमलता ने गवेंद्र को फोन किया तो पता चला कि रामसेवक वोट डालने गांव गए हैं. खेतों की बुवाई भी करानी है, इसलिए वह खेतों की बुवाई कराने तक गांव में ही रहेंगे. प्रेमलता ने बबलू से कहा कि गवेंद्र को निबटाने का यह अच्छा मौका है. बबलू ने अपने दोनों दोस्तों, सर्वेंद्र और विनयकांत को दोस्ती के नाम पर साथ देने के लिए राजी कर लिया. इस तरह गवेंद्र की हत्या की पूरी तैयारी हो गई.

31 दिसंबर, 2015 को प्रेमलता बच्चों के साथ कीरतपुर आ गई. उसे देख कर गवेंद्र ने कहा, “फोन कर देती तो मैं बच्चों को लेने आ जाता.”

“मैं ने फोन इसलिए नहीं किया कि यहां आ कर घर भी देख लूंगी और तुम से भी मिल लूंगी.” प्रेमलता ने कहा.

योजना के अनुसार, 4 दिसंबर, 2015 को बबलू अपने दोनों दोस्तों, सर्वेंद्र और विनयकांत के साथ मैनपुरी आ गया. कीरतपुर में ही उस का एक दोस्त रहता था, वे उसी के घर ठहर गए. उन का खाना प्रेमलता ने ही उमंग के हाथों भिजवाया था.

5 दिसंबर को गवेंद्र अपनी स्कूल की ड्यूटी कर के घर आया तो प्रेमलता उसे काफी बेचैन लगी. गवेंद्र ने पूछा तो प्रेमलता ने कहा, “मैं आगरा में रहती हूं तो तुम्हारी और बच्चों की चिंता लगी रहती है.”

गवेंद्र ने कहा, “कुछ दिनों की ही तो बात है. पढ़ाई पूरी होने पर मैनपुरी के आसपास नौकरी की कोशिश की जाएगी.”

प्रेमलता की इन बातों से गवेंद्र का मन साफ हो गया. उसे क्या पता था कि अब उस की जिंदगी कुछ ही घंटों की बची है. रात का खाना बना कर प्रेमलता ने सब को खिलाया. गवेंद्र को खाना खातेखाते ही नींद आने लगी. वह बिस्तर पर जा कर सो गया. प्रेमलता ने बच्चों को भी सुला दिया. जब मोहल्ले में सन्नाटा पसर गया तो उस ने बबलू को फोन कर के आने को कहा.

बबलू तो तैयार ही बैठा था. वह अपने दोनों साथियों, सर्वेंद्र और विनयकांत के साथ आ पहुंचा. प्रेमलता उन्हें उस कमरे में ले गई, जहां गवेंद्र सो रहा था. प्रेमलता ने गवेंद्र को खाने में नींद की गोलियां दे कर सुला दिया था, इसलिए सभी उस की ओर से निङ्क्षश्चत थे.

बबलू गवेंद्र का गला दबाने लगा तो वह जाग गया. उस के विरोध में हुए शोर से दूसरे कमरे में सो रहे उमंग की नींद टूट गई. शोर क्यों हो रहा है, यह जानने के लिए वह उस कमरे में आया तो देखा 4 लोग उस के पापा को दबोचे हुए थे. लेकिन तब तक गवेंद्र मर चुका था.

उमंग को देख कर सभी के होश उड़ गए. जो जहां था, वहीं खड़ा रह गया. अबब की नजरें उमंग पर टिकी थीं. बबलू एकदम से बोला, “यह तो बड़ी गड़बड़ हो गई, इस ने जो देखा है, किसी से भी बता सकता है. अब इसे भी खत्म करना होगा.”

“नहीं, इसे कोई हाथ नहीं लगा सकता. तुम लोग लाश को इसी तरह पड़ी रहने दो. मैं इसे भी संभाल लूंगी और लाश को भी संभाल लूंगी. आगे क्या करना है, यह तुम मुझ पर छोड़ दो.” प्रेमलता ने कहा.

इस के बाद बबलू, सर्वेंद्र और विनयकांत चले गए. उन के जाने के बाद प्रेमलता बेटे को डराती रही कि वह किसी से कुछ नहीं बताएगा. अगर उस ने किसी को कुछ बताया तो वह उसे भी मार देगी. सवेरा होने पर प्रेमलता ने रोरो कर मोहल्ले वालों को इकट्ठा कर के बताया कि गवेंद्र ने आत्महत्या कर ली है. इस के बाद खुद ही थाने जा कर पति की आत्महत्या की सूचना दे दी.

बबलू को उमंग से तो खतरा था ही, ताजमहल में उस ने प्रेमलता के साथ जो फोटो ङ्क्षखचवाए थे, उन से भी वह पकड़ा जा सकता था. इसीलिए वह उन के बारे में पता करने थाने आ गया और पकड़ा गया. सर्वेंद्र और विनयकांत भी उमंग से डर रहे थे, इसलिए उन्होंने उस का अपहरण करना चाहा, लेकिन रामसेवक को इस की भनक लग गई तो उन्होंने इस बात की जानकारी थाना विछवां के थानाप्रभारी जी.पी. गौतम को दे दी. जी.पी. गौतम ने उसे पुलिस सुरक्षा मुहैया करा दी.

पूछताछ के बाद बबलू और प्रेमलता को जेल भेज दिया गया है. फरार सर्वेंद्र और विनयकांत की पुलिस तलाश कर रही है.

मनोहर सिंह यादव ने इस मामले का खुलासा मात्र 9 दिनों में कर दिया. इस से खुश हो कर एसएसपी ने उन्हें 5 हजार रुपए ईनाम दिया है. रेनू और मंसूर अहमद ने जिस तरह सूझबूझ से पकड़वाया, इस के लिए उन्हें भी ढाईढाई हजार रुपए ईनाम दिया गया है.

मां के प्रेम का जब खुला राज – भाग 2

राधा भी बह गई नेत्रपाल के प्यार में

जब वह मुसकान बिखेरती हुई रसोई में गई तो उस की मतवाली चाल देख कर नेत्रपाल का दिल जोरों से धडक़नें लगा. कुछ देर में राधा 2 कप चाय और बिस्कुट ले आई.

चाय पीतेपीते नेत्रपाल ने पूछा, “भाभी, एक बात पूछूं, तुम्हारी आंखों में मुझे एक उदासी सी तैरती दिखती है. तुम भैया के साथ खुश तो हो न..?”

राधा ने घूर कर नेत्रपाल को देखा, “यह खयाल तुम्हारे मन में कैसे आया?”

“बस यूं ही आ गया. तुम्हारे खूबसूरत चेहरे पर मुझे उदासी अच्छी नहीं लगती.”

“माना मैं उदास रहती हूं. अब बताओ, मेरी उदासी दूर करने को तुम क्या कर सकते हो?” अप्रत्याशित सवाल पूछ कर राधा ने अपनी नशीली आंखों से उसे देखा.

“तुम्हें खुश करने के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं.” नेत्रपाल सिंह ने भी कह दिया.

“अच्छा!” राधा ने आंखें नचाईं, “औरत को खुश कैसे रखा जाता है, यह जानते भी हो?”

“भाभी, तुम बताओगी तो जान जाऊंगा. आखिर तुम मेरी प्यारी भाभी हो, इस जहां में सब से अच्छी. सब से सुंदर.” नेत्रपाल ने उस के हाथ पर हाथ रख दिया.

राधा ने अपनी तारीफ, अपनी खूबसूरती के ऐसे बोल पहली बार सुने थे. नारी सुलभ कमजोरी उस पर हावी होने लगी. उस ने कस कर नेत्रपाल सिंह का हाथ पकड़ लिया, “हाथ पकड़ कर कभी छोड़ोगे तो नहीं?”

“कभी नहीं भाभी. मैं तुम्हें अपनी जान से ज्यादा चाहता हूं.” कह कर उस ने राधा को अपनी बांहों में भर लिया. राधा भी उस से लिपट गई. नेत्रपाल ने राधा के शरीर से छेड़छाड़ शुरू की तो राधा का मन भी बेकाबू होने लगा. लेकिन वह उचित समय न था, अपनी ख्वाहिशों में मस्ती भरने का. अत: वह नेत्रपाल की बांहों से छिटक गई.

फिर कामुक निगाहों से उसे देखती हुई बोली, “अभी जाओ, कोई आ जाएगा. रात को आना. मैं जानवरों वाले बाड़े में तुम्हारा इंतजार करूंगी.”

झोपड़ी में हुआ पहला मिलन

नेत्रपाल का दिल बल्लियों उछलने लगा. उस ने अपने कपड़े दुरुस्त किए. इधरउधर नजर दौड़ाई, फिर राधा के घर से बाहर निकल आया.

उस शाम राधा ने जल्दीजल्दी खाना खिला कर बच्चों को सुला दिया. ससुर ओमप्रकाश खेत से आते ही अपनी घासफूस की बनी झोपड़ी में चले गए. वहीं उन्होंने खाना खाया. राधा के पति अश्वनी की उस दिन तबीयत कुछ ठीक नहीं थी. अत: वह भी दवा खा कर बिस्तर पर पड़ते ही सो गया.

राधा ने जल्दीजल्दी रसोई का काम निपटाया और घर का मुख्य दरवाजा बाहर से बंद कर बगल में बने जानवरों के बाड़े में पहुंच गई. फिर वह नेत्रपाल का इंतजार करने लगी. रात के 10 बजतेबजते सिरसा दोगड़ी गांव में सन्नाटा छा गया था.  सब के दरवाजे बंद हो चुके थे. तभी एक साया अश्वनी के जानवरों वाले बाड़े के बाहर दिखाई दिया. उस ने बाड़े के दरवाजे को ढकेला तो वह खुल गया. अंदर मौजूद राधा ने साए को अंदर खींच कर दरवाजा बंद कर लिया. वह नेत्रपाल ही था.

बाड़े के अंदर आते ही नेत्रपाल ने राधा को अपनी बांहों में भरा और दोनों जमीन पर लुढक़ गए. नेत्रपाल ने राधा के कान के पास मुंह ले जा कर फुसफुसाहट की, “सब सो गए?”

“हां, लेकिन ससुर का पता नहीं, कब जाग जाएं. हमारे पास बहुत कम वक्त है. बेटा उठ गया तो रोने लगेगा.”

हसरतें पूरी करने की चाहत से दोनों सराबोर थे. उन के शरीर भी मिलन को बेताब थे. अत: जल्दी ही दोनों एकदूसरे में समा गए. फिर तो असीम सुख प्राप्त करने के बाद ही वे दोनों एकदूसरे से अलग हुए. उस रात को नेत्रपाल के लिए यह पहला स्त्री सुख था, इसलिए वह देर तक राधा को चूमता रहा. राधा के लिए यह पहला मनमुताबिक सुख था. इसलिए वह उस के बाल सहलाती रही. उस के सीने को अंगुलियों से हरारत देती रही. उस रात के बाद राधा और नेत्रपाल जैसे एक जिस्म दो जान हो गए.

उन के अवैध संबंध जारी रहे

अश्वनी तथा उस के पिता ओमप्रकाश सुबह खाना खाने के बाद खेत पर चले जाते थे. फिर शाम को ही आते. दोपहर को राधा अकेली होती थी. दोपहर का सन्नाटा होते ही नेत्रपाल उस के घर में घुस जाता. दोनों की देह एकदूजे से लिपटती, फिर शरीर का कामज्वर उतारने के बाद ही अलग होती.

राधा का जीवन अब मस्ती से भर गया था. वह पूरी तरह अवैध संबंधों के दलदल में फंस चुकी थी. वह पति की उपेक्षा भी करने लगी थी. अश्वनी समझता था कि राधा बच्चों के पालनपोषण व घर के काम में इतनी थक जाती है जिस से वह उस का ध्यान नहीं रख पाती.

नेत्रपाल सिंह जहां राधा से प्यार करता था, वहीं उस के बच्चों को भी दुलारता था और खिलाता पिलाता था. वह जब भी घर आता, बच्चों को बिस्कुट, नमकीन, चिप्स, कुरकुरे आदि जरूर लाता. इन चीजों को पा कर बच्चे खुश हो जाते. राधा की बेटी व बेटा नेत्रपाल को चाचा कह कर बुलाते थे. हालांकि अश्वनी नेत्रपाल का घर आना तथा बच्चों को सामान ला कर देना पसंद नहीं करता था.

नेत्रपाल शातिर दिमाग था. वह खुद तो शराबी था ही, उस ने राधा के पति अश्वनी को भी शराब का चस्का लगा दिया था. सप्ताह में एक या दो बार वह शराब की बोतल ले कर अश्वनी के घर आ जाता फिर थकान मिटाने का बहाना कर उसे शराब पीने को प्रेरित करता. अश्वनी भी नानुकुर के बाद राजी हो जाता. साथसाथ शराब पीने से दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई थी.

नेत्रपाल के अकसर अश्वनी के घर में घुसे रहने पर आसपड़ोस को शक होने लगा तो चौपाल पर दोनों के संबंधों की चर्चाएं होने लगीं. कनबतियां एक कान से होती हुई दूसरे कान तक पहुंचीं और बात ओमप्रकाश के कानों तक पहुंच गई.

सावधान! ऐसे दोस्तों से : दोस्त की बेटी पर बुरी नजर – भाग 2

इसी पूछताछ में पुलिस को पता चला कि नुसरत रईस की चौथी बीवी थी. रईस ने पहला निकाह अमरोहा की शबाना से किया था. उसे तलाक दे कर रईस ने गुइयाबाग निवासी नरगिस से दूसरा निकाह किया था. कुछ दिनों साथ रख कर रईस ने उसे भी छोड़ दिया था. इस के बाद रईस ने लालबाग निवासी रानी से निकाह किया. उसे भी छोड़ कर उस ने 8 साल पहले नुसरतजहां से निकाह किया, जिस से उसे 3 बच्चे थे.

पुलिस ने मृतक रईस मंसूरी के फोन नंबर को सॢवलांस पर लगाया तो वह बंद आ रहा था. लेकिन जांच में पता चला कि उस के फोन की अंतिम लोकेशन 15 दिसंबर की शाम को उसी इलाके में थी, जहां आलम रहता था. इस से यह तो पता चल रहा था कि रईस आलम के यहां गया था, लेकिन वहां जाने के बाद उस का फोन बंद क्यों हो गया? पुलिस को यही पता लगाना था.

पुलिस टीम बखलान के रहने वाले आलम के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. पूछताछ के लिए पुलिस उसे थाने ले आई. अनिल कुमार वर्मा ने आलम से रईस की हत्या के बारे में पूछताछ शुरू की तो वह यही कहता रहा कि उस के यहां इनवर्टर लगाने के बाद रईस चला गया था. इस के बाद वह कहां गया, उसे पता नहीं. वह खुद को बेकुसूर बता रहा था.

पूछताछ के दौरान ही एसएसआई मनोज कुमार सिंह को मुखबिर से पता चला कि मृतक रईस के आलम की बहन से नाजायज संबंध थे. यह बात उन्होंने अनिल कुमार वर्मा को बता दी. जिस तरह क्रूरता से रईस की लाश के टुकड़े कर के उस के गुप्तांग को काट कर फेंक दिया गया था, उस से अनिल कुमार वर्मा को लग रहा था कि हत्या के पीछे प्रेमप्रसंग का मामला है.

मनोज कुमार सिंह की बात ने उन के शक को पुख्ता कर दिया. उन्हें लगा कि आलम झूठ बोल रहा है. इसलिए उन्होंने उस से थोड़ी सख्ती की तो वह सारी सच्चाई बताने को तैयार हो गया. उस ने स्वीकार कर लिया कि रईस मंसूरी की हत्या उसी ने की थी. उस ने उस के सामने ऐसे हालात पैदा कर दिए थे कि उसे उस की हत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा. आलम से पूछताछ में रईस मंसूरी की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

रईस मंसूरी और आलम के पिता जमा खां आपस में अच्छे दोस्त थे. कहा जाता है कि दोनों बिजली की लाइनों का तार चोरी किया करते थे. चोरी किए तार से जो पैसा मिलता था, उसे वे आपस में बांट लेते थे. इसी काम से वे अपनेअपने परिवारों को पाल रहे थे. लेकिन जमा खां की पत्नी को जानकारी नहीं थी कि उस का पति बिजली के तार चोरी करता है. उसे तो जमा खां ने यही बताया था कि वह इलैक्ट्रिशियन है.

करीब 15 साल पहले की बात है. रईस और जमा खां काशीपुर की तरफ बिजली के तार काटने गए थे. जमा खां ने पत्नी को बताया था कि उसे काशीपुर में बिजली फिटिंग का एक बड़ा काम मिला है, रईस के साथ वह उस काम को करने जा रहा है. उस की पत्नी रईस को जानती थी, क्योंकि वह उस के यहां आताजाता रहता था. उस ने कहा था कि वह वहां से कई दिनों बाद लौटेगा. लेकिन वह वहां से जिंदा नहीं लौट सका.

दरअसल, हुआ यह कि जब दोनों रात को काशीपुर के जंगल में 11 हजार वोल्ट की लाइन के तार काट रहे थे, तभी जमा खां को बिजली ने करंट मार दिया. वह खंभे से नीचे गिरा और उस की मौत हो गई. दोस्त को मरा देख कर रईस डर गया. कहीं वह पुलिस के चक्कर में न फंस जाए, वह उसे वहीं छोड़ कर घर चला आया.

अगले दिन लोगों ने खेत में लाश देखी तो इस की सूचना पुलिस को दे दी. पुलिस मौके पर पहुंची तो लाश के पास बिजली के तार काटने के औजार देख कर पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि यह बिजली के तार काटने वाला चोर है और बिजली के करंट की चपेट में आ कर मर गया है. पुलिस ने आवश्यक काररवाई कर के लाश का पोस्टमार्टम कराया और शिनाख्त न होने के बाद अज्ञात मान कर उस का अंतिम संस्कार करा दिया.

इस के बाद एक दिन जमा खां की पत्नी को बाजार में रईस मिला तो वह उसे देख कर चौंकी, क्योंकि उस का पति तो रईस के साथ काम करने काशीपुर गया था. तसलीमा ने उस से पति के बारे में पूछा तो रईस ने बताया कि उस की एक हादसे में मौत हो गई है.

पति की मौत की बात सुन कर तसलीमा चौंकी, “यह तुम क्या कह रहे हो, यह नहीं हो सकता?”

“मैं सच कह रहा हूं भाभी, करंट लगने से जमा खां की मौत हो गई है.” रईस ने कहा.

“यह कैसे और कहां हो गया? तुम ने मुझे बताया क्यों नहीं?” तसलीमा ने पूछा.

“हम दोनों बिजली का तार काटने काशीपुर गए थे. वहीं तार काटते समय उन्हें 11 हजार वोल्ट का करंट लग गया, जिस से वह खंबे से नीचे गिर गया और उस की मौत हो गई.” रईस ने बताया.

“मेरे पति चोर नहीं थे, वह तो इलैक्ट्रिशियन थे. तुम झूठ बोल रहे हो.” तसलीमा रोते हुए बोली.

“नहीं भाभी, मैं बिलकुल सच कह रहा हूं. उन्होंने तुम्हें बताया होगा कि वह इलैक्ट्रिशियन हैं. हकीकत में हम दोनों तार काट कर बेचा करते थे.” रईस ने कहा.

“मुझे तुम्हारी बात पर यकीन नहीं हो रहा. मैं काशीपुर जा कर वहां की पुलिस से मिलूंगी.” तसलीमा ने कहा.

“तुम वहां जाना चाहती हो तो जरूर जाओ. लेकिन वहां जा कर तुम खुद भी फंस सकती हो. वहां की पुलिस ने जब जमा खां की लाश बरामद की थी, तब उस के साथ तार काटने के औजार भी मिले थे. जब तुम वहां जाओगी, पुलिस तुम से कहेगी कि एक चोर की बीवी हो कर तुम ने पुलिस को इस की खबर क्यों नहीं दी?” रईस ने उसे डराने के लिए कहा.

तसलीमा सीधीसादी औरत थी. वह रईस की बातों से डर कर काशीपुर नहीं गई और पति की मौत का गम सीने में दबा कर रहने लगी. उस समय उस का बेटा आलम 13 साल का था.

प्रेम में डूबी जब प्रेमलता – भाग 2

उन्होंने उस लडक़े को प्रेमलता से मिलने की इजाजत तो दे दी, लेकिन महिला सिपाही रेनू सारस्वत को उस के पीछे लगा दिया कि वह किसी भी तरह उन की बातें सुनने की कोशिश करे. रेनू उधर से गुजरी तो लडक़ा कह रहा था, “तुम ने ताजमहल वाले फोटो जला दिए हैं न?”

“हां, जला दिए हैं. तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है?”

यह सुन कर रेनू चौंकी. वह तुरंत मुंशी मंसूर अहमद के पास पहुंची और उन से बता दिया कि प्रेमलता से जो लडक़ा मिलने आया है, वही बबलू है. मंसूर अहमद तेजी से बाहर आए. बबलू को शायद शक हो गया था, इसलिए वह तेजी से बाहर की ओर चला जा रहा था. मंसूर अहमद ने संतरी को आवाज देते हुए तेजी से उस की ओर दौड़े. आखिर उन्होंने उसे दबोच ही लिया.

इस के बाद उसे अंदर ला कर पूछताछ की गई तो एक ऐसी प्रेम कहानी सामने आई, जिस में प्रेम की राह में रोड़ा बनने वाले गवेंद्र सिंह उर्फ नीलू की हत्या कर दी गई थी. यह पूरी कहानी इस प्रकार थी.

उत्तर प्रदेश के जिला मैनपुरी का एक गांव है भरथरा, जहां महेशचंद फौजी परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी, 2 बेटे और 4 बेटियां थीं. प्रेमलता उन में सब से बड़ी थी. उस ने बीए करने के बाद बीएड किया और नौकरी की तलाश में लग गई. इसी के साथ महेशचंद उस की शादी के लिए लडक़ा ढूंढऩे लगे.

महेशचंद की आर्थिक स्थिति ठीकठाक थी, बेटी भी पढ़ीलिखी थी. इसलिए वह उस के लिए खातेपीते परिवार का पढ़ा लिखा लडक़ा तलाश रहे थे. इसी तलाश में उन्हें किसी से जिला एटा के थाना बागवाला के गांव लोहाखार के रहने वाले रामसेवक के बेटे गवेंद्र के बारे में पता चला तो वह उस के घर जा पहुंचे.

रामसेवक का खातापीता परिवार था. उस के पास ठीकठाक जमीन थी. गांव में पक्का मकान था, एक मकान मैनपुरी के नगला कीरतपुर में भी था. गवेंद्र ने पौलिटैक्निक करने के साथ बीए भी कर रखा था. वह नौकरी की तलाश में था.  महेशचंद को गवेंद्र प्रेमलता के लिए पसंद आ गया. उसे लगा कि गवेंद्र को जल्दी ही कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाएगी. उस के बाद उन की बेटी की जिंदगी संवर जाएगी.  उस ने गवेंद्र को प्रेमलता के लिए पसंद कर लिया और उस के साथ प्रेमलता की शादी कर दी.

प्रेमलता ससुराल आ गई. रामसेवक का छोटा सा परिवार था. पतिपत्नी के अलावा एक बेटा और एक बेटी नीरज थी, जिस की वह शादी कर चुके थे. इसलिए घर में सिर्फ 4 ही लोग बचे थे. प्रेमलता को पूरा विश्वास था कि उस के पति को जल्दी ही कहीं न कहीं अच्छी नौकरी मिल जाएगी. वैसे घर में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी, लेकिन पति की कमाई की बात अलग ही होती है.

गवेंद्र नौकरी की कोशिश में लगा था, लेकिन नौकरी मिल नहीं रही थी. इस बीच वह 2 बच्चों उमंग और तमन्ना का पिता बन गया. प्रेमलता खुद भी बीए, बीएड थी. लेकिन बच्चे छोटे थे, दूसरे गवेंद्र नहीं चाहता था कि वह नौकरी करे, इसलिए प्रेमलता ने अपने लिए कोशिश नहीं की.

सन 2012 में गवेंद्र को मैनपुरी के कीरतपुर स्थित सेवाराम जूनियर हाईस्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरी मिल गई. नौकरी भले ही चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की थी, लेकिन सरकारी थी, इसलिए उस ने इसे जौइन कर लिया. लेकिन प्रेमलता को यह नौकरी पसंद नहीं थी, वह शायद किसी अधिकारी की बीवी बनना चाहती थी. चपरासी की बीवी कहलवाना उसे बिलकुल भी पसंद नहीं था. इसलिए उस ने सोचा कि अब उसे ही कुछ करना होगा. वह अपने कैरियर के बारे में सोचने लगी. उस के बच्चे भी बड़े हो गए थे, इसलिए वह खुद कुछ कर के समाज में नाम और पैसा कमाना चाहती थी.

उसी बीच ससुराल जाते समय बस में उस की मुलाकात बबलू से हुई. बबलू भी उसी सीट पर बैठा था. रास्ते में बबलू उस के बच्चों से बातें करतेकरते उस से भी बातें करने लगा. उस ने बताया कि वह आगरा के आईआईएमटी कालेज से जीएनएम (जनरल नॄसग मिडवाइफरी) का कोर्स कर के आगरा के पुष्पांजलि अस्पताल में नौकरी करता है.

जब प्रेमलता ने कहा कि उस ने भी बीए, बीएड किया है, लेकिन लगता नहीं कि उसे नौकरी मिलेगी तो उस ने कहा, “अगर तुम जीएनएम का कोर्स कर लो तो जल्दी ही तुम्हें कहीं न कहीं नौकरी मिल जाएगी. रही बात दाखिले की तो वह तुम मुझ पर छोड़ दो.”

इस के बाद दोनों ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए. 2-4 दिन ससुराल में रह कर प्रेमलता पति के पास आई तो उस ने गवेंद्र से कहा, “भई अब इस तरह काम नहीं चलेगा. बच्चों के भविष्य के लिए मुझे भी कुछ करना होगा. बीए, बीएड से तो नौकरी मिल नहीं सकती, इसलिए मैं जीएनएम का कोर्स करना चाहती हूं. इस से किसी न किसी अस्पताल में नौकरी मिल जाएगी.”

गवेंद्र को लगा कि अब बच्चे समझदार हो गए हैं. ऐसे में प्रेमलता कुछ करना चाहती है तो इस में बुराई क्या है. वह प्रेमलता को जीएनएम का कोर्स कराने के लिए राजी हो गया. गवेंद्र के पिता रामसेवक रिटायर हो चुके थे. इसलिए अब वह भी उसी के साथ रहने लगे थे.

प्रेमलता ने बबलू की मदद से आईआईएमटी में अपना दाखिला करा लिया. बबलू उसे सुनहरे भविष्य का सपना दिखाने लगा. प्रेमलता की पढ़ाई शुरू हो गई. बबलू लायर्स कालोनी में कमरा किराए पर ले कर रहता था. प्रेमलता को भी उस ने उसी कालोनी में कमरा दिला दिया. अब दोनों की रोज मुलाकात होने लगी. बबलू प्रेमलता के कमरे पर भी आनेजाने लगा.

लगातार मिलने और कमरे पर आनेजाने से प्रेमलता और बबलू में प्यार ही नहीं हो गया, प्रेमलता ने उस से शारीरिक संबंध बना कर उस ने रिश्तों की मर्यादा भंग कर दी. सपनों को ख्वाहिश बनाया तो तन और मन से पति से ही नहीं, बच्चों से भी दूर हो गई.

बबलू को जब लगा कि प्रेमलता पूरी तरह से उस की हो गई है तो उस ने उस से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की. तब प्रेमलता ने कहा, “बबलू यह सब इतना आसान नहीं है. क्योंकि गवेंद्र मुझे आसानी से छोडऩे वाला नहीं है.”

“तो ठीक है, मैं उसे रास्ते से हटाए देता हूं.” बबलू ने कहा तो प्रेमलता गंभीर हो कर बोली, “यह तो और भी आसान नहीं है.”

प्रेमलता भी अब गवेंद्र से छुटकारा पा कर बाकी की जिंदगी बबलू के साथ बिताना चाहती थी, लेकिन वह उसे छोड़ कर बबलू से शादी नहीं कर सकती थी. क्योंकि ऐसा करने पर मायके वाले उस का साथ न देते. इसलिए वह बड़ी उलझन में फंसी थी. वह इस बारे में कुछ करती, उस के पहले ही उस की पोल खुल गई.