बदनामी का डर : प्रेमी बना ब्लैकमेलर – भाग 2

हितेश श्वेता के भाई गौरव की पत्नी चेतना के मामा जुगल किशोर जिंदल का बेटा था. वह अपने चाचा पवन कुमार जिंदल के साथ लुधियाना की न्यू फे्रंड्स कालोनी में जिंदल प्रौपर्टी के नाम से प्रौपर्टी का व्यवसाय करता था. श्वेता की तरह वह भी शादीशुदा था. श्वेता की ही तरह वह भी पत्नी से खुश नहीं था.

हितेश की पत्नी हिना लुधियाना की ही रहने वाली थी. श्वेता भी पति से खुश नहीं थी, शायद यही वजह रही कि शादीशुदा होने के बावजूद श्वेता और हितेश पहली ही मुलाकात में एकदूसरे से इस तरह प्रभावित हुए कि एकदूसरे को दिल दे बैठे. शादी के माहौल में साहिल जहां रिश्तेदारों और अन्य कामों में व्यस्त था, वहीं श्वेता हितेश से परिचय बढ़ाने में लगी थी. रिश्तेदारी हो ही गई थी, इसलिए दोनों ने अपनेअपने मोबाइल नंबर एकदूसरे को दे दिए थे.

साहिल तो अगले दिन जगराओं वापस आ गया, पर श्वेता कुछ दिनों के लिए मायके में रुक गई. मौका मिलते ही उस ने हितेश को फोन किया. दूसरी ओर हितेश उस से मिलने के लिए उतावला बैठा था. उस ने श्वेता को मिलने के लिए एक होटल में बुला लिया.

श्वेता ने हितेश के सामने अपने मन की बात रखी तो हितेश ने भी उस से अपने मन की बात बता दी. दोनों ही एकदूसरे की बातों से सहमत थे, इसलिए सारे रिश्तेनाते और अपनीअपनी मर्यादाएं भूल कर उन्होंने होटल के उस एकांत में सारी सीमाएं तोड़ दीं. उन्होंने वहां एक ऐसा रिश्ता कायम कर लिया, जो समाज की नजरों में अवैध था.  लेकिन इस की परवाह न श्वेता को थी और न ही हितेश को. दोनों बेझिझक एकदूसरे से मिलने लगे. कभी हितेश जगराओं चला जाता तो कभी श्वेता लुधियाना आ जाती.

उन का यह खेल बिना किसी रोकटोक के चल रहा था. जब श्वेता रोजरोज लुधियाना जाने लगी तो साहिल ने पूछ लिया कि वह रोजरोज लुधियाना क्यों जाती है? तब उस ने कहा कि उस के सिर में दर्द रहता है, उसी के चैकअप और इलाज के लिए वह लुधियाना जाती है. सीधेसादे साहिल ने उस की बात पर विश्वास कर लिया और संतुष्ट हो कर चुप बैठ गया. क्योंकि उसे पूरा विश्वास था कि एक संभ्रांत परिवार की बहू कोई ऐसा काम कतई नहीं करेगी, जिस से उस की बदनामी हो.

लेकिन यह भी सच है कि पाप कितना भी छिपा कर क्यों न किया जाए, एक न एक दिन उजागर हो ही जाता है. इस का मतलब यही हुआ कि पाप का घड़ा अवश्य फूटता है. वजह चाहे जो भी हो, ऐसा ही श्वेता और हितेश के साथ भी हुआ. दोनों के संबंधों को अब तक लगभग एक साल हो चुका था.

इधर कुछ दिनों से श्वेता को लगता था कि हितेश अपनी सीमाएं लांघने लगा था. वह जरूरत से ज्यादा आगे बढ़ रहा था. वह उस पर इस तरह अधिकार जताने लगा था जैसे उस का पति हो. यही नहीं, हितेश श्वेता से कहने लगा था कि वह साहिल से उस के और अपने संबंधों के बारे में बता कर उस से तलाक ले ले और उस से शादी कर ले. लेकिन श्वेता इस के लिए कतई तैयार नहीं थी.

उस ने हितेश से संबंध अपनी इच्छापूर्ति के लिए बनाए थे. इस के लिए वह हितेश का पूरा खर्च भी उठा रही थी. लेकिन हितेश अब जो चाह रहा था, वह उसे कभी नहीं पूरा कर सकती थी. क्योंकि इस में 2 परिवारों की इज्जत तो जुड़ी ही थी, साहिल और उस की हैसियत में भी बहुत अंतर था. हितेश की हरकतों से तंग आ कर श्वेता ने उस से मिलना बंद कर दिया. तब वह उसे फोन कर के साहिल से तलाक लेने के लिए कहने लगा. अब श्वेता को लगा कि उस से बहुत बड़ी गलती हो गई है.

श्वेता को गलती का अहसास हुआ तो पछतावा भी होने लगा. अब वह उस से संबंध खत्म करना चाहती थी, लेकिन हितेश उसे मजबूर करने लगा था. वह उसे धमकी देने लगा था कि अगर उस ने उस की बात नहीं मानी तो वह साहिल से अपने और उस के संबंधों के बारे में सबकुछ बता देगा.

हितेश के डर से श्वेता अपना पुराना नंबर अकसर बंद रखने लगी. बातचीत के लिए नया नंबर ले लिया. लेकिन हितेश ने उस का नया नंबर भी पता कर लिया.

8 मार्च, 2014 को भी हितेश ने श्वेता के नए नंबर पर फोन कर के धमकी दी थी कि अगर उस ने जल्दी कोई फैसला नहीं लिया तो वह जगराओं आ कर साहिल को सब साफसाफ बता देगा. हितेश की इस धमकी से श्वेता बेचैन हो उठी थी. उस ने हितेश को न जाने कितना समझाया कि उन के बीच जो भी जिस तरह चल रहा है, उसे वैसा ही चलने दे. वह जो चाहता है, वह न ठीक है और न संभव. उस से कई घर बरबाद हो जाएंगे.

लेकिन हितेश उस की बातों को हंसी में उड़ा कर अपनी जिद पर अड़ा रहा. इस से श्वेता और अधिक परेशान रहने लगी थी. उस की परेशानी को साहिल ने ताड़ तो लिया था लेकिन वजह नहीं जान पाया था. उस ने सोचा कि वह श्वेता को समय नहीं दे पाता, शायद इसीलिए वह परेशान रहती है. तभी उस ने 10 मई को बाहर किसी होटल में चल कर डिनर लेने के लिए कहा था.

साहिल वादे के अनुसार शाम को समय से पहले घर आ गया था. श्वेता ने सासससुर के लिए खाना बना कर रख दिया था, इसलिए साहिल के आते ही वह उस के साथ निकल गई थी. साहिल उसे जगराओं के मशहूर होटल स्नेहमून में डिनर के लिए ले गया.

श्वेता साहिल के साथ होटल डिनर ले रही थी, तब भी हितेश बारबार श्वेता को फोन कर के धमकी दे रहा था. परेशान हो कर श्वेता ने अपना फोन बंद कर दिया था. रात के 12 बजे के करीब पतिपत्नी खाना खा कर लौटे. साहिल काफी थका हुआ था, इसलिए लेटते ही सो गया. जबकि चिंता और बेचैनी की वजह से श्वेता को नींद नहीं आ रही थी.

हितेश उतनी रात को भी श्वेता को फोन कर रहा था. श्वेता की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह इस मुसीबत से कैसे छुटकारा पाए. बातचीत से श्वेता समझ गई थी कि हितेश काफी नशे में है. नशे में ही होने की वजह से ही शायद वह उसे और ज्यादा परेशान कर रहा था. उस स्थिति में उसे रोका भी नहीं जा सकता था.

कोई उपाय नहीं सूझा तो श्वेता ने फोन का स्विच औफ कर दिया और आंखें बंद कर के बेड पर साहिल के बगल लेट गई. इस के बाद रात 1 बजे के करीब साहिल के फोन पर किसी का फोन आया. साहिल ने फोन रिसीव किया तो दूसरी ओर से जो भी कहा गया, उसे सुन कर साहिल ने सिर्फ यही कहा, ‘‘रात बहुत हो चुकी है. अभी सो जाओ. इस विषय पर कल सुबह बात करेंगे.’’

फोन रख कर साहिल ने करवट ली तो बगल में श्वेता नहीं थी. उसे लगा, सीढि़यों पर कोई जा रहा है. वह उठ कर सीढि़यों की ओर गया. वहां कोई नहीं था. उसे ऊपर का दरवाजा खुला दिखाई दिया तो वह तेजी से ऊपर की ओर बढ़ा.

छत पर पहुंच कर साहिल ने देखा श्वेता छत की मुंडेर पर चढ़ कर नीचे कूदने की तैयारी कर रही थी. वह ‘श्वेता… श्वेता’ चिल्लाते हुए उसे बचाने के लिए उस की ओर दौड़ा. वह श्वेता के पास पहुंच पाता, उस से पहले ही श्वेता ने छलांग लगा दी. एक जोरदार चीख वातावरण में गूंजी, उस के बाद सब खत्म हो गया.

साहिल जहां था, वहीं घबरा कर रुक गया. जल्दी ही उस ने स्वयं को संभाला और नीचे की ओर भागा. चीख सुन कर साहिल के मातापिता ही नहीं, पड़ोसी भी जाग गए थे. लोग निकल कर बाहर आ गए. श्वेता जमीन पर पड़ी थी. पड़ोसियों की मदद से साहिल ने उसे कल्याणी अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

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बदनामी का डर : प्रेमी बना ब्लैकमेलर – भाग 1

श्वेता बिस्तर पर लेटी जरूर थी, लेकिन नींद न आने की वजह से वह बारबार लंबी सांसें छोड़ कर करवट बदल रही थी. बेचैनी ज्यादा बढ़ जाती तो उठ कर कमरे में ही टहलने  लगती. उस के मन में जो जबरदस्त  अंर्तद्वंद्व चल रहा था, वह उस के चेहरे पर साफ झलक रहा था. उस ने जो गलती की थी, उसी के पश्चाताप की आग में वह जल रही थी. जैसे ही वह अपने अतीत में झांकती, इतना डर जाती कि सांसें तेजतेज चलने लगतीं. इस के बाद वह सोचने लगती कि अतीत में की गई गलती से वह वर्तमान में कैसे छुटकारा पाए. यही बात उस की समझ में नहीं आ रही थी, जो उस की बेचैनी का सबब बनी हुई थी.

श्वेता ने जो गलती की थी, उस बात पर उसे बेहद अफसोस था. उसी गलती ने आज उसे ऐसी जगह पर ला कर खड़ा कर दिया था, जहां से उसे कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. जिंदगी उसे मौत से भी बदतर लग रही थी. इसलिए वह मौत के बारे में सोचने लगी थी, क्योंकि मौत ही अब उसे इस समस्या और चिंता से मुक्ति दिला सकती थी.

लंबी सांस ले कर श्वेता ने खिड़की से दूर क्षितिज की ओर देखा. बाहर गहरा अंधकार और सन्नाटा पसरा हुआ था. एक गलती की वजह से ठीक वैसा ही अंधकार और सन्नाटा उस के जीवन में भी पसर गया था, जिस के लिए वह स्वयं दोषी थी. अगर वह अपनी बेलगाम इच्छाओं और कामनाओं को काबू रखती तो शायद आज यह दिन उसे न देखना पड़ता.

बिना पतवार की नाव की तरह वह भटकतेभटकते एक ऐसे भंवर में फंस गई थी, जहां से निकलने का उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. ऐसे में ही कभी वह अपने 4 वर्षीय बेटे हितेन के बारे में सोचती तो कभी पति साहिल के बारे में. साहिल सिंह सारी चिंताओं से मुक्त एकदम शांति से बिस्तर पर लेटा सो रहा था.

कल तक जो साहिल उसे गंवार, साधारण और भोंदू नजर आ रहा था, इसी वजह से वह उस से घृणा करती थी. आज उसी भोंदू साहिल पर उसे प्यार आ रहा था. लेकिन अब अफसोस इस बात का था कि उस के पास उस से प्यार करने का वक्त नहीं था. अब न ही वह उस से दुख प्रकट कर सकती थी, न ही उस का घर बरबाद होने से बचा सकती थी. समय उस की उच्च महत्त्वाकांक्षाओं और हाईसोसायटी के साथ उस के हाथों से सरक गया था.

श्वेता के पास अब पछताने के अलावा कुछ नहीं बचा था. यहां तक कि उस के पास अपनी गलती का प्रायश्चित करने का भी समय नहीं रह गया था. उस की यह हालत कई दिनों से थी. लेकिन आज जो हुआ था, उस ने उस की बेचैनी को बहुत ज्यादा बढ़ा दिया था. वह अजीब कशमकश में फंसी थी.

बात ऐसी थी कि चाह कर भी वह यह राज किसी को नहीं बता सकती थी. श्वेता जानती थी कि उस ने बहुत बड़ी गलती की थी, लेकिन अब उसे सुधारने का न कोई रास्ता था न समय. वह कई दिनों से उसी गलती की वजह से परेशान थी, जो उस के चेहरे पर साफ झलक भी रही थी. उसे परेशान देख कर साहिल ने पूछा भी था. हर बार वह ‘कोई खास बात नहीं है’, कह कर टाल दिया था.

दरअसल, साहिल अपने कामों में कुछ अधिक ही व्यस्त रहता था, इसलिए श्वेता को बिलकुल समय नहीं दे पाता था. श्वेता के ठीक से जवाब न देने से उसे लगा कि कहीं उसी की वजह से तो वह परेशान नहीं है. इसलिए 10 मार्च की दोपहर को जब वह खाना खाने घर आया तो उस ने कहा, ‘‘श्वेता, आज रात का खाना केवल मां और बाबूजी के लिए ही बनाना. हम दोनों बाहर खाने चलेंगे.’’

अशोक कुमार सिंगला जगराओं शहर के किराना के थोक व्यापारी थे. जगराओं के आतुवाला चौक में उन की बहुत बड़ी दुकान थी. उन का यह व्यवसाय पुश्तैनी था. शहर में उन की गिनती बड़े व्यापारियों में होती थी. जगराओं जैसे छोटे शहर के वह बड़े व्यापारी थे. पास में पैसा था, इसलिए शहर में इज्जत भी थी और रुतबा भी था.

अशोक कुमार सिंगला के परिवार में पत्नी कुसुम के अलावा बेटी शिखा तथा बेटा साहिल सिंह उर्फ रिकी था. शहर के पौश इलाके ग्रेवाल कालोनी में 5 सौ वर्गमीटर में उन की 2 मंजिला विशाल कोठी थी. बेटी की शादी के बाद साहिल पढ़ाई पूरी कर के पिता के साथ दुकान पर बैठने लगा तो वह उस की शादी के बारे में सोचने लगे थे.

2-4 लड़कियां देखने के बाद अशोक कुमार सिंगला ने साहिल की शादी लुधियाना के रहने वाले बृजभूषण गोयल की बेटी श्वेता को पसंद कर के उस के साथ कर दी थी. बृजभूषण का लुधियाना में कपड़े रंगने का व्यवसाय था. श्वेता के अलावा उन का भी एक ही बेटा था गौरव.

लुधियाना जैसे महानगर में पलीबढ़ी श्वेता को जगराओं जैसा छोटा शहर देहात जैसा लगता था. उस का वश चलता तो वह एक पल भी जगराओं में न रुकती. लेकिन मांबाप की इज्जत की खातिर वह स्वयं को ससुराल में व्यवस्थित करने की कोशिश करने लगी थी. इस में वह काफी हद तक सफल भी हो गई थी.

श्वेता को एक बेटा पैदा हुआ तो उस का नाम हितेन रखा गया. चूंकि श्वेता उच्चशिक्षा प्राप्त थी और उस ने महानगर और कालेज की रंगीनियों में दिन गुजारे थे, इसलिए कभीकभी न चाहते हुए भी उस के मन को भटका देते थे. घर में पड़ेपड़े श्वेता का दम घुटने लगा तो उस ने लैपटौप खरीद लिया. नेट लगवा कर वह उसी पर समय काटने लगी.

कोई चिंता उसे थी नहीं, उतनी बड़ी कोठी में सास कुसुम के अलावा और कोई नहीं होता था. वह भी ज्यादातर बीमार ही रहती थीं.  नेट से भी मन भर जाता तो श्वेता समय काटने के लिए कार ले कर निकल पड़ती. जगराओं में ऐसा कुछ था नहीं, जहां वह समय गुजारती. इसलिए वह लुधियाना चली जाती. सिंगला परिवार इस का बुरा भी नहीं मानता था.

श्वेता खुले विचारों की आधुनिक युवती थी, जिस से वह आजाद पंछी की तरह हवा में उड़ना चाहती थी. जबकि उस की ससुराल वाले धार्मिक प्रवृत्ति के थे, इसलिए वो आजकल की चकाचौंध और फैशनपरस्ती से काफी दूर थे. यही वजह थी कि ससुराल उसे कैदखाने की तरह लगती थी.

श्वेता कुछ मांबाप की इज्जत का खयाल कर रही थी तो कुछ समाज का, इसीलिए वह साहिल के साथ दांपत्य की गाड़ी खींच रही थी. क्योंकि साहिल उसे भोंदू, गंवार और बेवकूफ लगता था. शायद इसीलिए एक दिन दांपत्य की इस गाड़ी को ऐसा झटका लगा कि श्वेता की गाड़ी दूसरी पटरी पर चली गई.

पिछले साल मई में श्वेता के भाई गौरव की शादी थी. उस के भाई की शादी थी, इसलिए शादी में शामिल होने के लिए वह तो आई ही थी, पति और सासससुर भी शादी में शामिल होने आए थे. यह शादी लुधियाना के गुलमोहर पैलेस में हो रही थी. इसी शादी में श्वेता की मुलाकात हितेश जिंदल से हुई.

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मांगा सुहाग मिली मौत – भाग 3

आखिर जब नहीं रहा गया तो एक रात बिस्तर पर उस ने पति को समझाने की कोशिश की, ‘‘तुम जिस रास्ते पर चल रहे हो, वह अच्छा नहीं है. तुम उस दो टके की औरत के पीछे ऐसे दीवाने हो गए हो, जैसे कोई पागल सांड़ भरी बाजार में बलबला उठता है. मेरा नहीं तो कम से कम अपने बेटे के बारे में सोचो. कल जब वह बड़ा होगा तो तुम्हारा नाम ले कर लोग ताना नही मारेंगे.’’

प्रेम केसरवानी समझ गया कि पत्नी को सब पता चल गया है. वह सिर झुकाए बैड पर बैठा रहा. संगीता आगे बोली, ‘‘आखिर सुशीला में कौन से मोती जड़े हैं? क्या मुझ से ज्यादा उस के अंदर तुम्हें गरमी मिलती है? प्रेम, मैं तुम्हारी पत्नी हूं और सुशीला… सुशीला गंदी नाली का कीड़ा है. वह औरत लटकेझटके दिखा कर तुम्हें तो चूस ही रही है. साथ में तुम्हारी दौलत पर भी उस की नजर लगी हुई है.’’

संगीता ने हर तरह से पति को समझाया, लेकिन संगीता की कोई बात प्रेम की खोपड़ी में नहीं घुसी. उस ने बातें एक कान से सुनीं और दूसरे से निकाल दीं. दरअसल, सुशीला की चाहत में वह इतना आगे निकल चुका था कि वहां से पीछे लौटना अब उस के बस की बात नहीं थी. फिर भी संगीता ने पति का साथ नहीं छोड़ा और उस के पीछे पड़ी रही. सुशीला और प्रेम केसरवानी लव अफेयर की कहानी आगे बढ़ती रही. एकदूसरे को पाने के लिए वे दोनों हमेशा छटपटाते रहते और जब कभी एकांत में मिलने का अवसर मिलता तो आंधीतूफान की तरह एकदूसरे में समा जाते थे. तन की आग बुझ जाती, किंतु मन की प्यास हमेशा बनी रहती.

जैसेजैसे दिन बीतते जा रहे थे, वैसेवैसे संगीता की चिंता बढ़ती जा रही थी. उसे सब कुछ गंवारा था, लेकिन सुहाग का बंटवारा मंजूर न था. इसी चिंता में एक रोज संगीता सुशीला की पान की दुकान पर जा पहुंची. वहां उस ने सुशीला को खूब खरीखोटी सुनाई और पति से दूर रहने की चेतावनी दी. सुशीला मुंहफट थी. संगीता की चेतावनी से न वह डरी न सहमी. वह बेहयाई से बोली, ‘‘अपने खसम को अपने पल्लू से बांध कर रखो. मैं उसे बुलाने नहीं जाती, बल्कि वही कुत्ते की तरह दुम हिलाता हुआ मेरी चौखट पर आ जाता है. समझा देना उसे कि वह मेरे घर न आया करे.’’

संगीता ने मुंहफट औरत के मुंह लगना उचित नहीं समझा और वापस घर आ गई. वह अपनी किस्मत पर रोती रही. इधर प्रेम को पता चला कि संगीता उस की प्रेमिका की दुकान पर उलाहना देने गई थी तो उस का गुस्सा बढ़ गया. देर रात जब वह घर आया तो उस की संगीता से तकरार हुई और नौबत मारपीट तक आ गई. धीरेधीरे पतिपत्नी के बीच दूरियां और बढ़ गईं. प्रेम को इस के बावजूद कोई परवाह नहीं थी. तब संगीता ने भी अपना दिल कठोर कर लिया. उसे अब अपने बेटे की चिंता थी. उस ने सब कुछ नियति पर छोड़ दिया था.

इधर सुशीला ने संगीता को फटकार तो दिया था, लेकिन उस के मन में डर समा गया था कि कहीं संगीता का विरोध भारी न पड़ जाए और वह प्रेम को उस से छीन ले. इसी डर के चलते उस शाम वह प्रेम के साथ रेस्टोरेंट पहुंची थी और अपनी चिंता से प्रेम को अवगत कराते हुए संगीता के डर से निजात दिलाने की बात कही थी.

सुशीला रखैल के बजाय बनना चाहती थी पत्नी…

सुशीला चालाक औरत थी. वह प्रेम की रखैल बन कर नहीं रहना चाहती थी. बल्कि उस की पत्नी बनने का सपना संजोने लगी थी. इस सपने को पूरा करने के लिए वह तानाबाना बुनने लगी थी. हालांकि प्रेम सुशीला का पूरा खर्च उठाता था और आर्थिक मदद भी करता था, लेकिन सुशीला इस से संतुष्ट नहीं थी.

एक रोज शाम को प्रेम केसरवानी सुशीला के घर पहुंचा तो घर पर वह अकेली थी. उस के बच्चे ननिहाल गए थे. प्रेम को देख कर सुशीला बहुत खुश हुई. दोनों कुछ देर हंसतेबतियाते रहे फिर साथ बैठ कर खाना खाया. उस रोज सुशीला ने मीट पकाया था, सो खाते वक्त उस ने मीट पकाने के लिए सुशीला की जम कर तारीफ की. रात 10 बजे प्रेम घर जाने लगा तो उस ने बहाने से उसे रोक लिया. प्रेम भी यही चाहता था, इसलिए वह रुक गया. थोड़ी देर बाद दोनों बिस्तर पर पहुंच गए.

सुशीला कुछ देर प्रेम की बांहों में मचलती रही फिर बोली, ‘‘प्रेम एक बात पूछूं, सचसच बताना.’’

“पूछो, क्या जानना चाहती हो?’’

“तुम मुझ से जिस्मानी प्यार करते हो या सच्चा प्यार…’’

“मैं तुम से सच्चा प्यार करता हूं. यकीन न हो तो आजमा कर देख लो.’’ प्रेम बिना सोचेसमझे बोल गया.

“तो फिर कल बारादेवी मंदिर चलो और मां को साक्षी मान कर मेरी मांग में सिंदूर भर दो. अब मैं तुम्हारी रखैल बन कर नहीं, बल्कि पत्नी बन कर रहना चाहती हूं. पत्नी का दरजा मिल जाएगा तो तुम्हारी धनदौलत और मकान पर भी मेरा हक होगा.’’ सुशीला की बात सुन कर प्रेम सन्न रह गया. वह जान गया कि सुशीला के मन में लालच समा गया है. वह उस की पत्नी बनने और संपत्ति हथियाने का ख्वाब देखने लगी है. प्रेम शादीशुदा ही नहीं, एक बच्चे का बाप भी था. अत: वह सुशीला की बात कैसे मान लेता.

प्रेम कुछ देर सोचता रहा फिर बोला, ‘‘सुशीला, मुुझे कुछ वक्त दो ताकि मैं तुम्हारा ख्वाब पूरा कर सकूं. क्योंकि सब जानते हैं कि एक म्यान में 2 तलवारें नहीं रह सकतीं. संगीता तुम्हें सौतन के रूप में कभी स्वीकार नहीं करेगी. कहीं अलग प्लौट मकान ले कर तुम्हें बसाना होगा.’’

“ठीक है, मैं तुम्हारी बात से सहमत हूं. लेकिन जल्दी ही इंतजाम करो.’’ इस के बाद प्रेम केसरवानी परेशान रहने लगा. उस ने सुशीला से मिलनाजुलना भी कम कर दिया. अब वह तभी उस के घर जाता, जब वह जिद कर उसे बुलाती. हर बार वह अपनी बात मनवाने का दबाव डालती.

दे दी हत्या की सुपारी…

प्रेम केसरवानी का एक दोस्त राजेश गौतम उर्फ छोटू था. वह पनकी में रहता था और अपराधी किस्म का था. एक शाम प्रेम ने उसे सीटीआई चौराहा स्थित शराब ठेके पर बुला लिया. वहां बैठ कर पहले दोनों ने शराब पी, फिर प्रेम ने उसे अपनी समस्या बताई और किसी तरह समस्या से निजात दिलाने की बात कही. दोस्त की समस्या से छोटू के माथे पर बल पड़ गए. लेकिन उस ने प्रेम को निजात दिलाने का भरोसा दिया.

मांगा सुहाग मिली मौत – भाग 4

एक रोज प्रेम केसरवानी किसी काम से पनकी गया तो उसे छोटू की याद आ गई. तब उस से मिलने उस के घर जा पहुंचा. राजेश गौतम उर्फ छोटू उस समय घर पर ही था. बातचीत करते हुए प्रेम ने पूछा, ‘‘छोटू, तुम ने हमारी समस्या का कोई हल ढूंढा या फिर यूं ही आश्वासन दे रहे थे?’’

“तुम्हारी समस्या का एक ही हल है कि तुम अपनी प्रेमिका सुशीला का काम तमाम करा दो. लेकिन इस के लिए तुम्हें पैसा खर्च करना पड़ेगा,’’ छोटू ने प्रेम को सुझाव दिया. “ठीक है, मैं तैयार हूं.’’ इस के बाद प्रेेम ने सुशीला की हत्या की सुपारी 70 हजार रुपए में राजेश गौतम उर्फ छोटू को दे दी.

रकम मिलने के बाद छोटू ने हत्या की योजना बनाई और रुपयों का लालच दे कर अपने अपराधी दोस्त अजय, दिनेश व सनी को शामिल कर लिया. ये तीनों मन्नीपुरवा (मैथा) के रहने वाले थे. हत्या की योजना बनाने के बाद राजेश गौतम ने प्रेम को वह सुनसान जगह दिखा दी, जहां सुशीला को ठिकाने लगाना था. उस ने दिन, तारीख व समय भी निश्चित कर दिया. सुशीला को उस स्थान तक लाने की जिम्मेदारी प्रेेम को सौंपी गई.

योजना के तहत 3 दिसंबर, 2022 की शाम 4 बजे प्रेम सुशीला की पान की दुकान पर पहुंचा और प्लौट देखने के लिए साथ चलने को कहा. सुशीला ने दुकान बंद की और प्रेम की स्कूटी पर बैठ कर चल दी. प्रेम सूरज छिपने तक सुशीला को इधरउधर घुमाता रहा, फिर किसान नगर होता हुआ जामू नहर पुल के पास पहुंचा. यहां राजेश गौतम उर्फ छोटू अपने साथी अजय, दिनेश व सनी के साथ खड़ा था. अब तक हलका अंधेरा छा चुका था.

प्रेमी ने कराया मर्डर…

सुशीला जैसे ही प्रेम की स्कूटी से उतरी, तभी राजेश व उस के साथियों ने उसे दबोच लिया और अजय ने तमंचा निकाल कर उस के सीने में 2 फायर झोंक दिए. सुशीला की मौके पर ही मौत हो गई. प्रेम दूर खड़ा करीब 10 मिनट तक देखता रहा कि सुशीला की सांसें चल रही हैं या नहीं. जब उसे विश्वास हो गया कि सुशीला की सांसें थम गई हैं तब वह भी वहां से फरार हो गया. हत्या के बाद राजेश व उस के साथी भी फरार हो गए. प्रेमिका की हत्या हो जाने के बाद प्रेम ने राहत की सांस ली यानी प्रेमी कातिल बन गया.

सुबह जामू गांव के बाहर नहर पुल के पास झाडिय़ों के किनारे कुछ लोगों ने एक महिला की लाश देखी तो उन्होंने सूचना ग्राम प्रधान जनार्दन सिंह को दी. ग्राम प्रधान ने थाना विधनू पुलिस को खबर दी तो मौके पर एसएचओ योगेश सिंह, एसीपी (नौबस्ता) अभिषेक कुमार तथा एडिशनल डीसीपी अंकिता शर्मा आ गईं. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर डौग स्क्वायड व फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. सभी अपनेअपने काम में जुट गए. पुलिस

अधिकारियों ने जहां घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया तो पता चला कि महिला की हत्या सीने में गोली मार कर की गई थी. उस की उम्र 40 वर्ष के आसपास थी. वह पीले रंग की साड़ी व गुलाबी रंग का स्वेटर पहने थी. महिला की शिनाख्त नहीं हो पाई थी. तब पुलिस ने उस के शव को पोस्टमार्टम हाउस हैलट अस्पताल भेज दिया.

इधर रात 10 बजे तक जब सुशीला घर नहीं पहुंची तो उस के बेटे को चिंता हुई. वह और उस की बहन रात भर मां के आने का इंतजार करते रहे. सुबह वे दोनों मां की पान की दुकान पर पहुंचे तो दुकान बंद थी. मां का जब पता नहीं चला तो बेटा थाना गुजैनी जा पहुंचा. उस ने थानाप्रभारी को मां के लापता होने की बात बताई. थाने में उसे पता चला कि विधनू थाना पुलिस ने एक अज्ञात महिला की लाश बरामद की है. तब वह थाना विधनू पहुंच गया.

एसएचओ योगेश सिंह ने जब उसे लाश की फोटो दिखाई तो वह फफक पड़ा और बताया कि यह लाश उस की मां सुशीला की है. लाश की शिनाख्त होने के बाद एसएचओ योगेश सिंह ने मृतका के बेटे से सहानुभूतिपूर्वक पूछताछ की तो पता चला कि वरुण विहार (बर्रा) का रहने वाला प्रेम केसरवानी उन के घर आताजाता था. मां सुशीला से उस की दोस्ती थी. वह रात में भी उस के घर रुक जाता था. इस से पुलिस को यह शक हो गया कि सुशीला के प्रेमी ने ही मर्डर कराया है.

प्रेम केसरवानी शक के दायरे में आया तो योगेश सिंह ने उस की तलाश शुरू कर दी. फिर छापा मार कर उसे उस के घर से ही हिरासत में ले लिया. प्रेम केसरवानी को थाना विधनू लाया गया. उस से जब सख्ती से पूछताछ की गई तो तो उस ने सारा रहस्य उगल दिया. प्रेम ने बताया कि सुशीला से उस का नाजायज रिश्ता था, लेकिन वह उस पर पत्नी का दरजा देने का दबाव बना रही थी और संपत्ति में हक मांग रही थी. इसी कारण उस की हत्या की सुपारी अपने दोस्त पनकी निवासी राजेश गौतम उर्फ छोटू को 70 हजार रुपए में दी. उस ने अपने साथी अजय, दिनेश व सनी के साथ मिल कर सुशीला की हत्या कर दी.

इस के बाद एसएचओ योगेश सिंह ने अपनी पुलिस टीम के साथ छापा मार कर पहले राजेश गौतम उर्फ छोटू को भाटिया तिराहा से गिरफ्तार किया. फिर उस के साथी सनी व अजय गौतम को गड़ेवा नहर पुल के समीप धर दबोचा. राजेश, अजय व सनी ने भी सुशीला की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. उन का एक साथी दिनेश पुलिस के हाथ नहीं आया.

अजय गौतम के पास से पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त .315 बोर का एक तमंचा तथा 2 जिंदा कारतूस बरामद किए. प्रेम ने भी अपनी स्कूटी बरामद करा दी. कानपुर (विधनू) के सुशीला मर्डर केस की शिनाख्त हो जाने के बाद पुलिस ने सभी आरोपियों को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. एक अन्य आरोपी दिनेश फरार था. पुलिस उसे तलाश रही थी.

-कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मांगा सुहाग मिली मौत – भाग 2

सुशीला उम्र मेंं उस से बड़ी थी, इसलिए प्रेम उसे भाभी कहता था और हंसीमजाक भी कर लेता था. सुशीला उस के मजाक का बुरा नहीं मानती थी. अब वह उस के घर भी आने लगा था. सुशीला का सौंदर्य उसे विचलित भी करने लगा था. हंसीमजाक के दौरान प्रेम उस के शरीर को स्पर्श करने से भी नहीं चूकता था. सुशीला बुरा मानने के बजाय मुसकरा कर कह देती, ‘‘आजकल तुम बड़े शरारती हो गए हो. ऐसी हरकतें अच्छी नहीं होतीं. कोई देख लेगा तो..?’’

“कोई देख लेगा तो क्या हो जाएगा भाभी?’’ प्रेम पूछ बैठता.

“तुम्हारा तो कुछ नहीं होगा प्रेम, लेकिन मैं बदनाम हो जाऊंगी.’’ हालांकि सुशीला प्रेम की हरकतों से मन ही मन खुश होती थी और उस का शरीर रोमांच से भर उठता था. प्रेम का घर आना सुशीला को अच्छा लगने लगा था. वह जब भी आता, उस के बच्चों को खानेपीने की कुछ चीजें जरूर लाता, जिस से बच्चे भी उस से घुलमिल गए थे.

एक दिन प्रेम उस के घर आया हुआ था, तभी सुशीला नहा कर बाथरूम से निकली थी. उस के बदन पर पानी की बूंदें मोती की तरह चमक रही थीं. प्रेम को देख कर सुशीला बड़ी अदा के साथ जुल्फों को झटक कर अंदर वाले कमरे में चली गई. कुछ देर बाद सुशीला आई और चाय बना कर लाई. दोनों ने साथ बैठ कर चाय पी, साथ में मुसकरा कर 2-4 बातें कीं. प्रेम उस की इन्हीं अदाओं पर मर मिटा. सुशीला जब हंसती थी तो लगता था, जैसे चूडिय़ां खनक उठी हों. उभारों की बनावट कुछ ऐसी थी जैसे लगता था कि यौवन चोली फाड़ कर बाहर आ जाएगा. यह सब प्रेम के दिमाग में बस गया था.

उस दिन प्रेम का काम में मन नहीं लगा और रात को भी उसे नींद नहीं आई. बिस्तर पर पूरी रात वह करवटें बदलता रहा. पत्नी संगीता ने 2-4 बार पूछा भी था कि आखिर बात क्या है तो उसे बहुत बुरा लगा था. प्रेम चाहता था कि उस की कल्पनाओं में कोई खलल न डाले और वह सुशीला के साथ सपने सजाता रहे. सुबह हुई, तब भी प्रेम का मन किसी काम में नहीं लगा. वह अपनी गोदाम पर गया जरूर था, लेकिन उस का दिलदिमाग सुशीला के घर पर ही था. उस के एकएक अंग प्रेम की आंखों के सामने मचल उठते थे. मन करता कि वह अभी उठे और सुशीला के पास पहुंच जाए.

शुरू हुई अवैध संबंधों की कहानी…

उधर सुशीला का भी कुछ यही हाल था. प्रेम जिन लच्छेदार बातों का सिलसिला वहां छोड़ कर आया था, सुशीला अभी तक उसी में उलझी हुई थी. दिनरात प्रेम केसरवानी की बातें उस के कानों में शहद की तरह टपकती रहतीं और उस पर मदहोशी का आलम छाया रहता. सोतेजागते अब उस की नजरों के आगे प्रेम ही प्रेम दिखाई पड़ता.

दरअसल, सुशीला तन्हा जिंदगी बिता रही थी. पति से अब उसे कोई मतलब न था. अत: वह प्रेम में पति का अक्स तलाशने लगी थी. मोहब्बत की यही तो निशानी है. हीररांझा, लैलामजनूं और न जाने कितने प्रेमीप्रेमिका चाहत की मंजिल पाने को कुरबान हो गए. अब सुशीला और प्रेम भी उसी रास्ते पर चल पड़े थे. रात होते ही सुशीला का दिल मचलने लगता, तनमन बेकाबू हो उठता और इच्छा होती कि प्रेम उसे अपनी बांहों में भर कर खूब प्यार करे.

एक रोज सुबह प्रेम केसरवानी अपनी दुकान जा रहा था. वह विल्स चौराहा पहुंचा तो देखा कि सुशीला की पान की दुकान बन्द है. वह सोचने लगा, ‘‘सुशीला तो सुबह 10 बजे के पहले ही दुकान पर आ जाती थी, फिर आज बंद क्यों है? कहीं कुछ..?’’ मन में उलटेसीधे विचार आए तो प्रेम ने अपनी स्कूटी सुशीला के घर की ओर मोड़ दी. चंद मिनटों में ही वह सुशीला के घर पहुंच गया. सुशीला घर में बैड पर लेटी थी. वह उसे देख कर तड़प उठा, ‘‘यह क्या सुशीला, तुम्हारा चेहरा इतना उतरा हुआ क्यों है? तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’

“नहींनहीं, बस यूं ही थोड़ा बुखार आ गया था.’’ सुशीला ने बिस्तर से उठने का प्रयास करते हुए कहा, ‘‘तुम खड़े क्यों हो? बैठो न प्रेम.’’

“बच्चे दिखाई नहीं पड़ रहे हैं. कहीं गए हैं क्या?’’ प्रेम ने दाएंबाएं नजर दौड़ा कर पूछा.

“बेटी स्कूल गई है और बेटे को सामान लेने बाजार भेजा है.’’

प्रेम को लगा कि यह उचित मौका है. आज उसे अपने दिल की बात कह देनी चाहिए. वह धीरे से बैड पर उसी के बगल में बैठ गया और एकटक उसे निहारने लगा. सुशीला ने उसे इस तरह निहारते देखा तो बोली, ‘‘प्रेम, तुम मुझे इस तरह क्यों देख रहे हो. दिल में जो भी बात हो, बता दो.’’

“बता दूं?’’ कहते हुए प्रेम एकदम उस के चेहरे पर झुक गया. उस की आंखों में उसी की तसवीर थी. सुशीला की सांसें गरम हो उठीं. दिल की धडक़नें बढ़ गईं. प्रेम का अंगअंग भी फडक़ने लगा. मदहोशी के आलम में उस का एक हाथ सुशीला के कमर में पहुंच गया और दूसरा छाती पर रेंगने लगा तो सुशीला के भीतर जैसे तूफान मचल उठा. वह सिसियाकर प्रेम से लिपट गई, ‘‘बस, अब और अधिक मत तड़पाओ.’’

प्रेम केसरवानी तो यही चाहता था. सुशीला का आमंत्रण पाते ही उस ने उसे अपनी बलिष्ठ भुजाओं में जकड़ लिया. सुशीला भी उस से लता की भांति लिपट गई. दोनों के बीच खड़ी शर्मोहया की दीवार कुछ ही पलों में तहसनहस हो गई. उन के बीच एक बार अनैतिक संबंध कायम हुए तो फिर यह सिलसिला शुरू हो गया. जब भी समय मिलता वे दोनों एकदूसरे में समा जाते. फिर भी लोगों को उन के प्रेम संबंधों का पता चल ही गया. वे जान गए कि सुशीला और प्रेम के बीच नाजायज रिश्ता है. लेकिन लोगों की परवाह न सुशीला ने की और न ही प्रेम ने. वे दोनों अपनी ही मस्ती में डूबे रहे.

प्रेम की पत्नी को लग गई अवैध संबंधों की भनक…

सुशीला से प्रेम का रिश्ता जुड़ा तो उस की अपनी पत्नी संगीता में दिलचस्पी कम हो गई. वह उस की उपेक्षा करने लगा. प्रेम कभी घर आता तो कभी नहीं भी आता. संगीता पूछती तो बहाना बना देता. संगीता ने जब इस की वजह जाननी चाही तो उस के हाथों के तोते उड़ गए. पता चला कि प्रेम आजकल सुशीला नाम की औरत के साथ अपनी खुशियां बांटता है. तब तो संगीता के होश उड़ गए. वह सोचने लगी कि आखिर सुशीला में ऐसा क्या है, जो उस में नहीं है. संगीता का सिर चकराने लगा. उसे अपनी हरीभरी दुनिया उजड़ती नजर आने लगी.

मांगा सुहाग मिली मौत – भाग 1

कानपुर शहर के दक्षिण में बने एक रेस्टोरेंट की केबिन में बैठे प्रेम और सुशीला अपलक एकदूसरे की आंखों में झांक रहे थे. उन्होंने एकदूसरे का हाथ ऐसे पकड़ रखा था, जैसे आज के बाद फिर कभी न मिलने का डर सता रहा हो. काफी देर तक उन के बीच खामोशी छाई रही, फिर सुशीला ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘प्रेम, तुुम पास होते हो तो जिंदगी बहुत सुहानी लगती है. दिल करता है कि बस यूं ही तुम्हारी आंखों में झांकते हुए तमाम उम्र गुजार दूं.’’

सुशीला के दिल में एक अजीब सी बेचैनी थी. होंठ थरथरा रहे थे. कहने लगी, ‘‘मैं जानती हूं कि तुम मुझे अपनी जान से भी ज्यादा चाहते हो. फिर भी न जाने क्यों मेरा दिल घबरा रहा है. ऐसा लग रहा है प्रेम, जैसे तुम मुझ से बहुत दूर जाने वाले हो.’’ सुशीला की आंखें भर आई थीं. उस ने धीरे से अपना सिर प्रेम की छाती पर टिका दिया था, ‘‘तुम कुछ बोलते क्यों नहीं? खामोश क्यों हो? तुम्हारी खामोशी तो मुझे आने वाले किसी तूफान का दस्तक दे रही है.’’

“घबराओ मत सुशीला, धैर्य रखो और हिम्मत से काम लो.’’ प्रेम ने सुशीला की जुल्फों में अपनी अंगुलियां फिराते हुए कहा, ‘‘मैं जानता हूं कि तुम्हारे डर की वजह क्या है, तुम संगीता के बारे में सोच रही हो न?’’

सुशीला चौंक पड़ी, ‘‘तुम्हें कैसे पता?’’

“वह मेरी पत्नी है और तुम मेरी धडक़न. मैं खुद से ज्यादा तुम्हें जानता हूं. तुम्हारी इन आंखों में कौन सा सपना है, मुझे सब पता है.’’

“तुम सही कह रहे हो प्रेम, लेकिन संगीता के डर से निजात भी तुम्हीं दिला सकते हो, सिर्फ तुम ही.’’

सुशीला उत्तर प्रदेश के कानपुर (देहात) के गजनेर कस्बा के रहने वाले रामकुमार की बड़ी बेटी थी. उस से छोटी शीला थी. सुशीला का कोई भाई नहीं था, इसलिए उन दोनों बहनों को ही घरपरिवार वाले लडक़ों की तरह चाहते थे. पिता रामकुमार व चाचा शिवकुमार, सुशीला व शीला से बहुत प्यार करते थे. उन दोनों की छोटी से छोटी फरमाइश का उन्हें पूरा खयाल रहता था.

रामकुमार की बड़ी बेटी सुशीला दिखने में सुंदर थी. प्रकृति ने न केवल उसे रूपसौंदर्य से सजाया था, बल्कि उसे स्वभाव भी बड़ा मिलनसार दिया था. उस का यही मोहक अंदाज हर किसी के मन को मोह लेता था. उस का यह माधुर्य रूप जहां युवकों की आंखों में यौवन का खुमार पैदा करता था, वहीं उस की सहेलियों में इष्र्या की भावना. सुशीला इन सभी बातों को समझते हुए भी अपने आप में मस्त रहती थी. जब भी उस की कोई सहेली कुछ व्यंग्य करती तो वह उसे हंस कर टाल देती थी.

महत्त्वाकांक्षी थी सुशीला…

बेटी के शरीर पर यौवन का भार लदता देख कर उस के पिता ने उस की शादी कानपुर शहर के बर्रा भाग 8 निवासी रामबाबू उर्फ पप्पू से कर दी. पप्पू मूलरूप से औरैया जिले के गांव मटेरा का रहने वाला था. मातापिता गांव में रहते थे. उन के पास खेती की जो थोड़ीबहुत जमीन थी, उस की खेती से घर का खर्च चलाते थे. पप्पू रोजीरोटी की तलाश में कानपुर शहर आ गया था. वह दादा नगर स्थित गत्ता बनाने वाली फैक्ट्री में काम करता था.

रामबाबू उर्फ पप्पू गठीला युवक था. सुशीला के रूप में सुंदर पत्नी पा कर वह निहाल हो गया था. विवाह के शुरुआती दिनों में पतिपत्नी के बीच शारीरिक आकर्षण ही प्रमुख रहता है. तब मन में झांकने की फुरसत नहीं होती. बस, दोनों एकदूसरे को अच्छे लगते हैं. ऐसा ही रामबाबू और सुशीला के बीच भी हुआ. लेकिन जब धीरेधीरे शारीरिक आकर्षण ठंडा पड़ा तो रामबाबू को पता चल गया कि सुशीला बहुत महत्त्वाकांक्षी किस्म की औरत है. वह रामबाबू से तरहतरह की फरमाइशें करने लगी.

प्राइवेट नौकरी करने वाला रामबाबू उस की हर फरमाइश पूरी करने में असमर्थ था. सुशीला इस बात को नहीं समझती थी बल्कि लड़ाईझगड़े पर उतर आती थी. कुछ ही सालों में दोनों का दांपत्य जीवन कड़वाहट से भर गया. कई बार तो दोनों में मारपीट तक हो जाती और फिर महीनों तक बोलचाल बंद रहती. इसी बीच सुशीला 2 बच्चों की मां बन गई. 2 बच्चों की मां बनने के बाद भी सुशीला के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया.

पारिवारिक कलह से निजात पाने के लिए रामबाबू उर्फ पप्पू ने शराब का सहारा लिया. बाद में वह उस का आदी हो गया. खालिस शराब और घर की किचकिच से उस का स्वास्थ्य गिरता चला गया. इस का नतीजा यह हुआ कि उस की नौकरी छूट गई, वह दरदर भटकने लगा और एकएक पैसे को मोहताज हो गया. पत्नी सुशीला ने भी उस से किनारा कर लिया था. अत: रामबाबू अपने गांव में आ कर रहने लगा और पिता के साथ खेती के काम में हाथ बंटाने लगा. उस ने भी पत्नी से किनारा कर लिया.

सुशीला ने भी पति की कोई सुध नहीं ली और वह दोनों बच्चों के साथ रहने लगी. बच्चों के पालनपोषण के लिए उस ने दादानगर स्थित प्लास्टिक की एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली. लेकिन फैक्ट्री में उस का ज्यादा दिनों तक मन नहीं लगा, अत: उस ने नौकरी छोड़ कर बर्रा के विल्स चौराहे पर पान की दुकान खोल ली. शुरू में तो दुकान कम चली, लेकिन बाद में ग्राहकों की संख्या बढ़ती गई और दुकान से आमदनी होने लगी.

सुशीला 30 साल की उम्र पार कर चुकी थी, इस के बावजूद भी उस की खूबसूरती में कोई खास कमी नहीं आई थी. उस का मांसल शरीर तथा बड़ीबड़ी आंखें किसी को भी अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम थीं. वह सजधज कर पान की दुकान पर बैठती थी. उस ने अपने कुशल व्यवहार से ग्राहकों का मन मोह लिया था.

एक रोज प्रेम केसरवानी नाम का युवक उस की दुकान पर पान खाने आया तो पहली ही नजर में सुशीला उस के दिल में उतर गई. इस के बाद वह अकसर सुशीला की दुकान पर आने लगा. पान खाने का तो बहाना होता, उस का असली मकसद होता सुशीला का दीदार करना और उस से हंसीठिठोली करना. सुशीला भी उस से खुल गई थी और उस की लच्छेदार बातों में दिलचस्पी लेने लगी थी.

सुशीला को चाहने लगा प्रेम…

प्रेम केसरवानी वरुण विहार (बर्रा) में रहता था. वह शादीशुदा और एक बच्चे का बाप था. उस की शादी संगीता से हुई थी. संगीता सांवले रंग की जरूर थी, लेकिन नाकनक्श अच्छा था. संगीता ने विवाह के पहले जैसे राजकुमार की कल्पना की थी, प्रेम ठीक उसी के अनुरूप था. उस का दांपत्य जीवन हंसीखुशी से गुजर रहा था. प्रेम केसरवानी कबाड़ का व्यवसाय करता था. इस काम में उस की अच्छी कमाई होती थी. इसी कमाई से उस ने दोमंजिला मकान बनवा लिया था और एक गोदाम भी किराए पर ले लिया था. वह अय्याश प्रवृत्ति का था. औरत उस की कमजोरी थी. घर में जवान बीवी होने के बावजूद वह बाहर ताकझांक करता रहता था.

मोहब्बत का खतरनाक अंजाम – भाग 3

रीनू ने पड़ोसी जीशान को फोन कर के घर बुला लिया. उस ने मुन्ना को देख कर कहा, ‘‘यह एक गंभीर चर्मरोग है. इस की दवा मुझे मालूम नहीं है. ऐसा करो, तुम मेरे कमरे पर आ जाओ. मैं लैपटौप में देख कर इस के लिए दवा लिख देता हूं.’’  यह कह कर जीशान चला गया.

मुन्ना की पीठ में निकले दानों में भयंकर जलन हो रही थी. उस की परेशानी रीनू से देखी नहीं जा रही थी. घर में उस के अब्बा या कोई भाई नहीं था, इसलिए मजबूरी में उसे ही जीशान के कमरे पर जाना पड़ा. जून की भयंकर गरमी में चौथी मंजिल तक सीढि़यां चढ़तेचढ़ते उस की जुबान सूख गई. कमरे में सामने ही मेज पर पानी की बोतल रखी थी. रीनू ने पानी पीने के लिए जैसे ही बोतल उठाई, जीशान ने कहा, ‘‘यह जूठी है, इसलिए इस का पानी तुम्हारे पीने लायक नहीं है. मैं तुम्हारे लिए नीचे से दूसरा ठंडा पानी लाए देता हूं.’’

जीशान भाग कर नीचे गया और रीनू के लिए एक गिलास ठंडा पानी ले आया. उसे पीते ही रीनू को चक्कर सा आया और वह बेहोश हो कर गिर पड़ी. इस के बाद उस के साथ क्या हुआ, उसे पता नहीं चला. थोड़ी देर बाद उसे होश आया तो वह दवा की पर्ची ले कर घर आ गई. जब उस के ऊपर से बेहोशी का असर पूरी तरह से हटा तो उसे लगा कि जीशान ने उसे पानी में कोई नशीली चीज पिला कर उस के साथ गलत काम किया है. उस के साथ क्या हुआ होगा, वह जान तो गई, लेकिन वह शादीशुदा थी, इसलिए इज्जत ही नहीं, अपनी गृहस्थी बचाए रखने के लिए उस ने यह बात किसी से नहीं कही.

रीनू ने सोचा कि जो होना था, वह हो गया. लेकिन अब आगे से वह जीशान को इस तरह का कोई मौका नहीं देगी. लेकिन जीशान नादान नहीं था. उस ने रीनू को कब्जे में रखने के लिए उस से संबंध बनाने की वीडियो क्लिप बना ली थी. उसी को ले कर वह तीसरे दिन रीनू के घर आ धमका. उस ने रीनू को एकांत में ले जा कर हंसते हुए उसे वह अश्लील वीडियो क्लिप दिखा कर कहा, ‘‘अब तुम्हें वही करना होगा, जो मैं कहूंगा. अगर तुम ने मना किया तो यह वीडियो क्लिप मैं मोहल्ले में सभी को दिखा दूंगा.’’

‘‘जीशान, तुम ऐसा कतई मत करना, वरना मेरा हंसताखेलता घरपरिवार बिखर जाएगा. मेरे बच्चों की जिंदगी बरबाद हो जाएगी. खुदा के लिए इसे डिलीट कर दो.’’

‘‘ठीक है, तुम कहती हो तो डिलीट कर दूंगा, लेकिन बदले में तुम्हें मुझे खुश करना होगा.’’ जीशान ने शर्त रखी.

न चाहते हुए भी रीनू को जीशान की बात माननी पड़ी. इस बार भी जीशान ने अपने और रीनू के शारीरिक संबंधों की वीडियो क्लिप बना ली. फिर तो सिलसिला सा चल पड़ा. क्लिपों को डिलीट करने की बात कह कर वह रीनू से शारीरिक संबंध बनाता रहा. यही नहीं, वह हर बार की वीडियो क्लिप भी बना लेता था. इस तरह जीशान के जाल में रीनू बुरी तरह फंसती चली गई.

यह सब रीनू अपने घरपरिवार और बच्चों के भविष्य के लिए कर रही थी. उसे यह भी पता था कि उस का पति उसे जान से ज्याद प्यार करता है. अगर ऐसे में उसे जीशान और उस के संबंधों के बारे में पता चल गया तो वह यह सब बरदाश्त नहीं कर पाएगा. इसी वजह से वह जीशान के चंगुल में फंसती चली गई थी. जब रीनू को लगा कि अब वह जीशान के चंगुल से मुक्त नहीं हो पाएगी तो उस ने आत्महत्या के बारे में भी सोचा. लेकिन बच्चों के भविष्य को देखते हुए वह ऐसा नहीं कर सकी.

उमर को जब जीशान की असलियत का पता चला तो उसे उस पर बहुत गुस्सा आया. उसे लगा कि जब तक यह आदमी जिंदा रहेगा, उस की पत्नी को ब्लैकमेल करते हुए वह उस की देह से खेलता रहेगा. यही नहीं, अपने दोस्तों के बीच उस की इज्जत का तमाशा भी बनाएगा. अब यह सब तभी बंद होगा, जब उसे मार दिया जाए.

उमर के दिमाग में जीशान को मारने की बात आई तो उस ने उस की हत्या की योजना बना डाली. फिर उसी योजना के तहत 29 दिसंबर को ट्रैवल बैग में एक लोहे की रौड रख कर वह पुष्पक एक्सप्रेस से कानपुर आ गया. वह दोपहर 1 बजे के करीब कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर उतरा. ससुराल जाने के बजाए वह स्टेशन के बाहर होटल में कमरा ले कर ठहर गया.

रात 10 बजे उमर शाद बैग ले कर होटल से बाहर निकला. उस समय भयंकर ठंड पड़ रही थी, जिस से सड़कों पर लगभग सन्नाटा पसरा था. एक रिक्शा ले कर वह मकबरा के लिए चल पड़ा. 11 बजे के आसपास वह मकबरा पहुंचा तो मोहल्ले में पूरी तरह सन्नाटा था. वह अपनी ससुराल जाने के बजाय सीधे जीशान के कमरे  पर चला गया. एकबारगी उमर को अपने कमरे पर देख कर जीशान ने हैरानी से पूछा, ‘‘अरे उमर भाईजान, इतनी रात को अचानक यहां कैसे?’’

‘‘मुंबई से आ रहा हूं. कोहरे की वजह से ट्रेन लेट हो गई. यहां आया तो देखा गलीमोहल्ले में सन्नाटा पसरा है. ससुराल वाले रजाई में दुबके होंगे. उन्हें परेशान करने के बजाय सीधे आप के कमरे पर चला आया. सोचा, रात आप के साथ गुजार लूं, सुबह ससुराल चला जाऊंगा.’’ हंसते हुए उमर ने कहा.

‘‘कोई बात नहीं, यह भी आप का ही घर है. कपड़े उतार कर रजाई में आ जाओ. बड़ी ठंड है.’’ जीशान ने कहा.

कपड़े उतार कर उमर जीशान के साथ लेट गया. कुछ देर दोनों बातें करते रहे. बातें करतेकरते जीशान तो सो गया, लेकिन उमर जागता रहा. क्योंकि वह तो प्रतिशोध की आग में जल रहा था. जब उसे यकीन हो गया कि जीशान सो गया है तो वह धीरे से उठा. उस ने मुंबई से लाई लोहे की रौड बैग से निकाली और गहरी नींद सो रहे जीशान के सिर पर पूरी ताकत से एक के बाद एक कई वार कर दिए.

सिर पर गहरी चोट लगने से जीशान चीख भी नहीं सका और इस दुनिया से विदा हो गया. इस के बाद प्रतिशोध की आग में जल रहे उमर ने रजाई हटा कर उस के पुरुषांग पर भी कई वार किए. इस पर भी उसे संतोष नहीं हुआ तो उस ने साथ लाई रौड को पत्थर से ठोंकठोंक कर खूंटे की तरह उस के पेट में घुसेड़ दिया.

यह सब कर के उमर ने जीशान का मोबाइल फोन उठाया और तीसरी मंजिल के दरवाजे पर ताला लगा कर नीचे आ गया. वहां से सीधे वह रेलवे स्टेशन पहुंचा और मुंबई जाने वाली ट्रेन पकड़ कर अपने घर चला गया. पुलिस से बचने के लिए उस ने जीशान और अपना मोबाइल फोन तथा दोनों सिम तोड़ कर रास्ते में कहीं फेंक दिए.

उमर ने जीशान की हत्या का अपराध स्वीकार कर के हत्या की वजह भी पुलिस को बता दी थी. इस के बाद थानाप्रभारी मोहम्मद अशरफ ने उस के खिलाफ जीशान की हत्या का मुकदमा दर्ज कर 6 जनवरी को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

(कथा में महिलाओं के नाम बदले हुए हैं.)

मोहब्बत का खतरनाक अंजाम – भाग 2

पूछताछ करतेकरते 2 दिन बीत गए. इसे बीच पुलिस किसी नतीजे पर नहीं पहुंची. इस से इलाके में तनाव बढ़ने लगा. जब इस बात की जानकारी एसपी (पश्चिम) दिनेश कुमार पी. को हुई तो उन्होंने मामले की जांच के लिए आननफानन एक पुलिस टीम गठित कर दी, जिस में थाना ग्वालटोली, कर्नलगंज, कोहना के थानाप्रभारियों के अलावा क्राइम ब्रांच के कुछ तेजतर्रार अधिकारियों को भी शामिल किया गया.

इस पुलिस टीम ने सब से पहले जीशान और उस के कुछ मित्रों के मोबाइल फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स के अध्ययन के बाद पुलिस को उस में मिले एक नंबर पर संदेह हुआ. पुलिस ने उस नंबर के मोबाइन फोन की लोकेशन निकलवाई तो पता चला कि घटना वाले दिन वह फोन कानपुर में ही था, जबकि वह नंबर महाराष्ट्र का था. इस में अहम बात यह थी कि घटना से पहले उस की लोकेशन जहां कानपुर और घटनास्थल के आसपास थी, वहीं घटना घटने के बाद वह फोन बंद कर दिया गया था.

जांच टीम ने उस नंबर के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि वह नंबर उत्तर प्रदेश के जिला मऊ के थाना घोसी के रहने वाले मोहम्मद उमर शाद के नाम था, जो वर्तमान में परिवार के साथ महाराष्ट्र के जिला थाणे के थाना नालासोपारा के अचोल रोड स्थित एमडीनगर के किसराज स्कूल के नजदीक साईंनाथ अपार्टमेंट के रूम नंबर 103 में रहता था. इसी के साथ यह भी पता चला कि कानपुर के ग्वालटोली के मोहल्ला मकबरा के रहने वाले अब्बास की बेटी रीनू से उस का निकाह हुआ था.

पुलिस ने अब्बास से पूछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘मेरे दामाद मोहम्मद उमर शाद के मृतक जीशान से दोस्ताना संबंध थे. लेकिन वह तो इधर 6 महीने से कानपुर आया ही नहीं है.’’

लेकिन पुलिस को सर्विलांस द्वारा मिली जानकारी के अनुसार उमर शाद घटना वाले दिन कानपुर में ही था. पुलिस समझ गई कि अब्बास या तो झूठ बोल रहा है या उस के आने का इसे पता नहीं है. यही बात उमर की पत्नी रीनू ने भी पुलिस को बताई थी. बहरहाल पुलिस को अब्बास, उस की बेटी रीनू और दामाद मोहम्मद उमर शाद पर शक हो गया. पुलिस ने छानबीन की तो सचमुच मामला अवैध संबंध का निकला.

अवैध संबंध की बात सामने आते ही मोहम्मद उमर शाद को कानपुर लाने के लिए एक पुलिस टीम थाणे के लिए रवाना हो गई. लेकिन पुलिस टीम के वहां पहुंचने से पहले ही वह फरार हो गया. पुलिस को वहां से उस का मोबाइल नंबर मिल गया, जिसे सर्विलांस पर लगा कर उस की लोकेशन पता की जाने लगी. फिर सर्विलांस के माध्यम से ही उस की लोकेशन पता कर के घंटाघर रेलवे स्टेशन से उसे गिरफ्तार कर लिया गया. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने जीशान की हत्या की जो कहानी पुलिस को बताई, वह इस प्रकार थी.

मूलरूप से जिला मऊ के थाना घोसी के रहने वाले मोहम्मद उमर शाद के पिता सालों पहले मुंबई जा कर रहने लगे थे. उन्हीं के साथ उन का परिवार भी रहता था. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 6 बेटे और 2 बेटियां थीं. उन्हीं में एक उमर शाद भी था. वह मुंबई में बच्चों की साइकिल बनाने वाली फैक्ट्री में नौकरी करता था.

चूंकि वह उत्तर प्रदेश का रहने वाला था, इसलिए आज भी उस के तमाम रिश्तेदार उत्तर प्रदेश के तमाम शहरों में रह रहे हैं. यही वजह थी कि 7 साल पहले उस की शादी कानपुर के ग्वालटोली के मोहल्ला मकबरा के रहने वाले अब्बास की बेटी रीनू के साथ हो गई थी. अब तो वे 2 बच्चों के मांबाप भी बन चुके हैं.

पिछले साल अचानक रीनू की तबीयत खराब हुई तो वह इलाज कराने के इरादे से उमर से अनुमति ले कर अपने देवर मुन्ना के साथ कानपुर आ गई. कुछ दिन कानपुर में रहने के बाद मुन्ना मुंबई वापस गया तो उस ने अपने बड़े भाई उमर शाद से कहा, ‘‘भइया, मुझे लगता है कि कानपुर में भाभी का उन्हीं के मोहल्ले के रहने वाले एक लड़के से गलत संबंध है.’’

‘‘ऐसा तुम्हें कैसे लगा?’’ उमर शाद ने मुन्ना से पूछा.

‘‘उन दोनों के बातव्यवहार से,’’ मुन्ना ने कहा, ‘‘हमारे खयाल से भाभी को कानपुर भेजना ठीक नहीं है.’’

भाई की इन बातों ने उमर शाद को बेचैन कर दिया, क्योंकि पत्नी का सालोंसाल का पलपल का साथ, बातचीत और नजदीकियों से भाई की बातों पर उसे विश्वास नहीं हुआ था. लेकिन वह पुरुष था. पुरुष का मन शंकालु होता है, इसलिए भाई की बातें सोचसोच कर वह रातदिन बेचैन रहने लगा.

जब यह बेचैनी कुछ ज्यादा ही परेशान करने लगी तो वह 2 महीने की छुट्टी ले कर कानपुर अपनी ससुराल आ गया और जीशान तथा अपनी पत्नी रीनू पर नजर रखने लगा. उसी बीच उसे मोहल्ले के कुछ लड़कों से पता चला कि रीनू और जीशान के बीच शारीरिक संबंध ही नहीं हैं, बल्कि जीशान ने अपने उन संबंधों की वीडियो क्लिपें भी बना रखी हैं.

इस बात ने उमर की बेचैनी और बढ़ा दी. सच्चाई का पता लगाने के लिए उस ने जीशान से दोस्ती गांठ ली. वह किसी भी तरह उस के मोबाइल में पड़ी रीनू और उस की वीडियो क्लिपें देखना चाहता था. इस के लिए वह जीशान के साथ उस के कमरे पर रुका भी, लेकिन जीशान ने मोबाइल में कोड लगा रखा था, इसलिए वह उस की मेमोरी को खोल नहीं सका. धीरेधीरे उस की उलझन बढ़ती ही जा रही थी.

इसी तरह छुट्टी खत्म हो गई और उमर मुंबई चला गया. कानपुर में रहते हुए उस ने रीनू से भले ही कुछ नहीं कहासुना था, लेकिन उस के दिमाग में यह बात पूरी तरह बैठ गई थी कि उस की पत्नी का जीशान से संबंध है. इसलिए इस बात को ले कर वह बुरी तरह परेशान रहने लगा था.

दूसरी ओर जीशान चाहता था कि अगर रीनू का उमर से तलाक हो जाए तो वह हमेशाहमेशा के लिए उस की हो जाएगी. इस के लिए वह अपने करीबी मित्रों से उमर शाद के मोबाइल पर फोन करवा कर अपने और रीनू के शारीरिक संबंधों की बात कहलवाने लगा था. उसे लगता था कि यह जान कर उमर अपनी पत्नी रीनू को तलाक दे देगा.

उमर शाद रीनू से बेहद प्यार करता था, इसलिए वह किसी भी सूरत में उसे छोड़ना नहीं चाहता था. लेकिन रीनू और जीशान के संबंधों को ले कर जब भी उस के पास कोई फोन आता, वह बुरी तरह तिलमिला उठता था. ऐसे में वह गुस्से में अपने शरीर को किसी धारदार चीज से काट लेता. इस के बाद भयानक पीड़ा उठती तो पत्नी के गैरमर्द के संबंधों की तिलमिलाहट धीरेधीरे शांत हो जाती. एक बार तो उस ने पत्नी की इस बेवफाई पर जान तक देने की कोशिश की, लेकिन किसी तरह वह बच गया.

उमर शाद खुद इतना परेशान और बेचैन रहता था, लेकिन उस के पास इन अनैतिक संबंधों का कोई प्रमाण नहीं था, इसलिए वह इस बारे में पत्नी से कुछ पूछ नहीं पा रहा था. लेकिन जब उस की बेचैनी हद से ज्यादा बढ़ गई तो उस ने रीनू से उस के और जीशान के अवैध संबंधों तथा अश्लील वीडियो क्लिपों के बारे में पूछ ही लिया.

तब रीनू ने रोते हुए कहा, ‘‘मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है. इस की वजह से मैं कई महीनों से भयानक मानसिक पीड़ा की आग में दिनरात जल रही हूं. औरत हूं, इसलिए अपने साथ हुए धोखे के बारे में तुम से बताने की हिम्मत नहीं कर सकी. बस, यही मुझ से गलती हुई है.’’

‘‘तुम्हारे साथ यह सब कैसे हुआ, तुम ने कभी बताने की कोशिश क्यों नहीं की?’’ उमर शाद ने कहा.

‘‘कहा न, हिम्मत ही नहीं पड़ रही थी. अब आप सब जान ही गए हैं तो आप को सारी सच्चाई बताए देती हूं.’’ रीनू ने कहा.

इस के बाद रीनू ने उमर को जो बताया, वह कुछ इस प्रकार था…

पिछले साल जून में बीमार होने पर मुन्ना रीनू को कानपुर ले कर आया तो मुन्ना की पीठ में दाने निकल आए थे, जिस की पीड़ा से वह काफी परेशान था. तब अब्बास ने रीनू से कहा कि वह उसे जीशान को दिखा कर उस के लिए मैडिकल स्टोर से दवा मंगा ले.

मोहब्बत का खतरनाक अंजाम – भाग 1

जीशान अपने भांजे शानू के पैर की ड्रेसिंग करने नहीं आया तो उस की बड़ी बहन अलीशा ने पहले उसे फोन किया, फोन बंद मिला तो उस ने उस की खोजखबर करवाई. लेकिन जब उस का कुछ पता नहीं चला तो अलीशा को लगा कि वह किसी जरूरी काम से कहीं बाहर चला गया होगा, घंटे-2 घंटे में लौट कर ड्रेसिंग कर देगा. यही सोच कर वह अपने कामकाज में लग गई. शाम के 5 बज गए और जीशान नहीं आया तो उसे चिंता हुई. चूंकि उस के पति एहसान किसी जरूरी काम से अहमदाबाद गए हुए थे और घर में कोई दूसरा बड़ाबूढ़ा नहीं था, इसलिए अलीशा ने पड़ोस में रहने वाले समीर को मोहल्ला मकबरा स्थित अपने दूसरे मकान पर जीशान के बारे में पता करने के लिए भेज दिया.

अलीशा के उस दूसरे 4 मंजिला मकान में कुल 6 कमरे थे, जिन में नीचे की 2 मंजिलों में 3 किराएदार अपने परिवार के साथ रहते थे. उस के ऊपर की तीसरी और चौथी मंजिल के 3 कमरों में 2 लड़के और उस का छोटा भाई जीशान हैदर रहता था. जीशान की खोज में आया समीर दूसरी मंजिल पर पहुंचा तो तीसरी मंजिल पर जाने वाले दरवाजे पर ताला लगा था. वह वहीं रुक गया. तभी उसे वहां कुछ सड़ने जैसी बदबू महसूस हुई. ताला बंद होने की वजह से वह ऊपर नहीं जा सका तो नीचे रहने वाले किराएदारों से जीशान के बारे में पूछा. लेकिन वे लोग जीशान के बारे में कुछ नहीं बता सके.

जब समीर को जीशान के बारे में कुछ पता नहीं चला तो लौट कर उस ने अलीशा को बताया कि तीसरी मंजिल पर जाने वाले दरवाजे पर ताला लगा है, इसलिए वह जीशान के कमरे तक पहुंच नहीं सका. लेकिन ऊपर से लाश के सड़ने जैसी बदबू आ रही थी. यह सुन कर अलीशा परेशान हो उठी. उस के दिल में छोटे भाई को ले कर तरहतरह की आशंकाएं उठने लगीं. वह खुद तो वहां नहीं जा सकी, लेकिन मोहल्ले के 2 अन्य लड़कों को बुला कर कहा, ‘‘तुम लोग समीर के साथ वहां जा कर तीसरी मंजिल पर जाने वाले दरवाजे का ताला तोड़ कर ऊपर के सभी कमरों को ठीक से देखना. मुझे किसी गड़बड़ी की आशंका हो रही है.’’

समीर ने दोनों लड़कों के साथ जा कर तीसरी मंजिल पर जाने वाले दरवाजे का ताला तोड़ दिया. इस के बाद वह चौथी मंजिल पर पहुंचा तो वहां बने गोदामनुमा कमरे में जीशान हैदर की खून से लथपथ क्षतविक्षत लाश पड़ी देख कर डर गया. उस के साथ आए दोनों लड़के भी डर गए थे. उन्होंने लगभग भागते हुए आ कर यह बात अलीशा को बताई तो छोटे भाई की हत्या की खबर सुन कर अलीशा जोरजोर से रोने लगी.

उस के रोने की आवाज सुन कर मोहल्ले वाले इकट्ठा हो गए. धीरेधीरे यह बात पूरे मोहल्ले में फैल गई. अलीशा रोते हुए मकबरा स्थित अपने मकान की ओर भागी. उसी बीच किसी ने इस हत्या की जानकारी थाना ग्वालटोली पुलिस को दे दी थी. जानकारी मिलते ही थानाप्रभारी मोहम्मद अशरफ वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दे कर पुलिस बल के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए थे.

जब वह घटनास्थल पर पहुंचे तो वहां भारी भीड़ जमा हो चुकी थी. उस में काफी तनाव भी था. थानाप्रभारी ने इस बात की जानकारी पुलिस अधीक्षक (पश्चिम) दिनेश कुमार पी. को दी तो कानूनव्यवस्था बनाए रखने के लिए उन्होंने थाना बजरिया, चमनगंज, कोहना के थानाप्रभारियों को पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंचने का आदेश दिया. थोड़ी देर में वह खुद भी फोरैंसिक टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे.

फोरैंसिक टीम को जांच के दौरान कमरे से जैलोकेन के इंजेक्शन, सिरिंज और रबर की एक जोड़ी चप्पल मिली. टीम ने उसे अपने कब्जे में ले लिया. फोरैंसिक टीम का काम खत्म हो गया तो पुलिस अपना काम करने लगी. कमरे में मिले जैलोकेन के इंजेक्शन से आशंका व्यक्त की गई कि मृतक जीशान की हत्या बेहोश कर के की गई थी.

हत्या बड़ी ही क्रूरता से की गई थी. उस का सिर और चेहरा इस तरह से कुचला गया था कि उस की एक आंख फूट गई थी. सिर का भेजा भी बाहर निकल आया था. नाजुक अंगों को भी हत्यारे ने बुरी तरह क्षतविक्षत किया था. यही नहीं, मृतक के पेट में लोहे की जो रौड घुसी थी, लगता था उस के पेट के ऊपर रख कर किसी भारी चीज से ठोंकी गई थी.

लाश और घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद पुलिस ने पंचनामा तैयार कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए हैलेट अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद उस मकान में रहने वाले सभी किराएदारों और पड़ोसियों से पूछताछ की गई. पुलिस ने काफी प्रयास किया, लेकिन इस पूछताछ में हत्या से संबंधित ऐसी कोई भी जानकारी पुलिस को नहीं मिली, जिस से हत्यारे तक पहुंचने का रास्ता आसान हो जाता.

जीशान की हत्या की सूचना पा कर उस के बड़े भाई मोहम्मद इरफान घर वालों के साथ रात 10 बजे थाना ग्वालटोली पहुंच गए थे. इस के बाद उन्हीं की तहरीर पर थानाप्रभारी मोहम्मद अशरफ ने जीशान की हत्या का मुकदमा दर्ज कराया. हत्या का मुकदमा दर्ज होने के बाद उन्होंने इरफान से पूछताछ शुरू की. इस पूछताछ में इरफान ने जो बताया, उस के अनुसार वह उत्तर प्रदेश के जिला उन्नाव के कस्बा सफीपुर के मोहल्ला सराय खुर्रम के रहने वाले डा. हसन असगरी उर्फ शम्मू का बेटा था. भाईबहनों में उस के अलावा उस के 2 भाई इमरान और मृतक जीशान के अलावा 2 बहनें थीं.

भाइयों में 29 वर्षीय जीशान सब से छोटा था. पढ़ाईलिखाई के साथ वह पिताजी की उन के काम में मदद करता था, जिस की वजह से उसे बीमारियों और उन के इलाज के बारे में काफी जानकारी हो गई थी. लेकिन उस का मन न पढ़ाईलिखाई में लगा, न पिताजी के साथ काम करने में. इस की वजह यह थी कि वह इलेक्ट्रीशियन बनना चाहता था. समय मिलने पर वह मोटर वाइंडिंग और इलेक्ट्रिक के अन्य काम सीखता रहता था. जब वह बिजली के सारे कामों में निपुण हो गया तो कमाईधमाई करने के लिए कानपुर के ग्वालटोली में रहने वाले अपने बहनोई एहसान के यहां चला गया. यह लगभग 10 साल पहले की बात थी.

पुलिस को शक था कि जीशान की हत्या प्रेमप्रसंग, लेनदेन या किसी रंजिश की वजह से हुई थी. लेकिन इन में से सब से ज्यादा संभावना थी कि उस की हत्या प्रेमप्रसंग को ले कर हुई थी, क्योंकि जिस तरह क्रूरता के साथ उस की हत्या की गई थी, ऐसा अकसर प्रेमप्रसंग या अवैध संबंधों के मामलों में होता था. पुलिस जीशान के दोस्तोंपरिचितों से पता करने लगी कि उस का किसी से प्रेम संबंध तो नहीं था. क्योंकि इस तरह की बातें लोग दोस्तों से जरूर बताते हैं.

आवारगी में गंवाई जान – भाग 3

रेखा ने रिंकी को पहली बार तेजप्रताप गिरि के यहां देखा था, तभी से वह भांप गई थी कि यह औरत उस के काम की साबित हो सकती है. उस ने तेजप्रताप से रिंकी का मोबाइल नंबर ले कर उस से बातचीत शुरू कर दी थी. बातचीत के दौरान उसे पता चल गया कि रिंकी पैसों के लिए कुछ भी कर सकती है, इसलिए वह उसे पैसे कमाने का रास्ता बताने लगी. फिर जल्दी ही रिंकी उस के जाल में फंस भी गई.

रिंकी जब भी गोरखपुर आती, रेखा से मिलने उस के घर जरूर जाती थी. इसी आनेजाने में अपनी उम्र से छोटे बबलू, संदीप और मनोज से उस के संबंध बन गए. इन लड़कों से संबंध बनाने में उसे बहुत मजा आता था.

रेखा का एक पुराना ग्राहक था सरदार रकम सिंह, जो सहारनपुर का रहने वाला था. उस ने रेखा से एक कमसिन, खूबसूरत और कुंवारी लड़की की व्यवस्था के लिए कहा था, जिस से वह शादी कर सके. रेखा को तुरंत रिंकी की याद आ गई. रिंकी भले ही शादीशुदा और 2 बच्चों की मां थी, लेकिन देखने में वह कमसिन लगती थी. कैसे और क्या करना है, उस ने तुरंत योजना बना डाली.

अब तक रिंकी की बातचीत से रेखा को पता चल गया था कि वह अपने सीधेसादे पति से खुश नहीं है. उसे भौतिक सुखों की चाहत थी, जो उस के पास नहीं था. इस के लिए वह कुछ भी करने को तैयार थी.

1 दिसंबर, 2013 को रिंकी छोटे बेटे सुंदरम को साथ ले कर गोरखपुर आई. संयोग से उसी दिन किरन किसी बात पर पति से लड़झगड़ कर बड़ी बहन पुष्पा के यहां कुबेरस्थान (कुशीनगर) चली गई. रिंकी ने वह रात तेजप्रताप के साथ आराम से बिताई.

अगले दिन सुबह तेजप्रताप ने रिंकी को उस की ससुराल वापस पटहेरवा भेज दिया. इस के 2 दिनों बाद रेखा ने रिंकी को फोन किया. हालचाल पूछने के बाद उस ने कहा, ‘‘रिंकी मैं ने तुम्हारे लिए एक बहुत ही खानदानी घरवर ढूंढा है. अगर तुम अपने पति को छोड़ कर उस के साथ शादी करना चाहो तो बताओ.’’

रिंकी ने हामी भरते हुए कहा, ‘‘मैं तैयार हूं.’’

‘‘ठीक है, कब और कहां आना है, मैं तुम्हें फिर फोन कर के बताऊंगी.’’ कह कर रेखा ने फोन काट दिया.

8 दिसंबर, 2013 को फोन कर के रेखा ने रिंकी से 11 दिसंबर को गोरखपुर आने को कहा. तय तारीख पर रिंकी अजय से बड़ी ननद पुष्पा के यहां जाने की बात कह कर घर से निकली. शाम होतेहोते वह रेखा के यहां पहुंच गई. उस ने इस की जानकारी तेजप्रताप को नहीं होने दी. रात रिंकी ने रेखा के यहां बिताई. 12 दिसंबर को रेखा ने भतीजे बबलू और भांजे मनोज के साथ उसे सहारनपुर सरदार रकम सिंह के पास भेज दिया और उस के बेटे को अपने पास रख लिया.

रिंकी को सिर्फ इतना पता था कि उस की दूसरी शादी हो रही है, जबकि रेखा ने उसे सरदार रकम सिंह के हाथों 45 हजार रुपए में बेच दिया था. रिंकी को वहां भेज कर उस ने उस के बेटे को बेलीपार की रहने वाली भाजपा नेता इशरावती के हाथों 30 हजार रुपए में बेच दिया था. बच्चा लेते समय इशरावती ने उसे 21 हजार दिए थे, बाकी 9 हजार रुपए बाद में देने को कहा था.

दूसरी ओर 2 दिनों तक रिंकी का फोन नहीं आया तो अजय को चिंता हुई. उस ने खुद फोन किया तो फोन बंद मिला. इस से वह परेशान हो उठा. उस ने पुष्पा को फोन किया तो उस ने बताया कि रिंकी तो उस के यहां आई ही नहीं थी. अब उस की परेशानी और बढ़ गई. वह अपने अन्य रिश्तेदारों को फोन कर के पत्नी के बारे में पूछने लगा. जब उस के बारे में कहीं से कुछ पता नहीं चला तो वह उस की तलाश में निकल पड़ा.

रिंकी का रकम सिंह के हाथों सौदा कर के रेखा निश्चिंत हो गई थी. लेकिन सप्ताह भर बाद उसे बच्चों की याद आने लगी तो वह रकम सिंह से गोरखपुर जाने की जिद करने लगी. तभी सरदार रकम सिंह को रिंकी के ब्याहता होने की जानकारी हो गई. चूंकि रिंकी खुद भी जाने की जिद कर रही थी, इसलिए उस ने रेखा को फोन कर के पैसे वापस कर के रिंकी को ले जाने को कहा.

अब रेखा और मनोज की परेशानी बढ़ गई, क्योंकि रिंकी आते ही अपने बेटे को मांगती. जबकि वे उस के बेटे को पैसे ले कर किसी और को सौंप चुके थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें. रिंकी के वापस आने से उन का भेद भी खुल सकता था. इसलिए पैसा और अपनी इज्जत बचाने के लिए उन्होंने उसे खत्म करने की योजना बना डाली.

21 दिसंबर, 2013 को बबलू और मनोज सहारनपुर पहुंचे. रकम सिंह के पैसे लौटा कर वे रिंकी को साथ ले कर ट्रेन से गोरखपुर के लिए चल पड़े. रात 7 बजे वे गोरखपुर पहुंचे. स्टेशन से उन्होंने रेखा को फोन कर के एक मोटरसाइकिल मंगाई. संदीप उन्हें मोटरसाइकिल दे कर अपने गांव चौरीचौरा गौनर चला गया.

आगे रिंकी के साथ क्या करना है, यह रेखा ने मनोज को पहले ही समझा दिया था. मनोज, बबलू रिंकी को ले कर कुसुम्ही जंगल पहुंचे. मनोज ने उस से कहा था कि वह कुसुम्ही के बुढि़या माई मंदिर में उस से शादी कर लेगा. मंदिर से पहले ही मोड़ पर उस ने मोटरसाइकिल रोक दी. तीनों नीचे उतरे तो मनोज ने बबलू को मोटरसाइकिल के पास रुकने को कहा और खुद रिंकी को ले कर आगे बढ़ा.

शायद रिंकी मनोज के इरादे को समझ गई थी, इसलिए उस ने भागना चाहा. लेकिन वह भाग पाती, उस के पहले ही मनोज ने उसे पकड़ कर कमर में खोंसा 315 बोर का कट्टा निकाल कर बट से उस के सिर के पीछे वाले हिस्से पर इतने जोर से वार किया कि उसी एक वार में वह गिर पड़ी.

घायल हो कर रिंकी खडंजे पर गिर कर छटपटाने लगी. उसे छटपटाते देख मनोज ने अपना पैर उस के सीने पर रख कर दबा दिया. जब वह मर गई तो उस की लाश को ठीक कर के दोनों मोटरसाइकिल से घर आ गए. बाद में इस बात की जानकारी तेजप्रताप को हो गई थी, लेकिन उस ने यह बात अपने साले अजय को नहीं बताई थी.

कथा लिखे जाने तक रिंकी हत्याकांड का मुख्य अभियुक्त मनोज कुमार पुलिस के हाथ नहीं लगा था. सरदार रकम सिंह की भी गिरफ्तारी नहीं हो पाई थी. वह भी फरार था. बाकी सभी अभियुक्तों को पुलिस ने जेल भेज दिया था.

इस हत्याकांड का खुलासा करने वाली टीम को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रदीप कुमार ने 5 हजार रुपए पुरस्कार देने की घोषणा की है.

—कथा पारिवारिक और पुलिस सूत्रों पर आधारित.