सवालों में उलझी मर्डर मिस्ट्री

सवालों में उलझी मर्डर मिस्ट्री – भाग 4

जांच के दौरान क्राइम ब्रांच यूनिट-6 की पुलिस को संध्या सिंह के जानपहचान वालों से पता चला था कि रघुवीर सिंह का व्यवहार संध्या सिंह के प्रति कभी भी अच्छा नहीं रहा. वह अकसर उन से लड़ाईझगड़ा किया करता था. घटना के कुछ दिनों पहले भी किसी बात को ले कर मांबेटे में जोरदार झगड़ा हुआ था. रघुवीर सिंह ने मां को कुछ इस तरह मारा था कि उन की नाक से खून बहने लगा था. मामला एनआरआई पुलिस थाने तक पहुंचा था. तब इस मामले को शांत कराने के लिए संध्या सिंह के पति जयप्रकाश सिंह को इंदौर से मुंबई आना पड़ा था.

इसी तरह 3-4 साल पहले भी हुआ था. उस समय संध्या सिंह परिवार के साथ भीमा शंकर इमारत की चौथी मंजिल पर रहती थीं. किसी बात को ले कर रघुवीर सिंह का मां से झगड़ा हुआ तो वह उन्हें पीटने लगा. पीटते हुए वह उन्हें खिड़की से बाहर गिराने की कोशिश कर रहा था. यह सब देख कर संध्या सिंह की नौकरानी घबरा गई. वह जल्दीजल्दी से सीढि़यां उतर कर उसी इमारत में रहने वाली संध्या सिंह की एक घनिष्ठ सहेली को बुला लाई. उस सहेली ने किसी तरह संध्या सिंह को छुड़ाया. बेटे ने उन्हें इस तरह मारा था कि उन के मुंह का दाहिना हिस्सा सूज गया था.

संध्या सिंह की सहेली ने जब रघुवीर सिंह को उस की इस हरकत के लिए बुरी तरह डांटा तो जवाब में उस ने कहा था, ‘‘मुझे एक पंडित ने बताया है कि मेरी मां की मौत मेरे हाथों लिखी है.’’

तब संध्या सिंह की सहेली ने कहा, ‘‘अगर यह बात तुम्हारे पिता जयप्रकाश सिंह को पता चल गई तो वह तुम्हें छोड़ेंगे नहीं.’’

‘‘वह क्या करेंगे. वह खुद ही मां से लड़तेझगड़ते रहते हैं.’’ रघुवीर सिंह ने कहा था.

जिस दिन की यह बात है, उस दिन जयप्रकाश सिंह मुंबई में नहीं थे. 4-5 दिनों बाद वह मुंबई वापस आए तो संध्या सिंह की सहेली ने उस दिन की सारी बात उन्हें बताने के साथ यह भी बताया था कि रघुवीर सिंह को ड्रग्स देने के लिए नीग्रो इमारत में आते हैं.

पूछताछ में क्राइम ब्रांच यूनिट-6 को यह भी पता चला था कि संध्या सिंह के गायब होने के 2 दिन पहले उन की अलमारी से 30 हजार रुपए गायब हो गए थे. इन रुपयों के बारे में पूछने के लिए संध्या सिंह ने रघुवीर सिंह को फोन किया था. जांच टीम ने जब रघुवीर सिंह से इस बारे में पूछा था तो उस ने कहा था कि वे रुपए मां को उसी दिन दूसरी जगह मिल गए थे.

जबकि उस की गर्लफ्रैंड श्रेया ने पुलिस को कुछ और ही बताया था. उस का कहना था कि 11 और 12 दिसंबर, 2012 को उस ने रघुवीर सिंह की पर्स में हजार और 5 सौ के काफी नोट देखे थे. उस ने जब उस से उन रुपयों के बारे में पूछा था तो रघुवीर सिंह ने उसे बताया था कि वे रुपए उस के पिता ने कार रिपेयरिंग के लिए दिए थे. लेकिन जब जयप्रकाश सिंह से उन रुपयों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने रुपए देने की बात से मना कर दिया था.

इसी क्रम में रघुवीर सिंह का एक और झूठ क्राइम ब्रांच ने पकड़ा था. उस ने क्राइम ब्रांच को मां के आभूषणों की जो सूची दी थी, लगभग वही आभूषण अभ्युदय बैंक के लौकर में मिले थे. जबकि बैंक वालों का कहना था कि संध्या सिंह भले ही उस दिन आभूषण ले कर बैंक के बाहर तक आई थीं, लेकिन उस दिन न वह बैंक के अंदर आई थीं और न ही उस दिन उन्होंने अपना लौकर खोला था. इस का मतलब यह हुआ कि उन्होंने उन आभूषणों को 13 दिसंबर, 2012 के पहले लौकर में रखा था.

अब सवाल यह था कि जब उस दिन संध्या सिंह ने बैंक के लौकर में आभूषण रखे ही नहीं थे तो रघुवीर सिंह ने संध्या सिंह के साथ उन आभूषणों के गायब होने की शिकायत क्यों की थी? रघुवीर सिंह के दोस्तों ने पूछताछ में क्राइम ब्रांच टीम को बताया था कि जिस दिन संध्या सिंह गायब हुई थीं, उस दिन रघुवीर ने अपने घर में दोस्तों के लिए एक पार्टी रखी थी.

लेकिन उसी दिन पास ही उस की एक फ्रैंड अवंतिका की बर्थडे पार्टी थी. उसे और श्रेया को अवंतिका की बर्थडे पार्टी में ले जाने के लिए जब उस के कुछ दोस्त शाम 7 बजे उस के घर पहुंचे तो उन्हें उस के घर में धुआं ही धुआं दिखाई दिया. उन्होंने रघुवीर से उस धुएं के बारे में पूछा तो उस ने कहा कि यह धुआं ब्राउन शुगर और गांजे का है. लेकिन जिस तरह उस के घर में वह धुआं भरा था, अमूमन इन दोनों ड्रग्स के जलाने से उतना धुआं नहीं उठता.

क्राइम ब्रांच के एक अधिकारी के अनुसार, कई बार किसी लाश को डीकंपोज करने के लिए जब कैमिकल का इस्तेमाल किया जाता है तो इस तरह का धुआं उठता है. इस साल 28 जनवरी, 2013 को जब संध्या सिंह का नरकंकाल नेरुल के दिल्ली पब्लिक स्कूल के पीछे मिला था तो वह जला हुआ नहीं, बल्कि डीकंपोज हालत में था. आगे उस अधिकारी ने यह भी कहा कि हो सकता है, उस की यह धारणा गलत हो.

क्राइम ब्रांच यूनिट-6 द्वारा की गई पूछताछ में रघुवीर सिंह मां की हत्या के मामले में पूरी तरह से संदेह के घेरे में उस समय आ गया था, जब घर में काम करने वाले तमाम नौकरनौकरानियों, रघुवीर सिंह और उस की गर्लफ्रैंड श्रेया से विस्तारपूर्वक पूछताछ की गई थी.

नौकरनौकरानियों ने बताया था कि 13 दिसंबर को संध्या सिंह 11 बजे जब घर से निकली थीं, उस से आधा घंटा पहले करीब साढ़े 10 बजे रघुवीर सिंह अपनी गर्लफ्रैंड श्रेया के साथ कार से उसे आईटी की परीक्षा दिलाने के लिए खारघर जाने की बात कह कर घर से निकला था. श्रेया को खारघर छोड़ कर वह करीब साढ़े 11 बजे अकेला ही घर वापस आ गया था. आते ही उस ने घर में मौजूद सभी नौकरनौकरानियों से कहा था कि आज मैडम नहीं आएंगी, इसलिए वे लोग खाना खा लें.

इस के बाद साढ़े 12 बजे वह श्रेया को लाने के लिए खारघर चला गया था. 1 बजे जब श्रेया की छुट्टी हुई तो वह उसे साथ ले कर घर आने के बजाए उल्वे चला गया था. उल्वे नेरुल के पास ही है. वहां कुछ खापी कर वे घर आ गए थे.

जबकि क्राइम ब्रांच यूनिट-6 का अंदाजा है कि रघुवीर सिंह श्रेया को खारघर छोड़ कर अपनी कार से अभ्युदय बैंक पहुंचा होगा. उस दिन बैंक में रेनोवेशन चल रहा था, इसलिए संध्या सिंह को लगा होगा कि बैंक बंद है. वह बैंक के अंदर जाने के बजाए वापस आने के बारे में सोच रही थीं कि तभी रघुवीर सिंह वहां पहुंच गया होगा. वह उन्हें कार में बैठा कर उन की हत्या कर के शव को कार की डिक्की में छिपा कर घर लाया होगा.

घर में शव को डीकंपोज कर के उसे डीपीएस स्कूल के पास ले जा कर फेंक दिया होगा. क्राइम ब्रांच को उस दिन की संध्या सिंह के एक मोबाइल फोन की लोकेशन उल्वे की भी मिली थी.

रघुवीर सिंह पूरी तरह संदेह के घेरे में था, इस के बावजूद भी क्राइम ब्रांच यूनिट-6 उसे गिरफ्तार नहीं कर पा रही थी. इस की सब से बड़ी वजह यह थी कि वह एक हाईप्रोफाइल परिवार से था. लगभग डेढ़ दर्जन बार पूछताछ करने के बाद भी क्राइम ब्रांच टीम उस पर हाथ नहीं डाल पाई. रघुवीर सिंह गिरफ्तारी से बचने के लिए बारबार अदालत जा रहा था तो क्राइम ब्रांच यूनिट-6 इस का विरोध कर रही थी.

सुप्रीम कोर्ट से भी अग्रिम जमानत की अरजी खारिज हो गई तो मजबूरन रघुवीर सिंह को पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा. इस तरह रघुवीर सिंह पुलिस गिरफ्त में आ गया. लेकिन इसी के साथ तमाम सवाल भी उठ रहे हैं. रघुवीर सिंह ड्रग एडिक्ट था. वह आधे घंटे भी खड़ा नहीं रह सकता. ऐसे में उस ने अपनी मां संध्या सिंह की हत्या अकेले कैसे की?

इस के बाद वह लाश को अकेले अपने घर से उतनी दूर कैसे ले गया? अगर उस ने यह हत्या की भी है तो निश्चित उस के साथ और लोग शामिल रहे होंगे. उस ने अपनी मां की हत्या क्यों की, अभी तक यह भी पता नहीं चला है. अब यह सब रघुवीर सिंह से पूछताछ के बाद ही पता चलेगा.

कथा लिखे जाने तक रघुवीर सिंह क्राइम ब्रांच यूनिट-6 की हिरासत में था.

— कथा पुलिस से मिली जानकारी पर आधारित

सवालों में उलझी मर्डर मिस्ट्री – भाग 3

संध्या सिंह की हत्या की गई है, नवी मुंबई के पुलिस कमिश्नर अशोक शर्मा द्वारा इस बात की पुष्टि करने के बाद जांच की दिशा बदल गई. क्राइम ब्रांच यूनिट-6 ने संध्या सिंह हत्याकांड की जांच नए सिरे से शुरू की. अब क्राइम ब्रांच के निशाने पर संध्या सिंह का परिवार था. उस ने संध्या सिंह के पति जयप्रकाश सिंह, बेटी राजेश्वरी सिंह, बेटे रघुवीर सिंह और उस के साथ लिव इन रिलेशन में रह रही श्रेया वर्मा से विस्तारपूर्वक पूछताछ की.

इस पूछताछ में क्राइम ब्रांच ने बाकी लोगों को तो क्लीन चिट दे दी, लेकिन रघुवीर सिंह और उस की गर्लफ्रैंड श्रेया को सस्पेक्ट में रख लिया. इस के बाद रघुवीर सिंह और श्रेया  को बारबार पूछताछ के लिए चेंबूर क्राइम ब्रांच के औफिस में बुलाया जाने लगा.

इस के अलावा क्राइम ब्रांच पुलिस ने संध्या सिंह के सभी घर वालों के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स और बैकग्राउंड के साथसाथ उन पहलुओं की भी जांच की, जिन पहलुओं को नवी मुंबई पुलिस ने अपनी जांच में दरकिनार कर दिया था.

एनआरआई कौंप्लेक्स और अभ्युदय बैंक में लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की जांच की गई. अभ्युदय बैंक के आसपास काम करने वालों को जब संध्या सिंह की फोटो दिखा कर पूछताछ की गई तो कुछ लोगों ने बताया कि फोटो में दिखने वाली जैसी एक महिला को उस दिन उन लोगों ने साड़ीब्लाउज में बैंक के पास से एक आटोरिक्शे में बैठते देखा था.

संध्या सिंह जिस कौंप्लेक्स में रहती थीं, उस के सामने आटो वालों की काफी भीड़ रहती थी. इन में कई आटो वाले ऐसे थे, जो संध्या सिंह को भलीभांति जानते थे. वे उन के यहां आतेजाते भी थे. उन में से कई आटो वालों से क्राइम ब्रांच ने सस्पेक्ट के तौर पर पूछताछ की.

उन में सभी आटो वाले तो निकल गए, लेकिन आटो ड्राइवर मोहम्मद आरिफ मेहंदी हसन फंस गया. क्योंकि उस की पृष्ठभूमि आपराधिक थी. 2009 में उस ने सुपारी ले कर 2 हत्याएं की थीं. इन में से एक भांडुप, मुंबई की एक महिला ने पैसे दे कर उस से अपने पति की हत्या करवाई थी तो दूसरी हत्या उस ने थाना चेंबूर में की थी. बैंक के आसपास वालों का कहना था कि आटो में बैठने वाली महिला साड़ीब्लाउज में थी, जबकि उमा गौर का कहना था कि उस दिन संध्या सिंह सलवारकमीज में थीं. उन के हाथ में एक छोटा सा बैग था.

पुलिस ने हसन को पूछताछ के लिए मात्र इसलिए रोका था, क्योंकि उस की आपराधिक पृष्ठभूमि थी. इस के अलावा उस सुबह की उस के मोबाइल फोन की लोकेशन भी अभ्युदय बैंक के पास की दिखा रही थी. संयोग से उस का घर भी एनआरआई कौंप्लेक्स के पास था. फोटो दिखाने पर लोगों ने यह भी कहा था कि फोटो वाली महिला को उन्होंने पानी की बोतल लिए आटो में बैठते देखा था. हसन से पूछताछ में पुलिस को कोई क्लू नहीं मिला तो पुलिस ने उसे दूसरे मामले में जेल भेज दिया.

क्राइम ब्रांच यूनिट-6 रघुवीर सिंह और उस की गर्लफ्रैंड श्रेया वर्मा से लगातार पूछताछ कर रही थी. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ के अनुसार रघुवीर सिंह और श्रेया की कहानी एक अंधेरे कमरे से शुरू हुई थी, जो जल्दी ही लिव इन रिलेशन में बदल गई थी.

श्रेया वर्मा दिल्ली के एक प्रतिष्ठित परिवार की एकलौती संतान थी. वह आईटी करने मुंबई आई तो नवी मुंबई के खारघर के एक हौस्टल में रहने लगी. श्रेया जिस कमरे में रहती थी, उस में उस के साथ 5-6 अन्य लड़कियां भी रहती थीं. उन लड़कियों में से कुछ ड्रग्स लेती थीं. जब इस बात की जानकारी उस के मातापिता को हुई तो उन्होंने उसे डांटाफटकारा ही नहीं, प्यार से समझाया भी.

उन्होंने उसे दिल्ली वापस आने को कहा तो उस ने मांबाप से वादा किया कि वह खारघर वाला हौस्टल छोड़ कर अपने लिए कहीं और मकान ले लेगी. लेकिन दिल्ली नहीं आएगी. उस की इस बात पर मांबाप राजी हो गए थे. मांबाप से वादा करने के बाद श्रेया नए घर की तलाश में जुट गई. तभी उसे किसी से नेरुल की भीमा शंकर इमारत में रघुवीर सिंह के खाली पड़े फ्लैट के बारे में पता चला. श्रेया रघुवीर सिंह का वह फ्लैट देखने पहुंची तो पता चला कि बिजली का बिल जमा न होने के कारण वहां की बिजली काट दी गई थी. बिना बिजली वाले फ्लैट को लेने का कोई सवाल ही नहीं था.

चूंकि रघुवीर सिंह का संबंध एक रसूखदार परिवार से था, इसलिए बिजली का मामला शीघ्र निपट सकता था. इसलिए वह रघुवीर सिंह से मिली. उस ने रघुवीर सिंह को अपनी परेशानी बताई तो उस ने बिजली ठीक कराने में असमर्थता जाहिर करते हुए कहा कि उस के घर में एक बेडरूम खाली पड़ा है. अगर वह चाहे तो उस में रह ले. श्रेया ने कहा कि उस की मां संध्या सिंह उसे अपने घर में क्यों रहने देंगी तो रघुवीर सिंह ने कहा था कि वह पीछे के दरवाजे से आएगी जाएगी, मां को पता ही नहीं चलेगा कि वह वहां रह रही है.

यहीं से श्रेया की रघुवीर सिंह के घर में एंट्री हुई. लेकिन कुछ दिनों बाद एक दिन श्रेया का सामना संध्या सिंह से हो ही गया. संध्या सिंह के सामने पड़ने पर वह घबरा गई. लेकिन संध्या सिंह ने सहमी खड़ी श्रेया को डांटने फटकारने के बजाए प्यार से उस के बारे में सब कुछ पूछा. इस के बाद उन्होंने उसे गलत आदतोें से दूर रहने की हिदायत दे कर अपने घर में रहने की इजाजत दे दी. एक ही घर में एक साथ रहते हुए रघुवीर सिंह और श्रेया करीब आ गए. इस के बावजूद श्रेया संध्या सिंह से हमेशा डरती रही.

रघुवीर सिंह और श्रेया से लगातार पूछताछ करने बाद भी पुलिस के हाथ कुछ नहीं लगा तो पुलिस ने दोनों का नारको टेस्ट कराने का विचार किया. पुलिस इन्हें प्राइम सस्पेक्ट इसलिए मान रही थी, क्योंकि संध्या सिंह के गायब होने के समय यही दोनों उन के साथ थे. नारको टेस्ट के लिए पुलिस ने अदालत से इजाजत मांगी तो श्रेया तो नारको टेस्ट के लिए तैयार हो गई, लेकिन रघुवीर सिंह ने इस के लिए 6 अगस्त तक का समय मांगा. इसी के बाद वह अग्रिम जमानत के लिए अदालतों के चक्कर लगाने लगा.

सवालों में उलझी मर्डर मिस्ट्री – भाग 2

सुबह 11 बजे की निकली संध्या सिंह जब शाम तक घर नहीं लौटी तो रघुवीर सिंह को मां की चिंता हुई. वह उन की तलाश में निकल पड़ा. उस ने कालोनी के एकएक आदमी से मां के बारे में पूछा. इस के बाद वह वहीं पास ही पामबीच कालोनी में रहने वाली अपनी मौसी सुलक्षणा पंडित और विजयेता पंडित को फोन कर के मां के न लौटने की बात बताई.

सुलक्षणा पंडित और विजयेता पंडित ने उसे धीरज रखने के लिए कहा. लेकिन जब रात भी बीत गई और संध्या सिंह घर नहीं लौटीं तो रघुवीर सिंह के साथसाथ सुलक्षणा पंडित और विजयेता पंडित को भी चिंता हुई. उन के भाई जतिन और ललित सांताक्रुज जुहू में रहते थे. उन्हें फोन कर के संध्या के बारे में पूछा गया, लेकिन वह वहां भी नहीं थीं.

उसी दिन शाम को रघुवीर सिंह ने अपने घर में ही दोस्तों की एक पार्टी रखी थी. लेकिन मां के अचानक गायब हो जाने से वह पार्टी में शामिल नहीं हो सका. उस के पार्टी में न जाने से उस पार्टी की जिम्मेदारी उस की गर्लफ्रेंड श्रेया ने संभाली थी.

संध्या सिंह को घूमने का शौक था. कभीकभी वह बिना किसी को बताए जहां मन होता था, चली जाती थीं. इसलिए सवेरा होने पर रघुवीर सिंह मुंबई एयरपोर्ट गया. वहां उस ने सिक्योरिटी पर तैनात अपने चाचा को पूरी बात बता कर मां कहीं बाहर तो नहीं गईं हैं, यह पता लगाने को कहा. लेकिन वहां से भी उन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. अब तक संध्या सिंह के लापता होने की बात पूरे परिवार को पता चल चुकी थी. इसलिए पूरा परिवार अपनीअपनी तरह से संध्या सिंह की तलाश में जुट गया था.

16 दिसंबर, 2012 को संध्या सिंह के लापता होने की जानकारी जयप्रकाश सिंह को मिली तो वह तुरंत इंदौर से मुंबई आ गए. उन्होंने मुंबई आते ही घर वालों के साथ थाना एनआरआई जा कर 20 लाख रुपए के गहनों के साथ पत्नी संध्या की गुमशुदगी दर्ज करवा दी. उन्होंने पत्नी के गायब होने का आरोप सीधे सीधे उसी पुलिस थाने में तैनात सहायक पुलिस निरीक्षक अनिल वेहराणी और अपनी एक मालिश करने वाली नौकरानी पर लगाया था.

इस की वजह यह थी कि 20 नवंबर, 2012 को जयप्रकाश सिंह के घर में चोरी हुई थी, जिस में संध्या सिंह के कुछ गहने चोरी चले गए थे. इस मामले की जांच अनिल वेहराणी ने की थी. जांच के दौरान बारबार घर आने और पूछताछ में संध्या सिंह से उन की अच्छी जानपहचान हो गई थी. यह जानपहचान तब और गहरी हो गई थी, जब उन्होंने उन की नौकरानी को गिरफ्तार कर के चोरी गए सभी गहने बरामद करा दिए थे.

इस से संध्या सिंह की नजरों में अनिल वेहराणी की इज्जत बढ़ गई थी. इस के बाद वह अकसर अनिल वेहराणी से फोन पर बातें करने लगी थीं. उन्होंने कई बार अनिल वेहराणी को अपने घर भी बुलाया था. जिस दिन संध्या सिंह गायब हुई थीं, उस दिन भी उन्होंने उमा गौर के मोबाइल से सहायक पुलिस निरीक्षक अनिल वेहराणी से काफी देर तक बातचीत की थी. संयोग से अगले दिन अनिल वेहराणी छुट्टी पर चले गए थे.

अनिल वेहराणी भले ही पुलिस अधिकारी थे, लेकिन उन पर जो आरोप लगा था, उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता था. लिहाजा पुलिस आयुक्त अशोक शर्मा ने इस मामले की जांच नवी मुंबई क्राइम ब्रांच (सीआईडी) के जौइंट पुलिस आयुक्त श्रीकांत पाठक को सौंप दी. उन्होंने सहायक पुलिस निरीक्षक अनिल वेहराणी के बारे में बड़ी बारीकी से जांच की, लेकिन उन के हाथ ऐसा कुछ भी नहीं लगा, जिस से वह संदेह के दायरे में आते.

नवी मुंबई पुलिस और क्राइम ब्रांच (सीआईडी) हर पहलू से संध्या सिंह के गायब होने के रहस्य की जांच कर रही थी, लेकिन कहीं से भी कोई सूत्र हाथ नहीं लग रहा था. मामला वीआईपी परिवार का था, इसलिए महानगर से निकलने वाले सभी हिंदी और अंगरेजी अखबारों ने इस मामले को सनसनीखेज बना दिया था, जिस की वजह से जांच अधिकारियों पर उन के उच्चाधिकारियों का दबाव बढ़ता जा रहा था.

धीरेधीरे संध्या सिंह को लापता हुए डेढ़ महीने से ज्यादा का समय बीत गया, लेकिन 2 पुलिस उपायुक्तों और 7 वरिष्ठ पुलिस निरीक्षकों की दौड़धूप का कोई परिणाम नहीं निकला था. इतना समय बीत जाने पर संध्या सिंह के पति जयप्रकाश सिंह और उन के घर वालों का धैर्य जवाब देने लगा. उन्हें लग रहा था कि पुलिस को जिस तरह से इस मामले की जांच करनी चाहिए, उस तरह नहीं कर रही है तो उन्होंने खुद एक प्रैस कौन्फ्रैंस कर के संध्या सिंह के बारे में जानकारी देने वाले को अपनी ओर से 5 लाख रुपए का इनाम देने की घोषणा की.

इसी के साथ राज्य के गृहमंत्री आर.आर. पाटिल से मिल कर संध्या सिंह की गुमशुदगी के मामले की जांच मुंबई क्राइम ब्रांच और सीबीआई से कराए जाने की मांग की. गृह राज्यमंत्री आर.आर. पाटिल पर उन की बातों का असर हुआ और उन्होंने मामले की जांच मुंबई क्राइम ब्रांच को सौंप दी.

क्राइम ब्रांच के जौइंट पुलिस कमिश्नर हिमांशु राय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इस की जांच क्राइम ब्रांच यूनिट-6 के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक श्रीपाद काले को सौंपी. क्राइम ब्रांच यूनिट-6 संध्या सिंह की गुमशुदगी की जांच की रूपरेखा तैयार कर ही रही थी कि मामले ने एक नया मोड़ ले लिया.

दरअसल, 28 जनवरी, 2013 को  ब्रिटिश नागरिक पक्षी वैज्ञानिक माइकल जौन ओट्स ने नवी मुंबई पुलिस को पाम बीच स्थित डीपीएस स्कूल के पीछे एक नरकंकाल पड़े होने की सूचना दी थी. उन्होंने पुलिस को बताया था कि जब वह पनवेल स्थित कर्नाला पक्षी अभ्यारण्य जा कर पक्षियों के शोध के लिए फोटो खींच कर अपने तीनों साथियों के साथ पवई के लिए लौट रहे थे तो नवी मुंबई पाम बीच रोड स्थित समुद्र की खाड़ी के किनारे कुछ और पक्षियों को देखने के लिए रुक गए.

पक्षियों को देखतेदेखते ही वे वहां के डीपीएस स्कूल के एकदम पीछे वाले हिस्से में खाड़ी के किनारे तक चले गए. वहां से वे लौट रहे थे तो एक  नरकंकाल से टकरा गए. उस दिन तो वे घर चले गए, लेकिन अगले दिन वे नवी मुंबई वापस आए तो इस की जानकारी थाना एनआरआई को दी.

यह जानकारी मिलते ही एक पुलिस टीम तत्काल वहां पहुंच गई. पुलिस ने घटनास्थल की जांच कर के उस नरकंकाल और सारी सामग्री इकट्ठा कर के कब्जे में ले लिया. पुलिस को वहां से एक नरमुंड, 7 हड्डियां, एक सोने की चेन, रुद्राक्ष की माला, बालों की विग, दांतों की कैप और एक सलवारकमीज मिली थी. इस सब की शिनाख्त के लिए पुलिस ने संध्या सिंह की बहन सुलक्षणा पंडित और उन के भाई ललित पंडित को बुला लिया.

सुलक्षणा पंडित और ललित पंडित ने वहां मिले सारे सामानों को देख कर बताया कि यह सारा सामान उन की बहन संध्या सिंह का है. सामान की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने नरकंकाल का पंचनामा तैयार कर फोरैंसिक और डीएनए जांच के लिए भेज दिया.

सवालों में उलझी मर्डर मिस्ट्री – भाग 1

सुप्रीम कोर्ट ने रघुवीर सिंह की अग्रिम जमानत की अरजी खारिज कर दी तो मजबूरन उसे 16 दिसंबर, 2013 की दोपहर 2 बजे महानगर मुंबई के उपनगर चेंबूर स्थित क्राइम ब्रांच यूनिट-6 के औफिस आ कर जांच अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा. क्योंकि इस के अलावा अब उस के पास कोई दूसरा चारा नहीं बचा था.

इस तरह वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक श्रीपाद काले और उन की जांच टीम को नवी मुंबई के बहुचर्चित संध्या सिंह हत्याकांड के मामले में 1 साल 3 दिन बाद मृतका के बेटे रघुवीर सिंह को गिरफ्तार कर ने में एक महत्त्वपूर्ण कामयाबी मिल गई थी. क्योंकि उन का कहना था कि रघुवीर सिंह के खिलाफ उन के पास भले ही कोई ठोस सुबूत नहीं है, लेकिन परिस्थितिजन्य सुबूत अवश्य हैं.

जिन परिस्थितिजन्य सुबूतों के आधार पर रघुवीर सिंह को गिरफ्तार किया गया था, ये सुबूत क्राइम ब्रांच और नवी मुंबई पुलिस के पास पिछले 6 महीनों से थे. लेकिन अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए रघुवीर सिंह बारबार कोर्ट का दरवाजा खटखटा रहा था, इसलिए पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर पा रही थी. वह जहां भी गया, जांच अधिकारियों ने परिस्थितिजन्य सुबूतों के आधार पर उस की अग्रिम जमानत का विरोध किया था. सभी अदालतों ने उन्हीं परिस्थितिजन्य घटनाओं को सुबूत माना और  उस की अग्रिम जमानत की अरजी खारिज कर दी.

पुलिस के पास रघुवीर सिंह के खिलाफ कोई ठोस सुबूत भले नहीं थे, लेकिन ये सुबूत उस ने खुद बारबार अदालत जा कर उपलब्ध करा दिए थे. गिरफ्तारी से बचने के लिए बारबार अदालत जा कर उस ने पुलिस का संदेह पुख्ता कर दिया था.

बारबार अदालात जा कर जो गलती रघुवीर सिंह ने की थी, कुछ ऐसी ही गलती नोएडा के डा. राजेश तलवार और नूपुर तलवार ने अपनी बेटी आरुषि और नौकर हेमराज हत्याकांड के मामले में की थी. इन दोनों ने भी बारबार अदालत जा कर संदेह को पुख्ता किया था.

जबकि इस मामले में भी सीबीआई के पास मात्र परिस्थितिजन्य सुबूत ही थे, डाइरैक्ट एविडेंस नहीं थे. इसलिए सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट पेश की तो डाइरैक्ट एविडेंस न होने की अपनी मजबूरी अदालत को बता दी थी. अंतत: अदालत ने उसी क्लोजर रिपोर्ट को चार्जशीट मान कर मुकदमा चलाया और परिस्थितिजन्य सुबूतों के आधार पर ही दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई.

जिन 50 वर्षीया संध्या सिंह की हत्या के मामले में उन के बेटे रघुवीर सिंह को मुंबई की क्राइम ब्रांच यूनिट-6 ने गिरफ्तार किया है, वह नवी मुंबई के गार्डन सिटी कहे जाने वाले पौश इलाके के एनआरआई कौंप्लेक्स की इमारत नंबर-3 में अपने परिवार के साथ रहती थीं. उन के परिवार में पति जयप्रकाश सिंह के अलावा बेटी राजेश्वरी और बेटा रघुवीर सिंह था.

सेंट्रल एक्साइज कमिश्नर जयप्रकाश सिंह उन दिनों इंदौर में तैनात थे. बेटी राजेश्वरी सिंह मणिपाल यूनिवर्सिटी से जिओपौलिटिक्स ऐंड इंटरनेशनल रिलेशंस की मास्टर डिग्री की पढ़ाई कर रही थी. वह वहीं हौस्टल में रहती थी. जबकि बेटा रघुवीर सिंह अपनी गर्लफ्रैंड श्रेया के साथ मां के साथ ही रहता था.

रघुवीर सिंह एक बिगड़ा हुआ नवाब था. लाडप्यार ने उसे इस कदर बिगाड़ दिया था कि उस पर किसी का अंकुश नहीं रह गया था. ड्रग एडिक्ट होने की वजह से मांबेटे में बिलकुल नहीं बनती थी. वह ड्रग के लिए अकसर मां संध्या सिंह से पैसे मांगता रहता था. मना करने पर वह उन से लड़ाईझगड़ा करता था. कई बार तो उस ने मां पर हाथ भी उठा दिया था.

संध्या सिंह जहां फिल्मों से जुड़े परिवार से थीं, वहीं उन के पति जयप्रकाश सिंह भी एक वीआईपी परिवार से थे. दोनों ही परिवार काफी संभ्रांत और प्रतिष्ठित थे. जयप्रकाश सिंह प्रशासनिक सेवा के अंतर्गत सेंट्रल कस्टम ऐंड एक्साइज कमिश्नर थे. कई सालों तक मुंबई में तैनात रहने के बाद उन का तबादला इंदौर हो गया था. उन के एक भाई मुंबई एयरपोर्ट के चीफ सिक्युरिटी अफसर थे तो एक अन्य भाई बंगलुरु में पुलिस कमिश्नर थे.

दूसरी ओर संध्या सिंह के दादा पंडित जसराज विश्वप्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत गायक थे तो उन के 2 भाई जतिन और ललित बौलीवुड में संगीतकार हैं. अभिनेत्री और गायिका सुलक्षणा पंडित और विजयेता पंडित उन की छोटी बहनें हैं. संध्या सिंह को फिल्मों में काम करना पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने फिल्मों से हट कर जयप्रकाश सिंह से शादी कर ली थी.

संध्या की जयप्रकाश सिंह से दुबई से भारत आते हुए हवाईजहाज में मुलाकात हुई थी. रास्ते में होने वाली बातचीत ने दोनों को इस कदर प्रभावित किया था कि उन में दोस्ती हो गई. दोनों ही प्रतिष्ठित और संपन्न परिवारों से थे, इसलिए उन की यह दोस्ती धीरेधीरे प्यार में बदल गई. इस के बाद दोनों ने शादी कर के अपनी गृहस्थी बसा ली.

यही संध्या 13 दिसंबर, 2012 की दोपहर को करीब 11 बजे अपने घर से 20 लाख के गहने ले कर बैंक के लौकर में रखने के इरादे से निकलीं तो लौट कर नहीं आईं. यह इलाका थाना एनआरआई के अंतर्गत आता था. जब संध्या सिंह की गुमशुदगी की सूचना थाना एनआरआई पुलिस को दी गई तो मामला बड़े और वीआईपी परिवार से जुड़ा होने के कारण वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक राजकुमार चाफेकर ने तत्काल इस बात की जानकारी उच्चाधिकारियों को दी और अपने सहायकों के साथ उन की तलाश में जुट गए.

मामला रसूखदार परिवारों से जुड़ा था, इसलिए नवी मुंबई के पुलिस आयुक्त अशोक शर्मा ने तत्काल योग्य और कुशल पुलिस अधिकारियों की 4 टीमें बना कर मामले की जांच में लगा दिया. इन टीमों में क्राइम ब्रांच, 2 पुलिस उपायुक्त और 7 वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक भी शामिल थे. वरिष्ठ अधिकारियों के दिशानिर्देश में चारों टीमें संध्या सिंह की तलाश में जुट गईं.

पूछताछ में पता चला था कि 13 दिसंबर, 2012 को संध्या सिंह 20 लाख के गहने ले कर नेरुल की अभ्युदय बैंक के लौकर में रखने के लिए घर से निकली थीं तो लौट कर नहीं आई थीं. वह घर से निकल रही थीं तो बेटे रघुवीर सिंह ने उन से बैंक तक छोड़ने को कहा था, लेकिन उन्होंने उस के साथ जाने से मना कर दिया था. इमारत से निकल कर वह आटो स्टैंड की ओर जा रही थीं, तभी उसी कौंप्लेक्स की इमारत नंबर 32 की रहने वाली उन की सहेली उमा गौर उन्हें मिल गईं. वह अपनी कार से दादर जा रही थीं. उन्होंने संध्या सिंह को अपनी कार में बैठा लिया था.

उमा गौर टीवी सीरियलों और फिल्मों में स्क्रिप्ट लिखने का काम करती थीं. संध्या सिंह से उन की जानपहचान तब हुई थी, जब उन की बहन की शादी थी. उन्हें बहन की शादी में आने वाले मेहमानों को ठहराने के लिए एक मकान की जरूरत थी. वह मकान की तलाश कर रही थीं, तभी उन्हें उसी कालोनी की भीमा शंकर इमारत में संध्या सिंह के खाली पड़े मकान के बारे में पता चला था. उमा ने संध्या सिंह से संपर्क किया और कुछ दिनों के लिए उन से अपना मकान देने को कहा.

संध्या सिंह ने बिना किसी किराए के अपना वह मकान उन्हें दे दिया था. चूंकि संध्या सिंह फिल्में और सीरियल तो देखती ही थीं, इस के अलावा वह एक फिल्मी परिवार से जुड़ी थीं, इसलिए उमा और उन के बीच दोस्ती हो गई थी. यही वजह थी कि उस दिन वह किसी काम से दादर जा रही थीं तो रास्ते में संध्या सिंह को देख कर अपनी कार में बैठा लिया था. उन्होंने उन्हें अभ्युदय बैंक के सामने छोड़ा था.