Family Dispute : पत्नी ने साजिश रचकर पति को गोली से मरवाया

Family Dispute : राजनीति में पैसा भी है और पावर भी, लेकिन इन चीजों को पचाना सब के बस की बात नहीं होती. रणजीत जमीन से उठ कर एक खास मुकाम तक भी पहुंच गया और 2-2 महिलाओं से शादी भी रचा ली, लेकिन उस ने सोचा भी नहीं होगा कि…

बात सन 2000 की है. गोरखपुर के कैंट थाना क्षेत्र इलाके के चेतना तिराहे पर एक नुक्कड़ नाटक चल रहा था. नाटक के कलाकार ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगा रहे थे. ये लोग देशभक्ति से ओतप्रोत नाटक का मंचन करते हुए लोगों को जागरूक कर रहे थे. सामान्य कदकाठी और गेहुंआ रंग का एक युवक नाटक का निर्देशन कर रहा था. वही कलाकारों का लीडर था. उस का नाम था रणजीत कुमार श्रीवास्तव उर्फ रणजीत बच्चन. सदी के महानायक अमिताभ बच्चन से प्रेरित हो कर रणजीत ने अपने नाम के आगे बच्चन शब्द जोड़ लिया था. दरअसल, रणजीत रंगमंच का एक उम्दा कलाकार था. कला की दुनिया में वह नाम कमाना चाहता था, इसलिए सतत प्रयासरत था.

‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे सुन कर एक युवती के पांव थम से गए. उसे नाटक इतना भाया कि वह नाटक खत्म होने तक वहीं जमी रही. वह युवती पूर्वांचल मैराथन की प्रथम विजेता कालिंदी शर्मा थी, जो मूलरूप से कुशीनगर जिले के थाना नेबुआ में आने वाले भंडार बिंदौलिया की रहने वाली थी. उस वक्त वह गोरखपुर के शाहपुर इलाके के असुरन चौक के पास अपने मातापिता और 5 बहनों के साथ रह रही थी. नुक्कड़ नाटक के समापन के बाद कालिंदी ने कलाकारों से पूछा कि तुम्हारा लीडर कौन है? उन में से एक कलाकार ने रणजीत बच्चन की ओर इशारा कर के बताया कि वही हमारे लीडर हैं. नाटक का मंचन उन्हीं के निर्देशन में होता है.

कालिंदी शर्मा ने रणजीत बच्चन से मुलाकात की और अपने बारे में बताया. कालिंदी का परिचय जान कर रणजीत काफी प्रभावित हुआ. इस मुलाकात के बाद दोनों में दोस्ती हो गई. दरअसल, कालिंदी की चाहत थी कि वह देश के लिए कुछ करे. रणजीत की सोच भी यही थी कि वह कुछ ऐसा करे, जिस से उस का नाम हो. दोनों की एक ही सोच थी, कुछ बड़ा करने की. अब तक दोनों अलगअलग थे. दोनों की सोच एक जैसी निकली तो दोनों की दिशाएं एक हो गईं. इसी बीच कालिंदी के जीवन के साथ एक नया कीर्तिमान जुड़ गया था. मैराथन दौड़ में प्रथम आने के आधार पर उसे नेहरू युवा केंद्र के सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु 2 साल के लिए एनएसबी सदस्य बना दिया गया था. संस्थान की ओर से उसे समाज को जागरूक करने वाले कुछ कार्यक्रम करने को कहा गया था, उस में नुक्कड़ नाटक का भी कराया जाना था. विषय था सारक्षरता.

कालिंदी ने रणजीत के साथ मिल कर नाटक का प्रस्तुतीकरण कराया जिस से लोग काफी प्रभावित हुए. कालिंदी के इस काम से संस्थान के निदेशक खुश हुए. इस मंचन के बाद से कालिंदी के दिल में रणजीत के लिए सौफ्ट कौर्नर बन गया, कह सकते हैं कि वह रणजीत को चाहने लगी थी. 40 वर्षीया कालिंदी शर्मा 5 बहनों में सबसे बड़ी थी. उस के पिता परमात्मा शर्मा प्राइवेट नौकरी करते थे. उन की आमदनी बहुत कम थी. उसी से परिवार के भरणपोषण के साथसाथ बेटियों की पढ़ाई का खर्चा भी होता था. कालिंदी परमात्मा शर्मा की सब से बड़ी संतान थी. कालिंदी ने अपनी लगन और परिश्रम की बदौलत समाजशास्त्र से परास्नातक की डिग्री ली.

करीब 45 वर्षीय रणजीत कुमार श्रीवास्तव उर्फ रणजीत बच्चन मूलरूप से गोरखपुर के गोला थाना क्षेत्र के अहिरौली लाला टोला का रहने वाला था. उस के पिता ताराशंकर श्रीवास्तव सिंचाई विभाग में ट्यूबवेल आपरेटर थे. कहने को तो ताराशंकर मूलरूप से अहिरौली गांव के निवासी थे, लेकिन 4 दशक पहले उन्होंने अपना गांव छोड़ दिया था. वह परिवार सहित गोरखपुर आ कर बस गए थे. 20 साल पहले सन 2000 में ताराशंकर की मृत्यु हो गई थी. पिता की मृत्यु के बाद परिवार की सारी जिम्मेदारी तीसरे बेटे रघुवंश कुमार श्रीवास्तव के कंधों पर आ गई थी. बाद में उन के 2 बड़े बेटों पप्पू और राजेश की भी बीमारी से मौत हो गई. रघुवंश अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी अंजाम देते रहे.

ताराशंकर की सभी संतानों में सब से कुशाग्र बुद्धि वाला उन का सब से छोटा बेटा रणजीत था. उस में कुछ नया करने की जिजीविषा रहती थी. होश संभालने के बाद जब वह कुछ समझदार हुआ तो बड़ा हो कर फिल्मी दुनिया में जाने की सोचने लगा. रणजीत गांव के कुछ युवकों की टोली बना कर नुक्कड़ नाटक किया करता था. इसी नुक्कड़ नाटक के जरिए उस की मुलाकात कालिंदी से हुई. सन 2002 के जनवरी में कालिंदी के मन में एक योजना आई. ॒यह योजना थी साइकिल यात्रा से देश में शांति का संदेश फैलाना. कालिंदी ने यह बात रणजीत को बताई तो वह खुश हुआ. रणजीत ने कालिंदी की साइकिल यात्रा पर मुहर लगा दी. रणजीत बच्चन ने कालिंदी सहित अपनी नाटक मंडली के 16 सदस्यों सहित यात्रा की तैयारी कर ली. टीम का नेतृत्व उस ने अपने हाथों में ले लिया.

4 फरवरी, 2002 को रणजीत बच्चन के नेतृत्व में साइकिल से भारत भ्रमण यात्रा शुरू हुई. आखिरी समय में सिर्फ कालिंदी और रणजीत बच्चन ही बचे रहे. 7 साल 10 महीने 14 दिन में दोनों ने भारत, नेपाल और भूटान सहित साइकिल से 1 लाख 32 हजार किलोमीटर की यात्रा तय कर के एक नया कीर्तिमान स्थापित किया था. इस उपलब्धि के लिए लिम्का बुक औफ रिकौर्ड्स में दोनों के नाम दर्ज हुए. इसी यात्रा के दौरान फरवरी, 2005 में कालिंदी और रणजीत बच्चन ने महाराष्ट्र के नासिक में एक मंदिर में गंधर्व विवाह कर लिया था. लेकिन दोनों ने अपने प्रेम विवाह को घरपरिवार और समाज से छिपा कर रखा. फिर जब बात खुली तो 9 साल बाद 31 मार्च, 2014 को परिवार वालों ने इस शादी पर अपनी स्वीकृति की मोहर लगा दी.

साइकिल यात्रा के दौरान सरकार और लोगों से काफी पैसा मिला था. उन पैसों से रणजीत ने गोरखपुर के गुलरिहा थानाक्षेत्र के पतरका टोला में अपने नाम से एक जमीन खरीद ली. उस जमीन पर रणजीत अपनी मां के नाम पर कौशल्या देवी वृद्ध एवं अनाथ आश्रम खोलना चाहता था. योजना पर काम भी शुरू किया गया, लेकिन यह योजना पूरी हो पाती, इस से पहले ही उस की हत्या हो गई. नुक्कड़ नाटकों से न तो कोई मुकाम मिलने वाला था और न ही दौलत. रणजीत यह बात समझ गया था. फलस्वरूप उस ने अपनी दिशा बदल दी, लेकिन लक्ष्य वही रहा. उन दिनों प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी.

सत्ताधारी दल के साथ रहना मुफीद था, इसलिए रणजीत ने जुगाड़ लगा कर बसपा की सदस्यता ग्रहण कर ली. लेकिन उस ने जो सोचा था, वह नहीं हो सका. इस पर रणजीत ने बसपा छोड़ कर समाजवादी पार्टी की सदस्यता ले ली. सन 2013 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव होने वाला था. साइकिल समाजवादी पार्टी का चुनाव चिह्न है. चुनाव में रणजीत ने कालिंदी के साथ मिल कर साइकिल यात्रा के जरिए सपा के लिए खूब प्रचार किया, जिस का परिणाम सकारात्मक निकला. चर्चा में बने रहने के लिए रणजीत कुछ न कुछ करता रहता था. इस के लिए वह कभी महापुरुषों की प्रतिमा सफाई अभियान, कभी इंसेफेलाइटिस जागरूकता तो कभी पल्स पोलियो अभियान चलाता रहता था. शोहरत हासिल करने के लिए उस ने पानी पर साइकिल तक चलाई थी, लेकिन उसे मनचाहा मुकाम नहीं मिला.

रणजीत बच्चन का सितारा उस समय बुलंदियों पर पहुंच गया, जब प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी थी. अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने पर रणजीत को काफी महत्व मिला. उसे राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया गया. रणजीत और कालिंदी के काम से खुश हो कर अखिलेश यादव ने दोनों को 5-5 लाख का पुरस्कार भी दिया. रणजीत ने कालिंदी के हिस्से के भी पैसे खुद रख लिए थे. इस के बाद दोनों ने लखनऊ की ओसीआर बिल्डिंग के बी-ब्लौक के फ्लैट नंबर 604 आवंटित करा लिए था. राज्यमंत्री का दर्जा मिलने के बाद रणजीत बच्चन के शौक भी बढ़ गए थे. बाइक से चलने वाले रणजीत ने अब कार लेने का मन बना लिया था. नवंबर, 2014 के अंतिम सप्ताह में रणजीत ने ओएलएक्स पर एक एक्सयूवी कार देखी. कार उसे पसंद आ गई. वह कार लखनऊ के संजय श्रीवास्तव के नाम पर रजिस्टर्ड थी.

जय श्रीवास्तव की बेटी स्मृति वर्मा ने कार बेचने के लिए ओएलएक्स साइट पर डाल रखी थी. स्मृति वर्मा लखनऊ की विकास नगर कालोनी के आवास संख्या- 2/625 में रहती थी. साइट पर कार के साथ स्मृति का फोन नंबर भी था. बातचीत के बाद सौदा पक्का हो गया तो 27 नवंबर को रणजीत दोस्तों के साथ वाहन की डिलिवरी लेने लखनऊ स्थित स्मृति के घर विकास नगर पहुंच गया. रणजीत बच्चन ने जब दूधिया रंगत वाली बला की खूबसूरत स्मृति को देखा तो उसे अपलक देखता रह गया. एक ही नजर में स्मृति रणजीत की आंखों के रास्ते उस के दिल में उतर गई. उस ने तय कर लिया कि सौदा चाहे कितना भी मंहगा हो, तय कर के ही रहेगा. पेशगी के तौर पर रणजीत ने स्मृति को साढ़े 4 लाख रुपए नकद दे दिए. बाकी के रुपए कागजात हैंडओवर होने के बाद देना तय हुआ. इस पर स्मृति मान गई तो वह कार ले कर गोरखपुर आ गया.

इस के बाद स्मृति और रणजीत के बीच मोबाइल पर बातचीत होने लगी. बातोंबातों में रणजीत को पता चला कि स्मृति पिता के स्थान पर कोषागार विभाग में कनिष्ठ लेखाकार है. रणजीत ने जब से स्मृति को देखा था, उस का दिन का चैन और रात की नींद उड़ गई थी. उस के दिमाग में एक ही बात उछलकूद मचा रही थी कि चाहे जैसे भी हो, स्मृति को अपना बना ले. इस के लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार था. जिन दिनों की यह बात है उन दिनों कालिंदी रणजीत के बच्चे की मां बनने वाली थी. लेकिन उसे इस की कोई परवाह नहीं थी. वह पूरी तरह से स्मृति के प्यार के रंग में डूब चुका था. इसी चक्कर में उस ने स्मृति से खुद को कुंवारा बताया था. उस ने अपनी लच्छेदार बातों से स्मृति के चारों ओर सम्मोहन का ऐसा जाल फैला दिया कि वह उसी जाल में घिर गई. रणजीत स्मृति से प्रेम करने लगा था, स्मृति भी उस से प्यार करती थी.

स्मृति वर्मा का रणजीत की ओर झुकाव तब हुआ, जब उसे पता चला कि सत्ता के गलियारे में उस की पहुंच बहुत ऊपर तक है. इतना ही नहीं, वह दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री है. प्रदेश सरकार में उस की अच्छी धाक है. रणजीत ने स्मृति के घर आनाजाना शुरू कर दिया था. बराबर आनेजाने से रणजीत ने स्मृति के अतीत के पन्नों को पढ़ लिया था, जिन में उस के जीवन के पन्नों पर कई दुख भरी कहानियां लिखी हुई थीं. राजधानी लखनऊ के विकासनगर में नायब तहसीलदार संजय श्रीवास्तव परिवार सहित रहते थे. पत्नी शोभना और 3 बच्चों में 2 बेटियां थीं, श्रुति और स्मृति और एक बेटा शिवांश. शोभना के शरीर पर जगहजगह सफेद दाग थे. सफेद दाग की वजह से संजय पत्नी को पसंद नहीं करते थे.

उन्होंने शोभना को तलाक दे दिया था. शोभना के पास 3 बच्चे थे. तीनों के पालनपोषण की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर थी. ऐसे में वह क्या करती, बच्चों को ले कर कहां जाती. तलाक के बावजूद शोभना बच्चों के साथ पति के ही घर में रहती थी. नायब तहसीलदार संजय श्रीवास्तव के घर में तलाकशुदा शोभना भी रह रही थी, लेकिन दोनों के बीच कोई संबंध नहीं था. बाद में संजय श्रीवास्तव ने कानपुर की रहने वाली एक दूसरी महिला से शादी कर ली. उन्होंने शादी तो कर ली, लेकिन पत्नी को अपने घर नहीं ला सके. बच्चों और शोभना के दबाव के चलते संजय का जीवन रेत के महल सा हो गया था. इसलिए दूसरी पत्नी अकसर कानपुर में ही रहती रही.

पहली पत्नी शोभना के तीनों बच्चे धीरेधीरे बड़े होते रहे. इन में दूसरे नंबर की बेटी स्मृति खूबसूरत और जहीन थी. बात सन 2013 की है. नायब तहसीलदार संजय की बड़ी बेटी श्रुति अपने प्रेमी के साथ घर से अचानक भाग गई. बेटी के इस घिनौने कदम से संजय श्रीवास्तव की समाज में बहुत बदनामी हुई. बेटी की इस करतूत से बुरी तरह आहत तहसीलदार श्रीवास्तव ने सारी संपत्तियों की पावर औफ अटार्नी छोटी बेटी स्मृति के नाम कर दी ताकि उन के न रहने पर वह संपत्ति की देखभाल कर सके. आननफानन में तहसीलदार संजय ने स्मृति की शादी लखनऊ के एक बैंक मैनेजर के साथ तय कर दी थी.

तिलक की रस्म भी पूरी हो गई थी. चढ़ावे में नकदी और लाखों रुपए के कीमती गहने चढ़ाए गए. घर में शादी की जोरशोर से तैयारियां चल रही थीं, अचानक एक दुखद हादसे ने बहुत कुछ बदल दिया. तिलक की रस्म के कुछ दिनों बाद की बात है. रात का समय था. संजय श्रीवास्तव अपनी छत पर टहल रहे थे. अचानक वह रहस्यमय तरीके से छत से नीचे सड़क पर जा गिरे. सिर में आई गंभीर चोट की वजह से मौके पर ही उन की मौत हो गई. वह छत से कैसे गिरे, यह रहस्य आज भी बरकरार है. जहां खुशियां होनी चाहिए थीं, वहां मातम छा गया. पिता की मौत के बाद स्मृति की शादी टूट गई. लाखों रुपए नकद और लाखों के जेवरात ससुराल में फंसे रह गए. स्मृति के ससुराल वालों ने पैसे और जेवर लौटाने से मना कर दिया.

स्मृति के सामने ससुराल वालों से सामान वापस लेना चुनौती थी. ऐसे में रणजीत बच्चन स्मृति से टकरा गया. दोनों के बीच जब नजदीकियां बढ़ीं तो स्मृति ने अपनी आपबीती रणजीत से बता कर ससुराल से नकदी और गहने वापस दिलवाने की पेशकश की. उस ने यह भी कह दिया था कि जिस दिन वह गहने और नकदी दिलवा देगा उसी दिन वह उस की हो जाएगी. रणजीत के लिए स्मृति की शर्त जीतना कोई बड़ी बात नहीं थी. क्योंकि उस पास साम, दाम, दंड, भेद चारों शस्त्र थे, इसलिए थोड़ी चुनौतियों का सामना करते हुए उस ने स्मृति की ससुराल जा कर चारों शस्त्र आजमाए. भले ही जबरदस्ती सही, लेकिन उस ने नकदी और जेवरात वसूल कर स्मृति की झोली में डाल दिए.

रणजीत की इस दबंगई से खुश हो कर स्मृति ने उस से शादी करने के लिए हामी भर दी. आखिर 18 जनवरी, 2015 को रणजीत और स्मृति ने मंदिर में जा कर शादी कर ली. रणजीत ने यह राज पहली पत्नी कालिंदी से छिपाए रखा. रणजीत द्वारा स्मृति से शादी करने के 3 दिनों बाद 21 जनवरी को कालिंदी ने बेटे को जन्म दिया. कालिंदी के मां बनने की जानकारी मिलने के बाद भी रणजीत पत्नी को देखने हौस्पिटल तक नहीं आया. लेकिन रणजीत की सच्चाई न तो पहली पत्नी कालिंदी से छिप सकी और न ही दूसरी पत्नी स्मृति वर्मा से.

कालिंदी को जब रणजीत की दूसरी शादी की बात पता चली तो उस के पैरों तले से मानो जमीन ही खिसक गई. उसे रणजीत से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि जिस रणजीत के लिए उस ने अपने घर वालों से बगावत कर उसे अपना जीवन सौंप दिया था, वही हमसफर सितमगर निकलेगा. जब यह बात दूसरी पत्नी स्मृति को पता चली कि रणजीत पहले से ही शादीशुदा है तो उस की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. रणजीत ने उसे धोखा दिया था. उस ने एक साथ कई जिंदगियां दांव पर लगा दी थीं. पति की सच्चाई सामने आने के बाद स्मृति उसे छोड़ कर विकासनगर वापस लौट आई. उसे नाराज देख रणजीत के हाथपांव ठंडे पड़ गए.

स्मृति से रणजीत इतना प्यार करता था कि उस की जुदाई एक पल के लिए बर्दाश्त नहीं कर सकता था, वह सच्चाई जान कर उस से नाराज हो कर गई थी इसलिए रणजीत ने स्मृति को मनाने के लिए जमीनआसमान एक कर दिया. खैर, पहली पत्नी कालिंदी चुप बैठने वालों में से नहीं थी. पति के धोखा देने के एवज में उस ने रणजीत के खिलाफ गोरखपुर महिला थाने में एक तहरीर दी. कालिंदी के उठाए कड़े कदम से रणजीत की त्यौरियां चढ़ गईं. दोनों के प्यार ने अब नफरत और दुश्मनी का रंग ले लिया.

स्थिति यहां तक पहुंच गई कि जहां देखो हत्या कर दो. कालिंदी अपनी और बच्चे की जान बचाने के लिए यहांवहां छिपती रही. जान का दुश्मन बना रणजीत कालिंदी को नहीं ढूंढ पाया. कालिंदी भागतेभागते थक चुकी थी. वह जानती थी कि रणजीत से जीत पाना आसान नहीं है. आखिर उस ने रणजीत के सामने घुटने टेक दिए. इस का सब से बड़ा कारण यह था कि उस के मायके वालों ने उस का साथ देना छोड़ दिया था. वे रणजीत की करतूतों से बेहद नाराज थे. ऐसे में कालिंदी के सामने एक ही सहारा बचा था, रणजीत के पास वापस लौटने का. आखिरकार कालिंदी बेटे आदित्य को ले कर रणजीत के पास लखनऊ आ गई, रणजीत ने भी सारे गिलेशिकवे भुला कर उसे माफ कर दिया.

कहते हैं एक म्यान में 2 तलवारें नहीं रह सकतीं. सच भी यही है. कालिंदी के ओसीआर आते ही स्मृति ने रणजीत से दूरी बना ली. स्मृति से दूरियां रणजीत से सहन नहीं हो रही थीं. स्मृति की दूरियों से खुन्नस खाया रणजीत कालिंदी पर अपनी मर्दानगी और जुल्म की कहानी लातघूंसों से लिखता था और मोबाइल का स्पीकर औन कर के स्मृति को सुनाता था. वह यह दिखाने की कोशिश करता था कि वो उसे कितना प्यार करता है, इसी से अंदाजा लगा सकती है. जबकि बेटे की खातिर कालिंदी पति के जुल्मों को सह कर भी उफ तक नहीं करती थी.

कालिंदी पर एक और आपदा तब टूटी जब 2017 में उस के ढाई साल के बेटे आदित्य की मृत्यु हो गई. बेटे की मौत से कालिंदी ही नहीं रणजीत भी बुरी तरह से टूट गया. इस घटना के बाद से रणजीत का झुकाव अध्यात्म की तरफ हो गया और वह एक वस्त्र (गेरुआ वस्त्र) धारण करने लगा. इस दौरान वह अखिल भारतीय हिंदू महासभा के संस्थापक चक्रपाणि महाराज के संपर्क में आया और संगठन का प्रदेश अध्यक्ष बन गया. बाद में रणजीत बच्चन ने अपना खुद का संगठन ‘विश्व हिंदू महासभा’ बनाया और खुद को उस का अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया. कालिंदी उस की सहयोगी रही.

हिंदूवादी नेता की छवि बनाने के लिए वह भगवा कपड़े पहनने लगा. विभिन्न मंचों से हिंदुत्व पर बेबाक टिप्पणी करने लगा, जिस से उसकी छवि हिंदू नेता के रूप में उभरने लगी. अतिमहत्त्वाकांक्षी रणजीत का संगठन चल निकला. धीरेधीरे बेटे की मौत को वह भूलने लगा था. अब भी वह स्मृति की याद में पागल था. जबकि स्मृति उस से दूर हो चली थी. उस के जीवन में दूसरा पुरुष आ गया था, जिस का नाम दीपेंद्र सिंह था. सन 2017 में अमर नगर रायबरेली निवासी दीपेंद्र की स्मृति से मुलाकात उस के दफ्तर में हुई थी. वह किसी आवश्यक काम से वहां आया था. धीरेधीरे दोनों की मुलाकातें होती रहीं. दोनों पहले दोस्त, फिर दोस्त से प्रेमी बन गए. दोनों एकदूसरे से प्यार करने लगे थे और शादी करना चाहते थे.

रणजीत से छुटकारा पाने के लिए स्मृति ने अदालत में तलाक की अर्जी दाखिल कर दी थी. रणजीत ने स्मृति को तलाक देने से साफ इनकार कर दिया था. वह जान चुका था कि स्मृति दीपेंद्र से प्यार करने लगी है. रणजीत ने खुले तौर पर स्मृति को धमकी दी कि वह दीपेंद्र का साथ छोड़ दे अन्यथा इसका अंजाम बहुत बुरा होगा. रणजीत के धमकाने का स्मृति पर कोई असर नहीं हुआ था. बावजूद इस के वह खुलकर दीपेंद्र से मिलती रही. यह बात रणजीत से सहन नहीं हो पा रही थी. दीपेंद्र को ले कर रणजीत और स्मृति के बीच विवाद बढ़ता गया. रणजीत स्मृति के पीछे जितनी तेज भागता गया, स्मृति उतनी ही तेजी से दीपेंद्र के पास आती गई. जबकि कालिंदी रणजीत के पीछे भाग रही थी.

बात 18 जनवरी, 2020 की है. उस दिन रणजीत और स्मृति की शादी की सालगिरह थी. लखनऊ के एक बड़े होटल में रणजीत ने दिन में एक पार्टी का आयोजन किया था. उस ने खासतौर पर स्मृति को आने के लिए आमंत्रित किया था. पार्टी में बड़ेबड़े लोग आए थे. समय बीत जाने के बाद भी स्मृति वहां नहीं पहुंची, तो रणजीत ने खुद को अपमानित महसूस किया. उसे स्मृति पर गुस्सा भी आया. उस ने मन ही मन स्मृति को सबक सिखाने की ठान ली. जैसेतैसे पार्टी खत्म कर के वह स्मृति के घर जा पहुंचा. संयोग से उस की मुलाकात घर पर ही हो गई. स्मृति को देखते ही रणजीत का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उस ने आव देखा न ताव, गुस्से से तमतमाते हुए स्मृति के गालों पर एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया.

थप्पड़ इतना जोरदार था कि उसे दिन में तारे नजर आने लगे. उसे सावधान करते हुए रणजीत ने दीपेंद्र का साथ छोड़ने के लिए हिदायत दी और वापस लौट आया. रणजीत का यह थप्पड़ स्मृति को काफी नागवार गुजरा. उस ने यह बात दीपेंद्र से बताई और रणजीत को सदा के लिए रास्ते से हटाने का दबाव बनाया. दीपेंद्र स्मृति से टूट कर प्यार करता था. उस ने इस काम के लिए हामी भर दी. दीपेंद्र ने इस के लिए अपने चचेरे भाई जितेंद्र की मदद ली. जितेंद्र मनबढ़ किस्म का युवक था. उस के खिलाफ रायबरेली के कई थानों में गंभीर और संगीन आपराधिक मुकदमे दर्ज थे. जितेंद्र तैयार हो गया.

योजना बनने के बाद 29 जनवरी, 2020 को दीपेंद्र चचेरे भाई जितेंद्र को साथ ले कर अपनी गाड़ी से रायबरेली से लखनऊ पहुंचा और 3 दिनों तक शहर में रह कर उस ने रणजीत की रेकी की. वह घर से कब निकलता है, कब घर लौटता है. घर से निकलते समय उस के साथ कौनकौन होता है, वगैरह. दीपेंद्र और जितेंद्र ने 3 दिनों तक रेकी कर के रणजीत की पूरी कुंडली तैयार कर ली और रायबरेली लौट आए. 1 फरवरी, 2020 की रात दीपेंद्र और उस का भाई जितेंद्र ड्राइवर संजीत के साथ बोलेनो कार से लखनऊ आ कर एक होटल में ठहर गए.

2 फरवरी की सुबह साढ़े 5 बजे डेली रूटीन के तहत सब से पहले घर से कालिंदी मौर्निंग वाक के लिए निकली. उस के 2-4 मिनट के अंतराल पर रणजीत अपने पुराने परिचित और गोरखपुर निवासी आदित्य कुमार श्रीवास्तव उर्फ सोनू के साथ निकला. आदित्य कुछ दिन पहले एक ठेके के संबंध में रणजीत से मिलने आया था. रणजीत ने उसे वाक पर साथ चलने के लिए कहा, तो वह साथ हो गया. कालिंदी आगेआगे दौड़ती हुई जा रही थी और पीछे मुड़मुड़ कर देख रही थी कि रणजीत कहां तक पंहुचे. कालिंदी पहली बार ग्लोब पार्क की ओर निकली थी. रणजीत और आदित्य जब पार्क की ओर आते दिखे तो उस ने उन्हें हाथ हिला कर इशारा किया कि वह आगे बढ़ रही है.

कालिंदी दयानिधान पार्क की ओर दौड़ती हुई चली गई, जहां वह अक्सर जाया करती थी. इधर हजरतगंज चौराहे के पास दीपेंद्र कार से उतर गया. जितेंद्र थोड़ी दूर स्थित कैपिटल सिनेमा के पास उतरा और वहीं खड़ा हो गया. रणजीत आदित्य के साथ ओसीआर से निकल कर सीडीआरआई जा रहा था. उसी वक्त जितेंद्र ने उस का पीछा करना शुरू कर दिया था. वह शाल से अपना चेहरा ढके हुए था. जैसे ही दोनों ग्लोब पार्क के पास पहुंचे, जितेंद्र फुरती के साथ आगे बढ़ा और पिस्टल निकाल कर रणजीत पर तान दिया. उस ने दोनों से मोबाइल फोन मांगा तो रणजीत और आदित्य ने कोई मोबाइल चोर समझ कर अपनेअपने फोन उस की ओर बढ़ा दिए. जितेंद्र ने दोनों के फोन अपने कब्जे में कर लिए.

रणजीत और आदित्य कुछ समझ पाते, तब तक जितेंद्र ने रणजीत को लक्ष्य बना कर उस के सिर में .32 बोर की गोली मार दी. गोली लगते ही रणजीत वहीं जमीन पर गिर पड़ा. यह देख आदित्य अपनी जान बचा कर वहां से भागा, तो जितेंद्र ने उसे भी गोली मार दी. यह संयोग ही था कि गोली उस के बाएं हाथ में लगी. गोली मारने के बाद जितेंद्र वहां से भाग निकला और दीपेंद्र के पास जा पहुंचा. दीपेंद्र उस का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. उस ने बताया कि काम हो गया है. फिर उसी कार में सवार हो कर दोनों रायबरेली चले गए.

उसी दिन शाम को दीपेंद्र और जितेंद्र रायबरेली से इलाहाबाद पहुंचे. वहां से दोनों मुंबई भाग गए. बीच रास्ते में दीपेंद्र ने स्मृति को मैसेज कर के बता दिया था कि काम हो गया. यह सुन कर वह खुश हो गई. गोली से घायल आदित्य श्रीवास्तव की तहरीर पर हजरतगंज पुलिस ने भारतीय दंड विधान की धारा 302, 307 के तहत अज्ञात बदमाशों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. लखनऊ के पुलिस कमिश्नर सुजीत पांडेय ने घटना का खुलासा करने के लिए 8 टीमें गठित कर दीं.

जांच की दिशा जर, जमीन और जोरू को ले कर तय की गई थी. पुलिस ने पहली पत्नी कालिंदी से पूछताछ शुरू की. कालिंदी से हुई पूछताछ से पता चला कि रणजीत ने दूसरी शादी विकास नगर सेक्टर-2/625 की रहने वाली स्मृति वर्मा से की थी. तकरीबन 4 दिनों की छानबीन के बाद पुलिस का पुख्ता शक दूसरी पत्नी स्मृति वर्मा पर जा टिका. पुलिस ने स्मृति को हिरासत में ले कर उस से कड़ाई से पूछताछ की, तो वह टूट गई और पूरी कहानी पुलिस को बता दी. उस ने अपना जुर्म कबूल करते हुए बताया कि रणजीत की हत्या उसी ने अपने प्रेमी दीपेंद्र से मिल कर कराई थी.

पूछताछ में उस ने दीपेंद्र के मुंबई चले जाने की बात बताई. उसी दिन हजरतगंज पुलिस टीम फ्लाइट से मुंबई पहुंची और वहां से दीपेंद्र को गिरफ्तार कर के लखनऊ ले आई. पता नहीं कैसे शूटर जितेंद्र को पुलिस के आने की भनक लग गई थी और वह वहां से फरार हो गया था. 6 फरवरी, 2020 को पुलिस ने रणजीत हत्याकांड के 3 आरोपियों— स्मृति वर्मा प्रेमी दीपेंद्र और ड्राइवर संजीत को गिरफ्तार कर लिया. कमिश्नर सुजीत पांडेय ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर के घटना का खुलासा किया. 3 दिन बाद पुलिस मुठभेड़ के बाद हजरतगंज में शूटर जितेंद्र को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

कथा लिखे जाने तक चारों आरोपी जेल में थे. पुलिस ने अज्ञात की जगह चारों आरोपियों स्मृति बच्चन उर्फ स्मृति वर्मा, दीपेंद्र, शूटर जितेंद्र और चालक संजीत को नामजद कर दिया था. यही नहीं, धारा 302, 307 के साथसाथ केस में धारा 120बी और 7 सीएलए की धाराएं भी जोड़ दी थी. कथा लिखे जाने तक पुलिस ने आरोपियों से रणजीत और आदित्य के मोबाइल फोन बरामद कर लिए थे.

—कथा वादी आदित्य, रणजीत की पहली पत्नी कालिंदी और पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Uttar Pradesh Crime : सपा एमलसी कमलेश पाठक की दबंगई की कहानी

Uttar Pradesh Crime : समाजवादी पार्टी से एमएलसी कमलेश पाठक दबंग नेता थे. उन के पास करोड़ों की अचल संपत्ति थी. इस के बावजूद वह एक मंदिर की बेशकीमती जमीन को कब्जाना चाहते थे. मुनुवां चौबे और इलाके के लोग इस का विरोध कर रहे थे. शहर कोतवाल और चौकी इंचार्ज की मौजूदगी में उन के बीच ऐसा खूनी तांडव…

उत्तर प्रदेश के औरैया शहर के मोहल्ला नारायणपुर में 15 मार्च, 2020 को सुबहसुबह खबर फैली कि पंचमुखी हनुमान मंदिर के पुजारी वीरेंद्र स्वरूप पाठक ब्रह्मलीन हो गए हैं. जिस ने भी यह खबर सुनी, पुजारी के अंतिम दर्शन के लिए चल पड़ा. देखते ही देखते उन के घर पर भीड़ बढ़ गई. चूंकि पंचमुखी हनुमान मंदिर की देखरेख एमएलसी कमलेश पाठक करते थे और उन्होंने ही अपने रिश्तेदार वीरेंद्र स्वरूप को मंदिर का पुजारी नियुक्त किया था, अत: पुजारी के निधन की खबर सुन कर वह भी लावलश्कर के साथ नारायणपुर पहुंच गए. उन के भाई रामू पाठक और संतोष पाठक भी आ गए.

अंतिम दर्शन के बाद एमएलसी कमलेश पाठक और उन के भाइयों ने मोहल्ले वालों के सामने प्रस्ताव रखा कि पुजारी वीरेंद्र स्वरूप पाठक इस मंदिर के पुजारी थे, इसलिए इन की भू समाधि मंदिर परिसर में ही बना दी जाए. यह प्रस्ताव सुनते ही मोहल्ले के लोग अवाक रह गए और आपस में खुसरफुसर करने लगे. चूंकि कमलेश पाठक बाहुबली पूर्व विधायक, दरजा प्राप्त राज्यमंत्री और वर्तमान में वह समाजवादी पार्टी से एमएलसी थे. औरैया ही नहीं, आसपास के जिलों में भी उन की तूती बोलती थी, सो उन के प्रस्ताव पर कोई भी विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा सका. नारायणपुर मोहल्ले में ही शिवकुमार चौबे उर्फ मुनुवा चौबे रहते थे.

उन का मकान मंदिर के पास था. कमलेश पाठक व मुनुवा चौबे में खूब पटती थी, सो मंदिर की चाबी उन्हीं के पास रहती थी. पुजारी उन्हीं से चाबी ले कर मंदिर खोलते व बंद करते थे. मोहल्ले के लोगों ने भले ही भय से मंदिर परिसर में पुजारी की समाधि का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था किंतु शिवकुमार उर्फ मुनुवा चौबे व उन के अधिवक्ता बेटे मंजुल चौबे को यह प्रस्ताव मंजूर नहीं था. मंजुल भी दबंग था, मोहल्ले में उस की भी हनक थी. दरअसल, पंचमुखी हनुमान मंदिर की एक एकड़ बेशकीमती जमीन बाजार से सटी हुई थी. शिवकुमार चौबे व उन के बेटे मंजुल चौबे को लगा कि कमलेश पाठक दबंगई दिखा कर पुजारी की समाधि के बहाने जमीन पर कब्जा करना चाहते हैं. चूंकि इस कीमती भूमि पर मुनुवा व उन के वकील बेटे मंजुल चौबे की भी नजर थी, सो उन्होंने भू समाधि का विरोध किया.

मंजुल चौबे को जब मोहल्ले वालों का सहयोग भी मिल गया तो कमलेश पाठक ने विरोध के कारण भू समाधि का विचार त्याग दिया. इस के बाद उन्होंने धूमधाम से पुजारी वीरेंद्र स्वरूप पाठक की शवयात्रा निकाली और यमुना नदी के शेरगढ़ घाट पर उन का अंतिम संस्कार कर दिया. शाम 3 बजे अंतिम संस्कार के बाद कमलेश पाठक वापस मंदिर परिसर आ गए. उस समय उन के साथ भाई रामू पाठक, संतोष पाठक, ड्राइवर लवकुश उर्फ छोटू, सरकारी गनर अवनीश प्रताप, कथावाचक राजेश शुक्ल तथा रिश्तेदार आशीष दुबे, कुलदीप अवस्थी, विकास अवस्थी, शुभम अवस्थी और कुछ अन्य लोग थे. इन में से अधिकांश के पास बंदूक और राइफल आदि हथियार थे. कमलेश पाठक ने मंदिर परिसर में पंचायत शुरू कर दी और शिवकुमार उर्फ मुनुवा चौबे को पंचायत में बुलाया.

मुनुवा चौबे का दबंग बेटा मंजुल चौबे उस समय घर पर नहीं था. अत: वह बड़े बेटे संजय के साथ पंचायत में आ गए. पंचायत में दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई. बातचीत के दौरान कमलेश पाठक ने मुनुवा चौबे से मंदिर की चाबी देने को कहा, लेकिन मुनुवा ने यह कह कर चाबी देने से इनकार कर दिया कि अभी तक मंदिर में तुम्हारा पुजारी नियुक्त था. अब वह मोहल्ले का पुजारी नियुक्त करेंगे और मंदिर की व्यवस्था भी स्वयं देखेंगे. मुनुवा चौबे की बात सुन कर एमएलसी कमलेश पाठक का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. दोनों के बीच विवाद होने लगा. इसी विवाद में कमलेश पाठक ने मुनुवा चौबे के गाल पर तमाचा जड़ दिया. मुनुवा का बड़ा बेटा संजय बीचबचाव में आया तो कमलेश ने उसे भी पीट दिया. मार खा कर बापबेटा घर चले गए. इसी बीच कुछ पत्रकार भी आ गए.

मंदिर परिसर में विवाद की जानकारी हुई, तो नारायणपुर चौकी के इंचार्ज नीरज त्रिपाठी भी आ गए. थानाप्रभारी एमएलसी कमलेश पाठक की दबंगई से वाकिफ थे, सो उन्होंने विवाद की सूचना औरैया कोतवाल आलोक दूबे को दे दी. सूचना पाते ही आलोक दूबे 10-12 पुलिसकर्मियों के साथ मंदिर परिसर में आ गए और कमलेश पाठक से विवाद के संबंध में आमनेसामने बैठ कर बात करने लगे. उधर अधिवक्ता मंजुल चौबे को कमलेश पाठक द्वारा पिता और भाई को बेइज्जत करने की बात पता चली तो उस का खून खौल उठा. उस ने अपने समर्थकों को बुलाया फिर भाई संजय,चचेरे भाई आशीष तथा चचेरी बहन सुधा को साथ लिया और मंदिर परिसर पहुंच गया.

पुलिस की मौजूदगी में कमलेश पाठक और मंजुल चौबे के बीच तीखी बहस होने लगी. इसी बीच मंजुल चौबे के समर्थकों ने पत्थरबाजी शुरू कर दी. एक पत्थर एमएलसी कमलेश पाठक के पैर में आ कर लगा और वह घायल हो गए. कमलेश पाठक के पैर से खून निकलता देख कर उन के भाई रामू पाठक, संतोष पाठक का खून खौल उठा. उन्होंने पुलिस की मौजूदगी में फायरिंग शुरू कर दी. उन के अन्य समर्थक भी फायरिंग करने लगे. कमलेश पाठक का सरकारी गनर अवनीश प्रताप व ड्राइवर छोटू भी मारपीट व फायरिंग करने लगे. संतोष पाठक की ताबड़तोड़ फायरिंग में एक गोली मंजुल की चचेरी बहन सुधा के सीने में लगी और वह जमीन पर गिर कर छटपटाने लगी. चंद मिनटों बाद ही सुधा ने दम तोड़ दिया.

चचेरी बहन सुधा को खून से लथपथ पड़ा देखा तो मंजुल चौबे उस की ओर लपका. लेकिन वह सुधा तक पहुंच पाता, उस के पहले ही एक गोली उस के माथे को भेदती हुई आरपार हो गई. मंजुल भी धराशाई हो गया. फायरिंग में मंजुल गुट के कई समर्थक भी घायल हो गए थे और जमीन पर पड़े तड़प रहे थे. फिल्मी स्टाइल में हुई ताबड़तोड़ फायरिंग से इतनी दहशत फैल गई कि पुलिसकर्मी अपनी जान बचाने को भाग खड़े हुए. मीडियाकर्मी भी जान बचा कर भागे. जबकि तमाशबीन घरों में दुबक गए. खूनी संघर्ष के बाद एमएलसी कमलेश पाठक अपने भाई रामू, संतोष तथा अन्य समर्थकों के साथ फरार हो गए. खूनी संघर्ष के दौरान घटनास्थल पर कोतवाल आलोक दूबे तथा चौकी इंचार्ज नीरज त्रिपाठी मय पुलिस फोर्स के मौजूद थे. लेकिन पुलिस नेअपने हाथ नहीं खोले और न ही किसी को चेतावनी दी.

हमलावरों के जाने के बाद कोतवाल आलोक दूबे ने निरीक्षण किया तो 2 लाशें घटनास्थल पर पड़ी थीं. एक लाश शिवकुमार चौबे के बेटे मंजुल चौबे की थी तथा दूसरी उस की चचेरी बहन सुधा की. घायलों में संजय चौबे, अंशुल चौबे, अंकुर शुक्ला तथा अजीत एडवोकेट थे. सभी घायलों को कानपुर के हैलट अस्पताल भेजा गया. कोतवाल आलोक दूबे ने डबल मर्डर की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी तो कुछ ही देर बाद एसपी सुनीति, एएसपी कमलेश दीक्षित, सीओ (सिटी) सुरेंद्रनाथ यादव तथा डीएम अभिषेक सिंह भी आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया तथा कोतवाल आलोक दूबे से जानकारी हासिल की. डीएम अभिषेक सिंह ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया जबकि एसपी सुनीति ने घटना के संबंध में जानकारी हासिल की.

चूंकि डबल मर्डर का यह मामला अति संवेदनशील था और कातिल रसूखदार थे. इसलिए एसपी सुश्री सुनीति ने घटना की जानकारी आईजी (कानपुर जोन) मोहित अग्रवाल तथा एडीजी जयनारायण सिंह को दी. इस के बाद उन्होंने घटनास्थल पर आसपास के थानों की पुलिस फोर्स तथा फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. फोरैंसिक टीम ने जांच कर साक्ष्य जुटाए तथा फिंगरप्रिंट लिए. डबल मर्डर से चौबे परिवार में कोहराम मचा हुआ था. शिवकुमार चौबे उर्फ मुनुवा मंदिर परिसर में बेटे की लाश के पास गुमसुम बैठे थे. वहीं संजय भाई की लाश के पास  बैठा फूटफूट कर रो रहा था. आशीष चौबे भी अपनी बहन सुधा के पास विलाप कर रहा था. संजय चौबे व उन की बहन रागिनी एसपी सुश्री सुनीति के सामने गिड़गिड़ा रहे थे कि हमलावरों को जल्दी गिरफ्तार करो वरना वे लोग इस से भी बड़ी घटना को अंजाम दे सकते हैं.

एसपी सुनीति मृतकों के घर वालों को हमलावरों की गिरफ्तारी का भरोसा दे ही रही थीं कि सूचना पा कर एडीजी जयनारायण सिंह तथा आईजी मोहित अग्रवाल घटनास्थल पर पहुंच गए. अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया, फिर एसपी सुनीति ने घटना के संबंध में जानकारी ली. पुलिस अधिकारी इस बात से आश्चर्यचकित थे कि पुलिस की मौजूदगी में फायरिंग हुई और 2 हत्याएं हो गईं. उन्होंने सहज ही अंदाजा लगा लिया कि हमलावर कितने दबंग थे. आईजी मोहित अग्रवाल ने घटनास्थल पर मौजूद मृतकों के घर वालों से बात की. शिवकुमार उर्फ मुनुवा चौबे ने बताया कि बाहुबली कमलेश पाठक मंदिर की बेशकीमती जमीन पर कब्जा करना चाहता था. जबकि उन का परिवार व मोहल्ले के लोग विरोध कर रहे थे.

पुजारी की मौत के बाद वह मंदिर की चाबी मांगने आए थे. इसी पर उन से विवाद हुआ और पुलिस की मौजूदगी में कमलेश पाठक, उन के भाइयों तथा सहयोगियों ने फायरिंग शुरू कर दी. मुनुवा चौबे ने आरोप लगाया कि अगर पुलिस चाहती तो फायरिंग रोकी जा सकती थी. लेकिन शहर कोतवाल आलोक दूबे एमएलसी कमलेश पाठक के दबाव में थे. इसलिए उन्होंने न तो हमलावरों को चेतावनी दी और न ही उन के हथियार छीनने की कोशिश की. शिवकुमार उर्फ मुनुवा चौबे का आरोप सत्य था, अत: आईजी मोहित अग्रवाल ने एसपी सुनीति को आदेश दिया कि वह दोषी पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित करें.

आदेश पाते ही सुनीति ने कोतवाल आलोक दूबे तथा चौकी इंचार्ज नीरज त्रिपाठी को निलंबित कर दिया. इस के बाद जरूरी काररवाई पूरी कर दोनों शवों को पोस्टमार्टम हेतु औरैया के जिला अस्पताल भिजवा दिया गया. बवाल की आशंका को भांपते हुए पुलिस ने रात में ही पोस्टमार्टम कराने का निश्चय किया. इसी के मद्देनजर पोस्टमार्टम हाउस में भारी पुलिस फोर्स तैनात कर दी गई थी. इस दुस्साहसिक घटना को आईजी मोहित अग्रवाल तथा एडीजी जयनारायण सिंह ने बेहद गंभीरता से लिया था. दोनों पुलिस अधिकारियों ने औरैया कोतवाली में डेरा डाल दिया. हमलावरों को ले कर औरैया शहर में दहशत का माहौल था और मृतकों के घर वाले भी डरे हुए थे.

दहशत कम करने तथा मृतकों के घर वालों को सुरक्षा देने के लिए पुलिस अधिकारियों ने पुलिस का सख्त पहरा लगा दिया. एक कंपनी पीएसी तथा 4 थानाप्रभारियों को प्रमुख मार्गों पर तैनात किया गया. इस के अलावा 22 एसआई व 48 हेडकांस्टेबलों को हर संदिग्ध व्यक्ति पर निगाह रखने का काम सौंपा गया. घर वालों की सुरक्षा के लिए 3 एसआई और आधा दरजन पुलिसकर्मियों को लगाया गया. तब तक रात के 10 बज चुके थे. तभी एसपी सुनीति की नजर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे 2 वीडियो पर पड़ी. वायरल हो रहे वीडियो संघर्ष के दौरान हो रही फायरिंग के थे, जिसे किसी ने मोबाइल से बनाया था. एक वीडियो में एमएलसी का गनर अवनीश प्रताप सिंह एक युवक की छाती पर सवार था और पीछे खड़ा युवक उसे डंडे से पीटता दिख रहा था.

उसी जगह कमलेश पाठक गनर की कार्बाइन थामे खड़े दिख रहे थे. दूसरे वायरल हो रहे वीडियो में कमलेश पाठक के भाई संतोष पाठक व अन्य फायरिंग करते नजर आ रहे थे. वीडियो देख कर एसपी सुनीति ने गनर अवनीश प्रताप सिंह को निलंबित कर दिया. साथ ही साक्ष्य के तौर पर दोनों वीडियो को सुरक्षित कर लिया. पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर औरैया कोतवाली में हमलावरों के खिलाफ 3 अलगअलग मुकदमे दर्ज किए गए. पहला मुकदमा मृतका सुधा के भाई आशीष चौबे की तहरीर पर भादंवि की धारा 147, 148, 149, 307, 302, 504, 506 के तहत दर्ज किया गया. इस मुकदमे में एमएलसी कमलेश पाठक, उन के भाई संतोष पाठक, रामू पाठक, रिश्तेदार विकल्प अवस्थी, कुलदीप अवस्थी, शुभम अवस्थी, ड्राइवर लवकुश उर्फ छोटू, गनर अवनीश प्रताप सिंह, कथावाचक राजेश शुक्ला तथा 2 अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया गया.

दूसरी रिपोर्ट चौकी इंचार्ज नीरज त्रिपाठी ने उपरोक्त 9 नामजद तथा 10-15 अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कराई. उन की यह रिपोर्ट 7 क्रिमिनल ला अमेडमेंट एक्ट की धाराओं में दर्ज की गई. आरोपियों के खिलाफ तीसरी रिपोर्ट आर्म्स एक्ट की धाराओं में दर्ज की गई. आईजी मोहित अग्रवाल व एडीजी जयनारायण सिंह ने नामजद अभियुक्तों को पकड़ने के लिए एसपी सुनीति, एएसपी कमलेश दीक्षित तथा सीओ (सिटी) सुरेंद्रनाथ यादव की अगुवाई में 3 टीमें बनाईं. इन टीमों में तेजतर्रार इंसपेक्टर, दरोगा व कांस्टेबलों को शामिल किया गया. सहयोग के लिए एसओजी तथा क्राइम ब्रांच की टीम को भी लगाया गया. हत्यारोपी बाहुबली एमएलसी कमलेश पाठक औरैया शहर के मोहल्ला बनारसीदास में रहते थे, जबकि उन के भाई संतोष पाठक व रामू पाठक पैतृक गांव भड़ारीपुर में रहते थे जो औरैया से चंद किलोमीटर दूर था.

गठित पुलिस टीमों ने आधी रात को भड़ारीपुर गांव, बनारसीदास मोहल्ला तथा विधिचंद्र मोहल्ला में छापा मारा और 6 नामजद अभियुक्तों को मय असलहों के धर दबोचा. सभी को औरैया कोतवाली लाया गया. पकड़े गए हत्यारोपियों में एमएलसी कमलेश पाठक, उन के भाई संतोष, रामू, गनर अवनीश प्रताप सिंह, ड्राइवर लवकुश उर्फ छोटू तथा कथावाचक राजेश शुक्ला थे. 3 हत्यारोपी शुभम अवस्थी, विकल्प अवस्थी तथा कुलदीप अवस्थी विधिचंद्र मोहल्ले में रहते थे. वे अपनेअपने घरों से फरार थे, इसलिए पुलिस के हाथ नहीं आए. पुलिस ने पकड़े गए अभियुक्तों के पास से एक लाइसेंसी रिवौल्वर, 13 कारतूस, 4 तमंचे 315 बोर व 8 कारतूस, सेमी राइफल व 23 कारतूस, गनर अवनीश प्रताप सिंह की सरकारी कार्बाइन व उस के कारतूस बरामद किए.

16 मार्च की सुबह मंजुल चौबे व सुधा चौबे का शव पोस्टमार्टम के बाद भारी पुलिस सुरक्षा के बीच उन के नारायणपुर स्थित घर लाया गया. शव पहुंचते ही दोनों घरों में कोहराम मच गया. पति का शव देख कर आरती दहाड़ें मार कर रो पड़ी. आरती की शादी को अभी 2 साल भी नहीं हुए थे कि उस का सुहाग उजड़ गया था. उस की गोद में 3 माह की बच्ची थी. मंजुल चौबे की बहनें रश्मि, रागिनी व रुचि भी शव के पास बिलख रही थीं. सुबह 10 बजे मंजुल व सुधा की शवयात्रा कड़ी सुरक्षा के बीच शुरू हुई. सुरक्षा की जिम्मेदारी सीओ (सिटी) सुरेंद्रनाथ यादव को सौंपी गई थी. अंतिम यात्रा में लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था,

जिसे संभालना पुलिस के लिए मुश्किल हो रहा था. कुछ देर बाद शवयात्रा यमुना नदी के शेरगढ़ घाट पहुंची, वहीं पर दोनों का अंतिम संस्कार हुआ. एसपी सुनीति ने गिरफ्तार किए गए अभियुक्तों से पूछताछ की. इस पूछताछ के आधार पर इस खूनी संघर्ष की जो कहानी प्रकाश में आई, उस का विवरण कुछ इस प्रकार है—

गांव भड़ारीपुर औरैया जिले के कोतवाली थाना क्षेत्र में आता है. ब्राह्मण बहुल इस गांव में राम अवतार पाठक अपने परिवार के साथ रहते थे. सालों पहले भड़ारीपुर इटावा जिले का गांव था. जब विधूना तथा औरैया तहसील को जोड़ कर औरैया को नया जिला बनाया गया, तब से यह भड़ारीपुर गांव औरैया जिले में आ गया. राम अवतार पाठक इसी गांव के संपन्न किसान थे. उन के 3 बेटे रामू, संतोष व कमलेश पाठक थे. चूंकि वह स्वयं पढ़ेलिखे थे, इसलिए उन्होंने अपने बच्चों को भी पढ़ायालिखाया. तीनों भाइयों में कमलेश ज्यादा ही प्रखर था. उस की भाषा शैली भी अच्छी थी, जिस से लोग जल्दी ही प्रभावित हो जाते थे. कमलेश पाठक पढ़ेलिखे योग्य व्यक्ति जरूर थे, लेकिन वह जिद्दी स्वभाव के थे. अपने मन में जो निश्चय कर लेते, उसे पूरा कर के ही मानते थे. यही कारण था कि 20 वर्ष की कम आयु में ही औरैया कोतवाली में उन पर हत्या का मुकदमा दर्ज हो गया था.

कुछ साल बाद कमलेश और उन के भाई संतोष और रामू की दबंगई का डंका बजने लगा. लोग उन से भय खाने लगे. अपनी फरियाद ले कर भी लोग उन के पास आने लगे थे. जो काम पुलिस डंडे के बल पर न करवा पाती, वह काम कमलेश का नाम सुनते ही हो जाता. जब तक कमलेश गांव में रहे, तब तक गांव में उन की चलती रही. गांव छोड़ कर औरैया में रहने लगे तो यहां भी अपना साम्राज्य कायम करने में जुट गए. उन दिनों औरैया में स्वामीचरण की तूती बोलती थी. वह हिस्ट्रीशीटर था. गांव से आए युवा कमलेश ने एक रोज शहर के प्रमुख चौराहे सुभाष चौक पर हिस्ट्रीशीटर स्वामीचरण को घेर लिया और भरे बाजार में उसे गिरागिरा कर मारा.

इस घटना के बाद कमलेश की औरैया में भी धाक जम गई. अब तक वह स्थायी रूप से औरैया में बस गए थे. बनारसीदास मोहल्ले में उन्होंने अपना निजी मकान बनवा लिया. दबंग व्यक्ति पर हर राजनीतिक पार्टी डोरे डालती है. यही कमलेश के साथ भी हुआ. बसपा, सपा जैसी पार्टियां उन पर डोरे डालने लगीं. कमलेश को पहले से ही राजनीति में रुचि थी, सो वह पार्टियों के प्रमुख नेताओं से मिलने लगे और उन के कार्यक्रमों में शिरकत भी करने लगे. वैसे उन्हें सिर्फ एक ही नेता ज्यादा प्रिय थे सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव. सन 1985 के विधानसभा चुनाव में कमलेश पाठक को औरैया सदर से लोकदल से टिकट मिला. इस चुनाव में उन्होंने जीत हासिल की और 28 वर्ष की उम्र में विधायक बन गए. लेकिन विधायक रहते सन 1989 में उन्होंने लोकदल के विधायकों को तोड़ कर मुलायम सिंह की सरकार बनवा दी.

इस के बाद से वह मुलायम सिंह के अति करीबी बन गए. लोग उन्हें मिनी मुख्यमंत्री कहने लगे थे. वर्ष 1990 में सपा ने उन्हें एमएलसी बनाया और 1991 में कमलेश दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री बने. सन 2002 के विधानसभा चुनाव में सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह ने कमलेश पाठक को कानपुर देहात की डेरापुर सीट से मैदान में उतारा. इस चुनाव में उन के सामने थे भाजपा से भोले सिंह. यह चुनाव बेहद संघर्षपूर्ण रहा. दोनों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंदिता में जम कर गोलियां चलीं. इस के बाद ब्राह्मणों ने एक मत से कमलेश पाठक को जीत दिलाई. तब से उन्हें ब्राह्मणों का कद्दावर नेता माना जाने लगा.

चुनाव के बाद मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने. मुख्यमंत्री बनने के बाद मुलायम सिंह ने औरैया को जिला बनाने के नियम को रद्द कर दिया. इस पर कमलेश ने अपनी ही पार्टी के खिलाफ बिगुल फूंक दिया. उन्होंने जिला बचाओ आंदोलन छेड़ कर जगहजगह धरनाप्रदर्शन शुरू कर दिया. मुख्यमंत्री मुलायम सिंह औरैया में सभा करने आए तो उन्होंने गोलियां बरसा कर उन के हैलीकाप्टर को सभास्थल पर नहीं उतरने दिया. एक घंटा हेलीकाप्टर हवा में उड़ता रहा, तब कहीं जा कर मानमनौव्वल के बाद उतर सका. इस घटना के बाद मुलायम सिंह नाराज हो गए, लेकिन दबंग नेता की छवि बना चुके कमलेश पाठक के आगे उन की नाराजगी ज्यादा दिन टिक न सकी. सन 2007 में नेताजी ने उन्हें पुन: टिकट दे दिया, लेकिन कमलेश दिबियापुर विधानसभा सीट से हार गए.

साल 2009 में कमलेश पाठक ने जेल में रहते सपा के टिकट पर अकबरपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा पर हार गए. इस के बाद उन्होंने साल 2012 में सिकंदरा विधानसभा से चुनाव लड़ा, पर इस बार भी हार गए. हारने के बावजूद वर्ष 2013 में कमलेश पाठक को राज्यमंत्री का दरजा दे कर उन्हें रेशम विभाग का अध्यक्ष बना दिया गया. इस के बाद 10 जून 2016 को समाजवादी पार्टी से उन्हें विधान परिषद का सदस्य बना कर भेजा. वर्तमान में वह सपा से एमएलसी थे. सपा सरकार के रहते कमलेश पाठक ने अपनी दबंगई से अवैध साम्राज्य कायम किया. उन्होंने ग्राम समाज के तालाबों तथा सरकारी जमीनों पर कब्जे किए. उन्होंने पक्का तालाब के पास नगरपालिका की जमीन पर कब्जा कर गेस्टहाउस बनवाया. साथ ही औरैया शहर में 2 आलीशान मकान बनवाए. अन्य जिलों व कस्बों में भी उन्होंने भूमि हथियाई.

जिले का कोई अधिकारी उन के खिलाफ जांच करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था. कमलेश की राजनीतिक पहुंच से उन के भाई संतोष व रामू भी दबंग बन गए थे. दबंगई के बल पर संतोष पाठक ब्लौक प्रमुख का चुनाव भी जीत चुका था. दोनों भाइयों का भी क्षेत्र में खूब दबदबा था. सभी के पास लाइसैंसी हथियार थे. कमलेश पाठक की दबंगई का फायदा उन के भाई ही नहीं बल्कि शुभम, कुलदीप तथा विकल्प अवस्थी जैसे रिश्तेदार भी उठा रहे थे. ये लोग कमलेश का भय दिखा कर शराब के ठेके, सड़क निर्माण के ठेके तथा तालाबों आदि के ठेके हासिल करते और खूब पैसा कमाते. ये लोग कदम दर कदम कमलेश का साथ देते थे और उन के कहने पर कुछ भी कर गुजरने को तत्पर रहते थे.

कमलेश पाठक ने अपनी दबंगई के चलते धार्मिक स्थलों को ही नहीं छोड़ा और उन पर भी अपना आधिपत्य जमा लिया. औरैया शहर के नारायणपुर मोहल्ले में स्थित प्राचीन पंचमुखी हनुमान मंदिर पर भी कमलेश पाठक ने अपना कब्जा जमा लिया था. साथ ही वहां अपने रिश्तेदार वीरेंद्र स्वरूप पाठक को पुजारी नियुक्त कर दिया था. कमलेश की नजर इस मंदिर की एक एकड़ बेशकीमती भूमि पर थी. इसी नारायणपुरवा मोहल्ले में पंचमुखी हनुमान मंदिर के पास शिवकुमार उर्फ मुनुवां चौबे का मकान था. इस मकान में वह परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे संजय, मंजुल और

3 बेटियां रश्मि, रुचि तथा रागिनी थीं. तीनों बेटियों तथा संजय की शादी हो चुकी थी. मुनुवां चौबे मोहल्ले के सम्मानित व्यक्ति थे. धर्मकर्म में भी उन की रुचि थी. वह हर रोज पंचमुखी हनुमान मंदिर में पूजा करने जाते थे. पुजारी वीरेंद्र स्वरूप से उन की खूब पटती थी. पुजारी मंदिर बंद कर चाबी उन्हीं को सौंप देता था. मुनुवां चौबे का छोटा बेटा मंजुल पढ़ाई के साथसाथ राजनीति में भी रुचि रखता था. उन दिनों कमलेश पाठक का राजनीति में दबदबा था. मंजुल ने कमलेश पाठक का दामन थामा और राजनीति का ककहरा पढ़ना शुरू किया. वह समाजवादी पार्टी के हर कार्यक्रम में जाने लगा और कई कद्दावर नेताओं से संपर्क बना लिए. कमलेश पाठक का भी वह चहेता बन गया.

मंजुल औरैया के तिलक महाविद्यालय का छात्र था. वर्ष 2003 में उस ने कमलेश पाठक की मदद से छात्र संघ का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. इस के बाद मंजुल ने अपनी ताकत बढ़ानी शुरू कर दी. उस ने अपने दर्जनों समर्थक बना लिए. अब उस की भी गिनती दबंगों में होने लगी. इसी महाविद्यालय से उस ने एलएलबी की डिग्री हासिल की और औरैया में ही वकालत करने लगा. मंजुल के घर के पास ही उस के चाचा अरविंद चौबे रहते थे. उन के बेटे का नाम आशीष तथा बेटी का नाम सुधा था. मंजुल की अपने चचेरे भाईबहन से खूब पटती थी. सुधा पढ़ीलिखी व शिक्षिका थी. पर उसे देश प्रदेश की राजनीति में भी दिलचस्पी थी.

मंजुल की ताकत बढ़ी तो कमलेश पाठक से दूरियां भी बढ़ने लगीं. ये दूरियां तब और बढ़ गईं, जब मंजुल को अपने पिता से पता चला कि कमलेश पाठक मंदिर की बेशकीमती भूमि पर कब्जा करना चाहता है. चूंकि मंदिर मंजुल के घर के पास और उस के मोहल्ले में था, इसलिए मंजुल व उस का परिवार चाहता कि मंदिर किसी बाहरी व्यक्ति के कब्जे में न रहे. वह स्वयं मंदिर पर आधिपत्य जमाने की सोचने लगा. पर दबंग कमलेश के रहते, यह आसान न था. 16 मार्च, 2020 को थाना कोतवाली पुलिस ने अभियुक्त कमलेश पाठक, रामू पाठक, संतोष पाठक, अवनीश प्रताप, लवकुश उर्फ छोटू तथा राजेश शुक्ला को औरैया कोर्ट में सीजेएम अर्चना तिवारी की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें इटावा जेल भेज दिया गया.

दूसरे रोज बाहुबली कमलेश पाठक को आगरा सेंट्रल जेल भेजा गया. रामू पाठक को उरई तथा संतोष पाठक को फिरोजाबाद जेल भेजा गया. लवकुश, अवनीश प्रताप तथा राजेश शुक्ला को इटावा जेल में ही रखा गया. 18 मार्च को पुलिस ने अभियुक्त कुलदीप अवस्थी, विकल्प अवस्थी तथा शुभम को भी गिरफ्तार कर लिया. उन्हें औरैया कोर्ट में अर्चना तिवारी की अदालत मे पेश कर जेल भेज दिया गया. म

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा पुलिस अफसर

भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा पुलिस अफसर – भाग 3

जल्दी ही ऐसा समय आ गया कि पुलिस विभाग में जिस का भी काम अटकता, वह फरहीन के दरबार में हाजिरी लगाने लगा. फरहीन काम के हिसाब से ‘सुविधा शुल्क’ तय करती. सुविधा शुल्क मिल जाने के बाद ही फरहीन के इशारे पर एसपी साहब काम करते थे.

कुछ ही दिनों में एसपी सत्यवीर सिंह फरहीन के इस तरह दीवाने हो गए कि आधी रात बाद वह अपने किसी ‘खासमखास’ सिपाही व अन्य व्यक्ति के साथ मोटरसाइकिल से सरकारी आवास से निकलते और सीधे बारां रोड स्थित फरहीन के होटल पहुंचते, जहां 2-3 घंटे गुजार कर सुबह 5 बजे तक अपने आवास पर लौट आते. कोटा के पुलिस विभाग में इसे एसपी की ‘विशेष नाइट गश्त’ कहा जाता था.

एसपी साहब फरहीन पर किस तरह फिदा थे, वह उन दोनों की मोबाइल फोन पर होने वाली बातचीत से पता चलता है. रात में मुलाकात होने के बावजूद एसपी साहब दिन में करीब 10 से 15 बार फरहीन से बात करते थे. यह जानकारी तब मिली, जब शिकायत के बाद एसपी साहब और फरहीन के मोबाइल सर्विलांस पर लगाए गए. एसीबी ने दोनों के 2700 काल रिकौर्ड किए थे. दोनों फोन पर बेहद अश्लील बातें करते थे.

एसपी सत्यवीर सिंह ने अपनी ‘खिदमतगार’ फरहीन को शहर के 2 पुलिस थानों के मामले निपटाने की जिम्मेदारी सौंप रखी थी. वे थाने थे बोरखेड़ा और नयापुरा. इन थानों में जमीनों से जुड़े ज्यादा मामले दर्ज होते थे. फरहीन का घर और होटल भी थाना बोरखेड़ा के तहत आता था. जब इन दोनों थानाक्षेत्रों के प्रौपर्टी व्यवसाइयों को फरहीन के रसूख का पता चला तो वे अपने काम कराने के लिए उसी के पास आने लगे थे.

थाना बोरखेड़ा और नयापुरा के थानाप्रभारियों से ले कर सिपाहियों तक की तैनाती फरहीन की सिफारिश पर होती थी. इन थानों की वही फाइलें आगे बढ़ती थीं, जिन्हें फरहीन चाहती थी. जांच में यह भी पता चला है कि कोटा शहर में जुआ वही खेलवा सकता था, जिसे फरहीन और निसार चाहते. स्थान भी वही तय करते थे.

फरहीन पुलिसकर्मियों को फोन पर एक डीएसपी की तरह डाइरेक्शन देती थी. इतना ही नहीं, उन का और जो काम उसे कराने होते थे, उन की फाइलों का वह सुपरविजन भी करती रहती थी. अगर उसे लगता कि जांच उस के मनमुताबिक नहीं हो रही है तो वह उस जांच अधिकारी को एसपी साहब के सामने खड़ा कर देती थी. तब एसपी साहब उसी के सामने जांच अधिकारी की बेइज्जती करते थे.

एसपी सत्यवीर सिंह से दोस्ती के बाद फरहीन की चांदी हो गई थी. उस ने सरस्वती कालोनी में किराए की जमीन ले कर एक होटल बना लिया, जिस का नाम उस ने ‘टेस्टी बाइट’ रखा था. उस के इस होटल का उद्घाटन एसपी सत्यवीर सिंह ने ही किया था. इस होटल का मेन गेट सड़क पर अतिक्रमण कर के बनाया गया था. होटल के अंदर लड़केलड़कियों के लिए अलग से केबिन बनवाए गए थे.

थाना नयापुरा के जिस मामले को ले कर यह सारा बवाल हुआ, उस में हुआ यह था कि पिछले साल विजय कुमार बैरवा ने अपनी एक जमीन अब्दुल मतीन को बेची थी. चूंकि जमीन एससी/एसटी कोटे की थी, इसलिए मतीन ने इस का इकरारनामा और मुख्तारनामा ही कराया था. अचानक अनुपम अग्रवाल नाम के आदमी ने उन से कहा कि वह जमीन उस की है और उस के कागजात भी उस के पास हैं. इस के बाद विजय बैरवा ने अनुपम के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा थाना नयापुरा में दर्ज करा दिया था.

पुलिस ने इस मामले में फाइनल रिपोर्ट लगा दी. मतीन जमीन के चक्कर में इधरउधर भागता रहा. एसपी से भी मिला. उन्होंने कोई सुनवाई नहीं की. तभी किसी सिपाही ने उस से कहा कि अगर वह बोराखेड़ा आर.के.नगर की रहने वाली फरहीन से मिले तो उस का काम हो सकता है.

इस के बाद मतीन फरहीन और निसार तंवर से मिला. आईजी आलोक वशिष्ठ के अनुसार फरहीन और निसार ने एसपी सत्यवीर से काम कराने के लिए मतीन से 2 लाख रुपए मांगे. मतीन तैयार हो गया और पहली किश्त के रूप में 25 हजार रुपए दे भी दिए. फरहीन ने थाना नयापुरा के थानाप्रभारी से जब मतीन के मामले में काररवाई करने को कहा तो उस ने मना कर दिया.

फरहीन इस मामले को रिओपन करा कर अनुपम का चालान कराना चाहती थी, जबकि जांच अधिकारी का कहना था कि इस मामले में फाइनल रिपोर्ट लग चुकी है. तब फरहीन ने एसपी सत्यवीर सिंह से बात की. इस के बाद इस मामले की जांच रामपुरा कोतवाली को सौंप दी गई. मतीन ने कुछ पैसे पैसे दे दिए थे. फिर भी उस का काम नहीं हो रहा था. उसे गड़बड़ी दिखाई दी तो वह एसीबी (एंटी करप्शन ब्यूरो) की शरण में चला गया.

14 मई को उस ने एसीबी से शिकायत की थी. इसी शिकायत पर उच्चाधिकारियों से आदेश ले कर एसीबी ने एसपी सत्यवीर सिंह के फोन सर्विलांस पर लगा दिए. फरहीन और एसपी सत्यवीर सिंह ने मोबाइल नंबर भी बदले, लेकिन एसीबी ने उन नंबरों के बारे में भी पता कर लिया था. दोनों मोबाइल पर ऐसी अश्लील बातें करते थे, जिस के बारे में विश्वास नहीं किया जा सकता. कभी फरहीन फोन पर पैसे वगैरह की बात करती तो एसपी साहब मना कर देते.

15 मई को मतीन 50 हजार रुपए की दूसरी किस्त देने पहुंचा तो सुबूत के तौर पर गुप्त कैमरे से उस की वीडियोग्राफी करा ली गई. गिरफ्तार फरहीन और निसार के घर से मिले दस्तावेजों से पता चलता है कि फरहीन के इशारे पर कई बड़े मामलों की जांच में फेरबदल किए गए थे.

एसपी सत्यवीर सिंह के जयपुर के आवास से मिली लौकर की चाबी से लौकर खोला गया तो उस में से 1 लाख रुपए नकद और 10 लाख रुपए के गहने मिले थे. इस के अलावा उन के यहां मिले दस्तावेजों में एक ज्योतिषी का लिखा एक कागज भी मिला, जिस में उस ने लिखा था कि किसी मामले में उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. उस ने परेशानी से निपटने के उपाय भी बताए थे. लेकिन अगर इस सब से परेशानी दूर हो तो लोग गलत काम करने से डरें ही क्यों.

एसपी सत्यवीर सिंह को जिस दिन गिरफ्तार किया गया था, उसी दिन शाम को उन के भाई और बहनोई के साथ गांव के भी कुछ लोग आए थे. लेकिन एसीबी ने उन से किसी को भी मिलने नहीं दिया. गिरफ्तारी के बाद पूरी रात उन से पूछताछ चली थी.

अगले दिन अदालत में पेश कर के सभी को 5 दिनों के रिमांड पर लिया गया था. एसीबी ने सारे सुबूत जुटा कर 5 दिनों बाद फिर अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. 30 मई को राज्य सरकार ने एसपी सत्यवीर को निलंबित कर दिया था. कोटा के एसपी पहले कोटा की जेल में बंद थे, लेकिन फिलहाल उन्हें जयपुर की जेल भेज दिया गया है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा पुलिस अफसर – भाग 2

पुलिस सेवा में होने की वजह से सत्यवीर सिंह को पुलिस के हर दांवपेचों की तो जानकारी थी ही, पूर्व में तहसीलदार रहने की वजह से जमीन संबंधी भी सारी जानकारी थी. इसी वजह से उन्हें अच्छी तरह पता था कि किस मामले में कैसे मोटा माल ऐंठा जा सकता है. इसलिए पदभार संभालने के तुरंत बाद सत्यवीर सिंह ने पुलिसकर्मियों की एक ऐसी टीम बनाई, जो उन के अनुसार काम करे.

इस के लिए एसपी सत्यवीर सिंह को काफी बड़ा फेरबदल करना पड़ा. भवन निर्माण स्वीकृतियों की सुरक्षा संबंधी एनओसी के लिए आवेदकों का एसपी से मिलना जरूरी कर दिया गया था. उन से मिलने के बाद ही लोगों की एनओसी मिलती थी.

सत्यवीर सिंह शौकीनमिजाज आदमी थे. इसलिए शौकीनमिजाज लोगों की पार्टियों में जाते रहते थे. ऐसी ही किसी पार्टी में एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने उन का परिचय फरहीन से करा दिया था.

फरहीन कोटा की तहसील दीगोद के गांव सुलतानपुर की रहने वाली थी. ब्राह्मण परिवार में जन्मी फरहीन का नाम ऊषा शर्मा था. उस के पिता पुलिस विभाग में सबइंसपेक्टर थे. इस के बावजूद ऊषा ज्यादा पढ़लिख नहीं सकी. इस की वजह यह थी कि जब वह हाईस्कूल में थी, तभी उस की गांव के ही रहने वाले निसार से आंखें मिल गई थीं. दोनों का प्यार गहराया तो उन्होंने निकाह कर लिया.

निकाह के बाद ऊषा ने अपना नाम फरहीन रख लिया और गांव छोड़ कर निसार के साथ कोटा शहर आ गई. निसार छोटामोटा काम कर के गुजरबसर करने लगा. उस की इस कमाई से किसी तरह घर तो चल जाता था, लेकिन फरहीन के शौक पूरे नहीं होते थे. जबकि वह काफी महत्त्वाकांक्षी थी. वह खूबसूरत तो थी ही, वाकचातुर्य भी उस में कूटकूट कर भरा था.

अपनी बातों से कुछ देर की मुलाकात में फरहीन किसी को भी प्रभावित कर लेती थी. शहर में आने के बाद वह फैशनेबल भी हो गई थी. अपने खर्च और शौक पूरे करने के लिए फरहीन ने ब्यूटीपार्लर का काम सीखा और अपना ब्यूटीपार्लर और मसाज पार्लर खोल लिया. इस से उस के शौक पूरे होने लगे. लेकिन वह जो चाहती थी, वह नहीं हो पा रहा था.

फरहीन बड़े लोगों की तरह रहना चाहती थी. वह चाहती थी कि लोग उसे नमस्कार करें, उस के आगेपीछे घूमें. वह बड़ेबड़े अफसरों के साथ उठनाबैठना, खानापीना और उन के साथ मौजमस्ती करना चाहती थी. लेकिन इस के लिए न उस के पास पैसा एवं साधन था और न ही पहुंच.

लेकिन फरहीन के पास सुंदरता थी. वह अपनी सुंदरता और बातचीत से किसी को भी आकर्षित कर सकती थी. जब उसे इस बात का अहसास हुआ तो उस ने इस का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. वह देखती थी कि नेता की इज्जत समाज भी करता है और सरकारी अमला भी. इसलिए नेता बनने के लिए फरहीन ने राजनीति में जाने का निश्चय किया.

पहले उस ने छोटेछोटे नेताओं से संबंध बनाए. उस के बाद उन्हीं के माध्यम से उस ने बड़े नेताओं तक पहुंच बना ली. राजस्थान में बिना जनाधार वाली मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी के कुछ नेताओं से उस की नजदीकियां बढ़ गईं तो उन्हीं के माध्यम से उस ने समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह, उन के मुख्यमंत्री बेटे अखिलेश सिंह तक अपनी पहुंच बना ली. वह उन से और पार्टी के अन्य बड़े पदाधिकारियों से मिलने लखनऊ तथा दिल्ली भी आनेजाने लगी.

सपा नेताओं से अपने संबंधों के बल पर फरहीन राजस्थान में महिला नेता के रूप में उभरने लगी. इन्हीं संबंधों के बल पर सन् 2008 में राजस्थान में विधानसभा का समाजवादी पार्टी के टिकट पर कोटा की पीपल्दा विधानसभा सीट से चुनाव भी लड़ा था, लेकिन इस चुनाव में उसे वहां से चुनाव लड़ रहे आठों प्रत्याशियों में सब से कम केवल 730 वोट मिले थे.

चुनाव में भले ही फरहीन अपनी जमानत भी नहीं बचा पाई थी, लेकिन उस का जो सपना था, वह राह पा चुका था. नेता बन जाने की वजह से उसे समाज में भी तवज्जो मिलने लगी थी और अधिकारियो में भी. अधिकारियों में तवज्जो मिलने लगी तो उसे संबंध बनाने में आसानी हो गई. जो भी नया अधिकारी कोटा में आता, उस तक पहुंच बनाने के लिए पहले उस का नंबर प्राप्त करती, उस के बाद वह वेलकम मैसेज भेजती.

अगर अधिकारी का जवाब आ जाता तो उसे अपने जाल में फांसने के लिए नौनवेज खाना बनवा कर भेजती. उस के उस लजीज नौनवेज का स्वाद अधिकारी के मुंह लग जाता तो वह उस के जाल में फंस जाता. घर आने वाले अधिकारियों को प्रभावित करने के लिए उस ने अपने उन दिवंगत पिता की वरदी में बड़ी सी तसवीर ड्राइंगरूम में लगा रखी थी, जिन्होंने शादी के बाद उस से संबंध खत्म कर लिए थे.

इस तरह फरहीन के संबंध जिले के ही नहीं, राज्य के तमाम अफसरों से हो गए थे. उस के बाद वह इन संबंधों का इस्तेमाल अपने हिसाब से करती. संबंधों के बल पर लोगों के काम कराने के लिए वह मोटी रकम लेती. अब उस का रुतबा बढ़ ही गया था और आमदनी भी.

विधानसभा चुनाव में फरहीन बुरी तरह हारी थी. इस के बावजूद उस के रुतबे में जरा भी कमी नहीं आई थी. 2009 में लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई तो लखनऊ पहुंच कर उस ने सपा नेताओं को अपना जलवा दिखाया और कोटा से लोकसभा का टिकट हासिल कर लिया. इस बार भी वह अपनी जमानत नहीं बचा पाई. लोकसभा चुनाव में उसे मात्र 1479 वोट मिले थे.

विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में करारी हार के बावजूद फरहीन राजनीति में अपने पैर जमाए रही. इसी राजनीति की आड़ में वह बड़ेबड़े अधिकारियों से दोस्ती गांठने लगी. वह अधिकारियों से सिर्फ दोस्ती ही नहीं करती थी, बल्कि उन के हर शौक पूरे करती थी. इन्हीं संबंधों के बल पर वह अधिकारियों से काम कराने के लिए जरूरतमंदों से पैसे लेती थी यानी दलाली करती थी.

फरहीन ने सब से ज्यादा पैठ पुलिस अधिकारियों में बना रखी थी. बड़ेबड़े पुलिस अधिकारियों से दोस्ती की वजह से फरहीन की पहचान कोटा के सोशल सर्किल में भी होने लगी थी. वह अफसरों से बड़े लोगों के अटके काम कराने लगी. कोटा का जो अधिकारी फरहीन का काम करने से मना करता, जयपुर में पुलिस मुख्यालय में तैनात एडीजी एवं शासन सचिवालय में तैनात सचिव स्तर के अधिकारियों से उस पर दबाव डलवा कर वह अपना काम करवा लेती.

फरहीन ने लोगों को प्रभावित करने के लिए सपा नेताओं एवं एडीजी स्तर के अधिकारियों के साथ खिंचाए फोटो अपनी फेसबुक पर डाल रखे थे. सभी फोटो उस के मोबाइल में भी रहते थे. वह अधिकारियों को अपने नाम और परिचय के साथ मैसेज भी भेजती रहती थी.

सत्यवीर सिंह कोटा के एसपी बन कर आए तो जयपुर के पुलिस मुख्यालय में तैनात अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजी) स्तर के एक अधिकारी ने फरहीन का परिचय उन से कराया था. पहली ही मुलाकात में फरहीन ने उन का दिल जीत लिया था. सत्यवीर सिंह को फरहीन अपने काम की लगी तो फरहीन को एसपी साहब अपने काम के लगे. दोनों ने एकदूसरे को समझा तो उन की दोस्ती गहराती चली गई.

                                                                                                                                              क्रमशः

भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा पुलिस अफसर – भाग 1

रेतीले धोरों वाले राजस्थान में चंबल नदी के मुहाने पर बसा औद्योगिक शहर कोटा आज एजूकेशन हब बन चुका है. इंजीनियरिंग एवं मैडिकल की आल इंडिया तथा प्रदेश स्तर की परीक्षाओं में सब से ज्यादा यहीं की कोचिंग सेंटरों में पढ़ने वाले बच्चों का सिलेक्शन होता है. यहां देश के नामीगिरामी कोचिंग सेंटरों की सैकड़ों शाखाएं हैं, जिन में देशभर के लाखों मेधावी बच्चे पढ़ने आते हैं.

उसी कोटा शहर में 27 मई की दोपहर को सूरज अपने पूरे शबाब पर था तो उस की तपन से लोगों का घर से बाहर निकलना मुश्किल हो रहा था. उस गरमी में कुछ देर पहले ही अपने औफिस से सरकारी बंगले पर आए शहर के एसपी सत्यवीर सिंह आराम फरमा रहे थे.

तभी भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) के डीआईजी आलोक वशिष्ठ आम कपड़ों में पैदल चलते हुए एसपी सत्यवीर सिंह के बंगले पर पहुंचे. गेट पर तैनात संतरी उन्हें पहचानता नहीं था, इसलिए उस ने उन्हें रोक कर पूछा, ‘‘किस से मिलना है?’’

‘‘मैं डीआईजी हूं, जयपुर से आया हूं.’’ डीआईजी आलोक वशिष्ठ ने कहा.

संतरी को जैसे ही पता चला कि आगंतुक डीआईजी हैं, उस ने झट से सैल्यूट मारा और उन के आने की सूचना देने के लिए इंटरकौम की घंटी बजाई. लेकिन डीआईजी आलोक वशिष्ठ बिना कुछ कहेसुने सीधे बंगले के अंदर चले गए.

सामने ड्राइंगरूम में पड़े सोफे पर एसपी साहब आराम की मुद्रा में बैठे थे. वह डीआईजी आलोक वशिष्ट को पहचानते थे, इसलिए उन के कमरे में आते ही उन्होंने तुरंत खड़े हो कर सैल्यूट मारा. डीआईजी ने उन के सैल्यूट का जवाब देते हुए कहा, ‘‘सत्यवीर सिंह, यू आर अंडर अरेस्ट. रिश्वत लेने के जुर्म में तुम्हें गिरफ्तार किया जाता है.’’

डीआईजी आलोक वशिष्ठ की ये बातें सुन कर एसपी सत्यवीर सिंह के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह कुछ कहने वाले थे कि डीआईजी साहब के पीछे आने वाले लोगों को देख कर चुप हो गए. डीआईजी साहब के पीछे एसीबी की टीम के साथ वह आदमी भी था, जिस ने उन पर रिश्वत लेने का आरोप लगाया था. उस आदमी का नाम अब्दुल मतीन था. उसी की शिकायत पर यह काररवाई की गई थी.

एसीबी ने यह काररवाई इतनी तेजी और गोपनीय तरीके से की थी कि एसपी सत्यवीर सिंह को न तो कुछ सोचने का समय मिला था और न ही कुछ कहनेसुनने का. अब्दुल मतीन को देखते ही वह सारा माजरा समझ गए थे. जबकि उन्हें सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि एक एसपी को उस के सरकारी आवास से इस तरह गिरफ्तार किया जाएगा.

एसपी सत्यवीर सिंह अच्छी तरह जानते थे कि विरोध करने का कोई मतलब नहीं है. आईपीएस होने के नाते वह एसीबी की कार्यप्रणाली को अच्छी तरह जानते थे. उन्हें अहसास हो गया कि अब खेल खत्म हो चुका है, इसलिए चुप रहना ही ठीक है. एसीबी टीम ने एसपी के मोबाइल जब्त करने के साथ उन के सरकारी आवास की तलाशी शुरू कर दी.

इस तलाशी में एसीबी टीम ने 62 हजार रुपए नकद, शराब की 6 बोतलें और 4 मोबाइल फोन के साथ कुछ खास दस्तावेज जब्त किए. दूसरी ओर उन के जयपुर के वैशालीनगर, गंगा सागर स्थित बंगले की भी तलाशी ली गई. वहां से कुछ दस्तावेजों के साथ बैंक के लौकर की चाबी भी मिली थी. तलाशी खत्म होने के बाद डीआईजी आलोक वशिष्ठ एसपी सत्यवीर सिंह को हिरासत में ले कर कोटा के अन्वेषण भवन आ गए.

एक ओर जहां एसीबी के डीआईजी आलोक वशिष्ठ ने एसपी सत्यवीर सिंह को गिरफ्तार किया था, वहीं दूसरी ओर एक अन्य डीआईजी हवा सिंह घुमरिया ने अपनी टीम के साथ जाल बिछा कर एसपी और जरूरतमंदों के बीच दलाली का काम करने वाली फरहीन और उस के पति निसार तंवर को आर.के.नगर स्थित उस के घर से गिरफ्तार किया था.

फरहीन और निसार को रंगेहाथों पकड़ने के लिए एसीबी टीम ने शिकायत करने वाले मतीन को रिश्वत के रूप में तय 2 लाख रुपए की रकम में से 50 हजार रुपए ले कर निसार के पास भेजा था. मतीन ने जैसे ही फरहीन को 50 हजार रुपए सौंपे थे, एसीबी की टीम ने घर में घुस कर फरहीन एवं उस के पति निसार को दबोच लिया था.

फरहीन और निसार की गिरफ्तारी की सूचना डीआईजी हवा सिंह घुमरिया द्वारा अपने साथी डीआईजी आलोक वशिष्ठ को मोबाइल फोन से देने के बाद ही आलोक वशिष्ठ ने एसपी सत्यवीर सिंह के घर छापा मार कर उन्हें गिरफ्तार किया था. फरहीन और निसार को गिरफ्तार करने की यह काररवाई इतनी गोपनीय थी कि यह दंपति अपनी गिरफ्तारी की सूचना अपने ‘आका’ एसपी को नहीं दे सका था. एसीबी टीम ने फरहीन और निसार के भी मोबाइल फोन जब्त कर लिए थे.

गिरफ्तारी के बाद फरहीन और निसार के घर तथा होटल की तलाशी ली गई. इस तलाशी में तमाम ऐसे दस्तावेज मिले, जिन से साफ हो गया कि फरहीन और उस का पति पैसे ले कर एसपी से तमाम काम कराते थे. यही नहीं, उस के रेस्टोरेंट और घर से पुलिसकर्मियों के तबादलों की तमाम अर्जियां भी मिली थीं.

एसीबी ने एसपी सत्यवीर सिंह के सरकारी आवास और जयपुर के वैशालीनगर स्थित आवास की ही नहीं, अलवर जिले की तहसील बहरोड़ के गांव चांदीचाना जा कर उन के पैतृक घर की भी तलाशी ली थी. एसीबी ने अपनी इस काररवाई को ‘औपरेशन टाइगर’ का नाम दिया था, जो पूरी तरह सफल रहा था.

एसीबी टीम का यह औपरेशन इतना गोपनीय था कि कोटा के एसीबी के एसपी को भी इस काररवाई की भनक नहीं लगी थी. एसपी सत्यवीर सिंह की गिरफ्तारी के बाद जब डीआईजी ने फोन कर के उन्हें पुलिस अन्वेषण भवन बुलाया तो इस काररवाई से वह हैरान रह गए थे.

गिरफ्तार एसपी सत्यवीर सिंह और उन के लिए दलाली का काम करने वाले फरहीन एवं उस के पति निसार से एसीबी अधिकारियों ने अलगअलग पूछताछ तो की ही, आमनेसामने बैठा कर भी पूछताछ की. इस पूछताछ एवं जांच में एक महिला की महत्त्वाकांक्षा एवं एक भ्रष्ट अधिकारी के भ्रष्टाचार और शौकीनमिजाजी की वरदी को दागदार करने वाली जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

राजस्थान के जिला अलवर की तहसील बहरोड़ के गांव चांदीचाना के रहने वाले सेवानिवृत्त शिक्षक अमीचंद के बड़े बेटे सत्यवीर सिंह ने पढ़ाई पूरी होने के बाद प्रतियोगी परीक्षाएं दीं तो उन का चयन राजस्व सेवा में हो गया था. पदोन्नति से भले ही वह तहसीलदार हो गए थे, लेकिन उस ने प्रतियोगी परीक्षाएं देनी बंद नहीं की थीं. इसी का नतीजा था कि तहसीलदार रहते हुए उन का चयन राजस्थान पुलिस सेवा में हो गया.

राज्य पुलिस सेवा में चयन होने के बाद वह डीएसपी बने. इस के बाद पदोन्नत कर के एडिशनल एसपी बने. 1 फरवरी, 2010 को उन की पदोन्नति भारतीय पुलिस सेवा में हो गई. आईपीएस बनने के बाद उन की पहली पोस्टिंग दौसा के एसपी के रूप में हुई. इस के बाद वह जयपुर (पूर्व) के पुलिस उपायुक्त बने.

जयपुर में सत्यवीर सिंह विवादों में घिरे तो उन्हें एपीओ बना दिया गया. इस के बाद उन्हें सीकर का एसपी बनाया गया. 6 महीने बाद ही उन का तबादला कोटा कर दिया गया. 24 अगस्त, 2013 को उन्होंने कोटा के एसपी का पदभार संभाला था.

                                                                                                                                         क्रमशः

मुन्ना बजरंगी हत्याकांड : जेल में सब हो सकता है

9 जुलाई, 2018 की सुबह उत्तर प्रदेश की बागपत जेल में 2 बदमाश मुन्ना बजरंगी और सुनील राठी साथ बैठ कर चाय पी रहे थे. अचानक दोनों के बीच बातचीत का सुर बदल गया और जेल परिसर गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंज गया. मुन्ना बजरंगी का शव जमीन पर पड़ा था. जेलर और बाकी स्टाफ वाले हक्केबक्के खड़े थे.

मुन्ना बजरंगी की हत्या से यह साफ हो गया कि जेलों में सबकुछ हो सकता है. सिक्योरिटी के कड़े इंतजाम होने के बाद भी जेल में पिस्तौल पहुंच गई. मुन्ना बजरंगी की हत्या ने उत्तर प्रदेश में भाजपा की योगी सरकार की पोल खोल कर रख दी.

अपराध जगत के जानकार कहते हैं कि मुन्ना बजरंगी ने भाजपा विधायक कृष्णानंद राय समेत कई दूसरे नेताओं की हत्या की थी, जिस की वजह से साजिशन उसे जेल में मार दिया गया. मुन्ना बंजरगी की हत्या करने वाला सनील राठी उत्तराखंड, हरियाणा और दिल्ली में दहशत की बड़ी वजह था. बागपत जिले के टीकरी गांव का रहने वाला सुनील राठी दोघट थाने का हिस्ट्रीशीटर अपराधी था.

18 साल पहले सुनील राठी तब चर्चा में आया था जब उस के पिता नरेश राठी की बड़ौत के पास हत्या कर दी गई थी. इस के बाद सुनील राठी ने महक सिंह और मोहकम सिंह की गोली मार कर हत्या कर दी थी. इस आरोप में सुनील राठी को उम्रकैद की सजा हुई थी. सुनील राठी पहले हरिद्वार जेल में था. जनवरी, 2017 में वह बागपत जेल में आया था. वह जेल से ही अपना गिरोह चला रहा था.

इस हत्या की गूंज राजधानी लखनऊ तक पहुंच गई. उत्तर प्रदेश सरकार ने आननफानन जेलर उदय प्रताप सिंह, डिप्टी जेलर शिवाजी यादव, हैड वार्डन अरजिंदर सिंह, वार्डन माधव कुमार को सस्पैंड कर दिया. जांच के लिए ज्यूडिशियल इनक्वायरी भी बनाई गई.

खौफ  का दूसरा नाम..

मुन्ना बजरंगी का असली नाम प्रेम प्रकाश सिंह था. उस का जन्म साल 1967 में उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के पूरेदयाल गांव में हुआ था. पारसनाथ सिंह के 4 बेटों में मुन्ना बजरंगी सब से बड़ा था. घरपरिवार पैसे के लिहाज से कमजोर था. मुन्ना बजरंगी अपने घर वालों की मदद के लिए बचपन से ही मजदूरी करता था. बाद में वह कालीन बुनने का काम करने लगा था. वहीं पहली बार उस के खिलाफ  मारपीट और बलवा करने का मुकदमा दर्ज हुआ था. इस के बाद ही प्रेम प्रकाश मुन्ना बजरंगी के नाम से बदनाम किलर बन गया था.

मुन्ना बजरंगी को किताबों के बजाय हथियार रखने का शौक हो गया था. यही वजह थी कि 17 साल की नाबालिग उम्र में ही उस के खिलाफ पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया था. इस के बाद वह अपराध के दलदल में धंसता चला गया. इसी दौरान मुन्ना बजरंगी को जौनपुर के दबंग माफिया गजराज सिंह का साथ हासिल हो गया था. वह अब उस के लिए काम करने लगा था. साल 1984 में उस ने लूट के लिए कालीन व्यापारी भुल्लन जायसवाल की हत्या कर दी थी.

मुन्ना बजरंगी पहली बार बड़ी चर्चा में तब आया था जब उस ने मई, 1993 में बक्शा थानाक्षेत्र के भुतहा निवासी भाजपा नेता जौनपुर के रहने वाले रामचंद्र सिंह, उन के सहयोगी भानु प्रताप सिंह और गनर आलमगीर की हत्या कचहरी रोड पर भरी भीड़ के बीच कर के पूर्वांचल में अपना दम दिखाया था. हत्या के बाद उस ने गनर की कारबाइन लूट ली थी.

24 जनवरी, 1996 को रामपुर थानाक्षेत्र के जमालपुर बाजार में उस समय के ब्लौक प्रमुख कैलाश दुबे, जिला पंचायत सदस्य राज कुमार सिंह और अमीन बांके तिवारी की हत्या हो गई थी. इस के बाद मुन्ना बजरंगी ने पूर्वांचल में छोटेछोटे अपराधियों की एक फौज बना ली थी. इस कांड में पहली बार एके 47 राइफल से हत्या हुई थी.

90 के दशक में मुन्ना बजरंगी पूर्वांचल के बाहुबली माफिया और नेता मुख्तार अंसारी के गैंग में शामिल हो गया था. मुख्तार अंसारी ने अपराध की दुनिया से राजनीति में कदम रखा और 1996 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर मऊ से विधायक चुने गए. इस के बाद इस गैंग की ताकत बहुत बढ़ गई. मुन्ना बजरंगी सीधेतौर पर सरकारी ठेकों को प्रभावित करने लगा था.

लेकिन इसी दौरान तेजी से उभरते भाजपा के विधायक कृष्णानंद राय उन के लिए चुनौती बनने लगे. उन पर मुख्तार अंसारी के दुश्मन ब्रजेश सिंह का हाथ था, जिस से कृष्णानंद राय का गैंग फलफूल रहा था. कृष्णानंद राय का बढ़ता असर मुख्तार अंसारी को रास नहीं आ रहा था. उन्होंने कृष्णानंद राय को खत्म करने की जिम्मेदारी मुन्ना बजरंगी को सौंप दी.

मुख्तार से फरमान मिल जाने के बाद मुन्ना बजरंगी ने भाजपा विधायक कृष्णानंद राय को खत्म करने की साजिश रची और उसी के चलते 29 नवंबर, 2005 को कृष्णानंद राय को दिनदहाड़े मौत की नींद सुला दिया.

भाजपा विधायक की हत्या के अलावा कई मामलों में उत्तर प्रदेश पुलिस, एसटीएफ  और सीबीआई को मुन्ना बजरंगी की तलाश थी, इसलिए उस पर 7 लाख रुपए का इनाम भी घोषित किया गया, पर वह लगातार अपनी लोकेशन बदलता रहा. बाद में वह भाग कर मुंबई चला गया. उस ने एक लंबा अरसा वहीं गुजारा.

1997 में स्पैशल टास्क फोर्स ने मुन्ना बजरंगी को पकड़ने के लिए जाल बिछाया. 11 सितंबर, 1998 को दिल्ली पुलिस के साथ मिल कर समयपुर बादली थानाक्षेत्र में उसे घेर लिया. इस मुठभेड़ में दोनों तरफ से ताबड़तोड़ गोलियां चलीं. मुन्ना बजरंगी को इस में कई गोलियां लगीं पर वह बच गया था.

अब मुन्ना बजरंगी को यह पता चल गया था कि अपराध की दुनिया से बाहर निकलना जरूरी है. ऐसे में वह राजनीति में कामयाब होना चाहता था. एक बार उस ने लोकसभा चुनाव में गाजीपुर लोकसभा सीट पर अपना एक डमी उम्मीदवार खड़ा करने की कोशिश की थी. वह एक महिला को गाजीपुर से भाजपा का टिकट दिलवाने की कोशिश कर रहा था, जिस के चलते उस के मुख्तार अंसारी के साथ संबंध भी खराब हो रहे थे.

भाजपा से निराश होने के बाद मुन्ना बजरंगी ने कांग्रेस का दामन थामा. वह कांग्रेस के एक कद्दावर नेता की शरण में चला गया. कांग्रेस के वह नेता भी जौनपुर जिले के रहने वाले थे. मगर मुंबई में रह कर सियासत करते थे. मुन्ना बजरंगी ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में उन को सपोर्ट भी किया था.

29 अक्तूबर, 2009 को दिल्ली पुलिस ने मुन्ना बजरंगी को मुंबई के मलाड इलाके में नाटकीय ढंग से गिरफ्तार कर लिया था. माना जाता है कि मुन्ना बजरंगी को अपने ऐनकाउंटर का डर सता रहा था, इसलिए उस ने खुद ही एक योजना के तहत दिल्ली पुलिस से अपनी गिरफ्तारी कराई थी.

मुन्ना बजरंगी की गिरफ्तारी के इस आपरेशन में मुंबई पुलिस को भी ऐन वक्त पर शामिल किया गया था. बाद में दिल्ली पुलिस ने कहा था कि दिल्ली के विवादास्पद ऐनकाउंटर स्पैशलिस्ट राजबीर सिंह की हत्या में मुन्ना बजरंगी का हाथ होने का शक है, इसलिए उसे गिरफ्तार किया गया.

मुन्ना बजरंगी की पत्नी सीमा सिंह ने अपने पति की हत्या को साजिश करार दिया तो दूसरी तरफ मुन्ना बजरंगी की गोली का शिकार हुए पूर्व विधायक कृष्णानंद राय की पत्नी अलका राय ने कहा कि जैसा उस ने किया था, वैसी सजा भी मिली.