Meerut Crime: अपराध का सौफ्टवेयर

Meerut Crime: महत्त्वाकांक्षी होना बुरी बात नहीं है. बुराई तब आती है जब महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति मेहनत और लगन के बजाय अपराध की डगर पर उतर जाता है. उस स्थिति में इंसान के लिए नातेरिश्ते भी कोई मायने नहीं रखते. प्रतीक और तुषार के साथ भी यही हुआ, जिन्होंने इंजीनियर होने के बावजूद अपना भविष्य अपराध की दलदल में ढूंढने की कोशिश की.

उत्तर प्रदेश, मेरठ शहर के टीपी नगर थानांतर्गत पौश कालोनी पंजाबीपुरा स्थित मयंक जैन की कोठी में 19 फरवरी, 2016 की शाम को अजीब सी हलचल थी. ऐसी हलचल वहां पहले कभी नहीं देखी गई थी. दरअसल इस परिवार का बेटा अतिशय जैन सुबह घर से स्कूल जाने के लिए निकला था. लेकिन शाम तक भी वापस नहीं लौटा था. जैन दंपत्ति के कई नातेरिश्तेदार भी कोठी में मौजूद थे. हर किसी के चेहरे पर चिंता की लकीरें झलक रही थीं. गुरजते वक्त के साथ बीचबीच में सभी की निगाहें दरवाजे की तरफ उठ जाती थीं.

दरअसल, मयंक जैन युवा कारोबारी थे. शहर में ही उन का विवाह मंडप था. उन के परिवार में पत्नी शिखा जैन के अलावा 2 बेटे थे. 13 वर्षीय अतिशय उन का छोटा बेटा था. वह शहर के ही एक स्कूल में कक्षा 6 का छात्र था. वह सुबह को घर से निकल कर करीब 100 मीटर दूर बसस्टाप पर जाता था और वहां से स्कूल बस में बैठ कर स्कूल चला जाता था. उस दिन जब दोपहर में वह वापस नहीं लौटा तो शिखा ने मयंक को फोन कर के बताया. वह तुरंत घर आ गए. पहले उन्होंने सोचा कि अतिशय कहीं किसी दोस्त के पास न चला गया हो. जब घंटों बाद भी वह नहीं आया तो मयंक स्कूल पहुंचे.

स्कूल से पता चला कि वह तो उस दिन स्कूल पहुंचा ही नहीं था. यह सुन कर उन की चिंता बढ़ गई. किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था. अपने स्तर से वह काफी खोजबीन कर चुके थे. शाम तक कई रिश्तेदार उन के घर पर एकत्र हो गए थे. सभी अतिशय को ले कर फिक्रमंद थे. बेटे के गायब होने से शिखा का रोरो कर बुरा हाल था. अतिशय के इस तरह लापता होने से किसी अनहोनी की आशंकाएं जन्म ले रही थीं. लोगों से विचारविमर्श के बाद मयंक ने थाने में बेटे की गुमशुदगी दर्ज करा दी. आशंका अपहरण की थी, सो पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया.

थानाप्रभारी प्रशांत कपिल ने अतिशय के स्कूल जा कर पूछताछ की. स्कूल बस के चालक परिचालक से भी पूछताछ की. पता चला कि उस दिन बसस्टाप पर उन्होंने अतिशय को नहीं देखा था. जो अन्य छात्र बसस्टाप से बस में बैठते थे, उन्होंने भी अतिशय को नहीं देखा था. अतिशय खुद ही नाराज हो कर कहीं न चला गया हो, इस बिंदु पर भी पुलिस ने जांच की. लेकिन इस बात से घर वालों ने साफ इनकार कर दिया. पुलिस ने शहर के बसअड्डों, सिनेमाघरों व शौपिंग सैंटरों के सीसीटीवी कैमरों की रिकौर्डिंग की भी जांच की. लेकिन कोई सफलता नहीं मिली.

अगर अतिशय का अपहरण हुआ था तो हैरानी की बात यह थी कि अपहर्त्ताओं ने उस के घर वालों से कोई संपर्क क्यों नहीं किया था? सीओ रफीक अहमद भी जांच में लग गए थे. एसएसपी डी.सी. दुबे के निर्देश पर कई स्थानों पर अतिशय की गुमशुदगी से संबंधित पोस्टर चस्पा कर दिए गए. आसपास के जिलों में भी इस की सूचना भेज दी गई. 3 दिन होने को आए थे, लेकिन अतिशय का पता नहीं चल सका था. इस बीच मामला तूल पकड़ने लगा था. 22 फरवरी की रात एक अंजान नंबर से मयंक के मोबाइल पर फोन आया तो उन्होंने काल रिसीव की. दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘बेटे को ले कर परेशान हो न?’’

‘‘आप कौन?’’

‘‘आप का बेटा हमारे कब्जे में है.’’

‘‘कैसा है मेरा बेटा, क्या हुआ उस को?’’ उन्होंने उत्सुकता से पूछा. लेकिन अगले ही पल उन्हें झटका लगा.

‘‘वह बिलकुल ठीक है. हम ने उस का अपहरण कर लिया है.’’ दूसरी ओर से यह कहा गया तो मयंक के पैरों तले से जमीन खिसक गई, चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. उन्होंने सोचा भी नहीं था कि अतिशय का इस तरह अपहरण हो जाएगा.

‘‘कौन बोल रहे हैं आप?’’ मयंक ने सहमते पूछा.

‘‘बता देंगे, इतनी भी क्या जल्दी है. हम ने अपहरण उस की रखवाली करने के लिए नहीं, बल्कि फिरौती के लिए किया है. हमें 2 करोड़ रुपए चाहिए, पूरे 2 करोड़. एक बात और बता दूं आप को, हम अच्छे लोग नहीं हैं. पलक झपकते ही जान भी ले सकते हैं. पुलिस को बीच में ला कर बेटे की जान जोखिम में मत डालना, वरना इस गलती की सजा भुगतनी पड़ेगी. इसे मार कर कहीं भी फेंक देंगे, फिर पुलिस से ही जिंदा करा लेना.’’

‘‘प्लीज तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे.’’ मयंक फोन पर गिड़गिड़ाए.

‘‘बताया न, हम कुछ भी कर सकते हैं. हां, अगर तुम चाहोगे तो उसे कुछ नहीं होगा. फिरौती की मांग पूरी होते ही हम उसे छोड़ देंगे. तुम रुपयों का इंतजाम करो. हम तुम्हें बाद में फोन करेंगे.’’ कहने के साथ ही उस ने फोन काट दिया. फिरौती के लिए फोन आने से जैन परिवार में कोहराम मच गया. उन्होंने इस की सूचना पुलिस को दे दी. बच्चे के अपहरण की सूचना मिलते ही पुलिस विभाग में भागदौड़ शुरू हो गई.

एसएसपी डी.सी. दुबे ने आननफानन में एसपी सिटी ओ.पी. सिंह के निर्देशन में पुलिस की 5 टीमें गठित कर के उन्हें तुरंत काम पर लगा दिया. आला अधिकारियों तक मामला पहुंचा तो आईजी सुजीत पांडेय और डीआईजी लक्ष्मी सिंह भी अतिशय जैन की अविलंब बरामदगी के लिए सक्रिय हो गए. अपहर्त्ताओं का फिर फोन आया तो मयंक ने मजबूरी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘अपना सब कुछ बेच कर भी हम इतनी रकम का इंतजाम नहीं कर सकते.’’ इस पर अपहर्त्ता सौदेबाजी पर उतर आए. मयंक गिड़गिड़ाए, ‘‘मैं जितना भी इंतजाम कर सकता हूं, करूंगा. लेकिन अतिशय को कुछ नहीं होना चहिए’’

‘‘जैन साहब, आप चाहेंगे तो आप के बेटे को कुछ नहीं होगा. लेकिन अपना उसूल है, इस हाथ दो, उस हाथ लो.’’ इतना कह कर अपहर्त्ता ने फोन काट दिया. इस के बाद अपहर्त्ता लगातार मयंक के संपर्क में बने रहे. इस बीच पुलिस ने अपहर्त्ताओं के मोबाइल नंबर की जांच कराई तो वह बदायूं जनपद के एक गलत पते का निकला. फलस्वरूप पुलिस के लिए अपहर्त्ताओं तक पहुंचने का यह माध्यम भी बंद हो गया.

दूसरी तरफ मयंक जैन ने जैसेतैसे 23 लाख रुपए का इंतजाम कर लिया. उन्होंने अपहर्त्ताओं से साफ कह दिया कि वह इस से ज्यादा रकम नहीं दे पाएंगे. अपहर्त्ता इतनी ही रकम ले कर अतिशय को लौटाने को तैयार हो गए. अलबत्ता उन्होंने मयंक को एक बार फिर धमकाया, ‘‘अगर तुम ने पुलिस को हमारे पीछे लगाया या चालाकी दिखाई तो बेटे की लाश भी सहीसलामत देखने को नहीं मिलेगी. यह तुम्हें तय करना है कि बेटा जिंदा चाहिए या नहीं?’’ अतिशय उन के कब्जे में है, यह बात साबित करने के लिए अपहर्त्ताओं ने मयंक से उस की बात भी कराई.

‘‘मेरी तरफ से ऐसा नहीं होगा.’’ मयंक ने उन्हें आश्वस्त कर दिया. मयंक जैन को बेटे की चिंता थी, इसलिए उन्होंने अपहर्त्ताओं की बात मान कर पुलिस से दूरी बना ली. उन्होंने पैसा दे कर बेटे को छुड़ाने का फैसला कर लिया. दूसरी ओर पुलिस अपनी जांच में लगी रही. अपहर्त्ताओं ने मयंक जैन से 24 फरवरी की रात गाजियाबाद के वैशाली मैट्रो स्टेशन के बाहर रुपए ले कर पहुंचने को कहा. मयंक वहां पहुंचे भी, लेकिन घंटों इंतजार के बाद भी कोई रुपए लेने नहीं आया.

अपहर्त्ता अपनी बात कहने के बाद मोबाइल फोन बंद कर देते थे. अगले दिन उन्होंने मयंक को रुपए ले कर दिल्ली के कनाट प्लेस बुलाया. पर वहां भी कोई रुपए लेने नहीं आया. मयंक परेशान थे. अगले दिन अपहर्त्ताओं ने कहा कि पैसा ले कर वह गुड़गांव आएं. मयंक वहां भी पहुंचे, लेकिन अपहर्त्ता पैसा लेने नहीं आए. पुलिस ने सर्विलांस का सहारा भी लिया, लेकिन गच्चा खा गई. क्योंकि अपहर्त्ताओं के मोबाइल की लोकेशन उत्तर प्रदेश के अलावा कभी दिल्ली तो कभी हरियाणा तो कभी बिहार आती थी. पुलिस समझ नहीं पा रही थी कि अपहर्त्ता आखिर इतने प्रोफेशनल कैसे हो सकते हैं.

इस बीच पुलिस की समझ में यह बात आ गई कि मयंक जानबूझ कर पुलिस से दूरी बनाए हुए हैं और अपहर्त्ताओं से फिरौती का लेनदेन तय हो गया है. पुलिस अधिकारियों ने जैसेतैसे मयंक जैन को इस वादे के साथ विश्वास में लिया कि वह उन के बेटे को कुछ नहीं होने देंगे. इस से पुलिस को पता चला कि 27-28 फरवरी की मध्यरात्रि में अपहर्त्ता फिरौती की रकम लेने के लिए दिल्लीजयपुर हाईवे पर आएंगे.

यह पता चलते ही केस की मौनीटरिंग कर रहे आईजी सुजीत पांडेय और डीआईजी लक्ष्मी सिंह ने आननफानन में एसपी सिटी ओ.पी. सिंह व एसपी (क्राइम) अजय सहदेव के नेतृत्व में पुलिस की 5 टीमों का गठन कर के उन्हें निगरानी पर लगा दिया. इस के साथ ही 2 दर्जन से अधिक पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में भी लगाए गए. पुलिस किसी भी स्थिति में अपहर्त्ताओं को पकड़ कर अतिशय को सकुशल बरामद करना चाहती थी.

पुलिस की टीमें संभावित ठिकानों पर लग गईं. रात करीब 1 बजे अपहर्त्ताओं ने मयंक को एक स्थान पर सड़क किनारे बैग छोड़ कर चले जाने को कहा. उन्होंने ऐसा ही किया. लेकिन पुलिस के वहां पहुंचने से पहले ही एक आईटैन कार में सवार अपहर्त्ता बैग उठा कर चले गए. यह सब इतनी तेजी से हुआ कि पुलिस देखती ही रह गई. लेकिन पुलिस इस मामले में बेफिक्र थी, क्योंकि उस ने मयंक जैन की सहमति से अपहर्त्ताओं तक पहुंचने के लिए रुपयों वाले बैग में जीपीएस टै्रकिंग सिस्टम लगा दिया था. भागते वक्त अपहर्त्ताओं की कार का रुख दिल्ली की तरफ था. जीपीएस से लोकेट हुआ कि अपहर्त्ता एक स्थान पर ठहर गए हैं. पुलिस पीछा करते हुए वहां पहुंच भी गई, लेकिन पुलिस को तब झटका लगा, जब सड़क किनारे सिर्फ खाली बैग पड़ा मिला.

पुलिस समझ गई कि अपहर्त्ता बेहद शातिर हैं और पुलिस की सर्विलांस की काररवाई के अच्छे जानकार भी. यही वजह थी कि उन्होंने फिरौती की रकम वाले बैग को रास्ते में ही फेंक दिया था. पुलिस ने अपहर्त्ता के मोबाइल को सर्विलांस पर लगाया हुआ था. सर्विलांस के हिसाब से अब तक कार का रुख दिल्ली से निकल कर देहरादून हाईवे की तरफ हो गया था. मुखबिरों के जरिए चूंकि आईटैन कार चिह्नित हो चुकी थी, इसलिए मेरठ में भी पुलिस टीम को अलर्ट कर दिया गया. मेरठ में वेदव्यासपुरी के पास पुलिस ने घेराबंदी कर के संदिग्ध कार की तलाशी ली तो उस में न केवल अतिशय सकुशल मिल गया, बल्कि उस में सवार 2 युवक व एक युवती भी कब्जे में आ गए. अतिशय बेहद डरासहमा था.

पुलिस सब को थाने ले आई और आला अधिकारियों को खबर कर दी. पुलिस ने उन से पूछताछ की. गिरफ्तार किए गए अपहर्त्ताओं में प्रतीक जैन उर्फ मोनू, तुषार जैन उर्फ नीशू और आस्था विश्वास शामिल थे. पुलिस के लिए नि:संदेह यह बड़ी सफलता थी. उस दिन यानी 28 फरवरी को प्रदेश के पुलिस महानिदेशक जावीद अहमद को नोएडा आना था. तय हुआ कि अपहरण का खुलासा उन्हीं के द्वारा हो. डीआईजी लक्ष्मी सिंह, एसएसपी डी.सी. दुबे व एसपी (सिटी) ओ.पी. सिंह नोएडा पहुंच गए. जावीद अहमद ने प्रैसवार्ता में पूरे केस से पर्दा उठाया. अतिशय के अपहरण में शामिल युवक युवती न केवल हाईप्रोफाइल थे, बल्कि उन में से एक अतिशय के पिता मयंक जैन का रिश्तेदार भी था.

दरअसल, गिरफ्तार अपहर्त्ता तुषार जैन मेरठ शहर की हनी गोल्फ कालोनी की कोठी नंबर-70 में रहता था. उस के पिता सिंचाई विभाग में अधिकारी थे. सन 2012 में उस ने गाजियाबाद के एक इंजीनियरिंग कालेज से बीटेक किया था. इस के बाद उस ने 2 साल का साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट का डिप्लोमा भी किया था. डिग्रीधारी हो कर भी जब उसे नौकरी नहीं मिली तो उस ने स्वतंत्र एक्सपर्ट के तौर पर काम करना शुरू कर दिया.

उस ने पुलिस विभाग के लिए भी कई काम किए. बड़ेबड़े केस खोलने में इंटरनेट के जरिए उस ने पुलिस की मदद की. एक तरह से वह साइबर मामलों में पुलिस का एडवाइजर था. समयसमय पर पुलिस उस की मदद लेती रहती थी. साइबर के जो सेमिनार आयोजित किए जाते थे, उन में वह लैक्चर देता था. इस के बाजवूद वह गुजारे लायक ही कमा पाता था. बाद में वह अपनी मौसी के लड़के प्रतीक जैन के पास चला गया था. प्रतीक जैन हरियाणा, गुड़गांव के सेक्टर-82 स्थित प्रथम तल के फ्लैट नंबर-31 में किराए पर रहता था. प्रतीक ने कंप्यूटर साइंस से बीटेक करने के साथ ही लंदन की एक यूनिवर्सिटी से भी इंजीनियरिंग का डिप्लोमा किया था. प्रतीक जयपुर, राजस्थान के जवाहर नगर निवासी कपड़ों के बड़े कारोबारी संजय जैन का बेटा था. प्रतीक के दादा सेवानिवृत्त आईएएस औफिसर थे. पढ़ाई के बाद वह गुड़गांव आ गया था.

गुड़गांव में चूंकि कई नामी कंपनियां थीं, इसलिए उसे उम्मीद थी कि मोटी तनख्वाह की नौकरी मिल जाएगी. लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो उस ने कौंटे्रक्ट पर सौफ्टवेयर बनाने शुरू कर दिए थे. वह अच्छा सौफ्टवेयर डेवलपर था. उस ने चूंकि लंदन में पढ़ाई की थी, इसलिए कंपनियां उसे महत्त्व और रकम दोनों देती थी. प्रतीक अपनी कमाई का हिस्सा अपने परिवार को भी भेजता था.

प्रतीक यूं तो हर महीने 5-6 लाख रुपए कमाता था. तुषार भी लाख 2 लाख कमा लेता था. यह बात अलग थी कि इतनी कमाई भी उस के लिए कम पड़ जाती थी. इस की भी एक बड़ी वजह थी. तुषार व प्रतीक दोनों ही लग्जरी लाइफ जीने के आदी थे. इस के अलावा वह अय्याशी भी करते थे. ये लोग अक्सर महंगे होटलों में जा कर मौजमस्ती करते थे. उन की साथी आस्था विश्वास मूलत: कोलकाता, पश्चिमी बंगाल के थाना धानतल क्षेत्र के अंतर्गत कलामपुर की रहने वाली थी. वह एक कंपनी में बतौर एडवाइजर नौकरी करती थी. एक साल पहले प्रतीक से मुलाकात के बाद दोनों की नजदीकियां बढ़ गई थीं.

धीरेधीरे दोनों के बीच प्रेमिल रिश्ते बन गए थे. दोनों ने एकदूसरे से विवाह का वादा भी कर लिया था. आस्था चूंकि परिवार से दूर थी, इसलिए वह प्रतीक के साथ ही लिवइन रिलेशन में रहने लगी थी. बात यहीं तक होती तो भी ठीक थी. प्रतीक व तुषार होटलों में हाईप्रोफाइल कौलगर्ल के साथ रातें रंगीन किया करते थे.

एकएक रात में वे 50 हजार रुपए से ज्यादा की रकम अपने अय्याशी के शौक पर लुटा देते थे. इंसान यदि बुरी लतों का शिकार हो कर अपनापशनाप खर्च करे तो बड़ी से बड़ी दौलत भी कम पड़ जाती है. इन दोनों के साथ भी ऐसा ही हुआ. प्रतीक और तुषार दोनों ही आर्थिक रूप से परेशान रहने लगे. जब पैसा होता मौज करते और जब पैसा खत्म हो जाता तो परेशान रहने लगते. मयंक जैन रिश्ते में प्रतीक का चाचा था. उन से मिलने के लिए कभीकभी वह मेरठ जाता रहता था.

दोनों महत्त्वाकांक्षी युवक थे. उन के सपने ऊंचे थे और खर्चे बेशुमार. अच्छी नौकरी उन्हें मिल नहीं रही थी. महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उन्होंने कोई शौर्टकट रास्ता अख्तियार करने का मन बनाया. यह अलग बात थी कि काफी विचारविमर्श के बाद भी वे किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाए. कहते हैं कि दिलओदिमाग में कोई खुराफाती विचार पनप जाए और इंसान उस के बारे में लगातार सोचता रहे तो वह अपने हिसाब से कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेता है.

फरवरी, 2016 के पहले सप्ताह में तुषार अपने घर मेरठ आया तो वह अपने साथ प्रतीक को भी ले आया. एक शाम दोनों बैठे तो तुषार ने उस की मुलाकात अपने 2 दोस्तों सोनू और राहुल से कराई. वे भी बीटेक किए हुए थे और उन के जैसी महत्त्वाकांक्षी सोच के शिकार थे. चारों ने बैठ कर अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने पर चर्चा की. सभी ने पैसे का रोना रोया. इसी दौरान प्रतीक ने कहा, ‘‘तुम लोग यदि साथ दो तो मेरे पास रातोंरात करोड़पति बनने का एक सुपर आइडिया है.’’

‘‘क्या?’’ सभी ने जिज्ञासावश पूछा तो उस ने राजदाराना अंदाज में बताया, ‘‘मेरे रिश्ते के चाचा मयंक जैन काफी पैसे वाले हैं.’’

‘‘इस से क्या होगा भाई, क्या वह हमें मालामाल कर देंगे?’’ तुषार के सवाल पर प्रतीक हंस दिया, ‘‘बिलकुल, इतना मालामाल कर देंगे कि सभी के दिन बदल जाएंगे और कभी पैसे की दिक्कत नहीं आएगी.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘अगर हम उन के बेटे का अपहरण कर लें तो वह मुंहमांगी रकम देंगे.’’

‘‘यह काम इतना आसान नहीं है. पुलिस जमीनआसमान एक कर देगी.’’ राहुल ने आशंका जाहिर की तो प्रतीक तुषार की तरफ इशारा कर के बोला, ‘‘इस सब की जरा भी फिक्र मत करो. अपना तुषार साइबर एक्सपर्ट है. सारे हथकंडे जानता है कि पुलिस ऐसे मामलों में कैसे काररवाई करती है. हम पुलिस को बहुत आसानी से नाच नचा देंगे. वह हम तक कभी नहीं पहुंच पाएगी.’’

तुषार ने भी उस की बात का समर्थन किया, ‘‘उस की चिंता तुम छोड़ दो, हम पूरी प्लानिंग से काम करेंगे.’’

काफी विचारविमर्श के बाद उन्होंने मयंक के बेटे अतिशय का अपहरण कर के फिरौती वसूलने की योजना बना ली. प्रतीक ने मयंक को यूं ही टारगेट नहीं बनाया था. इस की एक वजह तो यही थी कि मयंक जैन पैसे वाले थे और प्रतीक को यह बात पता थी. उन्होंने कुछ समय पहले एक महंगी लग्जरी कार भी खरीदी थी. इस से प्रतीक को लगा कि मयंक नोटों में खेल रहे हैं. इसी वजह से उस ने उन के बेटे को निशाने पर ले लिया. अगले कुछ दिनों तक अमीरी के सपने देख कर वह सभी प्लानिंग करते रहे. इस बीच उन्होंने 315 बोर के 2 तमंचों का इंतजाम भी कर लिया. अपनी योजना में उन्होंने आस्था को भी शामिल कर लिया था.

पूरी योजना तैयार कर के 18 फरवरी को वे मेरठ पहुंचे. प्रतीक चूंकि मयंक के घर आताजाता रहता था, इसलिए उसे उन के बेटे अतिशय के आनेजाने का समय और बसस्टाप का पता था. उस दिन अतिशय बसस्टाप पर पहुंचा, लेकिन चूंकि वहां कई बच्चे थे, इसलिए उन्होंने अपहरण का इरादा छोड़ दिया. अगले दिन यानी 19 फरवरी की सुबह तुषार व प्रतीक आईटैन कार संख्या यूपी 12 डब्ल्यू-3273 से फिर मेरठ पहुंच गए. यह कार प्रतीक की थी. तय स्थान पर उन्हें मोनू व राहुल भी मिल गए.

करीब 8 बजे अतिशय रोजाना की तरह स्कूल जाने के लिए बसस्टाप पर पहुंच गया. इत्तेफाक से उस समय अतिशय अकेला था. दूर से निगाह रख रहे वह चारों वहां पहुंचे तो प्रतीक ने अतिशय को बुला कर कहा, ‘‘आओ अतिशय आज मैं तुम्हें स्कूल छोड़ देता हूं.’’

‘‘ओके भैया,’’ कहते हुए अतिशय खुशीख्ुशी कार में बैठ गया. उस के बैठते ही कार नेशनल हाइवे की तरफ जाने लगी तो अतिशय ने उसे टोका, ‘‘आप लोग मुझे कहां ले जा रहे हैं?’’ जवाब में उन लोगों ने उस के  साथ मारपीट कर के उसे डरा दिया और चुप रहने की धमकी दी.

बाद में उन्होंने नशीला पदार्थ सुंघा कर उसे बेहोश कर दिया. गाजियाबाद पहुंच कर सड़क पर उन्होंने एक रिक्शेवाले को मोबाइल पर बात करते देखा. प्रतीक व तुषार कार रोक कर उस के नजदीक पहुंचे और एक अर्जेंट काल करने के लिए उस से मोबाइल मांगा. उन्होंने उसे बताया कि उन के मोबाइल रास्ते में एक होटल में चोरी हो गए हैं. एक काल करने के बदले में उन्होंने रिक्शा वाले को 5 सौ रुपए का नोट निकाल कर दे दिया. रिक्शे वाले ने खुश हो कर उन्हें अपना मोबाइल दे दिया. मोबाइल ले कर दोनों कार से भाग निकले. यह उन की योजना का एक हिस्सा था. कुछ घंटों के सफर में वे अतिशय को गुड़गांव वाले फ्लैट पर ले गए और उस के हाथपैर बांध कर मुंह पर टेप लगा दी. उस की निगरानी का जिम्मा आस्था को सौंप दिया गया. फिरौती के लिए फोन करने में उन्होंने जल्दी नहीं की, बल्कि अखबारों के जरिए हालात पर नजर रखे रहे.

3 दिनों बाद 22 फरवरी को तुषार ने आवाज बदल कर रिक्शेवाले से छीने गए मोबाइल से मयंक को फोन कर के 2 करोड़ की फिरौती मांगी. कई दौर की बातचीत के बाद सौदा 23 लाख रुपए में तय हो गया. प्रतीक ने भी आवाज बदल कर मयंक को फोन किया. 24, 25 व 26 फरवरी को उन्होंने मयंक को रकम ले कर बुलाया. दूर से वह उस पर नजर रखते रहे, परंतु फिरौती नहीं ली.

वे नजर रख कर पूरी चालाकी बरतते हुए आश्वस्त हो जाना चाहते थे कि मयंक के साथ पुलिस तो नहीं है. पुलिस ने मोबाइल का पता निकलवाया तो वह बदायूं का निकला, लेकिन उस का सिम फर्जी पते पर लिया गया था. तुषार व प्रतीक टैक्नीकली मजबूत थे. वह काल करने में लोकेशन बदलने के लिए एक खास सौफ्टवेयर का इस्तेमाल करते थे. 27-28 फरवरी की रात फिरौती की रकम वसूलने के लिए प्रतीक, तुषार और आस्था कार से अतिशय को साथ ले कर निकले. पहले से तय जगह से रकम का बैग उठा कर उन्होंने कार में रखा. तुषार साइबर एक्सपर्ट था. उस ने सब से पहले रुपए निकाल कर दूसरे बैग में रखे. उसी वक्त उस ने बैग को चैक किया तो पाया कि उस में जीपीएस डिवाइस लगी है. उस ने बैग रास्ते में फेंक दिया.

इस बीच प्रतीक बोला, ‘‘हम लोगों का काम हो गया है. अब वक्त आ गया है, जब अतिशय से पीछा छुड़ा लिया जाए. यह जिंदा रहेगा तो हम सब पकड़े जाएंगे. हम हरिद्वार की तरफ चलते हैं. रास्ते में इसे मार कर कहीं फेंक देंगे और हरिद्वार में गंगा नहा कर इस मामले की इतिश्री कर देंगे.’’ लेकिन वह अपने घृणित मकसद में कामयाब हो पाते, उस से पहले ही पुलिस की गिरफ्त में आ गए.

पुलिस ने उन के कब्जे से फिरौती के 23 लाख रुपए, 315 बोर के 2 तमंचे, अपहरण में प्रयुक्त कार, नायलौन की रस्सी व सेलो टेप आदि चीजें बरामद कीं. पुलिस ने उन के साथी अपहर्त्ताओं मोनू व राहुल की तलाश की, परंतु वे हाथ नहीं आ सके. पुलिस ने अपहर्त्ताओं पर धारा-364ए, 307, 25 आर्म्स एक्ट व 7/8 पोक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया. विस्तृत पूछताछ के बाद अगले दिन मेरठ पुलिस ने भी प्रैसवार्ता की और तीनों आरोपियों को अपर जिला जज की विशेष अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक किसी की भी जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस बाकी आरोपियों की तलाश कर रही थी.

प्रतीक, तुषार  और उन के साथियों के पास अच्छी डिग्रियां थीं, वे थोड़ा सब्र से काम लेते तो अच्छी नौकरियां पा कर अपना कैरियर बना सकते थे, लेकिन उन की महत्वाकांक्षाओं, शौर्टकट से दौलत कमाने की ललक और खुराफाती दिमाग ने उन का भविष्य चौपट कर दिया. दूसरी ओर केस के खुलासे पर डीजीपी जावीद अहमद ने अधिकारियों को प्रशस्ति पत्र और पुलिस की टीम को 50 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की. Meerut Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

True Crime Story: ठगी का बड़ा खिलाड़ी

True Crime Story: नौवीं फेल अजय पंडित देश की राजनैतिक पार्टियों के बड़ेबड़े नेताओं और नौकरशाहों से संबंध बना कर सफेदपोश बन गया. वीआईपी सुरक्षा में रह कर उस ने करोड़ों ठगे. जब उस की हकीकत सामने आई तो पता चला कि राजनीति की आड़ में कैसेकैसे लोग पलते हैं.

राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या एक पर स्थित हरियाणा के जिला करनाल की पहचान विभिन्न औद्योगिक इकाइयों के रूप में तो है ही, इस के अलावा यह धान की खेती के रूप में भी प्रसिद्ध है. यहां पैदा होने वाले उच्च गुणवत्ता वाले धान के चावल को विदेशों तक भेजा जाता है. यहां की दुनार राइस मिल का बड़ा नाम है. जाटान रोड स्थित इस मिल के मालिक सुरेंद्र गुप्ता बहुत ही सधे हुए अदांज में अपनी यह राइस मिल चला रहे हैं. उन की राइस मिल का चावल देशविदेश भेजा जाता है. सुरेंद्र एक बड़ी शख्सियत हैं, लिहाजा उन के संबंध भी वैसे ही लोगों से हैं. वह अपने कारोबार को और ऊंचाई तक ले जाना चाहते थे, जिस के लिए उन्हें करोड़ों रुपए की बड़ी रकम की जरूरत थी.

वैसे तो यह रकम उन्हें बैंकों से कर्ज के रूप में मिल सकती थी, लेकिन एक तो मोटी रकम, दूसरे बैंकों द्वारा लिया जाने वाला मोटा ब्याज, उन्हें परेशान करता था.

इंसान किसी बात की चाहत रखता है तो कई बार उस के रास्ते खुदबखुद खुल जाते हैं. सुरेंद्र गुप्ता के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. उन की मुलाकात एक आदमी और उस के साथियों से हुई तो उन्होंने अपनी समस्या उन से कही, उस आदमी के साथियों में से एक ने कहा, ‘‘गुप्ताजी, सोच लीजिए, आप का काम हो गया.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘आप को मोटा और सस्ती ब्याज दर पर एक आदमी लोन दिला सकता है, क्योंकि उस के लिए यह बाएं हाथ का खेल है.’’

‘‘कौन है वह?’’

‘‘आप ने अजय पंडित का नाम तो सुना ही होगा. वह ऐसे आदमी हैं कि उन के पास पहुंचते ही हर समस्या का हल निकल आता है.’’

इस के बाद उस आदमी और उस के साथियों ने अजय पंडित के बारे में जो कुछ बताया, उसे सुन कर सुरेंद्र गुप्ता हैरान रह गए.

अजय पंडित वह नाम था, जिस के बड़ेबड़े राजनेताओं से सीधे संबंध थे. बड़ेबड़े लोग अपने काम कराने उस के यहां लाइन लगाए खड़े रहते थे. यह बात अलग थी कि अजय सिर्फ करोड़पतियों या अरबपतियों के ही काम कराता था. अजय मूलरूप से रहने वाला तो हरियाणा के सिरसा जिले का था, लेकिन वह दिल्ली के छतरपुर स्थित एक फार्महाउस में रहता था. सुरेंद्र गुप्ता से मिलने वाला वह आदमी और उस के साथियों ने जो बताया था, उस के अनुसार अजय पंडित सोनिया गांधी एसोसिएशन का राष्ट्रीय अध्यक्ष था. इस के अलावा वह अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा का भी अध्यक्ष था.

राजनीतिज्ञों से चूंकि उस के गहरे रिश्ते थे, इसलिए वह लोगों के काम आसानी से करा देता था. वे लोग अजय को जानते ही नहीं थे, बल्कि उस से उन के अच्छे रिश्ते भी थे. इन लोगों से मिलने के बाद सुरेंद्र को लगा कि उन की इच्छा पूरी हो जाएगी. अजय पंडित के बारे में कुछ थोड़ा उन्होंने भी सुन रखा था. वह काफी ऊंची पहुंच वाला आदमी था.

उन लोगों ने सपने दिखाए तो सुरेंद्र अजय से मिलने के लिए ललायित हो उठे. उन्होंने कहा, ‘‘इस से अच्छी बात और क्या हो सकती है. आप लोग उन से मेरी मुलाकात करा दीजिए.’’

‘‘ठीक है, हम कोशिश करते हैं. समय ले कर आप को फोन पर बता देंगे.’’ रितेश और उस के साथियों ने कहा.

इस के बाद वे चले गए, लेकिन उन का संपर्क सुरेंद्र से बना रहा. एक दिन उन्होंने बताया कि सोमवार की दोपहर वह छतरपुर आ जाएं. इस के बाद तय दिन पर सुरेंद्र गुप्ता बताए गए पते पर पहुंच गए.

दिल्ली के छतरपुर इलाके में बड़ी हैसियत वाले नामीगिरामी लोगों के फार्महाउस हैं. उन्हीं में से राधामोहन लेन स्थित एक फार्महाउस पर वह पहुंचे तो वहां की कड़ी सुरक्षा के तामझाम देख कर एकबारगी वह ठिठक गए. मुख्य दरवाजा बंद था और वहां हथियारों से लैस प्राइवेट सुरक्षाकर्मी और पुलिसकर्मी खड़े थे. उन की गाड़ी रुकी तो एक सुरक्षाकर्मी ने उन के नजदीक आ कर पूछा, ‘‘किस से मिलना है?’’

‘‘अजयजी से. अपाइंटमेंट है मेरा.’’

‘‘एक मिनट ठहरिए.’’ कह कर सुरक्षाकर्मी पलटा और मुख्यद्वार पर बनी केबिन में जा कर वहां रखे टेलीफोन से बात की. उस ने फोन रख कर दरवाजा खुलवाने के साथ ही उन्हें अंदर जाने का इशारा कर दिया.

फार्महाउस के अंदर का नजारा बड़ा ही आकर्षक था. वहां हर तरफ हरियाली थी. पार्किंग में पहले से ही कई महंगी और लग्जरी कारें खड़ी थीं. उन्होंने भी अपनी कार वहां खड़ी कर दी और उतर कर कोठी की तरफ बढ़े. कोठी के बरामदे में बने औफिसनुमा कमरे में कई लोग बैठे थे. वहां मौजूद लोगों ने उन से आने का कारण पूछा तो उन्होंने बता दिया.

‘‘ठीक है, आप को थोड़ा इंतजार करना होगा, साहब बाहर हैं. कुछ देर में आते ही होंगे.’’ कह कर एक आदमी उन्हें अंदर ड्राइंगरूम में ले गया. वहां पड़े बेशकीमती सोफों पर पहले से ही तमाम लोग बैठे थे. वह भी एक सोफे पर बैठ गए. वहां की भव्यता देख कर उन की आंखें खुली की खुली रह गईं. चमकदार मार्बल, कालीन, फर्नीचर, दीवारें, उन पर लगी पेंटिंग्स और छत में लटकते झूमर, सभी कुछ भव्यता प्रदर्शित कर रहे थे.

इस के अलावा दीवारों पर नामचीन राजनेताओं के साथ मुसकराते हुए एक ही शख्स के तमाम फोटो टंगे थे. वह समझ गए कि यही अजय पंडित हैं. ड्राइंगरूम की शान भी अलग ही थी. क्लोजसर्किट कैमरे भी वहां लगे थे. इस से भी ज्यादा खास बात यह थी कि वहां बैठे लोग चाय, कौफी, स्नैक्स, फू्रट्स आदि इस अंदाज में खापी रहे थे, जैसे वहां कोई पार्टी चल रही हो. 3-4 वेटर खातिरदारी में लगे थे. एक वेटर उन्हें भी पानी दे गया. उस के बाद उन से और्डर लिया, ‘‘आप के लिए क्या लाएं सर?’’

‘‘कौफी ले आओ.’’ सुरेंद्र ने कहा तो कुछ देर बाद एक वेटर गोल्डन कप में उन्हें कौफी दे गया. वह जिस ड्राइंगरूम में बैठे थे, वहां से बाहर का भी नजारा दिखाई दे रहा था. वहां अनगिनत देशीविदेशी पेड़पौधों ने वातावरण को सुंदर बनाया हुआ था. कुछ ही वक्त बीता था कि वह आदमी और उस के साथी भी आ गए. उन्होंने गर्मजोशी से सुरेंद्र गुप्ता का स्वागत किया. वे भी बातचीत में मशगूल हो गए.

कुछ और वक्त बीता होगा कि सायरन बजाती एक जिप्सी फार्महाउस में दाखिल हुई. उस के ठीक पीछे काले रंग की चमचमाती मर्सिडीज कार थी और उस के पीछे एक और जिप्सी. दोनों जिप्सियों पर बीसियों कमांडों और सुरक्षाकर्मी सवार थे. सभी के पास हथियार और वौकीटौकी थे. एक सुरक्षाकर्मी ने चमचमाती कार का पिछला दरवाजा खोला तो उस में से जो शख्स उतरा, वह निहायत ही आकर्षक था. उस ने नीले रंग का सूट पहना हुआ था. उस ने अपने नजदीक आए स्टाफ से कुछ गुफ्तगू की और ड्राइंगरूम की तरफ बढ़ने लगा. उस की चालढाल में भी रुआब झलक रहा था. उस के चारों ओर सुरक्षाकर्मी इस तरह घेरा सा बनाए चल रहे थे कि कोई परिंदा भी नजदीक नहीं आ सकता था. अंदर पहुंच कर उस ने मुसकरा कर सभी से मुलाकात की.

सुरेंद्र के परिचित ने उन का परिचय कराया, ‘‘सर, आप ही हैं सुरेंद्र गुप्ताजी, जिन के बारे में आप से बात हुई थी.’’

‘‘ओके…ओके… आप के बारे में इन लोगों ने मुझे सब बता दिया है. आप अभी बैठिए, मैं बाकी लोगों से मिल कर आप से बात करता हूं.’’

सभी अपनीअपनी जगह पर बैठ गए. सारा तामझाम देख कर सुरेंद्र समझ गए कि अजय पंडित बहुत पहुंची हुई हस्ती है.

करीब आधे घंटे बाद अजय पंडित से उन के मिलने की बारी आ गई. औपचारिक बातचीत के बाद उस ने पूछा, ‘‘इन लोगों ने बताया तो था आप के काम के बारे में, लेकिन आप खुद विस्तार से मुझे बताइए कि आप चाहते क्या हैं?’’

‘‘सर, मुझे करीब 2 सौ करोड़ का लोन चाहिए.’’

सुरेंद्र की बात पर अजय इस तरह मुसकराया, जैसे यह बहुत छोटी बात हो. उस ने कहा, ‘‘2 सौ ही क्यों, आप 3 सौ करोड़ का लोन ले लीजिए. ऐसी कई विदेशी कंपनियां हैं, जो भारत में अपना पैसा निवेश करना चाहती है. बस, उन्हें गारंटी चाहिए, वह आप के लिए हम ले लेंगे. ब्याज भी केवल 7 प्रतिशत होगा. अभी पिछले महीने उन्होंने दिल्ली की एक पार्टी को 2 सौ करोड़ रुपए दिए भी हैं.’’

यह सुन कर सुरेंद्र गुप्ता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा.

‘‘बात करोड़ों की है, इसलिए एक बार कल मैं उन लोगों से बात कर लेता हूं. अगर उन्होंने कहीं इन्वैस्टमेंट नहीं किया होगा तो आप अपना काम पक्का समझिए.’’ कुछ पल रुक कर उस ने आगे कहा, ‘‘हां, एक जरूरी बात, कस्टम, पुलिस क्लियररैंस और सभी फाइल चार्ज आप को देने होंगे.’’

‘‘वह मैं दे दूंगा.’’ सुरेंद्र गुप्ता ने उत्साह से कहा. अच्छे माहौल में बातचीत के बाद सुरेंद्र खुशीखुशी वापस आ गए.

अजय के साथियों ने एक सप्ताह बाद ही सुरेंद्र गुप्ता को बता दिया कि उन का काम हो जाएगा. कागजी औपचारिकताओं और कमीशन के नाम पर पहली किश्त के रूप में उन्होंने एक करोड़ रुपए अजय तक पहुंचा दिए. इस के साथ अपने कुछ फोटो, प्रौपर्टी दस्तावेजों की फोटोकौपी भी दे दी थी. अगले कुछ महीनों में कस्टम, पुलिस क्लीयरेंस, सिक्योरिटी और अन्य कमीशन के नाम पर उन्होंने 3 करोड़ रुपए और भी दे दिए. 3 सौ करोड़ के लोन के लिए यह रकम कुछ भी नहीं थी. इतना बड़ा लोन उन्हें मिलने जा रहा था, यही क्या कम था.

इस बीच कई तरह के फार्म जो कस्टम, बैंकों और विदेशी मनी ट्रांसफर की सरकारी परमीशन से संबंधित थे, सुरेंद्र गुप्ता से हस्ताक्षर करा लिए गए थे. कई बार इंसान जैसा सोचता है, वैसा होता नहीं. लोन मिलने की उम्मीद में समय और तारीखें बढ़ती चली गईं. सुरेंद्र बहुत खुश थे, लेकिन उन की खुशी को पहला झटका तब लगा, जब अजय के साथियों ने उन्हें नजरंदाज करना शुरू कर दिया.

आशंकित हो कर सुरेंद्र गुप्ता ने अपने स्तर से अजय पंडित के बारे में पता लगाना शुरू किया, लेकिन उस के रसूख में कहीं कोई शक नहीं हुआ. उन के एक परिचित ने यह जरूर कहा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हें ठग लिया गया हो? यह ख्याल मन में आते ही उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उन्होंने अजय के साथियों से भी बात की. वे काम के लिए तो हामी भरते रहे, लेकिन टरकाते भी रहे. अजय से मिलने की उन्होंने कई कोशिशें कीं, लेकिन वीआईपी सुरक्षा के चक्रव्यूह में उन का उस से मिलना नहीं हो सका. वह हर बार नाकाम रहे. किसी से बात भी होती तो नेताओं का रौब दिखा दिया जाता.

सुरेंद्र ने जो रकम दी थी, वह कोई छोटी रकम नहीं थी. धीरेधीरे जब विश्वास हो गया कि उन्हें ठग लिया गया है तो वह बेचैन हो उठे. अजय पंडित भले ही रसूख वाला था, लेकिन करोड़ों रुपए की ठगी का मामला था, इसलिए सुरेंद्र भी कैसे चुप बैठते. उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराने का फैसला कर लिया. इस के बाद वह करनाल के एसपी पंकज नैन से मिले और उन्हें आपबीती सुनाई. पुलिस ने उन्हें शीघ्र काररवाई का आश्वासन दिया.

शिकायत पर गहराई से विचार कर के पुलिस अधिकारियों ने आपस में विचारविमर्श किया. पुलिस ने अजय के बारे में जानकारियां जुटाईं तो पता चला कि उस के बड़ेबड़े नेताओं से संबंध हैं. वह काफी उच्चस्तर पर संबंध रखने वाला आदमी है. उस की पैठ न केवल हर बड़ी पार्टी में हैं, बल्कि पुलिस प्रशासन, नौकरशाहों और उद्योगपतियों से भी उस के अच्छे रिश्तों की बात सामने आ रही थी. निस्संदेह वह ऊंची पहुंच वाला आदमी था. ऐसे आदमी पर बिना पर्याप्त सबूत या एफआईआर के हाथ डालना संभव नहीं था. इस से पुलिस की काररवाई शुरू होने से पहले ही खत्म हो सकती थी. इसी छानबीन में पुलिस रिकौर्ड से पता चला कि सन 2013 में पानीपत शहर में अजय के खिलाफ नौकरी के नाम पर 20 लाख रुपए की ठगी का एक मामला दर्ज हुआ था.

यह मामला अदालत में चल रहा था. इस से पुलिस का यह शक पुख्ता हो गया कि अजय राजनीतिक संबंधों की आड़ में लोगों के साथ ठगी कर रहा है. इस के बाद थाना मधुबन में सुरेंद्र गुप्ता की तहरीर पर भादंवि की धारा 420 और 506 के तहत मामला दर्ज हो गया. इस के बाद अधिकारियों ने विचारविमर्श के बाद उस की गिरफ्तारी का फैसला कर लिया. प्रदेश पुलिस के मुखिया यशपाल सिंघल और आईजी हनीफ कुरैशी ने भी इस मामले में काररवाई के निर्देश दे दिए. इस के लिए एक स्पैशल इन्वैस्टीगेशन टीम भी बना दी गई. इस टीम में कई तेजतर्रार पुलिसकर्मियों को शामिल करते हुए इस की कमान डीएसपी जिंतेंद्र गहलावत को सौंप दी गई. अब पुलिस उसे घेरने की कोशिश में जुट गई.

16 जनवरी, 2016 को पुलिस ने चंडीगढ़अंबाला रोड पर अजय को पूछताछ के बहाने बुलाया गया तो उस ने अपनी पहुंच का हवाला दे कर पुलिस को रौब में लेने की कोशिश की. लेकिन पुलिस ने उस के प्रभाव में आए बिना उसे गिरफ्तार कर लिया. जबकि पुलिस ने इस गिरफ्तारी की तत्काल किसी को भनक नहीं लगने दी और अदालत में पेशी के बाद उसे 5 दिनों के रिमांड पर ले लिया. प्राथमिक पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे साथ ले कर छतरपुर स्थित फार्महाउस पर छापा मारा तो वहां से सुरेंद्र गुप्ता द्वारा दिए गए 2 करोड़ रुपए बरामद हो गए. हरियाणा पुलिस के लिए किसी मामले में अब तक बरामद की गई सब से बड़ी रकम थी. इसी के साथ अजय की गिरफ्तारी की खबर जंगल में आग की तरह फैल गई.

पुलिस तब चौंके बिना नहीं रह सकी, जब उस के सामने 2 और ऐसे शिकायतकर्ता आ गए, जो अजय पंडित की ठगी का शिकार हुए थे. उन में से करनाल के वीरेंद्र सिंह से गैस एजेंसी और पैट्रोल पंप दिलाने के नाम पर डेढ़ करोड़ रुपए ठगे गए थे, जबकि पुणे के आर.एस. यादव से केंद्र सरकार में नेशनल सिक्योरिटी कमीशन में मेंबर बनवाने के नाम पर 50 लाख रुपए की रकम ऐंठी गई थी. पुलिस ने इन दोनों मामलों में भी मुकदमा दर्ज कर लिया और अजय पंडित से विस्तृत पूछताछ की. इस बीच उसे 21 जनवरी को पुन: अदालत में पेश किया गया. इस बार भी उसे 9 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया.

अजय पंडित से पूछताछ और उस के कारनामों की चर्चाओं एवं जांचपड़ताल में जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इसलिए चौंकाने वाली थी, क्योंकि एक नौवीं फेल शख्स ने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं और शातिर दिमाग के बल पर इतनी ऊंची पहुंच बना ली थी, जिस की जल्दी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता. जानीमानी पार्टियों के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं से ले कर वरिष्ठ अधिकारियों से उस के सीधे और मजबूत संबंध थे. उस का रसूख और राजशाही ठाठ देख कर बड़ेबड़े लोग प्रभाव में आ जाते थे.

अजय शर्मा उर्फ सरजू को जानने वाले बताते हैं कि वह नौवीं फेल था. उस के पिता का कभी छोटा सा क्लिनिक हुआ करता था. वह सिरसा में गोदाम रोड पर रहते थे. उस की प्रारंभिक शिक्षा यहीं हुई थी. वह बचपन से ही महत्त्वाकांक्षी था. पढ़ाई में मन नहीं लगा, इस के बावजूद वह ऊंचे सपने देखने लगा. कुछ लोग अपने सपनों को पढ़ाई और काबलियत के बलबूते पूरा करते हैं, परंतु कुछ लोग शौर्टकट के जरिए. फर्क इतना होता है कि जो सपने काबलियत से पूरे होते हैं, वे स्थाई होते हैं, जबकि जिन्हें शौर्टकट के जरिए पूरा किया जाता है, उन की कोई बुनियाद नहीं होती, वे वक्ती होते हैं. यह फर्क कलांतर में आईने की तरह एकदम साफ दिखता है. इस बड़ी हकीकत से अंजान अजय का थकी सी जिंदगी में मन नहीं लगता था.

पढ़ा हुआ वह भले ही कम था, लेकिन दिमाग का तेज था. उस का व्यक्तित्व भी आकर्षक था. उस के आर्थिक हालात कतई अच्छे नहीं थे. उसे लगता था कि हवाई चप्पलों में टहलते हुए उस की उम्र यूं ही कट जाएगी. सन 1997 में ही यह बात उस की समझ में आ गई थी कि आज के जमाने में राजनीतिक ताकत से बड़ी कोई ताकत नहीं है. उस ने राजनीति से जुड़े लोगों से रिश्ते बनाने शुरू कर दिए, साथ ही गुजारे के लिए प्रौपर्टी का छोटामोटा काम करने लगा.

बातों से किसी को भी प्रभावित करने की कला उस में थी ही, उस की पैठ बढ़ी तो उस ने दिल्ली का रुख किया. इस के बाद उस ने कई सालों तक सिरसा की ओर पलट कर नहीं देखा. राजनीतिज्ञों की शागिर्दी के साथ उस ने लोगों के छोटेमोटे काम कराने शुरू किए तो उस के बदले वह पैसे लेने लगा. इसी के साथ प्रौपर्टी के काम में भी वह हाथ आजमाता रहा. कई शराब कारोबारियों से भी उस के रिश्ते बन गए थे. विवादित प्रौपर्टी पर उस की खास नजर होती थी, क्योंकि वहां नेताओं और नौकरशाहों की पौवर का इस्तेमाल कर के वह अपने रिश्तों को भुना लेता था.

हैसियत बढ़ी तो पंजाबी बाग जैसे पौश इलाके में किराए पर रहना शुरू कर दिया. इन्हीं कामों से उस ने इतनी दौलत कमाई कि 10 सालों में वह काफी दौलतमंद हो गया. इस बीच फिल्मों से प्रभावित हो कर उस ने अपना नाम अजय पंडित रख लिया. अजय का काम करने का तरीका एकदम अलग था. उस ने तमाम चेलेचपाटे बना लिए थे, जो पहले शिकार को टारगेट करते थे. इस के बाद उसे शान दिखा कर संपर्क बढ़ा कर उसे राजनीतिक घरानों से ले कर बड़े नौकरशाहों से मिलवा कर अपना विश्वास जमाते. और जब विश्वास जम जाता था तो उसे कोई ख्वाब दिखा कर चाल चलना शुरू कर देते थे.

इस मामले में अजय करिश्माई व्यक्तित्व का स्वामी था. लोग न सिर्फ उस पर भरोसा कर लेते थे, बल्कि उसे काम के बदले मोटी रकम भी दे देते थे. जिन के काम नहीं होते थे, उन के रुपए फंस जाते थे. अजय रसूख की बदौलत तरहतरह के हथकंडे अपना कर ऐसे लोगों को किनारे कर देता था. किसी को राजनीतिक पार्टी का टिकट दिलाने, किसी को नौकरी, किसी को पैट्रोल पंप व गैस एजेंसी का लाइसैंस दिलाने तो किसी को बडे़ काम के ठेके दिलाने का झांसा दे कर वह ठगी करता था. ऐसा भी नहीं था कि वह लोगों के काम बिलकुल नहीं कराता था. लेकिन जिन का काम नहीं होता था, उन के पैसे फंस जाना तय था.

दौलत और ताकत में इजाफा हुआ तो अजय ने छतरपुर में एक फार्महाउस किराए पर ले लिया. उस ने सिरसा के सैक्टर-20 में एक आलीशान कोठी बनवाई. कई लग्जरी गाडि़यां खरीद लीं. राजनीतिक लोगों और नौकरशाहों पर भी उस का दबदबा रहता था. सरकारी सुरक्षा के अलावा प्राइवेट सिक्योरिटी में पहलवान जैसे लड़कों को वह साथ रखता था. अजय खुद को राजशाही घराने का बताता था. उस ने तमाम नामीगिरामी लोगों से संपर्क बना लिए थे. उस के रहनसहन, राजसी ठाटबाट, सुरक्षा तामझाम, लग्जरी गाडि़यों और बड़े संपर्कों को देख कर कोई भी प्रभाव में आ जाता था. वह लोगों से बड़ेबड़े कामों को कराने के बदले मोटी रकम लेता था. राजनीतिक संबंधों को भुनाने का हुनर उसे खूब आता था.

उस ने सोनिया गांधी एसोसिएशन बना ली, जिस का वह खुद ही राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गया. इसी के साथ उस ने ब्राह्मणसभा भी बनाई और उस का भी खुद ही अध्यक्ष बन गया. वह सफेदपोश बन कर ऐशोआराम की जिंदगी जीता था. अजय के जिंदगी जीने का अंदाज एकदम अलग था. वह रौबरुतबे से रहता था. उस का हुक्म बजाने के लिए नौकरों और सुरक्षाकर्मियों की फौज तैयार रहती थी. राष्ट्रीय पहुंच के नेताओं से संबंध बनाए रखने की कला का वह बाजीगर था. लखपति लोगों के काम कराना वह अपनी तौहीन समझता था, इसलिए करोड़पति और अरबपति लोगों को ही अपना निशाना बनाता था. किसी का काम कराने के बदले वह करोड़ो रुपए एडवांस में ले लेता था. शातिर दिमाग अजय ने दिखावटी शान से ही बड़ोंबड़ों को झांसे में लिया था.

दौलत और रसूख हासिल करने के बाद अजय ने सन 2012 से सिरसा आना शुरू किया तो वह जब भी वहां आता, उसे देख कर लोगों की आंखें फटी रह जातीं. कारों और वीआईपी सिक्योरिटी ही नहीं, अजय हैलीकौप्टर से भी आता था. लोगों में जिज्ञासा बढ़ाने के लिए वह शहर के ऊपर हैलीकौप्टर का चक्कर लगवा कर एयरफोर्स स्टेशन पर उतरता था. तब लोगों को पता चल जाता था कि उन का अजय उर्फ सरजू आया है. वह दान भी दोनों हाथों से करता था. यह दान वह धार्मिक आयोजनों, पूजास्थलों से ले कर गरीबों तक में करता था. उस ने दान भी इतना किया था कि उस की पहचान बड़े दानवीरों में होने लगी थी. उस के रसूख और दान देने की दिलदारी को देख कर लोग उसे कार्यक्रमों मे बुलाने लगे थे.

विशेष अवसरों पर जब उस के आने पर गरीबों की लाइन लगती थी तो उस के कारिंदे हजार व 5 सौ के नोटों की गड्डियां खोल कर उसे देते और वह बिना गिने बांटता चला जाता था. गरीबों के प्रति उस की यह दरियादिली जितनी सुर्खियों में आती, वह उतना ही खुश होता और गर्व महसूस करता. उस ने किसी गरीब को कभी हजार या 5 सौ से कम का नोट नहीं दिया, क्योंकि उस से कम देना वह अपनी तौहीन समझता था. उसे ऐसा करते देख बड़ेबड़े रईस भी हैरान रह जाते थे.

अजय को जब भी सिरसा आना होता, उस के स्वागत में शहर में बड़ेबड़े होर्डिंग और बैनर कुछ इस अंदाज में लगाए जाते थे, जैसे किसी बड़ी राजनैतिक हस्ती का स्पैशल दौरा हो. जब सारी तैयारियां पूरी हो जातीं, उस के बाद ही भारी सुरक्षा तामझाम और काफिले के साथ अजय फिल्मी स्टाइल में एंट्री करता था. उस के आगेपीछे पुलिस और कमांडों दस्ते की जिप्सियां चलती थीं. उन के बीच वह महंगी लग्जरी कार में रहता था. लोग उसे देख सकें, इस के लिए कार का शीशा उतार दिया जाता था. जिप्सियों पर 2-2 पुलिसकर्मी गले में कारबाइन डाल कर खड़े हो कर चलते थे. शायद ऐसा इसलिए किया जाता था कि लोग देख सकें कि पुलिस किस मुस्तैदी से उसे वीआईपी सुरक्षा दे रही है. इस सब के पीछे उस की मंशा लोगों को अपना रसूख दिखाने की होती थी. वह हमेशा वीआईपी सिक्योरिटी रखता था.

उस की सुरक्षा में पंजाब, हरियाणा और दिल्ली पुलिस के जवान होते थे. जितनी सुरक्षा उस के पास होती थी, किसी कैबिनेट मंत्री के पास भी नहीं होती थी. सन 2016 के विधानसभा चुनावों के समय सिरसा में चर्चा हो रही थी कि कांगे्रस अजय को अपना उम्मीदवार बनाएगी तो पूर्व मंत्री गोपाल कांडा से उस का कांटेदार मुकाबला होगा. हालांकि ऐसा हुआ नहीं. अजय की रईसी का आलम यह था कि वह अपने नातेरिश्तेदारों को महंगी कारें तक गिफ्ट करता था. उस के पास जो लग्जरी गाडि़यां थीं, वे उस के नाम नहीं थीं. उस की बीएमडब्ल्यू, मर्सडीज, औडी व हुंडई कारें उस के साथियों और पीए के नाम पर थीं.

अजय की शान से प्रभावित हो कर बड़ेबड़े लोग अपने काम कराने के लिए उस के पास आते और उस के जाल में फंस जाते थे. उन्हीं में पुणे के एक बड़े शिक्षण संस्थान के संचालक आर.एस. यादव भी थे. वह अकसर अपने कामों से दिल्ली आते रहते थे. इसी आनेजाने में उन की मुलाकात अजय से हुई तो उस ने उन्हें ऐसा झांसा दिया कि वह भी उस के जाल में फंस गए. उस ने उन से कहा था कि सरकार एक सिक्योरिटी कमीशन बनाने जा रही है, अगर वह चाहें तो गृह मंत्रालय में सिफारिश कर के उन्हें वह उस में मेंबर बनवा सकता है. उन्हें तमाम सरकारी सुविधाओं के साथ लाल बत्ती लगी गाड़ी और सुरक्षा भी मिलेगी.

आर.एस. यादव इस के लिए सहज ही तैयार हो गए. अजय का रसूख चूंकि वह देख चुके थे, इसलिए शक जैसी कोई बात नहीं थी. उन्होंने 50 लाख रुपए अजय को आने वाले दिनों में दे भी दिए. ऐसा कोई कमीशन बनना ही नहीं था, इसलिए रुपए हाथ में आते ही अजय उन्हें टरकाने लगा. उन्हें लगा कि वह फंस गए हैं तो पैसे वापस मांगे. इस के बाद वह आए दिन रुपए वापसी के लिए चक्कर लगाने लगे तो एक दिन फार्महाउस पर अजय से उन की कहासुनी हो गई. आर.एस. यादव अड़ गए. उन्होंने कहा, ‘‘अजयजी बहुत हो गया, आप मेरा हिसाब कर दीजिए. उस के बाद हमारा आप का रिश्ता खत्म.’’

उन की बात पर अजय ने मुसकरा कर कहा, ‘‘ठीक है, तुम यही चाहते हो तो आज मैं मामला साफ किए देता हूं. आज के बाद तुम मुझ से कभी नहीं मिल सकोगे.’’

इस के बाद अजय ने सुरक्षाकर्मियों को इशारा किया तो उन्होंने उसे धकिया कर फार्महाउस के बाहर कर दिया. उस ने ताकीद भी कर दी थी कि यह आदमी आइंदा कभी कोठी में नहीं दिखना चाहिए. बाहर से ही इसे भगा देना. इस तरह आर.एस. यादव को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया तो वह चाह कर भी कभी उस से नहीं मिल सके. अजय की पहुंच को देखते हुए उन्होंने उस के खिलाफ जान के डर से पुलिस में शिकायत करने की भी हिम्मत नहीं की. कोशिश कर के हरियाणा में शिकायत भी की तो वह दब कर रह गई.

सन 2013 में अजय ने पानीपत के एक आदमी से सरकारी नौकरी लगवाने के नाम पर 20 लाख रुपए ठग लिए थे. ठगी का शिकार हुए आदमी ने चुप बैठने के बजाय उस के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया था. पानीपत में उस के खिलाफ 20 लाख रुपए की ठगी का मुकदमा तो दर्ज हुआ, लेकिन अपनी पहुंच के बल पर वह कानून के शिकंजे में फंसने से बचता रहा. मामला अदालत में पहुंचा. अजय को उम्मीद थी कि एक दिन यह सब रफादफा करा देगा. अजय की ठगी का सिलसिला यहीं नहीं थमा. उस ने करनाल के सेक्टर-1 निवासी वीरेंद्र सिंह से भी पैट्रोल पंप और गैस एजेंसी दिलाने के नाम पर डेढ़ करोड़ रुपए ठग लिए थे. वीरेंद्र को न एजेंसी मिली, न रुपए. अजय की पहुंच के आगे वह भी थक कर बैठ गए थे.

इस के बाद उस ने सुरेंद्र गुप्ता को ठगी का शिकार बनाया. उसे कहीं से पता चला था कि सुरेंद्र को लोन की जरूरत है. यह पता चलते ही उस ने अपने साथियों को उन के पीछे लगा दिया. गुप्ता उन के जाल में एक बार फंसे तो फिर फंसते ही चले गए. अजय के कारनामों का खुलासा हुआ तो हर कोई हैरान था. पुलिस हिरासत में भी वह अपने परिचित नेताओं के नाम ले कर पुलिस को डराता रहा. उस की गिरफ्तारी की सूचना मिलने के बाद गैस एजेंसी के नाम पर डेढ़ करोड़ गंवाने वाले वीरेंद्र सिंह और पुणे के आर.एस. यादव ने भी मुकदमा लिखाया था.

दरअसल, आर.एस. यादव कुछ ऐसे लोगों के बराबर संपर्क में थे, जो अजय को जानते थे. उन्हें गिरफ्तारी की खबर पा कर वह करनाल से आ पहुंचे थे. पुलिस ने कई राज्यों में उस की गिरफ्तारी की सूचना भेज दी है, ताकि अन्य मामले भी पकड़ में आ सकें. 27 जनवरी, 2015 को पुलिस ने अजय के एक साथी रिषी विश्नोई को भी गिरफ्तार किया है. उसी ने डेढ़ करोड़ की ठगी का शिकार हुए वीरेंद्र की मुलाकात अजय से कराई थी और ठगी के इस मामले में अहम भूमिका निभाई थी.

रिमांड अवधि खत्म होने पर पुलिस ने अजय को फिर से अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस उस के शेष कारनामों की जांच के साथ ही उस के बाकी साथियों की तलाश कर रही थी. पुलिस के पास अजय की ठगी का शिकार हुए लोग पहुंच रहे थे. True Crime Story

 

Hindi Crime Story: एक रसिया ठग की दास्तान – तुझे राम कहें या राहुल

Hindi Crime Story: राम नायडू उर्फ राहुल दीक्षित जैसे लोगों की समाज में कमी नहीं है, जो दूसरों की कमजोरी का फायदा उठाते हैं. मृणालिनी को हर तरह लूटने वाला राम उर्फ राहुल भले ही पकड़ा गया, लेकिन क्या उसे उतनी सजा मिल पाएगी, जितने घाव उस ने मृणालिनी और दूसरी लड़कियों को दिए हैं?

‘‘बे टी, कब तक मुझ बूढ़ी की तीमारदारी में अपनी जिंदगी खराब करती रहेगी. मेरी मान

तो कोई अच्छा सा लड़का देख कर शादी कर ले और अपना घर बसा ले, मेरा क्या है, आज हूं कल नहीं. मैं चैन से तभी मर पाऊंगी, जब तेरा बसा हुआ घर देख लूंगी.’’

प्रोफेसर मृणालिनी (बदला हुआ नाम) जब थकीहारी कालेज से घर लौटती थीं तो उन्हें रोज किसी न किसी रूप में मां के इसी तरह के शब्द सुनने को मिलते थे. धीरेधीरे स्थिति यह हो गई थी कि मां जिस दिन ऐसी कोई बात नहीं कहती थीं, मृणालिनी को उन की तबीयत खराब होने का अंदेशा होने लगता था. 37 वर्षीया मृणालिनी इंदौर के एक नामी कालेज में प्रोफेसर थीं और एरोड्रम इलाके में रहती थीं.

पिता की मौत के बाद मृणालिनी ने मां की सेवा करने की ठान ली थी. ठान ही नहीं ली थी, बल्कि ऐसा कर भी रही थीं. घर में कोई और नहीं था, जो मां की देखभाल कर पाता. ऐसे में मृणालिनी को यह ठीक नहीं लगा कि वह मां को उन के हाल पर अकेला छोड़ कर शादी कर लें और ससुराल चली जाएं. इसलिए वह शादी, प्यार, रोमांस और घरगृहस्थी जैसे लफ्जों को भूल कर बेटे की भूमिका में आ गईं थीं. उन्होंने मां की सेवा और देखभाल को ही अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया था.

लेकिन बूढ़ी मां की अपनी अलग परेशानी थी, वह नहीं चाहती थीं कि उन की वजह से अच्छीखासी पढ़ीलिखी और सुंदर बिटिया अविवाहित रह जाए. इसलिए वे तरहतरह से उस पर शादी के लिए दबाव बनाती रहती थीं. मृणालिनी जैसी मिसाल कायम करने वाली दृढ़विश्वासी बेटियों की समाज में कमी नहीं है, जो अपने सुख से ज्यादा मांबाप की सेवा को प्राथमिकता देती हैं, भले ही उन्हें तन्हा जिंदगी क्यों न गुजारनी पड़े. पिछले कुछ दिनों से जैसेजैसे मां की जिद बढ़ती जा रही थी, उसे देख कर मृणालिनी भी सोचने को मजबूर हो गई थीं.

कभी मृणालिनी शादी के बारे में सोचतीं तो वह भी अन्य युवतियों की तरह अल्हड़ युवती में तब्दील हो जातीं. एक ऐसी युवती जो अपने लिए सुहाने सपने देखती है, पति के साथ घूमतीफिरती है, होटलों और मौल में जाती है. दूरदराज के पर्यटनस्थल पर अपने जीवनसाथी के हाथ में हाथ डाले रूमानी बातें करती हैं. मृणालिनी चूंकि परिपक्व और जिम्मेदार थीं, इसलिए जल्द ही ऐसे ख्वाबोंखयालों को झटक देती थीं और मां के पास बैठ कर बतियाने लगती थीं. ज्यादा बोरियत होने पर वह सहेलियों से फोन पर बातें कर लेती थीं या फिर टीवी पर अपने पसंदीदा सीरियल देखने बैठ जाती थीं. उन से भी जी भर जाता था तो वह पत्रपत्रिकाओं के पन्ने पलटने लगती थीं.

मृणालिनी की सोच में आ रहा यह बदलाव आखिरकार उन के इरादों पर भारी पड़ा. हालांकि उन की सोच यह थी कि कोई कमाऊ जीवनसाथी मिल जाए तो मां की सेवा और देखभाल की जिम्मेदारी भी पूरी होती रहेगी और गृहस्थी भी बस जाएगी. भले ही वह साथ क्यों न रहें. लेकिन यह महज सोचने भर की बात थी, क्योंकि अभी तक कोई ऐसा प्रस्ताव नहीं आया था. खुद मृणालिनी ने भी अपनी तरफ से इस तरह की कोई पहल नहीं की थी.

जब अरमानों और जज्बातों की लड़ाई में अरमान भारी पड़ने लगे तो बीते साल जून के महीने में मृणालिनी ने यह सोचते हुए एक अखबार में अपनी शादी का विज्ञापन दे दिया कि ढंग का कोई जीवनसाथी मिला तो ठीक, नहीं मिला तो कोई बात नहीं. विज्ञापन देते वक्त एक तरह से उन्होंने उम्मीद के साथ नाउम्मीदी के लिए भी खुद को तैयार कर लिया था. विज्ञापन का वाजिब असर हुआ. उस के छपते ही मृणालिनी के मोबाइल पर धड़ाधड़ प्रस्ताव आने लगे. लेकिन हर आने वाले फोन के साथ उन का उत्साह ठंडा पड़ने लगा. वजह यह थी कि आने वाले अधिकांश प्रस्ताव उन की चाहत के अनुरूप नहीं थे. कोई तलाकशुदा था तो कोई विधुर, उन में से भी अधिकतर बच्चों वाले थे.

कुछ प्रस्तावों पर तो उन्होंने साफ महसूस किया कि प्रस्ताव भेजने वाले की नजर उन के अच्छेभले वेतन, पद और घर पर थी. कुछ ऐसे फोन भी आए, जिन में उम्मीदवार करताधरता कुछ नहीं था, बस पुरुष भर होना ही उस की योग्यता थी. सलीके के अगर कुछ प्रस्ताव आए भी तो उन्होंने यह जान कर आगे दिलचस्पी नहीं ली कि मृणालिनी के घर उन के अलावा सिर्फ एक बूढ़ी मां हैं. इस सब से मृणालिनी की समझ में आ गया था कि इस उम्र और हालात में अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करना आसान नहीं है. लिहाजा उन्होंने उम्मीद का दामन छोड़ने की सोच ली. तभी जबलपुर से एक फोन आया. फोन करने वाला राहुल दीक्षित नाम का व्यक्ति था, जिस ने अपना परिचय पूरे आत्मविश्वास और आत्मीयता से दिया था.

राहुल ने खुद को जबलपुर के एक बड़े कारोबारी का एकलौता बेटा बताते हुए मृणालिनी से कहा था कि चूंकि उसे अब तक कोई मनपसंद लड़की नहीं मिली, इसलिए शादी नहीं की. दोनों के बीच इधरउधर की कुछ और भी औपचारिक बातें हुईं. फोन पर मृणालिनी की मां ने भी राहुल से बात की. अब तक आए तमाम प्रस्तावों में से यही एक बेहतर प्रस्ताव था. लिहाजा मांबेटी ने रायमशविरा कर के राहुल को इंदौर आने का न्यौता दे दिया, ताकि आमनेसामने साफसाफ बात हो सकें और वे लड़के को देख भी लें. इस आमंत्रण पर राहुल ने हां करते हुए कहा कि वह जल्द ही इंदौर आएगा.

चंद दिनों के बाद राहुल मृणालिनी के इंदौर स्थित घर जा पहुंचा. जिंदगी में कई बार ऐसा होता है कि आप पहली बार किसी से मिलते हैं तो यही लगता है कि जिस की तलाश थी, वही यह है. ऐसा ही कुछ मृणालिनी और उन की मां के साथ भी हुआ. राहुल से चंद घंटों की बातचीत के बाद दोनों इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने रिश्ते के लिए हां कर दी. पूरी बातचीत में राहुल ने कोई शर्त नहीं रखी थी. न ही मृणालिनी की नौकरी और वेतन पर चर्चा के अलावा लेनदेन की कोई बात की थी. अलबत्ता पढ़ेलिखे आदमी की तरह उस ने सारी जानकारी जरूर ले ली थी. यह कोई काबिलेऐतराज बात नहीं थी, क्योंकि रिश्ते के मामले में ये बातें बेहद आम और जरूरी होती हैं. मां बेटी को राहुल औरों से हट कर लगा.

पहली ही मुलाकात में बात औपचारिक से अनौपचारिक हो गई थी. जातेजाते राहुल इशारा कर गया कि उस की तरफ से तो कोई दिक्कत नहीं है. अब आगे की बात घर वाले करेंगे. इस के बाद जो हुआ, वह आजकल के हिसाब से बहुत सामान्य है. मृणालिनी और राहुल फोन पर लंबीलंबी बातें करने लगे. इन बातों में भविष्य के सपने भी होते थे. मृणालिनी की मां तो राहुल जैसा नेक और शरीफ लड़का पाने की कल्पना से ही खुश थीं. मांबेटी दोनों साथ बैठ कर बातें करती थीं तो यह खुशी दोगुनी हो जाती थी.

मृणालिनी राहुल को चाहने लगी थीं. वह इंतजार कर रही थीं कि उस के कहे मुताबिक उस के घर वाले बात आगे बढ़ाएं. इस बीच उस में काफी बदलाव आया था. वह खुश रहने लगी थीं और फिर से सपने देखने लगी थीं. अधेड़ उम्र की बेटी को मुद्दत बाद यूं खुश देख मां भी फूली नहीं समाती थीं. उन्हें खुशी इस बात की थी कि जीतेजी बेटी का घर बसते देख लेंगी. कुछ दिनों बाद एक दिन अचानक राहुल परेशान और बदहवास सा मृणालिनी के घर आ पहुंचा तो मांबेटी दोनों उस की हालत देख न केवल चौंकीं, बल्कि खुद भी परेशान हो उठीं. बारबार पूछने और कुरेदने पर राहुल ने बड़ी मासूमियत से बताया कि उस के घर वाले इस शादी पर राजी नहीं हैं, इसलिए वह हमेशा के लिए घर छोड़ कर आ गया है.

साथ ही उस ने यह भी बताया कि वह बिजनैस के लिए घर से 20 लाख रुपए ले कर चला था, लेकिन इटारसी जंक्शन पर उस के पैसे और सामान चोरी हो गया. उस ने अपनी बात कुछ इस ढंग से कही थी कि मृणालिनी और उन की मां चाह कर भी उस पर अविश्वास नहीं कर पाईं. राहुल खाली हाथ था, इसलिए उसे घर में रहने की अघोषित अनुमति मिल गई. बातों ही बातों में राहुल ने अपनी आगे की प्लानिंग भी बता दी कि अब वह इंदौर में ही रह कर कोई कारोबार करेगा और काम जमते ही मृणालिनी से शादी कर लेगा. मां तो घरजवांई चाहती ही थीं, लिहाजा उन्होंने तुरंत हां कर दी. दिल के हाथों मजबूर मृणालिनी भी इनकार नहीं कर पाईं. अगले 2 दिनों में ही राहुल ने मृणालिनी को बताया कि वह उस के लिए पिता की करोड़ों की जायदाद छोड़ आया है.

राहुल की लच्छेदार बातों का जादू और उस से भी ज्यादा उस की जरूरत, मांबेटी दोनों के सिर चढ़ कर बोल रही थी, इसलिए दोनों ने आंख मूंद कर उस की बातों पर विश्वास कर लिया. राहुल घर में घुसा तो वहीं का हो कर रह गया. हफ्ते भर में ही फैसला ले लिया गया कि राहुल को बिजनैस शुरू करने के लिए पैसा मांबेटी देंगी. जब राहुल भी दुकान के लिए भागदौड़ करने लगा तो शक की कोई गुंजाइश नहीं रही. जल्द ही उस ने मृणालिनी को बताया कि न्यू पलासिया इलाके में एक दुकान की बात हो गई है, जिस में वह आटोमोबाइल पार्ट्स का बिजनैस शुरू करेगा.

दुकान का किरायाभाड़ा और पार्ट्स खरीदने के लिए राहुल ने करीब 15 लाख रुपए की जरूरत बताई. अपना सबकुछ राहुल को सौंप चुकी मृणालिनी ने अपनी अब तक की बचत के 5 लाख रुपए और उज्जैन में पड़े एक प्लौट को बेच कर मिले 10 लाख रुपए यानी 15 लाख रुपए राहुल को दे दिए. जून की भीषण गर्मी खत्म हो चुकी थी. ढलती जुलाई की वह उमस भरी 26 तारीख थी, जब सुबहसुबह राहुल ने घर आ कर बताया कि माल आ गया है. मैं सामान का पेमेंट कर के और दुकान पर सामान लगवा कर कुछ घंटों में आता हूं. तैयारी पहले से हो रही थी, इसलिए मां बेटी ने पैसा देने में कोई ऐतराज नहीं किया. राहुल पैसा ले कर गया तो फिर वापस लौट कर नहीं आया.

रविवार 26 जुलाई, 2015 की देर रात तक मृणालिनी और उन की मां राहुल का इंतजार करती रहीं, पर वह घर नहीं लौटा तो वे चिंता में पड़ गईं. मृणालिनी ने राहुल को फोन किया तो उस का मोबाइल स्विच्ड औफ मिला, इस से मांबेटी और घबरा उठीं. मन में दबा शक यकीन में बदलने लगा था कि कहीं भोलाभाला, मायूस सा दिखने वाला और मीठीमीठी बातें करने वाला राहुल कोई ठग तो नहीं था, जो उन्हीं के घर में रह कर बड़े इत्मीनान से 15 लाख का चूना लगा गया. जैसेजैसे दोनों इस शक को दबाने की कोशिश करतीं, वैसेवैसे वह उन्हें और ज्यादा डराने लगता.

सदमे की सी हालत में आ चुकीं मृणालिनी बारबार इस उम्मीद के साथ राहुल का नंबर डायल कर रही थीं कि शायद इस बार घंटी जाए और काल रिसीव कर के एक महीने के ही सही राहुल जानेपहचाने अंदाज में कहे कि सौरी मोबाइल खराब हो गया था या उस की बैटरी डिस्चार्ज हो गई थी, इसलिए काल पिक नहीं कर पाया. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. मांबेटी ने सारी रात बुरे खयालों के साथ करवटें बदलते काटी. उन्हें जरा बहुत उम्मीद थी कि शायद सुबह को राहुल वापस आ जाए, लेकिन उसे नहीं आना था, सो नहीं आया. नतीजतन जल्द ही उन के सामने यह सच आ गया कि राहुल वाकई एक नंबर का ठग था और उस की बताई सारी बातें झूठी थीं. 15 लाख का तो दुख अपनी जगह था ही, लेकिन उस से भी बड़ा दुख यह था कि राहुल मृणालिनी को कहीं का नहीं छोड़ गया था.

कुछ दिन मृणालिनी और उन की मां ने राहुल के वापस आने की झूठी उम्मीद में काटे. लेकिन धोखा खाई मृणालिनी का दिल जानता था कि उस पर क्या गुजर रही है. मां की भी हालत ठीक नहीं थी. उन्होंने जिस आदमी पर बेटे जैसा भरोसा किया, वही सब कुछ लूट कर भाग गया था. महिलाओं का अकेलापन कभीकभी कैसे अभिशाप बन जाता है, यह मांबेटी की हालत देख कर समझा जा सकता था.

लेकिन मृणालिनी खामोश नहीं बैठी. कुछ ही दिनों में उन्होंने खुद को संभाल लिया और एक दिन ‘वी केयर फार यू’ के दफ्तर जा पहुंची, जो इंदौर में पीडि़त महिलाओं की मदद के लिए जाना जाता है. ‘वी केयर फार यू’ की इंचार्ज इंस्पेक्टर सीमा मलिक ने मृणालिनी की दास्तान सुनी और लिखित दरख्वास्त ले ली. परेशानी यह थी कि मृणालिनी के पास राहुल की कोई पुख्ता पहचान नहीं थी. ईमेल किया हुआ केवल एक फोटो भर था, जिस के सहारे राहुल को ढूंढ़ पाना भूसे के ढेर में सुई ढूंढ़ने जैसी बात थी. दूसरा जरिया राहुल का मोबाइल नंबर था, जो लगातार बंद जा रहा था.

लंबे वक्त तक जब वी केयर फार यू मृणालिनी के लिए कुछ नहीं कर पाया तो वह अक्तूबर के शुरू में इंदौर के आईजी संतोष कुमार सिंह से मिलीं और सारी बात उन्हें बताईं. संतोष कुमार सिंह ने इस मामले को पूरी गंभीरता से लेते हुए थाना क्राइम ब्रांच के प्रभारी कैलाशचंद पाटीदार को सौंप दिया. कैलाशचंद पाटीदार ने अपनी टीम बना कर ठग राहुल की खोजबीन शुरू कर दी. राहुल तक पहुंचने का एकमात्र जरिया उस का मोबाइल नंबर था, जो 26 जुलाई से ही बंद था.

पुलिस टीम ने जब उस के नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो हैरान रह गई, क्योंकि उस में जितने भी नंबर थे, वे सभी ऐसी महिलाओं के थे, जो अधेड़ थीं. इन में से कुछ से बातचीत करने पर राहुल का असली चेहरा सामने आ गया. वह एक पेशेवर और शातिर ठग था, जो अखबारों के वैवाहिक विज्ञापन देख कर उम्रदराज और हालात की मारी महिलाओं से संपर्क कर के शादी की पेशकश करता था और जहां बात जम जाती थी, वहां इसी तरह शादी कर लेता था.

लेकिन शादी कर के वह किसी के साथ जन्म भर नहीं, बल्कि 7 दिनों या 7 सप्ताह तक ही रहता था. इसी बीच वह अपनी बीवियों का मालमत्ता लपेट कर रफूचक्कर हो जाता था. मृणालिनी के मामले में भी उस ने ऐसा ही किया था. ज्यादा हैरान कर देने वाली दूसरी बात यह थी कि वह हर एक लड़की को अलग मोबाइल नंबर देता था, पर फोटो सभी को एक ही भेजता था. हां, अपना नाम जरूर सब को अलगअलग बताता था. पुलिस टीम के सामने नई परेशानी यह थी कि ठगी की शिकार लड़कियां पूरा सच बताने में हिचकिचा रहीं थीं. वजह थी लोकलाज और बदनामी का डर. अधिकांश ने यह भी कहा था कि राहुल ने उन्हें ठगा भर है. उन से शारीरिक संबंध नहीं बनाए थे. जैसे ऐसा कहने भर से उन्हें कोई चरित्र प्रमाण पत्र प्राप्त हो रहा हो.

जाहिर है, यह खुद को खुद के पाकसाफ होने का दिलासा देने वाली बात थी. बहरहाल, पुलिस के सामने राहुल की असल पहचान का संकट अभी भी मुंह बाए खड़ा था. कोई भी पीडि़ता पुख्ता तौर पर उस के बारे में जानकारी नहीं दे पा रही थी. आखिरकार काल डिटेल्स खंगालते- खंगालते जांच टीम की नजर एक मिसकाल पर पड़ी. इसे छोड़ कर राहुल ने दूसरे सभी नंबरों पर बात की थी. करने को कुछ और था नहीं, लिहाजा पुलिस वालों ने इसी मिसकाल को टारगेट किया. वजह उस के दूसरे तमाम नंबर फर्जी तरीके से हासिल किए गए निकल रहे थे. हर एक को ठगने या शादी करने के बाद वह इस्तेमाल किया नंबर हमेशा के लिए बंद कर देता था.

जब इस मिसकाल वाले नंबर की जांच की गई तो वह विदिशा का निकला. इस की जानकारी ले कर क्राइम ब्रांच ने विदिशा जा कर दबिश दी तो यह नंबर किसी राम नायडू का निकला, जो विदिशा की कृष्णा कालोनी में रहता था. काफी मशक्कत के बाद इस राम नायडू नाम के शख्स को पुलिस टीम ने इंदौर के ही नौलखा इलाके से गिरफ्तार करने में कामयाबी हासिल कर ली. राहुल दीक्षित और राम नायडू का क्या संबंध है यह पहेली सुलझाने में पुलिस को ज्यादा देर नहीं लगी. पता चला कि राम नायडू ही राहुल दीक्षित था, जिस के कई और भी नाम थे.

पूछताछ में पता चला कि राम नायडू के पिता पी. वेंकटेश्वर आंध्र प्रदेश के रहने वाले थे. पहले वह नागपुर में सेना में नौकरी करते थे. रिटायरमेंट के बाद वह बीएसएनएल में टैक्नीशियन के पद पर काम करने लगे थे. उन्होंने विदिशा में ही मकान बना लिया था. जब पुलिस ने राम नायडू उर्फ राहुल दीक्षित की जन्मकुंडली टटोली तो कई चौंका देने वाली बातें सामने आईं. राम नायडू विदिशा में ही पैदा हुआ था, लेकिन उस के पिता ने पढ़ाई के लिए उसे भोपाल में रहने वाले उस के मामा ईश्वर प्रसाद के पास भेज दिया था. भोपाल में उस का दाखिला एक प्राइवेट स्कूल में करा दिया गया था. पढ़ाई में राम नायडू ठीकठाक था.

स्कूली पढ़ाई के बाद उस ने एम.पी. नगर प्रैस कौंप्लेक्स के पास नवीन कालेज में दाखिला ले लिया था. जब वह बीए के दूसरे साल में था तो उसे रंगमंच का शौक लग गया. अपनी चाहत पूरी करने के लिए वह देशभर में मशहूर भोपाल के कला केंद्र रवींद्र भवन से जुड़ गया. यहां उस की मुलाकात मशहूर कलाकार आलोक चटर्जी से हुई. बड़े और प्रसिद्ध कलाकारों का सान्निध्य और प्रोत्साहन मिला तो उस का ध्यान पढ़ाई से उचट गया. वह मुंबई जा कर फिल्म इंडस्ट्री में जमने के सपने देखने लगा. राम नायडू चूंकि महत्त्वाकांक्षी था, इसलिए वह पढ़ाई अधूरी छोड़ कर मुंबई चला गया.

मुंबई में शायद वह कामयाब हो भी जाता, लेकिन जिन दिनों वह रवींद्र भवन में काम करता था, उन्हीं दिनों उस की मुलाकात इसी इलाके के 2 बदमाशों उजेब और अजीज उल्ला से हुई थी. ये दोनों नशा करने और कराने के लिए रवींद्र भवन के पास ही मंडराते रहते थे. इन दोनों की संगत में पड़ कर राम नशा करने लगा था. लेकिन इस के एवज में उसे अपना शोषण कराना पड़ता था. अजीज और उजेब ने उस का पीछा मुंबई तक किया तो वह परेशान हो उठा. उस में इन बदमाशों से टकराने की हिम्मत नहीं थी.

मुंबई से पहले वह भोपाल आया और फिर भोपाल से विदिशा आ गया. लेकिन इन दोनों बदमाशों से उसे छुटकारा नहीं मिला. ये दोनों विदिशा जा कर उस का शोषण करने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे. राम नायडू जब बहुत परेशान हो गया तो उस ने अपने भोपाल वाले मामा के साथ मिल कर विदिशा में अजीज उल्ला की हत्या कर दी. यह सन 2003 की बात है. उस का यह जुर्म छुपा नहीं रह सका. पुलिस ने राम नायडू और उस के मामा को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. सन 2006 में हत्या का आरोप साबित होने पर अदालत ने उसे और उस के मामा को आजीवन उम्रकैद की सजा सुनाई.

सन 2011 तक राम नायडू जेल में रहा. इसी बीच ग्वालियर हाईकोर्ट में दायर राम नायडू और उस के मामा की जमानत याचिका मंजूर हो गई. मामाभांजा दोनों जमानत पर जेल से बाहर आ गए. राम नायडू बाहर तो आ गया, पर उस के सामने हजार तरह की दुश्वारियां मुंह बाए खड़ी थीं. उस के ऊपर कातिल का ठप्पा लगा था. ऐसे में उसे नौकरी मिलना मुश्किल था. जबकि कोई कामधंधा वह जानता नहीं था, जिस से अपना गुजरबसर कर लेता. जब आदमी को कोई राह नहीं मिलती तो वह अपने लिए टेढ़ी राह चुन लेता है. यही राम नायडू के साथ हुआ. कामधंधा न होने के बावजूद वह हैरतअंगेज तरीके से अमीर होता गया. उस का रहनसहन ठाठबाट देख कर उसे जानने वाले चकित थे कि जेल से छूटे मुजरिम के पास इतना पैसा कहां से आ रहा है.

पूछने पर वह लोगों को बताता था कि वह प्रौपर्टी डीलिंग का धंधा कर रहा है, जिस से दलाली में अच्छाखासा पैसा मिल जाता है. इसी दौरान भोपाल के कोलार इलाके में उस ने नगद पैसे दे कर एक महंगा फ्लैट खरीद लिया. उन दिनों राम नायडू की रईसी और अय्याशी शबाब पर थी. हकीकत यह थी कि जेल से जमानत पर छूटने के बाद उस ने नया धंधा चुन लिया था. यह धंधा था उम्रदराज लड़कियों से शादी कर के उन से पैसे झटकने का. मध्य प्रदेश की जिन जगहों में उस ने ठगी की, उन में सागर, ग्वालियर, बीना, छिंदवाड़ा, खंडवा, खरगोन और सीहोर सहित दर्जन भर शहरों की लड़कियां शामिल थीं. राम के निशाने पर वे लड़कियां रहती थीं, जो 40 की उम्र के लगभग थीं और उन के घर में कोई पुरुष सदस्य नहीं होता था.

धंधा चल निकला तो वह बीवियों के पैसे से अय्याशी करने लगा. जिस को वह ठगता था, वे रिपोर्ट दर्ज नहीं कराती थीं, क्योंकि इस से सिवाय बदनामी के कुछ हासिल नहीं हो सकता था. इस प्लेबौय की कितनी पत्नियां हैं, इस की गिनती कथा लिखे जाने तक जारी थी. लेकिन हैरानी की बात यह है कि तमाम शहरों की लड़कियां यह तो स्वीकार रही हैं कि इस रंगीनमिजाज नटवरलाल ने उन्हें ठगा, पर रिपोर्ट अभी भी दर्ज नहीं करा रहीं.

सिर्फ एक पीडि़ता विजया उस के खिलाफ खुल कर सामने आई, जो जबलपुर मैडिकल कालेज में नर्स है. हैरानी की बात यह है कि उस ने विजया से शादी मृणालिनी को चूना लगाने के बाद बीते 12 नवंबर को भोपाल के आर्यसमाज मंदिर में की थी. शादी के 2-4 दिनों बाद उस ने विजया को समझाबुझा कर या कहें बेवकूफ बना कर इस बात पर राजी कर लिया था कि वह जबलपुर जा कर नौकरी करे. फिर कहीं सेटल होने के बारे में सोचेंगे.

मृणालिनी से ठगे पैसों से उस ने भोपाल के ही नेहरूनगर इलाके में एक और फ्लैट खरीदा था और साथ ही एक पुरानी कार भी खरीद ली थी. इस के बाद भी उस के पास पैसे बच गए थे, जिन से रंगीनमिजाज ठग राम नायडू सीधा बैंकाक जा पहुंचा, जहां वह एक होटल में ठहरा. इस के लिए उस ने जेल से छूटते ही मामा के घर के पते पर पासपोर्ट बनवा लिया था. बैंकाक में उस ने एक कालगर्ल बुक कर रखी थी. यानी शादी की मृणालिनी और विजया सरीखी दर्जनों लड़कियों से और हनीमून मनाने गया विदेश कालगर्ल के साथ.

पूरी तरह फंसने और पुराने पाप उजागर होने के बाद भी राम नायडू ने पूरी बेशर्मी से स्वीकारा कि वह अखबार में वैवाहिक विज्ञापन देख कर शादी का प्रस्ताव भेजता था, शिकार फांसता था, शादी करता था और पत्नियों से शारीरिक संबंध भी बनाता था. भले ही वे इस से मुकरती रहें. उस ने एक अजीब बात और भी मानी कि उस ने भले ही कई शादियां कीं, पर विजया आज भी उस का सच्चा प्यार है. उस से उस की मुलाकात जबलपुर में उस वक्त हुई थी, जब उस का एक दोस्त वहां इलाज के लिए भर्ती था.

कई पत्नियों वाले इस राम का लंबा नपना तय है, क्योंकि उस के खिलाफ पुलिस तमाम पुख्ता सबूत हासिल कर चुकी है. दाद देनी होगी मृणालिनी की हिम्मत की, जिस ने लोकलाज की परवाह न कर के पहल की. नहीं तो यह अय्याश ठग न जाने और कितनी लड़कियों की जिंदगी से खिलवाड़ कर के उन के पैसे लूटता रहता.

देश भर में उम्रदराज लड़कियां तख्तियां हाथ में लटका कर नारे लगा रही हैं कि अकेले हैं पर कमजोर नहीं. उन्हें एक दफा राम नायडू की अय्याशी से सबक लेना चाहिए, वजह उस ने जाने कितनी अधेड़ अविवाहित महिलाओं की इज्जत और जज्बातों से खिलवाड़ कर के उन का पैसा लूटा है. इस मामले से यह भी साबित होता है कि अकेली रह रही उम्रदराज लड़की भावनात्मक रूप से कमजोर होती ही है, जिस का फायदा राम नायडू जैसे ठग आसानी से उठा लेते हैं. Hindi Crime Story

—कथा में लड़कियों के

UP Crime: काली कमाई का कुबेर – यादव सिंह

UP Crime: भ्रष्टाचार की गटरगंगा में मछलियां भी पलती हैं और मगरमच्छ भी. सैकड़ों करोड़ कमाने वाला नोएडा अथौरिटी का चीफ इंजीनियर यादव सिंह॒ऐसा मगरमच्छ था, जिस ने छोटी मछलियों को पनपने भी दिया तो अपने स्वार्थों की खातिर. उस के खिलाफ बारबार जांच हुई लेकिन नतीजा कोई नहीं निकला. आखिर सीबीआई ने इस मगरमच्छ को धर ही दबोचा. दे श की राजधानी दिल्ली के बिलकुल पास स्थित उद्योगों व कौरपोरेट जगत में विश्वस्तरीय पहचान बना चुके नोएडा में छोटेबड़े रईसों की कोई कमी नहीं है.

यहां के विभिन्न सैक्टरों में यूं तो एक से बढ़ कर एक कोठिया बनी हैं, लेकिन सैक्टर-51 स्थित एक बंगलेनुमा कोठी नंबर ए-10 पिछले कुछ समय से खासी चर्चाओं में थी. यह कोठी खास महज इसलिए नहीं थी कि उस की 3 मंजिला बनावट जुदा थी, बल्कि इसलिए कि वह उत्तर प्रदेश सरकार के एक ऐसे अफसर की कोठी थी, जिसे सारा देश उस के कारनामों के लिए जान गया था. आसपास रहने वाले लोग तो चर्चा करते ही थे, उधर से गुजरने वाले लोग भी इस कोठी को अलग नजरिए से देखते थे. पहले वहां पर लालनीली बत्ती वाली गाडि़यों का खूब आवागमन रहता था. इस के बावजूद कम लोग ही कोठी के अंदर जा पाते थे. तगड़ी कदकाठी वाला कोठी का मालिक पूरे रुआब से रहता था. वह आसपास के लोगों से बात तक नहीं करता था.

लेकिन पिछले चंद महीनों में इस कोठी की रौनक जाती रही. लग्जरी गाडि़यां तो दूर गिनेचुने लोग ही वहां आतेजाते थे. लोगों का ध्यान भी इस कोठी की तरफ से हटना शुरू हो गया था, लेकिन 3 फरवरी, 2016 को न सिर्फ कोठी, बल्कि उस का मालिक भी एक बार फिर चर्चाओं में आ गया. इस की वजह यह थी कि कोठी के मालिक को देश की सब से बड़ी जांच एजेंसी सेंट्रल ब्यूरो औफ इन्वैस्टीगेशन (सीबीआई) ने गिरफ्तार कर लिया था.

गिरफ्तार किए गए शख्स का नाम था यादव सिंह. नोएडा/ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रैसवे अथौरिटी का सस्पैंड चीफ इंजीनियर. वह सरकारी तंत्र का इतना बड़ा भ्रष्ट अफसर था कि उस के कारनामों ने बड़ेबड़े घपलों को भी मात दे दी थी. उस का रसूख और हैसियत ऐसी थी कि आला दर्जे के अधिकारी भी उस से एक मिनट की मुलाकात के लिए तरसते थे. क्या नेता, क्या अधिकारी सब उस के आगेपीछे घूमते थे. यूं तो वह आरोपों और जांच के दायरे में कई बार घिरा, लेकिन उस की पकड़ इतनी मजबूत थी कि कभी उस का बाल भी बांका नहीं हो सका. वह जिसे चाहता था, अपनी अंगुलियों पर नचा देता था. लेकिन वक्त ने उस के रसूख को भी लील लिया.

सीबीआई की एंटीकरैप्शन व एसटीएफ विंग ने यादव सिंह को पूछताछ के लिए अपने लोधी रोड, दिल्ली स्थित हैड क्वार्टर बुलवाया, जहां पूछताछ के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया. पहले से ही सुर्खियों में रहे यादव सिंह के खिलाफ यह बहुत बड़ी काररवाई थी. अगले दिन सीबीआई टीम यादव को ले कर गाजियाबाद स्थित सीबीआई कोर्ट पहुंची तो वहां पहले से मीडियाकर्मियों की भारी भीड़ थी. यादव सिंह का सीबीआई की गिरफ्त में होना ही बड़ी खबर थी.

यादव सिंह सीबीआई की सफेद रंग की टवेरा कार से नीचे उतरा तो लोग उसे सही ढंग से देख पाए. वह काली पैंट, व्हाइट जैकेट और नीली कैप लगाए हुए था. वक्त की चाल का शिकार हुए यादव सिंह की हालत हारे हुए जुआरी जैसी थी. गहमागहमी के बीच सीबीआई ने उसे विशेष जज जे. श्रीदेवी की अदालत में पेश कर के पूछताछ के लिए 10 दिनों का रिमांड मांगा. प्राथमिक चार्जशीट के अध्ययन और कुछ देर चली सुनवाई के बाद अदालत ने उसे 6 दिनों के रिमांड पर सीबीआई को सौंप दिया. रिमांड स्वीकृत होते ही टीम उसे ले कर दिल्ली के लिए रवाना हो गई.

काली कमाई से हजारों करोड़ का साम्राज्य खड़ा करने वाला यादव सिंह सीबीआई के शिकंजे में कैसे आया? एक मामूली इंजीनियर अरबपति कैसे बन गया? इस के पीछे भी एक कहानी थी. यादव सिंह मूलत: आगरा का रहने वाला था. मत्त्वकांक्षी यादव सिंह की परवरिश गरीबी में हुई थी. उस का ख्वाब था कि वह बड़ा आदमी बने. इतना बड़ा कि गरीबी उस के आसपास भी न मंडरा सके. उस ने इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया. इस के बाद सन 1980 में उस की नौकरी नोएडा आथौरिटी में लग गई.

इंसान जितना महत्त्वाकांक्षी होता है, अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उस का दिमाग उतना ही तेज चलता है. यादव सिंह के कई साल नौकरी में बीत गए. इस बीच उस ने न सिर्फ अपने काम, बल्कि अथौरिटी के पूरे संचालन को अच्छी तरह से समझ लिया. सरकारी सिस्टम की उन बारीकियों को उस ने बारीकी से समझा, जहां अतिरिक्त आय के स्रोत थे. बात सिर्फ इतनी नहीं थी. उस ने यह भी जान लिया था कि सरकारी तंत्र राजनीतिज्ञों के इशारों के गुलाम होते हैं. नौकरशाह का रसूख ऊपर तक हो तो वह खुल कर खेल सकता है. यादव सिंह इसी राह पर चला और छुटभैये नेताओं से शुरू हुआ उस का सफर एक दिन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के सत्ता के गलियारों तक जा पहुंचा.

इस का उसे फायदा तब मिला जब सन 1995 में एक दर्जन से ज्यादा इंजीनियरों को नजरअंदाज कर के उसे प्रोजैक्ट इंजीनियर के पद पर प्रमोशन दे दिया गया. यादव सिंह के पास इस पद के हिसाब से डिग्री नहीं थी, लेकिन राजनीतिज्ञों के संरक्षण की वजह से उसे डिग्री हासिल करने के लिए 3 साल का समय दिया गया. बिलकुल उसी तरह जैसे किसी को लाइसेंस देने से पहले ही बंदूक दे दी जाए. इस के बाद यादव सिंह खुल कर खेला. बाद में उस ने डिग्री भी हासिल कर ली.

तनख्वाह भले ही सीमित थी, पर यादव सिंह के ठाठबाट देखते ही बनते थे. उस की किस्मत तब और भी जोरों से जागी, जब सन 2002 में उसे चीफ मैंटीनेंश इंजीनियर के पद पर तैनात किया गया. अथौरिटी में यह बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा पद था. अगले 9 सालों में यादव सिंह ने अपने नेटवर्क को भी मजबूत बनाया और मनमानी दौलत भी एकत्र की. आलम यह था कि यादव सिंह ने नोएडा के ही सैक्टर-51 और सैक्टर-24 में 2 आलीशान कोठियां  खड़ी कर ली थीं. इस के अलावा उस ने अपने परिवार के लिए आगरा में भी देवरी रोड पर बड़ी सी भव्य कोठी बनवा दी थी. इस कोठी में उस के बड़े भाई कपूर सिंह और उन का परिवार रहता था. यह आर्थिक हैसियत सिर्फ प्रत्यक्ष थी, जबकि वास्तव में हकीकत और भी बड़ी थी.

वक्त यादव सिंह का साथ दे रहा था. वह जैसा चाहता था, ठीक वैसा ही होता था. उन दिनों प्रदेश में बसपा की मायावती सरकार थी. यादव सिंह सरकार में मजबूत पकड़ बना चुका था. वह मुख्यमंत्री मायावती तक अपनी पहुंच बताता था. अथौरिटी में चीफ मैंटीनेंस इंजीनियर के और भी पद थे, पर उस ने अपनी पहुंच का इस्तेमाल कर के सभी पद न केवल खत्म करा दिए, बल्कि अपने लिए इंजीनियर इन चीफ का पद सृजित करा लिया. यादव सिंह के पास दौलत, ताकत और पहुंच सभी कुछ॒था. आला अधिकारियों से ले कर राजनैतिक आकाओं की उस पर नजरें इनायत थीं.

यादव सिंह को किसी ने कहा कि अगर वह तिलक लगाए और सोना पहने तो समृद्धि और भी बढ़ जाएगी. उस ने ऐसा ही किया. उस के माथे पर तिलक के साथ गले में सोने की चेन और हाथों की अंगुलियों में हीरे जडि़त सोने की कई अंगूठियां दमकने लगीं. सिस्टम पर पकड़ होने की वजह से बसपा सरकार में यादव सिंह की तूती बोलती थी. विरोधी सहकर्मियों ने उसे हटाने के लिए एक बार प्लानिंग भी की, लेकिन यादव सिंह सब पर भारी पड़ा और अपनी ताकत से विरोधियों को आईना दिखा दिया. वे लोग पद पर होते हुए भी काम के लिए तरस गए. यादव सिंह के परिवार में उस की पत्नी कुसुमलता के अलावा बेटा सन्नी और 2 बेटियां थीं करुणा और गरिमा.

सन 2011 से यादव सिंह के खिलाफ घोटाले की आवाज उठनी शुरू हुई. बाद में नवंबर महीने में बीजेपी सांसद किरीट सोमैया ने यादव सिंह के खिलाफ 950 करोड़ का घोटाला उजागर किया. यह बात अलग थी कि यादव सिंह पर तत्काल इस का कोई असर नहीं हुआ. यादव सिंह का सफर बहुजन समाज पार्टी की मायावती सरकार से शुरू हो कर  सन 2012 में समाजवादी पार्टी की अखिलेश यादव सरकार तक आ गया था. अखिलेश सरकार आई तो यादव सिंह पर शिकंजा कसने की तैयारी की गई. 950 करोड़ के टेंडर घोटाले में अथौरिटी के चीफ इंजीनियर के खिलाफ 13 जून, 2012 को थाना सैक्टर-39 में विभिनन धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया. इस बार यादव सिंह को सस्पैंड कर दिया गया.

विरोधी खुश हुए कि यादव सिंह अब लपेटे में आ जाएगा, क्योंकि मामला काफी बड़ा था. लेकिन यह विरोधियों की सोच थी. उन की खुशफहमी को तब झटका लगा, जब यादव सिंह ने अपने दिमागी गणित का फार्मूला मौजूदा सरकार में भी चला दिया. सस्पैंड होने के बावजूद अथौरिटी में यादव सिंह का हस्तक्षेप बराबर बना रहा. बड़े आवंटनों में यादव सिंह की सहमति ली जाती थी. इस रसूख का नतीजा यह निकला कि नोएडा पुलिस ने यादव सिंह को इस मामले में क्लिनचिट दे दी और अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी.

फिर कभी इस घोटाले पर सवाल खड़ा न हो, इसलिए इस मामले की सीबीसीआईडी जांच भी हुई, लेकिन यादव सिंह इस में भी बच गया. कुछ महीनों की गर्दिशों के बाद यादव सिंह को न केवल बहाल कर दिया गया, बल्कि प्रमोशन भी मिला. उसे यमुना एक्सप्रेस वे अथौरिटी का चीफ इंजीनियर बना दिया गया. एक बार फिर यादव सिंह को पंख लगे. वह अपने रसूख को बरकरार रख कर मजे से नौकरी करने लगा. इस के बाद एक तरह से उस की ताकत और भी बढ़ गई थी. अब उस का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता था. यादव सिंह औडी जैसी महंगी लग्जरी गाडि़या रखता था. लेकिन वह अपनी कारों पर सरकारी ड्राइवर नहीं रखता था.

यादव सिंह के रसूख का आलम यह था कि उस से मिलने के लिए लोग तरसते थे. वह कहीं किसी फंक्शन में जाता था तो बड़े अफसर और नेता उस के इर्दगिर्द मंडराते नजर आते थे. यादव सिंह का व्यवहार आला दर्जे के अधिकारी जैसा होता था. फंक्शन किसी का भी हो, लेकिन सारी रौनक यादव सिंह पर आ कर सिमट जाती थी. औफिस आने वाले बड़े बिल्डर और ठेकेदार सब से पहले यादव सिंह को खुश करते थे. अथौरिटी में वही होता था, जो यादव सिंह चाहता था. उस की मर्जी के बिना न कोई ठेका दे सकता था और न ही कोई छोटेबड़े आवंटन हो सकते थे. उस की खुशी और अनुमति दोनों के ही मायने होते थे. सरकारी लोगों को वह अपनी निजी जिंदगी से दूर ही रखता था.

यादव सिंह की दौलत पर किसी को कोई शक नहीं था, लेकिन उस की दौलत का दायरा कितना था, यह कोई नहीं जानता था. इस की भी वजह थी, क्योंकि मोटी डील वह अपने घर और होटलों में करता था. किसी की आर्थिक हैसियत का अंदाजा 2 तरीकों से ही होता है. पहला वह खुद जम कर उस का प्रदर्शन करे या फिर कोई दूसरा मय तथ्यों के उस का खुलासा कर दे. यादव सिंह के मामले में वक्त के साथ दूसरा तरीका अपनाया गया.

वह अकूत दौलत का मालिक है, यह बात 17 नवंबर, 2014 को तब पता चली, जब आयकर महानिदेशक (जांच) कृष्णा सैनी के निर्देश पर आयकर निदेशक (जांच) अशोक कुमार त्रिपाठी के नेतृत्व में आयकर विभाग की कई टीमों ने उस की नोएडा वाली कोठी सहित उस के कई ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की. इस से उन लोगों की गलतफहमी तो दूर हुई ही, जो उन्हें छोटामोटा अमीर समझते थे, आयकर विभाग भी बुरी तरह चौंक गया. 2 दिनों तक चली इस छापेमारी में यादव सिंह की करोड़ों की संपत्ति पकड़ में आई. प्रौपर्टी के कागजात व अन्य दस्तावेज कई सूटकेसों में भरे हुए थे. कोठी के बाहर खड़ी सफेद रंग की औडी कार की डिग्गी से ही 10 करोड़ रुपए नगद बरामद हुए.

घर में रखी तिजोरियों और अलमारियों को खंगालने के साथ ही आयकर विभाग ने उन के कई बैंकों के लौकर भी खंगाले और वहां से संपत्तियों के पेपर्स के साथसाथ करीब 2 करोड़ रुपए के आभूषण बरामद किए. इन आभूषणों में 9 लखा हार, हीरे के कई सैट, हीरे जड़ाऊ कंगन और गहनों के गिफ्ट आदि थे. घर में ही गहनों का मिनी शोरूम बना था. उस के परिवार और नजदीकियों के नाम करोड़ों की संपत्तियां थीं.

यह बड़ी काररवाई थी. इस से यादव सिंह छटपटा गया. इस के चलते ही यह राज भी खुल गया कि यादव सिंह ने अपनी पत्नी को तलाक दे रखा था. इस की वजह भी पता चल गई. दरअसल यादव सिंह ने पत्नी व बच्चों के नाम पर कारोबारी घरानों के साथ मिल कर 30 से ज्यादा कपंनियां खड़ी कर दी थीं. इन कंपनियों में कुसुम गारमेंट्स प्रा.लि., न्यू एरा सौफ्टवेयर, चाहत टैक्नौलोजी प्रा.लि., केएस अल्ट्राटैक प्रा.लि., क्विक इन्फौटैक सौल्यूशन प्रा.लि. व हिचकी क्रियेशंस प्रा.लि. प्रमुख थीं.

खास बात यह थी कि महज कुछ हजार से शुरू होने वाली ये कंपनियां कुछ ही दिनों में करोड़ों के टर्नओवर तक पहुंच गई थीं. बताते हैं कि यादव सिंह ब्लैकमनी को कंपनियों में लगा कर उसे व्हाइट मनी बनाना चाहता था. वैसे यादव सिंह खुद इन कंपनियों के मालिक नहीं था. इन कंपनियों को उस ने सन    2006 से ही खड़ा करना  शुरू कर दिया.

एक तरफ की काली कमाई दूसरी तरफ जा रही थी. कंपनियों में नोट गिनने की मशीनें थीं. करोड़ों रुपयों की शिफ्टिंग में निजी सुरक्षाकर्मियों का सहारा लिया जाता था. बात यहीं खत्म नहीं हुई. यादव सिंह के यहां से छापे में मिले आभूषणों के आंकलन और परख के लिए सर्राफों को बुलाया गया. आभूषणों को देख कर सर्राफों को भी पसीने आ गए, क्योंकि सभी जेवरात न केवल महंगे थे, बल्कि सौ फीसदी खरे थे. यादव सिंह भ्रष्ष्टाचार का मगरमच्छ बन कर सामने आया था. अपने पद पर रहते हुए उस ने अपने नाते रिश्तेदारों को धड़ाधड़ महंगे प्लाट आवंटित किए थे.

आयकर विभाग ने यादव सिंह का पासपोर्ट भी जब्त कर लिया था. इस सब के बावजूद यादव सिंह बेफिक्र था. इस की वजह थी उन की सियासी पकड़ और पहुंच. चर्चा होने लगी थी कि यादव सिंह आयकर विभाग को टैक्स चुका कर पाकसाफ बच जाएगा. क्योंकि आयकर विभाग को बरामद संपत्तियों, नगदी पर टैक्स से मतलब होता है. बहरहाल, आयकर विभाग ने अपनी जांच जारी रखी. इसी जांच में पता चला कि यादव सिंह के परिवार के नाम जो कंपनियां थीं, उन का लेनदेन विदेशों में भी था. प्रवर्तन निदेशालय को इस से अवगत करा दिया गया. इसी बीच यादव सिंह सुप्रीम कोर्ट की तरफ से भ्रष्टाचार के मामलों को ले कर बनाए गए विशेष जांच दल (एसआईटी) के रडार पर वह आ गया. एसआईटी ने इस मामले को संज्ञान में ले कर काररवाई शुरू कर दी.

यादव सिंह के खिलाफ सरकार ने तत्काल कोई काररवाई नहीं की थी. इस पर राजनीतिक दलों ने घेराबंदी शुरू की. जब सरकार पर सवाल उठने लगे तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने साफ किया कि आयकर विभाग और अन्य एजेंसियों की जांच रिपोर्ट आने के बाद सरकार यादव सिंह के खिलाफ कोई काररवाई करेगी. आखिर 8 दिसंबर को यादव सिंह समेत 3 लोगों को सस्पैंड कर दिया गया. यादव सिंह यह सोच कर बेफिक्र था कि इस बार भी वह पुराने फार्मूले अपना कर बच जाएगा.

लेकिन यादव सिंह का समय अनुकूल नहीं था. फिर भी उसे अपनी पहुंच और रसूख पर पूरा भरोसा था. उसे पूरी उम्मीद थी कि धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा. लेकिन यादव सिंह के सितारे गर्दिश में थे. शायद उस का बिगड़ा खेल बन भी जाता, लेकिन इसी बीच उत्तर प्रदेश के चर्चित सीनियर आईपीएस अमिताभ ठाकुर की पत्नी और सामाजिक कार्यकर्ता डा. नूतन ठाकुर ने 11 दिसंबर को हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर दी.

उन्होंने तर्क दिया कि यादव सिंह के यहां आयकर छापों में करोड़ों की अवैध संपत्ति के सुबूत मिले हैं. इसलिए उस के खिलाफ सीबीआई जांच होनी चाहिए. अदालत ने 16 दिसंबर को सरकार से जवाब तलब किया तो सरकार ने इसी बीच 10 फरवरी को यादव सिंह के खिलाफ जांच करने के लिए रिटायर्ड जस्टिस अमरनाथ वर्मा की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच आयोग गठित कर दिया.

बाद में हुई सुनवाई में याची ने अदालत में तर्क दिया कि राज्य सरकार ने काररवाई करने के बजाय न्यायिक आयोग बना दिया. ऐसा इसलिए किया गया, ताकि सूबे में पूर्व और मौजूदा सरकारों में ऊंची पहुंच रखने वाले यादव सिंह के मामले को रफादफा किया जा सके. आरोप लगाया गया कि सन 2002 से 2014 के बीच यादव सिंह करीब 2 हजार करोड़ की परियोजनाओं से ने बड़ी तादाद में अवैध संपत्ति अर्जित की. याची सीधे तौर पर सीबीआई जांच की मांग की.

इस पर कोर्ट ने एसआईटी से भी जानकारियां हासिल कीं. कई सुनवाइयों के बाद आखिर 16 जुलाई, 2015 की हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच के मुख्य न्यायमूर्ति डा. धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति नारायण शुक्ल की खंडपीठ ने सीबीआई जांच के आदेश दे दिए. हाईकोर्ट ने कहा कि ‘हमारे मतानुसार इस मामले के हालात सीबीआई के सुपुर्द करने लायक हैं. क्योंकि इस में भ्रष्टाचार का मामला बनता है.’ अदालत के हस्तक्षेप के बाद यादव सिंह की बचाव की तैयारियां धरी की धरी रह गई. उस के लिए यह बड़ी मुसीबत थी. इस बुरे वक्त में उस के नातेरिश्तेदारों से ले कर बड़े घरानों और नेताओं ने भी पल्ला झाड़ लिया था. वजह यह थी कि कोई भी जांच के लपेटे में नहीं आना चाहता था.

इस दौरान वह खुद भी सामने नहीं आया. आखिर हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने इस मामले में 30 जुलाई, 2015 को यादव सिंह व उस के साथियों के खिलाफ धारा 120बी, 409, 420, 466, 467, 469, 471 के अंतर्गत केस दर्ज कर लिया. इस पूरे प्रकरण की जांच का जिम्मा एसटीएफ व एंटी करैप्शन विंग के सुपुर्द कर दिया गया. सीबीआई जानती थी कि यादव सिंह बड़ा खिलाड़ी है. इसलिए वह उसे बचने का कोई मौका नहीं देना चाहती थी.

4 अगस्त, 2015 को सीबीआई की टीमों ने एक साथ दिल्ली, आगरा, नोएडा व फिरोजाबाद समेत 12 स्थानों पर छापेमारी की और यादव सिंह की 38 प्रौपर्टी का पता लगाने के साथ ही महत्वपूर्ण दस्तावेज बरामद कर लिए. सीबीआई की 14 सदस्यीय टीम ने यादव सिंह की कोठी में घंटों जांचपड़ताल की. आयकर विभाग ने भी सबूत एकत्र किए. अगले कुछ महीनों में जांच में जुटी सीबीआई ने धीरेधीरे टेंडर व जमीनों के आवंटन से जुड़ी 3 हजार फाइलों का जखीरा एकत्र कर लिया. सीबीआई ने इस दौरान कई बार नोएडा अथौरिटी जा कर जांच की और टेंडर से जुड़ी मूल पत्रावलियों को जब्त किया.

यादव सिंह ने सन 2002 से ले कर 1 दिसंबर, 2014 तक विभिन्न कार्यों के हजारों करोड़ रुपए के टेंडर जारी किए थे. सन 2014 में तो महज 8 दिनों के भीतर उस ने 950 करोड़ रुपए के ठेके बांट दिए थे. यह भी साफ हो गया कि यादव सिंह के पास आय से अधिक संपत्ति है. सीबीआई ने इस की भी जांच की कि 950 करोड़ के बड़े घोटाले में आखिर यादव सिंह बच कैसे गया? इस की नए सिरे से जांच हुई. सीबीआई ने बिल्डरों के ठिकानों पर छापेमारी की और दस्तावेज बरामद किए. इस में खुलासा हुआ कि यादव सिंह ने 5 फीसदी कमीशन के बदले टेंडर बांटे थे. 17 दिसंबर को सीबीआई ने नोएडा के सहायक परियोजना अभियंता रामेंद्र को गिरफ्तार कर लिया. उस से कड़ी पूछताछ के बाद सुबूत जुटाए और उसे जेल भेज दिया गया.

इस बीच अथौरिटी से पता किया गया कि यादव सिंह को तैनाती के बाद से कुल कितना वेतन मिला. पता चला कि सैकड़ों करोड़ की प्रौपर्टी जुटाने वाले यादव सिंह को सन 1980 से निलंबन तक की अवधि में वेतन के रूप में 70 लाख रुपए दिए गए थे. सैकड़ों पत्रावलियों और छापेमारी में बरामद दस्तावेजों की जांच में भ्रष्टाचार के पुख्ता सबूत मिले. जांच टीम ने सीबीआई के डायरेक्टर अनिल कुमार सिन्हा से विचारविमर्श के बाद यादव सिंह को गिरफ्तार करने का फैसला किया. आखिरकार सीबीआई ने 3 फरवरी को यादव सिंह को अपने हैड क्वार्टर बुला कर गिरफ्तार कर लिया.

रिमांड अवधि पूरी होने पर सीबीआई ने यादव सिंह को पुन: अदालत में पेश किया और 5 दिनों का रिमांड और ले लिया. यादव सिंह जांच में सहयोग नहीं कर रहा था. फलस्वरूप सीबीआई को उस की रिमांड अवधि बढ़वानी पड़ी. 17 फरवरी को उसे पुन: अदालत पर पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. फिलहाल वह जेल में है. कथा जांच एजेंसियों की काररवाई व जनचर्चाओं पर आधारित. UP Crime

 

Suspense Crime Story: रिश्ते जो खून में रंग गए

Suspense Crime Story: पढ़ीलिखी और अच्छे परिवार की अर्चना अजय कुमार की फेसबुक प्रोफाइल से इतना प्रभावित हुई कि उस से दोस्ती कर उस के साथ घर बसाने के सपने देखने लगी. अपनी इस चाहत को पूरा करने के लिए उस ने पति ओमप्रकाश को ही नहीं, 4 साल के बेटे शिवा को भी मौत के घाट उतार दिया…

सूरज के निकलते ही आसमान में छाई कोहरे की धुंध साफ होने लगी थी. चिडि़यों की मधुर कलरव ने सुबह होने का आभास कराया तो बागेश्वरी देवी भी उठ गईं. उन की बड़ी बहू पहले ही उठ कर फ्रेश हो गई थी. लेकिन पहली मंजिल पर रहने वाला उन का छोटा बेटा, बहू और पोता अभी तक नहीं उठा था. चायनाश्ते का समय हो गया था, इस के बावजूद वे लोग पहली मंजिल से नीचे नहीं आए थे. एक बार तो बागेश्वरी देवी को लगा कि शायद ठंड होने की वजह से वे उठ न पाए होंगे. लेकिन इतनी देर तक न कभी बेटा ओमप्रकाश सोता था और न पोता शिवा. इसलिए वह परेशान होने लगीं. वह उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की कोतवाली शाहपुर के मोहल्ला अशोकनगर में रहती थीं.

मकान की ऊपरी मंजिल पर काम चल रहा था. साढ़े 8 बजतेबजते मजदूर काम पर आ गए थे, लेकिन तब तक ऊपर सो रहे लोगों में से कोई नहीं उठा था. मजदूर जैसे ही सीढि़यां चढ़ते हुए प्रथम तल पर पहुंचे, उन्हें कमरे के अंदर से दरवाजे के जोरजोर से थपथपाने और औरत के चिल्लाने की आवाज सुनाई पड़ी. एक मजदूर ने जल्दी से दरवाजे की बाहर से लगी सिटकनी खोल दी. mअंदर से घर की छोटी बहू अर्चना तेजी से बाहर निकली और सीधे सामने वाले कमरे की तरफ भागी. उसे इस तरह भाग कर कमरे में जाते देख मजदूर हैरान रह गए.

अर्चना ने जैसे ही दरवाजे पर हाथ रखा, दरवाजा खुल गया. अंदर का दिल दहला देने वाला नजारा देख कर उस के पांव चौखट पर ही जम गए और वह जोर से चीखी. उस कमरे में बैड पर ओमप्रकाश की लाश चित पड़ी थी. फर्श पर खून ही खून फैला था. उन्हीं के बगल 4 साल के मासूम बेटे शिवा की भी लाश पड़ी थी. दोनों लाशें देख कर ही अर्चना जोर से चीखी थी. बापबेटे की लाशें देख कर मजदूरों के भी हाथपांव फूल गए. अर्चना रोतीचीखती नीचे सास बागेश्वरी देवी के पास पहुंची. बहू के मुंह से बेटे और पोते की हत्या की बात सुन उन का पूरा बदन कांपने लगा. घर में रोनापीटना मच गया. दोनों की आवाजें सुन कर पड़ोसी भी आ गए. जैसेजैसे यह खबर मोहल्ले में फैलती गई, लोग बागेश्वरी देवी के घर इकट्ठा होने लगे.

बागेश्वरी देवी की बड़ी बहू ने फोन द्वारा इस घटना की सूचना अपने पति राजकुमार को दे दी. वह उत्तर प्रदेश पुलिस में इंसपेक्टर थे. छोटे भाई और भतीजे की हत्या की बात सुन कर वह भी सन्न रह गए. उन्होंने कोतवाली शाहपुर के प्रभारी आनंदप्रकाश शुक्ला को फोन द्वारा घटना की जानकारी दे दी. इंसपेक्टर आनंदप्रकाश शुक्ला तुरंत एसआई रामकृपाल यादव, एएसआई विमलेंद्र कुमार, कांस्टेबल संतोष कुमार, रामविनय सिंह, शिवानंद उपाध्याय और जनार्दन पांडेय को साथ ले कर अशोकनगर स्थित राजकुमार यादव के घर पहुंच गए. मृतक ओमप्रकाश यादव के ससुर दीपचंद यादव राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पीएसओ थे. उन्हें जब घटना की जानकारी मिली तो उन्होंने गोरखपुर रेंज के आईजी पी.सी. मीणा को फोन किया.

इस के बाद तो आईजी पी.सी. मीणा, डीआईजी आर.के. चतुर्वेदी, एसएसपी लव कुमार, एसपी हेमंत कुटीयार, सीओ कमल किशोर, क्राइम ब्रांच, एसटीएफ की टीम, डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम वहां पहुंच गईं. थोड़ी ही देर में अशोकनगर पुलिस छावनी में तब्दील हो गया. पुलिस ने बड़ी बारीकी से घटनास्थल की जांच की. जिस कमरे में दोनों लाशें पड़ी थीं, वहीं बैड के पास खून से सना एक हथौड़ा और एक कूदने वाली रस्सी पड़ी थी. लाशें देख कर ही लग रहा था कि हत्यारे ने हथौड़े से ओमप्रकाश की हत्या की थी, जबकि उन के बेटे का रस्सी से गला घोंटा था. पुलिस ने दोनों सामानों को कब्जे में ले लिया.

सभी को यह बात परेशान कर रही थी कि आखिर बच्चे की हत्या क्यों की गई? पुलिस की नजर जब कमरे के दरवाजे की सिटकनी पर पड़ी तो दरवाजे पर सिटकनी तोड़ने जैसा कोई निशान नहीं था. देख कर लग रहा था कि किसी ने सिटकनी के पेंच खोल कर उसे फर्श पर रख दिया था. जबकि पूछताछ में अर्चना ने बताया था कि उस के पति अंदर से सिटकनी बंद कर के सोए थे. उस ने यह भी कहा था कि लूटपाट का विरोध करने पर लुटेरों ने हथौड़े से उस के पति की हत्या की होगी. उसी समय बच्चा जा गया होगा, तब पहचाने जाने के डर से उन्होंने बच्चे को भी मार दिया होगा. लूटपाट के दौरान खटपट की आवाज सुन कर वह आ न जाए, इसलिए बदमाशों ने उस के कमरे की सिटकनी बाहर से बंद कर दी थी.

अर्चना का बयान पुलिस को कुछ अजीब लग रहा था. बागेश्वरी देवी के बड़े बेटे इंसपेक्टर राजकुमार आ गए तो वह उस कमरे में गए, जहां दोनों लाशें पड़ी थीं. उन्होंने भी कमरे का निरीक्षण किया. उन्हें भी साफ लग रहा था कि यह लूट का मामला नहीं है. पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई पूरी करने के बाद दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. मृतक की मां बागेश्वरी देवी की तहरीर पर पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ दोनों हत्याओं का मुकदमा दर्ज कर लिया. यह 21 जनवरी, 2016 की बात है.

यह मामला एक तो विभागीय था, दूसरे बात मुख्यमंत्री तक पहुंच चुकी थी, इसलिए उसी दिन शाम को आईजी पी.सी. मीणा, एसएसपी लव कुमार ने एसपी (सिटी) हेमंत कुटीयार, एसपी (क्राइम ब्रांच) मानिकचंद और सीओ (कैंट) कमल किशोर को बुला कर विचारविमर्श करने के साथ इस केस का जल्द से जल्द खुलासा करने के निर्देश दिए. एसएसपी लव कुमार के निर्देश पर थानाप्रभारी आनंदप्रकाश शुक्ला ने सब से पहले मृतक ओमप्रकाश और उन की पत्नी अर्चना के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. ओमप्रकाश की काल डिटेल्स से तो कुछ खास नहीं मिला, लेकिन अर्चना की काल डिटेल्स चौंकाने वाली थी. रात साढ़े 12 से डेढ़ बजे के बीच उस ने एक नंबर पर कई फोन किए थे.

जांच में पता चला कि वह नंबर फिरोजाबाद जिले के स्वामीनगर के रहने वाले अजय कुमार यादव का था और उस के फोन की लोकेशन 20 जनवरी की दोपहर के बाद से ले कर उस समय तक गोरखपुर की थी. यही नहीं, इस के पहले भी उस नंबर पर अर्चना की दिन में कईकई बार लंबीलंबी बातें होती रही थीं. सारा माजरा पुलिस की समझ में आ गया. अर्चना शक के दायरे में आ गई, लेकिन पुलिस ने इस बात का अहसास किसी को नहीं होने दिया. अजय कुमार गोरखपुर में ही था, लेकिन पुलिस के पास उस का कोई फोटो नहीं था, जिस से उसे पहचाना जा सके.

अजय कुमार के फोटो के लिए पुलिस ने सोशल साइट फेसबुक खंगाली तो उस में उस का फोटो मिल गया. लेकिन फेसबुक पर पड़े उस के फोटो देख कर एक बारगी पुलिस को झटका सा लगा, क्योंकि एक फोटो में वह समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के साथ बैठक में था तो दूसरे फोटो में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से हाथ मिला रहा था. उन्होंने यह बात एसएसपी लव कुमार को बताई तो उन्होंने कहा कि स्थितियों से साफ लगता है कि इन हत्याओं में उसी का हाथ है, इसलिए उसे तुरंत गिरफ्तार करो. देर होने पर वह हाथ से निकल सकता है.

मोबाइल की लोकेशन से पुलिस को पता चल गया था कि अजय कुमार बसअड्डे पर है. पुलिस को फोटो मिल ही गया था, इसलिए 22 जनवरी की सुबह पुलिस ने बसअड्डे को घेर लिया. बसअड्डे पर भारी मात्रा में पुलिस बल देख कर अजय ने भागने की कोशिश तो की, लेकिन वह भाग नहीं सका. पुलिस उसे पकड़ कर सीधे शाहपुर कोतवाली ले आई. अजय कुमार के पकड़े जाने की सूचना मिलते ही एसएसपी लव कुमार और एसपी (सिटी) हेमंत कुटीयार थाने आ गए. अजय ने खुद को समाजवादी पार्टी का नेता बताते हुए बिना वजह थाने लाए जाने पर रौब तो खूब झाड़ा, लेकिन जब उस के सामने काल डिटेल्स रखी गई तो उस की सारी हेकड़ी निकल गई.

रुआंसी आवाज में हाथ जोड़ कर उस ने पुलिस अधिकारियों के सामने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘सर, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. अर्चना की बातों में आ कर मुझ से यह अपराध हो गया. उसी ने मुझ पर पति और बच्चे को रास्ते से हटाने का दबाव डाला था.’’

इस के बाद अजय ने ओमप्रकाश और उन के 4 साल के मासूम बेटे की हत्या की पूरी कहानी सुना दी. अजय ने स्वीकार कर लिया कि इन हत्याओं में अर्चना का भी हाथ था. इसलिए पुलिस अर्चना को गिरफ्तार करने के लिए अजय को साथ ले कर अशोकनगर कालोनी पहुंच गई. उस समय इंसपेक्टर राजकुमार के घर परिवार वाले तो थे ही, अर्चना के पिता दीपचंद भी मौजूद थे. पुलिस अधिकारी पूछताछ के बहाने उसे लौन में वहां ले आए, जहां अजय कुमार खड़ा था. उसे पुलिस हिरासत में देख कर अर्चना का चेहरा सफेद पड़ गया.

अजय को देख कर अर्चना समझ गई कि उस का खेल खत्म हो गया है. अब उस के सामने अपना अपराध स्वीकार करने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं है. इस से पहले कि उस से पुलिस कुछ पूछती, उस ने खुद ही कह दिया,  ‘‘हां, मैं ने ही अजय के साथ मिल कर पति और बेटे की हत्या की है. मुझे इस का कोई मलाल भी नहीं है.’’

अर्चना के मुंह से निकले इन शब्दों को सुन कर वहां खड़े लोग दंग रह गए. बेटी की करतूत पर दीपचंद तो गश खा कर गिर पड़े और बेहोश हो गए. पुलिस ने अर्चना को भी गिरफ्तार कर लिया था. इस के बाद एसएसपी लव कुमार ने पुलिस लाइंस में प्रैसवार्ता आयोजित कर अर्चना और अजय कुमार को पत्रकारों के सामने पेश किया तो दोनों ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए ओमप्रकाश और उन के 4 साल के बेटे की हत्या के पीछे की पूरी कहानी सुना दी. इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी.

उत्तर प्रदेश के जिला गाजीपुर के थाना जमनिया के खलीलचक ढडनी के रहने वाले भोलानाथ यादव का 5 लोगों का छोटा सा परिवार था. उन 5 लोगों में 2 तो वह पतिपत्नी थे, बाकी 2 बेटे राजकुमार व ओमप्रकाश और एक बेटी प्रमिला. भोलानाथ साधनसंपन्न किसान थे, इसलिए अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाई. पढ़लिख कर बड़ा बेटा राजकुमार यादव उत्तर प्रदेश पुलिस में सबइंसपेक्टर हो गया तो दूसरा बेटा ओमप्रकाश यादव नेत्र परीक्षक. पिता की मौत के बाद राजकुमार ने पूरे परिवार को अपने साथ रख लिया था. उन की पोस्टिंग गोरखपुर हुई तो वहां किराए पर रहते हुए उन्होंने कोतवाली शाहपुर के अंतर्गत बशारतपुर की पौश कालोनी अशोकनगर में जमीन खरीद कर अपना मकान बनवा लिया.

राजकुमार की शादी हो चुकी थी, ओमप्रकाश ने नेत्र परीक्षक का डिप्लोमा कर लिया तो उन की भी शादी सिंगापुर में हो गई. शादी के बाद ओमप्रकाश पत्नी को सिंगापुर से गोरखपुर ले आए. पत्नी को गोरखपुर में अच्छा नहीं लगा तो 6 महीने बाद ही वह सिंगापुर लौट गई. उस ने ओमप्रकाश को भी वहां आने को कहा, लेकिन ओमप्रकाश घरपरिवार छोड़ कर जाना नहीं चाहते थे, इसलिए मना कर दिया. दोनों ही अपनीअपनी जिद पर अड़े थे. इसी जिद ने उन के बीच तलाक करा दिया. इस के बाद सन 2009 में 34 साल के ओमप्रकाश की दूसरी शादी लखनऊ के रहने वाले पीएसी के कंपनी कमांडर दीपचंद यादव की बड़ी बेटी अर्चना से हो गई. उस समय अर्चना यही कोई 19 साल की थी.

उन की 2 बेटियों में अर्चना बड़ी थी. वह पढ़ीलिखी और खूबसूरत तो थी ही, स्वच्छंद स्वभाव की भी थी. अकेली घूमना, दोस्ती करना और महंगे मोबाइल फोन रखना उसे अच्छा लगता था. यह प्रवृत्ति उस की शादी के बाद भी बनी रही. खूबसूरत अर्चना को पा कर ओमप्रकाश खुश थे. करीब साल भर बाद उन के घर बेटा पैदा हुआ तो पतिपत्नी ने प्यार से उस का नाम नितिन रखा. घर में सभी उसे प्यार से शिवा कहते थे.  इस तरह ओमप्रकाश का घर खुशियों से भर गया.

ओमप्रकाश जिस मकान में परिवार के साथ रहते थे, वह उन के बड़े भाई राजकुमार यादव का था. वह भी भाई की तरह अपनी मेहनत की कमाई से एक घर बनाना चाहते थे, जिसे वह अपना कह सकें. अपने सपनों का महल खड़ा करने के लिए उन्होंने जीतोड़ मेहनत की. आखिर उन की मेहनत सफल हुई और उन्होंने थाना गुलरिहा के मोगलहा में जमीन खरीद कर सुंदर सा अपना घर बनवा लिया. 13 फरवरी, 2016 को उन के बेटे नितिन उर्फ शिवा का जन्मदिन था, उसी दिन वह अपने नए मकान में जाने की तैयारी कर रहे थे. लेकिन उन का यह सपना सपना ही रह गया. क्योंकि अर्चना और ओमप्रकाश के जो 5 साल हंसीखुशी से बीते थे, पिछले साल से उन की खुशियों में अचानक ग्रहण लग गया था.

ओमप्रकाश की बशारतपुर के एक कौंप्लेक्स में औप्टिकल्स की दुकान थी. उन के दुकान पर चले जाने के बाद अर्चना घर में खाली रहती थी. बूढ़ी सास बागेश्वरी देवी और जेठानी नीचे के कमरे में रहती थीं, जबकि वह पहली मंजिल पर. खाली समय में वह टीवी देख कर समय बिताती थी या फिर मोबाइल पर सोशल साइट फेसबुक पर दोस्तों के साथ चैटिंग करती थी. किसी दिन फेसबुक के ‘ऐडेड फ्रैंड’ लिस्ट में प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से हाथ मिलाते हुए था सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के साथ बैठे अजय कुमार यादव पर उस की नजर पड़ी तो वह उस से काफी प्रभावित हुई.

उस ने अजय की प्रोफाइल खोल कर देखी तो उस में उस का पता गांव स्वामीनगर, थाना शिकोहाबाद, जिला फिरोजाबाद दिया था. उस का मोबाइल नंबर भी उस में था. अर्चना ने अपने फेसबुक के मुख्य पेज पर अपनी शादी से पहले की आकर्षक फोटो लगा रखी थी. अजय की राजनीतिक पहुंच देख कर उस ने उसे ‘फ्रेंड रिक्वैस्ट’ भेज दी तो अजय की ओर से रिक्वैस्ट स्वीकार कर ली गई. उस के बाद उन के बीच चैटिंग शुरू हो गई. जल्दी ही दोनों गहरे दोस्त बन गए.

अजय कुमार यादव फिरोजाबाद के थाना शिकोहाबाद के गांव स्वामीनगर का रहने वाला था. दो भाइयों में वही बड़ा था. उस के घर की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी. गांव में उस के पिता श्यामबहादुर यादव की किराने की दुकान थी. पिता के न रहने पर अजय भी दुकान पर बैठता था. उस की शादी भी हो चुकी थी. पत्नी काफी खर्चीली थी, जबकि उस के खर्च पूरे करने का अजय के पास कोई साधन नहीं था, इसलिए जल्दी ही दोनों में तलाक हो गया था. पत्नी के चले जाने के बाद अजय अकेला हो गया था. उस के बाद वह समाजवादी पार्टी से जुड़ गया और मेहनत की बदौलत जल्दी ही युवजन सभा में जिला स्तर का पद पा लिया.

फिर तो उस का बड़े नेताओं के बीच उठनाबैठना होने लगा. ऐसे में ही उस का फोटो सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ भी खिंच गया, जिसे उस ने फेसबुक पर अपलोड कर दिया. इस फोटो को काफी लोगों ने लाइक किया. इसी दौरान अजय ने दूसरी शादी कर ली. दूसरी पत्नी से 2 बच्चे पैदा हुए. लेकिन दूसरी पत्नी से भी उस की अनबन रहने लगी और वह भी नाराज हो कर बच्चों के साथ मायके चली गई. यह 2 साल पहले की बात है. इधर पार्टी विरोधी गतिविधियों की वजह से अजय को पार्टी से निकाल दिया गया. लेकिन उस के उस फोटो को देख कर अर्चना तो उस से प्रभावित हो ही चुकी थी.

अजय और अर्चना की दोस्ती होने के बाद जबतब उन की फोन पर भी बातचीत होने लगी थी. जल्दी ही उन की दोस्ती ने प्यार का रूप ले लिया. दोनों ही एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे. इसी का नतीजा था कि मई, 2015 में अर्चना ने अजय को अपने मायके लखनऊ में मिलने के लिए बुला लिया. उस ने उसे मायके में इसलिए बुलाया था, ताकि मिलने में कोई बाधा उत्पन्न न हो. वहां मां के अलावा घर में कोई और नहीं रहता था. पापा दिन में ड्यूटी पर चले जाते थे, छोटी बहन वंदना की शादी ही हो चुकी थी. वह अपनी ससुराल में रहती थी.

पति से बहाना कर के अर्चना बेटे को ले कर मायके आ गई. अजय उस के दिए पते पर लखनऊ पहुंच गया. अर्चना ने मां से अजय का परिचय पुराने दोस्त के रूप में कराया. इस के बाद दोनों एकांत में मिले तो खुद को रोक नहीं पाए और वासना के प्रवाह में ऐसे बहे कि मर्यादा भंग कर बैठे. अजय अर्चना से मिल कर फिरोजाबाद लौट गया तो अगले दिन अर्चना भी लखनऊ से गोरखपुर आ गई. इस के बाद उस ने ओमप्रकाश को महत्त्व देना बंद कर दिया. वह हर घड़ी मोबाइल से ही चिपकी रहती. उस की यह आदत न पति को अच्छी लग रही थी और न ही सास को. जब भी कोई उस से कुछ पूछता, वह कोई बहाना बना देती. धीरेधीरे ओमप्रकाश को उस पर शक होने लगा.

इस बीच अजय अर्चना से मिलने उस के ससुराल भी आने लगा था. सास बागेश्वरी देवी ने इस नए चेहरे को देखा तो पूछ बैठीं कि यह कौन है? तब उस ने खुद को अर्चना का दूर का रिश्तेदार बता दिया था, वह अर्चना के सभी रिश्तेदारों को जानती थीं. इतने दिनों बाद यह नया रिश्तेदार कौन आ गया, यह बात बागेश्वरी देवी के गले नहीं उतरी तो उन्होंने ओमप्रकाश से बात की. ओमप्रकाश ने जब अर्चना से अजय के बारे में पूछा तो अपनी गलती मानने के बजाय वह पति से लड़ने पर आमादा हो गई. बस उसी दिन के बाद उन के रिश्ते में जो दरार पड़ी, वह धीरेधीरे बढ़ती ही गई.

पतिपत्नी के बीच इतनी दूरियां बढ़ गईं कि लगभग रोज ही घर में महाभारत होने लगा. यही नहीं, दोनों अलगअलग कमरों में सोने लगे. ओमप्रकाश नितिन को ले कर सोता था, जबकि अर्चना दूसरे कमरे में अकेली सोती थी. एक तरह से अब अर्चना के लिए पति उस के प्रेम में रोड़ा बन रहा था. रोजरोज के झगड़े से वह ऊब चुकी थी. इसी का नतीजा था कि उस ने पति को रास्ते से हटाने के लिए अजय से बात की. अजय उस के लिए कुछ भी करने को तैयार था, इसलिए वह उस का साथ देने के लिए राजी हो गया.

20 जनवरी, 2016 को पड़ोस में रवि राय के यहां सालगिरह का कार्यक्रम था, जिस में ओमप्रकाश भी सपरिवार जाना था. यही दिन अर्चना को पति को रास्ते से हटाने के लिए उचित लगा. उस ने अजय को फोन कर के 20 जनवरी को गोरखपुर बुला लिया. 3 बजे दोपहर अजय गोरखपुर पहुंच गया. उस समय मकान में काम चल रहा था, इसलिए बागेश्वरी देवी ऊपर थीं. अर्चना ने पीछे की सीढि़यों से अजय को अपने कमरे में ला कर छिपा दिया.

देर शाम ओमप्रकाश लौटे तो पत्नी से पार्टी में चलने को कहा. उस समय सिर दर्द का बहाना बना कर अर्चना ने पार्टी में जाने से मना कर दिया. ओमप्रकाश ने भी जाने की जिद नहीं की. बेटे को तैयार किया और खुद भी तैयार हो कर चले गए. पति के जाने के बाद अर्चना ने अजय को बाहर निकाला और उसे खिलायापिलाया. ओमप्रकाश के लौटने का समय हुआ तो उसे फिर छिपा दिया. रात करीब 11 बजे ओमप्रकाश बेटे के साथ पार्टी से लौटे और बेटे के साथ अपने कमरे में सो गए. सोते समय उन्होंने दरवाजे की सिटकनी अंदर से बंद नहीं की. मजदूरों के  जाने के बाद उन के औजारों से हथौड़ा निकाल कर अर्चना ने अपने कमरे में पहले ही रख लिया था.

बच्चों की कूदने वाली रस्सी भी उस ने रख ली थी. अपनी इस योजना को वह किसी भी तरह से विफल नहीं होने देना चाहती थी. सब के सो जाने के बाद अर्चना रात एक बजे के करीब दबे पांव अपने कमरे से निकली और पति के कमरे में गई. देखा कि बापबेटे गहरी नींद में सो रहे हैं तो वापस आई और अजय को हथौड़ा और रस्सी थमा कर एक बार फिर पति के कमरे में आ गई. अर्चना ने उसे पति पर वार करने के लिए इशारा किया तो अजय ने हथौड़े से ओमप्रकाश के सिर पर पूरी ताकत से वार कर दिया. भरपूर वार से ओमप्रकाश भले ही चीख नहीं पाया, लेकिन शरीर ने तो हरकत की ही, जिस से नितिन जाग गया. पापा को मारते देख वह चिल्लाने लगा. अर्चना डर गई. दूसरी ओर संगमरमर के फर्श पर खून देख कर अजय भी कांप उठा.

अर्चना ने अजय से बच्चे को खत्म करने को कहा तो अजय की हिम्मत जवाब दे गई. उस ने मना किया तो भेद खुलने के डर से अर्चना कांप उठी. तब उस ने खुद ही बेटे का गला पकड़ लिया. उस समय मां की वह ममता भी नहीं जागी, जिस के बारे में कहा जाता है कि मां की ममता से बढ़ कर इस दुनिया में कुछ भी नहीं है. मां मर सकती है, लेकिन अपने बच्चों को खरोंच तक नहीं आने दे सकती. लेकिन वासना में अंधी अर्चना ने बेटे को गला दबा कर मार दिया.

पुलिस और घर वालों को गुमराह करने के लिए अर्चना ने घर का सामान बिखेर दिया साथ ही सिटकनी खोल कर फर्श पर रख दी, ताकि सभी को यही लगे कि लूट की नीयत से सिटकनी तोड़ कर अंदर आए लुटेरों ने ओमप्रकाश और नितिन की हत्या कर दी है. इस के बाद दोनों ने बाथरूम में जा कर खून से सने हाथपैर धोए और कमरे में जा कर सो गए.

सुबह 4 बजे दोनों उठे तो अर्चना ने दरवाजा खोल कर बाहर झांका. कोई दिखाई नहीं दिया तो उस ने पीछे की सीढ़ी से अजय को बाहर निकाल दिया. अजय वहां से निकल कर गोरखपुरमहारागंज राष्ट्रीय राजमार्ग पर आया और टैंपो से बसअड्डे पर जा कर छिप गया. वह वहां इसलिए रुका था, क्योंकि अगले दिन अर्चना भी उस के साथ जाने वाली थी. वह अर्चना को ले जा पाता, उस के पहले ही पुलिस ने मोबाइल की लोकेशन के आधार पर उसे पकड़ लिया.

अर्चना ने प्रेमी अजय के साथ मिल कर जो किया, उस की सजा उसे अवश्य मिलेगी. अब उन की बाकी की जिंदगी जेल की सलाखों के पीछे बीतेगी. लेकिन अर्चना को अभी भी अपने किए का दुख नहीं है. Suspense Crime Story

—कथा पुल

Delhi Robbery Case: सवा करोड़ के गहनों की लूट

Delhi Robbery Case: देश की राजधानी के भीड़ भरे इलाके से हुई सवा करोड़ रुपए के गहनों की लूट ने दिल्ली पुलिस की नींद उड़ा दी थी. लेकिन पुलिस ने भी ऐसा सूत्र ढूंढ निकाला कि लुटेरों के पूरे गैंग को दबोच लिया, जिस ने और भी कई चौंकाने वाले राज उगले.

सुबह के 8 बजे के करीब पुलिस कंट्रोल रूम से उत्तरी दिल्ली के थाना सदर बाजार पुलिस को सूचना मिली कि कुतुब रोड पर तांगा स्टैंड के पास मोटरसाइकिल सवार बदमाशों ने चाकू मार कर किसी का बैग छीन लिया है. सदर बाजार, खारी बावली और चावड़ी बाजार आसपास हैं. यहां रोजाना बड़ेबड़े व्यापारियों का आनाजाना लगा रहता है. लुटेरे व्यापारियों व अन्य लोगों को यहां अपना निशाना बनाते रहते हैं. यहां ज्यादातर घटनाएं लूट की ही होती हैं.

जिस समय ड्यूटी अफसर को यह सूचना मिली थी, उस समय थानाप्रभारी अनिल कुमार औफिस में ही थे. ड्यूटी अफसर ने लूट की इस घटना के बारे में थानाप्रभारी को बताया तो उन के दिमाग में तुरंत आया कि लुटेरों ने किसी व्यापारी को शिकार बना लिया है. वह तुरंत एसआई संजय कुमार सिंह, प्रकाश और कुछ अन्य स्टाफ को ले कर घटनास्थल की ओर चल पड़े. घटनास्थल थाने से उत्तर दिशा में आधा किलोमीटर दूर था, इसलिए वह 5 मिनट में वहां पहुंच गए. वहां कुछ लोग जमा थे और एक औटो खड़ा था. उस में 30-35 साल का एक आदमी बैठा था, जिस के  दाहिने पैर के घुटने के पास से खून बह रहा था.

औटो के पास एक आदमी खड़ा था, जिस की उम्र 40-42 साल रही होगी. वह बहुत घबराया हुआ था. पूछने पर उस ने अपना नाम भरतभाई बताया. उस ने बताया कि बदमाश उसी का गहनों से भरा बैग ले कर फरार हो गए हैं. गहनों की कीमत कितनी थी, उसे पता नहीं था. उस का कहना था कि लूट का विरोध करने पर एक बदमाश ने उस के साथी प्रवीण को चाकू मार कर घायल कर दिया था.

अनिल कुमार ने घायल प्रवीण को कांस्टेबल सतेंद्र के साथ हिंदूराव अस्पताल भिजवाया और खुद भरतभाई से पूछताछ करने लगे. इस पूछताछ में उस ने बताया कि वह अहमदाबाद में मेसर्स राजेश कुमार अरविंद कुमार आंगडि़या के यहां नौकरी करता है. उन की फर्म अहमदाबाद से दिल्ली और दिल्ली से अहमदाबाद गहने भेजने का काम करती है. दिल्ली के कूचा घासीराम, चांदनी चौक में उन का एक औफिस है, जिसे अमितभाई संभालते हैं.

भरतभाई ने आगे जो बताया, उस के अनुसार, वह अहमदाबाद-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रैस से गहनों का एक बैग ले कर दिल्ली के लिए चला था. यह ट्रेन अहमदाबाद से एक दिन पहले शाम 5 बजे चली थी और उस दिन पौने 8 बजे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंची थी. प्रवीण दिल्ली वाले औफिस में काम करता था. जब भी वह माल ले कर नई दिल्ली स्टेशन पहुंचता था, वही उसे लेने रेलवे स्टेशन पर आता था. उस दिन भी प्रवीण उसे लेने स्टेशन पर आया था. वहां से उन दोनों ने चांदनी चौक जाने के लिए एक औटो किया और बैग ले कर उस में बैठ गए. जैसे ही उन का औटो यहां पहुंचा, तभी पीछे से पल्सर मोटरसाइकिल पर आए 3 लोगों ने उन का औटो रुकवा लिया.

औटो के रुकते ही मोटरसाइकिल से 2 लोग उतरे. उन में से एक ने भरतभाई पर पिस्तौल तान दी, दूसरा चाकू ले कर प्रवीण के पास खड़ा हो गया. तभी एक अपाचे मोटरसाइकिल और आ गई. उस पर भी 3 लोग सवार थे. उस मोटरसाइकिल से भी 2 लोग उतर कर उन के पास आ गए. तभी पिस्तौल वाले ने उस से गहनों से भरा बैग छीनने की कोशिश की. उस ने बैग नहीं छोड़ा तो चाकू वाले ने प्रवीण के पैर में चाकू मार दिया. इसी के साथ औटोचालक को 2 थप्पड़ मार दिए. थप्पड़ लगते ही औटोचालक भाग कर सड़क के उस पार जा कर खड़ा हो गया. उसी समय पिस्तौल वाले ने भरतभाई से बैग छीन कर अपाचे मोटरसाइकिल से आए लड़के को दे दिया. इस के बाद वे सभी नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की तरफ तेजी से चले गए.

भरतभाई से पुलिस को यह तो पता नहीं चला कि लूटे गए बैग में कितनी कीमत के गहने थे, पर यह जरूर पता चल गया था कि लुटेरे गहनों से भरा जो बैग लूट कर ले गए थे, उस का वजन 5, साढ़े 5 किलोग्राम था और उस बैग में जीपीएस डिवाइस भी लगा था. जीपीएस डिवाइस की बात सुन कर अनिल कुमार को लगा कि उस के सहारे लुटेरों तक पहुंचा जा सकता है. गहनों के वजन के आधार पर पुलिस ने अंदाजा लगाया कि बैग में लाखों रुपए के गहने होंगे.

लूट का यह मामला बड़ा था, इसलिए अनिल कुमार ने घटनास्थल से ही पुलिस ने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दे दी. डीसीपी मधुर वर्मा ने जिले की मुख्य सड़कों पर बैरिकेड्स लगा कर वाहनों की चैकिंग के आदेश समस्त थानाप्रभारियों को दिए और खुद भी घटनास्थल पर पहुंच गए. भरतभाई ने लूट की सूचना दिल्ली और अहमदाबाद के अपने औफिसों को दे दी थी. यह खबर सुन कर दिल्ली औफिस से अमितभाई घटनास्थल पर पहुंच गए थे. उन्होंने डीसीपी को बताया कि लूटे गए गहनों की कीमत एक करोड़ से अधिक थी. गहने वाले बैग में जो जीपीएस डिवाइस रखा था, पुलिस ने अमित से उस का नंबर ले लिया. वह डिवाइस वोडाफोन कंपनी का था.

दिनदहाड़े हुई इस लूट को सुलझाने के लिए मधुर वर्मा ने 2 पुलिस टीमें बनाईं. पहली टीम थाना सदर के थानाप्रभारी सतीश मलिक के नेतृत्व में बनाई गई, जिस में इंसपेक्टर मनमोहन, कमलेश, एसआई संजय कुमार सिंह, प्रकाश, निसार अहमद, आशीष शर्मा, एएसआई सुरेंद्र सिंह, हैडकांस्टेबल ए.के. वालिया, अवधेश कुमार, अशोक, जितेंद्र सिंह, कांस्टेबल अमित, सुरेश, बलराम, समंद्र आदि को शामिल किया गया.

दूसरी पुलिस टीम औपरेशन सेल के इंसपेक्टर धीरज कुमार के नेतृत्व में बनी, जिस में एसआई सुखवीर मलिक, देवेंद्र, यशपाल, प्रणव, आनंद, एएसआई सतीश मलिक, हैडकांस्टेबल योगेंद्र, राजेंद्र, कांस्टेबल प्रमोद, चंद्रपाल दिनेश को शामिल किया गया था. दोनों टीमों का निर्देशन के एसीपी राजेंद्र प्रसाद गौतम कर रहे थे. दोनों टीमें एसीपी राजेंद्र प्रसाद गौतम की देखरेख में केस की छानबीन में जुट गईं.

पुलिस टीम ने जांच की शुरुआत जीपीएस डिवाइस से की. पुलिस पता करने लगी कि बैग किस क्षेत्र में है. पुलिस ने फर्म के अहमदाबाद औफिस में अरविंदभाई से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि वह जल्द ही दिल्ली पहुंच कर पुलिस से संपर्क करेंगे. डिवाइस के कोड नंबर से पुलिस ने जांच की तो पता चला कि वह डिवाइस अहमदाबाद से निकलने के कुछ देर बाद ही बंद हो गया था. इस से पुलिस को निराशा हुई. गहने वाले बैग में जीपीएस डिवाइस रखी होने की जानकारी भरतभाई को भी थी, इसलिए पुलिस को शक हुआ कि कहीं उसी ने लूट के लिए डिवाइस को बंद नहीं कर दिया था. इस का पता लगाने के लिए पुलिस ने उसे पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. प्रवीण का हिंदूराव अस्पताल में इलाज चल रहा था. वहां भी पुलिस का पहरा लगा दिया गया.

भरतभाई को हिरासत में लेने की बात अरविंदभाई को पता चली तो उन्हें हैरानी हुई कि पुलिस लुटेरों को पकड़ने के बजाय उन्हीं के कर्मचारी को परेशान कर रही है. उन्होंने पुलिस से भरतभाई के खिलाफ कोई काररवाई न करने की सिफारिश की. उन्होंने कहा कि भरत पिछले 6 महीने से उन की फर्म में काम कर रहा है. वह बहुत ही ईमानदार और वफादार है. वह उसे अच्छी तरह जानते हैं. इस तरह का काम वह हरगिज नहीं कर सकता. जीपीएस डिवाइस के बारे में उन्होंने बताया कि वह किसी वजह से अपने आप ही कभीकभी बंद हो जाती है.

फर्म मालिक के कहने पर पुलिस ने भरतभाई को छोड़ जरूर दिया, लेकिन उसे यह हिदायत दे दी थी कि जांच में जब भी उस की जरूरत पड़ेगी, वह हाजिर होगा. अब पुलिस टीमों ने दूसरी दिशा में जांच शुरू की. जिस तांगा स्टैंड के पास लूट की गई थी, वहां पर मार्केट एसोसिएशन की ओर से 3 सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे. पुलिस को उम्मीद थी कि उन कैमरों में लुटेरों की फोटो जरूर कैद हो गई होगी. लेकिन पुलिस ने उन कैमरों की फुटेज के लिए मार्केट एसोसिएशन से सपंर्क किया तो पता चला कि 31 दिसंबर की रात 8 बजे से किसी वजह से सीसीटीवी सिस्टम बंद हो गया था. पुलिस को यहां भी शक हुआ कि यह सिस्टम इस घटना से कुछ घंटे पहले ही क्यों बंद हुआ?

कहीं ऐसा तो नहीं कि इस सिस्टम की देखरेख करने वाले की लुटेरों से कोई सांठगांठ रही हो? लुटेरों के कहने पर उस ने सिस्टम को बंद कर दिया हो. पुलिस टीम ने इस बिंदु पर भी जांच की. मार्केट एसोसिएशन की तरफ से जो व्यक्ति सीसीटीवी सिस्टम को देखता था, उस से भी पुलिस ने पूछताछ की. उस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स भी खंगाली, पर कोई नतीजा नहीं निकला. पुलिस को जांच में जिस बिंदु पर सफलता की उम्मीद नजर आती, उस पर भी जांच आगे नहीं बढ़ पा रही थी.

जांच का अगला पड़ाव पुलिस ने काल डिटेल्स पर केंद्रित किया. पुलिस टीम ने पता किया कि घटना वाले दिन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से कुतुब रोड तांगा स्टैंड तक सुबह 6 बजे से 9 बजे तक कौनकौन से फोन नंबर सक्रिय रहे. यानी उस रूट पर उस दौरान कितने लोगों की फोन पर बातें हुईं. मोबाइल फोन कंपनियों के सहयोग से पुलिस ने यह डाटा इकट्ठा किया. इस डाटा को डंप डाटा कहा जाता है. इस डाटा में कई हजार नंबर निकले. उन हजारों फोन नंबरों से संदिग्ध नंबरों को छांटना आसान नहीं था. यह जिम्मेदारी उत्तरी जिला पुलिस मुख्यालय में कंप्यूटर औपरेटर हेडकांस्टेबल ए.के. वालिया को दी गई.

ए.के. वालिया को डंप डाटा खंगालने का एक्सपर्ट माना जाता है. उन्होंने उस डाटा से करीब 300 संदिग्ध नंबर निकाले. इस के अलावा पुलिस ने अरविंदभाई की फर्म में जितने भी कर्मचारी काम करते थे, उन सभी के फोन नंबर ले कर यह जानने की कोशिश की कि उन में से किसी की डंप डाटा के नंबरों से किसी पर उस समय बात नहीं हुई थी. लेकिन कर्मचारियों के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला. उन हजारों फोन नंबरों में जो 3 सौ संदिग्ध नंबर निकाले गए थे, उन में से भी कोई ऐसा सूत्र नहीं मिला, जिस से लुटेरों तक पहुंचा जा सकता. यह जांच भी जहां से चली थी, वहीं ठहर गई.

भरतभाई ने पुलिस को बताया था कि बदमाश पल्सर और अपाचे मोटर- साइकिलों से आए थे. इन के बारे में पता करने के लिए पुलिस ने यह पता लगाया कि घटनास्थल से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बीच कहांकहां सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. पता चला कि नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर, स्टेशन के बाहर स्थित कई दुकानों पर और उसी रोड पर रास्ते में पड़ने वाले थाना नबी करीम के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. लुटेरों ने घटना को अचानक अंजाम नहीं दिया होगा. इस से पहले उन्होंने इस रूट पर रेकी की होगी. इसी बात को ध्यान में रख कर पुलिस ने सभी कैमरों की 15 दिन पुरानी फुटेज देखी.

फुटेज में घटना वाले दिन एक औटो के पीछे पल्सर और अपाचे मोटरसाइकिल जाती दिखाई दी. उस दिन से एक दिन पहले भी वे दोनों मोटरसाइकिलें उसी रूट पर जाती दिखाई दीं, लेकिन फुटेज में उन के नंबर स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहे थे. 4-5 दिन पहले तक दोनों मोटरसाइकिलें उस रूट में कई बार आतीजाती दिखीं. उन मोटरसाइकिलों पर जो लोग बैठे थे, उन की कदकाठी भरतभाई और प्रवीण द्वारा बताए गए हुलिए से मेल खा रही थी.

इस के बाद पुलिस ने अपना ध्यान पल्सर और अपाचे मोटरसाइकिलों पर लगा दिया. दिल्ली परिवहन विभाग की सभी अथौरिटियों में जितनी भी पल्सर और अपाचे मोटरसाइकिलें रजिस्टर्ड थीं, पुलिस ने उन की जानकारी निकलवाई. पता चला कि दिल्ली में 40 हजार पल्सर और 20 हजार अपाचे मोटरसाइकिलें रजिस्टर्ड हैं. इतनी मोटरसाइकिलों की जांच करना आसान बात नहीं है. लिहाजा पुलिस ने अपने जिले की अथौरिटी से उक्त दोनों ब्रांड की मोटरसाइकिलों की डिटेल्स निकलवाई.

यहां 400 पल्सर और 150 अपाचे मोटरसाइकिलें रजिस्टर्ड थीं. इन सभी की डिटेल्स हासिल कर पुलिस ने जिन लोगों के नाम से गाडि़यां थीं, उन का उम्र के हिसाब से वर्गीकरण किया. ज्वैलरी का बैग लूटने वाले बदमाशों की जो उम्र थी, उस उम्र के मोटरसाइकिल वालों को छांटा गया. इस तरह के करीब 42 मोटरसाइकिल मालिक मिले. इन सभी के पतों पर जा कर पुलिस ने पता किया कि 2 जनवरी, 2016 को वे सुबह 7 से 9 बजे के बीच वे अपनी मोटरसाइकिल ले कर कहां थे. इस जांच में भी पुलिस के हाथ लुटेरों तक नहीं पहुंच सके.

उधर जिला पुलिस मुख्यालय में कंप्यूटर औपरेटर ए.के. वालिया डंप डाटा को खंगालने में जुटे थे. उस में से वोडाफोन के एक नंबर पर उन की नजर जम गई. वह नंबर उन्होंने एसीपी राजेंद्र प्रसाद गौतम को दिया. वह नंबर पश्चिमी दिल्ली के रघुवीरनगर की रहने वाली गुड्डी के नाम था. सबइंसपेक्टर संजय कुमार सिंह उस नंबर की जांच के लिए गए तो पता चला कि उस पते पर गुड्डी नाम की कोई महिला नहीं रहती. इस से साफ हो गया कि वह नंबर किसी फरजी आईडी पर लिया गया था.

जब किसी भी कंपनी का नया मोबाइल नंबर लिया जाता है तो कंपनियां फार्म पर ग्राहक का एक अल्टरनेट नंबर मांगती हैं. वोडाफोन कंपनी का जो नंबर लिया गया था, उस पर अल्टरनेट नंबर के रूप में रिलायंस कंपनी का एक नंबर लिखा था. वह नंबर महेंद्र सिंह का था, जो बी-492, मीतनगर, ज्योतिनगर, नंदनगरी, दिल्ली का रहने वाला था. एसआई संजय कुमार सिंह हैडकांस्टेबल अवधेश और अशोक को ले कर उस पते पर पहुंचे.

वहां महेंद्र सिंह मिल गया. पुलिस को देखते ही वह घबरा गया. पुलिस ने उसे हिरासत में ले कर सदर बाजार में हुए गहनों की लूट के बारे में पूछा तो उस ने इस लूट से मना करते हुए बताया कि वह तो नंदनगरी की ईएसआई डिसपेंसरी में नौकरी करता है. उसे किसी लूट की कोई जानकारी नहीं है. उस ने भले ही खुद को ईएसआईसी डिसपेंसरी का कर्मचारी बताया था, पर उस के हावभाव से साफ लग रहा था कि वह कुछ छिपा रहा है. पुलिस ने जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो आखिर उस ने मुंह खोल दिया. उस ने स्वीकार कर लिया कि 2 जनवरी को उसी ने अपने साथियों के साथ लूट की उस घटना को अंजाम दिया था.

पुलिस टीम पूछताछ के लिए उसे थाने ले आई. डीसीपी मधुर वर्मा को जब पता चला कि लूट वाला मामला खुल गया है तो वह भी थाने आ गए. उन के सामने जब महेंद्र सिंह से पूछताछ की गई तो गहनों के बैग की लूट का पूरा रहस्य उजागर हो गया. पता चला, उस में सवा करोड़ के गहने थे. गहनों के बैग की लूट की जो कहानी सामने आई, वह चौंकाने वाली थी. महेंद्र सिंह दिल्ली के ज्योतिनगर के रहने वाले तेजू सिंह का बेटा था. वह नंदनगरी स्थित कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) की डिसपेंसरी में अस्थाई सफाई कर्मचारी था. उसे वहां से जो वेतन मिलता था, उस से उस के परिवार का गुजारा बड़ी मुश्किल से होता था. इसलिए वह हमेशा मोटी कमाई के बारे में सोचा करता था. इस के लिए वह कुछ भी करने को तैयार था.

महेंद्र को कहीं से पता चला कि चांदनी चौक में ऐसे तमाम लोग हैं, जो यहां से लाखों रुपए के गहने गुजरात ले जाते हैं और वहां से भी उसी तरह गहने दिल्ली आते हैं. उस ने सोचा कि अगर उन्हीं में से किसी को शिकार बना लिया जाए तो एक ही झटके में लाखों रुपए हाथ लग सकते हैं. इस के बाद वह यह पता लगाने लगा कि यह काम कौनकौन करते हैं. किसी जानकार ने उसे बताया कि दिल्ली के कूचा घासीराम में कई आंगडि़ए हैं, जो दिल्ली से बाहर गहने भेजते हैं. वहीं एक सरजू पंडित नाम का आदमी है, जो उन आंगडि़यों के बारे में अच्छी तरह से जानता है. क्योंकि वह उन्हें चायपानी पिलाता है. अगर सरजू पंडित को विश्वास में ले लिया जाए तो मोटा माल हाथ लग सकता है.

महेंद्र कूचा घासीराम के सरजू पंडित के पास पहुंच गया. उस ने पहले तो किसी जरिए उस से जानपहचान की. इस के बाद वह रोजाना उस से मिलने लगा. धीरेधीरे दोनों के बीच दोस्ती हो गई. जब दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई तो एक दिन महेंद्र ने सरजू को अपनी योजना के बारे में बता कर पैसों का लालच दे कर कि जो भी माल हाथ लगेगा, उस में से एक हिस्सा उसे दिया जाएगा, के बाद आंगडि़ए के बारे में पूछा. सरजू पंडित लालच में आ गया. 60 वर्षीय सरजू पंडित ने महेंद्र को प्रवीण कुमार के बारे में बताया ही नहीं, उसे पहचनवा भी दिया. प्रवीण कूचा घासीराम स्थित राजेश कुमार अरविंद कुमार आंगडि़या की फर्म में काम करता था. यह फर्म गहनों की कूरियर का काम करती थी.

दिल्ली के कुछ ज्वैलर्स इस फर्म द्वारा पुराने गहने अहमदाबाद भेज कर वहां से नए डिजाइन के तैयार गहने मंगाते थे. यह काम इस फर्म का कूरियर बौय भरतभाई करता था. वह हर 2 दिन बाद दिल्ली आता था. सरजू पंडित ने महेंद्र को पूरी बात बता तो दी, लेकिन महेंद्र यह फैसला नहीं कर सका कि कूरियर बौय भरतभाई से माल कैसे झटका जाए. महेंद्र का एक दोस्त था रोशन गुप्ता, जो विवेक विहार की झिलमिल कालोनी में रहता था. वह पेशे से ड्राइवर था. उस के 2 बच्चे थे, जो बड़े हो चुके थे. उन की शादी को ले कर वह काफी परेशान था. कुछ दिनों पहले उस ने मकान बनवाया था, जिस से उस पर ढाई लाख रुपए का कर्ज हो गया था. उसे इस बात की भी चिंता रहती थी कि वह कर्ज कैसे चुकाएगा.

महेंद्र ने लूट की योजना रोशन को समझाई तो पैसों की सख्त जरूरत की वजह से वह भी उस के साथ यह काम करने को तैयार हो गया. इस के बाद दोनों ने एक महीने तक उस रूट की रेकी की, जिस रूट से भरतभाई और प्रवीण माल ले कर नई दिल्ली स्टेशन आतेजाते थे. रेकी में रोशन ने अपनी स्प्लेंडर मोटरसाइकिल का उपयोग किया था. रूट को अच्छी तरह समझने के बाद बात हुई कि वारदात को कैसे अंजाम दिया जाए, क्योंकि इस में रिस्क था, इसलिए हथियारबंद लोगों का भी इस में शामिल होना जरूरी था. रोशन मनीष शर्मा और मोहम्मद आरिफ नाम के बदमाशों को जानता था. दोनों ही गाजियाबाद जिले के साहिबाबाद के रहने वाले थे.

मनीष शार्पशूटर था तो मोहम्मद आरिफ शातिर चाकूबाज. रोशन ने दोनों से बात की. वे राजी हो गए तो उन्हें भी योजना में शामिल कर लिया. दोनों बदमाशों को शामिल करने के बाद उन के दिमाग में बात आई कि ज्वैलरी लूटने के बाद मोटरसाइकिल से तुरंत भागना होगा. इस के लिए उन्हें भीड़भाड़ वाली जगह में भी तेजी से मोटरसाइकिल चलाने वाले 2 लोग चाहिए. इस बारे में आपस में चर्चा हुई तो मनीष शर्मा ने बताया कि वह जसपालदास उर्फ रिंकू को जानता है. वह भी साहिबाबाद में रहता है. पहले वह दिल्ली में क्लस्टर बस चलाता था. कुछ दिनों पहले उस ने नौकरी छोड़ा है. वह एक अच्छा बाइक रेसर है.

जसपाल को एक खतरनाक जानलेवा बीमारी थी, उसी के इलाज के लिए उसे पैसों की जरूरत थी. मनीष ने उसे लूट की योजना बताई तो वह भी तैयार हो गया. उस के पास चोरी की एक पल्सर मोटरसाइकिल भी थी. उन्हें एक मोटरसाइकिल चलाने वाला मिल गया था, एक की अभी और जरूरत थी. इस के लिए जसपाल ने अरुण नागर उर्फ बौबी से बात कराई. अरुण नागर मोटरसाइकिल से स्टंट करता था. वह बेरोजगार था. पैसों के लालच में वह भी उन के साथ काम करने को तैयार हो गया. अरुण ने भी किसी की अपाचे मोटरसाइकिल चुरा रखी थी, जिस की नंबर प्लेट बदल कर वह उसे खुद ही चलाता था.

पूरी टीम तैयार हो गई तो सभी ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से कूचा घासीराम बाजार तक का कई बार चक्कर लगाया. इस के बाद इस बात पर विचार किया जाने लगा कि घटना को किस जगह अंजाम दिया जाए, जहां से वे आसानी से भाग सकें. काफी सोचनेविचारने के बाद कुतुब रोड पर तांगा स्टैंड के पास वारदात को अंजाम देना निश्चित किया गया. क्योंकि वहां जो दुकानें बनी थीं, वे सुबह के समय बंद रहती थीं और सामने की पार्किंग भी खाली रहती थी. सुनसान रहने की वजह से वहां से यूटर्न ले कर भागना आसान था. वारदात की जगह निश्चित करने के बाद इस बात का भी कई बार रिहर्सल किया गया कि बैग को छीन कर किस तरह वहां से भागना है.

महेंद्र और रोशन गुप्ता को इस बात की पुख्ता जानकारी मिल गई थी कि अहमदाबाद से माल ले कर भरतभाई अहमदाबाद-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रैस से 2 जनवरी को नई दिल्ली स्टेशन पर उतरेगा. उसे पता ही था कि भरतभाई को लेने प्रवीण कुमार आता है. वहां से दोनों औटो से औफिस जाते हैं. पूरा प्लान तैयार कर के महेंद्र, मनीष शर्मा, अरुण नागर उर्फ बौबी, रोशन गुप्ता, जसपाल उर्फ रिंकू और मोहम्मद आरिफ पल्सर और अपाचे मोटरसाइकिलों से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गए. महेंद्र ने सब से पहले रेलवे स्टेशन की इनक्वायरी से यह पता लगाया कि अहमदाबाद से नई दिल्ली आने वाली राजधानी एक्सप्रैस कब आ रही है.

वहां से उसे पता चला कि ट्रेन स्टेशन पर 8 बजे पहुंचेगी. भरतभाई को लेने के लिए सुबह 7 बज कर 40 मिनट पर प्रवीण स्टेशन पहुंच गया था. महेंद्र प्रवीण को पहचानता था, इसलिए वह कुछ दूरी से उस पर नजर रखने लगा, क्योंकि भरतभाई को ट्रेन से उतर कर उसी के पास आना था. कुछ देर बाद अहमदाबाद से चल कर नई दिल्ली आने वाली राजधानी एक्सप्रैस के दिल्ली पहुंचने की घोषणा हुई, महेंद्र सतर्क हो गया. स्टेशन से बाहर निकलने वाले यात्रियों को महेंद्र गौर से देख रहा था. जब उसे भरतभाई दिखा तो वह खुश हो गया. भरत के हाथ में एक बैग था. भरत को पहले से ही पता था कि प्रवीण कहां खड़ा हो कर उस का इंतजार करता है, इसलिए वह स्टेशन से बाहर सीधे उसी स्थान पर पहुंच गया, जहां प्रवीण खड़ा था.

प्रवीण ने एक औटो तय किया, जिस में दोनों बैठ गए. महेंद्र फुरती से उस जगह आ गया, जहां उस के साथी खड़े थे. महेंद्र ने उन्हें वह औटो दिखा दिया, जिस में भरत और प्रवीण बैठे थे. पल्सर को जसपाल उर्फ रिंकू चला रहा था और उस पर महेंद्र तथा मोहम्मद आरिफ बैठे थे. दूसरी मोटरसाइकिल अपाचे को अरुण नागर उर्फ बौबी चला रहा था, जिस पर मनीष शर्मा और रोशन गुप्ता बैठ गए. वे सभी उस औटो का पीछा करने लगे, जिस में भरतभाई और प्रवीण बैठे थे.

जैसे ही वह औटो तांगा स्टैंड के पास पहुंचा, जसपाल ने उसे ओवरटेक कर के रोक लिया. इस के बाद अरुण नागर ने अपाचे मोटर-साइकिल औटो के बराबर में खड़ी कर दी. औटोचालक सरोज पटेल समझ नहीं पाया कि उन लोगों ने ऐसा क्यों किया, क्योंकि उस से तो कोई गलती भी नहीं हुई थी. औटो रुकते ही आरिफ चाकू ले कर और मनीष शर्मा पिस्तौल ले कर भरतभाई और प्रवीण के पास पहुंच गए. महेंद्र ने भरत के हाथ से बैग छीनना चाहा तो उस ने बैग नहीं छोड़ा. तभी डराने के लिए आरिफ ने प्रवीण के पैर पर चाकू मार दिया. इसी के साथ महेंद्र ने ड्राइवर सरोज पटेल के 2 थप्पड़ जड़ दिए.

थप्पड़ लगते ही औटोचालक वहां से भाग कर सड़क के उस पार चला गया. प्रवीण और भरतभाई भी डर गए थे. महेंद्र ने भरतभाई के हाथ से बैग छीन कर रोशन को पकड़ाया तो वे फुरती से यूटर्न ले कर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की ओर चले गए. वहां से गलियों में होते हुए वे शीला सिनेमा के सामने फ्लाईओवर के पास पहुंचे. जसपाल ने वहां पल्सर मोटरसाइकिल रोकी और एक औटोरिक्शा तय कर के उस में महेंद्र और आरिफ के साथ बैठ कर सीमापुरी बौर्डर चला गया. उन के पीछेपीछे अपाचे मोटरसाइकिल पर मनीष, अरुण और रोशन आ रहे थे.

वहां से वे जनकपुरी, साहिबाबाद पहुंचे. जनकपुरी में मनीष का एक प्लौट था, जिस में एक कमरा बना हुआ था. वह जगह सुनसान थी. वहां उन्होंने बैग खोल कर देखा तो उस में अलगअलग डिब्बों में सोने के गहने भरे थे. कुछ अंगूठियां, टौप्स और पैंडेंट ऐसे थे, जिन में हीरे जड़े थे. हीरे जड़ी सारी ज्वैलरी उन्होंने आपस में बांट ली. अब उन के सामने समस्या यह थी कि उन गहनों को कैसे और कहां बेचा जाए, क्योंकि गहने को बेचने पर पकड़े जाने की आशंका थी, इसलिए वे असमंजस में थे कि उसे कैसे ठिकाने लगाया जाए. तभी जसपाल ने कहा, ‘‘मेरे एक मौसा हैं किशनलाल, जो यहीं शालीमार गार्डन के रहने वाले हैं. अंडमान निकोबार में उन की गहनों की दुकान हैं. इस समय वह किसी परिचित की शादी में दिल्ली आए हुए हैं. गहनों को बेचने में वह मदद कर सकते हैं.’’

इस बात पर सभी तैयार हो गए तो जसपाल उर्फ रिंकू ने किशनलाल से बात की. उसने बताया कि सारे गहनों को पिघला कर अगर छड़ें बना दी जाए तो उन छड़ों को बाजार में आसानी से बेचा जा सकता है. सभी को यह सुझाव पसंद आया तो अगले दिन किशनलाल ज्वैलरी पिघलाने के लिए गैस बर्नर और अन्य सामान ले कर जनकपुरी के उसी प्लौट पर बने कमरे में पहुंच गया. किशनलाल ने पांच साढ़े पांच किलोग्राम सोने की ज्वैलरी को पिघला कर एक गोला बना दिया. वह गोला सोने की तरह चमकता हुआ न हो कर कुछ काले रंग का था. किशनलाल ने बताया कि इसे रिफाइंड कर के छड़ें बनानी पड़ेंगी. तब उन सभी ने किशनलाल से कह दिया कि इस गोले को वह अपने साथ ले जाएं और छड़ें बना दें.

किशनलाल उस गोले को ले गया. 3 दिन बाद आ कर उस ने कहा, ‘‘मैं ने उस गोले से अभी एक छड़ बनाई है, जो साढ़े 12 लाख रुपए की बाजार में बिकी है. जैसेजैसे छड़ें बनती जाएंगी, मैं उन्हें बेच कर तुम लोगों को पैसे देता रहूंगा.’’

किशनलाल से मिले साढ़े 12 लाख रुपयों में से एक लाख रुपए महेंद्र ने सरजू पंडित को दे दिए, जिस की सूचना पर उन्होंने घटना को अंजाम दिया था. बाकी के पैसे उन्होंने आपस में बांट लिए. महेंद्र से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 9 जनवरी को मनीष शर्मा, मोहम्मद आरिफ, अरुण नागर उर्फ बौबी, जसपाल उर्फ रिंकू, रोशन गुप्ता और सरजू पंडित को उन के ठिकानों से गिरफ्तार कर लिया. उन की निशानदेही पर पुलिस ने 2 पिस्तौलें, 7 जीवित कारतूस, साढ़े 12 लाख रुपए नकद, 18 डायमंड रिंग्स, 2 जोड़ी डायमंड टौप्स और एक डायमंड पैंडेंट के अलावा अपाचे मोटरसाइकिल बरामद कर ली थी.

किशनलाल को जब पता चला कि पुलिस ने जसपाल व अन्य लोगों को पकड़ लिया है तो वह फरार हो गया. पुलिस ने उस के ठिकाने पर भी छापा मारा था, लेकिन वह नहीं मिला. सभी अभियुक्तों से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि 6 सितंबर, 2015 को दिल्ली के कमला मार्केट इलाके में भी उन्होंने एक कूरियर बौय से 39 लाख रुपए के गहने लूटे थे. इस के अलावा 2 जुलाई, 2015 को देशबंधु गुप्ता रोड पर ढाई लाख रुपए की नकदी लूटी थी.

इन 2 मामलों के खुलासे के बाद पुलिस को लगा कि इस गैंग ने राजधानी में और भी वारदातें की होंगी, इसलिए पुलिस ने 10 जनवरी, 2016 को इन सभी अभियुक्तों को तीसहजारी कोर्ट में ड्यूटी एमएम श्री आर.के. पांडेय के समक्ष पेश किया. उस समय उन्होंने सभी अभियुक्तों को एक दिन के लिए जेल भेज दिया. अगले दिन सभी अभियुक्तों को महानगर दंडाधिकारी अंबिका सिंह की कोर्ट में पेश किया, जहां से पुलिस ने उन्हें 7 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया था. Delhi Robbery Case

कथा लिखे जाने तक पुलिस सभी अभियुक्तों से पूछताछ कर रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Story Hindi: गलतफहमी ने बनाया दोस्त को दुश्मन

Crime Story Hindi: सजल और निश्चल गहरे दोस्त थे. निश्चल की प्रेमिका राखी ने उस से दूरियां बनानी शुरू कीं तो निश्चल को लगा कि उस की प्रेमिका को सजल ने ही उस के खिलाफ भड़काया है. इस गलतफहमी के चलते उस ने एक ऐसी खतरनाक योजना बनाई कि…

दोस्ती में आदमी एकदूसरे की आदतों, बातों और इरादों से अच्छी तरह परिचित हो जाता है. उस बीच दोनों एकदूसरे को काफी हद तक जान चुके होते हैं. दोस्ती की इसी पगडंडी पर चलते हुए शुरू किया गया प्यार का सफर लंबा चलता है. निश्चल ने भी राखी के साथ प्यार के खुशनुमा सफर की शुरुआत दोस्ती के बाद ही की थी. उन का प्यार इतनी गहराई तक पहुंच गया था कि उन्होंने ख्वाबों का एक महल भी बना लिया था, लेकिन एक दिन निश्चल को अचानक अपने ख्वाब तब टूटते नजर आए, जब राखी की बातों में अचानक बेरुखी की हवाएं तैरने लगीं.

पहले तो निश्चल ने प्रेमिका की बेरुखी को नजरंदाज करने की कोशिश की, लेकिन एक दिन तो हद हो गई. उस दिन उस ने आदतन राखी के मोबाइल पर फोन किया तो उस ने बड़ी बेरुखी से कहा, ‘‘कहो, किसलिए फोन किया है?’’

राखी के इस व्यवहार पर निश्चल पहले तो हैरान हुआ, फिर भी उस की बेरुखी को नजरअंदाज करते हुए बड़े प्यार से बोला, ‘‘कैसी बात कर रही हो, अपने प्यार से बात करने की भी कोई वजह होती है क्या. दिल ने याद किया तो मैं ने तुम्हारा नंबर मिला दिया.’’

‘‘वह तो ठीक है निश्चल, पर मैं चाहती हूं कि अब हमारा इस तरह ज्यादा बातें करना ठीक नहीं है.’’ राखी ने उसी लहजे में जवाब दिया.

राखी की इन बातों और व्यवहार से निश्चल का दिमाग घूम गया. उस ने कहा, ‘‘राखी, तुम्हें क्या हो गया है. तुम ये कैसी अजीब बातें कर रही हो?’’

‘‘मैं जो कह रही हूं, ठीक ही कह रही हूं. अब पता नहीं तुम्हें यह सब अजीब क्यों लग रहा है.’’ राखी तुनक कर बोली.

‘‘मैं एक बात कहूं राखी?’’ निश्चल ने कहा.

‘‘हां, कहो.’’

‘‘मैं पिछले 2-3 दिनों से महसूस कर रहा हूं कि तुम काफी बदल सी गई हो. बताओ मुझ से ऐसी क्या गलती हो गई है?’’ निश्चल ने माहौल सामान्य करने की गरज से कहा.

‘‘ऐसी तो कोई बात नहीं है निश्चल. फिर भी तुम्हें ऐसा लगता है तो मैं भला इस में क्या कर सकती हूं.’’ राखी ने निराश करने वाले अंदाज में कहा.

‘‘क्या तुम मेरे प्यार का इम्तिहान ले रही हो?’’ निश्चल ने पूछा.

‘‘मैं कौन होती हूं ऐसा करने वाली. वैसे भी मुझे अभी बहुत काम है. अब हम बाद में बात करेंगे. ओके बाय.’’ कहने के साथ ही राखी ने फोन काट दिया.

निश्चल यह सोचसोच कर परेशान था कि राखी को अचानक न जाने ऐसा क्या हो गया है, जो वह इस तरह का व्यवहार करने लगी है. उसी दौरान उस के दिमाग में आया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि राखी को उस की वे बातें पता चल गई हों, जो राज बनी रहनी चाहिए थीं. इस के बाद वह यह सोचने लगा कि राखी को ऐसी बातें भला कौन बताएगा? इस पर उस ने सोच के घोड़े दौड़ाए तो कुछ देर बाद गहरी सांस ले कर हलके से बुदबुदाया, ‘ओह, अब समझ में आया, सजल ने ही राखी को उस के बारे में बताया होगा.’

अपने इस खयाल की पुष्टि के लिए उस ने फिर से राखी का मोबाइल मिलाया तो राखी ने पूछा, ‘‘अब क्या हुआ, मैं ने कहा तो था कि बाद में बात करेंगे.’’

‘‘राखी, मुझे एक बात पूछनी थी.’’ निश्चल बोला.

‘‘बताओ क्या पूछना है?’’

‘‘मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या तुम्हारी सजल से कोई बात हुई थी?’’ निश्चल ने पूछा.

‘‘हां, हुई तो थी, लेकिन इस में बुरा क्या है. वह तुम्हारा अच्छा दोस्त है.’’ राखी ने कहा.

‘‘मुझे लगता है कि उसी ने मेरे बारे में तुम से कुछ उलटीसीधी बातें की हैं, तभी तुम बदल गई हो.’’ निश्चल ने अपने मन की बात कही.

‘‘सौरी निश्चल, मैं इस बारे में कोई कमेंट नहीं करना चाहती.’’

राखी बात को खींचना नहीं चाहती थी, इसलिए उस ने बात को यहीं विराम देना चाहा.

लेकिन निश्चल राखी से सच्चाई जानना चाहता था, इसलिए उस ने पूछा, ‘‘तो फिर इस बेरुखी की वजह क्या है, यह तो बता दो?’’

‘‘मैं कुछ नहीं बताना चाहती, बाय.’’ पीछा छुड़ाते हुए राखी ने अपनी बात खत्म कर दी.

निश्चल उस के इस रूखे और उपेक्षित व्यवहार से ठगा सा रह गया. निश्चल अरोड़ा उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर के कस्बा बेहट की संजय कालोनी निवासी रमेश अरोड़ा का बेटा था. राखी भी उसी कालोनी में रहती थी. कुछ महीने पहले ही दोनों के बीच दोस्ती के बाद प्यार हो गया था. दोनों अकसर मोबाइल पर लंबीलंबी बातें और चैटिंग किया करते थे. राखी के प्यार से निश्चल की जिंदगी में जैसे बहार आ गई थी. लेकिन राखी का अचानक बदला रुख उसे परेशान करने लगा था. उस का ही एक दोस्त था सजल चुघ.

25 वर्षीय सजल की कस्बे में ही छोटे चौक पर पुश्तैनी किराने की दुकान थी. वह एक प्रतिष्ठित परिवार से था. उस के पिता राजेंद्र चुघ दुकान संभालते थे, जबकि चाचा मुकेश चुघ व्यापारी नेता थे. सजल व निश्चल न सिर्फ गहरे दोस्त थे, बल्कि वे एकदूसरे के हमराज भी थे. इसी दोस्ती के नाते निश्चल ने उस का परिचय अपनी प्रेमिका राखी से करा दिया था. सजल निश्चल की गैरमौजूदगी में भी कभीकभी राखी से बातें कर लिया करता था. इसीलिए राखी के बदले रवैए के पीछे निश्चल यह मान बैठा था कि सजल ने ही उस के बारे में राखी से कोई ऐसी बात कह दी होगी, जिस से राखी उस से दूरियां बना रही है.

जिंदगी के बहुत मौकों पर इंसान गलतफहमियों का शिकार हो जाता है. गहरे दोस्त होने के नाते निश्चल को यूं तो अपने मन में पल रही गलतफहमियों को बातचीत के जरिए दूर कर लेना चाहिए था, लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया. वह दोस्ती में ऐसी बातें कर के खुद को छोटा साबित नहीं करना चाहता था. अलबत्ता वह मन ही मन सजल से नाराज रहने लगा था. इतना ही नहीं, उस ने उस के खिलाफ एक खतरनाक योजना तक बना डाली थी.

12 नवंबर, 2015 की रात को सजल दुकान बंद कर के घर आया और करीब सवा 8 बजे अपने दादा बाबूराम चुघ से घूमने जाने की बात कह कर घर से निकल गया. वह अकसर इसी तरह जाता था. लेकिन वह आधे घंटे बाद घर वापस आ जाता था, जब उस दिन 2 घंटे बाद भी वह वापस नहीं आया तो घर वालों ने उस के मोबाइल पर फोन किया. उस का फोन स्विच्ड औफ मिला. सजल के पास एक और मोबाइल फोन था. घर वालों ने उस फोन का नंबर मिलाया. उस पर घंटी तो जा रही थी, लेकिन वह फोन रिसीव नहीं कर रहा था. घर वालों ने 2-3 बार उस नंबर पर फोन किया. हर बार घंटी बजती रही, लेकिन फोन नहीं उठा.

इस के बाद घर के सभी लोग सजल को ढूंढ़ने निकल पड़े. लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. रात में कई बार उसे फोन किया गया, लेकिन उस ने एक भी फोन का जवाब नहीं दिया. उस की चिंता में घर वाले रात भर जागते रहे. अगली सुबह उस का दूसरा मोबाइल फोन भी स्विच्ड औफ हो गया. उस के इस तरह अचानक लापता होने का कारण किसी की समझ में नहीं आ रहा था. सजल के करीबी दोस्त निश्चल अरोड़ा और अनुज सक्सेना भी परेशान थे.

सभी लोगों को यही लग रहा था कि किसी ने फिरौती के लिए उस का अपहरण कर लिया है. जब कहीं से सजल के बारे में कुछ पता नहीं चला तो उस के पिता राजेंद्र चुघ अपने रिश्तेदारों के साथ थाना कोतवाली पहुंचे और थानाप्रभारी नरेश चौहान से मिल कर सजल की गुमशुदगी दर्ज करा दी. मामला एक प्रतिष्ठित व्यापारी के बेटे के लापता होने का था, इसलिए पुलिस भी इस मामले को ले कर चिंतित थी. उसी दिन पुलिस को सूचना मिली कि बेलका गांव के पास बेहट शाकुंभरी मार्ग पर ऋषिपाल के आम के बाग में एक युवक की लाश पड़ी है.

खबर मिलते ही नरेश चौहान पुलिस टीम के साथ उस बाग में पहुंच गए. वह लाश एक 24-25 साल के लड़के की थी. शव खून से लथपथ था. देख कर ही लगता था कि उस के सिर पर गोली चलाई गई थी. शव के नजदीक ही 2 मोबाइल पड़े थे. एक मोबाइल की बैटरी निकली हुई थी, जबकि दूसरा स्विच्ड औफ था. उसी दिन व्यापारी राजेंद्र चुघ ने अपने बेटे सजल की गुमशुदगी दर्ज कराई थी. उन्होंने उस का जो हुलिया बताया था, वह उस मृत युवक से मेल खा रहा था. यह लाश कहीं सजल की तो नहीं है, जानने के लिए थानाप्रभारी ने फोन कर के राजेंद्र चुघ को बाग में ही बुला लिया. राजेंद्र चुघ अपनी पत्नी के साथ वहां पहुंचे तो लाश देखते ही रो पड़े. उन की पत्नी को तो इतना सदमा पहुंचा कि वह बेहोश हो गईं.

राजेंद्र चुघ ने उस लाश की पहचान अपने बेटे सजल के रूप में की. उन्होंने बताया कि दोनों मोबाइल सजल के ही हैं. शव के पास लाल रंग की एक हवाई चप्पल पड़ी थी, जो मृतक की नहीं थी. पुलिस ने सोचा कि शायद यह हत्यारे की है. मामला हत्या का था, इसलिए सूचना पा कर एसपी चरण सिंह यादव, एसपी (देहात) जगदीश शर्मा भी वहां पहुंच गए थे. उन्होंने भी मौकामुआयना किया. शव के आसपास किसी वाहन के टायरों के निशान भी थे. सजल की हत्या से कस्बे में सनसनी फैल गई थी. हत्या के विरोध में कस्बे के बाजार बंद हो गए. सैकड़ों व्यापारी घटनास्थल पर जमा हो गए. सभी व्यापारी हत्यारों को जल्द गिरफ्तार करने की मांग कर रहे थे.

पुलिस ने व्यापारियों को समझाबुझा कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाया. एसएसपी राजेंद्र प्रसाद यादव ने नरेश चौहान को केस का जल्द से जल्द खुलासा करने को कहा. इस के अलावा उन्होंने क्राइम ब्रांच के तेजतर्रार इंसपेक्टर संजय पांडेय को भी इस केस की जांच में लगा दिया. पुलिस टीम हत्या की वजह तलाशने में जुट गई. पुलिस ने मृतक के घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने किसी से कोई रंजिश होने से इंकार कर दिया. एक बात साफ थी कि हत्यारे सजल के करीबी थे. क्योंकि इतनी दूर उन के साथ वह अपनी मरजी से ही गया था.

जवान बेटे की मौत से चुघ परिवार में कोहराम मचा था. पुलिस अच्छी तरह जानती थी कि अगर केस का खुलासा नहीं हुआ तो बड़ा बखेड़ा खड़ा होगा, इसलिए पुलिस हत्यारों की तलाश में लग गई. अगले दिन पुलिस को कुछ लोगों से पता चला कि 12 नवंबर की रात को उन्होंने सजल के साथ निश्चल और अनुज को जाते देखा था. इस खबर की पुष्टि के लिए पुलिस ने सजल के मोबाइल की लोकेशन के साथ निश्चल और अनुज के मोबाइल की लोकेशन निकलवाई.

तीनों के मोबाइल फोनों की लोकेशन साथसाथ पाई गई. शक पुख्ता होने पर नरेश चौहान ने निश्चल और अनुज को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. दोनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने सजल की हत्या में अपना हाथ होने से साफ इंकार कर दिया. लेकिन जब मोबाइल फोन की लोकेशन के आधार पर उन से पूछताछ की तो वे ज्यादा देर तक पुलिस को गुमराह नहीं कर सके. उन्हें सच बोलने पर मजबूर होना पड़ा. इस के बाद उन्होंने सजल की हत्या का चौंकाने वाला राज उगला. पता चला कि महज गलतफहमी में एक दोस्त दूसरे की जान का दुश्मन बन गया था.

दरअसल, निश्चल अपनी प्रेमिका राखी के व्यवहार में आए बदलाव की वजह नहीं समझ पाया था. इस बात को ले कर वह परेशान रहने लगा था. एक दिन उस ने राखी से जिद कर के पूछने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘राखी, तुम इतनी बदल क्यों गई हो?’’

‘‘निश्चल, ऐसा तुम्हें लगता है तो बताओ भला मैं क्या कर सकती हूं.’’ राखी ने टालने वाले अंदाज में कहा.

‘‘नहीं, कोई तो वजह है. वह वजह क्या है, आज तुम्हें बतानी ही होगी.’’ निश्चल ने दबाव डालते हुए पूछा.

‘‘कोई वजह नहीं है निश्चल. मैं तुम से और ज्यादा बात करना नहीं चाहती. इसलिए आगे से तुम इस बात का ध्यान रखना.’’ राखी ने दो टूक जवाब दिया.

राखी की यही बेरुखी उस पर बिजली बन कर गिरी थी. रहरह कर उस के दिमाग में यह बात आती रहती थी कि इस के पीछे सजल ही जिम्मेदार है. वही राखी को उस के खिलाफ भड़काने का काम कर रहा है.

बस, वह मन ही मन सजल से रंजिश रखने लगा. उसे यह गलतफहमी हो गई कि सजल राखी को भड़का कर उस की खुशियों को छीनने का काम कर रहा है. सजल को सबक सिखाने के लिए निश्चल ने एक खतरनाक योजना बना डाली. अपने दोस्त अनुज सक्सेना को भी उस ने अपनी इस योजना में शामिल कर लिया. यह योजना थी सजल की हत्या की. उस की हत्या के लिए उस ने एक तमंचे और कुल्हाड़ी का भी इंतजाम कर लिया. वह सजल से लगातार मिलता रहा और अपने इरादों को बिलकुल भी जाहिर नहीं होने दिया. वैसे भी जब कोई अजीज दोस्त हो तो उस के इरादों को भांपना मुश्किल हो जाता है. सजल भी दोस्ती के विश्वास में निश्चल के इरादों से पूरी तरह अंजान था.

12 नवंबर, 2015 की रात सजल घर से घूमने के लिए निकला तो उसे रास्ते में निश्चल व अनुज मिल गए. निश्चल चूंकि जानता था कि सजल रात में घूमने के लिए घर से रोजाना निकलता है, इसलिए पहले से ही वह अपनी आल्टो कार संख्या यूपी 16 एक्स-1015 लिए रास्ते में खड़ा था. निश्चल और अनुज के इस तरह मिलने पर सजल को हैरानी नहीं हुई. कुछ देर में घूम कर आने की बात कह कर उन्होंने सजल को अपनी कार में बैठा लिया. सजल को अपने दोस्तों पर जरा भी शक नहीं हुआ. वे कार से ऋषिपाल के आम के बाग में पहुंच गए. उस वक्त वहां बिलकुल सुनसान था.

अनुज ने सजल को बातों में लगा लिया तो उसे बीच निश्चल ने तमंचा निकाल कर उस के सिर को टारगेट कर के गोली चला दी. गोली लगते ही सजल नीचे गिर गया और उस की मौत हो गई. अनुज ने भी तमंचा ले कर एक गोली और उस पर चलाई. सजल की हत्या करने के बाद उन्होंने सजल के दोनों मोबाइल फोन उस की जेब से निकाल कर वहीं फेंक दिए. फेंकते समय ही एक मोबाइल की बैटरी निकल गई थी. सजल की हत्या कर के वे जल्दी से वहां से भागे, जिस से निश्चल की एक चप्पल वहीं छूट गई थी. घटनास्थल से कुछ दूर जा कर उन्होंने एक खेत में तमंचा व कुल्हाड़ी छिपा दी और अपनेअपने घर चले गए.

अगली सुबह तक सजल के लापता होने की खबर फैल चुकी थी. चूंकि वे उस के गहरे दोस्त थे, इसलिए सजल को ढुंढवाने का उन्होंने भी बराबर नाटक किया. सजल का शव मिलने पर वे भी घटनास्थल पर पहुंचे. दोनों ने सोचा था कि उन्हें सजल के साथ जाते हुए किसी ने नहीं देखा. लेकिन गांव के ही किसी व्यक्ति ने उन्हें सजल के साथ जाते देख लिया था. उसी के आधार पर वे पुलिस की गिरफ्त में आ गए. एसपी देहात जगदीश शर्मा और सीओ चरण सिंह भी थाने आ गए थे. पुलिस ने तमाम लोगों की मौजूदगी में हत्याकांड का खुलासा किया.

जब कस्बे के लोगों को पता चला कि सजल की हत्या किसी और ने नहीं, उस के खास दोस्तों ने की थी तो सब हैरान रह गए. पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर खेत से हत्या में प्रयुक्त 315 बोर का तमंचा, खाली कारतूस और एक कुल्हाड़ी बरामद कर ली थी. हत्या में प्रयुक्त की गई कार भी पुलिस ने बरामद कर ली थी. विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने दोनों अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानतें नहीं हो सकी थी.

निश्चल ने गलतफहमी को दिल से नहीं लगाया होता और सजल दोस्त के इरादों को भांप गया होता तो शायद ऐसी नौबत नहीं आती. न सजल दुनिया से जाता और न उस के दोस्त जेल जाते. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, राखी बदला हुआ नाम है.

Love Story: जी नहीं पाए प्यार करने वाले

Love Story: नरेश और भारती शादी कर के एकदूसरे के साथ जिंदगी बिताना चाहते थे. लेकिन जाति ने उन का यह सपना ही नहीं चकनाचूर किया, जिंदगी ही लील ली.

आगरा का एक छोटा सा गांव है नगला लालजीत, जिस की आबादी मुश्किल से 5 सौ होगी. इस में कुशवाहा ज्यादा हैं, जबकि ठाकुरों के सिर्फ 4 घर हैं. इन में एक घर है हुकुम सिंह का. उन के परिवार में पत्नी शांति के अलावा 5 बेटे और एक बेटी थी. उन का सब से छोटा बेटा था नरेश, जो किसी मोबाइल कंपनी में सेल्समैन था. इसी गांव का रहने वाला गिरिराज कुशवाहा शादीब्याह में खाना बनाने का ठेका लेता था. उस के परिवार में पत्नी जलदेवी के अलावा 3 बेटियां सीमा, रोशनी, भारती और 2 बेटे देवेश तथा योगेश थे.

सीमा की शादी उस ने देवी रोड निवासी शैलेंद्र के साथ की थी तो उस से छोटी रोशनी की शादी आगरा के रहने वाले बंटू से. तीसरी बेटी भारती का अभी विवाह नहीं हुआ था. यह कहानी गिरिराज की इसी तीसरी बेटी भारती की है. एक साल पहले तक हुकुम सिंह और गिरिराज कुशवाहा सुखशांति से रह रहे थे. उन के घरों के बीच ज्यादा दूरी नहीं थी. छोटा सा गांव है, इसलिए गांव का हर कोई एकदूसरे को जानता ही नहीं था, बल्कि सभी रिश्ते की डोर से बंधे थे, चाहे वह किसी भी जाति के हों.

भारती मात्र आठवीं तक पढ़ी थी, क्योंकि इस से आगे वह न पढ़ना चाहती थी और न ही गिरिराज उसे पढ़ाना चाहता था. लेकिन एक पढ़ाई वह मांबाप से छिपछिप कर जरूर पढ़ रही थी. और वह थी इश्क की. इस पढ़ाई में उस के साथ था हुकुम सिंह का सब से छोटा बेटा नरेश. किसी दिन नरेश और भारती की नजरें टकराईं तो उन के दिलों की धड़कनें बढ़ गईं. दोनों अलगअलग जाति के थे, लेकिन इश्क करने वाले कहां इस की परवाह करते हैं. प्यार दोनों को करीब ले आया और वे लुकछिप कर मिलने लगे.

उन्हें मिलने में परेशानी भी नहीं होती थी, क्योंकि आजकल लगभग सभी के पास मोबाइल फोन है ही. यही मोबाइल फोन उन की भी मिलने में मदद कर रहा था. उन्हें जब मिलना होता, फोन कर के समय और जगह तय करते, उस के बाद तय समय और जगह पर मिल लेते. भारती और नरेश प्यार ही नहीं कर बैठे, साथ जीने और मरने की कसमें भी खा लीं, लेकिन उन की जाति अलगअलग थी, इसलिए उन्हें पता था कि उन का यह सपना आसानी से पूरा नहीं होगा. इसलिए कभीकभी भारती नरेश से पूछती भी थी कि समाज के डर से कहीं वह उसे छोड़ तो नहीं देगा?

तब नरेश कहता, ‘‘भारती, मैं अपने घर वालों को छोड़ सकता हूं, पर तुम्हें नहीं छोड़ सकता.’’

नरेश भले ही भारती को हर तरह से साथ देने का आश्वासन देता था, पर वह जानता था कि यह सब इतना आसान नहीं है. गांव में, वह भी दूसरे जाति की लड़की से शादी करना बहुत ही मुश्किल काम है. लेकिन उस का प्यार दीवानगी की हद तक पहुंच चुका था, इसलिए उस की अच्छाबुरा सोचने की समझ ही खत्म हो चुकी थी. न उसे घरपरिवार दिखाई दे रहा था और न समाज. उसे परिणाम की भी चिंता नहीं थी. नरेश और भारती भले ही लुकछिप कर मिल रहे थे, लेकिन उन का यह प्यार गांव वालों की नजरों से छिपा नहीं रह सका. फिर एक दिन वही हुआ, जिस का डर था. भारती फोन पर नरेश से बातें कर रही थी, तभी गिरिराज ने उस की कुछ बातें सुन लीं. उस ने पूछा, ‘‘किस से बातें कर रही है?’’

जवाब में भारती कुछ कहती, गिरिराज ने उस के हाथ से मोबाइल छीन लिया. उस में नरेश की फोटो लगी देख कर उस ने अपना सिर पीट लिया. उसे समझते देर नहीं लगी कि बेटी आशिकी में फंस गई है.

‘‘यह सब क्या है?’’ गिरिराज ने फोटो दिखाते हुए पूछा, ‘‘तू नरेश से क्यों बातें करती है?’’

भारती अंजान बनते हुए बोली, ‘‘पापा मैं तो अपनी सहेली से बातें कर रही थी, कभीकभी नेटवर्क की गड़बड़ी की वजह से किसी दूसरे को फोन ही नहीं लग जाता, बल्कि उस का फोटो भी आ जाता है.’’

गिरिराज इतना बेवकूफ नहीं था, जितना भारती समझ रही थी. उस ने पूछा, ‘‘पहले तो यह बता, नरेश का नंबर तेरे मोबाइल में कैसे आया?’’

‘‘पड़ोसी है, अब पड़ोसी का नंबर मोबाइल में नहीं आएगा तो क्या दूसरे गांव वालों का आएगा?’’ भारती रुआंसी हो कर बोली.

गिरिराज को लगा कि वह बेटी के साथ ज्यादती कर रहा है. जब मोबाइल है तो उस में नंबर तो होंगे ही. रही बात नरेश की तो वह गांव का ही नहीं है, पड़ोसी भी है. मोबाइल का काम भी करता है. इसलिए उस का नंबर भारती के पास है तो बुरा क्या है. वह चुप हो गया. गिरिराज भले ही चुप हो गया, लेकिन भारती कहां चुप होने वाली थी. वह उसी दिन नरेश से मिली और पूरी बात बता कर बोली, ‘‘आज तो किसी तरह बच गई, लेकिन इस तरह कब तक चलेगा. जो कुछ भी करना है, जल्दी करो.’’

नरेश ने कहा, ‘‘पहले तो हम घर वालों से कहेंगे कि वे हमारी शादी कर दें. नहीं करेंगे तो मैं तुम्हें ले कर कहीं दूर चला जाऊंगा, जहां घर वाले पहुंच ही नहीं पाएंगे.’’

भारती को नरेश पर पूरा विश्वास था, वह उस से अलग होना भी नहीं चाहती थी, इसलिए वह उस के साथ भागने को तैयार थी. लेकिन जब एक दिन गिरिराज ने बेटी को नरेश के साथ देख लिया तो उसे ममझते देर नहीं लगी कि बेटी ने उस से झूठ बोला था. उस ने पत्नी से कहा, ‘‘भारती पर नजर रखो, उस का घर से बाहर निकलना बंद कर दो, वरना यह हमारी नाक कटवाने वाली है.’’

इस के बाद भारती पर नजरों के पहरे लग गए. उस का बाहर आनाजाना बंद कर दिया गया.

यही नहीं, सोचविचार कर गिरिराज ने बड़े दामाद शैलेंद्र को फोन कर के बुलाया और पूरी बात बता दी. इस पर शैलेंद्र ने कहा, ‘‘आप नरेश के पिता से मिलें और उन से कहें कि वह बेटे को समझाएं.’’

गिरिराज ने हुकुम सिंह से शिकायत की तो उन्होंने नरेश को समझाने का आश्वासन ही नहीं दिया, बल्कि समझाया भी. लेकिन नरेश को तो जैसे ऐसे ही मौके की तलाश थी. उस ने कहा, ‘‘पापा, मैं भारती से प्यार करता हूं और उस से शादी करना चाहता हूं.’’

‘‘तुम्हारा दिमाग तो ठीक है,’’ हुकुम सिंह ने उसे डांटा, ‘‘ऐसा कतई नहीं हो सकता. एक तो वह गांव की है, दूसरे दूसरी जाति की है. तुम जानते हो गांव में ठाकुरों के सिर्फ 4 ही घर हैं. कुशवाहा ज्यादा हैं. अगर कुछ उल्टासीधा किया तो इस का खामियाजा पूरे परिवार को भुगतना पड़ेगा.’’

बाप की इस बात से नरेश की समझ में आ गया कि भारती को भगा कर ले जाना ठीक नहीं है. क्योंकि अगर वह उसे भगा कर ले गया तो गांव के कुशवाहा उस के घर वालों का जीना हराम कर देंगे. अब उसे गांव में ही रह कर अपने और भारती के घर वालों को मनाना होगा. नरेश ने गिरिराज को संदेश भिजवाया कि वह भारती से प्यार करता है और शादी करना चाहता है. वह वादा करता है कि भारती को खुश रखेगा. लेकिन जब यह संदेश गिरिराज को मिला तो वह उबल पड़ा. उस ने नरेश को तो कुछ नहीं कहा, लेकिन भारती की जम कर पिटाई कर दी. उस का कहना था कि उसी की वजह से आज उसे यह दिन देखना पड़ा है.

भारती की बहनों और बहनोइयों ने भी उसे समझाया. लेकिन उस ने साफ कह दिया कि वह शादी करेगी तो नरेश से, वरना पूरी जिंदगी कुंवारी रहेगी. हुकुम सिंह और उन की पत्नी शांति भी नरेश को समझा रहे थे कि वह ऐसा कोई काम न करे, जिस से परिवार को परेशानी हो. इस आशिकी की वजह से दोनों परिवारों में काफी तनाव था. गांव भी इस आशिकी से अंजान नहीं था. गिरिराज ने बदनामी से बचने के लिए दिसंबर के पहले सप्ताह में गांव की पंचायत बुलाई. पंचायत में दोनों ही बिरादरी के लोग शामिल थे. सभी इस शादी के खिलाफ थे, इसलिए सभी ने नरेश और भारती को समझाया कि वे ऐसा न करें. उन के ऐसा करने से गांव की बदनामी तो होगी ही, आने वाली पीढ़ी पर भी इस का बुरा असर पड़ेगा.

लेकिन नरेश और भारती उन की बातों से सहमत नहीं थे. उन का कहना था कि वे नए जमाने के लोग हैं. वे अपनी खुशी देखते हैं, परंपरा नहीं. इस पर बुजुर्गों ने उन्हें डांट कर चुप करा दिया और कहा कि वे जो चाहते हैं, वैसा कतई संभव नहीं है.

‘‘तो फिर ठीक है, आप सभी हमें हमारे हाल पर छोड़ दीजिए. हम अपनीअपनी दुनिया में एकदूसरे की यादों के सहारे जी लेंगे.’’ भारती ने कहा.

इस पर कुशवाहा नाराज हो गए. उन का कहना था कि बेटी को अविवाहित कैसे रखा जा सकता है. लेकिन भारती का बागी सुर मुखर हो उठा, ‘‘कुछ भी हो, मैं नरेश के अलावा किसी और से शादी नहीं कर सकती.’’

दोनों की जिद को देखते हुए पंचायत ने फैसला किया कि इन्हें गांव से बाहर रिश्तेदारियों में भेज दिया जाए. गिरिराज को लगा कि बेटी ने उस का सिर झुका दिया है, इसलिए उस ने पंचायत के सामने कहा, ‘‘अगर ऐसा कुछ हुआ तो वह दोनों को काट कर रख देगा.’’

ठाकुरों ने कोई जवाब नहीं दिया. उन का सोचना था कि कुछ दिन दोनों अलग रहेंगे तो सब ठीक हो जाएगा. उस समय यह किसी ने नहीं सोचा था कि गिरिराज ने जो कहा है, वह सचमुच ही वैसा कर डालेगा.

जो छिपा था, इस पंचायत के बाद पूरी तरह खुल गया. नरेश और भारती जो अब तक लुकछिप कर मिलते थे, वे खुलेआम मिलने लगे. शांति को बेटे की जान खतरे में लगी तो उस ने उसे बेटी के पास दिल्ली भेज दिया. लेकिन पंचायत में जो हुआ था, उस से गिरिराज को लग रहा था कि उस की मूंछें नीची हो गई हैं. मूंछें उठाने के लिए उसे कुछ करना ही होगा. उस ने अपनी जाति के कुछ लोगों से बात की तो उन्होंने कहा कि बेटी को खत्म कर दो, सारा झंझट खत्म हो जाएगा. इज्जत भी बच जाएगी.

गिरिराज ने भारती को खत्म करने का इरादा तो बना लिया, लेकिन उसे लगा कि भारती की हत्या पर नरेश चुप नहीं बैठेगा. क्योंकि वह उसे जान से ज्यादा प्यार करता है. भारती की मौत का संदेह होते ही वह पुलिस के पास पहुंच जाएगा. जब इस बात पर गहराई से विचार किया गया तो उस के बड़े दामाद शैलेंद्र ने कहा, ‘‘दोनों को खत्म कर देते हैं. किसी ठाकुर में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह पुलिस के पास जा कर शिकायत करेगा.’’

दामाद की बात गिरिराज को भी उचित लगी. लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था. गांव में कत्ल करने पर वे पकड़े जा सकते थे. इसलिए योजना बनी कि कहीं दूर ले जा कर दोनों को मारा जाए. इस के लिए भारती को विश्वास में लेना जरूरी था. घर वालों ने कोशिश भी शुरू कर दी. लेकिन भारती को विश्वास नहीं हो रहा था. उसे विश्वास तब हुआ, जब जलदेवी उस के लिए शादी का जोड़ा खरीद कर ले आई. इस के बाद भारती को लगा कि उस के घर वाले सचमुच शादी को तैयार हैं.

मां ने ही नहीं, पिता ने भी कहा, ‘‘हमारी समझ में आ गया है कि तू सचमुच नरेश को बहुत प्यार करती है. फिर इस में बुराई ही क्या है. नरेश है भी तो ऊंची जाति का. मुझे पहले लगता था कि वह धोखा दे देगा. लेकिन अब हमें उस पर भी विश्वास हो गया है. वह तुझ से शादी कर के तुझे सुखी रखेगा.’’

भारती को पिता की बातों पर विश्वास तो नहीं हो रहा था, लेकिन उसे उस की बातों में कोई साजिश भी नजर नहीं आ रही थी. वह कुछ नहीं बोली तो गिरिराज ने कहा, ‘‘गांव में तो हम तेरी शादी करा नहीं सकते, क्योंकि गांव वाले यह शादी कतई नहीं होने देंगे. तू ऐसा कर, नरेश को प्रिंस के ढाबे पर बुला ले. हम उसे ले कर ग्वालियर के किसी मंदिर चलते हैं और वहीं तुम दोनों की शादी करा देते हैं. नगला लालजीत गांव ग्वालियर के लिए जाने वाले हाईवे के किनारे बसा है. भारती जानती थी कि गांव वाले उस की शादी का विरोध कर रहे हैं. इसीलिए मम्मीपापा उस की शादी गांव से बाहर किसी मंदिर में करना चाहते हैं. उस ने नरेश को फोन कर के सारी बात बताई तो वह बहुत खुश हुआ.

किसी को कुछ बताए बगैर वह उसी रात प्रिंस के ढाबे पर पहुंच गया. गिरिराज पत्नी और भारती के साथ वहां पहले से मौजूद था. उस ने उसे गाड़ी में बैठाया और चल पड़ा. भारती और नरेश पिछली सीट पर एक साथ बैठे थे. वे सुनहरे भविष्य की कल्पनाओं में इस तरह खोए थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब गाड़ी मौजपुरा के जंगल में पहुंच गई. वहां पहुंचते ही नरेश समझ गया कि ये लोग उस की शादी कराने नहीं, उन्हें मारने लाए हैं. क्योंकि पीछे से भारती का बहनोई शैलेंद्र मोटरसाइकिल से भी वहां पहुंच गया था. नरेश तो कुछ नहीं बोला, लेकिन भारती फट पड़ी, ‘‘तुम लोग इतने बड़े धोखेबाज निकलोगे, मैं ने सोचा भी नहीं था. इस से अच्छा तो तुम लोगों ने पैदा होते ही मेरा गला घोंट दिया होता. ’’

नरेश और भारती ने जिंदगी के लिए संघर्ष तो बहुत किया, लेकिन उन लोगों ने नरेश को उस के मफलर तथा भारती को उस की शाल से गला घोंट कर मार दिया. दोनों लाशें वहीं छोड़ कर सभी लौट आए. भारती के पास शिनाख्त लायक वैसे भी कुछ नहीं था, नरेशजेबों से भी सब कुछ निकाल लिया गया था. सभी यह सोच कर निश्चिंत थे कि पुलिस उन तक पहुंच नहीं पाएगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

अगले दिन राजस्थान के जिला धौलपुर के थाना मनियां के थानाप्रभारी रतन सिंह को जंगल में 2 लाशें पड़ी होने की सूचना मिली तो सहयोगियों के साथ वह वहां पहुंच गए. उन्होंने शिनाख्त के लिए दोनों लाशों की तलाशी ली तो लड़की के पास से तो कुछ नहीं मिला, लेकिन लड़के की जेब से परिचय पत्र मिल गया, जिस से पता चला कि वह आगरा के गांव नगला लालजीत का रहने वाला है. लाशों पर चोटों के निशान के अलावा लड़के के गले पर मफलर और लड़की के गले पर शाल कसा हुआ था. इस से पुलिस को लगा कि इन्हें गला घोंट कर मारा गया है. हमउम्र लड़कालड़की की लाशें होने की वजह से यह भी अंदाजा लगाया गया कि यह प्रेमी जोड़ा रहा होगा और घर वालों ने ही इन की हत्याएं की हैं.

राजस्थान पुलिस लाशों की खबर ले कर नगला लालजीत स्थित हुकुम सिंह के घर पहुंची तो हड़कंप मच गया. वहीं पूछताछ में पता चला कि दूसरी लाश गांव के गिरिराज कुशवाहा की बेटी भारती की थी. गांव में तो किसी ने कुछ नहीं बताया, लेकिन जब हाईवे पर बने टोल प्लाजा पर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज चेक की गई तो उस में गिरिराज और जलदेवी के साथ गाड़ी में बैठे नरेश और भारती दिख गए. इसी के आधार पर थाना मनियां पुलिस ने पतिपत्नी को हिरासत में ले लिया. पोस्टमार्टम के बाद दोनों लाशें घर वालों को सौंप दी गई थीं. गांव ला कर उन का अंतिम संस्कार कर दिया गया था.

थाने ला कर गिरिराज और जलदेवी से पूछताछ शुरू हुई. वे कोई पेशेवर अपराधी तो थे नहीं, जल्दी ही उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पुलिस जानती थी कि केवल ये दोनों नरेश और भारती की हत्या नहीं कर सकते. इस के बाद पुलिस ने उन से शैलेंद्र का भी नाम उगलवा लिया. लेकिन शैलेंद्र डर के मारे फरार हो चुका था. पुलिस ने गिरिराज की निशानदेही पर नरेश का सामान, वह गाड़ी, जिस से भारती और नरेश को ले जाया गया था, बरामद कर ली थी. इस के बाद दोनों को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया था.

कथा लिखे जाने तक शैलेंद्र को भी गिरफ्तार कर के पुलिस ने जेल भेज दिया था. सभी जेल में बंद थे, किसी भी अभियुक्त की जमानत नहीं हुई थी. Love Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Dhradun Crime: मौत का नजराना

Dhradun Crime: शादीशुदा गुरप्रीत कौर मकान मालिक के निठल्ले और आवारा बेटे आशीष के पे्रेमजाल में फंस गई. उस के खर्चे पर वह ऐश करने लगा और धीरेधीरे 2 लाख रुपए ले लिए. ऐसे बेमेल, गलत और स्वार्थी रिश्तों का आखिर क्या अंजाम हुआ?

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के आर्मी एरिया को पार कर के प्रेमनगर से एक किलोमीटर दूर ग्रामीण क्षेत्र शुरू हो जाता है. यहां चाय के बाग भी हैं और अन्य फसलें भी होती हैं. 5 फरवरी, 2016 की शाम सड़क के ठीक किनारे स्थित एक चाय के बाग में पुलिसकर्मियों और आम लोगों की भीड़ लगी थी.  वजह, किसी ने एक खूबसूरत महिला की बेरहमी से हत्या कर दी थी. वहां खून से लथपथ जिस महिला की लाश मिली, वह लाल रंग की जैकेट पहने थी. मृतका की उम्र करीब 35 साल थी और हत्यारे ने किसी तेज धार वाले हथियार से उस की गर्दन पर वार कर के उस की सांसों की डोर काट दी थी.

प्राथमिक जांचपड़ताल में पुलिस महिला की लाश के इर्दगिर्द ऐसे सबूतों को ढूंढ रही थी, जिस के सहारे कातिल तक पहुंचा जा सके. इसी सिलसिले में पुलिस महिला की जेबों की तलाशी भी ले चुकी थी, लेकिन कुछ नहीं मिला था. अलबत्ता पुलिस को वहां पड़ा एक लेडीज हेलमेट जरूर मिला था. संभवत: वह मृतका का ही था.

दरअसल, करीब 7 बजे किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम को वहां लाश पड़ी होने की खबर दी थी. कंट्रोल रूम से सूचना फ्लैश होने के बाद पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया और क्षेत्र के थाना प्रेमनगर के थानाप्रभारी यशपाल सिंह बिष्ट मय पुलिस बल के अविलंब वहां पहुंच गए. मामला सनसनीखेज था, इस तरह से किसी महिला की हत्या हो जाना कोई मामूली बात नहीं थी. इस की सूचना आला अधिकारियों को दी गई तो एसएसपी डा. सदानंद दाते, एसपी (सिटी) अजय सिंह, एएसपी मंजूनाथ व सीओ (सिटी) मनोज कत्याल समेत कई थानों की पुलिस घटनास्थल पर आ पहुंची. पुलिस ने घटनास्थल का बारीकी से मुआयना किया, लेकिन मौके पर कातिल तक पहुंचने लायक कोई सुराग नहीं मिल सका.

आसपास भी पुलिस ने तलाश की, लेकिन हत्या में इस्तेमाल किया गया हथियार वहां नहीं मिला. पुलिस ने मौके पर मौजूद लोगों से पूछा कि किसी ने हत्या करने वाले को तो नहीं देखा. लेकिन ऐसा कोई चश्मदीद नहीं नहीं था. अलबत्ता एक युवक ने इतना जरूर बताया कि उस ने स्कूटी वाले एक आदमी को वहां से भागते जरूर देखा था. पुलिस ने युवक से पूछताछ की. उस के अनुसार, वह टहलने के लिए निकला था. तभी उस ने किसी महिला के चीखने की आवाज सुनी. पहले उसे लगा कि महिला पर जंगली जानवर ने हमला किया है. लेकिन जब उस ने इस ओर स्कूटी स्टार्ट होने की आवाज सुनी तो वह यहां आया.

जब तक वह वहां पहुंचा, तब तक स्कूटी सवार वहां से जा चुका था. चूंकि रात का धुंधलका होने लगा था, इसलिए वह स्कूटी सवार को देख नहीं सका. इस के बाद उस ने 100 नंबर पर फोन कर दिया था. कुछ लोगों ने बताया कि उन्होंने एक युवकयुवती को स्कूटी से उस तरफ आते देखा था. मामला सीधे हत्या का था. पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्यारा किसी बहाने महिला को अपने साथ यहां लाया होगा और फिर चालाकी से उस की हत्या कर के भाग गया होगा. घटनास्थल से बरामद हुआ हेलमेट चूंकि लेडीज था, इस से यह संभावना अधिक थी कि स्कूटी मृतका की ही रही होगी, साथ ही यह भी कि हत्यारा उस का कोई खास जानकार रहा होगा, इसीलिए वह उस क्षेत्र में उस के साथ आई होगी.

इस बात की संभावना कतई नहीं थी कि महिला की स्कूटी लूटने के लिए उस की हत्या की गई होगी. अमूमन चोरी और लूट के लिए इस तरह हत्या के मामले पेश नहीं आते. निस्संदेह हत्यारे ने पूरी प्लानिंग के साथ वारदात को अंजाम दिया था. घटना के अंदाज से ऐसा लगता था कि हत्यारे के दिल में मृतका के प्रति गहरी नफरत थी.

हत्यारा चूंकि स्कूटी ले कर भागा था, इसलिए पूरे जिले में संदिग्ध व्यक्ति की तलाश में नाकेबंदी कर के अभियान चलाने के निर्देश दे दिए गए. हत्या के इस मामले में जांच आगे बढ़ाने के लिए मृतका की शिनाख्त जरूरी थी. पुलिस ने उस के चेहरे के फोटो कराए और पूरे उत्तराखंड की पुलिस को व्हाट्सएप ग्रुप में भेज दिए. इस के साथ ही मृतका की लाश का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

रात को करीब 9 बजे चैकिंग के दौरान पुलिस को शहर के सावलांकला क्षेत्र में एक स्कूटी लावारिस खड़ी मिली. पुलिस ने स्कूटी की डिग्गी खुलवा कर उस की तलाशी ली तो उस में से एक मोबाइल फोन मिला. इसी दौरान पर्वतीय क्षेत्र उत्तरकाशी में तैनात सबइंसपेक्टर कुलदीप पंत ने प्रेमनगर पुलिस को बताया कि शिनाख्त के लिए जिस महिला का फोटो वायरल हुआ है, कुछ समय पहले वह एक महिला के केस की पैरवी के सिलसिले में कोर्ट आती थी. उस का पूरा पता तो वह नहीं जानते, लेकिन इतना पता है कि वह रेसकोर्स इलाके में कहीं रहती थी. कुलदीप चूंकि वर्ष 2013 में देहरादून शहर की लक्खीबाग पुलिस चौकी के इंचार्ज रहे थे, इसलिए उन्हें यह जानकारी थी.

मोबाइल मिलने से पुलिस के लिए मृतका की शिनाख्त की राह आसान हो गई थी. पुलिस ने स्कूटी से बरामद मोबाइल को अनलौक करा कर उस का सिम नंबर हासिल करने के साथ कंपनी से पता किया कि वह किस के नाम था. पता चला कि वह नंबर गुरप्रीत कौर के नाम रजिस्टर्ड था. उस का पता सरकुलर रोड स्थित रैस्ट कैंप कालोनी था. पुलिस अविलंब उस पते पर पहुंची तो जानकारी मिली कि वह वहां अपने पति गुरमीत सिंह के साथ किराए पर रहती थी. वहां से थोड़ी दूर स्थित त्यागी रोड पर उस के मायके वाले रहते थे. पुलिस ने वहां जा कर बरामद शव की फोटो दिखाई तो उन्होंने गुरप्रीत की पहचान अपनी बेटी के रूप में कर दी.

इस के बाद पुलिस ने उस के भाई जगजीत की तरफ से रात पौने 12 बजे भादंवि की धारा 302 के तहत हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. इस केस की विवेचना थानाप्रभारी यशपाल सिंह के सुपुर्द कर दी गई. अब सब से बड़ा सवाल यह था कि गुरप्रीत की हत्या क्यों और किस ने की थी? एसएसपी डा. सदानंद दाते ने इस मामले में अपने अधीनस्थों को त्वरित काररवाई कर के केस का खुलासा करने के निर्देश दिए. हत्या के खुलासे के लिए एसपी (सिटी) अजय सिंह के निर्देशन में एक पुलिस टीम गठित कर दी गई, जिस में विवेचनाधिकारी के अलावा एसओजी इंचार्ज अशोक राठौड़, एआई धनराज सिंह, कैंट थानाप्रभारी राजेश शाह, पटेलनगर थानाप्रभारी बी.डी. उनियाल, बसंत विहार थानाप्रभारी अब्दुल कलाम व शहर कोतवाली प्रभारी एस.एस. बिष्ट आदि को शामिल किया गया.

अगले दिन यानी 6 फरवरी को पुलिस ने गुरप्रीत के नंबर की काल डिटेल्स हासिल की तो उस में अंतिम नंबर एक युवक का निकला. उस युवक का नाम आशीष उर्फ मोनू था. 27 वर्षीय आशीष रेसकोर्स इलाके के त्यागी रोड पर रहता था. उसे संदेह के दायरे में रख कर पुलिस ने तुरंत उस के घर दविश दी तो पता चला कि वह घर से बिना बताए शाम से ही गायब था. घर वालों से भी उस का संपर्क नहीं हुआ था. वहां काम की एक बात यह पता चली कि गुरप्रीत कौर पहले उस के यहां बतौर किराएदार रही थी, लेकिन कुछ महीने पहले उस ने मकान बदल दिया था.

इस से पुलिस का शक और भी बढ़ गया. पुलिस को यह मामला प्रेमप्रसंग का लगा. आगे की जांच में पुलिस को कुछ और भी अहम बातें पता चलीं, जो इसी ओर इशारा कर रही थीं. पुलिस आशीष की तलाश में जुट गई. इस के लिए इलैक्ट्रौनिक सर्विलांस का भी सहारा लिया गया. इस से पता चला कि उस की न सिर्फ गुरप्रीत से बातें हुई थीं, बल्कि घटना के समय उस की लोकेशन भी गुरप्रीत के साथ थी. जांच आगे बढ़ी तो आशीष की लोकेशन देहरादून से करीब 28 किलोमीटर दूर मसूरी में मिलनी शुरू हुई. यह पता चलते ही एक पुलिस टीम मसूरी के लिए रवाना कर दी गई. तब तक शाम हो चुकी थी.

लोकेशन को ट्रैस करते हुए पुलिस कुल्हाड़ी चौकी स्थित होटल राज पैलेस पहुंची. पुलिस ने होटल का रजिस्टर चैक किया तो पता चला कि आशीष होटल के कमरा नंबर 7 में ठहरा हुआ है. पुलिस ने दरवाजा खुलवाया तो दरवाजा आशीष ने ही खोला. उस पर नजर पड़ते ही पुलिस चौंकी, क्योंकि उस की बाईं कलाई कटी हुई थी. खून बहने से वह लड़खडड़ा रहा था. आननफानन में पुलिस उसे वहां के सेंटमैररी अस्पताल ले गई. पुलिस टीम को कतई उम्मीद नहीं थी कि वह इस हाल में मिलेगा. प्राथमिक उपचार के बाद पुलिस ने उसे देहरादून ला कर सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया.

अब उस की हालत खतरे से बाहर थी. पुलिस ने औपचारिक पूछताछ के बाद उसे आराम करने दिया. अगली सुबह पुलिस ने आशीष से पूछताछ की तो प्यार, लालच, बेवफाई और नफरत में उलझी बेमेल मोहब्बत की एक चौंकाने वाली कहानी सामने आई. दरअसल, गुरप्रीत का परिवार देहरादून में ही रैस्टकैंप में रहता था. 10 साल पहले घर वालों ने उस का विवाह गुरमीत सिंह से कर दिया था. शादी के बाद गुरप्रीत एक बेटे की मां बनी. गुरमीत का औटो स्पेयर पार्ट्स का बिजनैस था. पतिपत्नी त्यागी रोड स्थित रेलवे कर्मचारी सुबोध कुमार के मकान में किराए पर रहते थे.

सुबोध के 3 बेटे थे, अविनाश, आशीष और अंकुश. पौलिटैक्निक का डिप्लोमा करने के बाद पढ़ाई से आशीष का मन उचट गया था. उस ने नौकरी की भी तलाश नहीं की. निठल्लेपन ने उसे आवारा बना दिया. एक वक्त ऐसा भी आया, जब वह घर वालों के हाथों से निकल गया. तेजतर्रार आशीष मनमर्जी करता था और सनकी किस्म का था. गुरप्रीत थोड़ा खुले विचारों वाली थी. किसी से भी हंसबोल लेती थी. गुरमीत बिजनैस के सिलसिले में अक्सर बाहर रहते थे. उन के पीछे गुरप्रीत को कोई परेशानी नहीं होती थी. उस का मायका तो नजदीक था ही, सुबोध का भी परिवार उस का खयाल रखता था. घर चूंकि एक ही था, लिहाजा उस के पास आशीष का भी आनाजाना था. आशीष गुरप्रीत की तरफ आकर्षित हो गया.

2 साल पहले दोनों के बीच पहले दोस्ती हुई, फिर यही दोस्ती प्यार में बदल गई. पतिपत्नी का रिश्ता विश्वास का होता है. जहां विश्वास, समर्पण और सामाजिक मर्यादाओं को महत्त्व दिया जाता है, वहां रिश्ते की डोर मजबूत होती है. गुरप्रीत के मामले में ऐसा नहीं था. भावावेश में ही सही, आशीष के प्यार में पड़ कर उस ने न केवल अपने विश्वास के रिश्ते को कमजोर किया, बल्कि वह एक बड़ी भूल भी कर रही थी. गुजरते वक्त के साथ गुरप्रीत और आशीष की मोहब्बत परवान चढ़ती गई. जल्दी ही एक ऐसा समय भी आया, जब उन के बीच का रिश्ता मर्यादाओं की दीवार लांघ गया.

गुरप्रीत विवाहिता थी. आशीष के लिए उस ने पति से बेवफाई की थी. उस के साथ गुरप्रीत का रिश्ता सामाजिक और नैतिक तौर पर पूरी तरह गलत था. जीवन की पगडंडियां बहुत रपटीली होती हैं. जब कोई इंसान पतन की डगर पर उतरता है तो फिर उस की वापसी मुश्किल हो जाती है. गुरप्रीत बिना किसी अंजाम की परवाह किए खुद अपनी इच्छा से इस राह पर चल रही थी. इस तरह के रिश्तों में भले ही खुशियों का बगीचा नजर आता हो, परंतु वह वक्ती होता है. उस के नतीजे कब किस रूप में घातक हो जाएं, यह बात कोई नहीं जानता. सीधे तौर पर कहें तो कालांतर में ऐसे रिश्तों के परिणाम दुखदायक ही होते हैं.

आशीष और गुरप्रीत के प्यार का सिलसिला चलता रहा. गुरप्रीत पूरी तरह आशीष के मोहपाश में बंधी थी. उन दोनों के रिश्तों की भनक किसी को नहीं लग सकी. घर के अलावा दोनों बाहर जा कर भी मिलते थे. गुरप्रीत को विश्वास में ले कर अशीष ने उस का एटीएम कार्ड ले लिया था और धीरेधीरे उस में से 2 लाख रुपए निकाल लिए थे. दरअसल, आशीष को लगता था कि उसे बैठेबिठाए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी मिल गई है. सन 2015 में जब गुरप्रीत और आशीष के रिश्ते की हकीकत सामने आई तो गुरमीत ने पत्नी को खूब डांटाफटकारा. गुरप्रीत ने वक्त की नजाकत को भांप कर अपने किए पर माफी मांग ली.

इस के बाद गुरमीत ने आशीष पर रुपए वापसी का दबाव बनाया तो काफी जद्दोजहद के बाद उस ने एक लाख रुपए वापस कर दिए और बाकी बाद में देने को कहा. अपनी गृहस्थी को बचाए रखने के लिए गुरमीत ने 3 महीने पहले सुबोध का मकान छोड़ कर ससुराल के नजदीक किराए पर रहना शुरू कर दिया, साथ ही गुरप्रीत को आगाह भी किया कि वह आशीष से कोई गलत रिश्ता न रखे और उस से अपने पैसे वापस मांगे.

अच्छा इंसान वही होता है, जो वक्त रहते अपनी गलतियों को सुधार ले. गलतियों को बारबार दोहराया जाए तो बुरे नतीजों का रूप ले लेती हैं. गुरप्रीत और आशीष दोनों ही इस बात से जानबूझ कर अंजान थे. कुछ दिनों तक गुरप्रीत और आशीष के बीच दूरियां रहीं, लेकिन मकान बदलने से दोनों के दिल नहीं बदले. इस के बाद भी दोनों मिलते रहे. गुरप्रीत पर पति का दबाव था कि वह आशीष से अपने पैसे वापस ले. इसलिए गुरप्रीत ने पैसों का तकाजा जारी रखा. इस बात पर आशीष से उस की बहस भी हुई. गुरप्रीत आजादख्याल महिला थी. आशीष से उस के आंतरिक रिश्ते थे, लेकिन उस की सोच के हिसाब से वह उस की गुलाम नहीं थी. बाद में उस के रिश्ते कुछ अन्य युवकों से भी हो गए. उस की खुफिया मुलाकातों का सिलसिला गुपचुप चलता रहा.

जब यह बात आशीष को पता चली तो उसे बहुत नागवार गुजरा. एक दिन मुलाकात हुई तो आशीष ने तेवर दिखाने की कोशिश की. इस पर गुरप्रीत ने उसे टका सा जवाब दे दिया, ‘‘मैं तुम्हारी गुलाम नहीं हूं आशीष, वैसे भी तुम मेरे ऊपर झूठा आरोप लगा रहे हो.’’

आशीष गुस्से में था. उस ने चेतावनी भरे लहजे में कहा, ‘‘मैं तुम से प्यार करता हूं गुरप्रीत, इसलिए तुम किसी दूसरे से मिलो यह मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता. जरूरत पड़ने पर मैं किसी भी हद तक जा सकता हूं.’’

‘‘जब तुम प्यार करते हो तो विश्वास भी करो, साथ ही यह भी कि अपनी हद मत भूलो.’’

उस दिन के बाद आशीष अवसादग्रस्त रहने लगा. काम वह कुछ करता नहीं था, खाली दिमाग शैतान का घर होता है. वह दिनरात गुरप्रीत के बारे में ही सोचता रहता था. तरहतरह के खयाल उस के मन को कचोटते रहते थे. सब से ज्यादा वह यही सोचता था कि गुरप्रीत किसकिस से मिल रही होगी.

गुरप्रीत आशीष की ब्याहता नहीं थी, बल्कि पति से बेवफाई कर के उस ने आशीष में खुशियों की नाजायज तलाश की थी. इस के बावजूद आशीष न सिर्फ गुरप्रीत पर अपना पूरा हक समझता था, बल्कि उसे लगता था कि उस ने उस के साथ बेवफाई की है. वह दिलोदिमाग से पूरी तरह गुरप्रीत से जुड़ा था. उस के लिए इस से भी ज्यादा तकलीफदेह बात यह थी कि वह पैसे वापसी के लिए तकाजा करती थी. आशीष अवसादग्रस्त हुआ तो उस ने मन ही मन आत्महत्या कर के अपनी जिंदगी खत्म करने की सोची. कुछ दिनों तक वह इसी उधेड़बुन में रहा.

इस के बाद उस ने यह सोच कर इस खयाल को अपने मन से निकाल दिया कि इस से तो गुरप्रीत और भी आजाद हो जाएगी. उसे कोई सबक नहीं मिल सकेगा. उसे खुद मरने के बजाय गुरप्रीत को ही बेवफाई का सबक सिखाना चाहिए. आशीष ने सोचा कि कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले उसे गुरप्रीत से बात करनी चाहिए. वह यह सब सोच रहा था कि एक दिन उस ने गुरप्रीत को किसी युवक के साथ घूमते देख लिया. यह देख कर उसे बहुत गुस्सा आया. एक दिन उस ने गुरप्रीत से मिलने की इच्छा जाहिर की तो वह चली आई.

गुरप्रीत किसी भी तरह आशीष से अपने पैसे वापस लेना चाहती थी. जबकि रिश्ते तोड़ कर यह मुमकिन नहीं था. आशीष मिला तो उस ने अपनी नाराजगी जाहिर की, ‘‘तुम यह मत सोचना गुरप्रीत कि मुझे कुछ पता नहीं है. मैं जानता हूं, तुम अपनी आदतों को बदलने के लिए तैयार नहीं हो. मैं ने कल भी तुम्हें बाजार में एक युवक से मिलते देखा था.’’

उस की बात सुन कर गुरप्रीत गुस्सा हो गई, ‘‘देखो आशीष, यह मेरा निजी मामला है. तुम अपनी हद में रहो.’’

‘‘क्या तुम मुझ से प्यार नहीं करतीं?’’

‘‘प्यार करती हूं, तभी तो तुम से मिलती हूं. मैं किस से मिलती हूं, तुम्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि मैं तुम से किनारा तो कर नहीं रही. तुम्हें पूरा वक्त दे रही हूं.’’ कुछ पल रुक कर गुरप्रीत आगे बोली, ‘‘और हां, जितनी जल्दी हो सके, तुम मेरे पैसों का इंतजाम कर दो. तुम नहीं जानते मुझे तुम्हारी वजह से क्याक्या सुनने को मिलता है.’’

आशीष शातिर दिमाग युवक था. उसे गुस्सा तो बहुत आया, पर उस ने अपने गुस्से को जब्त करने में ही भलाई समझी. उस की हालत हारे जुआरी जैसी हो गई है. अपने गुस्से को दबा कर उस ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं कुछ करूंगा.’’

उस रात आशीष को नींद नहीं आई. वह गुरप्रीत पर अपना हक समझ रहा था, जबकि वह उस के कहे अनुसार चलने को तैयार नहीं थी. वह चाहता था कि गुरप्रीत सिर्फ उसी की बनी रहे और वक्तबेवक्त उस पर पैसे भी खर्च करे. पर अब सब कुछ उस की सोच के विपरीत हो रहा था. नतीजतन वह गुरप्रीत से नफरत करने लगा.  निठल्लेपन का शिकार आशीष घर पर रह कर ज्यादातर आपराधिक घटनाओं पर आधारित सीरियल देखता रहता था. इसी से आइडिया ले कर उस ने मन ही मन फैसला कर लिया कि अगर गुरप्रीत ने उस की बात नहीं मानी तो पूरी प्लानिंग के साथ वह उस की हत्या कर देगा.

इस के लिए जनवरी के अंतिम सप्ताह में उस ने एक चाकू खरीद कर अपने पास रख लिया. उस ने सोचा कि ऐसा कर के वह गुरप्रीत से प्रतिशोध भी ले लेगा और उसे उस के तकाजे से भी मुक्ति मिल जाएगी.  फरवरी की शाम आशीष ने तयशुदा प्लानिंग के तहत गुरप्रीत को फोन कर के मिलने की इच्छा जताई. उस ने उस से रेलवे स्टेशन आने को कहा. गुरप्रीत ने जब आने के लिए हामी भर ली तो आशीष अपनी मोटरसाइकिल से वहां पहुंच गया. उधर गुरप्रीत अपने 8 वर्षीय बेटे शीतल से कुछ देर में वापस आने की बात कह कर अपनी स्कूटी से आशीष से मिलने पहुंच गई.

आशीष ने उस से प्रेमनगर के चाय बागान की तरफ घूमने चलने को कहा. गुरप्रीत उस पर भरोसा करती थी, इसलिए साथ जाने को तैयार हो गई. आशीष उस की स्कूटी पर पीछे बैठ गया और दोनों करीब आधे घंटे में चाय बागान के पास पहुंच गए.

आशीष ने अपने इरादे के बारे में गुरप्रीत को जरा भी शक नहीं होने दिया. अपने मोबाइल से उस ने गुरप्रीत के साथ सैल्फी खींची. इस के बाद वह मुद्दे पर आते हुए बोला, ‘‘क्या सोचा गुरप्रीत तुम ने?’’

‘‘किस बारे में?’’

‘‘तुम बदलोगी या नहीं?’’

वह उस के इस रवैये से बुरी तरह चिढ़ कर बोली, ‘‘तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है, मुझे अभी वापस जाना है.’’

‘‘नहीं, आज तुम सीधे ऊपर ही जाओगी.’’ कहने के साथ ही आशीष के हाथ हरकत में आ गए. उस ने गुरप्रीत का गला पकड़ कर दबाया और जमीन पर पटक दिया. गुरप्रीत को उस से ऐसी उम्मीद नहीं थी. उस के खतरनाक इरादों से अंजान गुरप्रीत संभल पाती, उस के पहले ही उस ने चाकू निकाला और उस के गले पर वार कर दिया.

इस से गुरप्रीत की चीख निकल गई. आशीष का वार घातक था. कुछ ही देर में तड़प कर गुरप्रीत की सांसों की डोर टूट गई. इस के बाद वह स्कूटी ले कर वहां से निकल गया. गुरप्रीत की चीख के बाद एकदो लोग वहां पहुंचे. उन्होंने ही पुलिस को इस हत्या की सूचना दी थी. गुरप्रीत की स्कूटी ले कर आशीष सीधा सेवलांकला गया और स्कूटी वहां छोड़ कर टैक्सी स्टैंड पहुंचा, जहां से वह मसूरी चला गया. वहां उस ने होटल में अपनी आईडी जमा कर के कमरा ले लिया. किसी को अंदाजा नहीं था कि वह कत्ल कर के आया है. उस ने रात में शराब पी और चिकन खाया. इस के बाद घंटों आराम किया. अगले दिन वह काफी परेशान रहा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. दिन भर उस ने आराम किया.

शाम को आशीष ने गुरप्रीत की खबर टीवी पर देखी तो अवसाद से ग्रस्त हो कर खुद भी अपनी जिंदगी खत्म करने का फैसला किया और अपनी बाईं कलाई की नसें काट लीं. संयोग से उसी समय पुलिस ने वहां पहुंच कर उसे हिरासत में ले लिया. पुलिस के पहुंचने में देरी होती तो रक्तस्राव से उस की मौत हो सकती थी. विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने आशीष को अस्पताल से डिस्चार्ज करा लिया. होटल के प्रबंधक प्रकाश सिंह की तरफ से धारा 309 के अंतर्गत आशीष के खिलाफ आत्महत्या के प्रयास का भी मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. पुलिस ने उस से गुरप्रीत की हत्या में इस्तेमाल चाकू के बारे में पूछताछ की तो उस ने कोई उत्तर नहीं दिया. पुलिस ने उसे 7 फरवरी को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

बाद में पुलिस ने 10 फरवरी को हत्यारोपी को एक दिन के रिमांड पर लिया. उस की निशानदेही पर उसी दिन मसूरी रोड स्थित डीयर पार्क की झाडि़यों से हत्या में इस्तेमाल किया गया चाकू बरामद हो गया. फिलहाल वह जेल में है. गुरप्रीत अपने परिवार से बेवफाई कर के सनकी स्वभाव के आशीष के प्यार में न पड़ी होती तो शायद इस तरह की नौबत कभी न आती. आशीष जैसे युवक महिलाओं की भावनाओं से खेल कर उन्हें अपने जाल में फंसाते हैं और उन्हें मौजमस्ती और कमाई का जरिया बना लेते हैं.

कानून आशीष को क्या सजा देगा, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन एक परिवार की खुशियों को उस ने हमेशा के लिए खत्म कर दिया.

—कथा पुलिस सूत्र

Hindi Crime Story: दिल दौलत और दगाबाज दोस्त

Hindi Crime Story: टेड सैंडी को दिल से प्यार करता था जबकि सैंडी को उस की दौलत से प्यार था. इस में जब टेड का दोस्त रिक भी सैंडी के साथ मिल गया तो दोनों ने टेड की दौलत के लिए उसे ठिकाने लगा दिया.

उत्तरी अमेरिका के शहर लास वेगास को दुनिया का फन सिटी माना जाता है. वहां चौबीसों घंटे जुआ खेला जाता है, इसलिए वहां जुआ खेलने वालों का जमघट लगा रहता है. यहां सिर्फ जुआ ही नहीं खेला जाता सैक्स और फैशनेबल कपड़ों का भी व्यापार होता है. इस की वजह से यहां अपराधी भी बहुत हैं. यहां रातदिन टौपलेस लड़कियों के डांस शो और शराब के साथ जुआ चलता रहता है. इस शहर की रौनक सालोंसाल से ज्यों की त्यों बनी है. कसीनो में डूबी रातों, स्पा बाथ के जलवे और सैक्स का मजा लूटने यहां तमाम पर्यटक आते हैं.

कसीनो में पैसे वाले लोग हजारोंलाखों रुपयों की बाजियों में डूबे रहते हैं. एक तरफ बाजी जीतने वाले को खुशी होती है तो दूसरी ओर हजारोंलाखों हारने वाले पर भी ‘जीत’ का नशा छाया रहता है. कसीनो का मायाजाल ही ऐसा होता है कि हारने का भी गम नहीं होता. वह इसी उम्मीद में रहता है कि कभी उस का भी समय आ सकता है. 17 सितंबर, 1996 की रात निवेडा वैली पर काले बादलों का ऐसा साया मंडराया, जो कभी फीका नहीं पड़ा. निवेडा वासियों के दिल में अब घोड़ों, जुआ और लड़कियों के शौकीन टेड बिनियन की सिर्फ यादें ही रह गई हैं.

स्मार्ट, गणित में माहिर और बेशुमार दौलत का मालिक. टेड के पास इतनी दौलत थी कि नोट गिनने वाली मशीन भी थक जाए. खतरों से खेलने वाला, मौत से न डरने वाला, टेड आखिर में मारा गया. जो दौलत उसे जान से प्यारी थी, उसी दौलत की वजह से उसे जान गंवानी पड़ी. टेड बिनियन लड़कियों का भी खूब शौकीन था. उसे हर रोज एक नई लड़की की तलाश होती थी. पैसा उस के पास था ही, इसलिए हर रात उसे नई लड़की आसानी से मिल जाती थी. उस रात वह लड़की की ही तलाश में चिताह क्लब पहुंचा तो वहां उस की मुलाकात साथ वाली टेबल पर बैठी सैंडी मर्फी से हुई.

टेड बारबार उसी की ओर देख रहा था. उस के इस तरह देखने से सैंडी को अंदाजा हो गया कि वह क्या चाहता है. सैंडी को पता था कि टेड अरबपति है. टेड ने सैंडी को अपनी तरफ खींचने की बहुत कोशिश की, लेकिन उस ने भाव नहीं दिया. तब उस ने उसे नोटों की गड्डी दिखाई. लेकिन सैंडी ने उसे लौटाते हुए कहा, ‘‘तुम ने मुझे समझा क्या है? तुम्हें क्या लगता है कि पैसे ले कर मैं तुम्हारे साथ चल दूंगी.’’

टेड ने सोचा था कि सैंडी भी अन्य लड़कियों की तरह होगी, लेकिन वह वैसी नहीं थी. जबकि यह उस की एक अदा थी, जिस की बदौलत वह टेड को अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब हो गई थी. उस के इस अंदाज से टेड अंदर तक घायल हो गया था. लड़कियों को सिर्फ मौजमस्ती की चीज समझने वाले टेड के दिल में सैंडी अपनी इस अदा से उतर गई थी. जबकि सही बात यह थी कि सैंडी पैसों की तलाश में ही कैलिफोर्निया से लास वेगास आई थी. वह पैसों के लिए क्लबों में टौपलेस डांस करती थी. सैंडी की यह अदा टेड के लिए दिखावा भर थी. वह टेड की अमीरी और खुले दिल से अनजान नहीं थी. वह खुद उसे अपनी ओर खींचना चाहती थी. जिस में वह कामयाब भी हो गई थी.

इस के बाद उन्हें मिलते देर नहीं लगी. उन की मुलाकातें होने लगीं. एक लंबे समय के बाद सैंडी को पता चला कि टेड ही उस कसीनो का मालिक है, जहां वह काम करती थी. 2 सप्ताह में ही सैंडी की जिंदगी बदल गई थी. टेड की पत्नी को जब पति और सैंडी के प्रेम के बारे में पता चला तो उस की पत्नी डौरिस अपनी 15 वर्षीया बेटी को ले कर चली गई. उस ने तलाक का मुकदमा करने में भी देर नहीं की. टेड शराब तो पीता ही था, पत्नी के जाने के बाद हेरोइन भी लेने लगा.

डोरिस के घर से जाते ही जो सैंडी पैसों की खातिर हर रात क्लबों में जिस्म दिखाने का नाच करती थी, वह अरबपति के घर की मालकिन बन गई. एक तरह से उस के हाथ सोने का अंडा देने वाली मुर्गी लग गई थी. लास वेगास ने उस की जिंदगी बदल दी थी. टेड सैंडी की अदाओं पर फिदा था. हर रात उस के साथ बाहर जा कर खाना खाता, कसीनो में जुआ खेलता और फिर रात भर सैंडी के साथ मजे लेता. यही उस की जिंदगी का नियम बन गया था.

सैंडी ने जिंदगी में जो चहा था, पा लिया था. अब टेड की बेशुमार दौलत सैंडी के हाथों में थी. उस की जिंदगी ने नया करवट तब लिया, जब उस की जिंदगी में टेबिश आया. रिक टेबिश लास वेगास सन 1991 में आया था. यहां उस ने अपनी ट्रांसपोर्ट कंपनी खोली थी. इस के बाद जल्दी ही उस की गिनती करोड़पतियों में होने लगी थी. पिएरो रेस्टोरेंट के रौसलेट में रिक की मुलाकात टेड से हुई तो जल्दी ही दोनों गहरे दोस्त बन गए. एक दिन टेड रिक को अपने घर ले गया तो वहां उस ने उसे सैंडी से मिलवाया. इस के बाद अक्सर तीनों की मुलाकातें होने लगीं.

टेड बिनियन अपने कारोबार में व्यस्त रहता था, जिस की वजह से सैंडी का झुकाव रिक की ओर हो गया. वह उस के साथ शौपिंग पर भी जाने लगी. इस तरह दोनों करीब आते गए. इस के बाद एक शाम जब दोनों घर में अकेले थे तो सैंडी ने कहा, ‘‘रिक, क्या तुम्हें नहीं लगता कि हमारे बीच अपनापन इस हद तक बढ़ गया है कि अब इसे रिश्ते का नाम दे दिया जाना चाहिए.’’

‘‘कैसा रिश्ता?’’ रिक ने पूछा.

‘‘प्यार का रिश्ता,’’ सैंडी ने कहा, ‘‘तुम्हारे साथ होने पर दिल में कुछकुछ होने लगता है. सच कहूं, मेरा दिल बिलकुल खाली है. टेड को तो मेरे दिल ने सिर्फ नाम का पति माना है. उस बूढ़े में इतनी ताकत कहां है कि उसे पूरी तरह से पति मान लिया जाए. वह शरीर में आग तो लगा देता है, लेकिन बुझाना उस के वश की बात नहीं है.’’

रिक उस के कहने का मतलब समझ गया था. वह तो वैसे ही सैंडी पर फिदा था. इस तरह खुले आमंत्रण पर भला कैसे खुद को रोक पाता. उस ने सैंडी को बाहों में भर लिया. इस का नतीजा यह रहा कि दोनों के बीच जिस्मानी दूरी खत्म होते देर नहीं लगी. दोनों एकांत के साथी बने तो हर छोटीबड़ी बातों के भी राजदार बन गए. इस सब से बेखबर टेड का भी रिक पर विश्वास बढ़ता गया. यही वजह थी कि एक दिन टेड ने उस से पार्किंग के नीचे बने बेसमेंट में दबी चांदी के सिक्कों की बोरियों को कहीं दूसरी जगह ले जाने के बारे में सलाह मांगी. क्योंकि टेड अपनी बहन की दखलंदाजी से परेशान था. वह उस की दौलत हड़पना चाहती थी.

इस के बाद रिक की सलाह पर टेड ने चांदी के सिक्कों से भरी बोरियां लास वेगास से 60 किलोमीटर दूर एक छोटे से गांव पाहरूपम पहुंचा दी. टेड ने वहां जमीन खरीद कर इंजीनियर्स ग्रुप की मदद से एक तहखाना बनवाया था और उसी में अपनी दौलत रखवा दी थी. 17 सितंबर, 1998 की रात लास वेगास के मेट्रोपैलिटन डिपार्टमेंट में एक फोन आया, जिस में एक औरत कह रही थी कि उस के पति की तबीयत बहुत खराब है. उन्होंने सांस लेना बंद कर दिया है.

उस ने घर का पता बताया था 2406, पोलोकिनो लेन. यह टेड बिनियन का घर था. वह फोन सैंडी ने किया था. थोड़ी देर में घर के बाहर 3 जीपें आ कर रुकीं. इसी के साथ डाक्टरों की 2 टीमों के साथ पुलिस वालों की लाइन लग गई. भीतर से सैंडी चिल्लाई,  ‘‘आप लोग इन्हें बचा लो, यह मर जाएंगे, इन की सांस रुक गई है.’’

एक डाक्टर उसे चुप कराने लगा तो बाकी अंदर चले गए. रेंकल ने बाहर आ कर उस से पूछा, ‘‘आप कौन हैं?’’

‘‘मैं उन की बीवी हूं.’’ सैंडी बोली.

‘‘आप की पति से आखिरी बार कब मुलाकात हुई थी?’’

‘‘आज सुबह.’’

रेंकल सैंडी को वहीं छोड़ कर अंदर टेड के पास पहुंचा. उस की नब्ज टटोली तो रुक चुकी थी. शरीर एकदम ठंडा हो चुका था. साफ था टेड मर चुका था. सैंडी भी आ गई और टेड की लाश से लिपट कर रोने लगी. पुलिसकर्मियों ने उसे पकड़ कर अलग किया और सांत्वना दिया. टेड को जांच के लिए अस्पताल ले जाया गया. वहां सैंडी की तबीयत खराब हो गई तो उसे दवा दे कर सुला दिया गया. कुछ देर में रिक भी आ गया. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में उस ने बताया कि वह टेड और सैंडी दोनों का दोस्त है. वह कारोबार के सिलसिले में शहर से बाहर जा रहा था. टेड की मौत का पता चला तो एयरपोर्ट से सीधे अस्पताल आ गया.

पुलिस ने अनुमान लगाया कि कैसीनों का लाइसैंस न मिलने से टेड ने आत्महत्या की होगी. सैंडी ने बताया कि देर शाम उस ने टेड के हाथ में बंदूक देखी थी. चाह कर भी उसे नींद नहीं आ रही थी. परेशानी की वजह से उन्होंने हेरोइन की ज्यादा डोज ले ली होगी? जांच करने वाली टीम ने पाया कि टेड बिनियन की मौत आत्महत्या नहीं थी, बल्कि उसे आत्महत्या दिखाने की कोशिश की गई थी. जांच में उस के कमरे से जो एक्सानेक्स की शीशी मिली थी, उस की अधिक डोज देने से टेड तड़पतड़प कर एक कमरे से दूसरे कमरे में भटका होगा. कमरा बंद होने की वजह से छलांग लगाने का भी कोई रास्ता नहीं था. इस दवा के कारण उल्टी भी हुई होगी, जिसे साफ किया गया होगा.

यह अपराध काफी गहराई तक सोच कर किया गया था. टेड बिनियन की मौत के 2 दिनों बाद 19 सितंबर, 1998 पुलिस को सूचना मिली कि 2 बड़ेबड़े भरे हुए ट्रक पाहरूम से बाहर जाते हुए देखे गए हैं. उन दोनों ट्रकों में से एक को रिक टेबिश चला रहा है, जबकि दूसरे को उस का साथी डेविड मेटसन. दोनों ट्रकों को पीछा कर के पकड़ लिया गया. उस समय तो रिक बहाना कर के बच गया था. उस ने कहा था कि टेड बिनियन ने उसे ये ट्रक मि. एंथनी के पास पहुंचाने को कहा था. लेकिन आगे की जांच में सैंडी और रिक शक के दायरे में आ गए. इस के बाद 14 जून, 1999 को सैंडी मर्फी और रिक टेबिश को गिरफ्तार कर लिया गया.

पूछताछ में पता चला कि जिस रात टेड का कत्ल हुआ था, दोनों होटल पेनिनसुला में एक साथ दिखाई दिए थे. होटल का कमरा मिस्टर एंड मिसेज टेबिश के नाम से बुक कराया गया था. रात गुजारने के बाद दोनों सुबह वहां से एक साथ घर के लिए निकले थे. लेकिन उस समय सबूत न होने की वजह से वे छूट गए थे. करीब 4 सालों बाद अक्टूबर, 2004 में सैंडी मर्फी और रिक टेबिश को सबूतों के साथ पेशी के लिए कोर्ट में लाया गया, जहां दोनों ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. सैंडी ने माना कि उस ने टेड बिनियन के साथ शादी प्यार की वजह से नहीं, उस की दौलत की वजह से की थी. वह उस की दौलत हासिल करना चाहती थी. इस के बाद रिक उस की जिंदगी में आया तो दोनों ने शादी का फैसला कर लिया.

सैंडी की तरह रिक भी टेड की दौलत हड़पना चाहता था. सैंडी ने जब उस से टेड की दौलत हथिया कर शादी करने को कहा तो वह राजी हो गया. सैंडी जानती थी कि टेड हेरोइन के नशे का आदी है. इस के अलावा वह कई तरह की नशीली गोलियां भी खाता था. उस ने टेड को मारने के लिए इन्हीं चीजों का सहारा लेने का फैसला किया. रिक भी इस पर सहमत हो गया. घटना वाले दिन पहले दोनों ने दवा की हाई डोज दे कर टेड को मार दिया. उस के बाद दोनों ने जिस्मानी भूख मिटाई.

उन्होंने माना कि टेड बिनियन को जबरदस्ती 12 पैकेट हेरोइन खिलाई गई थी. उस के बाद एक्सानेक्स की 10 गोलियां उस के मुंह में ठूंस दी थी, ताकि उस की अरबों की दौलत के मालिक वे खुद बन सकें. दोनों के अपराध स्वीकार करने और सबूतों के आधार पर जज ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी. उम्रकैद की सजा मिलने के बाद सैंडी और रिक ने कई बार जमानत की अर्जी दी, लेकिन उन्हे खारिज कर दिया गया. 2 जनवरी, 2010 को फिर सैंडी ने उम्र का हवाला देते हुए जमानत की अर्जी दाखिल की कि अभी उस की उम्र ही क्या है, अपने किए की वह काफी सजा भुगत चुकी है, इसलिए उस के भविष्य को ध्यान में रख कर उसे जमानत दी जाए. लेकिन इस बार भी उसे जमानत नहीं मिल सकी. दोनों की उम्रकैद की सजा बरकरार है. यह प्रकरण इतना विख्यात हुआ था कि हौलीवुड में इस पर फिल्म बनी थी. Hindi Crime Story