Punjab Crime: संत से शादी करने के लिए जसपाल कौर को दशमेश से तलाक लेना पड़ता जबकि दशमेश तलाक देने वाला नहीं था. इस समस्या से निजात पाने के लिए संत ने जो खूनी साजिश रची, उस का परिणाम क्या निकला?

पंजाब के जिला लुधियाना के गांव सिंघवाला खुर्द के रहने वाले दशमेश सिंह के पिता का नाम बलवान सिंह तो मां का सुरजीत कौर था. उस के 5 भाई भगवंत, निरवैर, अशोकजीत, मनोरजीत और सुरिंदरजीत सिंह के अलावा एकलौती बहन कुलदीप कौर थी. इन में दशमेश चौथे नंबर पर था. बलवान सिंह खेतीबाड़ी करते थे. थोड़ीबहुत पढ़ाई कर के उन के सभी बेटे खेतीबाड़ी के काम में उन का हाथ बंटाने लगे थे. लेकिन कुछ दिनों बाद निरवैर, दशमेश और मनोरजीत को खेतीकिसानी का यह काम अच्छा नहीं लगा तो निरवैर जहां फौज में भरती हो गया, वहीं दशमेश और मनोरजीत समयसमय पर विदेश चले गए.

विदेश जाने से पहले ही दशमेश की शादी गांव कुंभड़ाखुर्द के रहने वाले परमल सिंह की बेटी जसपाल कौर से हो गई थी, जिस से वह 3 बच्चों का बाप बना. दशमेश की शादी के समय एक मजेदार घटना यह घटी थी कि बलवान सिंह गए तो थे अपने बड़े बेटे भगवंत सिंह के लिए लड़की देखने. लेकिन उसी समय उन्हें 2 लड़कियां और पसंद आ गई थीं, जो भगवंत की होने वाली ससुराल में रिश्तेदारी में आई थीं. दोनों सगी बहनें थीं और उन के नाम थे सतविंदर कौर और जसपाल कौर. भगवंत सिंह की शादी वाले दिन ही इन दोनों बहनों का भी बलवान सिंह के 2 बेटों, निरवैर सिंह और दशमेश सिंह से ब्याह हो गया था. इस तरह एक ही दिन बलवान सिंह के 3 बेटों की एक साथ शादियां हो गई थीं, जिस की गांवों में खूब चर्चा हुई थी.

निरवैर सिंह शादी से पहले ही फौज में भरती हो गया था, इस के बाद दशमेश ने भी कुछ दिनों तक सेना की नौकरी की. लेकिन अचानक सेना की नौकरी छोड़ कर वह ग्रीस चला गया, जहां 2 सालों तक रहा. ग्रीस से लौट कर साल भर घर पर रहा. उस के बाद वह फिर ग्रीस चला गया. इस बार वह 3 सालों बाद लौटा. कुछ महीने गांव में रहने के बाद बाद वह जर्मनी चला गया, जहां से पत्नी के बारबार बुलाने के बावजूद वह पूरे 8 सालों बाद लौटा. घर लौटने के कुछ दिनों बाद ही थाना खरड़ के अंतर्गत आने वाले एक पोखर में उस की लाश पड़ी मिली. दशमेश की लाश सब से पहले गांव वडाली के रहने वाले राजकुमार ने उस पोखर में औंधे मुंह पड़ी देखी थी.

लाश पर कपड़ों के नाम पर एकमात्र अंडरवीयर था. वह काफी सड़गल चुकी थी. लाश से उठने वाली दुर्गंध ने ही राजकुमार को अपनी ओर आकर्षित किया था. दुर्गंध की वजह से ही वह पोखर के पास गया था,तब उसे लाश दिखाई दी थी. पोखर में लाश पड़ी होने की सूचना पा कर थोड़ी ही देर में पुलिस उपाधीक्षक एच.पी. सिंह थानाप्रभारी सुरजीत सिंह के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. घटनास्थल पर लाश के पास ही पुलिस को पौलीथिन की एक छोटी थैली में एक पत्र मिला था. पत्र में जो लिखा था, उस के अनुसार वह मृतक का सुसाइड नोट लग रहा था. पत्र में लिखे अनुसार, दशमेश सिंह ने घरेलू कारणों से आत्महत्या की थी, जिस का जिम्मेदार उस ने स्वयं को ठहराया था.

इस के अलावा पुलिस को अन्य कोई सूत्र नहीं मिला था. पुलिस ने मौके की आवश्यक काररवाई करने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था. इस के बाद थानाप्रभारी सुरजीत सिंह ने मृतक दशमेश सिंह के पिता बलवान सिंह से पूछताछ की तो उस समय उन्होंने केवल इतना ही कहा कि मरने वाला उन का बेटा दशमेश सिंह था, जो विदेश में रहता था. घर में ऐसी कोई परेशानी वाली बात नहीं थी, जिस से वह आत्महत्या जैसा संगीन कदम उठाता. जबकि सुरजीत सिंह को मामला आत्महत्या का ही लग रहा था, इसलिए उन्होंने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया. इस की एक वजह यह भी थी कि कुछ महीने पहले इस परिवार में आत्महत्या की एक और घटना घट चुकी थी.

दरअसल, दशमेश के छोटे भाई सुरिंदर सिंह ने भी कुछ महीने पहले आत्महत्या कर ली थी. मरने से पहले उस ने घर वालों के लिए जो संदेश छोड़ा था, उस में उस ने लिखा था कि वह एक बताए न जा सकने वाले कारण की वजह से आत्महत्या कर रहा है. इसी बात को ध्यान में रख कर पुलिस यह मान कर चल रही थी कि परिवार में इस तरह की मानसिक प्रवृत्ति बन चुकी है. उसी मानसिक प्रवृत्ति की वजह से दशमेश ने भी आत्महत्या की है. यही सोच कर पुलिस मामले की जांच करने के बजाय शांत हो कर बैठ गई.

बेटे की अंतिम क्रियाओं से फारिग हो कर बलवान सिंह थाना खरड़ पहुंचे और पुलिस से कहा कि दशमेश ने आत्महत्या नहीं की, बल्कि गहरी साजिश के तहत उसे मार डाला गया है. स्थानीय पुलिस ने उन की बातों पर ध्यान नहीं दिया तो वह एसएसपी साहब से मिले. उन्होंने बलवान सिंह की बातों को गौर से सुना और मामले की फाइल सुरजीत सिंह से ले कर सीआईए के इंसपेक्टर को सौंप दी. 2 सप्ताह की गहन छानबीन के बाद सीआईए इंसपेक्टर ने अपनी जो रिपोर्ट एसएसपी साहब को सौंपी, उस के अनुसार दशमेश सिंह की साजिश के तहत हत्या की गई थी. रिपोर्ट में साजिश के लिए जिन 2 लोगों को दोषी ठहराया गया था, उन में एक उस क्षेत्र का बहुत ही सम्मानित एवं पूज्यनीय व्यक्ति था.

उस पर हाथ डालने से आसपास के गांवों के हजारों लोग पुलिस के खिलाफ खड़े हो सकते थे. उसी बीच सुरजीत सिंह का तबादला कर के इंसपेक्टर दीदार सिंह को खरड़ थाने का थानाप्रभारी बना दिया गया. उन के चार्ज संभालने के 3 दिनों बाद एसएसपी ने उन्हें अपने निवास पर बुला कर इस मामले की फाइल उन्हें सौंपते हुए कहा, ‘‘दीदार सिंह, इस मामले की गुप्तरूप से छानबीन कर के 2 हफ्तों में मुझे अपनी रिपोर्ट दो.’’

दीदार सिंह को फाइल देने से पहले एसएसपी साहब ने फाइल से सीआईए इंसपेक्टर की रिपोर्ट निकाल कर अपने पास रख ली थी.

दीदार सिंह ने फाइल संभालते हुए कहा, ‘‘जी सर, मैं पूरी छानबीन कर के निश्चित अवधि में अपनी रिपोर्ट अवश्य दे दूंगा.’’

इस के बाद एसएसपी साहब को सैल्यूट कर के वह कैंप औफिस से बाहर निकल आए.  थाने लौट कर उन्होंने फाइल का गहन अध्ययन किया. इस के बाद एएसआई गुरबख्श सिंह और एएसआई इकबाल सिंह की मदद से इस मामले की जांच में जुट गए. ठीक 11 दिनों बाद रिपोर्ट तैयार कर के उन्होंने एसएसपी साहब के सामने रख दी. दीदार सिंह की रिपोर्ट में भी दशमेश की आत्महत्या को हत्या करार देते हुए उन्हीं 2 लोगों पर शक जाहिर किया गया था, जिन का उल्लेख सीआईए इंसपेक्टर ने अपनी रिपोर्ट में किया था.

रिपोर्ट को ध्यानपूर्वक पढ़ने के बाद एसएसपी साहब ने कहा, ‘‘दीदार सिंह, कल सुबह दशमेश के घर के किसी सदस्य को बुला कर उस का बयान दर्ज करो. उस के बाद जिला अटौर्नी की राय ले कर एफआईआर दर्ज करो. उस के बाद जरूरी काररवाई करो.’’

दीदार सिंह ने दशमेश के यहां संदेश भेजा तो बलवान सिंह अपने बेटे अशोकजीत के साथ थाने आ पहुंचे. उन्होंने अशोकजीत से तहरीर ले कर संदिग्ध लोगों के नामपते लिख कर अपनी संस्तुति के साथ वह तहरीर डीएसपी के माध्यम से जिला न्यायवादी के पास भिजवा दी. अगले ही दिन सहायक जिला न्यायवादी ज्ञानचंद ने इस पर टिप्पणी लिख कर भिजवा दिया कि इस मामले में भादंवि की धारा 302/34 के तहत प्राथमिकी दर्ज कर के छानबीन की जा सकती है. फिर क्या था, थाना खरड़ में दशमेश सिंह की हत्या का मुकदमा दर्ज हो गया. खरड़ थाना पुलिस ने हत्या का यह मामला जिन 2 लोगों के खिलाफ दर्ज किया था, उन में एक तो थी दशमेश सिंह की विधवा जसपाल कौर और दूसरा था उस इलाके का जानामाना संत इंदरजीत सिंह.

जैसे ही दोनों को मुकदमा दर्ज होने का पता चला था, वे भूमिगत हो गए थे. उन की तलाश में दीदार सिंह ने अनेक संभावित स्थानों पर छापे मारे, लेकिन दोनों ही उन के हाथ नहीं लगे, लेकिन इस से वे निराश नहीं हुए और अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए लगातार प्रयास करते रहे. अंतत: उन की कोशिश कामयाब हो ही गई. गांव ध्यानपुर के सरपंच पाला सिंह ने दोनों वांछित अभियुक्तों जसपाल कौर और संत इंदरजीत सिंह को ला कर थानाप्रभारी दीदार सिंह के सामने पेश कर दिया. दरअसल जसपाल कौर और संत इंदरजीत सिंह पुलिसिया काररवाई से घबरा कर पाला सिंह की शरण में पहुंच गए थे. पाला सिंह के सामने दोनों ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए पुलिस की मारपीट से बचा लेने की गुहार की थी.

इस के बाद पाला सिंह दोनों को समझाबुझा कर थाने ले आए थे तब बयान दर्ज कर के पुलिस ने दोनों अभियुक्तों को विधिवत गिरफ्तार कर अलगअलग हवालातों में बंद कर दिया था. अगले दिन दोनों को खरड़ के प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी एच.एस. मदान की अदालत में पेश कर के थाना खरड़ पुलिस ने पूछताछ के लिए 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया था. दीदार सिंह द्वारा की गई पूछताछ में इन लोगों ने जो कुछ बताया, उस से ढोंगी संत के घिनौने आपराधिक सिलसिले की एक ऐसी अमानवीय सनसनीखेज कहानी सामने आई, जो औरों के लिए एक सीख बन सकती है.

शादी के बाद सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. दशमेश सिंह अपनी पत्नी से खुश था तो जसपाल कौर को भी पति से कोई शिकायत नहीं थी. समयसमय पर उस ने 3 बच्चों को जन्म दिया. इस के बावजूद उस की सुंदरता में कोई कमी नहीं आई. जसपाल कौर जहां संतोषी युवती थी, वहीं दशमेश बहुत ज्यादा महत्त्वाकांक्षी था. उस पर हमेशा जिंदगी में आगे बढ़ने और अधिकाधिक पैसा कमाने की धुन सवार रहती थी. इस के लिए वह तरहतरह की योजनाएं बनाता रहता था. उन्हीं में से एक योजना यह भी थी कि बारबार भारत लौटने के बजाय कई सालों तक विदेश में रह कर ढेरों रुपया पत्नी को भेजता रहे, ताकि जब वह लौटे तो उसे फिर से विदेश जाने की जरूरत न पड़े.

उस ने यही किया भी. विदेश में लंबे समय तक रह कर वह भले ही घर नहीं आया था, लेकिन रुपए उसने इस कद्र भेजे थे कि उस के परिवार ने कल्पना नहीं की थी. पैसा भले ही खूब आ रहा था, लेकिन पति के बिना जसपाल कौर को सब सूना लगता था. उस ने 2 साल तो जैसेतैसे काट लिए, लेकिन उस के बाद उस का समय काटे नहीं कटता था. दशमेश को वह हर हफ्ते चिट्ठी लिखती और उस से वापस आने का आग्रह करती. दूसरी ओर दशमेश पर अधिक से अधिक पैसा कमाने की धुन सवार थी. इसलिए उस ने पत्नी की बातों पर जरा भी ध्यान नहीं दिया. शायद पत्नी की आहत भावनाओं की जैसे उसे जरा भी चिंता नहीं थी.

इस के बाद पति के विछोह में या अन्य किसी वजह से जसपाल कौर बीमार रहने लगी. गांव के डाक्टरों से ले कर लुधियाना के बड़े डाक्टरों तक से उस का इलाज कराया गया, लेकिन किसी की समझ में उस की बीमारी नहीं आई. जसपाल कौर की बड़ी बहन सतविंदर कौर, जो उस की जेठानी भी थी, ने अपने फौजी पति से कह कर गांव में ही अलग मकान ले लिया था, क्योंकि परिवार के साथ रहना उसे शुरू से ही पसंद नहीं था. छोटी बहन की बीमारी से वह भी परेशान थी.

एक दिन सतविंदर कौर ने जसपाल को अपने घर बुला कर कहा, ‘‘कुल्हैड़ गांव में एक संतजी हैं. वह किसी भी बीमारी का इलाज चुटकियों में कर देते हैं. बहुत पहुंचे हुए महात्मा हैं. अपनी समस्याएं ले कर दूरदूर से लोग उन के पास आते हैं और संतजी उन की परेशानियां चुटकी बजा कर दूर कर देते हैं.’’

‘‘दीदी, यह सब फालतू की बातें हैं.’’ जसपाल ने कहा.

‘‘इसीलिए तो मैं ने आज तक तुम से इस बारे में कोई बात नहीं की. पता नहीं तुम खुद को क्या समझती हो.’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है दीदी.’’

‘‘यह बात नहीं, वह बात नहीं. इतने डाक्टरों से इलाज करवा लिया, क्या हुआ, हो गई ठीक?’’

‘‘चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल में दिखाने जाऊंगी. देखो, वहां के डाक्टर क्या कहते हैं.’’

‘‘कुछ नहीं कहेंगे, फालतू के टैस्ट कर के तेरा सत्यानाश कर देंगे. ऐसे ही मर जाएगी एक दिन तू.’’ सतविंदर ने बहन को डांटते हुए कहा, ‘‘अच्छा, एक बात बता, कभी मुझे बीमार होते देखा है? मेरी मान, किसी दिन मेरे साथ संतजी के पास चल. एक हफ्ते में तू भलीचंगी न हो जाए तो कहना.’’

‘‘जिस बीमारी का इलाज डाक्टर नहीं कर सके दीदी, भला एक संत उस का इलाज क्या करेगा? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा.’’

‘‘समझने की जरूरत भी नहीं है,’’ सतविंदर ने कहा, ‘‘आज तक किसी डाक्टर ने तुम्हें तुम्हारी बीमारी के बारे में बताया है? दरअसल तुम्हें कोई बीमारीवीमारी नहीं है. किसी ने कुछ कर करा दिया है. मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि संतजी तुम्हें हफ्ते भर में भलीचंगी कर देंगे.’’

इस के बाद जसपाल कौर बहन सतविंदर कौर के साथ संतजी के यहां जा पहुंची थी.

संत का इतिहास कुछ इस तरह से था. एक बार दसवीं में फेल होने के बाद इंदरजीत सिंह ने पढ़ाई को तिलांजलि दे दी और गुरुद्वारा में जा कर पूजापाठ करने लगा. उस की इस पूजापाठ से गांव वाले उस की इज्जत करने लगे. इस से प्रेरित हो कर वह इस दिशा में और आगे बढ़ने की कोशिश करने लगा. उसी बीच एक ऐसी घटना घटी कि उस की इज्जत एकदम से बढ़ गई.

गांव की परमजीत कौर को दौरे पड़ते थे. एक दिन वह गुरुद्वारा में मत्था टेकने आई तो इंदरजीत ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारी बीमारी के लिए दवा तैयार कर रहा हूं. वाहेगुरु ने चाहा तो उस दवा से ठीक हो जाओगी.’’

इंदरजीत देसी दवा बनाने के नुस्खे वाली किताबें पढ़ा करता था. उन्हीं नुस्खों पर दवा तैयार कर के उस ने परमजीत कौर को दी. मनोवैज्ञानिक प्रभाव था या अन्य कोई वजह, संयोग से कुछ ही दिनों में परमजीत बिलकुल ठीक हो गई. इसी तरह के कुछ और मामले इंदरजीत ने सुलझाए तो गांव में उस का रुतबा बढ़ गया. इस के बाद वह कहने लगा कि उस ने अपनी अलौकिक शक्ति से ये कारगर दवाएं तैयार की थीं. इसी वजह से गांव में सब उसे सम्मान की दृष्टि से देखने लगे. लोग अब उसे संतजी कह कर बुलाने लगे.

धीरेधीरे संत इंदरजीत की शोहरत आसपास के इलाकों में फैल गई. अनुभव के आधार पर संत इंदरजीत की देसी दवाओं और जड़ीबूटियों की काफी जानकारी हो गई थी. आशीर्वाद लेने और अपने भविष्य के बारे में जानने के लिए आने वाले लोगों के अलावा लड़कियां और महिलाओं की एक ऐसी संख्या थी, जो जरा सी बीमारी के लिए भी दवा लेने उस के पास चली आती थीं. उन्हीं में एक सतविंदर कौर भी थी. वह संतजी से काफी प्रभावित थी. यही वजह थी कि वह अपनी छोटी बहन जसपाल कौर को भी समझाबुझा कर उस के पास ले आई थी. जसपाल कौर में ऐसा न जाने क्या था कि पहली ही नजर में वह संत इंदरजीत को भा गई थी. उसे लगा कि शायद यह उसी के लिए बनी है.

जसपाल कौर भी संत के व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हुई थी. पति से सालों से दूर रह रही जसपाल को भी संत भा गया था. पहली ही नजर में दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित हो गए थे. फिर तो पहली नजर के इस प्यार ने उन के भीतर इस कदर कशिश बढ़ा दी कि दोनों 2-4 दिनों के अंतर से मिलने लगे. जसपाल न आ पाती तो इंदरजीत खुद उस के गांव पहुंच जाता. चाहत बढ़ी तो जल्दी ही दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए. इस के बाद जसपाल की हर बीमारी उड़नछू हो गई. जसपाल के बताए अनुसार, संतजी के आगोश में आने के बाद वह पूरी दुनिया भूल गई थी. संत का सभी आदर करते थे. उस की तरफ अंगुली उठाने की हिम्मत किसी में नहीं थी. जसपाल कौर को ले कर जब उस की सच्चाई लोगों के सामने आने लगी तो पहले लोगों ने दबी जुबान में, फिर खुल कर इस मामले पर चर्चा करने लगे.

कुछ लोगों ने इस की चर्चा बलवान सिंह से भी की. बलवान सिंह ने इस बात को गंभीरता से लिया और जसपाल कौर को समझाना चाहा तो उस ने उन का घर छोड़ दिया और बड़ी बहन सतविंदर के साथ रहने लगी. बच्चों को भी वह अपने साथ नहीं लाई. बलवान सिंह गांव में अपनी रुसवाई नहीं करवाना चाहते थे, साथ ही विदेश में रह रहे बेटे को भी इस बारे में बता कर परेशान नहीं करना चाहते थे. लिहाजा वह जितना चुप रहे, जसपाल उतनी ही बागी होती गई.

फलस्वरूप तथाकथित संत इंदरजीत के प्रति लोगों के मन में गुस्सा पैदा होने लगा. जब यह गुस्सा बढ़ने लगा तो गांव में टिके रहना संत को खतरे से खाली नहीं लगा. उसे लगने लगा कि जसपाल के साथ उस के संबंधों को ले कर गांव में कभी भी विस्फोट हो सकता है, जो उन दोनों के लिए काफी महंगा साबित हो सकता है. यह सब सोच कर एक रात संत इंदरजीत ने गांव छोड़ दिया और खरड़ के नजदीकी गांव छिन्नाहर्षा में जा कर रहने लगा. जल्दी ही संत ने यहां भी अपनी प्रतिष्ठा कायम कर ली. जसपाल कौर भी उस के साथ थी. अब तक जसपाल की ससुराल वालों ने उस की तरफ से मुंह मोड़ लिया था. सब ने तय कर लिया था कि दशमेश के स्वदेश लौटते ही उस से जसपाल को तलाक दिलवा दिया जाएगा.

लेकिन दशमेश के छोटे भाई सुरिंदर सिंह को अपनी भाभी के इस गलत दिशा में उठे कदम काफी दुखी किया था. यह बात उस से बरदाश्त नहीं हो रही थी. उस के बारे में सोचसोच कर उस का मन अवसाद से भर जाता था. एक दिन वह छिन्नाहर्षा स्थित संत के डेरे पर गया. जसपाल कौर और संत इंदरजीत बैठे बातें कर रहे थे. संत को नजरअंदाज कर के सुरिंदर ने जसपाल कौर के पैरों को छू कर कहा, ‘‘भाभी, मैं ने तुम्हें हमेशा मां के रूप में देखा है. मैं तुम से यह कहने आया हूं कि इस संत को छोड़ कर अपनी दुनिया में लौट चलो.’’

‘‘तुम अपने घर जाओ सुरिंदर, अब यही मेरी दुनिया है.’’ जसपाल कौर ने दो टूक जवाब दिया.

‘‘भाभी, तुम मुझ से ज्यादा समझदार हो. इस बात को तुम मुझ से बेहतर जानती हो कि औरत की जन्नत उस के पति का घर होती है.’’

‘‘देखो सुरिंदर, फालतू बातें करने की जरूरत नहीं है. मैं यहां खुश नहीं, बहुत ज्यादा खुश हूं. अब मुझे तुम लोगों से कुछ लेनादेना नहीं है.’’ जसपाल कौर झुंझला कर बोली.

‘‘क्या भैया से भी नहीं?’’ सुरिंदर ने पूछा.

‘‘नहीं.’’

‘‘मुझ से और अपने बच्चों से भी तुम्हारा कोई वास्ता नहीं है?’’

‘‘नहीं, तुम सब लोग मेरे लिए मर चुके हो.’’

‘‘भाभी, अगर ऐसा है तो तुम एक बात सुन लो, अगर तुम कल तक घर नहीं लौटी तो तुम्हारा यह देवर अपनी जान दे देगा.’’

‘‘अरे कल का इंतजार क्यों, आज ही अपनी जान दे दो. तुम जियो या मरो, मुझे कोई परवाह नहीं है. मेरे पास दुनिया का हर सुख है.’’ जसपाल कौर ने कहा.

देवरभाभी की इस बातचीत में संत इंदरजीत कुछ नहीं बोला. वह चुपचाप मंदमंद मुसकराता रहा. अगली रात सुरिंदर ने बहुत ज्यादा शराब पी कर आत्महत्या कर ली थी. मरने से पहले उस ने घर वालों के लिए जो संदेश छोड़ा था, उस में उस ने लिखा था कि वह आत्महत्या का कारण नहीं बता सकता. इस तरह यह मामला रफादफा हो गया था. क्योंकि किसी ने गहराई में जाने की कोशिश ही नहीं की थी. दशमेश को भी यही सूचना भेजी गई थी कि ज्यादा शराब पीने की वजह से सुरिंदर भगवान को प्यारा हो गया था. देखतेदेखते 6 महीने का समय बीत गया. संत इंदरजीत और जसपाल कौर का लगाव धीरेधीरे इतना गहरा हो गया कि लोगों का मुंह बंद करने के लिए उन्होंने शादी करने का मन बना लिया.

इस के लिए जरूरी था कि जसपाल कौर दशमेश से तलाक ले, जिस के लिए शायद वह किसी भी कीमत पर राजी न होता. इसी बात के हल के लिए संत ने मन ही मन खतरनाक योजना बना डाली. इस के बाद उस ने जसपाल से कहा, ‘‘तुम दशमेश को किसी तरह यहां बुलाओ. मैं कुछ इस तरीके से उस का पत्ता साफ करूंगा कि किसी को हम पर जरा भी शक नहीं होगा.’’

‘‘जैसा आप कहेंगे संतजी, मैं वैसा ही करूंगी. मैं दशमेश को बुलाने की कोशिश करती हूं.’’

संत के निर्देशानुसार जसपाल ने दशमेश को लगातार कई पत्र लिखे और फोन किए. इस पर भी दशमेश आने को राजी नहीं हुआ तो उस ने धमकी देते हुए कहा कि अगर अब वह वापस नहीं आया तो वह उसे छोड़ कर किसी और के साथ घर बसा लेगी. आशा के अनुरूप दशमेश भारत लौट आया. गांव पहुंचने पर पत्नी की करतूतों के बारे में पता चला तो वह गुस्से में भरा संत इंदरजीत के डेरे पर जा पहुंचा. लेकिन संत ने उसे अपनी वाणी और शब्दजाल से ऐसा संतुष्ट किया कि उस का गुस्सा शांत हो गया. इस के बाद संत ने कोई बूटी घोल कर शरबत तैयार किया और उसे दशमेश को प्रेम से पिला दिया. उस के पीने के बाद वह उठनेबैठने और चलनेफिरने लायक नहीं रहा.

इस के बाद संत और जसपाल ने चारों तरफ यह बात फैला दी कि दशमेश भी संत का पक्का शिष्य बन गया है. संत ने क्षेत्र के अपने भक्तों में अपना ऐसा प्रभुत्व स्थापित कर लिया था कि उस की प्रचारित अफवाह पर सब ने यकीन कर लिया. अगर जसपाल कौर का मामला दरकिनार कर दिया जाए तो संत इंदरजीत अपने भक्तों के लिए किसी अवतार से कम नहीं था. अपने इसी प्रभाव का फायदा उठाते हुए एक रात संत इंदरजीत ने दशमेश को सल्फास घुली शराब पिला कर मौत की नींद सुला दिया और आधी रात के बाद जसपाल की मदद से उस की लाश को गांव वडाली को जाने वाले रास्ते पर स्थित एक पोखर में फेंक दिया.

लाश फेंकने से पहले उन्होंने दशमेश के शरीर पर अंडरवियर छोड़ कर उस के सारे कपड़े उतार लिए थे और खुद को बचाने के लिए उसी के साथ संत ने खुद की लिखावट बदल कर दशमेश की ओर से सुसाइड नोट भी लिख कर वहां छोड़ दिया था. संत इंदरजीत और जसपाल कौर अपराधी प्रवृत्ति के तो थे नहीं, जिस्मानी भूख मिटाने के चक्कर में बिना कुछ सोचेसमझे यह अपराध कर बैठे थे. शायद यही वजह थी कि बचने की तमाम कोशिश करने के बावजूद वे फंस गए थे. संत की करतूत जब उस के भक्तों के सामने आई तो सभी ने नफरत से उस की ओर से मुंह मोड़ लिया. दशमेश के कपड़े आदि बरामद करने के लिए जिस दिन पुलिस संत को ले कर छिन्नाहर्षा स्थित उस के आश्रम पहुंची, हजारों लोगों ने उस के विरुद्ध नारे लगाए और पुलिस प्रशासन से उसे और जसपाल कौर को फांसी दिलवाने की मांग की.

संत और जसपाल कौर को अपने किए पर कोई पछतावा नहीं था. दोनों का कहना था कि उन्हें सजा हो भी गई तो सजा के बाद वे दोनों बाहर आएंगे तो पतिपत्नी की तरह साथसाथ रहेंगे. रिमांड अवधि समाप्त होने पर थाना खरड़ पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें पटियाला की केंद्रीय जेल भेज दिया गया. पुलिस ने समय पर दोनों के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर अदालत में पेश कर दिया.  रोपड़ की अदालत में 3 साल केस चला. माननीय सेशन जज ने संत इंदरजीत और जसपाल कौर को दशमेश सिंह की हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाई, जिसे दोनों पटियाला की जेल में भुगत रहे हैं.

बहरहाल, यह कहना कतई अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आज पारंपरिक आस्थाओं और धर्मों से हट कर पाखंड और प्रपंच से ओतप्रोत एक ऐसी आडंबरी दुनिया रच दी गई है, जिस के स्वयंभू भगवान बन बैठे हैं. इस के संचालक अपने छल से न केवल लोगों को ठगते हैं, बल्कि उन्हें अपराध करना भी सिखाते हैं और खुद भी अपराध की राह पर चलने से नहीं कतराते. आज बहुत जरूरी है कि ऐसे ढोंगी संतोंबाबाओं की कुदृष्टि से समाज को बचाने में कोई कसर न छोड़ी जाए. Punjab Crime

 

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