Crime Story: राजेश मास्टर गोवर्धनदास को इस बात की सजा देना चाहता था कि उस बूढ़े मास्टर ने उस की पत्नी को खराब किया था. उस ने पत्नी की मदद से मास्टर को सजा तो दे दी, लेकिन नतीजा क्या निकला…

मैं उन दिनों पंजाब के जिला पटियाला का एसएसपी था, जब यह लोमहर्षक हत्याकांड घटित हुआ था. 1994 में आईपीएस अधिकारी के रूप में मैं ने पंजाब पुलिस जौइन की थी. अपनी 21 साल की नौकरी में कत्ल की ऐसी दास्तान मेरे सामने इस के पहले नहीं आई थी. 2 दिनों के कस्टडी रिमांड में थाना पुलिस के साथ मैं ने भी इस हत्याकांड के अभियुक्तों सुदीप कौर और राजेश से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की थी. इस पूछताछ में उन लोगों ने हमें जो कुछ बताया था और पुलिस जांच में जो तथ्य सामने आए थे, उस से अपराध की एक ऐसी कहानी सामने आई थी, जो काल्पनिक अपराध कथाओं से भी कहीं ज्यादा रोचक एवं अविश्वसनीय थी.

जाट सुरजीत सिंह पटियाला के एक अस्पताल में नौकरी करता था, जबकि उस की पत्नी दलजीत कौर घर की जिम्मेदारी संभालती थी. उन के यहां बच्चों में एक बेटा और 3 बेटियां थीं. दलजीत चाहती थी कि उस की सभी संतानें खूब पढ़लिख कर अच्छी नौकरियां हासिल कर के अपना भविष्य बनाएं. यह परिवार मूलरूप से जिला पटियाला के एक गांव का रहने वाला था. बच्चों की पढ़ाई की खातिर पटियाला शहर आ गया था और राजपुरा कालोनी में किराए का मकान ले कर रहने लगा था.

एक समस्या ने यहां भी इस का पीछा नहीं छोड़ा था. वह समस्या थी सुरजीत सिंह का नियमित शराब पीना. इसी वजह से घर में काफी लड़ाईझगड़ा होता रहता था. ऐसे माहौल में बच्चों के लिए पढ़ाई कर पाना मुश्किल हो जाता था. बच्चों में सब से बड़ी बेटी सुदीप कौर पढ़ाई में काफी होशियार थी. पटियाला आने के बाद सुदीप को मास्टर गोवर्धनदास के बारे में पता चला तो वह उन से मिलने उन के घर गई. पहले वह अर्थशास्त्र के अध्यापक थे और अपने विद्यार्थियों में वह काफी प्रसिद्ध थे. पढ़ाने में उन का कोई जवाब नहीं था. कुछ सालों पहले नौकरी से रिटायर होने के बाद वह घर पर ट्यूशन पढ़ाने लगे थे. गरीब विद्यार्थियों को वह मुफ्त ट्यूशन पढ़ाते थे.

पटियाला के पुराने एरिया में मास्टर गोवर्धनदास का बहुत बड़ा मकान था. पूछतेपूछते सुदीप भी उन के यहां जा पहुंची थी. मास्टरजी को लगा कि लड़की पढ़ाईलिखाई में होशियार है, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति पढ़ाई में बाधा बन रही है तो उन्होंने उसे मुफ्त में ट्यूशन पढ़ाने के लिए हामी भर दी. मास्टर गोवर्धनदास की छत्रछाया में सुदीप ने इकोनौमिक्स से एमए किया. वह एलएलबी कर के वकील बनना चाहती थी. लेकिन वह वकील बन पाती, घर वालों ने पहले ही उस की शादी कर दी. सुदीप पढ़लिख तो गई ही थी, उस की उम्र भी शादी लायक हो गई थी, इसलिए घर वालों ने अच्छा रिश्ता देख कर उस की शादी कर दी थी.

अब तक मास्टर गोवर्धनदास को भी अपनी इस लायक शिष्या से काफी लगाव हो गया था. उस की पारिवारिक स्थिति भी उन से छिपी नहीं थी, इसलिए उन्होंने उस की शादी में दिल खोल कर खर्च किया था. सुदीप के पति का नाम था राजेश. उस के साथ सुदीप जब कभी गोवर्धनदास के यहां जाती, वह उन की आवभगत बेटी और दामाद की तरह ही करते थे.

एक दिन गोवर्धनदास के परिवार के सभी लोग कहीं गए हुए थे. घर में वह और उन का बेटा अशोक था. दोपहर को मास्टरजी के लिए किसी का फोन आया. फोन पर बात करने के बाद उन्होंने बेटे से कहा, ‘‘अशोक, सुदीप के पति के काम से मुझे अभी दिल्ली जाना होगा. तुम मेरी अटैची तैयार कर दो, मैं 2-4 दिनों बाद लौटूंगा.’’

पिता के स्वभाव को अशोक बखूबी जानता था. जब भी किसी को उन की जरूरत पड़ती थी, वह न वक्त की परवाह करते थे और न खर्चे की. क्योंकि उन के पास पैसों की कमी तो थी नहीं. पैंशन मिल ही रही थी, अच्छे और संपन्न घरों के बच्चे उन के यहां ट्यूशन पढ़ने आते थे, जिन से वह मोटी फीस वसूल करते थे. चूंकि इस उम्र में भी वह बढि़या कमा रहे थे, इसलिए घर में किसी की ओर से उन पर कोई बंदिश नहीं थी. वह जहां चाहे जा सकते थे, मर्जी के हिसाब से खर्च कर सकते थे.

पिता के कहने पर अशोक ने तुरंत उन की अटैची तैयार कर दी और अपनी स्कूटर से उन के कहे अनुसार गुरुद्वारा दुख निवारण के पास छोड़ दिया. गोवर्धनदास के जाने के बाद उन के बेटे अशोक को भी किसी काम से पटियाला से बाहर जाना पड़ गया. 3 दिनों बाद लौट कर जब उस ने पिता के बारे में पूछा तो पता चला कि वह अभी दिल्ली से लौट कर नहीं आए हैं. उन का कोई फोन भी नहीं आया है. अशोक ने पिता को फोन किया तो उन का मोबाइल स्विच्ड औफ बता रहा था. अशोक ने सोचा कि बैटरी वगैरह डिस्चार्ज हो गई होगी. इसलिए ऐसा हो रहा है.

लेकिन जब अगले दिन भी उन का फोन बंद बताता रहा तो अशोक को पिता की चिंता हुई. वह सुदीप के पति का काम कराने की बात कह कर दिल्ली गए थे, इसलिए उन के बारे में सुदीप से ही कुछ पता चल सकता था. अशोक तुरंत उस के घर जा पहुंचा. सुदीप और उस का पति घर पर ही थे. अशोक ने जब उन से पिता के बारे में पूछा तो उन्होंने एक साथ कहा, ‘‘मास्टरजी हमारे किसी काम से दिल्ली नहीं गए. हम ने उन्हें किसी काम के लिए कहा ही नहीं था. हमें तो यह भी पता नहीं कि मास्टरजी दिल्ली गए हुए हैं.’’

उन के इनकार करने से अशोक निराश हो कर घर लौट आया. इस के बाद परिवार के सभी लोग गोवर्धनदास की तलाश में जुट गए. काफी कोशिश के बाद भी जब कोई सफलता हाथ नहीं लगी तो अशोक अगले दिन सुबह अर्बन एस्टेट पुलिस चौकी जा कर चौकीप्रभारी एसआई बलविंदर सिंह से मिला. उन से पूरी बात बताई तो उन्होंने मास्टर गोवर्धनदास की गुमशुदगी दर्ज कर के काररवाई शुरू कर दी. गोवर्धनदास के दामाद दलीप कुमार वर्मा ने देखा कि मास्टरजी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल रही है तो उन्होंने थाना सदर में तहरीर दी कि ‘मैं गोवर्धनदास की बेटी सीमा का पति हूं. मेरे ससुरजी सरकारी स्कूल से रिटायर होने के बाद घर पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते थे. उन्हीं में एक सुदीप कौर भी थी, जिसे मेरे ससुरजी बेटी की तरह मानते थे. 2-3 महीने पहले उस की शादी राजेश से हो गई थी.

‘जब वह कुंवारी थी तो गुरमेज सिंह निवासी गांव मिदड़ो व जगबीर सिंह निवासी गांव लहरां अकसर उसे मेरे ससुरजी के यहां छोड़ने आते थे. इस पर मेरे ससुरजी ने ऐतराज किया. इस बात को ले कर एक बार मेरी भी उन से तकरार हुई. बाद में मैं ने सुदीप और उन दोनों लड़कों के संबंधों के बारे में पता लगाया.

‘पता चला कि उन दोनों लड़कों से सुदीप के नाजायज संबंध थे. वह उन लड़कों के साथ होटलों में भी जाया करती थी. जब इस बात की जानकारी मेरे ससुरजी को हुई तो उन्होंने उसे समझाते हुए चेतावनी दी कि वह उन लड़कों से अपने संबंध हमेशा के लिए खत्म कर ले.

‘इस बात से नाराज हो कर गुरमेज और जगबीर ने मेरे ससुरजी को धमकी भी दी थी. इस के बाद सुदीप की शादी हो गई तो बात आईगई हो गई. शादी के बाद सुदीप कभी अकेली तो कभी अपने पति राजेश के साथ मेरे ससुरजी के यहां आती रहती थी.

‘अब तक गुरमेज और जगबीर की बात सब के दिमाग से निकल गई. इस के बाद सुदीप के पति का काम करवाने के लिए दिल्ली जाने की बात कह कर मेरे ससुरजी घर से निकले थे. लेकिन वह गए तो लौट कर नहीं आए.

‘घर से जाते समय मेरे ससुरजी स्टेट बैंक औफ पटियाला का अपना एटीएम कार्ड और मोबाइल फोन साथ ले गए थे. जब कई दिनों तक उन का मोबाइल फोन बंद बताता रहा तो चौकी पुलिस की मदद से मैं ने अपने ससुरजी का खाता चैक करवाया, तब बैंक से पता चला कि उस में से 75 हजार रुपए निकाले गए हैं. खाते में ढाई लाख रुपए और बचे थे. इसलिए मैं ने खाते को सील करवा दिया.

‘मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे ससुरजी को साजिश के तहत गुरमेज और जगबीर ने ही अगवा किया है. इस की वजह यह हो सकती है कि उन दोनों के सुदीप से नाजायज संबंध थे और मेरे ससुरजी इन की राह का रोड़ा बने हुए थे. उन्हीं लोगों ने मेरे ससुरजी को मौत के घाट उतारने के लिए अपहरण किया है.

‘यह भी हो सकता है कि उन लोगों ने मेरे ससुरजी को मौत के घाट उतारने के बाद उन की लाश को ठिकाने लगा दिया हो. आप से विनती है कि तीनों के खिलाफ मामला दर्ज कर सख्त काररवाई करें.’

थानाप्रभारी मनजीत सिंह बराड़ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दलीप वर्मा की इस तहरीर पर भादंवि की धारा 364 के तहत मामला दर्ज करा दिया और वांछित मुजरिमों की तलाश में उन के ठिकानों पर छापामारी शुरू कर दी. छापेमारी में जगबीर और गुरमेज ही नहीं, सुदीप और राजेश भी अपनेअपने घरों से नदारद मिले. 2 दिनों तक इन चारों के बारे में कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली. पटियाला के फोकल पौइंट इलाके में एक फर्म है, जिस के मालिक व्यापारी होने के साथसाथ समाजसेवी भी हैं. एक दिन उन्होंने सुदीप और राजेश को थानाप्रभारी मनजीत सिंह बराड़ के सामने पेश कर के कहा कि मास्टर गोवर्धनदास का कत्ल इन्हीं लोगों ने किया है. यह अपना अपराध स्वीकार कर रहे हैं.

जब कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति इस तरह के दोषी को पुलिस के सामने पेश करता है तो इस प्रक्रिया को एक्स्ट्रा जूडीशियल कन्फैशन कहा जाता है. इस के अधीन पुलिस मुजरिम को पेश करने वाले व्यक्ति का सीआरपीसी की धारा 161 के तहत बयान दर्ज कर के अपराधियों को विधिवत गिरफ्तार कर के आगे की काररवाई करती है. इस मामले में भी मनजीत सिंह ने ऐसा ही किया. इधर पुलिस की काररवाई शुरू हुई, उधर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से आए वारंट औफिसर ने थाने में छापा मार दिया. उन का कहना था कि थाना पुलिस राजेश और सुदीप को गलत तरीके से हिरासत में रख कर उन पर झूठा केस बनाने की कोशिश कर रही है. इस संबंध में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका उच्च न्यायालय में दाखिल की गई थी.

मनजीत सिंह बराड़ को समझते देर नहीं लगी कि जिन 2 मुजरिमों को उन की अपराध स्वीकृति की पेशकश के साथ ला कर उन के समक्ष पेश किया गया था, दोनों बहुत ही शातिर और अव्वल दर्जे के चालाक थे. लेकिन मनजीत सिंह भी कम चालाक नहीं थे. उन्होंने सारी कानूनी काररवाई बड़ी तेजी से की थी. अगर उन्होंने ऐसा न किया होता तो वारंट अधिकारी सुदीप और राजेश को अपने साथ ले जाता तो फिर शायद वे दोनों जल्दी उन की पकड़ में न आ पाते.

मनजीत सिंह ने सारी जानकारी डीएसपी गुरमीत चौहान को उन के मोबाइल पर दी तो वह भी तत्काल थाने आ गए. सुदीप और राजेश के अपराध और उन की गिरफ्तारी के सारे कागजात देख कर वारंट औफिसर संतुष्ट हो कर चले गए. यह मामला पहले ही मेरी नोटिस में आ चुका था. लेकिन जब डीएसपी गुरमीत चौहान ने यह सब मुझे विस्तार से बताया तो इस केस में मेरी रुचि और बढ़ गई. शुरू में ही अच्छाखासा झटका लग गया था, इसलिए आगे हर कदम फूंकफूंक कर रखने की जरूरत थी. उस दिन सुदीप और राजेश से कोई खास पूछताछ नहीं हो सकी. दोनों को हवालात में अलगअलग बंद कर दिया गया था. रात में भी खाना खा कर उन्हें सोने दिया गया.

अगले दिन थाना पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश कर के 2 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान इंसपेक्टर मनजीत सिंह, डीएसपी गुरमीत चौहान और सीआईए पुलिस के अलावा मैं ने भी दोनों से मनोवैज्ञानिक तरीके से व्यापक पूछताछ की. इस पूछताछ में राजेश और सुदीप ने हमें जो कुछ बताया, उस से अपराध की एक अलग तरह की जो कहानी सामने आई, वह इस तरह थी. कहानी का कुछ हिस्सा ऊपर आ ही चुका है. आगे की कहानी कुछ इस तरह थी. सुदीप जब मास्टर गोवर्धनदास के यहां ट्यूशन पढ़ने आने लगी तो वह अकेली ही आतीजाती थी. ऐसे में रास्ते में कुछ लड़के उस से छेड़खानी करते थे.

उन में कुछ लड़के ऐसे भी थे, जो उसे अपनी कार में लिफ्ट देने की कोशिश करते थे. उन्हीं लड़कों में गुरमेज और जगबीर भी थे. ये अन्य लड़कों की अपेक्षा कुछ होशियार थे. जल्दी ही सुदीप इन के जाल में फंस गई. दोनों सुदीप को अपनी कार से घुमाने लगे और उस पर दिल खोल कर पैसे लुटाने लगे. बदले में सुदीप उन की बांहों में सिमट कर उन्हें खुश करने लगी थी. एक बार वह किसी होटल के कमरे में गुरमेज के साथ आपत्तिजनक अवस्था में पकड़ी गई तो यह बात उस के घर तक जा पहुंची. इस के बाद उस के पिता ने उस की बहुत पिटाई की. पिता उस की पढ़ाई बंद करा देना चाहते थे, लेकिन मास्टर गोवर्धनदास के बीच में आ जाने से उस की पढ़ाई जारी रही.

अब सुदीप एक तरह से मास्टर गोवर्धनदास की पनाह में आ गई थी. मास्टरजी उस का भला चाहते थे, इसलिए उसे उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करते थे. सुदीप की मां की तरह वह भी चाहते थे कि सुदीप पढ़लिख कर कुछ बन जाए. इसीलिए उन्होंने गुरमेज और जगबीर से संबंध तोड़ कर ठीक से पढ़ने को कहा. अब सुदीप का ज्यादा समय मास्टरजी के यहां ही बीतने लगा था. कभीकभी वह रात में भी उन के यहां रुक जाती थी. एक रात मास्टरजी घर पर अकेले थे. उस रात भी देर होने की वजह से सुदीप उन के घर रुक गई तो उस के सामने मास्टरजी के ‘सज्जन’ होने का भेद खुल गया.

भेड़ की खाल में वह पूरे भेडि़या निकले. उन्होंने सुदीप को इमोशनली ब्लैकमेल कर के उस से शारीरिक संबंध बना लिए. शुरुआत होने के बाद यह रोज का सिलसिला बन गया. सुदीप को वह अकेली ही पढ़ाते थे. उसी बीच वह कमरे का दरवाजा बंद कर के अपनी ‘फीस’ वसूल लेते थे. एक तो गोवर्धनदास अध्यापक थे, दूसरे बुजुर्ग, इसलिए उन के और सुदीप के बीच बने इस अनैतिक संबंधों पर किसी को संदेह नहीं हुआ. यही वजह थी कि वह अपनी इस शिष्या से संबंध बनाए रहे. एमए करने के बाद सुदीप ने गोवर्धनदास से इच्छा जताई कि वह एलएलबी कर के वकील बनना चाहती है तो मास्टरजी ने उसे पूरा सहयोग करने का आश्वासन दिया. लेकिन उसी बीच सुदीप की शादी की बात चलने लगी तो आगे की पढ़ाई खटाई में पड़ गई.

सुदीप ने अपनी शादी की बात मास्टरजी से बताई तो उन्होंने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे घर वाले जहां चाहते हैं, तुम वहां शादी कर लो. जिस लड़के से तुम्हारी शादी होगी, वह तो तुम्हारा नाम का पति होगा. क्योंकि तुम्हें तो मेरे साथ संबंध बनाए रखना है. अगर शादी के बाद भी तुम मुझ से संबंध बनाए रहोगी तो तुम्हारा ही नहीं, तुम्हारे पति का भी हर तरह से खयाल रखूंगा.’’

सुदीप की शादी के लिए उस के मांबाप के पास उतने पैसे नहीं थे, जितने की जरूरत थी. इस के बावजूद वह उस की शादी जल्दी से जल्दी कर देना चाहते थे. इस की वजह यह थी कि शायद उन्हें मालूम हो चुका था कि उन की बेटी के कदम बहक चुके हैं. ऐसे में समय रहते उस पर नकेल न कसी गई तो वह जिस लड़के के साथ होटल में पकड़ी गई है, उस के साथ कोई नया गुल खिला सकती है. यही सब सोच कर उस के मांबाप पूरी तरह से इस कोशिश में लग गए कि जितनी जल्दी हो सके, कोई शरीफ लड़का ढूंढ़ कर उस की शादी कर दें. आखिर उन्हें राजेश मिल गया, जिस के साथ उन्होंने सुदीप की शादी कर दी.

राजेश के पिता का नाम अचित्तर सिंह और मां का सुरजीत कौर था. खेतीकिसानी करने वाला यह परिवार संगरूर के गांव माजरा का रहने वाला था. राजेश ने 10वीं पास कर के पढ़ाई छोड़ दी थी. उसे गाने का बहुत शौक था. उसे लगता था कि अगर वह अपने इस शौक को थोड़ा निखार ले तो प्रोफेशनल सिंगर बन कर नाम और पैसा, दोनों कमा सकता है. यही वजह थी कि 10वीं पास कर के वह गांव छोड़ कर संगरूर के मशहूर गायकों की शरण में आ गया था और गायकी के हुनर सीखने लगा था. सीखने के साथसाथ वह उन गायकों के साथ स्टेज शो भी करने लगा था.

उसी दौरान उस ने कुछ वीडियो अलबम्स में छोटेमोटे रोल भी किए थे. इसी बीच उसे एक लड़की से प्रेम हो गया तो उस ने उस के साथ विवाह कर लिया था. लेकिन जल्दी ही उस की पत्नी की मौत हो गई. इस के बाद उस की शादी सुदीप से हो गई थी. शादी के बाद राजेश ने अपने गायक बनने के सपने के बारे में सुदीप को बताया तो वह उसे मास्टरजी के पास ले गई. मास्टर गोवर्धनदास ने न केवल राजेश को उत्साहित किया, बल्कि सुदीप के हाथ पर 10 हजार रुपए रखते हुए कहा, ‘‘जरूरत पड़ी तो आगे भी मैं तुम्हारी इसी तरह मदद करता रहूंगा. मैं तुम्हारे पति का यह सपना जरूर पूरा करूंगा.’’

मास्टरजी ने जिस तरह 10 हजार रुपए सुदीप के हाथ पर रख दिए थे, राजेश हैरान रह गया. सुदीप मास्टरजी से केवल ट्यूशन पढ़ती थी. शादी में मास्टरजी का आना अलग बात थी. लेकिन बिना किसी वजह के इतनी बड़ी रकम देना उसे हैरान करने वाली बात लगी. बस यहीं से उस की सोच बदल गई. राजेश को पूरा विश्वास हो गया कि सुदीप और मास्टर गोवर्धनदास के बीच जरूर कुछ ऐसा है, जिस का खुलासा होने पर दिल बेचैन हो सकता है. उस समय तो उस ने कुछ नहीं कहा, लेकिन घर आ कर उस ने सुदीप पर भावुकता का ऐसा मनोवैज्ञानिक शिकंजा कसा कि उसने रोते हुए मास्टरजी से शारीरिक संबंध होने की बात स्वीकार ली.

इस के बाद उस ने राजेश के पैर छू कर वादा भी किया कि अब आगे वह मास्टरजी से किसी भी तरह का कोई संबंध नहीं रखेगी. सुदीप ने संबंध खत्म करने का भले ही वादा कर लिया, लेकिन राजेश को इतने में संतोष नहीं हुआ. उस ने कहा, ‘‘नहीं, बात इतने में ही खत्म नहीं होती. उस आदमी ने तुम्हें खराब किया है, इसलिए उसे इस की सजा मिलनी चाहिए. मैं उस जलील आदमी को जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’’

सुदीप ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘देखो, नादान मत बनो. मास्टरजी के पास लाखों रुपए हैं और मैं उस के ये रुपए आसानी से हथिया सकती हूं. उन रुपयों से हम तुम्हारे गानों का अलबम तैयार कर के मार्केट में उतारेंगे. तुम्हारा नाम चमकाने में मैं कोई कसर नहीं छोड़ूंगी. तुम्हारे भविष्य के लिए मैं अपना कुछ भी दांव पर लगाने को तैयार रहूंगी.’’

दरअसल, इस तरह की बातें कर के सुदीप मास्टरजी की ओर से राजेश का ध्यान हटाना चाहती थी. सुदीप इस में कामयाब भी हो गई, क्योंकि उस की बातों में उसे वजन लगा था. इस रास्ते से उस के पास इतना पैसा आ सकता था कि उस के गीतों की अलबम भले ही न सही, कैसेट तो निकाली ही जा सकती थी. इस के बावजूद राजेश के दिमाग से यह बात नहीं निकल रही थी कि बुड्ढे मास्टर ने उस की पत्नी से नाजायज संबंध बनाए थे. इस की सजा उसे हर हालत में मिलनी चाहिए. सजा भी ऐसीवैसी नहीं, सीधे मौत. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि वह मास्टर को इस दुनिया से विदा तो करेगा ही, उस का सारा पैसा भी हथिया लेगा.

इस के बाद राजेश और सुदीप किसी न किसी बहाने गोवर्धनदास से पैसा ऐंठने लगे. मास्टरजी न केवल उन के हाथों ब्लैकमेल होते रहे, बल्कि सुदीप से उस के पति के गीतों की कैसेट निकलवाने का वादा भी करते रहे. मास्टरजी को काबू में रखने के लिए सुदीप अभी भी उन के साथ अवैध संबंध बनाए रही. कुछ ही दिनों में सुदीप ने मास्टरजी से इतने पैसे ऐंठ लिए कि राजेश ने अपने लिए मारुति कार खरीद ली. लेकिन इतने में भी उसे तसल्ली नहीं हुई. उस ने और सुदीप ने योजना बनाई कि रिकौर्डिंग कंपनी वालों से मिलने का बहाना कर के मास्टरजी को दिल्ली चलने के लिए तैयार किया जाए और रास्ते में उन का सारा पैसा ले कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाए. योजना बनाने के बाद सुदीप ने यह बात मास्टरजी से कही तो वह उन लोगों के साथ दिल्ली जाने को तैयार हो गए.

राजेश और सुदीप ने मास्टर गोवर्धनदास को अपने साथ दिल्ली चलने के लिए तैयार कर के उन्हें गुरुद्वारा दुख निवारण के नजदीक बुला लिया. यहां से दोनों उन्हें अपनी मारुति कार से माता काली देवी मंदिर के नजदीक के स्टेट बैंक औफ पटियाला के एटीएम पर ले गए, जहां उन से 1 हजार रुपए निकालने को कहा. राजेश भी मास्टरजी के साथ एटीएम केबिन में घुस गया और उन के पिन दबाते समय उन का पिन नंबर याद कर लिया था. वहां से सभी जीटी रोड आ गए. आगे के लिए राजेश ने बेहोशी की दवा पहले से ही खरीद कर रख ली थी. मास्टरजी को साथ ले कर वे लुधियाना पहुंचे. वहां रेलवे स्टेशन की एक फ्रूट जूस की दुकान से उन्होंने संतरे का जूस खरीदा और उस में बेहोशी की दवा मिला कर उसे मास्टरजी को पिला दिया.

इस के बाद वे ब्राऊन रोड पर स्थित एक होटल में रुके तो वहां से वे शाम को निकले. अब तक मास्टरजी पर दवा का असर होने लगा था. मास्टरजी को ले कर वे चंडीगढ़ रोड पर पहुंचे. अब तक वह दिल्ली जाने के बारे में कई बार पूछ चुके थे. राजेश ने उन से कहा था कि कैसेट कंपनी वाले आज पंजाब आए हैं. संभव है कि उन से यहीं मुलाकात हो जाए, फिर दिल्ली नहीं जाना पड़ेगा. चंडीगढ़ रोड पर एक ढाबे पर वे खाना खाने के लिए रुके. वहां भी मास्टरजी की नजरें बचा कर उन की दाल में दवा डाल दी. खाना खाने के बाद वे कार में बैठे तो बैठते ही मास्टरजी पर बेहोशी छाने लगी.

मास्टर गोवर्धनदास कार की पिछली सीट पर बैठे थे. थोड़ी देर में वह एक ओर लुढ़क गए. सुदीप और राजेश को इसी का इंतजार था. कार को नहर के किनारे चलाते हुए वे कटानी गुरुद्वारा की ओर चल पड़े. दोराहे के पास एक जगह कार रोक कर राजेश ने गोवर्धनदास की जेबों से उन का एटीएम कार्ड, मोबाइल और पर्स निकाल कर उन के गले में रस्सी बांध कर नहर तक घसीट कर लाया और फिर उन्हें उठा कर नहर में फेंक दिया. अपना काम कर के दोनों लुधियाना चले गए, जहां भारतनगर चौक पर स्थित स्टेट बैंक औफ पटियाला के एटीएम से मास्टरजी के कार्ड से उन के खाते से 15 हजार रुपए निकाले. वह रात उन्होंने लुधियाना के एक होटल में गुजारी. अगले दिन दोनों लुधियाना में मौजमस्ती करते रहे. इस बीच उन्होंने गोवर्धनदास के एटीएम कार्ड के जरिए कई बार पैसे निकलवाए.

वे 75 हजार रुपए ही निकाल पाए थे कि खाता सील हो गया. पैसे मिलने का रास्ता बंद हो गया तो वे घर लौट आए. राजेश और सुदीप को मालूम था कि मास्टरजी घर नहीं लौटेंगे तो उन के यहां से कोई न कोई पूछने जरूर आएगा. हुआ भी वही. मास्टर का बेटा अशोक जब उन के घर पूछने आया तो उन्होंने अपनी बातों से उसे यकीन दिला दिया कि वे मास्टरजी के बारे में कुछ नहीं जानते. बाद में जब उन्हें मुकदमा दर्ज होने की सूचना मिली तो वे भूमिगत हो गए. घर से फरार होने के बाद उन्हें अपने आप को पुलिस से बचाए रखने में काफी मुश्किल हो रही थी.

लिहाजा सोचसमझ कर उन्होंने एक चाल चली.  एक वकील के जरिए उन्होंने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल करते हुए आरोप लगाया कि पुलिस उन्हें नाजायज हिरासत में रख कर टौर्चर करते हुए किसी झूठे गंभीर केस में फंसाने की कोशिश कर रही है. इसलिए उन्हें पुलिस की गलत हिरासत से छुड़ाया जाए. अपील दाखिल होने के बाद जब उन्हें हाईकोर्ट से वारंट औफिसर के पटियाला पहुंचने की जानकारी मिली तो दोनों ने किसी के माध्यम से पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. हमारी पूछताछ में पैसों के बारे में सुदीप और राजेश ने बताया कि उन में से 27 हजार रुपए उन्होने अपने ऊपर खर्च कर दिए थे. बाकी के पैसे राजेश के गांव वाले घर से बरामद हो गए थे. रिमांड समाप्त होने पर दोनों अभियुक्तों को फिर से अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

विवेचक मनजीत सिंह बराड़ ने उन के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर के समय से इलाका मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश कर दिया, जहां से मामला सेशन कमिट हो कर पटियाला के जिला एवं सत्र न्यायाधीश की कोर्ट में चला गया. वहां से दोनों को उम्रकैद की सजा हुई, आजकल दोनों पटियाला की सेंट्रल जेल में अपनी सजा काट रहे हैं. मेरे कैरियर का यह एक ऐसा केस था, जिसे मैं शायद ही कभी भूल पाऊं. Crime Story

 

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