Gujrat News: भावनगर के फारेस्ट औफिसर शैलेष खांभला का परिवार ऊपर से देखने में भले ही खुशहाल लगता था, लेकिन घर में ऐसी खामोश आग अंदर ही अंदर सुलग रही थी, जिस की कोई कल्पना तक नहीं कर सकता था. इसी बीच शैलेष ने एक ऐसी खूनी साजिश तैयार कर ली, जिस से उस ने न सिर्फ पत्नी बल्कि दोनों बच्चों की हत्या कर उन्हें दफन कर दिया. एक फारेस्ट अधिकारी ने आखिर ऐसा क्यों किया?

गुजरात के जिला भावनगर की फारेस्ट कालोनी की वह सुबह हर दिन से कुछ अलग सी थी. सूरज से निकलने वाली किरणें घरों की छतों पर इस तरह फैल रही थीं, मानो धीरेधीरे कोई राज खोल रही हों. जबकि इस कालोनी का वह घर, जिस में शैलेष खांभला अपनी पत्नी नयनाबेन, बेटे भव्य और बेटी पृथा के साथ रहता था. उस सुबह जैसे किसी अदृश्य परदे में लिपटा हुआ था. दूर से देखने में सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन अंदर ऐसा कुछ था, जिसे हवा भी छूने से डर रही थी. शैलेष खांभला वन विभाग में एसीएफ यानी असिस्टेंट कंजर्वेटर औफ फारेस्ट था. साल भर पहले ही उस का इस पद पर प्रमोशन हुआ था. उस के बाद ही ट्रांसफर हो कर भावनगर आया था.

जयपुरिया शर्ट पहन कर औफिस जाने वाला, नियमों में विश्वास रखने वाला, दिखने में शांत, लोगों से कम बोलने वाला व्यक्ति था शैलेष. लोग कहते थे कि साहब बहुत सीधे हैं, गुस्सा बिलकुल नहीं करते. परिवार से बहुत प्यार करते हैं. और उस की पत्नी नयना एक ऐसी महिला थी, जो अपनी छोटी सी दुनिया को संभालने में ही दिनरात खोई रहती थी. बेटी पृथा 13 साल की थी तो बेटा भव्य 9 साल का. दोनों पढऩे में तो अच्छे थे ही, सभ्य और खुशमिजाज भी थे.

एक अफसर का परिवार होने के बावजूद यह परिवार बिलकुल साधारण दिखाई देता था. नौकरी की वजह से पति बाहर रहता था तो नयना बच्चों को ले कर सूरत के कापोद्रा में सासससुर के साथ रहती थी. बाहर से देखने में सब कुछ सामान्य लगता था. लेकिन कुछ बातें ऐसी भी होती हैं, जो घर की दीवारों के अंदर ही चुपचाप सांसें लेती हैं. उन का किसी को पता तक नहीं चलता कि अंदर ही अंदर क्या हो रहा है, क्या मर रहा है और क्या जन्म ले रहा है?

शैलेष साल भर पहले ही प्रमोशन ले कर भावनगर आया था. यहां रहते हुए उस की दुनिया बदल गई थी, लेकिन यह बदलाव उस के घर में नहीं आया था, उस के औफिस में आया था. वन विभाग में ही नौकरी करने वाली एक युवती शैलजा (बदला हुआ नाम), जिस की उम्र शैलेष से भले कम थी, लेकिन उस का रूप अधिक था. आकर्षण ऐसा था कि देखने वाले की नजर उस पर ठहर जाए. वह विभाग की अपनी जिम्मेदारी अच्छे से निभाती थी. मुसकरा कर बातें करती तो जैसे फूल झड़ते हों. बिलकुल अलग दुनिया से आई हुई लगती थी शैलजा.

प्यार की हुई शुरुआत

मिलने की शुरुआत काम की बातचीत से हुई. शैलजा को काम के सिलसिले में बारबार शैलेष के पास आना पड़ता था. बारबार पास यानी नजदीक आने से शैलेष उस की ओर आकर्षित होने लगा, क्योंकि शैलजा जितनी खूबसूरत थी, उस से कहीं अधिक खूबसूरत उस का बातचीत करने का ढंग था. शैलजा अच्छी लगने लगी तो शैलेष उस के नजदीक जाने की कोशिश करने लगे. शुरुआत हुई वाट्सऐप मैसेज से. आजकल सरकारी आदेश, सूचनाएं, नोटिस आदि वाट्सऐप से ही भेजे जाने लगे हैं. इसलिए औफिस के हर कर्मचारी का नंबर हर किसी के पास होता ही है. इसलिए शैलजा का नंबर भी शैलेष के पास था. शैलेष शैलजा को सरकारी संदेशों के साथसाथ गुडमार्निंग का संदेश भी भेजने लगा था.

गुडमार्निंग का संदेश भेजतेभेजते शैलेष उसे प्यार के द्विअर्थी संदेश भेजने लगा. शैलजा उस के इन संदेशों को अवाइड करने या विरोध करने के बजाय जवाब देने लगी तो शैलेष समझ गया कि शैलजा को वह पसंद हैं. उस के संदेशों से स्पष्ट हो रहा था कि उस ने शैलेष के प्यार के प्रपोजल को स्वीकार कर लिया था. शैलजा को पता था कि शैलेष शादीशुदा ही नहीं, 2 बच्चों का बाप भी है, फिर भी वह शैलेष के प्यार के झांसे में आ गई थी.

जब दोनों को एकदूसरे से प्यार हो गया तो उन की फोन पर बातें होने लगी थीं, जो घंटोंघंटों चलती थीं. फिर तो दोनों के दिलों ने एकदूसरे को इस तरह जकड़ लिया, जैसे जंगल की बेल किसी पेड़ को धीरेधीरे जकड़ लेती है. कहते हैं कि प्यार कभी अचानक नहीं होता. वह धीरेधीरे बढ़ता है, जैसे दीमक किसी लकड़ी में बढ़ता है. शैलेष के मन में भी शैलजा के प्यार का दीमक लग चुका था.

किस ने चुराईं खुशियां

किसी और की मुसकान ने उस के घर की खुशियां चुरा ली थीं. अब घर लौटने में उस का मन शांत नहीं रहता था. वह फोन को सीने से लगा कर सोने लगा था. पत्नी कभी कोई सवाल करती थी तो जवाब देने के बजाय चुप रह जाता था. अपने ही बच्चों से अब उसे कोई मतलब नहीं रह गया था. एक पिता अपने ही बच्चों से दूर होता गया था. एक हंसतेखेलते, सुखीसंपन्न परिवार में एक पुरुष की लंपटता की वजह से काफी कुछ बदल चुका था.

शैलजा शैलेष के जीवन में भावना बन कर नहीं आई थी, बल्कि जुनून बन कर आई थी. एक आग की तरह कि जिसे बुझाना भी चाहो तो वह और भड़क उठे. शैलेष का दिमाग पूरी तरह बदल चुका था. वह सोचने लगा था कि अगर शैलजा के प्यार को पाना है तो उस के लिए कुछ बड़ा करना होगा. कुछ ऐसा करना होगा कि उस के बाद उसे कोई रोकटोक न सके. दुनिया उसे एक अधिकारी, एक भरेपूरे परिवार वाला और एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में देखती थी. हर किसी को लगता था कि शैलेष बहुत सुखी है.

उस की सुंदरसुघड़ पत्नी और 2 प्यारेप्यारे बच्चे हैं. अच्छीखासी कमाई है. संपन्न परिवार से भी है. लेकिन इतना सब कुछ होने के बावजूद उस के अंदर अब एक और आदमी पैदा हो चुका था, जो प्यार नहीं, कब्जा चाहता था. किसी और की देह पर कब्जा. और कब्जा अकसर हिंसा से ही मिलता है. 26 अक्तूबर, 2025 को नयना बच्चों को ले कर सूरत से भावनगर पति के पास आ गई थी. उसे पति के स्वभाव और बातचीत से उस की हरकतों पर संदेह हो गया था, जिस की वजह से वह उस से लडऩेझगडऩे लगी थी. साथ रहने की जिद करने लगी थी.

एक पति पत्नी के साथ जैसा व्यवहार करता है, शैलेष नयना के साथ बिलकुल नहीं कर रहा था. इसलिए यह झगड़ा बढ़ता ही जा रहा था. शैलेष के बदले व्यवहार से नयना को यकीन हो गया था कि शैलेष पूरी तरह बदल गया है. इसलिए नयना अब उस के साथ ही रहना चाहती थी, जबकि शैलेष उसे खुद से दूर ही रखना चाहता था. नयना ने पति की हरकतों को भांप कर तय कर लिया था कि अब वह उस के साथ ही रहेगी. जबकि शैलेष किसी भी हालत में साथ रखने को तैयार नहीं था. इसलिए नयना की जिद से वह परेशान हो उठा था. जब नयना किसी भी हालत में नहीं मानी तो शैलेष उस से छुटकारा पाने के उपाय ही नहीं सोचने लगा था, बल्कि योजना बनाने लगा था.

उसी योजना के तहत 2 नवंबर को शैलेष ने रेंज फारेस्ट अफसर गिरीश बनिया से कहा कि कूड़ा फेंकने और पानी भरने के लिए उसे घर के पीछे वाले खेत में एक बड़ा गड्ïढा खुदवाना है. खेत में गड्ïढा खुदवाना सामान्य बात थी. लेकिन वह गड्ïढा सामान्य नहीं था. वह गड्ïढा भविष्य का श्मशान था.

उसी दिन रेंज फारेस्ट अफसर गिरीश बनिया ने शैलेष के सरकारी क्वार्टर से 20 फीट की दूरी पर जेसीबी से मिट्टी हटवा कर गहरा गड्ïढा खुदवा दिया. गड्ïढा छोटामोटा नहीं खुदवाया था, शैलेष ने पूरे साढ़े 6 फुट गहरा गड्ïढा खुदवाया था. गिरीश ने सोचा था कि शैलेष ने किसी खास काम यानी कूड़ा डालने और पानी भरने के लिए गड्ïढा खुदवाया होगा. तब किसे पता था कि वह गड्ïढा 3 जिंदगियों का अंतिम ठिकाना बनने वाला है.

4 नवंबर, 2025 से शैलेष का व्यवहार एकदम से बदल गया था. घर में कुछ बेचैनी सी फैल गई थी. उस का बदला व्यवहार देख कर पत्नी ने पूछा भी था कि सब ठीक तो है न? जवाब में उस ने कहा था, ”हां, सब ठीक ही है. कुछ तो नहीं है.’’ लेकिन उस के इस ‘कुछ तो नहीं है’ में एक ऐसा तूफान छिपा था, जिस में सब उड़ जाना था. जो बच्चे रोज उस के साथ खेलते थे, वे उस से दूर हो गए थे. वे अपने मन से नहीं दूर हुए थे, बल्कि शैलेष ने खुद उन्हें दूर कर दिया था. पिता के बातव्यववहार से उन्हें भी हवा से कुछ गड़बड़ होने का अहसास हो रहा था.

4 नवंबर की सुबह साढ़े 8 बजे के करीब रेंज फारेस्ट औफिसर ने शैलेष को फोन किया कि सर खेत में जो गड्ïढा खोदा था, उस में एक मोर गिर कर मर गया है. इसलिए गड्ïढा पटवाना जरूरी है. शैलेष भाग कर आया. उस ने कहा कि यहां तो कोई मोर नहीं है. आरएफओ हैरान रह गया था, क्योंकि उस ने अपनी आंखों से गड्ढे क में मरा हुआ मोर देखा था. वह खड़ा यही सोच रहा था कि शैलेष झूठ क्यों बोल रहा है? आखिर यह आदमी गड्ïढा भरवाने से मना क्यों कर रहा है?

जो भी राज था, वह शैलेष के मन में ही था. गड्ढे क का वह क्या करेगा, यह किसी को पता नहीं था. इसलिए लोगों को शक होने लगा था. उस रात भावनगर में हवा कुछ अलग ही चल रही थी. वह ऐसी हवा थी, जो शांत तो थी, पर डरावनी भी थी. घर में बच्चों की आवाजें धीमी पड़ गई थीं. नयना को कुछ बेचैनी सी हो रही थी. शैलेष का चेहरा ऐसा हो गया था, जैसे कोई आदमी अपनी परछाई से भी डर रहा हो.

औफिसर ने किए 3 मर्डर

4 नवंबर, 2025 की रात से ही शैलेष और नयना में साथ रहने को ले कर झगड़ा शुरू हो गया था, जो पूरी रात चलता रहा. बच्चे खापी कर सो गए थे, लेकिन न शैलेष की आंखों में नींद थी और न नयना की आंखों में, क्योंकि कमरे की चौखट पर खड़ा शैलेष अपने ही परिवार की मौत लिखने वाला था. उस ने सोचा कि सब से पहले पत्नी को ठिकाने लगाया जाए. क्योंकि पत्नी ही उस के प्यार की, उस के नए जीवन की सब से बड़ी बाधा थी. सब से बड़ा सवाल थी. सब से बड़ा सच थी. वही सवाल कर सकती थी कि वह यह क्या करने जा रहा है.

शैलेष और नयना की लड़ाई सुबह और बढ़ गई थी. नयना अपना अधिकार मांग रही थी. उसे क्या पता था कि थोड़ी देर में उसे अधिकार नहीं, मौत मिलने वाली है. यह काम कोई और नहीं, वही आदमी करेगा, जिस ने अग्नि के 7 फेरे लेते हुए उस की जानमाल और इज्जत की सुरक्षा करने की कसम खाई थी. वही अब उस की जान लेने वाला है, एक ऐसी औरत के लिए जो अभी उस की कोई नहीं थी. अभी सब कुछ वादों में था.

लड़तेझगड़ते अचानक शैलेष को गुस्सा आ गया. उस ने बैड पर पड़ा दूसरा तकिया उठाया और नयना के मुंह पर पूरी ताकत से इतनी मजबूती से दबाया कि उस की आवाज तक बाहर नहीं आ सकी. नयना ने जान बचाने के लिए संघर्ष तो बहुत किया, लेकिन शैलेष की पकड़ इतनी मजबूत थी कि उस ने हाथपैर पटक कर, थोड़ी देर छटपटा कर दम तोड़ दिया. जिस आदमी ने कभी बच्चों तक से ऊंची आवाज में बात नहीं की थी, उस आदमी ने अपनी ही पत्नी की सांसें रोक दीं. जिस से पूरे जीवन साथ निभाने का वादा किया था, बीच में उस की जान ले कर उस का साथ छोड़ दिया.

कमरा फिर खामोश हो गया. एक ऐसी खामोशी, जिस में कोई रो तो सकता था, लेकिन कोई सुन नहीं सकता था. शायद मम्मी के कमरे से आने वाली छटपटाहट की आवाज सुन कर दोनों बच्चे, 13 साल की पृथा और 9 साल का भव्य जाग गए थे. कमरे से आने वाली धीमी आवाजों ने उन्हें डरा दिया था. बेटी थोड़ी बड़ी थी. उस ने पूछा, ”पापा, मम्मी को क्या हुआ?’’

शैलेष ने मुसकराने की कोशिश तो की, लेकिन उस की आंखों में पागलपन उतर चुका था. उस ने बेटी को समझाने या सांत्वना देने के बजाय दबोच लिया और उस के मुंह पर भी तकिया रख कर पूरी ताकत से दबाना शुरू कर दिया. 13 साल की मासूम बच्ची कितना संघर्ष करती, एक वयस्क पुरुष के सामने कितनी देर टिक सकती थी? आखिर वही हुआ, जो शैलेष चाहता था. कुछ पलों में पृथा की भी सांसें रुक गईं. उस के बाद 9 साल के बेटे को भी उसी तरह खत्म कर दिया.

जिन हाथों ने पकड़ कर उसे चलना सिखाया था, उन्हीं हाथों ने बेटी और बेटे का जीवन लील लिया था. उन का मुंह दबाते समय पिता के हाथ भी नहीं कांपे थे. जब पत्नी और बच्चों की सांसें थम गईं तो शैलेष के अंदर का शैतान शांत हो गया. वही नहीं, घर भी शांत हो गया था. यह शांति मौत की थी. शैलेष खड़ा तीनों लाशों को ताक रहा था. उस की आंखों में उस समय एक ऐसा खालीपन था, जो अब कभी भरने वाला नहीं था. लगता था कि भीतर का सब कुछ मर चुका हो. लेकिन मन में कोई पछतावा नहीं था. अब उसे तीनों लाशों को ठिकाने लगाना था. इस की योजना उस ने पहले से बना रखी थी.

लाशों को ठिकाने लगाने के लिए शैलेष ने पहले से घर के पीछे 20 फीट की दूरी पर गड्ïढा खुदवा रखा था. अब उसे उन लाशों को उस गड्ढे क में डाल कर ऊपर से मिट्ठी डालनी थी. शैलेष ने तीनों लाशें उस गड्ढे क तक पहुंचाई, जिसे उस ने लाशों के हिसाब से ही खुदवाया था. लाशों में पत्थर बांध कर गड्ढे क में डाल दिया. इस के बाद घड़ी की ओर देखा तो साढ़े 8 बज रहे थे. उस ने लाशों के ऊपर गद्ïदा डाल कर ऊपर से एक दरवाजा डाल दिया, जिस से गद्ïदा इधरउधर न खिसके. अब ऊपर से मिट्टी डालनी थी.

शैतान बन चुके शैलेष ने खुद ही अपने उस परिवार के ऊपर मिट्टी डाल कर दफना दिया, जिस के लिए अब तक जिया था. इस के बाद उस ने अमित को फोन कर के 2 डंपर बजरी मंगवाई कि गड्ढे क को भरवाना है. रेंज फारेस्ट अफसर ने कहा कि गड्ढे क से निकली मिट्टी तो है, उसी को जेसीबी से भरवा देते हैं. पर शैलेष ने बजरी मंगवा कर गड्ढे क में डलवा दी. इस तरह उस गड्ढे क में अपराध का एक इतिहास दफन हो गया था. ऊपर से सूखी घास और पुरानी बोरियां डाल कर गड्ढे को खेत का एक हिस्सा बना दिया था.

5 नवंबर, 2025 को हत्या हुई थी. इतना कुछ करने के बाद शैलेष घर से निकल गया. 7 नवंबर, 2025 की शाम को वह भावनगर के थाना भरतनगर पहुंचा और पत्नी, बेटे और बेटी की गुमशुदगी दर्ज कराई. गुमशुदगी दर्ज होते ही पुलिस ने अपना काम शुरू कर दिया. नयना, पृथा और भव्य के फोटो, आधार कार्ड आदि सारी जानकारी भावनगर जिले के तमाम थानों को भेज कर तलाश शुरू कर दी. 12 नवंबर, 2025 तक शैलेष नौकरी पर जाता रहा. उस के बाद छुट्टी ले कर सूरत चला गया. वह इस तरह रह रहा था, जैसे कुछ हुआ ही नहीं है.

दूसरी ओर 8 नवंबर को पुलिस ने नयना के मोबाइल नंबर की कौल डिटेल्स निकलवाई थी. उसी दिन शैलेष ने थाना भरतनगर जा कर पुलिस को बताया था कि सिक्योरिटी गार्ड ने बताया है कि उस ने नयना और दोनों बच्चों को एक औटोरिक्शा से जाते देखा था. इस के बाद पुलिस ने सिक्योरिटी गार्ड से पूछताछ की तो उस ने उन तीनों को देखने से साफ मना कर दिया. तब पुलिस ने फारेस्ट कालोनी तथा उस के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालने के साथ नयना के मोबाइल की वह स्क्रीनशौट मंगाई, जिस में उस ने वह मैसेज छोड़ा था कि वह घर छोड़ कर बच्चों के साथ जा रही है.

सीसीटीवी फुटेज में ऐसा कोई औटो नजर नहीं आया, जिस में नयना और बच्चे जा रहे हों. तीनों पैदल भी जाते नहीं दिखाई दिए थे.

फोन से मिला सुराग

जांच में पता चला कि शैलेश ने खुद ही पत्नी के मोबाइल से एक मैसेज किया था, जिस में उस ने लिखा था कि वह किसी दूसरे के साथ रहने जा रही है. लेकिन फोन फ्लाइट मोड पर था, इसलिए वह मैसेज सेंड नहीं हो सका था. पुलिस को इस से थोड़ा शक हुआ और उसे आगे बढऩे की रोशनी मिल गई. तब पुलिस ने नयना के पुराने मैसेज से उस की भाषा का मिलान किया तो उस की भाषा अलग लगी. पुलिस को यहीं शक हुआ कि जो इंसान घर छोड़ कर भाग रहा हो, वह संदेश छोड़ कर क्यों जाएगा.

शैलेष शक के दायरे में आया तो पुलिस ने उस के मोबाइल की कौल डिटेल्स निकलवाने के साथसाथ लोकेशन भी निकलवाई. कौल डिटेल्स से पता चला कि इस बीच शैलेष की रेंज फारेस्ट अफसर गिरीशभाई बनिया से अधिक बात हुई थी. 11 नवंबर को पुलिस ने शैलेष के घर की तलाशी ली, जिस में घर से एक छोटा कपड़ा कुरसी के नीचे से मिला था, जो किसी बच्चे का लगता था. उस का एक बटन टूटा हुआ था. कोने में पड़े 2 स्कूल बैग और घर बता रहा था कि बच्चे कई दिनों से गायब थे. 15 नवंबर को रेंज फारेस्ट अफसर गिरीश बनिया से मिलने पुलिस पहुंच गई.

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ मे गिरीश बनिया ने बताया कि 2 नवंबर को शैलेष ने उस से कहा था कि उसे घर के पीछे खेत में पानी जमा करने और कूड़ा डालने के लिए एक गड्ïढा खुदवाना है. उस ने शैलेष के कहने पर गड्ïढा खुदवा दिया था. 6 नवंबर को फिर आदेश आया कि अब इस गड्ढे क में मिट्टी भरवा दो. बनिया की इस बात से पुलिस को लगा कि यह महज संयोग नहीं हो सकता. यह किसी योजना के तहत था.

शैलेष के कहने पर गड्ïढा भरवाने के लिए गए वनरक्षक विशाल पनोत ने बताया कि जब वह गड्ïढा भरवाने के लिए डंपर से मिट्टी गिरवाने लगा तो गड्ïढा देखने की गरज से उस ओर गया. तब शैलेष ने घबराई आवाज में कहा था कि इधर मत आओ, उस का पैर किसी सांप पर पड़ गया था. वह उसे काट सकता है. घर का रहा न घाट का एक जंगल के अधिकारी की इस तरह की बचकानी हरकत पुलिस को हजम नहीं हुई. डंपर के साथ आए विशाल से बात की गई तो उस ने बताया कि जब उस ने गड्ढे क में पड़े गद्ïदे के बारे में पूछा तो शैलेष ने बताया था कि गड्ढे क में एक नीलगाय गिर गई थी, उसे बाहर निकालने के लिए गद्ïदा डालना पड़ा था. जबकि गड्ढे क में डाली गई मिट्टी एक अलग ही कहानी कह रही थी.

नई, ताजी, जल्दबाजी में भरी गई मिट्टी साफ कह रही थी कि इस के नीचे कोई रहस्य छिपा है. मिट्टी डाल कर भले जमीन समतल कर दी गई थी, लेकिन जल्दबाजी में किया गया यह कारनामा पुलिस की आंखों में धूल नहीं झोंक सका. हर क्लू एक ही बात की ओर इशारा कर रहा था कि गड्ïढा हत्या से जुड़ा है और हत्या के रहस्य को इसी गड्ढे में जल्द से जल्द मिटाने की कोशिश की गई थी. सिक्योरिटी गार्ड, सीसीटीवी फुटेज, रेंज फारेस्ट अफसर, वनरक्षक और डंपर के साथ आए सहायक की बातों से पुलिस का शक अब यकीन में बदलने लगा था. तब पुलिस टीम फिर फारेस्ट कालोनी पहुंची. इस बार उन के साथ फोरैंसिक टीम भी थीं.

गड्ढे में जहां मिट्टी और बजरी डाली गई थी, जेसीबी से मिट्टी हटाई जाने लगी. सभी टकटकी लगाए गड्ढे क को ताक रहे थे. जब मिट्टी के नीचे कपड़े का एक टुकड़ा दिखाई दिया तो वहां खड़े लोगों के रोंगटे खड़े हो गए. कुछ ही देर में तीनों लाशें दिखाई दे गईं. ये लाशें नयनाबेन, पृथा और भव्य की थीं, जिन्हें तकिए से दम घोंट कर मारा गया था. इस घटना की खबर आग की तरह फैल गई. पूरे भावनगर में मातम था. पुलिस ने लाशें निकलवा कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी थीं.

लाशें मिलने के बाद स्पष्ट हो गया था कि ये हत्याएं शैलेष ने ही की हैं. पर लोगों की समझ में यह नहीं आ रहा था कि एक पढ़ेलिखे, सभ्य, सरकारी मुलाजिम ने यह जघन्य अपराध क्यों किया? वह इतना क्रूर कैसे हो गया? अब पुलिस शैलेष को गिरफ्तार करना चाहती थी. पर वह घर में ताला बंद कर के गायब था. चूंकि मामला एक अधिकारी से जुड़ा था, इसलिए एसपी नितेश पांडे ने तुरंत थाना भरतनगर के इंसपेक्टर को भावनगर तथा सूरत में छापा मार कर शैलेष खांभला को गिरफ्तार करने का आदेश दिया.

पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए चंद घंटों में शैलेष खांभला को सूरत से गिरफ्तार कर लिया. लेकिन उस समय उस के चेहरे पर कोई पछतावा नहीं था. बस, एक अजीब सा खालीपन था, जैसे वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था कि उस ने क्या खोया और क्या पाया है. शैलेष की गिरफ्तारी की सूचना पा कर एसपी नितेश पांडे, रेंज आईजी गौतम परमार भी आ गए थे. सभी की मौजूदगी में शैलेष से पूछताछ की गई तो उस ने अपना हर अपराध स्वीकार कर लिया था.

इस पूछताछ में उस ने यही बताया कि पत्नी नयनाबेन साथ रहने की जिद कर रही थी, इसलिए आवेश में आ कर उस ने उस की हत्या कर दी थी. बच्चों की हत्या उस ने क्यों की, इस सवाल का उस ने कोई जवाब नहीं दिया. पुलिस ने शैलजा से भी पूछताछ की. उस का कहना था कि शैलेष के मन में क्या था, उसे पता नहीं. रही बात प्यार करने की तो वह अलग बात है. पर उस ने शैलेष से न कभी साथ रहने की बात की है और न ही उस से कभी अपने परिवार की हत्या करने की बात की थी.

पूछताछ के बाद पुलिस ने शैलजा को जाने दिया, क्योंकि पुलिस के पास ऐसा कोई सबूत नहीं था कि वह भी इस हत्या में शामिल थी. पुलिस ने शैलेष को 7 दिनों तक रिमांड पर भी रखा. इस बीच उस के खिलाफ जितने सबूत मिल सकते थे, जुटाए. यह भी पता किया कि इन हत्याओं में कोई और तो उस के साथ नहीं था. पता चला कि यह जघन्य अपराध उस ने अकेले ही किया था. रिमांड अवधि पूरी होने पर उसे कोर्ट में दोबारा पेश कर के जेल भेज दिया गया था. शैलेष के इस कारनामे से उस की पूरी बिरादरी ही नहीं, घर वाले भी इस कदर नाराज हैं कि सभी यही चाहते हैं कि उसे सख्त से सख्त सजा मिले. Gujrat News

 

 

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