UP News: फर्रुखाबाद में स्वास्थ्य विभाग में एक ऐसा फरजीवाड़ा सामने आया है, जिस ने सब को चौंका दिया है. अर्पित सिंह नाम का एक्सरे टेक्निशियन अलगअलग 6 जिलों के सरकारी अस्पतालों में एक साथ नौकरी कर रहा था. सभी जगह से वह सैलरी भी ले रहा था. चौंकाने वाली बात यह कि सभी जगह उस का नाम, जन्मतिथि और पिता का नाम भी समान था. आखिर कैसे चल रहा था यह फरजीवाड़ा?

इन दिनों उत्तर प्रदेश चर्चाओं में है. ‘मनोहर कहानियां’ के अक्तूबर, 2025 अंक में प्रकाशित गोंडा जिले की अनामिका शुक्ला शिक्षक घोटाले की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले से एक्सरे टेक्निशियन फरजी घोटाले का जिन्न बोतल से बाहर आ गया. एक ही नाम से 6 जिलों में कार्यरत फरजी कर्मियों ने सरकार को करीब 5 करोड़ रुपए की सैलरी का चूना लगाया है.

मामला तब सुर्खियों में आया, जब प्रदेश सरकार के मानव संवदा पोर्टल पर अर्पित सिंह नाम के व्यक्ति का 6 एक्सरे टेक्निशियन कर्मियों के रूप में दर्शाया जा रहा था. डा. रतन पाल सिंह सुमन (स्वास्थ्य महानिदेशक) के माथे पर उस वक्त पसीना चुहचुहा उठा था, जब यह प्रकरण उन के सामने आया. तत्काल उन्होंने सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों (सीएमओ) से यह रिपोर्ट मांगी कि उन के यहां कहीं अर्पित सिंह नाम का कोई कर्मचारी तो तैनात नहीं है, यदि है तो उस की डिटेल्स तुरंत यहां दें.

मामला बहुत गंभीर और घोटालों से जुड़ा हुआ था. इस प्रकरण की जानकारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हुई तो उन्होंने तुरंत ऐक्शन लिया और स्वास्थ्य महानिदेशक डा. रतन पाल सिंह सुमन को आरोपियों के खिलाफ तत्काल मुकदमा दर्ज कराने का आदेश दिया. महानिदेशक सिंह ने यह आदेश रचना खरे (सहायक निदेशक, पैरा मेडिकल, लखनऊ) को दिया. इस पर उन्होंने तत्काल ऐक्शन लिया.

पुलिस को दी तहरीर में लिखा कि उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (यूपीएसएसएससी) ने वर्ष 2016 में 403 एक्सरे टेक्निशियनों को सफल घोषित करते हुए सूची चिकित्सा स्वास्थ्य महानिदेशालय को उपलब्ध कराई थी. इस में क्रमांक संख्या 80 पर अर्पित सिंह पुत्र अनिल कुमार सिंह का नाम दर्ज था. इस अर्पित सिंह के ही नाम पर 6 अलगअलग जिलों— बलरामपुर, फर्रुखाबाद, रामपुर, बांदा और शामली में भी फरजी प्रमाण पत्रों से अन्य लोगों ने नियुक्ति हासिल कर ली थी.

इसी तहरीर के आधार पर राजधानी लखनऊ (पश्चिमी) के थाना वजीरगंज में अर्पित सिंह सहित 5 अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मुकदमा अपराध संख्या- 235/2025 के धाराएं- 419, 420, 467, 468, 471 बीएनएस के तहत मुकदमा दर्ज कराया.

यह मुकदमा 8 अक्तूबर, 2025 की शाम 7 बज कर 10 मिनट पर दर्ज हुआ था. जैसे ही मुकदमा दर्ज हुआ, सभी आरोपी भूमिगत हो गए. पुलिस आरोपियों की तलाश में जुट गई. यह मामला सामने कैसे आया? आइए पढ़ते हैं—

मुकदमा दर्ज होने से करीब सवा महीने पहले यानी 5 सितंबर, 2025 को एक दैनिक अखबार ने ‘एक अर्पित के नाम पर 6 अर्पित कर रहे नौकरी’ शीर्षक से सनसनीखेज खबर अपने सभी संस्करणों में छापी थी. जैसे ही फर्रुखाबाद जिले के मुख्य चिकित्साधिकारी (सीएमओ) अवनीश कुमार की नजर खबर पर पड़ी तो मानो उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह चौंक पड़े.

शुरू हुई घोटाले की जांच

उसी दिन आननफानन में सीएमओ अवनीश कुमार ने 10 बजे सुबह अपने दफ्तर में एक आवश्यक मीटिंग बुलाई, जिस में डा. सर्वेश कुमार यादव, डा. आर. सी. माथुर और डा. दीपक कटियार उपस्थित थे. घंटों तक अखबार में छपी खबर पर चली चर्चा के बाद सीएमओ ने पत्रांक संख्या-मु0चि0अ0/जांच/2025-26/3760 से जांच हेतु एक पत्र जारी किया और उक्त तीनों डौक्टरों को जांच समिति का सदस्य नामित करते हुए मामले की जांच कर 3 दिनों के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने की आदेश दिया. पत्र की यह कौपी जिला अधिकारी, फर्रुखाबाद को भी भेज दी गई.

फर्रुखाबाद के शमसाबाद में अर्पित सिंह नाम का एक कर्मचारी एक्सरे टेक्निशियन के पद पर तैनात था. अखबार में खबर छपने के बाद वह भूमिगत हो गया. जांच समिति की टीम जब शमसाबाद अस्पताल पहुंची तो पता चला अर्पित सिंह 5 दिनों से ड्ïयूटी पर नहीं आ रहा है. उस के बाद से अब तक उस का पता नहीं है.

मामले में तब और एक नया मोड़ आया, जब एक दैनिक अखबार में छपी यही खबर हाथरस जिले के एक युवक ने पढ़ी थी. उस का भी नाम अर्पित सिंह पुत्र अनिल कुमार सिंह था. वह मूलरूप से मोहल्ला प्रतापनगर शाहगंज, आगरा रहने वाला था. वर्तमान समय में वह अपने पेरेंट्स के साथ हाथरस में रहता था. यहीं रह कर वह नौकरी करता था. वह हाथरस जिले में मुरसान में स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में एक्सरे टेक्निशियन पद पर था.

खबर पढ़ते ही वह बुरी तरह सन्न रह गया. अखबार में अर्पित सिंह को ले कर जोजो हवाला दिया गया था, वो सूचना हाथरस वाले अर्पित सिंह से काफी मेल खा रही थी. खबर ने उसे बुरी तरह से सकते में डाल दिया था. उस ने सूझबूझ का परिचय देते हुए तत्काल यह बात अपने अधिकारियों को बताई. यह सुन कर वे भी सन्न रह गए थे. ये कैसे हो सकता है कि असली अर्पित सिंह तो यहां हाथरस में मौजूद है तो फिर वह कैसे फर्रुखाबाद में नौकरी कर सकता है? जरूर इस में कोई बड़ा लोचा है.

इधर हाथरस के अर्पित सिंह प्रकरण ने तूल पकड़ लिया था. इस के नाम से अन्य 6 जिलों मे नौकरी करने वाले युवकों के मामले में जांच शुरू हो गई थी. हाथरस के सीएमओ डा. मंजीत सिंह और मुरसान सीएचसी के प्रभारी डा. चंद्रवीर को लखनऊ निदेशालय हाजिर होने का फरमान जारी किया गया.

इस मामले में डा. मंजीत सिंह को आदेश हुआ कि मुरसान में तैनात अर्पित सिंह के नियुक्ति संबंधित दस्तावेजों के साथसाथ आधार कार्ड, पैन कार्ड साथ लाना है. साथ ही निदेशालय की ओर से फोटो की फोरैंसिक जांच कराने के लिए अर्पित सिंह के वर्तमान फोटो और नियुक्ति के दौरान का फोटो भी मांगा गया था. ताकि मिलान कर के असलीनकली की पहचान की जा सके. निदेशालय से आदेश मिलते ही दोनों अधिकारी एक सप्ताह के भीतर सभी दस्तावेजों के साथ लखनऊ निदेशालय रवाना हो गए और इस दौरान असली अर्पित सिंह भी उन के साथ मौजूद था, जिस का नियुक्ति के समय सीरियल नंबर 80 और रजिस्ट्रैशन नंबर 50900041299 था.

इस दौरान फर्रुखाबाद के शमसाबाद में तैनात अर्पित सिंह को भी लखनऊ निदेशालय तलब किया गया था, लेकिन सक्षम अधिकारी के सामने पेश होने से पहले ही वह फरार हो गया था. इस वाकये ने यह साबित कर दिया था कि मामले में जरूर बड़ा झोलझाल है, तभी सक्षम अधिकारी का सामना किए बिना ही वह मौके से फरार हो गया था.

खैर, हाथरस वाले अर्पित सिंह से घंटों पूछताछ चली. उस के दस्तावेजों का परीक्षण हुआ. सब कुछ ठीकठाक रहा. और तो और अधिकारियों के सवालों का उस ने दिलेरी के साथ बेझिझक जवाब दिया था. बात यहीं खत्म नहीं हुई थी. इस फरजीवाड़े की जांच आगे बढ़ी तो मामला परतदरपरत खुलता गया, जिस की नींव महानिदेशालय दफ्तर से जुड़ी हुई सामने आई. करप्शन की कोख से पैदा हुए अफसर यहीं बैठे हुए थे, जिन की शह पर ही घोटाले को ऊर्जा मिली थी. आइए पढ़ते हैं, इस फरजीवाड़े का काला सच—

मामला 2008 और 2016 की उन भर्तियों से जुड़ा है, जिन में एक्सरे टेक्निशियनों के पद पर नियुक्तियों में भारी गड़बड़ी की शिकायतें उठी थीं. स्वास्थ्य महानिदेशक डा. रतन पाल सिंह सुमन ने सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों से यह रिपोर्ट मांगी थी कि उन के यहां कहीं अर्पित सिंह नाम का कोई कर्मचारी तो तैनात नहीं है. यदि है तो उस की जानकारी निदेशालय को दें. जांच में यह सामने आया कि उस समय 79 स्वीकृत पदों पर 140 लोगों को नियुक्त किया गया था. यानी 61 लोगों को बगैर पद के नियुक्त कर के सीधे सरकार को करोड़ों का चूना लगाया गया. यह जानकारी जब सामने आई तो निदेशालय के वरिष्ठ अधिकारियों के माथे पर पसीना छलक उठा. एकदूसरे पर दोषारोपण करने लगे थे.

यह मामला गंभीर नहीं, अति गंभीर था, लिहाजा स्वास्थ्य महानिदेशक डा. रतन पाल सिंह सुमन ने तत्काल ऐक्शन लिया और उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए कि 2008-09 के बीच जिन भी अभ्यर्थियों ने जौइनिंग की थी, उन का पूरा विवरण उपलब्ध कराया जाए, ताकि गुणवत्ता के आधार पर असली और नकली की पहचान की जा सके. फर्रुखाबाद समेत पूरे प्रदेश में भरती घोटालों की परतें उधेड़ रही यह जांच यह साफ कर रही थी कि वर्षों से सिस्टम में किस तरह से गहराई तक भ्रष्टाचार ने जड़ें जमा ली थीं, लेकिन जनता का सवाल अब सीधा था कि आखिर अर्पित सिंह कहां है और कब तक कानून से बाहर रहेगा?

स्वास्थ्य विभाग में फरजी नियुक्ति के मामले कई बार सामने आ चुके थे. लेकिन अधिकारी इस पर ध्यान नहीं दे रहे थे और मामले में टालमटोल करते जा रहे थे, ताकि जुर्म की कोख से जन्मी भ्रष्टाचार की खेती यूं ही लहलहाती रहे और उस से पैदा होने वाली नोटों से सदा उन की जेबें गरम होती रहें, लेकिन कब तक वे भ्रष्टाचार की मद्धिम आंच पर जुर्म की ताजी रोटियां सेंकते, एक न एक दिन तो यह गंदगी उजागर होनी ही थी.

अब एक्सरे टेक्निशियन अर्पित सिंह की फरजी नियुक्ति होने की चर्चाएं तेज हैं. जांच का दायरा बढ़ा तो कुछ और मामले सामने आए. मई 2016 में अधीनस्थ सेवा चयन आयोग से 403 एक्सरे टेक्निशियन चयनित हुए थे. इन चयनित अभ्यर्थियों में एक ही अर्पित सिंह के नाम की नियुक्ति हुई थी. बाद में सरकार के मानव संपदा पोर्टल पर अर्पित सिंह के नाम से 6 एक्सरे टेक्निशियन के नाम दिखने लगे थे. और तो और सभी के पिता का नाम अनिल सिंह, जन्म तिथि 12 जून 1989 ही अंकित था. इन में 4 अर्पित सिंह का पता सी-22 प्रताप नगर, शाहगंज, आगरा अंकित था, जबकि 2 का पता अलग था.

इन में एक एक्सरे टेक्निशियन अर्पित की तैनाती सीएचसी शमसाबाद में दिखाई जा रही थी, जोकि फर्रुखाबाद जिले में आता है.

हालांकि 2016 में जनपद में 6 एक्सरे टेक्निशियन तैनात हुए थे. इन में कपिल वर्मा, प्रदीप यादव, भगवती शरण कुशवाहा, विजय शंकर तिवारी, रमेश कुमार व अर्पित सिंह शामिल थे.

जांच में सामने आया कि अन्य एक्सरे टेक्निशियन की तैनाती के करीब 15 दिन बाद अर्पित सिंह की जिले में तैनाती हुई थी.

सब से पहले उसे सीएचसी शमसाबाद में ही तैनात किया गया था. इस के बाद उसे सीएचसी मोहम्मदाबाद, रामपुर जिले में भेजा गया. फिर वहां से उस का ट्रांसफर सीएचसी शमसाबाद किया गया. वर्षांे तक वहीं नौकरी करता रहा. मामला उजागर होने से एक सप्ताह पहले अर्पित सिंह का दोबारा ट्रांसफर सीएचसी मोहम्मदाबाद कर दिया गया था.

शक में आई पुलिस जांच

यह खेल बड़े अधिकारियों की मिलीभगत से फलताफूलता रहा. और सरकार को लाखों का चूना हर माह लगाता रहा. उस के वेतन के कुछ हिस्से अधिकारियों की जेबों में भी जाते रहे, ताकि भ्रष्टाचार में पूरी तरह लिप्त अफसरशाही के घिनौने चेहरे सामने न आ सके और यह मामला दबा रहे. तथाकथित अर्पित सिंह जनपद एटा का निवासी था. अब सवाल यह उठता है कि एक ही नाम से 6 अर्पित सिंह की जनपद शामली, रामपुर, बांदा, बलरामपुर, बदायूं व फर्रुखाबाद में तैनाती हुई थी. इस में असली नियुक्ति किस की हुई और 5 फरजी नियुक्ति में कौनकौन शामिल थे? यह बड़ा सवाल है.

स्वास्थ्य विभाग लगातार सभी को वेतन दे रहा था, लेकिन इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया, जबकि नियुक्ति के बाद विभाग अभ्यर्थी का पुलिस सत्यापन कराता है. सत्यापन में भी फरजीवाड़ा खुल कर सामने नहीं आया. इस का मतलब साफ था कि पुलिस वेरीफिकेशन में जांच करने वाला पुलिस अधिकारी भी इस खेल में शामिल था, तभी तो उस ने भी अपने कर्तव्य का सही से पालन नहीं किया अन्यथा उसी दौरान फरजीवाड़े का यह खेल वहीं खुल जाता और सरकार को करोड़ों का चूना लगाए जाने से बचाया जा सकता था.

जैसेजैसे जांच का दायरा आगे बढ़ता गया, वैसेवैसे नए खुलासे होते गए. जांचपड़ताल में विवेचक के हाथ 2 नियुक्ति पत्र लगे. जिस में एक नियुक्ति पत्र 25 अगस्त, 2008 को जारी हुआ था. इस में क्रम संख्या 3, रोल नंबर-एक्सआर 5035 लिखा था. अभ्यर्थी का नाम फुरकान खान, पता- सिसेंडी, लखनऊ, नियुक्ति स्थान सीएमओ सीतापुर के अधीन लिखा था. जो 79 अभ्यर्थी के परीक्षा परिणाम में इन का विवरण मौजूद है.

बात अब दूसरे नियुक्ति पत्र की करते हैं. जब इसी तरह दूसरे नियुक्ति पत्र की 79 की सूची से मिलान किया गया तो विवरण नहीं मिला. इस जौइनिंग लेटर पर नियुक्ति तिथि 20 सितंबर, 2008 अंकित थी, क्रम संख्या- 67. अनुक्रमांक-एक्सआर 5365 लिखा था. इस पर नाम पुष्पेंद्र सिंह, पता- कंचनपुर, जिला मैनपुरी, नियुक्ति मुख्य चिकित्साधिकारी बलिया के अधीन लिखा था. लेकिन परीक्षा परिणाम वाली सूची में क्रम संख्या 67 पर नाम हरिमोहन, पता आगरा का दर्ज है.

नहीं माना शासनादेश

उत्तर प्रदेश में एक्सरे टेक्निशियन और लैब टेक्निशियन की भरती में हर स्तर पर विभागीय अधिकारियों ने मनमानी की. हालत यह है कि एक्सरे टेक्निशियन भरती 2016 में नियमावली बदलाव के संबंध में राज्यपाल का आदेश जारी होने से पहले ही नियुक्ति आदेश जारी कर दिया गया था. प्रदेश में 2013 में एक्सरे टेक्निशियन भरती के लिए 287 पदों पर आवेदन मांगे गए थे. इस भरती में कई तरह के गंभीर आरोप लगे. जांच में आरोप सही पाए गए और शासन की ओर से 21 जून, 2014 को भरती प्रक्रिया निरस्त कर दी गई.

फिर 2015 में अधीनस्थ चयन आयोग का गठन हुआ. पहले की तरह इस में थोड़ी तबदीली की गई थी. अब 287 पदों की जगह 403 पदों के लिए आवेदन मांगे गए. पहले हाईस्कूल, इंटरमीडिएट और डिप्लोमा इन एक्सरे टेक्निशियन के परीक्षा परिणाम के गुणांक के आधार पर 50 अंक और साक्षात्कार के आधार पर 50 अंकों को समाहित करते हुए मेरिट सूची तैयार किए जाने का नियम था. लेकिन आगे चल कर इस में बड़ा बदलाव किया गया.

तय यह किया गया कि 100 अंक के बजाय मेरिट धारियों को सिर्फ 20 अंक का साक्षात्कार लिया जाएगा. नियमों में बदलाव के लिए राज्यपाल को प्रस्ताव भेजा गया. इसी बीच मई, 2016 में 20 अंकों के आधार पर साक्षात्कार करा लिया गया. और 17 मई, 2016 को परिणाम भी जारी कर दिया गया. इतना ही नहीं, 25 मई को नियुक्ति पत्र जारी कर दिए गए.

जबकि 10 जून, 2016 को तत्कालीन शासन के विशेष सचिव अशोक कुमार श्रीवास्तव ने आदेश जारी किया गया कि समूह ‘ग’ के पदों के लिए सीधी भरती नियमावली 2015 के नियम 8(1) के तहत साक्षात्कार के अधिकतम अंक 20 निर्धारित करने के लिए राज्यपाल ने मंजूरी दे दी है. यह मंजूरी तत्काल प्रभाव से लागू की जाती है.

पते की बात तो यह थी कि जब तक यह आदेश जारी होता, उस से पहले ज्यादातर लोगों ने कार्यभार ग्रहण कर लिया था. इसी (2016) की भरती में एक चयनित अर्पित सिंह के नाम से 6 लोगों ने अलगअलग जिलों में कार्यभार ग्रहण किया था, जिस में वजीरगंज थाने में 6 लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी, जिन के खिलाफ जांच चल रही है. पुलिस जांच के दौरान एक बड़ा चौंकाने वाला मामला सामने आया था. जांच में पता चला कि फरजी भरती से जुड़े रैकेट में शामिल लोगों ने अभ्यर्थियों के पते गलत दिए थे. इस के पीछे उन की सोचीसमझी और पुख्ता रणनीति थी.

तर्क यह था कि लाभार्थियों के फरजी पता देने से पकड़े जाने के बाद विभाग जब उन के पते पर नोटिस भेजेगा तो ये नोटिस स्वीकृत नहीं होगा. ऐसे में फरजी अभ्यर्थी यह कहते हुए खुद को बचा लेने में कामयाब हो जाएंगे कि उन्हें कोई नोटिस मिला ही नहीं और बाद में कोर्ट चले जाएंगे.

भ्रष्ट लालफीताशाहियों के करतूतों की पोल ऐसे खुल कर सामने आई थी. वे अपने लचर रवैए से जुर्म की मोटी दीवार पर सरकार से विश्वासघात का परदा डाल कर उसे ढक देते हैं ताकि वे फरजी अभ्यर्थियों के साथ ढुलमुल रवैया अपनाए रहें और उन के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत भी न मिले. ऐसे में तथाकथित अभ्यर्थियों को राहत मिल जाती है. 2008 के प्रकरण में चल रही जांच में अब तक की गई जांच में यह बात सामने आई थी कि अभ्यर्थी जहां का पता लिखते थे, वहीं का फरजी प्रूफ भी तैयार कर लेते थे. इस जांच में कुछ फरजी अभ्यर्थियों की कारस्तानी सामने आई थी.

कन्नौज के सीएचसी तालग्राम में कार्यरत मनोज का पता फिरोजाबाद के शिकोहाबाद का लिखा था, लेकिन जांच में पता चला कि वह फिरोजाबाद के शिकोहाबाद का नहीं, बल्कि कन्नौज के जलालाबाद के अटारा का रहने वाला था. दूसरा मामला बदायूं से जुड़ा सामने आया. बदायूं के सीएचसी उसवा में कार्यरत सुधीर का पता धुमरी सिद्धपुर रोड एटा लिखा था, जबकि वह एटा जिले के अलीगंज क्षेत्र के लड़सिया उर्फ लुतफुल्लापुर का रहने वाला था.

चंदौली के सीएचसी चकिया में कार्यरत विनोद का पता एटा जिले के जलालापुर रामनगर लिखा था, जबकि वह एटा जिले के अलीगंज के जैथरा का निवासी था. इसी तरह कई अन्य के निवास प्रमाण पत्रों में भी हेराफेरी की गई थी.

9 साल से लेते रहे सैलरी

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार एक्सरे टेक्निशियन की तैनाती 4,200 रुपए वेतनमान पर होती है. इस तरह शुरुआत में उन्हें लगभग 50 से 55 हजार रुपए महीना वेतन मिलता है. फरजी तरीके से नियुक्त हुए इन में से प्रत्येक व्यक्ति ने 2016 से 2025 तक 9 साल में करीब 58 लाख रुपए से अधिक वेतन स्वास्थ्य विभाग से लिया है. इस तरह फरजी नाम से नौकरी करने वाले सभी 6 कर्मचारियों ने करीब साढ़े 3 करोड़ रुपए से अधिक की आर्थिक धोखाधड़ी विभाग के साथ की है. वहीं, वेतन की बात करें तो एक अर्पित सिंह हर महीने 69,595 रुपए ले रहा था. एक साल में सिर्फ एक जिले से ही 8,35,140 रुपए की सैलरी ली गई. 9 सालों में केवल एक जिले से 75,16,260 रुपए का भुगतान किया जा चुका था.

ऐसे में 6 जिलों के अर्पित सिंह के वेतन को जोड़ें तो लगभग साढ़े 4 करोड़ रुपए सिर्फ 6 व्यक्तियों ने विभाग से हासिल कर लिए. ऐसे में विभाग के बेइमान अफसरों की जेबों में भी बेइमानी का एक मोटी रकम गई होगी, इस में कोई शक नहीं है. तभी तो भ्रष्टाचार की जड़े गहराई तक जमी हैं. फर्रुखाबाद के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. अवनींद्र कुमार ने पूरे मामले पर 3 उप मुख्य चिकित्सा अधिकारियों की टीम बनाई

थी. जिस में यह हुआ था कि जांच के बाद आरोपित अभ्यर्थियों के खिलाफ काररवाई होगी.  इस बीच सरकार की नीतियां, विभागीय सख्ती और निगरानी तंत्र सब पर यह सवाल खड़ा किया जा रहा है कि आखिर कैसे इतने लंबे समय तक एक शख्स सरकार से वेतन लेता रहा और विभाग को कानोंकान भनक तक नहीं लगी. इस पर सीएमओ डा. अवनींद्र कुमार ने तर्क दिया कि काररवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. जल्द वे चेहरे सामने आ जाएंगे, जिन के सान्निध्य में इस फरजीवाड़े का खेल खेला गया था. मगर बड़ा सवाल यह है कि यह काररवाई सिर्फ नियमकानून के दस्तावेजों तक सीमित रहेगी या फिर व्यवस्था की जड़ों तक पहुंचेगी?

हाथरस मुरसान सीएचसी पर तैनात अर्पित सिंह ने बताया कि उस के नाम पर नियुक्ति में फरजीवाड़ा 2017 में आया था, उस समय अलीगढ़ के अकराबाद सीएचसी में भी उस के नाम से एक टेक्निशियन तैनात था. जांच शुरू होते ही वह भाग गया था. तत्कालीन सीएमओ डा. रामवीर सिंह ने उस समय भी उन का सत्यापन कराया था. जांच में हाथरस वाले अर्पित सिंह की तैनाती सही पाई गई थी.

सीएमओ डा. रामवीर सिंह ने कहा कि यह फरजीवाड़ा लखनऊ से हुआ था, क्योंकि नियुक्ति पत्र निदेशालय से जारी होना दर्शाया गया था. उस की (असली अर्पित सिंह) वर्ष 2016 में हाथरस जिले में नियुक्ति हुई थी. उस समय अन्य जिलों में कोई नियुक्ति नहीं हुई थी.

उन्होंने अपने माध्यम से जानकारी जुटाई तो पता चला कि फरजी अर्पित सिंह की हाथरस में पोस्टिंग दिखा कर बिना जौइन कराए अन्य जिलों में तबादले दिखाए गए थे, जबकि असली अर्पित सिंह का तो कभी कोई तबादला हुआ ही नहीं है. उन्होंने दावा किया कि असली अर्पित सिंह ने करीब एक साल जिला अस्पताल में भी सेवा दी है. अन्य जिलों में उस के नाम से फरजी कर्मचारियों ने नौकरी की है, जब यहां टीमें पहुंचीं तो ये सभी लोग भाग खड़े हुए.

असली अर्पित सिंह की जब विभाग में जौइनिंग हुई थी तो उस के सभी दस्तावेजों की जांच के साथ पुलिस विभाग की तरफ से भी उस का सत्यापन हुआ था, जिस में सब कुछ सत्य पाया गया था. उपलब्ध दस्तावेजों में मुरसान सीएचसी पर तैनात टेक्निशियन अर्पित सिंह की नियुक्ति सीएमओ कार्यालय में वर्ष 2016 में दर्ज है. मुरसान सीएचसी पर तैनात अर्पित सिंह की भी जांच शासन स्तर पर चल रही है. इस संबंध में सभी दस्तावेज शासन को भेज दिए गए हैं. जबकि बाकी 5 जगहों पर अर्पित के नाम से नौकरी करने वाले भागे हुए हैं. मुरसान में तैनात अर्पित वास्तविक कर्मचारी है.

ऐसे खेला गया खेल

उत्तर प्रदेश में नौकरियों में फरजीवाड़े मामले में एक और हैरान करने वाला खुलासा हुआ है. फरजीवाड़ा करने वाले आरोपी पहली पोस्टिंग जुगाड़ से वहीं करा लेते हैं, जहां सुविधा होती है. इस के बाद पहला ट्रांसफर मिलते ही इन्हें पकडऩा मुश्किल हो जाता है, क्योंकि दूसरी जगह जाने पर दस्तावेज नहीं सिर्फ ट्रांसफर लेटर चैक होता है. फरजी दस्तावेजों से नौकरी हासिल करने का ये सारा खेल विभागीय मिलीभगत से चलता है.

इस का खुलासा इस बात से होता है कि कई जिलों में मुख्य चिकित्साधिकारी रह चुके स्वास्थ्य विभाग के एक निदेशक बताते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में तबादला करा कर आए लोगों की गोपनीय तरीके से जांच कराई तो कई अजीबोगरीब केस मिले थे, जो फरजी दस्तावेज पर नौकरी करते मिले.

ऐसे लोग पहली बार उसी जिले में कार्यभार ग्रहण करते हैं, जहां से उन का रैकेट से जुड़ा क्लर्क अथवा चिकित्साधिकारी कार्यरत होता है. क्योंकि वे आसानी से सर्विस बुक सहित अन्य पत्रावली तैयार करा लेते हैं. उस के बाद तो उन की चांदी ही चांदी होती है. तैनाती के बाद 6 महीने से साल भर के अंदर वे अपना तबादला करा कर दूसरे जिले में चले जाते हैं, जहां उन की नियुक्ति की प्रक्रिया से संबंधित दस्तावेज आमतौर पर देखे नहीं जाते हैं.

चिकित्साधिकारी के तर्क को देखा जाए तो साल 2008 में हुई एक्सरे टेक्निशियन भरती उन की इस बात की पुष्टि करती है कि फरजी अर्पित सिंह सहित अन्य के साथ भी ऐसा ही हुआ होगा. मानव संपदा पोर्टल पर दर्ज आंकड़े के मुताबिक 2008 में 79 की जगह 140 लोगों ने नौकरी हासिल की थी. इस में 61 अतिरिक्त थे. इन के सर्विस रिकौर्ड को देखा जाए तो ज्यादातर ने 2 साल के अंदर तबादले ले लिए थे.

जिस ने पहले बलिया में कार्यभार ग्रहण किया था, वह बांदा में कार्यरत है और जिस ने आगरा में कार्यभार ग्रहण किया था. वह अब वाराणसी या चंदौली में सेवाएं दे रहा है. पते की बात यह है कि इन सभी के नियुक्ति पत्र हाथ से लिख कर जारी किए गए थे.

कानपुर से जुड़े तार

चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के मानव संपदा पोर्टल पर दर्ज फैक्ट शीट (पी2) के रिकौर्ड के मुताबिक 2008 में फरजीवाड़ा के जरिए नौकरी हासिल करने वाले रैकेट के तार किसी न किसी रूप में कानपुर मंडल से जुड़े हैं, जिस में फर्रुखाबाद में हुए फरजीवाड़े से ज्यादा नजदीकी दिख रही थी. गौरतलब है कि 2016 में भी इसी रैकेट के सक्रिय रहने की आशंका जताई जा रही थी, क्योंकि फर्रुखाबाद में जिस एक्सरे टेक्निशियन अर्पित सिंह को नौकरी दी गई थी, उस का गृह जनपद आगरा था, लेकिन जांच के दौरान वह एटा का निकला.

2008 की भरती में मानव संपदा पोर्टल पर दर्ज तथ्यों के आधार पर 61 एक्सरे टेक्निशियन का गृह जनपद देखा जाए तो फर्रुखाबाद के सब से ज्यादा करीब 19 कर्मचारियों के मूल निवास दिखाए गए थे. इसी तरह एटा के 16, मैनपुरी के 6, कन्नौज के 4, वाराणसी के 3, कासगंज और मेरठ के 2-2, प्रयागराज, औरैया, झांसी, अंबेडकर नगर, शामली, मुरादाबाद, बाराबंकी, बिजनौर, बलिया के एकएक निवासी बताए गए थे.

इन सभी कथित अर्पित सिंह ने 5 जिलों में प्रताप नगर, शाहगंज, आगरा का पता दर्ज कराया था, जबकि अमरोहा में कुरावली मैनपुरी का पता दिया था. शामली जिले को छोड़ कर अन्य जिलों में कथित अर्पित ने अलगअलग आधार कार्ड नंबर भी उपलब्ध कराए हैं. इस में 2 फरजी अर्पित की पहचान लखीमपुर खीरी और गोंडा में हुई है. बदायूं में तैनाती लेने वाला फरजी अर्पित पहले ही बरखास्त किया जा चुका है. आजमगढ़ के पंवई और ललितपुर वाले अर्पित फरार चल रहे हैं.

यूपीएसएसएससी की सूची में 127 क्रमांक संख्या पर दर्ज अंकित के मामले में भी जांच शुरू कर दी है. अंकित पुत्र राम सिंह की 2016 में हरदोई की मल्लावां सीएचसी पर नियुक्ति हुई थी. वह भी फरार चल रहा है. इसी तरह क्रमांक संख्या 166 पर दर्ज अंकुर पुत्र नीतू मित्ता के नाम पर फरजीवाड़ा किया गया. अंकुर एक जून, 2016 को मैनपुरी सीएमओ के अधीन नियुक्त हुआ था. वहीं दूसरे फरजी अंकुर ने 12 जून 2016 को मुजफ्फरपुर की शाहपुर सीएचसी में फरजी तरीके से नियुक्ति ली थी.

वहीं दूसरी ओर, एक ऐसा नाम जो असल में मौजूद ही नहीं है और सिस्टम की खामियों का फायदा उठा कर करोड़ों रुपए डकार गया. आखिर इस सब के पीछे जिम्मेदार कौन है?  वे अधिकारी जिन्होंने दस्तावेजों पर सिर्फ एक ठप्पा लगाने को ही अपना काम अपनी जिम्मेदारी समझा? या वे दूषित मानसिकता से ओतप्रोत थे, जिस के चलते ऐसे लोग हमेशा बच निकलते हैं?

फरजीवाड़े का यह खेल तो लंबे अरसे से खेला जा रहा था और खेला भी जा रहा है. इस से सरकार को करोड़ों रुपए का चूना भी लगाया जा रहा है. अब देखना यह है कि क्या जांच अधिकारी अपनी निष्पक्ष जांच से उन के चेहरे से नकाब उतार सकेंगे अथवा वह भी नोटों की चमक के सामने औरों की तरह अपना ईमान गिरवी रख देंगे. यदि समय रहते भरती प्रक्रिया के दौरान सभी जिम्मेदार और सक्षम अधिकारियों ने ईमानदारी से अपने दायित्वों और कर्तव्यों का निर्वहन किया होता तो फरजीवाड़े का बीज अंकुरित होने से पहले इस का वजूद मिट गया होता और यूं ही नहीं विशाल बरगद का रूप लेता.

खैर, सभी फरजी कर्मचारियों के खिलाफ फरजीवाड़े का मुकदमा दर्ज कर के जांच की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. जांच शुरू हुए 2 महीने का समय बीत चुका है, लेकिन उन 6 में से किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी कथा संकलन तक नहीं हो सकी थी, क्योंकि उन का कहीं अतापता नहीं चल सका था. UP News

(कथा दस्तावेजों और सोशल मीडिया में छपी रिपोर्ट के आधार पर)

 

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