UP News: परिवार पैसों से नहीं, प्यार से खुश रहता है, जिस के लिए संयम, विवेक, समर्पण और आपसी तालमेल जरूरी है. डा. विशाल यही नहीं कर पाए, जिस की वजह से आज वह पत्नी को प्रताडि़त कर मौत के मुंह तक पहुंचाने के आरोप में जेल में हैं.

किसी परिवार की खुशहाली का मूल आधार सिर्फ दौलत ही नहीं, त्याग, समर्पण, विश्वास, आपसी प्यार, अपनापन और भावनाओं का संगम होना जरूरी है. जहां यह सब नहीं होता, वहां खुशियां पानी के बुलबुले और कोहरे जैसी होती हैं. जिस तरह कुछ वक्त के बाद बुलबुला अपना वजूद खो देता है और कोहरा छंट जाता है, कुछ वैसा ही खुशियों के साथ होता है. दौलत की चकाचौंध से प्यार करने वालों की अन्य मामलों में झोलियां खाली ही रह जाती हैं, क्योंकि पैसा जरूरतों को तो जरूर पूरी कर देता है, लेकिन वह सब नहीं दे पाता, जो खुशहाल जिंदगी के लिए जरूरी होता है.

राजेश कौड़ा इन बातों को अच्छी तरह जानतेसमझते थे. व्यवहारकुशल राजेश के लिए उन का अपना परिवार ही पूरी दुनिया था. वह सरकारी मुलाजिम थे. हर आम आदमी की तरह वह भी चाहते थे कि उन के परिवार में खुशियों के जुगनू हमेशा रोशनी बिखेरते रहें. इसी सोच के समुद्र में उन्होंने प्यार, समर्पण और जिम्मेदारियों की किश्ती को हमेशा चलाया था. राजेश कौड़ा उत्तर प्रदेश के शहर मेरठ के मोहल्ला अरविंदपुरी के रहने वाले थे. परिवार के संचालन व बच्चों की संस्कारपूर्ण परवरिश में गृहणियों का बड़ा योगदान होता है. उन की पत्नी प्रेमलता ने इस काम को दिल के साथसाथ दिमाग से पूरा किया. उन की 3 बेटियां, शालिनी, सोनिया और शिवानी थीं. बच्चे मातापिता के लिए अनमोल पूंजी की तरह होते हैं, जिसे वे अपने ढंग से सहेज कर रखते हैं.

राजेश की मानसिकता ऐसी नहीं थी कि बेटियों के साथ कोई भेदभाव करते. वह इस से पूरी तरह मुक्त थे. ज्ञान की रोशनी दुनिया के हर खजाने से ज्यादा अनमोल होती है. वह इस बात को जानते और समझते थे. इसी वजह से उन्होंने बेटियों को बेटा समझा और उन्हें शिक्षा की आजादी दी. परिवार का माहौल, मातापिता के विचार, संस्कार और जिम्मेदारियां अच्छी हों तो उस का असर बच्चों पर पड़ता ही है. कोड़ा दंपत्ति की बेटियां न सिर्फ उन की उम्मीदों पर खरी उतरीं, बल्कि उन्होंने ऊंची शिक्षा हासिल कर के उन का नाम भी रोशन किया. उन में एमबीबीएस, एमडी की पढ़ाई करने वाली शालिनी गोल्ड मैडलिस्ट थी. तीनों बेटियां पढ़लिख कर कामयाब हुईं तो उन्होंने एकएक कर के सभी का विवाह कर दिया.

शालिनी का विवाह मेरठ शहर के ही थाना सदर बाजार के पौश इलाके थापरनगर में विशाल से हुआ था. विशाल खुद भी डाक्टर थे. उन्होंने विदेश से मैडिकल की पढ़ाई की थी. उन के पिता डा. सी.एल. आर्य की गिनती नामी डाक्टरों में होती थी. वह सादगी पसंद अच्छे स्वभाव के डाक्टर थे. कोठी के बाहरी हिस्से में ही वह ‘आर्य चेस्ट क्लीनिक’ चलाते थे. उन के परिवार में पत्नी वीना आर्य के अलावा एक बेटी थी सपना, जिस का विवाह हो चुका था. शालिनी का विवाह विशाल के साथ सन 2002 में हुआ था. विवाह और उस की खुशियां बसंत ऋतु की तरह होती हैं, जिस में हजारों रंगबिरंगे फूल एक साथ खिल कर जिंदगी को महका देते हैं. जीवन के इस पायदान पर अनोखी मादकता होती है. लगता है, वह पल ठहर जाए और खुशियों का घरौंदा आबाद रहे.

लेकिन यह सिर्फ खूबसूरत सोच भर होती है, वास्तविकता में ऐसा कतई नहीं होता. इस के पीछे आईने की तरह साफ वजह यह होती है कि एक तो वक्त अपनी चाल नहीं छोड़ता, दूसरे जिंदगी कभी घुमावदार होती है तो कभी सीधी. समय अपनी गति से चलता रहा. समय के साथ शालिनी 2 बेटियों, वर्णिका और निकिता की मां बनी. शालिनी और उस के पति विशाल भी डा. सी.एल. आर्य की क्लिनिक में ही मरीजों को देखते थे. क्लिनिक के बोर्ड पर तीनों का संयुक्त नाम था. आर्य परिवार के पास नाम, दौलत और शोहरत, सभी कुछ था. अच्छी जिंदगी के लिए यह सब खुशनसीब लोगों के पास ही होता है या यूं कहें कि इस तरह की जिंदगी के लिए न जाने कितने लोग तरसते हैं.

आधुनिकता के दौर में चकाचौंध भरी जिंदगी के पीछे कुछ ऐसी हकीकतें होती हैं, जो सामाजिक तौर पर प्रत्यक्ष नजर नहीं आतीं. बहुत से घरों की दीवारों की पीछे न जाने कितने तूफान चल रहे होते हैं. यानी सिर्फ दौलत और शोहरत देख कर यह अंदाजा लगाना कठिन होता है कि वहां सब खुश हैं. डा. आर्य के परिवार में भी कुछ ऐसा ही था. हंसमुख स्वभाव की शालिनी बेहद मृदुभाषी थी. उस के इस स्वभाव को न सिर्फ मरीज, बल्कि आसपास के लोग भी पसंद करते थे. उस के ससुर डा. सी.एल. आर्य स्वभाव के जितने अच्छे थे, उन की पत्नी वीना ठीक इस के उतना ही विपरीत थीं. तेजतर्रार वीना हर बात पर टीकाटिप्पणी करना और परिवार को अंगुलियों पर नचाना अपना हुनर समझती थीं.

ऐसी बातों का दायरा हद से ज्यादा फैल जाए तो घर की शांति को ग्रहण लग जाता है. उन की इन बुरी आदतों का शिकार शालिनी भी हो चुकी थी. पढ़ेलिखे होने के बावजूद डा. विशाल और उन की मां वीना आर्य रूढि़वादी सोच और कुरीतियों का शिकार थीं. उन्हें शालिनी से शिकायत थी कि उस ने बेटे को जन्म नहीं दिया. इस के अलावा दहेज से ले कर छोटीछोटी बातों पर बतंगड़ बन जाना आम बात हो गई थी. ऐसी बातें खुशियों पर ग्रहण लगाने वाली होती हैं. शालिनी कभी झगड़े का तो कभी मारपीट का शिकार हो जाती थी, लेकिन पिता के घर से मिले संस्कार उसे बांधे रखते थे.

इस के अलावा एक बात यह भी थी कि डा. सी.एल. आर्य बहू शालिनी को बेटी की तरह मानते थे. वह बहू की काबलियत और व्यवहार की कद्र करते थे. सामाजिक अच्छाइयों और बुराइयों का भी उन्हें खयाल था. जब भी झगड़े के हालात उत्पन्न होते थे, डा. आर्य शालिनी की ढाल बन कर खड़े हो कर मामले को शांत करा देते थे. शालिनी की अपनी बहनों और मातापिता से बातें होती रहती थीं. इन कड़वाहटों से वे भी वाकिफ थे, लेकिन मामला चूंकि बेटी की ससुराल का था, इसलिए किसी प्रकार का वे हस्तक्षेप नहीं करते थे. बहुत सी बातों को खामोशी के धागों से शालिनी अपने होंठों को सिल लेती थी. शालिनी की परेशानी तब और बढ़ गई, जब उस के ससुर डा. सी.एल. आर्य की मौत हो गई.

कौडा दंपति ने शालिनी को नाजों से पाला था. हर मातापिता चाहते हैं कि उन की बेटी ससुराल में खुश रहे. वे भी ऐसा ही चाहते थे, लेकिन शालिनी के मामले में ऐसा नहीं हो सका था. वह बेटी को समझाते हुए वैवाहिक जीवन का वास्ता दे कर परिवार को संभालने की नसीहतें दिया करते थे. उसे भी परिवार के संस्कारों और सामाजिक मर्यादाओं का खयाल था. अब तक शालिनी की बड़ी बेटी वर्णिका नौवीं कक्षा में आ चुकी थी, जबकि उस से छोटी निकिता पांचवीं कक्षा में थी. वक्त अपनी गति से चल रहा था. बुरा वक्त किसी की जिंदगी में कब दस्तक दे दे, इस बात को कोई नहीं जानता. शालिनी के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ.

30 अगस्त, 2015 की सुबह करीब साढ़े 11 बजे शालिनी की बेटी वर्णिका का अपनी नानी प्रेमलता के पास फोन आया तो वह चौंकीं. वजह यह थी कि उस ने बताया था कि घर में झगड़ा हो रहा है. उस के पिता और दादी मम्मी को परेशान कर रहे हैं. बेटी को ले कर पहले से ही चिंतित कौड़ा दंपति पर यह खबर बिजली बन कर गिरी. प्रेमलता ने यह बात पति को बताई तो वह मेरठ में ही रहने वाली अपनी बहन उमा और बहनोई राजकुमार को साथ ले कर कुछ ही देर में बेटी की ससुराल थापरनगर पहुंच गए.

उस वक्त घर में महाभारत छिड़ा हुआ था. उन लोगों का इस तरह अचानक आना विशाल और वीना को नागवार गुजरा. वीना उन की आवभागत करने के बजाय बेरुखी से बोली, ‘‘भाईसाहब, आप को इस तरह नहीं आना चाहिए, यह हमारे घर का मामला है.’’

राजेश हाथ जोड़ कर बोले, ‘‘माफ कीजिए बहनजी, कौन पिता चाहता है कि उस की बेटी दुखी रहे. फिक्र तो सभी को होती है. आप लोग मेरी बेटी को इस तरह परेशान करते हैं, यह ठीक नहीं है. ऐसी क्या भूल हो गई हमारी बेटी से?’’

इस पर वीना हाथ नचा कर बोलीं, ‘‘हमें आप को यह बताने और समझाने की जरूरत नहीं है, आप यहां से चले जाएं तो बेहतर होगा.’’

राजेश को बेटी की ससुराल में अपने साथ इस तरह के रूखे और अपमानजनक व्यवहार की उम्मीद नहीं थी. वह शर्मिंदा हो गए. अपने सामने पिता की इस तरह बेइज्जती होते देख शालिनी की आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने कहा, ‘‘पापा, आप चले जाइए. यहां तो यह रोज का हाल है.’’

राजेश का दिल नहीं माना. उन्होंने विशाल से कहा, ‘‘बेटा, अपने पविर को संभाल कर रखो. बुजुर्गों ने कहा है कि रोजरोज की कलह अच्छी नहीं होती. वैसे तो यह आप के घर का मामला है, लेकिन बड़ा होने के नाते तुम्हें समझा तो सकता ही हूं.’’

राजेश का इस तरह समझाना विशाल को कांटे की तरह चुभा. वह भी बेरुखी से ही पेश आया. उस ने कहा, ‘‘हम सब संभाल लेंगे पापाजी, आप चिंता न करें. मैं कोई दूध पीता बच्चा नहीं हूं. प्लीज, आप यहां से चले जाइए.’’

राजेश मन मसोस कर वहां से चले आए. मातापिता बेटी को ससुराल में सुखी रहने की उम्मीद करते हैं, लेकिन वहां जो हालात थे, उन्होंने राजेश और उन की पत्नी को चिंता में डाल दिया था. हंसमुख स्वभाव की बेटी कब गंभीर हो गई थी, उन्हें पता ही नहीं चला था. उन्होंने सोचा कि वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा. उन्हें क्या पता था कि इस से भी बुरा होने वाला है. उसी रात करीब 2 बजे किसी व्यक्ति ने फोन कर के उन्हें बताया कि उन की बेटी को जहर दे दिया गया है. उसे जबरदस्ती इंजेक्शन लगा कर मारने की कोशिश की गई है. इस सूचना ने उन की नींद उड़ा दी. आननफानन में उन्होंने अपने नातेरिश्तेदारों को फोन किया और धड़कते दिल से शालिनी के घर जा पहुंचे. वहां पता चला कि शालिनी को जसवंतराय अस्पताल ले जाया गया है.

सभी लोग जसवंतराय अस्पताल पहुंचे. शालिनी की हातल गंभीर थी और उसे आईसीयू में भरती कराया गया था. डा. विशाल तब तक वहीं था, लेकिन उन लोगों को देखते ही उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थीं. बातचीत में उस की ससुराल वालों से झड़प हो गई तो वह भाग निकला. घटना की सूचना पुलिस को दी गई. सूचना मिलते ही थाना सदर बाजार के थानाप्रभारी राजेंद्रपाल सिंह मौके पर पहुंच गए.

शालिनी का इलाज कर रहे डाक्टरों का कहना था कि उस के शरीर में सल्फास की प्रकृति का जहर है. उस के हाथ, कमर व अन्य जगहों पर चोट के भी निशान थे. इस का मतलब उस के साथ मारपीट भी की गई थी. राजेश परिवार के हालातों से वाकिफ थे. शालिनी की इस हालत के लिए उस की ससुराल वाले जिम्मेदार थे. उन्होंने हत्या का आरोप लगा कर हंगामा शुरू कर दिया. शालिनी की हालत बेहद नाजुक थी. उसे वेंटीलैटर पर रखा गया था. वह बोलने की स्थिति में नहीं थी. घर वाले परिवार के हालात और उत्पीड़न का हवाला दे कर सल्फास या जहरीला इंजेक्शन जबरन लगाने का आरोप लगा रहे थे.

एसएसपी डी.सी. दुबे को इस हाईप्रोफाइल मामले की सूचना मिली तो उन्होंने पुलिस को निष्पक्ष काररवाई के निर्देश दिए. इस बीच शालिनी की बेटियों को ननिहाल भेज दिया गया. अपने मरीजों के लिए संवेदनशील रहने वाली डा. शालिनी खुद मौत से लड़ रही थी. जहर उस के शरीर में पूरी तरह घुल चुका था. डाक्टर उसे बचाने का हर संभव प्रयास कर रहे थे, लेकिन अथक प्रयास के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका. करीब 28 घंटे मौत से लड़ कर शालिनी की सांसों की डोर टूट गई. इस से उस के परिवार में कोहराम मच गया. अस्पताल में पूछताछ में पता चला कि शालिनी को वहां सीने व पेट दर्द की शिकायत के बहाने भरती कराया गया था.

पुलिस ने राजेश की तहरीर पर पुलिस ने अपराध संख्या 414/15 पर भादंवि की धारा 307, 328, 504, 506 व दहेज अधिनियम की धारा 498ए के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. इस के बाद शालिनी के शव के पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया. अब तक डा. विशाल और शालिनी की सास वीना, दोनों ही कोठी में ताला लगा कर फरार हो चुके थे. शालिनी की मौत से हर कोई आहत और आक्रोशित था. पोस्टमार्टम के बाद 1 सितंबर को गमगीन माहौल में उस के शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया. शालिनी की बेटियों का रोरो कर बुरा हाल था. कभी दुलहन के रूप में बेटी को विदा करने वाले राजेश कौड़ा ने सोचा भी नहीं था कि उन्हें होनहार बेटी की अर्थी को कंधा देना पड़ेगा.

इस बीच लोगों ने विशाल और वीना की गिरफ्तारी को ले कर जाम लगा दिया. मौके पर पहुंचे पुलिस अधीक्षक (नगर) ओमप्रकाश सिंह ने जल्द गिरफ्तारी का आश्वासन दे कर जाम खुलवाया. पुलिस अधिकारियों ने आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए 4 पुलिस टीमों का गठन किया तो ये टीमें मांबेटे की तलाश में लग गईं. अगले दिन शालिनी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई. उस की मौत शरीर में जहर घुलने से हुई थी. लीवर, किडनी से ले कर शरीर के हर अंग में जहर फैल गया था. उस के बाएं हाथ में इंजेक्शन लगाने का निशान था. डाक्टर ने पुलिस के कहने पर जांच के लिए बिसरा सुरक्षित रख लिया था. बाद में उसे जांच के लिए आगरा स्थित फोरैंसिंक लैब भेज दिया गया था.

उधर पुलिस ने आरोपियों की तलाश में छापेमारी शुरू कर दी थी, लेकिन वे हत्थे नहीं चढ़ रहे थे. विशाल विदेश भाग सकता था, इस आशंका के तहत लुकआउट नोटिस जारी करा दिया गया था. विशाल का मोबाइल स्विच औफ था. उस की काल डिटेल्स से पता चला कि उस के कई लड़कियों और महिलाओं से संबंध थे. शालिनी के घर वालों ने विशाल और वीना की गिरफ्तारी को ले कर मेरठ जोन के आईजी आलोक शर्मा व एसएसपी डी.सी. दुबे से भी मुलाकात की. 4 सितंबर को शालिनी की तेहरवीं की रस्म में आर्य परिवार की छोड़ो, उन का कोई रिश्तेदार तक नहीं आया था.

गिरफ्तारी न होने से शालिनी के घर वालों में गुस्सा था. आरोपियों का कुछ पता नहीं चल रहा था. शालिनी के परिजनों ने 5 सितंबर को विशाल की कोठी पर उस के और वीना के कातिल होने संबंधी पोस्टर चस्पा कर के धरना दे दिया. पुलिस ने गिरफ्तारी का आश्वासन दे कर धरना खत्म कराया. पुलिस को बिसरा रिपोर्ट का इंतजार था. इस बीच पुलिस ने अदालत से दोनों आरोपियों का गैर जमानती वारंट हासिल कर लिया. देखतेदेखते कई दिन बीत गए. मामला मीडिया की सुर्खियां बना था.

शालिनी की बिसरा जांच रिपोर्ट आ गई. उस में एल्यूमिनियम फास्फाइड (सल्फास) नामक जहर के अंश पाए गए थे. उसे जहर दिया गया था या उस ने मानसिक दबाव में खुद खाया था, इस का जवाब गिरफ्तारी के बाद ही मिल सकता था. अभियुक्तों की गिरफ्तारी को ले कर लोग सड़कों पर उतर आए. उन्होंने कैंडल मार्च निकाले और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री शाहिद मंजूर से भी मुलाकात की. पुलिस विशाल तक भले पहुंच नहीं पा रही थी, लेकिन अदालत से उस के घर की कुर्की का वारंट हासिल कर के चस्पा जरूर कर दिया था. पुलिस से बचने के लिए अपनी गिरफ्तारी पर स्टे हेतु विशाल ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अरजी लगाई, लेकिन उसे अस्वीकार कर दिया गया.

आखिर 16 सितंबर को डा. विशाल की फरारी का पटाक्षेप हो गया. उसे पुलिस ने उस वक्त गिरफ्तार कर लिया, जब वह अदालत में आत्मसमर्पण करने जा रहा था. विशाल से विस्तृत पूछताछ की गई. शालिनी के घर वालों और विशाल से पूछताछ में जो कहानी निकल कर आई, वह आर्थिक संपन्न परिवार में  घरेलू हिंसा के सामाजिक कलंक व उजले चेहरों के पीछे की चौंकाने वाली हकीकत थी. शालिनी होनहार थी. एमबीबीएस की पढ़ाई में वह अपने बैच की टौपर रही. इस के लिए उसे गोल्ड मैडल भी मिला. इस के साथ ही वह बालीबौल की भी अच्छी खिलाड़ी थी. राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले कर उस ने कई इनाम जीते थे. डाक्टर की डिग्री हासिल करने के साथ ही कौड़ा दंपति ने उस के लिए रिश्ते की तलाश शुरू कर दी थी.

शालिनी खूबसूरत होने के साथ होशियार थी, इसलिए थोड़े प्रयास के बाद 12 साल पहले उन्होंने शालिनी का रिश्ता डा. सी.एल. आर्य के एकलौते बेटे डा. विशाल में तय कर दिया. आर्थिक रूप से संपन्न डा. सी.एल. आर्य अच्छे स्वभाव और आचरण के व्यक्ति थे. समूचे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चेस्ट स्पैशलिस्ट के रूप में उन का नाम था. समाज में उन्हें इज्जत की नजरों से देखा जाता था. राजेश को लगा कि वह खुशनसीब हैं, जो उन्हें बेटी के लिए इतना अच्छा रिश्ता मिल गया. उन्होंने सोचा कि हमपेशा पति के साथ शालिनी खुश रहेगी.

रस्मी बातचीत के बाद शालिनी और विशाल ने एकदूसरे को पसंद कर लिया. राजेश के परिवार को पहला झटका तब लगा, जब श्रीमती वीना आर्य ने दहेज की ख्वाहिश जाहिर की. दहेज को भले ही बुराई, कुप्रथा, कानून के खिलाफ कहा जाए, लेकिन यह हकीकत किसी से छिपी नहीं है कि दहेज समाज में परंपरा बन गया है. शादियों में लाखोंकरोड़ों खर्च किए जाते हैं. कभी लड़के वालों की मांग पर तो कभी सामाजिक दिखावे के लिए तो कभी हैसियत के अनुसार. राजेश ने भी अपनी हैसियत के अनुसार शहर के एक बड़े फार्महाउस में 1 नवंबर, 2002 को धूमधाम से विवाह समारोह आयोजित कर के भारी मन से बेटी को विदा कर दिया. इस विवाह में उन्होंने 25 लाख रुपए से ज्यादा खर्च किए.

हर लड़की की तरह शालिनी ने भी मन में ढेरों उमंगे और सपने लिए ससुराल में पहला कदम रखा. विवाह का एक साल हंसीखुशी से बीत गया. ससुर के क्लीनिक में ही शालिनी ने प्रैक्टिस शुरू कर दी. शालिनी ने बेटी को जन्म दिया तो सास के अरमानों पर जैसे पानी फिर गया. वह बेटे की ख्वाहिश रखती थीं. बहुत जल्द उन्होंने ताने देने शुरू कर दिए तो सास की बातें शालिनी के हृदय पर तीर की तरह चुभने लगीं. इतना ही नहीं, उन्होंने नवजात बेटी के पालनपोषण से भी इंकार कर दिया. डा. सी.एल. आर्य अच्छे स्वभाव के व्यक्ति थे. वह बहू का पक्ष लेते तो वीना उन्हें भी आड़े हाथों लेती, ‘‘यह तुम्हारी बहू है बेटी नहीं, जो इस का पक्ष लेते हो.’’

डा. आर्य समझाने की कोशिश करते, ‘‘बहू भी बेटी समान होती है वीना, तुम्हें इस तरह की बातें नहीं करनी चाहिए.’’

डा. आर्य कहते जरूर थे, लेकिन उन की इस तरह की बातें वह एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देती थीं. शालिनी ने सास की आए दिन होने वाली तानेबाजियों की शिकायत पति विशाल से की. उसे उम्मीद थी कि वह उस के दिल के घावों पर सहानुभूति का फीहा रखेगा, लेकिन उस ने भी अपनी मां का समर्थन कर के उसे निराश कर दिया. वीना आर्य दानदहेज से भी नाखुश थीं. इसे ले कर भी वह ताने मारने लगीं थीं.

शालिनी एक बार मायके आई तो हमेशा खिलखिलाने वाली बेटी का बुझा चेहरा देख कर राजेश और प्रेमलता को लगा कि वह बीमार रही है. उन्होंने उस के दुखी और उदास रहने की वजह पूछी तो मातापिता के प्यारभरे बोलों से टूटी हुई शालिनी के सब्र का बांध टूट गया. कंपकंपाते होंठों से उस ने आपबीती कह सुनाई. कौड़ा दंपति ने बेटी को समझाया, विवाह के बाद बहुत कुछ सहना पड़ता है.

शालिनी ने एक बार फिर बच्चे के नवजीवन की तैयारी की तो वीना खुश हुई कि इस बार जरूर बेटा होगा. यह बात अलग थी कि उन के अरमानों पर एक बार फिर पानी फिर गया. शालिनी को दोबारा भी बेटी हुई तो उन पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा. उसे मानसिक रूप से प्रताडि़त किया जाने लगा. हर रोज लगता था, जैसे पति और सास अपने दिलों की भड़ास निकालते हैं. उन के शब्द कानों में पिघले सीसे की तरह उतरते थे. समय बीतता गया. शालिनी बेटियों को बहुत प्यार करती थी. वह चाहती थी कि वे पढ़लिख कर नाम रोशन करें. उधर बेटी का जीवन सुखद रहे, यह सोच कर राजेश कौड़ा ने कुछ रस्मी अवसरों पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार वीना आर्य को नकद रुपए भी दिए.

इस बीच डा. सी.एल. आर्य कैंसर से पीडि़त हो गए. ऐसे बुरे वक्त में विशाल ने पिता को उपेक्षित सा कर दिया. शालिनी ने एक अच्छी बहू का फर्ज निभा कर उन की खूब सेवा की. बेटे से ज्यादा उन्होंने शालिनी पर नाज किया. विशाल उन की कसौटी पर काबिल बेटे के तौर पर खरा नहीं उतरा. शालिनी को अपनी विरासत का सही उत्तराधिकारी मान कर उन्होंने अपनी करोड़ों की संपति का बड़ा हिस्सा उस के नाम कर दिया.

यह परिवार में विवाद की नई वजह बन गया. एक साल पहले डा. सी.एल. आर्य इस दुनिया से विदा हो गए. ससुर की मौत के बाद तो शालिनी के लिए प्रताड़नाओं का जैसे दौर ही शुरू हो गया. पति और सास को उस से मारपीट करने में कोई गुरेज नहीं था. शालिनी अपनी सोच सकारात्मक रखती थी. उस ने सोचा कि वक्त के साथ उन का व्यवहार सुधर जाएगा, परंतु ऐसा नहीं हुआ. विशाल और वीना किसी दूसरी ही मिट्टी के बने थे. उन के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया. शालिनी की किस्मत में शायद दुख ही दुख लिखे थे. सन 2015 में वीना और विशाल ने शालिनी से नई मांग शुरू कर दी कि वह अपने पिता से दोनों बेटियों के नाम 10-10 लाख रुपए की एफडी कराने को कहे.

राजेश कौड़ा रिटायर हो चुके थे. उन की हैसियत ऐसी नहीं थी. शालिनी इस बात को जानती थी. जब यह आए दिन की बात हो गई तो शालिनी ने दबी जबान से अपनी मां से यह बात कही. बेटी की खुशी के लिए उन्होंने किसी तरह 2 लाख रुपए नकद दे दिए. आर्थिक संपन्न होने के बावजूद वीना और विशाल के लिए यह रकम ऊंट के मुंह में जीरे के समान थी. वह अपनी मांग पर अड़े रहे.

शालिनी परिवार की अनेक बातों को कड़वा घूंट समझ कर पी जाती थी और मायके में नहीं बताती थी. वह नहीं चाहती थी कि मातापिता को उस के कारण कोई दुख पहुंचे. जीवन घिसटता हुआ सा चल रहा था. मानसिक प्रताड़ना झेलना जैसे शालिनी की जिंदगी का हिस्सा बन गया था. एक बार यह सिलसिला शुरू हुआ तो फिर थमा नहीं. घर का माहौल अशांत हो चुका था. बातचीत भी गालीगलौज से की जाती थी. दुत्कार और उत्पीड़न हदों को लांघ रहा था. पतिपत्नी के बीच अक्सर तनाव रहता था.

उा. विशाल अक्सर अकेले ही विदेश घूमने चला जाता था. वह सिंगापुर, पेरिस, स्वीटजरलैंड और मलेशिया जाता था. वह क्यों जाता था, यह शालिनी को बताना जरूरी नहीं समझता था. एक मायने में वह पिता की दौलत पर मौज करने वाला बेटा था. काम में उस का मन कम ही लगता था. विशाल की लड़कियों से दोस्ती थी. शालिनी इस का विरोध करती तो उस की आवाज को दबाने के लिए उस के साथ मारपीट की जाती.

शालिनी सहनशील थी, लेकिन तनाव के बीच घुटघुट कर जी रही थी. बेटियों की खातिर वह अपने परिवार को किसी भी सूरत में टूटने नहीं देना चाहती थी. शालिनी उस बंधन को निभा रही थी, जो वक्त के साथ खोखला सा हो गया था. खुशियां जैसे उस से रूठ चुकी थीं. वह दर्द के दरिया में सफर कर रही थी. आसपड़ोस के लोगों को बाहरी तौर पर सब ठीक लगता था, लेकिन अंदर भूचाल चल रहा था. वह अपना दिन मरीजों में बिता देती थी. उस का स्वभाव अच्छा था. मरीजों के प्रति वह संवेदनशील रहती थी, इसलिए मरीज उसे ही दिखाना पसंद करते थे. उस की शोहरत काबिल डाक्टर के रूप में हो रही थी. डा. विशाल इस बात से बहुत चिढ़ता था. मौका मिलते ही वह अपनी इस भड़ास को निकाल भी देता था. कहते हैं कि अति का अंत कभी सुखद नहीं होता.

30 अगस्त रविवार के दिन जब झगड़ा ज्यादा बढ़ गया और शालिनी से मारपीट की जाने लगी तो उस की बेटी वर्णिका ने घबरा कर अपनी नानी को फोन कर दिया. राजेश कौड़ा वहां आए, लेकिन उन्हें अपमानित कर के वापस कर दिया गया. घर का माहौल काफी खराब हो चुका था. बात घर से बाहर न जा पाए, शालिनी को मनाने के उद्देश्य से विशाल शालिनी और बच्चों को ले कर मूवी दिखाने गया. रात में वे वापस आए तो घर में फिर विवाद हो गया. इस के बाद कुछ ऐसा हुआ कि बुरी खबर मिलने के बाद राजेश कौड़ा ने बेटी को अस्पताल में पाया. चाह कर भी वह उसे बचा नहीं सके.

पुलिस ने विशाल को साथ ले कर कोठी का मुआयना किया, लेकिन वहां सल्फास की शीशी या सीरींज नहीं मिली. पूछताछ के बाद पुलिस ने विशाल को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. विशाल का कहना था कि उस ने पत्नी को नहीं मारा. वह अपनी बेटियों के लिए उसे जिंदा रखना चाहता था. शालिनी खुद भी बेटियों के लिए जिंदा रहना चाहती थी.

कथा लिखे जाने तक विशाल की जमानत नहीं हो सकी थी, जबकि पुलिस वीना आर्य की सरगरमी से तलाश कर रही थी. शालिनी की दोनों बेटियां अपने ननिहाल में रह रही थीं. डा. शालिनी को जहर दिया गया या उन्होंने खुद खाया, यह तो जांच के बाद ही स्पट होगा, लेकिन आर्थिक संपन्नता के बावजूद संबंधों की कड़वाहट से संयम, विवेक और समर्पण के अभाव में एक परिवार तो बिखर ही गया. मासूम बच्चियां भी उस की त्रासदी झेलने को विवश हो गई हैं. UP News

(कथा पात्रों से बातचीत व पुलिस सूत्रों पर आधारित)

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