निजाम का शहर कहिए या नवाबों का, हैदराबाद दक्षिण भारत का एक महत्त्वपूर्ण शहर है. एक ओर विश्वप्रसिद्ध चारमीनार इस शहर की ऐतिहासिक पहचान है तो दूसरी ओर संभवत: विश्व का यह अकेला ऐसा शहर है, जिस में 9 सरकारी विश्वविद्यालय हैं. इन्हीं 9 विश्वविद्यालयों में एक है केंद्रीय विश्वविद्यालय, जो इस शहर की गहमागहमी से दूर, शांत इलाके गाची बावली में स्थित है.
17 जनवरी की आधी रात बीत चुकी थी. तभी गाची बावली पुलिस स्टेशन को सूचना मिली कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के न्यू रिसर्च हौस्टल में एक छात्र ने आत्महत्या कर ली है. गाची बावली थाने के इंसपेक्टर जे. रमेश कुमार तुरंत अपने सहयोगियों के साथ न्यू रिसर्च हौस्टल पहुंच गए. हौस्टल के कमरा नंबर 207 में उन्हें एक छात्र फंदे से लटका हुआ मिला जिस की पहचान रोहित वेमुला के रूप में हुई. उन्होंने अपनी काररवाई शुरू कर दी. जैसेजैसे छात्रों को कैंपस में पुलिस की मौजूदगी और रोहित वेमुला की आत्महत्या की सूचना मिलती गई, वे हौस्टल में एकत्र होते गए.
पुलिस रोहित की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजना चाहती थी, मगर छात्रों की मांग थी कि पहले रोहित को आत्महत्या के लिए उकसाने वाले लोगों के विरुद्ध काररवाई की जाए. छात्रों का आक्रोश बढ़ता जा रहा था. उन के आक्रोश की जानकारी पा कर पुलिस के बड़े अफसर भी पहुंच गए. छात्रों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए रैपिड एक्शन फोर्स के 200 जवानों को बुला लिया गया. तब तक सुबह के 7 बज चुके थे. काफी कोशिशों के बाद पुलिस रोहित की लाश को पोस्टमार्टम के लिए उस्मानिया जनरल अस्पताल ले जाने में सफल हो पाई.
जैसेजैसे दिन चढ़ता गया, रोहित की आत्महत्या का समाचार फैलता गया. इस के साथसाथ हैदराबाद से ले कर दिल्ली, चेन्नै और कश्मीर तक राजनीतिक भूचाल आ गया. आखिर रोहित वेमुला को आत्महत्या क्यों करनी पड़ी, यह एक बड़ा सवाल है. गुंटूर के एक कस्बे गुरुतला के रहने वाले मनीकुमार और राधिका की 3 संतानों में से दूसरे नंबर का था रोहित वेमुला. रोहित जाति से दलित था. लेकिन पढ़ाई में बहुत तेज. अपनी स्कूली शिक्षा अच्छे नंबरों से पास करने के बाद उस ने स्नातक की डिग्री भी गुंटूर से ही ली थी. इस के बाद उस ने सन 2012 में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में एमएससी लाइफ साइंस में प्रवेश लिया. अप्रैल 2014 में उसे सीएसआईआर द्वारा जूनियर रिसर्च फेलोशिप के लिए चुन लिया गया.
रोहित वेमुला पढ़ाई के साथसाथ सामाजिक गतिविधियों में भी भाग लेता था. इस के साथ ही वह दलित व पिछड़ों के हितों और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी संघर्षरत था. वह अंबेडकर छात्र संगठन से भी जुड़ा हुआ था. अंबेडकर छात्र संगठन विश्वविद्यालय में दलित छात्रों के हितों के लिए संघर्ष करने वाली एक संस्था है. इस संगठन का भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के साथ हमेशा टकराव रहता है. अंबेडकर छात्र संगठन जहां एक ओर दलित छात्रों के हितों को प्राथमिकता देता है, वहीं दूसरी ओर एबीवीपी हिंदूवादी छात्रों के हितों के रक्षक के तौर पर काम करता है.
जिस समय रोहित वेमुला को स्कौलरशिप मिली, तब भारतीय राजनीति एक बार फिर करवट ले रही थी. देश में आम चुनाव हो रहे थे. 16 मई, 2014 को घोषित चुनाव परिणाम में भाजपा विजयी हुई थी. सन 2014 के आम चनुव में भाजपा को मिली विजय के बाद भाजपा के समर्थकों और उस से संबंधित संगठनों में एक विचित्र सी उग्रता आ गई है. सोशल मीडिया हो या संचार का कोई और माध्यम, ये लोग विरोध का स्वर सुनना पसंद नहीं करते. मई, 2014 के बाद से देश में कई घटनाएं ऐसी हुईं, जिस में आम जनता को इन की असहिष्णुता का सामना करना पड़ा. यहां तक कि केंद्र में भाजपा सरकार के कुछ मंत्री भी इस का समर्थन करते नजर आए.
जुलाई, 2015 में दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कालेज में एक डाक्युमेंट्री ‘मुजफ्फरनगर अभी बाकी’ का छात्रों के लिए प्रदर्शन किया जा रहा था. जैसे ही यह सूचना अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नवनिर्वाचित छात्र यूनियन के अध्यक्ष सनी डेडा को मिली, वह यूनियन कार्यकर्ताओं के साथ वहां पहुंच गए और जबरन डाक्युमेंट्री का प्रदर्शन रुकवा दिया. सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध दिल्ली विश्वविद्यालय में हुई यह दबंगई कोई मामूली घटना नहीं थी. इस से यह उजागर होता था कि आने वाले दिनों में विश्वविद्यालयों, शिक्षा संस्थानों आदि में केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा का समर्थक वर्ग अपने विरोधियों के स्वर दबाने का प्रयास करेगा.
ऐसे लोगों को अपरोक्ष रूप से शह मिल रही थी भाजपा के केंद्रीय नेताओं व मंत्रियों के बयानों से, जो समयसमय पर अपने बयानों से विषवमन कर रहे थे. इन लोगों में प्रमुख थे योगी आदित्यनाथ, साध्वी प्राची, साक्षी महाराज व महेश शर्मा आदि. यह सिलसिला अभी थमा नहीं है, शायद थमेगा भी नहीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इन लोगों को रोकने का कोई प्रयास नहीं करते. किरोड़ीमल कालेज में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की दबंगई का समाचार जब दूसरे शिक्षण संस्थानों में पहुंचा तो अंबेडकर छात्र संगठन ने इस के विरोध में प्रदर्शन किया. ऐसा ही प्रदर्शन हैदराबाद के केंद्रीय विश्वविद्यालय में 3 अगस्त, 2015 को किया गया था. इस प्रदर्शन को भी एबीवीपी ने रोकने का प्रयास किया था.
रोहित वेमुला इस के पहले से ही केंद्रीय विश्वविद्यालय हैदराबाद प्रशासन के निशाने पर था, क्योंकि वह अंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन के बैनर तले छात्रों के हितों से संबंधित मसले जोरशोर से उठाता रहता था. जबकि यह भाजपा की विचारधारा के विरुद्ध था. इस के चलते ही विश्वविद्यालय ने जुलाई, 2015 से रोहित की 25 हजार रुपए प्रतिमाह की छात्रवृत्ति कागजी काररवाही पूरी न होने का बहाना बना कर रोक दी थी, जो अभी तक रुकी हुई थी. यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि जब से स्मृति ईरानी ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय का पदभार संभाला है, शिक्षा संस्थानों में सरकारी दखल बढ़ा है. इस से पहले की ही एक घटना थी, चेन्नै स्थित भारतीय तकनीकी संस्थान की.
मद्रास आईआईटी ने एक शिकायत के आधार पर छात्र संगठन अंबेडकर पेरियार सर्किल की मान्यता समाप्त कर दी थी, जिस में कहा गया था कि यह संगठन केंद्र सरकार की नीतियों के विरुद्ध कार्य करने के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और हिंदुओं के विरुद्ध घृणा फैला रहा है. इस मामले में भी स्मृति ईरानी का नाम आया था और कहा गया था कि मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी की संस्तुति और परोक्ष हस्तक्षेप के कारण ही आईआईटी प्रशासन ने दलित छात्रों के संगठन अंबेडकर पेरियार सर्किल की मान्यता रद्द की थी.
केंद्र सरकार का शिक्षा संस्थानों व शिक्षा नीतियों में दखलंदाजी करने का यह कोई पहला मामला नहीं था. नोबेल पुरस्कार विजेता और महान अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने भी इसीलिए नालंदा विश्वविद्यालय के उपकुलपति का पद त्याग दिया था. यही बात हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के मामले में सामने आई. 3 अगस्त, 2015 को हुए प्रदर्शन के दौरान एबीवीपी और एएसए के बीच हुई झड़प को संज्ञान में लेते हुए एबीवीपी नेता सुशील कुमार के इस बयान के आधार पर कि रोहित और उस के साथियों ने उसे चोट पहुंचाई है, जिस के कारण उसे अस्पताल में भरती होना पड़ा, के आधार पर रोहित और उस के 4 साथियों के विरुद्ध जांच बैठा दी गई.
17 अगस्त, 2015 को केंद्रीय श्रम मंत्री व सिकंदराबाद के सांसद बंडारू दत्तात्रेय, जोकि भाजपा में शामिल होने से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रह चुके हैं, ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को एक पत्र लिखा. इस पत्र में कहा गया था कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय पिछले कुछ समय से जातिवादी, अतिवादी और राष्ट्रविरोधी तत्वों की पनाहगाह बन गया है, इसलिए यहां पर ऐसा करने वालों के विरुद्ध काररवाई की जाए.
यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि एबीवीपी का नेता होने के कारण सुशील कुमार के श्रम मंत्री से अच्छे संबंध हैं. बंडारू दत्तात्रेय के पत्र के बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय जिस की प्रमुख स्मृति ईरानी हैं, ने 3 सितंबर को विश्वविद्यालय को पत्र लिख कर एएसए के खिलाफ काररवाई करने को कहा. इस पत्र के मिलते ही विश्वविद्यालय ने रोहित वेमुला सहित 5 छात्रों को जांच पूरी होने तक के लिए निलंबित कर दिया. मगर मानव संसाधन मंत्रालय की दखलंदाजी यहीं नहीं रुकी और 14 सितंबर, 6 अक्तूबर, 20 अक्तूबर और 19 नवंबर को विश्वविद्यालय प्रशासन को एक के बाद एक 5 रिमाइंडर भेज कर दोषियों के विरुद्ध शीघ्र काररवाई की बात दोहराई गई.
अंतत: विश्वविद्यालय की ओर से 7 जनवरी को मंत्रालय के पत्र पर काररवाई करते हुए पांचों छात्रों को विश्वविद्यालय से निष्काषित कर के तुरंत हौस्टल छोड़ने का फरमान जारी कर दिया गया. इस फरमान के जरिए इन पांचों छात्रों को निष्काषित करने के साथ ही प्रशासनिक बिल्डिंग, लाइब्रेरी, मैस, विश्वविद्यालय कैंपस और वहां के सार्वजनिक क्षेत्रों में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया. विश्वविद्यालय प्रशासन के इस फरमान के विरोध में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. इन प्रदर्शनों को धार देने के लिए छात्रों ने जौइंट कमेटी फौर सोशल एक्शन बना ली.
7 जनवरी को जिस दिन रोहित का निष्कासन हुआ था, उस दिन से ही वह अपने चारों अन्य साथियों के साथ धरना देते हुए कैंपस में खुले में रात गुजार रहा था. 17 जनवरी को रविवार का दिन था. सभी छात्र बैठे बातें कर रहे थे. रोहित भी वहां मौजूद था. बातोंबातों में जिक्र निकला कि 30 जनवरी को रोहित का जन्मदिन है, वह 27 साल का हो जाएगा. इस पर रोहित ने कहा कि उस की छात्रवृत्ति गत जुलाई से रुकी हुई है और उस पर काफी कर्ज हो गया है. उस के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह अपने जन्मदिन की पार्टी कर सके.
उस के लहजे से मायूसी झलक रही थी. प्रशासन व एबीवीपी के समर्थकों द्वारा किया गया अपमान उसे दुखी कर रहा था. शाम साढ़े 7 बजे वह सब की नजरें बचा कर न्यू रिसर्च हौस्टल के कमरा नंबर 207 में गया, जहां उस ने एक पत्र लिखा—
‘मैं हमेशा से एक लेखक बनना चाहता था. विज्ञान का लेखक, कार्ल सगन की तरह.
मैं विज्ञान से, तारों से, प्रकृति से प्रेम करता हूं, लेकिन इस के बाद भी मैं लोगों से प्यार करता हूं. यह जाने बिना भी कि मेरे लोगों को दूसरे से अलगथलग कर दिया गया है. हमारी भावनाओं को महत्त्व नहीं दिया जाता. हमारा प्रेम बनावटी है. हमारे विश्वास अंधे हैं. हमारी पहचान झूठी प्रथाओं द्वारा बनाई जाती है. वास्तव में यह बहुत कठिन हो गया है कि बिना दुख का सामना किए प्रेम किया जाए. मानव की योग्यता उस की तात्कालिक पहचान और निकट संभावनाओं तक सीमित कर दी गई है. वोट के तौर पर, गिनती के तौर पर, वस्तु के तौर पर. मनुष्य को एक विचार के तौर पर कतई नहीं लिया जाता. हर क्षेत्र में, शिक्षा में, सड़कों पर, राजनीति में और मरने व जीने में हमें अलग कर दिया गया है.
मैं इस प्रकार का पत्र पहली बार लिख रहा हूं. यह पहल भी है और अंत भी, मेरे अंतिम पत्र का. अगर आप के अनुकूल बात मैं नहीं लिख सका तो मुझे क्षमा करना. मेरा जन्म एक खतरनाक दुर्घटना थी. मैं जीवन भर अपने बचपन की तनहाई से निकल नहीं पाया. मैं एक ऐसा बच्चा था, जिसे बचपन से ही दुत्कारा गया. हो सकता है मैं गलत होऊं. मैं सारी जिंदगी संसार को नहीं समझ पाया हूं. नहीं समझ सका हूं प्यार, दर्द, जीवन और मृत्यु को. इस की कोई जल्दी भी नहीं थी. मगर इस पूरे समय में मैं ने पाया कि कुछ लोगों के लिए जीवन अभिशाप है. मुझे इस समय की चोट नहीं पहुंची, न मैं दुखी हूं. बस मेरे पास कुछ नहीं है, अपने बारे में कोई चिंता नहीं है, यह दयनीय है. यही कारण है जो मैं ऐसा कर रहा हूं.
लोग मुझे स्वार्थी, मूर्ख समझ सकते हैं, परंतु मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे बारे में लोग क्या सोचते हैं. मैं मौत के बाद की कहानियों में या भूतप्रेत में विश्वास नहीं करता. अगर इस संसार में कुछ है, जिस पर मेरा विश्वास है, वह यह कि मैं तारों की यात्रा कर सकता हूं और दूसरी दुनिया को जान सकता हूं. अगर कोई मेरे लिए कुछ कर सकता है तो वह जान ले कि पिछले 7 माह से मुझे छात्रवृत्ति नहीं मिली, जोकि 1 लाख 75 हजार रुपए बनती है. अगर हो सके तो यह मेरे परिवार को दिलवा देना. मेरे ऊपर 40 हजार रुपए रामजी के उधार हैं. उस ने कभी भी मुझ से रुपए नहीं मांगे. मेरा अंतिम संस्कार शांति से और सादे तरीके से करना, ठीक उसी तरह से जिस तरह मैं इस दुनिया में आया और इस दुनिया से जा रहा हूं. मेरे लिए कोई आंसू नहीं बहाना. जान लें कि जिंदा रहने के मुकाबले मर कर मैं खुश हूं.
भाई उमा, मैं यह सब तुम्हारे कमरे में कर रहा हूं इस के लिए मुझे माफ करना. एएसए परिवार से भी उन्हें मायूस करने के लिए माफी चाहता हूं. आप सब मुझ से बहुत प्यार करते हैं, यह मैं जानता हूं. मैं कामना करता हूं कि आप सब का भविष्य सुनहरा हो. अंतिम बार जय भीम.
हां, मैं औपचारिकताएं लिखना भूल गया. मेरी आत्महत्या के लिए कोई भी जिम्मेदार नहीं है. किसी ने भी मुझे ऐसा करने के लिए नहीं उकसाया, न अपने कृत्यों से, न शब्दों से. यह मेरा निर्णय है. इस के लिए मैं ही जिम्मेदार हूं. मेरे दोस्तों और दुश्मनों को परेशान मत करना, मेरे जाने के बाद.’ इस के बाद रोहित वेमुला ने एएसए के नीले झंडे को अपने शरीर पर लपेट कर छत में लगे कुंडे से लटक कर अपना जीवन समाप्त कर लिया. आधी रात के बाद जब उमा, प्रशांत के साथ कमरा नंबर 207 में आया तो उसे रोहित द्वारा आत्महत्या कर लिए जाने का पता चला, जिस की सूचना पुलिस को दे दी गई.
रोहित के साथी प्रशांत ने थाना गाची बावली में उस की आत्महत्या के लिए 3 लोगों को जिम्मेदार ठहराते हुए एफआईआर दर्ज कराई. इन के नाम हैं—केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय, उपकुलपति अप्पा राव और एबीवीपी नेता सुशील कुमार. 18 जनवरी को जैसे ही यह समाचार देश में फैला, इस मामले की परतें उधड़ने लगीं. एक कमजोर शिक्षा मंत्री की काररवाई के नतीजे के तौर पर इसे आत्महत्या न मान कर हत्या माना गया. क्योंकि शिक्षा से संबंधित शिकायतों पर जो मंत्रालय काररवाई नहीं करता, उसी ने एक दूसरे मंत्री के पत्र पर ताबड़तोड़ पत्र लिख कर काररवाई करने की मांग की.
यह पहला अवसर नहीं है जब बंडारू दत्तात्रेय जैसे केंद्रीय मंत्री व भाजपा नेता ने विरोधी विचारधारा के लोगों व छात्रों को राष्ट्रदोही व अवांछित तत्व करार दिया हो. 14 मई, 2014 के बाद से भाजपा नेता कई विश्वविद्यालयों के बारे में कह चुके हैं कि ये राष्ट्रद्रोही तत्वों की पनाहगाह हैं. मजे की बात यह कि ये सारे विश्वविद्यालय वे हैं, जिन की शिक्षा के क्षेत्र में विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान है. आईआईटी मद्रास हो, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय हो या अब हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, भाजपाइयों को इस प्रकार के सारे संस्थान राष्ट्रद्रोहियों के गढ़ नजर आते हैं.
रोहित की आत्महत्या केवल एक छात्र की मौत नहीं है. यह मौत दर्शाती है दलित छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को. भाजपा के शासनकाल में यह भेदभाव अपने चरम की ओर अग्रसर है. कहने को तो मोदीजी अंबेडकर को महान नेता बताते हुए उन का गुणगान करते हैं, मगर उन के अधीनस्थ मंत्री व नेता अंबेडकरवादियों को राष्ट्रविरोधी कहते नहीं थक रहे हैं.
क्या यह असहिष्णुता नहीं है कि कालेज में हुए विरोध प्रदर्शन के कारण एक समुदाय को राष्ट्रविरोधी करार दे दिया जाए, उन का भविष्य चौपट कर दिया जाए? और अब जब इस मामले में सीधे तौर पर बंडारू दत्तात्रेय और मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी की भूमिकाएं शक के दायरे में हों तो भाजपा कह रही है कि इस मामले को तूल नहीं दिया जाए, यह तो छात्र के मन में उपजी निराशा का परिणाम था. इस का दलित या गैरदलित राजनीति से कोई संबंध नहीं है.
अपनी बात को सही साबित करने के लिए 20 जनवरी को स्मृति ईरानी ने प्रेस कौन्फ्रैंस की, जिस में कहा गया कि रोहित के निष्कासन का निर्णय जिस उपसमिति ने किया था, उस का मुखिया एक दलित ही था और यह एक दलित द्वारा दलित के विरुद्ध की गई काररवाई थी. स्मृति ईरानी के इस बयान को दिए 24 घंटे भी नहीं हुए थे कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के दलित प्रोफेसरों ने ईरानी के बयान का खंडन करते हुए कहा कि जिस उपसमिति ने रोहित और उस के 4 साथियों के निष्कासन का निर्णय लिया था, उस में कोई भी दलित नहीं था, सारे के सारे सदस्य गैरदलित थे.
यहां तक कि स्मृति ईरानी के बयान को भ्रामक बताते हुए विश्वविद्यालय के 15 प्रोफेसरों ने अपने प्रशासनिक पदों से त्यागपत्र दे दिया. उन्होंने कहा कि मानव संसाधन विकास मंत्री का यह कहना कि उपरोक्त निर्णय में दलित फैकल्टी की सहमति शामिल थी, एकदम निराधार और झूठ है. यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि विश्वविद्यालय की एग्जीक्यूटिव काउंसिल में किसी भी दलित को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है. मंत्री महोदया देश को गुमराह कर रही हैं. मुद्दों को भटका कर अपनी जिम्मेदारी से भाग रही हैं.
बात को बढ़ती देख दलित छात्रों के समर्थन में राजनीतिक दल भी कूद गए. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, कम्युनिस्ट ए. राजा और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी छात्रों के समर्थन में हैदराबाद विश्वविद्यालय पहुंचे. साथ ही रोहित वेमुला की आत्महत्या के मामले को ले कर देश भर में विरोध प्रदर्शन किए गए. विश्व भर के 150 से ज्यादा विख्यात शिक्षाविदों ने हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा की गई काररवाही की कड़े शब्दों में निंदा की.
जहां एक ओर प्रधानमंत्री अपने भाषण में भारत को विश्वगुरु बनाने की जोरशोर से घोषणा करते हैं, वहीं दूसरी ओर देश में इस तरह की घटनाएं हो रही हैं, जो एक सभ्य समाज के लिए कलंक है. गाहेबगाहे ऐसी घटनाओं के पीछे अधिकतर प्रधानमंत्री के सिपहसालारों की कारगुजारियां नजर आती हैं. पुलिस ने केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय और 2 अन्य के खिलाफ भादंवि की धारा 306 के तहत केस दर्ज कर लिया है. अब देखना यह है कि कानून आगे का अपना काम करता है या नहीं? मोदीजी अपने उतावले मंत्रियों के विरुद्ध काररवाई करने का मन बनाते हैं या नहीं? वैसे इस की उम्मीद कम ही है कि प्रधानमंत्री इस बार भी कोई कदम उठाएंगे.
लगता है, जिस प्रकार रोहित ने अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि मेरे ऊपर इस का कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई मेरे बारे में क्या सोचता है, ठीक उसी प्रकार मोदीजी भी सोचते हैं कि कोई कुछ भी कहता रहे, उन पर इस का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. वैसे बताते चलें कि 22 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लखनऊ की अंबेडकर यूनिवर्सिटी में भाषण देते हुए भावुक हो कर रोहित वेमुला का नाम ले कर कहा है कि भारत मां ने एक लाल खोया है. लेकिन उन वे आंसू राजनीति से प्रेरित थे. उस राजनीति से प्रेरित जिस का कोई चालचरित्र और चेहरा नहीं होता, जो गिरगिट की तरह रंग बदलता है.
हालांकि सरकार ने इस मामले की जांच के लिए एक आयोग भी बैठा दिया है और रोहित वेमुला के परिवार को 8 लाख रुपए सहायता राशि देने की भी घोषणा की है. जबकि धरना और विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने रोहित वेमुला के परिवार को 50 लाख रुपए और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की मांग की है. बौक्स 3 अगस्त को जब इस घटनाक्रम की शुरुआत हुई तो उस समय केंद्रीय विश्वविद्यालय के उपकुलपति आर.पी. शर्मा थे. कहा जाता है कि उस समय विश्वविद्यालय प्रशासन ने जो जांच कमेटी बनाई थी, उस ने पांचों दलित छात्रों को क्लीन चिट दे दी थी. क्योंकि एबीवीपी से जुड़ा छात्र सुशील कुमार जिस अस्पताल में दाखिल हुआ था, उस के रिकौर्ड के अनुसार वह वहां पर अपेंडीसाइटिस के औपरेशन के लिए दाखिल हुआ था, उस के शरीर पर कोई चोट का निशान नहीं था.
23 सितंबर, 2015 को नए उपकुलपति अप्पा राव ने इस विश्वविद्यालय का कार्यभार संभाल लिया है. उसी समय मानव संसाधन विकास मंत्रालय बहुत गतिशील हो गया. 24 सितंबर को ही रिमाइंडर भेज दिया कि जवाब दें कि दलित छात्र रोहित वेमुला और उस के साथियों के विरुद्ध क्या काररवाई हुई. इस के बाद एक के बाद एक पांच रिमाइंडर भेजे गए. आखिरकार 7 जनवरी को इन पांचों छात्रों रोहित वेमुला, डी प्रशांत, पी. विजय कुमार, शैषैया चेमुदुगुंटा और सुकन्ना को निलंबित कर दिया गया था, जिस के परिणामस्वरूप रोहित ने आत्महत्या की थी.






