Social Awareness. हमारे यहां जीवनसाथी खो चुके पुरुषों और औरतों को हेयदृष्टि से ही नहीं देखा जाता, बल्कि उन की उपेक्षा और अपमान भी किया जाता है. हम उन के जीवन में कैसे सुधार ला सकते हैं...
झारखंड के लोहारदगा के रहने वाले 42 साल के महावीर उरांव की पत्नी की मौत एक साल पहले हो गई थी. उन के 2 बेटे और 2 बेटियां थीं. उन की मुलाकात 45 साल की मनियारी उरांव से हुई तो वह उसे दिल से चाहने लगी. वह भी अकेली थी. उस के पति ने 7 साल पहले उसे छोड़ दिया था. उस की भी 27 साल की एक बेटी थी, जिस की शादी हो चुकी थी.
महावीर और मनियारी, दोनों ही एकदूसरे को न केवल पसंद करते थे, बल्कि प्यार भी करते थे. इस बात की जानकारी महावीर की 17 साल की बेटी प्रमिला टोप्पो को हुई तो उस ने अपने पिता की शादी मनियारी से कराने का निश्चय ही नहीं किया, बल्कि कोशिश कर के करा भी दी. इस तरह जीवनसाथी खो चुके 2 तनहा दिलों की उजड़ी वीरान जिंदगी फिर से संवर गई.
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देखा जाए तो यह कितनी अच्छी कोशिश है. अगर बच्चे या परिवार वाले चाहें तो इस तरह उन के घर के विधवा या विधुर की जिंदगी में एक बार फिर उम्मीद और खुशी की लहर जाग सकती है. हमारे यहां ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिन का जीवनसाथी समय से पहले उन्हें छोड़ कर जा चुका है.
सन 2011 में मिली जानकारी के अनुसार, हमारे यहां 4.6 प्रतिशत यानी 121 करोड़ में से 5.6 करोड़ लोग अपना जीवनसाथी खो चुके हैं, जो तनहा जिंदगी जी रहे हैं. इन में महिलाओं की संख्या पुरुषों की अपेक्षा काफी ज्यादा है. इस की वजह यह है कि महिला की उम्र लंबी होती है.






