Social Crime: यह कहानी सिर्फ लक्ष्मी की नहीं है, बल्कि हर उस औरत की है, जो पति से डरती है. लेकिन समाज से और ज्यादा अपमान सहती रहती है. वह इसलिए क्योंकि उसे अपना घर बचाना होता है. वह सब कुछ सहते हुए भी चुप रहती है, क्योंकि उसे अपने बच्चों का भविष्य देखना होता है. और अंत में वही चुप्पी उस की कब्र की मिट्टी बन जाती है. पढ़ें, दिल को झकझोर देने वाली यह कहानी.
लक्ष्मी जब उस घर में ब्याह कर आई थी, तब उस घर की लक्ष्मी बन कर आई थी. साल 2017 में जब वाराणसी के मार्कंडेय महादेव मंदिर में उस का विवाह 38 साल के प्रदीप मिश्रा के साथ हुआ था, तब वह मात्र 18 साल की थी. उस का पति प्रदीप उस से 20 साल बड़ा था. अपनी उम्र से 20 साल बड़े आदमी से विवाह करने का मतलब था कि उस के फेमिली वालों ने मजबूरी में उस का विवाह प्रदीप के साथ किया था. क्योंकि 20 साल का अंतर कम नहीं होता.
लक्ष्मी के पेरेंट्स की मजबूरी यह थी कि वे इतने गरीब थे कि बेटी का विवाह नहीं कर सकते थे. इसीलिए उन्होंने लक्ष्मी का विवाह मंदिर में किया था.
प्रदीप मिश्रा उम्र में ही लक्ष्मी से बड़ा नहीं था, बल्कि अपराधी भी था. वह 10 साल की सजा भी काट चुका था. थाना चौबेपुर में उस के खिलाफ कई आपराधिक मुकदमे दर्ज थे. इसीलिए इतनी उम्र तक वह कुंवारा ही रहा था.
कुछ भी रहा हो, लक्ष्मी प्रदीप से मंदिर में ब्याह कर के उस के घर की लक्ष्मी बन कर आ गई थी. इस तरह के आदमी से विवाह कर के लक्ष्मी जिस घर में आई थी, वहां संशय, डर और अपमान ने पहले से ही डेरा डाल रखा था. ऐसे घर में लक्ष्मी कहां से लक्ष्मी रहती. इस तरह लक्ष्मी नाम की यह महिला ‘लक्ष्मी’ नहीं, विडंबना बन कर रह गई थी.

प्रदीप मिश्रा: पत्नी द्वारा अपमानित करने पर उसे ठिकाने लगाने की ठान ली
वाराणसी के सोनबरसा गांव की उस गली में, जहां सुबह गंगा की आरती की ध्वनि गूंजती थी और शाम को दीपों की रोशनी उतरती थी, वहां प्रदीप से विवाह के बाद लक्ष्मी की जिंदगी बिना किसी शोर के धीरेधीरे बुझने लगी थी.
प्रदीप के साथ रहते हुए दिन गुजरने लगे. उसे अपने सुख की नहीं, पति के सुख की ज्यादा चिंता रहती. धीरेधीरे उसकी उम्र 26 साल हो गई तो पति की उम्र 46 साल. लक्ष्मी जवान हुई तो पति अधेड़ यानी बूढ़ा हो गया था. अब तक वह 2 बच्चों, एक बेटे और एक बेटी की मां बन चुकी थी.

मृतका लक्ष्मी: गरीब पेरेंट्स ने उस का विवाह 20 साल बड़े प्रदीप से कर दिया था
सपने देखने और और उन्हें संवारने की उम्र थी लक्ष्मी की, हाथों में बच्चों की गरमाहट और मन में शायद एक ऐसी जिंदगी की चाह थी, जिस में उसे हर पल सफाई न देनी पड़े, लेकिन उस के सामने था उस का पति 46 साल का प्रदीप मिश्रा, जो औटो चलाता था. वह एक कातिल भी था, जिस की वह सजा भी काट चुका था.
20 साल की उम्र का फासला कोई छोटी बात नहीं होती. इस तरह देखा जाए तो लक्ष्मी ने प्रदीप से विवाह नहीं किया था, बल्कि अपनी जिंदगी से, खुशियों से, सपनों से समझौता किया था. जैसा आज तक होता आया है कि लड़की के हिस्से में आता है समझना, झुकना, निभाना, वैसा ही लक्ष्मी के हिस्से में भी आया था. इस का उलटा पुरुष के हिस्से में आता है अधिकार, शक और असुरक्षा.
शादी के शुरुआती दिनों में शायद सब कुछ ठीकठाक रहा होगा. तभी तो लक्ष्मी प्रदीप के 2 बच्चों की मां बन गई थी. तब प्रदीप भी जवान रहा होगा. इसलिए लक्ष्मी को हर तरह से खुश रखता रहा होगा. इसी का परिणाम था उन के 2 बच्चे. बच्चे रिश्तों को जोड़ते हैं, परिवार को टूटने से बचाते हैं, लेकिन कभीकभी वे फंस गए होते हैं.
धीरेधीरे लक्ष्मी में बदलाव आने लगा था. इस की वजह यह थी कि अब वह जवान हुई तो उस का पति यानी प्रदीप मिश्रा बूढ़ा हो गया था. वह उस की हसरतें जगा तो देता था, पर उन्हें शांत करना उस के वश का नहीं रह गया था. जवान लक्ष्मी की चाल में वह काफी पीछे रह जाता था. औटो चलाने वाला प्रदीप पत्नी और बच्चों की खुशी के लिए पैसे कमाने के चक्कर में देर रात को आता था और खाना खा कर सो जाता था. कभीकभार लक्ष्मी उस से प्यार करने की बात करती तो वह उस की भावनाओं को नहीं समझता था. ऐसे में लक्ष्मी जलभुन जाती और बूढ़ा कह कर उसे धिक्कारती.
अपमान और शरम से प्रदीप करवट बदल कर सो जाता था. धीरेधीरे यह क्रम बढ़ता ही गया. पति का प्यार न पाने और देह की आग शांत न होने से लक्ष्मी का स्वभाव बदलने लगा था. वह चिड़चिड़ी हो गई थी, जिस से अपना ज्यादातर समय वह मोबाइल पर बिताने लगी थी. उसी बीच उस की मोबाइल द्वारा ही किसी से मुलाकात हो गई थी, जो उसे अपने पति और बच्चों से ज्यादा अच्छा लगने लगा था.
फिर तो जब देखो, तब लक्ष्मी मोबाइल पर बात करती रहती. कभी मुसकराती तो खिलखिला कर हंसती. कभी अचानक चुप हो जाती. फिर यही चुप्पी प्रदीप को चुभने लगती. लक्ष्मी में आए इस बदलाव से उसे लगता था कि लक्ष्मी उस से दूर जा रही है. वह उसे बूढ़ा समझती है, जिस की वजह से वह किसी और की हो चुकी है. प्रदीप को अभी इस बात का शक था, क्योंकि उस के पास इस बात का कोई सबूत नहीं था. शक दीमक की तरह रिश्तों को भीतर से खोखला कर देता है, लेकिन यह शक नहीं था. लक्ष्मी सचमुच किसी और की हो गई थी.
क्योंकि एक बार नहीं, 3 बार घर, पति और बच्चों को छोड़ कर भाग चुकी थी. वह जब भी घर छोड़ कर जाती थी, कभी एक सप्ताह तो कभी 10 दिन बाद लौट आती थी. पहली बात तो प्रदीप उस से कुछ पूछने की हिम्मत ही नहीं कर पाता था और अगर पूछ भी लेता तो उसे बूढ़ा कह कर अपमानित करती थी. वह अपना घर बचाने के लिए चुप रह जाता था. यही वजह थी कि दिनोंदिन लक्ष्मी मनबढ़ होती गई और वह वह करने लगी, जो उस का मन होता था. इस से प्रदीप परेशान रहने लगा था.
लक्ष्मी ने कभी खुल कर कुछ कहा या नहीं, यह अब कोई नहीं जानता. लेकिन प्रदीप ने लोगों को जो बताया, उस के हिसाब से लक्ष्मी ही हमेशा दोषी रही. प्रदीप का कहना था कि वह उसे ‘बुड्ïढा’ कह कर अपमानित करती थी. अब वह उस के साथ नहीं रहना चाहती थी. लक्ष्मी 3 बार घर छोड़ कर जा चुकी थी. पर उसने ही नही, किसी ने भी उस से यह नहीं पूछा कि वह कहां और क्यों गई थी?
इस की वजह यह थी कि प्रदीप को अपने बच्चों की चिंता थी. पत्नी नहीं रहेगी तो वह छोटेछोटे बच्चों को कैसे संभालेगा. बच्चों को पालने के लिए पैसों की जरूरत थी और पैसे कमाने के लिए उस का घर से बाहर जाना जरूरी था. अगर लक्ष्मी घर में नहीं रहेगी तो वह बच्चों को अकेला छोड़ कर घर से बाहर कैसे जा पाता? यही सोच कर प्रदीप लक्ष्मी की यह गलती भी स्वीकार करता रहा और उस के ताने भी सुनता रहा. लक्ष्मी जब भी घर छोड़ कर जाती थी, सप्ताह या 10 दिनों बाद खुद ही वापस आ जाती थी. वह भाग कर कहां जाती थी, किस के पास जाती थी, यह प्रदीप को ही नहीं, किसी को भी नहीं पता था. उस के मायके वालों को भी नहीं.
क्या घर छोड़ कर जाना अपराध है? क्या अपनी खुशी के लिए इतना करना अपराध है? कभीकभी यह घुटन भरे वातावरण से निकल कर सांस लेने की कोशिश भी तो हो सकती है? एक औरत की मानसिक थकान दूर करने की इच्छा भी तो हो सकती है. लक्ष्मी के दिन अब बोझिल होने लगे थे. प्रदीप के घर में उस के साथ रहने में उसे घुटन सी होने लगी थी. वह मां थी, लेकिन उस से पहले एक औरत भी थी. किसी भी औरत के लिए घर एक सुरक्षित जगह मानी जाती है. उस की सारी दुनिया वही घर होता है, जहां उसे सुरक्षा के साथसाथ सारे सुख मिलते हैं. पर लक्ष्मी के लिए अब उस का ही घर सुरक्षित जगह नहीं रहा था.
जिस सुख के लिए वह उस घर में आई थी, अब वही सुख उसे वहां नहीं मिल रहा था. अब उस के हर सवाल में इलजाम थे, हर चुप्पी में शक था और हर हंसी में अपराध था. जब देखो, तब लक्ष्मी मोबाइल पर व्यस्त रहने लगी थी. शायद इसलिए नहीं कि दूसरी ओर कोई और था, बल्कि इसलिए कि कोई तो हो, जिस से वह बिना डरे, बिना संकोच बात कर सके. मन की घुटन को दूर कर सके. मन को हलका कर सके.
लेकिन पुरुष समाज में औरत का अकेलापन भी उसे ही दोषी ठहराता है. अपराधी बनाता है या अपराध को जन्म देता है. अकेलेपन पर पति की उपेक्षा से परेशान लक्ष्मी एक बार फिर घर छोड़ कर भागी तो 18 दिसंबर, 2025 की सुबह लौटी थी. उस दिन गुरुवार था. लक्ष्मी घर तो वापस आ गई थी, लेकिन उस का मूड ठीक नहीं था. घर आने के बाद जब प्रदीप ने उसे टोका तो वह उस से लडऩे लगी थी. इस बार उस ने प्रदीप से स्पष्ट कह दिया था कि अब वह उस के साथ नहीं रहेगी. वह बूढ़ा हो चुका है. वह बूढ़े के साथ रहने के बजाय अपने बौयफ्रेंड के साथ रहेगी.
इस के पहले भी वह 2 बार भागी थी. तब प्रदीप और लक्ष्मी का एक बार थाने में तो दूसरी बार पंचायत में समझौता हुआ था. प्रदीप उसे तलाक देने को भी राजी था, लेकिन तब लक्ष्मी ने कहा था कि अब वह नहीं भागेगी. इस के बावजूद यह तीसरी बार भाग गई थी. अकेलेपन और पति की टोकाटाकी से परेशान लक्ष्मी बारबार प्रदीप से झगड़ा कर रही थी. हल्की ठंड थी, लेकिन अकेलेपन से बेचैन लक्ष्मी का मूड गरम था.
पतिपत्नी के इस झगड़े से बच्चे परेशान हो रहे थे. इसलिए सभी का मूड ठीक करने के लिए प्रदीप ने 19 दिसंबर, 2025 की शाम को लक्ष्मी से अपनी बहन के यहां चलने को कहा. उस की बहन जौनपुर के चंदवक के अहिरौली गांव में रहती थी. लक्ष्मी प्रदीप की बहन यानी अपनी ननद के यहां जाने के लिए राजी हो गई. महिलाएं अकसर मान जाती हैं. लक्ष्मी भी मान गई थी, शायद वह आखिरी कोशिश करना चाहती थी.
सभी को अपने औटो से ले कर प्रदीप बहन के यहां पहुंचा. रात करीब 10 बजे सभी ने साथ बैठ कर खाना खाया. खाने के बाद एक बार फिर प्रदीप ने उस लड़के का जिक्र किया, जिस से लक्ष्मी बातें करती थी. प्रदीप का कहना था कि लक्ष्मी उसे छोड़ कर उस लड़के से शादी करना चाहती है. प्रदीप ने उस लड़के की बात की तो लक्ष्मी उसे भलाबुरा कहने लगी. जबकि प्रदीप का कहना था कि वह उसे समझा रहा था. लड़के का जिक्र करने से लक्ष्मी को गुस्सा आ गया था और वह उस से जोरजोर लडऩे लगी थी.
रिश्तेदारों के सामने ही प्रदीप को अपमानित करने लगी थी. वहां भी उस ने वही बात कही कि अब वह उस जैसे बूढ़े के साथ नहीं रहेगी. वह अपने बौयफ्रेंड के साथ रहेगी. यह बात प्रदीप को बुरी लगी और उस ने मन ही मन उस की हत्या करने का निर्णय ले लिया. प्रदीप के अनुसार, रोजरोज के इन झगड़ों से अपमानित होने से वह परेशान हो चुका था. रिश्तेदारों के सामने लक्ष्मी ने प्रदीप को अपमानित किया तो उस ने तय कर लिया कि अब उसे लक्ष्मी को ठिकाने लगाना ही होगा. तभी वह शांति से रह पाएगा.
थोड़ा शांत होने के बाद लक्ष्मी ने चाय पिलाने के लिए कहा. बहन ने चाय बनाने के लिए कहा तो लक्ष्मी ने कहा, ”नहीं, मैं घर में नहीं, बाहर चल कर चाय पीना चाहती हूं.’’
बच्चों को बहन के घर में ही छोड़ कर प्रदीप लक्ष्मी को औटो से ले कर चल पड़ा. चलते समय बच्चों ने नहीं सोचा था कि वह मम्मी को अंतिम बार देख रहे हैं. यही कोई 11 बजे का टाइम था. लक्ष्मी ने एक बार फिर चाय पीने की बात की. उस की यह एक मामूली इच्छा थी. साधारण सी बात थी. बस, उस की इसी इच्छा ने अपराध को जन्म दे दिया था. लक्ष्मी औटो की पिछली सीट पर बैठी थी. वह सोच रही थी कि शायद सब ठीक हो जाएगा. उसे क्या पता था कि जिस आदमी के साथ उस ने इतने साल गुजारे थे, आज वही आदमी उस की सांसों का हिसाब करने वाला है.
सड़क पर सन्नाटा पसरा हुआ था. प्रदीप कथौर गांव के पास (चोलापुर) की ओर मुड़ गया. थोड़ा आगे बढऩे पर सड़क को सुनसान देख कर प्रदीप को लगा कि यही सही जगह और मौका है. उस के दिमाग में लक्ष्मी की हत्या की योजना बनने लगी. फिर उस ने औटो रोक दिया. उस के औटो रोकने पर लक्ष्मी ने पूछा, ”यहां सुनसान में औटो क्यों रोक दिया?’’
प्रदीप ने बहाना बनाते हुए कहा, ”कुछ गड़बड़ी हो गई है. रुको देखता हूं, क्या खराबी आई है?’’
औटो से बाहर आ कर प्रदीप ने गले में लिपटा मफलर निकाला और उस का फंदा बना कर तैयार हो गया. इस के बाद लक्ष्मी से कहा कि उस की मदद के लिए वह भी जरा बाहर आ जाए. लक्ष्मी जैसे ही औटो से उतर कर बाहर आई, प्रदीप ने फुरती से मफलर का फंदा उस के गले में डाल कर कस दिया. 2 मिनट तक तड़प कर लक्ष्मी हमेशाहमेशा के लिए शांत हो गई. लक्ष्मी की हत्या करने के बाद उस सर्द रात में प्रदीप 10 मिनट तक चुपचाप बैठा सोचता रहा कि अब क्या किया जाए. काफी सोचने के बाद उस के मन में आया कि अगर वह लाश को इसी तरह छोड़ कर चला गया तो वह पकड़ा जा सकता है, क्योंकि उस का घर वहां से ज्यादा दूर नहीं था. कोई न कोई लाश को पहचान लेगा.
लाश की पहचान न हो सके, इस के लिए वह लाश को सड़क से घसीट कर पास के एक बाग में ले गया और उस की पहचान मिटाने के लिए औटो में रखी एक सीमेंट की ईंट से उस के चेहरे पर कई वार किए, जिस से उस का चेहरा इस तरह बिगड़ गया कि अब उसे कोई पहचान नहीं सकता था. वहीं करीब ही बाजरे के लट्ठे का ढेर था. चेहरा बिगाडऩे के बाद प्रदीप ने लाश को उसी में छिपा दिया. उस के बाद वह न घर गया और न बहन के यहां. वह फरार हो गया था. बच्चों को उस ने बहन के घर ही रहने दिया था.
21 दिसंबर, 2025 को कथौर गांव का रहने वाला मूकबधिर सोनू यादव बाग में लगे बाजरे के लट्ठे के ढेर को उठाने पहुंचा तो उसे उस ढेर में एक महिला की लाश दिखाई दी. वह भाग कर गांव पहुंचा और इशारे से लोगों को बुला कर लट्ठे के ढेर के पास ले आया. इस के बाद लोगों ने ग्राम प्रधान दयाराम यादव को बाजरे के ढेर में लाश होने की सूचना दी तो दयाराम ने यह जानकारी वाराणसी के थाना चोलापुर पुलिस को दे दी.
लाश मिलने की सूचना मिलते ही एसएचओ दीपक कुमार पुलिस बल, फोरैंसिक टीम एवं डौग स्क्वायड के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. थाने से निकलने से पहले उन्होंने यह सूचना पुलिस अधिकारियों को भी दे दी थी. लाश बाहर निकाली गई. चेहरा बुरी तरह कुचला हुआ था. इसलिए उस की पहचान मुश्किल लग रही थी. प्रदीप ने यही सोचा था कि चेहरा बिगाड़ देने से कोई पहचान नहीं पाएगा, लेकिन वह यह भूल गया था कि औरतें सिर्फ चेहरे से ही नहीं पहचानी जातीं, उन की पहचान एक निशान से भी हो जाती है. उस के हाथों पर पहचान लिखी थी.
लाश के दोनों हाथों पर टैटू थे. एक हाथ पर अंगरेजी में ‘पीएल’ लिखा था तो दूसरे हाथ में दिल का निशान तो बना ही था, साथ ही कुछ लिखा भी था. ये प्रेम के निशान थे. पुलिस के लिए यही सब से बड़ा सुराग साबित हुआ. पूछताछ में मरने वाली का नाम आया लक्ष्मी. ‘एल’ से लक्ष्मी था तो ‘पी’ से प्रदीप. यानी उस ने हाथ पर लक्ष्मी और प्रदीप लिखवा रखा था. इस का मतलब था कि वह प्रदीप से बहुत प्यार करती थी. तभी तो अपने नाम के साथ उस का नाम लिखवाया था, लेकिन समय के साथ वह प्यार खत्म हो गया था और बात हत्या तक पहुंच गई थी.

प्रैस क्रौन्फ्रैंस करते एसीपी विदुष सक्सैना और एडीसीपी वरूणा नीतू कात्यायन
उसी टैटू से लाश की शिनाख्त हो गई तो पुलिस हत्यारे का पता लगाने के साथ सबूत जुटाने में लग गई. पुलिस को अब लक्ष्मी के पति प्रदीप मिश्रा की तलाश थी. लेकिन वह घर में नहीं था. पुलिस को उस का मोबाइल नंबर मिल गया था, जिसे पुलिस ने सर्विलांस पर लगा दिया था. इस के अलावा पुलिस सीसीटीवी कैमरों की भी मदद ले रही थी. परिणामस्वरूप पुलिस और क्राइम ब्रांच ने सीसीटीवी कैमरों और सर्विलांस की मदद से प्रदीप मिश्रा उर्फ गुड्ïडू को औटो के साथ 22 दिसंबर को महमूदपुर मोड़ के पास से गिरफ्तार कर लिया.
उसे थाना चोलापुर ला कर एडिशनल डीसीपी वरुणा नीतू कत्यायन और एसीपी सारनाथ विदुष सक्सेना की उपस्थिति में पूछताछ की गई तो प्रदीप थोड़ेबहुत बहाने बनाने के बाद टूट गया और पत्नी लक्ष्मी की हत्या करने का अपराध स्वीकार कर लिया. शुरुआत में उस ने भी बाकी अपराधियों की तरह अंजान बनने की कोशिश की थी, लेकिन सच भारी होता है. ज्यादा देर छिपता नहीं है. वह जल्दी ही मुंह से निकल ही आता है. जब उस ने कहा कि उस ने ही लक्ष्मी को मारा है तो पुलिस ने राहत की सांस ली, क्योंकि मामले का खुलासा हो गया था और आरोपी पकड़ा गया था.
और फिर जैसे किसी को अपना गुनाह हल्का करना होता है तो वह गुनाह की वजहें गिनाने लगता है, उसी तरह प्रदीप भी लक्ष्मी की हत्या की वजहें गिनाने लगा कि वह उसे ताने मारती थी, उस से दूर हो गई थी, उस का किसी और से अफेयर था. लेकिन प्रदीप ने यह नहीं कहा कि उस ने उसे समझने या समझाने की कोशिश की.
प्रदीप का कहना था कि उस ने उस की हर बात सुनी, उसे हर तरह की आजादी दी, शायद उसी का नतीजा था कि वह आजाद हो गई थी. अपना धर्म और संस्कार भूल गई थी. उस ने यह नहीं कहा कि किसी जवान महिला को सिर्फ रोटीकपड़ा ही नहीं चाहिए, उसे प्यार और स्नेह भी चाहिए, जो उसे परिवार के लिए बांधे रखता है.
उसके 2 बच्चे हैं, जो अभी कुछ नहीं जानते. सब से ज्यादा चुप्पी अब उन्हीं के हिस्से में है. वे अपनी बुआ के पास हैं. उन्हें बताया गया है कि मम्मी कहीं गई है. पापा काम से बाहर गए हैं. किसी ने उन्हें नहीं बताया कि उन की मम्मी अब कभी कहानी नहीं सुनाएगी, उन्हें अब कभी नहीं मिलेगी और उन के पिता जेल में हैं. पूछताछ के बाद प्रदीप को जेल भेज दिया गया है. पुलिस ने उसे हत्यारा साबित करने के लिए सबूत भी जुटा लिए हैं, जिस में सीसीटीवी फुटेज के अलावा घटनास्थल पर उस की उपस्थिति के भी सबूत थे. Social Crime






