Madhya Pradesh Crime News: नंदी सिंह और हरि सिंह के सामने जब भी युवरानी और राजकुमारी बेबी राजा आतीं, दोनों को अपना वह अपमान याद आ जाता, जिसे उन्होंने गांव वालों के सामने पुलिस से करवाया था. उन्होंने दोनों की हत्या कर के अपमान का बदला तो ले लिया, लेकिन अब उन की बाकी की जिंदगी जेल में ही कटेगी.
छतरपुर जिले में जहां से उत्तर प्रदेश की सीमा शुरू होती है, वहां हजार बारह सौ लोगों की आबादी वाला एक छोटा सा गांव है नैगुंवा. विकास की दौड़ में पिछड़े इस जिले में नैगुंवा का इलाका काफी पिछड़ा हुआ है. नैगुंवा हमेशा से उपेक्षा का शिकार रहा हो, ऐसा नहीं है. उत्तर प्रदेश के चरखारी राजा की यह जागीर भूतकाल में अपने वैभव और सुशासन के लिए जानी जाती थी. स्वतंत्रता के बाद राजारजवाड़े खत्म हो गए तो फिर जागीरें भी नहीं रहीं. लेकिन जैसे रस्सी जलने पर भी उस के बल नहीं जाते, कुछ वैसा ही हाल इन रियासतों और रियासतदारों का है.
नैगुंवा के बीचोबीच पत्थर की विशाल हवेली आज भी मौजूद है, जिसे जागीरदारों की निशानी कह सकते हैं. स्थानीय लोग इसे गढ़ी कहते हैं. यह गढ़ी अब जागीरदार के वंशज महाराज बहादुर सिंह के आधिपत्य में है. इस हवेली में वह अपनी पत्नी संगीता देवी, 70 वर्षीया राजमाता युवरानी और 40 वर्षीया बहन राजकुमारी बेबी राजा के साथ रहते हैं. यह जागीर अब पहले जैसी संपन्न तो नहीं रही, लेकिन अभी भी जागीरदारों के पास खेतीकिसानी की इतनी जमीन है, जिस से आज भी इस पुराने जागीरदार खानदान का राजसी ठाठबाट बरकरार है.
अपने रुतबे को बरकरार रखने के लिए महाराज बहादुर सिंह ने अपनी सारी खेती की जमीन बंटाईदारों को सौंप रखी है. इस के 2 फायदे हैं, एक तो राजा को खुद किसान के तौर पर अपने खेतों में काम नहीं करना पड़ता, दूसरे बटाई के बाद भी जागीर के खाते में हर साल इतना माल आ जाता है कि पेट भी भरता रहे और शान भी बनी रहे. इसी साल फरवरी महीने के दूसरे सप्ताह की बात है. महाराज के ससुराल पक्ष के किसी खास रिश्तेदार के यहां शादी थी. शादी में शामिल होने के लिए महाराज बहादुर सिंह अपनी पत्नी संगीता देवी और दोनों बच्चों को ले कर उरई चले गए. उन की मां युवरानी और बहन बेबी राजा गढ़ी में ही रह गईं.
दरअसल, महाराज बहादुर सिंह की 2 बहनें थीं, जिन में से एक की मृत्यु हो चुकी थी. दूसरी छोटी बहन बेबी राजा की शादी उत्तर प्रदेश के एक राज परिवार में हुई थी. लेकिन पति से अनबन के कारण वह पिछले कई सालों से अपने मायके में मां और भाई के साथ रह रही थीं. 17 फरवरी की बात है. महाराज बहादुर सिंह उरई में शादी समारोह में व्यस्त थे. तभी नैगुंवा के रहने वाले नंदी सिंह राजपूत ने उन्हें फोन कर के बताया कि गढ़ी के दरवाजे सुबह से ही बंद हैं. दरअसल नंदी सिंह रोज सुबह गढ़ी में दूध देने आता था. वह महाराज का बटाईदार भी था, इसलिए महाराज बहादुर सिंह से उस की अच्छी बनती थी.
नंदी ने फोन पर महाराज को बताया कि सुबह वह दूध ले कर गढ़ी गया था, लेकिन काफी देर तक दरवाजे पर दस्तक देने के बाद भी किसी ने दरवाजा नहीं खोला. उस वक्त वह वापस लौट आया और 11 बजे के आसपास फिर से दूध ले कर गढ़ी पर गया. लेकिन अंदर से दरवाजा अब भी बंद था. बारबार आवाज देने पर अंदर से कोई नहीं आया, न ही कोई जवाब मिला.नंदी की इस सूचना के बाद महाराज बहादुर सिंह को तत्काल कदम उठाना चाहिए था, लेकिन संभवत: अपनी व्यस्तता की वजह से उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया, फलस्वरूप बात यहीं खत्म हो गई. अगले दिन 18 फरवरी की सुबह नंदी ने उन्हें फिर से फोन कर के दरवाजा न खोले जाने की बात बताई, जिसे सुन कर नैगुंवा महाराज बहादुर सिंह को मांबहन की चिंता हुई.
दोपहर बाद वह पत्नी संगीता और बच्चों को ले कर नैगुंवा वापस आ गए. महाराज के बारबार आवाज देने पर भी जब दरवाजा नहीं खुला तो पूरा गांव गढ़ी के बाहर जमा हो गया. लोगों ने तुरंत बढ़ी सी सीढ़ी लगाई, ताकि अंदर जाया जा सके. कुछ लोगों ने सीढ़ी के सहारे महाराज के साथ गढ़ी की दीवार फांद कर अंदर प्रवेश किया. अंदर सन्नाटा पसरा था. महाराज ने गांव वालों के साथ एकएक कमरे को छान मारा, लेकिन मां और बहन का कहीं कोई पता नहीं चला. उन्हें ढूंढ़ते हुए जब वह महारानी युवरानी के शयन कक्ष में पहुंचे तो वहां का नजारा देख कर सन्न रह गए. कमरे की फर्श पर उन की मां युवरानी और बहन बेबी राजा के शव पड़े थे.
मौके के हालात किसी गंभीर वारदात की तरफ इशारा कर रहे थे, इसलिए महाराज ने तुरंत इस घटना की जानकारी नैगुंवा थाना प्रभारी मृगेंद्र त्रिपाठी को दी. जागीरदार परिवार में इस तरह का हादसा होना गंभीर बात थी. टीआई मृगेंद्र त्रिपाठी ने तुरंत एसपी छतरपुर ललित शाक्यवार और एसडीओपी नैगुंवा उमेश तोमर को इस घटना के बारे में बता दिया. इस के बाद वह अपने साथ एसआई जितेंद्र भदौरिया, सुशील शुक्ला और महिला एसआई प्रतिभा श्रीवास्तव को ले कर नैगुंवा पहुंच गए.
जिस के बारे में हम यहां बात कर रहे हैं, वह चरखारी रियासत कभी बुंदेलखंड अंचल के बड़े भूभाग पर फैली हुई थी. प्रजा की बेहतर खुशहाली के लिए जब कुछ जागीरदारों के गठन की जरूरत पड़ी तो विचारविमर्श के बाद नैगुंवा के रहने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह यादव को नैगुंवा का जागीरदार नियुक्त किया गया था. विश्वनाथ प्रताप सिंह वाकई योग्य, पराक्रमी और ईमानदार व्यक्ति थे. उन्होंने अपने समय में इस जागीर का काफी विकास किया, जिस से खुश हो कर चरखारी महाराज ने नैगुंवा की सीमा से लगी रिबई जागीर की जागीरदारी भी उन्हें सौंप दी. दोनों जागीरों का काम संभालते हुए ही विश्वनाथ प्रताप सिंह की शादी हुई. शादी के एक साल बाद उन के घर बेटे का जन्म हुआ, जिसे नाम दिया गया रतन सिंह जूदेव.
वक्त के साथ रतन सिंह जूदेव बड़े होने लगे. शिक्षादीक्षा के बाद जब उन्होंने जवानी में कदम रखा तो रियासत में सब से खूबसूरत मानी जाने वाली युवती चंपा पर उन का दिल आ गया. यह वह समय था, जब जागीरदार के बेटे और भविष्य के जागीरदार की जीवनसाथी बनने के लिए लगभग हर युवती तैयार रहती थी. जब रतन सिंह ने चंपा के पास एकांत में मिलने का संदेश भिजवाया तो वह खुशी से झूम उठी. वह निश्चित समय पर रतन सिंह से मिलने नदी किनारे बने बाग में पहुंच गई. पहली मुलाकात में ही चंपा ने रतन सिंह के दिल पर अपनी छाप छोड़ दी. नतीजतन रतन सिंह उस से शादी करने की जिद कर बैठे. लेकिन पिता विश्वनाथ प्रताप सिंह ने यह रिश्ता स्वीकार नहीं किया.
उस की जगह वह पड़ोसी जागीरदार की बेटी को बहू बना कर गढ़ी में ले आए. रतन सिंह ने पिता की आज्ञा मान कर उन की पसंद की लड़की से शादी तो कर ली, लेकिन पत्नी का रूपयौवन उन का मन नहीं जीत सका. फलस्वरूप शादी के बाद भी रतन सिंह की अधिकांश रातें चंपा के साथ बीतती रहीं. समय के साथ चंपा रतन सिंह के 2 बेटों, सरकार सिंह और सरताज सिंह की मां बनी. दूसरी तरफ रतन सिंह की ब्याहता रानी से भी 2 बेटे, विजय बहादुर सिंह और गजराज सिंह पैदा हुए. चंपा चाहती थी कि महाराज अपनी नैगुंवा और रिबई की जागीरदारी में से एक जागीर उस के दोनों बेटों को दे दें और दूसरी अपनी पत्नी के बेटों को.
लेकिन तब तक चंपा का यौवन ढल चुका था. उस में अब वह आकर्षण नहीं रह गया था, जिस की वजह से महाराज अपनी रानी को छोड़ कर उस के घर पड़े रहते थे. इसलिए वह उस की बात टालते रहे. उसी दौरान उन का निधन हो गया. महाराज के निधन के बाद जागीरों का बंटवारा हुआ, जिस में रिबई की जागीर गजराज सिंह को मिली और नैगुंवा की जागीर विजय बहादुर सिंह को. इस तरह गजराज सिंह और विजय बहादुर सिंह अलगअलग जागीरों के जागीरदार बन गए.
बाद में गजराज सिंह का विवाह महोबा के महाराजपुर की राजकुमारी शांति सिंह के साथ हुआ. लेकिन विवाह के ठीक दूसरे दिन जब महाराज की सुहागरात थी और वह अपने शयनकक्ष में दाखिल होने ही वाले थे कि अज्ञात लोगों ने उन पर हमला कर के उन की हत्या कर दी थी. शांति सिंह पति का चेहरा देखने से पहले ही विधवा हो गईं. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और देवर विजय बहादुर सिंह के सहयोग से अपनी जागीर को संभालने लगीं.
विजय बहादुर सिंह जूदेव का विवाह हमीरपुर जिले के ममना गांव में हुआ था. उन की 3 संतानें हुईं, 2 बेटियां और एक बेटा महाराज बहादुर सिंह जूदेव. समय आने पर विजय बहादुर सिंह जूदेव ने अपनी बड़ी बेटी रज्जो राजा का विवाह कर दिया. इसी बीच लंबी बीमारी के बाद उन का निधन हो गया. जबकि दूसरी बेटी बेबी राजा की शादी के बाद अपने पति से नहीं बनी. फलस्वरूप वह मायके आ कर अपनी मां युवरानी और भाई महाराज बहादुर सिंह के साथ रहने लगीं.
सब कुछ ठीक चल रहा था कि 18 फरवरी को महाराज बहादुर सिंह की गैरमौजूदगी में गढ़ी के अंदर मांबेटी की संदिग्ध मौत से गढ़ी चर्चाओं में आ गई. नैगुंवा थाना टीआई मृगेंद्र त्रिपाठी की टीम नैगुंवा स्थित गढ़ी के अंदर पहुंची तो वहां पर 70 वर्षीया युवरानी तथा 40 वर्षीया राजकुमारी बेबी राजा की लाशें बरामद हुईं. घटनास्थल पर मिले सबूत और हालात साफ इशारा कर रहे थे कि मांबेटी को किसी सुनियोजित साजिश के तहत मौत के घाट उतारा गया था. अलबत्ता वारदात को हादसे की शक्ल देने की नाकाम कोशिश जरूर की गई थी. गढ़ी के अंदर महारानी और राजकुमारी के शव बरामद होने की खबर फैलते ही न केवल छरतपुर जिले में, बल्कि समूचे बुंदेलखंड में सनसनी फैल गई थी.
घटनास्थल की स्थिति से साफ लग रहा था कि हत्यारों ने मांबेटी की हत्या के बाद उन के शव रूम हीटर से चिपका दिए थे, ताकि ऐसा लगे कि दोनों की मौत करंट की चपेट में आने की वजह से हुई थी. प्रारंभिक जांच के बाद पुलिस ने रानी और राजकुमारी की बरामद लाशों को पोस्टमार्टम के लिए नैगुंवा के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भिजवा दिया. 3 चिकित्सकों के पैनल ने मांबेटी के शवों का पोस्टमार्टम किया. पोस्टमार्टम के बाद गांव में ही शवों का पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया. गढ़ी में मांबेटी की संदिग्ध मौत को ले कर तरहतरह के कयास लगाए जा रहे थे. लेकिन हकीकत तब सामने आई, जब 3 दिनों बाद पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली.
रिपोर्ट में बताया गया था कि रानी और राजकुमारी के साथ मारपीट कर के उन की हत्या की गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने पर नैगुंवा थाना पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी. दूसरी तरफ इस बीच छतरपुर रेंज के डीआईजी के.सी. जैन, एसपी ललित शाक्यवार, एएसपी नीरज पांडेय, नैगुंवा एसडीओपी उमेश सिंह तोमर ने भी मौके पर पहुंच कर घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया.
इन अधिकारियों ने स्थानीय लोगों से चर्चा भी की. घटनास्थल का जायजा लेने के बाद ललित शाक्यवार ने न केवल एक टीम गठित कर के जल्द से जल्द हत्या की गुत्थी सुलझाने के निर्देश दिए, बल्कि यह भी बताया कि जांच की दिशा क्या होनी चाहिए? दरअसल, घटनास्थल से पुलिस को कुछ टूटे दांत और कुछ ऐसे सबूत मिले थे, जिन से साफ जाहिर हो रहा था कि मांबेटी की मौत करंट लगने से नहीं, बल्कि उन की हत्या की गई थी.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक, मृत्यु से पहले मांबेटी को क्रूरतापूर्वक पीटा गया था, जिस से जिस्म के कई अंदरूनी हिस्से क्षतिग्रस्त हो गए थे और इसी वजह से दोनोें ने दम तोड़ दिया था. गढ़ी से राजकुमारी बेबी राजा का मोबाइल भी गायब था. लेकिन लंबा समय बीतने के बाद भी हत्यारों का कोई पुख्ता सुराग नहीं लगा तो एसपी ने हत्यारों का सुराग देने वाले व्यक्ति को 10 हजार रुपए इनाम देने की घोषिण की.
बाद में इस राशि को बढ़ा कर छतरपुर पुलिस रेंज के डीआईजी ने 20 हजार रुपए कर दी. इस के बाद भी जब पुलिस को सफलता नहीं मिली तो ललित शाक्यवार ने घटना का सिलसिलेवार अध्ययन किया और सब से पहले महाराज बहादुर सिंह को वारदात की सूचना देने वाले नंदी सिंह से बारबार पूछताछ करने के निर्देश दिए. इस का नतीजा यह निकला कि वारदात के 13वें दिन पुलिस को गढ़ी के अंदर दोहरी हत्या करने वालों तक पहुंचने में कामयाबी मिल गई.
दोहरी हत्या की इस वारदात को नैगुंवा के नंदी सिंह राजपूत ने अपने साथी हरि सिंह उर्फ मुन्ना यादव के साथ मिल कर अंजाम दिया था. पुलिस ने आरोपियों से जब सख्ती से पूछताछ की तो दोनों ने महारानी और राजकुमारी की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. दोनों हत्यारोपियों को अदालत में पेश कर के नैगुंवा पुलिस ने दोनों को 2 बार पुलिस रिमांड पर ले कर हत्याकांड से संबंधित पूछताछ की और सबूत हासिल किए. नैगुंवा टीआई के मुताबिक हत्या की वारदात का मकसद एक लाख रुपए की रकम चोरी करना तथा पुरानी रंजिश थी.
नंदी राजपूत रानी की खेती की जमीन बटाई पर ले कर खेती किया करता था. नंदी ने गढ़ी के अंदर दोहरी हत्या को उस वक्त अंजाम दिया था, जब राजा महाराज बहादुर सिंह जूदेव उरई स्थित रिश्तेदारी में गए हुए थे. हत्या की वारदात के अगले दिन हत्यारोपी नंदी राजपूत ने योजना अनुसार मोबाइल पर महाराज बहादुर सिंह जूदेव को सूचना दी कि गढ़ी के दरवाजे नहीं खुल रहे हैं.
महाराज बहादुर सिंह जूदेव के निर्देश पर नंदी राजपूत ने नैगुंवा थाना पुलिस को गढ़ी के दरवाजे न खुलने की जानकारी दी थी. बताते हैं कि नैगुंवा गढ़ी में कुछ समय पूर्व लाखों रुपए के गहने, नकदी चोरी होने की घटना घटी थी, जिस में संदेह के आधार पर राजकुमारी बेबी राजा ने पुलिस से दोनों हत्यारोपियों को प्रताडि़त करवाया था. इन दोनों को पता चला कि बेबी राजा ने किसी को एक लाख रुपए की जमीन बेची है. नकदी चोरी करने के मकसद से दोनों हत्यारोपी रात के वक्त गढ़ी में घुसे. लेकिन वहां से उन्हें महज 3 हजार रुपए की धनराशि और एक मोबाइल ही मिल पाया था.
जमीन बिक्री से हासिल रकम कर्ज में चुका दी गई थी. चूंकि गढ़ी के अंदर दाखिल हत्यारोपियों को महारानी और राजकुमारी ने पहचान लिया था, इसलिए भेद खुल जाने के डर से दोनों ने पीटपीट कर मांबेटी की हत्या कर दी थी. पुलिस रिमांड के बाद 5 मार्च को दोनों अभियुक्तों का डीएनए परीक्षण कराने के बाद पुलिस ने उन्हें अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Madhya Pradesh Crime News
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित






