UP Crime: संजय ने पत्नी को दोस्त के साथ आपत्तिजनक स्थिति में अपनी आंखों से देखा था. इस के बावजूद उस ने दोनों को माफ कर दिया था. लेकिन पत्नी और दोस्त दोनों ही बेवफा हो गए थे, इसलिए उन्होंने संजय की जिंदगी खत्म कर अपनी जिंदगी बरबाद कर ली.

भावसिंह का पुरवा निवासी राम सिंह रोजाना की तरह 15 फरवरी, 2016 की सुबह 8 बजे के करीब अपने अरहर की खेत की मेड़ पर पहुंचा तो उसे वहां शराब की एक खाली बोतल और सिगरेट के कुछ टुकड़े पड़े दिखाई दिए. उन्हें देख कर उसे लगा कि रात को यहां बैठ कर किसी ने शराब पी है. वह कुछ आगे बढ़ा तो उसे कुछ पौधे टूटे व मसले हुए दिखाई दिए. जिज्ञासावश वह खेत में घुसा तो उस के मुंह से चीख निकल गई. वहां एक युवक की लाश पड़ी थी. बदहवास हालत में वह गांव की ओर भागा और गांव पहुंच कर गांव वालों को खेत में लाश पड़ी होने की सूचना दी.

कुछ ही देर में गांव के तमाम लोग उस के खेत पर पहुंच गए. उन्हीं में से किसी ने थाना सिकंदरा पुलिस को इस बात की सूचना दे दी. यह 15 फरवरी, 2016 की बात है. सूचना पाते ही थानाप्रभारी जयप्रकाश यादव पुलिस बल के साथ घटनास्थल की ओर चल पड़े. चूंकि मामला हत्या का था, इसलिए उन्होंने इस बात की जानकारी पुलिस अधिकारियों को भी दे दी थी. घटनास्थल पर पहुंचने के बाद भीड़ हटा कर वह अरहर के खेत में पड़ी लाश के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा, युवक की हत्या बड़ी बेरहमी से गला रेत कर की गई थी. उस की उम्र 35 साल के आसपास रही होगी. वह काली पैंट और धारीदार शर्ट पहने था. गले में दुर्गाजी का लौकेट पड़ा था, जो खून से सना था.

इस तरह की और वीडियो देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करें

मृतक की तलाशी ली गई तो पैंट की जेब से एक ड्राइविंग लाइसेंस और 2 सौ रुपए नकद मिले. लाश के पास ही खून से सनी कांच की एक टूटी बोतल पड़ी थी, जिस से अनुमान लगाया कि इसी बोतल से इस का गला रेता गया था. जयप्रकाश यादव घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर रहे थे कि एसपी (देहात) सभाराज सिंह और सीओ राजाराम यादव भी आ गए. उन्होंने भी घटनास्थल एवं लाश का निरीक्षण किया. इस के बाद थानाप्रभारी से मृतक के बारे में पूछा तो उन्होंने मृतक की पैंट की जेब से मिला ड्राइविंग लाइसेंस उन्हें थमा दिया. लाइसेंस के अनुसार, मृतक का नाम संजय था और यह सिकंदरा के मोहल्ला शास्त्रीनगर का रहने वाला था.

लाइसेंस में दर्ज पते पर एक सिपाही को भेजा गया तो पता चला कि मृतक वहीं रहता था. मृतक के पिता विश्वंभर ने घटनास्थल पर आ कर लाश देखी तो फफक कर रो पड़े. उन्होंने बताया कि लाश उन के बेटे संजय उर्फ चुलबुल की है, जो ड्राइवर था और प्राइवेट बस चलाता था. 2 दिनों से वह घर नहीं आया था. उन्हें लगा कि वह बारात की बुकिंग में गया होगा, इसलिए घर नहीं आया है. उन्हें क्या पता था कि उस की हत्या हो गई है.

लाश की शिनाख्त हो गई तो उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया. इस के बाद विश्वंभर से पूछा गया कि उन्हें किसी पर शक है तो उन्होंने छूटते ही कहा, ‘‘साहब, मुझे शानू पर शक है.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘साहब, वह हमारे पड़ोस में रहता है. संजय और शानू में गहरी दोस्ती थी. इसी दोस्ती की आड़ में शानू ने संजय की पत्नी सरिता से नाजायज संबंध बना लिए थे. संजय को पता चला तो वह विरोध करने लगा. उस ने शानू के घर आने पर रोक लगा दी. इन्हीं बातों से लगता है कि शानू ने ही संजय की हत्या की है.

अवैध संबंधों का पता चलते ही सीओ राजाराम यादव ने थानाप्रभारी जयप्रकाश यादव को आदेश दिया कि वह शानू को गिरफ्तार कर के जल्द से जल्द मामले का खुलासा करें. उन्होंने यह भी कहा कि कथित आरोपी की गिरफ्तारी में अगर कोई प्रभावशाली व्यक्ति हस्तक्षेप करता है तो उसे भी पकड़ कर थाने ले आएं. जयप्रकाश यादव ने शानू को गिरफ्तार करने के लिए शास्त्रीनगर स्थित उस के घर छापा मारा तो पता चला कि 2 दिनों से शानू घर नहीं आया है. शानू के इस तरह घर से गायब होने से पुलिस का शक विश्वास में बदल गया. उस के न मिलने पर जयप्रकाश यादव पूछताछ के लिए मृतक की पत्नी सरिता के घर जा पहुंचे.

सरिता घर पर ही थी. पुलिस को देखते ही लंबा घूंघट खींच कर वह जोरजोर से रोने लगी. जयप्रकाश यादव ने उसे धैर्य बंधा कर पूछा, ‘‘क्या शानू का तुम्हारे घर आनाजाना था?’’

‘‘जी साहब, वह हमारे घर आताजाता था.’’

‘‘कहीं उसी ने तो तुम्हारे पति की हत्या नहीं की?’’

‘‘मेरे पति और शानू में गहरी दोस्ती थी. दोनों साथ खातेपीते थे. जरूरत पड़ने पर शानू उन की आर्थिक मदद भी करता था. शानू मेरे पति की हत्या क्यों करेगा साहब?’’

सरिता की बात सुन कर जयप्रकाश यादव असमंजस में पड़ गए. सरिता का ससुर विश्वंभर शानू पर हत्या का आरोप लगा रहा था, जबकि मृतक की पत्नी उस का बचाव कर रही थी. उन्हें लगा कि सरिता जरूर कुछ छिपा रही है और लोगों को गुमराह करने के लिए रोने का नाटक कर रही है. 18 फरवरी को जयप्रकाश यादव ने नाटकीय ढंग से शानू को सिकंदरा बसअड्डे से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब उस से संजय की हत्या के बारे में पूछा गया तो उस ने साफ मना कर दिया. इस पर जयप्रकाश यादव ने अंधेरे में तीर छोड़ते हुए कहा, ‘‘शानू, तुम्हारे मना करने से क्या होता है, सरिता ने हमें सब सचसच बता दिया है. अब तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम भी सब कुछ सचसच बता दो, वरना…’’

इस बात से शानू इतना डर गया कि उस ने दोस्त संजय की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने अपने दोस्त इरशाद उर्फ मटरू के साथ मिल कर संजय की हत्या की थी. इस के लिए उस ने मटरू को 10 हजार रुपए देने का वादा किया था. उसी लालच में उस ने उस की मदद की थी. इरशाद उर्फ मटरू को पकड़ने के लिए जयप्रकाश यादव ने कई जगहों पर छापा मारा, लेकिन वह पकड़ा नहीं जा सका. शानू ने संजय की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया तो जयप्रकाश यादव ने मृतक के पिता विश्वंभर की ओर से शानू अंसारी तथा इरशाद उर्फ मटरू के खिलाफ संजय की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. पूछताछ में शानू ने संजय की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह अवैध संबंधों में की गई हत्या की कहानी थी.

कानपुर देहात के थाना मंगलपुर का एक कस्बा है राजपुर. इसी कस्बे में अनूप सिंह यादव अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटियां सरिता, कुसुमा और एक बेटा राजकुमार था. अनूप सिंह की कस्बे के बाजार में किराने की दुकान थी. इसी दुकान की कमाई से उस का घर चलता था. सरिता भाईबहनों में सब से बड़ी थी, जिस की वजह से वह मातापिता की लाडली बेटी थी. वह थोड़ा खूबसूरत और चंचल स्वभाव की भी थी. शादी लायक हुई तो अनूप सिंह ने उस का विवाह कानपुर देहात के कस्बा सिकंदरा के मोहल्ला शास्त्रीनगर के रहने वाले विश्वंभर के बेटे संजय उर्फ चुलबुल से कर दिया. संजय ड्राइवरी करता था.

संजय सरिता जैसी खूबसूरत पत्नी पा कर खुद को बड़ा किस्मत वाला समझ रहा था. वहीं सरिता संजय जैसे कुरूप को पति के रूप में पा कर खुद को बदकिस्मत समझ रही थी. सरिता की सुंदरता की ही वजह से संजय उस से दबादबा सा रहता था और उस की हर बात मानता था. सरिता संजय की इसी कमजोरी का फायदा उठा कर उसे अपनी अंगुलियों पर नचाने लगी. संजय ड्राइवर था, वह सुबह घर से निकलता था तो देर शाम को ही घर लौटता था. महीने में वह जो कमा कर लाता था, सरिता के हाथों पर रख देता था.

संजय सरिता को खुश रखने की हर संभव कोशिश करता था, लेकिन तुनकमिजाज सरिता खुश नहीं रहती थी. कभी वह कम कमाई का रोना रोती तो कभी अपने भाग्य को कोसती. उस की अपने सासससुर से भी नहीं पटती थी, इसलिए उन से लड़झगड़ कर अलग रहने लगी थी. दरअसल, सरिता ने पति के रूप में किसी सजीले युवक के सपने संजोए थे. लेकिन मिल गया था कुरूप और कमजोर, जो न तो उस की आंखों को भाता था और न ही बिस्तर पर उस का साथ दे पाता था. इस तरह उस के सारे सपने चकनाचूर हो गए थे.

संजय का एक दोस्त था शानू, जो गोराचिट्टा, शरीर से हृष्टपुष्ट, हंसमुख और मजाकिया स्वभाव का था. वह मोटर मैकेनिक था. मेनरोड पर उस की दुकान थी. संजय की बस जब भी खराब होती थी, वह उसी के यहां उसे ठीक कराता था. चूंकि शानू भी शास्त्रीनगर में ही रहता था, इसलिए संजय और शानू में गहरी दोस्ती थी. इस की एक वजह यह भी थी कि दोनों ही शराब के शौकीन थे. पीने के ही चक्कर में एक दिन शानू संजय के घर गया तो सरिता पर उस की नजर पड़ी तो उसे देखता ही रह गया. वह उसे इस कदर भा गई कि खातेपीते उस की नजरें सरिता पर ही टिकी रहीं. सरिता भी अपनी अदाओं से उसे घायल करती रही. खापी कर जाते समय शानू ने कहा, ‘‘भाभी, आप बेहद सुंदर हैं.’’

यह सुन कर सरिता ने शानू को गौर से देखा. इस के बाद मुसकरा कर सिर झुका लिया. सरिता को दिल में बसा कर शानू चला गया. इस के बाद वह अकसर संजय के घर जाने लगा. सरिता को रिझाने के लिए कभी वह खानेपीने की चीजें ले जाता तो कभी कोई उपहार ले जाता. सरिता थोड़ा नानुकुर के बाद उन चीजों को ले लेती. संजय को शक न हो या उसे बुरा न लगे, इस के लिए वह संजय की भी खूब खातिरदारी करता था. खानेपीने का सारा खर्च वही करता था.

शानू शरीर से हृष्टपुष्ट तो था ही, कमाई भी अच्छी थी. इसलिए वह संजय और सरिता पर खुले हाथों खर्च करता था. कभीकभार सरिता के हाथों पर हजार, 5 सौ रुपए रख भी देता था. वह मना करती तो कहता, ‘‘ले लो, वक्तबेवक्त काम आएंगे.’’

शानू अब संजय की गैरमौजूदगी में भी उस के घर जाने लगा था और सरिता से हंसीमजाक भी करने लगा था. सरिता भी उसे चाहने लगी थी, क्योंकि एक तो शानू उम्र में उस से छोटा था, दूसरे स्वस्थ और हंसमुख स्वभाव का था. इस के अलावा वह उस पर पैसे भी खर्च कर रहा था. जून की तपती एक दोपहर को शानू सरिता के घर पहुंचा तो सरिता उस समय कमरे में सो रही थी. गर्मी काफी होने और बिजली न होने की वजह से सरिता सिर्फ पेटीकोटब्लाउज पहने थी. आसपास सन्नाटा पा कर शानू सरिता के कमरे पर पहुंचा तो वह अंदर से बंद था, मगर खिड़की खुली थी. शानू ने खिड़की से अंदर झांका तो अस्तव्यस्त कपड़ों में सोई सरिता को देख कर उस का मन बेकाबू हो उठा. सरिता के अधखुले अंगों ने उसे बेचैन कर दिया. उस ने दरवाजा खटखटाया तो सरिता की आंखें खुल गईं.

सामने मंदमंद मुसकराते शानू को देख कर सरिता ने साड़ी पहननी चाही तो उस ने साड़ी फेंक कर दरवाजा अंदर से बंद कर के उसे बांहों में भर कर कहा, ‘‘कब तक तरसाओगी भाभी?’’

इस के बाद वहां जो हुआ, वह बरबादी की ओर ले जाने वाला था. लेकिन इस का पश्चाताप न सरिता को हुआ, न शानू को. क्योंकि शानू ने सरिता को जो सुख दिया था, वह संजय से उसे कभी नहीं मिला था. फिर संजय वैसे भी थकाथका रहता था.

संजय सरिता के इस प्रेमप्रसंग से बिलकुल अंजान था. लेकिन आसपड़ोस वालों को शानू और सरिता के संबंधों की जानकारी हो गई थी. इस के बावजूद उन्हें किसी की परवाह नहीं थी. शानू सरिता का दीवाना था तो सरिता उस की मुरीद. सरिता संजय की पत्नी थी, इसलिए उस पर भी शानू का अधिकार हो गया था. एक दिन संजय ने सरिता से कहा कि उसे बुकिंग पर बस ले कर झांसी जाना है, वहां से वह 2 दिनों बाद लौटेगा. अगर किसी चीज की जरूरत हो तो वह बता दे. सरिता पति को हसरत भरी नजरों से देख कर बोली, ‘‘घर में सब सामान है, तुम निश्चिंत हो कर जाओ.’’

संजय के जाने से सरिता मन ही मन बहुत खुश हुई. इस के बाद उस ने शानू को फोन कर के बता दिया कि संजय 2 रात घर नहीं आएगा, इसलिए वह शाम को दुकान बंद कर के सीधे उस के घर आ जाएगा. दूसरी ओर संजय औफिस पहुंचा तो पता चला कि बस की बुकिंग किसी वजह से कैंसिल हो गई थी. इसलिए घूमतेफिरते वह रात 10 बजे घर पहुंचा तो उस समय सरिता शानू की बांहों में समाई बेसुध पड़ी थी. यह देख कर संजय आगबबूला हो उठा. उसे न पत्नी से ऐसी उम्मीद थी न दोस्त से. कुछ देर तक वह चुपचाप खड़ा सोचता रहा. रात में हंगामा करने के बजाय वह खून का घूंट पी कर रह गया. वह घर के बाहर पड़ी अपने पिता की चारपाई पर जा कर लेट कर सो गया.

सवेरे वह उठा तो सीधे शानू के घर गया. उस का तमतमाया चेहरा देख कर शानू समझ गया कि वह क्यों आया है? इस के बाद भी खुद को सामान्य रखते हुए उस ने पूछा, ‘‘संजय भइया, आज सवेरेसवेरे?’’

‘‘हां शानू, बात ही ऐसी है कि सवेरेसवेरे आना पड़ा.’’

‘‘मेरे लायक कोई काम?’’

‘‘आओ मेरे साथ चलो, कहीं एकांत में बैठ कर बातें करते हैं.’’

शानू उस के साथ चल पड़ा. कस्बे से बाहर आ कर दोनों एक पुलिया पर बैठ गए. उस के बाद संजय ने कहा, ‘‘मैं देख रहा हूं, आजकल मेरी पत्नी सरिता तुम पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान है?’’

‘‘मैं कुछ समझा नहीं भइया?’’

‘‘समझबूझ कर अंजान मत बनो शानू.’’

‘‘इतना नाराज क्यों हो रहे हो भइया?’’

‘‘बीती रात तुम कहां थे?’’

‘‘अपने घर पर.’’

‘‘सफेद झूठ?’’

शानू ने सिर झुका कर मौन साध लिया. एक तरह से यह उस की स्वीकृति थी. इस पर संजय ने होंठ चबाते हुए कहा, ‘‘अगर तू मेरा दोस्त न होता तो कल रात मैं तुझे कुल्हाड़ी से काट कर रख देता. मैं ने तुझे सरिता के पास सोते देखा था. अब अगर तू अपनी खैर चाहता है तो दोबारा मेरे घर की ओर कदम बिलकुल मत रखना.’’

शानू को खरीखोटी सुना कर संजय अपने घर पहुंचा और सीधे सरिता से पूछा, ‘‘कल रात घर में तुम्हारे साथ कौन था?’’

‘‘कोई तो नहीं.’’ सरिता ने अंजान बनते हुए कहा तो संजय ने उस की कनपटी पर एक झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ दिया.

सरिता की आंखों के आगे अंधेरा छा गया. वह समझ गई कि उस के और शानू के संबंधों की जानकारी पति को हो गई है. इसलिए उस ने चुप्पी साध ली. संजय चीखा, ‘‘तो तू ने अपना एक और खसम चुन लिया?’’

सरिता ने कोई जवाब नहीं दिया. संजय सरिता की पिटाई करते हुए बोला, ‘‘हरामजादी, दोस्त से दुश्मनी कराने के लिए तू उस की बाहों में समा गई. कान खोल कर सुन ले, आइंदा अगर मैं ने तुझे उस से बातें करते भी देख लिया तो तेरी बोटीबोटी काट कर किसी नाले में फेंक दूंगा.’’

उस दिन के बाद सरिता और शानू का एकदूसरे से मिलना बंद हो गया. संजय ने भी शानू से दोस्ती तोड़ ली और उस के साथ खानापीना बंद कर दिया. लेकिन यह दूरी ज्यादा दिनों तक बनी नहीं रह पाई. एक दिन दोनों का आमनासामना हुआ तो शानू ने पैर पकड़ कर संजय से माफी मांग ली. इस के बाद दोनों का फिर उठनाबैठना और खानापीना शुरू हो गया.

एक दिन संजय के घर से निकलते ही शानू आ गया और सरिता को बांहों में भर कर प्रणय निवेदन करने लगा. लेकिन सरिता उस के अनुरोध को ठुकराते हुए बोली, ‘‘शानू, इस तरह लुकाछिपी का यह खेल अब मैं नहीं खेलना चाहती.’’

‘‘तो फिर…’’

‘‘मैं कोई स्थाई समाधान चाहती हूं.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि मैं संजय से छुटकारा चाहती हूं. अब तुम मेरे शरीर को तभी छू पाओगे, जब तुम मुझे उस से छुटकारा दिला दोगे.’’

‘‘ठीक है भाभी, तुम्हारे लिए मैं यह पाप भी करने को तैयार हूं.’’ कह कर शानू चला गया.

इस के बाद वह संजय की हत्या की योजना बनाने लगा. इस के लिए उस ने अपने दोस्त इरशाद उर्फ मटरू को रुपयों का लालच दे कर बात की तो वह राजी हो गया. मटरू शानू की ही दुकान पर काम करता था. योजना बना कर शानू मटरू के साथ 14 फरवरी, 2016 की रात 8 बजे सिकंदरा बसस्टाप पर खड़ा हो गया. संजय आया तो उस के पैर छू कर बोला, ‘‘भइया, आज मौसम बड़ा अच्छा है. चलो पार्टी हो जाए.’’

संजय शराब का आदी था, इसलिए वह मना नहीं कर सका. शानू ने देशी शराब के ठेके से 2 बोतल शराब खरीदी और अपने दोस्त इरशाद उर्फ मटरू को साथ ले कर कस्बे से एक किलोमीटर दूर भावसिंह का पुरवा पहुंचे और गांव से बाहर सड़क किनारे एक अरहर के खेत की मेड़ पर बैठ कर तीनों शराब पीने लगे. शानू ने जानबूझ कर संजय को ज्यादा शराब पिलाई. नशे में धुत हो कर संजय लड़खड़ा कर सड़क की ओर चलने लगा तो शानू ने उसे लात मार कर जमीन पर गिरा दिया. इस के बाद दोनों उसे अरहर के खेत में घसीट ले गए और शराब की बोतल तोड़ कर उसी से उस का गला रेत दिया. इस के बाद दोनों फरार हो गए.

पूछताछ के बाद 19 फरवरी, 2016 को शानू अंसारी को माती की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक शानू की जमानत नहीं हुई थी, दूसरा अभियुक्त इरशाद फरार था. पुलिस उसे पकड़ने की कोशिश कर रही थी. संजय मारा तो गया पत्नी की ही वजह से, लेकिन उस की हत्या में पुलिस को कोई भूमिका नजर नहीं आई. इसलिए पुलिस ने उसे अभियुक्त नहीं बनाया. UP Crime

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...