Group ISIS: क्या खौफ और क्रूरता की कोई अंतिम परिभाषा हो सकती है? क्या खौफ और आतंक का कोई अंतिम मानदंड हो सकता है? अगर वाकई कुछ हो सकता है तो आईएसआईएस वही है. इस के पहले दुनिया में किसी संगठन ने तो क्या किसी बर्बर राष्ट्र ने भी दुनिया को इस कदर नहीं डराया, चौंकाया, जैसे यह कर रहा है. आखिर इस सब के पीछे की कहानी क्या है? आइए जानते हैं—

एक संगठन, जो हजारों लोगों की मौजूदगी में पिंजरे में जानवरों की तरह बंद कर के बेकसूर पत्रकारों, मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली युवतियों और विरोधी संगठनों के सैनिकों पर पैट्रोल छिड़क कर आग लगा देता है और उन के धूधू कर के जलने का सामूहिक उत्सव मनाता है. एक ऐसा संगठन, जो किसी मां के बेटे को ही मजबूर करता हो कि वह अपनी मां का सिर धड़ से अलग कर दे. एक ऐसा संगठन, जो बाकायदा 4-4 कैमरों के सामने इस बर्बरता से विदेशी पत्रकारों की गरदन हलाल करता हो, जैसे बकरे की कुरबानी कर रहा हो.

एक ऐसा संगठन, जो ज्ञानविज्ञान की हजारों किताबों को यह कह कर जला देता हो कि ये युवाओं को इसलाम से विमुख कर रही हैं. सवाल है, ऐसे क्रूर और खौफनाक संगठन में शामिल होने के लिए दुनिया भर से युवक और युवतियां भागे क्यों चले आते हैं?

ट्यूनीशिया के गृहमंत्री लोफी बेन जेडौअ के मुताबिक तो उन के देश से हजारों युवतियां सीरिया में विद्रोह की कमान संभाले लड़ाकों को सैक्स सुख देने के लिए तथा उन के साथ कंधे से कंधा मिला कर लड़ने के लिए चोरीछिपे देश से भाग रही हैं. ट्यूनीशिया के गृहमंत्री इसे ‘सैक्स जिहाद’ की संज्ञा देते हैं और उन के मुताबिक इसे चला रही हैं खुद ट्यूनीशिया की युवतियां.

यह बात संसद के भीतर कही गई है, जिस से इस की गंभीरता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. बेन के मुताबिक, ‘ये औरतें 20, 30 या 100 के करीब विद्रोहियों के साथ सैक्सुअल रिलेशनशिप बनाती हैं. वे इसे जिहाद-अल-निकाह (सैसुअल होली वार) की संज्ञा देते हैं और प्रैग्नेंट हो कर घर लौट आती हैं.’

इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस संगठन के प्रति युवाओं में चाहे वे लड़कियां हों या लड़के, एक अजीब किस्म की दीवानगी है. पिछले 3 सालों में हिंदुस्तान से भी कई दर्जन युवक चोरीछिपे इस में हिस्सा लेने के लिए जा चुके हैं, जिन में से कइयों को एयरपोर्ट से वापस किया गया है तो कइयों के शहीद होने की खबरें ही लौट कर आई हैं.

जबकि यह संगठन अपने लड़ाकों से भी क्रूरता बरतने में पीछे नहीं रहता. अगर इसे अंदाजा हो गया कि कोई लड़ाका छोड़ कर भागने की फिराक में है तो यह संगठन बहुत नृशंसता से उस लड़ाके को बाकी तमाम लड़ाकों के सामने मौत के घाट उतार देता है, जिस से कि बाकी लड़ाके खौफ से भर जाएं और कभी वापस जाने का साहस न कर सकें.

यह संगठन लड़कियों के साथ तो और भी ज्यादा क्रूर है. यह संगठन लड़कियों को 7 से 9 साल की उम्र में भी शादी को मंजूरी देता है और 16 साल तक में हर हाल में शादी करने की हिदायत देता है. यह संगठन खुलेआम अपने लड़ाकों को सैक्स के लिए महिलाओं की मांग करता है और साफ चेतावनी देता है कि अगर उस की बात अनसुनी की गई तो खैर नहीं. यह हैरानी की ही बात है कि इस के बावजूद इस अमानवीय और बर्बर संगठन के प्रति लड़कियां और लड़के खिंचे चले आते हैं. सवाल है कि आखिर क्यों? उन में इस के लिए इतनी दीवानगी क्यों है?

ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो सिर्फ पत्रकारों को ही नहीं, पूरी दुनिया के समाजशास्त्रियों और सरकारों को भी परेशान कर रहे हैं. दि इंस्टीट्यूट फौर स्ट्रैटजिक डायलौग की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, सीरिया या इराक जाने वाले करीब 3 हजार यूरोपीय युवाओं में 5 सौ से ज्यादा युवतियां शामिल हैं. कुछ तो किशोर उम्र की और कुछ भले ही अपवाद के तौर पर हों, मगर 50 साल के पार की प्रौढ़ महिलाएं भी हैं.

‘बिकमिंग मुलान’ नामक इस रिपोर्ट के मुताबिक वास्तव में ये तमाम महिलाएं फिर चाहे वे जिस उम्र समूह से रिश्ता रखती हों, इस बात से प्रभावित होती हैं कि मुसलमानों के लिए नए इलाके का निर्माण हो रहा है. एक नई दुनिया, जहां किसी और के लिए कोई जगह नहीं होगी. यहां तक कि मुसलमानों में भी गैरसुन्नियों के लिए भी नहीं. इसीलिए तमाम सुखसुविधाओं में पलीबढ़ी पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका और इंग्लैंड की लड़कियां भी रोमांचित हो कर इस सपने वाले देश या भूखंड की तरफ कूच कर रही हैं. जाहिर है, वे उस सपने का हिस्सा होना चाहती हैं. यहां तक कि युद्ध के मोर्चे पर डट कर भी और लड़ाकों के लिए सेज में बिछ कर भी.

सवाल है, क्या ये युवा, खासकर लड़कियां दिमागी रूप से बीमार हैं? समाजशास्त्रियों की मानें तो हां, कुछकुछ ऐसा ही है. इन में से कई युवाओं का व्यक्तित्व कई हिस्सों में बंटा सा लगता है, विशेषकर युवतियों का. ऐसी कुछ महिलाओं, जिन के बारे में माना जाता है कि वे इस वक्त सीरिया या इराक में हैं, के ट्विटर या फेसबुक एकाउंट को देखने पर भी यह बात साफ प्रतीत होती है.  क्योंकि ये महिलाएं जहां एक पल को किसी फिल्म से संबंधित कोई बात कहती हैं या अपने पालतू कुत्ते के बच्चे के साथ अपनी वाल पर तसवीर लगाती हैं, वहीं दूसरे ही पल वे किसी सार्वजनिक जगह पर आईएस के लड़ाकों की किसी का सिर काटते या नृशंसता से पेश आने वाली तसवीरें पोस्ट कर रही होती हैं.

सवाल है, आखिर ये महिलाएं ऐसा क्यों कर रही हैं? बहुचर्चित हो रही बिकमिंग मुलान रिपोर्ट के मुताबिक वास्तव में ये महिलाएं भी वही चाहती हैं, जो इन दिनों आईएसआईएस की तरफ आकर्षित दुनिया भर के खासतौर पर पश्चिम के युवा मुसलिम चाहते हैं या कहें जिन बातों से मुसलिम युवक प्रेरित हैं, उन्हीं से महिलाएं भी प्रेरित हैं.

मुसलिम युवाओं की तरह ही ये मुसलिम महिलाएं भी आईएसआईएस की तरफ खलीफा के शासन की स्थापना, पश्चिम से नफरत, पहचान की तलाश जैसे वैचारिक कारणों से प्रेरित हैं. आईएस के आतंकियों के उन के कब्जे वाले इलाके में, ऐसे ही अफगानिस्तान या बाल्कन में सक्रिय कट्टरपंथियों से इसलिए भूमिका बिलकुल अलग है, क्योंकि आईएस के आतंकी यहां एक राष्ट्र का निर्माण करना चाह रहे हैं. इसलिए यहां स्थानीयता के साथ कोई टकराव नहीं है.

इसीलिए ये गतिविधियां आतंक के मनोविज्ञान से ऊपर उठ कर एक ‘राष्ट्र निर्माण’ की प्रक्रिया का हिस्सा हो जाती हैं. इसीलिए इस में भाग लेते हुए महिलाएं भी इतिहास रचने वालों में शामिल होना चाहती हैं. फिर चाहे भले ही लड़ाकों के लिए सैक्स परोस कर या उन के लिए घर की देखरेख कर के ही क्यों न ये संभव हो. सच तो यह है कि ज्यादातर महिलाएं अपनी भूमिका घर की देखरेख करने वाले के तौर पर ही देख रही हैं. इसीलिए ये महिलाएं जेहादियों को अपने पति के रूप में चुन रही हैं. कुछ महिलाओं के सोशल मीडिया एकाउंट के अनुसार, जिहादी लड़ाके से शादी करने पर उन्हें घर इत्यादि की सुविधाएं मिलती हैं यानी इस उन्माद में आर्थिक असुरक्षा भी एक कारण है.

इन महिलाओं की मंशा को उजागर करने वाली कई वेबसाइटों के मुताबिक सीरिया में होने का दावा करने वाले कुछ लोग ‘खलीफा के राज्य’ में शादी की संभावना से जुड़े सवालों का जवाब देते हैं. हालांकि इन में से कई शादियां ज्यादा समय तक नहीं चलतीं, क्योंकि उन के पति लड़ाई में मारे जाते हैं. ऐसे में ये महिलाएं ट्विटर पर अपने पतियों के शहीद हो जाने की घोषणा करती हैं. आईएस से तेजी से जुड़ रही ये महिलाएं एक मामले में पुरुषों से काफी हद तक अलग हैं. इन में से ज्यादातर ने इस्लाम में धर्मांतरण  किया है यानी ये जन्म से मुसलमान नहीं थीं. इसलिए ये इस्लाम से बहुत गहरे तक वाकिफ भी नहीं हैं. शायद यही इस सवाल का जवाब भी है कि कमउम्र की लड़कियां ऐसा माहौल क्यों स्वीकार करना चाहती हैं?

असली सवाल इन के इस्लाम की ओर झुकाव का है. आईएस की तरफ तीव्रता से आकर्षित हो रही ज्यादातर लड़कियों की उम्र 18 से 25 साल के बीच है. इस्लाम ग्रहण करने वाली इन ज्यादातर लड़कियों को इस्लाम धर्म के बारे में बिलकुल भी पता नहीं होता. वास्तव में उन्होंने इंटरनेट पर इस के बारे में सर्च किया होता है, जैसा आम लोग करते हैं. उन्होंने यूट्यूब पर ऐसे वीडियो देखे होते हैं, जिन में अतिशयोक्तिपूर्ण दावे किए गए होते हैं. धर्म के बारे में जानने के लिए उन के पास यही एक आधुनिक और आसान रास्ता होता है.

ऐसी लड़कियां न कभी मसजिद गई होती हैं, न किसी लाइब्रेरी. वे सौ प्रतिशत यूट्यूब, गूगल, सोशल मीडिया पर निर्भर होती हैं. इसीलिए ये इस्लाम की संवेदनशीलता से परिचित नहीं होतीं. ऐसे में ये अपना भी नुकसान करती हैं और इस्लाम को भी बदनाम करती हैं. एक किशोर लड़के की सोशल नेटवर्क पर एक तसवीर डाली गई है. वह अपने माथे पर इस्लामिक स्टेट का बैंड पहने है. चेहरे पर रौनक, मुखमुद्रा शांत और गहरी आस्था लिए हुए है. यह आईएसआईएस के एक लड़ाके अर्त्यूम के बेटे की तसवीर है. अर्त्यूम कजाकिस्तान का रहने वाला है.

आप सोच रहे होंगे कि किसी बच्चे की किसी सोशल नेटवर्क पर डाली गई तसवीर का हम इस तरह जिक्र क्यों कर रहे हैं? आखिर यह कौन सी अनोखी बात है? लेकिन अनोखी बात है, क्योंकि यह किसी साधारण किशोर की तसवीर नहीं, एक लड़ाके के बेटे की तसवीर है. यह तसवीर यह साबित करने के लिए डाली गई है कि आज से यह किशोर आईएसआईएस का हुआ. कहने का मतलब आईएसआईएस के लड़ाकों की फौज में एक और लड़ाके का इजाफा हुआ.

यह लड़का अभी बहुत छोटा है, लेकिन इस के मानसिक रूप से लड़ने और दुनिया इसे आईएसआईएस की निगाह से देखे, इस की ट्रेनिंग आज से ही शुरू हो जाएगी. आईएसआईएस के लड़ाकों में इसी तरह से नए लड़ाके नहीं आते, इस के और भी तरीके हैं, लेकिन आईएसआईएस के ज्यादातर लड़ाके अपने बच्चों को खासकर बेटों को आईएसआईएस के भविष्य के लड़ाकों के रूप में ही शुरू से देखते हैं.

आईएसआईएस के पास मौजूदा समय में हर महीने 70 हजार से ज्यादा तनख्वाह पाने वाले, 10 हजार से ज्यादा किसी तरह की खुद ही तनख्वाह न लेने वाले और 25 हजार से ज्यादा विरोधियों को हरा कर गुलाम बनाए गए लड़ाकों की फौज है. आईएसआईएस ने अपनी इतनी भारीभरकम फौज के सैक्स सुख के लिए और भविष्य के लड़ाकों को जन्म देने के लिए 10 हजार से ज्यादा जवान महिलाओं को अगवा कर रखा है, जिन में 13 साल से ले कर 49 साल तक की महिलाएं हैं. इन महिलाओं को सैक्स दासियों की तरह इस्तेमाल किया जाता है.

अलगअलग उम्र समूह की इन बंधक महिलाओं को अलगअलग कैंपों में रखा जाता है. इन के साथ लड़ाके लगातार बारीबारी से सैक्स करते हैं. एक निश्चित उम्र की महिलाओं के गर्भवती होने पर उन्हें दूसरे शिविर में पहुंचा दिया जाता है, ताकि वहां वे अपने पेट में पल रहे बच्चे को जन्म दे सकें. उस शिविर में उस महिला को बच्चे को जन्म देने तक रखा जाता है. जैसे ही महिला पेट में पल रहे बच्चे को जन्म दे देती है, उस के कुछ ही दिनों बाद उसे फिर से यौनदासियों वाली ड्यूटी के लिए उसी कैंप में भेज दिया जाता है.

इस तरह काफी बड़ी संख्या में लड़ाके यौन दासियों से हासिल होते हैं. आईएसआईएस के लड़ाके बड़े पैमाने पर सीरिया में दुष्कर्म के जरिए पैदा किए जाते हैं. आमतौर पर ये सीरिया और इराक से लूटी गई गुलाम औरतों से पैदा किए जाते हैं. लेकिन एक बड़ी संख्या में दुनिया के कई मुसलिम देशों से महिलाएं सीरिया पहुंच कर इन लड़ाकों के साथ सैक्स कर के बच्चा पैदा कर रही हैं. इन महिलाओं की नजर में यह जिहाद है. इसे वे सैक्स जिहाद का नाम देती हैं.

बहरहाल, आईएसआईएस दुनिया का ऐसा अकेला जिहादी संगठन है, जो धर्म के नाम पर दुष्कर्म करने को सही ठहरा रहा है. यह इसे एक तरह से काफिरों की सजा के तौर पर देखता है. लेकिन वह वहां मात खा जाता है, जिन महिलाओं के साथ सजा के तौर पर दुष्कर्म किया जाता है और फिर उन्हीं दुष्कर्मों से पैदा हुए बच्चों को इस्लाम के सब से असली और पवित्र लड़ाकों के रूप में देखा जाता है. कुछ भी हो, आईएसआईएस जिहादियों की भविष्य के जिहादियों की पौध तैयार करने का यह एक जांचापरखा रास्ता है. एक चेचेन लड़ाका मंसूर सिसानी अपने बेटे अस्खाब को बंदूक पकड़ाता है और बहुत कम उम्र में ही मिलिट्री ट्रेनिंग के लिए कैंप भेज देता है. इस बात से यही अंदाजा लगता है कि आईएसआईएस मुसलिमों को कितना लुभाता है.

दुनिया में ऐसे तमाम देश हैं, जहां आईएसआईएस के पक्ष में मुसलिम युवाओं का रुझान बहुत तेजी से बढ़ा है. लेकिन 9 ऐसे देश हैं, जहां आईएसआईएस सब से ज्यादा अपने लड़ाकों के लिए निर्भर है. ये देश हैं—पाकिस्तान, मिस्र, अल्जीरिया, इंडोनेशिया, इजरायल (गाजा), लेबनान, जौर्डन और सीरिया तथा इराक.

अलकायदा और आईएसआईएस दोनों ने कई बार खुल्लमखुल्ला घोषणा की है कि इजरायल, अमेरिका और भारत दुनिया के ये 3 देश उन के सब से बड़े दुश्मन हैं. हालांकि आईएसआईएस अभी तक भारत के विरुद्ध कोई बड़ा हमला करने में नाकाम रहा है, लेकिन पूरी दुनिया की खुफिया रिपोर्टें रहरह कर इस बात की पुष्टि कर रही है कि यह संगठन लगातार भारत के विरुद्ध किसी बड़े हमले की फिराक में है. हाल में इस का खुलासा इस की पत्रिका में छपे एक इंटरव्यू से भी हुआ है.

दुनिया का सब से खतरनाक आतंकी संगठन आईएसआईएस अपनी एक पत्रिका ‘दबिक’ भी निकालता है. इस पत्रिका के कुछ दिनों पहले के एक अंक में भारत पर हमले के मंसूबे को ले कर आईएसआईएस का एक बड़ा खुलासा हुआ था. पत्रिका में बांग्लादेश में आईएसआईएस की कमान संभालने वाले शाखा के मुखिया शेख अबू इब्राहिम अल हनीफ का इंटरव्यू प्रकाशित हुआ था, जिस में उस ने स्वीकार किया था कि आईएसआईएस की स्थानीय शाखा अपने मुखिया के निर्देश पर भारत पर दोतरफा हमले की योजना बना रहा है.

इसी मैग्जीन में छपे इस के बांग्लादेशी हैड के मुताबिक बंगाल और भारत में रहने वाले हिंदुओं ने हमेशा से मुसलमानों और इस्लाम के खिलाफ काम किया है, इसलिए आईएसआईएस के आतंकी भारत पर पाकिस्तान और बांग्लादेश, दोनों सीमाओं से हमले की योजना बना रहे हैं. बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार पर निशाना साधते हुए इस आतंकी सरगना ने कहा है कि यहां की सेक्युलर सरकार की वजह से ऊंचे पदों पर हिंदुओं का बोलबाला बढ़ रहा है, जोकि गलत है.

बांग्लादेश में रहने वाले हिंदू भारतीय खुफिया एजेंसी रौ की मदद करते हैं. वे मुसलिमों के खिलाफ सूचनाएं देते हैं. इसी पत्रिका में भारत पर गुरिल्ला वार की शुरुआत करने की कोशिश कर रहे शेख अबू इब्राहिम अल हनीफ ने कहा है कि बांग्लादेश की भौगोलिक स्थिति काफी अच्छी है, यहां जिहादी बेस बनने से भारत पर हमला करना आसान होगा. इस आतंकी के मुताबिक, बंगाल में तैयार किए जाने वाले जिहादी भारत पर दोतरफा गुरिल्ला वार छेड़ेंगे, इस काम में उन की मदद भारत में मौजूद मुजाहिदीन करेंगे. उस ने बर्मा (म्यांमार) में पहले ही जिहाद को मजबूत किया है.

अरसे से भारत किस तरह आईएसआईएस की निगाहों में गड़ा हुआ है, इस का खुलासा पिछले दिनों हैदराबाद में गिरफ्तार एक युवती के खुलासे से भी होता है. 17 साल की वह युवती सीरिया में आईएसआईएस से बच कर भारत लौटी थी. पूछताछ में लड़की ने बताया कि उसे टर्की में कई दिनों तक बंधक बना कर रखा गया था, जहां उसे साफ तो नहीं, पर बातों ही बातों में यह मालूम हुआ था कि आईएसआईएस भारत में किसी बड़े हमले की फिराक में है.

हालांकि किसी भी एजेंसी के पास इस संबंध में कोई और दस्तावेजी सूचना नहीं है, लेकिन पिछले 6 महीने के अंदर कश्मीर में 10 बार से ज्यादा आईएसआईएस के झंडे फहराए गए हैं और कम से कम 10 ऐसे लोग या तो गिरफ्तार हुए हैं या मुठभेड़ों में मारे गए हैं, जिन का संबंध इस खूंखार संगठन से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर रहा है.

यह कल्पना करना भी कितना भयानक है कि एक आदमी अपने एक हाथ में लहराता हुआ नंगा चाकू लिए है और दूसरे हाथ में आदमी के सिर के बाल हैं. इस के बाद वह उस आदमी की गरदन पर चाकू रखता है, जिस के सिर के बाल उस की मुट्ठी में हैं. इस के बाद वह कैमरे की तरफ देखता है, मानो जानना चाहता है कि सब कुछ ठीक तो है? जैसे ही सब कुछ ओके होने का सिगनल मिलता है, वह धीरेधीरे गला रेतना शुरू करता है, जैसे किसी बकरे को जिबह किया जा रहा हो. कुछ ही सैकेंड में खचाक के साथ उस निरीह व्यक्ति का सिर चाकू वाले खूंखार आतंकी के हाथ में आ जाता है और धड़ जमीन पर गिर जाता है.

क्या यह 20वीं या 21वीं सदी की कोई तसवीर हो सकती है? जी हां, यह 21वीं सदी के इसी भूमंडलीकरण के दौर की तसवीर है. हद तो यह है कि जिस समय यह कोई जल्लाद आतंकी किसी निरीह व्यक्ति की गरदन किसी चूजे की गरदन की तरह काट रहा होता है, उस समय फोन में, वीडियो काल के जरिए, गरदन कटने वाले व्यक्ति की मां, बच्चे या उस के घर के लोग गिड़गिड़ा रहे होते हैं, दया की भीख मांग रहे होते हैं. लेकिन बर्बर तरीके से गरदन काटने वाला खूंखार आतंकी जरा भी नहीं पसीजता, न ही उसे जिबह करते हुए देखने वाले दूसरे किसी आतंकी का खून खौलता है. इस के बजाय सब हंस रहे होते हैं, सब अपने मोबाइल से उन वीभत्स पलों की वीडियो बना रहे होते हैं.

क्या दुनिया में इस से ज्यादा कभी किसी ने बर्बरता देखी है? नहीं, कभी नहीं. भयानक बर्बर युग में भी इंसान की हत्या का इस तरह से लुत्फ लेने का चलन नहीं था. निश्चित रूप से यह भयानक नहीं महाभयानक है. जब भी आईएसआईएस की ऐसी क्रूर हरकतों के बारे में लोग सुनते हैं, पढ़ते हैं या टीवी में देखते हैं तो पहला सवाल दिमाग में यही उभरता है कि आखिरकार यह संगठन इस कदर बर्बर और खूंखार क्यों है? साथ ही यह भी कि आखिर यह अपनी इस बर्बरता को पूरी दुनिया के सामने इतने फूहड़ और वीभत्स तरीके से क्यों पेश करता है?

कुछ महीने पहले इस संगठन ने जब 2 निरीह पत्रकारों की इतने ही बर्बर तरीके से हत्या की थी तो इस बर्बर हत्या के कुछ ही घंटों बाद सोशल मीडिया में पूरी दुनिया से आईएसआईएस के कारनामे पर लोगों ने थूथू की थी. तब इस स्वयंभू संगठन ने अपनी क्रूरता को सही ठहराने के लिए कहा था, ‘हमारे साथ यही सब कुछ कई सालों तक इराक में होता रहा है. कभी सद्दाम हुसैन हमारे लड़ाकों को सार्वजनिक तौर पर बोटीबोटी कटवाते रहे हैं तो कभी अमेरिकी फौज हमारे लड़ाकों को नंगा कर के पैरों के बल पेड़ में बांध देती थी और भयानक शिकारी कुत्ते छोड़ देती थी. वे शिकारी कुत्ते हमारे लड़ाकों को कई घंटे तक इसी तरह नोचनोच कर खाते थे. हम लोग तो अभी भी उस सब के मुकाबले कुछ नहीं कर रहे.’

सीएनएन टेलीविजन चैनल की प्रोड्यूसर और द एंड औफ रेवोल्यूशन चेंजिंग वर्ल्ड ऐंड एज औफ लाइव टेलीविजन की लेखिका फ्रीडा घिटिस कहती हैं, ‘दरअसल, आईएसआईएस आतंकी संगठन अंदर से बहुत डरा हुआ और हताश संगठन है. इसे पता है कि इस के पास भविष्य में सपना देखने के लिए न कोई आधार है और न कोई हिम्मत. यह ऐसा संगठन है, जो हर पल आत्मघात की मुद्रा में रहता है, क्योंकि उसे मालूम है कि उस ने मानवता के विरुद्ध इतना कुछ किया है कि अब उसे किसी भी कीमत पर कभी भी बख्श दिए जाने का कोई रास्ता नहीं बचा है.’

यही वजह है कि आईएसआईएस क्रूरता को अपने ब्रांड की तरह स्थापित करना चाहता है. वह चाहता है कि भयानक से भयानक क्रूरता को भी आईएसआईएस से कोई बड़ा कर के न देख पाए. जब भी क्रूरता की बात हो, हमेशा आईएसआईएस का ही परचम बुलंद रहे. इसलिए इस तरह की क्रूरता उस की ब्रांड वैल्यू बन गई है. एक तरह से वह चाहे भी तो अब इसे छोड़ नहीं सकता, क्योंकि यह उस के गले में हड्डी बन कर रह गई है.

दरअसल, क्रूरता एक मनोवैज्ञानिक, रणनीतिक और वैचारिक कारक है. हर आतंकी संगठन अपनी ब्रांड वैल्यू अपनी क्रूरता के जरिए ही स्थापित करना चाहता है, क्योंकि पहली बात तो उसे अपनी ताकत दिखाने का कोई दूसरा जरिया पता नहीं होता. दूसरी बात यह कि उसे लगता है कि वह जितना क्रूर दिखेगा, उतना ही ज्यादा ताकतवर और उतना ही ज्यादा खूंखार साबित होगा. ऐसे संगठन इतिहास में अमर होने की आकांक्षा भी पाले रहते हैं और इतिहास में अमर होने की उन की इस आकांक्षा का रास्ता ऐसी ही क्रूरता के जरिए बनता है.

हर आतंकी संगठन चाहता है कि उस के विरोधी उस से जबरदस्त खौफ खाएं और खौफ दिलाने व दिखाने का उस के दिलोदिमाग में यही एक नक्शा, यही एक रास्ता होता है. लेकिन आतंकी संगठन भूल जाते हैं कि खौफ के मनोविज्ञान की भी एक सीमा होती है. सीमा से ज्यादा का खौफ, खौफ को ही खत्म कर देता है. आईएसआईएस ज्ञात इतिहास का सब से क्रूर संगठन है. इस के पहले कंबोडिया में खमेर रूज और जर्मनी में हिटलर की क्रूरता का उदाहरण दिया जाता था, लेकिन आईएसआईएस की क्रूरता के सामने तो ये बहुत सहृदय संगठन लगने लगे हैं.

सीरिया अभी एक दशक पहले तक अरब के नक्शे पर एक समृद्ध इतिहास वाला देश था. बड़ीबड़ी ऐतिहासिक इमारतें, सांस्कृतिक संग्रहालय, धरोहरें, पुस्तकालय, मंदिर, ऐतिहासिक मसजिदें, ये सब उस की पहचान थीं. लेकिन आज सीरिया ऐतिहासिक खंडहरों का देश है. दुनिया के 10 सब से समृद्ध सांस्कृतिक नगरों में से एक रहे सीरिया के पलमायरा शहर को इस संगठन ने एक भुतहे रेगिस्तान में बदल दिया है. चारों तरफ मौजूद बड़ीबड़ी इमारतों को इस ने कुछ इस तरह ढहा दिया है, जैसे शहर जैसी कोई चीज ही नहीं बची है.

पलमायरा एक ऐसा शहर था, जो 1800 साल पहले काफी कुछ उस जमाने के रोम जैसा था. लेकिन आईएसआईएस ने इस ऐतिहासिक शहर के तमाम शिल्प स्थापत्य को तहसनहस कर दिया है. तमाम ऐतिहासिक इमारतों को जमींदोज कर दिया है. पलमायरा म्यूजियम दुनिया के सब से समृद्ध म्यूजियम में से एक था. इस क्रूर संगठन ने 2 लाख से ज्यादा किताबों वाली उस दुर्लभ लाइब्रेरी को आग के हवाले कर दिया है, जिस में मध्यपूर्व के साहित्य, इतिहास और स्थापत्य के ग्रंथ थे. इतिहासकार नबी यूनुस कहते हैं, ‘इतना सांस्कृतिक ध्वंस तो पहले और दूसरे विश्वयुद्ध में बरबाद हुए इटली और जर्मनी का भी नहीं हुआ.’

दुनिया के इस सब से जालिम संगठन ने इराक और सीरिया की कमर इस कदर तोड़ दी है कि अगर कल को इस संगठन पर काबू पा लिया जाता है और फिर से दोनों देशों की सांस्कृतिक खुशहाली को लौटाने की कोशिश की जाती है तो इस में सदियां लगेंगी. आर्थिक नुकसान की तो कीमत ही भला क्या है? जब से यह संगठन इस बर्बर तरीके से हावी हुआ है, तब से ले कर अब तक मध्यपूर्व में 3 सौ खरब डालर से ज्यादा का आर्थिक नुकसान हुआ है. इसी की बर्बरता के चलते मध्यपूर्व की तेल संपदा पानी होने लगी है. पिछले 30 सालों में कच्चा तेल इस से ज्यादा सस्ता कभी नहीं रहा, जितना पिछले 2-3 सालों में रहा है. हर दिन 5 अरब गैलन से ज्यादा का कच्चा तेल इस दुर्दांत संगठन के आतताई बरबाद कर रहे हैं.

आने वाले दिनों में यह संगठन जिन और देशों की आर्थिक बरबादी का शिलालेख लिखने की कोशिश करता दिख रहा है, उस में लीबिया, जौर्डन, यमन, ट्यूनीशिया और गाजापट्टी भी शामिल हैं. इस आतताई संगठन ने पिछले 3 सालों में विश्व अर्थव्यवस्था को करीब 6 सौ खरब डौलर की चपत लगाई है. 1 अरब से ज्यादा रोजगार के अवसर नष्ट किए हैं और दुनिया को अपनी क्रूरता से कई कदम पीछे धकेल दिया है. Group ISIS

लेखक – वीना सुखीजा   

 

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