Contract Killing Story: कहा जाता है कि महेशचंद की पत्नी और तीनों बेटियों की हत्या आशा शर्मा ने कराई थी, लेकिन सबूतों के अभाव में 3 साल बाद वह जेल से छूट गई. आश्चर्य की बात यह है कि 7 साल बाद आशा शर्मा की उसी 16 अप्रैल को हत्या हो गई, जिस 16 अप्रैल को उस ने 4 लाशें बिछवाई थीं.
आशा शर्मा के कत्ल की कीमत एक लाख रुपए तय हुई थी. 20 हजार रुपए मदन को एडवांस दे दिए गए थे, बाकी काम हो जाने पर दिए जाने थे. एडवांस की रकम ले कर मदन जैसे ही अपनी दुकान पर पहुंचा, उस के मोबाइल की घंटी बज उठी. उस ने जेब से मोबाइल निकाल कर स्क्रीन पर नंबर देखा तो चौंका. फोन आशा शर्मा का था. वही आशा शर्मा, जिस के कत्ल की वह सुपारी ले कर आया था. पहले तो उस ने सोचा फोन रिसीव ही न करे, लेकिन वह जानता था कि जब तक फोन नहीं उठाएगा तब तक वह बारबार फोन करती रहेगी. आखिर मन मार कर उस ने फोन रिसीव कर के ‘हैलो’ कहा.
वह आगे कुछ बोलता, इस से पहले ही दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘हाय हैंडसम, ले आए मुझे मारने की सुपारी? तुम्हें शर्म नहीं आई, मेरी जान की कीमत 1 लाख रुपए लगाते हुए. एडवांस भी कुल 20 हजार. अरे 5-10 लाख लिए होते तो मुझे भी खुशी होती.’’
आशा शर्मा की बात सुन कर मदन घबरा गया. घबराने की बात थी भी. अभीअभी सौदा हुआ था और आशा को पता चल गया था. मदन के चेहरे पर घबराहट के चिह्न साफ नजर आ रहे थे, मुंह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे. उसे चुप देख कर दूसरी ओर से आशा ने ही कहा, ‘‘घबराओ मत, मैं किसी से नहीं कहूंगी. बस तुम एक घंटे के अंदरअंदर मेरे शास्त्रीनगर वाले घर पर आ जाओ. और हां, अगर तुम नहीं आए तो महेश और उस की बीवी मुन्नी के साथ थाने में खड़े नजर आओगे.’’
मदन की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या बोले. उसे चुप देख आशा गुर्राने जैसी आवाज में बोली, ‘‘मेरी आवाज सुन कर तेरी पैंट गीली हो गई क्या? घबरा मत, मैं घर पर अकेली हूं. जल्दी आना, मुझे ज्यादा इंतजार करने की आदत नहीं है.’’
अपनी बात कह कर आशा शर्मा ने झटके से फोन काट दिया. मदन की समझ में नहीं आ रहा था कि करे तो क्या करे. न तो वह आशा शर्मा से अंजान था और न आशा शर्मा उस से. दोनों एकदूसरे की नसनस को जानते थे. कुछ नहीं सूझा तो मदन दुकान को भूल कर अपने दोस्त बौबी के घर जा पहुंचा. उस ने बौबी को पूरी बात बता कर सलाह मांगी. बौबी भी आशा शर्मा से अंजान नहीं था. रायमशविरे के बाद तय हुआ कि दोनों दोस्त साथसाथ आशा के घर जाएंगे.
मदन और बौबी आशा के शास्त्रीनगर स्थित घर जा पहुंचे. उन्हें देखते ही आशा शर्मा के होठों पर विजयी मुसकान फैल गई. वह फिल्म शोले के गब्बर सिंह वाले स्टाइल में बोली, ‘‘आओ महारथी, आओ. कौन सा हथियार लाए हो मेरी जान लेने के लिए?’’
कुछ बोलने की हिम्मत नहीं थी, फिर भी मदन ने हिम्मत जुटा कर लड़खड़ाती आवाज में कहा, ‘‘आप को मारने की हिम्मत कौन कर सकता है? हवाई घोड़े दौड़ाना अलग बात है और किसी की जान लेना अलग बात.’’
‘‘जानती हूं, तुम्हें भी और मेरी जान की सुपारी देने वाली को भी.’’ आशा सोफे की ओर इशारा कर के बोली, ‘‘बैठ जाओ, फिर बात करेंगे. मुझे कोई जल्दी नहीं है, न मरने की न मारने की. और हां, डरो मत. मैं बिलकुल अकेली हूं. चाहो तो घर में घूम कर देख लो. चुहिया की जात तक नहीं है यहां.’’
मदन और बौबी बिना बोले सोफे पर बैठ गए. आशा ने दोनों के चेहरों को गौर से देखा फिर बोली, ‘‘मुन्नी ने मेरे कत्ल की कीमत सिर्फ 1 लाख लगाई है, यह मेरी बेइज्जती है, नाकाबिलेबर्दाश्त. मैं इस गेम को बदलना चाहती हूं. मैं तुम लोगों को 50 लाख रुपए दूंगी, लेकिन इस के बदले में तुम्हें मुन्नी और उस की तीनों बेटियों की हत्या करनी होगी. बोलो, क्या कहते हो?’’
मदन और बौबी दोनों ही समझ नहीं पा रहे थे कि वे क्या जवाब दें. उन्हें चुप देख कर आशा शर्मा ने ही कहा, ‘‘यही सोच रहे हो न कि मैं 50 लाख कहां से लाऊंगी? अरे बड़ा सीधा सा गणित है, मुन्नी और उन की बेटियों के मरते ही मैं महेश की पत्नी बन जाऊंगी, करोड़ों की मालकिन. उस के बाद 50 लाख या 1-2 करोड़ रुपए की कीमत क्या रह जाएगी मेरे लिए.’’
मदन और बौबी इस के बाद भी कुछ नहीं बोले तो आशा शर्मा ने एक और दांव खेला. वह अपने दोनों पांव सेंट्रल टेबल पर रखते हुए बोली, ‘‘काम हो जाने के बाद हमारा पैसे का लेनदेन तो खत्म हो जाएगा लेकिन मैं तुम्हारे लिए हाजिर रहूंगी.’’
सेंट्रल टेबल पर पैर रखने से आशा शर्मा की साड़ी घुटनों तक खिसक गई थी. उस के खुले दूधिया पैर इशारा समझने के लिए काफी थे. डरेसहमे मदन और बौबी की निगाहें उस के पैरों पर ही जमी थीं. आशा शर्मा ने कुछ इस अंदाज में बात की थी कि जरा सी देर में माहौल सामान्य हो गया. आशा ने मदन और बौबी के सामने ऐसा चारा डाला कि वे उस की बात मानने को तैयार हो गए. मोटी रकम और अपने जिस्म का लालच दे कर उस औरत ने पूरी बाजी ही पलट दी.
जब मदन और बौबी आशा के घर से निकले तो उन की नजरों के सामने निशाने के रूप में मुन्नी देवी और उस की तीनों बेटियों के चेहरे घूम रहे थे. उन्होंने सोच लिया था कि उन्हें क्या करना है. और इस के ठीक चौथे दिन मुन्नी और उस की तीनों बेटियों का कत्ल हो गया. उस दिन तारीख थी 16 अप्रैल, 2009. इस चौहरे हत्याकांड की तह तक जाने से पहले आप को बताते चलें कि इस घटना के 7 साल बाद 16 अप्रैल, 2016 को आशा शर्मा का भी कत्ल हो गया. कातिल था उस का अपना पति सुनील शर्मा. खास बात यह कि मृतका के पति सुनील ने ही अपने घर का पता बता कर पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी थी. वहां से इस की जानकारी थाना गांधी पार्क को दी गई थी.
अपने वरिष्ठ अधिकारियों को बता कर थानाप्रभारी संजय पांडेय अपनी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. सुनील शर्मा का घर गली नंबर 3, शास्त्रीनगर, नौरंगाबाद में था. चूंकि उस ने पुलिस कंट्रोल रूम को अपना पता बता दिया था, इसलिए पुलिस को उस के घर पहुंचने में कोई परेशानी नहीं हुई. वहां पहले ही तमाम लोग एकत्र हो गए थे. हत्या मकान के फर्स्ट फ्लोर पर हुई थी. पुलिस ऊपर पहुंची तो वहां एक कमरे में 40 साल की एक महिला की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. उस का हत्यारा सुनील शर्मा वहीं खड़ा था. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. लाश के पास ही 17 साल की एक लड़की और 12 साल का लड़का खड़ा रो रहा था. ये दोनों मृतका और सुनील के बच्चे थे.
पूछताछ में उन्होंने बताया कि मम्मी 3 साल जेल में रह कर आई थीं. जब से वह जेल से लौटी थीं, तभी से पापा उन के साथ कलह करते थे. दोनों की छोटीछोटी बातों पर लड़ाई होती थी. आज मम्मी को अकेला पा कर उन्होंने उन की हत्या कर दी. इस बीच खबर पा कर एसपी (सिटी) अंशुल गुप्ता और सीओ (द्वितीय) सोमदत्त भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. लोहे की जिस रौड से सुनील ने आशा के सिर पर वार किए थे, वह वहीं पड़ी थी. पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले लिया था.
पुलिस ने प्राथमिक काररवाई के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी और वहां मौजूद लोगों से पूछताछ की. गिरफ्तार किए गए सुनील शर्मा को थाने भेज दिया गया. उसी दिन मृतका की 17 वर्षीया बेटी प्रियंका की ओर से पिता के खिलाफ मां की हत्या का मुकदमा दर्ज कराया गया. अगले दिन सुनील को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. पोस्टमार्टम के बाद आशा की लाश उस के घर वालों को सौंप दी गई. उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया. इस मामले की जांच की जिम्मेदारी खुद थानाप्रभारी संजय पांडेय ने ली.
आशा और सुनील शर्मा की शादी सन 1998 में हुई थी. आशा जितनी खूबसूरत थी उतनी ही शोख और चंचल भी. सुनील जितना कमाता था, उस से गुजरबसर तो हो जाता था, लेकिन आशा के फैशन और शौक शृंगार के लिए पैसे नहीं बचते थे. कालांतर में जब घर में एक बेटी और बेटा आ गए तो घर का खर्चा बढ़ गया. पति को समझानेबुझाने के बाद आशा ने खुद घर से बाहर निकलने का फैसला किया, ताकि परिवार के बढ़े खर्चों को साधने के लिए कोई काम ढूंढ़ सके.
नौकरी के लिए इधरउधर धक्के खाने के बजाय आशा ने एलआईसी एजेंट बनने का फैसला किया. इस की 2 वजहें थीं. एक तो वह अपनी खूबसूरती के बूते पर लोगों को प्रभावित कर के उन्हें एलआईसी की पालिसियां बेच सकती थी, दूसरे चूंकि यह फुलटाइम जौब नहीं था, इसलिए अपने बच्चों के लिए भी समय निकाल सकती थी. अपनी इसी सोच के चलते वह एलआईसी एजेंट बन गई. बहरहाल अपने रूपयौवन और अदाओं के बूते पर उस ने काफी लोगों को एलआईसी की पालिसियां बेचीं, जिस की वजह से उसे अच्छा कमीशन मिलने लगा.
जून, 2007 में आशा की मुलाकात अलीगढ़ के थाना गांधी पार्क के मोहल्ला गांधीनगर निवासी एक्सपोर्टर महेशचंद से हुई. उन से वह एलआईसी की पालिसी के चक्कर में मिली थी. आशा खूबसूरत भी थी और जवान भी. ऊपर से उस की कातिल अदाएं. महेशचंद पहली ही मुलाकात में उस के दीवाने हो गए.
मर्दों की नजरों को बखूबी पहचानने वाली आशा ने जल्दी ही उन्हें शीशे में उतार लिया. महेशचंद उस के प्रति थोड़े उदार दिखाई दिए तो आशा ने उन्हें मोटी रकम की पालिसी कराने के लिए राजी कर लिया. इस के लिए महेशचंद ने उसे अगले दिन नौरंगाबाद स्थित अपनी फैक्ट्री में बुलाया. उन्होंने आशा से कहा, ‘‘फार्म भर लाना, मैं साइन कर के चैक दे दूंगा. और हां, लंच हमारे साथ ही करना.’’
जातेजाते आशा ने अनौपचारिक होते हुए अपनी तरफ से पहल की, ‘‘सिर्फ लंच, हम ने तो सोचा था कि आप डिनर भी कराएंगे.’’
‘‘माफ करें आशाजी, यह हमारी गलती है.’’ महेशचंद हंसते हुए बोले, ‘‘भला ऐसा कौन होगा जो आप के साथ डिनर नहीं करना चाहेगा. हम तो चाहते हैं, आप हमारे साथ हर रोज डिनर करें.’’
आशा हंसते हुए जाने लगी तो महेशचंद ने पूछा, ‘‘तो डिनर का न्यौता मंजूर है?’’
‘‘बिलकुल मंजूर है.’’ आशा बोली, ‘‘आप बुलाएं और हम न आएं, ऐसे तो हालात नहीं हैं.’’
आशा चली गई. महेशचंद सोच रहे थे कि उन्होंने चिडि़या को फंसाने के लिए जो दाना डाला, वह उस ने चुग लिया है. उधर आशा सोच रही थी कि यहां तो मुर्गा खुद ही अपनी गर्दन पर छुरी चलवाने के लिए तैयार हो गया है.
लंच भी हुआ, डिनर भी और पालिसी भी हो गई. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई. महेशचंद ने उसे घर बुला कर अपनी पत्नी और बच्चों से न केवल मिलवाया, बल्कि उन की भी पालिसियां करवा दीं. इस के बाद आशा शर्मा का उन के परिवार में आनाजाना हो गया. महेशचंद के बच्चे उसे आंटी कहते थे. आशा भी उन्हें खूब लाड़ लड़ाती थी. धीरेधीरे वह उन के परिवार की सदस्य जैसी बन गई. इस बीच महेशचंद और आशा के अवैध संबंध बन गए थे.
हार्डवेयर कारोबारी महेशचंद का एक्सपोर्ट का भी काम था. उन के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी. वह आशा को ले कर होटलों में जाने लगे. वहां एंट्री रजिस्टर में वह आशा को पत्नी लिखते थे. इतना ही नहीं, उन्होंने आशा के लिए थाना क्वारसी के नंगला तिकोना की संगम विहार कालोनी में एक शानदार मकान भी खरीद दिया था. इस मकान में सारी सुखसुविधाएं मौजूद थीं. इस के बाद महेशचंद का ज्यादातर समय पत्नी और परिवार की जगह आशा के साथ गुजरने लगा. महेशचंद की सीधीसादी पत्नी को अपने पति और आशा के संबंधों पर तब शक हुआ, जब आशा महेशचंद के बेटे गौरव की शादी में अपनी मनमरजी चलाने लगी और महेशचंद उस की हां में हां मिलाते रहे.
कोठी की रंगाईपुताई किस रंग की हो, कपड़ेजेवर कैसे खरीदे जाएं, रिसैप्शन के मेन्यू में क्याक्या खास चीजें जरूरी हैं, सब जगह आशा की चल रही थी. हद तो तब हो गई, जब शादी वाले दिन रस्मोरिवाज में मां की जगह आशा ने पूरे रौब के साथ दखलअंदाजी की. मुन्नी देवी का शक तब विश्वास में बदल गया, जब शादी में आए फोटोग्राफर एवं वीडियोग्राफर मदन ने मुन्नी देवी के सामने एक अलग ही हकीकत बयान की. उस ने बताया कि महेशचंद ने आशा को संगम विहार में एक मकान खरीद कर दे रखा है, जहां दोनों अकसर साथसाथ रहते हैं.
मुन्नी के अनुरोध पर मदन ने वह मकान दिखा भी दिया. मुन्नी ने पासपड़ोस के लोगों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि वहां एक पतिपत्नी रहते हैं, पति कहीं बिजनैस करता है, जबकि पत्नी बनीठनी घूमती है. मुन्नी ने उन लोगों को महेशचंद और आशा के फोटो दिखाए तो उन्होंने इस बात की तसदीक कर दी कि उस मकान में वह दोनों रहते हैं.
फोटोग्राफर मदन भी रसिया स्वभाव का था. पहले आशा शर्मा उस के पास आती रहती थी, लेकिन जब से वह महेशचंद के संपर्क में आई थी, तब से उस ने मदन को भाव देना बंद कर दिया था. मदन ने उस पर धौंस जमाने की कोशिश की तो आशा ने उसे सीधेसीधे धमकी दे दी. इसी बात को ले कर महेश उस से खार खाता था. यही कारण था, जिस की वजह से उस ने मुन्नी के सामने महेशचंद और आशा शर्मा की हकीकत का भंडाफोड़ किया था.
बाद में मदन ने ही मुन्नी देवी को आशा शर्मा को अपने रास्ते से हटाने का सुझाव दिया था. इस के लिए उस ने एक लाख का खर्चा बताया. मुन्नी तैयार हो गई तो उस ने 20 हजार रुपए एडवांस भी ले लिए. मुन्नी को यह पता नहीं था कि आशा ने उस के घर में भी अपने जासूस लगा रखे हैं. जब मुन्नी और मदन के बीच आशा की हत्या की सौदेबाजी हो रही थी, तभी पड़ोस में ही रहने वाली मुन्नी की देवरानी मधु ने दोनों की बातें सुन ली थीं. उसी ने फोन कर के यह बात आशा शर्मा को बता दी थी. आशा और मधु के संबंध गौरव की शादी में गहराए थे. बाद में वह महेशचंद के घर का हर राज आशा शर्मा को बताने लगी थी.
आशा शर्मा को मुन्नी देवी और मदन के षडयंत्र का पता चला तो उस ने फोन कर के मदन को अपने शास्त्रीनगर वाले घर पर बुलाया. मदन को आशा शर्मा की धमकी याद थी. वैसे भी वह खतरनाक औरत थी. ऊपर से उस के पीछे की शह थी. मदन की उस के पास जाने की हिम्मत न हुई तो वह अपने दोस्त बौबी को साथ ले कर उस के पास पहुंचा. वे दोनों आशा के पास पहुंचे तो आशा ने अपने रूपयौवन के बूते पर पल भर में पूरी बाजी पलट दी.
16 अप्रैल, 2009 को एक्सपोर्टर महेशचंद शर्मा की गांधीनगर स्थित कोठी में मुन्नी देवी और उन की 3 बेटियों की हत्या कर दी गई. तीनों अविवाहित बेटियों में पूनम 22 साल की थी, ममता 20 साल की और कीर्ति 17 साल की. जब ये हत्याएं हुईं, तब महेशचंद और उन का बेटा गौरव इंगलैंड गए हुए थे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पूनम और कीर्ति के साथ बलात्कार की भी पुष्टि हुई, जांच में हत्याओं का कारण लूटपाट बताया गया.
थाना गांधीनगर में यह मामला भादंवि की धारा 394, 302, 120बी और 376 के तहत दर्ज हुआ. इस संबंध में पुलिस ने महेशचंद को संदेह के दायरे में रखते हुए इस केस की मास्टरमाइंड आशा शर्मा के अलावा मदन, बौबी, मुन्नी देवी की देवरानी मधु, मनोज और अजीत को गिरफ्तार किया. लेकिन बाद में पुलिस ने महेशचंद को क्लीन चिट दे दी. इस मामले में 3 सालों तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी. बताया जाता है कि क्लीनचिट मिलने के बाद महेशचंद प्रेयसी आशा को छुड़ाने की कोशिश में लग गए.
इस मामले का फैसला आया 21 सितंबर, 2012 को. चूंकि एक ही परिवार के 4 लोगों की नृशंस हत्या हुई थी, इसलिए लोगों को उम्मीद थी कि इस मामले में कम से कम आशा शर्मा को सजाएमौत जरूर मिलेगी. चूंकि यह चर्चित मामला था, इसलिए उस दिन अलीगढ़ कोर्ट में तमाम लोग मौजूद थे. मीडियाकर्मी भी आए हुए थे. एडीजे (तृतीय) इंद्रप्रीत सिंह जोश ने अपने फैसले में मदन, मधु, बौबी, मनोज और अजीत को आजीवन कारावास की सजा सुनाई. जबकि सबूतों के अभाव में आशा शर्मा को बरी कर दिया गया. न्यायाधीश महोदय ने जांच अधिकारी नवाब सिंह की जांच पर भी सवाल उठाए.
बहरहाल, आशा शर्मा का न्याय खुद ब खुद हो गया. 7 सालों बाद उसी 16 अप्रैल को उस के ही पति ने उस की हत्या कर दी. थाना गांधी पार्क में उस की बेटी प्रियंका ने अपने पिता सुनील कुमार शर्मा पर मां की हत्या का आरोप लगाते हुए केस दर्ज कराया. सुनील ने चूंकि खुद ही पुलिस को सूचना दी थी, सो गिरफ्तारी के बाद उस ने अपना जुर्म कबूलने में भी देरी नहीं लगाई. पुलिस ने उसे अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. आश्चर्य की बात यह थी कि जिस तरह मुन्नी देवी और उस की बेटियों की हत्याएं की गईं थीं, वैसे ही आशा शर्मा की हत्या भी हुई. वैसी ही जघन्यता के साथ.
लेखक -कुंवर शैलेश बिट्टन
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित






