Queen of Tigers: 19 साल की हो चुकी बाघिन मछली उम्र के अंतिम पड़ाव पर भले ही जीवन के लिए संघर्ष कर रही हो, लेकिन जवानी के दिनों में उस की दहाड़ से न केवल रणथंभौर अभयारण्य थर्राता था, बल्कि बड़ेबड़े विशालकाय जीव भी भाग खड़े होते थे.

उस का नाम मछली जरूर है, लेकिन वह किसी नदी या समुद्र में तैरने वाली मछली नहीं, बल्कि बाघिन है. उस के बाएं गाल पर मछली जैसा निशान होने की वजह से वन अधिकारियों ने उसे मछली नाम दिया था. करीब 19 साल की मछली राजस्थान के रणथंभौर बाघ अभयारण्य में रहती है. माना जाता है कि बाघबाघिनों के वंश में वह भारत ही नहीं, दुनिया भर की सब से ज्यादा उम्र वाली बाघिन है. मछली को लाइफटाइम अवार्ड सहित दुनिया के कई नामी पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है.

मछली रणथंभौर की रौयल बाघिन है. उसे बाघों की रानी भी कहा जाता है. वह लेडी औफ द लेक्स और मगरमच्छों की शिकारी के रूप में भी मशहूर रही है. मछली अब जीवन के आखिरी पड़ाव पर है. जवानी के दिनों में रणथंभौर अभयारण्य में मछली के अपने जलवे थे. रणथंभौर में सब से ज्यादा पर्यटक मछली को ही देखने के लिए आते थे. रणथंभौर की आर्थिक समृद्धि और राजस्थान में वन्यजीव पयर्टन बढ़ाने में मछली का सब से बड़ा योगदान रहा है. यह भी माना जाता है कि राजस्थान ही नहीं, बल्कि गुजरात और मध्य प्रदेश के अभयारण्य भी मछली के वंशजों से आबाद हैं.

मौजूदा समय में मछली की 4 पीढि़यां आसपास के अभयारण्यों में राज कर रही हैं. मछली अब दादी, पड़दादी, सगड़दादी, नानी, पड़नानी और सगड़नानी तक बन चुकी है. रणथंभौर की रानी मछली की कहानी बरसों पुरानी है. उस का जन्म सन 1997 की जुलाई में मानसून के दौरान हुआ था. रणथंभौर के वन कर्मचारियों को उसी वर्ष अक्तूबर के महीने में वह अपनी मां और 2 अन्य शावकों के साथ पहली बार जंगल में विचरण करती दिखाई दी थी. जब वह किशोर अवस्था से जवानी की दहलीज की ओर बढ़ने लगी तो पदचिन्हों के आधार पर पता चला कि वह बाघ वंश की मादा है. उस की मां के साथ जो 2 अन्य शावक थे, वे भी मादा थीं. यानी ये तीनों बहनें थीं.

वनकर्मियों ने उस के बाएं गाल पर मछली जैसा निशान देख कर उस का नाम मछली रख दिया था. उस की मां के माथे पर भी मछली जैसा ही निशान था. उस समय तक अभयारण्यों में बाघबाघिनों के नाम उन की आदत, ताकत, किसी खास निशान या अन्य विशेषताओं के आधार पर रखे जाते थे. बाद में सुरक्षा की दृष्टि से बाघबाघिनों का नामकरण बंद हो गया और उन्हें अंकों के आधार पर टी-1, टी-2, टी-3 आदि कोड नाम दे दिए गए, ताकि उन की पहचान छिपी रहे. अंकों के आधार पर मछली का कोड टी-16 रखा गया. जन्म के करीब डेढ़दो साल बाद मछली अपनी मां की बिना किसी मदद के शिकार करने लगी. सन 1999 में वह अपनी मां से अलग हो गई. मां ने मछली को जंगल का एक हिस्सा सौंप दिया, जिसे मछली ने अपनी टेरिटरी बना लिया.

मछली ने जो टेरिटरी बनाई, वह रणथंभौर अभयारण्य के सब से प्रमुख स्थानों में है. दसवीं शताब्दी में बने ऐतिहासिक रणथंभौर दुर्ग के चारों ओर फैली वनों की हरियाली में विचरण करने वाले वन्यजीवों के लिए कई तालाब और झीलें हैं. मछली अपने यौवन काल में सब से खूबसूरत और ताकतवर बाघिन मानी जाती थी. अपनी ताकत के बल पर उस ने रणथंभौर अभयारण्य में पदम तालाब, मलिक तालाब, तांबाखान, राजबाग हंटिंग पैलेस सहित किले के आसपास के इलाके को अपनी टेरिटरी बना लिया था. झालरा इलाके में भी उस की हुकूमत थी. अपनी टेरिटरी में मछली का ऐसा रुतबा था कि कोई बाघ या बाघिन उधर पैर रखने की हिम्मत नहीं कर सकता था.

मछली अपने जीवन में कम से कम 4 बार गर्भवती हुई. इस दौरान उस ने करीब 9 शावकों को जन्म दिया. कुछ दस्तावेजों में मछली के 5 बार गर्भवती होने और 11 शावकों को जन्म देने का भी जिक्र है, लेकिन सब से ज्यादा पुष्टि 4 बार में 9 शावकों की पैदाइश की है. मछली के संबंध मुख्य रूप से 2-3 नर बाघों से रहे. इन में रणथंभौर का एक शक्तिशाली विशालकाय नर बाघ बंबूराम था. माना जाता है कि बंबूराम से संपर्क से मछली 2 बार गर्भवती हुई. बंबूराम की मौत के बाद मछली के संबंध दूसरे नर बाघ से बने, लेकिन उस के दूसरे पार्टनर बाघों का ज्यादा खुलासा नहीं हो सका. सब से पहले बंबूराम के साथ संबंध से गर्भवती हुई मछली ने सन 2000 में 2 शावकों को जन्म दिया.

ये दोनों नर थे. इन में एक का नाम रखा गया तिरछा कान (स्लंट ईयर). चूंकि उस का एक कान तिरछा था, इसीलिए उसे यह नाम दिया गया था. दूसरे शावक की पूंछ टूटी हुई नजर आने से उस का नाम टूटी पूंछ (ब्रोकन टेल) रखा गया. दिसंबर, 2001 के अंत तक मछली के दोनों शावक जब जवान होने लगे तो उस ने उन्हें अलग कर दिया. दोनों अपनी अलग टेरिटरी बनाने में लग गए, लेकिन अज्ञात कारणों से तिरछे कान वाला बाघ फिर कभी दिखाई नहीं दिया. माना गया कि वह जीवित नहीं रहा. वहीं टूटी पूंछ वाले बाघ की अगस्त, 2003 में रणथंभौर अभयारण्य से लगभग सौ किलोमीटर दूर रेलवे ट्रैक पार करते हुए एक यात्री ट्रेन से टकरा जाने से मौत हो गई.

कहा जाता है कि टूटी पूंछ वाले इस बाघ ने रणथंभौर अभयारण्य छोड़ दिया था और वह अपनी टेरिटरी बनाने के लिए कोटा जिले के दर्रा अभयारण्य की ओर निकल गया था. तभी यह हादसा हुआ था. टूटी पूंछ वाले इस बाघ की मौत के बाद उस के जीवन पर एक फिल्म भी बनाई गई. यह फिल्म बीबीसी सहित कई चैनलों पर दिखाई गई. इस फिल्म ने दुनिया का प्रतिष्ठित वाइल्ड लाइफ फिल्म फेस्टिवल अवार्ड जीता था. दूसरी बार बंबूराम के साथ बने संबंध से सन 2002 के अप्रैलमई महीने में मछली के गर्भ से 2 शावक पैदा हुए. इन में एक नर और एक मादा थी. मादा शावक का नाम रखा गया झुमरी और नर शावक का झुमरू. माना जाता है कि इस के बाद बंबूराम की मौत हो गई.

इस बीच झुमरी और झुमरू जवान होने लगे थे और अपनी मां से अलग हो कर अपनी टेरिटरी बनाने में लगे हुए थे. झुमरू ने लाहपुर में अपी टेरिटरी बनाई. लाहपुर की टेरिटरी एक नर बाघ की मौत से खाली हुई थी. वहीं मां से अलग होने के बाद झुमरी के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिल सकी. मछली अभी जवान थी. बंबूराम की मौत से उस के जीवन में खालीपन आ गया था, लेकिन जल्दी ही वह रणथंभौर के एक अन्य नर बाघ के संपर्क में आ गई. हालांकि इस नर बाघ की पहचान के बारे में कभी ज्यादा खुलासा नहीं हुआ, लेकिन कहा जाता है कि बंबूराम की मौत के बाद कटे कान वाले एक विशालकाय नर बाघ ने बंबूराम की टेरिटरी पर कब्जा कर लिया था.

कटे कान वाले इसी नर बाघ से बने संबंधों के बाद तीसरी बार गर्भवती हुई मछली ने सन 2004 के अप्रैल महीने में फिर 2 शावकों को जन्म दिया. इन में एक नर था और एक मादा. वन अधिकारियों ने प्यार से इन के नाम बंटी और बबली रखे. यह वह समय था, जब बौलीवुड फिल्म ‘बंटी और बबली’ चर्चाओं में थी. इस फिल्म के मुख्य किरदारों के नाम पर ही इन के नाम बंटीबबली रखे गए. वन विभाग के अधिकारी मानते थे कि 3 बार में 6 शावकों को जन्म देने के बाद मछली की प्रजनन क्षमता कम हो गई होगी, लेकिन ऐसा नहीं था. वन अधिकारियों की इस धारणा को गलत साबित कर के मछली चौथी बार गर्भवती हुई.

माना जाता है कि इस बार मछली के संपर्क किसी तीसरे नर बाघ से रहे, क्योंकि कटे कान वाला नर बाघ अकाल मौत का शिकार हो गया था. मछली ने चौथी बार में 3 शावकों को जन्म दिया. ये तीनों ही मादा थीं. इन के नाम रखे गए टी-17, टी-18 और टी-19, इन में टी-17 का निक नेम था सुंदरी और टी-19 का कृष्णा. इस तरह मछली ने 5 मादा और 4 नर शावकों को जन्म दिया. कहा यह भी जाता है कि मछली ने सन 2005 में भी 2 शावकों को जन्म दिया था. ये दोनों मादा थीं. कुछ दस्तावेजों में इस का उल्लेख भी मिलता है. अगर इन 2 शावकों को जोड़ा जाए तो मछली ने 5 बार में 11 शावक पैदा किए.

वन अधिकारी मानते हैं कि रणथंभौर में बाघों की वंश वृद्धि में मछली की सब से अहम भूमिका रही है. राजस्थान और आसपास के इलाकों में 60 फीसदी बाघबाघिन मछली के ही वंशज माने जाते हैं, उन की नसों में किसी न किसी रूप में मछली का ही रक्त दौड़ रहा है. मछली ने जन्म के बाद हर बार अपने शावकों की सुरक्षा मे कोई कमी नहीं छोड़ी. वह नर बाघ और दूसरे खूंखार जंगली जानवरों से अपने बच्चों को बचाने के लिए उन से भिड़ जाती थी. मछली अपनी जवानी के दिनों में बहुत दबंग थी. उस की दहाड़ सुन कर नर बाघ तक दुम दबा कर भाग जाते थे.

अपनी ताकत और शिकार कौशल के लिए भी मछली की अलग पहचान रही. रणथंभौर बाघ अभयारण्य में पानी के स्रोत के रूप में कई प्रमुख तालाब हैं. इन में राजबाग तालाब, पदम तालाब, मलिक तालाब आदि शामिल हैं. अभयारण्य में कई झीलें भी हैं. इन तालाबों और झीलों में बड़ी संख्या में मगरमच्छ हैं. मछली ने अपनी जवानी में कई मगरमच्छों का शिकार किया. सन 2007 में मछली अपने चौथे प्रसव के कुछ महीने बाद तीनों नन्हे शावकों को महफूज रखने के लिए राजबाग हंटिंग पैलेस ले जा रही थी. इस हंटिंग पैलेस तक पहुंचने का रास्ता तालाब से हो कर जाता है.

इस तालाब में मगरमच्छों का राज है. तालाब पार करते वक्त एक विशालकाय मगरमच्छ ने मछली के एक शावक को दबोच लिया. मगरमच्छ की इस हरकत से मछली गुस्से में भर गई. वह उस से भिड़ गई. कई घंटे चली मुठभेड़ में मछली ने उस 14 फुट लंबे मगरमच्छ को मार गिराया. मगरमच्छ को मार कर मछली ने अपना शावक तो बचा लिया, लेकिन उस ने अपने 2 कैनाइन दांतों को खो दिया. बाघबाघिनों की ताकत उन के आगे के 4 लंबे व नुकीले कैनाइन दांत ही होते हैं. इन्हीं दांतों से ये अपने शिकार की चीरफाड़ करते हैं. मछली के 2 कैनाइन दांत उस मगरमच्छ से मुठभेड़ में टूट गए.

राजस्थान के प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं हैड औफ फौरेस्ट फोर्स रहे भारतीय वन सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी आर.एन. मेहरोत्रा बताते हैं कि आमतौर पर जंगलों में बाघबाघिन की सामान्य उम्र 12 से 14 साल होती है. यह गौरव की बात है कि रणथंभौर की बाघिन मछली लगभग 19 साल की उम्र में भी खुद को जीवित रखने के लिए संघर्षरत है. मेहरोत्रा को वन एवं वन्यजीव प्रबंधन का 39 साल का अनुभव है. वह 2005 से 2010 तक राजस्थान के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक रहे हैं. इस के बाद वह दिसंबर, 2011 तक राजस्थान में वन विभाग के सब से बड़े पद प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं हैड औफ फौरेस्ट फोर्स रहे. वह राज्य सरकार की ओर से गठित वन एवं वन्यजीव प्रबंधन की राज्य एंपावर्ड कमेटी के सचिव भी रहे.

राजस्थान से सेवानिवृत्त होने के बाद मेहरोत्रा अब दिल्ली में रहते हैं. वह केंद्र सरकार और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट औफ इंडिया, देहरादून के विशेष सलाहकार मंडल में शामिल हैं. मेहरोत्रा आजकल भारत सहित विदेशों में मुख्यरूप से अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के साथ सलाहकार के रूप में काम कर रहे हैं. मेहरोत्रा ने राजस्थान में 39 साल की भारतीय वन सेवा की नौकरी के दौरान छोटे से ले कर सब से बड़े पद पर रहते हुए वनों और वन्यजीवों को बहुत नजदीक से देखा है. सैकड़ों बार भ्रमण के कारण वह रणथंभौर एव सरिस्का अभयारण्यों में एकएक बाघबाघिन को पहचानते हैं. रणथंभौर अभयारण्य की मछली उन की प्रिय बाघिन रही है.

मेहरोत्रा बताते हैं कि रणथंभौर की समृद्धि में मछली का बहुत बड़ा योगदान रहा है. राजस्थान के प्राकृतिक सौंदर्य, वनों एवं वन्यजीवों के अलावा परिंदों को देखने आने वाले देसीविदेशी पर्यटक मछली को देख कर एक खास तरह का रोमांच मायूस करते हैं. रणथंभौर अभयारण्य आने वाले वन्यजीव प्रेमियों और सैलानियों की सब से पहली इच्छा मछली को देखने की होती थी. अपने अनुभवों के आधार पर मेहरोत्रा बताते हैं कि शावकों का सब से बड़ा दुश्मन उस को जन्म देने वाला पिता ही होता है. उस पिता को डर रहता है कि जवान होते ही शावक उस की टेरिटरी (क्षेत्राधिकार) में अपना आधिपत्य जमा लेगा.

कोई भी नर बाघ अपनी टेरिटरी में दूसरे बाघ का दखल बर्दाश्त नहीं करता. इसीलिए वह अपने ही शावकों को मारने की फिराक में रहता है, लेकिन अपनी कोख से जन्म देने वाली मां उन शावकों को पिता की बुरी नजरों से बचाती है. बाघिन अपने शावकों को करीब डेढ़ साल तक साथ रखती है. इस दौरान वह उन शावकों को जीवन जीने और शिकार करने के तरीकों के साथसाथ संघर्ष करने के गुर भी सिखाती है. मेहरोत्रा बताते हैं कि जंगल का अपना नियम है. जंगलों में रोजाना अपने आधिपत्य और क्षेत्राधिकार के लिए संघर्ष होता है. इस संघर्ष में वही जीतता है, जो ताकतवर होता है.

मछली के सम्मान में भारत सरकार ने पोस्टल कवर एवं डाक टिकट जारी किए थे. मछली का फेसबुक पेज भी है. उस के फालोअर्स की तादाद लाखों में है. मछली पर दुनिया के कई नामी वन्यजीव लेखकों ने पचासों किताबें लिखी हैं. उस पर हजारों लेख लिखे जा चुके हैं. दुनियाभर के मशहूर फोटोग्राफरों ने मछली के लाखों फोटो खींचे हैं. वह दुनियाभर में एकलौती ऐसी बाघिन है, जिस की सब से ज्यादा फोटोग्राफी हुई है. उस के जीवन पर टाइगर क्वीन शीर्षक से 50 मिनट की कहानी नेशनल ज्योग्राफिक एंड एनिमल प्लेनेट पर दिखाई गई थी. बीबीसी के नेचुरल वर्ल्ड कार्यक्रम में भी क्वीन औफ टाइगर शीर्षक से मछली की कहानी प्रसारित हुई थी.

इंग्लैंड की टै्रवल इंडस्ट्री के प्रमुख संगठन टै्रवल औपरेटर्स फौर टाइगर्स (टीओएफटी) ने मछली को लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड से नवाजा था. मशहूर वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर आदित्य डिकी सिंह ने एक जवान विशालकाय नर बाघ से मछली की भिड़ंत की कई फोटो खींची थीं. एक लेख में अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने लिखा है कि 1 अप्रैल, 2009 को मछली की एक नर बाघ से भिड़ंत की 20 मीटर दूर से खींची गई तस्वीरें उन के जीवन का सब से रोमांचक अनुभव रहीं.

दोनों बाघ दहाड़ते और गुर्राते हुए एकदूसरे की जान लेने पर उतारू थे. ऐसा लग रहा था, जैसे बाघों का वायलेंट डांस हो रहा है. यह भिड़ंत सांभर के शिकार को ले कर हुई थी. दरअसल शिकार मछली ने किया था. दूसरा बाघ उस पर कब्जा जमाना चाहता था. काफी देर चली इस भिड़ंत में मछली ने आखिर अपने दुश्मन को पस्त कर के खदेड़ दिया था. मेहरोत्रा बताते हैं कि मछली की कई बार दूसरे बाघबाघिनों से भिड़ंत हुई, लेकिन हर बार विजय मछली की ही हुई. हालांकि इन मुठभेड़ों में मछली को कई बार चोटें भी लगीं. लेकिन मछली ने कभी हारना नहीं सीखा, इसीलिए वह जीवित है.

मछली द्वारा किए गए मगरमच्छ के शिकार की खींची गई एम.डी. पाराशर की एक दुर्लभ फोटो भी काफी चर्चित रही है. इस फोटो में मछली विशालकाय मगरमच्छ पर सवार हो कर उस का शिकार कर रही है. यह फोटो उस समय की है, जब सन 2004 में रणथंभौर अभयारण्य में भयंकर सूखा पड़ा था. जंगल में झीलों और तालाबों में पानी सूख गया था. जलस्रोत सूखने की वजह से वन विभाग वन्यजीवों को पानी उपलब्ध करा रहा था. झीलें सूखने से उन में रहने वाले मगरमच्छ भी बाहर निकल आए थे. मगरमच्छों को भी भोजन के लाले पड़ गए थे. तेज गर्मी और सूखे के कारण कई मगरमच्छों की मौत भी हो गई थी. इसी दौरान एक दिन मछली ने एक जानवर का शिकार किया.

मछली अपने शिकार को पदम तालाब के पास झाडि़यों में छिपा कर कुछ देर के लिए वहां से चली गई. शिकार पर नजर रखने के लिए मछली अपने 2 नन्हे शावकों को वहां छोड़ गई थी. इसी बीच मृत वन्यजीव की गंध पा कर एक भूखा विशालकाय मगरमच्छ उस झाड़ी में पहुंच गया. मगरमच्छ को देख कर मछली के दोनों शावक उस से बचने के लिए आसपास की झाडि़यों में छिप गए. मगरमच्छ उस शिकार को घसीट कर दलदल की तरफ ले जाने लगा. तभी मछली वहां आ गई. मगरमच्छ को अपना शिकार घसीट कर ले जाते देख वह पूरा माजरा समझ गई. इस के बाद आगबबूला हुई मछली ने उस मगरमच्छ का कचूमर निकाल कर ही दम लिया.

मछली के जीवन का सूरज अब अस्त होने वाला है. इसलिए पिछले 2-3 सालों से उस की मौत की खूब अफवाहें उड़ती रहती हैं. मछली जब कुछ दिन दिखाई नहीं देती तो उस की मौत की चर्चा शुरू हो जाती है. अप्रैल-मई, 2014 में मछली की मौत की अफवाह तेजी से फैली थी. दरअसल, उस समय करीब 20 दिनों तक मछली किसी को दिखाई नहीं दी थी. कई दिनों तक लापता रहने से यह अफवाह फैल गई कि मछली अब शायद नहीं रही. इस से वन्यजीव प्रेमियों को बड़ा धक्का लगा. वन विभाग के अधिकारी भी अधिकृत रूप से कुछ नहीं कह पा रहे थे, क्योंकि न तो मछली दिखाई दे रही थी और न ही उस की मौत के चिह्न मिल रहे थे.

बाद में मई के पहले सप्ताह में मछली की मौत की अफवाहों पर तब विराम लगा, जब वन अधिकारियों ने उसे देखा और उस के फोटो लिए. इस के बाद वन विभाग के उच्चाधिकारियों ने अधिकृत रूप से कहा कि मछली की मौत की खबरें निराधार हैं, वह जंगल में घूम रही है. इस से पहले और इस के बाद भी कई बार मछली के कुछ दिनों तक न दिखने पर उस की मौत की अफवाहें फैलती रही हैं. राजस्थान में बाघों की शरणस्थली के रूप में मुख्य रूप से 2 अभयारण्य हैं, सरिस्का और रणथंभौर. अलवर से जयपुर जिले तक फैले सरिस्का अभयारण्य का क्षेत्रफल अब लगभग 1200 वर्ग किलोमीटर है, इसलिए सरिस्का में बाघों के दर्शन मुश्किल से ही पाते हैं.

सरिस्का के मुकाबले रणथंभौर बाघ अभयारण्य का क्षेत्रफल कम है. सवाई माधोपुर जिले में स्थित रणथंभौर अभयारण्य लगभग 400 वर्ग किलोमीटर में फैला है. क्षेत्रफल कम होने और बाघबाघिनों की संख्या ज्यादा होने से रणथंभौर में बाघों को देखना आसान है. वन विभाग के अधिकारियों की सजगता से रणथंभौर अभयारण्य में बाघों का कुनबा लगातार बढ़ा है. इस कुनबे के बाघबाघिनों की नई खेप अब अपने लिए नए ठिकाने तलाश रही है. इस के लिए वे आसपास के जंगलों में चले जाते हैं. रणथंभौर से निकल कर बाघबाघिनों की नई खेप करौली, दौसा जिले में ठिकाना बना रही है.

कुछ बाघबाघिन सवाई माधोपुर जिले की सीमाएं पार कर के बूंदी व कोटा हो कर बने जंगल कारीडोर से पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश और गुजरात तक पहुंच गए हैं. देश में करीब एकडेढ़ दशक पहले बाघ संकट में आ गए थे. कुख्यात वन्यजीव तस्कर संसारचंद के इशारे पर उस के गुर्गे शिकारियों ने बाघ अभयारण्यों को उजाड़ दिया था. इन में राजस्थान का सरिस्का बाघ अभयारण्य भी शामिल था. बाद में सरकार ने बाघों के संरक्षण पर ध्यान दिया. वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट औफ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक सन 2004 में हुई गणना में देशभर में 1411 बाघ थे. सरकार के प्रयासों से सन 2011 में बाघों की संख्या बढ़ कर 1706 हो गई. सन 2014 में फोटोग्राफिक डाटा बेस के आधार पर देशभर में 2226 बाघ गिने गए.

इन में सब से ज्यादा 408 बाघ कर्नाटक में पाए गए. उत्तराखंड में 340, मध्य प्रदेश में 308, तमिलनाडु में 229, महाराष्ट्र में 190, आसाम में 167, केरल में 136 व उत्तर प्रदेश में 117 बाघ गणना में आए. राजस्थान के जिला अलवर स्थित सरिस्का अभयारण्य में बाघों का पूरी तरह सफाया हो जाने की बातें सामने आई थीं. उस समय इसे ले कर काफी शोरशराबा भी हुआ था. सीबीआई ने इस मामले की जांच की. प्रारंभिक जांच में साफ हो गया था कि सरिस्का में एक भी बाघ नहीं है. कई सालों तक सरिस्का अभयारण्य बाघ विहीन रहा.

इस दौरान राज्य सरकार ने इस संकट से निपटने, बाघ अभयारण्यों की हालत सुधारने और बाघों सहित अन्य वन्यजीवों पर खास ध्यान देने के लिए आर.एन. मेहरोत्रा को प्रदेश के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक की जिम्मेदारी सौंपी. मेहरोत्रा ने शिकार पर सख्ती से रोक लगाने और अभयारण्यों में आसपास के गांव वालों की घुसपैठ तथा पशुओं की चराई रोकने के लिए कई सख्त कदम उठाए. इसी के साथ उन्होंने सरिस्का अभयारण्य को बाघों से फिर आबाद करने के लिए ब्लू प्रिंट भी तैयार किया. हालांकि इस में कई तरह की अड़चनें आईं, लेकिन वह अपने प्रयासों में लगे रहे.

मेहरोत्रा ने केंद्र सरकार एवं वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट औफ इंडिया के सहयोग से बाघों के पुनर्वास और अभयारण्यों में बसे गांवों को अन्यत्र बसाने का प्रस्ताव तैयार किया. इस प्रस्ताव को सरकार ने हरी झंडी दे दी. इस के बाद यह तय किया गया कि सरिस्का को आबाद करने के लिए रणथंभौर से विभिन्न चरणों में बाघ शावकों को ला कर छोड़ा जाए. वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट औफ इंडिया की टीम ने इसरो की मदद से रणथंभौर से शिफ्ट किए जाने वाले शावकों की तलाश शुरू की.

मेहरोत्रा और डब्ल्यूआईआई की टीम के लगातार प्रयासों से भारत में 28 जून, 2008 को बाघ का पहला ट्रांसलोकेशन किया गया. इसे रणथंभौर अभयारण्य में ट्रंकुलाइज कर के भारतीय वायु सेना के हेलीकौप्टर से सरिस्का अभयारण्य में ला कर छोड़ा गया. इस के बाद समयसमय पर रणथंभौर से 2 नर और 2 मादा बाघों को ला कर सरिस्का में छोड़ा गया. इस तरह सरिस्का में रीइंट्रोड्यूस बाघों की वंश वृद्धि की कवायद शुरू हुई. रणथंभौर से सरिस्का लाए गए 5 बाघबाघिनों में मछली की 2 संतानें थीं. मछली की ये दोनों मादा संतानें चौथी बार में पैदा हुई थीं.

इन में सब से पहले लाए गए नर बाघ की नवंबर 2010 में पायजनिंग से मौत हो गई. अलबत्ता शेष बाघों को सरिस्का में स्वच्छंद विचरण और अपनी टेरिटरी बनाने के लिए विशाल जंगल मिला. इस के बाद सरिस्का में वह समय भी आ गया, जिस का लंबे समय से इंतजार था. शावकों के जन्म से बाघों का कुनबा बढ़ने लगा. मछली की संतानों ने सरिस्का को फिर से आबाद कर दिया. मेहरोत्रा के प्रयासों से शुरू किए गए बाघों के रीइंट्रोडक्शन के बाद भारत सहित विदेशों में वन्यजीवों के रीइंट्रोडक्शन को भी बढ़ावा मिला.

फिलहाल मछली अपने जीवन के आखिरी पड़ाव पर है. कई बार दूसरे बाघबाघिनों और मगरमच्छों से मुठभेड़ में अपने कैनाइन दांत खो चुकी मछली अब शिकार करने में भी लाचार है. सामान्य जीवन से डेढ़दो गुना जिंदगी जी चुकी मछली का शरीर भी काफी कमजोर हो चुका है. हालात यह हैं कि मछली को उस की ही संतानों ने उस के विशाल साम्राज्य वाली टेरिटरी से बेदखल कर दिया है. कुछ समय पहले वह उस अंबाघाटी में रहने लगी थी, जो बूढ़े बाघों की शरणस्थली मानी जाती है. आजकल वह कभीकभार लाकड़दा के जंगलों में दिखाई दे जाती है.

पहले वन विभाग के अधिकारी मछली के लिए भोजन का इंतजाम कर देते थे, लेकिन बाद में नैशनल टाइगर कंजरवेशन अथौरिटी (एनटीसीए) ने बाघिन को इस तरह भोजन देने पर रोक लगा दी. अब मछली को बुढ़ापे में भोजन मिलना भी मुश्किल हो गया है. जैसेतैसे वह अपने भोजन का इंतजाम कर के जीवन की आखिरी सांसें ले रही है. पता नहीं कब मछली की जिंदगी का सूर्यास्त होने की खबरें आ जाएं. बहरहाल मछली ने बाघबाघिनों की दुनिया में जीतेजी अपना नाम अमर कर दिया है. Queen of Tigers

—विभिन्न दस्तावेजों एवं वन्यजीव

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