Haryana Crime: एक बार किसी के हस्ताक्षर देख कर हूबहू वैसे ही हस्ताक्षर कर लेना धनीराम मित्तल के बाएं हाथ का खेल था. उस के द्वारा किए गए फरजी हस्ताक्षरों को हैंडराइटिंग एक्सपर्ट भी नहीं पकड़ सकते थे. फरजी हस्ताक्षरों के सहारे वह अफसर ही नहीं बना, झज्जर की कोर्ट में सवा महीने तक जज बन कर उस ने तमाम मुलजिमों को जेल से रिहा भी करा दिया था.
अब तक एक हजार से अधिक आपराधिक वारदातों को अंजाम दे चुके धनीराम मित्तल का जन्म 29 जून, 1939 को हरियाणा के भिवानी शहर के रहने वाले अमीलाल मित्तल के घर हुआ था. अमीलाल एक साधनसंपन्न व्यक्ति थे. उन के परिवार में पत्नी किन्नी देवी के अलावा 4 बेटियां और 5 बेटे थे. उन की एक आटा मिल थी, जिस से आमदनी अच्छी हो रही थी, सो उन्हें 9 बच्चों का पालनपोषण करने में कोई दिक्कत नहीं आई. अमीलाल ने उस जमाने में अपने सभी बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवाई थी. धनीराम ने रोहतक के हिंदू कालेज से बीएससी की थी.
धनीराम तेजतर्रार होने के साथ पढ़ाई में भी होशियार था. बीएससी करने के बाद उस ने राजस्थान के श्रीगंगानगर के खालसा कालेज से एलएलबी की. इस के बाद उस ने करनाल स्थित ‘मौडर्न सेल’ नाम के इंस्टीट्यूट से हस्तलिपि विशेषज्ञ का एक साल का डिप्लोमा किया. इसी क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए उस ने कोलकाता में रह कर हैंडराइटिंग एक्सपर्ट का 3 साल का डिप्लोमा किया. पढ़ाई के साथसाथ वह सरकारी नौकरी पाने की भी तैयारी कर रहा था. उस की मेहनत रंग लाई. रेलवे में क्लर्क की परीक्षा पास करने के बाद सन 1942 में वह दिल्ली जंक्शन पर बुकिंग क्लर्क बन गया. सरकारी नौकरी मिलने से घर वाले भले ही खुश थे, लेकिन धनीराम इस नौकरी से खुश नहीं था.
बुकिंग क्लर्क की नौकरी से वह ऊब गया तो दूसरी नौकरी की कोशिश करने लगा. आज की तरह उन दिनों नौकरी के लिए इतनी मारामारी नहीं थी. फिर धनीराम एक काबिल इंसान था, इसलिए थोड़ी कोशिश के बाद उसे हरियाणा राज्य परिवहन निगम में सुपरवाइजर के पद पर नौकरी मिल गई. उस की पोस्टिंग अंबाला में हुई. उसी दौरान उस की लक्ष्मी से शादी हो गई, जिस से बाद में उसे 3 बच्चे हुए. यह नौकरी भी उस की इच्छा के अनुरूप नहीं थी. नौकरी से उसे जो पगार मिलती थी, उस से वह संतुष्ट नहीं था. वह तो कोई ऐसा काम करना चाहता था, जिस से वह कम समय में ज्यादा पैसे कमा सके और उस की काबिलियत का भी इस्तेमाल हो.
काम में मन नहीं लगा तो उस ने यह नौकरी भी छोड़ दी. धनीराम ने हस्तलिपि विशेषज्ञ का जो कोर्स किया था, उस से वह दूसरों के हस्ताक्षरों को हूबहू करना जान गया था. अपनी योग्यता को जांचने के लिए वह ब्लौक, तहसील स्तर के अधिकारियों के हस्ताक्षर कर के लोगों के छोटेमोटे काम कराने लगा. उस के द्वारा किए गए फरजी हस्ताक्षर विभाग में किसी की पकड़ में नहीं आ सके तो धनीराम की हिम्मत बढ़ती गई. यह प्रयोग सफल हो गया तो उस के दिमाग में तरहतरह की योजनाएं घूमने लगीं. इस के बाद उस ने रोहतक के आरटीओ विभाग से अपना जालसाजी का धंधा शुरू किया.
वह जानता था कि इस विभाग में भ्रष्टाचार खुलेआम होता है. वह विभाग के कुछ अधिकारियों के हस्ताक्षर करना जान गया था. फिर क्या था, उन के जाली हस्ताक्षर से वह लोगों को ड्राइविंग लाइसेंस व अन्य दस्तावेज तैयार कर के देने लगा. इस के बदले वह लोगों से मोटी रकम वसूलता था. अधिकारियों के फरजी हस्ताक्षर से दस्तावेज बनाने का उस का यह धंधा चल निकला. लेकिन उस का यह धंधा ज्यादा दिनों तक चल नहीं सका. लिहाजा वह पुलिस की गिरफ्त में आ गया. सन 1964 में उस के खिलाफ रोहतक के सिटी थाने में पहली रिपोर्ट दर्ज हुई. भादंवि की धारा 380/379/420/468/471 के तहत उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.
करीब 52 साल पहले धनीराम मित्तल जब जेल गया था, उस समय उस की उम्र करीब 25 साल थी. अगर वह चाहता तो अपनी गलती पर पश्चाताप कर के अपराध का रास्ता छोड़ सकता था, लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया, बल्कि वह नएनए तरीके से जालसाजी करने के बारे में सोचने लगा. जमानत पर जेल से बाहर आने के बाद वह फिर से जालसाजी के काम करने लगा. धनीराम के पास एलएलबी की डिग्री थी. वह न्यायालय से संबंधित सभी कामों को जानना चाहता था. इसलिए वह दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट के एडवोकेट श्यामसुंदर शर्मा के यहां मुंशी का काम करने लगा. बाद में वह दिल्ली और हरियाणा की अदालतों में वकालत करने लगा. वह अपने मुकदमे भी खुद ही लड़ रहा था.
एक बार तो उस ने ऐसा काम किया, जिस से रेलवे के बड़े अधिकारी भी सकते में आ गए. बीकानेर रेलवे स्टेशन अधीक्षक ओमप्रकाश शर्मा को एक दिन टेलीग्राम मिला. टेलीग्राम में लिखा था ‘तत्काल प्रभाव से आप का तबादला किया जाता है. 2 दिनों बाद दिल्ली मुख्यालय आ कर रिपोर्ट करें.’
टेलीग्राम को पढ़ कर ओमप्रकाश शर्मा हैरान रह गए, क्योंकि उन का ट्रांसफर ड्यू नहीं था. वह समझ नहीं पा रहे थे कि अचानक उन का ट्रांसफर क्यों कर दिया गया. उन्होंने सोचा कि ड्यूटी खत्म होने के बाद अपने जानने वाले अधिकारियों से इस बारे में बात करेंगे. उन की ड्यूटी खत्म भी नहीं हुई थी कि टेलीग्राम मिलने के 2 घंटे बाद सूटेडबूटेड धनीराम मित्तल हाथ में ब्रीफकेस लिए उन के पास पहुंच गया.
उस ने ओमप्रकाश शर्मा को बताया कि उसे दिल्ली से ट्रांसफर कर के यहां का चार्ज लेने के लिए कहा गया है. उस ने अपनी नियुक्ति की प्रति भी शर्मा को सौंप दी. शर्मा ने उस का नियुक्ति पत्र पढ़ा और उस की तरफ देखने लगे. तभी धनीराम बोला, ‘‘शर्माजी, बधाई हो, आप का प्रमोशन हुआ है और मुख्यालय में आप के कार्यों और ईमानदारी की बड़ी चर्चा हो रही है. आप को मुख्यालय में पोस्टिंग दी गई है.’’
अपनी प्रशंसा से ओमप्रकाश शर्मा काफी खुश हुए. उन्होंने उस दिन धनीराम को अपने साथ रख कर उस की खूब खातिरदारी की. वह जल्द से जल्द दिल्ली पहुंच जाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने फटाफट टिकिट बिक्री और पार्सल का सारा कैश धनीराम को सौंप दिया और दिल्ली रवाना हो गए. ओमप्रकाश शर्मा अपने प्रमोशन की बात सोचसोच कर रास्ते भर खुश होते रहे. उन्होंने सोच रखा था कि दिल्ली में चार्ज संभालने के बाद वह अपने प्रमोशन की खुशखबरी टेलीग्राम द्वारा गांव में रह रहे अपनी बीवीबच्चों को देंगे. उन्होंने प्लान भी कर लिया था कि अब वह बीवीबच्चों को गांव से बुला कर दिल्ली में रखेंगे.
खुशीखुशी वह मुख्यालय पहुंचे. संबंधित अधिकारी के पास वह अपना ट्रांसफर लेटर ले कर पहुंचे तो वह अधिकारी भी आश्चर्यचकित रह गया, क्योंकि वह लेटर मुख्यालय से भेजा ही नहीं गया था और ना ही उन का कोई प्रमोशन हुआ था. यह सुन कर शर्माजी के होश उड़ गए. प्रमोशन की खुशी से उन्होंने जो प्लान बनाए थे, वे काफूर हो गए. वह समझ नहीं पा रहे थे कि जिस आदमी को उन्होंने चार्ज सौंपा है, आखिर वह है कौन और उन के पास टेलीग्राम से जो ट्रांसफर लेटर आया था उस पर बाकायदा संबंधित अधिकारी के हस्ताक्षर और मुहर भी थी. यह खेल किस ने और क्यों खेला है?
वह बीकानेर पहुंचे तो पता चला कि धनीराम कलेक्शन की सारी रकम ले कर फरार हो चुका था. नौकरी बचाने के लिए ओमप्रकाश शर्मा ने सारी रकम अपनी जेब से भरी. धनीराम ने इस के 8 महीने बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर स्टेशन को अपना निशाना बनाया. कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर गंगा स्नान के लिए यहां हजारों लोग आते हैं, जिस से यहां टिकिटों की बिक्री खूब होती है. धनीराम इस बात को जानता था. लंबा हाथ मारने के लिए धनीराम ने कार्तिक पूर्णिमा का ही दिन चुना.
गढ़मुक्तेश्वर के स्टेशन मास्टर को भी उस ने फरजी ट्रांसफर लेटर दे कर खुद वहां का चार्ज ले लिया और वहां से सारा कैश ले कर रफूचक्कर हो गया. फरजी जौइनिंग लेटर के जरिए उस ने दिल्ली जंक्शन, हरिद्वार, श्रीगंगानगर रेलवे स्टेशनों पर भी स्टेशन मास्टर बन कर कैश पर हाथ साफ किया. अब तक रेल विभाग में धनीराम मित्तल चर्चित हो गया था. हालत यह हो गई कि अब विभाग में किसी का ट्रांसफर होता तो वह कर्मचारी संबंधित अधिकारी से पहले अपने ट्रांसफर की पुष्टि करता, उस के बाद ही दूसरे कर्मचारी को चार्ज सौंपता. इस दौरान धनीराम जालसाजी के मामलों में अलगअलग जगहों पर गिरफ्तार भी होता रहा, पर जमानत पर छूटने के बाद वह फिर से यही काम करने लगता.
सन 1970 में देश में चीनी और मिट्टी के तेल की किल्लत हुई. सरकार राशन कार्ड पर ही इन चीजों को सस्ते दाम पर उपलब्ध करा रही थी. उसी दौरान धनीराम ने रोहतक जिले में 5 हजार फरजी राशन कार्ड बना कर वहां के हलवाइयों और अन्य लोगों को दे दिए थे. ऐसा नहीं था कि उस ने वे राशन कार्ड फ्री में दिए थे, उस ने उन लोगों से पैसे लिए थे. 2 महीने तक उन राशन कार्डों से लोगों ने सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान से चीनी और मिट्टी का तेल लिया था. बाद में भेद खुलने पर खाद्य एवं आपूर्ति विभाग ने वे राशन कार्ड निरस्त कर दिए थे और धनीराम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी.
सन 1970 में ही शातिरदिमाग धनीराम ने ऐसा काम किया कि लोग हैरान रह गए. दरअसल हुआ यह कि हरियाणा के झज्जर जिले के जज साहब लंबी छुट्टी पर गए हुए थे. इसी का फायदा उठाते हुए उस ने पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के फरजी कागजात बनाए और उन्हीं के बूते पर उस ने उस जज की कुरसी संभाल ली. वह अदालती काम से वाकिफ था ही, साथ ही उसे कानून की भी जानकारी थी.
इस के अलावा उस में एक खास बात यह थी कि वह निडर हो कर काम करता था. इसी वजह से किसी को भी उस पर शक नहीं होता था. अदालती काररवाई की उसे अच्छी जानकारी थी, इसलिए वह 28 दिनों तक जज की कुरसी पर बैठ कर केसों की सुनवाई करता रहा. इस बीच उस ने कई केसों के फैसले भी सुनाए. इतना ही नहीं, मोटे पैसे ले कर उस ने हत्या और संगीन मामलों के 30 मुलजिमों को जेल से रिहा भी करा दिया. ताज्जुब की बात यह रही कि 28 दिनों में उस ने वहां रह कर अच्छी कमाई की, पर वहां काम कर रहे किसी भी कर्मचारी को उस पर शक नहीं हुआ. लेकिन जब यह मामला खुला तो उसे एक बार फिर जेल जाना पड़ा. धनीराम फरजी जमानती वारंट बनाने में भी एक्सपर्ट था.
कोर्ट में वकालत करने के दौरान वह मोटी रकम ले कर फरजी जमानती वारंट तैयार कर देता था और उन्हीं की बदौलत उस ने तमाम मुजरिमों को जेल से बाहर निकलवाया. इतना ही नहीं, फरजी जज वाले मामले में भी उस ने जेल में रहते हुए किसी तरह अपना भी फरजी जमानती वारंट तैयार कर लिया और जेल से बाहर आ गया. एक बार सन 1976 में पुलिस किसी मामले में उसे पेश करने के लिए रोहतक जेल से बीकानेर की अदालत में ले गई. वहां मजिस्ट्रेट ने उसे जमानत पर छोड़ने से इनकार कर दिया. धनीराम ने वापस आ कर रोहतक जेल के अधीक्षक को जज के फरजी हस्ताक्षर वाला जमानती वारंट दिखाया तो जेल अधीक्षक ने उसे रिहा कर दिया. बाद में पता चला कि वह वारंट फरजी था.
धनीराम जालसाजी के ये काम केवल पैसे कमाने के लिए ही नहीं करता था, बल्कि निजी खुन्नस निकालने के लिए भी उस ने रोहतक के तत्कालीन चीफ ज्यूडीशियल मजिस्ट्रेट एन.एल. पारुथी को ऐसा सबक सिखाया था कि शायद वह उसे कभी भूल पाएं. इस की वजह यह थी कि उन की अदालत में धनीराम का एक केस चल रहा था. धनीराम खुद ही अपना केस लड़ रहा था. वह कोर्ट में ऐसा व्यवहार कर रहा था, जो अदालत के हिसाब से ठीक नहीं था. चीफ ज्यूडीशियल मजिस्टे्रट एन.एल. पारुथी ने धनीराम को लताड़ते हुए अदालत में अपना आचरण ठीक करने को कहा.
भरी अदालत में लताड़े जाने से धनीराम की बेइज्जती हुई थी. यह बात उसे बहुत खली. उस ने उसी समय जज पारुथी को इस बेइज्जती का खामियाजा भुगतने की धमकी दे दी. जज पारुथी को क्या सबक सिखाना है, इस की रूपरेखा धनीराम ने तुरंत तैयार कर ली. एक दिन जज पारुथी को रजिस्टर्ड डाक से पंजाब व हरियाणा हाइकोर्ट के न्यायाधीश का पत्र मिला. पत्र में लिखा था, ‘तत्काल प्रभाव से आप का इस्तीफा मंजूर कर लिया गया है. अत: आप तुरंत अपना पद और कार्यभार छोड़ दें.’
पत्र पढ़ते ही पारुथी का हलक सूख गया. वह परेशान हो उठे कि उन्होंने जब इस्तीफा दिया ही नहीं है तो वह मंजूर कैसे हो गया. यही बात सोचसोच कर रात भर उन्हें नींद नहीं आई. अगले दिन वह उस पत्र को ले कर चंडीगढ़ के लिए रवाना हो गए. वहां मुख्य न्यायाधीश से मिल कर उन्होंने कहा, ‘‘सर, कल मुझे यह लैटर मिला है. जबकि मैं ने अपने इस्तीफे के बारे में कोई पत्र दिया ही नहीं है.’’
मुख्य न्यायाधीश ने उन्हें वह फाइल दिखाई, जिस में उन के इस्तीफे की दरख्वास्त लगी थी. पारुथी ने उस दरख्वास्त को पढ़ा तो उस पर जो दस्तखत थे, वे उन के ही थे. उन का माथा चकराया कि जब उन्होंने दरख्वास्त लिखी ही नहीं है तो यह दस्तखत कैसे हो गए? उन्होंने कहा, ‘‘सर, यह दरख्वास्त मैं ने नहीं लिखी. जरूर यह किसी की साजिश है.’’
‘‘भले ही साजिश हो, पर यहां तो तुम्हारी सेवानिवृत्ति की विभागीय औपचारिकताएं लगभग पूरी हो चुकी हैं.’’ मुख्य न्यायाधीश ने कहा.
‘‘प्लीज सर, रुकवा दीजिए, वरना मेरी सालों की मेहनत बेकार जाएगी. मैं तबाह हो जाऊंगा,’’ पारुथी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘मुझे लगता है, यह सब धनीराम का किया है. इस तरह के काम वही करता है.’’
मुख्य न्यायाधीश के हस्तक्षेप पर पारुथी के इस्तीफे की प्रक्रिया रोकी गई. इस के बाद पारुथी ने रोहतक पहुंच कर सिटी थाने में धनीराम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. देशी चार्ल्स शोभराज के रूप में मशहूर धनीराम जालसाजी से कागज तैयार करने में ही माहिर नहीं था, बल्कि एक बार वह दिनदहाड़े पुलिस हिरासत से बहुत आराम से फरार भी हो गया था. किसी मामले में रोहतक पुलिस ने बड़ी मशक्कत के बाद धनीराम को गिरफ्तार किया था. 4 नवंबर, 1995 को रोहतक जेल से उसे फरीदाबाद की कोर्ट में पेश करने के लिए ले जाया गया. लेकिन फरीदाबाद कोर्ट परिसर में भीड़ का फायदा उठा कर वह वहां से नौ दो ग्यारह हो गया. लाख ढूंढने के बाद भी पुलिस उसे ढूंढ नहीं सकी.
हरियाणा की भिवानी जेल में कुख्यात अपराधी जिले सिंह बंद था. विभिन्न धाराओं में उसे 25 साल की सजा हुई थी. उसे किसी तरह पता चला कि धनीराम फरजी जमानती वारंट से सैकड़ों लोगों को जेल से रिहा करा चुका है. अपनी रिहाई के लिए उस ने अपने एक संबंधी को धनीराम के पास भेजा. मोटी रकम ले कर धनीराम उस का यह काम कराने को तैयार हो गया. चूंकि जिले सिंह सजायाफ्ता कैदी था, इसलिए उस की रिहाई के लिए उसे काफी मशक्कत करनी पड़ी थी.
जेल के अधिकारियों की मिलीभगत के बिना यह काम करना आसान नहीं था. उस समय आर.के. गुप्ता जेल अधीक्षक थे. धनीराम ने आर.के. गुप्ता के बेटे पंकज गुप्ता के माध्यम से बात आगे बढ़ाई. पैसों के लालच में आर.के. गुप्ता अपनी जिम्मेदारियों को भूल गए. धनीराम ने फरजी तरीके से जिले सिंह की रिहाई के जाली पेपर तैयार कर दिए और उस की 25 साल की सजा पूरी होने से पहले ही उसे जेल से रिहा करा दिया. बाद में जब यह मामला प्रकाश में आया तो पुलिस ने धनीराम, पंकज गुप्ता, जेल के 2 कनिष्ठ कर्मचारियों नरेश व अंजू सहित 5 लोगों को गिरफ्तार किया.
धनीराम फरजी वकील बन कर कोर्ट में अपने केसों की ही पैरवी नहीं करता, बल्कि अन्य केसों की भी पैरवी करता था था. फरवरी, 2005 में वह अपने एक मुवक्किल विजय के चैक बाउंस के केस के सिलसिले में पटियाला हाउस कोर्ट में आया, तभी वकीलों ने उसे घेर लिया. पूछने पर वह अपना रजिस्ट्रेशन नंबर तक नहीं बता पाया. सूचना मिलने पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में पता चला कि उस के पास केवल एलएलबी की डिग्री है. कोर्ट में प्रैक्टिस करने का कोई भी वैध दस्तावेज वह नहीं दिखा सका, पुलिस ने उस के पास से विभिन्न केसों की 7 फाइलें भी बरामद की थीं. इस मामले में पुलिस ने उसे जेल भेज दिया था.
जेल से जमानत पर बाहर आने के बाद वह फिर से वकालत करने लगा. 6 दिसंबर, 2005 को उसे दिल्ली के तीसहजारी न्यायालय में महानगर दंडाधिकारी राजेश कुमार की अदालत में फिर से फरजी वकील के रूप में गिरफ्तार किया गया. उस दिन वह अपने मुवक्किल के आर्म्स एक्ट के मामले की पैरवी करने आया था. धनीराम ठगी और जालसाजी के अलावा छोटीमोटी चोरियां भी कर लेता था. कार से स्टीरियो, स्टेपनी, ब्रीफकेस या अटैची उड़ाना वह हाथ की सफाई समझता था. 3 दिसंबर, 1996 को उसे दिल्ली स्थित डब्लूएचओ औफिस में कार्यरत दीप्ति नाग की मारुति कार से स्टीरियो चुराते रंगेहाथों पकड़ा गया था.
तिहाड़ जेल में ही धनीराम की मुलाकात अशोक कुमार से हुई. अशोक कुमार एक कार चोर था. जबकि धनीराम चोरी के अलावा जाली कागज बनाने में माहिर था. दोनों ने मिल कर कार चुराने और फरजी कागज बना कर उन्हें ठिकाने लगाने की योजना बनाई. अलगअलग समय पर दोनों जेल से जमानत पर बाहर आए. दोनों ही हरियाणा, पंजाब, दिल्ली आदि जगहों से कार चुरा कर फरजी कागजात तैयार कर के बेचने लगे. इस दौरान धनीराम अपने रहने के ठिकाने बदलता रहा.
26 अप्रैल, 2004 को दोनों कार चुराने के लिए चंडीगढ़ पहुंचे. हाइकोर्ट परिसर में उन्होंने सफेद रंग की चमचमाती मारुति कार नंबर एचआर01 पी 4177 देखी. वह कार जानेमाने एडवोकेट अशोक कुमार खुंगर की थी. मौका मिलते ही उन्होंने मास्टर चाबी से वह कार चुरा ली. एडवोकेट खुंगर अपनी गाड़ी लेने पहुंचे तो कार न देख कर वह परेशान हो उठे. उन्होंने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दे दी. पुलिस ने बैरिकेड्स लगा कर जांच की तो जीरकपुर रोड पर पुलिस ने चुराई गई कार के साथ धनीराम को गिरफ्तार कर लिया. जबकि उस का साथी अशोक बस द्वारा दिल्ली के लिए पहले ही रवाना हो गया था. धनीराम को गिरफ्तार कर बुड़ैल जेल भेज दिया गया.
चंडीगढ़ के वकील की कार चुराने का मामला अभी भी न्यायालय में विचाराधीन है. लंबे समय तक जब वह चंडीगढ़ कोर्ट की तारीखों पर नहीं पहुंचा तो चंडीगढ़ न्यायालय के जज श्री बलविंदर कुमार ने 6 मार्च, 2008 को उसे भगोड़ा घोषित कर दिया. दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश के विभिन्न राज्यों में धनीराम एक हजार से ज्यादा आपराधिक वारदातों को अंजाम दे चुका है. विभिन्न राज्यों के थानों में उस के खिलाफ 127 केस दर्ज हो चुके हैं. उस की खास बात यह है कि उस ने कभी भी अपना नाम और हुलिया नहीं बदला और न ही जालसाजी जैसे आपराधिक कामों से उस ने संन्यास लिया. 77 साल की उम्र में भी वह इस काम में जुटा है.
दिल्ली के रानीबाग इलाके में 5 नवंबर, 2015 को एक शख्स की सैंट्रो कार चोरी हो गई. पुलिस ने जब वहां के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज देखी तो पता चला कि कार चुराने वाला और कोई नहीं, धनीराम मित्तल है. दिल्ली पुलिस के पास धनीराम के फोटो तो थे, पर उस का ठिकाना नहीं था. पश्चिम जिले के वाहन चोर निरोधक दस्ते के इंसपेक्टर राजपाल डबास के पास धनीराम का पूरा इतिहास मौजूद था. वह अपने स्तर से उसे तलाशने लगे.
उन की मेहनत रंग लाई. उन्हें धनीराम मित्तल के बारे में सुराग मिला कि वह उत्तरी दिल्ली के नत्थूपुरा इलाके में रहता है. डीसीपी पुष्पेंद्र कुमार को उन्होंने इस सूचना से अवगत करा दिया. डीसीपी ने एसीपी दिनेश शर्मा की अध्यक्षता में एक टीम बनाई, जिस में एसआई सुमेर सिंह, एएसआई सतीश कौशिक, हैडकांस्टेबल नवीन कुमार, कांस्टेबल हरिप्रकाश को शामिल किया गया. टीम का नेतृत्व एडीशनल डीसीपी मोनिका भारद्वाज कर रही थीं. टीम ने मुखबिरों को भी लगा दिया.
31 मार्च, 2016 को इंसपेक्टर राजपाल डबास को सूचना मिली कि धनीराम रोहिणी कोर्ट से पश्चिम विहार की तरफ आने वाला है. यह सूचना मिलते ही पुलिस टीम ने पश्चिम विहार डिस्ट्रिक्ट पार्क के नजदीक बाहरी रिंग रोड पर बैरिकेड्स लगा कर वाहनों की जांच शुरू कर दी. तभी डीएल4सीएपी1880 नंबर की एक सैंट्रो कार रोहिणी की तरफ से आई. वह कार बैरिकेड्स के पास पहुंच कर धीमी हुई तो ड्राइविंग सीट पर बैठे धनीराम को पुलिस ने पहचान लिया. हिरासत में ले कर उसे इंसपेक्टर राजपाल डबास अपने औफिस ले आए.
उन्होंने धनीराम से पूछताछ की तो उस ने आसानी से बता दिया कि इस सैंट्रो कार का असली नंबर डीएल4सीएपी0882 था, जिसे उस ने बदल कर फरजी नंबर लगा लिया था. उस ने बताया कि यह कार उस ने दिल्ली के रानीबाग इलाके से चुराई थी. इसे वह किसी को बेचने जा रहा था. धनीराम ने बताया कि जालसाजी और कार चोरी करना उस का एक शौक है और शौक आसानी से नहीं छूटता.
उस ने बताया कि फरजी जमानती वारंट के जरिए वह अब तक ढाई हजार से ज्यादा मुलजिमों को विभिन्न जेलों से निकलवा चुका है. इंसपेक्टर राजपाल डबास को केवल कार चोरी के मामले में उस की तलाश थी. उन्हें यह भी पता चला कि वह चंडीगढ़ कोर्ट द्वारा भगोड़ा घोषित किया जा चुका है, इसलिए उन्होंने चंडीगढ़ पुलिस को भी उस की गिरफ्तारी की सूचना दे दी. दिल्ली पुलिस की सूचना पर अगले दिन चंडीगढ़ पुलिस दिल्ली पहुंच गई. पुलिस ने जब धनीराम को रोहिणी कोर्ट में पेश किया तो वहीं से चंडीगढ़ पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर अपने साथ ले गई.
धनीराम मित्तल बहुत ही होशियार शख्स है. लेकिन उस ने अपनी शिक्षा और काबिलियत को गैरकानूनी कामों में प्रयोग किया. अपनी काबिलियत के बूते पर वह किसी सरकारी विभाग में बड़ा अधिकारी बन सकता था, पर उस ने शुरुआत में ही ऐसे रास्ते पर कदम बढ़ा दिए, जिन का अंजाम हमेशा गलत ही होता है. पता चला है कि उस के रास्ते पर उस का बेटा संजय कुमार मित्तल भी चल निकला है. बहरहाल अब देखना यह है कि जेल से छूटने के बाद वह क्या करता है. Haryana Crime
—कथा पुलिस सूत्रों पर आध






