Mobile Tower Scam: मोबाइल फोन टावर लगाने के नाम पर लोगों से करोड़ों रुपए की ठगी करने वाले रामअवतार गुप्ता और दिनेश गुप्ता ने ठगी की ऐसी फूलप्रूफ योजना बना रखी थी कि क्राइम ब्रांच की टीम को भी उन तक पहुंचने में खासी मशक्कत करनी पड़ी.

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में पिछले कुछ महीनों से मोबाइल टावर लगाने के नाम पर ठगे जाने की घटनाओं में इजाफा हो रहा था. ठग लोगों से करोड़ों रुपए की ठगी कर चुके थे. जितने भी लोगों को ठगा गया सभी से बात करने पर पुलिस को यही जानकारी मिली कि उन सभी को ठगने का तरीका एक ही था. सभी लोग अखबारों में छपे एयरसेल ग्रुप लिमिटेड के विज्ञापन को पढ़ कर ठगों के झांसे में आए. विज्ञापन में लिखा होता कि अपने घर, प्लौट, खेत आदि जगहों पर मोबाइल फोन कंपनी का टावर लगवा कर 70 हजार से एक लाख रुपए हर महीना घर बैठे पाएं.

विज्ञापन पढ़ कर जब कुछ लोग उस में दिए फोन नंबर पर संपर्क करते तो वे लोग सब से पहले फाइलिंग चार्ज के नाम पर उन से ढाई हजार से 3 हजार रुपए एकाउंट में जमा कराते थे. इस के बाद वे उस जगह के कागज मांगते, जहां पर टावर लगाना है. कागज औनलाइन ही सबमिट करने को कहा जाता था. फिर फिक्सेशन चार्ज के नाम पर इतनी ही रकम जमा कराने को कहा जाता. बाद में 25 हजार रुपए सिक्योरिटी के नाम पर और इतनी ही रकम सर्विस चार्ज के रूप में जमा कराने को कहते थे. इस तरह ये लोग लाखों रुपए ऐंठ लेते थे.

एसपी आरिफ हुसैन से ऐसे अनेक लोगों ने संपर्क किया, जिन से ठगों ने करोड़ों रुपए की ठगी की थी. एसपी के निर्देश पर ऐसे ही 36 लोगों ने जिले के अलगअलग थानों में ठगों के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराईं. चूंकि वह जल्द ही उन ठगों को गिरफ्तार कराना चाहते थे, इसलिए उन्होंने यह मामला क्राइम ब्रांच के डीएसपी अखिलेश माहेश्वरी के हवाले कर दिया. डीएसपी अखिलेश माहेश्वरी ने जालसाजों तक पहुंचने की एक योजना बनाई. योजना के तहत उन्होंने सबइंसपेक्टर प्रेमचंद्र को डिकोय कस्टमर बना कर आगे की काररवाई करने को कहा.

स्थानीय अखबार में एयरसेल ग्रुप लिमिटेड का विज्ञापन छपा था. यह विज्ञापन मोबाइल टावर लगाने से संबंधित था. विज्ञापन में दिए गए फोन नंबर 08377035363 पर एसआई प्रेमचंद्र ने फोन किया तो दूसरी तरफ से बताया गया कि टावर लगवाने के लिए आप के पास 100 वर्गगज जमीन होनी चाहिए. यदि कोई प्लौट नहीं है तो छत पर भी टावर लग सकता है.

जमीन तो हमारे पास बहुत है. हमें यह बताइए कि टावर लगवाने से हमें मिलेगा क्या? डिकोय कस्टमर ने कहा. आप को 70 हजार रुपए महीने की इनकम होगी. इस के अलावा आप के यहां से एक आदमी को टावर लगाने वाली कंपनी में नौकरी मिलेगी. इस के अलावा आप उस कंपनी से अपनी जमीन पर 80 लाख रुपए तक का लोन भी ले सकते हैं. ये सारी बातें एक लिखित एग्रीमेंट में होंगी. लेकिन इस के लिए आप को पहले फाइल चार्ज के रूप में 2 हजार 3 सौ रुपए जमा करने होंगे. उस आदमी ने बताया.

जब आप इतना फायदा बता रहे हैं तो हम आज ही तेईस सौ रुपए आप के औफिस में ही आ कर जमा कर देंगे. डिकोय कस्टमर ने कहा. नहीं, इस काम के लिए आप को औफिस आने की जरूरत नहीं है. आप अपना ईमेल आईडी बता दीजिए हम एक खाता नंबर आप की ईमेल आईडी पर भेज देंगे. पैसे जमा होने के बाद हम आगे की काररवाई बता देंगे. उस आदमी ने कहा.

डिकोय कस्टमर बने एसआई प्रेमचंद्र ने उसे अपनी ईमेल आईडी बता दी तो उस आदमी ने तुरंत ईमेल से भारतीय स्टेट बैंक का खाता नंबर 20167374228 भेज दिया. एसआई प्रेमचंद्र का सोचना था कि इस बहाने उन्हें ठगों के औफिस का पता मिल जाएगा तो वे लोग आसानी से पकड़े जा सकते हैं पर ठग उन से ज्यादा चालाक निकले. प्रेमचंद्र ने यह बात डीएसपी अखिलेश माहेश्वरी को बताई तो उन्होंने भारतीय स्टेट बैंक में फाइलिंग चार्ज के 2 हजार 3 सौ रुपए जमा करा दिए. इस की जानकारी प्रेमचंद्र ने एयरसेल कंपनी के उसी फोन नंबर पर दी, जिस पर पहले बात हुई थी. तब उन्होंने प्रेमचंद्र से कहा कि वह अपनी जमीन के कागजों और आधार कार्ड को स्कैन करा कर ईमेल से भेज दें, जिस से आगे की काररवाई की जा सके.

क्राइम ब्रांच को अब यह जानकारी हो चुकी थी कि ठग किस तरह से लोगों को अपने जाल में फांसते हैं. अब पुलिस के पास ठगों तक पहुंचने के लिए 2 रास्ते थे, पहला तो फोन नंबर और दूसरा एकाउंट नंबर. दोनों की ही पुलिस ने जांच की तो वह दिल्ली के निकले. डीएसपी अखिलेश माहेश्वरी ने तुरंत 2 इंसपेक्टरों और 3 सबइंसपेक्टरों की एक 5 सदस्यीय टीम अभियुक्तों की तलाश के लिए दिल्ली भेज दी.

दिल्ली पहुंची छत्तीसगढ़ पुलिस की 5 सदस्यीय क्राइम ब्रांच टीम ने उस फोन नंबर की जांच की तो वह नंबर फरजी आईडी पर लिया हुआ निकला. पुलिस ने एक बात पर गौर किया कि जिन 36 लोगों ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी, उन की जिन फोन नंबरों पर बात हुई थी, वह सब अलगअलग थे. यानी उन 36 लोगों से अलगअलग 36 नंबरों से बात हुई थी. उन सभी फोन नंबरों की काल डिटेल्स पुलिस ने खंगाली तो पता चला कि वे लोग एक फोन नंबर से केवल एक ही शिकार को फोन करते थे. उस नंबर से उन्होंने किसी और से बात नहीं की. जांच में ये सभी नंबर भी फरजी आईडी पर लिए पाए गए.

इस के बाद पुलिस ने भारतीय स्टेट बैंक के उस खाता नंबर की जांच की, जिस में 2 हजार 3 सौ रुपए जमा कराए थे. पता चला कि वह खाता भी उन्होंने फरजी आईडी पर खुलवाया था. दिल्ली में डेरा डाल कर पुलिस जालसालों के अन्य खातों की जांच में जुट गई पर कोई नतीजा नहीं निकला. वजह यही निकली कि सारे बैंक खाते जाली डाक्यूमेंट से खुले हुए थे.

इस के बाद छत्तीसगढ़ पुलिस ने उन की मेल आईडी की जांच की, तो किसी भी मेल आईडी का आईपी एड्रेस भारत का नहीं निकला. उन के आईपी एड्रेस चीन, स्वीडन और दूसरे देशों के निकले. दिल्ली में रह कर 15-20 दिन जांच करने के बाद भी छत्तीसगढ़ पुलिस को ऐसा कोई सुराग नहीं मिला जिस से ठगों तक पहुंचा जा सके. डीएसपी अखिलेश माहेश्वरी ने दिल्ली में ठहरी क्राइम ब्रांच टीम को कुछ अलग बिंदुओं पर काम करने के निर्देश दिए. इतना ही नहीं वह खुद भी कुछ और पुलिसकर्मियों के साथ दिल्ली पहुंच गए. 4-5 दिनों तक डीएसपी भी अपने स्तर से ठगों तक पहुंचने की कोशिश करते रहे, लेकिन उन्हें भी कोई सफलता नहीं मिली.

अंत में उन्होंने दिल्ली पुलिस के संयुक्त पुलिस आयुक्त रविंद्र यादव से मुलाकात कर अभियुक्तों को तलाशने में मदद मांगी. रविंद्र यादव ने क्राइम ब्रांच के डीसीपी अशोक कुमार से इस मामले में छत्तीसगढ़ पुलिस की हेल्प करने को कहा.

ठगों के फोन नंबरों और खातों को देख कर दिल्ली पुलिस को यही लग रहा था कि वे सभी दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों के हैं. इसलिए डीसीपी अशोक कुमार ने क्राइम ब्रांच की स्पैशल टीम के एसीपी जितेंद्र मलिक के नेतृत्व में एक टीम बनाई, जिस में इंसपेक्टर अशोक कुमार, एसआई नरेंद्र सहरावत, हेड कांस्टेबल कविंद्र, दिनेश, कांस्टेबल प्रवेश, रविंद्र, विनोद को शामिल किया गया.

छत्तीसगढ़ के डीएसपी अभिषेक माहेश्वरी के साथ जो पुलिस टीम काम कर रही थी, उस में इंसपेक्टर बी.आर. नाग, दीपक साहू, एसआई प्रेमचंद्र, एएसआई बीरम नेतम, आशीष सिंह, हेडकांस्टेबल सुमन राजपूत, कांस्टेबल दुर्योधन, विपिन, योगेश, राहुल आदि शामिल थे. अब संयुक्त रूप से दोनों पुलिस टीमें काम करने लगीं.

जिनजिन बैंकों में ठगों के एकाउंट थे, दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने उन बैंकों में संपर्क कर के यह पता लगा लिया कि उन के बैंक खातों में लोग अभी भी पैसा जमा कर रहे हैं और उन पैसों को ठग दिल्ली और एनसीआर के एटीएम बूथों से निकाल रहे हैं. यानी उन का ठगी का धंधा अभी भी जारी था.

यह देखते हुए पुलिस ने बैंक अधिकारियों से संपर्क कर उन के सारे एकाउंट सीज करा दिए. इस के अलावा संबंधित बैंकों के शाखा प्रबंधकों से भी कह दिया गया कि इस संबंध में खाताधारक बैंक में फोन से संपर्क करे तो उसे किसी न किसी बहाने बैंक में बुला लेना.

दिल्ली पुलिस की यह योजना सफल रही. 28 अप्रैल, 2015 को भारतीय स्टेट बैंक की पटेल नगर शाखा के बैंक मैनेजर के पास दीपक कुमार नाम के शख्स ने फोन कर के कहा कि उस का एटीएम काम नहीं कर रहा. ब्रांच मैनेजर ने देखा कि यह तो वही खाता था, जिसे पुलिस ने सीज कराया था. इसलिए बैंक मैनेजर ने उस से कहा, ‘‘दीपकजी, आप परेशान मत होइए. आप कल बैंक आ जाना, कुछ कागजी काररवाई पूरी करने के बाद आप का एटीएम खुल जाएगा.’’

दीपक से बात करने के बाद बैंक मैनेजर ने यह बात पुलिस को बता दी थी. 29 अप्रैल को पुलिस टीम सादा लिबास में बैंक के अंदर और बाहर तैनात हो गई. करीब 11 बजे 22 साल का दीपक कुमार अपनी समस्या बताने के लिए बैंक मैनेजर के केबिन में पहुंचा. दीपक को इत्मीनान से बैठा कर वह उस से बात करने लगे. उसी दौरान उन्होंने पुलिस को इशारा कर दिया. पुलिस ने उसी समय दीपक को हिरासत में ले लिया.

पूछताछ में दीपक ने बताया कि वह दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके में रहता है और दिनेश गुप्ता उर्फ गुड्डू के लिए काम करता था. उस का काम केवल फरजी आईडी प्रूफ के जरिए बैंकों में खाते खोलना था. एक खाता खोलने के उसे 2 हजार रुपए मिलते थे.

उस की निशानदेही पर पुलिस ने बुद्ध विहार, रोहिणी से दिनेश गुप्ता उर्फ गुड्डू, उस के साथी राम अवतार गुप्ता, सुलतानपुरी से विनीत कुमार, पीरागढ़ी कैंप से मानव उर्फ मोनू को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में पता चला कि ठगी के इस खेल के मास्टरमाइंड दिनेश गुप्ता और रामअवतार गुप्ता थे. पता चला कि इन का ठगी का धंधा बड़े ही व्यापक तरीके से चल रहा था. इन्होंने सैक्टर-9 रोहिणी, दिल्ली के एक शौपिंग मौल में काल सेंटर भी बना रखा था.

पुलिस ने उसी दिन इन की निशानदेही पर इन के काल सैंटर की तलाशी ली तो वहां से 15 फरजी वोटर आईडी कार्ड, 15 पैन कार्ड, 13 एटीएम कार्ड, 12 मोबाइल फोन, विभिन्न मोबाइल कंपनियों के 12 सिम कार्ड, एक चैकबुक, अलगअलग कंपनियों की अनेक मोहरें बरामद कीं. पता चला कि रामअवतार गुप्ता और दिनेश गुप्ता सन 2012 में 7 लड़कियों के साथ दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच द्वारा ठगी के आरोप में गिरफ्तार किए जा चुके थे.

इन की निशानदेही पर पुलिस ने सैक्टर-24 रोहिणी से इन के एक साथी अमित कुमार को भी गिरफ्तार कर लिया. अमित खुद को चार्टर्ड एकाउंटेंट बताता था. वहां उस ने बाकायदा अपना एक औफिस भी खोल रखा था. अमित के औफिस से एक लैपटौप, 8 फरजी वोटर आईडीकार्ड, कई सिमकार्ड बरामद किए गए.

पुलिस ने जब इन से पूछताछ की तो पता चला कि इस धंधे के मास्टरमाइंड दिनेश गुप्ता और रामअवतार गुप्ता थे. दिनेश गुप्ता कई तरह की टेली कालिंग और टेली मार्केटिंग कंपनियों में काम कर चुका है. जबकि रामअवतार गुप्ता को कंप्यूटर की अच्छी जानकारी है. दोनों आपस में रिश्तेदार भी हैं.

दोनों ने सांठगांठ कर के ठगी का धंधा शुरू किया था, जिस में दोनों सन 2012 में गिरफ्तार भी हुए थे. जमानत पर जेल से बाहर आने के बाद इन्होंने ठगी का धंधा फिर से शुरू कर दिया. इस बार इन्होंने मोबाइल फोन टावर लगाने के नाम पर लोगों को अपने जाल में फांसा. इस की योजना इन्होंने इतनी फूलप्रूफ तरीके से बनाई कि कोई आसानी से इन के पास तक नहीं पहुंच सके.

इन्होंने रोहिणी सेक्टर-9 में एक मौल में किराए पर जगह ले कर एक काल सेंटर खोला, इन के साथ जो लोग काम करते थे, उन्हें 4 टीमों में बांट रखा था. एक टीम फरजी डाक्यूमेंट के जरिए विभिन्न बैंकों में एकाउंट खुलवाती थी. इस टीम में दीपक कुमार, विनीत, सुमित आदि थे. एक खाता खुलवाने के इन्हें 2 हजार रुपए दिए जाते थे.

दूसरी टीम फरजी डाक्यूमेंट तैयार करती थी, जिन के आधार पर बैंकों में खाते खुलवाए जाते और सिमकार्ड लिए जाते थे. खाता खुलने के बाद चैकबुक और एटीएम कार्ड तीसरी टीम तक पहुंचा दिए जाते थे. जिन से उस टीम के सदस्य बैंकों से पैसे निकालते थे. पैसे कभी भी दिल्ली के एटीएम बूथों से नहीं निकाले जाते थे. कैश विदड्राल का काम हरियाणा में रिंकू और उत्तर प्रदेश में आशु को दे रखा था. ये लोग एटीएम से पैसे निकाल कर अपने टीम लीडर को दे देते, टीम लीडर उन पैसों को दिनेश गुप्ता या रामअवतार तक पहुंचाता था. इस के बदले में इन्हें अच्छी कमीशन दी जाती थी.

चौथी टीम की जिम्मेदारी मोबाइल फोन टावर लगवाने के विज्ञापन विभिन्न अखबारों में छपवा कर ग्राहकों को फंसाने की थी. ताज्जुब की बात यह थी कि चारों टीमों के सदस्य एकदूसरे को नहीं जानते थे. प्रत्येक टीम का अलग लीडर बनाया गया था. दिनेश या रामअवतार केवल टीम लीडर से ही बात करते थे. ये लोग छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार आदि राज्यों के विभिन्न जिलों में निकलने वाले अखबारों में मोबाइल फोन टावर लगवाने का आकर्षक विज्ञापन छपवाते. स्टाफ को पहले ही इन्होंने हिदायत दे रखी थी कि लोगों की जेब से पहले छोटी रकम निकलवानी है. इसलिए ये फाइलिंग के नाम पर ढाई हजार से 3 हजार रुपए एकाउंट में जमा कराते. जिस ने भी यह रकम जमा कर दी, वह इन के जाल में फंसता चला जाता था. इस के बाद फिक्सेशन चार्ज के नाम पर इतनी ही रकम जमा कराई जाती.

फिर 25 हजार रुपए सिक्योरिटी के नाम पर और इतनी ही रकम सर्विस चार्ज के नाम पर ये लोग वसूलते थे. ये लोगों से किसी न किसी नाम पर तब तक पैसे वसूलते थे जब तक वह परेशान हो कर पैसे जमा कराने बंद कर अपने पैसे वापस मांगने शुरू न कर देता था. इस के बाद ये उस व्यक्ति से बात करना बंद कर देते थे.

जिस फोन नंबर से ये पीडि़त को काल करते थे, उस सिमकार्ड को नष्ट कर देते थे. पीडि़त व्यक्ति इन्हें फोन मिलाता रहता. फोन न मिलने पर मजबूरी में वह चुप हो कर बैठ जाता था. जो लोग चुप नहीं बैठे, उन्होंने इस की शिकायत पुलिस से कर दी. अगर ये लोग भी पुलिस से शिकायत नहीं करते तो पता नहीं अभी कितने और लोगों को अपने जाल में फांस कर उन्हें ठगते. पुलिस ने इन के कब्जे से फोर्ड ईको स्पोर्ट और एक आई-20 कार भी बरामद की. साथ ही रामअवतार से 50 हजार रुपए नकद भी बरामद किए.

छत्तीसगढ़ पुलिस ने अभियुक्त रामअवतार गुप्ता, दिनेश गुप्ता उर्फ गुड्डू, मानव, अमित, विनीत, दीपक को दिल्ली के न्यायालय में पेश किया. वहां से ट्रांजिट रिमांड पर पुलिस उन्हें छत्तीसगढ़ ले गई. कथा संकलन तक छत्तीसगढ़ पुलिस उन से पूछताछ कर रही थी.Mobile Tower Scam

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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