Facebook Love Crime : एकदूसरे को जाने बिना लोग फेसबुक पर दोस्ती तो कर लेते हैं, लेकिन समस्या तब और बढ़ जाती है जब आकर्षण में वशीभूत हो कर उन की दोस्ती प्यार में बदल जाती है. अनुराग सिंह भदौरिया और विवाहिता किरण गिल के साथ भी यही हुआ. दोनों लिवइन रिलेशन में रहने लगे. तभी एक दिन ऐसा हुआ कि

राजस्थान के भीलवाड़ा के रहने वाले जितेंद्र सिंह भदौरिया का एकलौता बेटा अनुराग सिंह भदौरिया पढ़लिख कर निठल्ला घूमा करता था. कोई कामधाम न होने के कारण दिन भर मोबाइल फोन लिए उसी में टाइम पास किया करता था. कभी दोस्तों से बातें करता तो कभी सोशल मीडिया के दोस्तों से चैटिंग करता.

फेसबुक पर उस की ज्यादातर दोस्त महिलाएं ही थीं. फेसबुक दोस्ती का एक ऐसा प्लेटफार्म है, जहां बिना जानपहचान के भी दोस्ती हो जाती है. इस में घर वालों को भी नहीं बताना पड़ता कि उस का कौन दोस्त क्या करता है और कैसा है? खालीखोटे बैठे लोग दिन भर फेसबुक के दोस्तों की फोटो लाइक किया करते हैं, उन के फोटो पर कमेंट करते हैं और मैसेज भेजते हैं.

अनुराग भी ऐसे ही था. फेसबुक पर सुंदर लड़की की फोटो वाली प्रोफाइल पर वह फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजता और उधर से रिक्वेस्ट कंफर्म हो जाती तो उस से मैसेज भेज कर बातें करने की कोशिश करता. ऐसे में ही एक दिन उस ने किरण गिल नाम की एक महिला को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी. किरण ने उस की रिक्वेस्ट कंफर्म कर दी तो वह उस की फोटो पर बड़े ही रोमांटिक कमेंट करने लगा.

किरण गिल नाम की वह महिला फेसबुक पर बड़े ही बोल्ड फोटो डालती थी. अनुराग को उस के वे फोटो बहुत रोमांचित करते थे. जिस से वह उस के एक फोटो पर कईकई कमेंट करता था. कुछ दिन तक किरण ने उस के कमेंट सिर्फ लाइक किए, पर कुछ दिनों बाद वह जवाब भी उसी की भाषा में देने लगी. तब अनुराग ने उस के इनबौक्स में मैसेज भेजने शुरू किए तो किरण उस के मैसेज के जवाब भी देने लगी. इस तरह दोनों में चैटिंग शुरू हो गई. चैटिंग के जरिए ही दोनों एकदूसरे को अच्छी तरह जानपहचान गए.

किरण गिल उर्फ रवींद्र कौर भी इत्तफाक से भीलवाड़ा की ही रहने वाली थी. उस का घर अनुराग के घर से ज्यादा दूर नहीं था. वह शादीशुदा थी. लेकिन अभी कोई बच्चा नहीं था. किरण और अनुराग की उम्र में मात्र 2 साल का अंतर था. किरण अनुराग से मात्र 2 साल बड़ी थी. चैटिंग करतेकरते दोनों ने एकदूसरे को अपनेअपने नंबर शेयर कर दिए तो उन की फोन पर बातें भी होने लगीं. किरण शादीशुदा जरूर थी, लेकिन शायद वह अपने पति से खुश नहीं थी या फिर दिलफेंक महिला थी.

बातें करतेकरते ही दोनों में प्यार हो गया और वे घर के बाहर मिलने लगे. अनुराग कुंवारा था, किरण को प्रेमिका के रूप में पा कर उस की तो मानो लौटरी लग गई थी. पर किरण गिल शादीशुदा थी. उस का पति एक शरीफ और घरपरिवार वाला आदमी था. जब उसे पत्नी के प्रेमसंबंधों के बारे में पता चला तो पहले उस ने किरण को समझाया. पर जिस महिला के कदम एक बार देहरी लांघ जाएं, वह जल्दी कहां मानती है. किरण भी नहीं मानी. पति के मना करने के बावजूद जब किरण ने अनुराग से उस ने मिलनाजुलना बंद नहीं किया तो उस के पति ने उसे मायके भेज दिया.

मायके आ कर किरण पूरी तरह आजाद हो गई. अब तक वह अनुराग के प्यार में इस कदर डूब चुकी थी कि उसे न भविष्य की चिंता थी और न मांबाप की इज्जत की. एक ओर उस ने जहां पति से तलाक के लिए मुकदमा कर दिया था, वहीं दूसरी ओर अनुराग से भी साफ शब्दों में कह दिया था कि अगर उसे उस से विवाह करना है तो वह कामधाम करे. इस तरह निठल्ले बैठे रहने से न जिंदगी चलती है और न गृहस्थी. गृहस्थी चलाने के लिए पैसे चाहिए, जिस के लिए उसे काम करना होगा. इस के अलावा वह उस से तभी विवाह करेगी, जब वह अपने परिवार से अलग उसे ले कर अकेला रहेगा.

अनुराग किरण के प्यार में आकंठ डूबा था, इसलिए उस की हर बात मानने को तैयार था. उस के पापा जितेंद्र सिंह भदौरिया अहमदाबाद के थाना नरोड़ा के अंतर्गत आने वाले कृष्णानगर इलाके में रह कर किसी फैक्ट्री में नौकरी करते थे. अनुराग भी पापा के पास अहमदाबाद चला गया. उन्होंने उस की भी नौकरी किसी फैक्ट्री में लगवा दी. अब वह कमाने लगा था.

यह बात जैसे ही अनुराग ने किरण को बताई, वह अनुराग के पास अहमदाबाद पहुंच गई. उस ने पहले ही अनुराग से कह दिया था कि अगर उसे उस के साथ रहना है तो वह उसे ले कर परिवार से अलग अकेला रहेगा. इसलिए किरण के आने पर अनुराग उसे ले कर पापा से अलग रहने लगा था. उस ने रहने के लिए कृष्णानगर में ही किराए का मकान ले लिया था. इस तरह किरण और अनुराग बिना विवाह के ही पतिपत्नी की तरह लिवइन में रहने लगे थे.

अनुराग सुबह अपनी नौकरी पर जाता तो रात 8 बजे के बाद ही घर आता था, क्योंकि उस की 12 घंटे की ड्यूटी थी. इस बीच किरण घर में अकेली ही रहती थी. इसलिए अपना समय काटने के लिए वह मोबाइल में लगी रहती. पहले वह अनुराग से चैटिंग कर के समय बिताती थी तो अब किसी दूसरे से चैटिंग करने लगी थी. कुछ दिनों तक तो अनुराग और किरण के बीच सब कुछ अच्छा चला, पर बाद में दोनों के बीच लड़ाईझगड़ा होने लगा. यह लड़ाईझगड़ा भी शक की वजह से होता था. अनुराग को शक था कि किरण का किसी अन्य से उस के जैसा संबंध है. इस की वजह यह थी कि किरण उस से फेसबुक के जरिए मिली थी. किरण जब देखो, तब मोबाइल में ही लगी रहती थी, इसीलिए अनुराग को शक था कि वह किसी अन्य से उसी जैसा चैटिंग करती है.

28 मार्च, 2020 को किरण किसी से चैटिंग कर रही थी. उन दिनों कोरोना की वजह से लौकडाउन लगा था, इसलिए अनुराग घर पर ही था. उस ने पूछा, किरण, तुम किसे मैसेज कर रही हो? तुम्हें क्या करना है. मैं किसी को भी मैसेज करूं. किरण ने कहा. ‘अरे ऐसा कैसे हो सकता है. तुम मेरी पत्नी हो. इसलिए यह जानना मेरा हक है. अनुराग ने कहा. तुम ने मुझ से विवाह किया है क्या, जो मैं तुम्हारी पत्नी हो गई. हम रहते तो पतिपत्नी की ही तरह हैं. तुम्हारी सारी जिम्मेदारी मैं उठाता हूं, इसलिए तुम पर मेरा हक तो है ही. अनुराग ने कहा.

मैं अपनी मरजी की मालकिन हूं, इसलिए मेरा जो मन होगा, मैं वही करूंगी. इस तरह किरण ने साफ कह दिया कि वह स्वतंत्र है. उस का जो मन होगा, वह वही करेगी, लेकिन यह बात अनुराग को पसंद नहीं थी. इसलिए वह मैसेज देखने के लिए किरण का मोबाइल मांगने लगा. लेकिन किरण ने मोबाइल देने से साफ मना कर दिया.

मोबाइल की इसी छीनाझपटी में अनुराग ने किरण का गला पकड़ लिया. अनुराग को मोबाइल तो मिल गया, पर मोबाइल छीनने में उस के हाथों का दबाव बढ़ गया, जिस से किरण का गला एक ओर लुढ़क गया. अनुराग ने उस का गला सीधा किया तो पता चला कि वह तो मर चुकी है. उन दिनों लौकडाउन लगा हुआ था. इसलिए लाश को बाहर नहीं ले जाया जा सकता था. घर में भी रखने पर लाश सडऩे लगती तो उस की बदबू से आसपास वालों को पता चल जाता. कोई रास्ता न देख अनुराग ने लाश को घर के अंदर ही छोड़ कर भाग जाने का विचार किया.

उस ने लाश एक ट्रौली बैग में रखी और उस के ऊपर से ढेर सारे कपड़े रख कर बैग बंद कर दिया. बैग को घर में ही छोड़ कर घर में बाहर से ताला लगा कर वह चला गया. लौकडाउन होने के बावजूद गुजरात की सीमा पार कर के वह राजस्थान के जयपुर पहुंच गया. जयपुर में उसे पुलिस ने रोका. पुलिस उस से पूछताछ करने लगी. पुलिस ने इस पूछताछ में उसे इस तरह उलझा दिया कि उस ने घबरा कर कहा, साहब, मैं अहमदाबाद में एक हत्या कर के आ रहा हूं.

यह सुन कर जयपुर की पुलिस चौंकी. पुलिस ने अगला सवाल किया, किस की हत्या कर के आ रहे हो?  साहब, अपनी प्रेमिका की. अनुराग ने कहा. तुम ने अहमदाबाद में कहां की है हत्या? साहब, कृष्णानगर में. वहीं मैं किराए के मकान में रहता था. उसी मकान में हत्या की है और लाश उसी मकान के अंदर पड़ी है. कृष्णानगर किस थाने के अंतर्गत आता है. पुलिस ने पूछा. थाना नरोड़ा के अंतर्गत आता है. अनुराग ने कहा.

इस के बाद अनुराग से पूरी कहानी सुन कर जयपुर पुलिस ने अहमदाबाद के थाना नरोड़ा पुलिस को फोन कर के पूरी बात बताई. नरोड़ा पुलिस जयपुर पुलिस से अनुराग के घर का पता ले कर वहां पहुंची तो घर में बाहर से ताला लगा था. आसपड़ोस में पूछताछ कर पुलिस ने प्रौपर्टी डीलर से संपर्क किया और मकान मालिक को बुलवाया.

इस के बाद एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रैट की उपस्थिति में मकान का ताला तोड़ा गया. पुलिस ने मकान की तलाशी ली तो एक ट्रौली बैग में महिला की लाश मिली. इस से साफ हो गया था कि अनुराग ने जयपुर पुलिस को जो बताया था, वह सच था. पुलिस ने घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था.

हत्यारा पकड़ा ही जा चुका था. नरोड़ा पुलिस जयपुर गई और अनुराग को हिरासत में ले कर अहमदाबाद ले आई. पूछताछ के बाद उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया था.

कोरोना काल के दौरान तमाम कैदियों को पैरोल पर छोड़ा जा रहा था. इस में अनुराग भदौरिया का भी नंबर लग गया था. अनुराग को साल 2021 में पैरोल पर छोड़ा गया था. नियम के अनुसार 15 दिनों बाद उसे जेल वापस आ जाना चाहिए था. पर वह वापस नहीं आया.

इस के बाद उस का कुछ पता भी नहीं चला. उस के बारे में पता करने के लिए थाना नरोड़ा पुलिस भीलवाड़ा स्थित उस के घर भी गई, पर घर वालों ने साफ कह दिया कि अनुराग उन के संपर्क में नहीं है. ऐसा एक बार नहीं, कई बार हुआ. पुलिस जब भी उस की तलाश में उस के घर जाती, घर वालों का यही जवाब होता. हत्या के पहले अनुराग जिस मोबाइल नंबर का उपयोग करता था, वह स्विच्ड औफ हो चुका था. इसलिए टैक्निकल तरीके से भी उस की लोकेशन का पता नहीं लगाया जा सकता था. पुलिस के पास उस का कोई फोटो भी नहीं था.

जब लंबे समय तक अनुराग नहीं पकड़ा जा सका तो अदालत ने अहमदाबाद के डीसीपी जोन को वारंट इश्यू कर दिया. डीसीपी ने इस मामले को गंभीरता से लिया और अनुराग को पकडऩे की जिम्मेदारी अहमदाबाद की एलसीबी (लोकल क्राइम ब्रांच) को सौंप दी. अहमदाबाद की लोकल क्राइम ब्रांच को अनुराग के पकडऩे की जिम्मेदारी इसी साल के जनवरी महीने के अंतिम सप्ताह में सौंपी गई थी. क्राइम ब्रांच ने यह जिम्मेदारी तेजतर्रार इंसपेक्टर डी.डी. रहेवर को सौंपी.

डी.डी. रहेवर ने अनुराग को पकडऩे के लिए अपनी एक टीम बनाई, जिस में एएसआई रवींद्र कुमार, हैडकांस्टेबल विशाल कुमार, अरविंद सिंह, प्रद्युम्न सिंह, कांस्टेबल कुलदीप सिंह और मिसाल कुमार को शामिल किया था.

Facebook Love Crime

डी.डी. रहेवर अपनी टीम के साथ अनुराग की तलाश में सब से पहले भीलवाड़ा स्थित उस के घर गए. उस समय वह अपने साथ केवल 3 लोगों को साधारण कपड़ों में ले कर गए थे. अनुराग भीलवाड़ा में पटेलनगर सोसायटी में रहता था.

पुलिस टीम ने अपनी गाड़ी उस के घर से काफी दूर खड़ी कर दी थी, जिस से किसी को शक न हो कि वे लोग पुलिस वाले हैं. पुलिस टीम को पता था कि घर में अनुराग के पेरेंट्स और बहन रहती हैं. पुलिस टीम के बाकी लोग गली में बिखर गए, जबकि केवल इंसपेक्टर रहेवर अनुराग के घर पहुंचे.

थोड़ी देर बाद वहां एक आदमी ऐक्टिवा से आया. डी.डी. रहेवर और उन के साथियों को देख कर उसे लगा कि ये लोग पुलिस वाले हैं, इसलिए वह ऐक्टिवा को यूटर्न ले कर जाने लगा. क्राइम ब्रांच की इस टीम ने कभी अनुराग को देखा तो था नहीं, इसलिए उन्हें पता नहीं चला कि यह ऐक्टिवा वाला कौन है? फिर भी कांस्टेबल कुलदीप सिंह ने ऐक्टिवा वाले को पकड़ लिया.

जब उस आदमी से पूछा गया कि अनुराग कहां है और वह उस का क्या लगता है तो उस आदमी ने कहा, अनुराग मेरा नहीं, दूसरे का बेटा है. इस के बाद अनुराग के घर की ओर इशारा कर के उस ने कहा, अंदर वह जो मालकिन बैठी हैं, अनुराग उन का बेटा है.

इस के बाद डी.डी. रहेवर ने अनुराग की मम्मी और बहन से अलगअलग पूछताछ शुरू की. जब इंसपेक्टर रहेवर ने अनुराग की बहन से अनुराग के बारे में पूछा तो उस ने कहा, साहब, अनुराग मेरा सगा भाई है. लेकिन जब से वह जेल गया है, तब से मेरी उस से न कभी कोई बात हुई है और न मैं उस से मिली हूं.

इस के बाद जब डी.डी. रहेवर ने ऐक्टिवा वाले आदमी के बारे में पूछा तो अनुराग की बहन ने कहा, यह मेरे पापा हैं. इन का नाम जितेंद्र सिंह भदौरिया है. इस के बाद डी.डी. रहेवर ने जितेंद्र सिंह से पूछा, जब अनुराग तुम्हारा बेटा है तो तुम ने झूठ क्यों बोला कि वह तुम्हारा नहीं, किसी और का बेटा है?

साहब, पुलिस हम सब को परेशान करती है. जबकि हमें अनुराग के बारे में कुछ पता नहीं है. डर की वजह से मैं ने झूठ बोला था साहब. हाथ जोड़ कर जितेंद्र सिंह ने कहा. रहेवर को लग रहा था कि इन लोगों से पूछताछ में अनुराग के बारे में कुछ न कुछ जानकारी जरूर मिल जाएगी. उस के बाद अनुराग उन के हाथ लग जाएगा. पर उन की यह धारणा गलत साबित हुई.

उन्होंने सभी से अलगअलग खूब घुमाफिरा कर पूछा, लेकिन वे सभी एक ही बात की रट लगाए रहे कि जेल से छूटने के बाद अनुराग ने उन लोगों से संपर्क नहीं किया है. इसलिए उन्हें पता नहीं है कि अनुराग कहां है. जब उन लोगों से अनुराग के बारे में कुछ पता नहीं चला तो डी.डी. रहेवर ने अनुराग के घर वालों के मोबाइल फोन चैक करने शुरू किए कि शायद कोई ऐसा नंबर मिल जाए, जिस से अनुराग तक पहुंचा जा सके.

उन फोनों में अनुराग का तो कोई नंबर नहीं मिला, पर अनुराग के पिता जितेंद्र सिंह के बटन वाले मोबाइल में एक मैसेज था, जिस में अनुराग के सेविंग एकाउंट से करंट एकाउंट में बदले जाने की बात थी. मैसेज को देख कर रहेवर के मन में थोड़ी उम्मीद जागी कि यह मैसेज उन्हें अनुराग तक ले जाने में मदद करेगा. इस के बाद डी.डी. रहेवर ने अनुराग के घर वालों से उस का एक फोटो लिया और अहमदाबाद वापस आ गए.

अहमदाबाद आने के बाद डी.डी. रहेवर ने सोशल मीडिया पर अनुराग के बारे में बहुत गहराई से सर्च किया. इस के अलावा अनुराग के पापा के मोबाइल में आए बैंक के मैसेज से उन्हें पता चला कि अनुराग राजस्थान के प्रसिद्ध तीर्थस्थल खाटू श्याम मंदिर के आसपास कहीं रह रहा है. यह पता चलते ही वह अपनी टीम के साथ खाटू श्याम पहुंच गए. यह इसी अप्रैल महीने के पहले सप्ताह की बात है.

खाटू श्याम मंदिर में रोजाना 50 हजार से एक लाख के बीच लोग दर्शन के लिए आते हैं. इतने लोगों के बीच किसी एक आदमी को तलाशना आसान काम नहीं था. वह भी जिस की एक ढंग की फोटो भी पास में न हो. इसी से इस पुलिस टीम को लग रहा था कि उन की आगे की राह काफी मुश्किल भरी है. पुलिस को यह पता था कि अनुराग के हाथ पर टैटू है. इसलिए खाटू श्याम मंदिर में अनुराग की तलाश के दौरान पुलिस को जिस पर भी शक होता, पुलिस किसी न किसी बहाने से उस का हाथ देख लेती थी.

पुलिस अनुराग की तलाश में कभी दर्शनार्थी बन रही थी तो कभी पुजारी. टीम के आधे लोग कमरे पर आराम करते तो आधे लोग अनुराग की तलाश में मंदिर के आसपास भटकते रहते थे. जब वे थक जाते तो आराम करने कमरे पर आ जाते और आराम कर रहे लोग अनुराग की तलाश में लग जाते.

पुलिस सुबह मंदिर पहुंच जाती थी तो रात को जब 9, साढ़े 9 बजे मंदिर बंद हो जाता था, तभी लौट कर ती  थी. 2 दिन में पुलिस की इस टीम ने मंदिर के आसपास दुकान लगाने वाले तथा फेरी वालों के बारे में पता कर लिया था. इन में कहीं उन्हें अनुराग नजर नहीं आया था और न उस के बारे में कोई जानकारी मिली थी. इस के बाद डी.डी. रहेवर का ध्यान मंदिर के आसपास बने होटलों पर गया. वहां लोग अपने घरों में भी दर्शनार्थियों को ठहराते थे.

मंदिर से 800 मीटर की दूरी में तमाम होटल थे. अब वह होटलों और ढाबों पर अनुराग के बारे में पता करने लगे. तभी उन की नजर एक लोअर लेवल के होटल के बोर्ड पर पड़ी. श्याम दरबार नाम के उस होटल के बोर्ड पर एक कोने में छोटे अक्षरों में अनुराग नाम लिखा था. अनुराग नाम देख कर डी.डी. रहेवर की आंखों में चमक आ गई. उन्हें उम्मीद भी जागी कि अब अनुराग पकड़ा जाएगा. साधारण कपड़ों में आए अपने साथियों को उन्होंने इशारे से एलर्ट कर दिया.

इस के बाद श्याम दरबार नाम के उस होटल के बाहर बैठे एक आदमी से डी.डी. रहेवर ने पूछा, अनुराग कहां मिलेगा? उस आदमी ने अंदर की ओर इशारा कर के कहा, वह बीच में बैठा है. डी.डी. रहेवर अपने साथियों के साथ होटल में घुस गए. होटल के अंदर तमाम लोग थे. तब डी.डी. रहेवर के एक साथी पुलिसकर्मी ने जोर से पुकारा, अनुराग. जी, बोलिए क्या काम है? साधारण कपड़ों में आए उस सिपाही की ओर देख कर अनुराग ने कहा.

अनुराग के इतना कहते ही इंसपेक्टर डी.डी. रहेवर की टीम ने अनुराग को दबोच लिया. पुलिस ने उसे पकड़ कर सब से पहले उस का हाथ चैक किया. उस के हाथ पर टैटू था. इस से स्पष्ट हो गया कि वह अनुराग ही है. पुलिस ने जब अनुराग को पकड़ा था तो उसने सवाल किया, आप लोग कौन हैं और मुझे इस तरह क्यों पकड़ रहे हैं? हम गुजरात पुलिस हैं. डी.डी. रहेवर ने कहा.

उन के इतना कहते ही अनुराग ढीला पड़ गया था. इस के बाद पुलिस टीम अनुराग को ले कर अहमदाबाद के लिए चल पड़ी. रास्ते में उस ने डी.डी. रहेवर से कहा, साहब, आज सुबह से ही न जाने क्यों मुझे लग रहा था कि आज मेरे साथ कुछ गलत होने वाला है. मैं ने अपनी गर्लफ्रेंड से भी कहा था कि आज मुझे पुलिस पकड़ लेगी.

अनुराग की यह बात सुन कर सभी पुलिस वाले हैरान रह गए थे. पुलिस ने जब अनुराग को पकड़ा था तो वह काफी हद तक बदल गया था. पुलिस के पास उस की जो फोटो थी, उस में वह दुबलापतला युवक था. जेल से भागने के बाद उस की कदकाठी काफी हद तक बदल गई. अगर होटल के बाहर बोर्ड पर अनुराग नाम न लिखा होता और बाहर पूछा न होता तो शायद पुलिस वाले उसे ऐसे देख कर पहचान न पाते.

इस तरह 2 दिनों में ही इंसपेक्टर डी.डी. रहेवर की टीम ने सालों से फरार चल रहे अनुराग को पकड़ लिया था. पूछताछ में अनुराग ने पुलिस को बताया था कि अहमदाबाद की जेल से पैरोल पर बाहर आने के बाद सीधे वह जयपुर चला गया था, जहां वह होटलों के लिए कमीशन पर ग्राहक लाने का काम करने लगा था. इधर 5 महीने पहले वह खाटू श्याम मंदिर आ कर किराए पर होटल ले कर चला रहा था.

अहमदाबाद की लोकल क्राइम ब्रांच ने अनुराग को अहमदाबाद ला कर थाना नरोड़ा पुलिस के हवाले कर दिया था. थाना पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर जेल भेज दिया था. Facebook Love Crime

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...