Haryana Financial Crime. गरीब परिवार के सुखविंदर को नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट में नौकरी मिली तो अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए वह निक्रा प्रोजैक्ट की रकम से एक करोड़ से अधिक का घोटाला कर बैठा. इस से वह खुद तो जेल गया ही, उस की प्रेमिका और उस के 2 साथी भी जेल गए…
सपनों की कोई सरहद नहीं होती, वह हर बंदिशों से आजाद होता है. कोई भी आदमी उठतेबैठते, सोतेजागते बड़ेबड़े सपनों के साथ जी रहा हो तो उस की जिंदगी का अंदाज ही बदल जाता है. सुखविंदर के साथ भी कुछ ऐसा ही था. वह अपने अंदाज में शाही जिंदगी जी रहा था.
उस के चेहरे पर हर वक्त आकर्षक मुसकान तैरती रहती थी. उस के ठाटबाट देखने लायक होते थे. वह महंगे और ब्रांडेड कपड़े पहनता था, कार से औफिस आताजाता था. उस के पास सब कुछ था, शायद इसीलिए उस की बातें आसमान को छूने वाली होती थीं, जिस से साफ जाहिर होता था कि उस के दिल में महत्वाकांक्षाओं का सागर हिलोरे मार रहा है. वह गर्व से कहता था कि एक दिन अपना हर सपना पूरा करेगा.
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समाज का मनोविज्ञान है कि इस तरह के लोगों पर सभी का ध्यान जाता है. सुखविंदर पर भी जानने वालों की नजरें जम गई थीं. वह हरियाणा के करनाल शहर स्थित राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) में नौकरी करता था. एनडीआरआई की अपनी यूनिवर्सिटी भी है.
यह संस्थान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अधीन आता है. वह नेशनल इनोवेशन औन क्लासमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर (निक्रा) प्रोजैक्ट में सीनियर रिसर्च एसोसिएट था. केंद्र सरकार का यह प्रोजैक्ट सन 2011 में शुरू हुआ था, जिस के इंचार्ज सीनियर वैज्ञानिक डा. सोहनवीर थे.
उन्हीं के निर्देशन में सुखवीर एकाउंट विभाग का काम देखता था. उस के काम से किसी को रत्ती भर शिकायत नहीं थी. सन 2011 में नौकरी लगने के बाद धीरेधीरे उस की आर्थिक स्थिति सुधरने लगी थी. लेकिन सन 2015 में तो जैसे उस के हाथ कोई कुबेर का खजाना लग गया था.
उस के पास चमचमाती कार थी, बदन पर महंगे ब्रांडेड कपड़े और कलाई पर महंगी घड़ी होती थी. यह सब देख कर उस के साथी कई बार कहते भी थे कि सुखबिंदर तुम्हें तो अधिकारी होना चाहिए था. इस की वजह भी थी, उसे देख कर उस के अधिकारी हैरान थे, क्योंकि उस से अच्छी नौकरी और ज्यादा वेतन मिलने के बावजूद उन का अंदाज सुखविंदर की तरह रईसाना नहीं था.
लेकिन उस में खूबियां भी थीं, वह हंसमुख स्वभाव का था और अपना काम समय पर करता था. यही वजह थी कि वह अधिकारियों का प्रिय और विश्वासपात्र था. उस के इसी स्वभाव की वजह से उसे संस्थान का हर छोटाबड़ा कर्मचारी जानता था.
लेकिन यह भी सच है कि उम्र और पद में मिली अचानक बड़ी सफलताओं के पीछे बहुत से राज वक्त रहते पता नहीं चलते. सुखविंदर के साथ भी शायद ऐसा ही था. वह संस्थान परिसर में ही बने आवास में रहता था. अपनी इस सफलता पर वह खुद ही नहीं, उस की खूबसूरत प्रेमिका मनप्रीत कौर भी बेहद खुश रहती थी. वह पंजाब के नवाशहर के रटींडा की रहने वाली थी. वह यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रही थी और हौस्टल में रहती थी.
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उस के मामापिता, दोनों ही अध्यापक थे. वह भी निक्रा प्रोजैक्ट से जुड़ी थी. रिसर्च के लिए आनेजाने में उस की मुलाकात सुखविंदर से हो गई थी. पहले दोनों में दोस्ती हुई, बाद में यही दोस्ती प्यार में बदल गई. बातों और मुलाकातों के दरमियान दोनों का प्यार वक्त के साथ परवान चढ़ता गया.
उन के प्यार के वृक्ष पर कसमों और वादों के फूल भी खिलते रहे. सुखविंदर के जिंदगी जीने के अंदाज से मनप्रीत भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी थी. उस के संपर्क में आने के बाद उस के भी ख्वाबों को पंख लग गए थे. वह उस पर जम कर पैसे लुटा रहा था.
अकसर वह मनप्रीत को तोहफे देता रहता था. वह खुश होती थी कि उस का प्रेमी पैसे वाला है. दरअसल सुखविंदर की दिल खोल कर खर्च करने की आदत थी. कभीकभी मनप्रीत उसे टोकती भी, ‘‘तुम्हें मेरे ऊपर इतना खर्च नहीं करना चाहिए.’’ ‘‘क्यों, इस से तुम्हें खुशी नहीं मिलती?’’
‘‘खुशी तो मिलती है, लेकिन…’’ वह अपनी बात पूरी कर पाती, उस से पहले ही सुखविंदर कहता, ‘‘तो फिर शिकायत करने की क्या जरूरत है? तुम्हारे लिए यह सब कर के बड़ी खुशी मिलती है, क्योंकि मेरे लिए तुम्हारी खुशी से बढ़ कर और कुछ नहीं है.’’ कुछ पल रुक कर उस ने आगे कहा, ‘‘एक बात और…’’
‘‘क्या?’’ ‘‘मैं तुम्हारे साथ अपनी दुनिया बसाना चाहता हूं.’’ ‘‘चाहती तो मैं भी हूं, लेकिन मुझे डर लगता है कि अगर मेरे घर वाले नहीं मानेंगे तो क्या होगा?’’
‘‘उन्हें मनाना तुम्हारा काम है मनप्रीत. हर हालत में तुम्हें मेरी होना है. मेरे जो भी सपने थे, मैं ने पूरे किए हैं, तुम भी मेरा सपना हो, इसलिए इसे भी पूरा करना है. मैं तुम्हें दिल और दौलत, दोनों से हर खुशी दूंगा. एक दिन आएगा जब मैं तुम्हारे लिए नोटों की सेज बिछा दूंगा.’’
सुखविंदर की इन बातों से न केवल मनप्रीत को गुदगुदी होती थी, बल्कि उस के दिल में सुखविंदर के लिए प्यार और भी गहरा हो जाता था. उस के अमीर होने के पीछे की कहानी के पन्नों को समय के साथ मनप्रीत ने पढ़ लिया था. उसे हैरानी तो बहुत हुई थी, लेकिन चूंकि सुखविंदर उस का प्यार था और उस के सभी अरमान पूरे कर सकता था, इसलिए वह खुश थी.
दोनों के लिए दूरियां बर्दाश्त से बाहर होने लगीं तो सन 2016 में उन्होंने विवाह करने का फैसला किया. मनप्रीत के घर वाले इस विवाह के लिए राजी नहीं थे. अगर प्यार गहरा हो तो उस का रंग रुकावटों में भी फीका नहीं होता. मनप्रीत के साथ भी ऐसा ही हुआ. उस ने सुखविंदर का साथ छोड़ने से साफ इंकार कर दिया.
प्यार ने उसे बगावती बना दिया. दोनों हर हाल में शादी करना चाहते थे. सुखविंदर उस के हर अरमान पूरा करना चाहता था. शादी के लिए उन्होंने जम कर शौपिंग की. उस ने मनप्रीत के लिए ब्रांडेड आभूषण खरीदे, डायमंड जडि़त महंगा नैकलेस दिलाया तो वह गदगद हो गई. इन आभूषणों की कीमत 25 लाख रुपए से ज्यादा थी.
इस के बाद दोनों ने विवाह कर लिया. इस विवाह में सुखविंदर ने 10 लाख रुपए खर्च किए. विवाह के बाद दोनों ने पर्यटकस्थलों पर जा कर हनीमून मनाया. उन्हें जिंदगी किसी जन्नत से कम नहीं लग रही थी. सुखविंदर की बदौलत मनप्रीत वाकई नोटों में खेल रही थी, क्योंकि घर खर्च के लिए हमेशा घर में 4-5 लाख रुपए रखे रहते थे.
इस के अलावा बैंक खातों में मोटी रकम जमा थी. यह सब उन की खुशियों को और बढ़ा रही थी. लेकिन यह कोई नहीं जानता था कि उन की ये खुशियां चंद दिनों की मेहमान हैं. खुशियों के आगोश में सिमटी जिंदगी अपनी रफ्तार से चल रही थी कि तभी कुछ ऐसा हुआ कि उन की खुशियां तो काफूर हुई हीं, वे जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गए.
दरअसल, फरवरी, 2016 के अंतिम सप्ताह में एकाउंट विभाग में औडिट के दौरान सुगबुगाहट शुरू हुई कि निक्रा प्रोजैक्ट की सरकारी रकम में घपला हुआ है. इस की जांच के लिए कमेटी गठित कर दी गई. संस्था की विजिलैंस अधिकारी डा. स्मिता सिरोही ने जांचपड़ताल के बाद मोहर भी लगा दी कि घपला हुआ है. इस के बाद संस्थान में हड़कंप मच गया. क्योंकि एक करोड़ से अधिक के इस घोटाले का मास्टरमाइंड कोई और नहीं, सुखविंदर था.
उस ने अपनी प्रेमिका और संस्थान के 2 अन्य कर्मचारियों को अपने साथ मिला लिया था. हकीकत से पर्दा उठा तो सभी को उस के ठाठबाट की असलियत का पता चल गया. घोटाले में जिन के नाम सामने आए थे, वे फरार हो गए थे. संस्थान के डायरेक्टर डा. ए.के. श्रीवास्तव ने तत्काल प्रभाव से आरोपी कर्मचारियों को निलंबित कर बर्खाश्त कर दिया और मनप्रीत कौर का रजिस्ट्रेशन कैंसिल कर के उस की पीएचडी को भी रद्द कर दिया गया.
मामला बेहद गंभीर था. डा. स्मिता सिरोही ने सिविल लाइन थाने में 8 मार्च, 2016 को 5 लोगों के खिलाफ तहरीर दी तो थानाप्रभारी प्रतीक ने इस मामले को सुखविंदर, उस के भाई विक्रम, प्रेमिका मनप्रीत कौर, कर्मचारी अमरेंद्र श्रीवास्तव और दीपक कुमार के खिलाफ धारा- 420, 409, 467, 468, 471 व 120बी के तहत नामजद मुकदमा दर्ज कर लिया.
मामला बड़ा था. एसपी पंकज नैन को इस घटना की खबर मिली तो उन्होंने जल्द से जल्द आरोपियों को गिरफ्तार करने का आदेश दिया. मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने इस की जांच सीआईए टीम को सौंप दी. टीम के प्रभारी इसंपेक्टर दीपक कुमार के निर्देशन में एएसआई सुरेंद्र को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया.
घोटालेबाजों की तलाश के लिए अविलंब एक पुलिस टीम गठित कर दी गई, जिस में दीपक कुमार के अलावा एएसआई सुरेंद्र सिंह, बलजीत, चंद्रशेखर, हैडकांस्टेबल रजनीश और कांस्टेबल अंकित आदि को शामिल किया गया. पुलिस ने जांच शुरू की तो ऐसे तमाम सबूत मिल गए, जिस से साफ पता चल रहा था कि आरोपियों के खातों में लाखों रुपए ट्रांसफर हुए हैं.
पुलिस ने आरोपियों की तलाश में संभावित ठिकानों पर छापे मारने शुरू किए. 12 अप्रैल, 2016 को पुलिस टीम ने गुप्त सूचना के आधार पर मास्टरमाइंड सुखविंदर को काछवा रोड से गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने सहज ही अपना अपराध स्वीकार कर लिया. एसपी पंकज नैन ने पुलिस टीम को निर्देश दिए कि वह आरोपी से सख्त पूछताछ कर के सरकारी रकम बरामद करने को प्राथमिकता दें.
पुलिस उसे साथ ले कर उस के आवास पर गई तो वहां से 41 लाख रुपए नकद मिले. इसी के साथ प्रेमिका मनप्रीत के 30 लाख रुपए के गहने मिले. ये सभी गहने ब्रांडेड थे, जो एक नामी ज्वैलर्स के यहां से 133 किलोमीटर दूर दिल्ली जा कर खरीदे गए थे. उस के बैंक खाते से भी 7 लाख रुपए बरामद किए गए.
सुखविंदर मुख्य आरोपी था, उस से लंबी पूछताछ की जानी थी, लिहाजा पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर के उस का तीन दिनों का रिमांड हासिल कर लिया. इस के बाद उसे साथ ले कर पुलिस टीम ने मनप्रीत की तलाश में कई स्थानों पर छापे मारे, पर वह हाथ नहीं आ सकी. सुखविंदर से की गई पूछताछ में घोटाले की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.
सुखविंदर एक गरीब परिवार से था. करनाल के ही गांधीनगर के रहने वाले उस के पिता गुरमुख सिंह मजदूरी करते थे. उस का एक बड़ा भाई था विक्रम. पिता ने कठिन परिश्रम कर के दोनों को पढ़ाया. बाद में बच्चों को ट्यूशन वगैरह पढ़ा कर दोनों भाइयों ने आगे की पढ़ाई की. पढ़ाई पूरी होने के बाद विक्रम को एक कंपनी में नौकरी मिल गई.
सुखविंदर ने गरीबी को बेहद करीब से देखा था. वह महत्वाकांक्षी था. वह बड़ा आदमी बनना चाहता था. उस ने मेहनत की और सन 2011 में उसे नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट में कौंट्रैक्ट पर नौकरी मिल गई. इस से घर के सभी लोग बहुत खुश हुए.
सुखविंदर को नौकरी जरूर मिल गई थी, लेकिन वह उस से खुश नहीं था. क्योंकि वह ऐसी नौकरी चाहता था, जिस से शौर्टकट से अमीर बना जा सके. सपने बड़े हों तो आदमी इसी उधेड़बुन में लगा रहता है कि कब और कैसे वह अपने सपने पूरे करे? वह इसी जुगत में लगा रहता था. धीरेधीरे उस ने अपने पैर जमाए और अधिकारियों तथा कर्मचारियों का विश्वास जीत लिया.
2 साल पहले कृषि मंत्रालय का निक्रा प्रोजैक्ट आया. यह प्रोजैक्ट देश के कई संस्थाओं को दिया गया था, जिन में एनडीआरआई भी एक था. इस का उद्देश्य मौसम में बदलाव होने के कारण तापमान बढ़ने पर पशुओं पर पड़ने वाले असर का अध्ययन करना था. इस में केंद्र सरकार ने संस्थान के लिए मोटी रकम आवंटित की थी.
प्रोजैक्ट की सफलता के लिए संस्थान को अपने हिसाब से कर्मचारी रखने और औफिस प्रबंधन की आजादी थी. इस प्रोजैक्ट में 12 कर्मचारी रखे गए. सुखविंदर को भी इस में रखा गया. वह तेजतर्रार था और काम भी अच्छा करता था, इसलिए वैज्ञानिक डा. सोहनवीर ने उसे बहुत सी जिम्मेदारियां दे दीं. उसे चूंकि एकाउंट की अच्छी जानकारी थी, इसलिए करोड़ों के इस प्रोजैक्ट के एकाउंट की जिम्मेदारी उसी को सौंपी गई.
उस ने सभी का विश्वास जीत लिया था. उस ने इसी का फायदा उठाया. प्रत्यक्ष तौर पर इस प्रोजैक्ट का कामधाम देखने के लिए 12 कर्मचारी रखे गए थे. उन्हीं का वेतन बनाना था, लेकिन सुखविंदर ने इस में कर्मचारियों की संख्या बढ़ा कर अतिरिक्त रकम हासिल करने की योजना बना डाली.
उस ने 10 कर्मचारी बढ़ा दिए, जिस से 21 कर्मचारियों का वेतन बनने लगा. इस में 10 कर्मचारी फर्जी थे. उन के वाउचरों पर वह राइटिंग बदल कर खुद हस्ताक्षर करता था और यह रकम खुद रखता था. उस की योजना कामयाब रही. मजे की बात यह कि उस के इस फर्जीवाड़े पर किसी को जरा भी शक नहीं हुआ.
इसी अनोखे फार्मूले ने उसे अमीर बना दिया. सपनों को पंख लगे तो उस ने घर को अलविदा कहा और परिसर में ही बने आवास में रहने लगा. अपने लिए उस ने कार भी खरीदी. फर्जी तरह से आने वाले पैसे ने उस का रहनसहन, खानपान सब बदल दिया.
मनप्रीत उस की जिंदगी में आई तो उस ने उसे भी खुश किया. दौलत की चमक में अंधे सुखविंदर ने उसे अपना बनाने की ठान ली. उसी चकाचौंध में मनप्रीत भी बिना कुछ सोचेसमझे बहक गई. आने वाली रकम चूंकि लाखों में होती थी, इसलिए उस ने मनप्रीत के नाम से खाता खुलवा कर उस में भी रकम जमा करा दी.
बड़े भाई विक्रम के नाम से भी खाता खुलवा कर उस में भी लेनदेन करने लगा. उसी बीच सहकर्मी अमरेंद्र श्रीवास्तव और डिवीजनल क्लर्क दीपक को उस पर शक हुआ. उन्होंने उस का कारनामा पकड़ लिया तो उन्होंने अधिकारियों के सामने पोल खोलने की बात कही. सुखविंदर ने लाखों रुपए उन्हें दे कर उन का भी मुंह बंद कर दिया. इस के बाद वे भी वाउचरों पर हस्ताक्षर करने लगे.
इन्हीं पैसों से सुखविंदर ने चंडीगढ़ के जिरकपुर की माया कालोनी में एक महंगा फ्लैट खरीदा. गबन की इसी रकम से प्रेमिका मनप्रीत के अरमान पूरे किए. उसे महंगे गहने दिलाए और शादी एवं घूमनेफिरने पर भी खूब खर्चा किया. उसे अपनी जिंदगी जन्नत सी लग रही थी. इसी तरह धीरेधीरे उस ने सरकार को एक करोड़ 23 लाख रुपए की चपत लगा दी.
सब कुछ बढि़या चल रहा था. लेकिन जब एकाउंट का औडिट हुआ तो घोटाला पकड़ में आ गया. चर्चा चली तो गंभीरता से जांच की गई. घोटाले की तसवीर साफ होने के बाद मुकदमा दर्ज करा दिया गया. सुखविंदर के कारनामे से हर कोई हैरान था. रिमांड अवधि पूरी होने पर पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.
इंसपेक्टर दीपक कुमार की अगुवाई में पुलिस टीम अन्य आरोपियों की सुरागसी में लगी रही. पुलिस ने 17 जून को एक अन्य आरोपी दीपक पुत्र ईश्वरदयाल को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने उस की निशानदेही पर एक लाख रुपए बरामद किए. बाकी रकम वह ठिकाने लगा चुका था.
पूछताछ के बाद उसे भी अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. कथा लिखी जाने तक 2 आरोपी सलाखों के पीछे थे. अभी तक उन की जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस अन्य आरोपियों को गिरफ्तार नहीं कर सकी थी, इसलिए सरगर्मी से उन की तलाश जारी थी.
सुखविंदर ने अपने सपनों को काबू किया होता और नौकरी के बल पर आगे बढ़ने की सोची होती तो शायद यह नौबत न आती. उस के प्यार और सपनों में पड़ कर मनप्रीत का भविष्य भी चौपट हो गया. सुखविंदर के कारनामे के लालच में आ कर 2 अन्य कर्मचारी, दीपक और अमरेंद्र भी अपनी नौकरी गवां बैठे. Haryana Financial Crime
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित






