Noida Call Center Fraud. बीटेक कर चुका अभिषेक नौकरी की तलाश के दौरान ठगी का शिकार हो गया था. इस के बाद उस ने नौकरी की तलाश बंद कर दी और बेरोजगारों को ठगने की योजना बना कर अपने जैसे ही 2 और महत्त्वाकांक्षी युवकों को शामिल कर लिया. बस इस के बाद इन का शौर्टकट से करोड़पति बनने का खेल शुरू हो गया.
पु लिस हिरासत में बैठे उन 3 युवकों को देख कर यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि वे बेहद शातिर रहे होंगे. यह अलग बात थी कि उनके कारनामों से पुलिस अधिकारी भी हैरान थे. कमउम्र में ही उन्होंने जो शौर्टकट रास्ता पकड़ा था, उसे देखसुन कर पेशेवर ठग भी दांतो तले अंगुली दबा लेते. वैसे तो उन के गुनाह की परतें पूरी तरह खुल चुकी थीं, फिर भी उन्हें अपने बच निकलने की उम्मीद थी. पुलिस के चंगुल से छूटने के लिए वे बुरी तरह छटपटा रहे थे.
पकड़े गए युवकों में अभिषेक सिंह निवासी इंदिरापुरम, गाजियाबाद, अभिषेक कुमार निवासी जिला सीतामढ़ी, बिहार और शैलेंद्र निवासी कल्याणपुरम, कानपुर थे. ये तीनों बीटेक की पढ़ाई पूरी कर चुके थे. ये नौकरी दिलाने के नाम पर इंटरनेट के जरिए बेरोजगार युवकों के साथ लाखों रुपयों की ठगी कर चुके थे. इन का नेटवर्क पूरे देश में फैला था.
एक बार जो उन के जाल में फंस जाता था, उस का निकलना मुश्किल होता था. इन का धंधा शायद यूं ही चलता रहता, अगर ये उत्तर प्रदेश के जनपद मेरठ की थाना सरधना पुलिस की क्राइम ब्रांच व साइबर सेल की हिरासत में न आए होते.
पुलिस ने इन के कब्जे से भारी मात्रा में कंप्यूटर, मोबाइल, चैक, एटीएम कार्ड और कई दस्तावेज बरामद किए थे. इन के ठगी के धंधे और पुलिस की पकड़ में आने की भी चौंकाने वाली कहानी थी.
दरअसल, 2 मार्च, 2016 को मेरठ के एसएसपी दिनेशचंद्र दुबे अपने औफिस में बैठे कंप्यूटर पर ईमेल चैक कर रहे थे. तभी उन्हें एक शिकायती मेल मिला. जिस युवक ने मेल किया था, उस का नाम कार्तिकेय शर्मा था और वह बालाजी सीकर रोड, जयपुर, राजस्थान का रहने वाला था.
उस ने अपनी शिकायत में जो ब्यौरा दिया था, उस के मुताबिक उसे रोजगार की तलाश थी. इसलिए उस ने इंटरनेट पर अपना बायोडाटा डाला हुआ था. एक दिन अचानक उस के मोबाइल पर एक फोन आया. फोन करने वाले ने अपना परिचय शाइनडौटकौम कंपनी के कर्मचारी के रूप में दे कर बताया कि उसे एचडीएफसी बैंक में अच्छी सैलरी पर नौकरी दिलाई जा सकती है.
कार्तिकेय इस के लिए तैयार हो गया. यूं भी शाइनडौटकौम वेबसाइट कोई छोटा नाम नहीं था. दरअसल जो बेरोजगार युवक अपना परिचय इंटरनेट की शाइनडौटकौम साइट पर डालते हैं, उन्हें कंपनी रोजगार मुहैया कराती है. शाइनडौटकौम नौकरी दिलाने वाली देश की सब से तेजी से बढ़ती वेबसाइट है. सन 2007 में स्थापित इस साइट पर अब तक 1.3 करोड़ युवा पंजीकृत हो चुके थे. इस साइट पर 2 लाख से भी अधिक नौकरियों के अवसर थे.
कार्तिकेय इस के लिए खुशीखुशी तैयार हो गया. फोन करने वाले ने शैक्षिक प्रमाणपत्रों की प्रामाणिकता जांच के लिए उस से 16 सौ रुपए एकाउंट में डालने के लिए कहा. यह कोई बड़ी रकम भी नहीं थी. इस के लिए कार्तिकेय खुशीखुशी तैयार हो गया तो फोन करने वाले ने उसे भारतीय स्टेट बैंक का एक एकाउंट नंबर नोट करा दिया.
24 फरवरी को उस ने बताए गए खाते में रकम जमा कर दी. अगले दिन उस के पास फिर फोन आया तो उस से इंटरव्यू सिक्योरिटी के रूप में पंजाब नेशनल बैंक के एक दूसरे खाते में 5 हजार रुपए जमा करने को कहा गया. 27 फरवरी को उस ने वे रुपए भी जमा करा दिए.
कार्तिकेय ने सोचा था कि अब हर हालत में उस का काम हो जाएगा. लेकिन फोन करने वाले ने उसे बताया कि वे लोग उसे इतनी दूर से बुला कर परेशान नहीं करना चाहते, इसलिए क्यों न इंटरव्यू की औपचारिकता टेलीफोन पर ही पूरी कर ली जाए. इस के बाद उसे सीधे नियुक्ति पत्र भेज दिया जाएगा.
कार्तिकेय इस के लिए तैयार हो गया, लेकिन उस के सामने एक शर्त रख दी गई. फोन करने वाले ने कहा कि अगर वह दिल्ली या नोएडा आने से बचना चाहता है तो उसे 12 सौ रुपए जमा करने होंगे. कंपनी बारबार रुपए की मांग कर रही थी. इस से कार्तिकेय का माथा ठनका. उसे लगा कि उस के साथ धोखाधड़ी हुई है.
यही सोच कर कार्तिकेय ने न केवल इंटरव्यू देने से इनकार कर दिया, बल्कि अब तक जमा की गई रकम भी वापस करने को कहा. लेकिन फोन करने वाले शाइनडौटकौम कंपनी के तथाकथित कर्मचारी ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया. उस ने बताया कि यह कंपनी की शर्तों का हिस्सा नहीं है.
अगले कुछ दिन उस ने रकम वापस के लिए कोशिश जारी रखी, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. इस बीच उस ने शाइनडौटकौम कंपनी से इस बारे में पूछताछ की तो उसे बताया गया कि उन की कंपनी इस तरह रुपए जमा कराने का काम नहीं करती. इस से कार्तिकेय को विश्वास हो गया कि वह ठगी का शिकार हुआ है.
उस ने बैंक जा कर उन खातों के बारे में पता किया, जिन में रकम जमा की गई थी. उसे बताया गया कि उन में से स्टेट बैंक का खाता मेरठ के पौश इलाके साकेत स्थित शाखा का था. यह पता चलने के बाद उस ने शिकायत में सारी बातें लिख कर मेरठ के एसएसपी को मेल कर दी थीं.
साइबर क्राइम से जुड़ा यह मामला काफी गंभीर था. कार्तिकेय जैसे न जाने कितने युवा इस तरह की ठगी का शिकार हो रहे होंगे, यह ख्याल मन में आते ही एसएसपी दिनेशचंद्र दुबे ने एसपी (क्राइम) अजय सहदेव को तत्काल काररवाई करने के निर्देश दिए.
उन्होंने इस शिकायत को क्राइम ब्रांच व साइबर सेल को स्थानांतरित कर के जांच व काररवाई करने को कहा. साइबर सेल के प्रभारी कर्मवीर सिंह ने अपने साथी पुलिसकर्मियों विजय, उमेश और श्याम भाटी के साथ मामले की जांच शुरू कर दी.
जिस खाते के जरिए पहली बार पैसे लिए गए थे, वह बैंक दबथुआ में था और थाना सरधना क्षेत्र में आता था. इसलिए पुलिस ने इस संबंध में धारा 420, 467, 468, 471 और 66सी/66डी आईटी एक्ट के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया. जिस नंबर से फोन किए गए थे, वह नोएडा का एक मोबाइल नंबर था. लेकिन जांच से पता चला कि वह नंबर फर्जी पते पर लिया गया था. इस मामले की जांच में क्राइम ब्रांच की टीम भी संयुक्त रूप से लगी हुई थी.
स्टेट बैंक के जिस खाते में रकम जमा की गई थी, उस का नंबर-3413310867 था. साइबर टीम ने बैंक जा कर पूछताछ की. जांचपड़ताल में पता चला कि वह खाता शिव, निवासी दबथुआ के नाम पर था. खाते से रकम की निकासी एटीएम कार्ड के जरिए की जाती थी. दूसरे बैंक का खाता मनिंदर तोमर के नाम था.
10 मार्च को पुलिस ने दोनों बैंकों के खाताधारकों शिव व मनिंदर तोमर को हिरासत में ले कर पूछताछ की. उन्होंने बताया कि खाते जरूर उनके नाम थे, लेकिन वे उन में किसी प्रकार का लेनदेन नहीं करते थे. उन्होंने इन खातों के एटीएम कार्ड एक साल पहले इंजीनियरिंग कर रहे छात्र अभिषेक सिंह को दिए थे.
अभिषेक चूंकि गाजियाबाद का रहने वाला था, इसलिए उस के नाम पर कोई खाता नहीं खुल रहा था. उन की उस से जानपहचान थी, लिहाजा उन्होंने खाता खुलवा दिया था. इस के बदले अभिषेक ने उन्हें 25-25 हजार रुपए दिए थे.
उन दोनों से पुलिस को अभिषेक के घर का पता मिल गया. वह गाजियाबाद जनपद के इंदिरापुरम की शिप्रा सनसिटी सोसाइटी में रहता था. पुलिस ने उस की जांचपड़ताल की तो जानकारी मिली कि वह अपने अन्य साथियों अभिषेक कुमार व शैलेंद्र के साथ नोएडा की बिल्डिंग नंबर 242 में दयाल आईटी सौल्यूशन नाम से कालसेंटर चलाता है. उस की कंपनी बेरोजगारों को रोजगार दिलाने का वादा करती थी. जांच टीम समझ गई कि इस कंपनी की बुनियाद धोखे पर टिकी है. असल में वे लोग शाइनडौटकौम कंपनी की ख्याति की आड़ में अपना धंधा चला रहे थे.
जानकारियां एकत्र होने पर इस बारे में एसएसपी दिनेशचंद्र दुबे को अवगत कराया गया. छापे की काररवाई चूंकि दूसरे जनपद में होनी थी, इसलिए एसएसपी ने आईजी सुजीत पांडेय से बात कर के उन्हें पूरे मामले की जानकारी दे दी. इस के बाद जांच दल को छापेमारी और गिरफ्तारी के निर्देश दिए गए.
छापेमारी के लिए एसपी (क्राइम) अजय सहदेव के निर्देशन में एक पुलिस टीम का गठन कर दिया गया. इस पुलिस टीम में साइबर प्रभारी कर्मवीर सिंह, कांस्टेबल विजय, उमेश, श्याम भाटी, सरधना थानाप्रभारी सुधीर कुमार, क्राइमब्रांच प्रभारी संजीव कुमार, एसआई राजकुमार शर्मा, कांस्टेबल रकम सिंह और संजय को शामिल किया गया.
पुलिस ने 10 मार्च को नोएडा स्थित दयाल आईटी सोल्यूशन के औफिस में रेड की तो औफिस की भव्यता देख कर पुलिस भी चौंक गई. वहां 2 दर्जन से ज्यादा युवकयुवतियां काम रहे थे. उन का काम देशभर के बेरोजगारों का प्रोफाइल जमा करना था.
प्रोफाइल मिलने के बाद उस के धारक को फोन कर के नौकरी का लालच दिया जाता था. पुलिस ने उन सभी को हिरासत में ले लिया. पूछताछ में पता चला कि उस कंपनी के संचालक अभिषेक सिंह, अभिषेक कुमार और शैलेंद्र थे.
पुलिस ने छापे की काररवाई में आरोपियों के कब्जे से 28 कंप्यूटर, 26 मोबाइल, 14 चेक बुक, विभिन्न बैंकों के दर्जनों एटीएम कार्ड, 4 आईडी कार्ड, बैंकों की पासबुक, रबड़ की मुहरें, दयाल कंपनी के कागजात, सैकड़ों युवकों के बायोडाटा, अन्य दस्तावेज व 60 हजार रुपए की नकदी बरामद की.
पुलिस की यह बड़ी काररवाई थी. कंपनी में काम करते पाए गए 20 युवकयुवतियों को धारा 41 सीआरपीसी का नोटिस दे कर छोड़ दिया गया. जबकि अभिषेक व उस के दोनों साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने उन से गहराई से पूछताछ की.
दरअसल, ये तीनों युवक अतिमहत्वाकांक्षी थे और करोड़पति बनने का सपना संजोए हुए थे. अभिषेक ने मेरठ के छोटूराम इंजीनियरिंग कालेज से बीटेक किया था. इस दौरान उस ने इंटरनेट पर नौकरी की तलाश की तो उसे एक कंपनी ने नौकरी दिलाने का वादा किया. उस के पास फोन भी आया और उन्होंने उस के प्रमाण पत्रों की जांच आदि खर्चों के नाम पर उस से मोटी रकम ऐंठ ली.
अभिषेक तेजतर्रार व महत्वाकांक्षी युवक था. वह ठगी का शिकार हुआ था, लेकिन उस ने इस की शिकायत पुलिस से नहीं की, बल्कि खुद भी ऐसा ही कर के करोड़पति बन ने का मन बना लिया. उसे लगा कि देश में बेरोजगार युवकयुवतियों को ठगना सब से आसान काम है.
बेरोजगार नौकरी के सपने देखते हैं. उसे पूरा करने के लिए वे पैसे देने के लिए भी तैयार हो जाते हैं. मन ही मन उस ने फैसला कर लिया था कि वह बेरोजगारों को अपना शिकार बनाएगा.
अभिषेक के 2 दोस्त थे, अभिषेक कुमार व शैलेंद्र. वे भी बीटेक किए हुए थे और रोजगार की तलाश में थे. उस ने अपनी योजना उन्हें बताई तो वे भी इस के लिए तैयार हो गए. इस काम के लिए औफिस की जरूरत थी, लेकिन उन के पास ऐसी जगह नहीं थी, जहां औफिस बनाया जा सके.
अपनी योजना के तहत तीनों ने सन 2014 में फर्जी पतों पर कुछ मोबाइल सिम हासिल कर लिए और इंटरनेट पर बेरोजगारों की तलाश शुरू की. उन्होंने ऐसे युवकों से बात की तो वे पैसे खर्च करने को तैयार हो गए.
अभिषेक सिंह की पहचान शिव व मनिंदर तोमर से थी. उस ने आग्रह कर के उन से बैंक खाते खुलवाए और उन्हें 25-25 हजार रुपए दे कर उन के एटीएम कार्ड ले लिए. इस के बाद ये लोग बेरोजगारों से विभिन्न चार्जेज के नाम पर उन खातों में रुपए जमा कराने लगे. पैसा आने के बाद ये लोग या तो कैंडीडेट का मोबाइल सुनना बंद कर देते थे या कोई बहाना बना देते थे. जब इस से भी बात नहीं बनती थी तो सिम कार्ड को तोड़ कर फेंक दिया जाता था.
इन लोगों का ठगी का धंधा चल निकला तो पैसे भी एकत्र हो गए. इस के बाद इन्होंने धंधे को विस्तार देने के लिए दयाल आईटी सोल्यूशन के नाम से एक कंपनी बना कर नोएडा में औफिस खोल लिया और स्टाफ रख लिया. स्टाफ का काम इंटरनेट पर बेरोजगार युवकों की तलाश कर के उन्हें फोन कर के रुपए जमा कराना होता था.
अभिषेक व उस के साथी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों में दर्जनों बैंक खाते खुलवा चुके थे. उन्हें लगता था कि कभी कोई शिकायत नहीं करेगा, क्योंकि वे और पैसे की मांग करते थे. जब बेरोजगार पैसा देने से इनकार कर देते थे तो उन की पहले की रकम कंपनी की शर्त बता कर वापस नहीं की जाती थी. मोबाइल नंबरों से भी पकड़े जाने का डर नहीं होता था.
धीरेधीरे इन लोगों का काम बढ़ा तो इन्होंने स्टाफ भी बढ़ा लिया. स्टाफ को ये लोग 5 से ले कर 9 हजार रुपए तक सैलरी देते थे. शाइनडौटकौम कंपनी चूंकि बड़ा नाम थी, सो इन लोगों ने उस के ही नाम का सहारा लिया और उसी के नाम से फोन करने लगे. इस से उन्हें शिकार फंसाने में आसानी होती थी.
इतना ही नहीं, इन लोगों ने शाइनडौटकौम कंपनी के एक कर्मचारी प्रवेश कुमार को मोटी रकम का लालच दे कर बेरोजगारों का डाटा लेना भी शुरू कर दिया था. इस काम में इंजीनियरों की ठग तिगड़ी ने लाखों रुपए कमाए. इन के औफिस का खर्च ही महीने में 3 लाख रुपए के आसपास होता था.
इन लोगों ने देश के हर प्रदेश में बेरोजगारों को विभिन्न कंपनियों और बैंकों में नौकरी दिलाने का सपना दिखा कर उन्हें अपना निशाना बनाया. इन का धंधा अनवरत चलता रहता, लेकिन कार्तिकेय ने शिकायत की तो इन का भंडाफोड़ हो गया.
मेरठ पुलिस के लिए यह बड़ी सफलता थी. डीआईजी लक्ष्मी सिंह ने संयुक्त पुलिस टीम को 12 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की. अभिषेक और उस के साथियों ने कुल कितने बेरोजगारों को ठगा, इस का उन्हें खुद भी अंदाजा नहीं था.
इन तीनों ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी. चाहते तो ये लोग अच्छा कैरियर बना सकते थे, लेकिन इन की महत्वाकांक्षाओं और शौर्टकट से पैसा कमाने की फितरत ने इन के भविष्य को अंधकारमय कर दिया. पुलिस ने विस्तृत पूछताछ के बाद तीनोें आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. Noida Call Center Fraud
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित






