Uttar Pradesh Crime. घर वालों के समझाने पर आरती ने प्रेमी प्रवीण कुमार से किनारा किया तो प्रवीण ने उसे बदनाम करने की धमकी दे डाली. प्रेमी की इस धमकी से आरती ने जो कदम उठाया, आज उस का प्रेमी जेल की सजा काट रहा है.

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले की जिला अदालत में उस दिन भी रोज की तरह ही सभी अपनेअपने कामों में व्यस्त थे. वकील अपने मुवक्किलों की फाइलें लिए इधरउधर भागमभाग लगाए थे तो पेशी पर आए मुवक्किल अपनेअपने मजिस्ट्रैटों के कक्ष के बाहर बैठे अपनीअपनी पुकार का इंतजार कर रहे थे.

स्पैशल जज श्री गुरप्रीत सिंह भी अपने कक्ष में आ कर बैठ गए थे. उस दिन उन्हें एक मामले का फैसला सुनाना था. मुलजिम को वह पहले ही दोषी करार दे चुके थे. उन के कुरसी पर बैठते ही पेशकार ने मामले की फाइल उन के सामने रख दी थी. वह फाइल पलटने लगे तो पुकार हुई, मामले से जुड़े दोनों पक्षों के लोग और उन के वकील कक्ष के अंदर आ गए.

मुलजिम प्रवीण कुमार कटघरे में आ कर खड़ा हो गया. सरकारी वकील ने दोषी पाए गए मुलजिम प्रवीण कुमार को सख्त से सख्त सजा देने की मांग की तो बचाव पक्ष के वकील उसे निर्दोष होने की दलील देते हुए छोड़ देने की अपील की. इस मामले में क्या सजा सुनाई गई, यह जानने से पहले आइए यह जान लें कि मुलजिम प्रवीण कुमार कौन था, उस ने ऐसा कौन सा जुर्म किया था, जिस के लिए उसे सजा सुनाई जा रही थी.

पूरे मामले को जानने के लिए हमें 6 साल पीछे जाना होगा. रिटायर्ड फौजी महेंद्र सिंह मूलरूप से मैनपुरी के नजदीकी गांव बुरीचक सहारा के रहने वाले थे. फौज से रिटायर होने के बाद वह मैनपुरी शहर में जेल रोड पर शकुंतला अस्पताल के सामने मकान बनवा कर उसी में परिवार के साथ रहने लगे थे.

उन के परिवार में पत्नी माया के अलावा बेटी आरती और 2 बेटे अनूप तथा अवधपाल थे. बात तब की है, जब आरती एक महिला महाविद्यालय से बीए कर रही थी. महेंद्र सिंह के पड़ोस में ही देशराज सिंह परिवार के साथ रहते थे. वह भी सेना से रिटायर थे, इसलिए उन के और महेंद्र सिंह के परिवार के बीच घनिष्ठ संबंध थे.

दोनों ही परिवारों का एकदूसरे के घर बेरोकटोक आनाजाना था. उन्हीं दिनों सिंचाई विभाग का जूनियर इंजीनियर प्रवीण कुमार देशराज के घर किराए पर रहने आया. वह मेरठ के गढ़ रोड स्थित गांव समयपुर का रहने वाला था.

प्रवीण की नौकरी तो ठीकठाक थी ही, शक्लसूरत से भी वह ठीकठाक था. प्रवीण कुमार को देशराज के घर आए कुछ ही दिन हुए थे कि एक दिन उस की मुलाकात आरती से हो गई. वह रविवार का दिन था. आरती देशराज के घर उन की पत्नी के पास बैठी थी कि तभी प्रवीण ने ऊपर से आवाज लगाई, ‘‘आंटी, एक बोतल पानी चाहिए.’’

देशराज की पत्नी ने आरती से कहा, ‘‘बेटा, फ्रिज से एक बोतल निकाल कर प्रवीण को दे आ.’’

आरती ने फ्रिज से बोतल निकाली और ऊपर चली गई. ऊपर कमरे में एक हैंडसम युवक फाइलों में खोया था. आरती ने कहा, ‘‘पानी…’’ तो उस ने नजर उठा कर उस की ओर देखा. उस के बाद हड़बड़ा कर बोला, ‘‘आप… आप ने क्यों तकलीफ की?’’

‘‘पानी की बोतल लाने में कैसी तकलीफ?’’ आरती ने हंसते हुए कहा.

‘‘भई मेरे लिए तो आप का ऊपर आना ही तकलीफ लग रहा है,’’ प्रवीण ने कहा, ‘‘आइए बैठिए.’’

‘‘नहीं, मैं चलती हूं. आप अपना काम कीजिए.’’ कह कर आरती चली गई.

आरती प्रवीण को अच्छी लगी थी, इसलिए उस के जाने के बाद वह उस के बारे में सोचने ही नहीं लगा, बल्कि उस के बारे में पता भी करने लगा. बहुत जल्दी उसे पता चल गया कि आरती पड़ोस में रहती है और बीए कर रही है. आतेजाते या मकान मालकिन के साथ जब भी आरती उसे दिखाई देती, वह उसे ऐसी नजरों से देखता, जिन नजरों से हर किसी को नहीं देखा जाता.

प्रवीण भी सजीला जवान था और रहता भी ढंग से था. कुल मिला कर वह ऐसा था कि कोई भी लड़की उसे नकार नहीं सकती थी. यही वजह थी कि आरती को भी वह अच्छा लगने लगा था. आरती के मन में क्या है, यह प्रवीण को पता नहीं था.

पर जब आरती किसी न किसी बहाने देशराज के घर जा कर उस से बातें करने का मौका तलाशने लगी तो उसे उस के मन की थाह मिल ही गई. एक दिन जब आरती बहाने से उस के कमरे में पहुंची तो प्रवीण ने उसे प्यार से बैठाया ही नहीं, बल्कि आगे इसी तरह मुलाकातें होती रहें, इस के लिए कहा भी कि अगर पढ़ाई में उसे किसी तरह की मदद की जरूरत हो तो वह उस की मदद कर सकता है.

आरती को भी प्रवीण से मिलने का बहाना मिल गया था. ऐसे में ही एक दिन मौका देख कर प्रवीण ने उस का हाथ पकड़ कर प्यार का इजहार कर दिया. आरती बिना कुछ सोचेविचारे प्रवीण के प्यार में पड़ गई. तब वह यह भी भूल गई कि दोनों की जाति अलगअलग है. वह लोधी राजपूत है, जबकि प्रवीण जाटव.

आरती और प्रवीण का प्यार परवान चढ़ने लगा. दोनों चोरीछिपे मिल कर भविष्य का तानाबाना बुनने लगे.

लेकिन जब आरती देशराज के घर कुछ ज्यादा ही आनेजाने लगी तो महेंद्र सिंह को संदेह हुआ. उन्होंने जब गहराई से छानबीन की तो उन्हें पता चल गया कि आरती का पड़ोसी देशराज के घर किराए पर रह रहे जूनियर इंजीनियर प्रवीण से कुछ चक्कर चल रहा है.

उन्होंने आरती पर पाबंदी लगाने के साथ देशराज से भी कह दिया कि वह प्रवीण से कमरा खाली करा ले. देशराज के कहने पर प्रवीण ने उन का कमरा खाली कर दिया और देवपुरा रोड पर किराए पर कमरा ले कर रहने लगा. प्रेमी के दूर चले जाने से आरती परेशान रहने लगी. क्योंकि प्यार की राह पर वह काफी आगे बढ़ चुकी थी.

पाबंदी की वजह से वह प्रेमी से मिल नहीं पा रही थी. मन की व्यथा शांत करने के लिए उस ने प्रवीण को कई पत्र लिखे. उसे लगता था कि चाह कर भी वह उस से नहीं मिल सकती. वह हताश होने लगी थी. उस की हताशा उस के चेहरे पर भी नजर आने लगी थी.

घर वालों ने उसे समझायाबुझाया, इज्जत का हवाला दिया तो उसे भी लगा कि वह गलत है. ऐसे विवाह की उम्र लंबी नहीं होती. वह प्रवीण को भूलने की कोशिश कर रही थी कि तभी उसे पता चला कि प्रवीण की शादी तय हो गई है. महेंद्र सिंह और उन की पत्नी माया को लगता था कि अब सब ठीक हो गया है. वे निश्चिंत हो गए.

माया किसी काम से गांव चली गई तो उसी बीच आरती ने घर की लाइसैंसी बंदूक से गोली मार कर आत्महत्या कर ली.

यह 1 जुलाई, 2010 की बात है. महेंद्र सिंह ने तुरंत घटना की सूचना कोतवाली मैनपुरी पुलिस को दी तो थोड़ी ही देर में एसआई रामकुमार पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

निरीक्षण में उन्होंने देखा आरती सोफे पर बैठी मरी पड़ी थी. बगल में दोनाली बंदूक पड़ी थी. माथे से खून बह रहा था. उस के कंधे पर एक बैग टंगा था. साफ था, उस ने सोफे पर बैठ कर खुद को गोली मारी थी.

पुलिस ने बंदूक और बैग कब्जे में ले लिया. इस के बाद सारी औपचारिक काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

इस के बाद राम कुमार ने पूछताछ की तो महेंद्र सिंह के यहां किराए पर रह रही स्नेहलता ने बताया कि आरती के कमरे की बत्ती पूरी रात जलती रही थी. आधी रात के आसपास वह उस के कमरे में आई थी और उस का मोबाइल मांग कर ले गई थी.

5 बजे के बाद उस ने गोली चलने की आवाज सुनी तो घबरा कर अपने कमरे से बाहर आई. उसे लगा कि गोली आरती के कमरे में चली है तो उस ने महेंद्र सिंह को आवाज दी. उस के बाद महेंद्र अपने बेटों के साथ ऊपर आए और कमरे का दरवाजा खोल कर अंदर गए तो आरती सोफे पर बैठी मरी पड़ी थी. उस के माथे से खून बह रहा था.

पुलिस ने आरती के बैग से मिला सुसाइड नोट पढ़ा तो उस में उस ने आत्महत्या के लिए जूनियर इंजीनियर प्रवीण कुमार को जिम्मेदार ठहराया था. उस ने उस में उस का पता भी लिखा था, इसलिए पुलिस ने उसे तुरंत हिरासत में ले लिया.

पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर हैरानी जताते हुए प्रवीण ने कहा कि वह आरती से बहुत प्यार करता था. वह भला क्यों उसे आत्महत्या के लिए मजबूर करेगा. उस की तो मेरठ में शादी तय हो चुकी थी. 9 जुलाई को उस की शादी है.

लेकिन पुलिस ने उस की एक नहीं सुनी और उस के खिलाफ हत्या के लिए उकसाने का मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेज दिया. इस तरह शादी से एक सप्ताह पहले ही वह जेल चला गया. इस बात की जानकारी लड़की वालों को हुई तो उन्होंने शादी तोड़ दी.

आगे की जांच में पता चला कि घर वालों के समझाने पर आरती ने तय कर लिया था कि वह प्रवीण से संबंध खत्म कर लेगी और उस से कभी नहीं मिलेगी. यह बात उस ने प्रवीण से कह भी दी थी. लेकिन शादी तय होने के बावजूद वह उसे छोड़ने को तैयार नहीं था. रंग बदलते हुए उस ने कहा था कि वह उसे ऐसे कैसे छोड़ सकता है. वह उस से कोर्टमैरिज करना चाहता है.

आरती ने उस की शादी तय होने की बात कही तो उस ने कहा कि शादी तो घर वालों ने तय की है, वह तो उसी से शादी करना चाहता है. वह तय कर ले कि उसे क्या करना है. लेकिन अगर उस ने शादी से मना किया तो वह उस के प्रेमपत्रों को अखबारों में छपवा कर उसे बदनाम कर देगा. यही नहीं, वह उस के पिता तथा भाइयों को भी मरवा देगा.

प्रेमी की इस धमकी से आरती परेशान हो गई. घर वालों को उस पर वैसे ही विश्वास नहीं रह गया था, प्रेमी की ओर से वह अपना ध्यान हटा ही चुकी थी. क्योंकि उस की समझ में आ चुका था कि उस का प्रवीण से संबंध परिवार के लिए ठीक नहीं है. जबकि प्रवीण उस के साथ जबरदस्ती शादी करना चाहता था.

आरती की समझ में नहीं आ रहा था कि उसे क्या करना चाहिए? जिंदगी शायद उसे बेमानी लगने लगी थी. उसे लगा कि उस का मर जाना ही ठीक है, क्योंकि अगर जिंदा रही तो उस के परिवार को प्रवीण बदनाम कर देगा. उस के बाद घर वाले उस से नफरत करने लगेंगे. प्रवीण से प्यार करना उसे जीवन की सब से बड़ी भूल लगी.

उसे प्रेमी से अचानक नफरत हो गई. शायद इसीलिए उस ने अपने सुसाइड नोट में उस के लिए मौत की सजा की मांग की थी. उस ने लिखा था कि प्रवीण ने उस का जीना मुश्किल कर दिया था. पुलिस ने प्रवीण को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया था. महीने भर जेल में रहने के बाद उसे जमानत मिल गई. वह जेल से बाहर आ गया.

मुकदमा चलने लगा. अब प्रवीण का कैरियर दांव पर लग गया था. जमानत पर छूटने के बाद वह अपने मुकदमे की पैरवी करने लगा. सबूत के तौर पर उस ने आरती के प्रेमपत्र अदालत में पेश किए.

दूसरी ओर सरकारी वकील अशोक कुमार पंकज ने प्रवीण के मोबाइल की काल डिटेल्स अदालत में पेश की, जिस के अनुसार प्रवीण ने उसे कई बार फोन किया था. उन का कहना था कि प्रवीण ने फोन कर के मृतका और उस के परिवार को बदनाम करने की धमकी दी थी, जिस से डर कर मृतका ने आत्महत्या का निर्णय लिया था.

जज श्री गुरप्रीत सिंह ने आरती के सुसाइड नोट को अहम सबूत मानते हुए प्रवीण कुमार को आरती के आत्महत्या के लिए दोषी माना. जबकि उस के वकील विजय प्रताप का कहना था कि सुसाइड नोट की फोरैंसिक जांच होनी चाहिए. इस के अलावा मृतका 12 बोर की डबल बैरल बंदूक से सुसाइड नहीं  कर सकती. यह सुसाइड का नहीं, बल्कि हत्या का मामला है.

लेकिन अदालत ने न सुसाइड नोट की फोरैंसिक जांच कराई और न ही उस के इस दलील को माना कि मृतका डबल बैरल बंदूक से आत्महत्या नहीं कर सकती.

स्पैशल जज श्री गुरप्रीत सिंह ने प्रवीण कुमार को दोषी मानते हुए आरती को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में 10 साल की कैद और एक लाख रुपए जुरमाने की सजा सुनाई. जुरमाने की धनराशि में से 90 हजार रुपए मृतका के  घर वालों को देने के आदेश दिए.

प्रवीण कुमार ने हाईकोर्ट में इस सजा के खिलाफ अपील भले ही कर दी है, लेकिन उसे नौकरी से बर्खाश्त कर दिया गया है. वह मैनपुरी नौकरी करने आया था, लेकिन वहां वह एक ऐसी लड़की से प्यार कर बैठा, जो उस की जाति की नहीं थी. इस प्यार से उसे कुछ मिलता, वह कुछ ऐसा कर बैठा कि उस की जिंदगी बरबाद हो गई.

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