Women Safety.प्रीति राठी प्रतिभाशाली लड़की र्विस में लेफ्टिनेंट (नर्सिंग) की नौकरी मिल गई थी, लेकिन उस से ईर्ष्या रखने वाले अंकुर को यह बरदाश्त नहीं हुआ और उस ने…
सुबह के 8 बजे गरीब रथ एक्सपे्रस बांद्रा स्टेशन पर रुकी तो प्रीति बहुत खुश थी. उस की खुशी स्वाभाविक भी थी, क्योंकि मुंबई जैसे महानगर में इतनी अच्छी नौकरी मिलना आसान नहीं होता.
स्टेशन पर उस समय बहुत भीड़ थी. ऐसा लगता था जैसे मनुष्यों का समुद्र ठाठें मार रहा हो.
प्रीति अकेली नहीं थी. उस के साथ उस के पिता अमर सिंह राठी, मौसा विनोद कुमार दाहिया और मौसी सुनीता दाहिया भी मुंबई आए थे. टे्रन से उतर कर ये सब लोग प्लेटफार्म से बाहर जाने के लिए आगे बढ़े. अभी ये लोग 20-25 कदम ही चले थे कि प्रीति ने अपने कंधे पर किसी के हाथ का दबाव महसूस किया. पिता और मौसामौसी आगे चल रहे थे. प्रीति को अजीब लगा तो उस ने झटके से पीछे मुड़ कर देखा.
प्रीति के पीछे एक युवक खड़ा था, जिस ने चेहरे पर कपड़ा बांध रखा था. उस के हाथ में च्यवनप्राश का डिब्बा था. प्रीति ने चौंक कर झटके से उस की ओर देखा तो उस ने पलक झपकते ही डिब्बे में भरा तरल पदार्थ उस के मुंह पर फेंक दिया. अगले ही पल प्रीति तेज जलन से तड़प उठी और फर्श पर गिर कर लोटने लगी. उस के चीखने की आवाज सुन कर उस के पिता, मौसा और मौसी ने पीछे पलट कर देखा. प्रीति पर तेजाब फेंका गया था और वह जलन से बुरी तरह छटपटा रही थी. जबकि तेजाब फेंकने वाला भीड़ में गुम हो गया था.
जरा सी देर में स्टेशन पर अफरातफरी मच गई. कुछ लोगों ने तेजाब फेंक कर भागने वाले युवक को देखा था. वह खुद को बचाते हुए प्लेटफार्म नंबर 3 पर आ कर रुकी गरीब रथ एक्सप्रेस के दूसरी ओर प्लेटफार्म नंबर 4 पर दिल्ली के लिए रवाना होने जा रही स्वराज एक्सप्रेस में चढ़ गया था. स्वराज एक्सपे्रस 90 सेकेंड में रवाना होने वाली थी.
उधर दर्द से छटपटाती प्रीति को प्लेटफार्म के फर्श पर लोटपोट होते देख उस के पिता अमर सिंह राठी, मौसा विनोद कुमार और मौसी सुनीता के होश उड़े हुए थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसी परिस्थिति में क्या करें. प्रीति का शरीर रक्तरंजित हो गया था और उस के कपड़ों और शरीर से धुआं उठ रहा था. तेजाब की कुछ बूंदें सुनीता दाहिया और 2 अन्य युवकों के ऊपर भी गिरी थीं. वे भी जलन से परेशान थे. उन युवकों ने तेजाब फेंकने वाले का पीछा भी किया था, लेकिन वे उसे पकड़ने में नाकामयाब रहे थे.
आननफानन में प्रीति को कुछ लोगों की मदद से पास ही के बांद्रा, खैरवाड़ी स्थित गुरुनानक अस्पताल ले जाया गया. वहां उसे तुरंत इमरजेंसी वार्ड में भरती कर के उस का उपचार शुरू किया गया. इस बीच यह खबर बांद्रा रेलवे स्टेशन के थाना जीआरपी तक पहुंच गई थी. सूचना मिलते ही जीआरपी के अफसर गुरुनानक अस्पताल पहुंच गए.
प्रीति राठी की हालत इतनी नाजुक थी कि कोई बयान देना तो दूर वह एक शब्द तक बोलने की स्थिति में नहीं थी. उस का चेहरा, आंखें, जुबान और श्वांस नली सब कुछ बुरी तरह जल चुके थे. डाक्टर उस के प्राथमिक उपचार में लगे हुए थे. पुलिस अफसरों ने प्रीति के पिता अमर सिंह राठी, मौसा विनोद कुमार दाहिया और मौसी सुनीता के बयान ले कर केस दर्ज कर लिया.
प्राथमिक उपचार के बाद प्रीति को भायखला के मसीना अस्पताल भेज दिया गया ताकि उसे बचाने की कोशिश की जा सके. उधर अस्पताल में शुरुआती जांच और लिखापढ़ी के बाद जीआरपी के अफसरों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. उन्होंने उन दोनों प्रत्यक्षदर्शी युवकों के बयान भी लिए, जिन्होंने उस युवक को तेजाब डालते और भागते हुए देखा था. साथ ही एक कुली, एक महिला और रेहड़ीखोमचे वालों के बयान भी लिए गए. भिखारियों, बूट पौलिश वालों और फेरी वालों से भी पूछताछ की गई.
रेलवे स्टेशन पर लगे सीसी टीवी कैमरों की फुटेज भी देखी गई, लेकिन इस सब से कोई भी ऐसा सूत्र नहीं मिला, जिस से तेजाब फेंकने वाले युवक के बारे में कोई जानकारी मिल पाती. सीसीटीवी की एक फुटेज में तेजाब फेंकने वाला युवक भाग कर स्वराज एक्सप्रेस में चढ़ता तो नजर आ रहा था, लेकिन उस की शक्ल दिखाई नहीं दे रही थी. यह मात्र 10 सेकेंड की फुटेज थी.
तेजाब फेंकने वाला स्वराज एक्सप्रेस में चढ़ा तो था, पर इस बात की संभावना कम ही थी कि वह उसी टे्रन से दिल्ली गया होगा. उस टे्रन में चढ़ने की वजह से यह भी नहीं कहा जा सकता था कि वह दिल्ली का ही रहने वाला रहा होगा. दरअसल पुलिस इस संभावना को ज्यादा महत्त्व दे रही थी कि प्रीति के किसी दुश्मन ने यह काम किसी सुपारी किलर से कराया होगा.
इस मामले में पुलिस अफसरों की सोच यह भी थी कि इस तरह के हादसे अमूमन युवकयुवतियों के एकतरफा प्यार मोहब्बत अथवा शादीविवाह के असफल होने पर होते हैं. पुलिस टीम सोच रही थी कि हो न हो प्रीति राठी के मामले में भी ऐसा ही कुछ रहा हो. इस का पता लगाने के लिए गहराई में जाने की जरूरत थी. इस के लिए पुलिस ने प्रीति के पिता, मौसा और मौसी से विस्तृत पूछताछ की.
इस घटना को घटे 5 दिन बीत गए, लेकिन पुलिस किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी. इस बीच प्रीति के घर वाले और कई रिश्तेदार भी मुंबई पहुंच गए थे, क्योंकि वह जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही थी. पुलिस ने प्रीति का बैकग्राउंड खंगालने के लिए उस के घर वालों और रिश्तेदारों से विस्तार से पूछताछ की. साथ ही उस के सहपाठियों की लिस्ट भी बनाई गई. इस लिस्ट में प्रीति के एक शुभचिंतक पवन सिन्हा का भी नाम आया. वह राठी परिवार का न केवल पड़ोसी था, बल्कि प्रीति का दोस्त भी था.
पवन सिन्हा पर पुलिस को संदेह इसलिए हुआ, क्योंकि वह प्रीति की छोटी बहन को बारबार फोन कर के प्रीति की तबीयत के बारे में पूछ रहा था. संदेह हुआ तो बांद्रा जीआरपी थाने से एक पुलिस टीम को दिल्ली भेजा गया. यह पुलिस टीम पवन सिन्हा को गिरफ्तार कर के मुंबई ले आई. पूछताछ में वह अपने आप को निर्दोष बताता रहा.
पुलिस ने अदालत से उस का रिमांड ले कर सख्ती से पूछताछ की. लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. पवन सिन्हा भले ही प्रीति पर तेजाब फेंकने की बात से इनकार करता रहा, पर कुछ सुबूत उस के खिलाफ जा रहे थे. पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे अदालत पर पेश कर के न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. लेकिन बाद में प्रीति के पिता अमर सिंह राठी द्वारा उस का पक्ष लेने की वजह से उसे जमानत मिल गई.
मसीना अस्पताल में भरती प्रीति राठी की सेहत में जब 15 दिनों तक कोई सुधार नहीं आया तो उस के बेहतर इलाज के लिए और यह जघन्य अपराध करने वाले के विरुद्ध मुंबई से ले कर दिल्ली तक आवाजें उठने लगीं. कई महिला संगठनों द्वारा उठाई गई यह आवाज जब महाराष्ट्र विधानसभा तक पहुंची तो महाराष्ट्र के गृह राज्यमंत्री आर.आर. पाटिल ने प्रीति का इलाज किसी अच्छे अस्पताल में कराने और इलाज का सारा खर्चा सरकार द्वारा उठाए जाने का ऐलान कर दिया. इस के साथ ही प्रीति को मसीना अस्पताल से निकाल कर मुंबई अस्पताल में भरती करा दिया गया. लेकिन उस की सेहत में यहां भी कोई सुधार नहीं हुआ.
इसी बीच प्रीति ने इस केस के इन्वेस्टीगेशन अफसर को एक मार्मिक पत्र लिखा—
‘पुलिस भैया, मेरा क्या कुसूर था जो मुझे यह सजा मिली. मैं तो भारतीय मेडिकल सर्विस में इसलिए शामिल हुई थी कि देशवासियों की सेवा कर सकूं. घायलों, मरीजों के काम आ सकूं. मैं बीमार, लाचार भाईबहनों के लिए मुंबई आई थी, मैं ने किसी का क्या बिगाड़ा था? मेरे साथ उस ने ऐसा क्यों किया? जिस ने भी यह सब किया है, उसे आप छोड़ना नहीं. उसे सजा जरूर मिलनी चाहिए.
—आप की बहन प्रीति.’
इस पत्र को लिखने के 2-3 दिनों बाद ही 31 मई को प्रीति ने अस्पताल में ही दम तोड़ दिया. प्रीति की मौत के बाद जब उस का यह भावुक पत्र मुंबई के समाचार पत्रों में छपा तो जिस ने भी पढ़ा, उस के दिल को छू गया. फलस्वरूप इस मामले ने फिर तूल पकड़ लिया और उस पर एसिड फेंकने वाले को जल्द से जल्द पकड़ने की मांग जोर पकड़ने लगी. मुंबई से ले कर दिल्ली तक के महिला संगठनों ने इसे ले कर धरनेप्रदर्शन शुरू कर दिए.
लोगों के बढ़ते आक्रोश को देख कर महाराष्ट्र सरकार ने इस मामले की जांच जीआरपी की सीआईडी को सौंप दी. इतना ही नहीं, मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण ने जांच में तेजी लाने का भी स्पष्ट आदेश दिया. इस के बावजूद इस मामले की स्थिति ज्यों की त्यों बनी रही. सीआईडी (जीआरपी) तमाम कोशिशों के बाद भी प्रीति के अपराधी तक नहीं पहुंच सकी. देखतेदेखते घटना को घटे 6 महीने बीत गए.
अपनी बेटी को इंसाफ न मिलते देख प्रीति के पिता अमर सिंह राठी का धैर्य जवाब दे गया. कोई रास्ता नहीं बचा तो उन्होंने बौंबे हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की, जिस में उन्होंने इस एसिड कांड की जांच मुंबई क्राइम ब्रांच या सीबीआई से कराने की मांग की. उन की याचिका पर बौंबे हाईकोर्ट ने सीआईडी (जीआरपी) को इस केस की फाइल इस आदेश के साथ मुंबई के पुलिस कमिश्नर को सौंपने का आदेश दिया कि मामले की जांच मुंबई क्राइम ब्रांच से कराई जाए.
मुंबई हाईकोर्ट के आदेश पर 4 दिसंबर, 2013 को इस केस की फाइल मुंबई के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर चौधरी सतपाल सिंह के पास आ गई. उन्होंने जांच के लिए प्रीति राठी केस की फाइल ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर (क्राइम) हिमांशु राय को सौंप दी. केस स्टडी करने के बाद हिमांशु राय ने इस मामले की जांच की जिम्मेदारी पुलिस उपायुक्त अंबादास पोटे, अतिरिक्त पुलिस आयुक्त निकेत कौशिक और सहायक पुलिस आयुक्त प्रफुल्ल भोसले को सौंपी. भोसले ने इस केस को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया.
उन्होंने इस की विस्तृत जांच और प्रीति के गुनाहगार को पकड़ने के लिए क्राइमब्रांच यूनिट 2 के वरिष्ठ निरीक्षक प्रशांत राजे, सहायक पुलिस निरीक्षक सुदेश भजगांवकर, सिपाही सुभाष माली, हृदयनाथ मिश्रा और क्राइम ब्रांच यूनिट-5 के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक अशोक खोत, पुलिस निरीक्षक नितिन पाकांडे, सिपाही दीपक तोले, सुरेश पाटिल को चुना.
इस संयुक्त टीम ने सरगर्मी से अपनी जांच शुरू कर दी. इस के लिए बांद्रा जीआरपी पुलिस और सीआईडी (जीआरपी) की तफ्तीश फाइल का बड़ी बारीकी से अध्ययन किया गया. केस फाइल की स्टडी के बाद नए सिरे से मामले की तफ्तीश शुरू की गई. मुंबई क्राइम ब्रांच ने सब से पहले 2 मई, 2013 को गरीब रथ एक्सप्रेस से आए 1200 यात्रियों के रिजर्वेशन का चार्ट निकलवाया. इस के बाद उस में से 18 से 20 साल तक की उम्र वालों को छांट कर उन के नाम, पते और फोन नंबर निकलवाए.
इस तरह के करीब 60 युवक थे, ये सभी ऐसे थे, जिन्होंने घटना वाले दिन उसी टे्रन से दिल्ली से मुंबई का सफर किया था, जिस में प्रीति दिल्ली आई थी. ये वे लोग थे, जो प्रीति के साथ ही मुंबई के बांद्रा रेलवे स्टेशन पर उतरे थे. छांटे गए सभी युवकों में से कुछ को क्राइम ब्रांच ने अपने दफ्तर बुला कर पूछताछ की और कुछ से फोन पर बात की.
इस प्रयास में क्राइम ब्रांच को कोई कामयाबी तो नहीं मिली, लेकिन वह इस नतीजे पर जरूर पहुंच गई कि इस मामले के तार दिल्ली से ही जुड़े हैं. इस नतीजे पर पहुंचने के बाद मुंबई क्राइम ब्रांच ने जांच दिल्ली से ही शुरू करने का फैसला किया. इस के लिए क्राइम ब्रांच की एक टीम ने दिल्ली जा कर गुप्तरूप से प्रीति राठी के घर के आसपास डेरा जमा लिया.
क्राइम ब्रांच के अफसर प्रीति राठी के घर के आसपास और उस कालोनी में रहने वाले 18 से 20 साल के सभी युवकों पर कड़ी नजर रखते हुए उन की बैकग्राउंड टटोलने में जुट गए.
दिल्ली में की जा रही तफ्तीश से क्राइम ब्रांच अधिकारियों को इस बात का पूरा विश्वास हो चला था कि प्रीति राठी पर एसिड फेंकने वाला उस के आसपास का ही कोई युवक था. वह भले ही कोई भी रहा हो, काफी सुलझा हुआ और चतुरचालाक था. उस युवक तक पहुंचना आसान नहीं था. लेकिन क्राइम ब्रांच के अफसरों ने हिम्मत नहीं हारी. वे कालोनी में रहने वाले हर उस परिवार की जांचपड़ताल कर रहे थे, जिन में 18 से 20 साल तक के युवक थे.
मुंबई क्राइम ब्रांच की टीम को दिल्ली में डेरा डाले लगभग 30-35 दिन बीत चुके थे. क्राइम ब्रांच अफसरों की हिम्मत जवाब देने लगी थी. वे दिल्ली से वापस लौटने की सोच रहे थे कि उन्हें एक ऐसी जानकारी मिली, जो उम्मीद की नई किरण दिखाने वाली थी. पता चला कि प्रीति राठी के घर के सामने रहने वाला अंकुर पंवार अहमदाबाद के एक फाइवस्टार होटल में काम करता है और आजकल घर आया हुआ है. यह भी पता चला कि जब प्रीति मुंबई गई थी, तब वह दिल्ली में ही था.
दरअसल अंकुर जिस होटल में काम करता था, उस होटल के किसी ग्राहक का के्रडिट कार्ड चोरी हो गया था. बाद में वह के्रडिट कार्ड होटल के एक कर्मचारी के पास मिला था. इसी की वजह से होटल मैनेजमेंट का अपने सभी कर्मचारियों से भरोसा उठ गया था. फलस्वरूप होटल मैनेजमेंट ने अपने सभी कर्मचारियों को अपना करेक्टर सर्टिफिकेट लाने के लिए कहा था. अंकुर अपना कैरेक्टर सर्टीफिकेट लेने ही दिल्ली आया था.
जब यह जानकारी क्राइम ब्रांच की टीम को मिली तो उस ने अंकुर पंवार से मिलने का मन बना लिया. हालांकि टीम को इस की उम्मीद कम ही थी कि अंकुर से कुछ खास पता चल पाएगा. लेकिन उन्होंने सोचा कि जहां कालोनी के 30-40 युवकों से पूछताछ की जा चुकी है, वहीं एक युवक से और सही.
16 जनवरी, 2014 को क्राइम ब्रांच की टीम ने अंकुर पंवार के घर जा कर उस से पूछताछ की. पुलिस टीम के सवालों से अंकुर घबरा गया. हालांकि उस ने खुद को जल्दी ही संभाल लिया. पूछताछ में उस ने प्रीति राठी पर तेजाब फेंकने के मामले में खुद को निर्दोष बताया. उस का कहना था कि जिस दिन प्रीति पर एसिड फेंका गया था, उस दिन वह एक नौकरी के लिए इंटरव्यू देने हरिद्वार गया हुआ था. वहां चूंकि रात हो गई थी, इसलिए जिस होटल में इंटरव्यू था, वह उसी होटल में ठहर गया था.
लेकिन क्राइम ब्रांच ने जब अंकुर के इस दावे की सत्यता की जांचपड़ताल की तो उस के झूठ की पोल खुल गई. उस ने जिस होटल का जिक्र किया था, जब उस होटल में पूछताछ की गई तो वहां के कर्मचारियों ने बताया कि 28 मई, 2013 को उन के यहां इस नाम का कोई युवक इंटरव्यू देने नहीं आया था.
अंकुर पंवार से पूछताछ करते समय पुलिस टीम को उस की दाहिनी कलाई के ऊपर एक टैटू नजर आया. उस से जब उस टैटू के बारे में पूछा गया तो वह कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया. जांच टीम ने जब उस टैटू का कैमिकल परीक्षण करवाया तो उस की कलाई पर एसिड का जख्म पाया गया. इस जख्म को छिपाने के लिए ही अंकुर ने उस के ऊपर टैटू बनवा लिया था. आखिरकार 40 दिनों बाद मुंबई क्राइम ब्रांच की मेहनत रंग लाई और उस ने प्रीति राठी पर एसिड फेंकने वाले को गिरफ्तार कर लिया.
गिरफ्तारी के बाद अंकुर पंवार को ट्रांजिट वारंट पर मुंबई ले जाया गया. मुंबई कोर्ट में पेश कर के क्राइम ब्रांच ने उस का 14 दिनों का पुलिस कस्टडी रिमांड लिया, ताकि उस से विस्तार से पूछताछ करने के साथसाथ साक्ष्य भी जुटाए जा सकें. रिमांड की अवधि में अंकुर से उच्चाधिकारियों के सामने पूछताछ की गई. इस पूछताछ में उस ने प्रीति पर एसिड फेंकने की बात स्वीकार कर ली. आश्चर्य की बात यह थी कि उस होनहार लड़की पर एसिड फेंकने की वजह केवल ईर्ष्या थी.
22 वर्षीया प्रीति राठी दिल्ली के नरेला की रहने वाली थी. उन के पिता अमर सिंह राठी नरेला के दिल्ली बिजली विभाग में काम करते थे. उन का परिवार बिजली विभाग की सरकारी कालोनी में रहता था. अमर सिंह के परिवार में उन की पत्नी के अलावा 2 लड़कियां और एक लड़का था. प्रीति अपने भाई बहन से बड़ी थी. प्रीति के मातापिता को उस से काफी उम्मीदें थीं. इसीलिए वह उसे बेटी नहीं, बेटा मानते थे. वह उसे पढ़ालिखा कर इस योग्य बनाना चाहते थे कि अपने पैरों पर खड़ी हो सके.
प्रीति की सोच भी यही थी कि वह इस लायक बन जाए कि मर्दों के कंधे से कंधा मिला कर चल सके. वह पढ़लिख कर अपने मातापिता का सहारा बनना चाहती थी. प्रीति ने जब अच्छे नंबरों से बारहवीं पास की तो उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अब आगे क्या करे. बारहवीं करने के बाद वह डाक्टरी या इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर सकती थी, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी. उस के पिता का वेतन इतना कम था कि घरपरिवार की गाड़ी मुश्किल से चल पाती थी.
अपने घर की स्थिति के मद्देनजर प्रीति ने नर्सिंग का कोर्स करने का फैसला किया. मिड वाइफ का एग्जाम पास कर के वह दिल्ली के बत्रा मेडिकल कालेज में टे्रनिंग लेने लगी. 3 साल की नर्सिंग की टे्रनिंग पूरी कर के प्रीति को जब नर्स की डिग्री मिल गई तो उस ने नरेला के ही सुशीला अस्पताल में नौकरी कर ली. हालांकि प्रीति सुशीला अस्पताल की अपनी नौकरी से बहुत खुश थी, लेकिन उस का सपना कुछ और ही था.
प्रीति राठी को अपना यह सपना तब पूरा होता नजर आया, जब उसे भारतीय नौसेना मेडिकल सर्विसेज कोलाबा, मुंबई में नियुक्ति का लेटर मिला. यह मौका प्रीति राठी को तब मिला, जब वह सुशीला अस्पताल में नौकरी कर रही थी. इसी बीच भारतीय नौसेना मेडिकल सर्विसेज की वैकेंसी निकलीं तो प्रीति राठी ने फार्म भर दिया था. उस ने एग्जाम दिया तो पहले राउंड में 15 हजार उम्मीदवारों को पीछे छोड़ कर उस का नंबर 2 सौ उम्मीदवारों की सूची में आ गया. दूसरे राउंड में प्रीति दूसरे नंबर पर आई. फलस्वरूप उसे मुंबई के कोलाबा स्थित भारतीय नौसेना मेडिकल सर्विसेज में लेफ्टिनेंट (नर्सिंग) के लिए चुन लिया गया. 8 अप्रैल, 2013 को उसे नियुक्ति लेटर भी मिल गया. उसे 2 मई, 2013 को मुंबई पहुंच कर भारतीय नौसेना मेडिकल सर्विस के दफ्तर में अपना चार्ज संभालना था.
प्रीति के भारतीय नौसेना की मेडिकल सर्विस में जाने को ले कर उस के परिवार में खुशी का माहौल था. इधर प्रीति के मुंबई जाने की तैयारी चल रही थी और उधर अंकुर पंवार का परिवार अपने बेटे को ले कर दुखी था. दरअसल अंकुर के घर वाले प्रीति के बढ़ते हुए कदमों की सराहना करते हुए अंकुर को ताना दिया करते थे. जिसे ले कर वह दुखी रहता था. ऐसा तब से होता आया था, जब वह किशोर था.
23 वर्षीय अंकुर के पिता नारायण पंवार भी उसी बिजली बोर्ड में सर्विस करते थे, जिस में प्रीति के पिता अमर सिंह राठी थे. उन का घर ठीक अमर सिंह राठी के घर के सामने था. आमनेसामने रहने के कारण दोनों परिवारों में काफी मेलजोल था. प्रीति राठी और अंकुर पंवार बचपन में एकदूसरे के अच्छे दोस्त हुआ करते थे. अंकुर पंवार के पिता नारायण पंवार शारीरिक रूप से अपंग थे, इसलिए उन्होंने अपने बेटे अंकुर से कुछ ज्यादा ही आशा लगा रखी थीं. प्रीति राठी की तरह अंकुर पंवार भी अपने भाई और बहनों में सब से बड़ा था. लेकिन वह पढ़ाईलिखाई में प्रीति की तरह होशियार नहीं था.
प्रीति की तरह वह परीक्षाओं में भी अच्छे अंक नहीं ला पाता था. जिस की वजह से उसे डांट खानी पड़ती थी. बातबात में उस की तुलना प्रीति से की जाती थी. किसी तरह बारहवीं पास करने के बाद उस ने उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर जा कर होटल मैनेजमेंट की डिग्री हासिल कर ली थी. इस के बावजूद उसे कोई अच्छी नौकरी नहीं मिल रही थी. वह जिस होटल में इंटरव्यू देने जाता था या तो इंटरव्यू में फेल हो जाता या फिर उसे वहां का वातावरण ठीक नहीं लगता था.
उसे नौकरी मिल भी जाती थी तो वह छोड़ देता था. इस से उस का परिवार दुखी रहता था. घर के सब लोग उसे कोसते रहते थे.
उस दिन भी अंकुर के मातापिता उस से काफी नाराज थे, जिस दिन प्रीति राठी को भारतीय नौ सेना मेडिकल सर्विस में नौकरी मिली थी.
अपने घर में अकसर प्रीति की तारीफ और अपनी उस से तुलना सुनसुन कर अंकुर का मानसिक संतुलन बिगड़ गया था. उसे प्रीति से जलन होने लगी थी. इसी वजह से उस ने पहले खुद को हानि पहुंचाने की सोची, लेकिन फिर इरादा बदल गया. उस ने प्रीति को खत्म करने का फैसला कर लिया. लेकिन इस से वह डर रहा था. क्योंकि ऐसा करने पर वह पुलिस के हत्थे चढ़ सकता था. आखिर काफी सोचनेविचारने के बाद उस के दिमाग में एक नया आइडिया आया. दरअसल, आए दिन समाचार पत्रों में असफल प्रेमियों द्वारा अपनी प्रेमिकाओं पर तेजाब फेंक कर उन का चेहरा कुरूप करने की खबरें छपती रहती थीं. इसी को ध्यान में रखते हुए उस ने प्रीति पर तेजाब फेंकने की सोची, क्योंकि कुरूप होने से उस की नौकरी भी चली जाती और वह भविष्य में भी कुछ नहीं कर सकती थी.
लेकिन इस के लिए एसिड की जरूरत थी. जबकि एसिड हासिल करना आसान नहीं था. अगर वह कहीं से एसिड लेने की कोशिश करता तो पकड़ा जा सकता था. काफी सोचविचार के बाद आखिर उसे इस का रास्ता मिल ही गया. वह जिस कालोनी में रहता था, उसी के पास बैटरी बनाने की एक कंपनी थी. उस कंपनी में बैटरी में इस्तेमाल के लिए काफी बड़ी मात्रा में सल्फ्यूरिक एसिड आता था. वहां से एसिड प्राप्त करने के लिए अंकुर ने कंपनी के सुरक्षागार्ड से दोस्ती कर ली.
28 अप्रैल, 2013 को अंकुर सुरक्षागार्ड की नजर बचा कर कंपनी के अंदर गया और वहां से च्यवनप्राश के एक डिब्बे में सल्फ्यूरिक एसिड भर लाया. वह डिब्बा उस ने छिपा कर रख दिया. बाद में जब 1 मई, 2013 को प्रीति अपने पिता, मौसा और मौसी के साथ गरीब रथ एक्सप्रेस से मुंबई के लिए रवाना हुई तो अंकुर पंवार ने इन लोगों का पीछा किया. एसिड का डिब्बा उस के साथ था. पहले तो उस ने दिल्ली रेलवे स्टेशन पर ही प्रीति के चेहरे पर एसिड डालना चाहा, लेकिन स्टेशन पर काफी भीड़भाड़ थी. दूसरे गरीब रथ एक्सप्रेस चल भी चुकी थी.
नाकाम होने के बाद जिस तरह भूखा शेर अपना शिकार नहीं छोड़ता, उसी तरह अंकुर भी प्रीति को किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहता था. वह बिना टिकट ही गरीब रथ एक्सप्रेस में सवार हो गया. और यह सोच कर टौयलेट के पास बैठ गया कि प्रीति अगर टौयलेट आएगी तो वह अपना काम कर देगा. लेकिन ऐसा इसलिए नहीं हो सका, क्योंकि चलती टे्रन में उस के पकड़े जाने का खतरा था.
आखिरकार गरीब रथ एक्सप्रेस मुंबई बांद्रा रेलवे स्टेशन पर पहुंच गई. सारे यात्रियों के साथसाथ प्रीति भी स्टेशन पर उतर गई. मुंबई के बांद्रा रेलवे स्टेशन पर भी वही स्थिति थी, जो दिल्ली रेलवे स्टेशन पर थी. लेकिन यहां अंकुर प्रीति को किसी भी तरह बच कर नहीं जाने देना चाहता था. उस का मानना था कि अगर वह आज कामयाब नहीं हुआ तो फिर कभी मौका नहीं मिलेगा और उस के घर वाले हमेशा उस की तुलना प्रीति से करते रहेंगे.
बहरहाल, अंकुर प्रीति का पीछा कर रहा था. भीड़ का लाभ उठा कर उस ने मौका मिलते ही प्रीति पर एसिड फेंक दिया और भाग कर सामने जाने के लिए तैयार खड़ी दिल्ली जाने वाली स्वराज एक्सप्रेस में चढ़ गया. बाद में वह टे्रन के दूसरे गेट से उतर गया और आराम से घूमते हुए स्टेशन की टिकट खिड़की पर जा पहुंचा. वहां से दिल्ली का टिकट ले कर वह 10.30 बजे वाली दिल्ली जम्मूतवी वाली टे्रन से दिल्ली लौट आया.
घर वालों के यह पूछने पर कि वह 3-4 दिन कहां गायब था, उस ने बताया कि वह एक होटल में नौकरी का इंटरव्यू देने के लिए हरिद्वार गया था. लेकिन मुंबई क्राइम ब्रांच के सामने अंकुर पंवार का यह झूठ काम नहीं आया. अंकुर से विस्तृत पूछताछ के बाद क्राइम ब्रांच ने उसे बांद्रा रेलवे जीआरपी को सौंप दिया.
बांद्रा रेलवे जीआरपी ने अंकुर पंवार के खिलाफ भादंवि की धारा 302/326 के अंर्तगत मामला दर्ज किया और अदालत पर पेश कर के उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. बेकुसूर पवन सिन्हा के ऊपर से सभी आरोप हटा लिए गए.
यहां एक सवाल यह उठता है कि इस मामले में जहां बांद्रा जीआरपी और जीआरपी (सीआईडी) तफ्तीश में फेल हुई थी, वहीं रेलवे तंत्र भी फेल हुआ था. वातानुकूलित गरीब रथ जैसी एक्सप्रेस में एक युवक बिना टिकट लिए एसिड जैसा खतरनाक पदार्थ ले कर दिल्ली से मुंबई तक चला गया और किसी को पता तक नहीं चला.
अगर रेलवे के टिकट चैकर और रेलवे पुलिस अपनी जिम्मेदारी निभाते तो शायद आज प्रीति राठी जिंदा होती. Women Safety
— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.
— मनोहर कहानियां, 2014 में प्रकाशित






