Gopinath Munde Death. गोपीनाथ मुंडे भाजपा के कद्दावर नेता ही नहीं बल्कि एक ऐसा चेहरा थे जो काफी हद तक स्वर्गीय प्रमोद महाजन की कमी पूरी कर रहे थे. भाजपा उन के नेतृत्व में महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव लड़ना चाहती थी, लेकिन उन की आकस्मिक मौत ने इस समीकरण को बदल दिया…  

26 मई, 2014 को नरेंद्र मोदी राष्ट्रपति भवन के खुले प्रांगण में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के समक्ष भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ले चुके थे. उसी दिन उन के मंत्रीमंडल के 45 मंत्रियों ने भी शपथ ली. भाजपा और उन के समर्थकों में ही नहीं बल्कि देश भर में खुशी का माहौल था. अगले ही दिन सभी मंत्रियों को विभाग भी बांट दिए गए. महाराष्ट्र की बीड लोकसभा सीट से जीत कर आए महाराष्ट्र के लोकप्रिय नेता गोपीनाथ मुंडे को केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री बनाया गया था.

गोपीनाथ मुंडे प्रधानमंत्री द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारी से खुश भी थे और उत्साहित भी. लेकिन केंद्र सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद मिलने के बाद भी मुंडे अपनी पृष्ठभूमि को भूले नहीं थे. यही वजह थी कि जब उन्होंने मंत्री पद संभाला तो मंत्रालय के अधिकारियों और मीडियाकर्मियों से कहा, ‘‘मैं 400 लोगों की आबादी वाले गांव में पैदा हुआ, पला बढ़ा. मैं ने पंचायत से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की. मुझे खुशी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुझे इस लायक समझ कर गांवों के उत्थान की जिम्मेदारी सौंपी. मैं जमीनी लोगों से जुड़ कर इस जिम्मेदारी का निर्वहन करना चाहता हूं, बस मुझे आप सब का साथ और सहयोग चाहिए.’’

गोपीनाथ मुंडे ने इन सहज शब्दों और विनम्रता से अपने मंत्रालय के अधिकारियों को अपना मुरीद बना लिया था. सभी को उन की यह बात मित्रवत लगी थी और वे पहले ही दिन से उन्हें पसंद करने लगे थे. उसी दिन से मुंडे के मंत्रालय का काम भी शुरू हो गया.

4 जून बुधवार से 16वीं लोकसभा का 6 दिवसीय सत्र शुरू होना था जिस में गोपीनाथ मुंडे की उपस्थिति भी जरूरी थी.  लेकिन इस से पहले 3 जून को उन्हें अपने चुनाव क्षेत्र बीड जाना था. दरअसल उन की लोकसभा सीट बीड के उन के सहयोगियों, कार्यकर्ताओं और क्षेत्र की जनता ने परली के तोतला मैदान में उन का सम्मान करने के लिए एक समारोह आयोजित किया था. इस सम्मान समारोह में गोपीनाथ मुंडे के घर वालों को भी आना था.

लोकसभा क्षेत्र की जनता की भावनाओं का सवाल था, इसलिए गोपीनाथ मुंडे ने यह सोच कर परली जाने का प्रोग्राम बना लिया कि सुबह की फ्लाइट से पहले मुंबई जाएंगे और वहां से परली. शाम को सम्मान समारोह में भाग लेंगे और परिवार वालों से मिलजुल कर रात की फ्लाइट से दिल्ली लौट आएंगे. इस संबंध में उन्होंने भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को भी बता दिया था.

3 जून को गोपीनाथ मुंडे की मुंबई की फ्लाइट साढ़े 7 बजे थी. सुबह सवा 6 बजे वह अपने 21 लोधी एस्टेट, सरकारी बंगले से सफेद मारुति एसएक्स-4 कार से एयरपोर्ट जाने के लिए निकले. उस समय ड्राइवर वीरेंद्र कुमार और निजि सहायक सत्येंद्र नायर उन के साथ थे. 6 बज कर 20 मिनट पर मुंडे की कार उन के बंगले से 5 मिनट की दूरी पर स्थित अरविंदो चौक पर पहुंच गई. उस समय पृथ्वीराज रोड से सफदरजंग रोड की ओर जाने वाली सड़क की सिग्नल लाइट ग्रीन थी इसलिए ड्राइवर वीरेंद्र कुमार ने चौराहा पार करने के लिए गाड़ी की स्पीड कम करने की कोई जरूरत नहीं समझी.

उसी समय अरविंदो मार्ग की तरफ से तेजी से सिल्वर कलर की एक इंडिका कार आई जिस की स्पीड काफी तेज थी. मुंडे की कार को चौराहा पार करते देख इंडिका के ड्राइवर गुरविंदर ने ब्रेक भी लगाए, लेकिन तेज स्पीड की वजह से उस की कार करीब 30 फुट आगे तक घिसटती चली गई और उस ने मुंडे की कार में बाईं ओर से बीच में टक्कर मार दी. टक्कर इतनी जोरों से लगी कि उस की कार का बंपर और बोनट बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया. मुंडे की कार का दाईं ओर का शीशा भी टूट कर गिर गया.

उस समय गोपीनाथ मुंडे कार में पीछे की सीट पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे. टक्कर लगी तो उन का सिर आगे की सीट से टकराया. इस से उन की नाक, होंठ और सिर में चोटें लगीं, लेकिन ये चोटें देखने में ज्यादा गंभीर नहीं लग रही थीं. टक्कर लगने के बाद ड्राइवर वीरेंद्र ने गाड़ी रोक दी थी और एक्सीडेंट करने वाली गाड़ी पर ध्यान न दे कर वह और सत्येंद्र नायर मंत्री जी को देखने लगे थे. गोपीनाथ मुंडे की हालत ठीक नहीं लग रही थी. उन्होंने सत्येंद्र नायर से पानी मांगा और  तुरंत अस्पताल चलने को कहा. सत्येंद्र ने ड्राइवर से कह दिया, ‘‘आल इंडिया मैडिकल चलो.’’

ड्राइवर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी. उस वक्त सड़कें खाली थीं. आल इंडिया मैडीकल पहुंचने में 10-15 मिनट लगे.

एक्सीडेंट करने वाली टाटा इंडिका आगे से काफी क्षतिग्रस्त हो गई थी. रेडिएटर खराब होने की वजह से वह स्टार्ट भी नहीं हो पा रही थी. यह कार एक ट्रेवलिंग एजेंसी की थी, जिसे ले कर गुरविंदर जनपथ स्थित होटल इंपीरियल जा रहा था. उस की मजबूरी यह थी कि कार को छोड़ कर भाग भी नहीं सकता था.

कोई और रास्ता न देख उस ने अपने मोबाइल से फोन कर के इस एक्सीडेंट की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दी. उस वक्त तक उसे यह पता नहीं था कि जिस कार को उस ने टक्कर मारी है उस में भाजपा के कद्दावर नेता और केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री गोपीनाथ मुंडे थे.

पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिलते ही थाना तुगलक रोड पुलिस अरविंदो चौराहे पर पहुंच गई. उस ने गुरविंदर को हिरासत में ले कर एक्सीडेंट की जांच शुरू कर दी.

उधर वीरेंद्र कुमार और सत्येंद्र नायर जब गोपीनाथ मुंडे को ले कर एम्स के जयप्रकाश नारायण ऐपेक्स ट्रामा सेंटर पहुंचे तो उन्हें इलाज के लिए तत्काल भरती तो कर लिया गया, लेकिन उन्हें किसी ने पहचाना नहीं. इत्तेफाक से एक सीनियर नर्स ड्यूटी पर थी जो मुंडे को पहचानती थी. उस ने यह बात ड्यूटी पर मौजूद डाक्टर को बताई तो उन्होंने आल इंडिया मैडिकल के कार्यकारी निदेशक आर.एन. अरोड़ा को फोन किया. अरोड़ा तत्काल ट्रामा सेंटर के लिए रवाना हो गए. साथ ही उन्होंने फोन कर के यह सूचना केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन को भी दे दी. हर्षवर्धन आल इंडिया मैडिकल के अध्यक्ष भी हैं.

ट्रामा सेंटर के डाक्टरों ने गोपीनाथ मुंडे को चैक किया तो उन की सांस और नब्ज दोनों बंद थीं. हालांकि उन के होंठ, नाक और सिर की चोटें ज्यादा गंभीर नहीं दिख रही थीं. डाक्टरों ने मुंडे को सी.पी.आर. (कार्डियो पल्मोनरी रिसासिटेशन) देने की काफी कोशिश की ताकि उन की सांस वापस आ सके. बारबार उन की छाती को भी दबाया गया, लेकिन डाक्टरों की 50 मिनट की यह कवायद बेकार गई. अंतत: 7 बज कर 20 मिनट पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.

इस बीच केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन और केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी आल इंडिया मैडिकल के ट्रामा सेंटर पहुंच गए थे. उन्होंने यह खबर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह सहित सभी बड़े नेताओं को दे दी. साथ ही गडकरी ने गोपीनाथ मुंडे की दोनों बेटियों और दामाद को भी फ्लाइट ले कर तुरंत दिल्ली पहुंचने को कहा.

उस समय वे लोग मुंबई एयर पोर्ट पर मुंडे साहब की फ्लाइट का इंतजार कर रहे थे. उन्हें मुंडे की मौत की सूचना तब दी गई जब वे फ्लाइट में बैठ गए. उन लोगों को एयरपोर्ट से सीधे आल इंडिया मैडीकल पहुंचने को कहा गया था. इस के लिए एयर पोर्ट पर गाड़ी भी भेज दी गई थी.

मुंडे की आकस्मिक मौत की सूचना पा कर 11 अशोक रोड स्थित भाजपा मुख्यालय में मातम सा पसर गया. जिस भी बड़े नेता को पता चला, वह आल इंडिया मैडिकल की ओर दौड़ पड़ा. इस खबर से सभी के चेहरे उतरे हुए थे. 9 बजे नितिन गडकरी ने मुंडे की मृत्यु की सूचना मीडिया को दी, जिस के बाद उन की मौत की बात देश भर को पता चल गई.

गोपीनाथ मुंडे की मौत की खबर मिलने के बाद थाना तुगलक रोड ने 35 वर्षीय गुरविंदर के खिलाफ भादंवि की धारा 304ए, 336 और 279 के तहत केस दर्ज कर के उसे गिरफ्तार कर लिया. मामला चूंकि केंद्रीय मंत्री से जुड़ा था इसलिए उस से दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल और इंटेलिजेंस ब्यूरो ने भी पूछताछ की. गुरविंदर दिल्ली के थाना फतेहपुर क्षेत्र के सुलतानपुर का रहने वाला था.

उस ने बताया कि वह एक ट्रेवलिंग एजेंसी में बतौर प्रोफेशनल ड्राइवर काम करता है और कार ले कर अपनी ड्यूटी पर होटल इंपीरियल जा रहा था. उस ने अपनी गलती मानते हुए स्वीकार किया कि रेडलाइट पर अगर वह 26 सेकेंड इंतजार कर लेता तो यह हादसा न होता.

गोपीनाथ मुंडे की बड़ी बेटी पंकजा पालवे अपने पति अमित पालवे और छोटी बहन यशश्री के साथ एयरपोर्ट से सीधी आल इंडिया मैडीकल पहुंचीं. पिता की मौत का समाचार उन के लिए दिल दहला देने वाला था. दोनों बहनों का रोरो कर बुरा हाल हो गया.

मुंडे की डैडबौडी का पोस्टमार्टम डा. सुधीर कुमार के नेतृत्व में 3 फोरेंसिक डाक्टरों की टीम से कराया गया. अभी तक अंदाजा था कि मुंडे की मौत संभवत: हार्ट अटैक से हुई थी, लेकिन पोस्टमार्टम से यह बात साफ हो गई कि  की मौत का कारण हार्ट अटैक नहीं था. पोस्टमार्टम से पता चला कि उन्हें आंतरिक चोटें पहुंची थीं, उन की गर्दन की हड्डी (सर्वाइकल स्पाइनल कोर्ड) टूटी हुई थी. उन का लीवर भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था जिस से उन के पेट में काफी खून जमा हो गया था. उन की मौत की वजह भी यही दोनों चीजें थीं.

गोपीनाथ मुंडे भाजपा के बड़े नेता थे, नरेंद्र मोदी के अत्यधिक करीबी. आल इंडिया मैडीकल से उन के पार्थिव शरीर को 11 अशोक रोड स्थित भाजपा मुख्यालय ले जाया जाना था ताकि लोगों के अंतिम दर्शन के लिए रखा जा सके. आननफानन में इस की पूरी तैयारी कर ली गई थी.

12 बज कर 45 मिनट पर जब मुंडे के शव का पोस्टमार्टम हो गया तो रसायनिक लेप के बाद उन के शव को फूलों से सजे सेना के ओपन ट्रक पर रख कर भाजपा मुख्यालय ले जाया गया. ट्रक पर उन के पार्थिव शरीर के साथ उन की दोनों बेटियां, दामाद, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन, नितिन गडकरी और केंद्रीय सरकार के 2-3 अन्य मंत्री भी मौजूद थे. जब तक यह ट्रक भाजपा मुख्यालय पहुंचा तब तक वहां भाजपा के तमाम बड़े नेता और हजारों कार्यकर्ताओं की भीड़ एकत्र हो चुकी थी. मुंडे के शव को ट्रक से उतार कर लोगों के दर्शनार्थ रख दिया गया.

भाजपा मुख्यालय में शोक की लहर छाई हुई थी. यह स्वाभाविक भी था क्योंकि नवनिर्वाचित भाजपा सरकार के लिए यह बहुत बड़ा झटका था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी और भाजपा के सभी मंत्रियों ने नम आंखों से बारीबारी से मुंडे को श्रद्धांजलि दी. सोनिया गांधी और राहुल गांधी भी गोपीनाथ मुंडे को श्रद्धांजलि देने भाजपा मुख्यालय पहुंचे.

मुंडे परिवार चाहता था कि उन का अंतिम संस्कार महाराष्ट्र स्थित उन के गृह नगर परली में किया जाए जहां से उन्होंने राजनीति शुरू की थी. इसलिए तय हुआ कि उन के पार्थिव शरीर को उन के पैतृक घर परली ले जाया जाए.

तय प्रोग्राम के अनुसार गोपीनाथ मुंडे के पार्थिव शरीर को पहले परली के उसी तोतला मैदान में लोगों के दर्शनार्थ रखा जाना था जहां उन के सम्मान में स्वागत समारोह आयोजित किया गया था. उस के बाद उन के शव को पांगरी स्थित वैद्यनाथ सहकारी सुगर मिल ले जा कर कपाउंड में उन का अंतिम संस्कार किया जाना था.

3 बजे गोपीनाथ मुंडे के पार्थिव शरीर को सेना के उसी ट्रक से इंदिरा गांधी एयरपोर्ट के लिए रवाना कर दिया गया. ट्रक के साथ सैकड़ों गाडि़यों का काफिला था. ट्रक और गाडि़यों का यह काफिला पालम टेक्नीकल एरिया से एयरपोर्ट के अंदर गया. साढ़े 3 बजे मुंडे के पार्थिव शरीर को सेना के विमान में चढ़ाने से पहले सेना के जवानों ने उन्हें गार्ड औफ औनर दिया. 4 बजे यह विमान मुंबई के लिए रवाना हो गया.

उधर पूछताछ के बाद गुरविंदर को उसी दिन पटियाला हाउस कोर्ट के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट पुनीत पाहवा की कोर्ट में पेश किया गया. स्पेशल ब्रांच उस का रिमांड लेना चाहती थी, लेकिन जमानती अपराध होने की वजह से मजिस्ट्रेट ने 30-30 हजार के 2 मुचलकों पर उसे जमानत दे दी.

गोपीनाथ पांडुरंग मुंडे का जन्म 12 दिसंबर, 1949 को जिला बीड की तहसील परली के छोटे से गांव नाथरा में हुआ था. उन के पिता पांडुरंग राव मध्यम वर्गीय किसान थे और मां लिंबाबाई घरेलू महिला. गोपीनाथ मुंडे की प्राथमिक शिक्षा गांव के ही सरकारी स्कूल में हुई. इस के बाद उन्होंने परली के जिला परिषद इंटर कालेज से इंटर किया. कामर्स में ग्रेजुएशन उन्होंने अंबेजोगाई के स्वामी रामतीर्थ महाविद्यालय से किया. इस के बाद मुंडे ने एलएलबी करने के लिए पुणे के आईएलएस कालेज में दाखिला लिया. यह 1975 की बात है.

इसी दौरान गोपीनाथ मुंडे की मुलाकात प्रमोद महाजन से हुई. महाजन के कहने पर मुंडे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़ गए. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ कर संघ की विचारधारा को भी उन्होंने तभी अपनाया. यह प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे की दोस्ती की भी शुरुआत थी और राजनीतिक जीवन की भी.

प्रमोद महाजन पहले से ही राष्ट्र स्वयं सेवक संघ से जुडे़ थे. साथ ही जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से भी.

इंदिरा गांधी ने जब देश में इमर्जेंसी लगाई तो जयप्रकाश नारायण के विरोध अंदोलनों से जुड़े होने की वजह से प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे को गिरफ्तार कर के नासिक जेल भेज दिया गया. दोनों 16 महीने तक साथसाथ नासिक जेल में रहे. इमर्जेंसी खत्म होने के बाद जब दोनों जेल से बाहर आए तो पूरी तरह राजनीति में उतर गए. उसी समय कई पार्टियों को जोड़ कर जनता पार्टी बनाई गई थी. महाजन और मुंडे जनता पार्टी में सक्रिय भूमिका निभाने लगे.

गोपीनाथ मुंडे जब पढ़ रहे थे तभी उन्हें प्रमोद महाजन की बहन प्रज्ञा महाजन से प्यार हो गया था. यह बात किसी से छुपी भी नहीं थी. प्रमोद महाजन उच्च जाति से थे जबकि मुंडे वंजारी जाति से थे जो पिछड़ी जातियों में आती है. लेकिन जब बात गोपीनाथ मुंडे और प्रज्ञा की शादी की आई तो प्रमोद महाजन और उन के परिवार ने मुंडे की काबिलियत को महत्व दिया न कि उन की जाति को. फलस्वरूप 21 मई, 1978 को प्रज्ञा और गोपीनाथ मुंडे का विवाह हो गया.

1978 में ही मुंडे ने जनता पार्टी से पहली बार महाराष्ट्र विधान सभा का चुनाव लड़ा, लेकिन वह कांग्रेस प्रत्याशी से हार गए. मुंडे का संबंध बीड के उस इलाके से था जहां सूखा पड़ने की वजह से किसान परेशान रहते थे. गोपीनाथ मुंडे जिला और राज्य स्तर पर किसानों के हित में आवाज भी उठाते रहते थे और उन की मदद भी करते थे जिस की वजह से पिछड़े समाज में उन की लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी. इसी के चलते वह बीड जिला परिषद के सदस्य बने.

1980 में जब जनता पार्टी भारतीय जनता पार्टी बनी तो महाराष्ट्र में पार्टी के पास कोई भी ऐसा चेहरा नहीं था जिसे आगे लाया जा सके. प्रमोद महाजन थे भी तो वह उच्च वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे. उन्हें पिछड़े हुए लोगों का नेता बता कर चुनाव लड़ना संभव नहीं था.

उन्हीं दिनों राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विचारक वसंत राव भागवत ने पिछड़े वर्ग को ले कर नई तरह की राजनीति की नींव रखी. इस के लिए उन्होंने माधव (माली), धनगर और वंजारी जातियों को पार्टी से जोड़ कर गोपीनाथ मुंडे को उन का चेहरा बनाया. प्रमोद महाजन वसंत राव भागवत के भी करीबी थे और मुंडे के भी. उन्होंने मुंडे का बढ़चढ़ कर साथ दिया.

इस का  नतीजा यह हुआ कि 1980 में गोपीनाथ मुंडे भाजपा से महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव जीत गए. इस के 5 साल बाद 1985 में मुंडे ने भाजपा के टिकट पर रेणापुर से विधान सभा का चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए. हार के बाद भी मुंडे ने अपने क्षेत्र में अपनी गतिविधियों में कोई कमी नहीं आने दी.

1990 में भाजपा शिवसेना गठबंधन ने जब महाराष्ट्र विधान सभा का चुनाव लड़ा तो गोपीनाथ मुंडे निर्वाचित हो कर फिर विधान सभा पहुंच गए. अब तक उन की पिछड़े वर्ग के नेता के रूप में अच्छी पहचान बन गई थी. उन्हें सदन में नेता विपक्ष बनाया गया.

1993 में जब मुंबई में बम विस्फोट हुए तो मुंडे ने एनसीपी नेता शरद पवार का नाम दाऊद इब्राहीम से जोड़ कर पूरे राज्य का दौरा किया. उन के इस प्रचार से शरद पवार की काफी बदनामी हुई. जबकि मुंडे महाराष्ट्र भाजपा का लोकप्रिय चेहरा बन गए.

1995 में जब महाराष्ट्र में चुनाव हुए तो भाजपा शिवसेना की गठबंधन सरकार सत्ता में आई. इस सरकार में गोपीनाथ मुंडे को उपमुख्यमंत्री बनाया गया. गृहमंत्रालय भी मुंडे को ही मिला. तब तक प्रमोद महाजन राष्ट्रीय राजनीति में शामिल हो कर दिल्ली आ गए थे. गृहमंत्री रहते हुए मुंडे ने मुंबई पुलिस को कई तरह के अधिकार दिए, साथ ही निर्देश भी कि जितने भी माफिया डौन हैं, उन से सख्ती से निपटा जाए. फलस्वरूप कई माफिया डौन एनकाउंटर में मारे गए.

प्रमोद महाजन राष्ट्रीय राजनीति में आ कर कद्दावर नेता और भाजपा सरकार में मंत्री जरूर बन गए थे, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में उन का पूरा दखल था और वह हर तरह से मुंडे की मदद करते रहते थे. 2006 में जब अपने ही भाई के हाथों प्रमोद महाजन की हत्या हो गई तो भाजपा को गहरा झटका लगा और मुंडे को भी.

लेकिन तब तक प्रमोद महाजन की छत्रछाया में चलने वाले गोपीनाथ राजनीति में न केवल अपनी जड़े जमा चुके थे बल्कि भाजपा में ओबीसी का बड़ा चेहरा बन कर भी उभर रहे थे. महाराष्ट्र में उन की गिनती लोकप्रिय नेता के रूप में होती थी. इसी के चलते 2007 में उन्हें महाराष्ट्र में भाजपा का महासचिव बनाया गया.

प्रमोद महाजन के बाद महाराष्ट्र से भाजपा का कोई ऐसा कद्दावर नेता नहीं था जिसे राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में लाया जा सके. इस के लिए 2009 के लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में चुना. इस तरह मुंडे राष्ट्रीय स्तर के नेता बन गए. उन की पहचान भीड़ जुटाने वाले नेताओं में होने लगी, जो उन की लोकप्रियता की पहचान थी. 2009 से 2014 के चुनावों तक गोपीनाथ मुंडे लोकसभा में भाजपा की ओर से सदन के उपनेता रहे.

2014 के लोकसभा के चुनाव में गोपीनाथ मुंडे ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई. वह नरेंद्र मोदी के कदमों के कदम मिला कर चले. यह उन की लोकप्रियता और नरेंद्र मोदी की लहर का ही परिणाम था कि महाराष्ट्र में भाजपा शिवसेना गठबंधन ने 48 में से 42 सीटों पर जीत हासिल की. उन की इसी सफलता और मेहनत के मद्देनजर उन्हें केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री बनाया गया था. इस के साथ ही उन्हें पंचायत कार्य और पेयजल विभाग भी सौंप दिए गए थे.

गोपीनाथ मुंडे के परिवार में पत्नी प्रज्ञा मुंडे के अलावा 3 बेटियां हैं – पंकजा पालवे, प्रीतम और यशश्री. पंकजा पालवे की शादी अमित पालवे से हो चुकी है और वे परली विधानसभा सीट से विधायक हैं. उन की दूसरी बेटी प्रीतम डाक्टर हैं और तीसरी यशश्री ला की पढ़ाई कर रही हैं.

बहरहाल, गोपीनाथ मुंडे का पार्थिव शरीर सेना के विशेष विमान से पहले मुंबई पहुंचा और वहां से उसे अगले दिन पौने 12 बजे लातूर होते हुए परली ने जाया गया. चूंकि उन के अंतिम संस्कार में कई बड़े नेताओं को शामिल होना था इसलिए परली में हैलीकाप्टरों के लिए 12 हैलीपैड बनाए गए थे.

पहले योजना थी कि परली में मुंडे के पार्थिक शरीर को तोतला मैदान में उसी जगह लोगों के दर्शनार्थ रखा जाएगा जहां उसी दिन उन के सम्मान समारोह की योजना थी. लेकिन वहां लोगों की ज्यादा भीड़ को देख कर कार्यक्रम बदल दिया गया. नई योजना के हिसाब से उन के शव को तोतला मैदान की जगह सीधे परली स्थित वैद्यनाथ सुगर फैक्ट्री परिसर ले जाया गया, जहां उन का अंतिम संस्कार होना था. वहां भी उन के अंतिम दर्शन के लिए हजारों लोग एकत्र थे.

गोपीनाथ मुंडे की मां लिंबाबाई अपने दूसरे बेटे के पास रहती थीं. बुद्धवार सुबह तक उन्हें मुंडे की मौत के बारे में कुछ नहीं बताया गया. लिंबाबाई को सीधे संस्कार स्थल पर ले जाया गया, जहां उन्होंने भरी आंखों और रुंधे गले से बेटे के अंतिम दर्शन किए.

गोपीनाथ मुंडे और नितिन गडकरी दोनों ही महाराष्ट्र से थे. यह बात सभी को मालूम थी कि अपने अपने आधिपत्य की चाह में दोनों के रिश्ते कभी अच्छे नहीं रहे. गडकरी नहीं चाहते थे कि राजनीति में मुंडे उन से बड़ा चेहरा बनें. इस के लिए उन्होंने कई बार मुंडे की राह में रोड़ा अटकाने की कोशिश भी कीं. नितिन गडकरी के भाजपा अध्यक्ष रहते गोपीनाथ मुंडे को उभरने का कोई मौका नहीं मिला था.

इसी सब की वजह से मुंडे समर्थक गडकरी से नाराज थे. संस्कार के समय उन्होंने गडकरी के खिलाफ नारेबाजी करते हुए मुंडे के साथ हुई दुर्घटना की सीबीआई जांच की मांग की. नारेबाजी और अफरातफरी के बीच उन्होंने तोड़फोड़ भी की और एक वाहन को आग लगा दी. इतना ही नहीं कुछ लोगों ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण की गाड़ी के बोनट पर चढ़ कर उधम भी मचाया.

भारी भीड़ और सुरक्षा के मद्देनजर संस्कार स्थल पर सुरक्षाबलों की कई कंपनियां लगाई गई थीं. हालात बिगड़ते देख सुरक्षा बलों ने ही भीड़ को खदेड़ कर स्थिति पर काबू किया.

बाद में गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा ने लोगों को समझाया, तो वे शांत हुए. बड़ी बेटी होने के नाते पंकजा ने ही पिता की चिता की मुखाग्नि दी.

मुंडे की चिता को जलते देख लोगों की आंखें भर आईं, फिर भी उन्होंने रुंधे गले से मुंडे जिंदाबाद के नारे लगाए. देखतेदेखते एक ऐसा लोकप्रिय नेता पंचतत्व में विलीन हो गया जिस ने 10 दिन पहले ही केंद्रीय मंत्री के रूप में शपथ ली थी.

मुंडे के निधन से भाजपा को बहुत बड़ी क्षति पहुंची है. दरअसल महाराष्ट्र में जल्दी ही विधान सभा चुनाव होने वाले हैं. भाजपा महाराष्ट्र में वहां के अति लोकप्रिय नेता मुंडे को सर्वोसर्वा बना कर चुनाव लड़ना चाहती थी. अगर जीत हासिल होती तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री गोपीनाथ मुंडे ही बनते. मुंडे खुद भी यही चाहते थे, लेकिन ऐसा हो पाता इस से पहले ही मौत का पंजा उन तक पहुंच गया.

हालांकि ऊपरी तौर पर गोपीनाथ मुंडे की मौत में कोई रहस्य नजर नहीं आता, फिर भी दिल्ली के पुलिस आयुक्त भीमसेन बस्सी ने इस मामले की हर नजरिए से जांच करने के लिए एक एसआईटी का गठन किया जिस में तुगलक रोड सब डिवीजन के एसीपी सुखराज कटेवा, थानाध्यक्ष प्रमोद जोशी, क्राइम ब्रांच के एसीपी सुरेश कौशिक और क्राइम ब्रांच के एक इंसपेक्टर को शामिल किया गया.

इस के अलावा भाजपा आलाकमान ने इस मामले की जांच की जिम्मेदारी सीबीआई को भी सौंप दी है ताकि इस घटना के पीछे कोई षड्यंत्र हो तो सामने आ सके. Gopinath Munde Death

— 2014 में प्रकाशित

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...